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अर्बन नक्सल गौतम नवलखा के हिजबुल और कश्मीरी अलगाववादियों से सीधे संबंध: महाराष्ट्र सरकार

भीमा कोरेगाँव केस में आरोपित अर्बन नक्सल गौतम नवलखा के सम्बन्ध में एक और खुलासा हुआ है। पुणे पुलिस ने अपनी रिपोर्ट में बुधवार को बॉम्बे हाईकोर्ट के सामने यह दावा किया कि गौतम नवलखा हिज्बुल मुजाहिद्दीन और कई कश्मीरी अलगाववादियों के संपर्क में था। जस्टिस रंजीत मोरे और जस्टिस भारती डोंगरे की बेंच ने हालाँकि, नवलखा की गिरफ्तारी पर लगी रोक अगले आदेश तक बढ़ा दी है।

इस मामले में सुनवाई गुरुवार को को भी जारी रहेगी। राज्य सरकार की तरफ से वकील अरुणा पई ने कोर्ट में पुणे पुलिस की चार्जशीट के आधार बताया, “भीमा कोरेगाँव की जाँच में यह निकल कर आया है कि पाकिस्तान के आतंकी संगठन के जरिए माओवादियों को हथियार सप्लाई करवाए गए थे।”

बता दें कि 31 दिसंबर, 2017 को पुणे में एलगार परिषद सम्मेलन आयोजित किया था। इसमें भड़काऊ भाषण दिए गए थे जिसके अगले दिन पुणे के भीमा कोरेगाँव में हिंसा हुई थी। इसके बाद FIR दर्ज की गई थी और 28 अगस्त, 2018 को पुलिस ने छापेमारी कर कई वामपंथी अर्बन नक्सलियों को गिरफ्तार किया था। हिरासत में जिनको लिया गया था उनमें से एक गौतम नवलखा भी थे।

गौरतलब है कि अर्बन नक्सल केस के आरोपी गौतम नवलखा ने हाईकोर्ट में याचिका डालकर उन पर दर्ज हुए मामले को खत्म करने की अपील की थी। मुम्बई हाईकोर्ट ने इस पर राज्य सरकार से अपना पक्ष रखने को कहा था।

राज्य सरकार की तरफ से वकील अरुणा पई ने कहा कि भीमा कोरेगाँव की जाँच के दौरान पुणे पुलिस को आरोपी रोना विल्सन और सुरेंद्र गण्डलिक के लैपटॉप से कुछ अहम दस्तावेज मिले हैं। इनसे पता चलता है कि गौतम नवलखा और कुछ नक्सल समूह साल 2011 से ही पाकिस्तानी आंतकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन से सपर्क में थे। इसके अलावा साल 2011 से 2014 के बीच मे गौतम नवलखा कश्मीर के अलगाववादी नेता सैय्यद अली शाह गिलानी और शकील बख्शी से भी सम्पर्क में थे।

बता दें कि माओवादियों के साथ संबंधों को लेकर पुणे पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए जाने पर गौतम नवलखा ने सरकार पर आरोप लगाया था। नवलखा का कहना था कि उनके खिलाफ दर्ज मामला सत्ता खासतौर से मोदी के विरोधियों को निशाना बनाने के लिए सरकार की राजनीतिक चाल है।

हालाँकि, बाद में नवलखा को कोर्ट की तरफ अंतरिम जमानत दे दी गई थी। लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट द्वारा गौतम नवलखा को गिरफ्तारी से दी गई अंतरिम छूट का महाराष्ट्र सरकार लगातार विरोध करती रही है।

सोनभद्र खूनी संघर्ष को भुनाने की फ़िराक़ में नक्सली, IB अलर्ट

सोनभद्र के उम्भा गाँव में जमीनी विवाद को लेकर हुए खूनी संघर्ष के बाद सूबे में नक्सलियों के सक्रिय होने की आशंका जताई जा रही है। मीडिया खबरों की मानें तो केंद्रीय खुफिया एजेंसी को मिले इनपुट के अनुसार छत्तीसगढ़ के बस्तर से नक्सलियों की एक थिंक टीम सोनभद्र के आस-पास सक्रिय हुई है, जिसकी सूचना मिलते ही इंटेलिजेंस ब्यूरो की एक टीम सोनभद्र में अपना डेरा जमा लिया। साथ ही यूपी एटीएस भी इलाके में सक्रिय हो गई है।

दरअसल, खूफिया एजेंसी को मिले इनपुट के आधार पर मालूम चला है कि नक्सलियों की एक टीम घटनास्थल के आस-पास के कई गाँवों में ग्रामीणों से संपर्क कर रही है। इतना ही नहीं, उम्भा गाँव में हुए खूनी संघर्ष के बाद आईबी को कई युवाओं के अंडरग्राउंड होने की भी सूचना मिली है। ऐसे में खूफिया एजेंसी को डर है कि अगर संवेदनाओं का फायदा उठाकर बस्तर के नक्सली यहाँ पहुँचते हैं तो किसी बड़ी वारदात को अंजाम दे सकते हैं।

बता दें आदिवासी बहुल उम्भा गाँव लंबे समय से नक्सल प्रभावित रहा है। 1996 से लेकर 2012 तक ये गाँव नक्सल आंदोलन का शिकार रहा। लेकिन 17 जुलाई जैसी घटना यहाँ उस समय में भी नहीं हुई थी। 17 जुलाई से पहले इस इलाके को शांत माना जाता था लेकिन अब खूफिया एजेंसी को डर है कि नक्सली गाँव वालों की संवेदना को हथियार बनाकर यहाँ अपने पैर पसारने की कोशिश कर सकते हैं।

इस पूरे मामले के मद्देनजर खुफिया एजेंसी उम्भा गाँव में होने वाली गतिविधियों पर नजर बनाए हुए है। इसके अलावा एजेंसी नक्सलियों को चिह्नित करने की कोशिशों में भी जुटी हुई है। साथ ही, आईबी की रडार पर इस समय संचार व्यवस्था से जुड़े वे लोग भी हैं जो नक्सल विचारधारा से जुड़े हैं।

बदले की भावना से ग्रस्त केजरीवाल काम नहीं करने दे रहे हैं जी: अलका लांबा

दिल्ली के चाँदनी चौक से आप विधायक अलका लांबा ने बुधवार (जुलाई 24, 2019) को अपनी पार्टी के संयोजक और दिल्ली मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर हैरान करने वाले आरोप लगाए हैं। अलका लांबा ने दावा किया है कि केजरीवाल उनसे बदला लेने के लिए उन्हें उनके निर्वाचन क्षेत्र में सीसीटीवी लगाने से रोक रहे हैं।

आप विधायक द्वारा यह जानकारी ट्वीट के जरिए दी गई। अपने ट्वीट में उन्होंने लिखा, “दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अब बदले की भावना से काम कर रहे हैं, जिसका खमियाजा चाँदनी चौक विधानसभा क्षेत्र की जनता को उठाना पड़ रहा है, मेरे द्वारा इलाके में लगवाए जा रहे CCTVs के काम को रुकवाकर AAP* यह कैसी राजनीति करने का उदाहरण पेश करना चाहती है?”

इसके बाद अलका लांबा ने एक और ट्वीट किया और आम आदमी पार्टी को धमकी दी कि वे अपने लोगों की सुरक्षा के लिए सरकार से लड़ने से नहीं डरती हैं। वे लिखती हैं, “मैं अपनी जनता को आप* की द्वेष की राजनीति का शिकार नही होने दूँगी, अपनी जनता के हक़ और सुरक्षा के लिए सरकार के दरवाजे पर भी जाकर लड़ना पड़ेगा तो मैं लड़ूँगी, जनता को जवाब तो देना ही होगा कि क्यों आप के द्वारा CCTVs लगाने का काम रुकवाया गया है? आप में और दूसरों में कोई अंतर नही रहा।”

गौरतलब है कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब अलका लांबा ने अरविंद केजरीवाल के प्रति अपनी नाराजगी जगजाहिर की हो। कुछ समय पहले भी लांबा ने कहा था कि दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने उन्हें ट्विटर पर अनफॉलो कर दिया है और ‘आप’ के ऑफिशियल वॉह्ट्स एप ग्रुप से भी रिमूव कर दिया है। इतना ही नहीं, उनका आरोप था कि केजरीवाल लगातार उन्हें लगातार नजरअंदाज कर रहे हैं। उन्होंने चाँदनी चौक में एक परियोजना का शिलान्यास कार्यक्रम पर न बुलाए जाने पर भी नाराजगी जताई थी

मुखर्जी नगर मामला: सिख ड्राइवर से मारपीट में डेप्यूटी कमिश्नर ने किया 2 सिपाहियों को बर्खास्त

दिल्ली के मुखर्जी नगर इलाके में सिख ड्राइवर और कॉन्सटेबल के बीच हुई हाथापाई में पुलिस प्रशासन द्वारा 2 सिपाही नौकरी से बर्खास्त कर दिए गए है। पुष्पेंन्द्र शेखावत और सत्य प्रकाश नाम के इन दो सिपाहियों को नौकरी से 6 महीने के लिए निकाला गया है।

मामले में दिल्ली प्रशासन द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि ऐसे कृत्यों से पुलिस खासकर दिल्ली पुलिस मेट्रोपॉलिटन फोर्स की छवि खराब होती है, जिससे लोगों को काफी उम्मीदें हैं। पूरे घटनाक्रम को ध्यान में रखते हुए डेप्युटी कमिश्नर राकेश कुमार (फर्स्ट बटालियन, डीएपी) ने कॉन्स्टेबल पुष्पेंदर शेखावत और कॉन्स्टेबल सत्य प्रकाश को तत्काल प्रभाव से नौकरी से हटा दिया है।

हालाँकि, बता दें कि इस मामले में घटना के बाद ही तीन पुलिसकर्मियों को निलंबित किया जा चुका था, लेकिन बाद की जाँच में पुष्पेंद्र शेखावत और कांस्टेबल सत्यप्रकाश को गलती के लिए जिम्मेदार माना गया। और फिर दोनों को बर्खास्त करने का फैसला लिया गया।

गौरतलब है पिछले महीने दिल्ली के मुखर्जीनगर इलाके में 16 जून को हुई इस घटना का वीडियो वायरल होने के बाद मामले ने खूब तूल पकड़ा था। एक ओर जहाँ सिख ड्राइवर के आक्रामक रवैये को देखकर सोशल मीडिया पर लोगों ने ड्राइवर पर सवाल उठाए थे तो वहीं पुलिस द्वारा की गई प्रतिक्रिया पर भी सियासी घमासान हुआ था। जाँच में दिल्ली पुलिस ने दोनो पक्षों को दोषी पाया था।

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने भी इस घटना की निंदा करते हुए इसे दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया था। कॉन्ग्रेस और आम आदमी पार्टी ने इस घटना पर भाजपा पर जमकर निशाना साधा था। इस दौरान ड्राइवर सरबजीत सिंह ने आरोप लगाया था कि 10-12 पुलिस वालों ने उनकी और उनके बेटे की बहुत बुरी तरह पिटाई की और फिर थाने ले गए। जहाँ सरबजीत के मुताबिक फिर उनसे मारपीट की गई।

बता दें इस घटना में सरबजीत पर पुलिस वालों की गाड़ी पर धक्का मारने और उनपर तलवार से हमला करने का आरोप था। इसके अलावा उनके बेटे पर पुलिस पर गाड़ी चढ़ाने की कोशिश भी कैमरे में कैद है। इस घटना के बाद पुलिस ने दावा किया था कि ऑटो ड्राइवर का पहले भी आपराधिक बैकग्राउंड रह चुका है और उसने पहले भी कई बार मारपीट की है। 2006 से अब तक सरबजीत पर तीन बार मारपीट के केस दर्ज हुए हैं। इसके अलावा सरबजीत सिंह पर इसी साल अप्रैल में गुरुद्वारा बंगला साहिब के एक सेवादार ने मारपीट का मामला दर्ज कराया था।

40,000 हिन्दुओं के नरसंहार के लिए मंदिर के प्रसाद में जहर मिलाने की योजना, जाकिर नाइक से था प्रेरित

विवादित इस्लामिक धर्म उपदेशक जाकिर नाइक की बातें सुनकर कुछ आतंकियों ने मुंबई के एक मंदिर के प्रसाद में जहर मिलाने की योजना बनाई थी। आतंकियों का इरादा मंदिर में आने वाले भक्तों का नरसंहार करना था। मुंबई की एक अदालत में दाखिल चार्जशीट के मुताबिक मुंबई स्थित मुम्बेश्वर मंदिर में नरसंहार की कथित योजना बनाने को लेकर महाराष्ट्र से गिरफ्तार आतंकवादी जाकिर नाइक से प्रेरित थे। ये आतंकी ISIS से प्रेरित एक आतंकी समूह ‘उम्मत-ए- मोहम्मदिया’ के सदस्य थे।

जिस दिन इस साजिश को अंजाम देना था, उस दिन मंदिर के महाप्रसाद को 40 हजार से ज्यादा लोगों ने खाया था। दहशतगर्दों की साजिश थी कि महाप्रसाद में जहर मिलाकर बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं की जान ली जा सके। एटीएस ने इस मामले में चार्जशीट दायर करते हुए सभी संदिग्धों की पहचान बताई है, जिनमें से 9 बालिग और 1 संदिग्ध नाबालिग है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, महाराष्ट्र एटीएस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने आरोप पत्र के हवाले से बताया कि समूह की योजना मुम्ब्रा स्थित 400 साल पुराने श्री मुम्बरेश्वर मंदिर के श्रद्धालुओं के प्रसाद में जहर मिला कर उनका नरसंहार करने की थी। ATS ने आरोपितों की सोशल मीडिया प्रोफाइल पर जाकिर नाइक की मौजूदगी वाले कई वीडियो और तस्वीरें पाई हैं। समूह के कुछ सदस्य विदेश स्थित अपने आकाओं से भी संपर्क में थे।

गिरफ्तारी से पहले इस दल में शामिल जम्मान, सलमान, वारिस और फहाद ने हाइड्रोजन पराक्साइड की मदद से विस्फोटकों का निर्माण किया था। दल के मुखिया अबू हमजा और अन्य आरोपितों ने इन विस्फोटकों का ट्रायल किया था और मंदिर परिसर की रेकी भी की थी।

ठाणे की एक पहाड़ी पर लिया था विस्फोट बनाने का प्रशिक्षण

चार्जशीट में कहा गया है कि गिरफ्तार आतंकवादियों ने मंदिर के प्रसाद में जहर मिलाने की कोशिश की थी। इन लोगों ने विस्फोटक और जहर बनाने का भी प्रशिक्षण लिया था और ठाणे जिले में मुंब्रा बाईपास के नजदीक एक पहाड़ी पर विस्फोट का अभ्यास भी किया था। महाराष्ट्र ATS ने उम्मत-ए- मोहम्मदिया समूह के 10 सदस्यों को इस साल जनवरी में राज्य के मुंब्रा और औरंगाबाद से गिरफ्तार किया था। आतंकी संगठन आईएस से उनके कथित तौर पर तार जुड़े हैं। उन्हें गिरफ्तार कर नरसंहार को अंजाम देने की उनकी योजना नाकाम कर दी गई थी।

चार्जशीट के मुताबिक गिरफ्तार आरोपितों में शामिल ताल्हा पोट्रिक ने प्रसाद में जहर मिलाने की कोशिश की थी। एटीएस ने इस समूह के नेतृत्वकर्ता के तौर पर अबू हमजा की पहचान की है।

संगठन ही नहीं, अब व्यक्ति भी घोषित होगा आतंकी, नहीं बचेंगे अर्बन नक्सल, हुआ कानून में बदलाव

बिना किसी संगठन या ढाँचे के अकेले दहशत फ़ैलाने वाले आतंकवादी को भी आतंकवादी घोषित करने वाला गैरकानूनी गतिविधि (निरोधक) संशोधन अधिनियम (UAPA) लोक सभा में पास हो गया है। इसके ज़रिए अब सरकार इस्लामिक स्टेट के इराक-सीरिया में खत्म होने के बाद हिंदुस्तान लौटे संभावित ‘लोन वुल्फ टेररिस्ट’ (अकेले जिहादियों) पर कानूनी नकेल आसानी से कस सकेगी। इस संशोधन के ज़रिए सरकार ने NIA के महानिदेशक को ऐसे लोन-वुल्फ जिहादी की सम्पत्ति मामले की जाँच के दौरान ज़ब्त कर लेने की ताकत प्रदान की है। इस दौरान सरकार की ओर से बहस का नेतृत्व गृह मंत्री और भाजपा प्रमुख अमित शाह ने किया।

कॉन्ग्रेस ने जताई थी ‘संघीय ढाँचे’ वाली आपत्ति

चूँकि NIA को इस संशोधन के ज़रिए संदिग्ध को दहशतगर्द घोषित करने और बिना राज्य पुलिस के मुखिया (डीजीपी या समकक्ष रैंक) से सहमति लिए ऐसे दहशतगर्द घोषित हुए लोगों की सम्पत्ति ज़ब्त करने का अधिकार मिल जाता है, अतः कॉन्ग्रेस इस संशोधन पर संघीय ढाँचे को दरकिनार करने का हवाला दे कर आपत्ति जता रही थी। अमित शाह ने इस पर कॉन्ग्रेस को UAPA कानून कॉन्ग्रेस द्वारा ही पास किए जाने की याद दिलाते हुए आईना दिखाया। कॉन्ग्रेस के सवाल उठाने को आड़े हाथों लेते हुए शाह ने कहा कि जब कॉन्ग्रेस राजग पर सवाल उठाती है तो भूल जाती है कि यह कानून लाया कौन (कॉन्ग्रेस) था और किसने उसे कड़ा बनाया। उन्होंने कहा कि कानून आप (कॉन्ग्रेस) लाए थे, आपने भी सही काम किया और अब हम भी (इसमें संशोधन करके) सही ही कर रहे हैं।

विपक्ष के इस संशोधन के दुरुपयोग की चिंता पर भी शाह ने सदन को आश्वस्त किया कि कानून का इस्तेमाल केवल और केवल आतंकवादियों और आतंक को जड़ से उखाड़ने के लिए ही किया जाएगा

गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में साफ़ किया है उनकी सरकार शहरी नक्सलियों और माओवादियों के प्रति किसी भी मुरौव्वत के मूड में नहीं है। उन्होंने सदन में यह भी बयान दिया कि सच में सामाजिक कार्य कर रहे कार्यकर्ताओं को पकड़ने में पुलिस की कोई रुचि नहीं है।

‘अर्बन नक्सलियों’ पर बहस का हिस्सा

‘अर्बन नक्सली’ या ‘अर्बन माओवादी’ का अर्थ वह शहरी नागरिक हैं, जो शहरी मध्य-वर्ग/उच्च-मध्यम वर्ग (मार्क्सवादी भाषा में ‘बुर्जुआ’, bourgeois) का हिस्सा होते हुए भी वैचारिक, नैतिक-राजनीतिक, और कई बार आर्थिक, समर्थन भारत-विरोधी वाम-चरमपंथी गुटों जैसे नक्सलियों और माओवादियों की ग्रामीण इलाकों में हिंसक गतिविधियों का समर्थन करते हैं। माना जाता है कि यह शब्द फ़िल्मकार विवेक अग्निहोत्री द्वारा प्रचलित किया गया था।

शहरी वाम-चरमपंथियों, और आदिवासी इलाकों में उनके हाथों जनजातियों के उत्पीड़न, को चित्रित करने वाली अग्निहोत्री की फिल्म ‘बुद्धा (बुद्ध) इन अ ट्रैफिक जाम’ की एक ओर वामपंथी धड़े में जहाँ आलोचना होती है, वहीं दूसरी ओर देश के ‘राइट विंग’ में फिल्म को ‘कल्ट स्टेटस’ मिला हुआ है। इस विषय पर जेएनयू में लगाए गए कुख्यात भारत-विरोधी नारों के बाद से कई बार राजनीतिक और सामाजिक बहस हो चुकी है।

चंद्रयान 2 की लैंडिंग साइट का नाम होगा ‘राजीव गाँधी गड्ढा केंद्र’: नरेन्द्र मोदी

इसरो द्वारा चंद्रयान 2 का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण कर लिया गया है और अब उसका चाँद के लिए सफर जारी है। इसके बाद इसरो (ISRO) के वैज्ञानिक इन्तजार कर रहे हैं इसके चन्द्रमा पर सफलतापूर्वक उतरने का। इसी बीच खबर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चंद्रयान 2 के उतरने की जगह (लैंडिंग साइट) का नामकरण कर सकते हैं। इसरो ने बताया है कि उनके पास नामों की एक लिस्ट है जिस पर विचार किया जा रहा है।

शायद आप इस तथ्य को नहीं जानते होंगे कि करीब एक दशक पहले चंद्रयान 1 की लैंडिंग के बाद भारत ने शैकलेटन क्रेटर के पास के एक क्षेत्र को ‘जवाहर पॉइंट’ का नाम दिया था। जाहिर सी बात है, उस वक़्त की सत्तरूढ़ सरकार की हड्डियों में जवाहरलाल नेहरू का नमक जो था।

14 नवंबर 2008 को जब चंद्रयान 1 चंद्रमा पर उतरा था तो उससे पहले इसरो के वैज्ञानिक समेत भारत सरकार के तमाम आला अधिकारियों की बैठक चली कि जिस जगह यान उतरेगा उसका नाम क्या रखा जाए? सोनिया, मनमोहन समेत दिग्विजय और कमलनाथ सरीखे लोगों ने इसरो से महीने भर का समय माँगा। उन्होंने साथ ही इसरो के वैज्ञानिकों से भी कहा कि वो भी नाम सोचें। एक महीने की बैठक के बाद तय हुआ कि उस जगह का नाम ‘जवाहर प्वाइंट’ रखा जाएगा।

अब चंद्रयान 2 के प्रक्षेपण के बाद इसरो के चेयरमैन ने इस बात की पुष्टि की है कि लैंडिंग साइट को नाम देने पर विचार हो रहा है और यान की सफल लैंडिंग के बाद पीएम नरेंद्र मोदी स्वयं इस नाम का ऐलान कर सकते हैं।

ऑपइंडिया तीखीमिर्ची सेल के हाथ कुछ कागजात लगे हैं, जिनसे चंद्रयान 2 के लैंडिंग साइट के नाम का खुलासा हो गया है। सूत्रों का कहना है कि नरेंद्र मोदी जी इस लैंडिंग साइट को ‘राजीव गाँधी गड्ढा केंद्र’ रखने वाले हैं। हालाँकि, इस नाम पर आखिरी मुहर अभी लगनी बाकी है।

दरअसल इस नाम में राजीव गाँधी और कॉन्ग्रेस के अगले संभावित अध्यक्ष राहुल गाँधी जी, दोनों की ही छवि मौजूद है। मोदी जी चाहते थे कि इस नाम में राहुल गाँधी द्वारा देश और भाजपा के लिए किए गए योगदान की झलक रहे इसलिए उनके गालों पर पढ़ने वाले पाताल तोड़ गहरे गड्ढों को अब चाँद पर पहुँचाने का प्रयास किया गया। ऐसा करने से भारत के हर मिशन की सफलता के पहले हकदार और कश्मीर समस्या के जिम्मेदार जवाहरलाल नेहरू जी का भी मान रह जाएगा।

चंद्रयान 2 के चाँद पर उतरने से पहले ही ट्विटर पर रोजाना ‘जवाहरु-हु-अकबर’ के नारे लगाकर पूरा दिन कॉन्सपिरेसी थ्योरी रचने वाले एक कॉन्सपिरेसी थ्योरी एक्टिविस्ट ने एक एक्सक्लूसिव जानकारी साझा की है। चंद्रयान 2 से पहले ही चाँद पर उत्तर चुके इस एक्टिविस्ट का कहना है कि चंद्रयान पर प्रॉपर्टी डीलिंग का बिजनेस बहुत चोखा चल रहा है।

राष्ट्रवादी सरकार के दौरान सोशल मीडिया पर अस्थमा की शिकायत करने वाले एक्टिविस्ट ने जब देश में बढ़ती असहिष्णुता के डर से चाँद पर एक टुकड़ा जमीन लेने के लिए सम्बंधित व्यक्ति से संपर्क किया तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई।

दरअसल, अपनी खोजी प्रवृत्ति से इस एक्टिविस्ट ने पता लगाया है कि चाँद पर जमीन का आधे से ज्यादा हिस्सा किसी भूमि-भक्षी रॉबर्ट ठठेरा के नाम पर पहले से ही रजिस्टर्ड है। सबसे बड़ी हैरानी की बात यह थी कि रॉबर्ट ठठेरा कोई एलियन नहीं बल्कि मनुष्य निकले।

स्टूडियो पर ही चन्द्रमा का वातावरण बनाकर चन्द्रमा से ही लाइव रिपोर्टिंग कर रही ‘खाज तक’ न्यूज़ की एक एंकर से रॉबर्ट ठठेरा ने बात करते हुए कहा कि उसके जीवन का अब एक ही मकसद है और वो है ब्रह्माण्ड पर कब्ज़ा। साथ ही श्री ठठेरा जी ने कहा कि वो इस सम्बन्ध में श्री थानोस जी से बातचीत कर रहे हैं। अपनी महत्वकांक्षी प्रवृत्ति के बारे में बात करते हुए रॉबर्ट ठठेरा ने बताया कि उन्हें यह शक्ति जवाहर लाल नेहरू के आशीर्वाद से प्राप्त हुई है कि वो भूमि के जिस भाग पर भी अपनी नजर दौड़ाते हैं, वो तुरंत उनके नाम हो जाती है।

लेकिन, चन्द्रमा पर जमीन खरीदने की बात सुनते ही रॉबर्ट ठठेरा को गुस्सा आ गया और उसने टीवी एंकर को ‘देख लेने’ की धमकी दे डाली। इसका कारण पूछने पर उन्होंने जवाब दिया कि जिस तरह से कॉन्ग्रेस लगातार हार पर हार झेल रही है, लगता नहीं है कि पृथ्वी पर उनके छुपने लायक कोई जगह बाकी बच जाएगी। यही वजह है कि वो 2024 के बाद अपने सारे परिवार, जिसमें उसका साला, साले की बहन और सासू जी भी शामिल हैं, को लेकर चन्द्रमा पर जाने की तैयारियाँ कर रहा है।

हालाँकि, उनके इस बयान पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने आश्वासन दिलाया है कि यदि वाकई में किसीको चाँद पर जमीन लेनी हो, तो वो बीच में मध्यस्थता करने के लिए तैयार हैं।

अकबरुद्दीन ओवैसी, दर्द उठा है तो अलीगढ़ के हकीम के पास जाओ, ये 2019 है

पुरानी फिल्म में एक संवाद है कि ‘भैंस पूँछ उठाएगी तो गाना नहीं गाएगी, गोबर ही करेगी’। ओवैसी नाम के दो लोग हैं, जो राष्ट्रीय परिदृश्य में काफी चर्चित रहते हैं। ये दोनों आपस में गुड ओवैसी-बैड ओवैसी करते रहते हैं। एक भाई मुँह से विष्ठा करता है, दूसरा अपनी छवि समझदारों वाली बनाए घूमता है। लेकिन ऐसा है नहीं, दोनों ही ज़हरीले हैं।

अकबरुद्दीन और असदुद्दीन नाम हैं इनके। पूरी पहचान मजहब विशेष के तथाकथित हक की राजनीति को लेकर है जिसमें इन्हें लगता है कि इनके मजहब वाले इस देश के नागरिक मात्र नहीं हैं, बल्कि कुछ और ही हैं और उन्हें उनका हक नहीं दिया जा रहा। और वो हक क्या है? ‘पंद्रह मिनट के लिए पुलिस को हटा दो’ फिर हम अदरक कर देंगे, लहसुन कर देंगे।

आज फिर एक विडियो घूम रहा है जिसमें अकबरुद्दीन बता रहा है कि उसके 15 मिनट वाले बयान को लेकर लोग अभी तक दहशत में हैं। इसीलिए मॉब लिंचिंग करने वाले और आरएसएस वाले उससे डरते हैं। उसने कहा कि मजहब वालों को शेर बनना होगा, ताकि कोई ‘चायवाला’ उनके सामने खड़ा न हो सके। छुटभैये ओवैसी ने इस्लामी भीड़ से कहा कि उन्हें डरने वाला नहीं, डराने वाला बनना चाहिए।

जाहिर है कि ऐसे मौकों पर भारत के लिबरपंथी और स्वयं को लेनिन-माओ की क्रॉसब्रीड बताने को लालायित कामभक्त वामपंथी अभी या तो गालिब की शायरी करने में मशगूल हैं या मोदी को चिट्ठियाँ लिख कर बता रहे हैं कि ‘जय श्री राम’ तो युद्धघोष बन चुका है। अब इनको ये कौन बताए कि ये तो युद्धघोष हनुमान के समय से है जब वो लंका पर कूद गए थे। साथ ही, संदर्भ सही हो तो ये अभिवादन भी है। वर्साटाइल नारा है। एक नारा और भी बहुत वर्साटाइल है लेकिन वो युद्धघोष नहीं, कामांध आतंकियों के लिए किसी आकाशी वेश्यालय तक पहुँचने का पासवर्ड है। लेकिन उस पर किसी ने चिट्ठी नहीं लिखी।

खैर, रिंकलफ्री शेरवानी पहन कर, भीड़ को उन्मादी और दंगाई बनाने को आतुर ओवैसी यह भूल गया है कि ये 2012 नहीं है, न ही ‘इस देश के संसाधनों पर पहला हक मुस्लिमों का होना चाहिए’ कहने वाली सरकार है। शायद कॉन्ग्रेसियों के इसी बयान को ओवैसी जैसे चिरकुट ने ये सोचा कि पुलिस भी तो संसाधन ही है, और उस पर पहला हक समुदाय विशेष का है तो उसे हटा दिया जाए।

डरा हुआ शांतिप्रिय बनाम डराने वाला शांतिप्रिय

अब बात यह है कि ओवैसी पहले तो यह डिसाइड कर ले कि देश का ‘शांतिप्रिय’ डरा हुआ है या वो पंद्रह मिनट में हिन्दुओं को खत्म करने के लिए तैयार है। क्योंकि उसके भाई समेत कई ‘शांतिप्रिय’ नेता आज कल डरा हुआ ‘शांतिप्रिय’ वाला ही कोरस गा रहे हैं। ये बात और है कि जिस हिसाब से उनके द्वारा किए गए बलात्कारों, मंदिरों को तोड़ने, झूठ बोल कर ‘जय श्री राम’ का एंगल डालने, तलाक देकर भाई/बाप/मामा/जीजा आदि के साथ सो कर हलाला करवाने आदि की खबरें आ रही हैं, उससे ये डरे तो बिलकुल नहीं लग रहे। मजहब विशेष के तीन लोग किसी के घर के आगे गाँजा पीता है, मना करने पर उसको चाकुओं से गोद देते हैं। डरे हुए तो नहीं लगते। काँवड़ियों का अपने इलाके से गुजरने का इंतजार करते हैं और रात के एक बजे उन पर पत्थर फेंकते हैं। ये डरे हुए तो नहीं लगते।

दूसरी बात यह भी है कि ओवैसी को बैठ कर यह सोचना चाहिए कि 2012 से 2019 में ऐसा क्या बदल गया कि पंद्रह मिनट में हिन्दुओं का सफाया करने वाला ओवैसी इस्लामी भीड़ को कह रहा है कि उनमें शहादत का जज्बा होना चाहिए। आखिर इशारा कहाँ है? क्या ओवैसी चाहता है कि उसके सामने बैठे ‘शांतिप्रिय’, और उसको सुन कर स्खलित होने वाले ‘शांतिप्रिय’, भारतीय सेनाओं में जाएँ और राष्ट्र के लिए शहादत दें? क्या ओवैसी जब इस्लामी भीड़ से कहता है कि वो डराने वाले बनें तो उसका मतलब इससे है कि सुनने वाले मजहबी लोग पाकिस्तानियों को, या देश-समाज के दुश्मनों को डराने वाले बनें?

शहादत का जज्बा यानी मर मिटने की चाहत रखना। ऐसा जज्बा इस्लामी आतंकियों में खूब देखा गया है। वो बस इसलिए देह पर बम बाँध कर अपनी बम-बिरयानी बनवा लेते हैं क्योंकि किसी ने कहा है कि ऊपर बहत्तर हूरें बुर्का पहने इंतज़ार कर रही होंगी। यही तो वो जज्बा है कि अपने लक्ष्य को पूरा करने के लिए मर मिटना है। आखिर ओवैसी इन लोगों को शहादत के लिए क्यों तैयार कर रहे हैं? वो भी तब जब भारत के प्रधानमंत्री, जो ओवैसी के समर्थकों के भी प्रधानमंत्री हैं, ‘सबका विश्वास’ जीतने में जी-जान से लगे हैं।

आरएसएस का हौव्वा

चूँकि ओवैसी जैसे दंगाई प्रवृत्ति के लोग बार-बार यह नहीं कह सकते कि हिन्दू तुम्हारा दुश्मन है, इसलिए उन्हें एक विकल्प चाहिए। विकल्प है संघ, जिसके नाम एक भी अपराध नहीं, जिसने कभी भी किसी भी संप्रदाय के खिलाफ कुछ गलत नहीं किया, न कहीं हम फोड़ा, न किसी मार्केट में जा कर ‘जय श्री राम’ कहते हुए फट गया, फिर भी कट्टरपंथियों के लिए एक कॉमन दुश्मन के तौर पर इसे सारे नालायक पेश करते रहे हैं।

चूँकि, इन्होंने एकजुट हो कर, नरेन्द्र मोदी को इस चुनाव में हराने के लिए एड़ी-चोटी का परिश्रम किया लेकिन हुआ कुछ भी नहीं, तो इन्हें चुनने वाले इनकी क्षमता पर सवाल कर रहे हैं कि तुमने तो कहा था कि ये उखाड़ लोगे, और वहाँ से मोदी को भगा दोगे। न्यूज वाले भी इनको भाव नहीं दे रहे, तो इनके नुमाइंदे टिकटॉक से लेकर गलियों के जलसों में पागल कुत्तों की तरह भौंक रहे हैं।

लेकिन भौंकने के लिए एक भागती हुई कार तो चाहिए। आरएसएस वही भागती हुई, चमचमाती कार है जिसे देख कर ये भौंकते हैं क्योंकि इनका एक भी संगठन इस तरह का नहीं बन पाया जो कि अपनी राष्ट्रवादी विचारधारा को सत्ता तक पहुँचा दे। इनके संगठन बड़ी पार्टियों द्वारा फेंकी गई हड्डियाँ चूसते रहे और अपने समर्थकों को ठगते रहे कि तुम्हारे लिए शहद की नदियाँ बहाने के लिए फंड इकट्ठा हो रहा है। परिणामतः मजहबी नेता रिंकलफ्री शेरवानी पहन कर घूम रहे हैं, और उनके समर्थक ‘नारा ए तदबीर अल्लाहु अकबर’ चिल्ला कर खुश हैं कि उनका मसीहा अब पर्वत को जला कर राख कर देगा। जबकि वो वास्तव में है चिरकुट।

कट्टरपंथियों का आइटम गर्ल है ओवैसी

जैसे फिल्मों में आइटम सॉन्ग हुआ करते थे और उनके आधार पर उनकी मार्केटिंग हुआ करती थी, और अब उन आइटम सॉन्ग्स में भी रीमिक्स का ही सहारा लिया जा रहा है तो ओवैसी का भी कुछ ऐसा ही है। नया है नहीं कुछ कहने को। घर की औरतें भी बुर्का पहन कर मोदी को वोट दे आती हैं, तो बेचारा भीतर से दुखी है।

ऐसे दुखी आदमी की भी जलसों में बुकिंग हो रखी होती है तो निजी दर्द को दरकिनार करते हुए माइक पर बोलना पड़ता है। ओवैसी का हाल उस बच्चे की तरह है जिसे उसका बाप मेहमानों के सामने सीधा ला कर खड़ा देता है और कहता है कि ‘अंकल को वो वाला पोएम सुना दो’। बच्चे को भी रटा हुआ रहता है, उसको पता है कि पिछले बार जो अंकल और आंटी आए थे किस लाइन पर ‘अरे वाह बेटा’ बोले थे, तो वो उस लाइन पर ज़ोर देता है।

ओवैसी को भीतर से पता है कि वो एक टुच्चा आदमी है जिसके विचार टुटपुँजिया हैं लेकिन इस देश में ऐसे लोगों के सामने भी, पंजो पर नितम्ब टिकाए लोग घुटनों पर हाथ रख कर ताली पीटने को बेकरार रहते हैं। उसे याद है कि ‘पंद्रह मिनट’ बोल कर वो अपने जेहनी बवासीर के दर्द से बिना चीर-फाड़ कराए, या अलीगढ़ के लाल कुआँ वाले हकीम के पास बिना जाए ही निजात पा सकता है। इसलिए वो बोलता है और उसके समर्थकों का भी दर्द थोड़ी देर के लिए शांत हो जाता है जो मई की 23 तारीख की सुबह से दोबारा शुरु हुआ है।

इसलिए, मेरी सलाह तो यही रहेगी कि भीड़ के सामने से हिन्दुओं के सफाए की धमकी देने वाले ओवैसी को अपनी स्पीच का प्रिंटआउट निकाल कर ठीक से पढ़ना चाहिए, फिर उसे सिलिंड्रिकल शेप में मोड़ कर स्थान विशेष में छुपा कर रख लेना चाहिए क्योंकि ये 2019 है।

अजब-गजब: केरल में कुतिया को ‘अवैध’ संबंध के लिए घर से निकाला

केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में एक कुतिया को मालिक ने पड़ोसी के कुत्ते के साथ ‘अवैध संबंध’ के लिए घर से निकाल दिया। लगभग तीन साल की सफ़ेद कुतिया पॉमेरेनियन नस्ल की है और शहर के चकई स्थित वर्ल्ड मार्केट में घूमती मिली। उसका मालिक कौन है यह पता नहीं चल पाया है।

चिट्ठी से हुआ खुलासा

कुतिया की कॉलर में लटकी चिट्ठी से पूरे मामले का खुलासा हुआ है। उसे छोड़ने वाले मालिक ने चिट्ठी में बताया है, “वह बहुत अच्छी है, केवल भौंकती है, तीन साल में किसी को कभी काटा नहीं, ज़्यादा खाना नहीं खिलाना पड़ता- आम तौर पर दूध, बिस्कुट और अण्डों से काम चल जाता है। अब हमने इसे निकाल दिया है, क्योंकि इसके पड़ोस के कुत्ते से अवैध संबंध थे।”

जानवरों के लिए काम करने वाले NGO पीपल फॉर एनिमल्स की शमीन फारूखी ने मीडिया को बताया कि फ़िलहाल कुतिया को उन्होंने अपने घर में रख लिया है। उन्हें उम्मीद है कि उसे गोद लेने वाला कोई मिल जाएगा। हालाँकि कुतिया के चेहरे पर उम्मीद के भाव ऐसे हैं जैसे मालिक उसे लेने आता ही होगा।

‘कुत्ते ऐसा ही करते हैं’

शमीम ने कहा कि कुत्ते अपने प्रजनन काल में यौन संबंध बनाते ही हैं- यही उनकी प्रकृति है। अगर मालिक को उसके बच्चे/पिल्ले नहीं चाहिए थे तो वह कुतिया की नसबंदी करा सकता था। यदि उसे अपनी कुतिया को ‘कुँवारी’ ही रखना था तो उसे घर में बंद रखने के सिवाय और कोई दूसरा रास्ता नहीं होता। शमीम के अनुसार उन्होंने घायल, बीमार वगैरह कुत्तों को छोड़े जाते तो देखा है, लेकिन ‘अवैध संबंध’ के कारण छोड़े गए कुत्ते का यह पहला मामला है।

शहरी नक्सलियों से जीरो सहानुभूति, कॉन्ग्रेस ने कानून लाकर अच्छा काम किया: अमित शाह

गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में साफ़ किया है उनकी सरकार शहरी नक्सलियों और माओवादियों के प्रति किसी भी मुरौव्वत के मूड में नहीं है। उन्होंने सदन में यह भी बयान दिया कि सच में सामाजिक कार्य कर रहे कार्यकर्ताओं को पकड़ने में पुलिस की कोई रुचि नहीं है।

‘अर्बन नक्सलियों’ पर बहस का हिस्सा

‘अर्बन नक्सली’ या अर्बन माओवादी’ का अर्थ वह शहरी नागरिक हैं, जो शहरी मध्य-वर्ग/उच्च-मध्यम वर्ग (मार्क्सवादी भाषा में ‘बुर्जुआ’, burgeoise) का हिस्सा होते हुए भी वैचारिक, नैतिक-राजनीतिक, और कई बार आर्थिक, समर्थन भारत-विरोधी वाम-चरमपंथी गुटों जैसे नक्सलियों और माओवादियों की ग्रामीण इलाकों में हिंसक गतिविधियों का समर्थन करते हैं। माना जाता है कि यह शब्द फ़िल्मकार विवेक अग्निहोत्री द्वारा प्रचलित किया गया था। शहरी वाम-चरमपंथियों, और आदिवासी इलाकों में उनके हाथों जनजातियों के उत्पीड़न, को चित्रित करने वाली अग्निहोत्री की फिल्म ‘बुद्धा (बुद्ध) इन अ ट्रैफिक जाम’ की एक ओर वामपंथी धड़े में जहाँ आलोचना होती है, वहीं दूसरी ओर देश के ‘राइट विंग’ में फिल्म को ‘कल्ट स्टेटस’ मिला हुआ है। इस विषय पर जेएनयू में लगाए गए कुख्यात भारत-विरोधी नारों के बाद से कई बार राजनीतिक और सामाजिक बहस हो चुकी है।

‘व्यक्ति को आतंकवादी घोषित करने वाले प्रावधान की ज़रूरत’

गृह मंत्री अमित शाह ने गैरकानूनी गतिविधि (निरोधक) संशोधन अधिनियम (UAPA) पर बहस करते हुए कहा कि देश में एक व्यक्ति को आतंकवादी घोषित करने के प्रावधान की सख्त ज़रूरत है। उन्होंने अपने तर्क के समर्थन में अमेरिका और संयुक्त राष्ट्र से लेकर पाकिस्तान तक के उदाहरण गिनाते हुए बताया कि हर बड़े देश के पास यह कानूनी हथियार है। यह प्रावधान इस्लामिक स्टेट (आईएस) के इराक-सीरिया स्थित केंद्रीयकृत संगठन के उखड़ जाने के बाद उसके आतंकियों के स्वतंत्र टुकड़ों (‘लोन वुल्फ टेररिस्ट’, अकेला जिहादी) के रूप में बिखर जाने की खबरों के प्रकाश में सरकार का एक महत्वपूर्ण कदम है।

‘आपने सही किया था, हम भी सही कर रहे हैं’

UAPA पर कॉन्ग्रेस के सवाल उठाने को आड़े हाथों लेते हुए शाह ने कहा कि जब कॉन्ग्रेस राजग पर सवाल उठाती है तो भूल जाती है कि यह कानून लाया कौन (कॉन्ग्रेस) था और किसने उसे कड़ा बनाया। उन्होंने कहा कि कानून आप (कॉन्ग्रेस) लाए थे, आपने भी सही काम किया और अब हम भी (इसमें संशोधन करके) सही ही कर रहे हैं।