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सऊदी अरब से आई कुरान: कोच्चि में होगी नीलामी, 21 जनवरी को लगाएँ बोली

केरल के कोच्चि में इंटरनेशनल ट्रांसशिपमेंट कंटेनर टर्मिनल (वल्लारपाद) पर 25 टन क़ुरान की नीलामी की जाएगी। इन्हें सऊदी अरब से 6 महीने पहले भेजा गया था। मल्लापुरम के वाज़हक्कड़ स्थित दारुल उलूम अरेबिक कॉलेज के प्रिंसिपल अब्दुल सलाम ने इन्हें मँगवाया था। अब उन्होंने आयात शुल्क का भुगतान करने में असमर्थता जताई है। इसलिए 21 जनवरी को 25 टन क़ुरान को नीलाम कर दिया जाएगा।

ख़बर के अनुसार, बड़ी संख्या में क़ुरान की खेप 6 महीने पहले वल्लारपदम इंटरनेशनल कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल (ICTT) में आई थी। विदेश में अत्याधुनिक प्रेस में छपी हुई ये क़ुरान तब से पड़ी हुई है। मलप्पुरम में दारुल उलूम अरबी कॉलेज के प्रिंसिपल अब्दुल सलाम ने बताया कि कॉलेज ने आर्थिक रूप से कमज़ोर तबके के मुस्लिमों को मुफ़्त क़ुरान बाँटने के लिए इन्हें सऊदी अरब से मँगवाया था।

सलाम का कहना था, “जब हम खेप को स्वीकार करने गए, तो हमसे खेप हासिल करने के लिए सीमा शुल्क के रूप में लगभग 8 लाख रुपए का भुगतान करने के लिए कहा गया। हमारे पास इतना पैसा नहीं था और हमने इसे कबूल नहीं करने का फ़ैसला किया। बाद में सीमा शुल्क एजेंट ने सूचित किया कि लावारिस खेप की नीलामी की जाएगी।”

सलाम ने यह भी बताया कि उन्होंने क़ुरान की खेप को वापस सऊदी अरब भेजने का अनुरोध किया था, लेकिन उन्हें सूचित किया गया कि इसके लिए माल भाड़ा शुल्क का भुगतान करना होगा। उसके बाद, उन्होंने टर्मिनल अधिकारियों को क़ुरान की नीलामी के लिए एक पत्र दे दिया। इस पत्र में कहा गया था कि कॉलेज 8 लाख रुपए का शुल्क अदा करने में असमर्थ है। सलाम ने बताया कि इतनी बड़ी संख्या में क़ुरान की प्रतियाँ सऊदी अरब से निशुल्क भेजी गई थी। ऐसा इसलिए क्योंकि उन्हें पता चला था कि 2018 में केरल में आई बाढ़ के दौरान बहुत सारी क़ुरान खो गई थीं।

अब जब कॉलेज ने क़ुरान को लेने से इनकार कर दिया है, तो MIV लॉजिस्टिक्स प्राइवेट लिमिटेड ने क़ुरान की खेप की नीलामी करने संबंधी एक नोटिस जारी किया है। लॉजिस्टिक कंपनी का कहना था कि उन्होंने सीमा शुल्क विभाग से कार्रवाई आगे बढ़ाने के आदेश पर क़ुरान की नीलामी करने का फ़ैसला लिया है। 

MIV लॉजिस्टिक्स के अधिकारियों ने बताया कि कंसाइनमेंट किसी भी छूट की श्रेणी में नहीं आता है और आयातक के लिए शुल्क का भुगतान करना ज़रूरी होता है। उन्होंने बताया कि सभी आयातित सामानों को कम्प्यूटरीकृत भारतीय सीमा-शुल्क EDI प्रणाली से गुज़रना पड़ता है। सीमा शुल्क के तहत मूल्यांकनकर्ताओं की एक समिति ने क़ुरान की खेप की नीलामी के लिए आधार मूल्य के रूप में 1 लाख रुपए की राशि तय की है, इसकी ई-नीलामी 21 जनवरी को होगी।

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जिसके साथ घर बसाना चाहती थी आरती, उसी बॉयफ्रेंड मोहम्मद शाहिद ने गला रेत कर मार डाला

तेलंगाना के वारंगल में नवम्बर 2019 में एक किशोरी के बलात्कार और हत्या की ख़बर आई थी। अब जिले से एक और आपराधिक घटना की ख़बर आई है। शुक्रवार (जनवरी 10, 2019) को एक 25 वर्षीय युवती की उसके बॉयफ्रेंड ने बेरहमी से हत्या कर दी। मृतक युवती एमबीए कर चुकी थी। आरोपित मोहम्मद शाहिद लश्कर सिंगारम का रहने वाला है। वह किराए के मकान में रहता था, जहाँ उसने इस हत्याकांड को अंजाम दिया। इसके बाद वो सीधा वारंगल सेंट्रल जेल पहुँचा और उसने पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। ख़बर के अनुसार, आरोपित और मृतक युवती कॉलेज के समय से ही रिलेशनशिप में थे।

आरोपित शाहिद से युवती के परिवार वाले भी अच्छी तरह परिचित थे। जहाँ एक तरफ शाहिद प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में लगा हुआ था, उसकी गर्लफ्रेंड के परिवार वाले शादी के लिए लड़का ढूँढने में व्यस्त थे। इसी बीच शाहिद को शक हुआ कि उसकी गर्लफ्रेंड का किसी और से अफेयर चल रहा है और उसने इस पर बात करने के लिए उसे अपने घर बुलाया। दोनों के बीच तीखी नोंक-झोंक हुई। इसके बाद गुस्साए शाहिद ने युवती का गला काट दिया। हंस इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, दोनों लिव-इन रिलेशनशिप में भी रह चुके थे।

मृत युवती का नाम आरती (Harathi) है। उसकी मौत घटनास्थल पर ही हो गई थी। पुलिस ने आरोपित को हिरासत में ले लिया है और मामले की जाँच की जा रही है। युवती के पिता ने कहा कि इस बात से उन्हें गहरा आघात लगा है कि उनकी बेटी को हत्या करने वाला परिवार का परिचित ही था। उन्होंने बताया कि वो शाहिद को लंबे समय से जानते हैं और वो युवती के सबसे विश्वस्त दोस्तों में से एक था। मृतक युवती के परिवार वालों ने बताया कि उन्हें कुछ दिनों पहले ही पता चला था कि आरती और शाहिद एक-दूसरे से प्यार करते हैं। उन्होंने बताया कि ख़ुद आरती ने उन्हें इस बारे में बताया था।

परिवार वालों के अनुसार वो इन दोनों के रिश्ते के लिए राज़ी भी हो गए थे और सही समय पर शाहिद के साथ बात आगे बढ़ाने के बारे में सोच रहे थे। दोनों का एक-दूसरे के घर आना-जाना लगा रहता था। शुक्रवार को आरती ने अपने परिवार वालों को बताया कि वो कुछ काम से बाहर जा रही है। वो शाहिद के घर गई, जहाँ उसकी हत्या हो गई। आरती की हत्या के बाद आरोपित शाहिद 4 किलोमीटर का सफर ऑटो रिक्शा से तय कर सेंट्रल जेल सरेंडर करने पहुँचा। जेल कर्मचारी को लगा कि वो किसी क़ैदी का रिश्तेदार है और उसे बताया कि मुलाक़ात का समय ख़त्म हो गया है।

जब शाहिद ने बताया कि वो हत्या कर के आ रहा है तो कर्मचारियों ने तुरंत स्थानीय पुलिस को सूचना दी। इसके बाद पुलिस की टीम शाहिद को हिरासत में लेकर थाने ले गई। पुलिस आरोपित को लेकर उसके कमरे पर गई, जहाँ आरती का मृत शरीर पड़ा हुआ था और ख़ून था। शाहिद ने ही पुलिस को आरती के घरवालों के बारे में बताया। इसके बाद पुलिस ने पीड़ित परिवार को सूचना दी।

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कबीरा इस संसार में भाँति-भाँति के कामरेड्स: कथा कामरेड क्रांति कुमार की

CAA के विरोध से शुरू हुई क्रांति, छपाक फिल्म देखकर विरोध जाहिर करने में सिमट चुकी है। लड़ना फासीवाद से था, और लड़ टिकट खिड़की पर PVR में पानी की बोतल और झालमूड़ी ले जाने की परमिशन के लिए रहे हैं। इस सब किस्से से मुझे क्रांति कुमार की याद आती है। सीधा-सादा सर्वहारा क्रांति कुमार किस तरह से साथियों की देखा-देखी कामरेड क्रांति कुमार में तब्दील हो गया लेकिन क्रांति फिर भी न आई।

क्रांति कुमार एक आम इंसान हुआ करते थे, इसके बाद क्रांति कुमार ने सोशल मीडिया पर देखा कि व्यवस्था से हर वक़्त नाराज रहने वाले खूब डिमांड में हैं। यहाँ से क्रांति कुमार के जीवन में बड़ा बदलाव आया। अब क्रांति कुमार आम इंसान नहीं रहे। अब क्रांति कुमार कामरेड क्रांति कुमार हो गए हैं। कामरेड क्रांति कुमार ने ट्विटर पर संविधान पढ़ा था और राजनीति शास्त्र की बारीकियाँ उसने एक बुर्जुआ मित्र के साथ पिज्जा ऑर्डर करते वक़्त मुफ्त कूपन इस्तेमाल करते हुए सीखीं थीं।

कामरेड ने फेसबुक पुस्तकालय पर सुना था कि भगत सिंह भी कामरेड हुआ करते थे। क्रांति कुमार ने यह भी सुना था कि महिलाओं के वस्त्र पहनकर उनके विरोध को HD कैमरा जल्दी कैद कर लेता है। अब कामरेड ने सबसे पहले एक ढपली ली और एक पेटीकोट खरीद लिया, जिसके उसके हाल ही में उसके एक साथी ने ही बताया था कि जब सभी मर्द पेटीकोट पहनने लगेंगे तो यह नया कूल हो जाएगा। बुर्जुआ कामरेड ने फिर नव-कामरेड को गाँधी जी की याद दिलाते हुए कहा कि परिवर्तन की शुरुआत स्वयं से करो, यह कहते कहते नव-कामरेड ने वह वस्त्र धारण कर लिया और माथे पर बिंदी भी लगा ली।

अब कामरेड बनने का आखिरी चरण था- विरोध। कामरेड क्रांति कुमार ने बुर्जुआ साथी से पूछा- “अब लगभग सभी औपचारिकताएँ पूरी हुईं साथी, ये बताओ अब विरोध किसका किया जाए?” साथी कामरेड ने क्रांति कुमार को तुरंत उसकी भूल याद दिलाते हुए कहा- “सुनो साथी, एक कामरेड कभी यह सवाल नहीं कर सकता कि किसका विरोध करें? याद रखो कि तुम्हें बस विरोध करना है, फिर चाहे किसी का भी हो।” क्रांति कुमार को शुरू में बात अटपटी लगी लेकिन यह सोचते हुए कि अगर उसने इसी बात का विरोध कर दिया तो कहीं उसकी नई-नई कामरेड वाली सदस्यता भंग ना हो जाए, क्रांति कुमार ने सर हिलाकर ‘ठीक’ का इशारा किया।

क्रांति कुमार ने सोशल मीडिया स्क्रॉल किया तो देखा कि नाराजगी से भरे हुए उसी के जैसे ही करोड़ों अन्य लोग किसी ना किसी मुद्दे से नाराज थे। कुछ व्यवस्था से नाराज थे, कुछ सरकार से, कुछ मनुवाद से, कुछ हिंदुत्व से, कुछ पितृसत्ता से, कुछ फासीवाद से… दूर कोने में एक छोटा सा ‘अल्पसंख्यक’ वर्ग ऐसा भी था जो सिर्फ पेटीकोट-बिंदी लगाए हुए इंसानों की पहचान न हो पाने से नाराज था। ख़ास बात यह थी कि नाराज होने के बावजूद भी यह वर्ग कामरेड नहीं था, इसने अपनी पहचान ‘अर्बन ट्रोल’ के रूप में बताई।

ट्रेंडिंग परेशानियों में CAA का विरोध और मोदी-शाह का विरोध देखकर क्रांति कुमार को मानो नाराज होने की दवा ही मिल गई। क्रांति कुमार को ध्यान आया कि कुछ चुनिंदा लोग तो मात्र मोदी-शाह के नाम से ही 2014 से नाराज हैं। उसे ध्यान आया कि रवीश कुमार जी से लेकर स्वरा भास्कर और अब अनुराग कश्यप जैसे बड़े नाम भी मोदी-शाह से नाराज हैं और निरंतर नाराज ही हैं, इस नाराजगी से एक दिन का भी अवकाश नहीं। उसके मन में तुरंत विचार आया कि यह सबसे सही ‘गोची’ है।

तुरंत क्रांति कुमार ने JNU जाकर CAA का विरोध करने की प्रतिज्ञा ली। और इसके लिए उसने सबसे पहले एक ढपली खरीद ली। ढपली के साथ उन्हें एक फिल्म का टिकट मुफ्त मिला। कामरेड क्रांति कुमार को लगने लगा कि JNU में ढपली हाथ में लेते ही वह भगत सिंह बन जाएगा, लेकिन वो यह भूल गया कि महज ढपली बजाने से अगर भगत सिंह बन जाते तो ऋषि कपूर को आज यूनेस्को ने बेस्ट भगत सिंह घोषित कर दिया होता।

एक समय था जब बाप सीना चौड़ा कर कहता था कि उसका बेटा क्रांति कुमार फलां कॉलेज से टॉपर निकला है। टॉपर ना सही तो बेटे के ग्रेजुएट होने में भी वह गर्व महसूस कर लेता था। अब बाप की खुशी इस बात में सिमट गई है कि क्रान्ति कुमार किसी कॉलेज में गया और वहाँ पेटीकोट पहनते हुए ढपली बजाकर प्रोग्रेसिव नजर आने लगा है। मने, बाप भी खुश और बेटे के भी शौक पूरे।

एक रोज क्रान्ति कुमार कॉलेज जाता है। शाम होते कामरेड क्रांति कुमार फैज़ को गुनगुनाते हुए घर लौटता है… ‘हम भी देखेंगे लाज़िम है कि हम भी देखेंगे।’ मांँ कहती है- हाथ-मुँह धुलकर खाना खा ले। कामरेड बेटा जवाबी हमले में कहता है- “माँ के हाथ का बना नहीं खाऊँगा, जब तक बाप किचन में जाकर खाना नहीं बनाएगा, तब तक वो भूख हड़ताल करेगा, गाँधी जी भी यही करते।”

इतना सुनकर दिल्ली की सर्दी में टीवी पर प्राइम टाइम में बर्निंग क्वेश्चन वाली डिबेट की अलाव ताप रहा बाप तिलमिलाया हुआ बिस्तर से फ़ौरन कम्बल त्यागकर उठता है। बेटे क्रांति कुमार के पिछवाड़े पर जोर की लात मारते हुए कहता है- “नालायक, हमारी तो पितृसत्ता में ही खूब निभी, मैं दफ्तर जाता, मेरी बीवी घर संभालती। तूझे परेशानी है तो आज से ही किचन में जाकर खाना-पकाना, चूल्हा-चौका सब तेरे हिस्से। अब लड़ पितृसत्ता से। गाँधी जी भी तो कहते थे- बी दी चेंज दैट यू विश टू सी इन दी वर्ल्ड।”

बापू का यह रूप देखकर और कुछ करने का नाम सुनकर क्रांति कुमार रूठ जाता है। जब लात पड़ी तब फैज़ भी नहीं आए, न बापू आए। अब मम्मी उसे मना रही है, क्रांति कुमार आज भी भूखा नहीं सोएगा।

पिछवाड़े पर पड़ी बाप की लात के दर्द से कराहते हुए क्रांति कुमार बस याद कर रहा है- कितना विरोध पेंडिंग रह जाएगा। सिस्टम और व्यवस्था से लड़ने के लिए उसने जो नारे लगाने के सपने देखे थे। स्वरा और दीपिका की फिल्म देखकर सत्ता पलटनी थी, क्रांति वाले हैशटैग चलाने थे। दर्द के इन पलों में फैज़-वैज की जगह कामरेड क्रांति कुमार को बस कबीर का वह दोहा याद आया, जो उसके साथियों ने ‘हम भी देखेंगे’ वाले व्हाट्सएप्प ग्रुप में शेयर किया था- “कबीरा इस संसार में भाँति-भांति के लोग… “

हे मार्क्स बाबा के कॉमरेड, ठण्ड का मौसम तुम्हारी क्रांति के लिए सही नहीं है, रजाई में दुबके रहो

मोदी के कहने पर फोर्ब्स में कन्हैया का नाम, शेहला ने नए नोट पर लिख दिया- कन्हैबा बेब्फा है

‘माँ’ को छोड़ ‘मर्दानगी’ पर अटके मुनव्वर, ‘मर्दाना कमज़ोरी’ के शर्तिया इलाज के लिए वामपंथियों ने लगाई लाइन

खोज उस क्रिएटिव डॉक्टर की, जिसने नकली पीड़ितों के हिजाब और जैकेट पर बैंडेज लगाया

JNU पर सुब्रह्मण्यम स्वामी का प्लान: 2 साल चले ‘सफाई अभियान’, जवानों को करो तैनात

जेएनयू में हुई हिंसा को लेकर जारी गहमागहमी के बीच भाजपा नेता और राज्यसभा सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने इस विश्वविद्यालय को लेकर अपना प्लान सामने रखा है। बकौल स्वामी जेएनयू कैंपस में पुलिस स्टेशन बनना चाहिए। बीएसएसएफ और सीआरपीएफ जवाने की तैनाती होनी चाहिए। यूनिवर्सिटी को दो साल के लिए बंद कर जरूरी ‘सफाई अभियान’ चलाया जाए। साथ ही कहा है कि इसके बाद जब दोबारा जेएनयू को खोला जाए तो उसका नाम बदलकर सुभाष चंद्र बोस विश्‍वविद्यालय कर देना चाहिए।

स्वामी ने अहमदाबाद के थलतेज में एक निजी विश्वविद्यालय के कार्यक्रम के दौरान पत्रकारों से कहा कि सरकार को जेएनयू को लेकर बड़ा कदम उठाना चाहिए। इसकी सफाई के लिए इसे कम से कम दो साल के लिए बंद कर देना चाहिए और जब यह वापस से शुरू हो तो इसका नाम बदल कर सुभाष चंद्र बोस विश्वविद्यालय कर दिया जाना चाहिए।

स्‍वामी ने कॉन्ग्रेस पर आरोप लगाते हुए कहा कि कॉन्ग्रेस ने जान-बूझकर जेएनयू में अयोग्य और अशिक्षित लोगों को प्रवेश दिया। इससे वहाँ के हालात लगातार खराब होते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि जेएनयू के हॉस्टल का किराया 10 रुपए है और वहाँ 35 से 40 साल तक के लोग छात्र हैं और हर साल फेल होते रहते हैं। इन लोगों का एक ही उद्देश्य होता है कि जेएनयू के हॉस्टल को रहने के ठिकाने के रूप में इस्तेमाल करें और वो पूरे देश में घूम-घूम कर समाजवादी कार्यक्रमों में हिस्सा लें।

उन्होंने कहा कि बंद करने से पहले अच्छे छात्रों को दिल्ली विश्वविद्यालय और आंबेडकर विश्वविद्यालय में स्थानांतरित कर देना चाहिए एवं हुल्लड़बाजों को बाहर कर देना चाहिए। स्वामी ने कहा कि नेहरू के नाम पर पहले से ही कई संस्थान है, इसलिए जेएनयू का नाम बदल दिया जाना चाहिए। स्वामी ने दावा किया कि जेएनयू तथा अन्यत्र हो रहे नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) के हिंसक विरोध के पीछे आतंकी और विदेशी तत्वों का भी हाथ है।

साथ ही स्‍वामी ने जेएनयू में पुलिस स्टेशन बनाए जाने की माँग की है। उन्होंने कहा कि जेएनयू में सिर्फ दिल्ली पुलिस से काम नहीं चलेगा। वहाँ पर बीएसएफ और सीआरपीएफ की तैनाती जाए। इसके बाद ही वहाँ के हालात सामान्य हो सकेंगे। स्वामी ने मीडिया से बात करते हुए कहा, “सुरक्षा का मतलब हरेक कैंपस के अंदर पुलिस स्‍टेशन बनाया जाना है। आज आपको पुलिस बुलाना पड़ता है जिसमें काफी समय लग जाता है। देश में विश्‍वविद्यालयों के अंदर पुलिस स्‍टेशन का होना बहुत जरूरी है। यह केवल जेएनयू के लिए नहीं है। लेकिन हमें इसकी शुरुआत जेएनयू से करनी चाहिए।”

JNUSU कार्यकर्ता को ABVP का बता डाला… राहुल कंवल ने स्टिंग के नाम पर ऐसे किया गड़बड़झाला

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JNUSU कार्यकर्ता को ABVP का बता डाला… राहुल कंवल ने स्टिंग के नाम पर ऐसे किया गड़बड़झाला

इंडिया टुडे चैनल ने 10 जनवरी 2020 को एक स्टिंग ऑपरेशन प्रसारित किया। इस स्टिंग ऑपरेशन को उन्होंने अपनी खोजी पत्रकारिता का कमाल बताया। इंडिया टुडे द्वारा किया गया यह स्टिंग ऑपरेशन JNU हिंसा पर आधारित था। दिल्ली पुलिस द्वारा एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित करने के ठीक बाद इंडिया टुडे ने स्टिंग ऑपरेशन का प्रसारण किया और यह दिखाया कि JNU हिंसा के संदिग्धों के रूप में JNUSU अध्यक्ष समेत वामपंथी छात्रों को फँसाया गया है।

स्टिंग ऑपरेशन के प्रसारण के दौरान, ABVP ने एक बयान जारी करते हुए कहा कि अक्षत अवस्थी, जिस व्यक्ति की पहचान ABVP कार्यकर्ता के रूप में की जा रही है, वह किसी भी तरह से ABVP से नहीं जुड़ा हुआ है। राहुल कंवल ने इसी शख़्स के लिए दावा किया कि उनके पास ABVP की रैली में अक्षत के भाग लेने का प्रमाण है।

स्टिंग ऑपरेशन के प्रसारित होने के बाद राहुल कंवल ने अक्षत को लेकर कहे अपने झूठे दावे को सच साबित करने के लिए ट्विटर का सहारा लिया। और यहीं पर राहुल कंवल और इंडिया टुडे के “स्टिंग ऑपरेशन” का ख़ुलासा या यूँ कहें कि पर्दाफाश भी हो गया।

राहुल कंवल ने दावा किया कि अक्षत ने भले ही यह कहा हो कि वो ABVP से नहीं जुड़ा है, लेकिन एक फ़ोटो में हाथ में तिरंगा लिए हुए नज़र आ रहा है और यह फ़ोटो ABVP रैली का है। 

“एबीवीपी की रैली” में भाग लेते अक्षत अवस्थी के सबूत के रूप में राहुल कंवल द्वारा साझा की गई तस्वीर

राहुल कंवल के अनुसार, फ़ोटो में भारतीय ध्वज को हाथ में थामे हुए जो शख़्स है, वो अक्षत अवस्थी है।

इसके बाद, हमारी टीम ने इस फ़ोटो से संबंधित जानकारी जुटाने की कोशिश की और यह जानने का प्रयास किया कि इस फ़ोटो का अन्य किन प्रकाशनों में इस्तेमाल हुआ है। जानकारी जुटाने का मक़सद यह भी जानना था कि क्या यह वाकई ABVP की रैली थी, और अगर थी तो इस रैली के आयोजन का मुद्दा क्या था।

मनोरमा प्रकाशन द्वारा इस्तेमाल की गई तस्वीर के अनुसार, यह फ़ोटो 11 नवंबर 2019 की है, जब पुलिस ने JNU के उन छात्रों को रोका, जो हॉस्टल की फीस वृद्धि के मुद्दे पर विरोध-प्रदर्शन कर रहे थे। यह फ़ोटो पीटीआई के कमल सिंह ने ली थी।

मनोरमा में प्रकाशित लेख

मनोरमा और इंडिया टुडे के राहुल कंवल द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली इस फ़ोटो को हमने ध्यान से देखा और यह पता लगाने की कोशिश की कि क्या वाकई दोनों फ़ोटो में अक्षत अवस्थी ही था।

11 नवंबर के विरोध-प्रदर्शन की पीटीआई की फ़ोटो राहुल कंवल ने ट्वीट की

अपनी जाँच में हमने पाया कि राहुल कंवल जिसे ABVP की रैली कह रहे थे, वो 11 नवंबर 2019 को JNU छात्रावास शुल्क वृद्धि के विरोध में आयोजित की गई थी।

हमें इंडिया टुडे का वो लेख भी मिला जिसमें उन्होंने ख़ुद इस बात की पुष्टि की कि वो फ़ोटो 11 नवंबर के विरोध-प्रदर्शन की थी, जिसे राहुल कंवल ABVP की रैली कह रहे थे।

इंडिया टुडे का 12 नवंबर का लेख

इंडिया टुडे के लेख में पहले पैराग्राफ में कहा गया, “छात्रावास शुल्क बढ़ने के ख़िलाफ़ नारे लगाने और बैनर उठाने के कारण, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के हज़ारों छात्र सोमवार को पुलिस के साथ भिड़ गए। यूनिवर्सिटी के छात्र, जिन्हें हाल के वर्षों में कई ऐसे आंदोलन करते देखा गया, वो ऑल इंडिया काउंसिल ऑफ टेक्निकल एजुकेशन (एआईसीटीई) परिसर के बाहर विरोध-प्रदर्शन कर रहे थे, जहाँ यूनिवर्सिटी के तीसरे दीक्षांत समारोह के दौरान उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने छात्रों को संबोधित किया था।”

इस दौरान, उप-राष्ट्रपति तो दीक्षांत समारोह में हिस्सा लेकर किसी तरह वहाँ से निकल गए, लेकिन मानव संसाधन विकास मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक वहाँ क़रीब छ: घंटे तक फँसे रहे।

एक सवाल के जवाब में इंडिया टुडे के लेख में खुद ही बताया गया कि किसने विरोध-प्रदर्शन का समर्थन कर रहे अन्य दलों को संगठित किया।

इंडिया टुडे का लेख

इंडिया टुडे के लेख में उल्लेख किया गया था कि 11 नवंबर का विरोध-प्रदर्शन JNUSU द्वारा आयोजित किया गया था। JNUSU के वर्तमान अध्यक्ष आइशी घोष हैं, जिन्हें दिल्ली पुलिस ने JNU हिंसा में एक संदिग्ध के रूप में नामित किया है और वो वामपंथी संगठन SFI से हैं।

यह विरोध BAPSA (बिरसा अम्बेडकर फुले स्टूडेंट्स एसोसिएशन), Kshatra राजद (RJD, लालू की पार्टी का छात्रसंघ) और कॉन्ग्रेस की NSUI जैसी पार्टियों द्वारा समर्थित था।

उन्होंने विरोध-प्रदर्शन के दौरान मिलकर, “हमें चाहिए आज़ादी” के नारे लगाए थे। 

इंडिया टुडे का लेख

ग़ौर करने वाली बात यह है कि तब के अपने लेख में इंडिया टुडे ने ABVP का ज़िक्र कहीं किसी कोने में भी नहीं किया था।

11 नवंबर 2019 को एआईसीटीई के बाहर JNUSU विरोध के बारे में इंडिया टुडे की एक वीडियो रिपोर्ट यहाँ दी गई है।

दिलचस्प बात यह है कि इस वीडियो रिपोर्ट में भी ABVP का कोई ज़िक्र नहीं था।

इससे यह बात एकदम साफ़ हो जाती है कि राहुल कंवल के फ़र्ज़ी दावे वाली फ़ोटो का संबंध दूर-दूर तक ABVP या “ABVP की रैली” से नहीं था। राहुल कंवल के खोखले दावे का सच ख़ुद राहुल कंवल द्वारा शेयर किए गए जनसत्ता के लेख से भी हो गया। इसमें विरोध-प्रदर्शन के लिए स्पष्ट तौर पर आइशी घोष और JNUSU का उल्लेख किया गया था, न कि ABVP का।

जनसत्ता का लेख

JNU में 11 नवंबर के विरोध-प्रदर्शन से जुड़े JNUSU के पर्चे (Pemphlate) ऑपइंडिया के पास भी हैं।

11 नवंबर 2019 को जेएनयूएसयू विरोध का पैम्फलेट

इस तरह राहुल कंवल के दावे का कोई प्रमाण नहीं है, जो उनकी बात को सही साबित कर सके। विरोध मार्च, जिसे इंडिया टुडे के राहुल कंवल ने “ABVP रैली” करार दिया, वो विरोध-प्रदर्शन JNUSU द्वारा किया गया था, जो वामपंथियों के प्रभुत्व और कॉन्ग्रेस की छात्र शाखा NSUI सहित अन्य वाम संगठनों द्वारा समर्थित है। इसलिए यह कहना ग़लत नहीं होगा कि अक्षत अवस्थी JNUSU कार्यकर्ता तो हो सकते हैं, लेकिन ABVP के सदस्य तो बिलकुल नहीं हो सकते।

यह कई महत्वपूर्ण प्रश्न हैं, जिनका राहुल कंवल और इंडिया टुडे को जवाब देना चाहिए:

1. यदि इंडिया टुडे को केवल यही साबित करना है कि अक्षत अवस्थी ABVP के सदस्य हैं, तो इस स्टिंग ऑपरेशन को हवा क्यों दी गई?

2. दिल्ली पुलिस द्वारा स्पष्ट रूप से प्रारंभिक संदिग्धों के नाम दिए जाने के बाद भी, इंडिया टुडे ने ग़लत स्टिंग ऑपरेशन का प्रसारण क्यों किया और दिल्ली पुलिस की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। क्या इसके लिए इंडिया टुडे माफ़ी माँगेगा?

3. इंडिया टुडे का इसके पीछे क्या मक़सद था, क्या ABVP के एक सदस्य के नाम पर इंडिया टुडे कोई साज़िश रचने की फ़िराक में था?

4. प्रथम वर्ष का वो छात्र कौन है, जो स्पष्ट रूप से कैमरे पर झूठ बोल रहा था कि उसने साबरमती छात्रावास में हिंसा का आयोजन किया था और कई ABVP कार्यकर्ताओं को बुलाया था?

5. इंडिया टुडे के राहुल कंवल का पैंतरा कहीं वामपंथी दलों की करतूत पर पर्दा डालने की कोशिश तो नहीं थी?

इसके अलावा, इंडिया टुडे के ग्राफ़िक्स भी एक अलग ही इतिहास गढ़ने का कुचक्र रचते दिखे। आजतक पर, अक्षत अवस्थी के बोलने के दूसरे खंड में टाइम स्टैम्प को छिपा दिया गया, इस दौरान एक अजीब सा टाइम स्टैम्प सामने आया है।

Aaj Tak द्वारा अपलोड किए गए वीडियो का स्क्रीनशॉट

अक्षत अवस्थी को दिखाए जाने वाले वीडियो के दूसरे खंड पर टाइम स्टैम्प 22 अक्टूबर 2019 अंकित है। जबकि JNU में हिंसा 5 जनवरी 2020 को हुई थी।

इस सेगमेंट में, अक्षत अवस्थी सामान्य बयान दे रहे थे कि कैसे ABVP के कार्यकर्ताओं को उनके चेहरे पर मास्क लगाने का विचार आया, दिलचस्प बात यह है कि इस सेगमेंट में अक्षत अवस्थी द्वारा 5 जनवरी की हिंसा के बारे में कोई विवरण नहीं बताया गया था।

इसके पीछे हो सकता कि कोई तकनीकी गड़बड़ी रही हो, लेकिन जिस विश्वसनीयता के साथ इंडिया टुडे ने इस ख़बर का प्रसारण किया, उससे उनकी विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं। इसलिए इस स्टिंग ऑपरेशन के सन्दर्भ में कुछ सवाल हैं, जिनका जवाब चैनल और राहुल कंवल को देना होगा:

1. क्या यह सेगमेंट वास्तव में अक्टूबर में ही रिकॉर्ड किया गया था?

2. यदि यह सेगमेंट अक्टूबर में रिकॉर्ड किया गया था, तो क्या इंडिया टुडे के जाँचकर्ताओं ने ABVP को फँसाने के लिए एक तरह की साज़िश रची थी?

3. यदि यह एक तकनीकी गड़बड़ी थी, तो इंडिया टुडे या आजतक ने कोई डिस्क्लेमर क्यों नहीं जोड़ा?

कई ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब इंडिया टुडे को अपने JNU स्टिंग ऑपरेशन के लिए देना चाहिए और यह स्पष्ट करना चाहिए कि जब दिल्ली पुलिस ने JNU हिंसा के लिए में वामपंथियों के होने का ख़ुलासा कर दिया, बावजूद इसके इंडिया टुडे ने ABVP के छात्र को बदनाम कर वामपंथी छात्र की तरह दिखाने की कोशिश क्यों की?

राहुल कंवल ने आरोप लगाया कि उनके चैनल ने “डर या पक्षपात” के बिना अपना काम किया है। लेकिन अगर JNU की हिंसा पर ​इंडिया टुडे के स्टिंग ऑपरेशन की बात की जाए तो उसका मक़सद दिल्ली पुलिस की छवि को धूमिल करने का था, ऐसा करना चैनल और राहुल कंवल को किसी भी तरह से शोभा नहीं देता।

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यह मूल ख़बर OpIndia English की एडिटर नुपुर जे शर्मा की है, जिसका अनुवाद प्रीति कमल ने किया है।

हिंदू बनकर छिपा था दाऊद इब्राहिम का शूटर एजाज, आधार कार्ड बनवाने जा रहा था दरभंगा

कुख्यात गैंगस्टर दाऊद इब्राहिम के शूटर रहे एजाज लकड़वाला की गिरफ्तारी के बाद से कई चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार पुलिस की आँखों में धूल झोंकने के लिए एजाज ने तमाम जतन किए। रूप-रंंग बदला। अपनी फर्जी पहचान के हिसाब से जीवनशैली भी बदली। असली पहचान छिपाने के लिए हिंदू नामों का इस्तेमाल किया। इनमें अक्षय प्रीतमदास भाटिया और मनीष आडवाणी जैसे नाम प्रमुख हैं।

फरारी के दौरान अलग-अलग वेशभूषा वह विभिन्न देशों में घूमता रहा। वह फर्राटेदार अंग्रेजी बोलने लगा था। लेकिन करीब 22 साल की लंबी जद्दोजहद के बाद मुंबई पुलिस ने उसे पटना के मीठापुर बस स्टैंड से पिछले दिनों दबोच लिया था। उसके ख़िलाफ़ हत्या व हत्या के प्रयास के 27 मामले दर्ज हैं। वह 1998 से ही भारत के मोस्ट वॉन्टेड की सूची में शामिल है। उसके ख़िलाफ़ रंगदारी के 80 मामले दर्ज हैं। मुंबई में पले-बढ़े लकड़वाला ने अपने चाचा के ट्रैवेल कम्पनी से करियर की शुरुआत की थी। लेकिन कुछ दिन बाद वह अंडरवर्ल्ड से जुड़ गया। 22 वर्ष की उम्र में ही उसने पहला ख़ून किया था।

एजाज लकड़वाला के बारे में पता चला है कि वो कई वर्षों से काठमांडू में छिपा हुआ था। उसका कारोबार नेपाल की राजधानी काठमांडू से लेकर पोखरा तक फैला हुआ है। उसने होटलों में निवेश से लेकर सोने की तस्करी तक अपने धंधे फैला रखे हैं। मुंबई के सिनेमाई हस्तियों और कारोबारियों से उगाही गई रंगदारी की रकम उसके पास हवाला के जरिए पहुँच रही थी। बेटी सोनिया भी उसके इस धंधे में शामिल थी। उसने हाल ही में एक फ़िल्म कारोबारी से रंगदारी माँगी थी।

बता दें कि सोनिया पहले ही गिरफ़्तार की जा चुकी है। उससे मिली जानकारियों के आधार पर ही एजाज पकड़ा गया था। जब उसे पकड़ा गया तो वह दरभंगा जा रहा था। बताया जा रहा है कि वह दरभंगा से आधार कार्ड बनवाने की फ़िराक़ में था। असल में एजाज एक नई पहचान के लिए बेचैन था। उसे इस बात की भनक मिल गई थी कि मुंबई पुलिस को उसके ठिकाने की खबर लग चुकी है। गृह मंत्रालय से हरी झंडी मिलने के बाद नेपाल में भी भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी ने उस पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया था। आईबी की एक टीम ने एजाज का पता लगा लिया था। एजेंसी को पता था कि वो बिहार के रास्ते भागने का प्रयास करेगा और यही हुआ भी। एजाज लगातार अपनी गाड़ी बदल रहा था और आईबी के लोग भी उसका पीछा करते हुए गाड़ियाँ बदल रहे थे।

एजाज ने पूछताछ में बताया है कि उसने वीरगंज के रास्ते भारत में एंट्री की। वह पटना से दरभंगा जाने वाला था। इससे पहले कि वह फ़र्ज़ी आधार कार्ड बनवाता, वह पकड़ा गया। 3 जनवरी को भी एजाज ने एक उद्योगपति से फोन पर रंगदारी माँगी थी। लकड़वाला इससे पहले भी गिरफ़्तार किया जा चुका है। उसे 1995 में गिरफ़्तार किया गया था लेकिन मात्र 2 साल जेल में रहने के बाद उसे बरी कर दिया गया था। उसे दोबारा फिर गिरफ़्तार कर नासिक जेल में रखा गया। उसने जेल से भागने के लिए मनीष श्याम आडवाणी के नाम से पासपोर्ट बनवाया था।

बाद में उसकी बेटी सोनिया शेख की आईडी कार्ड में उसके पिता का नाम मनीष श्याम पाया गया था। लकड़वाला 1998 में नासिक जेल से भाग निकला। 2003 में उसके और छोटा शकील के गैंग के बीच लड़ाई चलती थी। उसने डी-कम्पनी के सबसे बड़े फिनांसर शरद शेट्टी को मार डाला था। उससे पूछताछ के दौरान कई और राज खुलने की संभावना है।

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13 साल की बच्ची से बार-बार संभोग की इच्छा, मना करने पर हुसैन ने किया रेप और एनल सेक्स

हुसैन अब्दुकर ने इन्सजॉन के एक अपार्टमेंट में 13 साल की लड़की का बलात्कार किया। हुसैन ने पीड़ित लड़की के साथ यौन अपराध को इस हवस के साथ अंजाम दिया कि पीड़िता दो दिन तक बैठ नहीं पाई। अपराध के समय आरोपित हुसैन की उम्र 19 वर्ष थी और वह यह बात अच्छी तरह से जानता था कि लड़की की उम्र 15 साल से कम है। बलात्कार की यह घटना 7 मार्च, 2019 को हुई। अब्दुकर सोमालिया का रहने वाला है, जबकि पीड़ित लड़की स्वीडन की है।

हुसैन को 9 मार्च, 2019 को हिरासत में लिया गया और 12 मार्च, 2019 को गिरफ्तार किया गया। आरोपित हुसैन ने नाबालिग पीड़िता के साथ न सिर्फ बलात्कार (वेजाइनल संभोग) किया बल्कि जबरन अप्राकृतिक सेक्स (गुदा मैथुन) भी किया। हैरतअंगेज बात यह रही कि इतने विभत्स अपराध के बावजूद हुसैन को बच्ची के साथ बलात्कार का दोषी नहीं, बल्कि बाल यौन शोषण अपराध का दोषी ठहराया गया। और उसे सजा कितनी मिली? सिर्फ 75 घंटों के लिए समाज सेवा करने का आदेश!

6 मई 2019 को मोरा जिला परिषद ने इस मामले पर फैसला सुनाया और सोमालिया के नागरिक हुसैन अब्दिकादिर अब्दुकर को बाल यौन शोषण के लिए 75 घंटे सेवा करने के साथ ही पीड़िता को 15000 स्वीडिश करेंसी देने की सजा सुनाई गई थी। इसके बाद इस मामले में सेवा उच्च न्यायालय ने भी फैसला सुनाया। यहाँ भी पीड़िता के साथ उच्च न्यायालय ने न्याय नहीं किया और जिला अदालत की तरह हुसैन को बच्ची के साथ बलात्कार के बजाए बच्ची के यौन शोषण के लिए दोषी ठहराया।

बता दें कि अभियोजक पक्ष ने कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए तर्क दिया था कि अदालत को हुसैन को बच्चों के यौन शोषण के बजाए बच्चों के साथ बलात्कार के लिए दोषी ठहराया जाना चाहिए, और जेल की सजा दी जानी चाहिए। साथ ही उन्होंने पीड़िता के असह्य दर्द को मुआवजा देकर रफा-दफा करने पर सवाल उठाते हुए कहा कि क्या इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि इस वारदात के बाद पीड़िता की मन:स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ा है और यह उसकी पढ़ाई को भी प्रभावित करता है। 

जानकारी के मुताबिक पीड़िता जानती थी कि हुसैन हाईस्कूल के तीसरे वर्ष का छात्र था। पीड़िता ने पुलिस द्वारा की गई पूछताछ के दौरान यह बातें कहीं। उसने बताया कि कुछ महीने पहले वो दोनों मिले थे, जिसके बाद वह चाहता था कि वे केवल एक-दूसरे के साथ समय बिताएँ। मगर लड़की ने इसके लिए मना कर दिया, क्योंकि वह उससे उम्र में काफी बड़ा था। जिसके बाद दोनों की स्नैपचैट पर बात होने लगी। इस दौरान लड़की के उम्र बताने के बावजूद भी हुसैन ने लड़की के सामने बार-बार संभोग की इच्छा जाहिर की थी।

एक दिन जब वो अपनी दोस्तों के साथ मस्ती कर रही थी तो हुसैन ने उससे मिलने की इच्छा जाहिर की। इसके बाद वो लोग ICA में मिले और फिर अपार्टमेंट में गए। इसके बाद पीड़िता ने हुसैन द्वारा जबरन उसे बिस्तर पर लिटाने, उसका कपड़े उतारने और फिर पेनेट्रेशन करने का दर्द बयाँ करती है। पेनेट्रेशन के दर्द के दौरान वो बार-बार अपने दाँतों से जीभ काट लेती थी, जिसकी वजह से उसकी जीभ पर भी लाल निशान हैं। जब लड़की का भाई अपार्टमेंट में आया तो हुसैन ने उसे रोक दिया। हुसैन के हवस का शिकार होने के बाद लड़की दो दिनों तक बैठ नहीं पाई और सोने में भी काफी कठिनाई हुई।

60 सालों तक कॉन्ग्रेस को सत्ता तो जनता समझदार… मोदी को चुना तो ‘मासूम’ या बेवकूफ: वाह चिदंबरम जी वाह!

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम का मानना है कि भारतीय लोग काफी भोले-भाले होते हैं, जो सरकार द्वारा जारी कार्यक्रमों के क्रियान्वयन को लेकर किए गए दावों पर आसानी से विश्वास कर लेते हैं। उनका कहना है कि उन्होंने भारतीय जैसे मासूम कहीं नहीं देखे, जो अखबार में कुछ भी छप जाने पर तुरंत विश्वास कर लेते हैं।

पहली दफा आपको भी उनकी बातों पर विश्वास करना होगा। अब 70 सालों तक देश की जनता पर राज करने वाली पार्टी के वरिष्ठ नेता कह रहे हैं, तो सही ही कह रहे होंगे न! आखिर इन्हें मासूम जनता को इतने सालों तक बेवकूफ बनाने का अच्छा-खासा अनुभव जो है। इनकी पार्टी हर चुनाव में इन ‘मासूम’ जनता को बरगला कर सत्ता में आई और सालों तक देश की जनता का फायदा उठाया।

मगर मेरी समझ में यह बात नहीं आ रही कि उनके शासनकाल में भी यही जनता थी, या फिर बदल गई… क्योंकि इसी जनता ने जब इनकी बातों पर, इनके झूठे वादों पर, इनके कार्यक्रमों पर आसानी से विश्वास कर लिया तो समझदार, लेकिन जब इन्होंने तत्कालीन मोदी सरकार की योजनाओं, कार्यक्रमों पर विश्वास कर लिया तो ‘मासूम’ कैसे? दरअसल इनकी नज़र में मोदी सरकार और उनकी योजनाओं पर विश्वास करने वाली यह जनता मासूम नहीं बेवकूफ है।

यानी कि जब तक जनता ने पूर्व केंद्रीय मंत्री माननीय पी चिदंबरम की पार्टी की योजनाओं और झूठे वादों को बिना कोई सवाल किए, बिना कोई जाँच-पड़ताल किए आँख मूँदकर माना, तो समझदार… लेकिन जैसे ही जनता ने सच्चाई को देख-समझकर, देश हित को देखकर फैसला लेना शुरू किया, तो वो बेवकूफ। सच्चाई तो यह है कि जब से जनता जागरूक हुई है, इन्हें तकलीफ होने लगी, इनके पेट में दर्द होने लगा है, और इसी का विकार इनके मुँह से निकल रहा है।

इनकी पीड़ा को समझा जा सकता है। तकलीफ होने वाली तो बात है ही। इन्हीं ‘मासूम’ जनता ने इन्हें सत्ता से इस कदर खींचकर फेंक निकाला, कि ये फिर वापस से सत्ता सुख पाने का स्वप्न ही देखते रह गए। क्या कीजिएगा चिदंबरम जी! मासूम जनता है, समझ नहीं पा रही है। अगर इन्हें समझ होती तो ये और काफी पहले आपको निकाल फेंकती, जब आपकी सरकार घोटाले पर घोटाले किए जा रही थी और उसके बाद भी आप लगातार सत्ता में आ रहे थे। आपने और आपकी सरकार ने मासूम जनता को बेवकूफ बनाकर इतने घोटाले किए कि आज भी आप और आपकी पार्टी के आलाकमान, शीर्ष नेता जमानत पर घूम रहे हैं।

आज जब जनता सजग हो गई और हर चीज को क्रॉस चेक करके विश्वास करती है, सरकार से सवाल करती है और सच्चाई की तह तक जान के बाद ही सरकार पर विश्वास करती है तो यह मासूम कैसे हो गई। और ये जनता क्यों न करें मोदी सरकार की योजनाओं पर विश्वास… तब जब उन्हें सारी योजनाओं का लाभ मिल रहा है। किसानों को उनकी सब्सिडी मिल रही है, महिलाओं को उज्जवला योजना के तहत गैस की सुविधा मिली है, बुजुर्गों को वृद्धावस्था पेंशन मिल रही है, गरीबों को घर मिलने के साथ ही कई अन्य योजनाओं का भी लाभ मिल रहा है।

जहाँ तक आपने बात की आयुष्मान योजना की, तो लोगों को इस योजना का भी बखूबी लाभ मिल रहा है। अगस्त 2019 तक आयुष्मान भारत योजना के तहत जितने मरीजों को अब तक मुफ्त इलाज मिला है, अगर वो अगर इसके दायरे में ना होते तो उन्हें 12 हज़ार करोड़ रुपए से अधिक खर्च करने पड़ते। यानी कि एक तरह से देश के लाखों गरीब परिवारों के 12 हज़ार करोड़ रुपए की बचत हुई है।

चिदंबरम जी आपने कहा कि आपके ड्राइवर को अस्पताल ने बताया कि उन्हें आयुष्मान भारत जैसी किसी योजना के बारे में जानकारी नहीं है। माफ कीजिएगा, लेकिन कहीं आप अमेठी में राजीव गाँधी चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा संचालित अस्पताल की बात तो नहीं कर रहे! मैं ऐसा इसलिए कह रही हूँ क्योंकि कुछ दिन पहले ही इस अस्पताल में मौत से लड़ाई लड़ रहा एक गरीब जब आयुष्मान कार्ड लेकर अपना इलाज कराने गया, तो उस गरीब से कहा गया कि ये मोदी का अस्पताल नहीं, जहाँ आयुष्मान कार्ड चल जाए।

मृतक के भतीजे ने बताया था, “जब मैंने अपने चाचा को अस्पताल में भर्ती कराया और कार्ड दिखाया तो अस्पताल के लोगों ने कहा कि यह राहुल गाँधी का अस्पताल है और यहाँ मोदी और योगी का कार्ड नहीं चलता है। हमने कार्ड पर दिए हेल्पलाइन नंबर से भी शिकायत की लेकिन, मदद नहीं मिली और इलाज न हो पाने के कारण मेरे चाचा की मौत हो गई।”

माननीय चिदंबर जी आपका कहना है कि हम मासूम बन रहे हैं। जबकि कई समाचार और आँकड़े सच्चाई से परे होते हैं। आप मासूम तो कतई नहीं हैं। वैसे आपने ये बात बिलकुल सही कही है कि कई समाचार और आँकड़े सच्चाई से परे होते हैं। आपको भी लंबी-लंबी फेंकने से पहले अपनी पार्टी के कृत्यों के बारे में सोच लेना चाहिए, और सच को परखकर ही बोलना चाहिए।

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15 जनवरी के बाद Chhapaak की रिलीज पर रोक: दिल्ली HC का आदेश – चलानी है मूवी तो करो एडिट

दिल्ली हाई कोर्ट ने बॉलिवुड फ़िल्म ‘छपाक’ में एसिड अटैक सर्वाइवर की शिकार हुई लक्ष्मी अग्रवाल का केस लड़ने वाली महिला वकील अपर्णा भट्ट को क्रेडिट देने का आदेश दिया है। दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि अपर्णा को क्रेडिट दिए बिना फ़िल्म रिलीज़ पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा। इसके लिए 15 जनवरी तक मल्टिपलेक्स और अन्य जगहों पर 17 जनवरी तक की मोहलत दी गई है।

दरअसल, बॉलीवुड अभिनेत्री दीपिका पादुकोण अभिनीत फ़िल्म ‘छपाक’ तमाम विवादों के बीच शुक्रवार (10 जनवरी) को सिनेमाघरों में रिलीज़ तो हो गई थी, लेकिन इससे जुड़ा विवाद थमा नहीं था। एसिड अटैक पीड़िता लक्ष्मी अग्रवाल का केस लड़ने वाली वकील को क्रेडिट देने के निचली अदालत के फ़ैसले के एक दिन बाद Fox Studios और फ़िल्म की निर्देशक मेघना गुलज़ार ने दिल्ली हाईकोर्ट में एक अपील दायर की थी।

फ़िल्म में क्रेडिट न दिए जाने को लेकर महिला वकील अपर्णा भट्ट ने फेसबुक पर लिखा था कि कैसे वे इस बात से नाराज़ हैं कि फ़िल्म छपाक के मेकर्स ने उन्हें अपनी फ़िल्म में कोई क्रेडिट नहीं दिया। उन्होंने ये भी कहा था कि वे इस मामले में क़ानून की मदद लेंगी। साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया था कि वो दीपिका पादुकोण और बाकी लोगों के बराबरी की नहीं हैं, लेकिन इस मामले में वे चुप नहीं बैठेंगी।

एसिट अटैक सर्वाइवर लक्ष्मी अग्रवाल का केस लड़ने वाली महिला वकील अपर्णा भट्ट की याचिका पर सुनवाई के बाद, दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने गुरुवार (9 जनवरी) को छपाक की निर्देशक मेघना गुलज़ार को मूवी में वकील को उचित क्रेडिट देने का आदेश दिया था।

कोर्ट के आदेश में महिला वकील के दावों को वैध पाए जाने का उल्लेख था। कोर्ट का कहना था, “यह आवश्यक है कि वास्तविक फुटेज और चित्र प्रदान करके वकील के योगदान को स्वीकार किया जाए।” साथ ही कोर्ट ने निर्माताओं से फ़िल्म स्क्रीनिंग में लाइन जोड़ने के लिए भी कहा कि “अपर्णा भट्ट महिलाओं के प्रति यौन और शारीरिक उत्पीड़न के मामलों से लड़ती रहती हैं।”

इस आदेश में उल्लेख किया गया था कि अगर अपर्णा भट्ट को क्रेडिट दिए बिना वास्तविक फुटेज और छवियों को फ़िल्म की स्क्रीनिंग दिखाई जाती है, तो यह महिला वकील के साथ एक गंभीर अन्याय होगा और यह भट्ट के योगदान और उनके प्रयासों को जनता तक पहुँचाने से भी रोकेगा।

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176 लोगों की मौत… ईरान ने मानी ग़लती, कहा- यूक्रेन के विमान को हमारे ही मिसाइल ने गिराया

तेहरान से उड़ान भरने के कुछ ही मिनट बाद क्रैश हुए यूक्रेन के विमान हादसे की ज़िम्मेदारी ईरान ने ले ली है। ईरान की सरकार की तरफ़ से जारी एक बयान में कहा गया है कि ईरानी मिसाइलों ने ही विमान को ग़लती से निशाना बनाया था। इस विमान हादसे में 176 लोगों की मौत हो गई थी, जिनमें अधिकतर नागरिक कनाडा और ईरान के थे। अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसे देश पहले से ही ग़लती से विमान को निशाना बनाए जाने की बात कर रहे थे।

दरअसल, ईरान की नागरिक उड्डयन विभाग के साथ बैठक के बाद पहले से ही इसकी उम्मीद जताई जा रही थी। अब ईरान प्रशासन ने बयान जारी कर यह स्पष्ट कर दिया है कि यूक्रेन का विमान मानवीय भूल के कारण निशाने पर आ गया था। इस हादसे में सवार सभी लोगों की मौत हो गई थी। यूक्रेन इंटरनैशनल के विमान बोइंग 737-800 टेक ऑफ़ के कुछ मिनट बाद ही क्रैश हो गया था। शुरुआत में विमान हादसे का कारण ईरान ने तकनीकी खामी बताया था।

शुक्रवार (10 जनवरी) को, न्यू यॉर्क टाइम्स ने एक वीडियो जारी किया था, इसमें तेहरान के हवाई अड्डे के पास एक ईरानी मिसाइल को एक विमान को मार गिराते हुए दिखाया गया। इस वीडियो में दिखाया गया कि हवाई अड्डे के पास एक शहर, परांड के ऊपर एक विमान को निशाना बनाते हुए एक मिसाइल ने उसे निशाना बनाया और तभी एक छोटा धमाका हुआ, लेकिन विमान में विस्फोट नहीं हुआ। जेट कई मिनटों तक उड़ान भरता रहा और हवाई अड्डे की ओर मुड़ गया। वो विमान तब तक अपना सिग्नल संचारित करना बंद कर चुका था, विस्फोट होने से पहले ही हवाई अड्डे की ओर उड़ गया और तेजी से दुर्घटनाग्रस्त हो गया।

ख़बर के अनुसार, इससे पहले ईरान कई दिनों तक इस बात से इनकार कर रहा था कि उनकी एक मिसाइल ने यूक्रेन के विमान को मार गिराया। लेकिन, अमेरिका और कनाडा ने ख़ुफ़िया जानकारी का हवाला देते हुए कहा था कि उनका मानना है कि ईरान ने ही यूक्रेन के विमान को मार गिराया है। अधिकारियों के अनुसार यूक्रेनी विमान में 167 यात्री और 9 क्री मेंबर मौजूद थे। इनमें 82 ईरानी, कम से कम 63 कनाडाई और 11 यूक्रेनियन नागरिक शामिल थे।

ईरानी कमांडर मरा तो उबल पड़े ‘शांतिदूत’, ट्रंप ने बताया- दिल्ली में भी हमले की रची थी साजिश

दिल्ली की सुनहरी मस्जिद पर लहरा रहा था लाल झंडा और मचा था कत्लेआम, अब उसी से ललकार रहा ईरान