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क्या इंडिया टुडे कॉन्कलेव में लॉरा लूमर और राजदीप सरदेसाई की ‘जुबानी जंग’ एक सुनियोजित तमाशा थी?

इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में लॉरा लूमर से जुड़ा यह मामला कई असहज सवाल खड़े करता है। शुरुआत में गुस्सा इस बात पर था कि ऐसे कमेंटेटर को क्यों बुलाया गया जिसने पहले भारतीयों के बारे में नस्लभेदी बातें की थीं। लेकिन कुछ ही समय में मामला टीवी पर हुई तीखी बातचीत और आंशिक माफी तक पहुँच गया, जिससे पूरी कहानी का रुख ही बदल गया।

इंडिया टुडे ग्रुप ने इस हफ्ते ‘इंडिया टुडे कॉन्क्लेव 2026’ का आयोजन किया। इस कार्यक्रम के वक्ताओं की सूची में एक नाम ऐसा था जिसने तुरंत विवाद खड़ा कर दिया। यह नाम था लॉरा लूमर। एक अमेरिकी कमेंटेटर, जो डोनाल्ड ट्रंप के राजनीतिक दायरे और MAGA इकोसिस्टम से जुड़ी मानी जाती हैं। लूमर ने भड़काऊ बयानबाजी और उकसावे के कारण अपनी पहचान बनाई है।

हालाँकि, इस कार्यक्रम में उनका नाम आने पर जो विवाद हुआ, वह सिर्फ उनकी राजनीति की वजह से नहीं था। असली वजह उनकी भारतीयों और भारतीय मूल के लोगों के बारे में नस्लभेदी अपमानजनक टिप्पणियाँ करने को लेकर है। इसी कारण उनके आमंत्रण को लेकर काफी आलोचना और बहस शुरू हो गई।

जब लूमर ने ‘एक्स’ पर पोस्ट करके खुद बताया कि वह कॉन्कलेव में हिस्सा लेने के लिए भारत आ रही हैं, तो भारतीयों ने तुरंत उनके पुराने पोस्ट ढूँढने शुरू कर दिए। सोशल मीडिया पर उनके पुराने पोस्ट के स्क्रीन शॉट तेजी से वायरल होने लगे। उन पोस्ट में लूमर ने भारतीयों को ‘थर्ड वर्ल्ड इवेडर्स’ कहा था, भारत की सफाई व्यवस्था का मजाक उड़ाया था और भारतीयों की बौद्धिक क्षमता पर भी सवाल उठाए थे।

एक और विवादित मामले में लूमर ने भारतीय-अमेरिकी टेक्नोलॉजिस्ट श्रीराम कृष्णन पर तीखा हमला किया था, जब उन्हें व्हाइट हाउस में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के लिए सीनियर पॉलिसी एडवाइजर बनाया गया था। लूमर ने सवाल उठाया था कि अमेरिका में प्रभावशाली पदों पर प्रवासियों को क्यों रखा जाना चाहिए।

लूमर ने पहले भी कमला हैरिस की भारतीय पृष्ठभूमि का मजाक उड़ा चुकी हैं और ‘करी’ शब्द का इस्तेमाल करते हुए टिप्पणी की थी, जिससे काफी गुस्सा और आलोचना हुई थी। भारत विरोधी बयानों के अलावा लूमर पहले भी कई विवादों में रह चुकी हैं।

उन्होंने 11 सितंबर के हमलों को लेकर साजिश से जुड़ी बातें फैलाने की कोशिश की थी और कोविड-19 महामारी के दौरान भी गलत जानकारी फैलाने के आरोप लगे थे। यहाँ तक कि रिपब्लिकन सीनेटर थॉम टिलिस ने भी एक बार उन्हें ‘पागल साजिश थ्योरी फैलाने वाली’ कहकर खारिज कर दिया था।

लॉरा लूमर की इस पृष्ठभूमि को देखते हुए सोशल मीडिया पर तुरंत एक सवाल उठने लगा। सवाल यह था कि एक बड़ा भारतीय मीडिया मंच ऐसे व्यक्ति को क्यों आमंत्रित करेगा, जिसने बार-बार भारत और भारतीयों का अपमान किया हो?

इस पर लोगों की नाराजगी बहुत तेजी से सामने आई। सोशल मीडिया यूजर्स ने लूमर के पुराने पोस्ट के स्क्रीनशॉट फिर से शेयर करने शुरू कर दिए। इन पोस्ट में वह भारत की सफाई व्यवस्था का मजाक उड़ाती नजर आई थीं, भारतीयों को ‘थर्ड वर्ल्ड इनवेडर्स’ कहती थीं और भारतीय प्रवासियों को ‘हाई-स्किल्ड वर्कर्स’ बताने का भी मजाक बनाती थीं, जबकि भारत में बुनियादी ढाँचे की कमी होने की बात कहती थीं।

आलोचकों ने इस निमंत्रण को हैरान करने वाला और नुकसान पहुँचाने वाला कदम बताया। उनका कहना था कि जिस व्यक्ति का भारत विरोधी बयानों का रिकॉर्ड रहा है, उसे इतना बड़ा मंच देना गलत है। इससे ऐसे नफरत भरे विचारों को मान्यता मिलने का खतरा पैदा होता है, जिनका विरोध करने की बात भारतीय मीडिया संस्थान अक्सर करते हैं।

लेकिन इसके बाद एक नया मोड़ आया। कॉन्क्लेव के सत्र के दौरान वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने लूमर से उनके पुराने बयानों को लेकर सीधा सवाल किया। उन्होंने लूमर के कई विवादित ट्वीट्स का जिक्र किया और पूछा कि क्या उन्हें उन पर पछतावा है। राजदीप ने लूमर से कहा, “आपके बयान खुलकर नस्लभेदी और इस्लामोफोबिक हैं।”

इस पर लूमर ने जवाब देते हुए माना कि उनके कुछ पुराने पोस्ट सच में हद पार कर गए थे। लूमर ने कहा, “दूसरे ट्वीट्स में मैंने जो कुछ बातें लिखी थीं, उनमें से कुछ मुझे नहीं कहना चाहिए थीं।” उन्होंने यह भी कहा कि अगर उनके बयानों से भारतीयों की भावनाएँ आहत हुई हैं तो वह इसके लिए माफी माँगती हैं। लूमर ने एक और चौंकाने वाली बात कही कि भारतीयों को लेकर उनके कुछ ट्वीट्स ‘एक्स’ ने खुद की हटा दिए थे और उनके पास इसे स्वीकार करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं था।

साथ ही कुछ मुद्दों पर उन्होंने अपनी बात पर कायम रहने की कोशिश भी की। लूमर ने H-1B वीजा कार्यक्रम के विरोध के लिए माफी माँगने से इनकार कर दिया और कहा कि एक अमेरिकी एक्टिविस्ट के तौर पर उनका काम अमेरिकी कामगारों के हितों की रक्षा करना है। उन्होंने अपनी बात को थोड़ा नरम करते हुए यह भी कहा कि उन्हें भारतीय का हिंदुओं से कोई नफरत नहीं है और वह कट्टर इस्लामी द्वारा हिंदुओं पर होने वाले अत्याचार के खिलाफ भी बोल चुकी हैं।

दोनों की यह बातचीत बहुत जल्द ही वायरल हो गई। सरदेसाई द्वारा लूमर से सवाल पूछने वाले वीडियो क्लिप्स सोशल मीडिया पर तेजी से फैल गए। ऑनलाइन दुनिया के कई लोग, चाहे वे इंडियन नेशनल कॉन्ग्रेस के समर्थक हों या खुद को नॉन-लेफ्ट कहने वाले हों, इस पर को पत्रकारिता की जीत बताने लगे।

सरदेसाई को उस पत्रकार के रूप में सराहा गया जिसने ‘एक नस्लभेदी को उसकी जगह दिखाने का साहस किया।’ वहीं लूमर की आंशिक माफी को भी कहानी की जीत यानी नैरेटिव विक्ट्री के रूप में पेश किया गया।

कुछ और लोग भी थे जिन्होंने ऑनलाइन लूमर की भद्दी टिप्पणियों को लेकर उन्हें ‘कॉनफ्रंट’ के लिए राजदीप सरदेसाई को ‘धन्यवाद’ कहा। और बस यहीं से पूरी चर्चा का फोकस बदल गया।

शुरुआत में असली विवाद यह था कि लूमर को आखिर बुलाया ही क्यों गया। लेकिन कुछ ही घंटों में बातचीत इस बात पर आ गई कि मंच पर उनसे कितने प्रभावी तरीके से सवाल पूछे गए।

इंडिया टुडे द्वारा लौरा लूमर को सम्मेलन में आमंत्रित करने पर राजदीप सरदेसाई ने आक्रोश क्यों नहीं जताया?

इस पूरे मामले का एक और पहलू है जो और ज्यादा सवाल खड़े करता है और वह है खुद राजदीप सरदेसाई की भूमिका। अगर सरदेसाई सच में लूमर द्वारा भारत और भारतीयों के बारे में कही गई गंदी बातों से नाराज थे, तो उम्मीद की जाती कि यह नाराजगी कॉन्क्लेव में कैमरे चलने से पहले ही सामने आ जाती।

आखिरकार, सरदेसाई सोशल मीडिया पर सबसे सक्रिय पत्रकारों में से एक माने जाते हैं। ‘एक्स’ पर वह अक्सर ‘स्टोरीज दै कॉट माई आई’ नाम से एक लोकप्रिय थ्रेड चलाते हैं, जिसमें वे उन मुद्दों को सामने लाते हैं कि जिन्हें वे सार्वजनिक चर्चा के लायक मानते हैं। जब भी उन्हें लगता है कि कोई नेता, संस्था या सार्वजनिक व्यक्ति हद पार कर रहा है, तो वह उसकी आलोचना करने से भी पीछे नहीं हटते।

इसी वजह से कॉन्क्लेव से पहले के दिनों में इस मुद्दे पर उनकी चुप्पी कई लोगों को हैरान करने वाली लगती है।

जब लूमर ने बताया कि वह इंडिया टुडे ग्रुप द्वारा आयोजित कॉन्क्लेव में बोलने के लिए भारत आ रही हैं, तो तुरंत ही विरोध शुरू हो गया। भारतीयों का मजाक उड़ाने और अमेरिका में उनकी जगह पर सवाल उठाने वाले उनके पुराने ट्वीट्स के स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर तेजी से फैलने लगे।

लेकिन उस समय सरदेसाई की ओर से कोई सार्वजनिक आपत्ति सामने नहीं आई.

यही वह समय था जब वह अपनी हैरानी या नाराजगी जाहिर कर सकते थे। नेटवर्क के एक वरिष्ठ संपादकीय चेहरे के तौर पर वह आसानी से ‘एक्स’ पर पोस्ट करके सवाल उठा सकते थे कि आखिर कोई मीडिया संस्था ऐसे व्यक्ति को क्यों बुला रही है जिसका रिकॉर्ड भारतीयों का अपमान करने का रहा है।

इसके बजाए, सरदेसाई कॉन्क्लेव में ही मंच पर पहुँचे और वहीं लूमर से उनके बयानों को लेकर सवाल किए। यह बातचीत लगभग एक ‘तैयार पैकेज’ की तरह सामने आई, जिसमें उनके आपत्तिजनक ट्वीट्स पर सवाल पूछे गए, लूमर ने माना कि उनमें से कुछ गलत थे और फिर लाइव दर्शकों के सामने उन्होंने आंशिक माफी भी दे दी।

यह पल जल्दी ही वायरल हो गया।

लेकिन बाद में जब इस पूरे क्रम को देखा जाए, तो यह कम अचानक और ज्यादा पहले से तय किया हुआ लगता है। पहले कोई सार्वजनिक आपत्ति न होना और फिर सही समय पर मंच पर सीधा सामना होना, यह संभावना भी पैदा करता है कि यह बातचीत पहले से ही कैमरों के सामने होने के लिए तय थी, न कि सार्वजनिक बहस की अनिश्चित स्थिति में।

यहीं से हम फिर बड़े सवाल पर लौटते हैं।

क्योंकि घटनाओं का यह कर्म लगभग एक सावधानी से लिखी गई ‘स्क्रिप्ट’ जैसा लगता है। पहले एक ऐसे विवादित व्यक्ति को बुलाना जिसके पुराने बयान आपत्तिजनक रहे हों, फिर जब वे बयान दोबारा सामने आएँ तो गुस्सा बढ़ने देना और उसके बाद कार्यक्रम के दौरान एक नाटकीय टकराव दिखाना।

इस टकराव से वायरल कंटेंट बनता है, मेहमान आंशिक माफी देता है और मेजबान नेटवर्क की छवि अचानक बदल जाती है। अब उसे उस मंच के रूप में नहीं देखा जाता जिसने विवादित आवाज को मंच दिया, बल्कि उस मंच के रूप में दिखाया जाता है जिसने उससे जवाब माँगा।

यहीं से पूरी कहानी बदल जाती है।

‘इंडिया टुडे ने भारत विरोधी नस्लवादी टिप्पणीकार को मंच दिया’ वाली कहानी को ‘देखिए इंडिया टुडे ने उसका सामना कैसे किया’ में कैसे बदल दिया गया?

‘इंडिया टुडे ने ऐसे व्यक्ति को क्यों बुलाया जिसने बार-बार भारतीयों का अपमान किया?’ इस सवाल की जगह कहानी बदलकर ‘देखिए इंडिया टुडे ने उनसे कैसे सवाल किए’ बन जाती है।

असल में पूरे विवाद को एक तरह के दृश्य और तमाशे के जरिए शांत कर दिया जाता है।

इसी वजह से यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या पूरा मामला, निमंत्रण से लेकर मंच पर टकराव और फिर माफी तक, एक तरह का नैरेटिव डैमेज कंट्रोल था या शायद नैरेटिव लॉन्ड्रिंग भी।

आखिरकार, नतीजा ऐसा दिखाई देता है जिससे इस पूरे मामले में शामिल लगभाग हर पक्ष को फायदा मिलता नजर आता है।

लूमर इस पूरे मामले के बाद ऐसी स्थिति में बाहर आईं जहाँ उन्होंने सार्वजनिक रूप से अपने कुछ बयानों को थोड़ा नरम किया और भारत के प्रति कम विरोधी छवि दिखाने की कोशिश की। सरदेसाई को सोशल मीडिया पर उनसे सवाल करने के लिए खूब सराहना मिली। वहीं इंडिया टुडे ग्रुप भी बातचीत का फोकस उस असहज सवाल से हटाने में सफल रहा, जिससे शुरुआत में पूरा विवाद शुरू हुआ था।

वायरल वीडियो के इस दौर में जो चीज एक पत्रकार और एक विवादित कमेंटेटर के बीच अचानक हुई बहस जैसी दिख रही थी, वह शायद कुछ और भी हो सकती है। यह एक ऐसा सुविधाजनक नाटक भी हो सकता है जिसने छवि से जुड़े संकट को एक ऐसे पल में बदल दिया, जहाँ सब कुछ पहले से तय तरीके से जवाबदेही दिखाने जैसा लगे।

(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

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Jinit Jain
Jinit Jain
Jinit Jain is a journalist and commentator covering politics, national security, law, and socio-cultural issues, with a focus on in-depth reporting and fact-based analysis. His work examines public policy, governance, and current affairs, bringing complex developments into clear and accessible context for readers.

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