दुनिया के सामने एक वायरस और उससे उपजी महामारी पहले से मौजूद है। लेकिन इसके साथ-साथ ऐसी बीमारियाँ भी सामने आ रही हैं, जो बेहद भयावह हैं। अमेरिका के कई प्रांतों में सैलमोनेला (salmonella) नाम का संक्रमण बहुत तेज़ी से फैल रहा है। यह संक्रमण बैक्टीरिया से होता है और ज़्यादातर प्याज़ खाने से होता है।
पूरे अमेरिका में अब तक लगभग 640 लोग इसकी चपेट में आ चुके हैं। इनमें से लगभग 85 लोगों को भर्ती किया जा चुका है। Centers for Disease Control and Prevention (CDC) ने इस बारे में जानकारी दी। CDC ने इस बारे में चेतावनी भी जारी की है। चेतावनी में उन्होंने कहा, “अगर आपको इस बात की जानकारी नहीं है कि आपकी प्याज़ कहाँ से आई है या कहाँ की है? तब उसे मत परोसिए, मत मत खाइए और न ही बेचिए।”
फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने भी इस बारे में चेतावनी जारी की है। उनका साफ़ तौर पर कहना है कि उपभोक्ता किसी भी सूरत में प्याज़ का सेवन न करें। विशेष तौर पर लाल, सफ़ेद, पीली और मीठी प्याज़ का तो कतई नहीं। CDC का इस मामले पर यह भी कहना था कि भारी मात्रा में प्याज़ बड़े स्टोर्स में बेची गई हैं। जैसे वालमार्ट, क्रोगर, फ्रेड मेयर, पब्लिक्स, जायंट इगल, फूड लायन और एचईबी। इतना ही नहीं इन स्टोर्स में प्याज़ ब्रांड के तहत बेची गई हैं।
कई बड़े समूहों ने प्याज वापस बुलाई है। साथ ही ऐसे खाद्य उत्पाद भी वापस बुलाए हैं, जिनमें प्याज़ का इस्तेमाल होता है। इसमें चिकन सैलेड, मैक्रोनी सैलेड, फजीता स्टिर फ़्राय, पिज्जा और कच्ची प्याज़ भी शामिल है। CDC ने यह विशेष रूप से कहा है कि लोगों को जाँच करने की ज़रूरत है कि बड़े समूहों ने जिन खाद्य उत्पादों (प्याज़) को वापस बुलाया है, वैसे खाद्य उत्पाद उनके घरों में तो नहीं मौजूद हैं? अगर ऐसा है तो वह उसे तुरंत नष्ट कर दें। CDC के मुताबिक़ प्याज़ संबंधित किसी भी तरह के खाने को अभी के लिए नज़रअंदाज़ करना है।
सैलमोनेला के मुख्य लक्षण डायरिया, बुखार और पेट में दर्द है। सैलमोनेला के बैक्टीरिया संपर्क में आने के बाद इस संक्रमण के लक्षण घंटे से लेकर 6 दिन के बीच नज़र आते हैं। इस संक्रमण का असर सबसे ज़्यादा उन पर पड़ता है, जिनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर होती है। यानी 5 साल से कम उम्र के बच्चे और 65 साल से अधिक उम्र के बुजुर्गों पर इस संक्रमण का ख़तरा सबसे ज़्यादा रहता है। कुछ मामलों में संक्रमण आंतों से होते हुए शरीर के बाकी हिस्सों में भी फैल जाता है। इस तरह के मामलों में मरीज़ को भर्ती कराना पड़ता है।
CDC अमेरिका के लोगों से इस बात का निवेदन कर रहा है कि अगर उनमें इसके लक्षण नज़र आते हैं, तो वह सबसे पहले इस बात की जानकारी दें कि उन्होंने बीमारी के एक हफ्ते के पहले क्या खाया था। वह स्वास्थ्य विभाग को इस बात का संक्षिप्त ब्यौरा दें और उसके बाद स्वास्थ्य अधिकारी उनकी जाँच करेंगे।
इस संक्रमण के मामले अमेरिका के कई प्रांतों में नज़र आए हैं। इसमें एरिज़ोना, कैलिफोर्निया, कोलोराडो, फ्लोरिडा, इंडियाना, इलीनोयस, इडाहो, लोवा, कनसेस, केंटकी, माइने, मैरीलैंड, मिनेसोटा, मिसोरी, मोंटाना, नेवाडा, न्यूयॉर्क, नार्थ कैरोलाइना, नार्थ डकोटा, ओहियो, ऑरेगोन, पेन्सिल्वेनिया, साउथ कैरोलाइना, टेक्सस और वर्जीनिया जेर प्रांत मुख्य हैं।
कॉन्ग्रेस के लिए अभी तक स्थायी अध्यक्ष न चुन पाना अब उनकी पार्टी के अस्तित्व के लिए खतरा बन सकती है। संडे गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार अगर कॉन्ग्रेस, चुनाव आयोग को संतोषजनक स्पष्टीकरण देने में विफल रहती है कि वह पिछले साल राहुल गाँधी के इस्तीफे के बाद स्थायी अध्यक्ष का चुनाव क्यों नहीं कर पाई है, तो पार्टी को निलंबन या अयोग्यता का सामना करना पड़ सकता है।
बता दें कि 2019 के आम चुनावों में हार के बाद राहुल गाँधी ने अध्यक्ष के पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद कॉन्ग्रेस कार्य समिति द्वारा सोनिया गाँधी को अंतरिम अध्यक्ष बनाया गया था। सोमवार को बतौर अंतरिम अध्यक्ष उनका साल भर पूरा हो जाएगा।
पार्टी का दावा है कि कोरोना वायरस महामारी के कारण नए प्रमुख का चुनाव करने की प्रक्रिया को स्थगित कर दिया गया है और सामान्य स्थिति बहाल होते ही चुनाव आयोग के प्रावधानों का अनुपालन करने का आश्वासन दिया गया है।
चुनाव आयोग प्राय: पार्टी के आंतरिक मुद्दों में हस्तक्षेप करने से दूर रहता है। हालाँकि, अगर वह चाहे तो किसी भी राजनीतिक पार्टी के खिलाफ नियमों और विनियमों का पालन करने में विफल रहने के लिए कार्रवाई शुरू कर सकता है। चुनाव आयोग सिंबल ऑर्डर के तहत चुनाव चिह्न को भी फ्रीज कर सकता है।
राजनीतिक दल, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 29 (A), उप-खंड (V) द्वारा शासित होते हैं। इसकी शुरुआत 1989 में हुई। कॉन्ग्रेस सहित प्रत्येक राजनीतिक दल को खुद को फिर से पंजीकृत करना होगा, और भारत के संविधान के प्रति अपनी निष्ठा दिखाने और नियत समय पर होने वाले चुनावों में भाग लेने के लिए सहमत होना होगा।
हालाँकि अनिवार्य अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए कोई नियम नहीं हैं। चुनाव आयोग समय-समय पर इस मामले पर निर्देश दे सकता है। चुनाव आयोग अब जाँच कर सकता है कि क्या कॉन्ग्रेस संगठन में पद खाली होने के बाद एक निश्चित अवधि के भीतर नए अध्यक्ष के चुनाव के संबंध में कोई विशेष प्रावधान है। आयोग पार्टी को इस निर्धारित समय सीमा के भीतर आंतरिक चुनाव कराने का आदेश दे सकता है।
ग्रैंड-ओल्ड-पार्टी के लिए चिंता का विषय यह है कि पार्टी के भीतर संकट और अधिक गहरा जाने की संभावना है। अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी को हाल ही में गंगा राम अस्पताल में कुछ स्वास्थ्य जटिलताओं के कारण भर्ती कराया गया था। यदि वह अपनी वार्षिक मेडिकल चेकअप के लिए विदेश जाने का फैसला करती है, तो पार्टी को उनकी जगह किसी और को चुनने की आवश्यकता हो सकती है, खासकर अगर राहुल गाँधी कार्यभार सँभालने के लिए अनिच्छुक हैं। पार्टी का अध्यक्ष केवल ऑल इंडिया कॉन्ग्रेस कमिटी द्वारा ही चुना जा सकता है।
इस बीच, पार्टी के वरिष्ठ नेताओं सहित पार्टी कैडर की माँग है कि AICC को जल्द से जल्द संगठनात्मक पदों पर नियुक्ति की जाए। साथ ही वे कॉन्ग्रेस संसदीय बोर्ड की विधिवत निर्वाचित कार्यसमिति के साथ, व्यापक आधार रखने वाले नेताओं को प्रतिनिधित्व प्रदान करने की भी माँग कर रहे हैं।
इन दिनों चूँकि कई पावर सेंटर्स उभरे हैं, इसलिए कॉन्ग्रेस पार्टी वर्तमान में भाजपा के दाँव-पेंच को लेकर काफी अतिसंवेदनशील और सतर्क है। कॉन्ग्रेस नेताओं का मानना है कि संगठन की वर्तमान स्थिति नेतृत्वहीन और दिशाहीन है।
मध्य प्रदेश में इस साल की शुरुआत में पार्टी की सरकार गिर गई थी। वहीं राजस्थान सरकार संकट का सामना कर रही है। ऐसी भी रिपोर्टें हैं, जो बताती हैं कि छत्तीसगढ़ सरकार भी मध्यप्रदेश की तरह गिर सकती है। झारखंड में गठबंधन की सरकार को भी अपना भविष्य खतरे में नजर आ रहा है। वहीं भाजपा, कॉन्ग्रेस के भीतर चल रहे ड्रामे पर करीब से नजर रखे हुए है और बदली परिस्थितियों का लाभ उठाने का इंतजार कर रही है।
कॉन्ग्रेस पार्टी के पास प्रमुख मुद्दों में से एक राहुल गाँधी की अस्पष्टता है। एक ओर उन्होंने कथित तौर पर यह स्पष्ट कर दिया है कि वह पार्टी प्रमुख के रूप में वापस नहीं लौटना चाहते हैं, वहीं दूसरी ओर, जब उनके करीबी सहयोगी उनकी बहाली की माँग उठाते हैं, तो वह चुप रहना पसंद करते हैं।
इसके अलावा, सोनिया गाँधी का स्वास्थ्य उन्हें अध्यक्ष के रूप में सक्रिय रहने की अनुमति नहीं देता है। इसलिए, पार्टी को संगठन के हित में जल्द से जल्द उन्हें जिम्मेदारियों से मुक्त करना पड़ सकता है। हालाँकि, प्रमुख चिंताओं में से एक यह है कि उसके लंबे कार्यकाल ने निर्णय लेने की प्रक्रिया को केंद्रीकृत कर दिया है। पार्टी के ज्यादातर फैसले वे बिना किसी परामर्श प्रक्रिया के खुद ही लेती हैं।
जब से सोनिया गाँधी ने पार्टी की बागडोर सँभाली, वह सर्वोच्च नेता रही हैं। वह यूपीए शासन के दौरान राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की संयोजक भी थीं। कुछ का मानना है कि अधिकार और शक्ति का इस तरह एक हाथों में होने से पार्टी को नुकसान हुआ है। इसके अलावा, दलित-मुस्लिमों की तरफ झुकाव ने पार्टी को कमजोर कर दिया है।
पार्टी के वरिष्ठ नेता अब इस विचार में हैं कि एक बार राहुल गाँधी के निर्णय के बाद, पार्टी को संगठनात्मक चुनाव के जरिए गैर-गाँधी का चयन करना चाहिए। कुछ समय के लिए कमलनाथ या भूपिंदर सिंह हुड्डा जैसे को प्रमुख बनाया जा सकता है। युवा नेता चुनाव में भाग लेकर पार्टी के भीतर अपनी हैसियत का अंदाजा लगा सकेंगे। इन चुनावी बाधाओं को जीतने वाले नेताओं को भविष्य के नेताओं के रूप में चुना जा सकता है।
महाराष्ट्र के अकोला में माउंट कार्मेल सेकेंडरी एंड हायर सेकेंडरी स्कूल ने शनिवार (8 अगस्त, 2020) को VI (A) स्टैण्डर्ड में पढ़ाने वाली सुनीता जोसफ नाम की एक शिक्षक को निलंबित कर दिया। जोसफ ने स्कूली छात्र-छात्राओं के आधिकारिक व्हाट्सएप ग्रुप में शुक्रवार को एक अपमानजनक हिन्दुफोबिक फेसबुक पोस्ट शेयर किया था।
माउंट कार्मेल की शिक्षिका ने एक कुत्ते को भगवान गणेश की मूर्ति के पास पेशाब करते हुए एक आपत्तिजनक पोस्ट शेयर किया था। सुनीता ने इस हिंदू विरोधी पोस्ट के साथ एक बेहद ही घटिया कैप्शन भी दिया, “कुत्ते को पूरा विश्वास है कि यह पत्थर है और कुछ नहीं। लेकिन पता नहीं ये बात भारतीयों को क्यों समझ नहीं आती।”
हालाँकि, एक हिंदू देवता के प्रति घटिया मानसिकता वाली बात कहने और छोटे बच्चों के ब्रेनवॉश करने की नापाक कोशिश करने पर स्कूल अधिकारियों ने तुरंत इस मामले पर कार्रवाई की। माउंट कार्मेल हाई स्कूल के प्रिंसिपल फादर माथैव करिकाल ने शिक्षक सुनीता जोसेफ को संबोधित कर एक पत्र में बताया कि उन्हें तत्काल प्रभाव से शिक्षक पद से निलंबित कर दिया गया है।
निलंबन आदेश में लिखा गया, “यह मामला भले ही गलती से भी हुआ हो, लेकिन इसे किसी भी कीमत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। मुझे यह बताते हुए खेद है कि आपको तत्काल प्रभाव से सेवा से निलंबित कर दिया गया है।”
बंगाल के देगंगा (Deganga) में सितंबर 06, 2010 को सोमवार के दिन दंगे शुरू हो गए थे और कई दिनों तक जारी रहे थे। कोलकाता से लगभग 150 किलोमीटर दूर उत्तर 24 परगना के बशीरहाट इलाके में मजहबी उपद्रवियों द्वारा हिन्दू परिवारों को निशाना बनाया गया, जिसमें कई हिन्दू परिवार और पुलिसकर्मी तक बुरी तरह घायल हुए। हिन्दुओं के घर और संपत्तियों को तहस-नहस कर दिया गया और पूरे इलाके में मौजूद मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया।
इसका परिणाम यह हुआ कि कई लोगों की निर्मम हत्याएँ हुईं और कई लोगों को बेघर होना पड़ा। इस दंगे की वजह सिर्फ यह थी कि विवादित कब्रिस्तान के चारों ओर एक दीवार का निर्माण किया जा रहा था। मजहबी कट्टरपंथियों का मकसद हिन्दुओं को वहाँ मौजूद दुर्गा मंदिर के पूजा पंडाल में प्रवेश करने से रोकना और उस भूमि पर अपना नियंत्रण स्थापित करना था।
पीड़ित हिन्दुओं के अधिकारों और उन पर दंगों के दौरान हुए अत्याचारों का हिसाब क्या रहा होगा, इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब देगंगा में शरणार्थी हिन्दू अपनी घरों से जान बचाने के लिए यहाँ-वहाँ भाग रहे थे, उस साल 2010 में पश्चिम बंगाल में वामपंथी सरकार थी, जिसके मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य थे और केंद्र में UPA सरकार थी, जिसकी लगाम लंबे दौर से सोनिया गाँधी के हाथों में ही थी।
भारत जैसे सेक्युलर देश में हिन्दुओं के खिलाफ ‘डरे हुए शंतिप्रियों’ द्वारा एक नहीं बल्कि अनेकों बार प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस ‘मनाए’ गए हैं। देगंगा दंगा इसी का एक और उदाहरण है। TMC सांसद नुरुल इस्लाम के नेतृत्व में दंगाई भीड़ के अत्याचारों के बाद दोनों ही धर्मों- ख़ास मजहब और हिन्दू, द्वारा अपने भाग्य पर छोड़ दिए हिन्दू इस देश की धर्म निरपेक्षता के असली गवाह हैं। हिन्दुओं के घरों में तोड़फोड़ की गई, हिन्दुओं की दुकानों में आग लगा दी गई, हिंदू मंदिरों को उजाड़ दिया गया। यह सब तब हुआ, जब इस्लामिक बर्बरता के छोटे से उदाहरण के सामने मजबूर होकर जिला प्रशासन और पुलिस ने कान पकड़ लिए थे। पश्चिम बंगाल में मार्क्सवादियों को समुदाय विशेष के समर्थन की जरूरत रहती आई है। जबकि, TMC की बुनियाद ही खास समुदाय के समर्थन से ज्यादा हिन्दू-घृणा पर टिकी है।
मीडिया द्वारा विवाद का कारण दुर्गा माता के एक मंदिर का मंडप बताया गया था- इस जगह हर साल बंगालियों का सबसे बड़ा धार्मिक त्योहार दुर्गा पूजा आयोजित किया जाता था। मंडप के पीछे की जमीन एक सुनसान और विवादित कब्रिस्तान है, जिसका मालिकाना हक अदालत में काफी समय से लंबित रहा। इस स्थान को ‘चट्टलपल्ली’ कहा जाता है। कोई भी बंगाली-भाषी व्यक्ति इस नाम से ही तुरंत समझ जाएगा कि यह गाँव पूर्वी बंगाल के चटग्राम या चटगाँव जिले के विभाजन के बाद हिंदू शरणार्थियों द्वारा स्थापित किया गया था।
यहीं पर एक संकरा कच्चा रास्ता दुर्गा मंडप और चट्टलपल्ली को मुख्य सड़क से जोड़ता है। स्थानीय कट्टपंथियों ने मुख्य सड़क से दुर्गा मंडप और गाँव, दोनों को अलग करने के लिए इस रास्ते पर एक नहर खोदना और दीवार निर्माण करना शुरू कर दिया। वे पहले ही विवादित कब्रिस्तान पर अपने अधिकार का दावा कर चुके थे। वो इस मार्ग को अवरुद्ध करना चाहते थे, जिससे उन्हें मंदिर की जमीन को जल्द से जल्द हासिल करने में मदद मिलती। लेकिन, स्थानीय हिंदुओं ने समुदाय विशेष वालों की इस हरकत का विरोध किया।
मंदिर के इस संकरे मार्ग को लेकर लोगों ने विवाद किया था (चित्र साभार- हिन्दूसमहाति ब्लॉग)
वर्ष 2010 में जब हिन्दुओं को उनके अधिकारों के लिए प्रताड़ित किया गया तो बंगाली मीडिया अपनी रिपोर्ट में यह नैरेटिव चलाने का काम कर रहा था कि हिंदू समूह सांप्रदायिक आग भड़का रहे हैं और बशीरहाट के तृणमूल कॉन्ग्रेस के सांसद हाजी नुरुल इस्लाम (Haji Nurul Islam) को अपमानित कर रहे हैं। तृणमूल कॉन्ग्रेस के सासंद… जी हाँ, वही TMC, जिसकी मुखिया ममता बनर्जी आज बंगाल में हिन्दुओं को ‘जय श्री राम’ का नारा लगाने पर गिरफ्तार कर लेती हैं। दंगा पीड़ित स्थानीय लोगों ने तब कहा था कि इन दंगों का असली जिम्मेदार इसी नुरुल हाजी ही था। इस सांसद को दंडित करने की माँग को लेकर बसीरहाट से 25 किलोमीटर दूर इलाके तक पोस्टर और लोगों द्वारा प्रदर्शन किए गए।
इस हिंसक रैली में हिंदुओं के सैकड़ों घरों और दुकानों को तबाह कर दिया गया, इसके अलावा वाहनों और पुलिस की गाड़ियों में आग लगा दी गई। स्थानीय निवासियों ने कहा था कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि इन दंगों का मुख्य खलनायक नुरुल इस्लाम ही था।
सदियों पुराने दुर्गा मंदिर को कब्जाना चाहते थे दंगाई
देगंगा के स्थानीय बहुसंख्यक दुर्गा मंडप की ओर जाने वाले हिंदूओं का मार्ग बाधित करने की कोशिश कर रहे थे। ये वो जगह थी, जहाँ तब पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) से आए कई पीड़ित हिन्दू शरणार्थी रहा करते थे। पास के ही दूसरे मजहब के लोग उन्हें पूजा स्थलों और उनके घरों में घुसने से रोकते थे। लोगों द्वारा मंदिर पंडाल के रास्ते को खोदने का मुख्य कारण वहाँ बनाए गए ‘मजहबी कब्रिस्तान’ के नाम पर मंदिर की भूमि को हड़पना था।
इस्लामिक आतंक के तीन दिन
6 सितम्बर की सुबह उपद्रवियों ने दुर्गा मंदिर के पंडाल का मार्ग यह कहकर खोदना शुरू कर दिया कि वह कब्रिस्तान की जमीन है। लेकिन वास्तविकता यह थी कि इस दुर्गा मंदिर में पिछले चालीस वर्षों से विशाल दुर्गा पूजा का आयोजन होता आया था और इसे लेकर किसने भी आपत्ति नहीं की थी।
काली माता के मंदिर को तोड़कर मूर्ति खंडित कर दिया गया था
जब हिंदुओं ने मंदिर के रास्ते की खुदाई करने पर आपत्ति जताई तो उन पर मजहबी भीड़ द्वारा हमला किया गया। विवाद बढ़ने पर स्थानीय हिन्दू परिवारों ने पुलिस को इसकी सूचना दी। पुलिस जब वहाँ पहुँची और उपद्रवियों को रोकने की कोशिश की तो मजहबी भीड़ ने पुलिस को ही बुरी तरह से मारा और पीटा।
इस हिंसक झड़प में थाना प्रभारी अरूप घोष को सिर में चोटें आईं और एक हाथ में फ्रैक्चर हो गया। यही नहीं, उपद्रवियों ने शाम को फिर से हिंदुओं को अच्छा सबक सिखाने की धमकी दी।
शाम को लगभग 8.30 बजे, करीब 2000 लोगों की भीड़ देगंगा, कार्तिकपुर और बेलियाघाटा के बाजार क्षेत्रों पर उतरी और बड़े स्तर पर आगजनी, तोड़फोड़ और हिंसा की। हिंदुओं की दुकानें बुरी तरह से लूटी गईं, जला दी गईं और उन्हें नष्ट कर दिया गया। हिंदू समुदाय की बस्तियों से लगी सड़कों पर आग लगा दी गई।
अगले दिन, मंगलवार की सुबह, 7 सितंबर को TMC सांसद हाजी नुरुल इस्लाम के नेतृत्व में हथियारबंद कट्टरपंथियों की बड़ी भीड़ देगंगा पुलिस स्टेशन पहुँची और पुलिस को धमकाया। इस सशस्त्र मजहबी भीड़ का नेतृत्व मकबुर रहमान और मिंटू साहजी जैसे स्थानीय लोगों ने किया।
पुलिस द्वारा लगाई गई धारा 144 को ताक पर रखते हुए सभी आदेशों को नजरअंदाज कर दिया गया। मजहबी भीड़ ने भारी गोलाबारी की और बम फेंके। इसी बीच इसी भीड़ ने वहीं फाल्टी गाँव के एक मजहब विशेष के युवक को ही बेलियाघाटा पुल पर गलती से गोली मार दी और उसकी मौत हो गई।
इसके बाद, पुलिस दल और अधिकारी रैपिड एक्शन फोर्स के एक विशाल दल के साथ दंगों को नियंत्रित करने के लिए वहाँ पहुँचे। लेकिन, दोनों डीएसपी को भीड़ ने जमकर पीटा। अशोक रे को रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) द्वारा बचाया गया और एक नर्सिंग होम में स्थानांतरित कर दिया गया।
सुबह 11 बजे, डीआईजी (प्रेसीडेंसी रेंज) सिद्धनाथ गुप्ता, उत्तर 24 परगना के डीएसपी राहुल श्रीवास्तव और डीएम विनोद कुमार ने एक आपात बैठक बुलाई और जिले के 15 पुलिस थानों के पुलिसकर्मी मजहबी
दंगाइयों को रोकने में नाकाम रहे।
दोपहर 1.30 बजे, एसडीपीओ (बारासात) महमूद अख्तर ने धारा-144 की घोषणा की। जिला पुलिस, रैपिड एक्शन फोर्स और बीएसएफ भी हालात नियंत्रित करने में असफल रहे तो राज्य सरकार ने सेना को बुलाया।
शाम तक किसी तरह सेना की दो बटालियन देगंगा इलाके में प्रवेश कर पाईं। अब तक दंगों और यातनाओं को झेल रहे तड़पते हुए ग्रामीण हिन्दू इस आशा में अपने घरों से बाहर निकले कि अब उन्हें किसी सुरक्षित जगह ले जाया जा सकेगा।
कट्टरपंथियों ने हिन्दू मंदिरों को कर दिया था बुरी तरह से तबाह
दंगाइयों की सशस्त्र भीड़ ने हिंदू मंदिरों में बुरी तरह से तोड़फोड़ की। देगंगा की ही कॉलोनी में स्थित काली मंदिर को भीड़ ने खंडित कर दिया था। ये दंगाई वहाँ बेलियाघाटा, साशन और बशीरहाट से ट्रकों में पहुँचे थे। काली मंदिर को तृणमूल कॉन्ग्रेस के सांसद हाजी नुरुल इस्लाम के नेतृत्व में तोड़ दिया गया।
जब वहाँ मौजूद हिंदुओं ने इसका विरोध किया तो उन्हें उपद्रवियों की भीड़ ने उनका पीछा तलवारों और खंजर से किया और उन पर बम फेंके गए। उन्होंने काकड़ा मिर्जा नगर काली मंदिर को भी जला दिया। कार्तिकपुर के शनि मंदिर को भी इस भीड़ द्वारा खंडित कर दिया गया था। इस पर देगंगा बाजार के पास मस्जिद का लाउडस्पीकर फहराता था, जबकि यह यह धार्मिक स्थलों पर लाउडस्पीकर के प्रयोग पर उच्च न्यायालय के आदेश के भी खिलाफ था।
दंगों में जलाए गए घर, मंदिर, और नदी में डुबोई गई पुलिस के वैन की तस्वीरें –
बुधवार की सुबह, 8 सितंबर को रामनाथपुर और खेजुरंगा में एक सशस्त्र भीड़ ने सलिमपुकुर और अस्पताल में हिंदुओं को निशाना बनाया और उन पर हमला किया। सलिमपुकुर में 23 घरों में तोड़फोड़ की गई, पीड़ितों ने पास के कार्तिकपुर इलाके में शरण ली। देगंगा थाने के प्रभारी अधिकारी अरूप घोष ने दंगाइयों के खिलाफ एक पुलिस दल का नेतृत्व किया, जिन पर दंगाइयों ने जमकर पथराव किया और उन पर ईंट-पत्थर बरसाए। पुलिसकर्मियों के सिर पर इस पथराव में गंभीर चोट आई और वो घायल हो गए।
दंगों के बाद
भारी दंगों के बाद सेना की मौजूदगी के बावजूद आखिरकार बृहस्पतिवार को हिंसा की छिटपुट घटनाएँ होती रहीं। शुक्रवार के दिन तक किसी तरह स्थिति शांत हुई, हालाँकि पूरे क्षेत्र में तनाव और भय पसरा था।
हिन्दू, विशेषकर वो महिलाओं जो मजहबी दंगाइयों के उत्पीड़न के बाद अपने घरों से भाग गईं, अभी तक भी अपने घरों को नहीं लौटीं थीं। हिन्दुओं के घरों को निशाना बनाकर उन्हें तहस-नहस कर दिया गया था और संपत्तियों को लूटा गया था। मजहबी भीड़ ने हिन्दुओं के घरों को आग लगा दी थी और मंदिरों को खंडित कर दिया था। भयभीत लोग तीन-चार दिन बाद अपने घरों को वापस लौट आए।
पोस्टर में लिखा है – “हिन्दुओं से नफरत करने वालों के नेतृत्व में हिन्दुओं पर हमला क्यों किया गया था? मिर्ज़, मक़ुलाकर, सोहराब और तालेब (स्थानीय गुंडे और घटिया नेता)? हम सरकार से जवाब माँगते हैं। हस्ताक्षर – ग्रामीण।”
करीब साठ पीड़ित हिन्दुओं ने पुलिस स्टेशन में दंगाइयों के खिलाफ FIR दर्ज कराई थीं। जाँच दल ने अपनी इन्वेस्टिगेशन में पाया था कि 6 सितम्बर को शफ़िक, अलाउद्दीन, अरब, फ़रीद, फ़ज़लू, अफ़ज़ल, मोहम्मद याकूब और हसिया और डोगाचिया गाँव के 100 से अधिक लोग घरों में बनी कुल्हाड़ी, लोहे की रॉड और हथियारों से लैस थे, जिन्होंने लोगों पर हमला किया और हिंदू व्यापारियों की दुकानों को लूटना और उन्हें आग के हवाले करना शुरू कर दिया था।
दस साल बाद हुए दिल्ली के हिन्दू-विरोधी दंगों की झलक
बंगाल के देगंगा में हुए यह दंगे 2010 की घटना है, जबकि इसके ठीक दस साल बाद दिल्ली में जो हिन्दू-विरोधी दंगे हुए, उनमें भी यही तरीके देखे गए। जो यह बताता है कि एक सम्प्रदाय विशेष अपनी निशानदेही और दंगों के तरीकों में कितनी स्पष्ट रणनीति को अपनाता है।
देगंगा में भी पुलिस पर हमला किया गया था, पथराव किया गया था, निशाना बनाया गया, हिन्दुओं के परिवारों और उनकी दुकानों को निशाना बनाया गया था। कितनी दिलचस्प बात है कि ठीक यही शैली 2020 की शुरुआत में पूर्वोत्तर दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों में भी अपनाई गई थी।
यह सभी बातें, सभी घटनाएँ और तरीके सब एक ही निष्कर्ष तक पहुँचाती हैं। ‘अच्छा मजहबी और बुरा मजहबी’ जैसे वाक्यांशों को सिर्फ मिथक और कपोल कल्पना साबित करने पर मजबूर करती हैं। एक मजहब द्वारा हिन्दुओं को उन्हीं के देश में प्रताड़ित करने के ऐसे ही कई और किस्से हैं, जिन्हें मीडिया की कारस्तानी और राजनीतिक षड्यंत्रों ने कभी सामने आने ही नहीं दिया और जिन पर बात तक नहीं की गई है।
भाजपा नेता कपिल मिश्रा ने बताया कि उन्हें आम आदमी पार्टी के एक दलित कार्यकर्ता ने फोन कर के बताया है कि शनिवार (अगस्त 8, 2020) की रात AAP दलित मोर्चा के लोगों ने संजय सिंह की पिटाई कर के उनका मुँह काला किया। दिल्ली के पूर्व मंत्री कपिल मिश्रा ने पूछा कि क्या ये सही है? बकौल कपिल मिश्रा, उन्हें सूचना मिली कि दलित गुस्से में पूछे रहे थे कि दिल्ली में दलित उप-मुख्यमंत्री क्यों नहीं है?
कपिल मिश्रा ने ट्विटर पर बताया कि संजय सिंह की पिटाई कर के उनका मुँह काला करने वाले उनकी ही पार्टी के दलित कार्यकर्ता ये पूछ रहे थे कि पार्टी PAC में कोई दलित क्यों नहीं है? साथ ही वो ये भी पूछ रहे थे कि आम आदमी पार्टी ने राज्यसभा में किसी दलित को क्यों नहीं भेजा? बता दें कि कपिल मिश्रा भी AAP से ही भाजपा में आए हैं। उन्होंने दिल्ली दंगों को लेकर भी कई खुलासे किए थे।
हाल ही में आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने सोशल मीडिया पर झूठ फैलाया था। उन्होंने भाजपा को दलित विरोधी पार्टी ठहराने के लिए ट्विटर पर झूठ फैलाया। इसके बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर ‘संजय सिंह झूठा है’ ट्रेंड करने लगा। AAP नेता ने दावा किया था कि उत्तर प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या को अयोध्या स्थित राम जन्मभूमि कार्यक्रम में बुधवार (अगस्त 5, 2020) को नहीं बुलाया गया, क्योंकि वो दलित हैं।
AAP के दलित कार्यकर्ता ने फोन करके बताया
कल रात AAP के SC मोर्चा के लोगों ने संजय सिंह जी की पिटाई की और मुंह काला किया
मौर्या ने उसी दिन ट्विटर पर फोटो डाल कर बताया था कि वो श्री राम जन्मभूमि परिसर में आयोजित भूमि पूजन कार्यक्रम के साक्षी बन रहे हैं। उन्होंने ट्वीट किया था, “श्री राम जन्मभूमि परिसर में आयोजित भूमि पूजन कार्यक्रम के भव्य पंडाल में ऐतिहासिक दिन का साक्षी बन रहा हूॅं। परम सौभाग्य एवं अद्भुत और अलौकिक आनंद की अनुभूति कर रहा हूॅं।”
मौर्या ने 5 अगस्त को ही यह ट्वीट किया था। बावजूद 7 अगस्त को संजय सिंह ने ट्विटर पर लिखा कि उन्हें एक दलित नेता ने बताया है कि राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को राम मंदिर भूमिपूजन कार्यक्रम में इसीलिए नहीं बुलाया गया क्योंकि वो दलित हैं और केशव प्रसाद मौर्या को भी इसीलिए नहीं बुलाया गया। उन्होंने पूछा कि भाजपा ऐसा क्यों करती है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा दलितों को मंदिर के बाहर रखना चाहती है।
सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में शेखर गुप्ता की वेबसाइट ‘द प्रिंट’ ने एक लेख प्रकाशित किया। इस लेख का शीर्षक और इसकी तमाम बातें ऐसी हैं जिनका न तो कोई आधार है और न अर्थ। लेख की शैली से स्पष्ट था कि इसका उद्देश्य एक क्षेत्र और समूह के लोगों को निशाना बनाना है। सुशांत सिंह के बहनोई विशाल कीर्ति ने इसका जवाब दिया है।
विशाल ने लिखा है कि वह इस लेख का जवाब नहीं देना चाहते थे। लेकिन जब उन्हें लगा कि इसका प्रभाव उनके नज़दीकी लोगों पर पड़ रहा है तो उन्होंने जवाब देने का फैसला किया।
प्रिंट के लेख में कहा गया था कि जिस तरह सुशांत सिंह के परिवार ने प्रतिक्रिया दी है उससे यह स्पष्ट है कि बिहारी परिवार में बेटा होना किसी बोझ से कम नहीं है। लेख में यह भी आरोप लगाया गया है कि बिहारी परिवार के लोगों का रवैया अपने बेटों के लिए बुरा होता है।
विशाल कीर्ति ने लिखा है कि इस मसले पर वे पूर्व में बरखा दत्त को जवाब दे चुके हैं। सुशांत सिंह की मौत मनोवैज्ञानिक मुद्दों पर बात करने का माध्यम नहीं हैं। सुसैन जो सुशांत के बाईपोलर होने का दावा कर रही थीं, उसका आधार क्या था? जानकार मनोविज्ञान से जुड़े ऐसे दावे करने में सालों खर्च करते हैं और सुसैन तो सुशांत से कुछ महीने पहले मिली थीं। अगर अदालत में यह साबित हो जाता है कि सुशांत अवसाद से जूझ रहे थे तो मैं सम्मान के साथ इसे सबसे पहले स्वीकार करूॅंगा।
विशाल ने लिखा है कि वे खुद एक बिहारी परिवार से हैं। उनके परिवार की भावना उनकी पत्नी को लेकर बिलकुल वैसी नहीं है जिस तरह के दावे फिलहाल किए जा रहे हैं। उन्होंने लिखा है कि बिहार में ऐसे लाखों शिक्षित और मध्यम वर्गीय परिवार हैं, जिनका रवैया अपने बेटे और उनकी पत्नी या गर्लफ़्रेंड के लिए बेहद सरल और सहज है। लेकिन कुछ परिवारों को देख कर इतना बड़ा दावा कर देना टॉक्सिक जर्नलिज्म (विषाक्त पत्रकारिता) से कम नहीं है। बिहार के परिवारों को लेकर इस तरह के पूर्वाग्रह और रुढ़िवादी मानसिकता खुद में घिनौना है। ’
विशाल ने कहा है कि एफ़आईआर को महिला विरोधी पहलू देकर मुद्दे की दिशा बदली नहीं जा सकती है। मैं न तो किसी पर आपराधिक आरोप लगा रहा हूँ और न ही सुशांत के पिता की तरफ से बात कर रहा हूँ।
उन्होंने कहा है, “मैंने पिछले कुछ समय में सुशांत की मृत्यु पर हुई पत्रकारिता और विमर्श को बहुत करीब से देखा है। मेरे और सुशांत के रिश्ते बहुत अच्छे थे। हम जब भी मिलते किताबों और फिल्मों पर बात करते थे। मैं उसे और उसकी बहन को 1997 से जानता हूँ। हम एक ही स्कूल में पढ़ते थे। सुशांत उन दिनों बहुत प्यारा और शर्मीला था। उसे ज़्यादातर लोग उसकी बहन की वजह से पहचानते थे। लोग हमें ‘जीजा-साला’ कह कर चिढ़ाते थे। मैं 2006 में अमेरिका चला गया था लेकिन सुशांत का स्वभाव ऐसा था कि 2019 तक उसके संपर्क में था।”
विशाल ने लिखा है कि रिया द्वारा सुशांत को दवाओं का ओवरडोज़ देने की खबरें आ रही है। इससे पता चलता है कि उसका नुकसान ऐसे इंसान ने किया जिससे उसे बहुत ज्यादा लगाव था। जब तक यह बात साबित नहीं होती कि सुशांत ने मानसिक बीमारी के प्रभाव में आत्महत्या की है, तब तक मनोविज्ञान से जुड़े मुद्दे पर जागरूकता फैलाना किसी मूर्खता से कम नहीं है।
उत्तर प्रदेश STF की टीम ने हनुमान पांडेय उर्फ राकेश पांडेय को मार गिराया है। उस पर एक लाख रुपए का ईनाम था। वह बीजेपी के विधायक रहे कृष्णानंद राय की हत्या का आरोपित था।
लखनऊ के सरोजनी नगर में उसकी पुलिस के साथ मुठभेड़ हुई, जिसमें वो मारा गया। कोपागंज के रहने वाले हनुमान पांडेय पर कई संगीन आपराधिक मामले दर्ज थे।
हनुमान उत्तर प्रदेश के बाहुबली नेता मुख्तार अंसारी और अपराधी मुन्ना बजरंगी का करीबी था। जहाँ मुख्तार अंसारी फिलहाल जेल में है, वहीं मुन्ना बजरंगी की हत्या हो चुकी है। उसकी हत्या के बाद हनुमान पांडेय ही अंसारी गैंग का मुख्य शूटर बन गया था। उसने अंसारी के गैंग D-5 में प्रमुख भूमिका प्राप्त कर ली थी। मऊ में ठेकेदार प्रकाश सिंह सहित दो लोगों की हत्या कर दी गई थी, उस मामले में भी ये आरोपित था।
नवंबर 29, 2005 को करीमुद्दीन इलाके में स्थित सोनाड़ी गाँव में एक स्टीकेट मैच का उद्घाटन करने पहुँचे भाजपा विधायक कृष्णनंदन राय की गोलियों से भून कर हत्या कर दी गई थी। उस दिन जोरों की बारिश हो रही थी, इसीलिए वो बुलेटप्रूफ गाड़ी छोड़ कर सहयोगियों सहित सामान्य गाड़ी से ही वहाँ चले गए थे। शाम 4 बजे जब वो अपने गाँव गोडउर लौट रहे थे, तभी बसनिया चट्टी के पास उनकी गाड़ी घेर ली गई।
कृष्णानंद राय हत्याकांड में एक लाख का इनामी बदमाश हनुमान पांडेय उर्फ राकेश STF के साथ मुठभेड़ में ढेर। मुख्तार अंसारी का बेहद करीबी था हनुमान पांडेय । pic.twitter.com/MRQVbCl1Tw
इसके बाद एके-47 से फायरिंग कर के विधायक सहित 7 लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया था। हनुमान पांडेय राजधानी लखनऊ सहित रायबरेली, गाजीपुर और मऊ में 10 मुकदमे गंभीर धाराओं में पंजीकृत हैं। बनारस और लखनऊ की STF को इनपुट मिला था कि वह इनोवा कार से जा रहा है। इसके बाद लखनऊ-कानपुर हाइवे पर उसे रोकने का प्रयास किया गया, लेकिन उसने पुलिस पर फायरिंग शुरू कर दी।
जब कृष्णानंद राय व उनके सहयोगियों की हत्या हुई, उस समय कोई ऐसा भी था जो बच गया था। उस व्यक्ति का नाम था- शशिकांत राय। वह एक तरह से इस घटना के मुख्य चश्मदीद गवाह थे। थे इसलिए, क्योंकि अब वो नहीं रहे। सैंकड़ों राउंड गोलियों के बीच ज़िंदा बच जाने वाला शख्स शराब पीने के बाद संदिग्ध स्थिति में सड़क पर बेहोश पड़ा पाया गया, जिसके बाद उसकी मौत हो गई।
एक और गवाह था, उनका नाम था- मनोज गौड़। यह भी था, क्योंकि अब ये भी नहीं रहे। सितंबर 2006 को मनोज गौड़ की भी संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई। इन दोनों घटनाओं के बीच मात्र डेढ़ महीने का अंतर था। उन्हें अस्पताल ले जाया गया था, जहाँ उन्हें डॉक्टरों ने ‘ब्रांको न्यूमोनिया’ की वजह से मृत करार दिया। जब वो अस्पताल में भर्ती थे, तब प्रशासन द्वारा किसी भी प्रकार की सुरक्षा मुहैया नहीं कराई गई थी।
केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल के संबंध में आज कई बड़े ऐलान किए। यह ऐलान मुख्य रूप से रक्षा क्षेत्र को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने के लिए किए गए हैं। ऐलान में सबसे पहले यह कहा गया कि रक्षा क्षेत्र से जुड़े 101 उत्पादों का आयात पूरी तरह बंद होगा। इस कदम का मूल उद्देश्य रक्षा क्षेत्र को ज़्यादा से ज़्यादा स्वदेशी बनाना है।
The Ministry of Defence is now ready for a big push to #AtmanirbharBharat initiative. MoD will introduce import embargo on 101 items beyond given timeline to boost indigenisation of defence production.
प्रधानमंत्री ने कुल 5 स्तम्भों के आधार पर भारत को आत्मनिर्भर बनाने का मूल मंत्र दिया है। यह चार स्तम्भ अर्थव्यवस्था, आधार भूत संरचना, तंत्र, जनसांख्यिकी और माँग (Economy, Infrastructure, System, Demography & Demand) हैं। प्रधानमंत्री ने इसके लिए विशेष आर्थिक पैकेज की घोषणा भी की थी। राजनाथ सिंह ने कहा कि इस सूची में न केवल कुछ उपकरण शामिल हैं बल्कि उच्च प्रौद्योगिकी वाले हथियार मसलन असॉल्ट राइफलें, सोनार सिस्टम, ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट, LCH, रडार और कई अन्य चीजें शामिल हैं।
Prime Minister Shri @narendramodi has given a clarion call for a self-reliant India based on the five pillars, i.e., Economy, Infrastructure, System, Demography & Demand and announced a special economic package for Self-Reliant India named ‘Atamnirbhar Bharat’.
इसके बाद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि इस फैसले से सबसे पहले एक बड़ा बदलाव आएगा। भारत की रक्षा इंडस्ट्री को मौक़ा मिलेगा कि वह अपने तय मानकों, निर्देशों, क्षमता और डिज़ाइन के आधार पर ऐसे उत्पाद तैयार करेंगे, जिनकी भारतीय सेना को असल में ज़रूरत होती है। इस काम में रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) उनकी पूरी मदद करेगा, जिससे बेहतर नतीजे हासिल हों।
एक लंबे दौर के विमर्श के बाद रक्षा मंत्रालय ने ऐसे उत्पादों की सूची तैयार की है। सेना के अलावा निजी और सार्वजनिक क्षेत्र को निर्देश दिए जा चुके हैं। वह इसका निरीक्षण करे कि सेना के उपयोग में आने वाली ज़रूरत की चीज़ों का उत्पादन भारत में किस स्तर पर हो सकता है। इस प्रक्रिया के लिए लगभग 3.5 लाख करोड़ रुपए अप्रैल से अगस्त 2020 के बीच जारी किए जाएँगे। आगामी 6 से 7 सालों के दौरान घरेलू इंडस्ट्री (रक्षा) में लगभग 4 लाख करोड़ रुपए तक के समझौते किए जाएँगे।
Almost 260 schemes of such items were contracted by the Tri-Services at an approximate cost of Rs 3.5 lakh crore between April 2015 and August 2020. It is estimated that contracts worth almost Rs 4 lakh crore will be placed upon the domestic industry within the next 6 to 7 years.
थल और वायु सेना से जुड़े ऐसे उत्पादों में लगभग 1 लाख 30 हज़ार करोड़ रुपए का खर्च आएगा। वहीं दूसरी तरफ नौसेना के उत्पादों में 1 लाख 40 हज़ार करोड़ रुपए का खर्च आएगा। इसमें Armoured Fighting Vehicles (AFVs) भी शामिल हैं। दिसंबर 2021 तक इनके आयात पर रोक लगा दी जाएगी।
Of these, items worth almost Rs 1,30,000 crore each are anticipated for the Army and the Air Force while items worth almost Rs 1,40,000 crore are anticipated by the Navy over the same period. #AtmanirbharBharat
— Rajnath Singh
Of these, items worth almost Rs 1,30,000 crore each are anticipated for the Army and the Air Force while items worth almost Rs 1,40,000 crore are anticipated by the Navy over the same period. #AtmanirbharBharat
साल 2022 से लेकर साल 2024 के बीच ऐसे आयातों पर पूरी तरह रोक लगा दी जाएगी। इस पहल का मूल उद्देश्य देश की रक्षा इंडस्ट्री को बड़े पैमाने पर सशक्त और आत्मनिर्भर बनाना है। जिससे सेना की ज़रूरत से जुड़ी अहम चीज़ों का निर्माण और उत्पादन देश में हो पाए। प्राथमिकता देश के रक्षा क्षेत्र को स्वदेशी और आत्मनिर्भर बनाना है।
लखनऊ में शनिवार (अगस्त 8, 2020) की दोपहर तब अचानक से हड़कंप मच गया, जब पत्रकारों को विदेशी नम्बरों से फोन कॉल्स आने लगे। 12 बजे के बाद करीब 3 बजे तक ये सिलसिला चला। फोन कॉल्स का लोकेशन यूनाइटेड स्टेट्स और एटलांटा बता रहा था। साथ ही ये फोन कॉल्स पर ‘यूसुफ अली’ का नाम दिखा रहा था। इन फोन कॉल्स में अयोध्या के राम मंदिर भूमिपूजन को लेकर धमकियाँ दी जा रही थीं।
साथ ही मजहब विशेष वालों को भी भड़काया जा रहा है। अपील की जा रही है कि भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विरोध किया जाए और राम मंदिर भूमिपूजन को लेकर लोगों को भी भड़काया जा रहा है। लोगों को किए गए फोन कॉल्स में कहा गया कि भारत के मजहब विशेष वाले मिल कर अब एक अलग देश ‘उर्दूस्तान’ की माँग करें, जो भारत को खंडित कर के बनाया जाएगा। पत्रकारों ने तुरंत इस बात की शिकायत कराई।
लखनऊ स्थित हजरतगंज पुलिस स्टेशन में इसे लेकर मामला दर्ज किया गया है। लखनऊ के पुलिस कमिश्नर सुजीत पांडेय ने बताया कि पत्रकारों के अलावा कई अन्य लोगों को भी फोन कॉल्स से वॉइस मैसेज प्राप्त हुए, जिसमें 15 अगस्त को होने वाले स्वतंत्रता दिवस समारोहों को लेकर धमकाया जा रहा है और साथ ही देश की एकता को खंडित किए जाने वाली बातें की जा रही हैं। इस मामले में FIR दर्ज हो गई है।
Several media persons & others have received a voice message from unknown numbers pretaining to Independence Day & unity of the country. An FIR is being registered at Hazratganj Police Station in Lucknow & strict action will be taken: Lucknow Police Commissioner Sujeet Pandey pic.twitter.com/5f86h7MEtW
पांडेय ने आश्वासन दिया कि इस मामले में पुलिस कड़ी कार्रवाई करेगी। यूएपीए और आईटी एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत FIR दर्ज की गई है। हालाँकि, कई पत्रकारों ने इंटरनेशनल नम्बर देख कर कॉल नहीं उठाया था। लेकिन, लखनऊ में यूपी इन्फॉर्मेशन डिपार्टमेंट से जितने भी पत्रकार जुड़े हुए हैं, उन सभी को फोन कॉल्स आए। उत्तर प्रदेश में सैकड़ों पत्रकारों को ये कॉल्स आए।
कहा गया कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर के राम मंदिर बनाया जा रहा है, इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के मौके पर लाल किले पर झंडा नहीं फहराने दिया जाएगा। साथ ही उदाहरण देते हुए भड़काया गया कि जिस तरह से सिख एक अलग खालिस्तान की माँग कर रहे हैं, उसी तरह से दूसरे मजहब वालों को भारत से कट कर एक अलग देश उर्दूस्तान के लिए प्रयास करना चाहिए। इसमें खालिस्तान का भी समर्थन किया गया।
रिया चक्रवर्ती के भाई शौविक चक्रवर्ती से प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने पूछताछ की है। शनिवार (अगस्त 8, 2020) को सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में आरोपित शौविक ED के समक्ष पेश हुए। इस मामले में सभी आरोपितों के बयान ‘Prevention Of Money Laundering Act’ के तहत दर्ज किए जा रहे हैं। इस मामले में रिया की पूर्व मैनेजर श्रुति मोदी से भी पूछताछ हुई है।
सोमवार को भी ED ने इस मामले में कई आरोपितों को समन किया है। सुशांत सिंह राजपूत के पिता केके सिंह ने आरोप लगाया है कि कुछ ही समय में उनके बेटे के एकाउंट से 15 करोड़ रुपए ट्रांसफर किए गए। CBI ने भी जाँच को अपने हाथ में ले लिया है और एजेंसी जल्द ही घटनास्थल का दौरा करेगी। सीबीआई इस मामले में आपराधिक षड्यंत्र, धोखाधड़ी और आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज कर जाँच कर रही है।
सीबीआई इस मामले में पटना पुलिस की एफआईआर के आधार पर जाँच कर रही है। केके सिंह का आरोप है कि आरोपित सुशांत के करीब आ गए और उन्हें झाँसे में लेकर उनकी ज़िंदगी में हस्तक्षेप करने लगे। साथ ही उन पर विश्वस्त कर्मचारियों को हटाने, घर बदलने और मानसिक रूप से बीमार होने का एहसास दिलाया गया। आरोप है कि उन्हें डेंगू होने की बात कह के ड्रग्स का ओवरडोज दे दिया। इसके अलावा भी कई आरोप हैं।
बताया गया है कि शौविक चक्रवर्ती से कुल 18 घण्टे तक ED की गहन पूछताछ चली। शुक्रवार को उनसे 2 घण्टे तक पूछताछ चली थी। उस दिन रिया से भी 9 घंटे पूछताछ हुई थी। बिहार पुलिस ने भी इससे जुड़े सारे दस्तावेज सीबीआई को सौंप दिए हैं। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने भी पीड़ित परिवार से मुलाकात कर न्याय का आश्वासन दिया।
महाराष्ट्र सरकार सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई जाँच का विरोध कर रही है। सीनियर कॉन्ग्रेसी नेता और वकील अभिषेक मनु सिंघवी इस मामले में उद्धव ठाकरे की सरकार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में पक्ष रखेंगे।
On the last date, sr counsel R Basant had led the fight for the state against #Bihar Govt & Sushant's father, who have Mukul Rohatgi & Vikas Singh as lawyers.
उधर दिशा सलियान की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के अनुसार, उसका शव निर्वस्त्र पाया गया था। जिसका मुंबई पुलिस ने अब तक खुलासा नहीं किया था। रिपब्लिक टीवी द्वारा एक्सेस की गई रिपोर्ट से पता चलता है कि दिशा सालियान के शरीर पर कपड़े नहीं थे, जब वह एक बिल्डिंग की 14 वीं मंजिल से गिरने के बाद मृत पाई गई थी।
पोस्टमॉर्टम रिपार्ट में सेक्स, स्पष्ट आयु, जाति या कास्ट के हेडिंग के तहत शरीर पर कपड़ों और गहनों का विवरण दिया जाता है। जहाँ दिशा की रिपोर्ट में कहा गया है, “महिला, 28 साल, नग्न शरीर।”
वहीं रिपोर्ट में कपड़ों की स्थिति का उल्लेख किया जाता है जैसे – शव पानी से गीला हो, खून से सना हो या उल्टी और मादक पदार्थ से सना हुआ हो। दिशा पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के इस सेक्शन में ‘न्यूड (नग्न) शरीर कहा गया है।