देश के लिए डिजिटल इंडिया की कल्पना करने वाली मोदी सरकार ने पिछले साल 23 सितंबर 2018 को ‘आयुष्मान भारत’ नाम की योजना शुरू की थी। इसके तहत दवाइयों से लेकर सर्जरी जैसे 1350 मेडिकल पैकेज कैशलेस और पेपरलेस मुहैया कराए जाने का उद्देश्य निहित है। इस जन-कल्याणकारी योजना से कुछ ही दिनों के भीतर लाखों लोगों को लाभ मिला लेकिन राजनीति के कारण कुछ गैर-बीजेपी राज्य इसे अपने यहाँ बंद कर रहे हैं। अब छत्तीसगढ़ ने ‘आयुष्मान भारत’ योजना से खुद को अलग कर लिया है।
आश्चर्यजनक रूप से दिल्ली, उड़ीसा और तेलंगाना ने ‘आयुष्मान भारत’ योजना को अब तक स्वीकारा ही नहीं है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने कुछ समय पहले इसे बंद कर किया। अब छत्तीसगढ़ ने भी इस योजना को अपने राज्य में लागू करने से मना कर दिया है। छत्तीसगढ़ सरकार ने ऐसा करने के पीछे अपना मत दिया कि वो इस योजना के बदले में ‘यूनिवर्सल हेल्थ स्कीम’ शुरू करने जा रहे हैं।
छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव ने आयुष्मान योजना को बीमा योजना करार देते हुए कहा कि इसमें आउटपुट बेहद कम है और खर्चा बहुत ज्यादा है। उन्होंने अपने राज्य में इस योजना का विकल्प रखते हुए बताया कि उनके राज्य में एक ऐसी योजना लाई जा रही है, जो आयुष्मान योजना के मुकाबले कम खर्चे में तैयार होगी। राज्य में लागू होने वाली इस योजना में जाँच, इलाज व दवा भी मुफ़्त उपलब्ध करवाई जाएगी।
टीएस सिंहदेव ने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए कहा कि आयुष्मान भारत में गंभीर बीमारियों का इलाज किया जाता है, जिसके अंतर्गत सिर्फ प्रदेश की 5 से 8 प्रतिशत जनता ही आ पाएगी। इसके तहत प्रदेश में रह रहे 42 लाख परिवारों का 1100 रुपए हर परिवार के आधार पर बीमा कराया जाएगा। इस 1100 की राशि में 660 रुपए केंद्र द्वारा दिए जाते हैं और 440 रुपए राज्य सरकार द्वारा दिए जाते हैं। राज्य को इसके लिए करीब 180 करोड़ रुपए देने पड़ेंगे। मंत्री सिंहदेव के अनुसार इतनी राशि में पूरे राज्य के 80 फीसदी की आबादी को निशुल्क दवा और इलाज़ उपलब्ध करा दिया जाएगा।
आपको बता दें कि 2018 में आए केंद्रीय बज़ट में सरकार ने इसकी घोषणा की थी। इस योजना में लगभग उन सभी बीमारियों को कवर करने की बात है, जो बहुत से प्राइवेट मेडिकल बीमा कंपनियाँ मुहैया नहीं कराती हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के महानिदेशक ने भी आयुष्मान भारत योजना की सराहना की थी। उन्होंने कहा था कि इस योजना को लागू करने के 100 दिनों के भीतर 7 लाख लोगों को फ़ायदा पहुँचा था।
पिछले महीने उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिले में गोकशी घटना के संबंध में सात लोगों को गिरफ़्तार गया था। इनमें से तीन लोगों अज़हर ख़ान, नदीम ख़ान और महबूब अली पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) के तहत मुक़दमा दर्ज कर लिया गया है। दरअसल तीन दिसंबर को बुलंदशहर के स्याना तहसील में खेत के बाहर मवेशियों के कंकाल मिले थे। इसके बाद ग्रामीणों ने आरोपितों के विरोध में जमकर बवाल काटा था। गोकशी की घटना के बारे में सुनकर मौक़े पर पहुँची ग्रामीणों की भीड़ ने उत्पात मचाते हुए पुलिस चौकी पर हमला कर दिया था।
इस घटना के दौरान पुलिस इंस्पेक्टर सुबोध कुमार सिंह और एक 20 वर्षीय नौजवान सुमित कुमार की मौत गोली लगने से हो गई थी। इस घटना के बाद राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने स्याना का दौरा करके पुलिस अधिकारी को कानून के आधार पर सख़्त कार्रवाई करने का दिशा-निर्देश दिया था। घटना के बाद पुलिस ने कार्रवाई करते हुए गोकशी मामले में सात लोगों को हिरासत में लिया था। पुलिस जाँच के बाद गिरफ़्तार किए गए सात में से तीन आरोपितों पर रासुका लगाया है।
जानकारी के लिए आपको बता दें कि इस मामले में घटना के संबंध में स्याना थाने में दो प्राथमिकी दर्ज हुई थी। पहली प्राथमिकी हिंसा के संबंध में दर्ज हुई जिसमें करीब 80 लोगों को नामजद किया गया, जबकि दूसरी प्रथमिकी गोकशी के लिए दर्ज हुई थी।
इस मामले में सुनावाई के बाद जिला मजिस्ट्रेट अनुज झा ने कहा, “तीन आरोपितों ने जमानत के लिए आवेदन किया था और उन्हें जमानत मिलने की संभावना थी। इस बात को ध्यान में रखते हुए, उनपर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लगाया गया है।” जिला मजिस्ट्रेट ने अपने बयान में यह भी कहा कि कार्रवाई पुलिस रिपोर्ट के आधार पर की गई है।
पुलिस रिपोर्ट में इस बात की चर्चा है कि अज़हर ख़ान,नदीम ख़ान और महबूब अली को गलत तरह से धन कमाने के लिए गोकशी में संलिप्त पाया गया था। जज ने सुनवाई के दौरान यह भी कहा था कि गोकशी में संलिप्त इन आरोपितों के कृत्य से महाव व नयाबांस गाँव में रहने वाले हिन्दुओं की भावना को चोट पहुँचाई गई है, जिसके बाद गाँव में हिंसा हुई।
इस तरह आरोपितों पर रासुका लगाए जाने के बाद उन मुट्ठी भर लोगों के मुँह पर ताला लग गया जो पूरी घटना के लिए हिन्दुओं को ज़िम्मेदार मानते थे। जिला मजिस्ट्रेट ने अपने बयान में स्पष्ट कर दिया कि जिन लोगों पर रासुका लगा है, उन्होंने हिन्दुओं की भावना को चोट पहुँचाया है।
दुबई से प्रत्यर्पित, अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी चॉपर घोटाले में बिचौलिए क्रिश्चियन मिशेल ने ख़ुलासा किया कि जब से इस सौदे पर बातचीत शुरू ही हुई थी तभी से वह लगातार भारतीय लोगों के सम्पर्क में था। इस मामले में एक के बाद एक लगातार आश्चर्यजनक खुलासे हो रहे हैं। इससे पहले, यह बताया गया था कि कैसे मनमोहन सिंह के कार्यकाल में मिशेल की कैबिनेट मीटिंग, कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) मीटिंग्स और तत्कालीन पीएमओ तक पहुँच थी। इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट में अब यह सामने आया है कि उसकी जाँच एजेंसियों तक भी पहुँच थी।
एक आश्चर्यजनक रहस्योद्घाटन उसके 2009 के डिस्पैच के आधार पर किया गया है जिसे उसने अपने साथी बिचौलिए, गुइडो राल्फ हाश्के को लिखा था। 6 दिसंबर 2009 के इस डिस्पैच में, हाश्के को अगस्ता वेस्टलैंड चॉपर घोटाले के एक सह-अभियुक्त वकील गौतम खेतान से दूरी बनाने के लिए कहा था।
इसका कारण बताते हुए क्रिश्चियन मिशेल ने हाश्के को लिखा था कि खेतान ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के भीतर अपने ‘दोस्त’ के साथ मिलकर रियल एस्टेट फर्म एम्मार एमजीएफ़ के ख़िलाफ़ छापा मारने की कोशिश की थी। उस समय कंपनी अपना पहला इनिशियल पब्लिक ऑफर (आईपीओ) शुरू करने वाली थी। लेकिन एमजीएफ़ के लोगों को इसके बारे में पता चल गया था और उन्होंने हाश्के के लोगों को ‘गेट लॉस्ट’ कहा था।
रिपोर्ट के अनुसार, क्रिश्चियन मिशेल पर अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले में ₹3,600 करोड़ के मनी लॉन्ड्रिंग, रिश्वतखोरी और धोखाधड़ी का आरोप है।
क्रिश्चियन मिशेल के प्रत्यर्पण के बाद चल रही जाँच में कुछ और बड़े ख़ुलासे हुए हैं। इससे पहले, यह बताया गया था कि कॉन्ग्रेस के एक वरिष्ठ नेता के बेटे ( son of a senior Congress leader) ने ‘किकबैक’ की व्यवस्था की थी। रिपोर्ट के अनुसार, मिशेल ऑफिशल सीक्रेट एक्ट के तहत आरोपित किए जा सकते हैं।
जाँच के दौरान, “श्रीमती गांधी”, “इतालवी महिला का बेटा आर” (“Mrs Gandhi”, “Italian Lady’s Son R”) और एपी (AP) (जो अहमद पटेल हो सकते हैं) जैसे गुप्त नाम भी सामने आए थे। यह भी पाया गया कि क्रिश्चियन मिशेल कई बार भारत आए थे और वे कॉन्ग्रेस शासन के दौरान भारत में राफ़ेल सौदे के ख़िलाफ़ और यूरोफाइटर सौदे के समर्थन में भी पैरवी कर रहे थे।
800 वर्षों की परंपरा को तोड़ कर सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करने वाली महिला की उसकी सास ने बुरी तरह पिटाई की है। सुप्रीम कोर्ट ने सितम्बर 2018 में महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करने की इजाज़त दे दी थी जिसके बाद श्रद्धालुओं ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया था। उच्चतम न्यायलय के उस निर्णय के बाद कनकदुर्गा सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करने वाली पहली महिला थी। 39 वर्षीय कनकदुर्गा ने एक अन्य महिला के साथ सबरीमाला की सैकड़ों साल पुरानी परंपरा को धता बताते हुए मंदिर में प्रवेश किया था।
ताज़ा ख़बर के अनुसार मंदिर में प्रवेश करने के बाद पहली बार घर पहुँची कनकदुर्गा पर उनकी सास ने हमला कर दिया। उसकी सास ने उसे इतनी बुरी तरह पीटा कि कनकदुर्गा को तुरंत अस्पताल पहुँचाना पड़ा। अभी उसकी हालत स्थिर बनी हुई है। सबरीमाला मंदिर में प्रवेश कर वापस लौटने के बाद कनकदुर्गा कई दिनों से घर नहीं पहुँची थी और किसी गुप्त स्थान पर छिपी हुई थी। लोगों को लगा था कि वो शायद प्रदर्शनकारियों से बचना चाह रही हैं।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार कनकदुर्गा जैसे ही अपने घर पहुँची, उस से नाराज़ उसकी सास ने लकड़ी के तख्ते से उसपर हमला कर दिया और उसकी पिटाई शुरू कर दी। उसके बाद उन्हें आनन-फानन में पेरिंथलमन्ना के सरकारी अस्पताल में भर्ती किया गया जहाँ अभी भी उसका इलाज चल रहा है। स्थानीय लोगों के अनुसार उसकी सास ने लकड़ी के तख्ते से उसके सिर पर वार किया। फ़िलहाल पुलिस ने इस मामले में केस दर्ज कर लिया है और आगे की करवाई की जा रही है।
कनकदुर्गा का परिवार उस से तभी से नाराज़ चल रहा था जब से उसके सबरीमाला में प्रवेश करने की ख़बर आई थी। उसके भाई ने इसे CPM और केरल पुलिस की साजिश बताया था। ज्ञात हो कि केरल के मुख्यमंत्री पिन्नाराई विजयन ने सबरीमाला में प्रवेश करने वाली इन महिलाओं को पूरी सुरक्षा प्रदान करने के निर्देश दिए थे। इसके बाद इन्हे पुलिस प्रोटेक्शन के साथ उसे आधी रात को मंदिर की सीढ़ियों पर ले जाया गया। रात के क़रीब तीन बजे कनकदुर्गा एक अन्य महिला के साथ सबरीमाला के अंदर घुसने में सफल हो गई थी। उसके साथ गई महिला का नाम बिंदु है जो केरल में सत्ताधारी पार्टी CPM की कार्यकर्ता है।
कई ख़बरों के मुताबिक़ अब तक 10 महिलाएँ सबरीमाला मंदिर के अंदर प्रेवश करने का दावा कर चुकी है। सबरीमाला की पुरातन प्रथा की रक्षा के लिए श्रद्धालु कई दिनों से सड़कों पर हैं और केरल की वामपंथी सरकार के ख़िलाफ़ लगातार प्रदर्शन कर रहे हैं। इस मामले में अब तक केरल पुलिस ने 5000 से भी अधिक श्रद्धालुओं को गिरफ़्तार किया है।
बचपन से अपने गाँव में एक कहावत ‘अधजल गगरी छलकत जाय’ को सुनते हुए बड़ा हुआ हूँ। इस कहावत का आशय यह है कि जब किसी घड़े में आधा पानी भरा होता है, तो घड़ा से छलक कर पानी बाहर आ ही जाता है।
शेखर गुप्ता की वेबसाइट ‘दि प्रिंट’ का मामला भी कुछ इसी तरह का लगता है। दरअसल दि प्रिंट को लॉन्च हुए अभी मुश्किल से दो साल भी नहीं हुआ है, लेकिन वेबसाइट अपने रिपोर्ट के ज़रिए दावा कुछ इस तरह करती है, जैसे उनके रिपोर्ट को पढ़ने के बाद ही सुप्रीम कोर्ट के जज किसी मामले में कोई फ़ैसला लेते हैं।
पिछले दिनों सीबीआई निदेशक पद से आलोक वर्मा को हटाए जाने के लिए केंद्र के पक्ष में वोट करने के बाद तथाकथित प्रगतिशील मीडिया का एक बड़ा गिरोह जस्टिस एके सीकरी के ईमानदारी पर सवाल खड़े कर रहा है। इस मामले में मार्कंडेयकाटजू ने नई टिप्पणी करते हुए अपने ट्वीटर पर लिखा – “मीडिया में जरा सी भी शर्म बची है तो उसे जस्टिस सीकरी से माफ़ी माँगनी चाहिए।”
Has the Indian media no shame ?
Our mostly rotten and shameless media has sought to tarnish Justice Sikri in mud and ruin his reputation.
पूर्व जस्टिस काटजू का यह बयान दि प्रिंट जैसे संस्थानों के लिए ही है। सीबीआई निदेशक मामले में जस्टिस सीकरी के फ़ैसले के बाद दि प्रिंट हिंदी ने वेबसाइट पर एक आर्टिकल पब्लिश किया। इस आर्टिकल को मनीष छिब्बर नाम के व्यक्ति ने 14 जनवरी को 10 बजकर 39 मिनट पर अपडेट किया है। इसे राहुल गाँधी ने अपने ट्वीटर अकाउंट से शेयर भी किया है। इस आर्टिकल में अप्रत्यक्ष रूप से एक न्यायाधीश की ईमानदारी पर सवाल उठाया गया है, मानो आलोक वर्मा को हटाने के पुरस्कार के रूप में सरकार उन्हें यह पद दे रही है।
जस्टिस सीकरी मामले में दिप्रिंट की यह पहली रिपोर्ट है
When the scales of justice are tampered with, anarchy reigns.
This PM will stop at nothing, stoop to anything & destroy everything, to cover up the #RafaleScam. He’s driven by fear. It’s this fear that is making him corrupt & destroy key institutions.https://t.co/IfYHf2EMGd
पहले रिपोर्ट के ठीक 38 मिनट बाद 11 बजकर 17 मिनट पर दि प्रिंट हिंदी की तरफ से एक दूसरी स्टोरी ‘दि प्रिंट की रिपोर्ट के बाद न्यायमूर्ति सीकरी का अब सीसैट पद से इंकार’ की हेडिंग के साथ अपडेट की गई। जिस वेबसाइट को पैदा हुए अभी जुम्मा-जुम्मा आठ रोज़ नहीं हुए हैं, उस वेबसाइट के इस खोखले दावे को देखकर किसी को भी आश्चर्य होगा। हालाँकि, दि प्रिंट ने अंग्रेजी वेबसाइट पर मनीष छिब्बर की यह रिपोर्ट 13 जनवरी को अपडेट की है। लेकिन बावजूद इसके सोचने वाली बात यह है कि दि प्रिंट को किन सूत्रों से यह पता चला कि उनके रिपोर्ट को पढ़ने के बाद ही जस्टिस सीकरी ने अपने फ़ैसले को बदला है।
दिप्रिंट के इस रिपोर्ट में जस्टिस सीकरी के फ़ैसले पर सवाल किया गया है
इस रिपोर्ट में किए गए दावे को देखकर शेखर गुप्ता और उनकी टीम के बड़बोलेपन का अंदाज़ा लगाया जा सकता है। दि प्रिंट को लगता है कि जस्टिस सीकरी मुख्यधारा के चैनल व अख़बारों को देखना-पढ़ना छोड़कर आजकल सिर्फ़ दि प्रिंट को पढ़ रहे हैं। यही वजह है कि उनके रिपोर्ट को अपडेट हुए आधा घंटा भी नहीं हुआ कि जस्टिस सीकरी का दिमाग एकदम से घूम गया और उन्होंने आधे घंटे के अंदर सीसैट पद ठुकराने का फ़ैसला ले लिया। दि प्रिंट को यह भ्रम हो गया है कि उनके रिपोर्ट को पढ़कर ही एक न्यायाधीश ने अपना फ़ैसला बदल लिया है।
जस्टिस एके सीकरी की छवि एक ईमानदार न्यायधीश की रही है। पिछले दिनों बेबाक राय रखने वाले पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू ने कहा, “एके सीकरी को मैं काफ़ी अच्छे से जानता हूँ, वो बेहद ईमानदार न्यायधीश हैं। उन्होंने जो भी फ़ैसला लिया है, कुछ सोचने के बाद ही लिया होगा।”
ऐसे में साफ़ है कि जस्टिस सीकरी को यह बात काफ़ी अच्छी तरह से मालूम था कि सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा पर फ़ैसले के बाद कुछ लोगों और कथित प्रगतिशील मीडिया के एक धरे द्वारा उनके ऊपर सवाल उठाए जाएंगे। इस बात को समझते हुए एके सीकरी ने विवादों के गंदे छींटें से बचने के लिए सेवानिवृत होने के बाद सीसैट के पद से इनकार कर दिया।
लेकिन जस्टिस सीकरी के इस ईमानदार फ़ैसले पर शेखर गुप्ता के शेरों ने इसे अपनी जीत के रूप में देखना शुरू कर दिया। सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा के मामले में जैसे ही जस्टिस सीकरी ने फ़ैसला लिया, राहुल गाँधी ने हर बार की तरह इस बार भी देश के सर्वोच्च संस्थान और वहाँ काम करने वाले ईमानदार न्यायाधीश को बदनाम करना शुरू कर दिया।
दि प्रिंट जैसे प्रोपेगेंडा फ़ैलाने वाले वेबसाइट के लिंक के ज़रिए जस्टिस सीकरी को बदनाम करने वाले राहुल ने एक बार भी नहीं सोचा कि कर्नाटक मामले में कॉन्ग्रेस की याचिका पर सीकरी ने दूसरे जजों के साथ मिलकर रात के एक बजे कोर्ट में सुनवाई की थी। यही नहीं अपने फ़ैसले में सीकरी ने राज्यपाल के फ़ैसले को पलटकर भाजपा को पंद्रह दिनों की बजाय तुरंत बहुमत साबित करने का आदेश सुनाया था। इसी आदेश के बाद भाजपा जल्दबाजी में बहुमत नहीं साबित कर पाई और कॉन्गेस-जेडीएस ने मिलकर सरकार बना लिया था।
कॉन्ग्रेस के लिए देश के सरकारी संस्थाओं पर सवाल उठाना कोई नई बात नहीं है। इससे पहले भी कॉन्ग्रेस पार्टी ने गुजरात में होने वाले राज्यसभा चुनाव के दौरान चुनाव आयोग पर सरकार के दवाब में काम करने का आरोप लगाया था, जबकि चुनाव आयोग ने दो विधायकों के सदस्यता को रद्द करके फ़ैसला कॉन्ग्रेस पार्टी के पक्ष में सुनाया।
इसी तरह जब अचल कुमार ज्योति देश के मुख्य निर्वाचन आयुक्त बने थे, तो कॉन्ग्रेस ने उन्हें भाजपा समर्थक बताकर घड़ियाली आँसू बहाना शुरू कर दिया। कॉन्ग्रेस और राहुल गाँधी के इन बयानों को प्रोपेगेंडा वेबसाइटों ने खूब आगे बढ़ाया था ।
शेखर गुप्ता अपने बेकार और बेबुनियाद ख़बरों को लीड में चलाकर देश की सेना पर पहले ही ‘मिलिट्री कू’ (सेना द्वारा तख़्तापलट) के मनगढंत आरोप लगाकर जलवे काटे हैं। गुप्ता जी जैसे पत्रकारों को कहानी लेखन में अप्रतिम योगदान के लिए साहित्य अकादमी अवार्ड दिया जाना चाहिए।
भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी अभिनव कुमार ने UPSC के टॉपर रहे शाह फ़ैसल के इस्तीफे को प्रोपेगंडा बताते हुए उनकी धज्जियाँ उड़ा दी है। इंडियन एक्सप्रेस में लिखे गए एक लेख में अभिनव कुमार ने कहा कि फ़ैसल ये समझते हैं कि कश्मीरी अलगाववाद भारतीय संविधान के साथ पूरी तरह सुसंगत है। अपने लेख में उन्होंने कश्मीर समस्या पर बात करते हुए कहा कि बुद्धिजीवियों और यहाँ तक कि अंतराष्ट्रीय समुदाय ने कश्मीर पर एक गलत धारणा बना रखी है। बकौल अभिनव वो धारणा है, ‘निर्दयी भारतीय गणराज्य 1947 से ही कश्मीर के लोगों पर अत्याचार करता रहा है।’
अभी कश्मीर में अपनी सेवा दे रहे IPS अधिकारी कुमार इस लेख में कहते हैं कि यह एक संकीर्ण विचारधारा है, जो खुद धार्मिक कट्टरता, ज़ेनोफोबिया पर टिकी हुई है। उनके अनुसार इसमें कश्मीर की संस्कृति और उसके इतिहास के लिए कोई जगह नहीं है। ये ‘एकतरफा उत्पीड़न’ की गलत धारणा कश्मीरियों द्वारा उठाए गए कई गलत कदमों को भी नजरअंदाज कर देती है। अभिनव ने इसके लिए कश्मीरी नेताओं को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि उन अति महत्वकांक्षी नेताओं ने राज्य को विशेष दर्जा हासिल कराने के लिए अतिशयोक्तिपूर्ण आश्वाशन दिए। साथ ही उन्होंने घाटी से कश्मीरी पंडितों की निर्मम सफाई के लिए भी इस धारणा को आड़े हाथों लिया।
अभिनव कुमार ने अलगावादियों को भी कश्मीर पर भारतीय भावनाओं को समझने की हिदायत देते हुए कहा कि भारतीय भावनाएँ भारत-पाक विभाजन के कड़वे अनुभवों पर आधारित है। साथ ही, भारत-पाक के तल्ख़ रिश्ते भी इसे प्रभावित करते हैं। आतंकवादियों और अलगाववादियों द्वारा प्रयोग किए जाने वाले ‘इन्तिफ़ा’ और ‘जिहाद’ जैसे शब्दों पर करारी चोट करते हुए उन्होंने अपने इस लेख में कहा कि ये शब्द ना तो भारतीय मुख्यधारा को भयभीत कर सकते हैं और न ही हमारे इरादे को तनिक भी हिला सकते हैं।
कश्मीरियों को इस अपरिहार्य त्रासदी लिए जिम्मेदार ठहराते हुए उन्होंने लेख में बताया कि इसका निर्माण कश्मीरियों ने ही किया है और वो आज खुद इसमें उलझ गए हैं। शाह फ़ैसल के बारे में बात करते हुए अभिनव कुमार ने लिखा कि भले ही कश्मीर को एक उभरता सितारा मिल गया हो लेकिन उसकी सोच अस्पष्ट है। उन्होंने फ़ैसल द्वारा ‘टारगेट ऑडियंस’ को भरमाने पर भी सवाल खड़ा किया। कुल मिला कर देखें तो पुलिस अधिकारी अभिनव कुमार ने कश्मीर को लेकर चल रही गलत अवधारणा और उसे आगे ले जाने वाले फ़ैसल के इस्तीफे को विशेष प्रोपगेंडा से प्रेरित बताया।
बता दें कि शाह फै़ैसल 2009 में सिविल सेवा की परीक्षा में पूरे भारत में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले पहले कश्मीरी बने थे। उसके बाद वो विभिन्न पदों पर कार्यरत रहे। विवादित अधिकारी फ़ैसल अक्सर उलूलजलूल बयान देकर चर्चा में आते रहे हैं। भारत को रेपिस्तान कह कर तीखी आलोचना का सामना करने वाले फ़ैसल ने भारत सरकार पर कश्मीरियों को प्रताड़ित करने का आरोप लगा कर कुछ दिनों पहले सिविल सेवा से इस्तीफा दे दिया था जिसके बाद उनके उमर अब्दुल्ला की पार्टी में शामिल होने के कयास लगाए जा रहे हैं।
लोकसभा चुनावों के आते-आते कॉन्ग्रेस नेताओं के बयानों को सुनकर ऐसा लगता है, मानो जैसे वो अच्छा-बुरा सब भुलाकर अपना आपा खो चुके हैँ। उन्हें न किसी के पद का ख़्याल है और न ही किसी की उपलब्धियों का। साम-दाम-दंड-भेद किसी भी तरीके से उन्हें सत्ता में आना हैं, जिसके लिए वो कुछ भी कर गुज़रने को तैयार हैं।
मणिशंकर अय्यर, दिग्विजय सिंह और संजय निरूपम जैसे कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता पहले ही प्रधानमंत्री और उनके मंत्रिमंडल के ख़िलाफ़ अपशब्दों का प्रयोग करते रहे हैं। लगातार आते इन नेताओं के बयानों को देखकर लगता हैं जैसे ये सिलसिला अभी रुकने वाला नहीं हैं।
रिपोर्टों के अनुसार उल्हास पवार ने, जो कि कॉन्ग्रेस के नेता भी हैं और पूर्व विधायक भी रह चुके हैं, नागपुर में आयोजित हुई ‘जन संघर्ष रैली’ में इल्ज़ाम लगाते हुए कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी 1942 में स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल थे, जिस दौरान उन्हें जेल भी भेजा गया। लेकिन, उन्होंने 9 दिनों के भीतर ही ब्रिटिश सरकार को क्षमा पत्र लिखा और जेल से बाहर आ गए। इस घटना के बाद वो कभी भी जेल नहीं गए।
इसके बाद उन्होंने अपनी बात को जारी रखते हुए बताया कि विनायक दामोदर सावरकर ने भी अंग्रेज़ों को कम से कम 18 दफ़ा माफ़ी पत्र लिखा। अपनी बातों पर ज़ोर देते हुए उन्होंने भाजपा पर कई और आरोप लगाए। उनके कहे अनुसार 1968 में वो भाजपा के ही नेता थे, जिन्होंने अपनी पार्टी के प्रमुख दीन दयाल उपध्याय को मारा था। जिसका स्त्रोत उन्होंने भारतीय जन संघ के पूर्व अध्यक्ष बलराज माढोक की किताब को बताया, जिसमें उन्होंनें दील दयाल उपध्याय की पूरी जीवनी की चर्चा की है।
बीजेपी की छवि धूमिल करने के लिए लगातार कॉन्ग्रेस नेताओं का इस तरह का हमला करना उनकी ओछी राजनीति का सबूत है। अपने आपको सेक्यूलर पार्टी होने का दावा करने वाली कॉन्ग्रेस सरकार लगातार पीएम की जाति को लेकर, उनके पारिवारिक परिस्थितियों को लेकर उनके बैकग्राउंड को लेकर टिप्पणी करना बताता है, कि कॉन्ग्रेस किस दिशा में जाकर पीएम को सत्ता से हटाने के लिए आतुर है। यही नहीं तथाकथित रूप से महिलाओं का सम्मान करने वाली कॉन्ग्रेस पार्टी के नेता संजय निरूपम ने स्मृति ईरानी पर भी शर्मसार करने वाली नारीविरोधी टिप्पणी की थी।
हर साल की तरह इस साल भी 15 जनवरी ‘आर्मी डे’ के रूप में मनाया गया। दिल्ली कैंट स्थित फील्ड मार्शल केएम करियप्पा परेड ग्राउण्ड में भारतीय सेना और सशस्त्र बलों ने अपनी ताकत दुनिया को दिखाई और अपने प्रदर्शन से पूरे देश का दिल जीत लिया। इस आर्मी डे की सबसे ख़ास बात यह रही कि इतिहास में पहली बार किसी महिला अधिकारी ने परेड का नेतृत्व किया। ये अपने-आप में एक बहुत बड़ा क्षण था, जब लेफ्टिनेंट भावना कस्तूरी ने आर्मी सर्विस कोर के 144 जवानों का नेतृत्व किया। लेफ्टिनेंट कस्तूरी 2015 में सेना में शामिल हुई थीं।
सेना में आने से पहले एनसीसी में शामिल रहीं लेफ्टिनेंट भावना कस्तूरी ने इस परेड को सफल बनाने के लिए कई दिनों तक प्रैक्टिस किया था। परेड से पहले एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि अब भारतीय सेना में क्रांति हो रही है और महिला अधिकारियों की स्वीकार्यता बढ़ रही है। इसके अलावे कप्तान शिखा सुरभि आर्मी डेयरडेविल्स टीम में जगह बनाने वाली पहली महिला बन कर इतिहास रचा। 24 वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने वाली इस टीम ने इस बार भी डेयरडेविल्स बाइक स्टंट्स का ऐसा प्रदर्शन किया, जिस से लोगों के रोंगटे खड़े हो गए।
विदेशी तोपों के साथ-साथ इस बार के सेना दिवस परेड में ‘मेक इन इंडिया (Make In India)’ का भी जलवा रहा। दक्षिण कोरिया के सहयोग से भारत में बनी K-9, जिसका भारतीय नाम वज्र दिया गया है, को भी इस परेड में शामिल किया गया। सेल्फ प्रोपेल्ड हॉवित्ज़र कैटिगरी में वज्र बोफोर्स से भी ज्यादा ताकतवर है। वज्र को नवंबर 2018 में सेना में शामिल किया गया था।
सेना प्रमुख जनरल विपिन रावत ने सेना दिवस पर कहा:
“हम अपने शहीदों को याद करते हैं, जिनकी अद्वितीय वीरता हमें आने वाले वर्षों में भी प्रेरित करती रहेंगी। भारतीय सेना राष्ट्र की सुरक्षा के लिए किसी भी चुनौती से निपटने में सक्षम है और पूरी तरह तैयार है।”
राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद ने भी भारतीय सेना को देश का गौरव बताते हुए उन्हें सेना दिवस की बधाई दी।
सेना दिवस के अवसर पर भारतीय सेना के सभी फौजी भाई-बहनों, युद्धवीरों और उनके परिवारों को बधाई। आप हमारे राष्ट्र के गौरव हैं और हमारी आजादी के रखवाले। सभी भारतवासी चैन की नींद सो सकते है, क्योंकि उन्हें भरोसा है कि आप हमेशा चौकन्ने और सतर्क रहते हैं — राष्ट्रपति कोविन्द
सेना दिवस प्रत्येक वर्ष भारत के पहले चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ़ (COAS) कोडंडेरा मडप्पा करिअप्पा (KM Cariappa) की याद में मनाया जाता है। जनरल करिअप्पा को उनके सेना से रिटायरमेंट के 33 सालों बाद फील्ड मार्शल की उपाधि से सम्मानित किया गया था। राजपूत रेजिमेंट से जुड़े करिअप्पा ने 1947 के भारत-पाक युद्ध में देश की पश्चिमी सीमा पर भारतीय सेना का नेतृत्व किया था। 15 जनवरी यानी आज के ही दिन 1949 में सेना प्रमुख नियुक्त किए गए जनरल करिअप्पा ने भारत और पकिस्तान के बँटवारे के बाद भारतीय सेना के गठन में अहम भूमिका निभाई थी।
देश की रक्षा कर रहे जवानों को लेकर अक्सर तरह-तरह की बातें की जाती हैं। कई बार सोशल मीडिया के यूज़र्स उन पर तंज कसते हुए उनकी सफलताओं पर सवालिया निशान लगाते हुए दिखाई देते हैं। कई बार शाहरुख़ और सलमान की 100 करोड़ पार कर गई फ्लॉप फिल्मों को शेयर करने में चक्कर में हम नौज़वानों के बलिदान को एक दूसरे के साथ साझा करना ही भूल जाते हैं।
लेकिन, हमारी सराहनाओं की अपेक्षा किए बिना भी वो देश की रक्षा में हमेशा जुटे रहते हैं ताकि हर नागरिक सुरक्षित रह सके। 1997 में आई बॉर्डर फिल्म उन्हीं सैनिकों की कहानी दिखाती है, जो देश की रक्षा करने में अपने घर से दूर, ज़िम्मेदारियों को दरकिनार करके देश के लिए मर-मिटने की कसम खाए, सरहद पर मौत का सेहरा बाँधे हमेशा तैनात रहते हैं।
इस फिल्म का पर्दे पर आना भले ही कलाकारों और निर्देशक की मेहनत का परिणाम है, लेकिन इसकी सफ़लता सिर्फ उन सैनिकों के जीवन का आधार है, जो हकीकत में भी बिलकुल उसी तरह देश की सुरक्षा करते हैं, कभी गर्म रेत पर तो कभी सियाचीन की बर्फ पर…
इस फिल्म में एक गाना है, “संदेशे आते हैं, हमें तड़पाते हैं….” जिसमें हर सैनिक अपने घर को, अपने लोगों को, अपनी ज़िम्मेदारियों को याद करते हुए बेहद भावुक हो जाता है और बदलते अंतरों में अपनी यादों को और व्यथाओं को गुनगुना कर बताने की कोशिश करता है। वो वाकई आँसूं छलका देने वाला दृश्य होता है। सोचिए अगर कोई जवान सही में ये बोल गुनगुनाए तो शायद हम उनके दर्द की खनक को दोगुना महसूस कर पाएंगे।
सोशल मीडिया पर इस समय एक वीडियो वायरल हुआ है। इस वीडियो में बीएसएफ का एक जवान बॉर्डर फिल्म के उसी गाने को बहुत ही शानदार ढंग से गा रहा है। फेसबुक से लेकर ट्विटर और ढेर सारे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर इस वीडियो को शेयर किया जा रहा है।
BSF soldier sings “Sandese Aate Hain” from movie ‘Border’. Salute to the Bravehearts and their spirit and dedication towards the Nation. ???pic.twitter.com/UPQCw6gHVn
इस वीडियो की सबसे खास बात यह है कि फिल्म में जहाँ कई उपकरणों की मदद से और दृश्यों के चुनाव के साथ इस गाने में जान डाली गई थी, वहीं इसमें एक रियल लाइफ सैनिक इस गाने को अपनी भावनाओं में लपेटकर गाते जा रहा है, वो भी पूरे सुर-लय-ताल के साथ।
बता दें बॉर्डर फिल्म में यह गाना सोनू निगम और रूप कुमार राठौड़ की आवाज़ में है।
दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने जेएनयू के पूर्व छात्र नेता कन्हैया कुमार, सईद उमर ख़ालिद और अनिर्बन भट्टाचार्य पर सोमवार (जनवरी 14, 2019) को देशद्रोह के मामले में आपराधिक षड्यंत्र रचने का आरोप लगाया है। पुलिस का आरोप है कि ये लोग 9 फरवरी 2016 को हुए प्रदर्शन में अन्य अपराधों से भी जुड़े हुए थे।
इस पूरे मामले पर पुलिस ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया के रिपोर्ट की पुष्टि करते हुए बताया कि जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व नेता कन्हैया कुमार ने ही उस दिन पूरी भीड़ का नेतृत्व किया था और बतौर छात्रसंघ नेता उसने सबको रोकने की जगह उन सबके साथ मिलकर देश-विरोधी नारेबाज़ी की थी।
दिल्ली पुलिस ने जो चार्जशीट फाइल की है, वो पूरे 1200 पन्नों का है। इसमें इस बात का ज़िक्र है कि 2016 में हुई यह घटना सोची-समझी साज़िश और पूरी प्लानिंग के साथ हुई थी। अपनी चार्जशीट में पुलिस ने इस मामले से जुड़े 90 गवाहों को साक्ष्य के तौर पर रखा है। इनमें से 30 ऐसे हैं, जो देशद्रोही नारेबाज़ी के प्रत्यक्षदर्शी हैं। इनमें से कुछ वहाँ के स्टॉफ और सुरक्षाकर्मी भी हैं।
रिपोर्ट के अनुसार सैयद उमर ख़ालिद के खिलाफ देशद्रोह के साथ-साथ आईपीसी की दो अन्य धाराएँ भी लगाई गई हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि ख़ालिद पर आरोप है कि उसने कुछ छात्रों और लोगों के नाम पर फर्जी हस्ताक्षर किए थे। खालिद पर 124ए, 323, 465, 471, 143, 147, 149 और 120 बी धारा लगाई गई है। अन्य आरोपितों पर 465 और 471 धारा को छोड़कर बाकी सारी धाराएँ लगाई गई हैं।
लगभग 3 साल पहले सैयद उमर ख़ालिद, कन्हैया कुमार और अनिर्बन भट्टाचार्य को इस पूरे मामले में मुख्य आरोपितों के रूप में गिरफ़्तार किया गया था, लेकिन बाद में सबको ज़मानत मिल गई थी। इन तीन के अलावा इस मामले में 7 कश्मीरी छात्रों – अक़ूब हुसैन, मुज़ीब हुसैन गट्टू, मुनीब हुसैन गट्टू, उमर गुल, रईस रसूल, बशरत अली और ख़ालीद बशीर भट्ट के भी नाम शामिल हैं। इन सातों आरोपितों में से उस समय किसी को भी गिरफ़्तार नहीं किया गया था।
सात कश्मीरी छात्रों में से रईस रसूल एक फ्रीलांस पत्रकार है, जबकि अक़ूब हुसैन डेंटिस्ट्री की पढ़ाई कर रहा है। बाकी के छात्र अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से या जेएनयू से है।
इस पूरी घटना के आरोपितों में से कन्हैया, उमर ख़ालिद और अनिर्बन के अलावा मुज़ीब हुसैन गट्टू जेएनयू का छात्र था। जबकि देश-विरोधी इस घटना को अंज़ाम देने के लिए कुछ लोगों को बाहर से बुलाया गया था, जिन्होंने पूरे समय अपने चेहरों पर मास्क ढक रखा था। हालाँकि पुलिस की स्पेशल सेल ने वहाँ पर मौजूद गवाहों और सोशल मीडिया के ज़रिए इन सबकी पुख़्ता पहचान कर ली है।