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हिंदू कार्यकर्ता ने ईसाई मिशनरी को ‘आततायी’ कहा तो गोवा में दर्ज हो गया केस: जानें- सेंट जेवियर ने कैसे स्थानीय लोगों पर ढाए थे जुल्म, क्यों हिंदुओं का ऐसों के खिलाफ बोलना जरूरी

गोवा में ‘सेंट’ फ्रांसिस जेवियर पर दिए गए बयान को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। यहाँ हिंदू कार्यकर्ता गौतम खट्टर ने जेवियर को ‘आतंकवादी’ और ‘बर्बर’ शासक बताया। इस बयान पर गोवा में विपक्षी पार्टी, खासकर कॉन्ग्रेस ने आपत्ति जताई। इसके बाद कार्यकर्ता के खिलाफ धार्मिक भावनाएँ आहत करने के मामले में FIR दर्ज की गई।

हिंदू कार्यकर्ता का ‘सेंट’ जेवियर को लेकर बयान

दरअसल, हिंदू संगठन सनातन महासंघ के संस्थापक गौतम खट्टर ने ‘सेंट’ जेवियर को लेकर यह बातें गोवा के वास्को डा गामा शहर में 18 अप्रैल 2026 को परशुराम जयंती के अवसर पर आयोजित एक समारोह में की हैं। इस समारोह में राज्य के परिवहन मंत्री मौविन गोडिन्हो और विधायक संकल्प अमोनकर भी मौजूद हुए।

गौतम खट्टर ने कहा, “आतंकवादी और बर्बर क्रूर शासक सेंट जेवियर को जहाँ दफनाया गया, उसके शरीर को कीड़े लग गए, न आत्मा बची और न शरीर बचा। उसकी हड्डियों को कीड़ों ने खाकर चूरा-चूरा कर दिया। उसके बाद भी उसका कोई त्योहार होता है, जिसमें लाखों सनातनी वहाँ हाथ जोड़ते हैं। जिसने पूरा जीवन लाखों सनातनियों को धर्मांतरण कराने में लगाया, वही सनातनी आज उसके त्योहार पर हाथ जोड़ने जाते हैं।”

वीडियो पर कॉन्ग्रेस की आपत्ति, FIR की कार्रवाई

इस बयान का वीडियो भी इंटरनेट पर वायरल हुआ। तमाम लोगों ने इसे धार्मिक भावनाओं को आहत करने वाला बयान बताया और इसे ‘हेट स्पीच’ की श्रेणी में जगह दी। कॉन्ग्रेस ने भी गौतम खट्टर के ‘सेंट’ जेवियर के बयान पर आपत्ति जताई।

गोवा कॉन्ग्रेस ने अपने ‘एक्स’ अकाउंट पर गौतम खट्टर के बयान का वीडियो शेयर किया और लिखा, “हम सेंट फ्रांसिस जेवियर के खिलाफ की गई अपमानजनक टिप्पणियों की कड़ी निंदा करते हैं। ऐसे बयान ईसाई समुदाय की भावनाओं को गहरी ठेस पहुँचाते हैं और गोवा की उस सामाजिक एकता को नुकसान पहुँचा सकते हैं, जिसके लिए राज्य हमेशा जाना जाता रहा है। हम प्रशासन से अपील करते हैं कि इस मामले में जल्द और जिम्मेदारी के साथ कार्रवाई की जाए।”

इसके बाद कॉन्ग्रेस के विधायक पीटर डिसूजा ने वास्को पुलिस थाने गौतम खट्टर के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई। साउथ गोवा पुलिस अधीक्षक संतोष देसाई के मुताबिक, खट्टर को धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने का मामला दर्ज किया गया है।

अब यहाँ जानना जरूर है कि जिस फ्रांसिस जेवियर को ‘बर्बर शासक’ बताने पर कॉन्ग्रेस इसे धार्मिक भावनाओं की आहत होना बता रही है, उस फ्रांसिस जेवियर के कारनामे क्या हैं? कैसे वो भारत आया और उसने हिंदुओं का धर्मांतरण कराने का मिशन शुरू किया और जिसने इन्कार किया तो उसको बद से बदतर सजा दी गई। और जिस गोवा को आज ईसाई के नाम से जाना जाता है, यह पहचान जेवियर ने ही थोपी थी।

‘सेंट’ जेवियर का धर्मांतरण मिशन

फ्रांसिस जेवियर 06 मई 1542 को भारत के गोवा पहुँचा। वह अकेला नहीं आया था, बल्कि पुर्तगाल के राजा जॉन III के समर्थन और आदेश के साथ आया था। उस समय गोवा पूरी तरह पुर्तगाल के कब्जे में था और वहीं से पूरे एशिया में ईसाई मिशन चलाने की योजना बनाई गई थी।

गोवा पहुँचते ही जेवियर ने सबसे पहले बच्चों और गरीब तबके को निशाना बनाकर ईसाई का प्रचार शुरू किया। 1542 से 1545 के बीच उसने तटीय इलाकों, खासकर फिशरमैन समुदाय में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण अभियान चलाया। कई ऐतिहासिक रिकॉर्ड बताते हैं कि पुर्तगाली शासन के दबाव और लालच में आकर स्थानीय हिंदू लोगों को अपना धर्म छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।

1545 के बाद जेवियर ने गोवा को अपना बेस बनाकर मिशन को और फैलाया। उसने बार-बार पुर्तगाल के शासकों को पत्र लिखकर यहाँ ” कड़े धार्मिक कानून’ लागू करने की माँग की, ताकि जो लोग धर्मांतरण नहीं कर रहें उन पर दबाव बनाया जा सके। यही वह दौर था जब गोवा में संगठित तरीके से धर्मांतरण की प्रक्रिया तेज हुई और चर्च का प्रभाव लगातार बढ़ता चला गया।

‘सेंट’ जेवियर की हिंदू-घृणा और हिंदुओं पर अत्याचार

‘सेंट’ जेवियर पर मौजूदा लेख बताते हैं कि उन्हें हिंदू से इतनी घृणा थी कि वह उन्हें विधर्मी, काफिर तक कहकर संबोधित करते थे। वहीं ब्राह्मणों से उन्हें इतनी दिक्कत थी कि उन्हें वो ‘धोखेबाज और झूठा’ बताकर पेश करते थे ताकि समाज का विश्वास उनपर से उठ जाए। इसके अलावा वो ईसाई धर्म में लोगों को लाने के लिए ईसाई धर्म की खूबियों के अलावा ये बताते थे कि कैसे हिंदू और उनके देवी-देवता बुरे होते हैं।

फ्रांसिस के बारे में कहा जाता है कि उनके होते हुए गोवा में इतनी तेजी से धर्मांतरण की रफ्तार बढ़ी थी कि वो कई बार पूरे के पूरे गाँव को ईसाई बनवा देते थे। फिर हिंदू बच्चों को मंदिर में ले जाते थे और उनसे देवी-देवताओं को गाली देने को कहते थे, मूर्तियाँ तोड़ने, उनपर थूकने और उन्हें रौंदने के लिए कहते थे। साथ ही उन कलाकारों को भी धमकी दी जाती थी जो मूर्तियाँ बनाने का काम करते थे।

‘सेंट’ फ्रांसिस जेवियर ने गोवा पर जब पूरा कब्जा किया तो गैर इसाइयों के लिए स्थिति और बद्तर हो गई क्योंकि तब सत्ता ईसाई पादरियों के हाथ आ गई और हिंदू विरोधी कानून बनने शरू हुए। धर्मांतरण के लिए नृशंस यातनाएँ दी जाने लगी। हिंदू माता पिता के सामने बच्चों के अंग काटे जाने लगे। वहीं जो धर्मांतरण के लिए नहीं मानता था उसे सूली पर लटकाकर जलाना शुरू कर दिया गया।

इस तरह जेवियर के काल में धर्मांतरण को अंजाम दिया गया और आगे चल कर जब इतिहासकारों ने इस सच्चाई को लिखना चाहा तो उन्हें भी असहनीय यातनाएँ दी गईं। गोवा में एक ‘हाथकाटरो’ खंभ भी है। बताया जाता है कि ये हिंदुओं पर पुर्तगाली शासकों के बर्बरता का जीवंत साक्ष्य है। ईसाइयों द्वारा हिंदुओं को इससे बाँधकर उनके अंगों को तोड़ा जाता था।

अब ‘सेंट’ जेवियर का काल बीते कई सदी हो चुकी हैं। आज ईसाई समुदाय जो हमें उनके बारे में बताता है हम उसी को जानते हैं लेकिन अगर लोगों की सुनी सुनाई बातों से हटकर खुद समझना चाहते हैं कि ‘सेंट’ जेवियर हिंदुओं के लिए सोच क्या रखते थे तो एक पत्र में लिखी बात पढ़िए जो उन्होंने 1545 में कोचीन से लिखी थी

क्या है नेपाल की ‘भंसार नीति’, जिसके खिलाफ PM बालेन शाह के खिलाफ सड़कों पर उतरी जनता: जानें- टैक्स के इस ‘अव्यावहारिक सिस्टम’ के पीछे की वजह

नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह के भारत विरोधी तेवर एक बार फिर सुर्खियों में है। उन्होंने नेपाली 100 रुपए से अधिक के सामान जो भारत से आते हैं, उस पर टैक्स लगाने के फैसले को सख्ती से लागू करना शुरू कर दिया है। सीमाओं पर भारतीय सामानों पर टैक्स की वसूली की जा रही है।

इससे नेपाल के लोगों को ज्यादा पैसे चुकाने पड़ रहे हैं और भारत-नेपाल से सटे इलाकों में खासतौर पर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। भारत नेपाल के बीच हमेशा से रोटी-बेटी का रिश्ता रहा है। सीमा पर कड़ा पहरा नहीं रहा है और बॉर्डर क्रॉस करने के लिए पहले से अनुमति लेने की जरूरत भी नहीं रही है।

लेकिन, बालेन शाह के निर्देश के बाद स्थितियाँ काफी बदल गई हैं। सीमा पार कर हर दिन सामानों की आवाजाही होती थी, उसमें कमी आ गई है। ऐसे में नेपाल को सामानों की कमी हो रही है। इससे महँगाई बढ़ने की आशंका है। सरकार भले ही टैक्स लगाकर पैसे कमा ले, लेकिन जनता बेहाल है। यही वजह है कि वहाँ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं।

क्या है नेपाल की ‘भंसार नीति’

नई भंसार नीति यानी कस्टम ड्यूटी के तहत भारत से आने वाले नेपाली 100 रुपए से अधिक की कीमत वाले सामानों को टैक्स देना होगा। खास कर रक्सौल, जोगबनी बॉर्डर पर इसे सख्ती से लागू कर दिया गया है। यहाँ सामानों पर 5 फीसदी से 80 फीसदी तक टैक्स वसूला जा रहा है।

नेपाल की मानें तो इस नीति का मकसद नेपाल के घरेलू उत्पादों और व्यापारियों को प्रोमोट करना और भारत से आने वाले सस्ते सामान पर रोक लगाना है। नेपाल सशस्त्र प्रहरी बल यानी नेपाल आर्म पुलिस फोर्स लाउडस्पीकर लगा कर लगातार सीमा पर नियम की जानकारी दे रही है और सख्ती कर रही है।

नेपाल के अधिकारी ने कहा, “कस्टम क्षेत्रों में अवैध आयात को रोकने के लिए ‘जीरो-टॉलरेंस’ की नीति अपनाना हमेशा से सरकार की नीति रही है। कस्टम अधिनियम में पहले से ही यह प्रावधान था कि नेपाली 100 रुपए से अधिक मूल्य के सामान पर शुल्क देना अनिवार्य है।” उन्होंने आगे कहा, “अब हम इस मामले में और भी अधिक सक्रिय हो गए हैं। मंत्री और प्रधानमंत्री की ओर से भी इसी तरह के निर्देश मिले हैं।”

भारतीय नंबर प्लेट वाले निजी वाहनों को अब बिना पूर्व अनुमति के नेपाल में प्रवेश करने से रोका जा रहा है। पहले भारतीय नंबर प्लेट वाली मोटरसाइकिलें अक्सर नेपाल में प्रवेश करती हुई दिखाई देती थीं, और कुछ लोग तो नेपाल के भीतर भी इसका धड़ल्ले से इस्तेमाल करते थे।

अब नेपाल में आसानी से जाया नहीं जा सकता। वाहनों को अब ‘वाहन पास’ पहले से लेना होगा। एक दिन नेपाल में रहने पर वाहन को 315 रुपए से 350 रुपए देना होगा। नेपाली करेंसी में इसकी कीमत करीब 500-600 रुपए है।

नेपाली की नई कस्टम नीति से भारत नेपाल के पारंपरिक रिश्ते प्रभावित हो रहे हैं। बॉर्डर से व्यापार कम हो गया है।

नेपाल में विरोध प्रदर्शन

नेपाल में नई कस्टम नीति को लेकर राजनीतिक दलों और स्थानीय निवासियों में गहरी नाराजगी है। लोग सड़कों पर उतर आए हैं। इनका कहना है कि यह फैसला मधेश क्षेत्र के लोगों के जीवन की असलियत को नजरअंदाज करता है।

नेपाल के बारा जिला मुख्यालय के कलैया भरत चौक पर 19 अप्रैल 2026 को लोग जमा हुआ और विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों में छोटे व्यापारी और आम लोग शामिल रहे। इनका कहना है कि ये फैसला लोगों पर आर्थिक बोझ डालने वाला है। सरकार बगैर सोचे समझे लोगों पर आर्थिक बोझ बढ़ा रहे हैं।

जनता समाजवादी पार्टी (JSP) की केंद्रीय समन्वय समिति के सदस्य उमेश यादव ने सरकार के इस कदम पर कड़ा रोष जताते हुए ‘चुने हुई सरकार का फासीवाद’ करार दिया। उन्होंने कहा, “सरकार जान-बूझकर सीमावर्ती क्षेत्र के लोगों को परेशान कर रही है, इससे आम जनता के बीच सरकार के प्रति गंभीर असंतोष बढ़ेगा।”

राष्ट्रीय मुक्ति पार्टी के महासचिव अनिल महासेठ ने कहा कि नेपाल और भारत के बीच खुली सीमा का निर्धारण काठमांडू या दिल्ली में एयरकंडीशन में बैठे लोग नहीं कर सकते। यहाँ खुली सीमा पर व्यावहारिक और वास्तविक सच्चाई नजर आती है।

उन्होंने कहना है कि बिराटनगर से लेकर नेपालगंज तक के निवासियों की चिंताओं को समझे बिना मनमाने ढंग से नीतियाँ थोपना पूरी तरह से ग़लत है।

राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के नेता और ‘खुली सीमा संवाद समूह’ के अध्यक्ष डॉ. राजीव झा का कहना है कि सरकार किसी भी हाल मं उन सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिवारिक संबंधों को न भूले, जो सदियों से नेपाल और भारत के बीच मौजूद हैं।

उनका कहना है कि आज के महँगाई के दौर में नेपाली 100 रुपये की सीमा तय करना बेहद कम और अव्यावहारिक है। सरकार को इस पर तत्काल पुनर्विचार करना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि मायके आई बेटी साधारण उपहारों और व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए लाए गए सामान के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए। खाद्य पदार्थों को सीमा शुल्क से मुक्त रखा जाना चाहिए।”

राष्ट्रीय एकता दल के अध्यक्ष विनय यादव ने इस कदम को ‘अघोषित नाकेबंदी’ करार दिया। उनका कहना है, “यह कदम 1950 की शांति और मैत्री संधि के प्रावधानों के विपरीत है। सरकार को घरेलू उपयोग की वस्तुओं पर से सीमा शुल्क की सीमा तत्काल हटा देनी चाहिए और सुरक्षाकर्मियों को नागरिकों के प्रति मित्रवत व्यवहार करने का निर्देश देना चाहिए।”

उन्होंने चेतावनी दी कि यदि नेपाल की सरकार ने सख्ती बंद नहीं की और 100 रुपए वाले नियम को वापस नहीं लिया, तो सीमावर्ती क्षेत्र के लोग सड़कों पर उतर जाएँगे। इनका कहना है कि इंटरनेशनल हवाई अड्डे पर तो सामानों से भरे सूटकेस लाने पर तो कोई कस्टम नहीं लगती, तो फिर मधेशियों को परेशान क्यों किया जा रहा है। उन्होंने पूछा कि क्या सीमा पार से थोड़ा सा नमक और तेल लाने पर लोगों के साथ तस्करों जैसा बर्ताव किया जाएगा?

नेपाल के रवैये को देखते हुए भारत सरकार ने भी सीमा पर चौकसी बढ़ा दी है। नेपाल आने और जाने वालों की सख्ती से जाँच की जा रही है, यहाँ तक की पैदल और साइकिल वालों के रिकॉर्ड भी रखे जा रहे हैं।

नेपाल सरकार की मंशा पर सवाल

नेपाल की बालेन सरकार का मानना है कि इससे छोटे-छोटे घरेलू उद्योग को बढ़ावा मिलेगा। भारत के सामान सस्ते होते हैं इसलिए नेपाल का लोकल बाजार प्रभावित हो रहा था। इसलिए ‘आत्मनिर्भरता’ और स्थानीय उत्पादों को बचाने के लिए यह कदम उठाया गया। बालेन शाह की नीति राष्ट्रवादी मानी जाती है।

भारतीय सामान पर सख्ती दिखा कर घरेलू समर्थन हासिल करने का तरीका भी ये माना जा रहा है। दरअसल बालेन शाह भारत के खिलाफ पहले भी बोलते रहे हैं।

नेपाल के अधिकारियों ने सरकार के फैसले का बचाव करते दिख रहे हैं। सीमा शुल्क विभाग के निदेशक किशोर बरतौला के मुताबिक यह कदम तस्करी रोकने के लिए उठाया गया है। उनका कहना है कि तस्कर थोड़े- थोड़े सामान मँगा कर उसे थोक में बेचते हैं।

इससे नेपाल के राजस्व में बढोतरी का भी तर्क दिया जा रहा है। कस्टम ड्यूटी से सरकार को सीधा राजस्व मिलता है। आर्थिक दबाव के बीच यह एक सरकार के आय का आसान स्रोत है। हालाँकि बरतौला इससे इनकार कर रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार को राजस्व बढ़ाने में इससे ज्यादा मदद नहीं मिलेगी।

इसे राजनीतिक संकेत भी कहा जा सकता है। इससे नेपाल के अंदर और बाहर यह संदेश जा रहा है कि सरकार ‘सख्त और फैसले लेने वाली’ है। दरअसल बालेन सरकार अपनी अलग पहचान बनाने में जुटी हुई है। लेकिन यह नीति ‘अव्यवहारिक’ है।

इससे भारत-नेपाल सीमा पर रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो रही है। भारत-नेपाल सीमा पर लोग रोजमर्रा की चीजें खरीदते हैं। शादी-ब्याह के मौके पर सीमा पार कर एक-दूसरे के घर आते-जाते हैं। ऐसे में ₹100 काफी कम है, जिससे ऊपर की वस्तुओं पर टैक्स लगाया गया है। इसे कम से कम ₹1000 किया जाना चाहिए।

सीमा पर सख्ती से दैनिक श्रमिकों की हालत ज्यादा खराब हो जाएगी। उनके सामने रोजी-रोटी का संकट आ जाएगा। इस नीति को लागू करना भी अपनेआप में एक चुनौती है। इससे सीमा पर भ्रष्टाचार को फलने- फूलने का मौका मिलेगा। इसलिए कम से कम रोजमर्रा की चीजों को इससे अलग रखा जाना चाहिए।

इस नीति का सीधा असर सीमा व्यापार पर पड़ रहा है। जो सामान आसानी से और कम कीमत पर नेपाली जनता को मिलती थी और भारत के छोटे व्यापारी लाभान्वित होते थे। नई भंसार नीति इस पर असर डालेगी। भारत-नेपाल के ‘रोटी-बेटी’ संबंधों के कारण यह मुद्दा ज्यादा संवेदनशील हो गया है।

दोनों देशों के बीच राजनयिक संवाद जारी है, जिससे रिश्तों की कड़वाहट में कमी आई है। बालेन शाह के कस्टम ड्यूटी वाले फैसले ने भारत के साथ रिश्तों को भी प्रभावित करेगा।

कभी देश की औद्योगिक ताकत था पश्चिम बंगाल लेकिन अब कर्ज के जंजाल में फंसा: जानें 2011 में TMC की सरकार आने के बाद कैसे बर्बाद हुआ राज्य, GDP का हिस्सा हुआ आधा

जैसे-जैसे पश्चिम बंगाल 2026 के विधानसभा चुनावों की ओर बढ़ रहा है, राज्य का माहौल राजनीतिक तनाव से भरा हुआ है। दार्जिलिंग के चाय बागानों से लेकर हुगली के औद्योगिक इलाकों और दक्षिण के तटीय गाँवों तक, हर कोना एक निर्णायक पल के लिए तैयार खड़ा है।

‘माँ, माटी, मानुषट जैसे नारों से आगे बढ़कर देखें तो एक अध्ययन यह दिखाता है कि जो राज्य कभी भारत की सबसे मजबूत आर्थिक ताकतों में गिना जाता था, वह धीरे-धीरे कर्ज और गिरावट के चक्र में फंसता गया। पहले वाम मोर्चा के लंबे शासन में और अब ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के पिछले पंद्रह सालों में।

2011 के बाद से संरचनात्मक गिरावट

Finskeptics की वित्तीय रिपोर्ट के अनुसार, जब नई सरकार आई थी तो उम्मीद थी कि औद्योगिक ठहराव खत्म होगा और एक ‘नई सुबह’ आएगी। लेकिन आँकड़े बताते हैं कि अर्थव्यवस्था की कमजोरियाँ खत्म नहीं हुईं, बल्कि और गहरी हो गई हैं।

राज्य सरकार ने कल्याणकारी योजनाओं का एक बड़ा नेटवर्क जरूर खड़ा किया है, जिससे गरीबों को तुरंत राहत मिलती है, लेकिन अर्थव्यवस्था का ‘इंजन’ कमजोर पड़ रहा है। सरकार ज्यादा से ज्यादा पैसा बाँटने में लगा रही है, जबकि भारी उद्योग और आईटी जैसे उत्पादक क्षेत्र पीछे छूटते जा रहे हैं। इसका असर बड़े संकेतकों में साफ दिखता है।

पश्चिम बंगाल का राष्ट्रीय GDP में हिस्सा घट रहा है, प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से नीचे है और हजारों कंपनियाँ राज्य छोड़कर जा चुकी हैं। निवेश का माहौल भी प्रभावित हुआ है। ‘कट मनी’ जैसे अनौपचारिक खर्च और मजदूर मामलों में राजनीतिक दखल ने निवेशकों का भरोसा कम किया है। बुनियादी ढाँचे की कमी और फैक्ट्रियों के बंद होने से औद्योगिक ढाँचा और कमजोर हुआ है।

एक औद्योगिक दिग्गज का लंबा पतन

इतिहास में पश्चिम बंगाल भारत के उद्योग का केंद्र था। आजादी के बाद यह देश के GDP में करीब 10% योगदान देता था। यह इंजीनियरिंग कंपनियों, जूट मिलों और पूर्वी भारत की व्यापारिक राजधानी के रूप में जाना जाता था। लेकिन पिछले सात दशकों में हालात और नीतियों के कारण इसकी नींव कमजोर होती गई।

बंटवारे का झटका, ‘फ्रेट इक्वलाइजेशन पॉलिसी’ जिसने खनिज आधारित उद्योगों में बंगाल की बढ़त खत्म कर दी और वाम शासन के दौरान उग्र मजदूर आंदोलन इन सबने गिरावट को लगातार बढ़ाया। 1960 में पश्चिम बंगाल भारत का तीसरा सबसे अमीर राज्य था। 2024 तक यह 24वें स्थान पर पहुँच गया।

ग्राफ (साभार: Finskeptics)

EAC-PM की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य का राष्ट्रीय GDP में हिस्सा 1960-61 के 10.5% से घटकर 2023-24 में सिर्फ 5.6% रह गया, यह किसी भी बड़े राज्य के लिए सबसे तेज गिरावट है। और भी चौंकाने वाली बात यह है कि प्रति व्यक्ति आय, जो कभी राष्ट्रीय औसत से 127.5% ज्यादा थी, अब घटकर 83.7% रह गई है।

ग्राफ (साभार: Finskeptics)

ओडिशा जैसे राज्य, जो कभी पीछे माने जाते थे, अब आगे निकल रहे हैं। इस लंबे पतन को अक्सर ‘बंगाल कर्स’ कहा जाता है, जो अलग-अलग सरकारों की नीतिगत गलतियों का जमा हुआ नतीजा है।

वर्तमान वित्तीय संकट: विकास की कीमत पर कल्याण

TMC सरकार के दौरान राज्य की वित्तीय स्थिति और नाजुक हो गई है। राज्य अब ऐसे चक्र में फंस गया है जहाँ वह रोजमर्रा के खर्च चलाने के लिए कर्ज ले रहा है, बजाय भविष्य के लिए संपत्ति बनाने के। राज्य का कर्ज 7.7 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा हो चुका है और राजकोषीय घाटा लगातार ऊँचा बना हुआ है।

कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च खासकर चुनावों के आसपास तेजी से बढ़ता है, लेकिन पूंजीगत निवेश पीछे रह जाता है। सरकार की कमाई का बड़ा हिस्सा पुराने कर्ज का ब्याज, वेतन और पेंशन में चला जाता है। इससे नई सड़कें, पुल और बिजली परियोजनाएँ बनाने के लिए बहुत कम पैसा बचता है, जो असल में निवेश और रोजगार लाते हैं।

मुख्य संकेतक इस असंतुलन को दिखाते हैं, राज्य की अपनी टैक्स आय की वृद्धि कमजोर है, क्रेडिट-डिपॉजिट रेशियो कम है और विदेशी निवेश भी सीमित है। MSME सेक्टर संख्या में बड़ा जरूर है, लेकिन ज्यादातर इकाइयाँ बहुत छोटी हैं और बड़े स्तर पर रोजगार देने में सक्षम नहीं हैं।

राजकोषीय और कर्ज का बढ़ता बोझ

2011 में जब TMC सत्ता में आई थी, तब राज्य का कर्ज लगभग 1.92 लाख करोड़ रुपए था। 2025-26 तक यह बढ़कर 7.7 लाख करोड़ रुपए होने का अनुमान है, यानी सिर्फ 15 साल में चार गुना। आज हर नागरिक पर औसतन करीब 70,653 रुपए का कर्ज है।

सरकार अपनी कमाई का 20% से 28% सिर्फ ब्याज चुकाने में खर्च कर रही है, जबकि दूसरे राज्यों में यह 5% से 15% के बीच होता है। सबसे बड़ी चिंता ‘रेवेन्यू डेफिसिट’ है। यानी राज्य कर्ज लेकर सब्सिडी और प्रशासनिक खर्च चला रहा है, न कि इंफ्रास्ट्रक्चर बना रहा है।

ग्राफ (साभार: Finskeptics)

वित्तीय वर्ष 2024-25 में राजकोषीय घाटा 4.02% तक पहुँच गया, जो सुरक्षित सीमा 3% से ज्यादा है। 2020 से 2025 के बीच राज्य ने 1.49 लाख करोड़ रुपए का राजस्व घाटा जमा किया। राज्य की पूंजीगत आय का 80% हिस्सा कर्ज से आ रहा है, यानी उधार पर सिस्टम चल रहा है।

औद्योगिक पलायन: क्यों जा रही हैं कंपनियाँ?

2011 के बाद से 6,600 से ज्यादा कंपनियाँ, जिनमें 110 सूचीबद्ध कंपनियाँ भी शामिल हैं, पश्चिम बंगाल छोड़ चुकी हैं। यह सिर्फ अस्थायी गिरावट नहीं, बल्कि पूंजी का स्थायी पलायन है। कंपनियाँ महाराष्ट्र, गुजरात और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में जा रही हैं, क्योंकि वहाँ का माहौल ज्यादा अनुकूल है।

चार्ट (साभार: Finskeptics)

राज्य में ‘बंगाल ग्लोबल बिजनेस समिट’ जैसे बड़े आयोजन होते हैं और बड़े निवेश के वादे किए जाते हैं, लेकिन जमीन पर केवल करीब 4% प्रस्ताव ही लागू हो पाते हैं। एक बड़ा कारण ‘सिंडिकेट सिस्टम’ है, जहाँ राजनीतिक समर्थन वाले समूह निर्माण सामग्री और मजदूरों पर नियंत्रण रखते हैं और ‘कट मनी’ माँगते हैं।

इसके अलावा ‘घेराव’ संस्कृति भी नए रूप में वापस आई है, जिससे TMC शासन में 177 फैक्ट्रियाँ बंद हुईं, जबकि पिछली सरकार में यह संख्या 83 थी। औद्योगिक उत्पादन भी घटकर 13.5% से सिर्फ 3.9% रह गया है।

श्रम और क्षेत्रीय संकट: पतन की मानवीय कीमत

आर्थिक संकट का असर सीधे लोगों की जिंदगी पर पड़ा है। रोजगार की कमी के कारण पश्चिम बंगाल अब देश के सबसे बड़े श्रम आपूर्तिकर्ता राज्यों में से एक बन गया है। 2025 तक करीब 22.4 लाख मजदूर राज्य से बाहर केरल, कर्नाटक और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में काम कर रहे हैं।

यह एक तरह से ‘खामोश जनमत’ है कि अगर राज्य में अवसर होते, तो लोग अपने घर छोड़कर बाहर काम करने नहीं जाते। उत्तर बंगाल के चाय बागानों में स्थिति बेहद गंभीर है। 2025 में उत्पादन 50-60% तक गिर गया और 80% बागान घाटे में हैं।

मजदूरी में भारी अंतर है, जहाँ सिक्किम में 500 रुपए रोज मिलते हैं, वहीं बंगाल में सिर्फ 250 रुपए मिलते हैं। इसका नतीजा कुपोषण और एनीमिया के रूप में सामने आया है। अलीपुरद्वार जिले में 36% मजदूर कुपोषित हैं और 88% एनीमिया से पीड़ित हैं। कुछ बंद बागानों में तो लोग भूख से मरने तक की स्थिति में पहुँच गए हैं।

व्यापक आर्थिक कमजोरी: बाकी राज्यों से पीछे

मैक्रो स्तर पर भी पश्चिम बंगाल पीछे रह गया है। राज्य का GDP में हिस्सा घट चुका है और प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से नीचे है। वित्तीय वर्ष 25 में राज्य की विकास दर सिर्फ 9.91% रही, जो बड़े राज्यों में सबसे कम है। क्रेडिट-डिपॉजिट रेशियो 46% से 52% के बीच है, जो राष्ट्रीय औसत से करीब 30% कम है।

इसका मतलब है कि यहाँ जमा पैसा दूसरे राज्यों में निवेश हो रहा है। MSME सेक्टर में 99.9% इकाइयाँ माइक्रो हैं यानी छोटे स्तर की, जो बड़े पैमाने पर रोजगार नहीं दे सकतीं। 2019 से 2024 के बीच 2,200 से ज्यादा MSMEs बंद हो चुके हैं। राज्य का खुद का टैक्स संग्रह भी कमजोर है और इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च 5.3% से घटकर सिर्फ 3% रह गया है।

इन सभी आँकड़ों से एक साफ और चिंताजनक तस्वीर सामने आती है। पश्चिम बंगाल एक उत्पादन आधारित अर्थव्यवस्था से हटकर निर्भरता आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है। यह औद्योगिक रोजगार से हटकर प्रवासी मजदूरों की कमाई पर निर्भर होता जा रहा है। राज्य का आर्थिक हिस्सा घट रहा है, फैक्ट्रियाँ बंद हो रही हैं और कर्ज बढ़ता जा रहा है।

आज की आर्थिक चुनौतियाँ किसी अस्थायी मंदी का परिणाम नहीं, बल्कि एक गहरे संरचनात्मक असंतुलन का नतीजा हैं। कल्याणकारी खर्च बढ़ाने के साथ उत्पादन, निवेश और उद्योग पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया, जिससे यह कमजोर आर्थिक मॉडल बन गया है। उच्च कर्ज, कम निवेश, उद्योगों का पलायन और बढ़ता प्रवासन, ये सभी उसी असंतुलन के जुड़े लक्षण हैं।

यह रिपोर्ट मूल रुप से अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

url- West Bengal economy witnessed massive decline under TMC government after 2011

समीर ने पकड़ा और रिजवान ने चाकू से धड़ाधड़ किए वार, अहमदाबाद में हिंदू युवक की पार्किंग विवाद में हत्या: गुस्साए लोगों ने की आगजनी-तोड़फोड़, पढ़ें- FIR की डिटेल्स

गुजरात के अहमदाबाद के धांधुका में शनिवार (18 अप्रैल 2026) को दो मुस्लिम युवकों ने एक हिंदू युवक धर्मेश भरवाड की हत्या कर दी। बताया जा रहा है कि यह विवाद बाइक पार्किंग की बात से शुरू हुआ और यह इतना बढ़ गया कि दोनों आरोपितों ने मिलकर धर्मेश पर चाकू से हमला कर दिया। घायल हालत में धर्मेश को तुरंत अस्पताल ले जाया गया लेकिन इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई।

इस घटना के बाद इलाके में तनाव फैल गया और स्थानीय हिंदू समुदाय के लोग आक्रामक हो गए। कुछ जगहों पर दुकानों में तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाएँ भी हुईं। स्थिति को संभालने के लिए पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की और धांधुका में भारी पुलिस बल तैनात किया गया। अहमदाबाद ग्रामीण के SP समेत कई वरिष्ठ अधिकारी भी मौके पर पहुँचे और हालात को नियंत्रण में किया।

मृतक धर्मेश के चचेरे भाई राहुल भरवाड ने इस मामले में धांधुका पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई। इसी शिकायत के आधार पर पुलिस ने FIR दर्ज की। FIR की एक कॉपी ऑपइंडिया के पास भी मौजूद बताई जा रही है।

पुलिस ने जाँच के दौरान आरोपित की पहचान रिजवान निजाम मनियार और समीर मोहम्मद अमदानी के रूप में की और दोनों को कुछ ही घंटों में गिरफ्तार कर लिया गया। फिलहाल पुलिस दोनों से पूछताछ कर रही है।

घटना के बारे में जानकारी देते हुए बताया गया कि शनिवार (18 अप्रैल 2026) को धर्मेश ने अपने चचेरे भाई राहुल से कहा था कि वह एक रिश्तेदार का हाल-चाल जानने जा रहे हैं और राहुल को भी साथ चलने के लिए कहा। इसके साथ ही उन्होंने राहुल से एक बाइक लाने को भी कहा था।

इसके बाद राहुल रणपुर चौराहे पर पहुँचे, जहाँ उनकी मुलाकात धर्मेश से हुई। इसी दौरान धर्मेश ने राहुल की बाइक यह कहकर ले ली कि वह बैंक जा रहे हैं और बाइक बैंक के पास खड़ी कर दी।

इसी बात को लेकर आरोपित रिजवान और समीर ने धर्मेश से झगड़ा शुरू कर दिया और उन्हें धमकी भी दी। हालाँकि, धर्मेश ने उनकी बात को नजरअंदाज कर दिया और राहुल को फोन करके बताया कि वह अपने रिश्तेदार के घर जा रहे हैं।

गाड़ी के पास खड़े होकर आरोपित ने किया हमला

धर्मेश और राहुल बैंक में अपना काम पूरा करने के बाद अपने रिश्तेदार के घर जाने के लिए अलग-अलग बाइकों से निकले थे। जैसे ही वे नसीब सोसाइटी के पास पहुँचे, तभी दोनों आरोपितों ने उनका रास्ता रोक लिया और धर्मेश को गालियाँ देने लगे। जब धर्मेश और राहुल ने उन्हें समझाने की कोशिश की तो बात और बढ़ गई। आरोपित ने हमला करते हुए धर्मेश को पकड़ लिया और कहा, “बैंक में क्या बात कर रहे थे, आज तो तुम्हें खत्म करना ही होगा।”

शिकायत में राहुल ने बताया कि समीर मोहम्मद ने धर्मेश को पकड़ रखा था जबकि रिजवान ने चाकू से उस पर वार किया। राहुल ने बीच-बचाव करने की कोशिश की लेकिन तब तक धर्मेश पर कई वार किए जा चुके थे और वह गंभीर रूप से घायल हो चुका था।

हमले के बाद दोनों आरोपित मौके से फरार हो गए। उधर घायल धर्मेश को तुरंत अस्पताल ले जाया गया लेकिन उसकी हालत बहुत गंभीर थी। इलाज के दौरान डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। शिकायत के मुताबिक, अस्पताल ले जाते समय धर्मेश ने खुद हमलावरों के नाम रिजवान और समीर बताए थे।

राहुल की शिकायत के आधार पर पुलिस ने आरोपित रिजवान निजाम मनियार और समीर मोहम्मद अमदानी के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 103(1), 351(3), 352 और 54 के साथ-साथ गुजरात पुलिस अधिनियम की धारा 135 के तहत मामला दर्ज किया है। पुलिस ने इस घटना को एक सोची-समझी आपराधिक साजिश मानते हुए जाँच शुरू कर दी है।

ओपइंडिया से बातचीत में मृतक धर्मेश के भाई और शिकायतकर्ता राहुल ने बताया कि आरोपितों ने मामूली विवाद को लेकर धर्मेश पर धारदार हथियार से हमला किया। उन्होंने यह भी कहा कि आरोपित कहते हुए गए “आज इसे जिंदा नहीं छोड़ेंगे, इसे मार डालो।” राहुल ने बताया कि उसने अपने भाई को बचाने की पूरी कोशिश की लेकिन आरोपितों ने उसे पकड़ लिया, जिससे वह धर्मेश को बचा नहीं सका।

SIT का गठन करेगी पुलिस

इस पूरे मामले को लेकर अहमदाबाद ग्रामीण के एसपी ओम प्रकाश जाट ने बताया कि उन्होंने पीड़ित परिवार से मुलाकात की है और परिवार के लोगों ने अब तक की पुलिस कार्रवाई पर संतोष जताया है। उन्होंने कहा कि मृतक के परिवार ने मामले में सख्त कार्रवाई और विस्तृत जाँच की माँग की है।

एसपी ने आगे कहा, “परिवार की माँग को ध्यान में रखते हुए हम अपने वरिष्ठ अधिकारियों और सरकार से चर्चा करने के बाद इस मामले की जाँच के लिए एक विशेष जाँच समिति (SIT) का गठन करेंगे।” इसके साथ ही उन्होंने यह भी आश्वासन दिया कि मामले की पैरवी मजबूत तरीके से हो सके, इसके लिए एक विशेष लोक अभियोजक की नियुक्ति की सिफारिश भी की जाएगी।


इसके अलावा जिला पुलिस प्रमुख ने जानकारी दी कि अब इलाके की सभी दुकानें खुल चुकी हैं और स्थिति पूरी तरह शांत है। पुलिस ने उसी रात से इलाके में तलाशी अभियान शुरू कर दिया था और संदिग्ध लोगों से पूछताछ भी की जा रही थी।

घटना का संक्षिप्त विवरण देते हुए पुलिस अधिकारी ने बताया कि बाइक को लेकर हुए विवाद के बाद रिजवान और समीर नाम के दो लोगों ने एक चरवाहे युवक पर हमला किया। इस दौरान हुई हाथापाई में युवक की मौत हो गई। पुलिस का कहना है कि मामले की गहराई से जाँच की जा रही है और आरोपितों की गिरफ्तारी के बाद आगे की कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई है।

गौरतलब है कि इसी क्षेत्र में साल 2022 में भी एक ऐसी ही घटना सामने आई थी, जब किशन भरवाड़ नाम के एक हिंदू युवक की कथित तौर पर भगवान कृष्ण की तस्वीर पोस्ट करने के कारण हत्या कर दी गई थी। दिनदहाड़े उसे गोली मार दी गई थी, जिससे पूरे इलाके में सनसनी फैल गई थी। बाद में इस मामले में एक मौलवी समेत कई आरोपितों को गिरफ्तार किया गया था।

किशन भरवाड़ की उस घटना को स्थानीय लोग अब तक भूल नहीं पाए थे और जब इस तरह की एक और वारदात सामने आई तो लोगों में आक्रोश बढ़ गया। हालाँकि, फिलहाल पुलिस की कार्रवाई के बाद इलाके में स्थिति शांत बताई जा रही है।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट गुजराती में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

अब महिला आरक्षण, परिसीमन और मुस्लिम कोटा पर दूर होंगे सारे कन्फ्यूजन: सरकार ने जारी किए FAQ

लोकसभा में महिलाओं को 33% आरक्षण देने वाला बिल पास नहीं हो सका जिसके बाद राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है। एक तरफ इसे महिलाओं के अधिकारों के लिए बड़ा कदम माना जा रहा था तो वहीं दूसरी तरफ विपक्ष ने सरकार पर आरोप लगाया कि वह इसके जरिए परिसीमन और सीटों के बँटवारे को अपने तरीके से आगे बढ़ाना चाहती है।

इन सवालों और आरोपों के बीच केंद्र सरकार ने 14 सवालों का एक FAQ जारी कर अपनी स्थिति साफ की है। इसमें सरकार ने आसान भाषा में बताया है कि महिला आरक्षण, परिसीमन और लोकसभा सीटों को लेकर उसकी क्या योजना है और कदम उठाए जाएँगे।

सवाल: 16 अप्रैल, 2026 को केंद्र सरकार ने लोकसभा में कौन से बिल पेश किए?

जवाब: 16 अप्रैल को केंद्र सरकार ने लोकसभा में तीन खास बिल पेश किए। इनमें संविधान (131वां संशोधन) बिल, 2026, डिलिमिटेशन बिल, 2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) बिल, 2026 शामिल हैं।

सवाल: केंद्र सरकार की ओर से ये तीनों विधेयक सदन ने अभी क्यों लाए गए?

जवाब: ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (महिला आरक्षण कानून) में यह कहा गया है कि महिलाओं के लिए आरक्षण जनगणना के बाद होने वाली परिसीमन प्रक्रिया के आधार पर लागू किया जाएगा, जो 2026 के बाद होगी। अगर सरकार जनगणना और उसके बाद होने वाले परिसीमन का इंतजार करती तो महिलाओं को 33% आरक्षण का फायदा 2029 के लोकसभा चुनाव में भी नहीं मिल पाता क्योंकि जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने में काफी समय लगता है। इसी वजह से महिलाओं को समय पर इसका फायदा मिल सके इसके लिए यह जरूरी समझा गया कि इस कानून को लागू करने को इस शर्त से अलग कर दिया जाए।

सवाल: अगर ये बिल पास हो जाते तो देश की महिलाओं को क्या फायदा होता?

जवाब: अगर ये बिल पास होकर लागू हो जाते तो महिलाओं को 33% आरक्षण का फायदा 2029 के लोकसभा चुनाव से ही मिल सकता था। जिसका वो दशकों से इंतजार कर रही हैं।

सवाल: नारी शक्ति वंदन अधिनियम के साथ परिसीमन (delimitation) को क्यों जोड़ा गया और सीटें बढ़ाने की बात क्यों हुई?

जवाब: परिसीमन का मतलब होता है किसी चुनाव क्षेत्र (constituency) की सीमाएँ तय करना। महिलाओं के आरक्षण को प्रभावी रूप से लागू करने के लिए यह जरूरी होता। लोकसभा में सीटों की अधिकतम संख्या 1976 में 550 तय की गई थी। उस समय (1971 में) भारत की आबादी करीब 54 करोड़ थी जबकि आज यह लगभग 140 करोड़ हो चुकी है। इसलिए यह जरूरी माना गया कि लोकसभा की सीटें बढ़ाकर करीब 850 की जाएँ ताकि संसद में लोगों का सही और बराबर प्रतिनिधित्व हो सके।

सवाल: क्या परिसीमन आयोग के कानून में राजनीतिक फायदे के लिए कोई बदलाव करने की कोशिश हुई? क्या चल रहे चुनावों पर इसका असर पड़ेगा?

जवाब: नहीं, परिसीमन आयोग के कानून में कोई बदलाव करने का प्रस्ताव नहीं था। अभी जो कानूनी व्यवस्था है, वही लागू रहेगी। आयोग की कोई भी सिफारिश संसद की मंजूरी और राष्ट्रपति की सहमति के बाद ही लागू होगी। और जो चुनाव अभी चल रहे हैं, जैसे तमिलनाडु या पश्चिम बंगाल में तो उन पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। 2029 तक के सभी चुनाव मौजूदा व्यवस्था के अनुसार ही होंगे।

सवाल: लोकसभा की सीटें 850 तक बढ़ाने के पीछे क्या सोच थी?

जवाब: इस प्रस्ताव के पीछे यह विचार था कि सीटों को एक समान तरीके से बढ़ाया जाए। यानी सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (UTs) के लिए 50% सीटें बढ़ाई जाएँ ताकि सबका अनुपात बना रहे। अभी लोकसभा में 543 सीटें हैं। अगर इसमें 50% बढ़ोतरी की जाए तो यह करीब 815 सीटें हो जाती हैं। इसी आधार पर अधिकतम सीमा (cap) को 550 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव रखा गया।

सवाल: क्या नए परिसीमन से दक्षिण भारत या छोटे राज्यों को नुकसान होता?

जवाब: नहीं, ऐसा नहीं होता। सभी राज्यों में एक समान 50% सीटें बढ़ाई जातीं इसलिए किसी का हिस्सा कम नहीं होता। दक्षिणी राज्यों का प्रतिनिधित्व घटने के बजाय लगभग वही बना रहता। उदाहरण के तौर पर:

  • तमिलनाडु की सीटें 39 से बढ़कर 59 हो जातीं
  • कर्नाटक की 28 से बढ़कर 42
  • आंध्र प्रदेश की 25 से बढ़कर 38
  • तेलंगाना की 17 से बढ़कर 26
  • केरल की 20 से बढ़कर 30

इन पाँचों दक्षिणी राज्यों की कुल सीटें 129 से बढ़कर 195 हो जातीं। अभी लोकसभा में दक्षिणी राज्यों की हिस्सेदारी 23.76% है जो बढ़कर करीब 23.87% हो जाती यानी लगभग बराबर ही रहती।

सवाल: जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण किया है, क्या उन्हें नुकसान होता?

जवाब: नहीं, उन्हें कोई नुकसान नहीं होता। क्योंकि सीटें सभी राज्यों में एक समान अनुपात में बढ़ाई जा रही थीं और इसलिए उनका प्रतिनिधित्व या तो वैसा ही रहता या थोड़ा बेहतर हो जाता।

सवाल: क्या अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के प्रतिनिधित्व पर असर पड़ता?

जवाब: नहीं, परिसीमन की प्रक्रिया में SC और ST के लिए आरक्षित सीटें भी उनके अनुपात के हिसाब से तय होती हैं। जब कुल सीटें बढ़तीं तो उनके लिए आरक्षित सीटों की संख्या भी बढ़ती जिससे उनका प्रतिनिधित्व और मजबूत होता।

सवाल: क्या यह संवैधानिक संशोधन बिल जाति जनगणना को टालने के लिए लाया गया था?

जवाब: नहीं, ऐसा नहीं है। सरकार पहले ही जाति जनगणना के लिए तय समय के अंदर पूरा होने वाला कार्यक्रम शुरू कर चुकी है। इसमें लोगों की गिनती के दौरान उनकी जाति से जुड़ी जानकारी भी दर्ज की जाएगी।

सवाल: आरक्षण में मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग से कोटा क्यों नहीं रखा गया?

जवाब: भारत का संविधान धर्म के आधार पर आरक्षण देने की अनुमति नहीं देता। यहाँ आरक्षण सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर दिया जाता है जैसा कि संविधान में तय किया गया है।

सवाल: महिलाओं का आरक्षण 2024 के लोकसभा चुनाव में ही क्यों लागू नहीं किया गया?

जवाब: आरक्षण लागू करने के लिए पहले परिसीमन जरूरी होता है। परिसीमन एक लंबी और विस्तार से चलने वाली प्रक्रिया है, जिसे पूरा होने में लगभग 2 साल लगते हैं। इसी वजह से महिलाओं के आरक्षण को लागू करने के लिए ये बिल (जिसमें परिसीमन से जुड़ा बिल भी शामिल है) संसद में लाए गए।

सवाल: जब तुरंत लागू नहीं करना था, तो 2023 में महिला आरक्षण बिल क्यों लाया गया?

जवाब: यह बिल 2023 में इसलिए लाया और पास किया गया, ताकि महिलाओं के आरक्षण के लिए कानूनी और संवैधानिक ढांचा तैयार किया जा सके। इसे सभी दलों का समर्थन मिला जिससे ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को लागू करने का रास्ता साफ हुआ।

सवाल: केंद्र शासित प्रदेशों (Union Territories) के लिए अलग बिल की जरूरत क्यों पड़ी?

जवाब: जम्मू-कश्मीर, दिल्ली और पुडुचेरी जैसे केंद्र शासित प्रदेशों की विधानसभाएँ अलग-अलग कानूनों के तहत चलती हैं। इसलिए वहाँ महिलाओं के आरक्षण को लागू करने के लिए अलग से संशोधन करने पड़े जिसके लिए एक अलग बिल लाना जरूरी था।

नासिक कांड वाली निदा खान HR मैनेजर नहीं, प्रोसेस एसोसिएट: जानिए TCS में क्या थी उसकी भूमिका, कैसे कंपनी के बयान पर वामी-इस्लामी गैंग कर रहा प्रोपेगेंडा

टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) ने कंपनी के नासिक दफ्तर में हिंदू युवतियों के शोषण और धर्मांतरण से जुड़े मामले में शुक्रवार (17 अप्रैल 2026) को एक आधिकारिक बयान जारी किया। कंपनी ने अपने बयान में साफ किया कि मीडिया रिपोर्ट्स में जिस निदा खान को HR मैनेजर बताया जा रहा है वह वास्तव में इस पद पर नहीं थीं।

कंपनी के अनुसार, निदा खान एक प्रोसेस एसोसिएट के पद पर कार्यरत थी और उसके पास किसी भी तरह की भर्ती या नेतृत्व से जुड़ी जिम्मेदारी नहीं थी। TCS ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उन्हें बार-बार एचआर मैनेजर के रूप में पेश किया जाना गलत है।

TCS के बयान में कहा गया, “निदा खान जिनका नाम मीडिया में बार-बार TCS के HR मैनेजर के रूप में लिया जा रहा है, न तो HR मैनेजर हैं और न ही भर्ती प्रक्रिया से उनका कोई संबंध है। वह एक प्रोसेस एसोसिएट के तौर पर कार्यरत थीं और उनके पास कोई नेतृत्व वाली जिम्मेदारी नहीं थी।”

कंपनी ने यह बयान नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) को भी सौंपा और इसे सोशल मीडिया X पर भी शेयर किया। साथ ही, TCS ने यह भी बताया कि आंतरिक जाँच पूरी होने तक निदा खान को सस्पेंड कर दिया गया है।

इस बीच, कई मीडिया संस्थानों और वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोगों ने TCS के इस बयान का हवाला देते हुए निदा खान की भूमिका को कमतर दिखाने की कोशिश की। खुद को फैक्ट-चेकर बताने वाले और Alt News के मोहम्मद जुबैर ने भी TCS के स्पष्टीकरण के बाद एक अभियान चलाया। उन्होंने उन सभी मीडिया संस्थानों और पोर्टलों को निशाना बनाया जिन्होंने अपनी रिपोर्ट्स में निदा खान को HR मैनेजर बताया था।

Alt News ने एक विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की जिसमें OpIndia समेत कई मीडिया संस्थानों को निशाना बनाया गया। हालाँकि, इस लेख में HR ढाँचे में प्रोसेस एसोसिएट की भूमिका क्या होती है तो इसका कोई विवरण नहीं दिया गया।

साभार: ऑल्ट न्यूज

कई सोशल मीडिया यूजर्स ने भी इसी तरह का अभियान चलाया और मीडिया संस्थानों को निशाना बनाया क्योंकि उन्होंने निदा खान को HR मैनेजर बताया था। हालाँकि, इन लोगों ने भी प्रोसेस एसोसिएट की भूमिका क्या होती है इस बारे में कोई विस्तार से जानकारी नहीं दी।

साभार: X

HR में प्रोसेस एसोसिएट क्या होता है?

TCS ने साफ कर दिया है कि निदा खान HR मैनेजर नहीं थीं लेकिन कंपनी ने यह नहीं बताया कि HR विभाग में प्रोसेस एसोसिएट की भूमिका क्या होती है। यह जॉब प्रोफाइल (जिसे कंपनी के अनुसार निदा खान संभाल रही थीं) उसे समझना जरूरी है ताकि यह जाना जा सके कि बड़ी कंपनियों में इस पद पर काम करने वाले कर्मचारियों की जिम्मेदारियाँ क्या होती हैं।

प्रोसेस एसोसिएट कोई लीडरशिप वाला पद नहीं होता लेकिन HR विभाग में इस पद पर काम करने वाला कर्मचारी रोजमर्रा के कामों और बैकएंड प्रक्रियाओं को संभालता है। यह भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण होती है क्योंकि इसके जरिए कंपनी के सिस्टम, डॉक्यूमेंट और कर्मचारियों से जुड़े काम सही तरीके से चलते रहते हैं।

प्रोसेस एसोसिएट का एक मुख्य काम कर्मचारियों के डॉक्यूमेंट्स को संभालना होता है। इसमें पहचान पत्र की जाँच करना, बैकग्राउंड वेरिफिकेशन कराना और यह सुनिश्चित करना शामिल होता है कि जॉइनिंग से पहले सभी जरूरी कागजात पूरे हों।

इसके अलावा, वह NDA (गोपनीयता समझौता), कंपनी की नीतियाँ और नौकरी के कॉन्ट्रैक्ट जैसे दस्तावेज़ों को प्रोसेस करके रिकॉर्ड में रखता है। यह काम बड़ी कंपनियों में बहुत जरूरी होता है ताकि सभी नियमों का पालन सही तरीके से हो सके।

प्रोसेस एसोसिएट HR सिस्टम में कर्मचारियों की जानकारी को अपडेट और मेंटेन करता है। इसमें सही डेटा दर्ज करना, उसे समय-समय पर अपडेट करना और डेटाबेस को संभालना शामिल है। इस काम में बहुत सावधानी की जरूरत होती है क्योंकि छोटी गलती भी सैलरी, नियमों के पालन (कम्प्लायंस) और रिपोर्टिंग पर असर डाल सकती है।

कई कंपनियों में प्रोसेस एसोसिएट ही कर्मचारियों के लिए पहला संपर्क होता है, खासकर जब उन्हें HR से जुड़ी कोई समस्या होती है। यह कर्मचारी शिकायतें दर्ज करता है, सामान्य सवालों के जवाब देता है और जरूरत पड़ने पर मामले को सीनियर HR या संबंधित कमेटी (जैसे POSH) तक पहुँचाता है। हालाँकि, उसके पास बड़े फैसले लेने का अधिकार नहीं होता लेकिन वह कर्मचारियों और HR टीम के बीच ब्रिज का काम करता है।

प्रोसेस एसोसिएट रिपोर्ट बनाने में मदद करता है, रोजमर्रा के HR कामों को संभालता है और नियमों से जुड़े कार्यों में मदद करता है। साथ ही, वह कर्मचारियों के वेतन, कंपनी की नीतियों और HR प्रक्रियाओं से जुड़े सवालों का जवाब देता है। भले ही वह खुद नीतियाँ नहीं बनाता लेकिन उन्हें समझाकर कर्मचारियों तक पहुँचाता है और उनकी समस्याओं का समाधान कराने में मदद करता है।

भूमिका सिर्फ काम करने तक सीमित, फैसले लेने की नहीं

प्रोसेस एसोसिएट की भूमिका मुख्य रूप से काम को लागू करने (एक्जीक्यूशन) तक सीमित होती है। इसमें प्रोसेस करना, जाँच करना, डेटा अपडेट करना और जरूरत पड़ने पर मामलों को आगे बढ़ाना शामिल होता है, न कि कोई बड़े फैसले लेना या टीम का नेतृत्व करना। हालाँकि, TCS ने अपने बयान में जो कहा है वह सही हो सकता है, लेकिन सिर्फ यह कहकर कि निदा खान प्रोसेस एसोसिएट थीं, उनकी HR फ्रेमवर्क में भूमिका को पूरी तरह नकार देना भी सही नहीं होगा।

इस मामले में जाँच जारी है और बताया जा रहा है कि निदा खान फिलहाल फरार हैं। ऐसे में पुलिस अभी तक उनसे पूछताछ नहीं कर पाई है कि कंपनी में उनकी भूमिका क्या थी और उनके खिलाफ दर्ज FIR से जुड़े विवाद में उनकी क्या भूमिका रही।

सरकारी कर्मचारियों को नहीं मिल रहा वेतन, फ्री स्कीम्स में ₹6000 करोड़ का आवंटन: समझें- कॉन्ग्रेस सरकार की ‘रेवड़ियों’ से कैसे बैठा कर्नाटक के खजाने का भट्ठा

कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने मुफ्त रेवड़ियों के वादे किए, लेकिन सत्ता में आने के दो साल बाद भी यह बोझ आम आदमी की झेल रहा है। सरकारी कर्मचारियों का वेतन लटका हुआ है। हालात यह है कि लाखों कर्मचारी अप्रैल का आधा महीना गुजरने के बाद भी मार्च 2026 के वेतन का इंतजार कर रहे हैं।

मामला सीधे तौर पर राज्य के करीब 6 लाख कर्मचारियों से जुड़ा है, जिन्हें हर महीने की तरह अप्रैल के पहले हफ्ते में वेतन मिल जाना चाहिए था। लेकिन इस बार 10 अप्रैल तक भी बड़ी संख्या में कर्मचारियों को सैलरी नहीं मिली।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह समस्या एक-दो विभाग तक सीमित नहीं है। शिक्षा, राजस्व, पुलिस, स्वास्थ्य और अन्य विभागों के कर्मचारी इस देरी से प्रभावित हुए हैं। यानी पूरा प्रशासनिक ढाँचा ही इसकी चपेट में आ गया है।

सरकारी कर्मचारियों को वेतन न मिलने की वजह?

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, इस देरी की दो बड़ी वजहें सामने आ रही हैं। पहली- फंड की कमी और दूसरी- ट्रेजरी और प्रोसेसिंग सिस्टम से जुड़ी तकनीकी दिक्कतें। अधिकारियों का कहना है कि वित्तीय वर्ष खत्म होने के समय भुगतान का दबाव बढ़ जाता है, जिससे देरी हो जाती है।

लेकिन मामला यहीं खत्म नहीं होता। राज्य की कॉन्ग्रेस सरकार पर पर आरोप सामने आए हैं कि सरकार ने करीब ₹6000 करोड़ की रकम अपनी गारंटी स्कीम्स, खासकर ‘गृहलक्ष्मी योजना’ की ओर डायवर्ट की है, जिससे वेतन भुगतान पर असर पड़ा।

वहीं राज्य के वित्तीय विभाग के अधिकारियों से एक और अहम बात सामने आई है। कई जगह ड्रॉइंग एंड डिस्बर्सिंग ऑफिसर (DDOs) ने समय पर बिल प्रोसेस नहीं किए, जिसकी वजह से भुगतान और अटक गया। यानी समस्या सिर्फ पैसे की नहीं, बल्कि प्रशासनिक ढिलाई की भी है।

वेतन में देरी का असर?

हालाँकि, कर्मचारी संगठनों का कहना है कि हर साल मार्च-अप्रैल के दौरान 2-3 दिन की देरी सामान्य मानी जाती है, लेकिन इस बार 10 दिन से ज्यादा देरी हो चुकी है, जो असामान्य है। यही वजह है कि कर्मचारियों में नाराजगी बढ़ रही है।

जमीनी स्तर पर इसका सीधा असर दिख रहा है। कर्मचारियों का कहना है कि सैलरी न मिलने से EMI, बच्चों की फीस, किराया और रोजमर्रा के खर्च प्रभावित हो रहे हैं। कई लोगों को उधार लेने की नौबत आ गई है।

कुल मिलाकर, यह सिर्फ वेतन में देरी का मामला नहीं है, बल्कि राज्य की वित्तीय स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। एक तरफ सरकार की गारंटी योजनाओं पर हजारों करोड़ रुपए खर्च हो रहे हैं, दूसरी तरफ 6 लाख कर्मचारियों की सैलरी समय पर नहीं देना प्रशासनिक और आर्थिक दोनों मोर्चों पर चिंता बढ़ाने वाला संकेत है।

राज्य में जीत को कॉन्ग्रेस ने किए थे ‘रेवड़ी’ वादे

2023 में विधानसभा चुनाव जीतने के लिए कॉन्ग्रेस ने पाँच गारंटी दी थी। इन्हें ‘रेवड़ी’ कहा गया था। कॉन्ग्रेस ने 2023 विधानसभा चुनाव में वादा किया था कि सत्ता में आने पर वह हर घर को 200 यूनिट मुफ्त बिजली देगी। इसे गृह ज्योति योजना का नाम दिया गया था। इसके अलावा गृह लक्ष्मी नाम की योजना का भी एक वादा किया गया था। इसके अंतर्गत कॉन्ग्रेस ने वादा किया था कि वह राज्य की महिलाओं को ₹2000 प्रतिमाह देगी।

कॉन्ग्रेस ने कर्नाटक की आर्थिक स्थिति और मुफ्त सुविधाओं के वादों से अर्थव्यस्था पर पड़ने वाले बोझ को दरकिनार करते हुए हर परिवार को 10 किलो अनाज देने का भी वादा किया था, इसे अन्न भाग्य योजना का नाम दिया गया था। कॉन्ग्रेस ने राज्य में महिलाओं को मुफ्त बस यात्रा का भी वादा किया था। इसके अलावा राज्य के बेरोजगार युवाओं को भी ₹1500 देने की बात कही गई थी। इनमें से कुछ योजनाएँ पूरी तरह से लागू कर दी गई हैं तो कुछ को आंशिक रूप से लागू किया गया है।

कॉन्ग्रेस के इन ‘रेवड़ी’ वादों का असर अब राज्य के खजाने पर दिख रहा है और वह राजस्व बढ़ाने के लिए नई-नई जुगत भिड़ा रही है। वह राज्य की आम जनता को अब नए कर और बढ़े करों से लादना चाह रही है। साथ ही वह कमाई के नए जुगाड़ भी लगा रही है। सरकारी कर्मचारियों का लटका वेतन भी इसी का असर है।

डीजल-पेट्रोल के बाद पानी और बसों के किराए बढ़ाने की तैयारी

इससे पहले भी कॉन्ग्रेस सरकार ने अपना खजाना भरने के लिए जनता पर बोझ डाला है। राज्य सरकार ने पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ाए थे। कॉन्ग्रेस सरकार ने राज्य में पेट्रोल और डीजल पर सेल्स टैक्स बढ़ाया था। इसके अंतर्गत पेट्रोल और डीजल के दाम राज्य क्रमशः ₹3 और ₹3.50 बढ़ गए थे। इसको लेकर कॉन्ग्रेस सरकार की खूब आलोचना हुई थी। यह निर्णय लोकसभा चुनाव के आने के तुरंत बाद लिया गया था।

पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ाने से भी कॉन्ग्रेस सरकार का खजाना पूरा नहीं पड़ा कि फिर कॉन्ग्रेस सरकार में उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने बेंगलुरु में पानी आपूर्ति के दाम बढ़ाने का ऐलान कर दिया था। उपमुख्यमंत्री शिवकुमार का दावा है कि बेंगलुरु का जल आपूर्ति विभाग अपना बिजली का बिल और कर्मचारियों की तन्ख्वाह तक नहीं दे पा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया कि कावेरी नदी से पानी लेने वाले बाशिंदों के लिए पानी की कीमतें 40% बढ़ाए जाने की तैयारी की।

भारत के इतिहास में याद रखा जाएगा 131वाँ संविधान संशोधन विधेयक, इसके विरोध में एक हुईं महिला विरोधी पार्टियाँ: पढ़ें कैसे एक्सपोज हुए कॉन्ग्रेस-सपा-DMK-TMC

17 अप्रैल 2026 को भारत के संसदीय इतिहास में याद रखा जाएगा। देश के चुनावी ढाँचे में अहम बदलाव करने के लिए लाए गए 3 संविधान संशोधन बिल को विपक्ष ने पारित नहीं होने दिया। महिलाओं के लिहाज से नारी शक्ति वंदन अधिनियम अहम था। अगर यह पारित हो जाता और कानून का रूप अख्तियार कर लेता तो 2029 का लोकसभा चुनाव का परिदृश्य ही बदल जाता।

विधेयक के पक्ष में 278 वोट और विरोध में 211 वोट पड़े। इस दौरान 489 सदस्य उपस्थित थे और सभी ने मतदान किया। संविधान के अनुच्छेद 368 के तहत किसी भी संवैधानिक संशोधन के लिए, उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन जरूरी है।

यह वोट केंद्र सरकार द्वारा संविधान (106वाँ संशोधन) अधिनियम, 2023 को अधिसूचित किए जाने के एक दिन बाद हुआ। इस अधिनियम के तहत 16 अप्रैल से लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान करने वाला कानून लागू हो गया है।

केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने इसके साथ जुड़े परिसीमन विधेयक 2026 और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक 2026 को वापस लेने का प्रस्ताव रखा। ये विधेयक 131वें संशोधन से जुड़े हुए थे। सीटों की सीमा और जनगणना के मानदंडों में बदलाव करने का संवैधानिक अधिकार न होने के कारण, ये सहायक विधेयक कानूनी रूप से टिकने लायक नहीं रह गए थे।

यह सरकार की योजनाओं के लिए एक बड़ा झटका है। लोकसभा सीटों में बढ़ोतरी को रोक दिया गया है और इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इसने महिला आरक्षण अधिनियम के कार्यान्वयन को अनिश्चितता के अँधेरे में डाल दिया गया है।

131वाँ संशोधन विधेयक क्या है?

131वाँ संशोधन विधेयक मूल रूप से भारत के चुनावों के स्वरूप को पूरी तरह से बदलने की एक योजना थी। लोकसभा में सीटों की संख्या 1971 की जनगणना के आधार पर तय की गई थी, जो आज भी जारी है। यह विधेयक के पारित होने से लोकसभा में सीटों की अधिकतम संख्या को 550 से बढ़ाकर 850 हो जाता।

इनमें से 815 सीटें राज्यों से और 35 सीटें केंद्र शासित प्रदेशों से आती। दरअसल यह उस सिद्धांत का समर्थन करता है, जिसमें प्रत्येक राज्य को उसकी वास्तविक जनसंख्या के अनुपात में सीटें मिलने की बात कही गई है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि देश भर में प्रत्येक नागरिक के वोट का महत्व लगभग समान हो।

केवल सीटें जोड़ने के अलावा, इस विधेयक ने संसद को यह तय करने की शक्ति मिल जाती कि अगला ‘परिसीमन’ (निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को फिर से निर्धारित करने की प्रक्रिया) कब होगा और किस जनगणना का उपयोग किया जाएगा। इसके साथ आया परिसीमन विधेयक यह स्पष्ट करता था कि वे इस चरण के लिए 2011 की जनगणना का उपयोग करेंगे।

आम नागरिक के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि इस विधेयक को उन तकनीकी बाधाओं को दूर करने के लिए डिजाइन किया गया था, जो महिलाओं के लिए 33% आरक्षण को रोक रही थीं। इसने आरक्षण की शुरुआत को “2023 के बाद की पहली जनगणना” की शर्त से अलग करने की माँग की, ताकि आरक्षण कानून को 2026-27 की जनगणना के परिणामों का इंतजार किए बिना लागू किया जा सके। इसका उद्देश्य तत्काल परिसीमन प्रक्रिया से जोड़कर महिलाओं को उनका हक दिलाना था।

नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023

नारी शक्ति वंदन अधिनियम या महिला आरक्षण विधेयक सितंबर 2023 में पारित किया गया था। उस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बारे में जानकारी दी थी कि कैसे 1996 से ही देरी हो रही थी। 2023 का यह कानून लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में सभी सीटों में से एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम था। इसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से जुड़ी महिलाओं के लिए एक उप-कोटा भी शामिल था, जिससे यह पक्का हो सके कि सत्ता के गलियारों में सबसे ज्यादा हाशिए पर पड़ी आवाजों को भी सुना जाए।

लेकिन, 2023 के उस कानून में एक अहम शर्त, अनुच्छेद 334A(1) जोड़ी गई थी। इसमें कहा गया था कि आरक्षण तभी लागू होगा, जब नई जनगणना हो जाएगी और सीटों के बँटवारे (परिसीमन) का काम पूरा हो जाएगा। चूँकि 2021 की जनगणना COVID-19 की वजह से टल गई थी और अब इसकी प्रक्रिया शुरू हो रही है जो 2027 तक पूरी होगी। इसलिए असल में आरक्षण मिलना 2029 के चुनावों या उसके बाद की ही बात लग रही थी।

131वाँ संशोधन सरकार की इस प्रक्रिया को तेजी से आगे बढ़ाने की एक कोशिश थी। यह एक ऐसा जरूरी बिल था, जो इस रास्ते को साफ कर देता। 131वाँ संशोधन पास न होने देने से, 2023 के कानून के तहत महिला आरक्षण 2034 से पहले लागू नहीं हो पाएगा, क्योंकि इसे 2027 की जनगणना के बाद परिसीमन प्रक्रिया पूरी होने से जोड़ा गया था।

परिसीमन बिल

इसी तरह, 2026 का प्रस्तावित परिसीमन बिल 131वें संशोधन का ही सीधा नतीजा था। परिसीमन वह प्रक्रिया है, जिसमें सीटों की सीमाएँ फिर से तय की जाती हैं, ताकि हर सांसद लगभग बराबर लोगों की नुमाइंदगी कर सके। अभी राज्यों को सीटों का बँटवारा 1971 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर ही तय है। ऐसा इसलिए किया गया है, ताकि उन राज्यों को नुकसान न हो, जिन्होंने आबादी पर काबू पाने के उपायों को कामयाबी से लागू किया है। लेकिन, 131वें संशोधन का मकसद इस रोक को हटाना था, ताकि भारत की आज की आबादी की असलियत को सीटों के बँटवारे में दिखाया जा सके।

परिसीमन बिल के तहत एक आयोग बनाया जाता, जिसकी अगुवाई सुप्रीम कोर्ट का कोई जज करता। यह आयोग हाल ही में जारी हुए आँकड़ों के आधार पर सीटों की सीमाएँ फिर से तय करता। महिलाओं को नुमाइंदगी देने के लिए यह प्रक्रिया बहुत जरूरी है, क्योंकि कानून के मुताबिक कुछ खास ‘आरक्षित’ सीटों की पहचान करना जरूरी है और यह काम सिर्फ परिसीमन की प्रक्रिया द्वारा ही पूरा किया जा सकता है।

संवैधानिक संशोधन के खिलाफ वोट देकर विपक्ष ने न सिर्फ सीटों की संख्या बढ़ाने का काम रोक दिया है, बल्कि सीटों की सीमाएँ फिर से तय करने का काम भी अटका दिया है। इसी प्रक्रिया के तहत 33% सीटें खास तौर पर महिलाओं के लिए तय की जानी थीं।

विपक्ष का तर्क था कि 2011 की जनगणना के आँकड़ों का इस्तेमाल करने से दक्षिण और उत्तर-पूर्वी राज्यों को नुकसान होगा, क्योंकि इन राज्यों में आबादी बढ़ने की रफ्तार धीमी रही है। लेकिन सरकार सरकार का जवाब था कि आप ऐसा लोकतंत्र नहीं चला सकते, जिसमें कुछ लोगों के वोटों का महत्व दूसरों के वोटों से ज्यादा हो और आप निश्चित रूप से नक्शे को फिर से बनाए बिना महिलाओं के लिए आरक्षण लागू नहीं कर सकते।

इस बिल के पारित नहीं होने पर विपक्ष के नियत पर सवाल खड़े हो गए हैं। इस कदम से INDI गठबंधन के भीतर ‘महिला-विरोधी’ पूर्वाग्रह का पता चलता है। जहाँ एक ओर विपक्ष ने 2023 में महिलाओं के लिए आरक्षण का समर्थन करने का दावा किया था, वहीं शुक्रवार को उनके कार्यों ने एक अलग ही कहानी बयाँ की। 131वें संशोधन के खिलाफ वोट देकर विपक्ष ने प्रभावी रूप से 70 करोड़ महिलाओं से यह कह दिया है कि उन्हें अपने अधिकारों के लिए अभी और लंबा इंतजार करना होगा। वे 2023 के कानून का समर्थन करने का दावा करते हैं, लेकिन उन्होंने उसी बिल को खारिज कर दिया, जो उस कानून को लागू करने के लिए ज़रूरी था।

विपक्ष का महिला-विरोधी रवैया

बिल के गिर जाने के बाद विपक्ष का जश्न धोखा की तरह है। जहाँ राहुल गाँधी जैसे नेताओं ने इस बिल को ‘असंवैधानिक चाल’ कहा, वहीं विपक्ष का असली डर राजनीतिक सत्ता में आने वाला वह बदलाव था, जो सीटों के विस्तार के साथ आता है। उन्होंने महिलाओं के ऐतिहासिक सशक्तिकरण को रोक दिया।

महिलाओं का हितैषी बनने की कोशिश करने वाले समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने आरक्षण के भीतर धर्म-आधारित कोटे की असंवैधानिक माँगों को लेकर इस बिल का विरोध किया। इस तरह की राजनीति दिखाती है कि विपक्ष के लिए महिला सशक्तिकरण एक अच्छा नारा तो है, लेकिन जब बात उनके अपने राजनीतिक अस्तित्व की आती है, तो यह एक गौण प्राथमिकता बन जाता है।

प्रधानमंत्री ने दी चेतावनी

18 अप्रैल को कैबिनेट की बैठक में पीएम मोदी ने विपक्षी दलों को महिला आरक्षण बिल में रोड़े अटकाने पर महिलाओं के गुस्से का सामना करने की बात कही। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, PM मोदी ने कहा कि विपक्ष ने एक बहुत बड़ी गलती की है और उन्हें इसके परिणाम भुगतने होंगे। PM ने अपनी कैबिनेट से कहा, “उन्होंने देश की महिलाओं को निराश किया है। यह संदेश हर एक व्यक्ति तक, हर एक गाँव तक पहुँचाया जाना चाहिए।”

उन्होंने सदन में व्यक्तिगत गारंटी देने की बात भी कही थी कि किसी भी राज्य को घाटा नहीं होगा। कोई अन्याय नहीं होगा, भले ही सीटों की संख्या बढ़कर 816 हो जाए।

प्रधानमंत्री की यह निराशा सरकार में कई अन्य लोगों द्वारा भी साझा की जाती है। केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू ने विपक्ष के इस कदम को ‘कॉन्ग्रेस और उसके सहयोगियों पर एक काला धब्बा’ करार दिया, जिसे वे कभी मिटा नहीं पाएँगे। गृह मंत्री अमित शाह ने भी विपक्ष के ‘जश्न’ पर निशाना साधते हुए कहा, “देश की आधी आबादी को धोखा देने के बाद… और उनका भरोसा खोने के बाद कोई जीत का जश्न कैसे मना सकता है?”

आज की स्थिति यह है कि हमारी संसद में 33% महिलाओं को देखने का सपना फिर से ठंडे बस्ते में चला गया है। 131वें संशोधन का पारित न होना केवल NDA के लिए एक राजनीतिक नुकसान ही नहीं है, बल्कि भारत की महिलाओं के लिए भी एक बड़ा झटका है। इन्होंने मान लिया था कि आखिरकार इनका ‘टाइम’ आ गया है।

(यह लेख अंग्रेजी में लिखा गया है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

इंजीनियर ने ‘मजदूर बिगुल’ का पत्रकार बनकर जुटाया डाटा, फिर घर में बैठकर 3 दिनों तक की प्लानिंग: जानिए नोएडा में कैसे भड़की हिंसा, विदेश भागने की फिराक में था मास्टरमाइंड

नोएडा में मजदूरों के प्रदर्शन और हिंसा फैलाने में साजिश कर्ताओं में एक और 1 लाख का इनामी आदित्य आनंद को तमिलनाडु से गिरफ्तार कर ट्रांजिट रिमांड पर नोएडा लाया जा रहा है। उससे पूछताछ में हिंसक आंदोलन के कई राज खुले हैं। पता चला है कि मजदूर नेता रुपेश राय और मनीषा के साथ मिलकर उसने मजदूरों को भड़काया।

वह 2022 से ‘मजदूर बिगुल’ नाम के मजदूर संगठन के सोशल मीडिया पेज से जुड़ा हुआ था। इस संगठन के संपादक अनुभव सिन्हा हैं। वह नोएडा की फैक्ट्रियों की रिपोर्टिंग करने लगा। रूपेश राय और आदित्य आनंद की मुलाकात भगत सिंह जन अधिकार यात्रा के दौरान हुई थी। इसके बाद दोनों मजदूर नेताओं से मिलने लगे।

3 दिन की बैठक और रची गई साजिश

रुपेश राय और आदित्य आनंद साथ-साथ फैक्ट्रियों तक जाने लगे। नोएडा के सभी फैक्ट्रियों की पूरी जानकारी और उसके मजदूरों का पूरा डेटा जमा किया गया। इन दोनों ने नोएडा में एक्टिव मजदूर संगठनों ‘मजदूर बिगुल’, नौजवान भारत सभा, एकता संघर्ष समिति, दिशा संगठन, आरडब्लूपीआई के नेताओं के साथ आदित्य आनंद के नोएडा के सेक्टर 37 अरुण विहार के स्थित फ्लैट में बैठक की। ये बैठक तीन दिन 30 मार्च, 31 मार्च और 1 अप्रैल तक चली। बैठक में पूरी योजना बनाई गई।

साजिशकर्ता और सॉफ्टवेयर इंजीनियर आदित्य आनंद ने लोगों को जुटाने के लिए व्हाट्सएप का इस्तेमाल किया। व्हाट्स एप ग्रुप के क्यूआर कोड के जरिए ज्यादा से ज्यादा लोगों को जोड़ा गया। ये ग्रुप 9-10 अप्रैल को बनाए गए। पहले तो मजदूरों को उनकी माँगों के लिए प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित किया।

उसके बाद प्रदर्शन को हिंसक बनाने की साजिश रची। अपर पुलिस अधीक्षक राजकुमार मिश्रा ने इसकी जानकारी देते हुए कहा कि घटना के बाद फरार आदित्य आनंद को तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार किया गया। उसने अपनी तकनीकी जानकारी का इस्तेमाल भीड़ को इकट्ठा करने और भड़काऊ भाषण देने में किया।

विदेश भागने के फिराक में था आदित्य आनंद

28 साल का आदित्य आनंद उर्फ रस्टी बिहार के वैशाली का रहने वाला है। उसने 12वीं तक की शिक्षा वहीं ली थी। वह एनआईटी जमशेदपुर से 2020 में बीटेक किया। इसके बाद सॉफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर नोएडा में नौकरी करने लगा। 2022 में वह गुरुग्राम शिफ्ट हुआ लेकिन फिर 2025 से नोएडा के अरुण विहार में किराए के घर में रह रहा था।

नोएडा में हिंसा को लेकर साजिशकर्ता के रूप में सामने आने के बाद सरकार ने उसको पकड़ने के लिए 1 लाख का इनाम रखा। नोएडा में हिंसा के बाद वह चेन्नई भाग गया था। उसकी तलाश में कई राज्यों की पुलिस लगी हुई थी। चेन्नई से होते हुए जब वह तिरुचिरापल्ली जा रहा था, तो एसटीएफ को इसकी जानकारी मिल गई। इसके बाद नोएडा पुलिस ने ही उसे रेलवे स्टेशन पर गिरफ्तार कर लिया। उसने पहचान छिपाने के लिए अपना हुलिया बदल लिया था।

लंबे बाल काट लिए थे। सिर पर टोपी लगा ली थी। टीशर्ट के ऊपर शर्ट पहना हुआ था। बताया जा रहा है कि वह विदेश भागने की फिराक में था, लेकिन उससे पहले ही पुलिस के हत्थे चढ़ गया। आदित्य को ट्रांजिट रिमांड पर नोएडा लाया जा रहा है। साजिशकर्ता रुपेश राय को 11 अप्रैल को गिरफ्तार किया जा चुका है और पुलिस उसे जेल भेज चुकी है। उसकी एक और सहयोगी मनीषा भी गिरफ्तार हो चुकी है। नोएडा हिंसा मामले में 13 मामले दर्ज किए गए थे। इसको लेकर 1140 लोगों को अब तक गिरफ्तार किया जा चुका है।

रुपेश राय और मनीषा की गिरफ्तारी के बाद 12 अप्रैल को आदित्य आनंद नोएडा से दिल्ली भाग गया और ट्रेन से चेन्नई पहुँच गया। वहाँ वह छिपा हुआ था। उसकी लगातार ट्रैकिंग की जा रही थी। 18 अप्रैल को तिरुचापल्ली में टावर लोकेशन ट्रेस होने के बाद एसटीएफ और नोएडा पुलिस रेलवे स्टेशन, बस अड्डे और दूसरे सार्वजनिक स्थानों पर लग गई। वह रेलवे स्टेशन पर गिरफ्तार कर लिया गया।

पाकिस्तान कनेक्शन और अंतरराष्ट्रीय साजिश

इस मामले में सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह हुआ है कि नोएडा की इस हिंसा के पीछे अंतरराष्ट्रीय साजिश के संकेत मिले हैं। जाँच में पता चला है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर दो सक्रिय हैंडल पाकिस्तान से चलाए जा रहे थे।

वीपीएन (VPN) का इस्तेमाल कर लोकेशन छिपाई गई थी और पिछले 3 महीनों से आईपी एड्रेस पाकिस्तान से जुड़े हुए थे। इन पर एफआईआर दर्ज किया गया। इसके अलावा कई एक्स हैंडल पर सरकार की नजर रही। इन हैंडल्स के माध्यम से नोएडा में कानून-व्यवस्था बिगाड़ा जा रहा था और मजदूरों को हिंसा के लिए उकसाया जा रहा था।

इतना ही नहीं मध्यप्रदेश के शहडोल जिले की हिंसक घटना के वीडियो को नोएडा हिंसा का बताकर सोशल मीडिया अकाउंट्स से प्रसारित किया गया, जिसका यूपी पुलिस ने खंडन किया और लोगों को सचेत रहने की सलाह दी।

9 अप्रैल से मजदूरों ने प्रदर्शन शुरू किया

सैलरी बढ़ाने समेत कई माँगों को लेकर मजदूरों ने 9 अप्रैल 2026 से प्रदर्शन शुरू किया। 13 अप्रैल को ये लोग सड़कों पर उतर गए। पुलिस के साथ उनकी 2-3 जगहों पर झड़प हुई। प्रदर्शनकारियों ने गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया और जमकर तोड़फोड़ की। स्थिति को काबू में करने के लिए पुलिस को आँसू गैस के गोले दागने पड़े। बवाल की वजह से एनएच-9, दिल्ली- मेरठ एक्सप्रेस वे और चिल्ला बॉर्डर पर 5 किलोमीटर तक लंबा जाम लग गया।

वेतन बढ़ोतरी समेत तमाम माँगे मान लिए जाने के बाद भी मजदूरों को भड़काया गया। योगी सरकार ने आंदोलन शुरू होने के दो-तीन दिन बाद ही मजदूरों की ज्यादातर माँगे मान ली थी। जिला प्रशासन ने मजदूरों का आश्वासन भी दिया था। इसके बावजूद आंदोलन जारी रहा।

योगी सरकार ने वेतन वृद्धि के साथ-साथ कई माँगें मान ली थी। उसमें ओवरटाइम करने पर दोगुना भुगतान, समय पर सैलरी सीधे बैंक में देने डालने, 10 तारीख से पहले हर महीना वेतन मिलना चाहिए, सैलरी स्लिप हर मजदूर को हर महीने मिलना चाहिए, 30 नवंबर से पहले बोनस का भुगतान सीधा बैंक खाते में होना चाहिए, साप्ताहिक अवकाश सुनिश्चित हो, अवकाश के दिन काम करने पर दोगुनी मजदूरी देने का आश्वासन दिया गया।

महिला सुरक्षा के लिए आंतरिक शिकायत समितियाँ और कंट्रोल रूम बनाना अनिवार्य, समिति में एक महिला सदस्य जरूर हो। कंट्रोल रूम में शिकायत पेटी लगाई जाए, हेल्पलाइन नंबर जारी की जाए, ताकि उससे भी शिकायत दर्ज कराई जा सके। शिकायतों का तुरंत निपटारा किया जाए। सरकार के निर्देशों का पालन सुनिश्चित कराने के लिए नियमित निगरानी की जाए। नियमों का उल्लंघन करने वाली कंपनी के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।

सीएम योगी ने मजदूरों के विरोध प्रदर्शन को संज्ञान में लेते हुए उच्च स्तरीय बैठक की थी और निर्देश जारी करते हुए कहा था कि मजदूरों के हितों की किसी भी हाल में अनदेखी नहीं की जाएगी। इसके बावजूद सुनियोजित साजिश कर नोएडा में विरोध प्रदर्शन किया गया। दरअसल नोएडा में हिंसा कर यूपी के औद्योगिक माहौल को खराब करने की कोशिश की गई। हिंसक प्रदर्शन को सोशल मीडिया के जरिए फैलाया गया और इसके पाकिस्तानी तार भी सामने आए हैं। इसका मकसद यूपी के विकास को रोक कर राज्य में अव्यवस्था वाली स्थिति का नेरेटिव बनाना भी था।

महिला आरक्षण में दुनिया से पिछड़ा भारत, ग्लोबल रिपोर्ट में बड़ा खुलासा: जानें किन देशों ने दी 50% हिस्सेदारी और कहाँ खड़ा है अपना देश

भारतीय संसद में महिलाओं को आरक्षण देने की कोशिश तब नाकाम हो गई, जब साल 2023 का महिला आरक्षण कानून (106वाँ संशोधन) संसद की कार्यवाही में अटक गया। अगर आज के हालात देखें, तो देश चलाने में महिलाओं की हिस्सेदारी बहुत कम है। लोकसभा में केवल 14% और राज्यसभा में 17% महिलाएँ हैं।

यह संख्या दुनिया के औसत (26%) से भी काफी कम है। सच तो यह है कि बड़े पदों पर महिलाओं का न होना सिर्फ भारत नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की एक पुरानी समस्या है। कहने को तो भारत ने नया कानून पास करके महिलाओं को बराबरी का हक देने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है, लेकिन हकीकत यह है कि यह कानून दो साल से सिर्फ कागजों पर ही है और इसके लागू होने का इंतजार खत्म ही नहीं हो रहा।

राजनीति और समाज में महिलाओं को पुरुषों के बराबर हक देने की यह बहस किसी एक देश की नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की है। संयुक्त राष्ट्र ने भी 2030 तक जो लक्ष्य तय किए हैं, उनमें ‘लैंगिक समानता’ (स्त्री-पुरुष को बराबर हक) एक मुख्य लक्ष्य है। यह साफ है कि जब तक देश के नियम बनाने में महिलाओं की बराबर की भागीदारी नहीं होगी, तब तक समानता की बात करना बेकार है।

अच्छी बात यह है कि भारत अकेला ऐसा देश नहीं है जो इसके लिए कानूनी कोशिश कर रहा है। दुनिया के कई अन्य देशों ने भी महिलाओं को राजनीति में आगे लाने के लिए कड़े कदम उठाए हैं। कुछ देशों ने संसद में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित कर दी हैं, तो कुछ ने राजनीतिक पार्टियों के लिए यह जरूरी कर दिया है कि वे चुनाव में एक तय संख्या में महिलाओं को टिकट जरूर दें।

यहाँ उन देशों की लिस्ट दी गई है जिन्होंने महिलाओं को राजनीति में बराबर का हक देने के लिए ठोस कदम उठाए हैं। इन देशों ने अपनी संसद या स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित की हैं या चुनाव में उम्मीदवारों के लिए कोटा तय किया है।

नेपाल

नेपाल में महिलाओं के लिए संसद की 33% सीटें आरक्षित हैं। यहाँ के निचले सदन (Lower House) में महिलाओं के लिए 33% और ऊपरी सदन (Upper House) में 2% कोटा तय है। इसके अलावा, स्थानीय स्तर (नगर निकाय/पंचायत) पर भी महिलाओं के लिए 33% भागीदारी अनिवार्य की गई है।

पाकिस्तान

पाकिस्तान में महिलाओं के लिए कोटा तय करने की शुरुआत तो 1965 में ही हो गई थी। लेकिन साल 2002 के बाद से वहाँ की नेशनल असेंबली (संसद) में महिलाओं की कम से कम भागीदारी 17% तय कर दी गई है।

बांग्लादेश

बांग्लादेश की संसद (जातीय संसद) के निचले सदन में कम से कम 14% सीटें महिला उम्मीदवारों के लिए रखी गई हैं। वहीं, स्थानीय स्तर के चुनावों में महिलाओं के लिए यह कोटा 33% तय किया गया है।

श्रीलंका

श्रीलंका ने भी महिलाओं को राजनीति में आगे लाने के लिए कदम उठाए हैं। यहाँ स्थानीय स्तर (Sub-national level) के निकायों में महिलाओं के लिए 25% कोटा तय किया गया है।

संयुक्त अरब अमीरात (UAE)

इस खाड़ी देश ने अपनी नेशनल काउंसिल के निचले सदन में महिलाओं के लिए 50% कोटा तय किया है, जो समानता की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम है।

इंडोनेशिया

यहाँ संसद के निचले सदन और स्थानीय स्तर, दोनों ही जगह महिलाओं के लिए कम से कम 30% भागीदारी तय की गई है।

यूनान (ग्रीस)

यूनान की संसद के निचले सदन और स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए 40% सीटें आरक्षित रखी गई हैं।

इटली

इटली में संसद के दोनों सदनों (ऊपरी और निचले) में महिलाओं के लिए 40% सीटें तय हैं। साथ ही, स्थानीय स्तर पर भी 40% आरक्षण दिया गया है। यहाँ की राजनीतिक पार्टियों ने खुद आगे बढ़कर महिलाओं को टिकट देने का कोटा अपनाया है।

स्पेन

स्पेन में निचले सदन में 40% और ऊपरी सदन में 50% सीटें महिलाओं के लिए हैं। स्थानीय स्तर पर भी 40% सीटें आरक्षित हैं। इटली की तरह यहाँ की पार्टियों ने भी चुनाव में महिलाओं को करीब 44% टिकट देने का नियम खुद बनाया है।

नार्वे

इस देश ने स्थानीय स्तर के चुनावों में महिलाओं के लिए 40% कोटा तय कर रखा है।

दुनिया भर के मौजूदा हालात

हैरानी की बात यह है कि अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी और स्वीडन जैसे बड़े पश्चिमी देशों में महिलाओं के लिए संसद में कोई सीटें आरक्षित नहीं हैं। अगर 1 जनवरी 2026 तक के आँकड़ों को देखें, तो दुनिया के सिर्फ 28 देशों में 30 महिलाएँ सरकार या देश की प्रमुख (जैसे राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री) के तौर पर काम कर रही हैं। संयुक्त राष्ट्र (UN Women) के डेटा के मुताबिक, दुनिया भर के मंत्रालयों में केवल 22.4% महिलाएँ ही कैबिनेट मंत्री के पद पर हैं।

समानता अभी भी कोसों दूर

एक अनुमान के मुताबिक, जिस रफ्तार से अभी सुधार हो रहा है, उस हिसाब से राजनीति में महिलाओं को पुरुषों के बराबर हक मिलने में 2063 तक का समय लग सकता है। भले ही दुनिया के अमीर और गरीब दोनों तरह के देशों में बराबरी का यह लक्ष्य अभी दूर है, लेकिन सीटों का आरक्षण इस दिशा में एक बड़ा और जरूरी कदम साबित हुआ है।

क्यों जरूरी है महिलाओं की भागीदारी?

राजनीति में महिलाओं का आना सिर्फ दिखावे के लिए नहीं है। इसका गहरा असर देश की नीतियों और शासन पर पड़ता है। जब महिलाओं की भागीदारी बढ़ती है, तो नियम-कानून ज्यादा समावेशी और सबके भले के लिए बनते हैं। यह समाज के उन पुराने ढांचों को भी तोड़ता है जहाँ ताकत सिर्फ पुरुषों के हाथ में रही है, और महिलाओं को सार्वजनिक जीवन में अपना हक माँगने के लिए प्रेरित करता है।

(ये रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई है। अंग्रेजी की रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)