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जबरन मतान्तरण व मॉब लिंचिंग के शिकार होते पाकिस्तानी ईसाई, जड़ में है ईशनिंदा कानून

पाकिस्तान में ईशनिंदा क़ानून एक ऐसा ख़तरनाक हथियार बन कर उभरा है, जिसका दुरूपयोग कर वहाँ का हर आदमी किसी दूसरे धर्म के लोगों से हुई निजी प्रतिद्वंदिता या लड़ाई-झगड़े को इस्लाम बनाम अन्य का रूप दे सकता है। पाकिस्तानी हिन्दुओं व सिखों की बात करने के साथ-साथ हम पाकिस्तानी ईसाईयों की भी बात करेंगे, जो पाकिस्तान में अल्पसंख्यक हैं और इस्लामिक क़ानून की गलत धाराओं का शिकार होते रहे हैं।

अगर हम पाकिस्तान का इतिहास और अल्पसंख्यकों की बात करें तो आज़ादी के दौरान गुज़रे कुछ वर्षों को छोड़ दिया जाए तो पाकिस्तान में ये स्थिति तब नहीं थी, जो आज है। 1971 में पाकिस्तान खंडित हुआ और भारत की मदद से पूर्वी पाकिस्तान के लोगों को पाक सेना के बर्बर अत्याचार से मुक्ति मिली। पाकिस्तान में रह रहे बाकी अल्पसंख्यक भी वहाँ से निकल लिए। जो बचे-खुचे रह गए, उनकी रक्षा करने में भी वहाँ का शासन असमर्थ साबित हुआ और उन पर अत्याचार और बढ़ते चले गए। इसके आधार पर हम कह सकते हैं कि 1971 के बाद का जो पाकिस्तान है, वहाँ अल्पसंख्यकों के लिए कोई जगह नहीं बची और तरह-तरह के नियम-क़ानून बना कर उन्हें प्रताड़ित करना तेज़ कर दिया।

पाकिस्तान में ईसाईयों की स्थिति समझने के लिए हमें लगभग 6 वर्ष पीछे जाना पड़ेगा। 22 सितंबर 2017 को पेशावर के क्वेटा स्थित ऑल सेंट्स चर्च में इस्लामिक आतंकियों ने आत्मघाती हमला किया। यह कोई छोटा-मोटा हमला नहीं था। इसमें 127 लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा और 250 से भी अधिक गंभीर रूप से घायल हुए। इस हमले की जिम्मेदारी पाकिस्तानी तालिबान ने ली थी। ये पाकिस्तान में ईसाईयों पर हुए सबसे ख़ूनी हमलों में से एक है। आतंकियों ने दावा किया कि ईसाईयों व अन्य धर्मों के लोगों पर ऐसे आतंकी हमले होते रहेंगे क्योंकि पाकिस्तानी इसे मुस्लिमों के दुश्मन हैं। बाद में इस हमले की जिम्मेदारी लेने वाले आतंकी समूह जुंदाल्ला से तालिबान ने पल्ला झाड़ लिया। इस हमले के बाद कई पाकिस्तानी ईसाईयों ने डर के मारे चर्च जाना ही छोड़ दिया। इस हमले के बाद भी ऐसे कई हमले हुए।

आज से ठीक 4 वर्ष पहले 15 मार्च 2015 में लाहौर स्थित रोमन कैथोलिक चर्च पर आतंकी हमला हुआ। हमेशा की तरह ये हमले इस्लामिक चरमपंथी आतंकियों द्वारा किए गए थे। मजे की बात तो यह कि इस हमले के आरोप में गिरफ़्तार तालिबानियों के भारत से कनेक्शन बताए गए। कहा गया कि उन्हें भारत से वित्तीय सहायता मिली थी। भारत में धार्मिक स्वतन्त्रता की स्थिति यह है कि यहाँ बलात्कार के आरोपी पादरी को भी भीड़ द्वारा सर-आँखों पर बिठाया जाता है और उस पर आरोप लगाने वाली ननों पर चर्च कार्रवाई करता है (जो कि गलत है)। पाकिस्तान में ईसाईयों पर हो रहे अत्याचारों की यह एक बानगी भर है। असली अत्याचार तो उन पर हो रहा है जो मरने से पहले भी हज़ार बार मरते हैं। पाकिस्तान के 2% ईसाई वहाँ की जनसंख्या का एक बहुत ही छोटा भाग हैं। प्रतिशत के मामले में भारत में सिखों की जनसंख्या (1.7%) इस से कम है। भारत में सेना से लेकर शासन तक सिखों का अहम योगदान रहा है और वे लगभग सभी विभागों में विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर काबिज़ हैं।

वैसे, इस मामले में भारत और पाकिस्तान की तुलना बेमानी है। जहाँ भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है वहीं ‘इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान’ एक इस्लामिक देश है जो सभी धर्मों को स्वतन्त्रता देने का झूठा दावा करता रहा है। पाकिस्तान दुनिया का इकलौता ऐसा देश है, जिसका बँटवारा मज़हब के आधार पर हुआ था। अभी-अभी ख़बर आई है कि इस्लामिक नियम-कानूनों की आड़ में पाकिस्तान में धीरे-धीरे अल्पसंख्यकों को साफ़ किया जा रहा है। यूरोप में रह रहे पाकिस्तानी ईसाईयों ने पाकिस्तान में ईशनिंदा क़ानून की आड़ में अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किया। उन्होंने गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि उनकर घर की लड़कियों को ईशनिंदा क़ानून की आड़ में अपहृत कर के इस्लाम में धर्मान्तरण कर दिया जाता है। आर्टिकल 295C के ख़िलाफ़ अपना विरोध दर्ज कराते हुए उन्होंने बताया कि व इस से नाख़ुश हैं क्योंकि इसका बड़े तौर पर दुरूपयोग हो रहा है। उन्होंने इसे एक ख़तरनाक क़ानून करार दिया।

प्रदर्शन का नेतृत्व करने वालों ने कहा कि पाकिस्तान में ईसाईयों का धीमे-धीमे नरसंहार किया जा रहा है। उनका यह डर बेजा नहीं है। ‘United States Commission On Religious Freedom’ की वार्षिक रिपोर्ट 2018 में भी कहा गया है कि पाकिस्तान में नॉन-मुस्लिमों के घर की लड़कियों व महिलाओं का जबरन धर्मान्तरण एक आम बात है। रिपोर्ट में कहा गया है कि धारा 295 व 298 के अंतर्गत ईशनिंदा के तहत अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित किया जा रहा है। अकेले 2011 से 2017 के बीच 100 से अधिक लोगों पर ईशनिंदा के तहत कार्रवाई की गई और उनमे से 40 ऐसे हैं, जिन्हे मृत्युदंड या आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई है।

लाहौर चर्च हमले के बाद मृतकों के परिवार वालों की बुरी हालत

ये लोग जेल में बंद न्यायालय अंतिम वर्डिक्ट का इन्तजार करते रहते हैं। अमेरिका की रिपोर्ट में कहा गया है कि पड़ोसी के साथ हुए झगड़े, कार्यस्थल पर हुए झगड़ों से लेकर निजी लड़ाई तक में ईशनिंदा का दुरूपयोग किया जाता है। कई मामलों में तो मुद्दे को अदालत तक पहुँचने ही नहीं दिया जाता, भीड़ ही निर्णय ले लेती है। ऐसे मामलों में भीड़ का निर्णय मृत्युदंड होता है। मॉब लॉन्चिंग की इन घटनाओं में बेचारे अल्पसंख्यक मारे जाते हैं। ईशनिंदा का मामला होने के कारण सरकार भी दोषियों के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई करने से डरती है।

अब हम आपको ईशनिंदा क़ानून के उस पहलू से परिचित कराने जा रहे हैं, जो पाकिस्तान के पिछड़ेपन का भी कारण बनता जा रहा है। इसकी पूरी प्रक्रिया को यूँ समझिए। मुस्लिम समाज में तीन तलाक़, बालविवाह, धर्मान्तरण से लेकर कई सामाजिक कुरीतियाँ हैं। पाकिस्तान की सेना आतंकियों के साथ मिल कर कई साज़िशें रचती रहती है। हर समाज में कुछ ऐसे लोग होते हैं जो गलत के ख़िलाफ़ आवाज उठाते हैं। समाज में ऐसे भी जागरूक व्यक्ति होते हैं जो अपनी सेना या सरकार को गलत रास्ते पर चलते देख उन्हें सचेत करते हैं। ये कार्य सामाजिक आंदोलन चला कर किए जाते हैं, डिजिटल मीडिया द्वारा ब्लॉग लिख कर किए जाते हैं या न्यूज़ चैनलों पर अपनी राय रख कर भी किए जा सकते हैं। लेकिन, क्या आपको पता है कि पाकिस्तान में ऐसे समाजसेवियों या जागरूक व्यक्तियों के साथ क्या किया जाता है? उन पर ईशनिंदा का क़ानून थोप कर उन्हें ही समाज से अलग-थलग कर दिया जाता है। अमेरिका की रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र करते हुए कहा गया है कि ऐसे व्यक्तियों के पास पाकिस्तान छोड़ने के अलावा कोई चारा नहीं बचता, भले ही वे अदालत से निर्दोष ही क्यों न साबित हो गए हों।

अगर आपको इस बारे में कोई भी शक हो तो एक उदाहरण लेते हैं, जिसके बाद आपको पूरा माजरा समझ में आ जाएगा। जुनैद हफ़ीज़ पाकिस्तान के एक प्रोफेसर हैं। मुल्तान स्थित बहाउद्दीन जकारिया यूनिवर्सिटी में महिलाधिकारों को लेकर एक सम्मलेन आयोजित करने की सजा उन्हें ईशनिंदा क़ानून का आरोपित बनाकर दी गई। इसका अर्थ यह हुआ कि पाकिस्तान के शैक्षणिक संस्थान भी इस से अछूते नहीं हैं। आधुनिक विचारों व प्रगतिशील कार्यों के लिए वहाँ कोई जगह नहीं है। जुनैद हाफिज के वकील राशिद रहमान को उनके दफ़्तर में ही मार दिया गया। जब पाकिस्तान में मानवाधिकार की बात करने वाले मुस्लिमों व सामाजिक कार्यकर्ताओं तक पर भी ईशनिंदा क़ानून थोप दिया जाता है तो अल्पसंख्यकों की हालत आप समझ ही सकते हैं। इसी तरह छात्र समाजिक कार्यकर्ता मशाल ख़ान को दिन-दहाड़े मार डाला गया। उन्हें मारने वाले कोई आतंकी नहीं थे बल्कि छात्रों व यूनिवर्सिटी प्रशासन की भीड़ थी।

आशिया बीबी मामले के बारे में आपको पता ही होगा। आठ वर्षों तक झूठे ईशनिंदा के आरोप में जेल में बंद अपनी रिहाई का इन्तजार कर रही इसे महिला आशिया को पाकिस्तानी अदालत ने फाँसी की सज़ा सुनाई थी। आम झगड़े का मामला ईशनिंदा बन गया और उनकी ज़िंदगी का लगभग एक दशक बर्बाद हो गया, प्रताड़ना झेलनी पड़ी सो अलग। उनकी तरफ से बोलने पर पाकिस्तान में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री शाहबाज़ भाटी और पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर की ह्त्या कर दी गई। ईशनिंदा क़ानून का कुचक्र इतना व्यापक है कि पाकिस्तान सरकार के मंत्री और राज्यपाल तक को नहीं छोड़ा गया। शाहबाज़ भाटी पाकिस्तान के तत्कालीन मंत्रिमंडल में एकमात्र ईसाई सदस्य थे। वे पाकिस्तान के पहले अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री थे। जब बड़े-बड़े पदों पर बैठे नेताओं तक की हालत यह है तो आम ईसाईयों की व्यथा समझी जा सकती है।

बीबीसी की एक रिपोर्ट में कहा गया था कि पाकिस्तान में अधिकतर ईसाई वही लोग हैं जिन्हे ब्रिटिश राज के दौरान धर्मान्तरित किया गया था। उस दौरान ग़रीब हिन्दुओं को ईसाई बनाना आसान हुआ करता था। जाती प्रथा की आड़ में अपनी सरकार के बैनर तले मिशनरीज ने निर्धन हिन्दुओं को ईसाई बनाया। लेकिन, तब भी उनकी सामाजिक हालत वही रहीव् आज भी पाकिस्तान स्थित पंजाब में अधिकतर ईसाई ग़रीब हैं और मज़दूरी कर के अपना घर-परिवार चलाते हैं। ब्रिटिश राज के समय गोवा से कराँची आकर बेस ईसाई ज़रूर अमीर है लेकिन उनकी संख्या बेहद कम है। पाकिस्तान के सेंट्रल पंजाब स्थित गोजरा शहर में कई ईसाईयों के घर जला डाले गए। 50 के आसपास घरों में आग लगा दी गई जिनमे महिलाएँ व बच्चे मारे गए थे। पुलिस भी आतताइयों का ही साथ देती है।

ख़ुद पाकिस्तान के तत्कालीन अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री शाहबाज़ भाटी ने कहा था कि उन्होंने घटना के कुछ दिन पहले ही गोजरा शहर पहुँच कर स्थानीय प्रशासन से ईसाईयों की सुरक्षा सुनिश्चित करने को कहा था। साथ ही उन्होंने स्थानीय पुलिस पर हत्यारों का साथ देने का भी आरोप लगाया। इन घटनाओं का सीधा अर्थ यह निकलता है कि आप पाकिस्तान में चाहे जहाँ भी रहें, अगर आप अल्पसंख्यक हैं तो आपको इस्लामिक कट्टरपंथियों का कोपभाजन बनना पड़ेगा। इसी तरह 2005 में फैसलाबाद में ईसाई विद्यालयों व चर्चों को जला दिया गया था। ईसाई पाकिस्तान में न चर्च में सुरक्षित हैं और न घर में। उनके बच्चे स्कूलों में भी सुरक्षित नहीं हैं। एक ईसाई चैरिटी के 6 कार्यकर्ताओं को उनके दफ़्तर में ही मार डाला गया।

तालाब का गंदा पानी पीने को मजबूर थे लोग, 70 साल के दैत्री नायक ने बदली गाँव की क़िस्मत

शनिवार को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उड़ीसा के समाजसेवी दैत्री नायक को देश के चौथे बड़े सम्मान पद्म श्री अवॉर्ड से सम्मानित किया। बता दें कि 70 साल के दैत्री नायक उड़ीसा के कोइन्झर ज़िले के बैतरणी गाँव के निवासी हैं। ये गाँव बांसपाल ब्लॉक के अंतर्गत आता है।

बांसपाल ब्लॉक के साथ साथ आस पास के तेलकोई और हरिचंदपुर ब्लॉक के लोग भी पानी की समस्या से जूझ रहे थे। यहाँ पर पीने के पानी और सिंचाई की कोई व्यवस्था नहीं थी। पानी से संबंधित किसी भी काम के लिए लोगों को बारिश के पानी पर ही निर्भर रहना पड़ता था। पहाड़ी इलाका होने की वजह से सरकारी तंत्र के लिए भी यहाँ पर पानी की व्यवस्था कर पाना काफी मुश्किल हो रहा था। जिससे लोग काफी परेशान थे, मगर कुछ कर नहीं पा रहे थे।

सभी लोग हार मानकर परिस्थिति के साथ समझौता करने पर विवश हो गए। जब ग्रामीणों ने इसे ही अपनी किस्मत मान ली, तब 70 वर्षीय दैत्री ने इस समस्या को हल करने का बीड़ा उठाया। दैत्री ने गाँव की किस्मत को बदलने की ठान ली। पथरीली जमीन होने के बावजूद दैत्री ने अपने परिवार के साथ नहर बनाने का काम शुरू किया। पानी के इंतजाम के लिए दैत्री ने तीन साल तक पहाड़ों को तोड़ा और खुदाई की। इस दौरान दैत्री का परिवार पत्थर हटाने में उसकी मदद करता था। दैत्री ने तीन साल तक लगातार मेहनत करने के बाद गाँव में एक किलोमीटर लंबी नहर खोद डाली। इससे गाँव के लोगों के पानी की समस्या खत्म हो गई।

दैत्री नायक के इस साहसिक कार्य के बाद उन्हें ‘उड़ीसा का मांझी’ भी कहा जाने लगा। आपको बता दें कि दशरथ मांझी ने अपने गाँव में सड़क की समस्या को दूर करने के लिए पहाड़ को काटकर रास्ता बनाया था। वो बिहार में गया के पास के गहलौर गाँव के एक गरीब मजदूर थे। उन्होंने अकेले ही 360 फुट लंबी, 30 फुट चौड़ी और 25 फुट उँचे पहाड़ को काट कर एक सड़क बना डाली। 22 वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद दशरथ ने इस सड़क को बनाया। उनकी बनायी सड़क ने अतरी और वजीरगंज ब्लॉक की दूरी को 55 किमी से 15 किमी कर दिया।

दैत्री के द्वारा नहर बना दिए जाने से अब लोगों को पानी की समस्या से छुटकारा मिल गया है। पहले तो लोगों को मजबूरी में तालाब का गंदा पानी पीना पड़ता था। जिससे लोग काफी बीमार भी पड़ते थे। दैत्री से गाँव के लोगों की ये परेशानी देखी नहीं गई और उन्होंने गाँव के लिए वो कर दिखाया, जिसे करने में सरकार भी सफल नहीं हो पा रही थी। दैत्री के इस कार्य से उड़ीसा के सीएम नवीन पटनायक इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उनके घर जाकर उनके साहस और कर्मठता को सराहा।

टुकड़े-टुकड़े गैंग के सरगना उमर ख़ालिद का पिता पश्चिम बंगाल से चुनाव लड़ने की तैयारी में

JNU के अल्ट्रा-लेफ्ट विंग के सरगना उमर ख़ालिद के पिता सैयद क़ासिम रसूल इलियास पश्चिम बंगाल की जंगीपुर सीट से आगामी लोकसभा चुनाव लड़ने की पूरी तरह तैयारी में है। इलियास प्रतिबंधित आतंकी संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ़ इंडिया (SIMI) का पूर्व सदस्य है, जिसे 2001 में प्रतिबंधित कर दिया गया था।

ख़बरों के मुताबिक़, इलियास मुर्शिदाबाद ज़िले की मुस्लिम बहुल सीट जंगीपुर सीट से वेलफेयर पार्टी ऑफ़ इंडिया (WPI) के टिकट पर चुनाव लड़ेंगे। यह सीट पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के बेटे अभिजीत के पास थी। 2011 की जनगणना के अनुसार, मुस्लिम निर्वाचन क्षेत्र की आबादी का 61.79% है।

सिमी के पूर्व सदस्य इलियास ने मुख्य रूप से मुर्शिदाबाद के लोगों की बिगड़ती हालत का हवाला देते हुए कहा, “सात से आठ लाख लोग इस क्षेत्र से कोलकाता चले गए हैं बावजूद इसके यहाँ रोज़गार के अवसर बहुत कम हैं। जंगीपुर में अच्छी गुणवत्ता वाले जूट का उत्पादन होता है, लेकिन उन्हें स्थानीय स्तर पर संसाधन युक्त नहीं किया जा पाता और इसलिए लोगों को कोलकाता जाना पड़ता है। मैं अपने अभियान में ऐसे मुद्दों को उजागर कर रहा हूँ।”

वेलफेयर पार्टी ऑफ़ इंडिया को मुख्य रूप से दलित और अल्पसंख्यक मुद्दों को उठाने के लिए जाना जाता है। जबकि वाम मोर्चे ने अपनी सीट-बँटवारे की व्यवस्था के अनुसार जंगीपुर सीट कॉन्ग्रेस को दे दी है, लेकिन WPI मुस्लिम वोटों को काटने में अपनी अहम भूमिका निभा सकती है।

दिलचस्प बात यह है कि, इलियास ने भारतीय चुनाव प्रक्रिया का हिस्सा बनने का फैसला ऐसे समय में किया है जब उसका बेटा उमर ख़ालिद, जो ‘ब्रेकिंग-इंडिया’ ब्रिगेड का हिस्सा होने के साथ-साथ ‘भारत तेरे टुकडे़ होंगे, इंशाल्लाह इंशाल्लाह चिल्लाने, ‘अफ़ज़ल हम शर्मिंदा है, तेरे क़ातिल ज़िंदा है’ जैसे देशद्रोह के नारे लगाने का दोषी है और उस पर देशद्रोह के आरोप भी लगे हैं। 1200 पेज़ की चार्जशीट में कथित तौर पर उसके नाम का उल्लेख है जिसमें JNU के अध्यक्ष कन्हैया कुमार, उमर ख़ालिद और अनिर्बान भट्टाचार्य शामिल थे।

लोकसभा चुनाव 2019 : बिहार में NDA ने सीटों के बँटवारे का किया ऐलान

लोकसभा चुनाव 2019 के लिए NDA ने बिहार के लिए 40 सीटों के बँटवारे की घोषणा कर दी है। सीटों के इस बँटवारे से यह साफ़ हो गया है कि बीजेपी, जेडीयू और एलजेपी किन सीटों से चुनाव लड़ने की तैयारी में है। बता दें कि लोक जन शक्ति पार्टी नवादा के संसदीय क्षेत्र से ही चुनाव लड़ेगी।

आइये सीटों के बँटवारे पर एक नज़र डालते हैं, जो इस प्रकार हैं :

भारतीय जनता पार्टी

  • पटना साहिब
  • पाटलीपुत्र
  • सारण
  • आरा
  • बक्सर
  • औरंगाबाद
  • मधुबनी
  • बेगुसराय
  • उजियारपुर
  • पूर्वी चंपारण
  • शिवहर
  • दरभंगा
  • पश्चिम चंपारण
  • मुजफ्फरपुर
  • अररिया
  • महाराजगंज
  • सासाराम

जनता दल यूनाइटेड

  • सुपौल
  • किशनगंज
  • कटिहार
  • गोपालगंज
  • सीवान
  • भागलपुर
  • सीतामढ़ी
  • जहानाबाद
  • काराकाट
  • गया
  • पूर्णिया
  • मधेपुरा
  • बाल्मिकीनगर
  • मुंगेर
  • बांका
  • झांझरपुर
  • नालंदा

लोकजन शक्ति पार्टी

  • वैशाली
  • हाजीपुर
  • समस्तीपुर
  • खगड़िया
  • नवादा
  • जमुई

पिछले काफी समय से यह उम्मीद लगाई जा रही थी कि नवादा सीट एलजेपी के खाते में ही जा सकती है। सीटों के इस बँटवारे से अब यह बात स्पष्ट हो गई है। वहीं भागलपुर की सीट जेडीयू के हिस्से आई है और इसी के साथ शाहनवाज़ हुसैन के चुनाव लड़ने की स्थिति पर सवालिया निशान अभी भी बरक़रार है। इससे पहले 2014 के चुनाव में शाहनवाज़ हुसैन को इसी सीट पर हार का सामना करना पड़ा था।

कीर्ति आज़ाद के पार्टी छोड़ने के बाद भी पटना सीट को बीजेपी ने अपने पाले में रखा हुआ है। वहीं शत्रुघ्न सिन्हा के चुनाव लड़ने पर भी संशय बना हुआ है। ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि बीजेपी इस सीट पर अपना कोई नया उम्मीदवार उतारेगी। इसके अलावा बीजेपी ने पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि बिहार कोटे से पाँचो केंद्रीय मंत्री चुनाव लड़ेंगे।

जानकारी के अनुसार, बिहार में बीजेपी और जेडीयू 17-17 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे और एलजेपी के हिस्से में 6 सीटें आई हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में NDA ने बिहार की 31 सीटों पर जीत दर्ज की थी। लेकिन उस समय जेडीयू का एनडीए से किसी प्रकार का गठबंधन नहीं था। अबकी लोकसभा चुनाव-2019 में बीजेपी ने जेडीयू के साथ सीटों के बँटवारे पर सहमति बनाने के लिए अपनी जीती हुई 5 सीटें छोड दी हैं।

42 वर्षों से मथुरा में गोसेवा कर रही जर्मन मूल की सुदेवी गोवर्धन को पद्मश्री

जर्मन महिला फ्रेड्रिन इरिन ब्रूनिंग उर्फ़ ‘सुदेवी दासी गोवर्धन’ को केंद्र सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया है। सुदेवी राधाकुंड धाम में विगत 42 वर्षों से गौसेवा कर रहीं हैं। बीमार और असहाय गायों की सेवा करने के कारण उन्हें ‘गायों की मदर टेरेसा’ भी कहा जाता है। उन्हें पद्म सम्मान मिलने का समाचार पाकर स्थानीय निवासी भी ख़ुश हुए और गौशाला पहुँच कर उन्होंने सुदेवी को माला पहनाकर सम्मानित किया। उन्हें शनिवार (मार्च 16, 2019) को राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद के हाथों पद्म श्री से सम्मानित किया गया।

पाँच बीघा के क्षेत्र में फैले सुरभि गौशाला का संचालन कर रही सुदेवी ने 1,500 से भी अधिक गायों को पाल रखा है, जिनकी वह लगातार देखभाल करती हैं। इन गायों में से अधिकतर बीमार, नेत्रहीन या अपाहिज हैं। इनमें से 52 गायें नेत्रहीन है जबकि 350 पैरों से अपाहिज है। उनके पैरों की नियमित मरहम-पट्टी की जाती है। सुदेवी के अनुसार, जब मंत्रालय द्वारा उन्हें पुरस्कार मिलने की जानकारी दी गई, तब उन्हें समझ नहीं आया कि क्या हो रहा है। फिर स्थानीय निवासियों ने उन्हें इस से अवगत कराया। ये तब की बात है, जब सरकार ने उन्हें पद्मश्री देने की घोषणा की थी।

अपने माता-पिता की इकलौती संतान फ्रेड्रिन 42 वर्ष पहले भारत भ्रमण पर आई थी। इस दौरान उन्होंने ब्रज आकर श्रीकृष्ण के भी दर्शन किए। कृष्ण-भक्ति ने उन्हें अपनी तरफ ऐसा खींचा कि उन्होंने भारत में रहने की ठान ली। ब्रज में उन्होंने एक गाय भी पाल रखी थी, जिसके बीमार होने के बाद उन्होंने उसकी काफ़ी देखभाल की। इसके बाद वह जहाँ भी बीमार गाय देखती, उसकी देखभाल और सेवा में लग जाती। इसके बाद तो जैसे उन्होंने गोसेवा को ही अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। उन्होंने अपना पूरा जीवन ही गोसेवा को समर्पित कर दिया।

सुदेवी के पिता तीस वर्ष पहले तक दिल्ली स्थित जर्मन दूतावास में कार्यरत थे। इकलौती संतान होने के कारण उन्होंने पिता से मिलने वाली सारी धनराशि को गोसेवा में ही ख़र्च किया। उनकी गौशाला में गायों के लिए एक स्पेशल एम्बुलेंस भी है। अगर किसी गाय की मृत्यु निकट आ जाए और उसके बचने की कोई संभावना न रहे, तब सुदेवी उसे गंगाजल का सेवन कराती है। मरणोपरांत गायों के शरीर का अंतिम संस्कार भी पूरे विधि-विधान के साथ संपन्न किया जाता है।

सुदेवी बताती हैं कि गायों की सेवा में हर महीने ₹35 लाख तक ख़र्च होते हैं। गायों का इलाज डॉक्टरों द्वारा करवाया जाता है। सुदेवी दानदाताओं और जर्मनी से आने वाले रुपयों की मदद से इस गौशाला का संचालन कर रहीं हैं। सुरभि गौशाला में 70 से 80 कर्मचारी कार्यरत हैं। किराए की भूमि पर गौशाला चला रहीं सुदेवी को उम्मीद है कि उन्हें इस पुरस्कार के मिलने के बाद गौशाला के लिए भूमि उपलब्ध कराई जाएगी। साथ ही, उन्होंने इस बात की भी उम्मीद जताई कि अब गोसेवा के रास्ते में आने वाली अड़चनें दूर होंगी।

सुदेवी ने बताया कि अगर गौशाला के लिए उन्हें भूमि मिल जाती है तो मासिक किराए में ख़र्च हो रहे रुपयों की बचत होगी और उसका उपयोग गौसेवा में किया जाएगा। हाल ही में जब उनके वीजा की अवधि समाप्त हो गई थी तब उन्होंने मथुरा की सांसद हेमा मालिनी से लेकर विदेश मंत्री सुषमा स्वराज तक के दरवाज़े खटखटाए थे। इसके बाद उन्हें वीजा मिल गया था। सुदेवी अविवाहित हैं और अभी भी एक झोपड़ी में ही रहती हैं। स्थानीय निवासियों ने उन्हें भारतीय नागरिकता देने की भी माँग की है।

आदर्श आचार संहिता लागू होने के बाद सुमित्रा महाजन ने गाड़ियाँ और सुरक्षा लौटाई

लोकसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा होने के साथ ही आचार संहिता भी लागू हो गई है। इसी के मद्देनज़र लोकसभा स्पीकर और इंदौर से बीजेपी सांसद सुमित्रा महाजन ने सरकारी गाड़ियाँ और सुरक्षाकर्मी मध्य प्रदेश सरकार को वापस लौटा दिए हैं।

सुमित्रा महाजन ने इस बारे में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ को एक पत्र भी लिखा है। इस पत्र में उन्होंने लिखा है कि आगामी लोकसभा चुनावों के कारण 10 मार्च से पूरे देश में आदर्श आचार संहिता लागू हो गई है। उन्होंने उसी दिन से इंदौर में सरकारी गाड़ियों का उपयोग करना बंद कर दिया था, लेकिन लोकसभा अध्यक्ष के संवैधानिक पद पर अब भी उनके आसीन होने के कारण सुरक्षा गार्ड और पुलिस की गाड़ियाँ उनकी निजी गाड़ी के साथ चल रही हैं। इसके साथ ही उन्होंने आगे लिखा कि इंदौर जैसे शांत और सुरक्षित शहर में उन्हें प्रोटोकॉल के तहत मिलने वाली इन गाड़ियों और सुरक्षाकर्मियों की आवश्यकता नहीं है। इसलिए वो इन सभी सुविधाओं का त्याग कर रही है।

हालाँकि अभी तक इंदौर लोकसभा चुनाव के लिए निर्वाचन आयोग की तरफ से कोई आधिकारिक सूचना जारी नहीं की गई है और सुमित्रा महाजन ने ये भी कहा कि उन्हें पता है कि अभी तक ना तो उनकी उम्मीदवारी को लेकर कोई घोषणा हुई है और ना ही उन्होंने चुनाव संबंधी कोई पर्चा भरा है। बता दें कि इंदौर में 19 मई को मतदान होना है।

दिल्ली BJP की माँग: चुनाव के दौरान मस्जिदों में नियुक्त हों विशेष पर्यवेक्षक ताकि मतदाता ‘भटक’ न जाएँ

भारतीय जनता पार्टी की दिल्ली इकाई ने मुख्य चुनाव अधिकारी (CEO) से मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में मस्जिदों पर विशेष पर्यवेक्षकों को नियुक्त करने का आग्रह किया है। इसका उद्देश्य लोकसभा चुनाव 2019 के दौरान मतदाताओं को मज़हबी आधारों पर प्रभावित किए जाने के प्रयास से बचाना है।

दिल्ली बीजेपी ने आम आदमी पार्टी (AAP) के नेताओं पर मज़हबी आधारों पर मतदाताओं के धुव्रीकरण का आरोप लगाते हुए चुनाव आयोग को पत्र लिखकर मस्जिदों में विशेष पर्यवेक्षक नियुक्त करने की अपील की।

दिल्ली बीजेपी ने AAP पार्टी पर आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी के सदस्यों द्वारा मज़हबी आधारों पर मतदाताओं को लगातार भ्रमित करने का प्रयास किया जा रहा है, इसमें भड़काऊ भाषण और आधारहीन बयान भी शामिल हैं, इसलिए बीजेपी को इस तरह का पत्र लिखना पड़ा। अपने पत्र में बीजेपी ने ऐसे कई उदाहरण भी दिए जिसमें बताया गया कि AAP पार्टी द्वारा जनता को बरगलाने का काम किया जा रहा है। अपने पत्र में बीजेपी ने विधायक अमानतुल्लाह ख़ान के बयान का भी उल्लेख किया।

इसके अलावा बीजेपी का यह भी कहना है कि मस्जिदों के आस-पास दिए जाने वाले भाषण से मुस्लिम जनता नेताओं की नफ़रत का शिकार हो जाते हैं। इन परिस्थितियों में नेताओं के नफ़रत भरे भाषण मतदाताओं पर ग़लत प्रभाव छोड़ सकते हैं।

ख़ासतौर पर रमजान के महीने में इसकी आशंका अधिक है कि सम्प्रदाय विशेष को भड़काने के लिए मज़हब की राजनीति का इस्तेमाल किया जाए। अपनी इस चिंता को व्यक्त करते हुए चुनाव आयोग से अनुरोध किया गया है कि जल्द ही मस्जिदों में विशेष पर्यवेक्षक की नियुक्ति करें जिससे चुनावी माहौल में धर्म के नाम पर राजनीति न हो सके साथ ही किसी पार्टी और मज़हबी नेता द्वारा चुनावी आचार संहिता का उल्लंघन भी न किया जा सके।

पौधों को सींचने कमर और सिर पर पानी लेकर 4 किमी तक जाती थीं राष्ट्रपति को ‘आशीर्वाद’ देने वाली ‘वृक्ष माता’

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने शनिवार को विभिन्न क्षेत्र के लोगों को पद्म पुरस्कार से सम्मानित किया। इस दौरान जब
‘वृक्ष माता’ कहलाने वाली सालूमरदा थिमक्का पद्म श्री सम्मान लेने पहुँची तो उन्होंने राष्ट्रपति कोविंद के सर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया। वह बेहद भावुक क्षण था जब थिमक्का जी ने राष्ट्रपति महोदय को एक प्रकार से आशीर्वाद दे दिया।

इस वर्ष पद्म सम्मान प्राप्त करने वालों में सबसे वरिष्ठ 107 वर्षीय थिमक्का ने जिस सहजता से राष्ट्रपति कोविंद के माथे पर हाथ रखा, उससे प्रधानमंत्री और अन्य मेहमानों के चेहरे पर मुस्कान आ गई। राष्ट्रपति भी खुद को रोक नहीं पाए और पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।

सालूमरदा थिमक्का कर्नाटक की रहने वाली हैं। वह पर्यावरणविद और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। हालाँकि ज्यादातर पर्यावरणविद बड़ी-बड़ी डिग्रियाँ लिए होते हैं लेकिन उच्च शिक्षा का अभाव कभी थिमक्का के दृढ संकल्प के आड़े नहीं आया। थिमक्का ने हल्दीलाल और कुदुर के बीच चार किलोमीटर के राजमार्ग के किनारे बरगद के 385 पेड़ों समेत 8000 से ज्यादा पेड़ लगाए हैं जिसके कारण उन्हें ‘वृक्ष माता’ की उपाधि मिली है।

भूमिहीन मजदूरों को जो ज़मीन दी गई थी वहाँ ढेर सारे पीपल के पेड़ थे। थिमक्का और उनके पति ने इन पेड़ों की टहनियों को काट कर उन्हें धरती में रोपकर पौधे उगाने शुरू किया। उन्होंने पहले वर्ष में पड़ोस के गाँव कुदूर के पास चार किलोमीटर की दूरी पर केवल 10 पौधे लगाए। दूसरे वर्ष में, उन्होंने 15 पौधे लगाए, और तीसरे वर्ष में 20, इसके बाद यह क्रम चलता रहा। पौधारोपण करने से दंपत्ति को काफी भावनात्मक सहारा मिला क्योंकि वे उन्हें अपने बच्चों की तरह पालते थे।

थिमक्का के पति चिक्कन्ना एक बांस के दोनों छोरों पर पानी के दो विशाल कंटेनर अपने कंधों पर लेकर चार किलोमीटर तक जाते थे। थिमक्का भी एक बाल्टी अपनी कमर पर और दूसरी सिर पर लाद कर ले जाती थीं। उन्होंने पौधारोपण के लिए किसी खाद का इस्तेमाल नहीं किया। बस जीवटता ही थी जिसने पौधों को पेड़ बना दिया। इन्होंने ये पौधे मानसून के दौरान ही पौधे लगाए गए थे, और बाद के मानसून के दौरान दंपत्ति गर्मियों के अंत तक सप्ताह में एक या दो बार पौधों को पानी दिया करते थे। थिमक्का कहते हैं कि पौधे अगले मानसून तक मूल रूप ले लेते थे।

थिमक्का का जन्म कर्नाटक के तुमकुरु जिले के गुब्बी तालुक में हुआ था। गरीबी की वजह से वो स्कूल नहीं जा सकीं और पारिवारिक मजबूरी की वजह से उन्हें छोटी सी उम्र से ही मजदूरी करनी पड़ी। बड़ी होने पर उनका विवाह कर्नाटक के रामनगर जिले के मगदी तालुक के हुलिकल गाँव के निवासी चिककैया से हुआ, जो कि एक मजदूर थे। शादी के बाद भी गरीबी ने थिमक्का का पीछा नहीं छोड़ा। शादी के काफी साल बाद भी जब बच्चा नहीं हुई तो वो टूट गई। वो आत्महत्या करने की सोच रही थीं। तब उनके पति ने उन्हें वृक्षारोपण की सलाह दी। जिसके बाद उन्होंने वृक्षारोपण शुरू किया। फिर उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। वो सिर्फ वृक्षारोपण ही नहीं करती बल्कि इनकी देखभाल अपने बच्चे की तरह करती है।

थिमक्का के पति की 1991 में मृत्यु हो गई थी। आज थिमक्का को भारत में वृक्षारोपण से जुड़े कई कार्यक्रमों के लिए आमंत्रित किया जाता है। वह अपने गांव में आयोजित होने वाले वार्षिक मेले के लिए बारिश के पानी को संग्रहित करने के लिए एक टैंक का निर्माण करने जैसी अन्य सामाजिक गतिविधियों में भी शामिल रही हैं। उनका अपने पति की याद में अपने गाँव में एक अस्पताल बनाने का भी सपना है और इस उद्देश्य के लिए एक ट्रस्ट की स्थापना की गई है। साल 2016 में सालूमरदा थिमक्का को ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉरपोरेशन (BBC) द्वारा दुनिया की सबसे प्रभावशाली और प्रेरणादायक महिलाओं में से एक के रूप में सूचीबद्ध किया गया था।

फिलहाल थिमक्का अपने मुँहबोले बेटे उमेश बी.एन. के साथ रह रही हैं। उमेश को भी पर्यावरण से काफी लगाव है। वो भी ‘पृथ्वी बचाओ’ अभियान के साथ ही कई नर्सरी भी चला रहे हैं और उन किसानों को पौधे भी प्रदान करते हैं, जो वृक्षारोपण के लिए इच्छुक होते हैं।

‘वृक्ष माता’ थिमक्का को अभी तक कई सारे अवॉर्ड मिल चुके हैं, लेकिन वहाँ के स्थानीय लोगों का कहना है कि थिमक्का के ऊपर इसका कोई प्रभाव नहीं दिख रहा है। वो आज भी उसी तरह से सादा जीवन जी रही हैं और लोगों के साथ उनका व्यवहार पहले की तरह ही है। इससे ये जाहिर होता है कि सच्ची उपलब्धियाँ वही हैं जो मनुष्य को और भी विनम्र बना दें। वृक्ष माता ने इसका उदाहरण राष्ट्रपति भवन में भी दे दिया।

कर्नाटक सरकार ने थिमक्का के काम को सम्मान देते हुए इसे आगे बढ़ाने का फैसला किया है। इसके लिए सरकार ने इस दिशा में कदम उठाए हैं। सरकार ने कहा कि कक्षा 1 से 10 तक की हिंदी की किताब में थिमक्का की कहानी के जरिए इनकी उपलब्धियों से बच्चों को परिचित कराया जाएगा। बच्चे इनकी कहानी से प्रेरित होंगे। वहीं कक्षा बारहवीं के राजनीति विज्ञान विषय की पुस्तक में भी एक पाठ इनके ऊपर होगा। सरकार का ये कदम बेहद सराहनीय है। इससे बच्चों के भीतर पर्यावरण के प्रति जागरूकता तो बढ़ेगी ही, साथ ही वो इस दिशा में काम करने में सक्रिय भागीदार भी बनेंगे।

रंगभरी एकादशी: काशी में दूल्हा बने महादेव कराएँगे माँ गौरा का गौना, शुरू होगा होली का हुड़दंग

ब्रज के बाद यदि कहीं की पौराणिक और परंपरागत होली प्रसिद्ध है तो वह है भगवान शिव की नगरी काशी की। धर्म और अध्यात्म की नगरी काशी में फाल्गुन शुक्ल एकादशी को रंगभरी एकादशी के रूप में मनाया जाता है, जिसे आमलकी एकादशी भी कहते है। रंगभरी एकादशी होली से 5 दिन पहले आती है। ब्रज में होली का पर्व होलाष्टक से शुरू होता है। वहीं वाराणसी में यह रंग भरी एकादशी से शुरू हो जाता है। 17 मार्च को रंगभरी एकादशी से लेकर बुढ़वा मंगल तक अब हर तरफ ”होली ही होली…” नज़र आएगी बनारस में। काशी के साथ ही जहाँ-जहाँ महादेव विराजमान हैं उन सभी मंदिरों में भक्त अपने भगवान को रंग-गुलाल से सराबोर कर उत्सव के रंग में डूब जाएँगे।

महाश्मशान की नगरी काशी में अन्नपूर्णा के रूप में निवास करने वाली देवी गौरी के पहली बार काशी आगमन के साथ ही बनारस में होली का आगाज़ हो जाता है। इस दिन से वाराणसी में रंग खेलने का सिलसिला प्रारंभ हो जाता है जो लगातार छह दिन तक चलता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार रंगभरी एकादशी के दिन ही भगवान शिव माता पार्वती से विवाह के बाद पहली बार काशी पधारे थे। इस खुशी में भगवान शिव के गण रंग-गुलाल उड़ाते हुए और खुशियाँ मनाते हुए आए थे। मान्यता है कि रंगभरी एकादशी को बाबा विश्वनाथ अपने भक्तों के साथ रंग और गुलाल से होली खेलते हैं। इस दिन भोलेनाथ की नगरी रंगों से सराबोर होती है, हर भक्त रंग और गुलाल में डूबा मस्त-मगन हो जीवन-उत्सव मनाता है।

बनारस में परंपरानुसार महाशिवरात्रि को विवाह बंधन में बंधने के बाद बाबा विश्वनाथ पहली बार माँ गौरा का गौना कराने उनके नइहर यानी श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के महंत के घर पहुँचते हैं। ससुराल पहुँचने पर बाबा विश्वनाथ का स्वागत घर की महिलाओं द्वारा मंगल गीत के साथ किया जाता है। काशी, महादेव के इस उत्सवप्रेमी मस्तमौला शहर को बस बहाना चाहिए। काशीपुराधिपति बाबा भोलेनाथ अपनी दुल्हन लेकर निकलें और उनके गण के रूप में काशीवासी उल्लासित न हों ऐसा कैसे संभव है। बाबा भोले के भक्त बाबा विश्वनाथ से आशीर्वाद लेकर रंग-गुलाल की होली खेलते, नाचते-गाते-झूमते गौने की बारात में निकलते हैं।

महादेव शिव और माँ गौरा पार्वती

रंगभरी एकादशी पर भगवान शिव के पूरे परिवार की चल प्रतिमाएँ विश्वनाथ मंदिर में लाई जाती हैं और बाबा विश्वनाथ मंगल वाद्ययंत्रों की मधुर ध्वनि के बीच नगर भ्रमण पर निकलकर भक्तों को आशीर्वाद देते हैं।

बात काशी की हो, माँ गौरी के गौने की हो और उनके अनन्य प्रेमी शिव के विवाह की बात छूट जाए ये कैसे हो सकता है। तो थोड़ी चर्चा शिव विवाह की भी कर लेते हैं।

महाशिवरात्रि पर शिव और पार्वती का विवाह बहुत ही भव्य तरीके से हो रहा था। कहते हैं, इससे पहले ऐसी शादी कभी नहीं हुई थी। उनकी शादी में एक से बढ़कर एक अतरंगी लोग शामिल हुए। देवताओं के साथ ही असुर भी वहाँ पहुँचे। शिव पशुपति भी हैं, मतलब सभी जीवों के देवता भी हैं, तो कहा जाता है सारे जानवर, कीड़े-मकोड़े और अन्य जीव भी उनकी शादी में बाराती बने। यहाँ तक कि भूत-पिशाच, अपंग और विक्षिप्त लोग भी उनके विवाह में मेहमान बन कर पहुँचे।

यह एक शाही शादी थी। एक राजकुमारी की शादी हो रही थी। इसलिए विवाह समारोह से पहले एक अहम समारोह का आयोजन होना था। वर-वधू दोनों की वंशावली घोषित की जानी थी। एक राजा के लिए उसकी वंशावली सबसे अहम चीज होती है, जो उसके जीवन का गौरव होता है। ऐसे में पार्वती की वंशावली का बखान खूब धूमधाम से किया जाने लगा। यह कुछ देर तक चलता रहा और आखिरकार जब उन्होंने अपने वंश के गौरव का बखान खत्म किया, तो वे उस ओर मुड़े, जिधर वर के रूप में महादेव शिव बैठे हुए थे।

सभी अतिथि इंतजार करने लगे कि वर की ओर से कोई उठकर शिव के वंश के गौरव के बारे में बोलेगा मगर किसी ने एक शब्द भी नहीं कहा। वधू का परिवार ताज्जुब करने लगा, ‘क्या उनके खानदान में कोई ऐसा नहीं है जो खड़े होकर उनके वंश की महानता के बारे में बता सके?’ मगर वाकई कोई नहीं था। वर के माता-पिता, रिश्तेदार या परिवार से कोई वहाँ नहीं आया था क्योंकि उनके परिवार में कोई था ही नहीं। वह सिर्फ अपने साथियों, गणों के साथ ही आए जो विकृत जीवों की तरह दिखते थे।

फिर पार्वती के पिता पर्वत राज हिमालय ने शिव से अनुरोध किया, “कृपया अपने वंश के बारे में कुछ बताइए।” शिव कहीं शून्य में देखते हुए चुपचाप बैठे रहे। वह न तो दुल्हन की ओर देख रहे थे, न ही शादी को लेकर उनमें कोई उत्साह नजर आ रहा था। वह बस अपने गणों से घिरे हुए बैठे रहे और शून्य में घूरते रहे। वधू पक्ष के लोग बार-बार उनसे यह सवाल पूछते रहे क्योंकि कोई भी अपनी बेटी की शादी ऐसे आदमी से नहीं करना चाहेगा, जिसके वंश का अता-पता न हो। उन्हें जल्दी थी क्योंकि शादी के लिए शुभ मुहूर्त तेजी से निकला जा रहा था। मगर शिव मौन रहे।

महादेव शिव और उनके अतरंगी बाराती

कहा जाता है, समाज के लोग, कुलीन राजा-महाराजा और पंडित बहुत घृणा से शिव की ओर देखने लगे और तुरंत फुसफुसाहट शुरू हो गई, “इसका वंश क्या है? यह बोल क्यों नहीं रहा है? हो सकता है कि इसका परिवार किसी नीच जाति का हो और इसे अपने वंश के बारे में बताने में शर्म आ रही हो।”

फिर नारद मुनि, जो उस सभा में मौजूद थे, ने यह सब तमाशा देखकर अपनी वीणा उठाई और उसकी एक ही तार खींचते रहे। वह लगातार एक ही धुन बजाते रहे- टोइंग टोइंग टोइंग। इससे खीझकर पार्वती के पिता पर्वत राज अपना आपा खो बैठे, ‘यह क्या बकवास है? हम वर की वंशावली के बारे में सुनना चाहते हैं मगर वह कुछ बोल नहीं रहा। क्या मैं अपनी बेटी की शादी ऐसे आदमी से कर दूँ? और आप यह खिझाने वाला शोर क्यों कर रहे हैं? क्या यह कोई जवाब है?’ नारद ने जवाब दिया, “वर के माता-पिता नहीं हैं।” राजा ने पूछा, “क्या आप यह कहना चाहते हैं कि वह अपने माता-पिता के बारे में नहीं जानता?”

“नहीं, इनके माता-पिता ही नहीं हैं। इनकी कोई विरासत नहीं है। इनका कोई गोत्र नहीं है। इसके पास कुछ नहीं है। इनके पास अपने खुद के अलावा कुछ नहीं है।” पूरी सभा चकरा गई। पर्वत राज ने कहा, “हम ऐसे लोगों को जानते हैं जो अपने पिता या माता के बारे में नहीं जानते। ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति हो सकती है। मगर हर कोई किसी न किसी से जन्मा है। ऐसा कैसे हो सकता है कि किसी का कोई पिता या माँ ही न हो।” नारद ने जवाब दिया, “क्योंकि यह स्वयंभू हैं। इन्होंने खुद की रचना की है। इनके न तो पिता हैं न माता। इनका न कोई वंश है, न परिवार। यह किसी परंपरा से ताल्लुक नहीं रखते और न ही इनके पास कोई राज्य है। इनका न तो कोई गोत्र है, और न कोई नक्षत्र। न कोई भाग्यशाली तारा इनकी रक्षा करता है। यह इन सब चीजों से परे हैं। यह एक योगी हैं और इन्होंने सारे अस्तित्व को अपना एक हिस्सा बना लिया है। इनके लिए सिर्फ एक वंश है- ध्वनि। आदि, शून्य प्रकृति जब अस्तित्व में आई, तो अस्तित्व में आने वाली पहली चीज थी- ध्वनि। इनकी पहली अभिव्यक्ति एक ध्वनि के रूप में है। ये सबसे पहले एक ध्वनि के रूप में प्रकट हुए। उसके पहले ये कुछ नहीं थे। यही वजह है कि मैं यह तार खींच रहा हूँ।”

रंग भरी एकादशी
रंगभरी एकादशी पर काशी में निकली शाही सवारी (पेंटिंग)

महादेव शिव के बारे में ऐसी अनेक कथाएँ प्रचलित हैं। जो शिव के उस रूप का बोध कराती हैं जो कहता है, “शिव अर्थात वह जो नहीं है।” जो सर्वेश्वर सर्वशक्तिमान अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक भगवान हैं, ये अलग बात है कि महादेव रसरीति से अत्यंत सुलभ साधारण भोलेनाथ हो जाते हैं। शास्त्रों में कहा गया है, प्रेमदेवता जिसको छू लेता है, वह कुछ-का-कुछ हो जाता है। अल्पज्ञ सर्वज्ञ हो जाता है और सर्वज्ञ अल्पज्ञ हो जाता है। अल्पशक्तिमान सर्वशक्तिमान हो जाता है, सर्वशक्तिमान का भी महाविनाश हो जाता है।

जिस नगरी के कर्ता-धर्ता स्वयं महादेव शिव हों उसकी बात ही क्या! काशी तो शिव के ताल पर नृत्य करती है। ये भी कहा जाता है कि प्रेम के स्पर्श से कुछ-का-कुछ हो जाता है। प्रेमरंग में रंगे हुए प्रेमी के लिए सम्पूर्ण संसार ही प्रेमास्पद प्रियतम हो जाता है। शिव अपने प्रेम की पराकाष्ठा की वजह से ही महादेव हुए, कल्याण के हर रंग के उन्नायक हुए। यह जो रंगभरी एकादशी है, इसमें भी रंग क्या है? जिसके द्वारा जगत रंगों से सराबोर हो उठता है- ‘उड़त गुलाल लाल भये अम्बर’ अर्थात् गुलाल के उड़ने से आकाश लाल हो गया। आकाश इस सारे भौतिक प्रपंच का उपलक्षण है और काशी भौतिकता से आध्यात्म की यात्रा का महामार्ग।

काशी प्राचीन काल से उत्सवधर्मिता और आध्यात्म की अलख जगाए हुए है, जब भी जीवन में खुशियों के रंग कम होने लगे तो आइए काशी, जहाँ मरघट पर भी जीवन का उत्सव नज़र आएगा। जहाँ मृत्यु अंत नहीं बल्कि नए जीवन का प्रस्थान बिन्दु है। मोक्ष का मार्ग है। रंगभरी एकादशी से काशी जीवन की सादगी में रंग और उमंग के साथ ही फक्कड़पने में भी मस्ती-उल्लास-आनन्द का सन्देश देती है।

इन बातों से नाराज था न्यूज़ीलैंड हमले का आरोपित, लम्बे समय से बना रहा था योजना

शुक्रवार (15 मार्च, 2019) को न्यूजीलैंड के क्राइस्टचर्च शहर के 2 प्रार्थना स्थलों में एक बंदूकधारी ने अंधाधुंध गोलीबारी कर करीब 49 लोगों की हत्या कर दी। इस घटना से सारी दुनिया को गहरा दुःख पहुँचा है, जो स्वभाविक है। इस मामले की जाँच पड़ताल से पता चलता है कि बंदूकधारी ने यह हमला किसी उग्रवादी संगठन के बहकावे में आकर, जल्दबाजी में या मानसिक रोग की वजह से नहीं किया है।

ये बात जानकार हैरानी होती है कि ब्रेनटेन टैरेंट नाम के इस आरोपित ने अपना एक 74 पेज का घोषणापत्र जारी किया था, जिसमें उसने अपनी सोच, उद्देश्य व हमले के कारण लिखे थे। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, वह करीब 2 साल से हमले की तैयारी कर रहा था। हमले वाले स्थलों को उसने 3 महीने पहले ही चुन लिया था, और 24 घंटे पहले ही सोशल मीडिया के माध्यम से धमकी भी दी थी।

हमले के वक्त आरोपित ब्रेनटेन टैरेंट ने लगातार 17 मिनट तक वीडियो का लाइव टेलीकास्ट भी किया। हमले के पीछे उसने कई कारणों को जिम्मेदार बताया है। यह कारण जानना इसलिए भी जरूरी है, ताकि वैश्विक शांति के लिए दहशतगर्दी की जड़ को पहचानकर और समझकर, उसका समाधान किया जा सके, जिससे कि भविष्य में ऐसे किसी नृशंस कार्य व हिंसा द्वारा मानवता को शर्मसार करने वाली अप्रिय घटना से बचा जा सके। हालाँकि, यह एक दिवास्वप्न मात्र है।

  1. हमलावर ने अपने घोषणापत्र में सबसे पहले बेतहाशा बढ़ रहे शरणार्थियों का विरोध किया है, वह कहता है, “मुस्लिम शरणार्थी हमारी भूमि पर अतिक्रमण कर रहे हैं। यह भूमि श्वेतों की है।” हमलावर ने चिंता जताई है कि शरणार्थी अधिक प्रजनन करके पश्चिमी देशों की धार्मिक जनसांख्यिकी को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं। वह शरणार्थियों पर पश्चिम देशों की संस्कृति व शांति भंग करने का आरोप लगाता है।
  2. हमलावर पूरे इतिहास में यूरोपीय भूमि में विदेशी आक्रमणकारियों के कारण हुई हजारों मौतों का बदला लेने की बात कहता है। साथ ही इस्लामिक आक्रान्ताओं पर यूरोप के लाखों लोगों को गुलाम/दास बनाने का भी आरोप लगाता है।
  3. आरोपित ब्रेनटेन टैरेंट यूरोप में हुए जिहादी हमलों में हुई मौतों का जिक्र करता है। गौरतलब है कि शरणार्थियों को शरण देने के बाद से यूरोप में आतंकी घटनाओं में अत्यधिक वृद्धि दर्ज की गई है, जिसमें 2017 का स्टॉकहोम हमला भी शामिल है।
  4. वह ‘एब्बा एकरलैंड’ नाम की एक 12 साल की मूक-बधिर बच्ची जिसकी अप्रैल 2017 के स्टॉकहोम
    आतंकी हमले में मृत्यु हो गई थी, की बात करता है। गौरतलब है कि स्टॉकहोम हमला रख्मत नाम के
    एक शरणार्थी ने इस्लामिक स्टेट आतंकी संगठन के समर्थन में किया था।
  5. वह ऐसे राजनेताओं को खुद के देश के लोगों का शत्रु बताता है जो शरणार्थी समर्थक हैं, इसलिए वो उन्हें भी आतंकी संगठनों के खिलाफ कड़े कदम उठाने के लिए संदेश देने की बात करता है। वह कहता है कि शून्यवाद, सुखवाद, व्यक्तिवाद व स्वार्थ ने पश्चिमी विचारों पर नियंत्रण कर लिया है, वह इसे नष्ट करना चाहता है।
  6. हमलावर इस कृत्य द्वारा नाटो (NATO ) के सदस्य राष्ट्रों, यूरोप के देशों व तुर्की के बीच दरार डालना चाहता था, जिससे नाटो से तुर्की को निकाल दिया जाए और वह फिर से एकजुट होकर यूरोपीय सेना में बदल जाए। दरअसल नाटो (नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन) एक अंतर्राष्ट्रीय राज्यसंघ है, जिसमें कुल 29 देश हैं। इनमें 2 देश संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के, 26 देश यूरोप के हैं व एक देश तुर्की है। संधि की अनुसार, इसमें से किसी भी देश पर हमला सभी देशों पर हमला माना जाता है। इनमें से तुर्की एकमात्र इस्लामिक देश है, जिस पर नाटो संधियों के उल्लंघन के आरोप लगते रहे हैं। जैसे वर्ष 2003 में ईराक में आतंकवाद के खिलाफ सेना भेजने से इंकार करना आदि। ऐसे कारणों व सीरिया समस्या के बाद से पश्चिमी देशों में तुर्की को इस्लामिक पक्षपाती देश के रूप में देखा जाने लगा है।
  7. इसके अलावा हमलावर ने ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, फिनलैंड, जर्मनी व अन्य पश्चिमी देशों में अप्रवासी, शरणार्थियों आदि द्वारा किए गए महिलाओं के बलात्कार व बाल यौनशोषण के करीब 20 लिंक देते हुए बदला लेने की बात कही है।

हमलावर ने अपना एक चिन्ह भी जारी किया है, जिसमें उसने 8 उद्देश्य रखे हैं

  1. पृथ्वी के पर्यावरण की रक्षा
  2. जिम्मेदार मार्केट
  3. व्यसन मुक्त समाज
  4. कानून एवं व्यवस्था
  5. जातीय स्वराज्य
  6. संस्कृति और परंपरा की रक्षा
  7. कामगारों के अधिकार
  8. साम्राज्यवाद का विरोध

इसके अतिरिक्त भी हमलावर ने कई बातें कहीं हैं, जो उग्र, संगीन, हिंसा समर्थक व विवादित होने के कारण प्रकाशित नहीं किए जा सकते हैं। इस हमले से आज सारा विश्व दुखी महसूस कर रहा है। कानून हाथ में लेकर निर्दोष व्यक्तियों की हत्या करना एक सभ्य समाज में कभी भी किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। इसलिए बदले की भावना से भरे इस भटके हुए हमलावर की जितनी कड़ी से कड़ी निंदा की जाए कम है। इस समय हमें वैश्विक शांति के लिए एक समाज, एक शांतिप्रिय विश्व के रूप में एकजुट होना चाहिए।