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DRDO के पास ‘गौरव’ बम, फिर क्यों पड़ी इजरायल से SPICE-1000 खरीदने की जरूरत: समझें क्यों सैन्य ताकत के संतुलन के लिए जरूरी है यह खरीद

भारत की रक्षा अधिग्रहण परिषद यानी डिफेन्स एक्विजिशन काउंसिल (DAC) ने हाल ही में तीनों सेनाओं को 79,000 करोड़ रुपए के हथियार खरीदने की मंजूरी दी है। इन हथियारों में इजरायल से SPICE-1000 ग्लाइड बम किट की खरीद को मंजूरी दी है। यह निर्णय ऐसे समय पर सामने आया है जब भारत का रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) अपने स्वदेशी लॉन्ग-रेंज ग्लाइड बम ‘गौरव’ के विकास पर वर्षों से काम कर रहा है और अब वो बनकर भी तैयार है।

इसी कारण यह फैसला रक्षा मामलों से जुड़े विशेषज्ञों और रणनीतिक विश्लेषकों के बीच चर्चा का विषय बन गया है। इसे केवल एक एक्सपोर्ट से जुटे निर्णय के रूप में नहीं बल्कि भारत की डिफेंस नीति के बड़े दृष्टिकोण के तौर पर देखा जा रहा है। इस निर्णय में साफ तौर पर यह दिखता है कि सरकार ने तत्काल सैन्य जरूरतों, खर्च और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की है।

SPICE-1000 क्या है?

SPICE-1000 का पूरा नाम ‘स्मार्ट, प्रिसाइस इम्पैक्ट, कॉस्ट-इफेक्टिव’ (SPICE) है। यह एक आधुनिक स्टैंड-ऑफ प्रिसिजन स्ट्राइक ग्लाइड बम किट है जो किसी सामान्य 1,000 पाउंड के एयरक्राफ्ट बम को अत्याधुनिक गाइडेड हथियार में बदल देती है। इस किट की खास बात यह है कि यह पारंपरिक बम को ऐसा हथियार बना देती है जो अपने लक्ष्य तक खुद पहुँच सकता है और उसे पहचान भी सकता है।

SPICE-1000 में एक खास तरह की ग्लाइड बॉडी होती है, जो बम को हवा में काफी दूर तक जाने में मदद करती है। इसके साथ ही इसमें INS और SATNAV आधारित नेविगेशन सिस्टम लगाया गया है और अंतिम चरण में लक्ष्य को सटीक तरीके से निशाना बनाने के लिए इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल और इन्फ्रारेड सीकर भी मौजूद होता है। इन सभी तकनीकों के मेल से यह हथियार बेहद सटीक हमला करने में सक्षम बनता है।

SPICE-1000 की टेक्नोलॉजी और ऑपरेशनल खूबियाँ

SPICE-1000 की सबसे बड़ी ताकत इसका ऑटोनॉमस टारगेट एक्विजिशन सिस्टम है। यह सिस्टम रियल-टाइम में मिलने वाली EO तस्वीरों की तुलना पहले से मिशन के लिए सेव किए गए डेटा से करता है और बिना किसी बाहरी मदद के अपने लक्ष्य को पहचान लेता है। यानी बम को छोड़ने के बाद भी वह खुद तय कर सकता है कि उसे कहाँ वार करना है।

इसके अलावा इसमें टू-वे डेटा लिंक की सुविधा भी दी गई है, जिससे उड़ान के दौरान पायलट या वेपन सिस्टम ऑफिसर हथियार से संपर्क बनाए रख सकता है और जरूरत पड़ने पर आखिरी समय में भी जरूरी बदलाव कर सकता है।

सटीकता के मामले में SPICE-1000 को बेहद भरोसेमंद हथियार माना जाता है। इसका सर्कुलर एरर प्रोबेबल तीन मीटर से भी कम बताया जाता है यानी लक्ष्य से चूकने की संभावना बहुत कम होती है। यह क्षमता दिन और रात दोनों समय काम करती है और खराब मौसम में भी इसकी प्रभावशीलता बनी रहती है।

इसकी स्टैंड-ऑफ रेंज करीब 125 किलोमीटर तक है जिससे लड़ाकू विमान दुश्मन की एयर डिफेंस रेंज से बाहर रहते हुए ही हमला कर सकते हैं। भारतीय वायुसेना पहले ही SPICE-2000 और SPICE-250 जैसे वेरिएंट का इस्तेमाल कर चुकी है और 2019 के बालाकोट एयरस्ट्राइक में इनके सफल उपयोग ने इस हथियार प्रणाली पर वायुसेना का भरोसा और भी मजबूत कर दिया है।

DRDO का ‘गौरव’ बम

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने 8 से 10 अप्रैल 2025 के बीच भारतीय वायुसेना के Su-30 MKI लड़ाकू विमान से ‘गौरव’ के रिलीज ट्रायल को सफलतापूर्वक पूरा किया था। ट्रायल्स के दौरान गौरव बम को विमान के अलग-अलग स्टेशनों पर और विभिन्न वॉरहेड कॉन्फिगरेशन के साथ लगाया गया था। इन परीक्षणों के दौरान गौरव बम ने लगभग 100 किलोमीटर के करीब की दूरी से बेहद सटीक निशाना लगाने की क्षमता को सफलतापूर्वक साबित किया।

LRGB (Long Range Glide Bomb) ‘गौरव’ एक 1000 किलोग्राम श्रेणी का ग्लाइड बम है जिसे पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से डिजाइन और विकसित किया गया है। इसका विकास रिसर्च सेंटर इमारत, आर्मामेंट रिसर्च एंड डेवलपमेंट एस्टैब्लिशमेंट और इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज, चांदीपुर द्वारा किया गया है। इसके विकास में अदाणी डिफेंस और भारत फोर्ज जैसी निजी भारतीय कंपनियाँ भी सहयोग कर रही हैं। गौरव को खास तौर पर 1,000 किलोग्राम के हाई-स्पीड लो ड्रैग बम के लिए एक ग्लाइड और नेविगेशन किट के रूप में तैयार किया गया है, ताकि मौजूदा बमों को अपेक्षाकृत कम लागत में लंबी दूरी के सटीक हथियार में बदला जा सके।

‘गौरव’ की ताकत और उसकी सीमाएँ

गौरव बम में INS और SATNAV पर आधारित नेविगेशन सिस्टम लगाया गया है, जिसकी मदद से यह तय किए गए रास्ते पर उड़ते हुए सीधे अपने लक्ष्य तक पहुँच सकता है। इसके साथ ही इसमें सेमी-एक्टिव लेजर होमिंग सीकर लगाने की सुविधा भी है। इसका मतलब यह है कि जब लक्ष्य को लेजर से लाइट किया जाता है, तो गौरव बम बहुत सटीक तरीके से उस पर हमला कर सकता है। Su-30MKI लड़ाकू विमान से किए गए परीक्षणों में इस बम ने करीब 100 किलोमीटर तक मार करने की क्षमता दिखाई है। सही तरीके से लेजर टारगेटिंग होने पर इसकी सटीकता काफी बेहतर मानी जाती है।

हालाँकि, गौरव बम की कुछ सीमाएँ भी हैं। अभी इसमें SPICE-1000 की तरह अपना अलग EO या IR सीकर नहीं है। इस वजह से यह अपने आप लक्ष्य को पहचान नहीं सकता। इसकी सटीकता बाहरी लेजर डिजिग्नेशन पर निर्भर करती है, जो आमतौर पर ड्रोन या किसी दूसरे प्लेटफॉर्म के जरिए किया जाता है। इससे ऐसे प्लेटफॉर्म पर खतरा भी बढ़ सकता है और खराब मौसम में लेजर गाइडेंस पर असर पड़ने की संभावना रहती है।

रणनीतिक रूप से इसलिए जरूरी है SPICE-1000

SPICE-1000 और गौरव के बीच यही बुनियादी फर्क भारत की हथियार खरीद की रणनीति को समझने में मदद करता है। SPICE-1000 में मौजूद EO/IR सीकर उसे पूरी तरह आत्मनिर्भर बना देता है, जिससे बम अपने आप लक्ष्य को पहचान सकता है और हमले के तरीके में ज्यादा लचीलापन मिलता है। इसके उलट, गौरव को लक्ष्य पर सटीक हमला करने के लिए बाहर से लेजर सपोर्ट की जरूरत होती है।

इसका मतलब यह है कि लेजर से निशाना दिखाने वाले ड्रोन या दूसरे प्लेटफॉर्म को दुश्मन की एयर डिफेंस के करीब जाना पड़ता है और इससे उनका जोखिम बढ़ जाता है। इसके साथ ही, बादल, धूल, धुआँ या खराब मौसम जैसी स्थितियों में लेजर गाइडेंस ठीक से काम न करे तो पूरे मिशन की सफलता पर असर पड़ सकता है।

लागत और क्षमता के संतुलन के जरूरी SPICE-1000

रक्षा खरीद में लागत और क्षमता के बीच संतुलन बनाना हमेशा एक अहम चुनौती रहता है, खासकर तब जब देश के पास स्वदेशी विकल्प भी मौजूद हों। रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक SPICE-1000 किट की कीमत करीब 4.8 लाख अमेरिकी डॉलर यानी लगभग चार करोड़ रुपए बताई जाती है। इतनी ज्यादा कीमत होने के कारण इसे पूरी वायुसेना में बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करना व्यावहारिक नहीं माना जाता। फिर भी भारतीय वायुसेना इसे उन खास अभियानों के लिए जरूरी समझती है, जहाँ बहुत अहम और भारी सुरक्षा वाले लक्ष्यों को बेहद सटीक तरीके से नष्ट करना होता है।

वहीं, दूसरी तरफ ‘गौरव’ जैसी स्वदेशी प्रणाली कम लागत में तैयार की जा सकती है और इसे बड़ी संख्या में तैनात करना संभव है। यह खास तौर पर स्थायी बुनियादी ढाँचे जैसे ठिकानों पर हमले के लिए उपयोगी मानी जाती है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत इस समय एक मिश्रित रणनीति अपना रहा है, जिसमें सीमित संख्या में SPICE-1000 जैसे महँगे लेकिन बेहद सक्षम हथियार रखे जाएँगे जबकि बड़ी मात्रा में गौरव जैसे स्वदेशी और किफायती सिस्टम इस्तेमाल किए जाएँगे ताकि लागत और क्षमता दोनों के बीच संतुलन बना रहे।

रणनीतिक सोच और आत्मनिर्भर बनने की दिशा में बढ़ते कदम

SPICE-1000 की खरीद को DRDO की अनदेखी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसे तत्काल ऑपरेशनल जरूरतों को पूरा करने, मौजूदा क्षमता के अंतर को भरने और भविष्य में स्वदेशी प्रणालियों को समय के साथ और मजबूत होने का समय देने की रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। SPICE-1000 पहले से युद्ध में परखा हुआ भरोसेमंद हथियार है जबकि ‘गौरव’ जैसे स्वदेशी बम अभी विकास और परिपक्वता के चरण में हैं। आने वाले समय में गौरव में EO या IR सीकर और उन्नत मिशन प्रोफाइल जैसी क्षमताओं के जोड़े जाने की संभावना है। यह आने के बाद इसकी सटीकता और बढ़ जाएगी।

भारत की रक्षा नीति आत्मनिर्भरता पर जोर दे रही है लेकिन यह भी सुनिश्चित किया जा रहा है कि अगर किसी हथियार को डेवलप कर उसे उन्नत बनाने में समय लग रहा है तो इसका असर सेना पर ना पड़ने पाए। DRDO द्वारा विकसित गौरव जैसे स्वदेशी सिस्टम धीरे-धीरे भारत को रक्षा तकनीक में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में आगे ले जा रहे हैं।

इस तरह भारत की रणनीति साफ है कि एक ओर आवश्यक हथियारों के आयात से तत्काल सैन्य जरूरतों को पूरा किया जा रहा है तो वहीं दूसरी ओर स्वदेशी प्रणालियों के विकास के जरिए भविष्य में पूरी तरह आत्मनिर्भर बनने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं।

हिंदुओं की मौत पर भी चुप्पी, मुस्तफिजुर रहमान के सिर्फ IPL से जाने पर छलका दर्द: जहाँ रोज मर रहे हिंदू, उस बांग्लादेशी खिलाड़ी के लिए आँसू बहा रहा लेफ्ट-लिबरल गैंग

3 जनवरी 2025 को लेफ्ट-विंग लिबरल इकोसिस्टम को मोदी सरकार के खिलाफ बोलने का एक और कारण मिल गया, जब बोर्ड ऑफ कंट्रोल फॉर क्रिकेट इन इंडिया (BCCI) ने कोलकाता नाइट राइडर्स (KKR) को बांग्लादेशी क्रिकेटर मुस्तफिज़ुर रहमान को आने वाले इंडियन प्रीमियर लीग (IPL) सीजन से रिलीज करने का निर्देश दिया।

यह फैसला ऐसे समय में आया है जब बांग्लादेश में हिंदुओं को अगस्त 2024 में पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को हटाए जाने के बाद से टारगेटेड हिंसा का सामना करना पड़ रहा है। बांग्लादेशी खिलाड़ी रहमान को शामिल किए जाने पर लोगों में काफी गुस्सा था। इस राजनीतिक उथल-पुथल के बाद बेकाबू इस्लामी भीड़ ने हिंदुओं के घरों, मंदिरों पर हमला किया। हिन्दुओं की मॉब लिंचिंग हुई। इसके बाद बांग्लादेशी खिलाड़ियों को आईपीएल की टीम में सेलेक्शन का विरोध हुआ और बैन करने की माँग उठने लगी।

BCCI सेक्रेटरी देवजीत सैकिया ने कन्फ़र्म किया कि बोर्ड ने KKR को अपने फैसले के बारे में ऑफ़िशियली बता दिया था और अगर फ़्रैंचाइज़ी चाहे तो उसे रिप्लेसमेंट खिलाड़ी साइन करने की इजाज़त दे दी थी। KKR ने बाद में साफ़ किया कि उसने मुस्तफ़िज़ुर रहमान को अपनी टीम से रिलीज कर दिया है।

हिन्दुओं पर अत्याचारों की वजह से लोगों का गुस्सा

शेख हसीना को हटाए जाने के बाद लगातार भारत-बांग्लादेश के रिश्ते खराब होते जा रहे हैं, लेकिन हिंदू युवक दीपू चंद्र दास की मॉब लिंचिंग और ‘ईशनिंदा’ का आरोप लगा कर लगातार हिंदुओं पर हो रहे हमलों ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। ये घटनाएँ धार्मिक ज़ुल्म के एक बड़े पैटर्न का हिस्सा थीं, जिसे बांग्लादेशी सरकार पूरी तरह से रोकने में नाकाम रही है।

NDTV की गार्गी रावत ने इस कदम पर सवाल उठाते हुए ट्वीट किया: “सोचिए कि इससे हमारे पड़ोसी बांग्लादेश को कैसा मैसेज जाएगा। संगीत सोम ने अपने घरेलू दर्शकों के लिए पॉइंट्स बनाए होंगे, लेकिन इससे भारत की डिप्लोमेसी और रिश्तों को नुकसान होगा।”

राम गुहा, जो खुद को इतिहासकार बताते हैं और जिन्हें फैक्ट्स को तोड़-मरोड़कर पेश करने और कहानी गढ़ने का हुनर ​​है, ने बीसीसीआई के फैसले को ‘बहुत ही बेवकूफी भरा’ बताया। उन्होंने कहा कि ढाका के साथ अच्छे रिश्तों के लिए क्रिकेट के रिश्ते बहुत जरूरी हैं। इस तरह का कदम बांग्लादेश को इस्लामाबाद के और करीब ला सकता है।

विदेशी मामलों की एडिटर सुहासिनी हैदर ने कहा कि विदेश मंत्री एस जयशंकर बांग्लादेश जा सकते हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बांग्लादेशी नेताओं से मिल सकते हैं, लेकिन एक क्रिकेटर को भारत में खेलने का हक नहीं दिया जा रहा है।

इसी बात में और जोड़ते हुए, ‘कॉलमिस्ट’ सबा नकवी ने भी BCCI के निर्देश के कुछ घंटों बाद कहा कि भारत ने दक्षिण एशिया में अपनी सारी ‘नैतिक प्रतिष्ठा’ खो दी है और एक बांग्लादेशी खिलाड़ी को कमर्शियल लीग में खेलने की इजाजत न देकर ‘मतलबी’ बन गया है।

X पर एक लंबे पोस्ट में, नकवी ने कहा कि बांग्लादेश की आजादी में भारत की ऐतिहासिक भूमिका रही है। बांग्लादेश का राष्ट्रगान रवींद्रनाथ टैगोर का लिखा हुआ है। भारत में अभी भी बांग्लादेशी की पूर्व प्रधानमंत्री की मेजबानी कर रहा है, ऐसे हालात में ये फैसला नहीं होना चाहिए था।

उन्होंने आगे दावा किया कि भारत एक ‘बड़ी ताकत की तरह नहीं, बल्कि घटिया और असभ्य स्क्रिप्ट’ चुन रहा है, जो कथित तौर पर आने वाले राज्यों के चुनावों और ‘हिंदू कट्टरपंथियों’ की वजह से हो रहा है। अंत में उन्होंने दुख जताया कि भारत एक ‘नैतिक ताकत जिसकी दुनिया तारीफ़ करती थी’ को गिरा दिया है।

यह तर्क नैतिकता की चिंता के लिए नहीं, बल्कि बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे अत्याचार को महत्वहीन बनाने के लिए दिया गया है। एक बार फिर हिन्दुओं के साथ हो रही हिंसा को एक छोटी सी परेशानी माना गया, जबकि एक विदेशी एथलीट को प्राइवेट लीग से बाहर करने को सभ्यता का संकट बना दिया गया।

नैतिकता में ‘चुनाव’ और पाखंड

नैतिकता पर ये उपदेश सिर्फ भारत की सरकार के लिए होते हैं। अगर विराट कोहली को राजनीतिक कारणों से किसी विदेशी देश में खेलने से रोक दिया जाता, तो वही वामपंथी विचारक तुरंत इसे भारत की विदेश नीति की नाकामी बता देते। कोई भी बैन लगाने वाले देश पर सवाल नहीं उठाता। इसके बजाय, नई दिल्ली से खुद को समझाने के लिए कहा जाता।

यह तरीका सिर्फ खेलों तक ही सीमित नहीं है। जब डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर टैरिफ लगाए, तो लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम भारत की विदेश नीति पर सवाल खड़े करने लगा। कुछ लोगों ने पूछा कि अमेरिका भारत को वॉशिंगटन के फायदे वाले ट्रेड डील के लिए मजबूर क्यों कर रहा था। हमेशा की तरह, सबसे पहले भारत पर इल्जाम लगाया गया।

चाहे मुद्दा डिप्लोमेसी हो, ट्रेड हो, या क्रिकेट, स्क्रिप्ट में कोई बदलाव नहीं होता। भारत का खुद को साबित करना एक नैतिक नाकामी के तौर पर दिखाया जाता है। भारत का जनता की भावनाओं पर प्रतिक्रिया देना मेजॉरिटी की दादागिरी के तौर पर दिखाया जाता है। इसके अलावा सरकार जब अपने फैसले ‘एलीट क्लास’ की मंज़ूरी के बगैर लेती है तो इसे सभ्यता का पतन बताया जाता है।

(यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी में लिखा गया है, इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें)

अमेरिकी हमले के बाद डेल्सी रोड्रिगेज के हाथों में वेनेजुएला की कमान, SC ने बनाया अंतरिम राष्ट्रपति: जानें कौन हैं तेल से लेकर विदेश जैसे मंत्रालयों की जिम्मेदारी संभाल चुकीं ‘टाइगर’

अमेरिका द्वारा वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को पकड़कर न्यूयॉर्क ले जाए जाने के बाद वेनेजुएला में सत्ता की जिम्मेदारी डेल्सी रोड्रिगेज के हाथों में आ गई है। देश के सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें तत्काल अंतरिम राष्ट्रपति घोषित किया है ताकि प्रशासनिक कार्यों और राष्ट्रीय सुरक्षा में निरंतरता बनी रहे।

हालाँकि, मादुरो ने पहले ही कहा था कि वे देश के राष्ट्रपति हैं लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि डेल्सी रोड्रिगेज ने राष्ट्रपति पद की शपथ ले ली है और वे अमेरिका के निर्देशानुसार देश को चलाने में सहयोग कर रही हैं।

कौन हैं डेल्सी रोड्रिगेज?

डेल्सी रोड्रिगेज का जन्म 18 मई 1969 को वेनेजुएला की राजधानी काराकास में हुआ। उनके पिता, जॉर्ज एंटोनियो रोड्रिगेज, 1970 के दशक में लेफ्ट-विंग गेरिल्ला फाइटर और लीगा सोशलिस्टा पार्टी के संस्थापक थे। डेल्सी ने कैराकास स्थित सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ वेनेजुएला से लॉ की पढ़ाई की और बाद में विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में भी काम किया।

56 साल की डेल्सी रोड्रिगेज दो दशक से अधिक समय से वेनेजुएला की राजनीति में सक्रिय हैं और चैविज्म (Hugo Chavez द्वारा स्थापित राजनीतिक आंदोलन) की प्रमुख समर्थक हैं। मादुरो भी चैविज्म के अनुयायी हैं और उन्होंने 2013 में ह्यूगो चावेज की मृत्यु के बाद इसे आगे बढ़ाया है।

उनकी राजनीतिक यात्रा उनके भाई जॉर्ज रोड्रिगेज के साथ करीबी सहयोग पर आधारित रही है, जो वर्तमान में नेशनल असेंबली के अध्यक्ष हैं। डेल्सी ने देश में कई अहम पदों पर काम किया है। 2014 से 2017 तक उन्होंने वेनेजुएला की कम्युनिकेशन और इंफॉर्मेशन मिनिस्ट्री संभाली।

इसके बाद उन्होंने विदेश मंत्रालय की जिम्मेदारी भी संभाली, जहाँ उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर मादुरो सरकार का समर्थन किया और मानवाधिकार उल्लंघनों और चुनावी विवादों की आलोचना का जवाब दिया।

राजनीतिक करियर और अहम पद

डेल्सी रोड्रिगेज 2017 में प्रॉ-गवर्नमेंट कांस्टीट्यूएंट असेंबली की अध्यक्ष बनीं थी, इससे पहले 2015 में उन्होंने चुनावों में मादुरो का समर्थन किया था। 2018 में मादुरो ने उन्हें अपने दूसरे कार्यकाल में उप-राष्ट्रपति बनाया। मादुरो ने उन्हें ‘एक युवा, बहादुर, अनुभवी, क्रांतिकारी और हजारों संघर्षों में जाँची परखी महिला’ बताया है।

मादुरो के जुलाई 2024 में हुए चुनावों के विवाद के बाद 2025 में डेल्सी ने तीसरे कार्यकाल में भी उप-राष्ट्रपति पद संभाला। विपक्ष ने इन चुनावों को धोखाधड़ी करार दिया और दावा किया कि देश के वास्तविक राष्ट्रपति एम्बेसडर एडमुंडो गोंजालेज उरूतिया हैं। इसके बावजूद डेल्सी रोड्रिगेज मादुरो के शासन में लगातार बनी रहीं।

वे वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था और तेल मंत्रालय की प्रमुख भी रही हैं। अगस्त 2024 में मादुरो ने तेल मंत्रालय का काम उन्हें सौंपा ताकि वे अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद देश की सबसे महत्वपूर्ण उद्योग शाखा को संभाल सकें। उन्होंने बढ़ती महँगाई को काबू करने के लिए परंपरागत आर्थिक नीतियों को अपनाया।

राजनीतिक विशेषज्ञ जोस मैनुअल रोमानो के अनुसार, डेल्सी को मादुरो का पूर्ण विश्वास प्राप्त है। उनके पास पूरे सरकारी तंत्र और रक्षा मंत्रालय पर भी काफी प्रभाव है।

सुप्रीम कोर्ट की भूमिका

वेनेजुएला के सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार (3 जनवरी 2026) को डेल्सी रोड्रिगेज को अंतरिम राष्ट्रपति घोषित किया और आदेश दिया कि वे राष्ट्रपति के सभी अधिकारों और कर्तव्यों का निर्वहन करें। कोर्ट ने मादुरो को स्थायी रूप से अनुपस्थित घोषित नहीं किया, जिसके लिए 30 दिनों के भीतर चुनाव कराना अनिवार्य है।

मादुरो के पकड़े जाने के तुरंत बाद डेल्सी ने राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठक की अध्यक्षता की। इस बैठक में कई वरिष्ठ अधिकारी और मंत्री शामिल हुए। उन्होंने राष्ट्रपति और प्रथम महिला की तुरंत रिहाई की माँग की और अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की आलोचना की।

वेनेजुएला के संविधान के अनुच्छेद 233 और 234 के अनुसार, राष्ट्रपति की अस्थायी या स्थायी अनुपस्थिति में उप-राष्ट्रपति को सभी कार्यकारी जिम्मेदारियों का निर्वाह करना होता है। डेल्सी ने देश के कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों पर नियंत्रण रखने के कारण इस समय सत्ता के केंद्र में हैं।

डेल्सी रोड्रिगेज का प्रभाव और अंतरराष्ट्रीय पहचान

डेल्सी रोड्रिगेज को कई देशों ने प्रतिबंधित किया है और पड़ोसी कोलंबिया में प्रवेश पर रोक है। वे वेनेजुएला की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय और प्रभावशाली रही हैं। मादुरो ने उन्हें उनके साहस के चलते ‘टाइगर’ का नाम दिया था।

डेल्सी ने सरकार में अपने करियर की शुरुआत 2003 में की। उन्होंने वेनेजुएला के उप-राष्ट्रपति कार्यालय के जनरल कॉर्डिनेशन विभाग में काम करना शुरू किया। 2006 में उन्होंने राष्ट्रपति ह्यूगो चावेज के कार्यकाल में मिनिस्टर फॉर प्रेसीडेंशियल अफेयर्स के रूप में काम किया। 2013 में मादुरो ने उन्हें कम्युनिकेशन और इंफॉर्मेशन मिनिस्ट्री का जिम्मा दिया। 2014 में वे विदेश मंत्री बनीं और वेनेजुएला में यह पद संभालने वाली पहली महिला बनीं।

उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और तेल मंत्रालय में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 2017 में उन्होंने कांस्टीट्यूएंट नेशनल असेंबली में प्रवेश किया, जिसने मादुरो के शक्तियों को और बढ़ाया। 2018 में उन्हें उप-राष्ट्रपति बनाया गया।

वेनेजुएला में डेल्सी रोड्रिगेज का प्रभाव

निकोलस मादुरो को अचानक अमेरिका द्वारा पकड़े जाने के बाद वेनेजुएला की कमान अब डेल्सी रोड्रिगेज को सौंप दी गई है। वह लंबे समय से मादुरो की करीबी रही हैं और सरकार में अहम जिम्मेदारियाँ संभाल चुकी हैं। राजनीति और प्रशासन का उन्हें अच्छा अनुभव है, इसलिए मौजूदा संकट के समय में उनकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो गई है।

कानून, राजनीति और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश का पक्ष रखने में वह काफी माहिर मानी जाती हैं। अमेरिका की सैन्य कार्रवाई और देश में बने सत्ता के खालीपन के बीच अब डेल्सी रोड्रिगेज के हर फैसले पर न सिर्फ वेनेजुएला बल्कि पूरी दुनिया की नजर टिकी रहेगी।

कभी नोबेल पुरस्कार के लिए जताया ट्रंप का आभार, कभी लोकतंत्र बहाली की उठाई माँग: क्या इसी सत्ता परिवर्तन के लिए वेनेजुएला की विपक्षी नेता महीनों से लगा रही थीं अमेरिका को मक्खन?

अमेरिका ने शनिवार (3 जनवरी 2026) को वेनेजुएला पर कई हवाई हमले किए। राजधानी कराकस में रात करीब 2 बजे लड़ाकू विमानों से कई ठिकानों पर बमबारी की गई जिसके बाद अफरा-तफरी मच गई। इन हमलों की पुष्टि खुद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ट्रुथ सोशल पर की। ट्रंप ने कहा कि अमेरिकी सेना ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को हिरासत में लेकर अमेरिका पहुँचा दिया है।

अमेरिकी अटॉर्नी जनरल पाम बॉन्डी ने बताया कि मादुरो और उनकी पत्नी पर न्यूयॉर्क के साउदर्न डिस्ट्रिक्ट में नार्को-टेररिज्म साजिश, कोकीन तस्करी, मशीनगन और घातक हथियार रखने व उसकी साजिश जैसे गंभीर आरोपों में मुकदमा दर्ज किया गया है।

यह हमला अचानक नहीं माना जा रहा बल्कि अमेरिका से टकराव के बाद वेनेजुएला में लंबे समय से चल रहे सत्ता परिवर्तन के प्रयासों का हिस्सा बताया जा रहा है। खास बात यह है कि यह कार्रवाई उस समय हुई है, जब कुछ महीने पहले विपक्षी नेता मारिया मचाडो ने नोबेल शांति पुरस्कार जीतने के बाद इसे अमेरिकी राष्ट्रपति को समर्पित किया था और वेनेजुएला में ‘आजादी और लोकतंत्र’ के लिए अमेरिकी हस्तक्षेप की खुलकर माँग की थी।

मारिया मचाडो के नोबेल शांति पुरस्कार जीतने पर प्रतिक्रिया देते हुए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि उन्होंने उनसे फोन पर बात की थी। ट्रंप के मुताबिक, मचाडो ने उनसे कहा कि उन्होंने यह नोबेल पुरस्कार उनके सम्मान में स्वीकार किया है और उनका मानना है कि इसके असली हकदार ट्रंप ही हैं। दोनों नेताओं के बीच दिखी यह आपसी सराहना वेनेजुएला में बीते और आने वाले घटनाक्रम की दिशा को लेकर किसी तरह का संदेह नहीं छोड़ती।

दिसंबर 2025 में मारिया मचाडो ने राष्ट्रपति निकोलस मादुरो पर अमेरिकी दबाव का समर्थन किया था। उन्होंने दुनियाभर से अपील की थी कि वेनेजुएला में तानाशाही शासन से जुड़े ड्रग्स, हथियारों और मानव तस्करी के पैसों की सप्लाई रोकी जाए। मचाडो ने कहा था कि उन्हें पूरी उम्मीद है कि वेनेजुएला जल्द आजाद होगा और यह बहुत जल्दी होने वाला है।

ट्रंप ने मादुरो सरकार पर नारकोटिक आतंकवाद का आरोप लगाया

अमेरिका और वेनेजुएला के बीच टकराव की मुख्य वजह राष्ट्रपति निकोलस मादुरो सरकार पर लगाए गए अमेरिकी आरोप हैं। अमेरिका का दावा है कि मादुरो शासन ने हजारों प्रवासियों को जबरन अमेरिका की दक्षिणी सीमा की ओर धकेला और अमेरिकी क्षेत्र में नशीले पदार्थों की तस्करी करवाई। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आरोप लगाया कि मादुरो ने जेलों और मानसिक अस्पतालों से कैदियों को निकालकर अमेरिका भेजा।

ट्रंप ने मादुरो पर ड्रग तस्करी में शामिल होने और आतंकी संगठनों से जुड़े होने के भी आरोप लगाए। उनका कहना है कि वेनेजुएला कोकीन तस्करी का बड़ा ट्रांजिट रूट बन गया है, जिससे अमेरिका में ड्रग संकट गहराया। ट्रंप के मुताबिक, वेनेजुएला की नावें कैरेबियन और पूर्वी प्रशांत महासागर के रास्ते नशीले पदार्थों की तस्करी कर रही थीं।

ड्रग कार्टेल से निपटने के पारंपरिक अमेरिकी तरीकों से हटकर, ट्रंप प्रशासन ने सितंबर 2025 में वेनेजुएला के ड्रग कार्टेल्स के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया। बीते महीनों में अमेरिका ने संदिग्ध ड्रग तस्करी वाली नावों पर हमले किए, जिसे ट्रंप ने ‘ड्रग्स के खिलाफ जंग’ बताया।

आजादी का समय आ गया है: अमेरिकी हमले के बाद मारिया

वेनेजुएला में अमेरिकी हवाई हमलों के बाद मारिया ने X पर बयान जारी किया है। मारिया ने लिखा, “वेनेजुएला के लोगों आजादी का समय आ गया है। अमेरिका की सरकार ने कानून बनाए रखने का अपना वादा पूरा किया है। हम व्यवस्था बहाल करेंगे, राजनीतिक कैदियों को रिहा करेंगे, एक शानदार देश बनाएँगे और अपने बच्चों को घर वापस लाएँगे।”

उन्होंने आगे कहा, “आज हम अपना जनादेश लागू करने और सत्ता संभालने के लिए तैयार हैं। जब तक लोकतांत्रिक परिवर्तन पूरा नहीं हो जाता, तब तक हम सतर्क, सक्रिय और संगठित रहें। एक ऐसा परिवर्तन जिसमें हम सभी की जरूरत है।”

वेनेजुएला पर US का हमला, सत्ता परिवर्तन का ऑपरेशन

साल 2020 में न्यूयॉर्क के साउदर्न डिस्ट्रिक्ट में निकोलस मादुरो पर ‘नार्को-टेररिज्म साजिश’ के आरोपों में मामला दर्ज किया गया था। अमेरिका का कहना है कि वह ड्रग कार्टेल्स के साथ सशस्त्र संघर्ष में है और इन्हीं कार्टेल्स को मादुरो संरक्षण देते हैं या उनका नेतृत्व करते हैं।

हालाँकि, वेनेजुएला के राष्ट्रपति मादुरो इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते रहे हैं। उनका कहना है कि यह अमेरिका की साजिश है, जिसका मकसद उन्हें सत्ता से हटाकर वेनेजुएला के तेल संसाधनों पर कब्जा करना है।

गौर करने वाली बात यह है कि अमेरिकी हमलों से कुछ दिन पहले ही मादुरो ने ड्रग तस्करी और अवैध प्रवासन के मुद्दों पर अमेरिका के साथ सहयोग की पेशकश की थी। 2020 में दर्ज मामले को देखते हुए यह कयास लगाए जा रहे हैं कि मादुरो को अमेरिका में उन आरोपों का सामना करना पड़ सकता है। वहीं, राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर भी देश के भीतर सवाल उठ सकते हैं, क्योंकि वेनेजुएला पर हमला कॉन्ग्रेस की मंजूरी के बिना किया गया।

वेनेजुएला में जो कुछ हो रहा है, वह दुनिया के लिए नया नहीं है। इससे पहले वियतनाम, इराक,अफगानिस्तान और सीरिया जैसे देशों में भी इसी तरह की रणनीति देखी जा चुकी है, जहाँ अमेरिका ने अपने विरोधी शासन को गिराकर मनपसंद सत्ता स्थापित करने की कोशिश की है।

(यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में अदिति ने लिखी है जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करे)

भारत-विरोधी वैश्विक ताकतें एकजुट: जिहादी सोच वाली इल्हान उमर से भारत-विरोधी प्रमिला जयपाल तक, 8 अमेरिकी सांसदों ने उमर खालिद को ‘फ्री’ करने के लिए लिखा पत्र, कई राहुल गाँधी से कर चुके मुलाकात

इस्लामो-वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोग अपने समर्थकों का खुलकर बचाव करते हैं। अब चाहे उन पर आतंकवाद से सहानुभूति, देश विरोधी गतिविधियों या दंगों की साजिश जैसे गंभीर आरोप ही क्यों न हों। ऐसा ही एक नाम है उमर खालिद, जो 2020 के दिल्ली दंगों का आरोपित है और पिछले पाँच साल से अधिक समय से जेल में बंद है।

उमर खालिद को लेकर देश और विदेश के वामपंथी और तथाकथित उदारवादी मीडिया से लेकर तमाम नेता तक लगातार उसके समर्थन में आवाज उठाते रहे हैं। इसी कड़ी में अब अमेरिका से उमर खालिद प्रेम नया मामला सामने आया है, जिसे ‘फ्री उमर खालिद’ अभियान का हिस्सा माना जा रहा है। मंगलवार (30 दिसंबर 2025) को अमेरिका के डेमोक्रेट पार्टी के 8 सांसदों ने भारत सरकार को एक पत्र लिखकर उमर खालिद को जमानत देने और निष्पक्ष सुनवाई की माँग की है।

इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में इल्हान उमर, राशिदा तलीब, प्रमिला जयपाल, जिम मैकगवर्न, जैमी रस्किन, क्रिस वैन हॉलन, पीटर वेल्च, जैन शाकोव्स्की और लॉयड डॉगेट शामिल हैं।

यह पत्र भारत में अमेरिका के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा के नाम लिखा गया है। इसमें अमेरिकी सांसदों ने लिखा कि वे फरवरी 2020 के दिल्ली दंगों से जुड़े मामलों में आरोपितों की लंबे समय से चल रही हिरासत को लेकर परेशान हैं, जिनमें छात्र नेता और शोधकर्ता बताया गया उमर खालिद भी शामिल हैं।

पत्र में इन सांसदों ने लोकतंत्र, आजादी, कानून का शासन, मानवाधिकार और बहुलतावाद जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए भारतीय सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश की है। उन्होंने यह संकेत देने की कोशिश की कि उमर खालिद निर्दोष है और उसे रिहा किया जाना चाहिए।

इन सांसदों ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ हुए प्रदर्शनों को शांतिपूर्ण बताया और 2020 के दिल्ली दंगों में मुसलमानों को पीड़ित के रूप में दिखाया गया है।

अमेरिकी सांसद जिम मैकगवर्न ने CAA को मौलिक रूप से भेदभावपूर्ण बताया और कहा कि यह कानून मुसलमानों को बाहर रखता है। हालाँकि, इन सांसदों ने यह नहीं बताया कि इस्लामिक या मुस्लिम बहुल देशों में मुस्लिमों को उनके मजहब होने के कारण कैसे प्रताड़ित किया जा सकता है, जबकि CAA उन्हीं अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने की बात करता है जो वहाँ सताए जाते हैं।

आलोचकों का कहना है कि अमेरिकी डेमोक्रेट नेताओं ने इस पूरे मामले में भारत की संप्रभुता, न्यायिक प्रक्रिया और जमीनी सच्चाई को नजरअंदाज करते हुए एकतरफा रुख अपनाया है और सामान्य तर्क को भी भेदभाव बताने की कोशिश की है।

अमेरिका के डेमोक्रेट सांसदों ने उमर खालिद के लंबे समय से जेल में रहने को सरकार की नाइंसाफी और सही कानूनी प्रक्रिया न होने का नतीजा बताने की कोशिश की। उन्होंने इशारों-इशारों में उसे बेगुनाह भी दिखाने का प्रयास किया। लेकिन हकीकत यह है कि यह बात जमीनी तथ्यों से मेल नहीं खाती है।

ऑपइंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, 2023 और 2024 में उमर खालिद के मामले में कुल 14 बार सुनवाई टली जिनमें से कम से कम 7 बार तारीख टालने की माँग खुद उमर खालिद की ओर से की गई थी। इससे साफ है कि जमानत याचिका वापस लेने की वजह कोर्ट की देरी नहीं बल्कि बचाव पक्ष द्वारा बार-बार माँगी गई तारीखें थीं।

इसके बावजूद इस्लामो-वामपंथी समूह लगातार नाइंसाफी का शोर मचाते रहे। हकीकत यह है कि उमर खालिद की लंबे समय तक जेल में रहने की एक बड़ी वजह उसके वकीलों द्वारा मनचाहे जज से सुनवाई कराने की कोशिश यानी ‘फोरम शॉपिंग’ रही। इस पर भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने भी टिप्पणी की थी।

उन्होंने कहा था कि समस्या अदालतों में नहीं बल्कि कुछ वकीलों और राजनीतिक समूहों की उस सोच में है जो चाहते हैं कि उनके मामले केवल कुछ खास जज ही सुनें। कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक, वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल के नेतृत्व में उमर खालिद की कानूनी टीम ने कम से कम 7 बार सुनवाई टलवाई और आखिरकार फरवरी 2024 में परिस्थितियों में बदलाव का हवाला देकर जमानत याचिका वापस ले ली।

अमेरिकी सांसदों और अमेरिका की संस्था USCIRF (United States Commission on International Religious Freedom) ने दिल्ली दंगों के अन्य आरोपितों शरजील इमाम, गुलफिशा फातिमा और खालिद सैफी को भी मजहबी स्वतंत्रता के उल्लंघन का शिकार बताने की कोशिश की। जबकि इन पर गंभीर आरोप हैं।

शरजील इमाम ने भारत के चिकन नेक कॉरिडोर को अलग करने की बात कही थी, जो भारत को पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ता है। गुलफिशा फातिमा पर आरोप है कि उसने 2020 में मुस्लिम महिलाओं को हिंसक प्रदर्शनों के लिए उकसाया और पुलिस पर डंडों और लाल मिर्च पाउडर से हमला करवाया। वहीं, अब्दुल खालिद सैफी पर हथियारों की व्यवस्था के लिए फंड जुटाने और प्रदर्शन स्थलों को चलाने का आरोप है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि USCIRF पर पहले से ही भारत विरोधी एजेंडा चलाने के आरोप लगते रहे हैं। इस संस्था पर इस्लामी चरमपंथियों को कार्यकर्ता बताने, हिंदुओं को बदनाम करने और लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई मोदी सरकार को निशाना बनाने के आरोप हैं। यह सब भारत में मजहबी स्वतंत्रता के नाम पर किया जाता है।

डेमोक्रेट सांसदों के पत्र में 2020 के दिल्ली दंगों को भड़काने वालों को और मुस्लिम समुदाय को पीड़ित के तौर पर दिखाया गया, साथ ही इशारों में यह भी कहा गया कि दंगों के लिए हिंदू जिम्मेदार थे। लेकिन इस पत्र में यह उल्लेख नहीं किया गया कि उन्हीं दंगों में दिल्ली पुलिस के एक हेड कांस्टेबल और इंटेलिजेंस ब्यूरो के एक कर्मचारी की मौत हुई थी।

यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान ममदानी, जो अपने हिंदू और भारत विरोधी बयानों के लिए जाने जाते हैं, उसने उमर खालिद के समर्थन में एक पत्र लिखा। इन सभी तथ्यों को देखते हुए यह स्पष्ट होता है कि अमेरिकी डेमोक्रेट सांसदों का यह पत्र पक्षपाती है, मुस्लिम पीड़ित होने की राजनीति से प्रेरित है और दिल्ली दंगों व भारत की न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े अहम तथ्यों को नजरअंदाज करता है।

जिम मैकगवर्न: CAA और धर्मांतरण विरोधी कानूनों का विरोध, भारत को धार्मिक स्वतंत्रता के लिए चिंता बताने की वकालत और अब उमर खालिद के लिए रोना

जेम्स पैट्रिक मैकगवर्न, जिन्हें आमतौर पर जिम मैकगवर्न कहा जाता है, साल 2013 से अमेरिका के मैसाचुसेट्स के दूसरे संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मोदी सरकार और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के लगातार आलोचक रहे हैं। मैकगवर्न कई बार यह दावा कर चुके हैं कि मोदी सरकार के कार्यकाल में भारत में मानवाधिकार, मजहबी स्वतंत्रता और लोकतंत्र कमजोर हो रहे हैं।

जनवरी 2022 में जिम मैकगवर्न ने भारत के 73वें गणतंत्र दिवस के अवसर पर आयोजित एक विशेष अमेरिकी संसदीय ब्रीफिंग को संबोधित किया था। इस ब्रीफिंग में उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी सरकार हिंदू राष्ट्रवादी नीतियों को बढ़ावा दे रही है और देश में मजहबी स्वतंत्रता व मानवाधिकार पीछे जा रहे हैं।

उन्होंने भारतीय इस्लामो-वामपंथी समूहों द्वारा फैलाए जा रहे इस दावे को भी दोहराया कि नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) मिलकर मुसलमानों के खिलाफ भेदभाव को संस्थागत रूप देंगे। इस कार्यक्रम में भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी भी शामिल थे।

यह ब्रीफिंग अमेरिका की 17 तथाकथित अधिकार संगठनों के गठबंधन द्वारा आयोजित की गई थी, जिनमें इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (IAMC), हिंदूज़ फॉर ह्यूमन राइट्स (HfHR) और सिख कोएलिशन जैसी संस्थाएँ शामिल थीं। इन संगठनों पर लंबे समय से भारत और हिंदुओं के खिलाफ दुष्प्रचार करने और अमेरिका में हिंदू समुदाय के खिलाफ लॉबिंग करने के आरोप लगते रहे हैं।

मैकगवर्न ने दावा किया था कि 2019 में पहली बार भारत में ऐसा कानून पास हुआ जिसने नागरिकता को धर्म से जोड़ा और CAA को NRC के साथ जोड़ते हुए यह डर फैलाया कि इससे मुसलमानों के खिलाफ भेदभाव होगा।

जबकि हकीकत यह है कि CAA का NRC से कोई संबंध नहीं है और यह कानून भारतीय मुसलमानों से जुड़ा ही नहीं है। CAA को 2024 में लागू किया गया और इसके तहत पाकिस्तान, बांग्लादेश व अन्य मुस्लिम-बहुल देशों से आए प्रताड़ित हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन और ईसाई अल्पसंख्यकों को नागरिकता दी जा रही है। अब तक किसी भी भारतीय नागरिक की नागरिकता नहीं छीनी गई है।

2019 में यह सवाल जरूर उठा था कि CAA में मुसलमानों को क्यों नहीं जोड़ा गया, खासकर जब पाकिस्तान में शिया और अहमदिया समुदाय पर अत्याचार होते हैं। लेकिन इसकी वजह भेदभाव नहीं है। असल में शिया और अहमदिया खुद को मुसलमान मानते हैं, इसलिए उनके साथ होने वाली हिंसा को धार्मिक अल्पसंख्यकों पर अत्याचार नहीं बल्कि मुस्लिम समुदाय के भीतर की सांप्रदायिक हिंसा माना जाता है। इसके बावजूद जिम मैकगवर्न आज भी CAA को भेदभाव वाला कानून बताते हैं।

हाल ही में उमर खालिद को जमानत और निष्पक्ष सुनवाई की माँग वाले पत्र पर हस्ताक्षर करते हुए भी उन्होंने इसी झूठे नैरेटिव को दोहराया। उन्होंने मदर टेरेसा द्वारा स्थापित मिशनरीज ऑफ चैरिटी का विदेशी फंडिंग लाइसेंस (FCRA) नवीनीकरण न होने को ईसाइयों के खिलाफ भेदभाव बताया जबकि असल वजह यह थी कि संस्था ने जरूरी दस्तावेज जमा नहीं किए थे। दस्तावेज पूरे होते ही कुछ ही दिनों में लाइसेंस बहाल कर दिया गया।

मैकगवर्न ने यह भी कहा कि मजहबी पहचान के आधार पर भेदभाव की चिंता इतनी गंभीर है कि USCIRF ने भारत को कंट्री ऑफ पर्टिकुलर कंसर्न घोषित करने की सिफारिश की है। उन्होंने मोदी सरकार द्वारा लागू किए गए UAPA और अन्य सख्त आतंकवाद विरोधी कानूनों पर भी आरोप लगाया कि इनका इस्तेमाल पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और असहमति रखने वालों को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है।

हालाँकि, उन्होंने यह नजरअंदाज कर दिया कि इन कानूनों के तहत कार्रवाई पत्रकारिता या एक्टिविज्म के कारण नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और देश की अखंडता को खतरे में डालने वाली गतिविधियों के आरोपों के आधार पर की जाती है।

जिम मैकगवर्न का झुकाव इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (IAMC) जैसी खुलकर हिंदू-विरोधी संस्थाओं की ओर भी रहा है। साल 2016 में IAMC ने वॉशिंगटन डीसी में टॉम लैंटोस ह्यूमन राइट्स कमीशन के सामने गवाही दी थी, जिसमें भारत में मजहबी अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभाव का आरोप लगाया गया। मैकगवर्न ने IAMC के इन दावों को दोहराया। IAMC पर प्रतिबंधित आतंकी संगठन SIMI से जुड़े होने के आरोप भी लग चुके हैं।

दिलचस्प बात यह है कि उमर खालिद के पिता सैयद कासिम रसूल इलियास SIMI के पूर्व सदस्य रह चुके हैं और वह वेलफेयर पार्टी ऑफ इंडिया के प्रमुख नेता हैं। नवंबर 2025 में इस पार्टी के छात्र संगठन ने दिल्ली में तथाकथित ‘एंटी एयर पॉल्यूशन’ प्रदर्शन में हिस्सा लिया, जिसे कई लोग अर्बन नक्सलियों का विरोध प्रदर्शन मानते हैं।

IAMC के संस्थापक शेख उबैद के जरिए इस संगठन के लश्कर-ए-तैयबा (LeT) और जमात-ए-इस्लामी (JeI) से संबंधों के भी आरोप हैं। IAMC पर USCIRF के जरिए भारत को बदनाम करने, फर्जी खबरें फैलाने और इस्लामी एजेंडा आगे बढ़ाने के आरोप लगते रहे हैं। 2021 में इस पर UAPA भी लगाया गया था। यह संगठन अक्सर हिंदू राष्ट्रवाद के नाम पर भारत और अमेरिका के हिंदुओं को बदनाम करने वाली रिपोर्टें जारी करता है और जोहरान ममदानी जैसे भारत-विरोधी नेताओं का समर्थन करता रहा है।

2019 में जब मोदी सरकार ने अनुच्छेद 370 और 35A हटाकर जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म किया, तब भी मैकगवर्न ने भारत पर बड़े पैमाने पर मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगाए थे। उन्होंने दावा किया कि नेताओं को हिरासत में लिया गया, पत्रकारों पर पाबंदी लगाई गई और प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग हुआ। इसी मुद्दे पर मैकगवर्न ने जेमी रस्किन, जैन शाकोव्स्की और लॉयड डॉगेट के साथ मिलकर एक प्रस्ताव का समर्थन किया था, जिसमें भारत से जम्मू-कश्मीर में संचार प्रतिबंध और हिरासत खत्म करने की माँग की गई थी। इस प्रस्ताव को प्रमिला जयपाल ने पेश किया था, जो उमर खालिद के समर्थन वाले इस पत्र की भी हस्ताक्षरकर्ता हैं।

जून 2025 में मैकगवर्न ने IAMC से जुड़ी संस्था हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स (H4HR) की सदस्य रिया चक्रवर्ती के साथ मिलकर भारत को मजहबी स्वतंत्रता के मामले में कंट्री ऑफ पर्टिकुलर कंसर्न घोषित करने की माँग की। उन्होंने खालिस्तानी अलगाववादी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू का भी समर्थन किया और भारत पर ट्रांसनेशनल दमन का आरोप लगाया। मैकगवर्न लगातार खालिस्तानी गतिविधियों को भारत द्वारा सिखों पर अत्याचार के रूप में पेश करते रहे हैं।

कुल मिलाकर देखा जाए तो जिम मैकगवर्न लंबे समय से मुस्लिम पीड़ित होने की कहानी, भारत के खिलाफ प्रचार और हिंदुओं को असहिष्णु व दमनकारी बताने वाले इस्लामो-वामपंथी नजरिये को बढ़ावा देते रहे हैं। इसी सोच के तहत उन्होंने उमर खालिद के समर्थन में लिखे गए पत्र पर भी हस्ताक्षर किए।

जैन शाकोव्स्की: भारत में इस्लामोफोबिया का रोना रोया, राहुल गाँधी से मिलीं और उमर खालिद के लिए माँगी बेल

जैनिस या जैन शाकोव्स्की अमेरिका के इलिनॉय राज्य के 9वें संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करती हैं। वह सार्वजनिक रूप से भारत–अमेरिका के अच्छे संबंधों की बात करती रही हैं, लेकिन इसके साथ-साथ वह भारत के संदर्भ में मुस्लिम पीड़ित होने का नैरेटिव आगे बढ़ाने वाली गतिविधियों में भी शामिल रही हैं। 2021 में जैन शाकोव्स्की ने कॉम्बैटिंग इंटरनेशनल इस्लामोफोबिया एक्ट नामक बिल को को-स्पॉन्सर किया था।

जैसा कि इस बिल के नाम से ही स्पष्ट है, इसका उद्देश्य दुनिया भर में तथाकथित इस्लामोफोबिया के खिलाफ कार्रवाई करना बताया गया था। इस बिल को अमेरिका की सांसद इल्हान उमर ने पेश किया था, जिन्हें कट्टर इस्लामी एजेंडा और भारत-विरोधी रुख के लिए जाना जाता है। इस तरह, जैन शाकोव्स्की का यह कदम भी भारत के खिलाफ मुस्लिम पीड़ित होने की राजनीति को समर्थन देने के रूप में देखा जाता है।

वर्ष 2023 में अमेरिका की सांसद जैन शाकोव्स्की ने तत्कालीन राष्ट्रपति जो बाइडेन से यह माँग की थी कि वे भारत के साथ बातचीत के दौरान भारत में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों का मुद्दा उठाएँ। इस कदम के जरिए जैन शाकोव्स्की ने एक बार फिर भारत के आंतरिक मामलों पर सवाल खड़े करते हुए मानवाधिकार के नाम पर भारत की आलोचना करने वाला रुख अपनाया।

सितंबर 2024 में अमेरिका की सांसद जैन शाकोव्स्की और इल्हान उमर ने कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी से मुलाकात की थी। यह मुलाकात राहुल गाँधी की अमेरिका यात्रा के दौरान हुई, जिसे लेकर उस समय काफी विवाद और चर्चा हुई थी।

कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी से मुलाकात के बाद अमेरिकी सांसद जैन शाकोव्स्की ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर खुशी जताई। उन्होंने लिखा कि उन्हें भारत के नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी से मिलकर अच्छा लगा। शाकोव्स्की ने कहा कि समावेशी विकास, अल्पसंख्यकों के अधिकारों की सुरक्षा और मोदी सरकार को जवाबदेह ठहराने की राहुल गाँधी की सोच भारत के भविष्य के लिए बेहद अहम है।

इसके कुछ महीने बाद, जनवरी 2025 में जैन शाकोव्स्की ने एक बार फिर कॉम्बैटिंग इंटरनेशनल इस्लामोफोबिया एक्ट को दोबारा पेश किया। इस बिल में भारत का नाम साफ तौर पर लिया गया और दावा किया गया कि भारत में मुस्लिमों को उनकी मजहबी पहचान के कारण भेदभाव और सरकारी कार्रवाई का सामना करना पड़ता है। इस बिल को इल्हान ओमार ने पेश किया था और जैन शाकोव्स्की व राशिदा तलीब सहित कई अन्य सांसद इसके को स्पॉन्सर थे।

अब इसी कड़ी में जैन शाकोव्स्की ने उमर खालिद को जमानत देने की माँग करते हुए भारत सरकार को पत्र लिखा है, मानो मोदी सरकार उसकी जमानत या निष्पक्ष सुनवाई में बाधा डाल रही हो जबकि मामला भारत की न्यायपालिका के अधीन है।

प्रमिला जयपाल: अमेरिका की एक हिंदू और भारत-विरोधी आवाज

सूची में अगला नाम प्रमिला जयपाल का है, जो अपने भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी रुख के लिए जानी जाती हैं। दिसंबर 2019 में उन्होंने अमेरिकी कांग्रेस में एक प्रस्ताव पेश किया था, जिसमें भारत से जम्मू-कश्मीर में लगाए गए संचार प्रतिबंध हटाने की माँग की गई थी।

इसके साथ ही उन्होंने अनुच्छेद 370 हटाने के भारत सरकार के फैसले का खुलकर विरोध किया। उनके इस रुख से भारतीय-अमेरिकी समुदाय खुद को ठगा हुआ, आहत और निराश महसूस करने लगा, क्योंकि यह भारत के आंतरिक मामलों में सीधा हस्तक्षेप माना गया।

प्रमिला जयपाल के इसी प्रस्ताव के बाद एक अहम कूटनीतिक घटनाक्रम देखने को मिला। भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अमेरिकी सांसदों के एक प्रतिनिधिमंडल से होने वाली बैठक रद्द कर दी क्योंकि उस प्रतिनिधिमंडल से प्रमिला जयपाल को बाहर करने से इनकार कर दिया गया था।

इस पर विदेश मंत्री जयशंकर ने साफ कहा था कि उन्हें प्रमिला जयपाल की रिपोर्ट में जम्मू-कश्मीर की स्थिति को लेकर कोई निष्पक्ष समझ या भारत सरकार के कदमों का सही आकलन नहीं दिखता और इसलिए उन्हें उनसे मिलने में कोई रुचि नहीं है।

जेमी रस्किन: मुस्लिम पीड़ित होने के नैरेटिव को लगातार आगे बढ़ाने वाले नेता

‘फ्री उमर खालिद’ पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में एक और नाम जेमी रस्किन का है। साल 2023 में जेमी रस्किन ने जैन शाकोव्स्की के साथ मिलकर एक पत्र पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन से भारत में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों को लेकर चिंता जताने की माँग की गई थी।

इससे पहले 2020 में रस्किन ने यह फर्जी दावा किया था कि भारतीय सरकार ने सत्तावादी तरीके से एमनेस्टी इंटरनेशनल की गतिविधियों को भारत में रोक दिया। सोशल मीडिया पर उन्होंने लिखा था कि भारत द्वारा एमनेस्टी को मानवाधिकार उल्लंघनों का दस्तावेजीकरण करने से रोकना लोकतंत्र के खिलाफ एक शर्मनाक कदम है और उन्होंने उस समय के अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो से अपील की थी कि वे भारत दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सामने इस मुद्दे को उठाएँ।

हालाँकि, एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया को लेकर यह दावा गलत है कि मोदी सरकार ने उसके खिलाफ कोई राजनीतिक बदले या विच हंट चलाया। साल 2020 में उसके बैंक खाते फ्रीज किए गए थे, लेकिन यह पहली बार नहीं था। इससे पहले 2018 में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने FCRA कानून के उल्लंघन के मामले में एमनेस्टी के ठिकानों पर छापे मारे थे और उसके बैंक खाते फ्रीज किए थे। यह भी स्पष्ट है कि एमनेस्टी की वित्तीय गतिविधियाँ साल 2010 से जाँच के दायरे में थीं, न कि केवल दिल्ली दंगों पर रिपोर्ट के बाद।

जाँच एजेंसियों का आरोप था कि एमनेस्टी ने FCRA कानून से बचने के लिए एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (AIIPL) नाम से एक व्यावसायिक इकाई बनाई। आरोप के अनुसार, एमनेस्टी ने अपने एक भारतीय संस्थान के जरिए 10 करोड़ रुपए की फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) को गिरवी रखकर 14.25 करोड़ रुपए की ओवरड्राफ्ट सुविधा बनाई, जिससे ट्रस्ट को विदेशी निवेश (FDI) के रूप में धन प्राप्त हुआ। यह व्यवस्था कानून के दायरे से बाहर बताई गई।

ED ने यह भी आरोप लगाया कि एमनेस्टी ने FEMA (विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम) के उधार और लेन-देन से जुड़े नियमों का उल्लंघन किया और करीब 51.72 करोड़ रुपए की अनियमितताएँ कीं। आरोप है कि एमनेस्टी ने अपनी मूल संस्था Amnesty International UK से धनराशि को सेवाओं के निर्यात के नाम पर भारत में मंगवाया और उसका इस्तेमाल देश में तथाकथित नागरिक समाज गतिविधियों के लिए किया।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि एमनेस्टी इंटरनेशनल का भारत के आंतरिक मामलों में दखल देने का पुराना इतिहास रहा है। संगठन लगातार भारत को झूठे तरीके से मानवाधिकार उल्लंघनकर्ता और मुसलमानों का दमनकर्ता दिखाने की कोशिश करता रहा है। एमनेस्टी और उसके पूर्व प्रमुख आकार पटेल ने भीमा कोरेगाँव हिंसा मामले में गिरफ्तार अर्बन नक्सलियों के समर्थन में भी अभियान चलाया था।

दिलचस्प बात यह है कि जेमी रस्किन स्वयं भी विवादों में रहे हैं। उन पर अपनी पत्नी से जुड़ी बड़ी शेयर होल्डिंग और भुगतान की जानकारी सार्वजनिक न करने के आरोप लगे थे। इसके बावजूद, जनवरी 2022 में रस्किन ने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत में मानवाधिकारों की स्थिति खराब हो रही है और इसका असर न सिर्फ मुसलमानों, ईसाइयों और सिखों पर पड़ रहा है बल्कि उन हिंदुओं पर भी जो तथाकथित हिंदू वर्चस्ववादी आंदोलन का विरोध करते हैं। यह बयान उन्होंने एमनेस्टी इंटरनेशनल USA, जेनोसाइड वॉच, IAMC और अन्य संगठनों द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में दिया था।

लॉयड डॉगेट: ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ की आलोचना करते हुए ‘भारतीय मुसलमानों पर खतरे’ के नैरेटिव को हवा देने वाले नेता

लॉयड डॉगेट अमेरिका के टेक्सास का प्रतिनिधित्व करते हैं और लंबे समय से कॉन्ग्रेसनल कॉकस ऑन इंडिया के सदस्य रहे हैं। इसके बावजूद उनका रिकॉर्ड भारत के प्रति आलोचनात्मक रहा है।

साल 2008 में उन्होंने भारत के साथ परमाणु शक्ति के रूप में सहयोग के खिलाफ वोट दिया था। फिर साल 2020 में भारत के गणतंत्र दिवस पर दिए गए अपने बयान में डॉगेट ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार राष्ट्रीय ध्वज, देशभक्ति के प्रतीकों और धर्म का इस्तेमाल समाज में विभाजन पैदा करने के लिए करती है और पड़ोसी को पड़ोसी के खिलाफ खड़ा कर रही है। उन्होंने नागरिकता संशोधन कानून (CAA), NRC और जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा हटाने के फैसले को लेकर भी कड़ी आलोचना की। इसी दौरान उन्होंने JNU छात्र संघ की तत्कालीन अध्यक्ष आइशी घोष की खुले तौर पर सराहना की और उन्हें महिमामंडित किया।

डॉगेट ने कहा था कि नया नागरिकता कानून, NRC के विस्तार की आशंका, जम्मू-कश्मीर का एकतरफा तरीके से राज्य का दर्जा खत्म करना और कश्मीरी डी-रेडिकलाइजेशन कैंप जैसी बातें भारत के खिलाफ आवाज उठाने के लिए पर्याप्त कारण हैं। उन्होंने यह भी कहा कि पूरे भारत में विरोध की आवाजें उठ रही हैं और विशेष रूप से नई दिल्ली की छात्रा आइशी घोष को सम्मान दिया जाना चाहिए, जिन्होंने कथित तौर पर हिंसक हिंदू राष्ट्रवादी हमले के सामने चुप रहने से इनकार किया।

आइशी घोष, जिन्हें लॉयड डॉगेट ने बहादुर छात्रा बताया था, 2020 के JNU दंगों के मामले में आरोपित हैं। आइशी घोष को पहचान 2020 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में हुई हिंसा के दौरान मिली, जब वामपंथी छात्र समूहों ने बाहरी लोगों के साथ मिलकर विश्वविद्यालय परिसर में व्यापक हिंसा की थी।

इस दौरान अन्य छात्रों को फीस वृद्धि के विरोध में कक्षाओं का बहिष्कार करने के लिए मजबूर किया गया था। आरोप है कि जेएनयू छात्र संघ (JNUSU) की अध्यक्ष के रूप में आइशी घोष ने उस भीड़ का नेतृत्व किया, जिसने छात्रों पर शारीरिक हमला किया और उन्हें शीतकालीन सेमेस्टर के लिए पंजीकरण करने से रोका, ताकि बहिष्कार को लागू कराया जा सके।

इसके अलावा, आइशी घोष के नेतृत्व में वामपंथी समूहों पर विश्वविद्यालय के सर्वर रूम में तोड़फोड़ करने और कैंपस में वाई-फाई बंद करने का भी आरोप है, जिससे छात्र ऑनलाइन पंजीकरण नहीं कर पाए। इस हिंसा में कई छात्र और ABVP के नेता घायल हुए थे।

क्रिस वैन होलेन

विनय क्वात्रा को लिखे गए उस पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में अगला नाम क्रिस वैन हॉलन का है, जिन्होंने उमर खालिद के जमानत और निष्पक्ष सुनवाई की माँग की है। क्रिस वैन हॉलन का जन्म पाकिस्तान में हुआ था।

2020 में उन्होंने तीन अन्य अमेरिकी सांसदों के साथ मिलकर अमेरिकी विदेश मंत्री को एक पत्र लिखा था, जिसमें कश्मीर में मानवाधिकार स्थिति और भारत में मजहबी अल्पसंख्यकों के अधिकारों का आकलन करने की माँग की गई थी। उस पत्र में उन्होंने खुद को भारत का पुराना मित्र बताते हुए कहा था कि मोदी सरकार के कुछ कदम चिंताजनक हैं।

उन्होंने आरोप लगाया कि जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा हटाए जाने के छह महीने बाद भी वहाँ इंटरनेट सेवाएँ बड़े पैमाने पर बंद थीं, जिसे उन्होंने किसी लोकतंत्र द्वारा लगाया गया अब तक का सबसे लंबा इंटरनेट शटडाउन बताया। हॉलन और अन्य सांसदों ने दावा किया कि इससे स्वास्थ्य सेवाएँ, कारोबार और शिक्षा प्रभावित हुई और करीब 70 लाख लोग प्रभावित हुए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि सैकड़ों कश्मीरी, जिनमें प्रमुख राजनीतिक नेता भी शामिल हैं, निवारक हिरासत में रखे गए और इसी आधार पर भारत सरकार की आलोचना की।

क्रिस वैन हॉलन और उनके साथियों ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर भी भारत को निशाना बनाया। उन्होंने अपने पत्र में कहा कि भारतीय सरकार ने ऐसे कदम उठाए हैं जो कुछ मजहबी अल्पसंख्यकों के अधिकारों और देश के पंतनिरपेक्ष चरित्र को खतरे में डालते हैं। इसमें उन्होंने CAA का खास तौर पर उल्लेख किया और कहा कि यह कानून विवादास्पद है और भारत के सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा रही है।

इसके बाद जून 2023 में क्रिस वैन हॉलन ने कई अन्य अमेरिकी सांसदों के साथ मिलकर अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन से अपील की कि वे भारत में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों का मुद्दा उठाएँ। इन सांसदों में उमर खालिद के समर्थन वाले पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले अधिकतर सांसद शामिल थे।

इससे पहले मार्च 2023 में क्रिस वैन हॉलन ने दावा किया था कि मोदी सरकार जानबूझकर कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी को चुप करा रही है, जब कोर्ट ने मोदी सरनेम मानहानि मामले में राहुल गाँधी के खिलाफ फैसला सुनाया था। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि भारत के मित्र के रूप में यह खबर चिंताजनक है, क्योंकि एक स्वस्थ लोकतंत्र में विपक्ष को चुप नहीं कराया जाता बल्कि उससे बहस की जाती है। उन्होंने यह भी कहा कि अभिव्यक्ति की आज़ादी लोकतंत्र के लिए जरूरी है और भारत वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में 180 देशों में 150वें स्थान पर पहुँच गया है। हालाँकि, हॉलन ने इस तथ्य को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया कि राहुल गाँधी की संसद सदस्यता जाना अदालत के फैसले का नतीजा था, न कि मोदी सरकार का कोई सीधा कदम।

इल्हान उमर: हिंदुओं के खिलाफ भेदभाव और भारत विरोधी विचारों के लिए कुख्यात

इल्हान उमर अमेरिका की एक सोमालिया में जन्मी नेता हैं और डेमोक्रेटिक पार्टी के टिकट पर मिनेसोटा से हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की सदस्य चुनी गई हैं। उन्हें एक कट्टर इस्लामवादी रुझान वाली नेता के रूप में जाना जाता है। वैश्विक मुस्लिम ब्रदरहुड या उम्माह से बाहर, इल्हान उमर को ऐसे नेता के रूप में देखा जाता है जो ताकतवर इस्लामी लॉबी समूहों के एजेंडे को आगे बढ़ाती हैं, जिनका उद्देश्य आधुनिक समाजों में कट्टर इस्लामी विचारधारा को बढ़ावा देना माना जाता है।

मिनेसोटा की प्रतिनिधि इल्हान उमर ने बीते सालों में कई बार कट्टर इस्लामी संगठनों और पाकिस्तान द्वारा फैलाए गए झूठे दावों को दोहराया है। वह लंबे समय से भारत-विरोधी नैरेटिव फैलाती रही हैं और खास तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को निशाना बनाती रही हैं। इतना ही नहीं, इल्हान उमर ने अपनी इस प्रचार मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए कई बार बाइडन प्रशासन से आधिकारिक समर्थन की भी माँग की है।

अमेरिकी सांसद इल्हान उमर/ इमेज सोर्स: NPR

भारत और पश्चिम के कुछ वाम-उदारवादी (लेफ्ट-लिबरल) समूहों के समर्थन के साथ इल्हान उमर ने अमेरिकी संसद में कश्मीर मुद्दे को बार-बार उठाया और पाकिस्तान समर्थक रुख अपनाते हुए अमेरिकी एजेंसियों से इसमें दखल देने की माँग की।

उन्होंने भारत में अल्पसंख्यकों पर हमले, मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर कथित तौर पर झूठे आरोप लगाए और दावा किया कि देश में हिंदुओं द्वारा मुस्लिमों पर अत्याचार हो रहे हैं। 2024 में दक्षिण एशिया में मानवाधिकारों पर हुई अमेरिकी हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी की सुनवाई में इल्हान उमर ने भारतीय पत्रकार आरती टिकू सिंह पर भी हमला बोला, जिन्होंने 1990 के दशक में कश्मीर घाटी में कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार पर अमेरिकी कॉन्ग्रेस के सामने गवाही दी थी।

इल्हान उमर पर कट्टर इस्लामी संगठनों से नजदीकी संबंध होने के आरोप लगते रहे हैं। यह भी दावा किया जाता है कि वे मुस्लिम ब्रदरहुड और कतर के शासकों के प्रभाव में रही हैं। उनका नाम इस्लामिक रिलीफ और हेल्पिंग हैंड फॉर रिलीफ एंड डेवलपमेंट (HHRD) जैसे संगठनों से जोड़ा जाता है। HHRD को ICNA की सहयोगी संस्था बताया जाता है, जिसका संबंध जमात-ए-इस्लामी से होने का दावा है। एक संगठन जिसे भारत में प्रतिबंधित आतंकी संगठन माना जाता है। इसके अलावा HHRD के पाकिस्तानी आतंकी समूहों से कथित संबंधों की बात भी सामने आती रही है जिनमें लश्कर-ए-तैयबा भी शामिल है।

इल्हान उमर को यहूदी-विरोधी माना जाता है और उन्होंने हमास जैसे आतंकी संगठन का खुला समर्थन किया है, 2021 के इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष में भी वह जिहादी समूहों के पक्ष में दिखीं। 2019 में उन्होंने 9/11 आतंकियों को ‘कुछ लोग कुछ कर गए’ कहकर विवाद खड़ा किया था। इसके अलावा, वह फिलिस्तीन-फिलिस्तीन विवाद में वन-नेशन समाधान की समर्थक हैं, जिसका अर्थ फिलिस्तीन के अस्तित्व को नकारना माना जाता है।

रशीदा तलीब: हिंदू विरोधी, इस्लामवादी और इस्लामी आतंक की हिमायती

अमेरिका के मिशिगन की 12वीं कॉन्ग्रेसनल डिस्ट्रिक्ट से चुनी गई सांसद रशीदा तलीब को अमेरिका में इस्लामी आतंकवाद का बचाव करने वाली और यहूदी-विरोधी नेता के रूप में जाना जाता है।

2021 में रशीदा तलीब ने कश्मीर मुद्दे पर भारत-विरोधी प्रचार करने के लिए ऐसे पैनल में हिस्सा लिया, जिसमें कट्टर इस्लामी आतंक समर्थक और जिहादी विचारधारा से जुड़े लोग शामिल थे। यह पैनल शिकागो स्थित ‘साउंड विजन’ नामक संगठन से जुड़ा था, जिसे इस्लामिक सर्कल ऑफ नॉर्थ अमेरिका (ICNA) की एक शाखा बताया जाता है।

उल्लेखनीय है कि ICNA उत्तरी अमेरिका का एक कुख्यात इस्लामी संगठन है, जिसके हमास, मुस्लिम ब्रदरहुड, जमात-ए-इस्लामी और अन्य इस्लामी आतंकी संगठनों से गहरे संबंध होने के आरोप लगते रहे हैं।

ICNA ने अपनी पत्रिका द मैसेज में अमेरिका द्वारा वैश्विक आतंकवादी घोषित किए गए सैयद सलाहुद्दीन का महिमामंडन किया था। संगठन ने सैयद सलाहुद्दीन को कश्मीर को कथित तौर पर भारतीय कब्जे से मुक्त कराने के लिए लड़ने वाला मुजाहिदीन का निर्विवाद नेता बताया। सैयद सलाहुद्दीन एक कुख्यात इस्लामी आतंकवादी है, जिस पर भारत और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर आरोप हैं।

इसी पृष्ठभूमि में, जून 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अमेरिका दौरे और अमेरिकी कॉन्ग्रेस के संयुक्त सत्र को संबोधित करने से पहले, रशीदा त्लैब ने इल्हान ओमार के साथ मिलकर पीएम मोदी के भाषण का बहिष्कार करने की घोषणा की थी। रशीदा तलीब ने पीएम मोदी की यात्रा को शर्मनाक बताया और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि मोदी को अमेरिका की राजधानी में मंच देना गलत है। उन्होंने आरोप लगाया कि पीएम मोदी पर मानवाधिकार उल्लंघन, अलोकतांत्रिक कदम, मुसलमानों और मजहबी अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने और पत्रकारों की आवाज दबाने के आरोप हैं, इसलिए वह कॉन्ग्रेस में उनके संबोधन का बहिष्कार करेंगी।

तलीब ने जम्मू-कश्मीर में आर्टिकल 370 और 35A को हटाने का विरोध किया था। वह CAA के भी खिलाफ रही हैं।

रशीदा तलीब को यहूदी-विरोधी (एंटीसेमिटिक) विचारधारा फैलाने वाली नेता के रूप में भी जाना जाता है और वह बार-बार यह धारणा आगे बढ़ाती रही हैं कि इजरायल को एक देश के रूप में अस्तित्व का अधिकार नहीं है। पहले वह अमेरिकी संसद भवन (यूएस कैपिटल) में एक कार्यक्रम आयोजित करना चाहती थीं, जिसमें इजरायल की स्थापना को ‘नकबा’ यानी ‘तबाही’ कहा गया था।

इस कार्यक्रम को ऐसे कट्टर इजरायल-विरोधी संगठनों का समर्थन प्राप्त था, जो इजरायल के खिलाफ पूरे सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार की माँग करते हैं। हालाँकि, जब मीडिया में इन कट्टर संगठनों की भूमिका सामने आई, तो हाउस स्पीकर केविन मैकार्थी ने इस कार्यक्रम को रोक दिया और रशीदा तलीब द्वारा फैलाए जा रहे खुले यहूदी-विरोधी रवैये की कड़ी निंदा की। माना जाता है कि रशीदा तलीब का पूरा राजनीतिक करियर इजरायल के खिलाफ नफरत और यहूदी-विरोधी भावनाएँ भड़काने के इर्द-गिर्द ही केंद्रित रहा है।

निष्कर्ष

उमर खालिद की रिहाई की माग को लेकर पत्र लिखने वाले अमेरिकी सांसदों का खुद का रिकॉर्ड भारत-विरोधी प्रचार करने और भारतीय इस्लामो-लेफ्टिस्ट नैरेटिव को आगे बढ़ाने का रहा है, जिसमें हिंदुओं और मोदी सरकार को गलत तरीके से खलनायक बताया जाता है।

यह हैरानी की बात नहीं है कि अमेरिकी वामपंथी मीडिया के बाद अब कुछ नेता भी ऐसे पत्र लिखकर उमर खालिद को बेगुनाह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं जबकि मामला अभी कोर्ट में विचाराधीन है। डेमोक्रेट नेता जिस अंदाज़ में खुद ही फैसले सुना रहे हैं और उमर खालिद की मासूमियत की मुहर लगा रहे हैं, उससे ऐसा लगता है मानो वे मुस्लिम पीड़ित होने का एक ऐसा नैरेटिव गढ़ रहे हों कि भारतीय इस्लामवादी भी पीछे रह जाएँ जबकि हकीकत यह है कि उमर ख़ालिद खुद को नास्तिक बताता है।

गंभीर बात यह है कि भारत के आंतरिक मामलों पर अमेरिकी सांसदों की दखलअंदाजी स्वीकार्य नहीं है और इसे दूसरे देश के घरेलू मामलों में हस्तक्षेप के तौर पर देखा जाता है। विचारधारा से अलग हटकर भी डेमोक्रेट नेताओं को भारत के अंदरूनी मुद्दों में दखल नहीं देना चाहिए। अगर यही काम भारतीय सांसद करें और अमेरिका के आंतरिक मामलों पर सवाल उठाएँ जैसे जो बाइडेन द्वारा अपने बेटे हंटर बाइडेन को दी गई माफी या ओसामा बिन लादेन को बिना मुकदमे के मारे जाने का मुद्दा तो यह अमेरिका को भी मंजूर नहीं होगा।

उमर खालिद एक भारतीय नागरिक है और वह भारतीय कानून के तहत मुकदमे का सामना कर रहा है। उसे जमानत मिलेगी या नहीं, वह बरी होगा या दोषी ठहराया जाएगा। इसका फैसला केवल भारतीय कानून और भारतीय अदालतें करेंगी, न कि किसी अंतरराष्ट्रीय दबाव या अमेरिकी सांसदों की इच्छा से ऐसा होगा।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में श्रद्धा पांडे ने लिखी है, जिसको पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें)



क्रिकेट या दावत-ए-जिहाद? मैदान में इस्लामी विक्टिमहुड घुसाने की साजिश

क्रिकेट मूलतः बल्ला और गेंद का खेल है। टाइमिंग, लाइन-लेंथ और अनुशासन का अनुशासित संघर्ष। यह खेल टीमों की प्रतिस्पर्धा और खेल भावना से गढ़ा जाता है, न कि व्यक्तिगत आस्था के प्रदर्शन से।

लेकिन पिछले कुछ वर्षों से क्रिकेट के इसी मैदान को मजहबी अखाड़े में बदलने के सुनियोजित प्रयास दिखाई दे रहे हैं। पिच से लेकर ड्रेसिंग रूम तक इस्लामी एजेंडा और मुस्लिम विक्टिम कार्ड की घुसपैठ कराई जा रही है। यह बदलाव संयोग नहीं, एक सुनियोजित साजिश का हिस्सा प्रतीत होते हैं।

ऑस्ट्रेलिया के क्रिकेटर उस्मान ख्वाजा का संन्यास की घोषणा करते हुए यह कहना कि ‘पाकिस्तानी मुस्लिम होने के कारण उनके साथ दोहरा बर्ताव हुआ’, या जम्मू-कश्मीर चैंपियंस लीग में फुरकान भट का हेलमेट पर फिलिस्तीन का झंडा लगाकर मैदान में उतरना- ये घटनाएँ किसी निजी ‘स्टेटमेंट’ की श्रेणी में नहीं आतीं। ये क्रिकेट के मंच का उपयोग कर इस्लामी विक्टिमहुड, राजनीतिक इस्लाम और मजहबी एजेंडे को सामान्य बनाने की कोशिशें हैं। यहाँ खेल माध्यम है, संदेश कुछ और।

जिन्हें क्रिकेट की बुनियादी समझ है, वे जानते हैं कि उस्मान ख्वाजा कोई साधारण खिलाड़ी नहीं रहे। एक दशक से अधिक का अंतरराष्ट्रीय करियर, ऑस्ट्रेलिया के लिए 87 टेस्ट, कप्तानी की चर्चाएँ- इस पूरी यात्रा में न उनका मुस्लिम होना बाधक बना, न इस्लामाबाद में जन्म लेना।

डॉन ब्रैडमैन इसलिए महान नहीं हुए कि वे चर्च में प्रार्थना करते थे। सचिन तेंदुलकर क्रिकेट के भगवान इसलिए नहीं बने कि वे संत ​सत्य साईं बाबा के भक्त थे। वसीम अकरम की प्रतिष्ठा नमाज से नहीं, स्विंग से बनी। विराट कोहली की पहचान प्रेमानंद महाराज के आश्रम में जाने से नहीं, कवर ड्राइव से है।

दुनिया इन सबको उनके क्रिकेटीय कौशल के लिए जानती है, उनकी निजी आस्था के लिए नहीं। इन सबकी आस्था व्यक्तिगत है, मैदान से बाहर है। लेकिन जाते-जाते उस्मान ख्वाजा ने क्रिकेट को पीछे धकेलकर पाकिस्तान और इस्लाम को आगे कर दिया। यह केवल खेल भावना का अपमान नहीं है, उस खेल की हत्या है जिसने उन्हें वह मंच दिया, जहाँ से वे यह बयान दे सके।

उस्मान ख्वाजा और फुरकान भट उस प्रवृत्ति की कड़ियाँ हैं जिसे सबसे पहले, सबसे खुलकर पाकिस्तानी क्रिकेट ने बढ़ावा दिया। मैच के दौरान नमाज, कैमरे के सामने मजहबी संकेत, जीत को ‘अल्लाह की देन’ बताने की अनिवार्यता- हर बार इसे ‘व्यक्तिगत आस्था’ कहकर बचाने की कोशिश की गई।

लेकिन जब यह बार-बार, योजनाबद्ध और कैमरा-फ्रेंडली ढंग से हो, तो वह निजी नहीं रह जाता। वह संदेश बन जाता है। वही संदेश फुरकान भट जैसे नवोदित खिलाड़ियों को प्रेरित करता है कि क्रिकेटीय पहचान से पहले मजहबी पहचान स्थापित की जाए।

हमने जर्सी पर ‘Victory belongs to Allah’ जैसे संदेश देखे हैं। यह खेल की भाषा को एक विशेष मजहब की शब्दावली में ढालने का प्रयास है। यही भाषा पाकिस्तानी खिलाड़ियों की मैच के बाद प्रस्तुतियों में सुनाई देती है, टीवी स्टूडियो में दोहराई जाती है। याद करिए क्रिकेट विश्लेषण के बीच आपने कितनी बार यूसुफ योहाना के मोहम्मद यूसुफ बनने को ‘टर्निंग पॉइंट’ के रूप में सुना है? सईद अनवर के कवर ड्राइव से अधिक उनके मौलवी बनने के बाद आए कथित ‘चमत्कारों’ पर चर्चाएँ सुनी हैं?

2014 का वह वीडियो भी याद कीजिए, जब पाकिस्तानी क्रिकेटर अहमद शहजाद श्रीलंकाई खिलाड़ी तिलकरत्ने दिलशान से यह कहते पाए गए कि अगर आप इस्लाम स्वीकार कर लें तो जीवन में कुछ भी करें, अंततः जन्नत तय है। यह साथी क्रिकेटर से संवाद नहीं था। यह एक मजहबी दखल था।

ICC ने कुछ मामलों में चेतावनियाँ दीं, लेकिन वह घुसपैठ रोकने में विफल रही है। दानिश कनेरिया का प्रकरण बताता है कि यह जहर मैदान से बाहर निकलकर ड्रेसिंग रूम तक पहुँच चुका है। उन्होंने खुलकर बताया कि कैसे धार्मिक पहचान के आधार पर उन्हें अलग-थलग किया गया, धर्मांतरण का दबाव डाला गया। यह किसी एक खिलाड़ी की पीड़ा नहीं, उस मानसिकता का प्रमाण है जहाँ ‘टीम’ से पहले ‘मजहब’ आता है।

यहाँ प्रश्न आस्था का नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या क्रिकेट टीम किसी मजहबी एजेंडे का विस्तार है? यदि नहीं, तो यह दबाव क्यों?

उस्मान ख्वाजा का बयान इसी प्रवृत्ति का अगला चरण है। जब उम्र, फिटनेस और अनुशासन पर सवाल उठें, तो मजहब को ढाल बना लो। पाकिस्तान इस कला में पारंगत है। वर्षों से वह अपनी असफलताओं को ‘साज़िश’, आलोचना को ‘ईमान-विरोध’ और अनुशासन को ‘आस्था का दमन’ बताकर टालता आया है।

ऐसा नहीं है कि क्रिकेट विशुद्ध जेंटलमैन गेम है। उसने कई विवाद देखे हैं। जैसे केरी पैकर सीरीज, मैच-फिक्सिंग, मंकीगेट…। लेकिन मजहब कभी एजेंडा नहीं बना। जब मजहब एजेंडा बन जाता है, तब खेल की तटस्थता समाप्त हो जाती है। टीम-स्पिरिट टूटती है। साझा लक्ष्य की जगह साझा मजहब हावी हो जाता है। अनुशासन ढीला पड़ता है और दर्शकों का भरोसा गिरता है।

इसका समाधान स्पष्ट और कठोर होना चाहिए। मैदान पर किसी भी राजनीतिक-मजहबी प्रदर्शन को पूर्णतः अस्वीकार्य घोषित किया जाए। ड्रेसिंग रूम में मजहबी दबाव पाए जाने पर पूरी टीम को दंडित किया जाए। आवश्यकता पड़े तो उस देश को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से प्रतिबंधित किया जाए।

स्मरण रहे क्रिकेट सभ्यताओं को जोड़ने का खेल है। उन्हें विभाजित करने का मैदान नहीं। जब खिलाड़ी जर्सी से पहले एजेंडा पहनने लगें, तो खेल हारता है। दर्शक हारते हैं।

आवश्यक है कि क्रिकेट को क्रिकेट रहने दिया जाए। इस्लाम के बोझ से मुक्त। ऐसा नहीं हुआ तो वह दिन दूर नहीं, जब मैदान पर बल्ला–गेंद नहीं, विचारधाराएँ टकराएँगी।

‘तिलक लगाने पर मुस्लिम देते हैं धमकी, बहन-बेटियों के आगे पैंट उतारते हैं’: गुजरात के साणंद में हिंदुओं ने OpIndia को सुनाई आपबीती, बताया- मस्जिद के सामने से नहीं निकल पाती बारात

अहमदाबाद के साणंद तहसील के कलाणा गाँव में हिंदुओं के साथ हो रही घटनाओं को लेकर कई बातें सामने आ रही हैं। यहाँ के पीड़ित हिंदुओं ने ऑपइंडिया के सामने अपना दर्द बयाँ किया है और आरोप लगाया है कि गाँव के ही कुछ मुस्लिम कट्टरपंथी उन्हें बार-बार प्रताड़ित कर रहे हैं। स्थानीय महिलाओं ने बताया कि ये कट्टरपंथी उन्हें न तो त्योहार मनाने देते हैं और न ही मस्जिद के सामने से बारात (वरघोड़ा) निकालने देते हैं।

इस पूरी घटना में जिस पर सबसे पहला हमला हुआ, वह एक हिंदू नाबालिग लड़का है। हमले में उसके पिता भी घायल हो गए थे। अस्पताल में इलाज के दौरान उन्होंने ऑपइंडिया को बताया कि उनके बेटे ने बांग्लादेश में हुई दीपू दास की हत्या को लेकर सोशल मीडिया पर एक पोस्ट डाली थी, जिसमें उसने न्याय की माँग की थी। आरोप है कि इस पोस्ट को देखने के बाद स्थानीय मुस्लिम भड़क गए और धमकी देने लगे कि जो बांग्लादेश में हुआ, वही हाल यहाँ भी करेंगे।

बहन-बेटियों से अश्लील हरकतें- पीड़ित महिलाएँ

पीड़ित हिंदू महिलाओं ने रोते-रोते ऑपइंडिया को अपनी आपबीती सुनाई और बताया कि किस तरह मुस्लिम कट्टरपंथी उन्हें लंबे समय से परेशान कर रहे हैं। महिलाओं का आरोप है कि पिछले 12 महीनों से गाँव के कुछ मुस्लिम युवक उन्हें तंग कर रहे हैं। हिंदू बच्चों को माथे पर तिलक लगाने को लेकर धमकियाँ दी जाती हैं और गाँव में कोई भी हिंदू त्योहार या उत्सव शांति से नहीं मनाने दिया जाता।

एक अन्य महिला ने अपना दर्द बयाँ करते हुए कहा, “जब भी हिंदू महिलाएँ या बेटियाँ वहां से गुजरती हैं, तो मुस्लिम युवक सरेआम उनके सामने अपनी पैंट खोलकर खड़े हो जाते हैं।” महिलाओं ने दावा किया कि पिछले काफी समय से कुछ कट्टरपंथी मुस्लिम हिंदू बहन-बेटियों के सामने अश्लील हरकतें कर रहे हैं और उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रहे हैं।

हिंदू बच्चों को तिलक लगाने पर धमकियाँ

महिलाओं ने आगे बताया कि स्थानीय मुस्लिम युवक छोटे बच्चों को भी निशाना बना रहे हैं और माथे पर तिलक लगाने पर उन्हें धमकियाँ देते हैं। वे हमें हिंदू त्योहार भी नहीं मनाने देते। एक महिला ने आरोप लगाया कि जब उनके पति या घर के अन्य सदस्य नौकरी से वापस लौट रहे होते हैं, तब भी उनके साथ मारपीट की जाती है। साथ ही, जब भी हिंदू बहन-बेटियाँ बाहर निकलती हैं, तो उनके साथ अश्लील इशारे किए जाते हैं।

महिलाओं ने बार-बार न्याय की माँग की है और गृह राज्य मंत्री हर्ष संघवी से इस घटना पर ध्यान देने की अपील की है। एक अन्य महिला ने ठाकोर समाज के नेता अल्पेश ठाकोर पर भी सवाल उठाए हैं। महिलाओं का दावा है कि हर बार हिंदुओं को ही प्रताड़ित किया जाता है और बिना किसी वजह के उन्हें निशाना बनाया जा रहा है।

सुनियोजित साजिश: मस्जिद के सामने बारात निकालने पर पाबंदी

ऑपइंडिया से बात करते हुए महिलाओं ने इस पूरी घटना के पीछे किसी गहरी साजिश का शक जताया है। उनका दावा है कि यह हमला अचानक नहीं हुआ, बल्कि एक सोची-समझी प्लानिंग थी। पत्थरबाजी का जिक्र करते हुए एक महिला ने तर्क दिया कि एक ही दिन में इतने सारे पत्थर इकट्ठा होना मुमकिन नहीं है, इसके लिए कम से कम 10 दिन पहले से तैयारी की गई होगी। उन्होंने बताया कि वे सुबह उठकर अपनी रोजाना की दिनचर्या (चाय-पानी) में लगे ही थे कि अचानक चारों तरफ से पत्थर बरसने शुरू हो गए।

इसके अलावा यह आरोप भी लगाया गया है कि गाँव में जब भी किसी हिंदू परिवार में शादी-ब्याह का मौका होता है, तो बार-बार हंगामा खड़ा किया जाता है और मस्जिद के सामने से बारात निकालने के लिए साफ मना कर दिया जाता है। महिलाओं ने अपना दुख जताते हुए कहा कि कट्टरपंथी शादी के समय न तो बारात निकलने देते हैं और ऊपर से धमकियाँ भी देते हैं।

इसके अलावा भी महिलाओं ने कई गंभीर आरोप लगाए हैं और इंसाफ की गुहार लगाई है। फिलहाल पुलिस इस पूरे मामले की जाँच कर रही है और आगे की कानूनी कार्रवाई में जुटी है।

क्या है पूरा मामला?

यह पूरी घटना सोमवार (29 दिसंबर 2025) की रात को हुई थी, जिसके बाद मंगलवार (30 दिसंबर 2025) की सुबह भी जमकर पत्थरबाजी हुई। हालात बिगड़ते देख पुलिस की भारी फौज गाँव में पहुँच गई और पूरे इलाके की तलाशी (कॉम्बिंग) शुरू कर दी। दूसरी तरफ, पुलिस की कार्रवाई के डर से आरोपित अपने घर छोड़कर खेतों में भाग गए, जिन्हें पुलिस ने ड्रोन की मदद से ढूँढ-ढूँढकर गिरफ्तार किया।

एक हिंदू नाबालिग की शिकायत पर पुलिस ने शाहरुख समेत 22 मुस्लिम युवकों के खिलाफ FIR दर्ज की है। इस शिकायत के आधार पर साणंद GIDC पुलिस स्टेशन में आरोपितों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया है। पुलिस ने मामले की गंभीरता को देखते हुए अब तक 42 लोगों को हिरासत में ले लिया है और आगे की जाँच जारी है।

यह रिपोर्ट मूल रुप से गुजराती में लिंकन सोखाडिया ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।

‘भूल गए… SI संतोष को हमने ही जलाया था’: बांग्लादेश में कट्टरपंथी पुलिस के सामने फख्र से कबूल रहे हिंदुओं को मारने की बात, क्या डेढ़ साल में यही बदलाव लाई है युनूस सरकार?

बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा एक बार फिर अपने सबसे भयावह और शर्मनाक चेहरे के साथ सामने आई है और इस बार वह चेहरा कैमरे के सामने है, बेखौफ है और बेशर्मी से भरा हुआ है।

सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है, यह कोई अफवाह या आरोप नहीं बल्कि खुद अपराधी का खुला इकरार है। एक युवक, बिना किसी डर या पछतावे के यह दावा करता है कि उसने एक हिंदू पुलिस अधिकारी को जिंदा जला दिया। और यह सब वह कहाँ बैठकर कह रहा है? एक पुलिस थाने के भीतर। उसकी आँखों में न डर है, न पछतावा सिर्फ घमंड है। सत्ता का घमंड और सिस्टम की सड़ांध से मिला हुआ संरक्षण।

इस वीडियो के सामने आने के बाद सिर्फ गुस्सा नहीं बल्कि कई सवाल भी खड़े हो रहे हैं। जब कोई व्यक्ति पुलिस स्टेशन के अंदर बैठकर हत्या का ऐलान कर सकता है, तो यह सवाल लाजमी है क्या बांग्लादेश में कानून है या युनूस के संरक्षण में कट्टरपंथियों ने हिंदुओं की तरह उसे भी जला दिया है।

वायरल वीडियो में क्या कहा गया है?

वीडियो में दिख रहा युवक खुद को बांग्लादेश के हबीगंज जिले का छात्र नेता बताता है। वह पुलिस अधिकारियों को सीधे धमकी देता हुआ नजर आता है। वह कहता है कि जरूरत पड़ी तो पुलिस स्टेशन को दोबारा जला दिया जाएगा।

सबसे चौंकाने वाली बात तब सामने आती है जब वह यह कहता है कि जुलाई 2024 के आंदोलन के दौरान उन्होंने पुलिस स्टेशन में आग लगा दी थी और एक हिंदू सब-इंस्पेक्टर को जिंदा जला दिया था। वह यह बात ऐसे कहता है, जैसे किसी बहादुरी के काम का जिक्र कर रहा हो।

यह बयान बताता है कि कुछ कट्टरपंथी तत्वों में कानून का कोई डर नहीं बचा है और बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा को वे गर्व की बात मानते हैं।

सब-इंस्पेक्टर संतोष भाभू की दर्दनाक हत्या

वीडियो में जिस पुलिस अधिकारी का जिक्र किया गया है, वे थे सब-इंस्पेक्टर संतोष भाभू। अगस्त 2024 में उनकी बेरहमी से हत्या कर दी गई थी। उस समय बांग्लादेश में राजनीतिक हालात बेहद तनावपूर्ण थे और पूरे देश में अशांति फैली हुई थी।

हबीगंज जिले के बनियाचोंग थाना क्षेत्र में पहले एक हिंसक भीड़ ने पुलिस स्टेशन पर हमला कर दिया। हालात बिगड़ने पर पुलिस को आत्मरक्षा में गोली चलानी पड़ी, जिसमें कुछ लोगों की मौत हो गई। इसके बाद माहौल और ज्यादा खराब हो गया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, रात के समय भीड़ फिर से पुलिस स्टेशन पहुँची। बताया जाता है कि जब फौज मौके पर आई, तो भीड़ ने एक खौफनाक शर्त रखी। उन्होंने कहा कि बाकी सभी पुलिसकर्मियों को छोड़ दिया जाएगा लेकिन संतोष भाभू को उनके हवाले किया जाए।

करीब ढाई बजे रात में संतोष भाभू को भीड़ के सामने कर दिया गया और उन्हें पीट-पीटकर मार डाला गया। उनकी मौत के बाद भी उनका शव लंबे समय तक सड़क पर पड़ा रहा। यह घटना पूरे देश के लिए शर्मनाक थी।

हबीगंज जिला और वहाँ के हिंदू

हबीगंज जिला बांग्लादेश का मुस्लिम बहुल इलाका है। यहाँ लगभग 84 प्रतिशत लोग मुस्लिम हैं जबकि हिंदू आबादी करीब 16 प्रतिशत है। संख्या में कम होने के कारण हिंदू अक्सर खुद को असुरक्षित महसूस करता है।

इस जिले में हिंदू कई पीढ़ियों से रहते आ रहे हैं लेकिन हर बार जब राजनीतिक तनाव बढ़ता है, तो सबसे पहले हिंसा का शिकार वही बनते हैं। मंदिरों पर हमले, घर जलाना और लोगों को पीटना जैसी घटनाएँ यहाँ पहले भी सामने आती रही हैं।

बांग्लादेश में हिंदुओं पर हमले की बात नई नहीं

बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा कोई नई बात नहीं है। बीते कई वर्षों से ऐसी घटनाएँ लगातार सामने आती रही हैं। कभी मंदिर तोड़े जाते हैं, कभी हिंदुओं के घर जलाए जाते हैं और कभी भीड़ उन्हें पीट-पीटकर मार डालती है।

कई बार मामूली से बहाने बनाकर हिंसा भड़का दी जाती है। कभी किसी सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर, कभी चुनाव के समय और कभी धार्मिक पहचान के कारण हिंदुओं को निशाना बनाया जाता है। हर बार जाँच के आदेश दिए जाते हैं लेकिन हालात ज्यादा नहीं बदलते।

गौरतलब है कि इससे पहले ऑपइंडिया ने ऐसे 9 निर्दोष हिंदुओं की हत्या के मामलों की रिपोर्ट प्रस्तुत कर बताया था कि सिर्फ एक महीने में किस तरह बांग्लादेश में कुल 9 हिंदुओं को निशाना बनाया गया। कभी दीपू दास तो कभी शांतो दास और जोगेश चंद्र रॉय जैसे लोगों को कट्टरपंथी निशाना बनाते रहे हैं।

इस्लामी भीड़ इन निर्दोष हिंदुओं की हत्या कर नारे लगाती है और पेट्रोल डाल कर जलाते हुए अपनी क्रूरता का जश्न मनाती है। इनके पास ऐसी हिंसा का कोई कारण ना भी हो तो ये ईशनिंदा जैसे झूठे आरोप लगाकर अपनी कट्टरता साबित करने उतर जाते हैं।

मानवाधिकार संगठनों की चिंता

इस वायरल वीडियो के सामने आने के बाद मानवाधिकार संगठनों ने गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि जब कोई व्यक्ति खुलेआम हत्या की बात करता है और उसे कोई डर नहीं होता, तो यह देश की कानून-व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

सोशल मीडिया पर लोग माँग कर रहे हैं कि वीडियो में दिख रहे युवक के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो और दोषियों को कड़ी सजा दी जाए। लोग यह भी कह रहे हैं कि अगर अब भी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो बांग्लादेश में हिंदुओं की हालत और खराब हो सकती है।

सब-इंस्पेक्टर संतोष भाभू की हत्या और उस पर गर्व करता वायरल वीडियो यह दिखाता है कि बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यक कितनी कठिन स्थिति में हैं। यह सिर्फ एक हत्या की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस डर और असुरक्षा की तस्वीर है, जिसमें वहाँ का हिंदू जी रहा है।

नक्सलवाद मुक्त भारत, भय मुक्त भारत: ‘लाल आतंक’ के गर्त से निकलकर शिक्षा-रोजगार-विकास से जुड़ रहा जनजातीय समाज

यह दौर भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक, साहित्यिक और राजनीतिक चेतना को वर्षों की मानसिक गुलामी और गुमनाम भय से मुक्त करने का है। विगत एक दशक में राष्ट्र की उत्तरोत्तर प्रगति को देखकर कभी–कभी मुझे लगता है कि सही मायनों में भारत 1947 में नहीं, अपितु 2014 में स्वतंत्र हुआ है। देश की महनीय जनता ने 2014 में अपनी बागडोर संघ, सनातन और संस्कृति के प्रति श्रद्धा और भारत की प्रतिष्ठा को समृद्ध करने वाली पार्टी भाजपा के हाथ में सौंपकर इस नए भारत का सूत्रपात कर दिया है।

65 वर्ष की जो आधी और तथाकथित स्वतंत्रता हमें मिली थी, उसके साथ विभाजन की त्रासदी, अखंडित भारत और बौद्धिकता के नाम पर आतंकवाद, नक्सलवाद और उग्रवाद का भय भी मिला। हम स्वतंत्र हुए लेकिन हमारी आत्मा किसी बंधन में थी। वर्तमान सरकार के शीर्ष नेतृत्व ने सबसे पहले ऐसे निर्णय लेने का साहस दिखाया, जिससे हम स्वतंत्रता की सोंधी महक को अनुभव कर सकें।

आजादी का अमृत महोत्सव, जी–20 में भारतीय नेतृत्व, स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत, नशामुक्त भारत, तीन तलाक की मुक्ति, सर्जिकल स्ट्राइक, अनुच्छेद 370 की समाप्ति, CAA, ऑपरेशन सिंदूर, आत्मनिर्भर भारत, सबका साथ सबका विकास, भारतीय ज्ञान परम्परा, भारतीय भाषाओं की प्रतिष्ठा जैसे तमाम विचार इस देश की जनता को पहली बार सुनने-देखने को मिले। इसके साथ ही नई भारतीय न्याय संहिता में समाज हित के लिए कुछ सांविधिक परिवर्तन जैसे कदम उठाकर सरकार ने भारत की न्याय व्यवस्था को और अधिक विश्वसनीय बना दिया है।  

इसी क्रम में, नक्सलवाद मुक्त भारत का अभियान गृह मंत्री अमित शाह द्वारा आरंभ हुआ। उनका यह विचार मुझे राजनीतिक समीकरण से अधिक सुरक्षा बलों के उन हजारों योद्धाओं और अपनी अस्मिता के लिए संघर्ष कर रहे आम जनता की आत्मा की शांति के हवन जैसा लगा, जिन्हें नक्सलवादियों द्वारा बेरहमी से मार दिया गया था। हमने वह भयानक दौर भी देखा है, जब वामपंथियों ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए वनवासी समाज की भोली-भाली जनता को इस्तेमाल किया। जिन हाथों में कलम पकड़ानी थी, उन हाथों में बंदूकें और हथियार पकड़ा दिए गए, जिन्हें किताबें देनी थी, उन्हें उन्मादी इतिहास की भटकी कहानियों और भारत विरोधी दस्तावेज पकड़ा दिए, जिन आँखों में सुंदर भविष्य के सपने और साहस बोने थे, उनमें अपने ही लोगों के प्रति नफरत के कांटे बो दिए गए।

यह कितना सुखद है कि आज भारत उसी वनवासी समाज के एक गुमनाम नायक बिरसा मुंडा की जयंती को वैश्विक आधार देते हुए उन्हें ‘भगवान बिरसा मुंडा’ की उपाधि से विभूषित कर रहा है। वर्षों तक विकास के नाम पर जिस समाज को उनके जल, जंगल और जमीन से वंचित करके रखा गया, आज सरकार उनके अधिकार के लिए नियम बना रही है। वर्तमान सरकार के गठन को एक दशक बीत चुका है। आतंकवाद और नक्सलवाद की जड़े हिलने लगी हैं। गृह मंत्री अमित शाह ने भारत को नक्सलवाद मुक्त करने का संकल्प लेकर उपेक्षित जनता को भी विकसित भारत के विजन से जोड़ दिया है।

विकसित भारत की जो संकल्पना इस देश ने की है, गृहमंत्री ने उससे भी सुंदर, सशक्त और समर्थ भारत देने का प्रण लिया है। नक्सलमुक्त भारत का भाव इतना पावन है कि उसकी सिद्धि होनी निश्चित है। आप सोचिए कि कैसा देश बनाया जा रहा था, जहाँ सत्ता में बने रहने के लिए अपने ही राष्ट्र के कुछ हिस्से को संविधान प्रदत्त अधिकारों से वंचित कर नक्सलवादी बना दिया गया। जिस समाज को बराबर की हिस्सेदारी मिलनी थी, उसे उपेक्षा मिली। यह पहली बार हुआ, जब देश के प्रथम नागारिक और राष्ट्र के सर्वोच्च राष्ट्रपति पद पर एक वनवासी महिला को बैठने का अवसर मिला।

यह भी पहली बार हुआ जब प्रधान मंत्री और गृह मंत्री ने नक्सलवाद प्रभावित लोगों को उस गर्त से निकाल कर उन्हें शिक्षा, रोजगार, विकास के संसाधनों से जोड़ा और उनसे निरंतर सार्थक संवाद किया। गृह मंत्री ने स्वयं उनके बीच जाकर उनकी समस्याओं का समाधान करते हुए, उन्हें मुख्यधारा से जोड़ा। देश की सुरक्षा, सद्भावना और समन्वय की भावना को बनाए रखने में उनकी सहभागिता तय की। 

भाजपा और संघ की मूल भावना में सेवा, समर्पण और त्याग है। इसी के माध्यम से भारत सुशासन की बुनियाद तैयार करने में सफल हुआ है। प्रधानमंत्री ने वामपंथ के वैचारिक उग्रवाद से देश को मुक्त करने के लिए नक्सलवाद मुक्त भारत का अभियान आरंभ कर दिया है जिसे गृह मंत्री द्वारा विस्तार कर दिया जा रहा है। यह समझना बहुत आवश्यक है कि नक्सलवाद से मुक्ति का अभियान किसी विचारधारा का एजेंडा नहीं, बल्कि सुशासन द्वारा समाज में हिंसा, निरंकुशता को समाप्त करने का प्रण है।  एक दशक पूर्व नक्सलवाद, आतंकवाद की जो घटनाएँ प्रतिदिन हमारे जीवन का हिस्सा बन चुकी थी, वो पिछले एक दशक में लगभग 60 प्रतिशत कम हुईं हैं।

वामपंथियों द्वारा संरक्षित और पोषित उग्रवाद भारत की आतंरिक सुरक्षा के लिए बड़ी चुनौती बन चुका था, जो नेपाल की सीमा से दक्षिण भारत के आंध्रप्रदेश तक अपनी जड़े जमाए हुए था। भारत के वनवासी क्षेत्रों में, मुख्यत: छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में इनकी गतिविधियाँ निरंतर भारतीय जनमानस को आहत कर रही थीं। गृह मंत्रालय के एक आँकड़े के अनुसार, 2013 में जहाँ लगभग 126 जिले नक्सलवाद से प्रभावित थे, वह वर्तमान में 10 के आस-पास रह गई है। गृह मंत्री के द्वारा इन्हें भी 31 मार्च 2026 तक समूल खत्म करने का लक्ष्य तय कर दिया गया है। 

बीते छह महीनों के आँकड़ों को ही यदि देखा जाय, तो नक्सल-मुक्त भारत की दिशा में सबसे निर्णायक बात यह रही कि सुरक्षा बलों ने सीधे नक्सली नेतृत्व को निशाना बनाया है। छत्तीसगढ़ और ओडिशा के घने जंगलों में चले अभियानों में मोदम बालकृष्ण उर्फ बाला कृष्णा, दंडकारण्य और आंध्र-ओडिशा क्षेत्र में आतंक का पर्याय रहे कट्टा रामचंद्र रेड्डी उर्फ उसेंडी विकल्प, शीर्ष सैन्य रणनीतिकार माने जाने वाले कादरी सत्यनारायण रेड्डी उर्फ कोसा और लंबे समय से वांछित नक्सली कमांडर गणेश उइके को सुरक्षा बलों ने मुठभेड़ों में मार गिराया।

इनके अलावा बीजापुर, नारायणपुर और अबूझमाड़ जैसे इलाकों में हुए बड़े ऑपरेशनों में कई सशस्त्र नक्सली ढेर किए गए, जिससे नक्सलियों के संगठन की फील्ड कमांड, हथियार नेटवर्क और मनोवैज्ञानिक बढ़त पूरी तरह टूट गई। इन्हें निष्क्रिय करके गृह मंत्री ने यह संदेश स्पष्ट कर दिया है कि अब नक्सलवाद के लिए भारत की धरती पर न तो सुरक्षित ठिकाने हैं और न ही नेतृत्व का संरक्षण है।

गृह मंत्री ने एक तरफ जहाँ नक्सलवाद ग्रस्त समाज के लोगों को उससे मुक्त होकर जीने का अवसर दिया, वहीं दूसरी तरफ उनके वैचारिक समर्थकों को चुनौती भी। एक नागरिक के रूप में हम सभी गृह मंत्री के दृढ़ संकल्प और राष्ट्रभक्ति की भावना को जानते हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है कि अमित शाह के नेतृत्व में यह देश नक्सलवाद से मुक्त होकर भयमुक्त भारत बनेगा।

संगम तीरे फिर से ‘आस्था का महाकुंभ’, जानिए क्या है प्रयागराज माघ मेला का माहात्म्य, कल्पवास रहस्य क्या है: योगी सरकार ने दी दिव्यता-भव्यता-नव्यता

नए साल की शुरुआत के साथ ही संगम नगरी प्रयागराज एक बार फिर आस्था के महासागर में डूबने को तैयार है। 3 जनवरी 2026 से शुरू होकर 15 फरवरी 2026 तक चलने वाला माघ मेला 2026 लाखों-करोड़ों श्रद्धालुओं को अपनी ओर खींच रहा है। महाकुंभ 2025 की भव्य सफलता के बाद यह माघ मेला उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार के लिए एक और बड़ी परीक्षा है।

योगी सरकार ने इसे महाकुंभ मॉडल पर आयोजित करने का फैसला किया है, ताकि श्रद्धालुओं को सुरक्षित, स्वच्छ और दिव्य अनुभव मिल सके। अनुमान है कि इस बार 12 से 15 करोड़ श्रद्धालु संगम में पवित्र डुबकी लगाने आएँगे।

माघ मेला कुंभ का छोटा रूप माना जाता है, लेकिन इसका धार्मिक महत्व किसी से कम नहीं। त्रिवेणी संगम पर माघ मास में स्नान करने से हजारों अश्वमेध यज्ञों के बराबर पुण्य मिलता है। यह मेला न केवल स्नान का पर्व है, बल्कि तप, संयम और आत्मशुद्धि का भी महोत्सव है।

माघ मेला का धार्मिक महत्व

हिंदू धर्म में माघ मास को विशेष स्थान प्राप्त है। शास्त्रों के अनुसार, माघ में गंगा स्नान करने से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है। प्रयागराज का त्रिवेणी संगम गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का संगम दुनिया का सबसे पवित्र स्थल माना जाता है। यहाँ स्नान करने से व्यक्ति के सभी जन्मों के पाप धुल जाते हैं।

माघ मेला हर साल आयोजित होता है, जबकि कुंभ हर 12 साल में और अर्धकुंभ हर 6 साल में। लेकिन महाकुंभ 2025 की सफलता के बाद यह माघ मेला विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो गया है। श्रद्धालु मानते हैं कि संगम पर माघ स्नान से आत्मा शुद्ध होती है और जीवन में सुख-शांति आती है। यह पर्व संयम, दान और भक्ति का प्रतीक है।

कल्पवास: तपस्या की अनुपम परंपरा

माघ मेले का सबसे खास हिस्सा है कल्पवास। कल्पवास का अर्थ है कल्प (लंबे समय) तक वास करना। श्रद्धालु पौष पूर्णिमा (3 जनवरी 2026) से महाशिवरात्रि (15 फरवरी 2026) तक संगम तट पर टेंट में रहते हैं और कठोर तपस्या करते हैं।

कल्पवास के मुख्य नियम हैं

  • जमीन पर सोना, कुश के आसन पर।
  • दिन में एक बार सादा भोजन (फल, दूध, सात्विक आहार)।
  • ब्रह्मचर्य का पालन।
  • रोजाना संगम स्नान।
  • भजन-कीर्तन, रामायण-महाभारत पाठ और ध्यान।

शास्त्रों में कहा गया है कि कल्पवास करने से व्यक्ति को 12 साल की तपस्या का फल एक साथ मिल जाता है। यह मोक्ष प्राप्ति का सीधा मार्ग माना जाता है। लाखों कल्पवासी संगम तट पर छोटे-छोटे टेंट लगाकर रहते हैं और पूरी अवधि सादगी से बिताते हैं।

2026 में प्रमुख स्नान तिथियाँ

प्रयागराज के त्रिवेणी संगम पर आयोजित माघ मेला 2026 में छह मुख्य स्नान पर्व हैं, जिनमें तीन अमृत स्नान (शाही स्नान) शामिल हैं। ये तिथियाँ हिंदू पंचांग के अनुसार निर्धारित हैं और प्रत्येक का विशेष धार्मिक महत्व है। शास्त्रों में वर्णित है कि माघ मास में संगम स्नान से सहस्रों अश्वमेध यज्ञों के समान पुण्य प्राप्त होता है तथा पूर्वजन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं (पद्म पुराण, प्रयाग माहात्म्य)।

इन दिनों लाखों-करोड़ों श्रद्धालु संगम तट पर एकत्र होते हैं, जहाँ पवित्र डुबकी के साथ भजन-कीर्तन, दान-पुण्य और तपस्या का वातावरण बनता है। अमृत स्नान के अवसर पर साधु-संतों के अखाड़ों की भव्य पेशवाई निकलती है, जिसमें हाथी-घोड़ों पर सवार नागा साधु, ध्वज-पताकाएँ और ढोल-नगाड़ों की गूँज देखते ही बनती है। यह दृश्य सनातन परंपरा की जीवंत झलक प्रस्तुत करता है।

माघ मेला 2026 में छह मुख्य स्नान पर्व हैं। इनमें तीन अमृत स्नान सबसे महत्वपूर्ण हैं-

3 जनवरी 2026 (पौष पूर्णिमा): यह माघ मेले और कल्पवास की औपचारिक शुरुआत की तिथि है। पहला प्रमुख स्नान इसी दिन होता है। पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की पूर्ण कला में स्नान करने से मन की शुद्धि और आत्मिक शांति मिलती है। स्कंद पुराण में उल्लेख है कि पौष पूर्णिमा पर संगम स्नान से व्यक्ति को देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होता है। इस दिन कल्पवासी टेंट लगाकर तपस्या शुरू करते हैं और मेला क्षेत्र पूरी तरह जीवंत हो उठता है।

14 जनवरी 2026 (मकर संक्रांति): पहला अमृत स्नान इसी दिन होता है। सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर यह पर्व मनाया जाता है, जिसे उत्तरायण का आरंभ माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, इस दिन स्नान, दान और तिल गुड़ का सेवन विशेष पुण्यदायी है (महाभारत, अनुशासन पर्व)। अमृत स्नान में अखाड़ों की पेशवाई सबसे आकर्षक होती है- जूना अखाड़ा, निरंजनी, महानिर्वाणी आदि अखाड़े भव्य जुलूस के साथ संगम की ओर बढ़ते हैं। श्रद्धालु सूर्य देव को अर्घ्य देकर स्नान करते हैं।

29 जनवरी 2026 (मौनी अमावस्या): माघ मेले का सबसे महत्वपूर्ण स्नान पर्व। इस दिन मौन व्रत रखकर स्नान करने की परंपरा है, जिससे इंद्रियों पर संयम और आत्मचिंतन होता है। मत्स्य पुराण में कहा गया है कि मौनी अमावस्या पर प्रयाग स्नान से मोक्ष प्राप्ति का द्वार खुलता है और सभी पाप धुल जाते हैं। यह दिन मेले में सबसे अधिक भीड़ वाला होता है, क्योंकि इसे मुख्य स्नान माना जाता है। कल्पवासी विशेष रूप से इस तिथि का इंतजार करते हैं।

2 फरवरी 2026 (बसंत पंचमी): दूसरा अमृत स्नान। यह विद्या, बुद्धि और ज्ञान की देवी माँ सरस्वती की पूजा का पर्व है। पीले वस्त्र धारण कर, सरस्वती पूजन और स्नान से बुद्धि-विवेक की प्राप्ति होती है। भागवत पुराण में वसंत पंचमी का महत्व वर्णित है। पेशवाई फिर से निकलती है और संगम तट पीले फूलों व वस्त्रों से सज जाता है।

12 फरवरी 2026 (माघ पूर्णिमा): तीसरा अमृत स्नान। माघ पूर्णिमा पर चंद्रमा की पूर्ण शक्ति से स्नान करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है। विष्णु पुराण के अनुसार, इस दिन संगम स्नान से हजारों गोदान का फल मिलता है। अखाड़ों की अंतिम भव्य पेशवाई इस दिन होती है।

15 फरवरी 2026 (महाशिवरात्रि): अंतिम स्नान और मेले का समापन। भगवान शिव की आराधना के साथ स्नान से सभी मनोकामनाएँ पूरी होती हैं। शिव पुराण में महाशिवरात्रि पर प्रयाग स्नान को परम पुण्यकारी बताया गया है।

योगी सरकार ने की है भव्य तैयारियाँ

महाकुंभ 2025 की ऐतिहासिक सफलता के बाद योगी आदित्यनाथ सरकार ने माघ मेला 2026 को भी उसी स्तर पर आयोजित करने का लक्ष्य रखा है। मुख्यमंत्री योगी ने कई बार तैयारियों की समीक्षा की और सख्त निर्देश दिए थे कि 31 दिसंबर 2025 तक सभी व्यवस्थाएँ पूरी हो जाएँ, जोकि पूरी हो चुकी है।

मुख्य तैयारियाँ इस प्रकार हैं-

क्षेत्र विस्तार: मेला क्षेत्र को 800 हेक्टेयर तक बढ़ाया गया है। टेंट सिटी, सेक्टर और घाटों का निर्माण तेजी से हुआ।
सुरक्षा व्यवस्था: हजारों पुलिसकर्मी, सीसीटीवी, ड्रोन और एआई आधारित निगरानी। मुख्य स्नान पर VIP प्रोटोकॉल पूरी तरह समाप्त।
स्वच्छता और स्वास्थ्य: संगम तट पर गहरी सफाई, अस्थाई अस्पताल, एम्बुलेंस और डॉक्टरों की टीम।
यातायात और पार्किंग: विशेष ट्रेनें, बसें और पार्किंग व्यवस्था। ट्रैफिक डायवर्जन प्लान तैयार।
बिजली और पानी: पूरे क्षेत्र में 24 घंटे बिजली और स्वच्छ पेयजल।
पर्यटन सुविधाएँ: पहली बार 4 अस्थाई पर्यटन सूचना केंद्र, जहाँ गाइड और होटल की जानकारी मिलेगी।
बजट: शुरुआत में ही ₹42 करोड़ की स्वीकृत, साथ ही महाकुंभ के बचे बजट से अतिरिक्त व्यवस्थाएँ की गई हैं।

मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि माघ मेला सनातन परंपरा का जीवंत रूप है। सरकार का लक्ष्य है कि हर श्रद्धालु को सुरक्षित और दिव्य अनुभव मिले।

माघ मेला के लिए भदोही की ज्ञानपुर जेल में बनाए गए खास कालीन (फोटो साभार: X_DM_Bhadohi)

योगी सरकार में हिंदू त्योहारों की भव्य परंपरा

योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में 2017 से उत्तर प्रदेश में हिंदू त्योहारों और धार्मिक आयोजनों को नई ऊँचाई मिली है। पहले ये पर्व साधारण और स्थानीय स्तर पर मनाए जाते थे, लेकिन अब वे विश्व स्तरीय, रिकॉर्ड बनाने वाले और करोड़ों श्रद्धालुओं को आकर्षित करने वाले हो गए हैं। सरकार का फोकस सनातन संस्कृति के सम्मान, श्रद्धालुओं की सुरक्षा, सुविधा और स्वच्छता पर रहा है। इससे न केवल आस्था मजबूत हुई, बल्कि पर्यटन और अर्थव्यवस्था को भी बड़ा बढ़ावा मिला। यह परंपरा अब उत्तर प्रदेश की पहचान बन चुकी है।

आइए कुछ प्रमुख उदाहरणों से समझते हैं कि कैसे ये आयोजन भव्य और दिव्य बने-

अयोध्या में दीपोत्सव की अनुपम छटा

दीपावली पर अयोध्या का दीपोत्सव अब विश्व प्रसिद्ध है। योगी सरकार ने इसे राम नगरी की आध्यात्मिक गरिमा से जोड़ा। हर साल सरयू तट पर लाखों दीये जलाए जाते हैं। 2025 में 26 लाख 17 हजार से अधिक दीयों से शहर रोशन हुआ, जिसने दो गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाए- सबसे अधिक दीये जलाने और 2,128 वेदाचार्यों द्वारा सामूहिक सरयू आरती का।

यह आयोजन लेजर शो, रामलीला और सांस्कृतिक कार्यक्रमों से सजा होता है। पहले जहाँ कुछ हजार दीये जलते थे, अब लाखों की संख्या और विश्व रिकॉर्ड यह दर्शाते हैं कि सरकार ने सनातन परंपरा को कितनी भव्यता दी है।

महाकुंभ 2025: विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक समागम

प्रयागराज में महाकुंभ 2025 ऐतिहासिक रहा। 66 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने संगम में डुबकी लगाई, जो विश्व रिकॉर्ड है। योगी सरकार ने इसे सबसे सुरक्षित, स्वच्छ और व्यवस्थित बनाया। इस आयोजन से राज्य की अर्थव्यवस्था को 3.5 लाख करोड़ रुपए का अनुमानित लाभ मिला। पहले कुंभ मेले में व्यवस्थाएं सीमित होती थीं, लेकिन अब यह वैश्विक स्तर का दिव्य आयोजन बन चुका है।

महाकुंभ 2025 के दौरान श्रद्धालुओं पर हेलीकॉप्टर से बरसाए गए थे फूल (फोटो साभार: X_SwachhKumbh)

काँवड़ यात्रा: आस्था में पुष्पवर्षा की बौछार

सावन में कांवड़ यात्रा को भव्य बनाया गया। मुख्यमंत्री योगी खुद हेलीकॉप्टर से कांवड़ियों पर पुष्पवर्षा करते दिखे हैं और रूट का हवाई निरीक्षण करते हैं। 2025 में भी मेरठ-मुजफ्फरनगर मार्ग पर यह नजारा देखा गया। हजारों सीसीटीवी, प्रकाश व्यवस्था, पानी और सुरक्षा के इंतजाम से यात्रा सुगम हुई। पहले असुविधाओं की शिकायतें आती थीं, अब यह आस्था का सुरक्षित और दिव्य पर्व बन चुका है।

वाराणसी में देव दीपावली की रोशनी

कार्तिक पूर्णिमा पर काशी के घाट 25 लाख दीयों से जगमगाते हैं। 2025 में लेजर शो, ग्रीन आतिशबाजी और सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने इसे और भव्य बनाया। मुख्यमंत्री योगी खुद भी क्रूज से देव दीपावली का भव्य नजारा देख चुके हैं। यह देवताओं की दिवाली के रूप में विश्व स्तर पर प्रसिद्ध हो रही है।

यह परंपरा सनातन संस्कृति के पुनरुत्थान का प्रतीक है। माघ मेला 2026 भी इसी कड़ी का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो महाकुंभ मॉडल पर आयोजित हो रहा है। प्रयागराज एक बार फिर विश्व को संदेश देगा कि भारत की आस्था और संस्कृति अमर है।