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रवीश जी, इतने दुबले क्यों हो रहे हैं कश्मीर को लेकर?

मैग्ससे अवॉर्ड से पुरस्कृत रवीश कुमार जी को अवॉर्ड मिला ही था कि अमित शाह ने पूरी कोशिश कर दी कि आदमी गुस्से में अवॉर्ड वापसी कर दे। अभी चॉकलेट फ्लेवर केक की महक स्टूडियो के एग्जॉस्ट फैन ने पूरी तरह से बाहर फेंकी भी नहीं थी कि अमित शाह ने उनकी खुशियों की चमक को हैलोजन लाइट से सीधा लाल-हरी एलईडी में बदल दिया। प्राइम टाइम इंट्रो करते-करते रवीश जी कश्मीर पर पूरा प्राइम टाइम ही निकाल ले गए।

स्टूडियो में परममित्र फैजान मुस्तफा जी के अलावा किसी राजनैतिक दल के प्रतिनिधि नहीं थे। ये बात और है कि रवीश भक्त मानते हैं कि रवीश जी स्वयं ही अपने आप में सारे राजनीतिक दल हैं। अगर महाभारत की बात करें तो रवीश जी आने वाले दिनों में अपना विराट रूप दिखा सकते हैं, जिसमें हम देखेंगे कि ‘सब जन्म मुझी से पाते हैं, फिर लौट मुझी में आते हैं’। उस हिसाब से उन्होंने विपक्षी दलों की भूमिका में स्वंय को रखते हुए, पत्रकारिता के स्वनिर्धारित फर्जी मापदंड कि ‘पत्रकार का काम हमेशा सरकार के विरोध में रहना होता है’ को शिद्दत से निभाया। पक्ष में अमित शाह के क्लिप्स तो आ ही रहे थे।

कश्मीर की बात करते हुए पहला दर्द जो रवीश जी के फूले हुए सीने में सुई जैसा चुभा वो यह था कि सरकार ने कश्मीर के लोगों से राय क्यों नहीं ली? उन्होंने ज़ोर दे कर पूछा कि पीडीपी और नेशनल कॉन्फ़्रेंस के सासंदों से क्यों नहीं पूछा गया। कश्मीर के लोगों की राय इसलिए नहीं ली गई क्योंकि उन्होंने किसी भी नेता को अपनी राय देने के लिए नहीं चुना था, इसलिए सरकार गिर चुकी है। जहाँ तक इन पार्टियों के सांसदों का सवाल है, एक ने अपना कुर्ता फाड़ कर श्रग नामक फैशनेबल वस्त्र बना लिया, और साथ ही संविधान को भी सदन में फाड़ गया। दूसरी बात यह है कि सासंदों को नाम लिखवा कर अपनी राय देने का प्रावधान है, उन्हें सुपारी और जनेऊ देकर बुलाया नहीं जाता कि भैया राय दे दो।

एक लाइन जो रवीश जी ने अपने डार्क ह्यूमर का प्रयोग करते हुए बार-बार कही और अपने भक्तों को रवीश प्रोफेशनल प्रोपेगेंडा यूनिवर्सिटी (व्हाट्सएप्प पत्राचार माध्यम) के नए शोध के कोर्सवर्क के तौर पर प्रदान की, वो यह थी कि ‘इससे क्या होगा, ये समस्याएँ तो बाकी राज्यों में भी है, उन्हें भी केन्द्र शासित बना दिया जाए’। रवीश जी शायद मैग्ससे वाले केक खाने के चक्कर में भूल गए कि बाकी राज्यों में न तो 370 था, न 35A, और कश्मीर बाकी राज्यों की तरह नहीं था इसीलिए ऐसा करना पड़ा।

कहने लगे कि रोजगार के अवसर अगर पैदा होते हैं तो फलाँ राज्य को भी केन्द्रशासित बना दिया जाना चाहिए। भ्रष्टाचार तो हर जगह है, सबको बाँट देना चाहिए। ऐसे ही वक्त पर रवीश जी क्यूटाचारी हो जाते हैं। मतलब, एक राज्य को, जहाँ बाहरी व्यक्ति रोजगार ला ही नहीं सकता, बाहरी का बसना गैरकानूनी है, बाकी के राज्यों के समकक्ष रख रहे हैं जो नॉर्मल है? ‘रोजगार नहीं है’ का भांडा कई बार फूट चुका है, इसलिए इस पर चर्चा नहीं करूँगा।

कश्मीर सामान्य राज्य नहीं था, इसलिए वहाँ जो समस्याएँ थीं, भले ही वो बाकी राज्यों में भी हो, उसके समाधान के लिए उसकी उस विशेषता को हटाना होगा जो उसके विकास की बाधक है। इसलिए, चुटकुलेबाजी के लिए तो नकली हँसी हँसते हुए रवीश कह सकते हैं कि यूपी को भी बाँट दिया जाए, लेकिन वो कुतर्क है, उस पर चर्चा नहीं होनी चाहिए।

उसके बाद, भावुक आवाज किन्तु भावहीन चेहरे के साथ रवीश जी ने बताया कि कैसे 1948 में जब आतंकियों ने हमला किया तब नेशनल कॉन्फ्रेंस के कार्यकर्ताओं ने अपनी शहादत दी थी। बिल्कुल दी थी रवीश जी, बाकी पार्टियों के कार्यकर्ता भी मरे थे। और संसद में रखे गए आँकड़ों की माने तो कश्मीर में अब तक लगभग 50,000 लोग मारे जा चुके हैं।

दूसरी बात यह है कि रवीश जी 1948 में तो चले गए, क्योंकि उनको सूट कर रहा था, लेकिन 1989-90 में क्या हुआ, ये पूरे एपिसोड में नहीं बता सके। रवीश कुमार एक लाइन नहीं बोल सके कि इन दो सालों के बीच, और उसके बाद ऐसा क्या हुआ कि रातों रात कश्मीर की डेमोग्रफी बदल गई और शिव की धरती पर मंदिरों में नमाज पढ़े गए। आप ये कह कर नहीं बच सकते कि उस घटना के सामने तो सारे तर्क निरस्त हो जाते हैं। आपको हर बार क्रूरता की डिग्री को माइक्रोस्कोप से देखना होगा, एक पूरी जनसंख्या की हर छटपटाहट को पढ़ना होगा और तब कहिए कि कश्मीर कैसे अलग है, और जो हुआ उसे कैसे ठीक किया जाए।

‘डर का माहौल’, ‘आवाज को दबाया जा रहा है’, ‘सवाल करना एंटी नेशनल बनाता है’ जैसी फर्जी बातें बेच कर, हजारों करोड़ के मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप झेल रहे मालिक की डुगडुगी बजाते पत्रकारिता के स्वघोषित स्तंभ ने कहा कि अगर लोग प्रश्न पूछेंगे तो उन्हें अलगाववादी कह दिया जाएगा। लगता है कि प्राइम टाइम में जिस अनौपचारिकता और उपेक्षा से रवीश आजकल बैठते हैं, बातें करते हैं, उन्होंने सिर्फ वही क्लिप्स देखीं जो उनके एडिटर ने उनके लिए छाँटी थी। अगर उन्होंने पूरी कार्यवाही देखी होती तो कैमरे में देख कर ऐसा बेहूदा झूठ नहीं बोलते। लेकिन बात तो वही है कि हमारा कैमरा, हमारा स्टूडियो और हमारे रवीश भक्त, हम जो कहेंगे वही सही है। जबकि, संसद में कई सांसदों ने सवाल किए, उन्हें जवाब दिया गया। उन्होंने स्पष्टीकरण माँगे, उन्हें स्पष्टीकरण दिया गया।

कश्मीर की बात हो और कश्मीरी पंडित कैसे नहीं आएँगे चर्चा में! लेकिन अगर रवीश का शो हो तो वो सरकार को गलत साबित करने के लिए पूरे भारत से तीन ऐसे गाँव ले आएँगे जहाँ बिजली के खंबे तो हैं लेकिन उन पर सरकार ने तार खींचने से पहले पूरे भारत के विद्युतीकरण का हल्ला कर दिया। ये इंसान इस बात पर अचंभित नहीं होता कि भारत के कई हजार गाँव अब बिजली पा सकेंगे, बल्कि वो इस पर खुश होता है कि तीन में तो नहीं हुआ न! उसी तर्ज पर, कश्मीरी पंडितों के बारे में लम्बी हाँकने के बाद रवीश ने किसी व्यक्ति को यह कहते दिखाया कि कश्मीर में 5-6000 कश्मीरी पंडित 101 जगहों पर रह रहे हैं। उन्हें कोई समस्या नहीं है।

रवीश जी किताबों का हवाला देते हैं, पन्ने का नंबर बताते हैं। मैं भी आँकड़ों की बात करते हुए बताना चाहूँगा कि सबसे कम संख्या बताने वाले लोग कहते हैं कि जनवरी 1990 से घाटी छोड़ने वाले कश्मीरी हिन्दुओं की संख्या एक लाख है। कुछ के अनुसार यह संख्या डेढ़ लाख है, और कुछ इसे आठ लाख तक बताते हैं। सबसे कम वाले को भी सही माना जाए तो क्या पाँच हजार लोगों के कश्मीर में होने से बाकी के 95,000 और उनके अभी के परिवारों का न्याय हो गया? पाँच प्रतिशत के वहाँ होने की बात दिखा कर किसको सांत्वना दे रहे हैं? क्योंकि आने वाले दिनों में आपके भक्तगण काले बैकग्राउंड पर ‘भाजपा का झूठ पकड़ा रवीश ने, कश्मीरी पंडित अभी भी खुशहाल हैं घाटी में’ घुमाते मिलेंगे। उनमें से किसी को तीन साल बाद रवीश श्री या रवीश विभूषण भी मिल जाएगा, किसको पता!

उसके बाद रवीश कुमार ने बताया कि इन दोनों केन्द्रशासित प्रदेशों की राजनैतिक पहचान आधी रह जाएगी! इसका मतलब क्या है, मुझे नहीं पता क्योंकि इतनी खूफियागीरी तो मैं नहीं कर सकता। कश्मीर की पहचान, दुर्भाग्य से, एक आतंकग्रस्त राज्य के रूप में ही रही है जहाँ के लोग अपने आप को आजादी के लिए तैयार करते रहते हैं। ऐसा मानना सच है या गलत, वो अलग चर्चा है, लेकिन अब कश्मीर की राजनैतिक पहचान भारत के एक अभिन्न अंग के रूप में है जहाँ भारत का संविधान, झंडा, दंड विधान और सारी योजनाएँ लागू होंगी। इसलिए, इनकी राजनैतिक पहचान आधी नहीं हुई, बल्कि अब उन्हें पूर्णता मिली है।

इसके बाद रवीश जी बिलकुल ऐसे बोलने लगे जैसे वो कल ही पैदा हुए और आज उन्हें स्टूडियो में बिठा दिया गया। वो सत्यपाल मलिक के जून और दो दिन पहले के बयान दिखाते हुए बोले कि देखिए राज्यपाल तो कह रहे हैं कि कश्मीर में कुछ नहीं होने वाला, सब अफवाह है कि ये हटेगा, वो हटेगा। लेकिन दो दिन बाद तो हटा दिया गया। इसके बाद रवीश जी ने इसका मतलब निकाला कि इतना बड़ा फैसला था और राज्यपाल को भी ये बात पता नहीं थी। जी रवीश जी, राज्यपाल को पता नहीं था, वरना वो तो लाउडस्पीकर लेकर कहता फिरता कि कश्मीर वालों तुम्हारा स्पेशल स्टेटस गया ‘चितरा के झाँट में’, सड़कों पर उतरो और पत्थरबाजी करो, राज्य सरकार तुम्हें पाँच सौ रुपए देगी। एक ही दिल है कितनी बार सांकेतिक छुरा मार कर आत्महत्या करूँ आपके कुतर्क सुन कर? (‘चितरा के झाँट में’ मिथिला क्षेत्र की ठेठी बोली का मुहावरा है जिसका तात्पर्य है ‘चित्रा नक्षत्र की फुहार’। इसका अर्थ ‘भाँड़ में जाओ’ जैसा है।)

कुल मिला कर, अंग्रेजी की एक कहावत रवीश जी के प्राइम टाइम को समेट देती है कि ‘some people speak because they have something to say, while some speak because they have to say something’. इसका अर्थ है कि कुछ लोग इसलिए बोलते हैं कि उनके पास बोलने के लिए कुछ होता है, जबकि कुछ लोग बस इसलिए बोलते हैं क्योंकि उन्हें कुछ बोलना होता है।

रवीश कुमार की एक समस्या यह भी है कि चालीस मिनट के प्राइम टाइम में वो इस बात पर खुश नहीं होते कि हजारों गाँवों में बिजली पहुँची, बल्कि वो पूरे समय यह बताने में लगे रहते हैं कि नहीं, तीन गाँव में नहीं पहुँची। यही पत्रकारिता उन्हें बाकी पत्रकारों से अलग बनाती है। उनमें यह दैवप्रदत्त कला है कि वो जब पत्रकार होते हैं तो वो अपने भाई और मालिक को भूल जाते हैं कि उनके कांड क्या हैं। वो जब पत्रकार होते हैं तो जेडीयू को यह याद जरूर दिलाते हैं कि वो भाजपा के साथ सरकार में हैं, और उन्हें कश्मीर वाले मसले पर जब सूचना भी नहीं दी गई तो उन्होंने इस्तीफा भी नहीं दिया।

जबकि उन्हें ही पत्रकारिता का आदर्श मानने वाले भक्तों से मेरा सवाल यह है कि मोदी से हर रात कठिन सवाल पूछने वाले रवीश अपने जमीर से कब कठिन सवाल पूछेंगे? आखिर वो कब इस्तीफा देंगे क्योंकि जब तक प्रणय रॉय अपने पैसों वाले कांड से बाइज़्ज़त बरी नहीं हो जाते, वो एनडीटीवी से नैतिकता के आधार पर तो जुड़े नहीं रह सकते? लेकिन वो ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि फिर अपने हृदय में अंधेरा लिए घूमने वाले पत्रकार शिरोमणि भारत की जनता को कैसे बताएँगे कि उनके डिश की छतरी की तार मोदी रात में काट देता है!

वो व्यक्ति पत्रकारिता का स्तंभ होने का दंभ भरता है जिसके पैनल में हमेशा एक ही विचार के लोग होते हैं, और विरोध के मत वालों को बुलाने की कोशिश भी नहीं होती। रवीश के प्राइम टाइम से ज्यादा अलोकतांत्रिक न्यूजरूम कहीं नहीं होता जहाँ, नेता तो चलिए आते नहीं है, जानकार भी अपने विरोध की आवाज को प्रदर्शित करने नहीं बुलाए जाते। क्या राजनैतिक विश्लेषक सिर्फ एक ही विचारधारा के होते हैं, या भाजपा के बायकॉट के बाद, भाजपा के समर्थकों में कोई विश्लेषक नहीं है? ऐसा नहीं है, बात इतनी है कि ऐसे तानाशाही प्रवृत्ति के लोग, हर रात यह चिल्लाते हैं कि असली पत्रकारिता वही कर रहे हैं, वो जो कह रहे हैं वही शाश्वत सत्य है, जबकि नंगा सच यह है कि रवीश कुमार से ज़्यादा मैनेज्ड पैनल किसी भी स्टूडियो में नहीं दिखता।

दुनिया से कठिन सवाल पूछना और उन्हें आदर्श से कम की स्थिति में नहीं स्वीकार पाना, रवीश जी की कई अदाओं में से एक है। सत्तर साल से जिस अस्थाई बात को ढोया जा रहा था, रवीश जी इतने छिछले तरीके से उसे डिफेंड करेंगे, ये नहीं सोचा था। वो ये बात भूल गए कि कश्मीर की डेमोग्रफी कैसे एक तय तरीके से बदली गई। वो यह भूल गए कि 1957 में पंजाब के गुरदासपुर और अमृतसर से कश्मीर में वाल्मीकि समुदाय का एक समूह कश्मीर सरकार की माँग पर उनका कचरा साफ करने आया था, और आज तक उसे वहाँ का नागरिक होने का हक भी नहीं दिया गया है। इसलिए रवीश जी यह ज्ञान तो न दें कि केन्द्रशासित बनाने से क्या हो जाएगा।

रवीश बहुत आराम से भूल गए कि किस अनुच्छेद की आड़ में आजादी की बात होती है। रवीश यह भूल गए कि आईसिस के झंडे गुजरात सा राजस्थान के गाँवों में नहीं दिखते, बल्कि कश्मीर घाटी में वो एक आम दृश्य है। रवीश जी ने कश्मीरी पंडितों की पीड़ा की वो किताबें नहीं पढ़ीं जो वो पीढ़ी लिख रही है जिसका बचपन उनसे छीन लिया गया था और जवानी अपने ही देश में भटकते हुए बीत रही है। रवीश जी ने उस बच्चे के बारे में नहीं सुना जो सेना के जवानों द्वारा दागी गई गोलियों के खोले चुनता है, उसे स्क्रैप मार्केट में बेचता है ताकि वो कुछ खा सके।

किताबें तो मैंने भी बहुत पढ़ी हैं, और पेज नंबर मुझे भी याद हैं, लेकिन मैं अभी तक इतना धूर्त नहीं बन पाया कि उस ज्ञान का इस्तेमाल अपनी फर्जी विचारधारा और मालिकों के प्रोपेगेंडा की रोटी सेंकने में कर सकूँ। वो तरीके रवीश को ही मुबारक हों।

Article 370 पर टूट रही कॉन्ग्रेस! 2 धुरंधर युवा नेता के साथ जनार्दन द्विवेदी भी मोदी सरकार के पक्ष में

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के ‘पावर’ को खत्म किए जाने के बाद अब कॉन्ग्रेस पार्टी 2 हिस्सों में बँटती दिखाई दे रही है। खबरों की मानें तो पार्टी के आधिकारिक व्हॉट्सऐप ग्रुप में पार्टी प्रवक्ताओं के बीच जम्मू-कश्मीर पर आए फैसले पर पक्ष और विपक्ष की बहसें हो रही हैं। पार्टी के कुछ नेता केंद्र सरकार के फैसले के ख़िलाफ़ होते विरोध से सहमत हैं तो कुछ इससे नाराज़ हैं। जो नेता नाराज़ हैं उनका डर है कि इस विरोध के कारण उन्हें राजनैतिक नुकसान उठाना पड़ सकता है, लेकिन फिर भी पार्टी के शीर्ष को देखकर वह चुप हैं।

बता दें कि केंद्र सरकार द्वारा कश्मीर पर लिए इस ऐतिहासिक फैसले पर एक ओर जहाँ कॉन्ग्रेस के आलाकमान इसका विरोध कर रहे हैं तो वहीं पार्टी के कुछ नेता पार्टी के मत से हटकर अपना बयान दे रहे हैं। इनमें कॉन्ग्रेस के युवा चेहरे और पूर्व सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा, मुंबई कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मिलिंद देवड़ा भी शामिल हैं। ये दोनों मोदी सरकार के इस फैसले का खुलकर समर्थन कर रहे हैं। इनके अलावा वरिष्ठ कॉन्ग्रेसी नेता जनार्दन द्विवेदी ने भी अनुच्छेद 370 हटाए जाने का स्वागत किया।

मोदी सरकार का फैसला आने के बाद हुड्डा ने अपने फेसबुक पर अपना पुराना पोस्ट शेयर किया और बताया कि वो शुरुआत से कहते आ रहे है कि 21वीं सदी में अनुच्छेद 370 का कोई औचित्य नहीं है। इसके अलावा उन्होंने अपने ट्वीट पर भी लिखा, “मेरी व्यक्तिगत राय रही है कि 21वीं सदी में अनुच्छेद 370 का औचित्य नहीं है और इसको हटना चाहिए? ऐसा सिर्फ देश की अखंडता के लिए ही नहीं, बल्कि जम्मू-कश्मीर जो हमारे देश का अभिन्न अंग है, के हित में भी है। अब सरकार की यह जिम्मेदारी है कि इसका क्रियान्वयन शांति और विश्वास के वातावरण में हो।”

वहीं, कॉन्ग्रेस अध्य मिलिंद देवड़ा ने भी इस मामले पर खुलकर अपनी बात की। उन्होंने कहा, “यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अनुच्छेद 370 को उदार बनाम रूढ़िवादी बहस में तब्दील कर दिया गया। पार्टियों को अपनी विचारधारा से अलग हटकर इस पर बहस करनी चाहिए कि भारत की संप्रभुता और संघवाद, जम्मू-कश्मीर में शांति, कश्मीरी युवाओं को नौकरी और कश्मीरी पंडितों के न्याय के लिए बेहतर क्या है?”

बता दें कि मोदी सरकार द्वारा जम्मू-कश्मीर को अनुच्छेद 370 के तहत मिलने वाले विशेषाधिकारों को हटाए जाने का कॉन्ग्रेस नेता जनार्दन द्विवेदी ने समर्थन किया है। उन्होंने कहा, “राजनीति में मेरे गुरु रहे राम मनोहर लोहिया जी हमेशा से ही अनुच्छेद 370 के खिलाफ थे। इतिहास में की गई एक बड़ी गलती आज सुधार ली गई है।”

कॉन्ग्रेस के सांसद और चीफ व्हिप भुवनेश्वर कालिता ने पार्टी के साथ-साथ अपनी सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया। वो अनुच्छेद-370 का ‘पावर’ खत्म होने पर अपनी पार्टी के द्वारा विरोध किए जाने को लेकर असहज थे। उनकी माने तो अनुच्छेद-370 का ‘पावर’ खत्म होना ही जम्मू-कश्मीर समस्या का एकमात्र विकल्प था।

गौरतलहब है कि इन कॉन्ग्रेसी नेताओं के अलावा बहुजन समाज पार्टी ने भी मोदी सरकार के इस फैसले का आदर किया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने भी इस फैसले का खुले सुर में स्वागत किया।

Article 370 पर JNU में बगावत: भीड़ ने सेना को दी गालियाँ, खुद को हिंदुस्तानी मानने से किया इनकार

जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले, अलग संविधान और अपना अलग कानून बनाने जैसी छूट देने वाले अनुच्छेद-370 का ‘पॉवर’ कल खत्म कर दिया गया। मोदी सरकार के इस फैसले ने कई विरोधियों के दिल पर चोट की। कुछ को हमने सदन में कपड़े फाड़ते देखा, तो कुछ को सोशल मीडिया पर बयानबाजी करते। लेकिन अब खबर है कि भारत सरकार के इस फैसले के ख़िलाफ़ दिल्ली स्थित जेएनयू में भी बगावती सुर उठते दिखाई दिए हैं।

दरअसल, खबरों की मानें तो सोमवार (अगस्त 5, 2019) की रात जेएनयू में सरकार के फैसले के ख़िलाफ़ ‘आजादी-आजादी’ के नारों की गूँज सुनाई दी। जानकारी के अनुसार कुछ लोगों ने अँधेरे में यहाँ जमकर नारेबाजी की और अनुच्छेद 370 को वापस लेने की माँग की। इस दौरान आपत्तिजनक भाषा के प्रयोग के साथ इन लोगों ने सेना को लेकर भी काफ़ी अपशब्द बोले।

आजतक में प्रकाशित खबर के अनुसार लाल सलाम का नारा बुलंद करने वाले इन लोगों ने इस दौरान खुद को हिंदुस्तानी बताने से भी परहेज किया। साथ ही वे आधी रात के अँधेरे में मीडिया के कैमरे से बचते नजर आए।

गौरतलब है कि एक ओर जहाँ दिल्ली स्थित जेएनयू में हमें सरकार के फैसले के ख़िलाफ़ ऐसी गतिविधियों की खबर सुनने को मिल रही हैं, वहीं जम्मू विश्वविद्यालय में सोमवार को छात्र 370 खत्म होने का जश्न मनाते दिखे। केंद्र सरकार के इस फैसले से हर राज्य में खुशी का माहौल है, जिसमें तेलंगाना भी शामिल है। लोग अपने घरों के बाहर पटाखे फोड़कर अपनी खुशी का इज़हार करते कल नजर आए।

बता दें कि इससे पहले भी जेएनयू ऐसे ही कारणों के कारण 3 साल पहले भी सुर्खियों को हिस्सा बना था। जब 9 फरवरी 2016 को वहाँ जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार समेत अन्य छात्र नेताओं ने संसद हमले के दोषी अफजल गुरू को फांसी पर लटकाए जाने के विरोध में कार्यक्रम आयोजित किया था। इस दौरान एबीवीपी (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद) ने आरोप लगाया था कि यहाँ ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ और आतंकी ‘अफजल तेरे कातिल जिंदा हैं’, जैसे नारे लगे। जिसके बाद इस मामले पर बाकायदा कार्रवाई हुई। अभी फिलहाल इस मामले में दिल्ली की एक कोर्ट में सुनवाई चल रही है।

‘अगर हिंदुस्तान सच में 370 को हटा, कश्मीर का पूर्ण विलय कर ले गया तो अब बात POK पर होगी’

ट्विटर पर जम्मू-कश्मीर के विभाजन और उसे केंद्र-शासित प्रदेश में तब्दील करने के साथ एक वीडियो घूमने लगा है। पाकिस्तानी टीवी चैनल के एक वीडियो में हिंदुस्तान में पाकिस्तान के उच्चायुक्त (हाई कमिश्नर) रह चुके अब्दुल बासित इस वीडियो में बताते हुए नज़र आ रहे हैं कि कैसे पाँच साल पहले ही भाजपा के नए-नए महासचिव बने राम माधव ने उन्हें बता दिया था कि 370 की उलटी गिनती शुरू हो चुकी है। बासित यह भी बताते हैं कि राम माधव ने उन्हें सलाह दे दी थी कि हुर्रियत और अलगाववादियों के ज़रिए कश्मीर पर कब्ज़ा बनाए रखने की कोशिश छोड़ कर पाकिस्तान को अपने विकास पर ध्यान देना चाहिए।

इस वीडियो में बासित आगे यह भी बताते हैं कि कैसे अगर हिंदुस्तान सच में 370 को हटा कर कश्मीर का पूर्ण विलय हिंदुस्तान में कर ले गया तो ट्रम्प का कश्मीर मामले पर मध्यस्थता करना पाकिस्तान को ही महँगा पड़ेगा। उनके अनुसार एक बार जम्मू-कश्मीर के गैर-पाकिस्तानी हिस्से का अगर हिंदुस्तान में पूर्ण विलय हो गया तो फिर हिंदुस्तान के हिस्से का कश्मीर तो बातचीत का हिस्सा ही नहीं होगा। फिर बात केवल POK पर होगी।

अब्दुल बासित के इस बयान से यह साफ़ है कि भाजपा राष्ट्रीय सुरक्षा और खासकर कि कश्मीर के मुद्दे पर आंतरिक रूप से प्रतिबद्ध हमेशा से रही है- पाँच साल पहले से भाजपा के नए-नए बने महासचिव तक ने पाकिस्तानी सरकार को अपनी पार्टी और सरकार की स्पष्ट नीति बता दी थी।

‘राजनीति के लिए नेताओं ने 70 साल बनाए रखा, 370 को हटाकर देश में समानता लाने की कोशिश की गई’

जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का मौलाना सैफ़ अब्बास ने समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि कश्मीर में अनुच्छेद-370 की वजह से एक मुल्क़ में रहते हुए भी हम अजनबी थे। उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि एक हिन्दुस्तान का नागरिक अगर हिन्दुस्तान की ही दूसरी जगह पर जाकर प्रॉपर्टी नहीं ख़रीद सकते और बिज़नेस नहीं कर सकता था तो ये चीज़ें सोचने वाली हैं।

मौलाना सैफ़ अब्बास ने कहा कि अनुच्छेद-370 को पहले ही हटा दिया जाना चाहिए था। राजनीति करने वाले नेताओं ने निजी स्वार्थों के लिए 70 साल तक इसे अस्तित्व में बनाए रखा गया। अनुच्छेद-370 को हटाकर देश में एक समानता लाने की कोशिश की गई है, जिसमें किसी के साथ भेदभाद किए जाने जैसी बातों को ख़त्म कर दिया गया है।

उन्होंने कहा कि इस भेदभाव वाली राजनीति के ख़त्म होने से केवल उन्हीं लोगों को दु:ख होगा जो भेदभाव वाली राजनीति करते थे। मौलाना अब्बास ने यह भी कहा कि हिन्दुस्तान एक है, संविधान एक है तो सब कुछ एक होना चाहिए। आगे भी ऐसे काम होते रहने चाहिए जिससे भेदभाव ख़त्म किया जा सके जिससे देश में एकता नज़र आए।

कड़े शब्दों का इस्तेमाल करते हुए मौलाना सैफ़ अब्बास ने कहा कि देश में अगर भेदभाव होगा तो उसका नुक़सान भी देश को ही होगा। ग़ौरतलब है कि अनुच्छेद-370 को ख़त्म करने का संकल्प पेश करने के साथ ही बीजेपी में ख़ुशी का माहौल है। देश भर के लगभग हर हिस्से में ख़ुशी मनाई जा रही है।

एकतरफ़ा फ़ैसले से कश्मीर की स्थिति नहीं बदल सकती, भारत का फ़ैसला हमें स्वीकार्य नहीं: पाकिस्तान

जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-370 और 35-A के संदर्भ में मोदी सरकार द्वारा लिए गए फ़ैसले पर पाकिस्तान ने आपत्ति जताई है। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय का कहना है कि भारत का फ़ैसला हमें स्वीकार्य नहीं है। भारत की कोशिश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) के संकल्पों और कश्मीरी लोगों की इच्छाओं के ख़िलाफ़ है।

पाकिस्तान ने कहा है कि वो भारत सरकार के इस फ़ैसले का विरोध अंतरराष्ट्रीय स्तर पर करेगा। पाकिस्तान ने भारत के इस फ़ैसले पर कहा है कि कश्मीर का मुद्दा एक अंतरराष्ट्रीय मुद्दा है। इसलिए भारत सरकार इस मसले पर एकतरफ़ा फ़ैसला नहीं कर सकता। ऐसा करने से कश्मीर का मुद्दा हल नहीं होगा, इसलिए यह फ़ैसला न तो पाकिस्तान को स्वीकार्य है और न ही जम्मू-कश्मीर के लोगों को स्वीकार्य है।

वहीं, पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने कहा कि भारत अगर अनुच्छेद 35-A से छेड़छाड़ करेगा तो इससे कश्मीर में समस्या बढ़ेगी। पाकिस्तान ने कहा है कि वो कश्मीरियों को अपना समर्थन देना जारी रखेगा।  

इसके अलावा पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज़-पार्टी के अध्यक्ष एवं विपक्ष के नेता शहबाज़ शरीफ़ ने अनुच्छेद 370 को रद्द करने के फ़ैसले की निंदा की और कहा कि यह ‘अस्वीकार्य’ और संयुक्त राष्ट्र के ख़िलाफ़ ‘देशद्रोह का कार्य’ था।

शहबाज़ शरीफ ने पाकिस्तानी नेतृत्व से तुरंत संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से एक आपातकालीन सत्र की माँग की और चीन, रूस, तुर्की, सऊदी अरब और अन्य मित्र देशों के साथ परामर्श करने की भी माँग की।

‘गुलाम नबी आजाद Pak आतंकवादी से ज्यादा घिनौना, लोग पत्थर मारेंगे’ – बॉलीवुड एक्ट्रेस

जम्मू-कश्मीर पर नरेंद्र मोदी सरकार के ऐतिहासिक फैसले का कॉन्ग्रेस, राजद समेत विपक्ष की कई पार्टियाँ विरोध कर रही हैं। मगर साथ ही सरकार को लोगों का समर्थन भी मिल रहा है। सोशल मीडिया पर जमकर इस विषय पर चर्चा हो रही हैl इसे लेकर कई कलाकार सोशल मीडिया पर अपनी प्रतिक्रिया जाहिर कर रहे हैं। लोग प्रधानमंत्री को मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को ऐसा करने पर आभार व्यक्त कर रहे हैं।

सामाजिक मुद्दों पर बेबाकी से अपनी राय रखने वाली अभिनेत्री पायल रोहतगी ने ट्विटर पर पोस्ट करते हुए पीएम मोदी को बधाई दी है। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने ऐसा कर इतिहास रच दिया है। महान दलित नेता जो कि हमारे देश के राष्ट्रपति हैं, उन्होंने ये काम किया है। इस बारे में बात करते हुए पायल ने पीएम मोदी, गृह मंत्री अमित शाह और राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को शुक्रिया कहा। वहीं बीजेपी को वोट कर सत्ता में लाने वाले देशवासियों को धन्यवाद कहा।

इसके साथ ही पायल ने गुलाम नबी आजाद के द्वारा इस संदर्भ में किए गए ट्वीट को आड़े हाथों लेते हुए सोशल मीडिया पर एक ट्वीट किया हैl इसमें उन्होंने गुलाम नबी आजाद को पाकिस्तानी आतंकवादी से ज्यादा घिनौना बताया हैl उन्होंने गुलाम नबी आजाद के बयान को बकवास बताते हुए कहा कि अगर वो अनुच्छेद 370 में किए गए परिवर्तन पर इस तरह से बकवास करेंगे तो लोग उनके घर पर पत्थर फेंकने लगेंगे।

बता दें कि जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस के सीनियर लीडर गुलाम नबी आजाद ने कहा कि आज का दिन भारतीय इतिहास का काला दिन है। बीजेपी की सरकार ने सत्ता के नशे में और वोट हासिल करने के लिए एक झटके में अनुच्छेद 370 के साथ 35A को खत्म कर दिया। इसके साथ खिलवाड़ कर यह बहुत बड़ी गद्दारी कर रहे हैं।

गुलाम नबी आजाद ने कहा कि कानून से जुड़ाव नहीं होता है, जुड़ाव दिल से होता है। जिसका डर लोगों को था, आज वही किया गया है। ये देश के इतिहास के लिए काला दिन है। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर के इतिहास की शुरुआत वहाँ के प्रधानमंत्री के साथ हुई थी, लेकिन अब उसे लेफ्टिनेंट गवर्नर पर लाकर खत्म कर दिया है, ताकि वो चपरासी की नियुक्ति भी खुद कर सकें।

मुफ़्ती-अब्दुल्ला दोनों को लिया गया हिरासत में, महबूबा को ले जाया गया VIP गेस्ट हाउस हरि निवास

जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की मुखिया महबूबा मुफ़्ती को गिरफ्तार कर लिया गया है। उनके साथ ही कश्मीर की दूसरी बड़ी मुख्यधारा की पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता और पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी हिरासत में ले लिए गए हैं। दोनों नेताओं की गिरफ़्तारी जम्मू-कश्मीर के पूर्ण राज्य से केंद्र-शासित प्रदेश बनने और अनुच्छेद 35 A के हटाए जाने के बाद की गई है।

पहले ही घर में नज़रबंद चल रहीं महबूबा मुफ़्ती को उनके घर से VIP गेस्ट हाउस हरि निवास ले जाया गया है। महबूबा मुफ़्ती ने 370/35A के न केवल पक्ष में बयान दिए थे, बल्कि उन्होंने देश-विरोधी और लोगों को भड़काने वालीं कई बातें ट्वीट भी कीं। मसलन उन्होंने जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय को न केवल अमान्य करार दिया था, बल्कि भारत को कश्मीर में ‘कब्जा की हुई ताकत’ (occupation force) भी बताया था। उन्होंने कश्मीर को ‘मुस्लिमों का राज्य’ भी बताया था

गौरतलब है कि आज राज्यसभा ने जम्मू-कश्मीर को विधानसभा वाला केंद्र-शासित प्रदेश बनाने और लद्दाख को उससे अलग एक केंद्र-शासित प्रदेश बनाने का बिल पास कराया है। इस बिल पर चर्चा के दौरान केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस बिल को जम्मू-कश्मीर में खूनखराबे के एक लम्बे दौर का अंत करने वाला बताया था।

उनकी गिरफ़्तारी से जुड़ा आदेश भी मीडिया को जारी किया गया है। पत्र में लिखा है कि उनके शब्दों व हरकतों, और राज्य पर उसके पड़ने वाले संभावित असर की आशंका को देखते हुए उन्हें एहतियातन गिरफ्तार किया जा रहा है।

इससे पहले रविवार रात को महबूबा मुफ्ती और उमर अब्दुल्ला को उनके आवास पर नजरबंद कर दिया गया था। उनके अलावा घाटी में अभी भी कई अलगाववादी नेता नजरबंद हैं। नजरबंद नेताओं में सज्जाद लोन समेत कई अलागवादी नेता और राजनीतिक दलों के नेता शामिल हैं। घाटी में पूरी तरह से मोबाइल, लैंडलाइन, ब्रॉडबैंड समेत सभी इंटरनेट सेवा शनिवार रात से ही बंद कर दिए गए थे। वहीं, घाटी में सभी अधिकारियों को सैटेलाइट फोन दिए गए हैं, ताकि आपस में बातचीत होती रहे।

370 का ‘पावर’ ख़त्म: लिबरल ‘महाभारत’ देख लिए तो अब Twitter पर पाकिस्तानियों की हालत देखिए…

जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद-370 के प्रावधान को आज खत्म कर दिया गया। मोदी सरकार के इस फैसले ने जहाँ विपक्ष को बेचैन किया वहीं पाकिस्तान में भी उथल-पुथल मच गई। राजनेताओं से लेकर पाकिस्तान के कलाकार और आम जनता भी इस विषय पर अपना मत रख रहे हैं। इस खबर को पाकिस्तानी मीडिया अपनी हेडलाइनों में ब्रेकिंग बनाकर चला रहा है और जानकारी के मुताबिक वे इस फैसले को गैर-कानूनी और अवैध तक बता रहे हैं।

फैसला आने के बाद पाकिस्तान मीडिया की कवरेज:

डॉन की हेडलाइन– “भारत ने संसद में भारी विरोध के बीच कश्मीर का ख़ास दर्जा ख़त्म करने के लिए प्रस्ताव पेश किया।”

The Dawn का स्क्रीनशॉट औऱ उसमें कश्मीर मुद्दा

द नेशन की हेडलाइन– “भारत सरकार ने अपने संविधान से अनुच्छेद 370 ख़त्म करने का ऐलान किया”
पाकिस्तान टुडे– “अमित शाह के ऐलान के बाद जम्मू-कश्मीर में तनाव फैल गया है।”
द न्यूज़– “पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में भारत के ‘अवैध’ कदम की निंदा करता है”

गौरतलब है इस प्रकार की मीडिया हेडलाइनों के साथ सोशल मीडिया पर अब भी कुछ पाकिस्तानी ‘कश्मीर हमारा है’ का नारा लगा रहे हैं तो वहीं कुछ ऐसे भी है जो इसके लिए पाकिस्तान प्रधानमंत्री से गुहार लगा रहे हैं।

पाकिस्तानी राजनेता,पत्रकार और कलाकारों के कश्मीर मामले पर रिएक्शन

इस मामले पर पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो ने #KashmirBleeds के साथ ट्वीट किया है, वे लिखते हैं, “भारतीय कश्मीर में लोगों पर लगातार अत्याचार हो रहा है। अतिवादी भारतीय सरकार के इरादे साफ़ हैं। कश्मीर में भारत की आक्रामकता के मद्देनज़र राष्ट्रपति को संसद का संयुक्त सत्र तुरंत बुलाना चाहिए।”

वहीं बॉलीवुड से अपनी पहचान बनाने वाली पाकिस्तानी अदाकारा माहिरा खान इस मामले पर लिखती हैं, “क्या हमने पूरी तरह उन चीज़ों को भुला दिया है जिनके बारे में हम बात नहीं करना चाहते हैं? लेकिन ये सिर्फ़ रेत पर खिंची लकीरें नहीं है, ये मासूम लोगों के मारे जाने का सवाल है। जन्नत (कश्मीर) जल रही है और हम ख़ामोशी से रो रहे हैं। “

पाकिस्तान के जाने-माने पत्रकार हामिद मिर भी इस फैसले के बाद भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और संयुक्त राष्ट्र को टैग करते हुए बताते हैं कि भारत सरकार ने अपने संविधान से अनुच्छेद 370 हटाने की कोशिश करके एक जंग छेड़ दी है।

पाकिस्तानी मीडिया न्यूज़ स्रोतों की मानें तो भारत में लिए गए इस बड़े फैसले के बाद पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय कोर्ट में जाने पर विचार कर सकता है। ‘द न्यूज’ अखबार के मुताबिक उनके मुल्क ने कश्मीर मुद्दे पर हमेशा सक्रिय पक्ष रखा है, इसलिए वे इसपर खामोशी नहीं बरत सकते।

पाकिस्तानी आवाम के ट्विटर पर रिएक्शन

इस समय पाकिस्तान की आवाम भी सोशल मीडिया पर जमकर अपना गुस्सा और भड़ास निकाल रही है। आमरा मेहदी नाम की पाकिस्तानी महिला ट्विटर पर लिखती हैं, “जिन्ना साहब माफी, पाकिस्तान के हमारे कथित प्रतिनिधि एक-दूसरे से लड़ाई करने और अपनी संपत्ति बढ़ाने में ही व्यस्त रह गए। आपका कश्मीर चला गया।”

जबकि नवीद नाम के दूसरे यूजर की मानें तो अब कश्मीर में हर शख्स अत्याचारी भारत के ख़िालफ़ उठ खड़ा होगा। यह कश्मीर की आजादी की शुरुआत भर है।

वकास अहमद कहते हैं कि मुस्लिम दुनिया को पंथ से ऊपर उठते हुए एक होना चाहिए और भारत पर कश्मीर में नरसंहार करने से रोकने के लिए दबाव बनाना चाहिए।

एक यूजर ने तो संयुक्त राष्ट्र पर सवाल उठाते हुए कहा, “मुस्लिम देशों के मंच ओआईसी और यूएन(संयुक्त राष्ट्र) जिस उद्देश्य से अस्तित्व में आए, वे कभी पूरे नहीं हुए।” इस यूजर के मुताबिर संयुक्त राष्ट्र अपना वादा नहीं निभा पाया। कश्मीर मुद्दे के न सुलझने के पीछे इस यूजर ने यूएन की नाकामी बताया और कहा अब उसे यूएन से कोई उम्मीद नहीं है।

कैप्टन मिर्जा नाम के यूजर ने तो सोशल मीडिया पर गुहार लगाई है कि उन्हें अब भारतीय प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए और एक यूजर ने तो इमरान खान को टैग करते हुए ‘कुछ’ करने को कहा है। साथ ही कहा है कि अभी पता चलेगा कि इमरान खान रियल हैं या नहीं।

वहीं, उर्वा लिखती हैं, संयुक्त राष्ट्र अस्तित्व में ही क्यों है? कश्मीर विवादित मुद्दा रहा है और हाल ही में ट्रंप ने भी इसके बारे में बात की थी, लेकिन संयुक्त राष्ट्र और ओआईसी को क्या हो गया है?

एक यूजर लिखते हैं कि अगर यूएन पाकिस्तान की समस्या नहीं सुलझा सकता तो पाकिस्तान को यूएन छोड़ देना चाहिए।

बता दें ऊपर लगाए गए सभी ट्वीट और 370 अनुच्छेद हटने के बाद आए रिएक्शन इस बात का सबूत है कि जिस अनुच्छेद के अस्त्तिव में होने से कश्मीर का विकास रुका हुआ था, उसके समर्थक भारत से लेकर पाकिस्तान में बैठे हुए थे। अब चूँकि केंद्र सरकार ने इस समस्या का निवारण कर दिया है तो उन सभी लोगों का दर्द छलक रहा है जो कश्मीर को पत्थरबाजों का कश्मीर बने रहने देना चाहते थे, जो चाहते थे कि कश्मीरी पंडितो को कभी न्याय न मिले। जिनका उद्देश्य था कि कश्मीर के नाम पर और भी लड़ाईयाँ सालों साल तक चलती रहें।

‘दिल पर पत्थर रख कर समर्थन कर रहे हो ना बौने’ – कुमार विश्वास ने केजरीवाल पर कसा तंज!

कश्मीर पर मोदी सरकार के ऐतिहासिक फैसले को देश भर में समर्थन मिल रहा है। हालाँकि, कुछ लोग इस फैसले का विरोध भी कर रहे हैं, मगर ज्यादातर लोग इस फैसले का समर्थन करते ही नजर आ रहे है। इनमें दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल समेत मोदी सरकार के कई विरोधी भी शामिल है। अरविंद केजरीवाल ने मोदी सरकार के फैसले पर ट्वीट करते हुए लिखा कि जम्मू-कश्मीर पर सरकार द्वारा लिए गए इस फैसले का वो पूरी तरह से समर्थन करते हैं और उम्मीद करते हैं कि ये फैसला राज्य में शांति और विकास लाएगा।

सीएम के इस ट्वीट को यूजर ने आड़े हाथों लिया। आम आदमी पार्टी के पूर्व नेता और कवि कुमार विश्वास ने अरविंद केजरीवाल का नाम लिए बिना ट्वीट किया, “दिल पर चट्टान रख कर ट्वीट कर रहे हो ना बौने? हमने जब सेना के समर्थन में वीडियो बनाया तब तो अपने घर पर पालित अमानती कुत्तों से हमको घेर कर मारने की कह रहे थे,अब क्या हुआ? चादर फटी तो प्रसाद लूटने आ गए सबूत माँगने वाले? इतिहास का कूड़ेदान हर दग़ाबाज़ देशद्रोही की प्रतीक्षा में है।”

कुमार विश्वास के ट्वीट पर एक यूजर ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि केजरीवाल दिल्ली को पूर्णराज्य बनाने की माँग कर रहे थे और मोदी जी ने एक और केंद्र शासित प्रदेश खड़ा कर दिया।

इसके साथ ही उन्होंने एक और ट्वीट में लिखा, “अपनी यूनियन टैरिटरी को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के असंभव ख्वाब देखने वाले आत्ममुग्ध बौने को भी एक पूर्ण राज्य के यूनियन टैरिटरी में बदलने के प्रस्ताव का समर्थन करना पड़ रहा है, इसी को ‘खुदाई-जूता’ कहते हैं जो लगता भी है और रोने भी नहीं देता। चलो जलेबी खाओ।”