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TV में निष्पक्षता के नाम पर होता है छल: यह न तो मीडियम है, न ही यहाँ काम करने वाले मीडियाकर्मी

किस्सा कुछ यूँ है कि एक राजा किसी देश पर बरसों से राज कर रहे थे। सालों में उन्होंने आस पास के कई इलाके भी जीत लिए थे और अपना वर्चस्व संधियों के जरिये भी बढ़ाया था। राजा वृद्ध हो चले थे तो जाहिर है उनके युवराज-राजकुमारी भी युवा हो चुके थे। युवराज के लिए समस्या वही अकबर-सलीम वाली थी। जैसे पचास साल राज करने वाला अकबर कब गद्दी छोड़ेगा, कब सलीम खुद राजा बन पाएगा- ये इंतज़ार सलीम से बर्दाश्त नहीं हुआ, वैसा ही युवराज का भी हाल था। वो भी सलीम की तरह राजा को मारकर राजा बनना चाहता था।

उधर बीतती उम्र में परेशान तो राजकुमारी भी हो रही थी। जैसे राजकुमार मन-ही-मन राजा की हत्या करके गद्दी हथियाने की सोच रहा था, वैसे ही उस रात राजकुमारी भी महावत के साथ भाग निकलने की योजना बना रही थी।

राजा साहब के लिए उधर एक दूसरी, अकबर वाली समस्या भी थी। वो बड़े राजा थे, तो जाहिर है बेटी का वैवाहिक सम्बन्ध भी बराबरी वालों में ही करना चाहते थे। इस वजह से राजकुमारी के लिए कोई उचित वर नहीं मिल रहा था।

एक आयोजन करके राजा साहब ने आस-पास के कई राजाओं-सामंतों और अपने गुरु को बुलवा लिया था। वो सोचते थे कई लोगों की सलाह से शायद वो राज्य से संन्यास लेने, सेवानिवृत्त होने के बारे में कुछ फैसला कर पाएँ। आयोजन था तो नाच-रंग का भी प्रबंध था, और राज्य की विख्यात नर्तकी को भी बुलाया गया था। सभा जमी थी तो पूरी रात ही नाच-गाने में बीत चली थी। इतने में सुबह होने से कुछ ही पहले नर्तकी ने देखा कि उसका तबालची ऊँघ रहा है। उसे जगाने के लिए नर्तकी ने इशारों में कहा,

“बहु बीती, थोड़ी रही, पल पल गई बिताय।
एक पलक के कारने, क्यों कलंक लग जाय।“

इतना सुनना था कि वहीं बैठे राजा के गुरु अपने आसन से उछल कर खड़े हुए और अपना इकलौता कम्बल तबलची को दान कर दिया। उसके बाद वो फौरन वन की ओर चल पड़े। उन्होंने सोचा जीवन पूरा तो साधना में बिताया, अंत समय में कहाँ मैं नर्तकी की महफ़िल में आ बैठा हूँ? उनके रवाना होते होते युवराज हाथ जोड़े खड़ा हो गया। उसे लगा आज मिले या कल, राज्य तो मेरा ही है, कहाँ जरा सी बेचैनी में मैं पिता की हत्या का कलंक सर पर लेने जा रहा था। राजकुमारी भी जरा-से लोभ में गलती करने का इरादा बदल कर उठी, उसने भी महावत के साथ भागने का इरादा बदला।

राजा ने सोचा बुढ़ापे में भी सिंहासन का लोभ छोड़ने के लिए मुझे इतने लोगों की सलाह चाहिए? पूरे जीवन तो मैं अपनी मर्जी से फैसले लेता रहा, आज तो धब्बा लगता। उसने भी मुकुट उतार कर युवराज के सर पर रख दिया। अपने गुरु के पीछे पीछे वो भी वन की ओर चला।

इतने तक की कहानी सुनाते आपको कई कथावाचक मिल जाएँगे। इसे थोड़ा बढ़ा चढ़ा कर अलग अलग रूप में सुनाया जाता है। भावविभोर होती हिन्दू जनता इसे सुनकर आह-वाह करती अश्रुधारा से पंडाल को सिक्त भी कर देती है। हमारे लिय ये कहानी यहाँ ख़त्म नहीं यहाँ शुरू होती है। ये संवाद यानी कम्युनिकेशन का सिद्धांत है। आप जो भी संवाद करते हैं उसका एक टारगेट ऑडिएंस (target audience) होता है। नर्तकी का टारगेट ऑडिएंस उसका तबालची था। बाकी लोगों के लिए ये संदेश था ही नहीं। उन्होंने जो अर्थ लिया वो सही मतलब नहीं था।

इसका ये मतलब तो कतई नहीं कि बाकी लोगों के लिए नर्तकी की बात का कोई मतलब नहीं निकला। सबने अपने अपने हिसाब से अर्थ तो निकाला ही। आपकी बात का भी ऐसा ही होता है। सुनने-पढ़ने वाले व्यक्ति की मनोस्थिति पर भी आपकी बात का निकाला गया अर्थ निर्भर करता है। वो क्या सोच रहा है, किस हाल में है, गुस्से में है, खुश है, इस पर भी आपके कहे का अर्थ निर्भर करेगा। मनोस्थिति का ठीक ना होना, संवाद में एक किस्म का नॉइज़ (noise) यानी शोर कहलाता है। मन का शांत होना सही अर्थ निकालने के लिए जरूरी है।

ये भी गौर कीजिए कि जिस तबालची को दोहा सुनाया गया था, उस पर क्या असर हुआ ये आपको कहानी से पता नहीं चला है। संवाद में हमेशा दो पक्ष होते हैं- सन्देश भेजने वाले के साथ सन्देश पाने वाले की भी बात होनी थी। कथा इस बारे में कुछ नहीं कहती। ये बिलकुल वैसा है जैसे टीवी, जो आप तक सन्देश तो पहुँचाता है, लेकिन उस सन्देश को आपने कैसे लिया इस बारे में सन्देश भेजने वाले चैनल को कुछ नहीं बताता। यानी टीवी एक कम्युनिकेशन का माध्यम- मीडिया नहीं है, ना ही उसके चैनल में काम करने वाले मीडियाकर्मी हुए।

तो कहा जा सकता है कि तबालची को सन्देश भेज रही नर्तकी अगर अपने दोहे का प्रभाव देखकर खुद को ईश्वरीय सन्देश प्रसारित करने वाला “नबी” घोषित करने लगे तो वो छल होगा। बिलकुल वैसे ही जैसे ब्रॉडकास्ट के माध्यम को कम्युनिकेशन का माध्यम बताने वाले जब खुद को मीडियाकर्मी बताकर “निष्पक्षता” का गुण “ओढ़ते” हैं तब छल होता है। बाकी शोर-शराबा तो सुनाई दे ही रहा है- कोई न कोई छल करने की कोशिश की जा रही है, ये भी समझ लीजिए।

370 का ‘पावर’ ख़त्म: मोदी सरकार के फ़ैसले के बाद देश में 28 राज्य और 9 केन्द्र शासित प्रदेश

जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में मोदी सरकार के आज के ऐतिहासिक फ़ैसले के बाद भारत के इतिहास में एक नया पन्ना जोड़ दिया है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने आज राज्यसभा में स्थिति को स्पष्ट करते हुए बताया कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 (1) के अलावा अनुच्छेद 370 के सभी खंड हटाने का निर्णय लिया गया है। उन्होंने जम्मू-कश्मीर राज्य के पुनर्गठन के लिए विधेयक 2019 पेश किया। गृहमंत्री ने लद्दाख के लिए केंद्र शासित प्रदेश के गठन की घोषणा की। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि यहाँ चंडीगढ़ की तरह विधानसभा नहीं होगी।

गृहमंत्री ने राज्यसभा में घोषणा की कि कश्मीर और जम्मू डिवीज़न विधानसभा के साथ एक अलग केंद्र शासित प्रदेश होगा जहाँ दिल्ली और पुडुचेरी की तरह विधानसभा होगी। बता दें कि इस गृहमंत्री के इस विधेयक को राष्ट्रपति से मंज़ूरी मिल चुकी है। इसके साथ ही देश में एक राज्य (जम्मू-कश्मीर) घट गया और केंद्र शासित प्रदेशों की संख्या 9 हो गई है।

कुल केन्द्र शासित प्रदेश:

  1. दिल्ली
  2. अंडमान और निकोबार
  3. चंडीगढ़
  4. दादरा और नगर हवेली
  5. दमन एवं दीव
  6. लक्षद्वीप
  7. पुडुचेरी
  8. जम्मू-कश्मीर
  9. लद्दाख

सरकार की घोषणा के बाद केंद्र शासित प्रदेशों की लिस्ट में जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का नाम जुड़ गया है। वहीं, अब कुल राज्यों की संख्या 28 हो गई है।

राज्यसभा में जम्मू-कश्मीर राज्य पुनर्गठन बिल 125-61 से पास, भविष्य में मिलेगा पूर्ण राज्य का दर्जा

जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन बिल राज्यसभा में पास हो गया है। जम्मू-कश्मीर को दो भागों में बाँटने वाले इस बिल पर सदन में बिल के पक्ष में 125 वोट पड़े तो वहीं इसके विपक्ष में 61 वोट पड़े। जबकि एक सदस्य गैर हाजिर रहा। इससे पहले राज्यसभा से जम्मू कश्मीर आरक्षण दूसरा संशोधन बिल ध्वनिमत से पारित कर दिया गया। इस संशोधन बिल के पास हो जाने के बाद अमित शाह की ओर से लाए गए संकल्प पर सदन का मत लिया गया।
इस बिल में जम्मू कश्मीर से लद्दाख को अलग करने और दोनों को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा देने के प्रावधान शामिल हैं।

कॉन्ग्रेस के पी चिदंबरम ने अमित शाह से पूछा कि आप कश्मीर को केंद्र शासित प्रदेश क्यों बना रहे हैं?
अमित शाह ने कहा कि कश्मीर हमेशा केंद्र शासित प्रदेश नहीं रहेगा, सामान्य स्थिति के बाद उसे पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जाएगा। हम कश्मीर को देश का सबसे विकसित राज्य बनाएँगे। कश्मीर को सामान्य बनाने के लिए सरकार की सहायता करें और सब मिलकर काम करें। अमित शाह ने कहा कि हमारे साथ नहीं रहने वाले दलों ने भी आज इस बिल पर हमारा साथ दिया है। सदन को एकमत से इस बिल और संकल्प का समर्थन करना चाहिए।

बता दें कि इससे पहले गृह मंत्री अमित शाह जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के प्रावधान हटाने संबंधी प्रस्ताव को लेकर राज्यसभा में जवाब दिया। अमित शाह ने राज्यसभा में श्यामा प्रसाद मुखर्जी को याद करते हुए कहा कि मुझे भरोसा है कि आर्टिकल 370 हटने के बाद घाटी में खून खराबा पूरी तरह से बंद हो जाएगा।

J&K में परिसीमन फिर से: अभी तक घाटी को मिलता था विशेष लाभ, अब होगा प्रतिनिधि लोकतंत्र

गृह मंत्री अमित शाह के अनुच्छेद 370 हटाने और लद्दाख को अलग केंद्र-शासित प्रदेश बनाने की घोषणा के साथ घाटी और जम्मू के राजनीतिक भविष्य पर अटकलें शुरू हो गईं हैं। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक जहाँ लद्दाख केंद्र-शासित प्रदेश के तौर पर चंडीगढ़-मॉडल के अनुरूप ढलेगा, वहीं दिल्ली और पुडुचेरी जैसी व्यवस्था जम्मू-कश्मीर में चलेगी, जहाँ सीमित शक्तियों वाली विधानसभाएँ अस्तित्व में हैं

इस विधानसभा के लिए अलग से परिसीमन निर्वाचन आयोग द्वारा किए जाने की भी बात मीडिया में चल रही है। 21 नवंबर, 2018 को भंग की गई अंतिम विधानसभा में 111 सदस्य थे, जबकि आगामी विधानसभा, जिसमें लद्दाख शामिल नहीं होगा, में 107 सदस्यों के होने की संभावना है। पिछली विधानसभाओं में इनमें से 24 सीटें POK (पाकिस्तान के कब्ज़े का कश्मीर) की होतीं थीं, जिन्हें फ़िलहाल खाली छोड़ दिया जाता है, और बहुमत के गणित में नहीं गिना जाता।

अभी तक की विधानसभाओं में कम जनसंख्या के बावजूद कश्मीर घाटी के अधिक विधायक होते थे। परिसीमन में इसी विसंगति को दूर कर जनसांख्यिकीय संतुलन बैठाया जाएगा, ताकि हर विधायक कमोबेश एक ही संख्या के लोगों का प्रतिनिधित्व करे और प्रतिनिधि लोकतंत्र (representative democracy) की आत्मा के अनुरूप जनसंख्या विधानसभा में प्रतिबिम्बित हो।

‘कश्मीरी लड़की शादी कर अन्य राज्यों में जाएगी, देखते-देखते J&K सही मायने में पूरे भारत में घुल-मिल जाएगा’

राज्यसभा में फ़िलहाल (5 अगस्त, शाम को) गृह मंत्री अमित शाह का भाषण चल रहा है, और वह अनुच्छेद 370 के विषय में सदन को सम्बोधित कर रहे हैं। इस दौरान गृह मंत्री ने कई महत्वपूर्ण बातें कीं, जिनमें 370/35A के विकास में बाधक होने की बात कहने से लेकर उनके खात्मे को एक रक्तपात भरे युग का अंत बताया। गृह मंत्री बड़ी सूक्ष्मता से 370/35A के कारण खुद कश्मीरियों को हो रहे एक-एक नुकसान को गिना रहे हैं।

अमित शाह ने गुलाम नबी आज़ाद के एक सवाल का जवाब देते हुए कहा, “गुलाम नबी आज़ाद जी आपने पूछा था इंटरस्टेट शादियाँ शुरू हो गई हैं। यदि कश्मीर की लड़की ओडिशा में शादी करती है तो क्या उसके बच्चे को जम्मू-कश्मीर में अधिकार मिलेगा? ऐसा कोई कानून नहीं है। अब समाधान हो गया है। आप खुश हैं इन शादियों से, होने दीजिए इंटरस्टेट मैरिज, कश्मीर की लड़की ओडिशा या अन्य राज्यों में जाएगी, देखते-देखते जम्मू-कश्मीर सही मायने में पूरे भारत में घुल-मिल जाएगा।”

कश्मीर की अर्थव्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा पर्यटन है, लेकिन 370/35A के चलते पर्यटन भी नहीं पनप पाया।

बिल लाने के तरीके पर कॉन्ग्रेस के सवाल उठाने को लेकर शाह ने उन्हें भी आड़े हाथों लिया, और इंदिरा गाँधी के आपातकाल लगाने के तरीके की याद दिलाई।

370 हटाने के बाद हर राज्य को अलर्ट: सांप्रदायिक दंगों के खिलाफ रहें सतर्क, पुलिस से कराएँ मॉक ड्रिल

जम्मू कश्मीर पर नरेंद्र मोदी सरकार ने सख्त कदम उठाते हुए जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म कर दिया। इसके बाद केंद्र सरकार ने सोमवार (अगस्त 5, 2019) को सभी राज्य सरकारों को एडवाइजरी जारी की है। उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों को हाई अलर्ट पर रखा गया है। इसमें सांप्रदायिक दंगों के खिलाफ सतर्क रहने की सलाह दी गई है। साथ ही हिंसा को रोकने के लिए पुलिस से मॉक ड्रिल चलाने का निर्देश भी जारी किया गया है।

जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। अर्धसैनिक बलों की करीब एक हजार कंपनियाँ घाटी में तैनात हैं। यानी राज्य में अर्धसैनिक बलों के करीब एक लाख जवान सुरक्षा का जिम्मा संभाले हुए हैं। घाटी में इससे पहले इतने सुरक्षाबलों की तैनाती पुलवामा हमले के बाद और बालाकोट एयरस्ट्राइक से पहले की गई थी। सरकार ने स्थिति को नियंत्रित करने के लिए जम्मू-कश्मीर के विभिन्न जिलों में धारा 144 लगा दी है। इंटरनेट और मोबाइल सेवाएँ स्थगित कर दी गई हैं।

जम्मू-कश्मीर को हाई अलर्ट पर रखने के मद्देनजर राज्य के सभी राजनीतिक दलों के बड़े नेताओं को नजरबंद कर दिया गया है। जिसमें PDP अध्यक्ष और पूर्व सीएम मेहबूबा मुफ्ती और NCP के अध्यक्ष उमर अब्दुल्ला का नाम भी शामिल है। सरकार का कहना है कि ऐसा माना जा रहा है कि आतंकी किसी घटना को अंजाम दे सकते हैं, इसलिए सरकार सुरक्षा की दृष्टि से ये सब कदम उठा रही है।

सावन के आखिरी सोमवार को शिवभक्त मंदिर जाते हैं, न दें बकरीद पर कुर्बानी: कलीम हैदर नकवी

सावन का अंतिम सोमवार 12 अगस्त को है और उसी दिन बकरीद भी है। इसी को ध्यान में रखते हुए उत्तर प्रदेश के शिया नेता और यूनाइटेड शिया मूवमेंट के महासचिव कलीम हैदर नकवी ने समुदाय वालों से 12 अगस्त को ईद-अल-अजहा के मौके पर कुर्बानी न देने की अपील की है। संगठन के इस पहल को शिया जामा मस्जिद के इमाम जुमा मौलाना शम्सुल हसन खाँ ने भी अपना पूरा समर्थन दिया है।

कलीम हैदर नकवी ने तमाम शिया समुदाय से अपील करते हुए कहा है कि सावन के सोमवार के आखिरी दिन बड़ी संख्या में शिवभक्त मंदिर जाते हैं। ऐसे में लोग 12 अगस्त को जानवरों की कुर्बानी न दें और इस दिन केवल नमाज पढ़ें।

इस पर संगठन शिया धर्मगुरू मौलाना कल्बे जब्बाद और मौलाना यासूब अब्बास से भी बातचीत कर अपील जारी करने के लिए प्रयास कर रहे हैं। प्रवक्ता समर अब्बास जैदी ने बताया कि शिया मूवमेंट की ओर से अपील में कहा गया कि ईद-उल-अजहा की नमाज सोमवार को ही सभी मस्जिदों में अपने निर्धारित समय पर होगी। शिया समुदाय से मंगलवार को कुर्बानी करने की अपील की गई है।

गौरतलब है कि, इससे पहले बकरीद पर कुर्बानी को लेकर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य मौलाना केआर फिरंगी महली ने सभी से अपील करते हुए कहा था कि सड़कों पर जानवरों की कुर्बानी न दी जाए। उनका कहना था कि कुर्बानी घर या मदरसे को अंदर दी जा सकती है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि कुर्बानी केवल उन्हीं पशुओं की दी जानी चाहिए, जो कि सरकार द्वारा प्रतिबंधित न हो।

जम्मू-कश्मीर में 87 साल बाद लागू होगी IPC, रणबीर दण्ड संहिता Article 370 के साथ खत्म

भारत के क़ानूनी मामलों में अदालतें भारतीय दण्ड संहिता (IPC) के तहत कार्रवाई करती हैं। लेकिन जम्मू-कश्मीर में IPC की जगह रणबीर दण्ड संहिता (RPC) के तहत कार्रवाई की जाती थी। अब अनुच्छेद-370 को हटा देने से जम्मू-कश्मीर में भी भारतीय दण्ड संहिता लागू होगी।

जम्मू-कश्मीर में रणबीर दण्ड संहिता लागू थी, जिसे रणबीर आचार संहिता के नाम से भी जाना जाता था। इस राज्य में ब्रिटिश राज से ही रणबीर दण्ड संहिता लागू थी। दरअसल, महाराजा रणबीर सिंह वहाँ के शासक थे। इस वजह से राज्य में 1932 में महाराजा के नाम पर रणबीर दण्ड संहिता लागू की गई थी। यह संहिता थॉमस बैबिंटन मैकाले की भारतीय दण्ड संहिता के ही समान थी, लेकिन कुछ धाराओं में भिन्नता थी।

आख़िर क्या अंतर है IPC और RPC में…

  • IPC की धारा-4 कम्प्यूटर के ज़रिए किए गए अपराधों को व्याख्यित और संबोधित करती है, लेकिन RPC में इस संदर्भ में कोई ज़िक्र नहीं है। 
  • IPC की धारा-153 CAA के तहत सार्वजनिक सभाओं में हथियार ले जाना दण्डनीय अपराध है, वहीं RPC में इसका कोई उल्लेख नहीं है।
  • IPC की धारा-195 के तहत झूठी गवाही या बयान के लिए दण्ड का प्रावधान है, लेकिन RPC में इसका कोई उल्लेख नहीं है।
  • IPC की धारा- 304B का संबंध दहेज के कारण होने वाली मौतों से है। लेकिन, RPC में ऐसा ऐसा कोई उल्लेख नहीं है।
  • RPC की धारा- 190 के तहत सरकार ऐसे व्यक्ति को सज़ा दे सकती है, जो सरकार द्वारा अमान्य या ज़ब्त की गई सामग्री का प्रकाशन या वितरण करता हो। इसका संबंध ख़ासतौर पर पत्रकारिता, सोच, विचार और अभिव्यक्ति से है।
  • RPC की धारा- 167A के अनुसार जो भी सरकारी कर्मचारी किसी ठेकेदार को उसके ठीक ढंग से न किए गए काम के एवज में भुगतान करता है, तो उनके लिए सज़ा का प्रावधान है। वहीं, IPC में इसका कोई उल्लेख नहीं है।
  • RPC की धारा-420 A के तहत सरकार, सक्षम अधिकारी या प्राधिकरण के लिए किसी भी समझौते में होने वाले छल या धोखाधड़ी की सज़ा का प्रावधान है, लेकिन IPC में इसका कोई ज़िक्र नहीं है।
  • RPC की धारा- 204 A साक्ष्य मिटाने या उससे छेड़छाड़ से संबंधित है, जिसमें सज़ा का प्रावधान है, लेकिन IPC में इसका कोई ज़िक्र नहीं है।
  • RPC की धारा-21 सार्वजनिक नौकरी के दायरे की व्याख्या करता है, वहीं IPC में इसका दायरा सीमित है।

दरअसल, भारत के बहुत से ऐसे क़ानून थे, जो जम्मू-कश्मीर में लागू नहीं होते थे। इसके लिए केंद्र की पूर्ववर्ती सरकारें ज़िम्मेदार थीं। अनुच्छेद-370 की आड़ में कुछ ऐसे भी संवैधानिक आदेश लागू किए गए, जिनके कारण अनुच्छेद 35-A जैसे असंवैधानिक प्रावधान जोड़े गए।

नेहरू और इंदिरा ने 370 की आड़ में शेख अब्दुल्ला से विभिन्न करार किए जिनकी न कोई वैधानिकता थी न ज़रूरत। उन्हीं करारों के चलते जम्मू कश्मीर राज्य को अलग झंडा और न जाने क्या-क्या दे दिया गया जिसके कारण बाद के वर्षों में अलगाववाद को हवा मिली। भारत के विभाजन के समय जनता की राय लेने जैसी कोई शर्त नहीं रखी गई थी। केवल राजा को ही यह तय करना था कि वह अपने राज्य सहित किस डोमिनियन में जाएगा।

‘सरकार जम्मू-कश्मीर के लोगों को गूँगा समझ रही है, मैं सुप्रीम कोर्ट में दूँगी चुनौती’

मोदी सरकार ने ऐतिहासिक कदम उठाते हुए जम्मू-कश्मीर को विशेष अधिकार देने वाले अनुच्छेद 370 को खत्म कर दिया है। इस फैसले से जहाँ देश भर में जश्न का माहौल है, वहीं तथाकथित लिबरलों को तगड़ा झटका लगा है। ट्विटर पर उनकी तरफ से तरह तरह की प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही है और साथ ही इस फैसले का विरोध भी शुरू हो गया है। शाह फैसल की पार्टी से जुड़ीं शेहला रशीद ने कहा कि वो इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगी। सरकार को गवर्नर मान लेने और संविधान सभा की जगह विधानसभा को रखने का फैसला संविधान के साथ धोखा है। सभी प्रगतिशील ताकतें एकजुट होकर लड़ाई लड़ेंगी। उन्होंने कहा कि वो दिल्ली और बेंगलुरु में विरोध प्रदर्शन करेंगी।

शेहला रशीद ने कहा कि इसके लिए वो वकीलों और कुछ कार्यकर्ताओं की एक टीम के साथ संपर्क में है। उन्होंने कहा कि इसे लड़ने के लिए वो सबसे अच्छा कानूनी तरीका खोज लेंगी। शेहला ने कहा कि उन्हें उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट में उन्हें न्याय मिलेगा। शेहला ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि सरकार का ये कदम पूरी तरह से अलोकतांत्रिक और अस्वीकार्य है। उनका कहना है कि देश के संघीय ढाँचे और धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को मजबूत करने के बजाय, वो उन्हें कमजोर कर रहे हैं। यह देश के संघीय व्यवस्था का अपमान है।

इसके साथ ही वो केंद्र सरकार पर भड़कती हुईं बोली कि सरकार जम्मू कश्मीर के लोगों को गूँगा समझ रही है और उनके साथ वैसा ही व्यवहार किया जा रहा है। उनका कहना है कि सरकार ने जम्मू कश्मीर के राजनेताओं को नजरबंद और संचार व्यवस्था को स्थगित इसलिए किया, ताकि कोई आवाज़ ना उठे। शेहला का कहना है कि चूँकि, वो कश्मीर से बाहर हैं, इसलिए उनके पास खुद को अभिव्यक्त करने की आवाज है। उन्होंने कहा कि वो सभी से अनुरोध करती हैं कि इस आंदोलन में कश्मीरियों के साथ खड़े हों और उनके साथ सहानुभूति रखें।

वहीं, संसद में पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के सांसदों- नजीर अहमद लवे और मीर मोहम्मद फैयाज ने संविधान की प्रतियाँ और कपड़े फाड़कर अपना विरोध जाहिर किया। जिसके बाद सभापति ने उन्हें सदन से जाने का आदेश दे दिया। पीडीपी की नेता महबूबा मुफ्ती ने संविधान की धारा 370 को खत्म करने के मोदी सरकार के फैसले को ‘भारतीय लोकतंत्र का सबसे काला दिन’ बताया।

370 का ‘पावर’ खत्म होने के बाद घाटी और आसपास के महत्वपूर्ण स्थानों पर 8000 अतिरिक्त अर्धसैनिक बलों की तैनाती

केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने की सिफ़ारिश की। अमित शाह ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का संकल्प राज्यसभा में पेश किया। शाह ने कहा कि अनुच्छेद 370 का सिर्फ़ एक खंड लागू होगा और राष्ट्रपति ने इसे मंजूरी दे दी है। जिसके बाद से ही संसद से लेकर देश के कई जगहों पर हंगामा जारी है। हालाँकि, स्थिति सामान्य है फिर भी सावधानी बरतते हुए श्रीनगर में घाटी और आसपास के महत्वपूर्ण स्थानों जैसे, नागरिक सचिवालय, पुलिस मुख्यालय, हवाई अड्डे और विभिन्न केंद्र सरकार के प्रतिष्ठानों में 8000 अतिरिक्त अर्धसैनिक बलों को तैनात किया गया है।

पुलिस और अर्धसैनिक बलों को घाटी में पहले से ही हाई अलर्ट पर रखा गया है। रविवार को ही, पुलिस स्टेशन में पारंपरिक टेलीकॉम नेटवर्क को बायपास करने के लिए सैटेलाइट फोन उपलब्ध कराए गए थे।

जानकारी के अनुसार, आज होने वाले वाले बड़े फैसले के मद्देनज़र केंद्र ने विभिन्न एयरलाइन्स के टिकट बढ़ते दाम पर रोक लगाते हुए उसकी क़ीमत 7,000 रुपए कर दी थी जिससे अमरनाथ यात्री और पर्यटक घाटी से निकलने में काफ़ी मदद मिली। क्रिकेट टीमों के मेंटर पूर्व भारतीय ऑलराउंडर इरफान पठान अपने घर सुरक्षित लौट गए थे। जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा के मद्देनज़र श्रीनगर में चल रहे अंडर-16 और अंडर-19 ट्रायल्स स्थगित कर दिए गए थे। ग़ौरतलब है कि इरफान पठान अंडर-16 (विजय मर्चेंट ट्रॉफी) और अंडर-19 (कूच बेहार ट्रॉफी) के ट्रायल्स को देखने और संभावित खिलाड़ियों की सूची तैयार करने के लिए श्रीनगर में थे।

इरफान पठान ने रविवार को पीटीआई से कहा, ”हमने फ़िलहाल जूनियर टीम ट्रायल्स का दूसरा चरण स्थगित कर दिया है। हमारा पहला चरण जून और जुलाई में चला था। यह दूसरा चरण था। सरकार की तरफ से परामर्श जारी हुआ है और इसलिए जम्मू कश्मीर क्रिकेट संघ (जेकेसीए) सीईओ बुखारी और प्रशासक न्यायमूर्ति प्रसाद से मैंने मुलाकात की। इसके बाद लड़कों को वापस घर भेजने का फैसला किया गया।”