Home Blog Page 5457

प्रेमी जोड़े को जबरन रोका, युवती का दुपट्टा हटा कर वीडियो बनाने का प्रयास: हैदर और गुरफान गिरफ़्तार

कौशाम्बी में 4 बदमाशों ने एक प्रेमी जोड़े के साथ बदसलूकी की और फिर वीडियो बना कर वायरल कर दिया। पुलिस ने इस मामले में हैदर और गुफरान नामक दो आरोपितों को गिरफ़्तार कर लिया है। दोनों ही आरोपितों को पूछताछ के बाद जेल भेज दिया गया। पुलिस 2 अन्य आरोपितों की तलाश कर रही है। उनकी पहचान लड्डन और विपिन के रूप में हुई है। सभी आरोपितों के ख़िलाफ़ विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज कर मुकदमा चलाने की जानकारी कौशाम्बी पुलिस ने दी है।

बता दें कि जहाँ ये घटना हुई, वह जगह घोसिया गाँव से लगभग 25 किलोमीटर की ही दूरी पर है। घोसिया वही गाँव है, जहाँ हाल में दलित नाबालिग के साथ गैंगरेप की जघन्य घटना हुई थी। जब पीड़िता ने भगवान के नाम पर छोड़ देने की गुहार लगाई थी, तब आरोपितों ने उसे अल्लाह के नाम पर रहम की भीख माँगने को कहा था। गैंगरेप के दौरान पीड़िता लगातार बहन समझ कर छोड़ देने की मिन्नतें करती रही थी। ताज़ा घटना भी कौशाम्बी की है, जिससे इलाक़े की क़ानून-व्यवस्था पर सवाल उठना लाजिमी है।

मंझनपुर में प्रेमी-प्रेमिका बाइक से कहीं जा रहे थे। तभी 4 बाइक सवार बदमाशों ने उनका पीछा किया और एक सुनसान जगह पर उन्हें जबरन रोक लिया। फिर बदमाशों ने युवती के साथ बदसलूकी करना शुरू कर दिया गया। युवती ने अपना चेहरा दुपट्टे से ढक रखा था। बदमाशों ने जबरन दुपट्टा हटा कर वीडियो बनाने का प्रयास किया। बाद में आरोपितों ने लड़के को पकड़ लिया। इसके बाद पीड़िता और उसका प्रेमी किसी तरह बदमाशों के चंगुल से भाग निकले।

‘अमर उजाला’ के कौशाम्बी संस्करण में छपी ख़बर

जब प्रेमी जोड़े ने बाइक से भागने की कोशिश की, तब बदमाशों ने फिर से उनका पीछा किया। आरोपित लगातार उन्हें धमका रहे थे कि युवती का वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया जाएगा। मामले में एसपी के निर्देश पर कार्रवाई की जा रही है।

आस्था के साथ बेहूदा खिलवाड़: हिंदू दम्पति को PoK बुलाया, लेकिन शारदा माँ के दर्शन से रोक दिया

हिन्दुओं की आस्था का बेहूदा अपमान करने वाले वाकये में पाकिस्तान की सरकार ने एक हिन्दू दम्पति को PoK स्थित माँ शारदा पीठ के दर्शन के लिए अनुमति देकर पूरी तरह खंडहर हालात में पड़े मन्दिर के बाहर ही रोक दिया। 72 साल से हिन्दुओं के लिए अगम्य रहे इस मन्दिर में दर्शन करने के लिए पीटी वेंकटरमण और सुजाता हॉन्गकॉन्ग से आए थे। लेकिन उन्हें मन्दिर के पास की नदी पर ही पूजा-अर्चना कर लौटना पड़ा।

माँ शारदा के नाम पर ही कश्मीरी भाषा की लिपि

कश्मीरी भाषा की लिपि का नाम भी ‘शारदा’ देवी सरस्वती के ही एक रूप शारदा के नाम पर पड़ा है। इस्लामी हमलों से पहले के भारतवर्ष में यह शक्तिपीठ न केवल आध्यात्म, बल्कि ज्ञान और शिक्षा का भी बहुत बड़ा केंद्र था। आदि शंकराचार्य देवी के दर्शन के लिए आठवीं सदी में केरल से चलकर यहाँ आए थे। लेकिन 1947 में पाकिस्तानी जिहादियों के PoK पर कब्जे के बाद इस पीठ तक जा पाना हिंदुस्तानी हिन्दुओं के लिए असम्भव हो गया।

गोलीबारी पर आस्था भारी

मंदिर के बाहर तक भी जाने के लिए पीटी वेंकटरमण और सुजाता को काफ़ी जद्दोजहद करनी पड़ी और जान का खतरा तक उठाना पड़ा। पहले तो पाकिस्तानी हुकूमत ने उन्हें अनुमति देने से ही मना कर दिया। फिर उन्होंने जब मिन्नत की कि वे हॉन्गकॉन्ग निवासी हैं, तो उन्हें अनुमति किसी तरह मिली। इसमें भी एक एनजीओ ‘सेव शारदा समिति कश्मीर’ से जुड़े रविन्द्र पंडिता के एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाने पर यह संभव हो पाया।

पाक अधिकृत कश्मीर में माँ सरस्वती का निवास, भारत की धरोहर है यह शारदा पीठ

और इसी बीच पाक ने हिंदुस्तान के खिलाफ़ कश्मीर में जिहाद का ऐलान करने और जम्मू-कश्मीर में हिंदुस्तानी सेना के खिलाफ़ मानवाधिकार हनन के प्रोपेगंडा को हवा देने के लिए LOC पर मार्च शुरू कर दिया। जिस रात पीटी वेंकटरमण और सुजाता PoK में थे, उस रात भी जमकर गोलीबारी हुई। उन्हें वहाँ से सुरक्षित निकालने में दो स्थानीय लोगों तनवीर अहमद और मोहम्मद रयीस ने मदद की।

हिन्दुओं को बदनाम करने के लिए की गई ‘मॉब लिंचिंग’ की ब्रांडिंग: विजयदशमी उत्सव पर भागवत

दशहरा के मौके पर नागपुर में आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत ने देश की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर मोदी सरकार की पीठ थपथपाई। उन्होंने भाजपा को दोबारा मिली बहुमत की बात करते हुए कहा कि नई सरकार को बढ़ी हुई संख्या के साथ फिर से लाकर समाज ने उनके पिछले कार्यों से सहमति व आने वाले समय के लिए बहुत सारी अपेक्षाओं को व्यक्त किया था। मोहन भागवत ने साफ़ कर दिया कि जन अपेक्षाओं को प्रत्यक्ष में साकार कर, जन भावनाओं का सम्मान करते हुए देशहित में उनकी इच्छाएँ पूर्ण करने का साहस दोबारा चुने हुए शासन में है।

उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि अनुच्छेद 370 को अप्रभावी बनाने के सरकार के काम से यह बात सिद्ध हुई है। उन्होंने इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह को बधाई एवं अभिनन्दन का पात्र बताया। इस दौरान उन्होंने विभिन्न सफल अंतरिक्ष कार्यक्रमों के लिए इसरो की भी पीठ थपथपाई। सरसंघचालक ने कहा कि हमारे वैज्ञानिकों ने अब तक चंद्रमा के अनछुए प्रदेश अर्थात उसके दक्षिण ध्रुव पर अपना चंद्रयान ‘विक्रम’ उतारने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि यद्यपि अपेक्षा के अनुरूप पूर्ण सफलता नहीं मिली, परंतु पहले ही प्रयास में इतना कुछ कर पाना भी काफ़ी महत्वपूर्ण है।

सरसंघचालक मोहन भागवत ने वैज्ञानिकों का हौंसला भी बढ़ाया। उन्होंने कहा कि हमारे देश की बौद्धिक प्रतिभा व वैज्ञानिकता का तथा संकल्प लेकर उस कार्य को परिश्रमपूर्वक पूर्ण करने की लगन के कारण ही हमारे वैज्ञानिकों का सम्मान दुनिया में सर्वत्र बढ़ गया है। उन्होंने जनता को भी अहम सन्देश देते हुए कहा:

“सुखद वातावरण में अलसा कर हम अपनी सजगता व अपनी तत्परता को भुला दें, सब कुछ शासन पर छोड़ कर और निष्क्रिय होकर विलासिता व स्वार्थों में मग्न हो जाएँ- ऐसा समय नहीं है। जिस दिशा में हम लोगों ने चलना प्रारंभ किया है, वह अपना अंतिम लक्ष्य-परमवैभव संपन्न भारत-अभी दूर है। मार्ग के रोड़े, बाधाएँ और हमें रोकने की इच्छा रखने वाली शक्तियों के कारनामे अभी समाप्त नहीं हुए हैं। हमारे सामने कुछ संकट हैं जिनका उपाय हमें करना है। कुछ प्रश्न है जिनके उत्तर हमें देने हैं, और कुछ समस्याएँ हैं, जिनका निदान कर हमें उन्हें सुलझाना है।

कार्यक्रम के दौरान सरसंघचालक ने शस्त्र-पूजन भी किया। एचसीएल के संस्थापक और अरबपति कारोबारी शिव नादर इस दौरान मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। मोहन भागवत ने ‘मॉब लिंचिंग’ गिरोह को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि कुछेक सामाजिक अपराध की घटनाओं को ‘मॉब लिंचिंग’ के रूप में ब्रांड किया गया। उन्होंने इसे भारत को बदनाम करने वाला दुष्प्रचार करार देते हुए कहा कि ‘मॉब लिंचिंग’ के ब्रांडिंग के माध्यम से हिन्दुओं को बदनाम करने और कुछ समुदायों में डर पैदा करने की कोशिश की गई।

वहीं आज की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़ा करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि पाठ्यक्रम से लेकर शिक्षकों के प्रशिक्षण तक, सब चीजों में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता लगती है। संघ प्रमुख ने याद दिलाया कि केवल ढाँचागत परिवर्तनों से काम बनने वाला नहीं है। साथ ही उन्होंने कहा कि अपनी मातृशक्ति को हमको प्रबुद्ध, स्वावलंबनक्षम, स्वसंरक्षणक्षम बनाना ही होगा। उन्होंने कहा कि महिलाओं को देखने की पुरुषों की दृष्टि में हमारी संस्कृति के पवित्रता व शालीनता के संस्कार भरने ही पड़ेंगे।

17 महीने तालिबान की कैद में रहने के बाद 3 भारतीय इंजीनियर रिहा, छोड़ना पड़ा 11 आतंकियों को

अफगानिस्तान में लगभग 17 महीनों से आतंकियों की चंगुल में फँसे 3 भारतीय इंजीनियरों को तालिबान ने अमेरिका के साथ वार्ता के बाद रिहा कर दिया। अपने 11 शीर्ष सदस्यों के बदले उसने भारत के इन तीन इंजीनियरों को आजाद किया। ये अदला-बदली रविवार को हुई, लेकिन मीडिया में ये जानकारी सोमवार को आई।

एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने तालिबान के रिहा हुए 11 सदस्यों में से 2 की जानकारी देते हुए बताया कि इनमें 2 प्रमुख तालिबानी नेता शेख अब्दुल रहमान और मौलवी अब्दुल राशिद का भी नाम शामिल है। ये दोनों अफगानिस्तान में तालिबान के शासन के दौरान कुनार और निम्रोज प्रांत के गवर्नर थे। साल 2001 में अमेरिका के नेतृत्व में गठबंधन सेना ने तालिबान को सत्ता से बेदखल किया था। न्यूज 18 की खबर के अनुसार इन्हें अमेरिका सेना ने बरगम एयरबेस से रिहा किया गया।

वहीं, बता दें कि तालिबान द्वारा आजाद किए गए तीनों इंजीनियर, उन्हीं 7 भारतीयों में से हैं, जिनका पिछले वर्ष अफगानिस्तान में अपहरण हुआ था। जानकारी के मुताबिक इन्हें अफगानिस्तान के बघनाल प्रांत से अगवा किया गया था। सातों इंजीनियर केईसी कंपनी की ओर से वहाँ में एक पॉवर प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे। इनमें से एक को इसी साल मार्च में रिहा कर दिया गया था जबकि बाकियों की जानकारी नहीं मिल पाई थी। अपहरण के बाद किसी भी आतंकी संगठन ने इसकी जिम्मेदारी नहीं ली थी।

लेकिन अब अमेरिका के अफगानिस्तान मामलों के विशेष प्रतिनिधि जलमय खलीलजाद और तालिबान प्रतिनिधि का नेतृत्व कर रहे मुल्ला अब्दुल गनी बरादर के बीच पाकिस्तान में हो रही वार्ता के दौरान यह फैसला सामने आया।

अदला-बदली की इस खबर के आने के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय का कहना है कि उन्होंने इस मामले में रिपोर्ट देखी है और वह अफगानिस्तान के साथ संपर्क में हैं। उन्होंने इस संबंध में किसी भी प्रकार की पुष्टि होने पर जानकारी देने की बात की है।

बता दें कि बीते दिनों पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में अमेरिका के विशेष दूत जालमे खलीलजाद और तालिबान के प्रतिनिधियों के बीच मुलाकात हुई थी। जिसके बाद तीनों भारतीय इंजीनियरों की रिहाई की खबर आई।

सरकारी आवास कब्जाए बैठे 50 पूर्व सांसदों को दिल्ली पुलिस की मदद से निकाल बाहर करने की प्रक्रिया शुरू

केंद्र सरकार ने उन सभी पूर्व सांसदों को सरकारी आवासों से निकाल बाहर करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है, जो नियमों को ताक पर रख कर डेरा जमाए हुए थे। ये सभी पूर्व सांसद सरकार द्वारा दिए गए समय की अवधि होने के बावजूद सरकारी आवासों में टिके हुए थे। अब सरकार ने दिल्ली पुलिस की मदद से उन्हें निकाल बाहर करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इन पूर्व सांसदों ने आवास खाली न करने के पीछे कई बहाने बनाए थे।

कुछ पूर्व सांसदों ने कहा था कि उनके बच्चे दिल्ली में पढ़ रहे हैं, इसीलिए वे सरकारी आवास खाली नहीं कर सकते। कुछ सांसदों ने अपने किसी परिवारजन के स्थानीय अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती होने का बहाना बनाया था। कुछ अन्य पूर्व सांसदों ने तो अजोबोग़रीब तर्क देते हुए कहा था कि वे दिल्ली में कहीं और आवास नहीं ढूँढ पा रहे हैं, इसीलिए वे सरकार आवास खाली नहीं कर सकते। शहरी मामलों के मंत्रालय ने अंत में दिल्ली पुलिस की मदद ली है और कुछ पूर्व सांसदों द्वारा कब्जाए गए सरकारी आवास खाली करा भी लिया गया है।

शुक्रवार (अक्टूबर 4, 2019) तक की बात करें तो कुल 50 पूर्व सांसद ऐसे थे, जिन्होंने अपने सरकारी बंगले खाली नहीं किए थे। इन लोगों को कई बार लीगल नोटिस दिया जा चुका था। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ के सूत्रों के अनुसार, इस लिस्ट में जन अधिकार पार्टी के संस्थापक पप्पू यादव, उनकी पत्नी और कॉन्ग्रेस नेता रंजीता रंजन, दीपेंद्र सिंह हुड्डा, मेघालय के मुख्यमंत्री कोर्नाड संगमा और मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ का नाम शामिल है।

अभी इस बात पर स्थिति साफ़ नहीं है कि पूर्व उप-प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी और पूर्व भाजपा अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी अपने सरकारी आवासों में बने रह सकते हैं या नहीं। 91 वर्षीय आडवाणी और 85 वर्षीय जोशी के सुरक्षा की संवेदनशीलता को देखते हुए सरकार इस सम्बन्ध में निर्णय लेगी। अधिकारियों ने कहा है कि पूर्व सांसद जिस तरह से सरकारी आवासों में डेरा जमा कर बैठे हैं, उससे नए सांसदों को आवास उपलब्ध कराने में काफ़ी दिक्कतें आ रही हैं।

20 अगस्त को ख़बर आई थी कि जो भी पूर्व सांसद सरकारी आवास खाली करने में आनाकानी कर रहे हैं, उनके घर में बिजली और पानी की सप्लाई काट दी जाएगी। ऐसा करने के लिए अधिकारियों को निर्देश दे दिया गया था। उस समय 200 ऐसे पूर्व सांसद थे जो सरकारी आवासों में जमे हुए थे। नियमानुसार, दोबारा चुन कर न आए सांसदों को लोकसभा भंग होने के एक महीने के भीतर अपना सरकारी आवास खाली करना होता है। राष्ट्रपति कोविंद ने 25 मई को ही पिछली लोकसभा भंग कर दी थी। इस हिसाब से देखें तो अब तक लगभग साढ़े 4 महीने हो चुके हैं।

Aarey में काटे जाने थे कुल 2185 पेड़, 2 दिनों में काट डाले 2141 पेड़: मुंबई मेट्रो

आरे क्षेत्र में पेड़ों की कटाई के मामले में हाईकोर्ट से कथित पर्यावरण एक्टिविस्ट्स को निराशा हाथ लगी थी। इसके बाद उन्होने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को यथास्थिति बरक़रार रखने का आदेश देते हुए कहा कि अब एक भी पेड़ नहीं काटे जाने चाहिए। इसके बाद मामले को सुप्रीम कोर्ट की फॉरेस्ट बेंच के पास भेज दिया गया। इसके बाद एक्टिविस्ट्स अपनी जीत का जश्न मनाने लगे। मुंबई मेट्रो कार शेड के लिए आरे क्षेत्र में 2185 पेड़ काटे जाने थे, जिसके लिए हंगामा किया जा रहा था। कई बॉलीवुड सेलेब्स ने भी इस विरोध प्रदर्शन को अपना समर्थन दिया था।

अब मुंबई मेट्रो का नया बयान आया है, जिससे कथित पर्यावरणविदों को निराशा हाथ लग सकती है। मुंबई मेट्रो ने जानकारी दी है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश आने से पहले ही 2,185 पेड़ों में से 2,141 पेड़ काटे जा चुके हैं। शुक्रवार (अक्टूबर 4, 2019) और शनिवार को इन पेड़ों को काटा गया।

अब सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद काटे गए पेड़ों को वहाँ से हटाया जाएगा और मेट्रो का कंस्ट्रक्शन कार्य शुरू हो जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने मेट्रो का कंट्रक्शन कार्य रोकने की बात नहीं कही है। उसने सिर्फ़ पेड़ों को न काटने का आदेश दिया है। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ़्तार किए गए सभी लोगों को छोड़ा गया या नहीं, इस सम्बन्ध में सरकार से जानकारी माँगी।

मुंबई मेट्रो ने कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट के आदेश का सम्मान करता है। उसने साफ़ किया कि आरे मिल कॉलोनी क्षेत्र में अब एक भी पेड़ नहीं काटा जाएगा। हालाँकि, काटे गए पेड़ों, लड़कियों व अन्य चीजों को वहाँ से साफ़ करने और हटाने का काम अनवरत चालू रहेगा। साथ ही मुंबई मेट्रो ने हरियाली के प्रचार-प्रसार के लिए किए गए कार्यों को गिनाते हुए बताया कि ‘मुंबई मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन’ पहले ही 23,846 पेड़ लगा चुका है और 25,000 पौधे वितरित कर चुका है।

हालाँकि, मुंबई मेट्रो का प्रोजेक्ट पहले से ही 6 महीने देरी से चल रहा है, क्योंकि तमाम विरोध-प्रदर्शनों और न्यायिक लड़ाइयों के कारण मेट्रो के कंस्ट्रक्शन सम्बन्धी कामकाज पर असर पड़ा है। इन सबके बावजूद मुम्बई मेट्रो ने आशा जताई है कि निर्धारित समय पर कार्य पूरा कर लिया जाएगा।

13 महीने में ही उतावले हो गए पाकिस्तानी, इतने कम समय में Pak को मदीना कैसे बनाऊँ: इमरान खान

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने अपने ही देश के लोगों को अधीर करार दिया है। एक कार्यक्रम के दौरान ख़ान ने कहा कि उनकी सरकार ने ग़रीबों के उत्थान के लिए जितने रुपए ख़र्च किए हैं, उतना पिछली किसी भी
सरकार ने नहीं किया। इस दौरान ख़ान ने पाकिस्तान को मदीना बनाने के वादे के बारे में बात करते हुए कहा कि पाकिस्तान के लोग 13 महीने में ही उतावले हो उठे हैं। उन्होंने कहा कि अभी 13 महीने ही हुए हैं और लोग पूछते हैं कि मदीना कहाँ है? ख़ान ने कहा, “मैं बताना चाहता हूँ कि मदीना कोई एक दिन में नहीं बन गया था।“

इमरान ख़ान ने अपने देश की जनता के सवालों से परेशान होकर ये बातें कही। उन्होंने चुनाव के दौरान ‘नया पाकिस्तान’ बनाने का वादा किया था और सरकार बनने के बाद भी वह कई बार ‘नया पाकिस्तान’ की बात करते रहे हैं। अब जब पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था की हालत खस्ता है और महँगाई लगातार आसमान छू रही है, इमरान ख़ान को लोगों के सवालों ने परेशान कर दिया है। वो बड़े-बड़े वादे पूरा करने में नाकाम सिद्ध हुए हैं, इसलिए अपने देश की जनता को ही उन्होंने बेसब्र बता दिया।

इमरान ने ये बातें इस्लामाबाद में ‘अहसास लंगर योजना’ के उद्घाटन के मौके पर कही। ‘सैलानी ट्रस्ट’ के साथ मिल कर शुरू की गई इस योजना का उद्देश्य ग़रीबों को भोजन उपलब्ध कराना है। पाकिस्तान सरकार इसके पहले चरण में 112 किचन की स्थापना करने जा रही है। इसके तहत इस्लामाबाद में रोजाना 600 लोगों को भोजन उपलब्ध कराए जाने की योजना है। प्रधानमंत्री इमरान ख़ान का दावा है कि वो एक भी व्यक्ति को भूखे सोने नहीं देंगे। ‘सैलानी ट्रस्ट’ ने दावा किया कि इस योजना के तहत पहले किचन को सिर्फ़ 10 दिन में ही स्थापित कर लिया गया।

इसी कार्यक्रम के दौरान इमरान ख़ान अपने ही वादों के बोझ तले दबे नज़र आए और उन्होंने कह दिया कि मदीना कोई एक दिन में नहीं बन गया था। हालाँकि, उन्होंने कहा कि वह मदीना की तर्ज पर विकास और जनकल्याण की सुविधाएँ उपलब्ध करा कर पाकिस्तान को मदीना ज़रूर बनाएँगे। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि बदलाव होगा लेकिन इसमें समय लगेगा।

साथ ही उन्होंने कहा कि उनकी सरकार कारोबारियों को अच्छा माहौल देने के लिए काम कर रही है। उनसे टैक्स लेकर गरीबों के लिए काम करने की दिशा में भी लगी हुई है। इसके बावजूद लोगों से सब्र नहीं होता और वे पूछने लगते हैं कि तेरह महीने हो गए हैं, कहाँ है नया पाकिस्तान।

जुलाई 2018 में मतगणना के बाद सबसे बड़े दल के रूप में उभरने के बाद तहरीक-ए-इंसाफ प्रमुख इमरान ख़ान ने कहा था कि वे मदीना की तरह पाकिस्तान में सरकार चलाएँगे। उन्होंने मदीना की तर्ज पर लोगों को बराबरी देने के लिए उनके वित्तीय हितों की रक्षा करने का वादा किया था। उन्होंने कहा था कि जिस तरह से मदीना में ग़रीबों और विधवाओं का ख्याल रखा जाता है, वैसा पाक में भी होगा।

स्विस बैंक ने दिए 31 लाख खातों के डिटेल, काला धन रखने वालों के उतरेंगे नक़ाब

कालेधन के ख़िलाफ़ लड़ाई में मोदी सरकार को बड़ी सफलता मिली है। स्विस बैंक में भारतीय खातों का विवरण प्राप्त करने के लिए भारत काफ़ी दिनों से प्रयास कर रहा था। अब पहले दौर का विवरण स्विट्जरलैंड ने भारत को सौंप दिया है। इसमें बैंक में भारतीयों के सक्रिय खातों से सम्बंधित जानकारियाँ शामिल हैं। स्विट्जरलैंड के संघीय कर प्रशासन ने 75 देशों को वैश्विक मानदंडों के तहत ऐसे वित्तीय खातों का विवरण दिया है। भारत भी इन देशों में शामिल है।

स्विट्जरलैंड ने इन सभी देशों को 31 लाख खातों का विवरण मुहैया कराया है और बदले में उसे भी इन देशों से 24 लाख जानकारियाँ मिली हैं। विवरण में खाताधारक की पहचान, खाते में जमा रकम और अन्य जानकारियाँ शामिल हैं। इसमें खाताधारक का नाम, पता, राष्ट्रीयता, टैक्स आइडेंटिफिकेशन नंबर और वित्तीय संस्थानों से जुड़ी अन्य सूचनाएँ शामिल हैं। स्विट्जरलैंड के अधिकारियों ने बताया कि पहली बार भारत को इस तरह की जानकारियाँ मुहैया कराई गई हैं।

इन सूचनाओं में न सिर्फ़ सक्रिय खातों की जानकारियाँ बल्कि 2018 में बंद किए जा चुके बैंक एकाउंट्स से सम्बंधित सूचनाएँ भी शामिल हैं। इसी कड़ी में स्विट्जरलैंड अब सितम्बर 2020 में स्विस बैंक में भारतीयों के बैंक एकाउंट्स से सम्बंधित अन्य जानकारियाँ भारत के साथ साझा करेगा। स्विट्जरलैंड ने भारत को क्या जानकारी दी है, इस सम्बन्ध में अधिकारियों ने कुछ कहने से मना कर दिया। उन्होंने बताया कि यह गोपनीयता का मामला है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कई अन्य देशों में रह रहे भारतीय व्यवसायियों से सम्बंधित जानकारियाँ इसमें शामिल हैं। स्विस बैंक दशकों से अपनी गोपनीयता के लिए जाना जाता रहा है, लेकिन पिछले कुछ सालों से इसके ख़िलाफ़ वैश्विक अभियान चला, जिससे उसे ये जानकारियाँ अन्य देशों के साथ साझा करनी पड़ी। इस अभियान के कारण कई लोगों ने जल्दबाजी में बैंक से रुपया निकालना शुरू कर दिया। यही कारण है कि 2018 में बंद किए जा चुके बैंक एकाउंट्स से सम्बंधित जानकारियाँ भी दी जा रही हैं।

स्विस नेशनल बैंक (एसएनबी) द्वारा जारी किए गए आँकड़ों के अनुसार, स्विस बैंक में भारतीयों द्वारा जमा रकम 2018 में लगभग 6% घटकर 6,757 करोड़ रुपए हो गई थी। पिछले 2 दशक में जमा रकम का यह दूसरा सबसे निचला स्तर है। साल 2018 में कई विदेशी ग्राहकों द्वारा स्विस बैंक में जमा रकम 4% से ज्यादा घटकर 99 लाख करोड़ रुपए रही थी।

गौरतलब है कि लोकसभा में इसी साल जून में वित्त मामलों की स्थायी समिति की रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि 1980 से लेकर साल 2010 के बीच भारतीयों ने 246.48 अरब डॉलर से लेकर 490 अरब डॉलर के बीच काला धन देश के बाहर भेजा था। एनआईपीएफपी, एनसीएईआर और एनआईएफएम के अध्ययन के आधार पर समिति ने यह आकलन किया था।

हिन्दुओं की आस्था से खिलवाड़ कब तक: त्रिपुरा हाईकोर्ट ने बलि-प्रथा बैन करने के पीछे दिए अजीब तर्क

त्रिपुरा राज्य के पश्चिमी छोर पर उदयपुर शहर में हिन्दू धार्मिक मान्यता के अनुसार 51 शक्ति पीठों में से एक त्रिपुरेश्वरी मंदिर विराजमान है जिसे लोग त्रिपुर सुंदरी मंदिर के नाम से भी जानते हैं। यहाँ देवी की पूजा-अर्चना में देवी की स्तुति में बलि देने की प्रथा प्रचलित है। ठीक ऐसा ही एक मंदिर कमलेश्वरी देवी भी है, जो कि भारत-बांग्लादेश सीमा के किनारे बसे कस्बा गाँव में पड़ता है। बीते सितम्बर माह के आखिरी हफ्ते में राज्य के हाईकोर्ट ने बलि प्रथा पर पूरी तरह से प्रतिबन्ध लगाने का फैसला सुनाया।

इस फैसले के खिलाफ त्रिपुरा की राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पेटीशन (एसएलपी) के तहत अपील करने का फैसला किया है। प्रदेश कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष प्रद्योत किशोर देब बर्मन ने भी उच्च न्यायालय के फैसले को धार्मिक गतिविधियों में दखल बताते हुए सर्वोच्च न्यायालय में अपील करने की बात कही है।

यह फैसला देने वालों की सोच में हिन्दू रीति-रिवाजों को न समझ पाने की असमर्थता साफ़ झलकती है। किसी भी सूरत में यह कहना गलत नहीं होगा कि उच्च न्यायालय का यह निर्णय पूरी तरह से निरर्थक और हास्यास्पद है। इसमें सिर्फ हिन्दू सभ्यता और उसकी मान्यताओं के प्रति भीषण असंवेदनशीलता दिखती है। इसी के साथ यह भी स्पष्ट हो जाता है कि यह फैसला देने वाले उन लोगों से कतई अलग नहीं हैं जिन्हें हिन्दुओं की भावनाओं, रीति-रिवाजों और मान्यताओं को अपने पूर्वाग्रह के चश्मे से देखने में ख़ुशी मिलती है।

पूर्वाग्रह से ग्रसित अपने इस जजमेंट में कोर्ट ने पूछा- कौन सा धर्म या संप्रदाय जानवर पर बेवजह दर्द और पीड़ा डालने की बात करता है? किस धर्म में कहा गया है कि वध से पहले जानवर को मानसिक या शारीरिक कष्ट मुक्त नहीं करना चाहिए? कौन सा ऐसा धर्म है जो अपने अनुयायियों को जानवरों पर इंसानियत के नाते दया दृष्टि न रखने के लिए कहता होगा?

दरअसल, इन सभी प्रश्नों पर चिंतन किया जाना बेहद ज़रूरी है। सबसे पहले प्रश्न में तो ‘बेवजह’ शब्द का उपयोग ही पूरी तरह से अनुचित है। ऐसा कई बार देखा गया है कि सामाजिक सुधार को लेकर कई मामलों में अदालतों का रुख सिर्फ एक ही धर्म को निशाना बनाता है, जबकि अदालत को यह भी समझना होगा कि धर्म और आस्था के क्षेत्र में तार्किकता का कोई स्थान नहीं है। यह लोगों की भावनाओं से जुदा मामला है जिसमे कोर्ट को उनकी आस्था और उनकी भावनाओं पर चोट नहीं बल्कि कद्र करनी चाहिए। हालाँकि, देखा यह भी गया है कि कैसे इस प्रकार के मामलों में सिर्फ हिन्दुओं को ही निशाना बनाया जाता है, जबकि अन्य मजहबों की उद्दंडता पर कोई नकेल नहीं कसी जाती इसलिए यह अपने आप में ही एक विवादित प्रश्न है।

किसी भी अदालत का काम धार्मिक मान्यताओं, रीति-रिवाजों और उसमे लोगों की आस्था से छेड़छाड़ करना नहीं है। पशुओं पर अत्याचार की बात करने वाले पहले देखें कि मांस उद्योग के लिए जानवरों पर होने वाला क्रूरतापूर्ण व्यवहार कितना जायज़ है? यदि वास्तव में किसी को पशुओं पर होने वाले अत्याचार को रोकना है तो उसे पहले मांस उद्योग रुकवाने पर ध्यान देना चाहिए, जहाँ व्यवस्थित ढंग से जानवरों की नृशंस हत्या की जाती है। व्यवस्थित क़त्लखाने की बजाय जानवरों को अत्याचार से बचाने के नाम पर पशुबलि पर रोक लगाना ठीक वैसे ही है जैसे चारों ओर और आग लगी हो और कोई मूर्ख पर्यावरण बचाने की दुहाई देकर घर मोमबत्ती जलाए।

फैसले के सम्बन्ध में देखें तो दूसरे और तीसरे सवाल पर यह याद रखना चाहिए कि ‘हलाल’ एक ऐसी इस्लामिक प्रथा है जिसमें जानवर को तड़पा-तड़पा कर मौत के घाट उतार दिया जाता है मगर इसपर किसी भी अदालत का मुँह तक नहीं खुलता। सबको पता है कि इसके पीछे के कारण क्या हैं?

कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में यह भी कहा कि ऐसा कौन सा धर्म है जो इतनी शर्मिंदगी के बावजूद हठ करके रूढी परंपराओं को लिए बैठा रहेगा ताकि संवैधानिक मूल्यों का ह्रास हो और समाज में होने वाले सुधारों में देरी हो?
संवैधानिक नैतिकता जजों का बनाया हुआ एक तमाशा है जिसे अक्सर वे अपनी सीमाएँ लाँघने के लिए इस्तेमाल करते हैं। हालाँकि, संविधान देश और उसके नागरिकों के बीच एक कानूनी अनुबंध से ज्यादा और कुछ नहीं है। मगर यदि संवैधानिक नैतिकता का सिद्धांत एक तमाशा नहीं भी होता तो यह कहना गलत नहीं होगा कि त्रिपुरा उच्च न्यायालय ने संवैधानिक ध्येय को इस मामले में घुसेड़ कर पूरे मसले को एक मज़ाक बनाकर रख दिया है।

देश के एक अभिन्न और महत्वपूर्ण अंग न्यायपालिका ने कैसे “संवैधानिक नैतिकता” शब्द का अविष्कार किया और इसके क्या मायने हैं, इसके बारे में एक बार केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने अपने एक बयान में कहा था कि “हम संवैधानिक नैतिकताओं के बारे में सुनते हैं, इसमें हुए बदलावों की सराहना जायज़ हो सकती है, बशर्ते इसकी बारीकियाँ व्यक्ति-दर-व्यक्ति बदलनी नहीं चाहिए साथ ही इसमें सभी को एकमत होना चाहिए।”

कोर्ट के पहले प्रश्न के विषय में यह कहना भी गलत नहीं होगा कि “क्या यह भी अदालत तय करेंगी कि किस व्यक्ति की लाश को जलाया जाएगा और किस व्यक्ति की लाश को दफनाया जाएगा? क्या अदालत बताएगी कि जीसस कहाँ जन्मे थे?” भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी ने सबरीमाला पर बात करते हुए यही बयान दिया था। इसी विषय पर विस्तार से बात करते हुए उन्होंने कहा था कि यह विषय कोर्ट के तय करने का नहीं है।

धर्म और रीति-रिवाज प्रत्येक व्यक्ति की अपनी आस्था का विषय है। अगर इन सबको सिर्फ इस तर्क पर देखें कि क्या सही है और क्या गलत तो सारे ही धर्म गैर-ज़रूरी रह जाएँगे, इसीलिए इन्हें आवश्यकता के तौर पर नहीं देखा जा सकता। अगर ऐसा होता तो सभी धर्मों को भ्रम या अंधविश्वास करार दे दिया जाएगा। समाज को सुधारने का जो बीड़ा न्यायपालिका ने उठाया है उसे हिन्दू धर्म को तोड़ने-मरोड़ने और पटकने के रवैये से उसकी आतुरता को साफ़ समझा जा सकता है। फैसले में कहा गया है कि “एक प्रगतिशील समाज की स्तिथि तब तक हासिल नहीं की जा सकती जब तक कि समाज का व्यक्ति धार्मिक क्रिया-कलापों में उलझा है, भ्रम और भ्रामकता से भरे समाज में प्रत्येक व्यक्ति को वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।” इसके आगे बात और भी विचित्र हो जाती है।

यह सब काफी नहीं था तो अदालत ने यहाँ तक सिद्धन्तवादी बनने का निश्चय कर लिया और दलील में कहा कि बच्चों को बलि देखने नहीं देना चाहिए, जबकि इसके पीछे कोई ठोस आधार पेश करती रिपोर्ट भी नहीं रखी गई। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इस प्रकार के वीभत्स दृश्य देखने से छोटे बच्चों में दया, प्रेम और संवेदना जैसे नैतिक मूल्य ख़त्म हो जाते हैं अथवा उनकी नींव ही नहीं पड़ पाती। साथ ही यह भी कहा यह भी गया कि मंदिर में चढ़ाई जाने वाली बलि धर्म के नाम पर एक ऐसा अन्धविश्वास है जो न सिर्फ देखने में अप्रिय है, बल्कि बच्चों के मनोवैज्ञानिक संरचना पर बुरा प्रभाव डालता है।

निश्चित रूप से यह उन जजों की अपनी निजी राय हो सकती है जो हो सकता है कि देखने और सुनने में अच्छा लगे मगर यह मुद्दा पर्सनल नहीं है और इसीलिए इस पर कोई भी एक पक्षीय राय थोपना भी किसी प्रकार से उचित नहीं। यह पूर्णतया चकित कर देने वाली बात है कि ऐसा जजमेंट दिया कैसे गया?

पशुबलि एक शताब्दियों पुरानी प्रथा है जिसे पीढ़ी दर पीढ़ी मनाया जाता रहा है। इसमें लोगों की बड़ी दिलचस्पी इसलिए भी है क्योंकि बंगाली समुदाय में यह बड़े स्तर पर मनाई जाती है और साथ ही इसे प्रगतिशील होने का भी सूचक माना जाता है। निश्चित तौर पर पशुबलि की प्रथा ने बंगाली बच्चों को कभी भी बड़े होकर प्रगतिशील बनने से नहीं रोका, इसलिए यह दावा भी कमज़ोर हो जाता है जिसमें कोर्ट ने कहा है कि बच्चों के ऊपर इसका विपरीत असर पड़ता है।

जजमेंट में कोर्ट की ओर से उन अभिभावकों पर भी टिप्पणी की गई है जो कि पशुबलि के क्रिया-कलापों में संलिप्त होते हैं। इसके जरिए इशारा था कि अभिभावकों से ज्यादा कोर्ट जजों को उनके बच्चों की फ़िक्र है। इसके मुताबिक बच्चों के माँ-बाप अपने बच्चों की ठीक से परवरिश करने में असमर्थ हैं और उनके मुकाबले वे (जज) बच्चों के लालन-पालन को लेकर उनसे ज्यादा चिंतित हैं।

जजमेंट में महानुभावों ने अपने लिखे को जायज़ ठहराने के लिए इन्सान और जानवर के बीच अंतर की खाई को भी पाट दिया, जजों ने अपनी टिप्पणी में यहाँ तक कह दिया कि पुरातन काल में इन्सान की भी बलि दी जाती थी जिसे कई शताब्दियों पहले बंद कर दिया लिहाज़ा पशुओं की भी बलि नहीं होनी चाहिए।

यहाँ बता दें कि पहला तथ्य यह है कि इंसान और जानवर दोनों में दूर-दूर तक किसी तरह की कोई सी भी समानता नहीं है, क्योंकि Cannibalism यानी नर-भक्षण (मनुष्य का मांस खाना) और जानवर का मांस खाने में बहुत फर्क है। किसी इन्सान को मारना गुनाह है मगर किसी जानवर जैसे मवेशी को मारने पर ऐसा कुछ भी नहीं। यह किसी तरह का कोई गुनाह नहीं है, बल्कि दुनियाभर में अपना पेट पालने के लिए लोग इस पर आश्रित हैं।

कोर्ट की अतिविस्तृत टिप्पणी में हिन्दुओं की बलि प्रथा से खीझ खाकर माननीयों ने यहाँ तक कह दिया कि अधिकतर शक्ति पीठों में पशुबलि की प्रथा को नहीं मनाया जाता, मगर इसकी पड़ताल में एक ही तथ्य देख कर कोर्ट का यह दावा भी फेल साबित होता है वह यह कि तारापीठ और कामख्या देवी मंदिर दो ऐसी शक्ति पीठ हैं जहाँ आज भी बलि चढ़ाई जाती है। साथ ही देश भर में ऐसी कई शक्ति पीठ मौजूद हैं जिनमें बलि प्रथा को मनाया जाता है। गौरतलब है कि अपने इस पूरे स्टेटमेंट को डिफेंड करने के लिए तथ्यात्मक तौर पर कई भ्रामक बातों को भी बढ़ावा दिया गया है जिसमें कई बातें गलत कही गई हैं।

इसके आगे न्यायालय की ओर से कहा गया है कि “यदि इस बलि प्रथा का अनुष्ठान कर लिया जाता है तो पूजा समारोह को किसी भी तरीके से बाधित नहीं कहा जा सकता और न ही इसका अभ्यास करने अधिकार कहा जा सकता है।” यहाँ पुनः यह स्पष्ट करना बेहद ज़रूरी है कि किसी भी तरीके से धार्मिक रीति-रिवाजों में अथवा आस्था के विषयों में दखल देना न्यायालय का काम नहीं है, न ही उसे इसके लिए सरकारी तंत्र में रखा गया।

कोर्ट की भाषा को देखकर एक बात तो पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है कि इन्हें हिन्दुओं की भावनाओं से कोई लेना-देना नहीं है, इनके लिए हिन्दुओं की भावनाओं को कुचलना ही समाज सुधार का पर्याय है। इस बात को स्पष्ट करने के लिए कोर्ट की टिप्पणी को पढ़कर यह और भी ज्यादा साफ़ हो जाता है। बता दें कि हिन्दू धर्म एकमात्र ऐसी संस्कृति का पोषक है जिसमें विविधता और सहिष्णुता का संगम देखने को मिलता है। विभिन्न सम्प्रदाय और जातियों को अपने अन्दर समेटे यह धर्म कतई संकुचित नही हो सकता, यह सिर्फ कुछ पाखंडी लिबरल हिन्दू हैं जो अपनी ही सभ्यता की जडें खोदने में लगे हुए हैं।

हाईकोर्ट यह भी कहता है कि पशुबलि न मानने वालों के अधिकार उनसे ऊपर हैं जो इसे मानते हैं। यानी कुल मिलाकर एक ही निष्कर्ष निकलता है कि भारत को न्यायिक सुधार की बहुत जरूरत है। यही समय है कि देश की न्याय व्यवस्था में नई जान फूँकी जानी चाहिए, साथ ही उसे खुद भी इसपर विचार भी करना चाहिए कि लोकतंत्र के चार खम्भों में से एक न्यायपालिका कितनी मजबूती से खड़ा है? खड़ा भी है या खोखलेपन का शिकार हो गया है। इससे पहले कि देश का ढाँचा तथाकथित बुद्धिजीवियों और वामी लिबराल्स के चंगुल से बर्बाद हो, हमें संभल जाना चाहिए।

कोई एक कारण ऐसा नहीं दिखता जो वास्तव में समाज-सुधार की परिभाषा में फिट बैठता हो, क्योंकि समाज में सभी धर्म बसते हैं। लेकिन अगर इसके लिए सिर्फ एक ही धर्म पर चोट करने से बदलाव लाने का सपना देखा जा रहा है तो भविष्य में आने वाली नस्लों को वह सिर्फ भयावह अन्धकारमय दलदल की ओर धकेलने जैसा है। इससे भारत की अतिप्राचीन विश्वप्रसिद्ध सभ्यता का ह्रास ही होगा। निश्चित रूप से संवैधानिक नैतिकता की आड़ में लोगों के धर्म और आस्था के प्रति कलुषित रवैया देश को शून्य की धकेल रहा है। किसी भी अराजक अव्यवस्थित राष्ट्र का रास्ता संवैधानिक नैतिकता से होकर ही जाता है।

पुलवामा में जैश, लश्कर और हिज़्बुल की गुप्त बैठक, Pak ने आतंकियों को सौंपे अलग-अलग टास्क

पाकिस्तानी फ़ौज और आईएसआई की शह पर लश्कर-ए-तैयबा, हिज़्बुल मुजाहिदीन और जैश-ए-मोहम्मद ने कई आतंकियों को जम्मू-कश्मीर सहित भारत के अन्य हिस्सों में हमला करने के लिए अलग-अलग टास्क दिया है। इनके निशाने पर राजनेता से लेकर पुलिस और सुरक्षा बलों के कर्मी हैं। एएनआई ने एक डॉक्यूमेंट के हवाले से ये खुलासा किया है।

इस डॉक्यूमेंट में कहा गया है कि पुलवामा में एक अज्ञात जगह पर तीनों बड़े आतंकी समूहों की पिछले हफ्ते गुप्त बैठक हुई। बैठक में उन्हें पाकिस्तान से मिले टास्क और भविष्य में क्या-क्या किया जाना है, इस पर चर्चा हुई। ख़ुफ़िया एजेंसियों ने आगाह किया है कि आतंकी संगठन कुछ राजनेताओं और सुरक्षा बलों के जवानों व अधिकारियों की हत्या की साजिश रच रहे हैं। जम्मू-कश्मीर के अलावा देश के अन्य हिस्सों में भी वारदातों को अंजाम देने की योजना बनाई जा रही है।

जैश को नेशनल हाइवे पर हमले करने का टास्क दिया गया है। लश्कर को सुरक्षा बलों और उनके कैम्पों पर हमला करने का टास्क मिला है। हिज़्बुल को जम्मू-कश्मीर में शटडाउन कराने और राजनेताओं व सुरक्षा बलों को निशाना बनाने का टास्क दिया गया है। यह सब कुछ पाकिस्तानी फ़ौज और आईएसआई की सहमति के बाद किया गया। हिज़्बुल मुजाहिदीन को स्थानीय लोगों को निशाना बनाने और घाटी में अशांति पैदा करने का टास्क भी दिया गया है।

इन आतंकी संगठनों को डर है कि अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के बाद से घाटी में कई विकास कार्य हो सकते हैं और सरकार जिस तरह से राज्य की जनता की भलाई के लिए काम कर रही है, इससे वहाँ शांति बहाल हो सकती है। इन्होंने योजना बनाई है कि जब भी कोई अच्छी ख़बर आएगी, किसी आतंकी वारदात द्वारा उसे दबाने और नकारात्मकता फैलाने की कोशिश की जाएगी। सुरक्षा बलों को आतंकियों के मंसूबे को नाकाम करने के लिए भारतीय सेना, स्थानीय पुलिस और ख़ुफ़िया विभाग से तालमेल बिठा कर रखने को कहा गया है।

लश्कर, जैश और हिज़्बुल लगातार जम्मू-कश्मीर में दुकानें बंद रखने के लिए दुकानदारों को धमका रहे हैं। ये चाहते हैं कि बाजार बाजार ठप्प हो जाए और लोग ज़रूरी समान भी न ख़रीद पाएँ। ऐसा कर के ये वहाँ की जनता के बीच सरकार के ख़िलाफ़ माहौल बनाना चाहते हैं। आतंकी पेट्रोल पम्प मालिकों को भी धमकी दे रहे हैं।