केरल हाई कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान सोमवार (6 जनवरी) को कहा कि एक व्यक्ति द्वारा महिला के शरीर की बनावट को ‘बढ़िया या मस्त’ कहना पहली नजर में यौन रूप से प्रेरित टिप्पणी है। इसके बाद जस्टिस ए बदरुद्दीन ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 354A(1)(iv), 509 और केरल पुलिस अधिनियम, 2011 की धारा 120 सहित अपराधों को रद्द करने से इनकार कर दिया।
दरअसल, IPC की धारा 354A कहता है कि यौन रूप से भड़काऊ टिप्पणी करना यौन उत्पीड़न माना जाएगा। वहीं, धारा 509 के प्रावधान में महिला की गरिमा को ठेस पहुँचाने के इरादे से किए गए कृत्यों के बारे में बताया गया है। केरल पुलिस अधिनियम की धारा 120 में उपद्रव करने और सार्वजनिक व्यवस्था का उल्लंघन करने के लिए दंड का प्रावधान है।
अभियोजन पक्ष (लड़की के वकील) का कहना था कि शिकायतकर्ता लड़की केरल राज्य विद्युत बोर्ड लिमिटेड के इलेक्ट्रिकल सेक्शन में काम कर रही थी। उस दौरान आरोपित ने यह कहते हुए यौन रूप से भड़काऊ टिप्पणी और इशारे किए कि उसके शरीर की बनावट ‘बढ़िया’ है। अभियोजन पक्ष ने यह भी आरोप लगाया गया कि आरोपित ने उसके मोबाइल नंबर पर यौन रूप से भड़काऊ संदेश भी भेजे।
वहीं, अपीलकर्ता आरोपित के वकील ने इसका विरोध किया और अदालत में तर्क दिया कि उसने सिर्फ महिला की शारीरिक संरचना के बारे में कहा था। याचिकाकर्ता का कहना था कि किसी व्यक्ति की शारीरिक संरचना अच्छी है कहना आईपीसी की धारा 354A(1)(iv) या धारा 509 या केरल पुलिस अधिनियम के प्रावधानों के दायरे में यौन रूप से संबंधित टिप्पणी नहीं हो सकती।
कोर्ट ने कहा, “किसी महिला की गरिमा को ठेस पहुँचाने या उसकी निजता में दखल देने के इरादे से कोई शब्द बोलना, कोई आवाज़ या इशारा करना या कोई वस्तु प्रदर्शित करना आईपीसी की धारा 509 के तहत अपराध है। अभियोजन पक्ष के आरोपों का विश्लेषण करने पर प्रथम दृष्टया आईपीसी की धारा 509 के तहत अपराध को आकर्षित करने के लिए तत्व सामने आते हैं।”
धारा 35A को लेकर न्यायालय ने कहा कि कोई भी पुरुष जो किसी महिला पर यौन रूप से भड़काऊ टिप्पणी करता है, वह यौन उत्पीड़न के अपराध का दोषी है। इस पर, न्यायालय ने याचिकाकर्ता की दलील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि इस मामले के तथ्यों पर गौर करने के बाद यह स्पष्ट है कि मामला विशेष रूप से कथित अपराधों को आकर्षित करने वाला है।
कोर्ट ने कहा, “न्यायालय का यह कर्तव्य है कि वह अन्य परिस्थितियों पर भी गौर करे और यह भी देखे कि क्या ऐसी कोई सामग्री है जो यह संकेत दे कि आपराधिक कार्यवाही में स्पष्ट रूप से दुर्भावना है और कार्यवाही दुर्भावनापूर्ण तरीके से गुप्त उद्देश्यों से शुरू की गई है। एक बार जब उक्त तथ्य स्थापित हो जाता है तो यह आपराधिक कार्यवाही को रद्द करने का एक अच्छा कारण है।”
विश्व भर में AI के मामले में अग्रणी मानी जाने वाली कंपनी OpenAI के CEO सैम ऑल्टमैन की बहन ने उन पर यौन शोषण के आरोप लगाए हैं। सैम पर आरोप है कि उन्होंने अपनी बहन का यौन शोषण तब से चालू किया जब वह मात्र 3 वर्ष की थीं और यह 12 वर्ष की आयु तक जारी रहा। सैम की बहन एनी ऑल्टमैन इसको लेकर सैम पर एक मुकदमा भी ठोंक दिया है। एनी ऑल्टमैन ने इस मामले में $75000 डॉलर का मुआवजा और मुकदमा चलाने की माँग की है। ऑल्टमैन ने यह सारे आरोप नकारे हैं और अपने परिवार के साथ एक बयान जारी किया है।
एनी ऑल्टमैन ने क्या आरोप लगाए?
एनी ऑल्टमैन ने मिसौरी राज्य में सैम ऑल्टमैन के खिलाफ यह मुकदमा दायर किया है। एनी का दावा है कि जब वह 3 वर्ष की और सैम 12 साल के थे तब यह यौन शोषण का सिलसिला चालू हुआ। एनी ने आरोप लगाया कि तब सैम उनको अपना लिंग छूने को कहते थे और जबरदस्ती उनके साथ ओरल सेक्स करते थे। सैम यह काम 1997 से लेकर 1999 तक करते रहे। एनी तब तक 5 वर्ष की हो चुकी थीं। इसके बाद सैम ऑल्टमैन की हरकतें और भी बढ़ गईं।
एनी ने आरोप लगाया कि 5 वर्ष की आयु के बाद सैम उनके गुप्तांगों में उँगलियाँ डालने जैसे कृत्य करने लगे। इस दौरान वह जबरदस्ती ओरल सेक्स भी करते। वर्ष 2000 आते-आते सैम ने एन के साथ जबरदस्ती सेक्स करने लगे। उन्होंने उनके साथ अप्राकृतिक सेक्स भी किया। यह हरकतें 8-9 वर्ष तक चली। एनी का आरोप है कि सैम उन्हें यह भी विश्वास करवाते रहे कि यह सब वह खुद चाहती हैं। एनी ने आरोप कहा कि उन्हें $75000 डॉलर मुआवजे तौर पर दिया जाए। इसके अलावा सैम के खिलाफ मुकदमा चलाया जाएगा।
सैम ऑल्टमैन ने क्या दिया जवाब?
सैम ऑल्टमैन और उनके परिवार ने बहन एनी के आरोपों पर एक बयान जारी किया है। उन्होंने इस बयान में सारे आरोपों को झुठलाया है। उन्होंने कहा है कि एनी मानसिक तौर पर परेशान रही है। उन्होंने यह भी बताया कि एनी की स्थिति सही हो जाए इसके लिए उन्होंने उसके बिल भरे हैं, उसे पैसा भी भेजा है, एनी को नौकरी दिलाने में सहायता की है और किराया तक चुकाया है। उन्होंने बताया कि उन्होंने एनी के लिए एक घर तक खरीदने का ऑफर दिया था। उन्होंने कहा कि आगे भी एनी को यह सहायता जारी रहेगी।
My sister has filed a lawsuit against me. Here is a statement from my mom, brothers, and me: pic.twitter.com/Nve0yokTSX
सैम ने कहा कि एनी हमसे लगातार पैसा माँगती रहती है। उन्होंने कहा कि एनी द्वारा लगाए गए आरोप पूरी तरह से झूठे हैं और काफी दुख देने वाले हैं। सैम के परिवार की तरफ से जारी बयान में कहा गया, “हमने उसकी और अपनी निजता के सम्मान के लिए सार्वजनिक रूप से जवाब न देने का फैसला किया है। हालाँकि, उसने अब सैम के खिलाफ़ कानूनी कार्रवाई की है, और हमें लगता है कि हमारे पास इस पर कार्रवाई करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।”
इस बयान में आगे कहा गया, “पिछले कुछ सालों में, उसने हमारे परिवार के सदस्यों पर हमारे पिता के 4 लाख डॉलर (लगभग ₹35 करोड़) फंड को रोकने, उसका वाईफाई हैक करने और उसे ChatGPT, ट्विटर समेत बाकी वेबसाइट से ‘शैडोबैन’ करने का आरोप लगाया है। इसमें सबसे खराब आरोप यौन शोषण का है। समय के साथ उसके दावे बदलते रहे हैं बदल गए हैं।”
कर्नाटक वक्फ बोर्ड ने राज्य के ऐतिहासिक शहर श्रीरंगपट्टनम में 70 से अधिक सरकारी संपत्तियों पर अपना दावा ठोका है। इन संपत्तियों में सरकारी जमीन, टीपू सुल्तान शस्त्रागार के साथ-साथ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और राज्य पुरातत्व, संग्रहालय और विरासत विभाग की कई इमारतें शामिल हैं। इससे पहले वक्फ बोर्ड ने राज्य के विजयपुरा में किसानों की 1,200 एकड़ से अधिक की कृषि भूमि हड़पने के लिए उसे वक्फ संपत्ति बताया था।
स्टार ऑफ मैसूर ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि श्रीरंगपट्टनम तालुक इन संपत्तियों को आधिकारिक आरटीसी (अधिकार, किरायेदारी और फसलों का रिकॉर्ड) दस्तावेजों में वक्फ बोर्ड की संपत्ति के रूप में दर्ज किया गया है। खास बात ये है कि पुरातत्व, संग्रहालय और विरासत विभाग की इमारत ‘श्रीरंगपट्टनम में श्री चामराजेंद्र मेमोरियल सरकारी संग्रहालय’ को भी वक्फ संपत्ति के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।
इसके अलावा, श्रीरंगपट्टनम शहर और तालुक में किसानों के स्वामित्व वाले कई कृषि भूखंडों को भी कर्नाटक राज्य वक्फ बोर्ड की संपत्ति के रूप में सूचीबद्ध किया गया है। इससे संबंधित किसानों में चिंता पैदा हो गई है। वक्फ बोर्ड ने महादेवपुरा गाँव में चिक्कम्मा चिक्कादेवी मंदिर और चंदागलू गाँव में एक सरकारी स्कूल पर भी दावा ठोका है। इससे लोगों में आक्रोश फैल गया है।
विरासत स्थलों और सरकारी ज़मीनों पर दावे कर्नाटक के विजयपुरा में किसानों को नोटिस मिलने के कुछ महीने बाद ही सामने आए हैं। दरअसल, वक्फ का यह दावा टिकोटा तालुका के होनवाड़ा गाँव में 1,200 एकड़ ज़मीन से जुड़ा है। वक्फ ने दावा किया था कि अधिकारी इस क्षेत्र को मुस्लिमों की धार्मिक संस्था शाह अमीनुद्दीन दरगाह के रूप में नामित करने का प्रयास कर रहे थे।
इसको लेकर कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार में अधिकारियों ने किसानों को जमीन खाली करने का नोटिस भी जारी किया था। होनवाड़ा ग्राम पंचायत के उपाध्यक्ष सुनील शंकरप्पा तुडीगल ने कहा था, “नोटिस में दावा किया गया है कि यह ज़मीन शाह अमीनुद्दीन दरगाह की है, लेकिन यह दरगाह सदियों से अस्तित्व में नहीं है और हमारा परिवार पीढ़ियों से इस ज़मीन के मालिक हैं।”
शंकरप्पा ने आगे दावा किया, “लगभग 41 किसानों को नोटिस मिले हैं, जिसमें उनसे स्वामित्व रिकॉर्ड उपलब्ध कराने के लिए कहा गया है। हम इन जमीनों के असली मालिक हैं। अगर सरकार इन नोटिसों को वापस नहीं लेती है तो हम बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन करेंगे।” विपक्षी दल भाजपा ने भी सरकार के इस रवैये का बड़े पैमाने पर विरोध किया था।
किसानों के आक्रोश के बाद कर्नाटक सरकार ने सभी क्षेत्रीय आयुक्तों और जिला आयुक्तों को पत्र लिखकर चेतावनी दी थी। सरकार ने कहा था कि जो अधिकारी भूमि दाखिल खारिज रिकॉर्ड में बदलाव करते हैं और वक्फ अधिनियम के तहत किसानों को बेदखली नोटिस जारी करते हैं, उन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।
बांग्लादेश में हिन्दुओं के खिलाफ हिंसा और अत्याचार लगातार जारी है। अब बांग्लादेश में एक हिन्दू युवक सुदेब हल्दर की हत्या कर दी गई है। उसकी लाश रास्ते में पड़ी मिली है। एक्टिविस्ट्स ने कहा है कि सुदेब की हत्या हिन्दू होने के कारण हुई है। वहीं बांग्लादेश के ही कॉक्स बाजार में एक नाबालिग लड़की का 8-10 लोगों ने गैंगरेप किया है। इसके बाद उसे रास्ते पर छोड़ दिया गया। उससे बलात्कार करने वाले जमात-ए-इस्लामी से जुड़े थे, यह आरोप लगाया गया है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सोमवार (6 जनवरी, 2025) को सदर उपजिला के बेतोरा गाँव के रहने वाले सुब्रत हलदर के 28 वर्षीय बेटे सुदेब हलदर की रामपुर जोड़ापोल इलाके में गला रेतकर हत्या कर दी गई। सुदेब हल्दर बौकाठी बाजार में मोबाइल फोन की दुकान चलाता था। सुदेब दो भाइयों और दो बहनों में सबसे छोटा था। पुलिस ने बताया कि सुदेब अपनी दुकान बंद करके घर वापस लौट रहा था और रास्ते में बदमाशों ने चाकू घोंपकर उसकी हत्या कर दी।
सुदेब की लाश 7 जनवरी, 2025 को स्थानीय लोगों और उसके परिवार को घर से 1 किलोमीटर दूर एक खेत में क्षत-विक्षत अवस्था में मिली। इसके बाद पुलिस को सूचना दी गई। हलकाठी के SSP उज्ज्वल कुमार रॉय ने कहा, “सिर पर चोट का निशान मिला है। आशंका है कि यह हत्या है। लाश को पोस्टमार्टम के लिए झलकाठी सदर अस्पताल भेजा जाएगा। इस संबंध में हत्या का मामला दर्ज किया जाएगा।” पुलिस ने यह भी कहा कि सुदेब पर कई बार चाकू से वार किया गया था और उसके सिर और गर्दन पर गहरे घाव थे।
सुदेव के पिता सुबोध हलदर ने कहा, “मेरे बेटे की किसी से कोई दुश्मनी नहीं थी। मुझे समझ नहीं आ रहा कि मेरे बेटे को किसने और क्यों मारा। मैं चाहता हूँ कि पुलिस सच्चाई को उजागर करे और हत्यारों को सजा दिलाए।” कुछ एक्टिविस्ट ने इसे धर्म के आधार पर हुई हत्या करार दिया है।
बंगबंधु प्रकाशोली परिषद के सचिव सुशांत दासगुप्ता ने कहा, “बांग्लादेश में हर दिन कहीं न कहीं हत्याएँ हो रही हैं। हमने जाँच की है और पाया है कि मारे गए सुदेव हलदर की किसी से कोई निजी दुश्मनी नहीं थी। हमारा मानना है कि उसे सिर्फ इसलिए मारा गया क्योंकि वह हिंदू था। इस तरह से हिंदुओं की हत्या करके यह संदेश दिया जा रहा है कि यह बांग्लादेश हिंदुओं का नहीं है। हिंदुओं को डराने के लिए उसे मारा गया ताकि वे बांग्लादेश छोड़कर चले जाएँ।”
सुदेब के भाई ने बताया कि बचपन से ही वह कोलकाता में अपने चाचाओं के साथ रहता था और कोविड महामारी के दौरान ही वह बांग्लादेश वापस गया और अपनी मोबाइल की दुकान खोली थी। उसने दावा किया कि हो सकता है कि उसकी दुकान पर मोबाइल रिपेयर को लेकर कुछ लोगों से हुई बहस के बाद उसकी हत्या कर दी गई हो।
कॉक्स बाजार में नाबालिग से गैंगरेप
बांग्लादेश के कॉक्स बाजार जिले के चकरिया इलाके में 8-10 लोगों ने एक 14 वर्ष की लड़की से गैंगरेप किया। यह घटना रविवार (5 जनवरी, 2025) को हुई। पीड़िता ने भद्रकाली इलाके से एक ऑटोरिक्शा लिया था। हालाँकिम रिक्शा वाले ने उसे रास्ते में उतार दिया। यहाँ से वह वापस आ रही थी तभी उसको दो लोगों ने चाकू की नोक पर अगवा कर लिया और सूनसान इलाके में ले जाकर उसका रेप किया। इसके बाद 6 और लोग इस काम में शामिल हो गए। इसके बाद उन्होंने नाबालिग को लहुलुहान सड़क किनारे छोड़ दिया।
#Bangladesh : In Cox's Bazar's Chakaria, a minor girl was gang-raped by 8-10 Muslim men from Jamaat-e-Islami in broad daylight and left on the street. Her identity is still unknown. She has been hospitalized due to excessive bleeding. pic.twitter.com/FBjXuz7zvW
— Voice of Bangladeshi Hindus ?? (@VHindus71) January 6, 2025
गैंगरेप करने वाले इसके बाद अलग-अलग जगह भाग गए। मामले में स्थानीय लोगों ने जब प्रदर्शन किया तो पुलिस ने कार्रवाई चालू की। स्थानीयों ने कॉक्स बाजार में रोड जाम, घेराव और मार्च का आयोजन किया। उन्होंने ही रेप एक आरोपितों को पहचानने में पुलिस की मदद की। पुलिस ने इस मामले में 7 लोगों को गिरफ्तार किया है। उनकी पहचान सामने नहीं रखी गई है। पुलिस ने कहा है कि अब उन्हें जेल भेज दिया गया है। आरोपितों के इस्लामी कट्टरपंथी संगठन जमात- ए-इस्लामी से जुड़े होने की भी बात कही गई है।
इससे पहले बांग्लादेश के नरैल में 52 साल की हिंदू महिला बसना मलिक की रहस्यमय तरीके से मौत हो गई थी। बसना के साथ गैंग रेप किया गया था। पीड़ित परिवार के लोगों ने बताया था कि बसना मलिक 24 दिसंबर की रात को करीब 8 बजे घर लौटी थी। इसके बाद से उसे लगातार उल्टियाँ हो रही थीं। उस रात वह खाना खाने के बाद परिवार से कुछ कहे बिना ही सो गई। अगले दिन 25 दिसंबर की सुबह महिला की हालत बिगड़ गई। उसे जेसोर जनरल अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहाँ 26 दिसंबर की रात को उसकी मौत हो गई।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा है कि मजहबी आतंक खतरनाक और त्रासद है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने यह टिप्पणियाँ एक ISIS आतंकी को जमानत देने से इनकार करते हुए की हैं। आतंकी अपने साथियों के साथ भारत समेत पूरी दुनिया में शरिया का राज लाना चाहता था। वह हिन्दुओं को मुसलमान बनाने के मिशन में जुट गया था। वह इस्लामी आतंकी संगठन ISIS और जाकिर नाइक से प्रभावित था। वह जबलपुर की हथियार फैक्ट्री पर हमला करके देश में इस्लामी कानून लागू करना चाहता था। उसने हिन्दू देवी-देवताओं का भी अपमान किया।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में जस्टिस अनुराधा शुक्ला की बेंच ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा, “मजहबी आतंकवाद एक त्रासद और खतरनाक सोच है जो मजहब की सच्ची शिक्षाओं को विकृत करती है और लोगों तथा समाज को भारी नुकसान पहुँचाती है। मजहबी आतंकवाद की जड़ें गहरी और जटिल हैं, लेकिन यह समझना महत्वपूर्ण है कि कोई भी धर्म असल रूप में हिंसा या आतंक का समर्थन नहीं करता।” हाई कोर्ट ने कहा कि हम उस आदमी के प्रति कोई दया नहीं दिखा सकते जिस पर आतंक के गंभीर आरोप हैं।
जमानत ना पाने वाले इस ISIS आतंकी का नाम मोहम्मद शाहिद खान है। उसे NIA ने मई, 2023 में पकड़ा था। मोहम्मद शाहिद खान ने NIA की गिरफ़्तारी से जमानत के लिए कोर्ट का रास्ता अख्तियार किया था। लेकिन यहाँ से उसकी जमानत याचिका खारिज हो गई थी। इसके बाद वह मध्य प्रदेश हाई कोर्ट पहुँचा था। यहाँ पर उसने दलील दी कि उसे इस केस में फंसाया गया है और उन लोगों ने कोई अपराध नहीं किया है। हालाँकि, NIA ने उसका सारा कच्चा चिट्ठा कोर्ट के सामने रख दिया।
NIA ने उसके साथ 2 और आतंकी आदिल खान और सैयद मामूर अली पकड़े थे। बाद में अगस्त, 2023 में उनका एक और साथी मोहम्मद काशिफ खान पकड़ा गया था। NIA ने अपनी जाँच में पाया कि यह सभी 2020 के कोविड लॉकडाउन के दौरान जाकिर नाइक को देखते थे। इसके बाद इन्होने जिहाद और ISIS के आतंक के बाद बारे में पढ़ना चालू किया। इन चारों ने यह ठान लिया कि भारत में दुनिया में शरीयत का राज और इस्लामी कानून लाना है। इन लोगों ने हिन्दुओं को इस्लाम में धर्मांतरित होने के लिए भी उकसाया।
इसके अलावा यह चारों अपनी ISIS वाली विचारधारा के प्रसार के लिए एक मस्जिद के बाहर पर्चे भी बाँटते रहे। उन्होंने ISIS और अल कायदा के झंडे वाले पर्चे भी बाँटे। इसके अलावा इन्होने एक व्हाट्सएप ग्रुप भी बनाया जिसमें हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान किया जाता था। इसमें ISIS से सम्बन्धित सामग्री शेयर होती थी। पूरी तरह से आतंकी सोच में पड़ने के बाद इन चारों ने आतंक के जरिए भारत में इस्लामी राज कायम करने का प्लान बनाया। इस काम के लिए हथियार जुटाने को उन्होंने जबलपुर हथियार फैक्ट्री पर हमले की योजना बनाई थी।
इन चारों का प्लान था कि यह जबलपुर फैक्ट्री में ब्लास्ट करेंगे और वहाँ से बड़ी मात्रा में हथियार लूटेंगे। इसके लिए उन्होंने विस्फोटक भी जुटाने चालू कर दिए थे। इस मामले में NIA ने घटना से पहले ही इन्हें गिरफ्तार कर लिया था और इनके मॉड्यूल का भंडाफोड़ कर दिया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंगलवार (7 जनवरी 2025) को एक जनहित याचिका (PIL) खारिज कर दी, जो जस्टिस शेखर कुमार यादव के खिलाफ संसद में दायर महाभियोग प्रस्ताव को चुनौती देने के लिए दाखिल की गई थी। जस्टिस शेखर कुमार यादव के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव उनके उस भाषण को लेकर है, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर मुस्लिम समुदाय के खिलाफ विवादास्पद टिप्पणियाँ की थीं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस मामले में वकील अशोक पांडे ने जनहित याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता ने माँग की थी कि राज्यसभा के अध्यक्ष को इस महाभियोग प्रस्ताव पर कोई कार्रवाई करने से रोका जाए। याचिकाकर्ता का तर्क था कि जस्टिस यादव ने यह बयान हिंदू समुदाय के सदस्य के तौर पर दिया था और यह बयान नफरत फैलाने वाले भाषण की श्रेणी में नहीं आता।
याचिका में कहा गया कि जस्टिस यादव ने ‘कठमुल्ला’ शब्द का इस्तेमाल उन घटनाओं के संदर्भ में किया जो उनके व्यक्तिगत अनुभवों से जुड़ी थीं। इसमें यह भी कहा गया कि संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार जजों को भी है, और उनके द्वारा अदालत के बाहर दिए गए बयान उन्हें जज के पद से हटाने का आधार नहीं हो सकते।
कोर्ट ने इस याचिका को खारिज करते हुए कहा कि यह न्यायसंगत नहीं है। जस्टिस अताउर रहमान मसूदी और जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की बेंच ने स्पष्ट किया कि जनहित याचिका केवल तभी दाखिल हो सकती है जब यह समाज के कमजोर वर्ग के लिए हो। अदालत ने यह भी कहा कि जस्टिस यादव खुद सक्षम हैं और यदि उन्हें लगता है कि उनके खिलाफ अन्याय हो रहा है, तो वे अदालत का रुख कर सकते हैं।
बता दें कि जस्टिस शेखर कुमार यादव ने 8 दिसंबर 2024 को प्रयागराज में विश्व हिंदू परिषद (विधि प्रकोष्ठ) द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में भाषण दिया था। इस भाषण में उन्होंने कहा था कि भारत में शासन बहुसंख्यक समुदाय की इच्छाओं के अनुसार चलना चाहिए। साथ ही, उन्होंने ‘कठमुल्ला’ जैसे शब्द का इस्तेमाल किया, जिसे मुस्लिम समुदाय के खिलाफ अपमानजनक माना जाता है। उनके इस बयान के बाद विवाद खड़ा हो गया और सांसद कपिल सिब्बल सहित 54 अन्य सांसदों ने राज्यसभा में उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश किया।
महाभियोग प्रस्ताव में जस्टिस यादव पर ‘अप्रमाणित दुर्व्यवहार’ और ‘अक्षमता’ का आरोप लगाया गया है। प्रस्ताव में कहा गया है कि उनका भाषण नफरत फैलाने वाला है और इससे न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुँची है।
जस्टिस यादव ने अपने बयान पर सफाई देते हुए कहा था कि उन्होंने सिर्फ अपनी राय जाहिर की थी। उनके अनुसार, ‘कठमुल्लापन’ मुस्लिम महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को प्रभावित करता है। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि क्या उनके बयान ‘सिद्ध दुर्व्यवहार’ की श्रेणी में आते हैं?
इस पूरे विवाद के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस ने जस्टिस यादव के न्यायिक मामलों का रोस्टर बदल दिया। अब वे केवल 2010 से पहले दाखिल की गई प्रथम अपीलें सुनेंगे। सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने भी जस्टिस यादव को तलब कर उनका पक्ष माँगा था।
कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने सोमवार (6 जनवरी, 2025) को इस्तीफ़ा देने का ऐलान कर दिया है। ट्रूडो ने कहा कि वह आगामी आम चुनावों में लिबरल पार्टी का चेहरा बनने के लिए पसंदीदा उम्मीदवार नहीं हैं। लिबरल पार्टी से प्रधानमंत्री पद के लिए नए नेता का चयन होने के बाद जस्टिन ट्रूडो अपना इस्तीफ़ा दे देंगे। ट्रूडो के इस इस्तीफे की पटकथा बीते लगभग एक वर्ष से लिखी जा रही थी। इस खबर के बाद अब लिबरल पार्टी के नेताओं में पीएम पद की दौड़ शुरू हो गई है। इस दौड़ में एक भारतवंशी अनीता आनंद भी शामिल हैं।
क्यों ट्रूडो को जाना पड़ा?
जस्टिन ट्रूडो 2015 में पहली बार कनाडा के प्रधानमंत्री बने थे। इस चुनाव में उन्होंने लिबरल पार्टी को बड़ी जीत दिलाई थी। इसके बाद उन्होंने 2019 और 2021 में भी जीत हासिल की। 2021 की सरकार के लिए उन्हें जोड़-तोड़ करना पड़ा। वह 2013 से ही लिबरल पार्टी के नेता का रोल निभाते आ रहे हैं। जस्टिन ट्रूडो जब प्रधानमंत्री बने थे. तब उनकी लोकप्रियता चरम पर थी। लेकिन समय के साथ उनके फैसलों और उनकी सरकार की विफलताओं के चलते अब इस्तीफे की नौबत आई है।
ट्रूडो की लोकप्रियता का जायजा लेने वाले एक ट्रैकर के मुताबिक, 2015-16 में लगभग 65% लोग उन्हें पसंद करते थे। 2025 आते-आते 75% लोग उन्हें नापसंद करने लगे हैं। मात्र 22% लोग अभी उनका समर्थन करते हैं। ट्रूडो का विरोध 2020 की कोविड महामारी के बाद तेजी से बढ़ा है। कनाडा में 2020 के बाद घरों की किल्लत, महंगाई, बढ़ता कट्टरपंथ, सुरक्षा चिंताएँ और रोजगार ऐसे मुद्दे रहे हैं, जिन्हें वह नहीं सुलझा पाए। इसके अलावा ट्रूडो की सदारत में लिबरल पार्टी अपने गढ़ रहे चुनाव भी हार गई।
ट्रूडो की सरकार से कुछ दिनों पहले जगमीत सिंह की NDP ने भी समर्थन वापस ले लिया था। इसी के साथ कुछ सांसदों ने उनको पद से हटाने के लिए कोशिश चालू कर दी। जनवरी आते-आते उन पर दबाव बढ़ गया और अब उन्हें इस्तीफ़ा देना पड़ा। जस्टिन ट्रूडो ने 2023 के बाद से ही भारत से भी लड़ाई मोल ले ली। उन्होने खालिस्तानियों को खुश करने के लिए भारत से लड़ाई मोल ले ली और आतंकी निज्जर की हत्या का आरोप भारतीय एजेंसियों पर ठोंक दिया। इसके चलते उनकी और थू-थू हुई।
कौन है अब रेस में?
कनाडा के नए प्रधानमंत्री की रेस में अब कई लिबरल नेता हैं। कनाडा की पूर्व वित्त मंत्री क्रिश्टिया फ्रीलैंड, बड़े नेता मार्क कारने, वित्त मंत्री डोमिनिक लीब्लांक, पूर्व विदेश मंत्री मेलीना जोली, पूर्व रक्षा मंत्री अनीता आनंद समेत जोनाथन विलकिंसन, करीना गौल्ड आदि प्रधानमंत्री पद की दौड़ में हैं। इनमें से कई नेताओं ने अपने समर्थन में लोगों को जुटाना भी चालू कर दिया है। उनका नाम सबसे आगे हैं, जिन्होंने दिसम्बर महीने में ट्रूडो की कैबिनेट से इस्तीफ़ा दिया था और ट्रूडो के भी इस्तीफे की माँग की थी।
अनीता आनंद कौन हैं?
ट्रूडो की जगह कनाडा के प्रधानमंत्री पद के लिए अनीता आनंद का भी नाम चल रहा है। अनीता आनंद 2019 में पहली बार सरकार में शामिल हुई थीं। ट्रूडो ने उन्हें 2019 में एक कम चमकधमक वाला मंत्रालय थमाया था। वह कनाडा की पहली हिन्दू कैबिनेट मंत्री थीं। उनको प्रोक्योरमेंट मंत्रालय मिला था, जो कनाडा के लिए बाकी जगह से आपूर्ति जुटाने का काम करता है। इस मंत्रालय का महत्व 2020 में तब और बढ़ गया जब पूरी दुनिया से वैक्सीन जुटानी थीं। इसके चलते अनीता आनंद को काफी प्रसिद्धि मिली।
इसी के चलते 2021 में उन्हें कनाडा का रक्षा मंत्री बना दिया गया। वह यूक्रेन-रूस संघर्ष के मौके पर रक्षा मंत्री रहीं। उन्हें कुछ दिनों के लिए कैबिनेट से हटा दिया गया था। इसके बाद उन्हें दिसम्बर, 2024 में दोबारा कैबिनेट में शामिल करके परिवहन और व्यापार मामलों का मंत्री बना दिया गया। अनीता आनंद भारतवंशी है और उनके माता-पिता नाइजीरिया से कनाडा पहुँचे थे। वह कनाडा में ही जन्मी थीं। वकालत की पढ़ाई पढ़ने वाली अनीता आनंद 2013 से ही सांसद हैं। वह ट्रूडो के करीबियों में से एक मानी जाती हैं।
भारत से रिश्तों पर क्या असर?
जस्टिन ट्रूडो के जाने की खबर भारत से रिश्तों के संबंध में बहुत मायने रखती है। भारत पर वह खुले तौर पर दखलअंदाजी और कनाडाई नागरिकों की हत्या के हवा-हवाई आरोप जड़ चुके हैं। भारत भी उन पर राजनीतिक फायदे के लिए राजनयिक रिश्तों की बलि चढ़ाने का आरोप लगाता आया है। हाल ही में दोनों ने एक-दूसरे ने शीर्ष राजनयिकों को भी वापस बुला लिया था। ट्रूडो के जाने के बाद भारत से रिश्तों में कोई बड़ा बदलाव आने की कोई ख़ास उम्मीद नहीं है, लेकिन हाँ नया प्रधानमंत्री कौन होगा, इस आधार पर थोड़े परिवर्तन हो सकते हैं।
इससे पहले जब उन्होंने भारत पर आरोप लगाए थे तब भी उनके खिलाफ कनाडा के अंदर से ही आवाजें उठी थीं। कनाडा के कई पत्रकार और नेताओं ने उन्हें लताड़ा था। ट्रूडो ने कोई सबूत भी नहीं दिखाए थे। इसको लेकर भी उन पर प्रश्न उठे थे।
गोवा के मशहूर लेखक और साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता दत्ता दामोदर नाइक ने विवादित बयान देकर हलचल पैदा कर दी है। खुद को कट्टर नास्तिक बताने वाले दत्ता दामोदर नाइक ने एक व्याख्यान के दौरान हिंदू मंदिरों के पुजारियों और पंडों को ‘डकैत’ और ‘लुटेरा’ कहकर संबोधित किया। उनके इस बयान को धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाला बताते हुए उनके खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, दत्ता दामोदर नाइक (Datta Damodar Naik) के खिलाफ पहली शिकायत सतीश भाट नामक व्यक्ति ने काणकोण पुलिस स्टेशन में दर्ज कराई। उन्होंने आरोप लगाया कि नाइक ने श्री संस्थान गोकर्ण पार्तगाली जीवोत्तम मठ और हिंदू पुजारियों को अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया। सतीश भाट ने कहा, “हमारी संस्कृति में हर किसी के विचारों का सम्मान होता है, चाहे वह नास्तिक ही क्यों न हो। लेकिन इस तरह का बयान देकर उन्होंने जानबूझकर धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाई है।”
दूसरी शिकायत पणजी पुलिस स्टेशन में गोमंतक मंदिर महासंघ और धार्मिक संस्थान फेडरेशन के सदस्य जयेश थाली ने की। शिकायत में कहा गया, “पुजारियों और मंदिरों को ‘लुटेरा’ कहना केवल निंदनीय ही नहीं, बल्कि यह एक गंभीर अपराध है, जिसने समाज में अशांति फैलाई है।”
पुलिस ने नाइक के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 295 (ए) के तहत मामला दर्ज किया है। यह धारा उन कृत्यों पर लागू होती है, जो जानबूझकर धार्मिक भावनाओं को आहत करने के उद्देश्य से किए जाते हैं। इस मामले की जाँच जारी है।
इस बीच, दत्ता दामोदर नाइक ने इस पूरे विवाद पर कहा कि वे अपने बयान पर कायम हैं और किसी भी कार्रवाई से डरते नहीं। उन्होंने कहा, “मैंने सिर्फ इतना कहा कि मंदिरों के पुजारी लोगों से पैसे वसूलते हैं। बाद में मैंने स्पष्ट किया कि मेरा मतलब था कि वे पैसे ‘वसूलते’ हैं, लूटते नहीं। यह सवाल उठाना गलत नहीं है कि इन पैसों का उपयोग कहाँ होता है। क्या इनसे स्कूल, अस्पताल या समाज के लिए कुछ और किया गया है?”
नाइक ने खुद को कट्टर नास्तिक बताते हुए कहा कि वे वर्षों से सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हैं और हमेशा तर्कवादी विचारधारा के समर्थक रहे हैं। उन्होंने कहा, “मुझे अपनी राय व्यक्त करने का अधिकार है। अगर मेरी भावनाओं का सम्मान नहीं होता, तो दूसरों की भावनाओं का इतना महत्व क्यों दिया जा रहा है?”
बता दें कि दत्ता दामोदर नाइक को साहित्य अकादमी पुरस्कार 2006 में उनके कोकणी निबंध संग्रह ‘जय काई जुई’ के लिए दिया गया था। वे कोकणी, मराठी और अंग्रेजी में कई किताबें लिख चुके हैं। 1990 के दशक में उन्होंने ‘समता आंदोलन’ नामक तर्कवादियों के एक समूह की स्थापना की थी, जो गोवा में तर्क और वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने के लिए काम करता है।
दिल्ली की 70 विधानसभा सीटों के लिए 5 फरवरी को वोट डाले जाएँगे। वोटों की गिनती 8 फरवरी को होगी। 7 जनवरी, 2025 को चुनाव की तारीखों की घोषणा करते हुए चुनाव आयोग ने उन सभी सवालों के भी जवाब दिए जो हर चुनाव में विपक्ष की हार के बाद उठाए जाते हैं।
मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने बताया कि मतदान से करीब 7-8 दिन पहले ईवीएम तैयार हो जाती है। इसके बाद मतगणना के दिन तक यह उम्मीदवारों की आँखों के सामने से एक बार भी ओझल नहीं होती। चुनाव आयोग इससे जुड़े हर चरण के बारे में राजनीतिक दलों के एजेंट और उम्मीदवारों को सूचित करता है।
ईवीएम को वायरस प्रूफ बताते हुए उन्होंने कहा कि इससे छेड़छाड़ संभव नहीं है यह बात अदालत भी मान चुकी है। फिर भी नतीजों के बाद ईवीएम पर संदेह जताया जाता है। उन्होंने कहा कि ईवीएम की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी है और इसके जरिए बोगस वोटिंग नहीं हो सकती।
EVMs-undergo scrutiny at every stage! Commissioning जो की polling day से लगभग 7-8 दिन पहले होती है, से लेकर counting तक, EVM candidate की आँखों के सामने से एक बार भी ओझल नहीं होती:CEC Kumar
हर step पर political parties के agents, candidates को inform करते हैं
आयोग ने 2020 में बिहार विधानसभा के हुए चुनावों से लेकर अब तक हुए 30 राज्यों केंद्र शासित प्रदेशों के नतीजों को सामने रखते हुए बताया कि इनमें 15 अलग-अलग दल सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरे हैं। ऐसे में नतीजों के आधार पर चुनावी प्रक्रिया का आकलन नहीं किया जा सकता।
पिछले साल लोकसभा चुनावों और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के बाद विपक्ष ने मतदान के प्रतिशत को लेकर भी विवाद खड़ा किया था। विपक्ष ने शाम 5 बजे के मतदान के आँकड़े और आखिरी आँकड़ों में अंतर का हवाला दे गड़बड़ी का दावा किया था। चुनाव आयोग ने बताया है कि मतदान शाम 6 बजे तक होता है।
कई इलाकों या मतदान केंद्रों पर मतदान इसके बाद भी जारी रहती है। इसके बाद ईवीएम को सील कर स्ट्रॉन्ग रूम में पहुँचाया जाता है। इन सारे कार्यों को निपटाने के बाद डाटा जारी किया जाता है। स्वभाविक तौर पर शाम 5 बजे के आँकड़े से यह ज्यादा होता है।
पिछले दिनों दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने वोटर लिस्ट से जानबूझकर लोगों का नाम काटने के आरोप लगाए थे। ऐसे आरोपों का जवाब देते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार ने कहा कि वोटर लिस्ट पूरी प्रक्रिया से तैयार कराई जाती है। किसी का भी नाम बिना प्रक्रिया के नहीं कटवाया जा सकता है।
दिल्ली चुनाव का गणित
मुख्य चुनाव आयुक्त ने बताया कि दिल्ली में 1 करोड़ 55 लाख 24 हजार 858 मतदाता हैं। इनमें 83 लाख 49 हजार 645 पुरुष और 71 लाख 73 हजार 952 महिला मतदाता हैं। थर्ड जेंडर मतदाताओं की संख्या 1261 है।
दिल्ली में मतदान के लिए 13033 पोलिंग बूथ बनाए जाएँगे। इनमें से 70 को महिला मतदान कर्मी संचालित करेंगी। हर बूथ पर औसतन 1191 वोटर्स होंगे। 85 वर्ष से अधिक आयु के लोग घर से वोट कर सकते हैं।
गौरतलब है कि 2020 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी (AAP) को लगातार दूसरी बार शानदार जीत मिली थी। पार्टी ने 70 में से 62 सीटें जीती थी। बीजेपी को 8 सीटें ही मिली थी। कॉन्ग्रेस का खाता भी नहीं खुला था। उससे पहले 2015 के चुनावों में भी कॉन्ग्रेस जीरो पर सिमट गई थी। उस चुनाव में आप को 67 और बीजेपी को केवल 3 सीटें मिली थी।
भारत के सबसे पढ़े-लिखे लोगों का राज्य कहा जाने वाला केरल अपनी धार्मिक आजादी को लेकर जागरुक रहा है। हालाँकि केरल की वामपंथी सरकार पर एक बार फिर हिंदू परंपराओं में हस्तक्षेप का आरोप लग रहा है। ताजा विवाद मंदिरों में ड्रेस कोड से जुड़ा है, जिसमें पुरुषों को बिना शर्ट के मंदिर में प्रवेश करना पड़ता है। शिवगिरी मठ के प्रमुख सच्चिदानंद स्वामी ने इस परंपरा को खत्म करने की माँग की है और इसे जातिवाद का हिस्सा बताया है। उनकी इस माँग को लेकर विवाद बढ़ चुका है, जिसमें कूदते हुए केरल की वामपंथी सरकार अब हिंदू परंपराओं को निशाना बनाने की कोशिश कर रही है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, शिवगिरी मठ के प्रमुख सच्चिदानंद स्वामी ने शिवगिरी पीठ के सालाना कार्यक्रम के दौरान केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन की उपस्थिति में एक प्रस्ताव रखा। उन्होंने पुरुषों के लिए मंदिरों में बिना शर्ट के जाने की परंपरा को खत्म करने की माँग की। इस दौरान मुख्यमंत्री विजयन ने सच्चिदानंद स्वामी की बात को सकारात्मक बताते हुए समर्थन दिया, लेकिन कहा कि इसे लागू करने के लिए सभी संबंधित पक्षों के बीच सहमति बनाना जरूरी है। उन्होंने यह बयान बेहद सावधानी रखते हुए दिया, क्योंकि इससे पहले उनकी सरकार ने सबरीमाला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू करने की कोशिश की थी, जो बड़े विवाद में बदल गया था।
दरअसल, सच्चिदानंद स्वामी का कहना है कि ड्रेस कोड ब्राह्मणवादी सोच का प्रतीक है और इसका मकसद गैर-ब्राह्मणों को मंदिरों से दूर रखना है। उन्होंने यह आरोप लगाया कि यह परंपरा पुजारियों और धर्मगुरुओं द्वारा थोपे गए नियमों का हिस्सा है। मुख्यमंत्री ने इस परंपरा को खत्म करने के लिए सहमति बनाने की बात कही है।
यहाँ ये बताना जरूरी है कि साल 1982 में भी गुरुवायूर मंदिर में ‘ब्राह्मण भोजन’ प्रथा के खिलाफ इसी तरह का विवाद हुआ था। उस समय समाज सुधारक नारायण गुरु के शिष्य आनंद तीर्थन ने इस प्रथा को चुनौती दी थी, जिसके बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री करुणाकरन ने इसे समाप्त कर दिया था। आज फिर वही इतिहास दोहराया जा रहा है। हिंदू संगठनों का आरोप है कि यह मुद्दा ड्रेस कोड से अधिक गहरा है। यह हिंदू समाज को उसकी परंपराओं और संस्कृति से अलग करने का एक सुनियोजित प्रयास है।
नायर सर्विस सोसाइटी (NSS) ने सच्चिदानंद स्वामी की माँग और सरकार के रुख का कड़ा विरोध किया है। उन्होंने कहा कि मंदिरों की परंपराएँ किसी सरकार या बाहरी व्यक्ति के कहने पर नहीं बदली जा सकतीं। NSS महासचिव जी. सुकुमारन नायर ने सवाल उठाया कि सच्चिदानंद स्वामी को किस अधिकार से मंदिर की परंपराओं को चुनौती देने का हक है। उनका कहना है कि हर मंदिर की अपनी परंपराएँ होती हैं, और ड्रेस कोड भी उनमें से एक है।
वहीं, एसएनडीपी योगम जैसे संगठन जो खुद को सुधारवादी कहते हैं, वो वामपंथी सरकार के इस रुख के समर्थन में दिखाई दे रहे हैं। एसएनडीपी योगम के महासचिव वेल्लप्पली नटेसन ने वहीं, एसएनडीपी योगम के महासचिव वेल्लप्पली नटेसन ने नायर सर्विस सोसायटी के इस रुख की आलोचना करते हुए कहा कि ऐसे मुद्दों को हिंदू समाज को विभाजित करने का जरिया नहीं बनाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि परंपराओं में बदलाव आवश्यक हो सकता है, लेकिन यह प्रक्रिया सोच-समझकर और सभी से सलाह-मशविरा करके होनी चाहिए।
इतिहासकार एम. जी. ससिभूषण ने बताया कि यह ड्रेस कोड संभवतः इसलिए बनाया गया था ताकि लोग मंदिरों में अनुशासन बनाए रखें और उन्हें पर्यटन स्थल न समझें। हालाँकि यह प्रथा केवल केरल और कुछ चुनिंदा मंदिरों खासतौर पर कर्नाटक के श्री मूकाम्बिका मंदिर (Sri Mookambika Temple in Karnataka) तक सीमित है। अधिकांश भारतीय मंदिरों में ऐसे ड्रेस कोड नहीं हैं।
इतिहासकारों का साफ कहना है कि यह ड्रेस कोड अनुशासन बनाए रखने के लिए लाया गया था, लेकिन वामपंथी सरकार इसे ब्राह्मणवाद और जातिवाद का रंग देकर हिंदू आस्थाओं को कमजोर करने की कोशिश कर रही है। हिंदू धर्म में विविधता और परंपराओं की गहरी जड़ें हैं, लेकिन बार-बार वामपंथी सरकार इन्हें आधुनिकता के नाम पर निशाना बनाती रही है।
प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: X_Bharatiyan108)
यह पहली बार नहीं है जब केरल की वामपंथी सरकार हिंदू परंपराओं पर हस्तक्षेप कर रही है। इससे पहले सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मुद्दा, गुरुवायूर मंदिर की प्रथाओं को खत्म करने की कोशिश और अब शिवगिरी मठ का प्रस्ताव – सभी घटनाएँ एक पैटर्न को दिखाती हैं। यह सरकार बार-बार हिंदू परंपराओं और आस्थाओं को तोड़ने के लिए सक्रिय नजर आती है।
वैसे, इस पूरे विवाद की जड़ को समझने के लिए आपको शिवगिरी मठ और सच्चिदानंद स्वामी के बारे में भी जानना आवश्यक है। शिवगिरी मठ की स्थापना साल 1904 में नारायण गुरु ने की। वे मंदिरों में पुजारियों के रूप में ब्राह्मणों की नियुक्ति के खिलाफ थे। हालाँकि वे खुद जिस एझावा समाज (Ezhava Community) से आते थे, वह भी ऊँची जाति है और मालाबार क्षेत्र में प्रभावी है।
खुद को सुधारवादी बताने वाले नारायण गुरु का रूख हमेशा से ब्राह्मण विरोधी रहा और बाद में यह शिवगिरि मठ की परंपरा भी बन गई। यह दूसरी बात है कि बिना कमीज मंदिर जाने की परंपरा को ‘ब्राह्मणवाद’ से जोड़ने वाले इस मठ द्वारा संचालित कई मंदिरों में भी प्रवेश के लिए शरीर के ऊपरी हिस्से को खुला रखना पड़ता है। ऐसे ही वामपंथी भी हमेशा से हिंदू परंपराओं को रूढ़िवादी और पिछड़ा बताकर उसका विरोध करते रहे हैं। लिहाजा इस बार भी सच्चिदानंद स्वामी के प्रस्ताव के समर्थन में मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन का झट से खड़ा हो जाना आश्चर्यजनक नहीं है।