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कोलकाता का पार्क सर्कस एरिया आजादी के बाद से ही इस्लामी कट्टरपंथियों की उपद्रव-हिंसा का रहा केंद्र, पहली बार कसी लगाम: जानें मुस्लिमों ने कैसे अब तक की सरकारों पर बनाए रखा था दबाव

मध्य कोलकाता का पार्क सर्कस इलाका एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। इस बार सड़क पर नमाज पढ़ने और लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर लगी रोक के विरोध में प्रदर्शन हो रहा था। इस दौरान अचानक हिंसा भड़क गई और प्रदर्शनकारियों की पुलिस से झड़प हो गई। भीड़ ने गाड़ियों में तोड़फोड़ की, जिससे कुछ पुलिसवाले भी घायल हो गए हैं।

इस ताजा घटना के बाद पार्क सर्कस को लेकर राजनीति भी गरमा गई है। दरअसल, यह इलाका पिछले कई सालों से बड़े प्रदर्शनों और भीड़ जुटाने का मुख्य केंद्र रहा है, खासकर तब जब मुस्लिम समुदाय से जुड़े मुद्दे सामने आते हैं। अब इस पूरे मामले पर पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने कड़ी चेतावनी दी है। उन्होंने साफ-साफ कहा है कि जो लोग भी कानून-व्यवस्था को बिगाड़ने की कोशिश करेंगे, उन्हें बख्शा नहीं जाएगा। सरकार अब किसी भी तरह की हिंसा या अशांति फैलाने की कोशिश को बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करेगी।

CM शुभेंदु अधिकारी की चेतावनी

मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने पथराव की घटना पर कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने साफ कहा है कि हिंसा करने वालों के खिलाफ राज्य सरकार बहुत सख्ती से निपटेगी। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि बंगाल में अब गुंडागर्दी बिल्कुल नहीं चलने दी जाएगी।

मुख्यमंत्री ने कहा कि पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को कानून के तहत कार्रवाई करने की पूरी छूट दे दी गई है। अब वह समय बीत चुका है जब पुलिसवालों को बिना किसी सरकारी समर्थन के अकेले छोड़ दिया जाता था। अब सरकार पुलिस के साथ मजबूती से खड़ी है।

CM शुभेंदु अधिकारी ने आगे कहा कि कुछ लोगों को पहले की ढीली व्यवस्था की आदत हो गई थी। उन्हें लगता था कि वे कुछ भी करेंगे और उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होगी। लेकिन अब सरकार साफ संदेश देना चाहती है कि पथराव करना, शांति भंग करना या मजहबी नारों की आड़ में तनाव फैलाना बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने यह भी बताया कि पुलिस सोशल मीडिया पर नजर रख रही है, क्योंकि ऐसी खबरें आई हैं कि घटना होने से पहले ही इसके बारे में जानकारी इंटरनेट पर डाल दी गई थी।

मुख्यमंत्री ने कोलकाता पुलिस को और मजबूत बनाने की बात भी कही। उन्होंने कहा कि पुलिस बल को बेहतर सुविधाएँ और गाड़ियाँ दी जाएँगी। इसके साथ ही, उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्री से अपील की है कि राज्य में पहले से मौजूद पैरामिलिट्री (अर्धसैनिक बलों) की कंपनियों को कुछ समय के लिए यहीं रहने दिया जाए, क्योंकि उनके अचानक जाने से पुलिस पर काम का दबाव बढ़ सकता है। आखिर में उन्होंने आम जनता से भी अपील की कि वे शांति बनाए रखने में पुलिस और प्रशासन का सहयोग करें।

पुलिस की कार्रवाई

यह हिंसा पार्क सर्कस सेवन पॉइंट चौराहे के पास हुई, जहाँ सड़क पर नमाज पढ़ने और लाउडस्पीकर की आवाज सीमित करने के सरकारी नियमों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन बुलाया गया था। इस दौरान इस्लामी कट्टरपंथी वहाँ इकट्ठा हो गए और सड़क जाम कर दी, जिससे ट्रैफिक रुक गया। खुफिया जानकारी मिलने के बाद पुलिस ने पहले से ही वहाँ सुरक्षा बल तैनात कर रखा था।

अधिकारियों के मुताबिक, जैसे ही पुलिस ने सड़क से जाम हटाने की कोशिश की, माहौल बिगड़ गया। इस्लामी भीड़ ने सुरक्षाकर्मियों और वहाँ खड़ी गाड़ियों पर पत्थर और ईंटें फेंकनी शुरू कर दीं, जिससे पुलिस की गाड़ियाँ और कई दूसरी गाड़ियाँ टूट गईं। हालात को काबू में करने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया और भीड़ को खदेड़ दिया, जिसके बाद वहाँ भारी पुलिस बल तैनात किया गया और ट्रैफिक को दोबारा शुरू कराया गया।

पुलिस ने इस मामले में कई लोगों को गिरफ्तार किया है और इलाके में फ्लैग मार्च भी किया है। प्रशासन ने इस घटना को कुछ दिन पहले राजाबाजार में शुक्रवार की नमाज के दौरान हुए विवाद से भी जोड़कर देखा है, जहाँ पुलिस ने सड़क पर नमाज न पढ़ने की सरकारी नीति को लागू करने की कोशिश की थी और तब भी झड़प हुई थी।

दरअसल, नई सरकार ने सड़क पर होने वाली मजहबी गतिविधियों को लेकर बहुत कड़ा रुख अपनाया है। बीजेपी नेताओं का साफ कहना है कि नमाज सिर्फ मस्जिदों के अंदर होनी चाहिए और इससे सड़कों पर आम लोगों को कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए। इसी नीति के तहत प्रशासन अब लाउडस्पीकर की आवाज और सड़कों पर भीड़ जुटाने के खिलाफ सख्ती से कार्रवाई कर रहा है।

पार्क सर्कस: क्यों बनता है यह बड़े प्रदर्शनों का केंद्र?

पार्क सर्कस में हुई इस घटना ने एक बार फिर इस इलाके के पुराने इतिहास की याद दिला दी है। यह इलाका लंबे समय से बड़े-बड़े प्रदर्शनों और भारी भीड़ जुटाने का मुख्य केंद्र रहा है। जब भी समुदाय से जुड़ा कोई बड़ा आंदोलन होता है, तो पार्क सर्कस उसका मुख्य अड्डा बन जाता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस इलाके की बनावट और यहाँ की सड़कें ऐसी हैं, जहाँ बहुत ही कम समय में बहुत बड़ी भीड़ आसानी से इकट्ठा हो जाती है।

भौगोलिक नजरिए से देखें तो पार्क सर्कस कोलकाता के सबसे जुड़े हुए इलाकों में से एक है। इसके आसपास कई मुख्य सड़कें हैं और पास में ही घनी आबादी वाली बस्तियाँ भी हैं। इसके अलावा, हर शुक्रवार को जुमे की नमाज के समय यहाँ वैसे भी भारी संख्या में लोग इकट्ठा होते हैं। ऐसे में जब भी कोई सामाजिक या राजनीतिक तनाव होता है, तो यहाँ लोगों को एकजुट करना बहुत आसान हो जाता है। यही वजह है कि पिछले कई सालों में मुस्लिम समुदाय से जुड़े जितने भी बड़े प्रदर्शन हुए हैं, वे या तो इसी इलाके से शुरू हुए हैं या फिर यहीं आकर उन्हें असली रफ्तार मिली है।

CAA-NRC के खिलफ पार्क सर्कस मैदान बना आंदोलन का बड़ा केंद्र

इसका सबसे बड़ा उदाहरण साल 2020 की सर्दियों में देखने को मिला था, जब नागरिकता कानून (CAA) और NRC के खिलाफ हुए आंदोलन ने पार्क सर्कस मैदान को एक बड़ा केंद्र बना दिया था। दिल्ली के शाहीन बाग आंदोलन से प्रेरणा लेकर यहाँ मुस्लिम महिलाओं ने दिन-रात का धरना शुरू कर दिया था। प्रदर्शन कर रही महिलाओं का कहना था कि जब तक नागरिकता कानून और NRC से जुड़ी उनकी चिंताएँ दूर नहीं होतीं, वे वहाँ से नहीं हटेंगी।

इस आंदोलन में पार्क सर्कस और उसके आसपास के इलाकों की मुस्लिम महिलाएँ लगातार शामिल हुईं। कई महिलाएँ अपने बच्चों और परिवार के सदस्यों को भी साथ लाई थीं, जबकि छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी उनका साथ दिया। जैसे-जैसे यह प्रदर्शन बढ़ा, वहाँ नारेबाज़ी होने लगी और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए गए। आंदोलन के बड़ा होने पर प्रदर्शनकारियों ने टेंट, शौचालय और लाउडस्पीकर जैसी सुविधाओं की माँग भी की। इस आंदोलन को वहाँ मौजूद कुछ लोगों ने ‘स्वतंत्रता आंदोलन 2’ यानी दूसरी आज़ादी की लड़ाई का नाम भी दे दिया था।

धरने पर बैठी कई मुस्लिम महिलाओं का कहना था कि उन्होंने इससे पहले कभी किसी राजनीतिक आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया था, लेकिन नागरिकता छिन जाने के डर से वे इस बार सड़क पर उतरने को मजबूर हुईं। आंदोलन के दौरान प्रदर्शन स्थल पर दिल का दौरा पड़ने से समीदा खातून नाम की एक महिला की मौत हो गई, जिसने हर किसी को भावुक कर दिया।

इस दौरान कई बड़े कलाकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिक नेताओं ने भी पार्क सर्कस मैदान का दौरा किया। यह प्रदर्शन कोलकाता में सीएए (CAA) के खिलाफ सबसे बड़ा चेहरा बन गया और इसके बाद पूरे देश में पार्क सर्कस की चर्चा होने लगी।

रोहिंग्या मुसलमानों के समर्थन में बड़ी रैली

पार्क सर्कस एक बार फिर उस समय एक बड़े आंदोलन का केंद्र बना, जब म्यांमार वापस भेजे जा रहे रोहिंग्या मुसलमानों के समर्थन में एक हजार से ज्यादा मुस्लिम लोग इकट्ठा हुए। म्यांमार सरकार द्वारा रोहिंग्याओं को वापस बुलाने के फैसले के खिलाफ कई मुस्लिम संगठनों ने मिलकर एक बड़ी रैली निकाली। यह मार्च पार्क सर्कस मैदान से शुरू हुआ था और वहाँ से होते हुए म्यांमार के दूतावास (कंसुलेट ऑफिस) की तरफ बढ़ा था।

इस प्रदर्शन के बाद बंगाल में भारी राजनीतिक बयानबाजी शुरू हो गई। बीजेपी नेताओं ने तब की राज्य सरकार (ममता बनर्जी सरकार) पर तीखा हमला बोला और आरोप लगाया कि सरकार इस मुद्दे के जरिए वोट बैंक की राजनीति कर रही है। इस बड़ी रैली के बाद पार्क सर्कस की यह पहचान और मजबूत हो गई कि जब भी मुस्लिम संगठनों से जुड़ा कोई मुद्दा होता है, तो भारी भीड़ जुटाने के लिए इसी इलाके को चुना जाता है।

नई सरकार के आते ही बदल गई पुलिस की सख्ती

पुलिस ने पार्क सर्कस मामले में जो कार्रवाई की, उसे नई बीजेपी सरकार के समर्थक एक बड़े बदलाव के रूप में देख रहे हैं। उनका मानना है कि टीएमसी (TMC) का राज खत्म होने के बाद अब प्रशासन के काम करने का तरीका पूरी तरह बदल गया है। नई सरकार का साफ कहना है कि अब कानून-व्यवस्था को लेकर कोई ढिलाई नहीं बरती जाएगी। जो लोग भी सड़कें जाम करेंगे, पुलिस पर पत्थर फेंकेंगे या हिंसा फैलाएँगे, उनके खिलाफ तुरंत और कड़ी कार्रवाई की जाएगी।

सरकार के समर्थकों का कहना है कि पहले ऐसे मामलों में शामिल लोगों पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं होती थी और वे आसानी से बच जाते थे। लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब गड़बड़ी करने वालों को तुरंत गिरफ्तार किया जा रहा है, संवेदनशील इलाकों में भारी पुलिस बल तैनात किया जा रहा है और पुलिस का सख्त रूप साफ दिखाई दे रहा है। संवेदनशील जगहों पर पुलिस का फ्लैग मार्च करना, सड़कों पर भीड़ जमा करने से रोकना और तुरंत एक्शन लेना इस नए बदलाव के सबसे बड़े उदाहरण हैं।

एक बार फिर पार्क सर्कस राजनीति और चर्चा के केंद्र में आ गया है। इस पूरी घटना ने यहाँ के पुराने इतिहास, पुराने आंदोलनों और अब सरकार की नई कड़क नीति को एक साथ लाकर खड़ा कर दिया है। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की तरफ से प्रशासन ने बिल्कुल साफ संदेश दे दिया है कि कानून के दायरे में रहकर शांतिपूर्वक काम करने की पूरी आजादी है, लेकिन अगर किसी ने भी प्रदर्शन की आड़ में हिंसा करने या शहर की शांति भंग करने की कोशिश की, तो पुलिस उसे किसी भी कीमत पर बख्शेगी नहीं।

(यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है। अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

ममता राज में रेप केस का खुलासा करने वाली महिला IPS को किया गया था शंट, अब CM शुभेंदु ने सौंपी अहम जिम्मेदारी: जानें कौन हैं ‘सुपरकॉप’ दमयंती सेन, जिनसे काँपते हैं अपराधी

पश्चिम बंगाल में ‘माँ-माटी-मानुष’ का नारा देकर सत्ता में आई ममता बनर्जी सरकार का असली चेहरा उस समय बेनकाब हो गया था, जब उन्होंने अपनी ही सरकार की नाक के नीचे हुए एक खौफनाक गैंगरेप को ‘मनगढ़ंत कहानी’ बता दिया था।

उस दौर में राजनीति के बड़े-बड़े धुरंधर मुख्यमंत्री ममता के सुर में सुर मिला रहे थे, लेकिन एक निडर महिला IPS अधिकारी ऐसी थीं, जिन्होंने सत्ता के दबाव के आगे झुकने से साफ इनकार कर दिया। नाम है- दमयंती सेन।

ममता सरकार ने सच को उजागर करने के बदले इस जांबाज अधिकारी को इनाम देने के बजाय सालों-साल हाशिए (साइडलाइन) पर धकेल कर रखा। लेकिन कहते हैं न कि सच कभी हारता नहीं है। बंगाल में BJP की सरकार बनते ही मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने बड़ा और सराहनीय कदम उठाया है।

उन्होंने तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के 15 साल के काले शासनकाल के दौरान महिलाओं और बच्चों पर हुए अत्याचारों की जाँच के लिए एक हाई-लेवल विशेष आयोग बनाया है। CM शुभेंदु अधिकारी ने इस बेहद महत्वपूर्ण जाँच आयोग का ‘सदस्य सचिव’ (Member Secretary) दमयंती सेन को नियुक्त कर उन्हें वो सम्मान लौटाया है, जिसकी वो हकदार थीं।

कौन हैं ‘सुपरकॉप’ दमयंती सेन?

दमयंती सेन 1996 बैच की भारतीय पुलिस सेवा (IPS) की एक बेहद तेजतर्रार अधिकारी हैं। 1970 में जन्मी दमयंती पढ़ाई-लिखाई में बचपन से ही बेहद होनहार और हमेशा फर्स्ट क्लास रही हैं। उन्होंने कोलकाता के प्रतिष्ठित जादवपुर विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र (Economics) में ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की।

उनकी काबिलियत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वह कोलकाता पुलिस के इतिहास में जॉइंट कमिश्नर (क्राइम) के पद पर तैनात होने वाली पहली महिला अधिकारी थीं। इसके बाद वे कोलकाता पुलिस की स्पेशल कमिश्नर भी बनीं। प्रशासनिक हलकों में उनकी ईमानदारी, कड़क स्वभाव और बिना किसी राजनीतिक दबाव के काम करने के अंदाज की मिसाल दी जाती है।

ममता बनर्जी का वो ‘झूठ’ जिसने हिला दिया था बंगाल

कहानी की शुरुआत होती है 6 फरवरी 2012 से। कोलकाता के आलीशान पार्क स्ट्रीट इलाके में एक नाइट क्लब से लौट रही महिला के साथ चलती कार में सामूहिक बलात्कार (पार्क स्ट्रीट गैंगरेप) होता है। तब ममता बनर्जी की तृणमूल कॉन्ग्रेस सरकार को सत्ता में आए कुछ ही समय हुआ था।

अपनी सरकार की छवि को बचाने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने बिना किसी जाँच के इस भयानक कांड को ‘सजानो घोटोना’ (एक मनगढ़ंत कहानी) करार दे दिया। उन्होंने सार्वजनिक तौर पर कहा कि यह उनकी सरकार को बदनाम करने की एक राजनीतिक साजिश है। मुख्यमंत्री का यह बयान पीड़ित महिला के घावों पर नमक छिड़कने जैसा था।

जब मुख्यमंत्री के झूठ के सामने अड़ गईं दमयंती सेन

ममता बनर्जी ने तो इसे झूठ मान लिया था, लेकिन उस समय क्राइम ब्रांच की प्रभारी जॉइंट कमिश्नर दमयंती सेन चुप नहीं बैठीं। उन्होंने मुख्यमंत्री के राजनीतिक बयानों की परवाह न करते हुए पूरी लगन से जाँच की।

दमयंती सेन और उनकी टीम ने वैज्ञानिक और पुख्ता सबूत जुटाए और यह साबित कर दिया कि बलात्कार की घटना कोई अफवाह नहीं बल्कि 100 फीसदी कड़वा सच थी। उन्होंने चंद दिनों के भीतर ही रसूखदार आरोपितों को दबोचकर सलाखों के पीछे भेज दिया।

सच बोलने की ‘सजा’ और ममता राज में ‘वनवास’

ममता बनर्जी के दावों को झूठा साबित करना और पीड़ित महिला को न्याय दिलाना दमयंती सेन के करियर पर भारी पड़ गया। बौखलाई ममता सरकार ने केस सुलझने के तुरंत बाद ही उनका ट्रांसफर कोलकाता पुलिस मुख्यालय (लालबाजार) से हटाकर बैरकपुर पुलिस ट्रेनिंग कॉलेज में एक बेहद मामूली और कम महत्वपूर्ण पद पर कर दिया।

सरकार ने इसे ‘रूटीन ट्रांसफर’ कहा, लेकिन पूरा बंगाल समझ गया था कि सच का साथ देने की वजह से एक ईमानदार अफसर को प्रताड़ित किया जा रहा है। इसके बाद TMC के पूरे कार्यकाल में उन्हें मुख्यधारा से दूर रखा गया।

हालाँकि, कलकत्ता हाई कोर्ट को उनकी ईमानदारी पर इतना भरोसा था कि अदालत ने 2014 के ‘मध्यमग्राम बलात्कार कांड’, साल 2022 के चार बड़े रेप केस और चर्चित रसिका जैन मौत मामले की जाँच सीधे दमयंती सेन को सौंप दी थी।

पर्सनल लाइफ: एक साहसी सिंगल मदर

दमयंती सेन अपनी निजी जिंदगी को हमेशा मीडिया और लाइमलाइट से दूर रखती हैं। उनके माता-पिता या भाई-बहन के बारे में कोई जानकारी सार्वजनिक नहीं है। उन्होंने जीवन में कभी शादी नहीं की, लेकिन वह एक बेहद गौरवान्वित ‘सिंगल मदर’ हैं। उन्होंने एक बच्चे को गोद लिया है और अकेले ही उसका बेहतरीन पालन-पोषण कर रही हैं।

CM शुभेंदु का मास्टरस्ट्रोक: बेटियों को सुरक्षा, अपराधियों को सजा

पश्चिम बंगाल की सत्ता संभालते ही मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ताबड़तोड़ और कड़े फैसले ले रहे हैं। पिछली सरकार के दौरान हुए संस्थागत भ्रष्टाचार, ‘कट मनी’, रिश्वतखोरी और महिलाओं-बच्चों के खिलाफ हुई हिंसा के खिलाफ उन्होंने कड़ा रुख अपनाया है। शुभेंदु सरकार ने इसके लिए दो अलग-अलग जाँच आयोगों का गठन किया है।

पहला है संस्थागत भ्रष्टाचार की जाँच, जिसमें कलकत्ता हाई कोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस विश्वजीत बसु की अध्यक्षता में यह कमेटी काम करेगी, जिसमें ADG रैंक के अधिकारी जयरमन सदस्य-सचिव होंगे।

दूसरा है महिला एवं बाल उत्पीड़न की जाँच, जिसमें रिटायर्ड जस्टिस समाप्ति चटर्जी की अध्यक्षता में बनी इस कमेटी में IPS दमयंती सेन को ‘सदस्य सचिव’ बनाया गया है। यह आयोग विशेष रूप से अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अल्पसंख्यक समुदायों की पीड़ित महिलाओं को न्याय दिलाएगा।

1 जून से लगेगा न्याय का ‘जनता दरबार’

ममता सरकार जहाँ अपराधियों को बचाने और सच छुपाने के आरोपों से घिरी रही, वहीं शुभेंदु सरकार ने सीधे जनता के द्वार जाने का फैसला किया है। यह विशेष आयोग आगामी 1 जून से राज्य के अलग-अलग थानों में जाकर ‘जनसुनवाई’ करेगा, जहाँ पीड़ित महिलाएँ बिना किसी डर के सीधे अपनी शिकायतें दर्ज करवा सकेंगी।

1 जून से पहले दमयंती सेन की देखरेख में अधिकारियों की टीम पुराने सभी लंबित मामलों का डेटा जुटा रही है। सालों तक हाशिए पर रहने के बाद दमयंती सेन की यह वापसी बंगाल की कानून-व्यवस्था के लिए एक नया सवेरा है और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी की न्यायप्रिय सोच का सबसे बड़ा प्रमाण है।

खरीफ की फसल के लिए UP की तैयारी पूरी, अभी से खाद-बीज-सिंचाई के लिए निगरानी तंत्र तैयार: जानें किसान हित में क्या-क्या कदम उठा रही योगी सरकार

उत्तर प्रदेश भारत का सबसे बड़ा कृषि प्रधान राज्य है, जहाँ करोड़ों किसान प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से कृषि पर निर्भर हैं। राज्य की अर्थव्यवस्था में कृषि का महत्वपूर्ण योगदान है। हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश सरकार ने किसानों की आय बढ़ाने, कृषि उत्पादन को स्थिर रखने तथा खेती को अधिक लाभकारी बनाने के लिए अनेक ठोस कदम उठाए हैं।

खासतौर पर उर्वरकों की उपलब्धता, उनकी आपूर्ति व्यवस्था, कालाबाजारी पर नियंत्रण और किसानों तक समय पर खाद पहुँचाने के क्षेत्र में योगी आदित्यनाथ सरकार की कार्यशैली उल्लेखनीय रही है।

उत्तर प्रदेश सरकार ने किसानों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए खाद और उर्वरकों की आपूर्ति को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। प्रदेश में यूरिया, डीएपी, एनपीके और एमओपी जैसे प्रमुख उर्वरकों का पर्याप्त भंडारण किया गया है।

राज्य सरकार ने केंद्र सरकार के रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय के साथ मिलकर किसानों तक समय पर खाद पहुँचाने की प्रभावी व्यवस्था विकसित की है। यूपी सरकार का कहना है कि प्रदेश में लाखों मीट्रिक टन उर्वरक उपलब्ध हैं और लगातार अतिरिक्त आवंटन भी कराया जा रहा है।

किसानों को समय पर खाद उपलब्ध कराने की व्यवस्था

उत्तर प्रदेश सरकार ने खरीफ और रबी सीजन में खाद की कमी न होने देने के लिए बड़े स्तर पर भंडारण किए। एक रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश सरकार ने लगभग 4.8 मिलियन टन उर्वरकों का भंडार तैयार किया, जो कुल मांग का लगभग 84 प्रतिशत था। राज्य सरकार ने केवल घोषणाएँ नहीं कीं, बल्कि जमीनी स्तर पर खाद उपलब्ध कराने की दिशा में प्रभावी प्रशासनिक प्रबंधन भी किया।

खेती में समय पर खाद की उपलब्धता अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। यदि बुआई या सिंचाई के समय किसान को खाद नहीं मिले तो इसका सीधा असर फसल पर पड़ता है। इसे ध्यान में रखते हुए उत्तर प्रदेश सरकार ने बहुस्तरीय निगरानी तंत्र विकसित किया है।

दैनिक जागरण की एक रिपोर्ट के अनुसार कृषि विभाग ने ये भी स्पष्ट किया है कि प्रदेश के सभी जिलों में पर्याप्त उर्वरक उपलब्ध हैं तथा किसानों को अफवाहों पर ध्यान नहीं देना चाहिए। इस प्रशासनिक पारदर्शिता ने सरकार और किसानों के बीच विश्वास बढ़ाने का काम किया है।

कालाबाजारी और जमाखोरी पर सख्त कार्रवाई

देश के कई राज्यों में खाद की कालाबाजारी और कुछ अन्य परेशानियों से जूझ रहे किसानों के लिए बड़ी समस्या रही है। लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने इस चुनौती से निपटने के लिए कठोर कदम उठाए हैं।

सरकार ने उर्वरकों की टैगिंग एवं पॉइंट ऑफ सेल (PoS) मशीनों के माध्यम से बिक्री को अनिवार्य बनाया है। किसानों के पहचान पत्र के माध्यम से खाद वितरण की व्यवस्था लागू की गई है। इससे यह सुनिश्चित हुआ कि अनुदानित उर्वरक वास्तविक किसानों तक ही पहुँचे।

सरकार ने उर्वरकों की अनधिकृत बिक्री, जमाखोरी तथा कालाबाजारी पर उर्वरक नियंत्रण आदेश एवं आवश्यक वस्तु अधिनियम-1955 के अंतर्गत कार्रवाई सुनिश्चित की है।

एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार योगी सरकार ने स्पष्ट निर्देश दिए कि किसानों को किसी प्रकार की परेशानी नहीं होनी चाहिए और उर्वरकों की कालाबाजारी करने वालों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाएगी। इसके जरिए किसानों के हितों की रक्षा के लिए ये कदम अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुआ।

वैज्ञानिक खेती और संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा

सरकार ने किसानों से सही मात्रा में खाद के उपयोग की अपील की है। कृषि वैज्ञानिकों द्वारा सुझाई गई मात्रा के अनुसार ही उर्वरक खरीदने और प्रयोग करने का निर्देश दिया गया है।

यह पहल कई तरह से महत्वपूर्ण है। पहली इससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है। इसके अलावा किसानों के फसल लगाने की लागत में कमी आती है। सही मात्रा में खाद के उपयोग से उत्पादन की गुणवत्ता बढ़ती है और सबसे अहम पहलू येहा कि इससे पर्यावरण संरक्षण भी होता है।

उत्तर प्रदेश सरकार लगातार ‘संतुलित उर्वरक उपयोग’ की अवधारणा को बढ़ावा दे रही है। कृषि विभाग किसानों को जागरूक करने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम, किसान गोष्ठियाँ और कृषि मेलों का आयोजन भी कर रहा है।

कृषि क्षेत्र में उत्तर प्रदेश की बढ़ती प्रगति

उत्तर प्रदेश ने हाल के वर्षों में कृषि क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार राज्य की अर्थव्यवस्था में कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों का योगदान बढ़कर लगभग 24.9 प्रतिशत तक पहुँच गया है।

यह उपलब्धि कई कारणों से संभव हुई है। समय पर खाद और बीज की उपलब्धता मिली है। इसके अलावा सिंचाई व्यवस्था को बेहतर किया गया है। सरकार ने फसल विविधीकरण के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया है। कृषि तकनीक का विस्तार लगातार किया जा रहा है। और सरकारी योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जा रहा है।

एक रिपोर्ट कहती है कि उत्तर प्रदेश की कृषि वृद्धि दर 17.7 प्रतिशत तक पहुँच गई, जो पूर्व वर्षों की तुलना में काफी अधिक है। इससे ये तो साफ है कि योगी सरकार की कृषि नीतियाँ किसानों के हित में सकारात्मक परिणाम दे रही हैं।

कृषि आधुनिकीकरण की दिशा में आगे बढ़ रहा UP

सरकार द्वारा PoS मशीनों से उर्वरक वितरण की व्यवस्था लागू करना एक बड़ा प्रशासनिक सुधार है। इससे कई लाभ हुए। वास्तविक किसानों की पहचान आसान हुई। इससे फर्जी खरीद पर भी रोक लगी। साथ ही खाद की उपलब्धता का असल डेटा मिला और वितरण प्रणाली अधिक पारदर्शी बनी।

उत्तर प्रदेश सरकार केवल खाद वितरण तक सीमित नहीं है, बल्कि कृषि आधुनिकीकरण पर भी विशेष बल दे रही है। आर्थिक सर्वेक्षण में उल्लेख है कि राज्य में सोलर पंपों का विस्तार हुआ है। इसके साथ ही माइक्रो इरिगेशन, सीड पार्क की स्थापना, हाईटेक नर्सरी, कृषि प्रसंस्करण इकाइयों के विकास के साथ कोल्ड स्टोरेज की क्षमता भी बढ़ाई जा रही है। इन पहलों से कृषि को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाने में सहायता मिल रही है।

योगी सरकार की सक्रियता के कारण किसानों में यह विश्वास मजबूत हुआ है कि सरकार उनकी समस्याओं के समाधान के लिए तत्पर है। खाद संकट की आशंकाओं के बीच भी राज्य सरकार ने नियमित प्रेस विज्ञप्तियों और प्रशासनिक निर्देशों के माध्यम से किसानों को भरोसा दिलाया कि प्रदेश में पर्याप्त खाद और उर्वरक उपलब्ध हैं।

चुनौतियाँ अभी और भी हैं

हालाँकि उत्तर प्रदेश सरकार ने उर्वरक प्रबंधन में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है, फिर भी कुछ चुनौतियाँ बनी हुई हैं। बढ़ती जनसंख्या के कारण खाद की माँग लगातार बढ़ रही है। इसके अलावा किसानी के कुछ क्षेत्रों में अचानक खाद की माँग बढ़ने लगी है।

इनके अलावा कुछ निजी विक्रेताओं द्वारा भी अनियमितताएँ भी बरती जा रही हैं जिस पर सरकार काम कर रही है। इन सभी के साथ-साथ किसानों में वैज्ञानिक खेती के प्रति जागरूकता कम है। इसे बढ़ाए जाने की जरूरत है।

इन चुनौतियों से निपटने के लिए डिजिटल निगरानी प्रणाली को और मजबूत करने की जरूरत होगी। ब्लॉक स्तर पर उर्वरक नियंत्रण कक्ष बनाने, किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड से जोड़ने, जैविक एवं प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने और कृषि विस्तार सेवाओं को आगे बढ़ाने जैसे कदम किसानों के लिए प्रभावी हो सकते हैं।

योगी आदित्यनाथ सरकार ने यह सिद्ध किया है कि यदि प्रशासनिक इच्छाशक्ति मजबूत हो तो किसानों को समय पर संसाधन उपलब्ध कराए जा सकते हैं। कृषि क्षेत्र में उत्तर प्रदेश की बढ़ती विकास दर, उत्पादन में वृद्धि और किसानों के बढ़ते विश्वास से यह स्पष्ट है कि राज्य सरकार की नीतियाँ सकारात्मक परिणाम दे रही हैं।

आने वाले समय में यदि सरकार इसी प्रकार कृषि अवसंरचना, तकनीकी नवाचार और किसान हितैषी योजनाओं पर कार्य करती रही, तो उत्तर प्रदेश न केवल देश का सबसे बड़ा कृषि राज्य रहेगा, बल्कि आधुनिक एवं टिकाऊ कृषि मॉडल के रूप में भी स्थापित होगा।

क्या 20 मई को नहीं मिलेंगी दवाइयाँ? हड़ताल पर क्यों जा रहे हैं देश भर के दुकानदार, क्या हैं इनकी माँगे

भारत के स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र और दवा आपूर्ति तंत्र में बुधवार (20 मई 2026) को एक बड़ा गतिरोध देखने को मिल रहा है। ‘ऑल इंडिया ऑर्गनाइजेशन ऑफ केमिस्ट्स एंड ड्रगिस्ट्स’ (AIOCD) ने ई-फार्मेसी प्लेटफॉर्म्स के खिलाफ और उनके अनियंत्रित संचालन के विरोध में एक दिवसीय देशव्यापी हड़ताल (मेडिकल स्टोर बंद) का आह्वान किया है।

AIOCD का दावा है कि इस विरोध प्रदर्शन में देश भर के लगभग 12.4 लाख से लेकर 15 लाख तक दवा विक्रेता, फार्मासिस्ट और थोक वितरक शामिल हैं। पारंपरिक दवा दुकानदारों का आरोप है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म बिना किसी कड़े नियम-कानून के एक ‘लीगल ग्रे ज़ोन’ (कानूनी अनिश्चितता के दायरे) में काम कर रहे हैं, जिससे न केवल उनका व्यवसाय प्रभावित हो रहा है बल्कि आम जनता के स्वास्थ्य के साथ भी खिलवाड़ हो रहा है।

दूसरी ओर इस देशव्यापी बंद की घोषणा ने देश भर के उन करोड़ों मरीजों और उनके परिवारों के बीच भारी चिंता पैदा कर दी है जो अपनी नियमित और जीवन रक्षक दवाइयों के लिए पूरी तरह से स्थानीय केमिस्ट दुकानों पर निर्भर हैं। हालाँकि, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय और केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) के हस्तक्षेप के बाद कई राज्यों के दवा संगठनों ने खुद को इस हड़ताल से अलग कर लिया है, जिससे आंशिक राहत की उम्मीद है।

हड़ताल क्यों हो रही है और कौन से संगठन इसमें शामिल हैं?

इस राष्ट्रव्यापी हड़ताल का मुख्य कारण पारंपरिक केमिस्टों और ऑनलाइन दवा डिलीवरी ऐप्स (जैसे 1mg, Netmeds, PharmEasy आदि) के बीच लंबे समय से चला आ रहा विवाद है। केमिस्ट एसोसिएशन का मानना है कि सरकार द्वारा ई-फार्मेसी को दी गई ढील उनके अस्तित्व के लिए खतरा बन गई है।

इस आंदोलन का मुख्य नेतृत्व ऑल इंडिया ऑर्गनाइजेशन ऑफ केमिस्ट्स एंड ड्रगिस्ट्स (AIOCD) कर रहा है। यह भारत में केमिस्टों की सबसे बड़ी शीर्ष संस्था है, जिसके अंतर्गत देश के विभिन्न राज्यों के जिला और स्थानीय केमिस्ट संगठन आते हैं।

AIOCD के अध्यक्ष जगन्नाथ शिंदे और महासचिव राजीव सिंघल ने संयुक्त बयान में कहा, “यह लड़ाई सिर्फ हमारे व्यापार को बचाने की नहीं है, बल्कि मरीजों की सुरक्षा और देश के स्वास्थ्य मानकों को बनाए रखने की भी है। बिना भौतिक सत्यापन के ऑनलाइन दवाइयाँ बेचना समाज में नशे और एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस के खतरे को बढ़ा रहा है।”

हड़ताल की मुख्य वजहें क्या हैं?

  • नियामक कमियाँ (Regulatory Gaps): पारंपरिक दुकानदारों का आरोप है कि दवा नियामक (Drug Regulator) ने ऑनलाइन दवा कंपनियों को बिना सख्त नियमों के काम करने की छूट दे रखी है।
  • गलत और फर्जी पर्चियों (Fake Prescriptions) पर दवा की बिक्री: डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर बिना भौतिक सत्यापन के पुरानी, अधूरी या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) द्वारा जनरेटेड फर्जी पर्चियों के आधार पर धड़ल्ले से दवाइयां डिलीवर की जा रही हैं।
  • गंभीर बीमारियों की दवाओं का दुरुपयोग: एंटीबायोटिक्स और आदत लगाने वाली (Habit-forming/नशीली) दवाओं की ऑनलाइन अनियंत्रित बिक्री से समाज में एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) और नशे की प्रवृत्ति बढ़ने का खतरा है।
  • असमान प्रतिस्पर्धा (Predatory Pricing): बड़े कॉर्पोरेट घरानों के निवेश के दम पर ई-फार्मेसी कंपनियां ग्राहकों को 20% से लेकर 50% तक की भारी छूट (Deep Discounting) दे रही हैं, जिससे छोटे गली-मोहल्ले के केमिस्ट प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पा रहे हैं।

किस कानून और नोटिफिकेशन के खिलाफ है ये हड़ताल?

AIOCD ने सरकार के सामने मुख्य रूप से दो सरकारी गजट नोटिफिकेशन (G.S.R.) को वापस लेने और एक ठोस कानूनी ढाँचा तैयार करने की माँग रखी है। इन दोनों नोटिफिकेशन के बारे में विस्तार से समझने की जरूरत है-

1- G.S.R. 817(E): ई-फार्मेसी का ड्राफ्ट नोटिफिकेशन

यह एक ड्राफ्ट (प्रारूप) नोटिफिकेशन है जिसे सरकार द्वारा लगभग आठ साल पहले जारी किया गया था। इसका उद्देश्य भारत में ई-फार्मेसी के संचालन के लिए एक औपचारिक पंजीकरण प्रणाली, पर्चियों की जांच के नियम, परिचालन सुरक्षा उपाय और उल्लंघन करने पर दंड का प्रावधान तय करना था।

विवाद की वजह: केमिस्ट एसोसिएशन का कहना है कि यह ड्राफ्ट पिछले आठ सालों से न तो पूरी तरह लागू किया गया और न ही इसे सरकार द्वारा वापस लिया गया। इसकी ‘समीक्षा’ सालों से चल रही है। इस लंबे समय की कानूनी अनिश्चितता का फायदा उठाकर ई-फार्मेसी कंपनियाँ बिना किसी ठोस जवाबदेही और स्पष्ट कानूनी ढाँचे के एक ‘ग्रे ज़ोन’ में अपना कारोबार बढ़ा रही हैं।

2 – G.S.R. 220(E): कोविड-19 महामारी के समय की आपातकालीन राहत

कोविड-19 महामारी के दौरान जब देश में सख्त लॉकडाउन लगा था, तब सरकार ने एक आपातकालीन उपाय के तहत इस नोटिफिकेशन को पेश किया था। इसके तहत पंजीकृत दवा दुकानों को मरीजों के घर तक दवाइयाँ पहुँचाने (Doorstep Delivery) की विशेष अनुमति दी गई थी ताकि लॉकडाउन में किसी की जान को खतरा न हो।

विवाद की वजह: पारंपरिक केमिस्टों का तर्क है कि यह एक अस्थायी आपातकालीन व्यवस्था थी। महामारी खत्म होने के बाद भी कंपनियाँ इस नोटिफिकेशन को एक कानूनी लूपहोल (चोर दरवाजे) की तरह इस्तेमाल कर रही हैं ताकि वे ऑनलाइन दवाओं की होम डिलीवरी जारी रख सकें। केमिस्टों की मांग है कि इस नोटिफिकेशन को तुरंत वापस लिया जाना चाहिए क्योंकि ऑनलाइन दवा बिक्री की प्रकृति पारंपरिक होम डिलीवरी से बिल्कुल अलग है।

भारत में फार्मा का बाजार और ऑनलाइन मार्केट शेयर

भारत को दुनिया भर में विश्व की फार्मेसी (Pharmacy of the World) के रूप में जाना जाता है। देश का फार्मास्युटिकल बाजार वॉल्यूम (मात्रा) के हिसाब से दुनिया में तीसरे नंबर पर और वैल्यू (मूल्य) के हिसाब से 11वें स्थान पर आता है।

आधिकारिक प्रेस विज्ञप्तियों और उद्योग के आँकड़ों के अनुसार, भारतीय फार्मा बाजार की स्थिति निम्नलिखित तालिका के माध्यम से समझी जा सकती है-

  • कुल भारतीय फार्मास्युटिकल बाजार (साल 2025-26 में) लगभग 60 बिलियन अमेरिकी डॉलर यानी ₹4.72 लाख करोड़ से अधिक का है।
    भविष्य का अनुमान लगाएँ तो साल 2030 तक इसके 130 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने की उम्मीद है |
  • पारंपरिक रिटेल फार्मेसी का हिस्सा अब भी बड़ा है, जिसमें घरेलू दवा बिक्री में अभी भी लगभग 64% से 65% हिस्सेदारी पारंपरिक केमिस्टों की है |
  • ई-फार्मेसी (ऑनलाइन मार्केट) का शेयर वर्तमान में देखें तो कुल मार्केट शेयर का ये लगभग 4% से 6% है, लेकिन यह 9.45% की वार्षिक दर (CAGR) से तेजी से बढ़ रहा है |

भले ही ऑनलाइन बाजार वर्तमान में प्रतिशत के हिसाब से छोटा दिखता हो, लेकिन महानगरों और टियर-1 शहरों में इसकी पैठ बहुत गहरी हो चुकी है। इस बाजार में बड़े कॉर्पोरेट और तकनीकी दिग्गजों के आने से पारंपरिक खुदरा बाजार का ढाँचा तेजी से बदल रहा है, जिससे खुदरा दुकानदारों को अपने भविष्य पर संकट दिखाई दे रहा है।

हड़ताल कर रहे केमिस्टों को किस बात का डर है?

पारंपरिक दवा विक्रेताओं की चिंताएं केवल तात्कालिक मुनाफे तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे एक व्यापक व्यावसायिक और सामाजिक संकट की ओर इशारा कर रहे हैं-

आजीविका पर संकट: भारत में लगभग 5 करोड़ लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से दवा व्यापार, लॉजिस्टिक्स और डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क से जुड़े हुए हैं। केमिस्टों को डर है कि यदि ई-फार्मेसी को बिना किसी कड़े नियमन के छोड़ दिया गया, तो ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों के छोटे दुकानदार पूरी तरह बर्बाद हो जाएँगे।
पारंपरिक केमिस्ट की महत्ता का अंत: भारत में केमिस्ट केवल दवा बेचने वाला नहीं होता, बल्कि ग्रामीण इलाकों में वह प्राथमिक स्वास्थ्य परामर्शदाता (First Point of Healthcare Access) की भूमिका भी निभाता है। केमिस्टों का मानना है कि छोटे स्टोर बंद होने से आम लोगों की स्वास्थ्य पहुँच पर बुरा असर पड़ेगा।
अवैध और अनैतिक व्यापार: बिना भौतिक पर्ची के दवा बेचने से नकली दवाओं के बाजार में आने और मरीजों द्वारा स्वयं से अपना इलाज करने (Self-medication) की प्रवृत्ति बढ़ेगी, जिसकी अंतिम जिम्मेदारी उनके ऊपर आ सकती है।

20 मई को क्या खुला रहेगा और क्या बंद रहेगा?

वैसे तो, AIOCD ने पूर्ण बंद का आह्वान किया है, लेकिन मरीजों की सहूलियत और आपातकालीन सेवाओं को ध्यान में रखते हुए इस बंद का असर आंशिक होने की संभावना है।

क्या बंद रहने की संभावना है?

  • स्टैंडअलोन (स्वतंत्र) स्थानीय और मोहल्ले की दवा दुकानें।
  • निजी थोक दवा वितरण और सप्लाई चेन नेटवर्क।
  • मार्केट और क्लीनिकों के पास स्थित प्राइवेट फार्मेसी काउंटर्स।

क्या खुला रहेगा?

  • अस्पतालों की फार्मेसी जिसमें सरकारी और निजी अस्पतालों से संबद्ध सभी मेडिकल स्टोर खुले रहेंगे।
  • आपातकालीन सेवाएँ खुली रहेंगी, जिसमें आपातकालीन जीवन रक्षक दवाइयों की काउंटर बिक्री चालू रहेगी।
  • सरकारी जन औषधि केंद्र भी खुले रहेंगे। देश भर में सक्रिय 18,600 से अधिक प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि केंद्र (JAK) और अमृत (AMRIT) फार्मेसी स्टोर पूरी तरह चालू रहेंगे।
  • 24/7 चलने वाले मेडिकल स्टोर भी खुले रहेंगे। ऐसे स्टोर अधिकतर बड़े शहरों में मौजूद हैं।
  • ई-फार्मेसी ऐप्स वाली ऑनलाइन दवा कंपनियों ने बंद का कोई आधिकारिक ऐलान नहीं किया है, इसलिए वे काम करती रहेंगी (हालाँकि स्थानीय डिलीवरी में कुछ देरी हो सकती है)।

किन राज्यों में हड़ताल का असर नहीं होगा?

केंद्रीय दवा नियामक (CDSCO) के अनुसार, कम से कम 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के रिटेल संगठनों ने लिखित आश्वासन देकर खुद को इस हड़ताल से अलग कर लिया है। इन राज्यों में उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक, केरल, पंजाब, हरियाणा, गुजरात, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, सिक्किम और लद्दाख शामिल हैं। इन राज्यों के संगठनों का कहना है कि वे मानवीय आधार पर और मरीजों की सेवा को ध्यान में रखते हुए अपनी दुकानें खुली रखेंगे।

इस हड़ताल से क्या नुकसान हो सकते हैं?

एक दिन की भी आंशिक केमिस्ट हड़ताल से देश की स्वास्थ्य व्यवस्था में गंभीर रुकावटें पैदा हो सकती हैं, जिसमें-

  • क्रोनिक मरीजों के लिए संकट: मधुमेह (Diabetes), उच्च रक्तचाप (Blood Pressure), थायराइड, हृदय रोग और अस्थमा जैसी बीमारियों से पीड़ित मरीजों को यदि समय पर दवा न मिले, तो उनकी स्थिति गंभीर हो सकती है।
  • ग्रामीण क्षेत्रों में परेशानी: बड़े शहरों में तो अस्पतालों और सरकारी केंद्रों के विकल्प मौजूद हैं, लेकिन सुदूर ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में जहाँ एकमात्र सहारा निजी केमिस्ट की दुकान होती है, वहां मरीजों को भारी कठिनाई का सामना करना पड़ेगा।
  • सप्लाई चेन में रुकावट: थोक वितरकों (Wholesalers) के बंद होने से अस्पतालों में भी दवाओं की दैनिक आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, जिससे आपातकालीन ऑपरेशनों और गंभीर मरीजों के इलाज में देरी हो सकती है।

सरकार का रुख और समाधान की दिशा

अधिकारियों के अनुसार, AIOCD के प्रतिनिधियों ने हाल ही में राष्ट्रीय दवा नियामक और स्वास्थ्य मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों से मुलाकात की थी। सरकार ने केमिस्टों को स्पष्ट आश्वासन दिया है कि उनके द्वारा उठाए गए मुद्दों की सक्रिय रूप से समीक्षा की जा रही है।

ऑनलाइन फार्मेसी और पारंपरिक खुदरा विक्रेताओं दोनों के हितों को संतुलित करने के लिए नियमों (Drugs and Cosmetics Act) में आवश्यक संशोधनों पर विचार किया जा रहा है। सरकार का स्पष्ट मानना है कि किसी भी नीतिगत बदलाव की प्रक्रिया के दौरान आम नागरिकों और मरीजों के स्वास्थ्य तथा दवाओं की उपलब्धता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।

बहरहाल, यह केमिस्ट हड़ताल भारत के स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र के बदलते डिजिटल परिदृश्य का एक बड़ा संकेत है। जहाँ तकनीक और ऑनलाइन सुविधाएं उपभोक्ताओं को घर बैठे दवाइयाँ दे रही हैं, वहीं देश के लाखों पारंपरिक छोटे व्यापारियों के हितों की रक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य सुरक्षा मानकों को बनाए रखना भी उतना ही अनिवार्य है।

इस समस्या का दीर्घकालिक समाधान केवल एक संतुलित और सख्त नियामक नीति (Strict Regulatory Framework) के माध्यम से ही संभव है, जहाँ ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यम पूरी पारदर्शिता और जिम्मेदारी के साथ काम कर सकें।

कौन है PM मोदी को टोकने वाली नॉर्वे की पत्रकार Helle Lyng जो खा रही फालतू का फुटेज, चीन-राणा अयूब-The Hindu से क्या है कनेक्शन: अब माँग रही राहुल गाँधी से इंटरव्यू

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नॉर्वे दौरे के दौरान सोमवार (18 मई 2026) को एक नॉर्वेजियन पत्रकार हेले लिंग (Helle Lyng) सोशल मीडिया पर अचानक चर्चा में आ गईं। उन्होंने दावा किया कि पीएम मोदी ने भारत में ‘मानवाधिकार उल्लंघन’ से जुड़े सवालों का जवाब देने से इनकार कर दिया।

हेले लिंग नॉर्वे के अपेक्षाकृत कम चर्चित मीडिया संस्थान डैग्सविसन (Dagsavisen) से जुड़ी हैं। दिलचस्प बात यह रही कि घटना से पहले उनके X अकाउंट पर करीब 800 फॉलोअर्स थे और अप्रैल 2024 के बाद से उनका अकाउंट लगभग निष्क्रिय था।

(फोटो साभार: X)

पोस्ट करने के कुछ ही घंटों में उनके फॉलोअर्स 14 हजार से ज्यादा हो गए और भारतीय विपक्षी तथा लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम ने उन्हें सोशल मीडिया पर हाथों हाथ लेना शुरू कर दिया। जिस मीडिया संस्थान से हेले लिंग जुड़ी हैं, उसका X अकाउंट भी 22 जनवरी के बाद से एक्टिव नहीं था, वह अचानक एक्टिव हो गया। फेसबुक पर भी इस वीडियो को पोस्ट किया गया।

डैग्सविसन ने भारत को लेकर एक रिपोर्ट भी प्रकाशित किया था, जिसमें कहा गया कि भारत भले ही दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर हो, लेकिन उसकी लोकतांत्रिक स्थिति ‘कमजोर’ हो रही है।

करीब 50 साल पुरानी इस मीडिया संस्थान ने अपने अखबार में पीएम मोदी के नॉर्वे दौरे पर केनेथ लिया सोलबर्ग (Kenneth Lia Solberg) की रिपोर्ट प्रकाशित की। रिपोर्ट की शुरुआत भारत की आर्थिक प्रगति को बताते हुए होती है, लेकिन धीरे- धीरे उसका रुख भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की खामियाँ गिनाने और मोदी सरकार की आलोचना की तरफ मुड़ जाता है।

रिपोर्ट में दावा किया गया कि भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ी है, लेकिन लोकतंत्र कमजोर हुआ है। V-डेम लिबरल डेमोक्रेसी इंडेक्स का हवाला देते हुए कहा गया कि भारत का ‘लोकतंत्र’ 1950 के बाद सबसे निचले पायदान पर पहुँच गया है। रिपोर्ट में बीजेपी के राजनीतिक प्रभाव और ‘हिंदुत्व ‘ की आलोचना की गई है और हिंदू राष्ट्रवाद को ‘डरावना’ बताया गया।

(साभार: Dagsavisen)

रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि भारत के मुसलमानों के साथ भेदभाव बढ़ा है। यह वही नैरेटिव है जिसे 2014 में पीएम मोदी के सत्ता में आने के बाद कई अंतरराष्ट्रीय और स्थानीय भारत-विरोधी समूह लगातार आगे बढ़ाते रहे हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि नॉर्वे को भारत के साथ व्यापारिक समझौते करते समय इन मुद्दों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, चाहे इससे दोनों देशों को आर्थिक फायदा ही क्यों न हो।

(साभार: Dagsavisen)

केनेथ सोलबर्ग की रिपोर्ट और हेले लिंग के सवालों की भाषा और विषय लगभग एक जैसे दिखाई दिए। उल्लेखनीय बात यह भी रही कि जिस कार्यक्रम में यह घटना हुई, वह कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं बल्कि दोनों प्रधानमंत्रियों का संयुक्त बयान था। वहाँ सवाल-जवाब का कार्यक्रम तय नहीं था। बाद में विदेश मंत्रालय के अधिकारियों की अलग प्रेस ब्रीफिंग आयोजित की गई थी।

जब पीएम मोदी बयान देकर मंच से नीचे उतर रहे थे, तभी हेले लिंग ने जोर से पूछा, “प्रधानमंत्री मोदी, आप दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस के सवालों का जवाब क्यों नहीं देते?” पीएम मोदी बिना प्रतिक्रिया दिए अपने नॉर्वेजियन समकक्ष के साथ आगे बढ़ गए। ठीक यही दृश्य हेले लिंग चाहती थीं।

बाद में उन्होंने कहा, “भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया। मुझे इसकी उम्मीद भी नहीं थी।”

इसके बाद सोशल मीडिया पर उन्हें भारतीय लेफ्ट-लिबरल समूहों की ओर से ‘नई हीरो’ की तरह पेश किया जाने लगा। जब उनके X अकाउंट की फॉलोइंग लिस्ट देखी गई तो उसमें द वायर, द वायर की पत्रकार शिवांगी देशवाल, खुद को पत्रकार बताने वाला राणा अय्यूब और अमेरिका स्थित विवादित एंटी-इंडिया पत्रकार लॉरा लूमर (Laura Loomer) जैसे नाम दिखाई दिए।

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने भी यह वीडियो साझा किया। उन्होंने लिखा, “जब छिपाने के लिए कुछ नहीं होता तो डरने की जरूरत नहीं होती। दुनिया जब एक घबराए हुए प्रधानमंत्री को सवालों से भागते देखती है, तो सोचा है कभी कि भारत की छवि पर क्या असर पड़ता है?”

(साभार: X)

राहुल गाँधी के कमेंट के बाद हेले लिंग ने उन्हें इंटरव्यू के लिए अप्रोच किया। उन्होंने लिखा कि क्या आप फोन पर इंटरव्यू देने के लिए मंगलवार को उपलब्ध होंगे। ये जानना दिलचस्प है कि आप नॉर्वे दौरे को लेकर क्या सोचते हैं?

एक्स पर राहुल गाँधी के कमेंट के बाद हेले लिंग ने उन्हें इंटरव्यू के लिए अप्रोच किया। उन्होंने लिखा कि क्या आप फोन पर इंटरव्यू देने के लिए मंगलवार को उपलब्ध होंगे। ये जानना दिलचस्प है कि आप नॉर्वे दौरे को लेकर क्या सोचते हैं।

लिंग नॉर्वे की एक छोटे से मीडिया हाउस से जुड़ी थी। पीएम मोदी पर प्रोपेगेंडा फैलाने से पहले उसे भारत में कोई नहीं जानता था। एक्स पर उसकी आखिरी पोस्ट 10 अप्रैल 2024 की थी। पिछले 2 साल से वह एक्टिव भी नहीं थी। उसके पास ब्लू टिक भी नहीं था और फॉलोअर्स 1000 से कम थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नॉर्वे दौरे के दौरान इन्होंने अचानक पैसे देकर blue tick लिया और एक्टिव हुईं।

इसके बाद इन्होंने प्रोटोकॉल तोड़कर हमारे प्रधानमंत्री को टारगेट किया। इसके तुरंत बाद भारत के विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने इन्हें सोशल मीडिया पर सपोर्ट किया। देखते ही देखते उसे लेफ्ट लिबरल गैंग का समर्थन भी मिल गया।

विडंबना यह रही कि यही राहुल गाँधी असहज सवाल पूछने वाले पत्रकारों को अक्सर ‘बीजेपी प्लांटेड पत्रकार’ कहकर खारिज करते रहे हैं। 2024 में उन्होंने ‘भारत जोड़ो यात्रा’ के दौरान एक असहज सवाल पूछने पर एक पत्रकार की पिटाई करा कर हत्या करवा दी थी ।

राहुल गाँधी के अलावा कई विपक्षी नेताओं, प्रचारक, यूट्यूबर्स तथाकथित इतिहासकारों और फेक न्यूज फैलाने वाले सोशल मीडिया हैंडल्स ने भी हेले लिंग का समर्थन किया। राणा अय्यूब ने लिखा, “नॉर्वे दौरे पर भारतीय लोकतंत्र की असल तस्वीर दिखी।”

TMC सांसद महुआ मोइत्रा ने कहा कि नॉर्वे की मीडिया ने वह दिखाया जो ‘गोदी मीडिया’ नहीं दिखा सकती।

(साभार: X)

TMC सांसद सागरिका घोष ने पीएम मोदी का मजाक उड़ाते हुए लिखा, “नो क्वेश्चन प्लीज, हम विश्वगुरु हैं।”

(साभार: X)

राजू पारुलेकर ने कहा कि यह भारत के लिए शर्मनाक बात है कि उसका प्रधानमंत्री दुनिया के सबसे स्वतंत्र प्रेस से सवाल नहीं ले सकता।

(साभार: X)

प्रोपेगैंडाबाज यूट्यूबर अर्पित शर्मा ने इसे भारत के लिए शर्मनाक बताया और कहा कि पीएम मोदी अंतरराष्ट्रीय मीडिया को जवाब भी नहीं दे सकते।

(साभार: X)

फर्जी इतिहासकार डॉ रुचिका शर्मा ने दावा किया कि पीएम मोदी ‘स्वतंत्र प्रेस से एलर्जी’ रखते हैं और जब पत्रकार ने सवाल पूछा तो उन्होंने अपनी गति तेज कर दी।

(साभार: X)

कॉन्ग्रेस नेता श्रीनिवास बीवी ने प्रधानमंत्री मोदी का मजाक उड़ाते लिखा, “अरे बाबू भाग क्यों रहे हो, पूरे विश्व के सामने थू-थू करा दी।”

(साभार: X)

यूट्यूबर ध्रुव राठी बनकर फर्जी खबरें फैलाने वाले एक व्यक्ति ने इसे मोदी के लिए ‘अंतरराष्ट्रीय बेइज्जती’ बताया।

(साभार: X)

खुद को फैक्ट चेकर बताने वाले प्रोपेगैंडाबाज और ऑल्ट न्यूज के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर ने इस घटना का मजाक उड़ाते हुए कहा कि ANI हर जगह मौजूद नहीं रहेगा।

(साभार: X)

जब हमने मूक रैक पर लिंग द्वारा लिखे गए लेखों की जाँच की, तो पाया कि जनवरी 2025 से उन्होंने अपने लेखों में भारत का जिक्र केवल एक बार किया है, जब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने भारत को टैरिफ बढ़ाने की धमकी दी थी। ट्रम्प के प्रति घृणा उनकी रिपोर्टों में स्पष्ट रूप से झलकती है, वहीं चीन के प्रति उनके मन में नरमी दिखाई देती है। यह स्पष्ट है कि उनकी कवरेज कभी भी भारत के बारे में नहीं रही है।

(साभार: Muck rack)

‘द हिंदू’ के साथ कथित तालमेल पर सवाल

घटना के दौरान एक और दिलचस्प बात सामने आई। जब हेले लिंग पीएम मोदी से सवाल पूछ रही थीं, उसी समय द हिंदू की पत्रकार सुहासिनी हैदर नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास गहर स्टोर से सवाल कर रही थीं। बाद में सुहासिनी ने लिंग का वीडियो शेयर किया और लिंग ने भी सुहासिनी का वीडियो साझा किया। इसके बाद सोशल मीडिया पर दोनों के बीच संभावित समन्वय को लेकर सवाल उठने लगे।

भारत पर अचानक फोकस और समय को लेकर सवाल

लिंग और उनके मीडिया संस्थान की पुरानी रिपोर्ट्स देखने पर पता चलता है कि भारत उनके कवरेज के केन्द्र में कभी नहीं रहा। कुछ सामान्य खबरें जरूर थीं, जैसे भूकंप, ट्रंप के टैरिफ या अन्य वैश्विक घटनाएँ, लेकिन भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था या आंतरिक राजनीति पर गहरी विश्लेषणात्मक रिपोर्टिंग लगभग नहीं दिखी।

ऐसे में पीएम मोदी के दौरे के दौरान अचानक भारत के लोकतंत्र और प्रेस स्वतंत्रता को लेकर उनका आक्रामक रुख कई सवाल खड़े करता है। पूरे घटनाक्रम को देखकर यह आशंका जताई गई कि यह एक योजनाबद्ध प्रयास हो सकता है, जिसका उद्देश्य विदेशी धरती पर पीएम मोदी और भारत की छवि को नुकसान पहुँचाना था।

संयुक्त बयान के बाद पीएम मोदी के बिना जवाब दिए आगे बढ़ जाने को ‘प्रेस स्वतंत्रता’ का मुद्दा बनाकर वायरल करने की कोशिश भी इसी दिशा में देखी गई। एक और रोचक तथ्य यह रहा कि हेले लिंग के X प्रोफाइल पर मई 2026 से वेरिफिकेशन दिख रहा था यानी उन्होंने हाल ही में X प्रीमियम लिया था।

(साभार: X)

आमतौर पर वेरिफाइड अकाउंट्स को सोशल मीडिया पर ज्यादा दृश्यता मिलती है। ऐसे में उनका नया वेरिफिकेशन, अचानक वायरल होना और भारतीय लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम द्वारा बड़े स्तर पर प्रमोशन इन सबने संबंध हो सकता है।

जब MEA ने हेले लिंग को दिया जवाब

नॉर्वे स्थित भारतीय दूतावास ने लिंग के हवाले से बताया कि उसी दिन बाद में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की जानी थी। दूतावास ने लिखा, “प्रधानमंत्री की यात्रा के संबंध में आज शाम 9:30 बजे रेडिसन ब्लू प्लाज़ा होटल में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित की जा रही है। आप सभी का स्वागत है, आप वहाँ आकर अपने प्रश्न पूछ सकते हैं।” लिंग उस प्रेस ब्रीफिंग में पहुँचीं और वहाँ भी उन्होंने माहौल को टकरावपूर्ण बनाने की कोशिश की।

(साभार: X)

उन्होंने विदेश मंत्रालय के अधिकारियों से पूछा कि नॉर्वे भारत के साथ साझेदारी बढ़ाते समय भारत पर भरोसा क्यों करे। इसके साथ ही उन्होंने मानवाधिकार उल्लंघन और पीएम मोदी द्वारा ‘आलोचनात्मक सवाल’ न लेने का मुद्दा भी जोड़ा।

लेकिन इस बार विदेश मंत्रालय के सचिव सिबी जॉर्ज (Sibi George) ने बेहद शांत लेकिन सख्त तरीके से जवाब दिया। जब लिंग ने बीच में टोका और कहा कि वह सीधा जवाब चाहती हैं, तब जॉर्ज  ने कहा, “आपने सवाल पूछा है, मुझे उसका जवाब देने दीजिए।” लगातार बाधा डालने पर उन्होंने दोबारा कहा, “कृपया बीच में मत बोलिए। यह मेरी प्रेस कॉन्फ्रेंस है।”

जॉर्ज ने भारत की सभ्यतागत विरासत और मानवता के प्रति उसके योगदान का हवाला देते हुए, उनके पहले प्रश्न का उत्तर दिया कि दुनिया को भारत पर भरोसा क्यों करना चाहिए। उन्होंने कहा, “हमें गर्व है कि हम 5000 साल पुरानी सभ्यता वाला देश हैं। हमारी सभ्यता निरंतर विकसित हुई है। हमने दुनिया में बहुत बड़ा योगदान दिया है।”

उन्होंने आगे कहा कि शून्य, शतरंज और योग जैसी अवधारणाओं की उत्पत्ति भारत में हुई है। जब लिंग ने दोबारा उन्हें अपने पसंदीदा प्रारूप में जवाब देने के लिए मजबूर करने की कोशिश की, तो जॉर्ज ने अपना संयम खोए बिना इसका विरोध किया। उन्होंने कहा, “कब जवाब देना है, कहाँ जवाब देना है, कैसे जवाब देना है, ये मेरे अधिकार हैं। आपने सवाल पूछा है। मुझसे किसी खास तरीके से जवाब देने के लिए मत कहिए। मुझे जवाब देने दीजिए।”

इसके बाद उन्होंने कोविड के दौरान भारत के आचरण का हवाला देते हुए कहा कि भारत ‘गुफा में नहीं छिपा’, बल्कि दुनिया की मदद के लिए आगे आया। उन्होंने कहा, “हमने 100 से अधिक देशों को टीके उपलब्ध कराए। इससे भरोसा बढ़ता है। हमने 150 देशों को दवाइयाँ उपलब्ध कराईं। इससे भरोसा बढ़ता है।”

जॉर्ज ने G20 की अध्यक्षता के दौरान भारत की भूमिका का भी उल्लेख किया और बताया कि भारत ने एक विभाजित विश्व को एकजुट किया और दिल्ली घोषणापत्र को सुनिश्चित किया। उन्होंने वैश्विक दक्षिण के मुद्दों को मुख्य मंच पर लाने और अफ्रीकी संघ को जी20 के स्थायी सदस्य के रूप में शामिल करने के भारत के प्रयासों की भी चर्चा की।

उन्होंने कहा, “इससे विश्वास का माहौल बना क्योंकि हम पूरे अफ्रीकी महाद्वीप की आकांक्षाओं और चुनौतियों को, जिन्हें नजरअंदाज किया जा रहा था, G20 के मुख्य मंच पर लाने में सफल रहे।” मानवाधिकार और लोकतंत्र पर बोलते हुए जॉर्ज ने कहा कि भारत एक ऐसे संविधान पर आधारित है जो अपने नागरिकों को न्याय, स्वतंत्रता, समानता और गरिमा की गारंटी देता है।

उन्होंने कहा, “भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है।” उन्होंने बताया कि पिछले आम चुनावों में लगभग एक अरब लोगों ने भाग लिया था। उन्होंने कहा कि भारत के प्रत्येक नागरिक को मौलिक अधिकार प्राप्त हैं और उन अधिकारों का उल्लंघन होने पर न्यायालयों में जाने का अधिकार है।

चुनिंदा रिपोर्टों के आधार पर भारत के बारे में राय बनाने वालों पर कटाक्ष करते हुए जॉर्ज ने कहा कि बहुत से लोगों को भारत की ‘विभिन्नता में एकता’ की समझ नहीं है। उन्होंने कहा, “लोग कुछ अज्ञानी गैर-सरकारी संगठनों द्वारा प्रकाशित एक-दो समाचार रिपोर्ट पढ़ते हैं और फिर आकर सवाल पूछते हैं। चिंता न करें। हमें लोकतंत्र पर गर्व है।”

जब तक जॉर्ज भारत के संवैधानिक ढाँचे और लोकतांत्रिक परंपराओं पर बात करने लगे, तब तक लिंग कथित तौर पर कमरे से जा चुकी थीं। अंततः भारतीय अधिकारियों को परेशान करने का उनका प्रयास विदेश मंत्रालय के सचिव के विस्तृत, दृढ़ और स्पष्ट जवाब के साथ समाप्त हुआ, जिन्होंने यह साफ कर दिया कि भारत किसी भी प्रकार के पूर्वाग्रही प्रश्न को पत्रकारिता के नाम पर पेश किए जाने की अनुमति नहीं देगा।

भारत-विरोधी तमाशा रचने की कोशिश

यह पूरा घटनाक्रम दर्शाता है कि कैसे एक सामान्य राजनयिक यात्रा को एक पत्रकार द्वारा मनगढ़ंत विवाद में बदल दिया गया, जिसका हालिया काम भारत पर शायद ही कोई गंभीर ध्यान केंद्रित करता था। लिंग को प्रश्न पूछने का अवसर देने से इनकार नहीं किया गया था। उन्हें भारतीय दूतावास द्वारा सार्वजनिक रूप से प्रेस ब्रीफिंग में आमंत्रित किया गया था, जहाँ उन्हें अपने मनचाहे प्रश्न पूछने का अवसर मिला।

हालाँकि उत्तरों पर गंभीरता से विचार करने के बजाय, उन्होंने बार-बार भारतीय अधिकारियों को बाधित किया और उन्हें यह बताने की कोशिश की कि उन्हें कैसे जवाब देना चाहिए। इसके बाद जो कुछ हुआ, उससे वायरल आक्रोश की खोखली सच्चाई सामने आ गई। प्रधानमंत्री मोदी प्रेस कॉन्फ्रेंस से नहीं हटे थे।

वे एक संयुक्त बयान के बाद चले गए थे, जहाँ प्रश्नोत्तर सत्र निर्धारित नहीं था। वास्तविक प्रेस वार्ता बाद में हुई और विदेश मंत्रालय के सचिव सिबी जॉर्ज ने भारत की लोकतांत्रिक संरचना और संवैधानिक गारंटी से लेकर कोविड काल में इसकी वैश्विक भूमिका, जी20, ग्लोबल साउथ के साथ संपर्क और अफ्रीकी संघ के समर्थन तक, सभी सवालों के विस्तृत जवाब दिए।

फिर भी भारतीय वामपंथी उदारवादी तंत्र ने इस सुनियोजित अवसर का फायदा उठाकर प्रधानमंत्री मोदी और भारत पर हमला किया। लिंग की लोकप्रियता में अचानक उछाल, हाल ही में उनका एक्स-रे सत्यापन, उनके प्रकाशन का भारत-विरोधी स्वरूप और कॉन्ग्रेस नेताओं, TMC सांसदों, प्रचारकों और फर्जी समाचार फैलाने वालों द्वारा इसका तुरंत प्रचार-प्रसार यह दर्शाता है कि यह पत्रकारिता से कहीं अधिक विदेशी धरती पर भारत-विरोधी तमाशा रचने की कोशिश थी।

मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

घर में रहने की जगह नहीं तो जनसंख्या कंट्रोल करो: यूँ ही नहीं CM योगी ने कही यह बात, यदि इसी रफ्तार से बढ़ते रहे तो 2050 तक भारत में होंगे सबसे अधिक मुस्लिम

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने मुस्लिमों को सड़क पर नमाज नहीं पढ़ने की सलाह दी है। सोमवार (18 मई 2026) को एक कार्यक्रम के दौरान सीएम योगी ने कहा कि सड़क लोगों के चलने के लिए है और इसे तमाशा नहीं बनने देंगे। इसी दौरान सीएम योगी ने मुस्लिम आबादी को लेकर भी चिंता जताई और मुस्लिमों को आबादी कम करने की नसीहत दी।

सीएम आदित्यनाथ ने अपने संबोधन में कहा, “लोग मुझसे पूछते हैं साहब आपके यहाँ यूपी में क्या सड़कों पर सचमुच नमाज नहीं होती? मैं कहता हूँ कतई नहीं होती है। आप जाकर देख लो नहीं होती है। सड़कें चलने के लिए हैं या कोई भी व्यक्ति आकर के चौराहे पर आकर तमाशा बना देगा। क्या अधिकार है उसको सड़क रोकने का? आवागमन बाधित करने का कौन सा अधिकार है? जहाँ उसका स्थल होगा वहाँ जाकर करें।”

उन्होंने कहा, “उन लोगों ने मुझसे कहा साहब कैसे होगा? हमारी संख्या ज्यादा है। हमने कहा शिफ्ट में कर लो। तुम्हारे घर में रहने की जगह नहीं है तो भाई संख्या नियंत्रित कर लो। और नहीं है सामर्थ्य, तो क्यों बेकार आगे संख्या बढ़ाई जा रही है और ये चाहिए आपको कि अगर आपको सिस्टम के साथ रहना है तो याद करना हम उन नियम और कानून को मानना शुरू करें।”

मुस्लिम आबादी को लेकर सीएम योगी की ओर से दिया गया ये बयान भले ही आपको आक्रामक लगे। लेकिन असल में ये एक फैक्ट है जिसका मुद्दा समय-समय पर उठता रहा है और कई रिसर्च भी इसको लेकर चिंता जाहिर करती रही हैं।

लगातार बढ़ती रही है मुस्लिमों की आबादी

भारत में 1951, 1971, 1991 और 2011 में जनगणनाएँ हुईं हैं। शुरू से ही जनगणनाओं में धर्म के आधार पर भी डेटा लिए जाते रहे हैं। 1951 की जनगणना में हिंदू आबादी 84 प्रतिशत थी, जबकि मुस्लिम आबादी 9.8 प्रतिशत थी। 1971 तक हिंदू आबादी घटकर 82 प्रतिशत रह गई और मुस्लिम आबादी बढ़कर 11 प्रतिशत हो गई। 1991 में हिंदू आबादी एक फीसदी और घटकर 81 प्रतिशत रह गई और मुस्लिम आबादी बढ़कर 12.2 प्रतिशत हो गई। वहीं, 2011 तक हिंदू आबादी और घटकर 79 प्रतिशत रह गई, जबकि मुस्लिम आबादी 14.2 प्रतिशत तक पहुँच गई।

यानी मुस्लिम आबादी में 24.6 प्रतिशत का इजाफा हुआ है, जबकि हिंदू आबादी में 4.5 प्रतिशत की कमी आई है। वहीं पाकिस्तान में 1951 में हिंदू आबादी 13 प्रतिशत थी जो अब केवल 1.73 प्रतिशत रह गई है। यही हाल बांग्लादेश में भी है जो 22 फीसदी से घटकर 7 प्रतिशत पर रह गई है।

अंतरराष्ट्रीय संस्था की रिपोर्ट भी चौंकाने वाली

अंतरराष्ट्रीय संस्था प्यू रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट भी यह बताती है कि भारत में मुस्लिम आबादी आने वाले दशकों में बढ़ेगी। इसके पीछे संस्था ने मुख्य रूप से कम उम्र की आबादी और ज्यादा प्रजनन दर को कारण माना है।

प्यू रिसर्च के मुताबिक भारत 2050 तक दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश बन सकता है। जहां करीब 31 करोड़ मुसलमान होंगे। जो वैश्विक मुस्लिम आबादी का करीब 11 प्रतिशत होगा। भारत में रिपोर्ट में मुस्लिम महिलाओं की औसत प्रजनन दर हिंदू महिलाओं की तुलना में अधिक बताई गई है।

वैश्विक स्तर पर तेजी से बढ़ रही मुस्लिम आबादी

प्यू रिसर्च की एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार इस्लाम दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ने वाला धर्म है। 2015 में दुनिया में मुस्लिम आबादी करीब 1.8 अरब थी, जो 2060 तक 3 अरब के पार पहुँच सकती है। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण उच्च प्रजनन दर है।

अध्ययन के अनुसार मुस्लिम महिलाओं की वैश्विक प्रजनन दर 3.1 है, जो प्रमुख धार्मिक समूहों में सबसे ज्यादा है। यही वजह है कि आने वाले दशकों में मुस्लिम आबादी की वृद्धि दर बाकी धर्मों से अधिक रहने का अनुमान है।

सीएम योगी के बयान के मायने समझिए

दुनिया की सबसे ज्यादा आबादी वाला देश भारत है। वहीं, राज्य स्तर पर देखें तो उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा आबादी है। संसाधन, सुविधाओं और तमाम बुनियादी जरूरतों के लिए जनसंख्या नियंत्रण जरूरी है। सरकारें इसको लेकर तमाम तरह के कार्यक्रम चलाती रहती हैं।

सोशल मीडिया पर बढ़ रहे ‘तिलचट्टे’, AAP का पुराना लबड़ा है ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ शुरू करने वाला: जानिए सटायर की आड़ लेकर कैसे फैलाया जा रहा प्रोपेगेंडा

कॉकरोच जनता पार्टी… नाम सुनने में भले ही मजाक लगे, लेकिन सोशल मीडिया की दुनिया में यह अब एक ऐसा डिजिटल समूह बन चुका है, जो खुद को ‘बेरोजगार’ और ‘आलसी’ युवाओं की आवाज बताता है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की बेरोजगार युवाओं, वकीलों, पत्रकारों और RTI एक्टिविस्ट पर की गई टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर जो गुस्सा उभरा, उसी माहौल में इस तथाकथित ‘पार्टी’ का जन्म हुआ। शुरुआत मीम और व्यंग्य (सटायर) से हुई, लेकिन देखते ही देखते इसे राजनीतिक एटेंशन मिलने लगी।

फोटो साभार: cockroachjantaparty.org

दिलचस्प बात यह है कि यह कोई आधिकारिक राजनीतिक पार्टी नहीं है। न इसका कोई चुनाव आयोग में पंजीकरण है और न ही कोई औपचारिक संगठनात्मक ढाँचा। इसके बावजूद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर इसके तिलचट्टे (फॉलोवर्स) तेजी से बढ़ रहे हैं। पार्टी से जुड़ने वाले लोगों की संख्या 50 हजार तक पहुँच गई।

पहली नजर में इसे युवाओं के गुस्से और सिस्टम से नाराजगी की आवाज की तरह दिखाया गया है, लेकिन थोड़ा गौर करें तो मामला सिर्फ मजाक या मीम तक सीमित नहीं दिखता। सवाल यह है कि क्या यह सच में युवाओं की समस्याओं को उठाने वाला मंच है या फिर इंटरनेट पर बैठे नाराज युवाओं को लगातार सिस्टम के खिलाफ भड़काने का नया तरीका। सोशल मीडिया पर सरकार विरोधी पोस्ट, मीम्स और तंज के जरिए ऐसा माहौल बनाया जा रहा है, जहाँ हर चीज के लिए सिर्फ सिस्टम को जिम्मेदार बताया जाता है।

कैसे बनी कॉकरोच जनता पार्टी?

कॉकरोच जनता पार्टी की शुरुआत किसी राजनीतिक विचारधारा से नहीं, बल्कि इंटरनेट पर उभरे गुस्से, व्यंग्य और नाराजगी से हुई। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की उस टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर अचानक बहस छिड़ गई, जिसमें बेरोजगार युवाओं, वकीलों, पत्रकारों और RTI एक्टिविस्ट्स को लेकर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली।

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने कहा कि सिस्टम पर कुछ ‘परजीवी’ हमला कर रहे हैं। उन्होंने इसे युवाओं से जोड़ते हुए कहा, “कुछ युवा कॉकरोच जैसे हैं। इन्हें कोई नौकरी नहीं मिलती और पेशे में भी इनकी कोई जगह नहीं होती। इनमें से कुछ मीडिया बन जाते हैं, कुछ सोशल मीडिया बन जाते हैं, कुछ RTI एक्टिविस्ट बन जाते हैं, कुछ दूसरे तरह के एक्टिविस्ट बन जाते हैं। और फिर ये सब पर हमला करने लगते हैं।”

देखते ही देखते CJI की इस टिप्पणी पर एक्स, Reddit और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म्स पर मीम्स, पोस्ट और कटाक्ष वायरल होने लगे। इसी डिजिटल माहौल में ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ नाम सामने आया, जिसे शुरुआत में केवल एक ऑनलाइन मजाक और व्यंग्य माना गया।

लेकिन इंटरनेट पर पैदा होने वाले कई ट्रेंड्स की तरह यह भी धीरे-धीरे एक डिजिटल कम्युनिटी में बदलने लगा। पार्टी ने खुद को उन्हीं युवाओं की आवाज बताना शुरू किया, जिन्हें अक्सर ‘आलसी’, ‘बेरोजगार’ और ‘ज्यादा समय इंटरनेट पर बिताने वाला’ कहकर खारिज कर दिया जाता है। यही वजह है कि इस पार्टी की एलिजिबिलिटी के लिए भी ‘आलसी’, ‘बेरोजगार’, ‘ज्यादा समय इंटरनेट पर बिताने वाला’ और ‘पेशेवर तरीके से भड़ास निकालने वाले’ जैसी कैटेगरी रखी गईं। ऐसे लोगों को ही पार्टी का ‘योग्य सदस्य’ माना गया।

फोटो साभार: cockroachjantaparty.org

पार्टी का बायो भी इसी नाराजगी और व्यंग्य की राजनीति को आगे बढ़ाता है। इसमें खुद को उन लोगों की पार्टी बताया गया है, जिन्हें सिस्टम ने गिनना ही छोड़ दिया। साथ ही दावा किया गया कि पार्टी की 5 माँगे हैं, कोई स्पॉन्सर नहीं है और यह एक ‘जिद्दी झुंड’ की तरह काम करेगी। पहली नजर में यह व्यवस्था के खिलाफ कटाक्ष जैसा लगता है, लेकिन यही भाषा युवाओं के भीतर ‘सिस्टम ने हमें छोड़ दिया’ वाला भाव मजबूत करती है।

इसका मिशन स्टेटमेंट भी सीधे भावनाओं पर चोट करता है। पार्टी कहती है कि वह उन युवाओं के लिए बनाई गई है, जिन्हें बार-बार आलसी, हर वक्त ऑनलाइन रहने वाला और अब ‘कॉकरोच’ तक कहा जा रहा है। पार्टी के मुताबिक यही उसका मिशन है और बाकी सब केवल व्यंग्य। यानी खुद को मजाक बताकर यह मंच उन युवाओं को जोड़ने की कोशिश करता है, जो पहले से व्यवस्था, नौकरी और राजनीति को लेकर निराश हैं।

फोटो साभार: cockroachjantaparty.org

वहीं पार्टी का विजन केवल नाराजगी तक सीमित नहीं रहता, बल्कि सीधे राजनीतिक व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है। इसमें कहा गया कि वे कोई नया फंड या टैक्सपेयर्स के पैसों पर विदेश यात्राएँ करने नहीं आए हैं, न ही भ्रष्टाचार को ‘रणनीतिक खर्च’ बताकर पेश करना चाहते हैं। उनका मकसद सिर्फ यह पूछना है कि जनता का पैसा आखिर गया कहाँ। इस तरह का नैरेटिव युवाओं के भीतर पहले से मौजूद असंतोष को और धार देता है।

कॉकरोच जनता पार्टी को मिलने लगा विरोधी पार्टियों का समर्थन

शुरुआत में जिस ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को सिर्फ इंटरनेट का मजाक और मीम कल्चर माना जा रहा था, वह धीरे-धीरे विपक्षी नेताओं और सरकार विरोधी चेहरों का ध्यान भी खींचने लगी। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इस ट्रेंड को कई विपक्षी नेताओं ने खुलकर समर्थन देना शुरू किया। इससे पार्टी के युवाओं की आवाज बनने के दावे पर सवाल उठने लगे।

तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की नेता महुआ मोइत्रा ने पार्टी में शामिल होने की इच्छा जताई। उन्होंने लिखा, “वह भी कॉकरोच जनता पार्टी में शामिल होना चाहती हैं, वैसे ही जैसे वह पहले से एंटी नेशनल पार्टी की कार्ड होल्डर सदस्य हैं।” और इस न्योते को खुद को पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष बताने वाले अभिजीत दिपके ने स्वागत भी किया।

TMC नेता कीर्ति आजाद ने भी एक्स पर पोस्ट कर लिखा कि वह ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ जॉइन करना चाहते हैं और पूछा कि इसके लिए योग्यता क्या चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और एक्टिविस्ट प्रशांत भूषण ने भी इस ट्रेंड का समर्थन करते हुए कहा, “कॉकरोच जनता पार्टी की शुरुआत CJI की टिप्पणी के बाद मजाक के तौर पर हुई थी, लेकिन केवल दो दिनों में इसे 55 हजार से ज्यादा लोगों का समर्थन मिल गया। यह दिखाता है कि लाखों युवा मौजूदा व्यवस्था और राजनीतिक दलों से परेशान हैं और कुछ नया चाहते हैं। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे युवाओं को प्रोत्साहित करना चाहिए और उन्हें सही दिशा ले जाना चाहिए।”

इसी के साथ सोशल मीडिया पर सक्रिय तमाम वामपंथी और सरकार विरोधी लॉबी ने भी इस ट्रेंड को जमकर आगे बढ़ाया। मीम पेज, एक्टिविस्ट अकाउंट्स और राजनीतिक हैंडल लगातार इसे प्रमोट करते दिखाई दिए। यही वह मोड़ था, जहाँ एक तथाकथित ‘व्यंग्य पार्टी’ धीरे-धीरे साफ राजनीतिक रंग लेती नजर आने लगी।

सबसे दिलचस्प बात खुद पार्टी के संस्थापक माने जाने वाले अभिजीत दिपके के बयान में दिखी। उन्होंने कहा कि इससे फर्क नहीं पड़ता कि कोई कॉन्ग्रेस, आम आदमी पार्टी (AAP) समाजवादी पार्टी (SP), तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) या किसी और पार्टी से जुड़ा है, सिर्फ सपोर्ट की जरूरत है। यहाँ BJP का नाम गायब था।

यहीं से सवाल और गहरे हो जाते हैं। अगर यह मंच सच में सिर्फ युवाओं की आवाज होता, तो वह खुद को किसी खास राजनीतिक दिशा से दूर रखता। लेकिन जिस तरह विपक्षी नेताओं, एक्टिविस्ट्स और सरकार विरोधी तत्वों का समर्थन इसे लगातार मिलता गया, उससे यह धारणा मजबूत होने लगी कि कॉकरोच जनता पार्टी युवाओं की समस्याओं से ज्यादा, सरकार विरोधी नैरेटिव को मजबूत करने का नया डिजिटल हथियार के तौर पर सामने आ रही है।

कॉकरोच जनता पार्टी के घोषणा पत्र में विपक्षी पार्टी के प्रोपेगेंडा को हवा दी गई

कॉकरोच जनता पार्टी भले ही सोशल मीडिया पर एक ट्रेंड बन रहा है, लेकिन इसका घोषणा पत्र किसी आधिकारिक राजनीतिक पार्टी की तरह तैयार किया गया है। गौर करने वाली बात यह है कि इसके ज्यादातर मुद्दे सीधे सरकार, न्यायपालिका, चुनाव आयोग, मीडिया और बड़े उद्योगपतियों को निशाने पर लेते दिखाई देते हैं। ये वही मुद्दे हैं जो कॉन्ग्रेसी इकोसिस्टम और उसके सहयोगी आए दिन सरकार के विरोध में उठाते रहते हैं।

घोषणा पत्र में कहा गया है कि अगर कॉकरोच जनता पार्टी कभी सत्ता में आती है, तो किसी भी CJI को रिटायरमेंट के बाद ‘इनाम’ के तौर पर राज्यसभा सीट नहीं दी जाएगी। यानी न्यायपालिका और सरकार के मेल-जोल पर निराधार सीधे सवाल उठाए गए।

इसके बाद चुनाव आयोग को लेकर भी बेहद आक्रामक भाषा इस्तेमाल की गई। घोषणा पत्र में कहा गया कि अगर किसी ‘असली वोट’ को हटाया जाता है, चाहे वह कॉकरोच जनता पार्टी शासित राज्य हो या विपक्षी दलों का राज्य, तो मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) पर UAPA लगाया जाना चाहिए। यहाँ तह कहा गया कि लोगों के वोटिंग अधिकार छीनना ‘आतंकवाद से कम नहीं’ है। यह नैरेटिव पिछले कुछ महीनों से कॉन्ग्रेस, आम आदमी पार्टी (AAP) और दूसरे विपक्षी दलों द्वारा विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) जैसे मुद्दों पर लगाए जा रहे आरोपों से काफी मिलता-जुलता दिखाई देता है।

घोषणा पत्र में महिलाओं को संसद और कैबिनेट में 50 प्रतिशत आरक्षण देने की भी बात कही गई है, वह भी संसद की सीटें बढ़ाए बिना। इसे केंद्र सरकार के प्रस्तावित परिसीमन अभ्यास के खिलाफ नैरेटिव के तौर पर भी देखा जा रहा है।

सबसे बड़ा हमला मीडिया और बड़े उद्योगपतियों पर किया गया। घोषणा पत्र में कहा गया कि अंबानी और अडानी के स्वामित्व वाले मीडिया संगठनों के लाइसेंस रद्द कर दिए जाएँगे ताकि ‘वास्तव में स्वतंत्र मीडिया’ को जगह मिल सके। साथ ही तथाकथित ‘गोदी मीडिया’ के एंकर्स के बैंक अकाउंट की भी जाँच कराने की बात कही गई है। यानी यह सीधे उस नैरेटिव को आगे बढ़ाता है, जिसमें बीजेपी सरकार पर बड़े कॉरपोरेट घरानों और मीडिया को नियंत्रित करने के आरोप लगाए जाते रहे हैं।

इसके अलावा कहा गया कि जो विधायक और सांसद दल-बदल करते हैं उन्हें चुनाव लड़ने पर रोक लगा दी जाएगी और साथ ही ऐसे सांसद और विधायक के पास 20 वर्षों तक कोई दफ्तर भी नहीं रहेगा।

कुल मिलाकर, ऊपर से मजाक और मीम्स जैसा दिखने वाला यह मंच अपने घोषणा पत्र में लगभग हर उस मुद्दे को उठाता दिखाई देता है, जिसे विपक्षी दल पिछले कुछ समय से सरकार के खिलाफ इस्तेमाल करते रहे हैं।

कॉकरोच जनता पार्टी के पीछे का चेहरा अभिजीत दिपके कौन है?

कॉकरोच जनता पार्टी को सोशल मीडिया पर युवाओं की आवाज बनकर पेश किया जा रहा है, लेकिन इसके पीछे मौजूद चेहरा कोई सामान्य या राजनीति से दूर रहने वाला सोशल मीडिया यूजर नहीं है। इस पूरे डिजिटल कैंपेन के केंद्र में अभिजीत दिपके नाम का वह व्यक्ति है, जिसके तार सीधे आम आदमी पार्टी (AAP) की सोशल मीडिया और चुनावी रणनीतियों से जुड़े दिखाई देते हैं।

महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) के रहने वाले अभिजीत दिपके ने बॉस्टन यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है। लेकिन अभिजीत की पहचान सिर्फ एक पढ़े-लिखे सोशल मीडिया एक्टिविस्ट तक सीमित नहीं रही। दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 के दौरान आई कई मीडिया रिपोर्ट्स में दिपके का नाम उस टीम के हिस्से के तौर पर सामने आया था, जो AAP की सोशल मीडिया छवि को आक्रामक और वायरल अंदाज में तैयार कर रही थी।

उस समय उन्हें पुणे के 23 वर्षीय युवा के तौर पर बताया गया, जो AAP की सोशल मीडिया ट्रांसफॉर्मेशन के पीछे काम कर रहे थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक, AAP उस चुनाव में छोटे-छोटे वन लाइनर्स, पैरोडी वीडियो, मीम्स और शॉर्ट क्लिप्स के जरिए अरविंद केजरीवाल की छवि को मजबूत करने और बीजेपी-कॉन्ग्रेस पर हमला करने की रणनीति अपना रही थी।

अभिजीत दिपके खुद इन रिपोर्ट्स में यह समझाते दिखाई दिए थे कि मिलेनियल्स और पहली बार वोट देने वाले युवाओं तक राजनीतिक संदेश पहुँचाने के लिए मीम्स और वीडियो सबसे असरदार तरीका हैं। यानी जिस ‘मीम पॉलिटिक्स’ और इंटरनेट नैरेटिव को आज ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ इस्तेमाल करती दिख रही है, वही तरीका पहले AAP के चुनावी प्रचार में भी इस्तेमाल हो चुका है।

एक दूसरी रिपोर्ट में दिपके को मीडिया स्टडीज ग्रेजुएट बताया गया, जो AAP के कई वायरल मीम्स के पीछे थे। इन मीम्स में बॉलीवुड सीन, एडिटेड तस्वीरें और पॉप कल्चर का इस्तेमाल कर अरविंद केजरीवाल को सकारात्मक तरीके से पेश किया जाता था, जबकि विरोधियों को निशाने पर लाया जाता था।

अभिजीत दिपके का AAP से कनेक्शन

सिर्फ इतना ही नहीं, AAP के ‘वॉर रूम’ से जुड़ी रिपोर्ट्स में भी अभिजीत दिपके का नाम सामने आया। एक रिपोर्ट के मुताबिक, वह पार्टी के नेशनल सोशल मीडिया कोऑर्डिनेशन की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। बताया गया कि AAP की सोशल मीडिया टीम अलग-अलग वॉर रूम्स से काम कर रही थी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैलियों के जवाब में तुरंत ऑनलाइन नैरेटिव तैयार करती थी।

इसी दौरान दिपके ने यह भी कहा था कि #DelhiwithKejriwal जैसे हैशटैग का मकसद केजरीवाल को ‘अपना बंदा’ और ‘हमारा आदमी’ की छवि में पेश करना था। उन्होंने यह भी दावा किया था कि AAP की टीम व्हाट्सऐप और फेसबुक पर बहुत ज्यादा फोकस कर रही है और पार्टी के मॉडरेटर्स बीजेपी, कॉन्ग्रेस और दूसरे राजनीतिक हैंडल्स पर नजर रखते थे ताकि पार्टी जिसे ‘फेक न्यूज’ मानती है, उसका जवाब दिया जा सके।

AAP की 2020 की चुनावी रणनीति पर आई एक और रिपोर्ट में अभिजीत दिपके को पार्टी के ‘मीम और पैरोडी ऑफेंसिव’ का अहम चेहरा बताया गया था। यानी फिल्मों, विज्ञापनों और सोशल मीडिया ट्रेंड्स को राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर ‘ब्रांड केजरीवाल’ को आगे बढ़ाने की रणनीति में वह प्रमुख भूमिका निभा रहे थे।

यही वजह है कि अब जब वही अभिजीत दिपके ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के पीछे का चेहरा दिखाई देते हैं, तो इसे केवल युवाओं की आवाज के लिए उभरी पार्टी मानना मुश्किल हो जाता है। जिस व्यक्ति का पूरा बैकग्राउंड सोशल मीडिया नैरेटिव, मीम कैंपेन और राजनीतिक डिजिटल प्रचार से जुड़ा रहा हो, उसके नेतृत्व में खड़ा हुआ यह ऑनलाइन कैंपेन अचानक पैदा हुआ मासूम ट्रेंड कम और एक सुनियोजित डिजिटल राजनीतिक कैंपेन ज्यादा नजर आने लगता है।

निष्कर्ष: ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ से आखिर हासिल क्या?

‘कॉकरोच जनता पार्टी’ जैसी चीजें सोशल मीडिया पर पहली नजर में युवाओं की आवाज और सिस्टम के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत जैसी लगती हैं। मीम्स, तंज, वायरल पोस्ट और सरकार विरोधी कंटेंट देखकर कई युवाओं को लगता है कि वे किसी बड़े बदलाव का हिस्सा बन रहे हैं। लेकिन धीरे-धीरे यही चीजें उन्हें असली दुनिया से दूर ले जाने लगती हैं।

पूरा कैंपेन इंटरनेट के गुस्से पर चलता है, जहाँ हर समस्या का जिम्मेदार सिर्फ सिस्टम, सरकार, अदालत, मीडिया या संस्थाओं को बताया जाता है। लगातार ऐसे कंटेंट देखने के बाद कई युवा यह मानने लगते हैं कि इस देश में कुछ ठीक हो ही नहीं सकता। न राजनीति पर भरोसा बचता है, न कानूनी प्रक्रिया पर और न ही लोकतांत्रित संस्थाओं पर।

सबसे बड़ी बात यह है कि इस तरह के ऑनलाइन ट्रेंड युवाओं को गुस्सा तो देते हैं, लेकिन दिशा नहीं। घंटों सोशल मीडिया पर बहस, ट्रोलिंग और मीम शेयर करने के बाद भी जमीन पर उनकी जिंदगी में कुछ बदलता नहीं। नौकरी, करियर, स्किल या असली राजनीतिक भागीदारी की जगह उनकी दुनिया धीरे-धीरे सिर्फ इंटरनेट तक सिमटने लगती है।

यही वजह है कि ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ को केवल मजाक मानकर नजरअंदाज करना आसान नहीं है। क्योंकि मीम्स और व्यंग्य के पीछे लगातार ऐसा माहौल बनाया जा रहा है, जहाँ युवाओं का भरोसा सिस्टम से टूटे और उनका गुस्सा हमेशा जिंदा रहे। इंटरनेट पर यह सब ‘कूल’ और ‘क्रांतिकारी’ जैसा दिख सकता है, लेकिन आखिर में ज्यादातर युवाओं के हाथ सिर्फ ऑनलाइन नाराजगी ही लगती है, कोई असली बदलाव नहीं।

इस्लामी-कम्युनिस्ट गैंग की नहीं, PM मोदी की सुनता है देश: 4 साल में 3875 से बढ़कर 68328 हुए लक्षद्वीप जाने वाले पर्यटक, जाने कैसे BJP सरकार ने बदली तस्वीर

मोदी सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में लक्षद्वीप को ‘हाई-वैल्यू इको-टूरिज्म’ डेस्टिनेशन के रूप में विकसित करने की कोशिश की है। खासकर जनवरी 2024 में पीएम मोदी की यात्रा के बाद लक्षद्वीप सुर्खियों में आया। लक्षद्वीप की ‘खूबसूरती’ को दुनिया ने देखा। पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए केन्द्र सरकार ने कई नियमों में सुधार किए। इसका असर ये रहा कि लक्षद्वीप हॉट डिस्टिनेशन बन गया है। पीएम मोदी ने विदेशों में छुट्टियाँ बिताने के बदले देश के खूबसूरत पर्यटन स्थल में जाने की लोगों से अपील की थी। इसका असर भी दिख रहा है।

पीएम मोदी की अपील का दिखा असर

जनवरी 2024 में पीएम मोदी ने लक्षद्वीप की तस्वीरें और वीडियो साझा किए थे। इसके बाद इंटरनेट पर ‘Lakshadweep tourism’ ट्रेंड करने लगा। दरअसल लक्षद्वीप को पीएम मोदी ने जैसे ही लक्षद्वीप को प्रोमोट किया। इसका असर मालदीव पर पड़ा। मालदीव ने इसे अपना ‘प्रतिद्वंदी’ मानते हुए कई भारत विरोधी बयान दिए। इससे मालदीव के प्रति भारत में नाराजगी बढ़ी। दरअसल वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लक्षद्वीप में टूरिज्म के विकास की बात की थी और फिर पीएम मोदी ने वहाँ का दौरा किया। इस दौरान लक्षद्वीप से जुड़ी तस्वीरों और वीडियो के माध्यम से दुनिया ने इसकी सुंदरता देखी।

इन फोटो को देखकर मालदीव की मुइज्जू सरकार भड़क गई। उसके मंत्रियों ने भारत और पीएम मोदी के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी की। भारत में इसका विरोध हुआ और ‘मालदीव बायकॉट’ के स्वर भी गूँजे। भारत के लोगों ने महसूस किया कि मुइज्जू सरकार चीन-पाकिस्तान की कठपुतली बन गई है और भारत विरोधी फैसले ले रही है।

(साभार- चैटजीपीटी)

ग्राफ में लक्षद्वीप में कैसे पर्यटक बढ़ रहे हैं ये दिखाया गया है। यहाँ 2000 में 1684 पर्यटक पहुँचे, जबकि 2005 में 7849, 2010 में 9217, 2015 में 18414, 2020 में 3875, 2023 में 46551 और 2024 में 68328 पर्यटक पहुँचे थे।

पीएम मोदी की विजिट के बाद पर्यटन में भारी उछाल

आरटीआई डाटा के मुताबिक, 2020 में जहाँ लक्षद्वीप में मात्र 3875 पर्यटक आए थे, वहीं 4 साल बाद यानी 2024 में यह संख्या बढ़कर 68328 हो गई। ये उछाल खास कर पीएम मोदी के जनवरी 2024 में लक्षद्वीप के दौरे के बाद आया। उन्होंने लक्षद्वीप के खूबसूरत फोटो और वीडियो शेयर किए थे। इससे टूरिज्म को बढ़ावा मिला। 2023 में यहाँ 46551 पर्यटक आए थे जो एक साल बाद 68328 हो गए यानी करीब 47 फीसदी का इजाफा हुआ।

वहीं मालदीव जाने वाले पर्यटकों की संख्या में काफी कमी आई। 2023 में 209193 पर्यटक मालदीव पहुँचे, लेकिन 2024 में इसकी संख्या घट कर 130805 हो गई यानी 37.5 फीसदी की कमी आई। मालदीव की अर्थव्यवस्था में टूरिज्म का बड़ा हाथ है। पर्यटकों की घटती संख्या ने मालदीव को सबक सिखा दिया। यहाँ भारतीय पर्यटकों की संख्या घट कर 41 फीसदी तक रह गई। वहीँ भारतीयों की संख्या लक्षद्वीप में दोगुनी हो गई। यह पीएम मोदी की रणनीति और लक्षद्वीप दौरे का असर था।

मोदी सरकार ने लक्षद्वीप से जुड़े नियम बदले

पर्यटकों को लक्षद्वीप जाने में किसी तरह की दिक्कत न हो इसको देखते हुए से नियमों में बड़ा बदलाव किया गया। लक्षद्वीप प्रशासन ने 29 अप्रैल 2026 को जारी एक सर्कुलर के माध्यम से पर्यटकों के लिए एंट्री परमिट नियमों में सुधार किया है। नए नियमों के बाद अब यहाँ घूमना पहले के मुकाबले काफी आसान हो गया है।

पर्यटकों के लिए लोकल स्पॉन्सर की जरूरत खत्म की गई। पहले स्थानीय व्यक्ति या संस्था का स्पॉन्सर होना जरूरी था। इतना ही नहीं पर्यटकों को पुलिस क्लियरेंस सर्टिफिकेट यानी पीसीसी की जरूरत होती थी। इसे खत्म कर दिया गया यानी अब पुलिस क्लियरेंस की जरूरत भी नहीं रही। नए नियम के मुताबिक सिर्फ 14 दिन पहले आवेदन करना अनिवार्य किया गया। अब सुरक्षा जाँच का काम लक्षद्वीप पुलिस खुद ही आवेदन करने के बाद करेगी।

पर्यटन को लेकर सरकार ने कई बड़े कदम उठाए

केंद्र सरकार ने लक्षद्वीप के विकास पर ₹3600 करोड़ से अधिक के पर्यटन और इंफ्रास्ट्रक्चर योजनाओं पर काम शुरू किया, ताकि लक्षद्वीप को टूरिस्ट हब बनाया जा सके। इंटरनेट और डिजिटल कनेक्टिविटी में बड़ा बदलाव किए गए। सबसे बड़ा प्रोजेक्ट Kochi-Lakshadweep Submarine Optical Fibre Cable था। यह केबल लगभग 11 द्वीपों को जोड़ती है और ‘डिजिटल इंडिया’ मिशन के तहत बनाई गई। इससे लक्षद्वीप की इंटरनेट स्पीड लगभग 100 गुना तक बढ़ाई गई। पहले जहाँ लगभग 1.7 Gbps क्षमता थी, उसे बढ़ाकर करीब 200 Gbps किया गया। इससे ऑनलाइन बुकिंग, डिजिटल पेमेंट, होटल या रिसॉर्ट का संचालन आसान हुआ, साथ ही 4G-5G का विस्तार हुआ।

पर्यटक वहाँ तक आसानी से पहुँच सकें, इसके लिए एयर और समुद्री कनेक्टिविटी सुधारने की कोशिश की गई। 2026 में कोच्चि-लक्षद्वीप सी-प्लेन ट्रायल भी शुरू हुए, जिनका उद्देश्य पर्यटन और इमरजेंसी कनेक्टिविटी बढ़ाना है। अगत्ती एयरपोर्ट का विस्तार किया गया। यहाँ रनवे को 336 मीटर तक बढ़ाया गया, ताकि बड़े जहाज आसानी से वहाँ उतर सकें। नया टर्मिनल भवन बनाया गया, जहाँ 150 यात्री एक साथ रुक सकें।

समुद्री रास्तों को आकर्षण बनाने के लिए नए सी- प्लान के तहत जेट्टी और पोर्ट इंफ्रास्ट्रक्चर में सुधार किया गया, ताकि बड़े जहाज और क्रूज को लाने में दिक्कत न हो। बीच रिसॉर्ट्स, वॉटर स्पोर्ट्स, स्कूबा डाइविंग, क्रूज टूरिज्म, इको-टूरिज्म को बढ़ावा दिया गया। राजधानी कवाराति में बैटरी बैकअप वाले सोलर पावर प्रोजेक्ट शुरू किए गए, ताकि बिजली की समस्या का निदान हो। पानी की समस्या को भी कम करने की कोशिश हुई। स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी काम किए गए।

सरकार लक्षद्वीप को सागरमाला परियोजना के तहत विकसित कर रही है। इसके विकास में लगने वाले फंड को सागरमाला परियोजना के फंड से लिया जाएगा। लक्षद्वीप के विकास के लिए कुल 13 प्रोजेक्ट बनाए गए। इन प्रोजेक्ट के जरिए लक्षद्वीप के 36 द्वीपों की तस्वीर बदली जा रही है।

मोदी सरकार कदामत द्वीप पर सबसे अधिक ₹1034 करोड़ खर्च कर रही है। यह फंड पोर्ट और बीच के विकास में लगाया जा रहा है। इसके अलावा कल्पेनी द्वीप पर ₹804 करोड़ का खर्च किया गया। अन्द्रोथ द्वीप को ₹762 करोड़ से विकसित किया जा रहा है। मिनिकॉय और कवरत्ती द्वीप को भी आधुनिकतम सुख सुविधाओं से लैस किया जा रहा है। कुल मिलाकर पर्यटन की दृष्टि से जितनी सहुलियत दी जा सकती थी, वह मोदी सरकार ने देने की कोशिश की।

मोदी सरकार से पहले लक्षद्वीप अविकसित माना जाता था। यहाँ की 98 फीसदी आबादी मुस्लिम थी। लोगों को सरेआम माँस कटते थे। कपड़ा पहनने पर अघोषित शरिया लागू था। शराब पर अघोषित बैन था और गंदगी काफी थी। ऐसी परिस्थिति में पीएम मोदी ने प्रफुल्ल खोड़ा पटेल को इस केन्द्रशासित प्रदेश का प्रशासक बना कर भेजा और उन्होंने इस स्थल को मालदीव के टक्कर का बनाने के लिए कुछ सुधर योजनाएँ लाई, तब जाकर लोगों को पता चला कि लक्षद्वीप की क्या हालत है।

यहाँ के हालत ऐसे थे कि राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी की प्रतिमा भी नहीं थी। दरअसल इसकी वजह मुस्लिम आबादी का होना था, जिनके लिए ‘बूतपरस्ती हराम’ है। 2010 में यूपीए सरकार यहाँ प्रतिमा लगाना चाहती थी, लेकिन विरोध को देखते हुए उसे पीछे हटना पड़ा था, लेकिन मोदी सरकार ने ये कर दिखाया। यहाँ विकास कार्यों का जमकर विरोध हो रहा था।

लक्षद्वीप में विकास नीतियों का विरोध करने वाले लोगों ने सरकार पर घटिया आरोप भी लगाए। लक्षद्वीप की एक्टर और मॉडल सुल्ताना ने एक मलयालम न्यूज चैनल पर डिबेट में यहाँ तक कह दिया कि केन्द्र सरकार ‘कोविड़-19 का इस्तेमाल हथियार के तौर पर’ स्थानीय लोगों के लिए कर रही है। उसने कहा कि ‘कोरोना को बायो वेपन’ की तरह इस्तेमाल किया गया। दरअसल अभिनेत्री कोरोना की बढ़ती संख्या को केन्द्र सरकार पर हमले की तरह इस्तेमाल किया।

ये बयान विकास की गति को रोकने की एक कोशिश की तरह देखा गया। कोरोना महामारी के वक्त सरकार ने स्थानीय निवासियों की सुरक्षा इंतजाम किए थे। देश के दूसरे हिस्सों की तरह यहाँ कई सेंटर्स बनाए गए थे, जहाँ कोरोना पीड़ितों को रखा गया था यानी विकास के साथ-साथ सरकार ने स्वास्थ्य सुविधाओं का भी पूरा ख्याल रखा।

इस्लामी आबादी हर हाल में लक्षद्वीप को जस का तस रखना चाहती थी, लेकिन प्रशासनिक फैसलों ने इन विरोधों को दरकिनार कर योजनाओं को अमली जामा पहनाया।

लक्षद्वीप की हिन्दू आबादी का हुआ था धर्मांतरण

इन खूबसूरत द्वीपों पर मुस्लिम कैसे आए, इसकी कहानी भी काफी दिलचस्प है। सातवीं शताब्दी में शेख उबैदुल्लाह का, जिसे ‘संत उबैदुल्लाह’ भी कहते हैं, वह यहाँ इस्लाम के प्रचार प्रसार के लिए पहुँचा। शेख उबैदुल्लाह अरब में रहता था और मक्का-मदीना में नमाज पढ़ता था। एक बार मक्का में अल्लाह की इबादत करते समय उसे नींद आ गई और सपने में खुद पैगंबर मुहम्मद आ पहुँचे। सपने में ही उन्हें आदेश मिला कि जेद्दाह (सऊदी अरब का बंदरगाह) जाओ और वहाँ से एक जहाज लेकर इस्लाम को फैलाने के लिए दूर-दूर क्षेत्रों में निकलो।

कहानी में बताया जाता है कि शेख उबैदुल्लाह समुद्र के रास्ते निकल पड़ा। कई महीनों तक समुद्र में भटकने के बाद एक तूफ़ान आया और उसका जहाज अमिनि द्वीप से आ टकराया। इसके बाद उसे फिर से नींद आ गई और वो सो गया। जैसा कि मक्का में हुआ था, पैगंबर मुहम्मद फिर से उसके सपने में आए और कहा कि इसी द्वीप पर इस्लाम का प्रचार-प्रसार करो। इसके बाद उसने आदेश का पालन शुरू कर दिया।

ये कहानी लक्षद्वीप की सरकार वेबसाइट पर द्वीप समूह के इतिहास के वर्णन में भी दी गई है। इसमें लिखा है कि उस समय यहाँ के मुखिया ने उसकी मंशा को भाँप कर उसे बाहर निकाल दिया, लेकिन वो अड़ा रहा। फिर एक सुंदर हिन्दू युवती के उसके प्यार में पड़ने की बात कही जाती है। उसने उसका धर्मांतरण करा के मुस्लिम बनाया और ‘हमीदत बीबी’ नाम रखा। शेख उबैदुल्लाह ने उसके साथ निकाह कर लिया।

इस्लामी नैरेटिव की कहानी के अनुसार, स्थानीय मुखिया ने जब उसे मारने की योजना बनाई और अपने सैनिकों के साथ उसे घेर लिया, तब शेख उबैदुल्लाह ने अल्लाह को याद किया और उसे घेरे उसके सभी विरोधी अंधे हो गए। दोनों भाग निकले और जैसे ही उन्होंने द्वीप छोड़ा, इन लोगों की आँखों की रोशनी वापस आ गई।

इसके बाद शेख उबैदुल्लाह एंड्रोट द्वीप पर पहुँचा, लेकिन वहाँ भी उसका कड़ा विरोध हुआ। लेकिन, किसी तरह उसने लोगों को फुसला कर कइयों का इस्लाम कबूल करवाया। फिर उसने लक्षद्वीप के कई द्वीपों में जाकर इस्लाम का प्रचार-प्रसार किया और धर्मांतरण अभियान चलाया। अपने जीवन के अंतिम दिनों में वो एंड्रोट लौटा, जहाँ उसे दफनाया गया। आज एंड्रोट में उसका मकबरा है और श्रीलंका से लेकर म्यांमार और मलेशिया तक से मुस्लिम उसके कब्र पर आते हैं।

कहते हैं कि बाद में उसने अमिनी में जाकर भी बड़े पैमाने पर लोगों का धर्मांतरण कराया और इस बारे नए-नए मुस्लिम बने कई स्थानीय लोग उसके साथ थे, इसीलिए उसका विरोध भी कम हुआ। इसी तरह उसने कवरत्ती और अगट्टी में भी बड़े पैमाने पर हिन्दुओं का धर्मांतरण कराया। एंड्रोट के जुमा मस्जिद में उसकी कब्र है, जो उसके समय ही बना था। ये उसके ब्रेनवॉशिंग का कमाल ही था कि आज लक्षद्वीप की 98% आबादी मुस्लिम है।

शिकायतों को किया नजरअंदाज, पीड़िता को ही ठहराया जिम्मेदार, धर्मांतरण गैंग को दी क्लीन चिट: जानें नासिक TCS कांड में POSH कमेटी सदस्य को क्यों नहीं मिली जमानत

महाराष्ट्र के नासिक स्थित टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग (BPO) में जबरन धर्मांतरण और यौन उत्पीड़न मामले में शुक्रवार (15 मई 2026) को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश वी वी कथारे ने POSH कमेटी की सदस्य अश्विनी अशोक चैनानी की जमानत याचिका खारिज कर दी।

कोर्ट ने यह फैसला इस आधार पर दिया कि POSH कमेटी की सदस्य होने के बावजूद उन्होंने हिंदू पीड़िता की गंभीर शिकायतों को नजरअंदाज किया। अपनी जिम्मेदारी निभाने और मदद करने की बजाय उन्होंने पीड़िता को ही दोषी ठहराया और आरोपितों को छोड़ देने के लिए दबाव बनाया।

इसके साथ ही कोर्ट ने आरोपित आसिफ अंसारी, रजा मेमन, तौसीफ अत्तार और शाहरुख कुरैशी की जमानत याचिकाएँ भी खारिज कर दी थीं।

पीड़िता की आपबीती, लगातार उत्पीड़न और चैनानी की संवेदनहीनता

हिंदू पीड़िता TCS में एक एसोसिएट के तौर पर काम करती थी और टीम लीडर रजा मेमन के अधीन थी। मई 2023 में मेमन ने ट्रेनिंग एरिया में अकेली मौजूद पीड़िता से संपर्क किया और निजी सवाल पूछकर उससे नजदीकियाँ बढ़ाने की कोशिश की। वह उसे वर्ड पजल हल करने के लिए देता और कहता कि इसे किसी को न बताए।

उसकी हरकतों से पीड़िता असहज महसूस करने लगी। आरोप है कि मेमन उसे अजीब तरीके से घूरता था, जबरन बातचीत करने की कोशिश करता था और ऑफिस में अकेले होने पर अनुचित तरीके से छूता था। पीड़िता ने मौखिक रूप से क्वालिटी और ट्रेनिंग मैनेजर को इसकी जानकारी दी।

मैनेजर ने उसे सावधान रहने की सलाह दी और कहा कि मेमन अच्छा इंसान नहीं है। एक अन्य टीम लीडर निताली जगजाप ने भी उसे अकेले न रहने और हमेशा ग्रुप में रहने की सलाह दी। जब मेमन को इसकी जानकारी हुई तो उसने बदला लेने के लिए पीड़िता का नाम उसके पुरुष सहकर्मी अभिषेक के साथ जोड़ना शुरू कर दिया।

वह दोनों के अफेयर की अफवाह फैलाने लगा। पिछले नवंबर में पीड़िता की शादी हुई थी। वह लंच के बाद ऑफिस में आराम कर लिया करती थी। तब मेमन उसकी शादीशुदा जिंदगी और निजी संबंधों को लेकर भद्दे सवाल पूछता था। फरवरी में जब पीड़िता ने गोवा जाने के लिए छुट्टी माँगी तो उसने पूछा कि क्या वह शराब पीती है और क्या हनीमून मनाने जा रही है।

पीड़िता ने बताया कि वह उसे सिर से पाँव तक घूरता था और उसकी हरकतें साफ तौर पर यौन उत्पीड़न की श्रेणी में आती थीं। आरोप यह भी है कि मेमन जानबूझकर उस पर काम का दबाव बढ़ाता था ताकि उसे मानसिक रूप से परेशान किया जा सके। परेशान होकर पीड़िता ने ऑफिस हेड अश्विनी चैनानी से शिकायत की।

आदेश में कहा गया है, “रजा मेमन, दानिश और तौशीफ, जो उसके उत्पीड़न के लिए जिम्मेदार थे, उनके खिलाफ कोई कार्रवाई करने की बजाय चैनानी ने पीड़िता से पूछा कि वह हमेशा ‘हाइलाइट’ में क्यों रहना चाहती है और उसे आरोपितों को छोड़ देने के लिए कहा। कोर्ट ने कहा कि चैनानी के इस रवैये ने आरोपियों का मनोबल बढ़ाया और उनका उत्पीड़न जारी रहा।

19 मार्च को गुड़ी पड़वा के दिन पीड़िता साड़ी पहनकर ऑफिस गई थी। आरोप है कि शाहरुख नामक कर्मचारी ने उसे अश्लीलता से देखा जिससे वह शर्मिंदा महसूस करने लगी। पीड़िता ने पहले भी चैनानी से उसकी शिकायत की थी, लेकिन उन्होंने कोई कदम नहीं उठाया, जिससे आरोपित और ज्यादा बेखौफ हो गए।

कोर्ट ने चैनानी के बचाव के तर्कों को किया खारिज

चैनानी की ओर से कोर्ट में कहा गया कि उन्हें केवल इसलिए इस मामले में घसीटा गया क्योंकि उन्होंने मौखिक शिकायतों पर उचित प्रतिक्रिया नहीं दी। उनका दावा था कि वे पुणे ऑफिस में तैनात थीं और नासिक ऑफिस का रोजमर्रा का काम उनके सीधे नियंत्रण में नहीं था। इसलिए उन्हें घटनाओं की जानकारी नहीं थी और न ही उन्हें कोई लिखित शिकायत मिली।

उन्होंने यह भी कहा कि वे जाँच में सहयोग कर रही हैं और 26 जून को उनके बेटे की शादी है। वहीं महाराष्ट्र सरकार की ओर से कहा गया कि चैनानी ने पीड़िता की मौखिक शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया, जिसके कारण आरोपितों की हरकतें लगातार जारी रहीं। सरकार ने आशंका जताई कि जमानत मिलने पर वह गवाहों को प्रभावित कर सकती हैं और सबूतों से छेड़छाड़ हो सकती है।

चैनानी ने यह भी सवाल उठाया कि जयेश और निताली जगजाप के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हुई। इस पर कोर्ट ने कहा कि दोनों ने पीड़िता को आरोपित से सावधान रहने और अकेले न रहने की सलाह दी थी, जबकि चैनानी ने शिकायत को ही दबाने की कोशिश की। कोर्ट ने साफ कहा कि POSH कमेटी की सदस्य होने के नाते शिकायत मिलने पर कार्रवाई करना चैनानी की जिम्मेदारी थी।

कोर्ट ने मामले की गंभीरता बताते हुए कहा कि आरोपित पीड़िता से निजी सवाल पूछते थे, अश्लील टिप्पणियाँ करते थे और उसकी शादीशुदा जिंदगी, नींद, हनीमून और शराब पीने की आदत तक पर सवाल उठाते थे। FIR के मुताबिक, शाहरुख और मेमन उसे गलत नीयत से सिर से पाँव तक घूरते थे।

उन्होंने उसका पीछा भी किया, गुड़ी पड़वा पर साड़ी पहनने के बाद उसकी खूबसूरती पर भद्दी टिप्पणियाँ भी की गईं। जाँच में सामने आया कि कार्यस्थल के खराब माहौल से परेशान होकर पीड़िता ने मार्च 2026 में नौकरी छोड़ दी, जिसके बाद औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई।

कोर्ट ने कहा कि चैनानी ने POSH कमेटी सदस्य होने के बावजूद पीड़िता की शिकायतों के प्रति असंवेदनशील रवैया अपनाया। उन्होंने न केवल आरोपितों को बचाया बल्कि उन्हें यौन उत्पीड़न जारी रखने के लिए उकसाया भी।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि चैनानी ने हालात बिगड़ने का इंतजार किया लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया। उन्होंने आँख और कान बंद कर लिए, जबकि सब कुछ उनके सामने हो रहा था। कोर्ट ने यह भी कहा कि पहली FIR दर्ज होने के बाद भी उन्होंने नासिक ऑफिस जाकर हालात की समीक्षा नहीं की।

कोर्ट ने कहा कि शिकायत दर्ज कराने में हुई देरी के लिए पीड़िता को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि उसने तुरंत चैनानी को परिस्थितियों के बारे में सूचित कर दिया था।

शिकायत में देरी के पीछे कोर्ट ने मानी उचित वजह

कोर्ट ने कहा कि कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न (रोकथाम, प्रतिषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 की धारा 9 के अनुसार यदि महिला लिखित शिकायत नहीं कर पाती तो इंटरनल कमेटी का सदस्य उसकी मदद करेगा। ऐसे में शिकायत लिखित न होने को आधार बनाना गलत है।

कोर्ट ने कहा कि शिकायत उन्हीं लोगों के माध्यम से आगे बढ़नी थी जो खुद आरोपित थे और पीड़िता उन्हीं के अधीन काम करती थी। वह साधारण परिवार से आती है और आर्थिक मजबूरी में नौकरी कर रही थी। ऐसे में अपने वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ शिकायत करने से उसके करियर और नौकरी पर असर पड़ने का डर स्वाभाविक था।

कोर्ट ने यह भी माना कि यौन उत्पीड़न के आरोप सामने आने पर परिवार और पति भी उस पर नौकरी छोड़ने का दबाव डाल सकते थे। इसलिए शिकायत दर्ज कराने में हुई देरी को परिस्थितियों के अनुसार उचित माना गया। जाँच एजेंसी ने कोर्ट को बताया कि चैनानी जाँच में सहयोग नहीं कर रही थीं। इसी वजह से उन्हें गिरफ्तार किया गया।

चैनानी ने अपने बचाव में एक पुराने केस का हवाला दिया जिसमें एक प्रिंसिपल के खिलाफ कार्यवाही रद्द कर दी गई थी। लेकिन कोर्ट ने कहा कि उस मामले में प्रिंसिपल के खिलाफ आरोपी की मदद या सहयोग करने के सबूत नहीं थे, जबकि इस मामले में चैनानी के खिलाफ स्पष्ट सबूत मौजूद हैं।

कोर्ट ने कहा कि पीड़िता द्वारा यौन उत्पीड़न की शिकायत किए जाने के बावजूद POSH कमेटी सदस्य होने के बाद भी चैनानी ने शिकायत को नजरअंदाज किया और पीड़िता पर आरोपितों को छोड़ देने का दबाव बनाया। यह साफ तौर पर आरोपितों की मदद करने जैसा है।

कोर्ट ने कहा कि जाँच अभी शुरुआती चरण में है और आरोपित प्रभावशाली हैं। ऐसे में जमानत मिलने पर गवाहों को प्रभावित करने और सबूतों से छेड़छाड़ की आशंका है। इसी आधार पर जमानत याचिका खारिज कर दी गई।

NCW की रिपोर्ट में भी सामने आया था कार्यस्थल का खराब माहौल और ‘जीरो POSH अनुपालन’

11 मई को राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) ने बताया था कि महाराष्ट्र सरकार को इस मामले की जाँच करने वाली फैक्ट फाइंडिंग कमेटी की विस्तृत रिपोर्ट सौंप दी गई है। रिपोर्ट में नासिक ऑफिस के माहौल को बेहद जहरीला और परेशान करने वाला बताया गया।

इसमें लगातार बुलिंग, यौन उत्पीड़न, अधिकारों के दुरुपयोग और महिला कर्मचारियों के खिलाफ हिंदू विरोधी टिप्पणियों का जिक्र किया गया। कमेटी ने कहा कि नासिक ऑफिस में POSH कानून का सही तरीके से पालन नहीं किया जा रहा था। रिपोर्ट के मुताबिक पुणे और नासिक ऑफिस के लिए एक ही इंटरनल कमेटी बनाई गई थी, जो नियमों के खिलाफ है।

इतना ही नहीं, इंटरनल कमेटी के सदस्य कभी नासिक ऑफिस का निरीक्षण करने भी नहीं पहुँचे। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि ऑफिस में POSH नियमों से जुड़े पोस्टर, बोर्ड या जानकारी तक मौजूद नहीं थी। कर्मचारियों को नियमों और शिकायत प्रक्रिया के बारे में जागरूक करने के लिए कोई अभियान नहीं चलाया गया।

इंटरनल कमेटी के सदस्यों को लेकर भी कोई ट्रेनिंग या जागरूकता कार्यक्रम नहीं था। कमेटी ने निष्कर्ष निकाला कि ऑफिस में POSH कानून का ‘जीरो कंप्लायंस’ था।

कोर्ट के ताजा आदेश ने भी यह दिखा दिया कि कंपनी की व्यवस्था कितनी कमजोर और समझौता करने वाली थी। जिन लोगों पर हिंदू महिला कर्मचारियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी थी, वही उनकी शिकायतों को दबाने और आरोपितों को बचाने में लगे हुए थे।

(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

वर्जिन बच्चियों से निकाह के लिए तालिबान ने सुनाया फरमान, कहा- इनकी चुप्पी को ‘हाँ’ समझो: विदेशों तक में उठे सवाल, चुप्पी साधे बैठा रहा भारत का लिबरल गैंग

अफगानिस्तान में तालिबान सरकार ने एक नया फैमिली लॉ लागू किया है और इस कानून की एक लाइन को लेकर पूरी दुनिया में बहस शुरू हो गई है। इस नए नियम में कहा गया है कि अगर कोई ‘कुँवारी लड़की’ (वर्जिन लड़की) निकाह के प्रस्ताव पर कुछ नहीं बोलती, तो उसकी चुप्पी को ही उसकी मंजूरी यानी कंसेंट माना जाएगा। यही वजह है कि मानवाधिकार संगठन, महिला अधिकार कार्यकर्ता और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ इसे औरतों और बच्चियों की आजादी पर एक और बड़ा हमला बता रही हैं।

क्या है तालिबान का नया फैमिली लॉ?

तालिबान ने 31 आर्टिकल वाला एक नया फैमिली रेगुलेशन जारी किया है, जिसका नाम ‘प्रिंसिपल्स ऑफ सेपरेशन बिटवीन स्पाउसेस’ रखा गया है। इसे तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदजादा ने मंजूरी दी है। यह कानून निकाह, तलाक, नाबालिगों का निकाह, मियां-बीवी के अलगाव और पारिवारिक विवादों से जुड़े नियम तय करता है। लेकिन सबसे विवादित हिस्सा वही है, जिसमें ‘कुँवारी लड़की’ की चुप्पी को उसकी मंजूरी माना गया है।

क्या है ‘खियार अल बुलूघ’ का नियम?

इस कानून में ‘खियार अल बुलूघ‘ नाम का एक इस्लामी कानूनी सिद्धांत भी शामिल किया गया है। इसका मतलब है ‘बालिग होने के बाद चुनने का अधिकार।’ इसके तहत अगर किसी बच्चे का निकाह कम उम्र में तय कर दिया गया है, तो वह बालिग होने के बाद उस निकाह को खत्म करने की माँग कर सकता है।

लेकिन यहाँ एक बड़ी शर्त भी रखी गई है। निकाह खत्म करने के लिए मजहबी अदालत की मंजूरी जरूरी होगी। यानी सिर्फ लड़की की इच्छा से निकाह खत्म नहीं होगा, बल्कि तालिबान की अदालत फैसला करेगी कि निकाह रद्द किया जाए या नहीं।

कानून में यह भी कहा गया है कि अगर शौहर निकाह के लिए सही नहीं माना जाता या दहेज को लेकर बहुत ज्यादा फर्क होता है, तो उस निकाह को मान्यता नहीं दी जाएगी। लेकिन आलोचकों का कहना है कि कौन ‘सही लड़का है’, इसका फैसला भी तालिबान की मजहबी अदालतें ही करेंगी।

नाबालिग बच्चों के निकाह को लेकर क्या कहता है कानून?

इस नए कानून में ‘बाल विवाह’ को लेकर कहा गया है कि कुछ परिस्थितियों में नाबालिग लड़के और लड़कियों के निकाह को मान्यता दी जा सकती है। कानून में अब्बा और दादा को बच्चों का निकाह तय करने का अधिकार दिया गया है। यानी परिवार के बड़े पुरुष यह फैसला कर सकते हैं कि लड़की का निकाह किससे और कब होगा।

कानून में यह भी कहा गया है कि अगर रिश्तेदारों द्वारा तय किए गए निकाह में लड़का ‘सामाजिक रूप से उपयुक्त’ माना जाता है और दहेज भी मजहबी मानकों के मुताबिक है, तो उस निकाह को वैध माना जा सकता है। आसान भाषा में कहें तो अगर परिवार और मजहबी अदालत को रिश्ता सही लगता है, तो कम उम्र में हुए निकाह भी स्वीकार किए जा सकते हैं।

निजी जिंदगी में भी बढ़ेगा तालिबान सरकार का दखल

इस कानून में सिर्फ निकाह ही नहीं बल्कि कई निजी मामलों में भी तालिबान की अदालतों को हस्तक्षेप का अधिकार दिया गया है। अगर किसी औरत पर व्यभिचार यानी अवैध संबंध का आरोप लगाता है, अगर कोई धर्म परिवर्तन करता है, अगर शौहर लंबे समय तक गायब रहता है या ‘जिहार’ जैसी स्थिति बनती है, तो तालिबानी जज फैसला ले सकेंगे।

‘जिहार’ इस्लामी कानून का एक पुराना सिद्धांत है जिसमें शौहर अपनी बीवी की तुलना ऐसी औरत रिश्तेदार से करता है जिससे निकाह करना मजहबी रूप से मना होता है। ऐसे मामलों में अदालत मियां-बीवी को अलग करने, जेल भेजने या दूसरी सजा देने का आदेश भी दे सकती है।

क्यों खतरनाक माना जा रहा कानून?

मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि किसी भी निकाह में लड़की की साफ और खुली सहमति जरूरी होती है। लेकिन अफगानिस्तान में औरतों की स्थिति पहले ही बहुत कमजोर हो चुकी है। 2021 में तालिबान के सत्ता में आने के बाद लड़कियों की पढ़ाई छठी क्लास के बाद बंद कर दी गई। औरतों को यूनिवर्सिटी जाने से रोक दिया गया। कई नौकरियों में औरतों के काम करने पर पाबंदी है और उनके अकेले यात्रा करने पर भी सख्त नियम लागू हैं।

ऐसे माहौल में अगर कोई लड़की डर, दबाव या परिवार की वजह से चुप रहती है, तो उसकी चुप्पी को ‘हाँ’ मान लेना जबरन निकाह का रास्ता खोल सकता है। जिस समाज में औरतों को खुलकर बोलने की आजादी ही नहीं हो, वहाँ ‘चुप्पी ही सहमति है’ जैसा नियम बेहद खतरनाक साबित हो सकता है।

दुनिया भर में हो रही कानून की आलोचना

एमनेस्टी इंटरनेशनल समेत कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने इस कानून की आलोचना की है। उनका कहना है कि निकाह में सहमति हमेशा साफ, खुली और बिना दबाव के होनी चाहिए। किसी लड़की का डर या मजबूरी में चुप रहना सहमति नहीं माना जा सकता।

कई विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि तालिबान जिस तरह इन नियमों को मजहबी आधार पर सही ठहराने की कोशिश कर रहा है, वह इस्लाम की आधुनिक और व्यापक व्याख्याओं से मेल नहीं खाता। उनके मुताबिक मजहब के नाम पर औरतों की आवाज दबाना और उन्हें फैसले लेने के अधिकार से दूर रखना मानवाधिकारों के खिलाफ है।

यही कारण है कि तालिबान का यह नया कानून सिर्फ अफगानिस्तान तक सीमित मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि अब इसे दुनिया भर में औरतों की आजादी और अधिकारों से जुड़े बड़े सवाल के तौर पर देखा जा रहा है।

लड़कियों की ‘चुप्पी’ पर तालिबान का कानून, लेकिन लिबरल चेहरे खामोश क्यों?

यह कानून साफ तौर पर महिला विरोधी है। यह लड़कियों से उनका सबसे बुनियादी अधिकारी यानी उनकी शादी पर फैसला लेने का हक तक छीन लेता है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि भारत में खुद को लिबरल, प्रोग्रेसिव और महिला अधिकारों का समर्थक बताने वाले कई नामी इस्लामी अकाउंट्स और एक्टिविस्ट इस मुद्दे पर चुप हैं।

ये वही लोग हैं जो भारत में किसी भी मुद्द पर तुरंत ट्वीट करते हैं, लंबी पोस्ट लिखते हैं, सरकार की आलोचना करते हैं और नारीवाद की बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। विदेशी मजहबी मुल्कों में मुस्लिमों से जुड़ा कोई भी मामला हो, तो सबसे पहले यही लोग आवाज उठाते नजर आते हैं। लेकिन अफगानिस्तान में लड़कियों की पढ़ाई बंद कर दी जाए, महिलाओं को घरों तक सीमित कर दिया जाए और अब लड़की की चुप्पी को ही शादी की मंजूरी मान लिया जाए, तब इनकी टाइमलाइन लगभग खाली नजर आती है।

न कोई बड़ा कैंपेन दिखता है, न लगातार ट्वीट्स, न रीट्वीट और न ही वैसी नाराजगी, जैसी भारत के मामलों में दिखाई जाती है। कहीं ‘सेव वूमेन’ की बात नहीं होती, कहीं ‘फेमिनिज्म’ की बहस नहीं होती और न ही महिलाओं की आजादी पर लंबे थ्रेड लिखे जाते हैं।

यही दोहरापन सबसे ज्यादा सवाल खड़े करता है। अगर महिलाओं के अधिकार सच में सबसे ऊपर हैं, तो फिर अफगानिस्तान की लड़कियाँ भी उतनी ही अहम होनी चाहिए जितनी भारत की महिलाएँ। लेकिन अक्सर ऐसा लगता है कि कुछ लोगों की एक्टिविज्म और नारीवाद की आवाज सिर्फ चुनिंदा मुद्दों तक सीमित रह जाती है।