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‘सबका साथ + सबका विकास + सबका विश्वास = विजयी भारत’

सुबह से दर्शाए जा रहे रुझानों से स्पष्ट प्रतीत हो रहा है कि एक बार फिर से मोदी सरकार देश की सत्ता संभालने वाली है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट करके अपनी खुशी को जाहिर किया है। उन्होंने लिखा है, “सबका साथ + सबका विकास + सबका विश्वास = विजयी भारत।” प्रधानमंत्री ने ट्वीट के जरिए देश को संदेश दिया कि हम साथ में बढ़ते हैं। हम साथ में समृद्ध होते हैं। हम मिलकर एक मजबूत और समावेशी भारत का निर्माण करेंगे। भारत फिर से जीता।

भारत में आज जैसा माहौल पाँच साल पहले भी हुआ था। जब भाजपा ने 16वें लोकसभा चुनाव में प्रचंड बहुमत प्राप्त किया था। उस समय भी देश की जनता भाजपा की जीत को लेकर सुनिश्चित थी और परिणाम घोषणा के बाद तो इस जीत को पर्व की तरह मनाया गया था। उस वक्त भी नरेंद्र मोदी ने एक ट्वीट किया था, जिसे ऐतिहासिक पलों में शामिल होने वाला एक सबूत माना गया था। आज के दिन उस ट्वीट को याद दिलाना बहुत जरूरी है। 16 मई 2014 को प्रधानमंत्री ने ट्वीट किया था, “India has won! भारत की विजय। अच्छे दिन आने वाले हैं।”

सोशल मीडिया पर Burnol के उपयोग को लेकर Creative हुए लोग, देखें तस्वीरें

सोशल मीडिया पर एक से बढ़कर एक पोस्ट शेयर किए जा रहे हैं। बरनौल को लेकर तरह-तरह के क्रिएटिव पोस्ट्स और ट्वीट्स शेयर किए जा रहे हैं। जिन लोगों ने मोदी लहर को मानने से अभी भी इनकार कर दिया है, उन्हें आम लोगों द्वारा बरनौल के चित्र भेजे जा रहे हैं। इन चित्रों में बरनौल को ट्रक में भर कर भेजा जा रहा है, तो किसी चित्र में विमान से बरनौल बरसाए जा रहे हैं। आए इस गैलरी में उनमें से चुनिन्दा चित्रों को देखते हैं:

ट्रक में भर-भर कर सोशल मीडिया के माध्यम से बरनौल भेजे जा रहे हैं
लड़ाकू विमानों से बम की जगह गिराए जा रहे हैं बरनौल
बरनौल क्रीम कि जगह स्प्रे का प्रयोग करने के सलाह भी दिए जा रहे है
अब तो शेयर मार्किट में भी बरनौल बनाने वाली कम्पनी के शेयर बढ़ने लगे
बरनौल पर सब्सिडी कि माँग भी की जा रही है

इसी तरह बरनौल एक बार फिर से चर्चा में है। बता दें कि बरनौल का प्रयोग शरीर के जले भागों पर किया जाता है। एक तरफ जहाँ बरनौल के शेयर में उछाल की ख़बरें हैं, ऐसे में भाजपा समर्थकों व आम लोगों के पास मोदी के ख़िलाफ़ ट्वीट करने वालों के लिए एक नया यन्त्र मिल गया है या यूँ कहें कि पुराने यन्त्र का ही नए रूप में प्रयोग किया जा रहा है।

पार्टी की हार बर्दाश्त नहीं कर पाए कॉन्ग्रेस जिलाध्यक्ष, मतगणना केंद्र पर ही हार्ट अटैक से हुई मौत

मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में एक मतगणना केंद्र पर सीहोर जिला कॉन्ग्रेस अध्यक्ष रतन सिंह ठाकुर की हार्ट अटैक से मौत हो गई। जानकारी के मुताबिक, रतन सिंह ठाकुर मतगणना केंद्र पर वोटों की गिनती देखने पहुँचे थे, लेकिन अचानक वो बेहोश होकर गिर पड़े। वहाँ पर मौजूद लोगों ने बताया कि अपने दोस्तों के साथ मतगणना केंद्र पर पहुँचे रतन सिंह नतीजे देखते हुए गश खाकर कुर्सियों पर गिर पड़े। उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाया गया, लेकिन तब तक उनकी मौत हो चुकी थी। ऐसा कहा जा रहा है कि वो कॉन्ग्रेस की हार का गम सहन नहीं कर पाए और उनको दिल का दौरा पड़ गया।

देशभर में लोकसभा चुनाव की काउंटिंग चल रही है। रुझानों में बीजेपी 300 से अधिक के का आँकड़ा पार करती हुई नजर आ रही है। कॉन्ग्रेस के कई दिग्गज नेता हारते हुए दिखाई दे रहे हैं। मध्य प्रदेश में भी भाजपा बड़ी जीत की ओर अग्रसर है। यहाँ की 29 लोकसभा सीटों में से भाजपा 28 सीटों पर आगे चल रही है, जबकि कॉन्ग्रेस को एक पर बढ़त मिलती हुई दिखाई दे रही है। भोपाल से भाजपा की साध्वी प्रज्ञा सिंह कॉन्ग्रेस के दिग्विजय सिंह से 69 हजार से अधिक मतों से बढ़त बनाई हुई हैं, जबकि गुना लोकसभा सीट से कॉन्ग्रेस के ज्योतिरादित्य सिंधिया भाजपा के केपी यादव से 50 हजार से अधिक वोटों से पीछे चल रहे हैं।

गौरतलब है कि, साल 2014 के लोकसभा चुनाव में मध्य प्रदेश में भाजपा ने बड़ी बाजी मारी थी। यहाँ की 29 लोकसभा सीटों में से 27 सीटों पर भाजपा ने कब्जा किया था, जबकि कॉन्ग्रेस केवल 2 सीटें ही जीत पाई थी। लेकिन इस बार कॉन्ग्रेस की बची हुई सीटें भी भाजपा की झोली में जाती हुए दिखाई दे रही है।

सिन्हा की हार का मुंबई कनेक्शन, समझिए कैसे अपने ही पैर पर कुल्हारी मार ख़ामोश हुए शत्रुघ्न

कहते हैं, घमंड ले डूबता है। घमंड जब हद से पार हो जाए, तो न सिर्फ़ ले डूबता है बल्कि 10 बार डुबो-डुबो कर निकालता है और फिर गर्दन पकड़ के एक जोर का झटका लगाता है। घमंड की बात शुरू करने के लिए पहले चलते हैं 2009 की तरफ। उस वर्ष हुए लोकसभा चुनाव में पटना साहिब से भाजपा से चुनाव लड़ रहे अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा को 57% से भी अधिक वोट मिले थे। अर्थात यह, कि उन्हें आधे से भी अधिक लोगों द्वारा पसंद किया गया था, वो बहुमत के साथ जीते थे। 3 लाख से भी अधिक वोट पाने वाले शत्रुघ्न के प्रतिद्वंद्वी राजद के विजय कुमार के लिए 1.5 लाख वोट जुटाना भी आफत हो गया था। सिन्हा ने इसे ‘फॉर ग्रांटेड’ ले लिया। रिकॉर्ड जीत की बात करते-करते वह पागल हो उठे।

असल में देखा जाए तो शत्रुघ्न सिन्हा की यह जीत पटना साहिब के जातीय समीकरण के अनुरूप भी थी। उन्हें टक्कर देने के लिए उम्मीदवार तो ठीक-ठाक आए लेकिन शत्रुघ्न सिन्हा को भाजपा के कोर वोट के अलावा कायस्थ समाज का वोट बड़े स्तर पर मिला करता था। उन्होंने इसे भी ‘फॉर ग्रांटेड’ लिया। बिहार में कायस्थ समाज एक साथ थोक में वोट करने के लिए जाना जाता है। शत्रुघ्न सिन्हा को 2014 में मोदी लहर का अच्छा साथ मिला और उन्होंने इस बार फिर से 55% मत पाने में सफलता हासिल की। इससे उनके घमंड में और इजाफा हुआ। शत्रुघ्न सिन्हा ने ख़ुद को पार्टी से ऊपर माना और उन्होंने इस जीत को पार्टी से इतर देखा। यह शत्रुघ्न सिन्हा से ज्यादा भाजपा की जीत थी, इसे समझने में वह विफल रहे।

2014 में सिन्हा को पौने 5 लाख वोट मिले और उनके प्रतिद्वंदी कुणाल सिंह को सवा 2 लाख वोट भी नहीं आए। शत्रुघ्न सिन्हा के मन में हमेशा से यह बात चलती थी कि ये वोट उनके हैं और किसी भी हालत में उन्हें ही मिलेंगे। तभी तो उन्होंने कई मीडिया इंटरव्यू में ‘मैंने रिकॉर्ड बनाया’, ‘मैं इतने मतों से जीता’ जैसी बातें बोल कर ये जताने कि कोशिश की कि वह पार्टी से ऊपर हैं। खैर, उनकी हार के और भी कई कारण हैं, जिन्हें गिनाना ज़रूरी है। शत्रुघ्न सिन्हा अपने कायस्थ मतों को लेकर आश्वस्त थे और अभी भी अपने आप को सुपरस्टार समझते थे। जबकि, पंजाब में उनकी रैली में एक बार भीड़ नहीं जुटी, तभी उन्हें अंदाज़ा हो जाना चाहिए था कि जनता का रुख क्या है।

जीतने के बाद पटना की तरफ मुड़ कर भी नहीं देखा

शत्रुघ्न सिन्हा कि सबसे बड़ी कमजोरी यह थी कि उन्होंने दो बार जीतने के बाद भी अपने संसदीय क्षेत्र की तरफ मुड़कर भी नहीं देखा। इससे जनता में यह संदेश गया कि वह अपने आप को किसी भी बड़े नेता से भी ऊपर समझते हैं। वो भाजपा की बैठकों में शामिल नहीं होते थे, कार्यकर्ताओं से मिलते-जुलते नहीं थे और सिर्फ़ पार्टी की बड़ी रैलियों में ही हिस्सा लेते थे। सिन्हा द्वारा इस तरह के सौतेले व्यवहार से भाजपा के कार्यकर्ताओं के भीतर ही उन्हें लेकर असंतोष फ़ैल गया। जीत कर मुंबई और दिल्ली चले जाना और फिर संसद में 70% से भी कम उपस्थिति होना, उनके लिए नेगेटिव पॉइंट्स साबित हुए।

शत्रुघ्न सिन्हा ने अपना अधिकतर समय मुंबई स्थित आवास पर गुजारा। 2014 में ही उनकी हार के चर्चे थे लेकिन मोदी लहर और पटना में नरेन्द्र मोदी की बहुप्रतीक्षित विशाल रैली ने सारे गणित को पलट कर रख दिया। इस बार ऐसा नहीं हुआ। इस बार केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद उनके सामने थे, जिनका कार्यक्षेत्र पटना ही रहा है। भले ही प्रसाद राष्ट्रीय राजनीति में ज्यादा रहे लेकिन बिहार में जब भी ज़रूरत पड़ी, उन्होंने सक्रियता दिखाई। प्रसाद भी सिन्हा की तरह कायस्थ समाज से ही आते हैं लेकिन, प्रसाद की राह में भी एक रोड़ा था, और उसका नाम था आर के सिन्हा। आर के सिन्हा भाजपा के राज्यसभा सांसद हैं और विश्व के अरबपतियों की लिस्ट (डॉलर में अरबपति) में आते हैं। आर के सिन्हा का क़द बिहार में बड़ा है, ख़ासकर कायस्थ समाज के अन्दर।

जब रविशंकर प्रसाद पटना पहुँचे तब कुछ आर के सिन्हा समर्थकों ने एअरपोर्ट पर हंगामा किया। नौबत मारपीट तक पहुँची और लोगों को ऐसा लगा कि इस आतंरिक कलह और असंतोष के कारण प्रसाद की हार हो जाएगी और सिन्हा यह सीट निकाल ले जाएँगे। लेकिन, बाद में आर के सिन्हा ने इस बात का खंडन किया कि वह नाराज़ हैं और उन्होंने अपने समर्थकों को किसी भी प्रकार की अफवाह से बचने का सन्देश दिया। शत्रुघ्न आर के खेमे के वोट को अपना मान कर चल रहे थे लेकिन अब यह साबित हो गया है कि अपने बेटे के लिए पटना साहिब सीट चाह रहे आरके सिन्हा इतने भी नाराज़ नहीं थे कि भाजपा के ख़िलाफ़ चले जाएँ।

स्वयं को अभी भी सुपरस्टार समझना

शत्रुघ्न सिन्हा अभी भी ख़ुद को सुपरस्टार मान कर चल रहे थे। विलेन से सपोर्टिंग एक्टर और फिर नायक की भूमिका में दिखे सिन्हा ने भाजपा के ख़िलाफ़ देश भर में प्रचार किया, जैसे हर जगह उनका जनाधार और उनके लाखों फैन्स हों लेकिन उनको देखने के लिए अब भीड़ नहीं आती। बिहार में अभी भी वह भीड़ जुटाने की क्षमता रखते हैं लेकिन राज्य से बाहर उनकी राजनीतिक स्थिति दयनीय हो चली है। इसका असर ये हुए कि वो अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा कि तरह ही अप्रासंगिक हो गए। कैसे हुए, यह आप यहाँ पढ़ सकते हैं।

बड़ी चीज यह भी है कि भाजपा ने बड़ी चालाकी से शत्रुघ्न सिन्हा को तीन साल खुल कर पार्टी व मोदी की आलोचना करने का मौका देकर उनके क़द को एकदम से घटा दिया। भाजपा को इस बात का एहसास था कि अगर वो सिन्हा पर निलंबन की अनुशासनात्मक कार्रवाई करती है तो उन्हें ख़ुद को विक्टिम के रूप में पेश करने का एक मौक़ा मिल जाएगा और इसी कारण वो जनता के एक हिस्से में सहानुभूति का पात्र बनने की कोशिश करेंगे। शत्रुघ्न सिन्हा द्वारा विपक्षी रैलियों का हिस्सा बनने पर भी उन्हें निलंबित नहीं किया गया।

वो पार्टी से निलंबन चाहते भी थे ताकि ये मीडिया में चर्चा का विषय बने और वो दूसरी पार्टी में पूरे धूम-धड़ाके से शामिल हों लेकिन उनका ये स्वप्न धरा का धरा रह गया। परिणाम यह हुआ कि समय के साथ सिन्हा अप्रासंगिक होते चले गए। उनकी बातों की गंभीरता ख़त्म हो गई और उन्हें मीडिया कवरेज भी अपेक्षाकृत कम मिलने लगा। इसके उलट अगर भाजपा उन्हें निलंबित करती तो ये बात मीडिया में छा जाती और उन्हें फिर से उनकी खोई हुई लोकप्रियता का कुछ हिस्सा वापस मिल जाता। भाजपा ने जिस रणनीति से काम लिया, उस कारण उन्हें मजबूरन कॉन्ग्रेसी होना पड़ा, बिना किसी ख़ास मीडिया कवरेज के।

लखनऊ में सपा प्रत्याशी की पत्नी का प्रचार

शत्रुघ्न सिन्हा इतने आत्मविश्वासी हो गए कि उन्होंने कॉन्ग्रेस में रहते हुए लखनऊ जाकर अपनी पत्नी के पक्ष में प्रचार किया। वह डिंपल यादव के साथ प्रचार करते दिखे और अपनी पत्नी पूनम सिन्हा के लिए कई दिनों तक वहाँ कैम्प किया। अति आत्मविश्वासी सिन्हा ने अपने आप को एक बार फिर पार्टी से ऊपर समझा और लखनऊ से कॉन्ग्रेस प्रत्याशी प्रमोद कृष्णन उनसे नाराज़ नज़र आए। कुल मिलाकर देखा जाए तो अब शायद उन्हें अगले पाँच सालों के लिए कोई मीडिया कवरेज ही ना मिले। उन्हें जो भी मीडिया कवरेज मिल रही थी, इस हार के बाद उसके भी ख़त्म हो जाने के आसार हैं।

शत्रुघ्न सिन्हा की पटना में बुरी हार हुई और लखनऊ में उनकी पत्नी पूनम सिन्हा की और भी बुरी हार हुई। सिन्हा दम्पति के लिए सोशल मीडिया के माध्यम से उनकी बेटी अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्हा ने भी प्रचार किया था। तमाम विपक्षी दलों का लाडला होने के बावजूद सिन्हा की हार के पीछे उनकी व्यक्तिगत विफलता छिपी है। भले ही पूरे देश में यह कॉन्ग्रेस की हार हो लेकिन पटना साहिब में शत्रुघ्न सिन्हा को यह बहुत बड़ा व्यक्तिगत झटका है। ऊपर से रविशंकर प्रसाद की स्पष्ट और अविवादित छवि ने भी सिन्हा के विरोध में काम किया। अब वह वोटरों द्वारा नकारे जा चुके हैं।

बेगूसराय में BJP और CPI कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झड़प, हुई जमके पत्थरबाजी

रुझानों के आने के साथ ही बेगूसराय में हिंसक झड़प की खबर आ रही हैं। बिगड़ते माहौल को देखकर वहाँ भारी संख्या में सुरक्षाबल की तैनाती की गई है। गौरतलब है यहाँ सीपीआई के उम्मीदवार कन्हैया कुमार, भाजपा प्रत्याशी गिरिराज सिंह के बीच सबकी नजरें टिकी हुई है। अभी तक गिरिराज सिंह की भारी मतों से बढ़त उनकी जीत को और भी पुख्ता कर रही है।

लेकिन, इन सबके बीच भारतीय जनता पार्टी और लेफ्ट के कार्यकर्ताओं के बीच हुई हिंसक झड़प में दोनों पार्टी के कार्यकर्ताओं ने जमकर पत्थरबाजी की है। सीपीआई के कार्यालय के बाहर नाराज़ कार्यकर्ताओं ने भीड़ लगा रखी है। हालाँकि आजतक द्वारा पोस्ट की गई वीडियो देख सकते हैं कि पुलिस वहाँ मौजूद है लेकिन माहौल पर काबू पाना मुश्किल हो रहा है।

चुनावी माहौल में इस तरह की खबरें अभी तक केवल पश्चिम बंगाल से सुनने-देखने को मिलीं थी, लेकिन रुझान आने के बाद अब ये दृश्य सीपीआई के कार्यालय के बाहर भी देखने को मिल रहा है। बता दें भाजपा प्रत्याशी गिरिराज सिंह यहाँ कन्हैया कुमार से 2 लाख वोट से आगे चल रहे हैं।

प्रधानमंत्री बनने से ‘लगभग’ चूक जाएँगे ये लोकप्रिय चेहरे

इस लोकसभा चुनाव में सबसे रोचक बात ये रही कि चुनाव जीतने से ज्यादा सर फुटव्वल प्रधानमन्त्री पद के उम्मीदवारों के बीच देखने को मिली। इसका सबसे पहला कारण तो महागठबंधन जैसे संक्रामक रोगों की उत्पत्ति थी और दूसरा कारण ‘कनविनिएंट वामपंथन’ और किराए पर उपलब्ध प्रदर्शनकारी शेहला रशीद के ‘मन की बात’ है। चुनाव के रुझान अब लगभग यही बता रहे हैं कि लोकप्रिय नरेंद्र मोदी एक बार फिर प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते हुए देखना चाहते हैं।

इसी रुझान के साथ, तमाम EVM हैकिंग से लेकर डर के माहौल के बीच अन्य कई प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवारों के अरमानों का शीघ्रपतन देखने को मिला है। इस प्रकार बड़े ही दुःख के साथ यह सूचित करना पड़ रहा है कि देश ने एकसाथ आज लगभग 22 प्रधानमंत्री खो दिए हैं। हालाँकि, जो लोग अभी तक नेहरू-इंदिरा को ही अपना प्रधानमंत्री मानते आए हैं, वो अभी भी उन 22 चेहरों में अपना प्रधानमंत्री तलाशने के लिए स्वतंत्र हैं।

एक नजर उन सभी चेहरों पर जो ‘लगभग’ प्रधानमंत्री बनते-बनते रह जाएँगे

1 – गठबंधन भिक्षु सर अरविन्द केजरीवाल

पिछले 1 साल से गठबंधन की भीख माँग रहे अरविन्द केजरीवाल को कोई और प्रधानमंत्री बनते देखना चाहे या न चाहे लेकिन बलात्कार पीड़ितों के नाम पर चंदा इकठ्ठा कर के अकेले डकार जाने वाली हायब्रिड वामपंथ की डोमेस्टिक विचारक शेहला रशीद उन्हें प्रधानमंत्री बनते देखना चाहती थीं। हैरानी की बात ये है कि ये मन की बात उन्होंने 4 महीनों तक पटियाला हाउस कोर्ट के बाहर जमकर कूटे गए और बेगूसराय सीट से फिलहाल ‘लगभग’ एक लाख वोटों से पीछे चल रहे कम्युनिस्ट कामरेड नेता कन्हैया कुमार के लिए चुनाव प्रचार करते वक़्त कभी नहीं रखी। हालाँकि, रोडशो के दौरान लप्पड़ खाकर चंदा जुटाने में शायद वो जरूर कामयाब रहे होंगे, लेकिन प्रधानमंत्री तो वो नहीं बन रहे हैं। अरविन्द केजरीवाल का ये डर कि नरेंद्र मोदी उनकी हत्या करवा देंगे, हो सकता है अभी लम्बे समय तक चलता रहे।

लगभग प्रधानमंत्री का प्रतीकात्मक चित्र

2 – PM IN WAITING, डिम्पलधारी, चिरयुवा, अध्यक्ष श्री राहुल गाँधी जी

नेहरू के बाद एकमात्र लाखों-करोड़ों लोगों की एकमात्र पसंद कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी को और 5 साल PM पद का सबसे योग्य उम्मीदवार बनने का सौभाग्य प्राप्त होने वाला है। उन्होंने रवीश कुमार को दिए गए गैर-राजनीतिक और निष्पक्ष इंटरव्यू में यह भी माना था कि 23 मई को जो भी नतीजे आएँगे, वो उसको ही मानेंगे। अब देखना ये है कि वो जनता के इस निर्णय को सर आँखों पर बिठाते हैं या फिरसे 5 साल तक जनता को जेब में एक ओर से हाथ डालकर दूसरी तरफ से निकालने और आलू से सोना बनाने का चमत्कार करते हुए नजर आते हैं। जो भी हो, जनता में चाहे राहुल गाँधी की लहर ना हो, लेकिन यह शत प्रतिशत तय है कि भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच में राहुल गाँधी का क्रेज पूरा है।

‘बेटा सत्ता जहर है और सुन, आएगा तो मोदी ही’ (PM in waiting का प्रतीकात्मक चित्र )

3 – टोंटीचोर अध्यक्ष अखिलेश यादव

अध्यक्ष श्री अखिलेश यादव जी टोंटी, चिलम और पकौड़ों के स्वाद में इतना उलझे रहे कि उन्हें चुनाव में पूरी ताकत झोंकने का मौका ही नहीं मिल पाया। नेताजी श्री मुलायम सिंह यादव ने पहले ही कह दिया था कि उनकी आस्था नरेंद्र मोदी हैं, शायद यही बुजुर्गों का आशीर्वाद युवा अध्यक्ष जी को मिल नहीं पाया। हालाँकि, कुछ लोग तो ये भी कयास लगा रहे हैं कि चुनाव प्रचार के दौरान आखिरी समय पर कठिन सवाल पूछने की चॉइस रखने वाला एक निष्पक्ष पत्रकार का साया उनके प्राइवेट चॉपर में घुस आया था। वो निष्पक्ष पत्रकार कौन था, यह अभी स्पष्ट नहीं हो पाया है।

टोंटी के साथ अध्यक्ष जी

4 – बहन मायावती

बसपा प्रमुख मायावती ने एग्जिट पोल के बाद तक भी मोदी विरोधियों को दिलासा दिया कि मोदी लहर कुछ नहीं होती है ये सब उनके मन का वहम है। NDTV जैसी निष्पक्ष मीडिया गिरोह को तो कल शाम को ये भी कहते देखा गया कि क्या भाजपा प्रधानमंत्री पद के लिए मायावती को अपना समर्थन देगी क्योंकि वो PM बनना चाहती हैं। यह बहुत बड़ी विडंबना है कि मायावती को गेस्ट हाउस प्रकरण के बाद भी समाजवादी पार्टी के साथ मंच पर बैठना पड़ा और उन्हें प्रधानमंत्री भी नहीं बनाया जा रहा है।

उन्नत भारत की दुखद तस्वीर

5 – ममता बनर्जी

सबसे पहले तो ममता बनर्जी को प्रधानमंत्री ना बन पाने की हार्दिक ‘जय श्री राम’। जिस तरह से TMC के गुंडों ने चुनाव के पहले से लेकर चुनाव के दौरान भी गुंडागिर्दी के द्वारा मतदाताओं से लेकर भाजपा तक को आतंकित कर के रखा, उससे ममता बनर्जी के सपनों के लोकतंत्र की झलक अवश्य मिलती है। पश्चिम बंगाल में TMC के गुंडों द्वारा RSS कार्यकर्ताओं की हत्या से लेकर हिन्दुओं पर किए जा रहे अत्याचार के सामने नरेंद्र मोदी द्वारा लगातार जनता का विश्वास जीतते रहना लोकतंत्र की सबसे बड़ी हत्या ही है। खैर, जो भी है, जय श्री राम।

ममता बनर्जी
तृणमूल कॉन्ग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी

6 – के चंद्रशेखर राव यानी, केसीआर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘तुच्छ’ बताने वाले तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव (केसीआर) भी इस लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री पद के अग्रणी उम्मीदवारों में से एक थे। भले ही देश में ग़ैर-भाजपा और ग़ैर-कॉन्ग्रेसी फ्रंट बनाने का सपना देखने वाले केसीआर शायद अकेले नेता होंगे। इसके लिए उन्होंने वर्तमान समय में भारत के एकमात्र वामपंथी मुख्यमंत्री पी. विजयन तक से बातचीत का रास्ता अपनाया। लेकिन, रुझान बता रहा है कि जनता का मूड इस समय सिर्फ ‘राइट‘ ही है।

केसीआर कह रहे हैं कि गई भैंस पानी में

7 – चंद्रबाबू नायडू

आंध्र प्रदेश के CM (फिलहाल) चंद्र बाबू नायडू इनकम टैक्स की रेड के बाद ‘सेव इंडिया, सेव डेमोक्रेसी, की राह पकड़ने के बाद ‘गंभीर परिणामों’ की भी चेतावनी देते हुए देखे गए। एक समय पर ऐसा लग रहा था कि अगर मोदी विरोधी दल सत्ता में आता है, तो चंद्रबाबू नायडू प्रमुख भूमिका में नजर आएँगे, लेकिन उनकी पार्टी लोकसभा और विधानसभा दोनों ही में बुरी तरह से पिटी है। ईवीएम के मुद्दे पर विपक्ष की आवाज बुलंद करने वाले आंध्र प्रदेश के सीएम एन चंद्रबाबू नायडू राज्य के विधानसभा चुनावों में भी बुरी तरह पिछड़ने के बाद मुख्यमंत्री पद भी गँवा बैठे। 175 सीटों में से 152 सीटों पर वाईएसआरसीपी (YSRCP) के साथ, जगन मोहन रेड्डी राज्य अगले सीएम बनने के लिए तैयार हैं।

जनता ने दे दिए हैं गंभीर परिणाम

भारत में PAK जैसे हालात: गिरोह विशेष के लोग कैमरे के सामने तोड़ रहे TV-LED

चुनावी रुझान जैसे-जैसे सामने आ रहे हैं देश के कुछ घरों और कार्यालयों में ‘पाकिस्तान’ जैसा माहौल होता जा रहा है। अभी तक जनता के बीच ‘हेट पॉलिटिक्स’ का बाजा बजाकर भाजपा को सत्ता से उखाड़ फेंकने की गुहार लगाने वाले अब अपने घर के केबल, डीटीएच की तारों को बेदर्दी से उखाड़ रहे हैं। उन्हें यकीन नहीं हो पा रहा है कि ‘सेकुलर’ नागरिक के घर में लगी एलईडी इतने कट्टर रुझान कैसे दिखा सकती है।

एनडीटीवी जैसे न्यूज चैनल्स के लिए अपने विशेष दर्शकों को समझा पाना बहुत मुश्किल हो रहा है कि अभी तक परिणाम नहीं आए हैं, इसलिए वो आखिरी समय तक उम्मीद न खोएँ और प्रियंका गाँधी की बात मानकर मतगणना केंद्र के बाहर शाम तक अड़े रहें। माहौल किसी भी हालात में शांत होने का नाम ही नहीं ले रहा है। स्थितियाँ बिगड़ती जा रही है, इसे कुछ लोग ‘तथाकथित सेकुलरों’ पर खतरे की तरह देख रहे हैं।

हालाँकि, देश में ऐसी गंभीर स्थिति 2014 में भी आई थी, उस समय उदार होकर लोगों ने अपनी विचारधारा की गाइडलाइन अनुरूप संयम बरत लिया था और 2019 में जनता खुलकर लोगों को बरगलाने की जमीनी कोशिशों में जुट गए थे। लेकिन, अब अपने इरादों में खुद को ‘नाकाम’ होता देख, ये लोग अपना आपा खो चुके हैं और पाकिस्तान से प्रेम-भाव की बात करते-करते उन्हीं के दिखाए ‘हिंसक’ मार्ग का अनुसरण कर रहे हैं।

गुप्त सूत्रों के मुताबिक जिन लोगों को पहले अंदाजा था कि उनका कोई भी ‘न्याय’ ‘पूर्ण राज्यों’ को भाजपा की ‘कट्टरता’ से मुक्त नहीं करवा सकता है। उन्होंने पहले ही अपने घरों में स्पेशली ‘अमेजन’ से हथौड़े और खुरपे मँगवा लिए थे, ताकि परिणाम वाले दिन टीवी से लेकर उस हर उपकरण को तोड़ सकें जिसमें देश भगवा होता दिखेगा, लेकिन प्रियंका के ऑडियो जारी होने के बाद उस पैकेट को खोला नहीं गया था। ऐसे में अब जब स्थिति हाथ से बाहर होती जा रही है, महागठबंधन की गाँठ केवल ‘बुआ-बबुआ’ तक सीमित नजर आ रही है, तो ’10 डे रिप्लेसमेंट गारंटी’ जैसा कोई विकल्प नहीं शेष है। अमेजन के पैकेट फट चुके हैं, गोरिल्ला ग्लास वाली एलईडी टीवी और मोबाइल पर लोग मिलकर हथौड़े चला रहे हैं।

प्रतीकात्मक तस्वीर की तरह हमारे देश में भी कुछ लोग अपनी टीवी लेकर सड़कों पर उतर आए हैं। पुरानी एलईडी का कचूमर उनके गुस्से को शाँत नहीं कर रहा है और वो शोरूम से नई एलईडी खरीद-खरीद कर उस पर ताबड़तोड़ बेरहमों की तरह वार कर रहे हैं। ईवीएम से पूरी तरह ये लोग विश्वास खो चुके है और दोबारा नेहरू-इंदिरा युग में जाने की बातें अपनी चरम पर है।

हमेशा से शांति अमन चाहने वाले विशेष गिरोह के लोगों द्वारा देश में टेलीविजनों पर इतने ‘निर्मम’ वार होंगे, ऐसा कभी किसी ने सोचा भी नहीं था। लेकिन भाजपा के कारण ऐसा हो रहा है। परिणाम आने से पहले ही देश में हिंसा का माहौल देखने को मिल रहा है। इसलिए ये बेहद गंभीर मामला है इसे दरकिनार नहीं किया जा सकता। मुमकिन है अपने दर्शकों और पाठकों को ‘न्याय’ देने के लिए लिबरल गिरोह इसपर प्राइम टाइम और स्पेशल रिपोर्ट करें। और पूरी संभावना है कि इन हिंसक घटनाओं को भावी विपक्ष भी अपना अगला मुद्दा बनाए। बता दें जगह-जगह से टूटी-फूटी टेलीवीजनों का डाटा कलेक्ट होना शुरू हो चुका है।

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बंगाल में BJP ‘सरकार-इन-वेटिंग’ है: TMC के चंदन मित्रा ने स्वीकार किया

लोकसभा निर्वाचन 2019 के रुझान और नतीजे सामने आ रहे हैं जिनमें भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिलता हुआ दिख रहा है। पश्चिम बंगाल में भाजपा को अप्रत्याशित रूप से 16-17 सीटें मिलती हुई दिख रही हैं।

इसी बीच खबर आई है कि रुझानों पर अपनी राय रखते हुए तृणमूल के चंदन मित्रा ने बयान दिया है कि भाजपा की स्थिति बंगाल में इतनी मजबूत होती जा रही है कि भविष्य में उसकी सरकार बन सकती है। चंदन मित्रा ने भाजपा को ‘गवर्नमेंट-इन-वेटिंग’ कहा है।

बंगाल में ताजा रुझान मिलने तक 42 में से जहाँ 23 सीटों पर तृणमूल आगे है, वहीं 17 पर भाजपा के प्रत्याशी आगे चल रहे हैं। अभी यह कहना कठिन है कि कौन किस सीट पर जीतेगा लेकिन यदि 17 सीटों पर भाजपा की बढ़त जीत में तब्दील हो जाती है तो आने वाले दिनों में बंगाल में भाजपा राज की उम्मीद दिखाई देती है।

BJP जीती तो 5 साल तक रहूँगा गंजा: कॉन्ग्रेस प्रत्याशी का ऐलान

लोकसभा चुनाव की मतगणना चल रही है। इस रुझान में एनडीए 300 से अधिक सीटें जीतती दिख रही है तो वहीं, यूपीए 100 सीटों पर सिमटती दिख रही है। इस बीच उत्तर प्रदेश के अमरोहा से कॉन्ग्रेस प्रत्‍याशी सचिन चौधरी ने ऐलान करते हुए कहा कि अगर उनके संसदीय क्षेत्र से भाजपा प्रत्याशी कंवर सिंह तंवर की जीत होती है, तो वो अपना बाल मुंडवाकर गंजे हो जाएँगे और अगले 5 साल तक बाल ही नहीं रखेंगे।

सचिन चौधरी ने आज (मई 22, 2019) कलेक्ट्रेट में प्रेस कॉन्फ्रेंस करके इसकी जानकारी दी। इस दौरान उन्होंने सबसे पहले तो एग्जिट पोल पर सवाल उठाए और भाजपा के पक्ष में अधिक से अधिक सीटों का एग्जिट पोल दिखाने वाले चैनलों को मोदी के हाथों बिका हुआ बताया। इसके अलावा उन्होंने कहा कि जो एग्जिट पोल दिखाए जा रहे हैं, वह पूरी तरह से बेबुनियाद हैं। भाजपा 200 का आँकड़ा भी नहीं छू पाएगी। भाजपा इस वक्त बौखलाई हुई है, इसीलिए वो एग्जिट पोल को अपने पक्ष में दिखाने के लिए सेटिंग कर रही है, ताकि छोटे-मोटे दल उनके साथ खड़े हो सकें।

पत्रकारों और एग्जिट पोल पर सवाल उठाने के साथ ही सचिन ने यह भी कहा कि जो भी चैनल वाले बीजेपी के पक्ष में एग्जिट पोल दिखा रहे हैं, उन्होंने मोदी से पैसे ले रखे हैं और वो लोग ये जानते हैं कि अब आगे उनका चैनल नहीं चलने वाला है, क्योंकि नतीजा सामने आने के बाद इन चैनलों को कोई नहीं देखेगा। इसके अलावा उन्होंने और भी कई भद्दे आरोप लगाए।

इस दौरान जब सचिन चौधरी से पूछा गया कि अगर यहाँ से बीजेपी जीत जाती है तो क्या वो चुनाव लड़ना छोड़ देंगे? सचिन ने इसका जवाब देते हुए जोश में आकर कहा कि चुनाव लड़ना तो नहीं छोडेंगे, लेकिन अगर अमरोहा सीट से भाजपा प्रत्याशी जीत जाता है तो वो अपने बाल मुंडवा लेंगे और 5 साल तक गंजे रहेंगे।

अपनों के ही जाल में फँसे दिग्गी राजा: जानिए कैसे कमलनाथ ने सुनिश्चित की उनकी बुरी हार

दिग्विजय सिंह हार रहे हैं। मध्य प्रदेश की राजनीति का सिरमौर रहा यह नेता आज हार रहा है, बुरी तरह हार रहा है। पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ रही एक साध्वी ने पुराने नेता को चित कर दिया। राजनीति के सारे दाँव-पेंच जानने वाले और गाँधी परिवार के वफ़ादार नेता का राजनीतिक सूर्यास्त हो चुका है। 1993 से 2003 तक अखंड मध्य प्रदेश (छत्तीसगढ़ के गठन से पहले उन्होंने दो चुनाव जीते) के मुख्यमंत्री रहे दिग्गी राजा का राजनीतिक करियर आज अपने अंतिम दौर में है। ये सब महज अनुमान नहीं है बल्कि सच्चाई है। इस सच्चाई को धरातल पर उतारने में उनके अपनों का ही हाथ है, परायों का नहीं। अगर ऐसा नहीं होता, तो क्या दिग्गी राजा को कोई सेफ सीट खोज कर नहीं लड़ाया जाता?

लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सिख नरसंहार के आरोपित रहे कमलनाथ ने अपने सामने सबसे बड़े काँटे को इस तरह से हटाया, जिससे साँप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटा। दरअसल दिग्विजय सिंह ने भले ही 2003 में राज्य में उमा भारती के हाथों करारी हार के बाद चुनाव लड़ना बंद कर दिया, लेकिन वह राजनीति में सक्रिय थे। मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी में उनका दखल उतना ही था, जितना पहले हुआ करता था। कारण? इसका कारण है गाँधी परिवार का वफ़ादार होना। जैसे गुजरात कॉन्ग्रेस में अहमद पटेल का दखल है, वैसे ही मध्य प्रदेश में दिग्गी राजा का स्थान था। सवाल यह है कि इतने बड़े नेता को, जो 2 दशक बाद चुनावी राजनीति में लौटा हो, इतनी कठिन सीट क्यों दी गई?

राष्ट्रीय राजनीति में पाँव जमाने को आतुर दिग्विजय ने दिल्ली का रुख तो किया था लेकिन उनके पीठ पीछे कमलनाथ ने उनका सिंहासन हथिया लिया, उनके स्थान को भर दिया। इसके बाद राज्य में ज्योतिरादित्य सिंधिया के रूप में एक और राजनीतिक घराने के प्रतिनिधि के उदय ने ज़रूर कमलनाथ को परेशान किया लेकिन गाँधी परिवार से वफ़ादारी के मामले में कमलनाथ के सामने वह कहीं नहीं ठहरते। कमलनाथ ने पहले भी कहा था कि दिग्विजय बहुत बड़े नेता हैं और उन्हें उसी सीट से चुनाव लड़ना चाहिए, जो सबसे कठिन सीट हो। चूँकि पहले भोपाल से भाजपा के शिवराज सिंह चौहान के लड़ने आसार थे, इसीलिए कमलनाथ को उम्मीद थी कि दिग्गी हारेंगे ही।

दिग्विजय सिंह को अपनों ने लूटा। उन्हें कमलनाथ ने बड़ी चालाकी से बेइज्जत होने के लिए भोपाल से लड़वा दिया। उन्हें सबसे बड़ा नेता और सबसे कठिन सीट वाली बातों से ऐसा बहला लिया गया, जिससे कथित हिन्दू आतंकवाद की बात करने वाले एक हिंदुत्ववादी नेत्री से ही हार गए। इस बात को समझने के लिए चलना पड़ेगा थोड़ा पीछे। चुनाव से पहले और उसके दौरान कैसे कमलनाथ ने अपने बेटे की जीत सुनिश्चित करने के लिए सारा जोर लगा दिया लेकिन दिग्विजय सिंह को एक ऐसे चक्रव्यूह में फँसा दिया, जिससे वो शायद ही कभी उबर पाएँ। अब कमलनाथ के सामने न सिंधिया हैं और न दिग्गी, उनके बेटे अगर चुनाव जीतते हैं तो उनका भविष्य भी ठीक है।

कमलनाथ चालाक हैं। उन्होंने बड़ी चालाकी से पार्टी के राष्ट्रीय आलाकमान पर दबाव डाल कर उन्हें प्रदेश से बाहर भेज दिया। सर्वविदित है, कमलनाथ और सिंधिया, दोनों ही एमपी में सीएम पद के दावेदार थे और राहुल गाँधी ने मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा से पहले दोनों के साथ फोटो डालकर यह जताने की कोशिश की थी कि पार्टी में सब ठीक है। राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि राज्य में सत्ता के 2 केंद्र न हो जाएँ, इसे देखते हुए सिंधिया को बाहर रखा जा रहा है। बीच में यह भी ख़बर आई थी कि कमलनाथ चाहते हैं कि दिग्विजय अगर चुनावी राजनीति में वापसी करते हैं तो वह राज्य की सबसे कठिन सीट चुनें और फलस्वरूप उन्हें भोपाल से लड़ाया गया जहाँ पिछले 8 चुनावों या यूँ कहें 30 सालों से भाजपा का कब्ज़ा है। साध्वी प्रज्ञा के आने से यहाँ मुक़ाबला और रोचक हो गया।

कमलनाथ चालाक हैं। मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री कमलनाथ के बारे में हाल ही में साध्वी प्रज्ञा ने तंज कसा था कि वह सिर्फ़ छिंदवाड़ा के मुख्यमंत्री हो कर रह गए हैं। एक तरह से उनकी बात बहुत हद तक सही है क्योंकि छिंदवाड़ा से कमलनाथ के पुत्र नकुल नाथ चुनाव लड़ रहे हैं और आपको बता दें कि कमलनाथ ने चुनाव प्रचार ख़त्म होने के अंतिम 2 दिन छिंदवाड़ा में गुज़ारे ताकि अपने बेटे की जीत सुनिश्चित कर सकें। कमलनाथ ने बड़ी चालाकी से अपने बेटे के लिए तो ख़ूब मेहनत कि लेकिन दिग्विजय सिंह कि हार के लिए परदे के पीछे से ऐसा चक्रव्यूह रचा, जिससे वह मध्य प्रदेश के एकछत्र शासक बन जाएँ।

उत्तर प्रदेश में बड़ी हार के बाद सिंधिया का क़द कम होना तय है और दिग्विजय की हार के बाद वह अप्रासंगिक हो ही जाएँगे। ऐसे में, कमलनाथ की बल्ले-बल्ले है। नकुल नाथ अपना पहला लोकसभा चुनाव लड़ रहे हैं और पिता कमलनाथ का सारा ध्यान अपने बेटे की जीत सुनिश्चित करने पर है। छिंदवाड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले 40 वर्षों से यहाँ कमलनाथ सांसद हैं। बीच में एक वर्ष के लिए भाजपा ने यहाँ जीत दर्ज की थी और एक वर्ष उनकी पत्नी अलका नाथ सांसद रही थीं। दरअसल, कमलनाथ चाहते नहीं थे कि राज्य में सत्ता के तीन केंद्र बनें और आलाकमान ने उनकी इस चाहत में उनका पूरा साथ दिया, या फिर उन्होंने अपनी बात मनवाई।