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RTI: अपनी ही याचिका पर ख़ुद ही सुनवाई करेगा सुप्रीम कोर्ट, अजीब मुक़दमा!

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के एक निर्णय के विरुद्ध अपनी याचिका को सुनवाई हेतु सूचीबद्ध किया है। 27 मार्च को सर्वोच्च न्यायलय की संविधान बेंच के समक्ष प्रस्तुत होने वाले मामलों की फेहरिस्त में एक ऐसा भी मामला आया है जिसमें माननीय उच्चतम न्यायलय स्वयं याची है, और यह याचिका दिल्ली उच्च न्यायलय द्वारा दिए गए एक निर्णय के विरुद्ध है। मामला सुप्रीम कोर्ट और सीजेआइ के सूचना के अधिकार के अंतर्गत आने या ना आने का है।

क्या है मामला

जनवरी, 2010 में दिए गए 88 पन्नों के अपने निर्णय में तीन जजों की दिल्ली हाई कोर्ट बेंच ने एकल बेंच के एक निर्णय को बरकरार रखा गया था। उक्त निर्णय में दिल्ली हाईकोर्ट की बेंच इस निष्कर्ष पर पहुँची थी कि सुप्रीम कोर्ट व सीजेआइ को याचिकाकर्ता सुभाष चन्द्र अग्रवाल को सुप्रीम कोर्ट की कार्यशैली व प्रशासन को लेकर माँगी गई सूचना उपलब्ध करानी होगी।

दिल्ली हाईकोर्ट की तीन जजों- चीफ़ जस्टिस एपी शाह, जस्टिस विक्रमजीत सेन, व जस्टिस एस मुरलीधर की बेंच ने सिंगल बेंच के उस निर्णय को बरकरार रखा था जिसमें उसने केन्द्रीय सूचना आयोग के निर्देश के खिलाफ़ आपत्ति जताती याचिका को खारिज कर दिया था।

2010 में दायर इस याचिका को 2016 में संविधान बेंच को भेजे जाने का निर्णय सुप्रीम कोर्ट की तीन-सदस्यीय पीठ ने किया था। संयोग से आज के सीजेआइ रंजन गोगोई उस समय उस तीन-सदस्यीय पीठ के भी अध्यक्ष थे।

सवालों की फेहरिस्त  

उपरोक्त निर्णय के अलावा संविधान बेंच को निम्नलिखित विषयों पर निर्णय लेना है:

  • न्यायपालिका की स्वतंत्रता के सिद्धांत के लिए क्या माँगी गई सूचना को दिए जाने से रोकना आवश्यक है? क्या इस सूचना का माँगा जाना न्यायपालिका में हस्तक्षेप कहा जा सकता है?

  • क्या माँगी गई सूचना को इस आधार पर रोका जा सकता है कि इससे न्यायपालिका के निर्णयों में भरोसे की कमी आएगी, व संवैधानिक पधाधिकारियों के मुक्त और स्पष्ट राय देने में कठिनाई होगी, जबकि यह प्रभावी मंत्रणा और सही निर्णय लिए जाने के लिए परमावश्यक है?

  • क्या माँगी गई सूचना, सूचना के अधिकार कानून के Section 8(i)(j) के अंतर्गत दिए गए अपवादों में शामिल है?

अभी असली मजे ‘भक्त’ ही ले रहे हैं, बाकियों को आ रही है खट्टी डकारें

जैसा कि मैं पहले ही कह चुका हूँ इस समय असली मजे ‘भक्त’ ही ले रहे हैं, क्योंकि वे मोदी के पीछे भेड़ की तरह हाँके हुए चले जा रहे हैं, किसी किस्म का लोड ही नहीं है, मोदी अगर उनको अंधे कुएँ में भी कूदा देंगे, तो वे कूद जाएँगे।

लेकिन जिनको मजे नहीं आ रहे, खट्टी डकारें आ रही हैं और शुगर बढ़ा हुआ है, उनमें केवल महागठबंधन के नेता ही नहीं बल्कि फेसबुक के ‘दलित चिन्तक’ भी शामिल हैं। क्योंकि उनको यह तो पता है कि मोदी का विरोध करना है, लेकिन चुनावों की घोषणा के बाद भी यह नहीं पता कि समर्थन किसका करना है। मायावती का, राहुल गाँधी का, लालू यादव का, ममता बनर्जी का, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव का या बाबा आंबेडकर के संविधान को बचाने निकले दलितों के नए एंग्री यंग मैन भीम आर्मी के चंद्रशेखर का?

इसलिए उनकी वॉल पर अगर कभी विचरने जाओ तो वे इन दिनों ‘संविधान/लोकतंत्र खत्म हो जाएगा’ से लेकर मनुवाद और ब्राह्मणवाद आ जाएगा तक का रोना रोते हुए और आपस में एक-दूसरे को सांत्वना देते हुए मिल जाएँगे। और इस हाल से कहीं डिप्रेशन में न चलें जाएँ, तो उससे बचने के लिए आपस में एक-दूसरे से मसखरी भी कर लेते हैं, जो कि दलित चिंतकों के पार्ट पर बहुत अचंभित करने वाली बात है, क्योंकि दलित चिन्तन की शुरुआत ही सवर्णों को गाली देने से, और सवर्ण बन जाने के हथकंडों से होती है। इसलिए इस दौरान यह लोग सामान्य मनुष्य न रहकर नीले झंडे के तले बौद्धिक फिदायीन बन जाते हैं, जिनके लिए हँसी-मजाक करना लगभग निषेध होता है। लेकिन दलितों के हितों की बात करने वाले नकारा नेताओं ने इनको इस हश्र तक पहुँचा दिया है।

बहरहाल, इन दिनों जबकि मोदी जी 2019 के फाइनल के लिए 7 लोक कल्याण मार्ग के भीतर नेट प्रैक्टिस कर रहे हैं, तब मायावती जी आलरेडी फुल फॉर्म में आ चुकी हैं। रोज उनके नए-नए करतब और बयान सामने आते रहते हैं, जिनमें से एक यह भी है कि वे अब कॉन्ग्रेस को फूटी आँख देखना भी पसंद नहीं करेंगी, अर्थात वे चुनावों में और चुनावों के बाद भी कांग्रेस से किसी भी प्रकार का वास्ता नहीं रखेंगी, जबकि उन्होंने अमेठी और रायबरेली सीट कांग्रेस के लिए छोड़ रखी है, जो अखिलेश यादव के अनुसार महागठबंधन में कांग्रेस की हिस्सेदारी का टोकन है, वहीं दूसरी तरफ उन्होंने अपने दो विधायकों के साथ मध्य प्रदेश में कांग्रेस की अल्पमत सरकार को समर्थन भी दिया हुआ है।

कुछ दिनों पहले उन्होंने लखनऊ में अपनी हवेली पर लालू जी के कनिष्ठ पुत्र तेजस्वी यादव को बुलवाया था, उनसे अपने पैर छुआने का फोटो सेशन करवाया और कुछ दिनों बाद यह घोषणा कर दी कि वे बिहार में सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करेंगी। उनकी धुआँधार लप्पेबाजी यहीं नहीं रुक रही है, बल्कि खबर यह भी है कि वे अप्रैल के पहले सप्ताह में अखिलेश यादव के साथ मैनपुरी सीट पर महागठबंधन के प्रत्याशी का प्रचार करने के लिए भी जा रही हैं, प्रत्याशी बोले तो तो साक्षात ‘मुलायम सिंह यादव’।

‘निष्पक्ष’ लोग मोदी पर जो अलग-अलग वैरायटी के आरोप लगाते हैं, उसमें से एक यह भी है कि मोदी नफरत फैलाने वाला और विभाजनकारी नेता है, लेकिन 2019 में जिस प्रकार के राजनीतिक समीकरण ‘मोदी’ की वजह से बने हैं, जहाँ मायावती; मुलायम सिंह का प्रचार कर रही हैं, केजरीवाल; कांग्रेस से गठबंधन के लिए 10 जनपथ के आगे लगभग कटोरा लिए खड़े हैं, वामपंथी; बिना शर्त ममता बनर्जी को समर्थन देने के लिए राजी हो गए हैं, उमर अब्दुल्ला; महबूबा मुफ्ती के ट्वीट को रीट्वीट कर रहे हैं, राहुल गाँधी; सीडी सम्राट हार्दिक पटेल के साथ गलबहियाँ कर रहे हैं तब मोदी को विभाजनकारी कहने वाले लोगों को भींगा हुआ जूता सीधे अपने मुँह पर मार लेना चाहिए। बल्कि मैं तो मानता हूँ कि समाज में इतना प्रेम, दया, सौहार्द, करुणा फ़ैलाने वाला नेता ज्ञात और लिखित इतिहास में कोई पैदा ही नहीं हुआ है।

बहरहाल, मैं फिर से मेरी फेवरेट नेता मायावती जी की ओर लौटता हूँ, तो सुश्री मायावती जी मैनपुरी के चुनावी मंच से उस नेता का प्रचार करेंगी, जो मायावती के गठबंधन सहयोगी अखिलेश यादव का बाप है, मायावती जी मैनपुरी के लोगों से उस नेता को जिताने की अपील करेंगी, जिसने उत्तर प्रदेश में खड़े खम्भों को जिता दिया है, वे उस नेता को जिताने के लिए कहेंगी, जिनके न समझ में आने वाले भाषणों से भी इम्प्रेस होकर यूपी की जनता ने दर्जनों सांसद दिल्ली भेजे हैं, और वे उस नेता को जिताने के लिए अपील करेंगी, जो पहले ही देश के लोगों से मोदी को जिताने के लिए अपील कर चुका है।

इतने भी पर भी सोचिये उस एक संभावित दृश्य को जब मैनपुरी के चुनावी मंच से पहले अखिलेश यादव खड़े होकर नेताजी के लिए वोट माँगेगे, फिर मायावती जी जनता से कहेंगी कि वे आज जो कुछ भी हैं, नेताजी की वजह से ही हैं, अगर आज नेताजी न होते तो अखिलेश जी भी न होते और तब हम गठबंधन किससे करते।

और अंत में आदरणीय मुलायम सिंह जी खड़े होकर, उपस्थित जनसमूह से कहेंगे कि “हमाए लला अखिलेश आज बहुत अच्छे बोले और भेन मायावती तो सुषमा स्वराज के बाद देश की दूसरी सबसे ग़जब की वक्ता हैं हीं, इसलिए उनकी बातेंऊँ सारी सही हैं, लेकिन एक सही बात आज हमहूँ कहि दे रहे हैं, चाहें तो लिख कें ले लेओ कि दुनिया इतें की वितें हे जाय, आवेगो तो मोदीअई”

बेटे की आड़ में सेना को ‘गाली’ देने वाले को कश्मीरी हिन्दू महिला से मिला करारा जवाब

कश्मीर में सेना की उपस्थिति को लेकर ट्विटर पर तीखी बहस देखने को मिली। हुआ यूँ कि स्वघोषित ‘मानवाधिकार रक्षक’ खुर्रम परवेज़ ने सेना की उपस्थिति भर को अपने बच्चों के लिए भय का सबब बता दिया। जवाब में जानी-मानी दक्षिणपंथी ब्लॉगर और कश्मीर के अल्पसंख्यक डोगरा हिन्दू समुदाय से ताल्लुक रखने वालीं सोनम महाजन ने पलटवार किया। उन्होंने कहा कि अहसानफरामोशों और आतंकवादियों के समर्थकों द्वारा आपके घर पर कब्ज़ा कर लिया जाना और आपका खुद शरणार्थी शिविर में सड़ना (और भी) हृदय-विदारक है। यह (भी) ह्रदय-विदारक है जब आपका बच्चा आपसे पूछे कि क्या वह बिना पत्थरबाज़ों के हमले के डर के अपने घर लौट पाएगा।

सोनम महाजन का इशारा कश्मीरी पण्डितों के लगभग तीस साल पुराने नरसंहार की ओर था, जिसके बाद कश्मीर के लगभग सभी हिन्दुओं और सिखों को जान बचाने के लिए घाटी छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा था।

क्या था खुर्रम का ट्वीट और क्या मिला जवाब

किसका दोष, कौन रक्षक

इसे सीधे-सीधे ओछापन तो नहीं कह सकते पर यह दुर्भाग्यपूर्ण अवश्य है कि खुर्रम परवेज़ अपने बेटे का इस्तेमाल राजनीतिक हथियार के तौर पर कर रहे हैं। अगर आप अपनी राजनीति में अपने परिवार का इस्तेमाल ढाल के तौर पर करेंगे तो आप अपने विरोधियों को उस ढाल पर प्रहार करने के लिए दोष नहीं दे सकते।

और अगर उन्हें किसी को अपने बेटे के ‘डर’ के लिए दोष देना ही है तो उन कश्मीरी दहशतगर्दों को दें जो इसी ताक में बैठे हैं कि यहाँ कश्मीर आज़ाद हो, वहाँ हिन्दुओं का या तो जबरन धर्मांतरण कर दिया जाए या क़त्ल कर दिया जाए। अपने बेटे के ‘डर’ का किसी को दोष देना ही है तो उन सैयद अली गिलानी को दें जो खुल कर यह कहते हैं कि कश्मीर उनके और उनके प्यारे कश्मीरियों के लिए राजनीतिक नहीं, मज़हबी मुद्दा है।

और अगर उन्हें इन ताकतों के खिलाफ़ मुँह खोलने में अपने बेटे की ‘mob-lynching’ हो जाने का डर है तो ज़रा जा के उसी सेना से एक बार सुरक्षा की गुहार लगाएँ। भारतीय सेना के ‘काफ़िर’ वीर सदियों से अपनी जान की कुर्बानी दे कर भी शरणार्थी को अभय प्रदान करते आए हैं।

खबरदार दक्षिणपंथियों! तुम HAHA का रिएक्शन मत देना, यह काम वामपंथियों पर छोड़ दो

भारत देश अभी आतंकवाद की घटना से उबरा नहीं था कि न्यूजीलैंड में भी एक वीभत्स नरसंहार की घटना सामने आई है, जिसमें एक बन्दूकधारी ने लगभग 50 लोगों को मार दिया। न्यूजीलैंड के शहर क्राइस्टचर्च की मस्जिद में किए गए हमले में इस 28 वर्षीय आरोपित का नाम है, ब्रेनटेन टैरेंट! लेकिन अचानक से यह हास्य की घटना में क्यों तब्दील हो गई?

यह घटना तब तक एक सामान्य घटना थी, जब तक भारत में बैठे मीडिया गिरोह के गिद्धों को ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमन्त्री ने उनके मतलब की ‘जानकारी’ नहीं उपलब्ध करवाई थी। यह ‘जानकारी’ थी इस घटना के बाद ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन द्वारा की गई कड़ी निंदा! उन्होंने ब्रेनटेन टैरेंट नाम के उस आरोपित को ‘दक्षिणपंथी आतंकवादी’ बताकर तुरंत हमारे मीडिया गिरोह में बैठे भेड़ियों के लिए काम आसान कर दिया।

पेशे से पत्रकार किन्तु दिमाग से ‘न्यूट्रल’ सागरिका घोष और बरखा दत्त ने फ़ौरन इस लाइन को बेचकर सस्ती लोकप्रियता जुटाना शुरू कर दिया। लेकिन ‘येन केन प्रकारेण’ लोकप्रियता जुटाने की इस कला में वो अक्सर भूल जाती हैं कि वो वास्तविक मुद्दे और समस्या से एक बार फिर लोगों का ध्यान भटका चुके हैं।

जो पत्रकार पुलवामा आतंकवादी हमले के लिए जिम्मेदार जिहाद की मानसिकता को कभी जिहाद नहीं बोल पाए हैं, वो अगर इस प्रकार की घटना को तुरंत किसी ‘पंथ’ से जोड़ दें और इसे आतंकवाद घोषित करने के लिए क्रान्ति छेड़ देते हैं, तो समझ आता है कि यह सिर्फ और सिर्फ किसी विचारधारा के प्रति कुंठा के कारण ही ऐसा करते हैं। लेकिन फिर सवाल यह भी है कि अगर किसी विचारधारा के प्रति कुंठा आपको ऐसा करने पर मजबूर करती है, तो इस तरह से 49 मुस्लिमों को मारकर वीडियो बनाने वाले व्यक्ति को आप किस प्रकार से दोषी ठहरा पाएँगे?

इस घटना को दक्षिणपंथी आतंकवाद ठहराने पर प्रतिक्रिया होना भी स्वाभाविक है और वो लोग जिनके खिलाफ ऐसे मीडिया गिरोह के गिद्ध जहर भरकर बैठे हुए हैं, उन्होंने भी अपनी राय रखनी शुरू कर दी है।

दक्षिणपंथी विचारधारा को आतंकवाद से जोड़ने की हड़बड़ी कुछ लोगों में इतनी रहती है कि वो भूल जाते हैं कि ये उनकी हरकतों का ही नतीजा ही है कि लोग न्यूजीलैंड की इस घटना पर लिखना शुरू करते हैं – ‘Just for a change, it was not a Muslim person this time।’ यानि, यह चौंकाने वाली बात है कि आतंकवाद शब्द चर्चा में है और इसमें मजहब विशेष का योगदान नहीं है।

इतना ही नहीं, भारतीय मीडिया के समुदाय विशेष की इस नीच हरकत के जवाब में कुछ लोगों ने लिखा है, “न्यूज़ीलैंड में अभी एक मस्ज़िद पर हमला हुआ। फ़ॉर आ रिफ्रेशिंग चेंज, हमलावर शांतिदूत नहीं था। हमलावर न्यूज़ीलैंड का एक आम क्रिस्चियन नागरिक था। जिसे सजा देकर उसका भविष्य खराब नहीं किया जाना चाहिए, हो सकता है वो किसी हेडमास्टर का बेटा हो।” कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने एक कदम आगे जा कर इन्हीं पत्रकारिता के कलंकों पर कटाक्ष करते हुए लिखा है, “Just wondering, no one from our neutral Media Giroh has tweeted yet – “सरहदों पर बहुत तनाव है क्या, कुछ पता तो करो चुनाव है क्या।” ऐसा प्रश्न शायद इसलिए किया गया है क्योंकि पत्रकारिता से जुड़े कुछ लोगों ने पुलवामा आतंकी हमले को कॉन्सपिरेसी थ्योरी की सारी हदें पार करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनाव जीतने की साजिश बताया था।

दक्षिणपंथी अगर चाहें तो तख्तियाँ पकड़कर यूट्यूब पर उसे वायरल कर ब्रेनटेन टैरेंट को भटका हुआ नौजवान साबित करने का अभियान चला सकते हैं। या उसे निर्दोष साबित करने और क्षमायाचना के लिए इंटरनेट पर ऑनलाइन पिटीशन भी साइन करवा सकते हैं। लेकिन उन्हें आतंकवाद को आतंकवाद कहना आता है, ना कि गोदी मीडिया की तरह आतंकवादियों को विक्टिम कार्ड जैसे खिलौने देकर उन्हें समर्पण के बजाए गौरवान्वित महसूस करवाते हैं।

खुद को अन्य लोगों से ज्यादा सभ्य और पढ़ा-लिखा बताने वाला यह मीडिया गिरोह जब आतकंवाद को दक्षिणपंथ से जोड़ने का प्रपंच रचता है तो प्रतिक्रिया में लोग उन्हीं की भाषा में जवाब देकर अपना विरोध जताते हैं। इसके बाद यदि यही लोग न्यूजीलैंड में हुई 49 लोगों की मौत की खबर पर सोशल मीडिया पर जाकर ‘HAHA’ और ‘दिल’ बनाकर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं, तो ये सब मात्र आपके द्वारा उन्हें लगातार लज्जित किए जाने के प्रयासों पर प्रतिक्रिया मात्र है और आपने इस पर शिकायत करने का अधिकार खो दिया है।

आतंकवादी बुरहान वानी के प्रति उसके नाम की वजह से सहानुभूति रखकर उसे एक हेडमास्टर का बेटा बताने वाली बरखा दत्त कल से एक क्रांतिकारी अभियान पर हैं। बरखा दत्त किसी भी शर्त पर चाहती हैं कि आरोपित ब्रेनटेन टैरेंट को आतंकवादी घोषित किया जाए। यह दोहरा नजरिया ही इन लोगों को पत्रकार नहीं बल्कि सामाजिक ट्रॉल की उपाधि देता है और दक्षिणपंथी इन्हें पत्रकारिता का आतंकवाद कहने से नहीं हिचकिचाते हैं।

49 लोगों की हत्या पर HAHA करने वालों को एक बार सोचना चाहिए कि उनकी प्रतिक्रिया करने का तरीका तार्किक नहीं है। सवाल कीजिए तो जवाब मिलता है कि पुलवामा में जिहाद के नाम पर घटी आतंकवादी घटना पर भारतीय बलिदानी सैनिकों की मृत्यु की खबर पर ऐसे लोगों ने इसी प्रकार की अतार्किक प्रतिक्रिया दी थी, जिनके नाम में उनका मजहब नहीं ढूँढा जाना चाहिए। उनका मानना है कि यदि वो इस मीडिया गिरोह के लाडले हैं तो फिर ये लाडले बनने का अधिकार दक्षिणपंथियों को भी अवश्य मिलना चाहिए।

वास्तव में, यदि देखा जाए तो पुलवामा आतंकवादी घटना के बाद पाकिस्तान जैसे देश भी भारत को शान्ति और मानवता का पाठ पढ़ाते नजर आ रहे थे। इसमें इसी पत्रकारिता के समुदाय विशेष ने काफी चरमसुख की प्राप्ति की थी। लेकिन नरेंद्र मोदी और भारतीय सेना को  पाकिस्तान को सबक सिखाने का दृढ़ निश्चय लेता देख इमरान खान की हाँ में हाँ मिलाने और उसकी तारीफ करने वाला यह पत्रकारिता का धूर्त गिरोह यह भूल जाना चाहता है कि यही वो शांतिदूतों का देश पाकिस्तान है, जो लगातार हमारे देश में आतंकवाद को प्रोत्साहन देता रहा है। ये वही शांतिदूत हैं जो पिछले कई दशकों से भारत देश को लगातार खून और आतंकवाद का तोहफा देते आए हैं।

क्या है आतंकवाद की जड़

अब यदि भारत देश की सहिष्णुता की तुलना करें तो हम देखेंगे कि कल न्यूजीलैंड में हुई इस घटना के आरोपित ब्रेनटेन टैरेंट ने एक मेनिफेस्टो (घोषणापत्र) जारी कर लिखा था, “न्यूज़ीलैंड की डेमोग्राफी तेज़ी से बदल रही है, बाहर से इस्लामिक लोग तेज़ी से अंदर आ रहे हैं और अपने आप को मल्टीप्लाई कर रहे हैं, उसे रोको।”

अगर देखा जाए तो ब्रेनटेन टैरेंट का मुद्दा बहुत सरल था, सारी उथल-पुथल के बीच उसे भी सुना जाना चाहिए। वो एक हिंसक मानसिकता के द्वारा पीड़ित व्यक्ति था, जिसका मकसद समाज और अपनी सरकार को एक सन्देश देना था। बेशक ब्रेनटेन मानसिक रूप से विक्षिप्त व्यक्ति था, लेकिन उसके अंदर ये घृणा मात्र एक दिन में नहीं उपजी थी। यह निरंतर हुई कुछ घटनाओं का ही परिणाम था, जिसने उसे इतना बड़ा कदम उठाने के लिए मजबूर किया।

आरोपित ब्रेनटेन ने 49 लोगों को मार गिराने के पीछे कारण देते हुए इबा (Ebba) का जिक्र किया और कहा कि ऐसा कर के उसने Ebba का बदला लिया है। Ebba गूँगी-बहरी बच्ची थी, जो स्कूल से लौटते समय एक चोर की गाड़ी का शिकार हुई थी। यह हादसा 7 अप्रैल 2017 के दिन स्टॉकहॉम में हुई थी। Ebba स्कूल से आ रही थी और एक वैन ने Ebba को कुचल दिया। वैन चलाने वाला एक मुस्लिम शरणार्थी था। उस समय कल की घटना का आरोपित ब्रेनटेन यूरोप भ्रमण पर था और इस घटना ने उसके मन मष्तिष्क पर गहरा आघात पहुँचाया था। ब्रेनटेन ने अपने घोषणापत्र में लिखा है कि इस्लाम को अन्य धर्म पसन्द नहीं हैं और इस्लाम को जो शरण देता है, इस्लाम उसे भी अपना शिकार बनाने से नहीं चुकता है। इस प्रकार यह क्रिया पर प्रतिक्रिया का उदाहरण है। लेकिन मानवता को ताक पर इस तरह के घृणित कदम सिर्फ कोई पीड़ित मानसिकता का ही व्यक्ति कर सकता है और इस मानसिकता का कोई धर्म नहीं होता है।

साधन की पवित्रता

महात्मा गाँधी हमेशा साधन की पवित्रता पर बल देते थे। हिंसा और आतंकवाद किसी भी तरह से साधन और समाधान नहीं माने जा सकते हैं। इसी तरह से अपनी मानसिकता को ऊँचा साबित करने के लिए अन्य किसी मानसिकता को नीचा बताने का निरंतर प्रयास भी एक पवित्र साधन नहीं हो सकता है। अब आतंकवादियों के आतंकवाद की तुलना भारतीय मीडिया गिरोह के पत्रकारों से कर के देखिए। ये भी सिर्फ दूसरी मानसिकता और विचारधारा से ही संघर्षरत नजर आते हैं, जिस कारण इसे ‘पत्रकारिता का आतंकवाद’ कहा जाना चाहिए। इसी संघर्ष में हमारे देश का यह मीडिया गिरोह हर मुद्दे की प्रासंगिकता को नष्ट कर देता है, उसकी गंभीरता को हास्य का विषय बना देता है।

हमें अपनी वर्तमान स्थिति से बहुत ऊपर उठने की जरूरत है। आतंकवाद को समाधान समझना सिर्फ पीड़ित मानसिकता का स्वर है। इसे ‘पंथ’ और ‘वाद’ में बाँटकर हम इससे ‘इम्यून’ नहीं हो सकते। इस तरह की घटनाओं का शिकार कोई भी व्यक्ति हो सकता है, इसलिए मृतकों के शवों पर अपनी घृणित विचारधारा की दुकान चलाना और दूसरे को नीचा दिखाना ना ही सागरिका घोष को शोभा देता है और ना ही सोशल मीडिया यूज़र्स को! यह समझना जरुरी है कि आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष सामूहिक संघर्ष होना चाहिए। हम सबका प्रयास आतंकवाद का धर्म और पंथ तलाशना नहीं बल्कि ‘लेफ्ट-राइट-मुस्लिम-ईसाई’ छोड़कर आतंकवाद को जड़ से मिटाना होना चाहिए।

मुद्दों से भटकी कॉन्ग्रेस ने पकड़ी Meme की राह, पप्पू वाले वीडियो से लोगों ने जमकर लगाई लताड़

हालिया समय में चुनावी दंगल के माहौल में राजनीति इतनी गरमा गई है कि कॉन्ग्रेस के पास कुतर्क करने के अलावा और कोई मुद्दा ही नहीं बचा है। अब तो लगता है कि शायद कॉन्ग्रेस को अपनी जग-हँसाई का भी कोई मलाल नहीं है। यह कहना ग़लत नहीं होगा कि बदहवासी की पराकाष्ठा पर पहुँची कॉन्ग्रेस इस समय अपने सबसे दु:खद दौर से गुजर रही है। इस बात को प्रमाणित करने के लिए सोशल मीडिया पर कॉन्ग्रेस के आधिकारिक ट्विटर हैंडल से साझा की गई एक तस्वीर पर नज़र डालनी होगी। बता दें कि इस पुरानी तस्वीर को शेयर करना ख़ुद कॉन्ग्रेस के लिए ही भारी पड़ गया जब लोगों ने इस पर जमकर तंज कसे।

जैसा कि आप देख सकते हैं कि ट्रक के पीछे लिखा है, ‘कृपया हॉर्न न बजाए, मोदी सरकार सो रही है।’ सोशल मीडिया पर कॉन्ग्रेस के इस मज़ाक की लोग कड़ी आलोचना कर रहे हैं और प्रतिक्रियात्मक रूप से आपत्ति भी दर्ज कर रहे हैं। एक यूजर ने इसी तस्वीर का इस्तेमाल करते हुए लिखा, ‘चाइनीज़ गाँधी ने फोटोशॉप एक्सपर्टस भी चीन से हॉयर किए हैं’। वहीं एक अन्य यूज़र ने कॉन्ग्रेस की चुटकी लेते हुए लिखा कि क्या कॉन्ग्रेस World PhotoShop Day मना रही है?

कॉन्ग्रेस के इस मज़ाक का जवाब बीजेपी ने भी अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से दिया। इसमें एक वीडियो शेयर किया। इस वीडियो क्लिप ‘शेरों के तेवर नहीं बदलते’ में जनवरी 1992 से 2019 के पीएम मोदी के स्वरूप को दिखाया गया।

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एक यू़जर ने चुटकी लेते हुए लिखा कि इस तरह का एक ट्रक उन्होंने मध्य प्रदेश जाने के दौरान देखा, जिस पर लिखा था, ‘चलती है गाड़ी उड़ती है धूल, पप्पू है गाँधी परिवार की सबसे बड़ी भूल’। वहीं एक अन्य यूज़र ने कॉन्ग्रेस के चुनाव चिन्ह पर माला चढ़ाकर उस तस्वीर को शेयर किया। इसमें लिखा था, ‘अबकी बार अंतिम संस्कार’।

राहुल गाँधी द्वारा आतंकवादी मसूद अज़हर को ‘जी’ कहकर संबोधित करने वाली बात को एक यूज़र ने ट्विटर पर साझा करते हुए लिखा, ‘कृपया हॉर्न न बजाए, आतंकवादी ‘जी’ वैसे भी सो नहीं पा रहे’।

वैसे तो सोशल मीडिया पर फ़ज़ीहत होने से कॉन्ग्रेस पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता और इसीलिए वो बार-बार ऐसी बेहुदी हरक़तों को दोहराती रहती है, लेकिन लोग भी कुछ कम नहीं हैं वो भी कॉन्ग्रेस को बार-बार आईना दिखाने से नहीं चूकते। ऐसा ही जवाब अपने ट्विटर हैंडल से एक अन्य यूज़र ने दिया, जिसमें उन्होंने ऐसी तस्वीर साझा की जिसमें संसद की कार्यवाही के दौरान राहुल गाँधी सच में सो रहे थे।

एक यूज़र ने ट्विटर हैंडल से एक अनोखा जवाब दिया। इसमें ट्रक वाली तस्वीर का ही इस्तेमाल किया गया लेकिन कुछ लिखने की बजाए राहुल गाँधी द्वारा ख़ुद को ‘पप्पू’ स्वीकारने वाला वीडियो उस जगह लगाया।

सोशल मीडिया पर कॉन्ग्रेस के इस भद्दे मज़ाक का लगभग हर कोई अपने-अपने अंदाज़ में जवाब दे रहा है। ऐसे ही एक यूज़र हैं, जिन्होंने एक तस्वीर शेयर की, जिसमें एक ऑटोचालक ने अपने ऑटो को मोदी एक्सप्रेस का नाम दिया और उस पर गाँधी परिवार के नाम संदेश लिखा।

कॉन्ग्रेस की मानसिकता का स्तर लगातार गिरता जा रहा है जो उसकी दिमागी रूप से विक्षिप्त होने की दशा को भी उजागर करता है। सच पूछो तो मोदी को घेरना कॉन्ग्रेस की एक आदत बन चुकी है, जिसे वो छोड़ ही नहीं पा रही है फिर भले ही उसका अंजाम जग-हँसाई ही क्यों न हो।

#ऐसी दीवानगी देखी नहीं कहीं: 36 मिनट में राहुल ने 27 बार नरेंद्र मोदी को किया याद

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में आज जनसभा को संबोधित करने पहुँचे जहाँ वह प्रधानमंत्री पर लगातार निशाना साधते रहे। वहाँ राहुल गाँधी ने पीएम मोदी पर जीएसटी से लेकर राफेल डील और किसान सम्मान निधि योजना तक पर सीधा वार किया। पीएम के कार्यों पर सवाल उठाते हुए राहुल इस बीच यही भूल गए कि हर बात के बाद केवल मोदी का ही नाम दोहरा रहे हैं। उन्होंने 36 मिनट के भाषण में 27 बार प्रधानमंत्री मोदी का नाम लिया।

जी हाँ, चुनाव के नज़दीक आते ही पार्टियाँ अपने-अपने तरीके से मतदाताओं को रिझाने का काम कर रही हैं। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी भी देहरादून में रैली करने पहुँचे जहाँ पीएम पर निशाना साधते हुए राहुल को यह भी याद न रहा कि वो अपने भाषण में बार-बार सिर्फ़ मोदी का ही नाम ले रहे हैं। इस दौरान कॉन्ग्रेस अध्यक्ष प्रधानमंत्री मोदी को चौकीदार कहते हुए जनता को संबोधित करते रहे।

दून के परेड मैदान में रैली करते हुए मोदी का नाम लेने के अलावा राहुल ने वहाँ की जनता के सामने दावा किया कि इस बार कॉन्ग्रेस की सरकार बनने वाली है। उन्होंने बताया कि उनकी सरकार ऐतिहासिक कदम उठाएगी। अपनी न्यूनतम आय की गारंटी वाला वादा भी राहुल इस रैली दोहराते हुए दिखे।

भाषण में राहुल गाँधी ने सीधे-सीधे प्रधानमंत्री का नाम 27 बार लिया और साथ ही पुलवामा हमले के बाद सरकार के साथ खड़े रहने की बात कहने वाले राहुल ने मौक़ा देखते हुए भाजपा सरकार पर जमकर निशाना साधा। साथ ही चौकीदार चोर है के नारे भी लगाए।

शोपियाँ में महिला SPO खुशबू जान को आतंकियों ने मारी गोली, मौत

एक तरफ जहाँ जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों ने आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई तेज कर दी है। वहीं छटपटाहट में आतंकी पिछले कई दिनों से आम आदमियों और पुलिस बलों को भी निशाना बनाना शुरू कर दिया है। एक बार फिर आतंकियों जम्मू-कश्मीर के शोपियाँ में एक महिला विशेष पुलिस अधिकारी (SPO) खुशबू जान को आतंकियों ने गोली मार दी। हालाँकि, आनन-फानन में खुशबू को अस्पताल में भर्ती कराया गया, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका।

वहीं, पुलिस के साथ सुरक्षा बलों ने इलाके की घेराबंदी कर आतंकियों के खिलाफ सर्च ऑपरेशन तेज कर दिया है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, शोपियाँ के वेहिल इलाके में महिला पुलिस अधिकारी को आतंकियों ने उनके घर पर ही गोली मारी है।

बता दें कि इससे पहले बीते गुरुवार को पुलवामा में आतंकियों ने 40 वर्षीय एक व्यक्ति को जबरन उसके घर से निकालकर गोली मार दी थी। वहीं, बुधवार को पुलवामा में ही आतंकियों ने सेना के एक पूर्व जवान की भी गोली मारकर हत्या कर दी थी।

तेजस्वी ने कॉन्ग्रेस को कहा घमंडी, बिहार में गठबंधन गड्ढे में!

चुनाव की तारीख़ों की घोषणा होते ही सियासी हलचल काफी तेज हो गई है। सभी राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से चुनाव जीतने की कोशिशें करती हुई नज़र आ रही है। इसी बीच खबर आ रही है कि बिहार में आरजेडी और कॉन्ग्रेस के बीच हुए महागठबंधन में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। साफ तौर पर तो नहीं, मगर अप्रत्यक्ष रूप से इनके बीच की खटपट सामने आने लगी है।

बता दें कि महागठबंधन के बीच का ये मनमुटाव सीट के बँटवारे को लेकर है। इस मसले पर आरजेडी के नेता और पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने ट्विटर पर बिना किसी का नाम लिए कॉन्ग्रेस पर तंज कसते हुए उसे अहंकारी पार्टी बताया।

तेजस्वी ने अपने ट्वीट में कहा, ”संविधान और देश पर अभूतपूर्व संकट है। अगर अबकी बार विपक्ष से कोई रणनीतिक चूक हुई तो फिर देश में आम चुनाव होंगे या नहीं, कोई नहीं जानता? अगर अपनी चंद सीटें बढ़ाने और सहयोगियों की घटाने के लिए अहंकार नहीं छोड़ा तो संविधान में आस्था रखने वाले न्यायप्रिय देशवासी माफ़ नहीं करेंगे।”

तेजस्वी यादव के इस ट्वीट को कॉन्ग्रेस से इसलिए जोड़ा जा रहा है, क्योंकि इन्होंने ऐसे समय में ये बयान दिया है, जब आरजेडी और कॉन्ग्रेस के बीच सीटों के बँटवारे का मामला अटका हुआ है। इस मामले पर बिहार चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष और राज्य सभा सांसद अखिलेश सिंह ने कहा कि उनकी पार्टी बिहार में 11 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। हालाँकि, उम्मीदवारों के नाम की घोषणा होना अभी बाकी है।

महागठबंधन में राजद और कॉन्ग्रेस के बीच बढ़ती तल्खी को देखते हुए राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने खुद इस बारे में फैसला लेने का विचार किया है। आरजेडी प्रवक्ता और राज्यसभा सांसद मनोज झा ने बताया कि चुनाव से जुड़े सारे फैसले लालू प्रसाद यादव ही लेंगे। यानी कि महागठबंधन में सीटों के बँटवारे से लेकर आरजेडी के उम्मीदवारों के चयन में अंतिम मुहर लालू प्रसाद यादव की ही लगेगी।

प्लेन से ‘विदेश’ जाना था, लेकिन जाना पड़ा पैदल: आर्मी स्पेशल फ़ोर्स ने म्यांमार में ऐसे की थी सर्जिकल स्ट्राइक

भारत ने म्यांमार में अब तक दो सर्जिकल स्ट्राइक की हैं। एक जून 2015 में की गई थी और दूसरी हाल ही में फरवरी-मार्च (2019) के बीच चले ऑपरेशन में की गई जिसकी जानकारी कुछ दिन पहले ही मीडिया में आई। इस लेख में इन दोनों ऑपरेशन का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत किया गया है।

मीडिया में प्रकाशित खबरों के अनुसार फरवरी 17 से मार्च 2, 2019 के बीच भारतीय सेना की स्पेशल फ़ोर्स के जवानों ने म्यांमार में फिर से आतंकी ठिकानों पर हमला कर उन्हें ध्वस्त कर दिया। इस बार अराकान आर्मी को निशाना बनाया गया जो भारत के सहयोग से म्यांमार में निर्मित सित्वे पोर्ट के लिए खतरा बन चुके थे। ईरान में चाबहार के बाद अब म्यांमार में भी भारत के सहयोग से निर्मित सित्वे पोर्ट चालू हो चुका है जिसके बाद दक्षिण एशिया में भारत की रणनीतिक एवं व्यापारिक साख़ मज़बूत होनी निश्चित है। इसे चीन के बेल्ट एन्ड रोड इनिशिएटिव (BRI) के जवाब के रूप में देखा जा रहा है।

सित्वे पोर्ट का निर्माण कालादान मल्टी मोडल ट्रांज़िट ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट के अंतर्गत हुआ है जिसके बहुआयामी उद्देश्य हैं। कालादान प्रोजेक्ट भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों और कलकत्ता को म्यांमार के रखाइन और चिन राज्यों से जल तथा भूमि मार्ग से जोड़ने के लिए 2008 में प्रारंभ किया गया था। भारत ने इस पूरे प्रोजेक्ट पर लगभग ₹3170 करोड़ का निवेश किया है जिसमें से सित्वे पोर्ट और पालेत्वा में अंतर्देशीय जलमार्ग पर लगभग ₹517 करोड़ व्यय हुए हैं।

चीन ने कालादान परियोजना को बाधित करने के भरसक प्रयास किए थे। यदि चीन म्यांमार स्थित सित्वे पोर्ट पर अपना अधिकार स्थापित कर लेता तो बंगाल की खाड़ी में भारतीय नौसेना को अपनी प्रभावी क्षमता पुनः प्राप्त करना अत्यंत कठिन होता। चीन ने म्यांमार के आतंकी गुटों से भी सम्पर्क स्थापित किए थे ताकि उन्हें बांग्लादेश और म्यांमार के मार्ग से भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में घुसपैठ कराई जा सके।

अराकान आर्मी म्यांमार सरकार द्वारा घोषित आतंकवादी संगठन है जो लगातार म्यांमार की सेना ‘तत्मादॉ’ से लड़ता रहता है। दिसंबर 2015 में इस संगठन ने रखाइन प्रान्त में सित्वे के पास कई दिनों तक हिंसक संघर्ष किया था। उसके बाद भी म्यांमार की सेना के विरुद्ध कई बार लड़ाई हुई। सित्वे को सुरक्षित रखना भारत के हित में जरूरी था इसलिए भारतीय सेना ने म्यांमार सेना के साथ मिलकर अराकान आर्मी को सबक सिखाया।

इस ऑपरेशन में करीब एक दर्जन आतंकी कैम्पों को ध्वस्त कर दिया गया। टाइम्स ऑफ इंडिया में रजत पंडित की रिपोर्ट के अनुसार भारत ने पहले से ही म्यांमार की 1600 किमी लंबी सीमा पर ऑपरेशन सनराईज़ के अंतर्गत इन्फैंट्री, असम राइफल्स, स्पेशल फ़ोर्स और ड्रोन के अतिरिक्त बल तैनात किए हैं। म्यांमार और भारतीय सेना ने चिन स्टेट और साउथ मिज़ोरम स्थित बॉर्डर पिलर 1-9 पर मिलिट्री ऑपरेशन कर अराकान आर्मी के 10-12 कैंप तबाह कर दिए जो कचिन इंडिपेंडेंस आर्मी के साथ मिलकर काम कर रहे थे। कचिन इंडिपेंडेंस आर्मी चीन के प्रभाव में काम करने वाला संगठन है। पूरे ऑपरेशन में NSCN (K), NDFB (S), ULFA (I) के उग्रवादियों को भी मार गिराया गया।

इससे पहले 2015 में की गई सर्जिकल स्ट्राइक में डोगरा रेजिमेंट के 18 सैनिकों की हत्या का बदला लिया गया था। 4 जून 2015 को NSCN के आतंकवादियों ने मणिपुर के चंदेल ज़िले में भारतीय सेना के 18 जवानों की हत्या कर दी थी। इसका प्रतिशोध लेने के लिए भारतीय सेना ने म्यांमार की सीमा के 10 किमी भीतर तक स्पेशल फ़ोर्स भेजी थी। उस समय तत्कालीन COAS जनरल दलबीर सिंह को ब्रिटिश आर्मी की गोरखा रेजिमेंट की 200वीं वर्षगाँठ पर ब्रिटेन जाने का न्योता मिला था जो उन्होंने स्थगित कर दिया था।

स्पेशल फ़ोर्स की जिस यूनिट (21 PARA SF) को म्यांमार भेजा गया था उसे ‘वाघनख’ नाम दिया गया था। यह नाम छत्रपति शिवाजी के उस वाघनख पर रखा गया था जिससे उन्होंने अफजल खान का वध किया था। स्पेशल फ़ोर्स की 21 PARA यूनिट पहले 21 मराठा लाइट इन्फैंट्री बटालियन थी। बाद में उसे स्पेशल फ़ोर्स यूनिट बनाया गया था। म्यांमार जाने से पहले स्पेशल फ़ोर्स की यूनिट संयुक्त राष्ट्र के मिशन पर साउथ सूडान जाने वाली थी। तभी उन्हें दिल्ली से नॉर्थ ईस्ट आने के आदेश मिले। इस पर एक जवान ने मजाक में कहा, “कहाँ तो हम प्लेन से विदेश जाने वाले थे लेकिन अब पैदल जाना पड़ेगा।”

स्पेशल फ़ोर्स को दो ठिकानों पर हमले करने थे- एक जिसमें करीब 150-200 आतंकी थे और दूसरा छोटा था जिसमें 50-60 आतंकी थे। हमले की पूरी प्लानिंग 57 डिविज़नल हेडक्वार्टर इंफाल में बनाई गई। निर्धारित रणनीति के तहत तत्कालीन कोर कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल बिपिन रावत ने पूरी गोपनीयता के साथ स्पेशल फ़ोर्स की टुकड़ी को ऑपरेशन को अंजाम देने के आदेश दिए। 9 जून को 50 सैनिकों की टुकड़ी म्यांमार के घने जंगलों में घुसी जहाँ बड़े कैंप पर अचानक हमला किया गया। उस कैंप में लगभग 150 आतंकी थे। स्पेशल फ़ोर्स को स्पष्ट निर्देश थे कि मारे गए आतंकियों की लाशें गिनने या फोटो लेने के लिए रुकना नहीं है। उन्हें काम खत्म कर लौटने का आदेश था।

स्पेशल फ़ोर्स के सर्जिकल स्ट्राइक कर लौटने के बाद अजित डोभाल और विदेश सचिव जयशंकर ने म्यांमार जाकर राजनयिक संबंध मजबूत किए जिसके कारण हमें म्यांमार से सटी अंतरराष्ट्रीय सीमा पर पूर्वोत्तर राज्यों में उग्रवादी और आतंकी संगठनों को समाप्त करने में म्यांमार आर्मी की सहायता मिली।  

भारत के लिए सित्वे पोर्ट के महत्व को जानने के लिए यहाँ पढ़ें।

स्मार्ट पोल्स लॉन्च करने को तैयार BSNL-नोकिया: 5G इंटरनेट के साथ वायु प्रदूषण पर भी रखेगा नज़र

नोकिया-बीएसएनएल के सहयोग से बना पहला स्मार्ट पोल बीएसएनएल के परिसर में संचालन प्रारंभ करने के लिए तैयार है। इकोनोमिक टाइम्स में छपी खबर के अनुसार 21 मार्च (गुरुवार) को इस स्मार्ट पोल का परिचालन प्रारंभ हो सकता है।

यह पोल नोकिया के इंटेलिजेंट इन्फ्रास्ट्रक्चर ट्रांसफॉर्मेशन प्रोग्राम का अंग है।

वायु प्रदूषण रोकने में सहायक

इंडिया मोबाइल कॉन्ग्रेस के दौरान प्रेस से बात करते हुए बीएसएनएल के चेयरमैन व मैनेजिंग डाइरेक्टर अनुपम श्रीवास्तव ने कहा था कि इन पोल्स का विपणन और प्रसार (marketing and deployment) नोकिया और बीएसएनएल संयुक्त तौर पर करेंगे। “यह स्मार्ट पोल्स वायु प्रदूषण के स्तर को समय रहते भाँप कर सम्बंधित विभाग को सूचित कर देंगे। यह परली जलाने पर वायु प्रदूषण के स्तर में तेज़ बढ़ोतरी को भी समय रहते दर्ज कर लेगा (ताकि उसकी रोकथाम हो सके)।

गौरतलब है कि भारत के लिए वायु प्रदूषण एक अति-गंभीर और उतना ही विवादस्पद विषय के साथ-साथ चुनौती भी है। पिछले दो वर्षों से सुप्रीम कोर्ट दिवाली पर पटाखे चलाने पर किसी-न-किसी प्रकार रोक लगाने, या कम-से-कम कमी लाने, के लिए प्रयासरत है।

(यह बात अलग है कि खुद पटाखे बेचने वालों को अवमानना की चेतावनी देने के बाद हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अचानक ही यह सवाल कर डाला कि प्रदूषण के और बड़े-बड़े कारकों, जैसे वाहनों आदि के बदस्तूर जारी रहते हुए आखिर लोग पटाखों से ही क्यों नाराज़ हैं?)

दिल्ली के मुख्मंत्री अरविन्द केजरीवाल ने भी दिल्ली में वाहनों से वायु प्रदूषण रोकने के लिए ऑड-ईवेन फार्मूला लागू करने का प्रयास किया था।

और भी हैं प्रयोग

गत अक्टूबर में बीएसएनएल ने ₹46 लाख प्रति पोल की दर से नोकिया को 50 पोल की आपूर्ति के लिए अनुबंधित किया था।

इन स्मार्ट पोल्स का प्रयोग शहरों में वाई-फाई सुविधा प्रदान करने के लिए (केजरीवाल जी ध्यान दें), मोबाइल टॉवर, स्ट्रीट लाइटिंग और यहाँ तक कि सुरक्षा हेतु सर्विलांस के लिए भी हो सकता है।

5G की दौड़ में भी सहायक

4G की दौड़ में भले ही बीएसएनएल पिछड़ गया हो (बीएसएनएल के 4G प्लान को दूरसंचार विभाग ने हाल ही में मंजूरी दी है जबकि अधिकांश निजी सेवा-प्रदाताओं ने 2016 के अंत से लेकर 2017 की शुरुआत के बीच अपने 4G परिचालन प्रारंभ कर दिए थे), पर इस स्मार्ट पोल उपक्रम के ज़रिए वह 5G की दौड़ में शायद सबसे आगे निकल गया है। तकनीकी पोर्टल TechHerald के अनुसार यह पोल्स बीएसएनएल के आधारभूत ढाँचे को महत्वपूर्ण तकनीकों जैसे 5G व इन्टरनेट-ऑफ़-थिंग्स (IoT) के लिए तैयार करेंगे।