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नौकरी के नाम पर ठगे ₹3 लाख, जिस्मफरोशी के लिए ओमान भेजा: मुंबई से अशरफ समेत 2 दलाल गिरफ्तार, फँसी मिली 70+ महिलाएँ

महाराष्ट्र की मुंबई पुलिस (Mumbai Police, Maharashtra) ने नौकरी दिलाने के नाम पर महिलाओं को ओमान ले जाकर जिस्मफरोशी में धकेलने वाले दो दलालों को गिरफ्तार किया है। दोनों दलालों ने 43 साल की एक कास्टिंग एजेंट को नौकरी के नाम पर ओमान में यौन व्यापार में धकेलने की कोशिश की थी।

पीड़ित महिला ने आरोप लगाया है कि ओमान में नौकरी के नाम पर उसने इन दोनों को तीन लाख रुपए दिए थे। महिला ने इसकी शिकायत मीरा भायंदर-वसई विरार (एमबीवीवी) में काशीमीरा पुलिस थाने में अगस्त 2022 में दर्ज कराई थी। पुलिस टीम ने इस मामले में पिछले सप्ताह एक आरोपित को पकड़ा था।

आरोपियों की पहचान कर्नाटक के 46 वर्षीय अशरफ मैदु कविरा और घाटकोपर की 46 वर्षीय नमिता सुनील मसुलकर के रूप में हुई है। पुलिस ने बताया कि यह पता लगाने के लिए जाँच की जा रही है कि इस रैकेट में और कितने एजेंट शामिल हैं। इसके साथ ही इन लोगों ने कितनी महिलाओं को देह व्यापार में धकेला है।

इस मामले में शिकायत करने वाली महिला ने बुधवार (8 मार्च 2023) को कहा कि यह उसके एनजीओ, छत्रपति मराठा साम्राज्य संगठन का एक अंडरकवर ऑपरेशन था। महिला ने मिड-डे को बताया कि कुछ पीड़ितों के परिवार इस तरह की शिकायत लेकर एनजीओ के पास आए थे।

महिला ने कहा, “मुझे पता चला कि एजेंटों का एक गिरोह महिलाओं को घरेलू असिस्टेंट, मॉल में एक सेल्स गर्ल, नर्स आदि के रूप में काम दिलाने के नाम पर ओमान भेज रहा था। जब महिलाएँ एक बार ओमान चली जाती थीं तो उन्हें देह व्यापार में धकेल दिया जाता है।”

महिला ने बताया, “परिवारों ने हमें बताया कि विदेश में नौकरी की तलाश कर रही महिलाओं को जस्ट डायल पर एजेंटों के संपर्क नंबर मिले थे। मैंने एक नंबर पर कॉल किया और नमिता से संपर्क किया, जिसने मुझे ओमान में नौकरी की पेशकश की। मैं 27 जुलाई 2022 को ओमान पहुँची। वहाँ अन्य महिलाओं के वीडियो और तस्वीरें लीं और हमारे दो एनजीओ सदस्यों जितेंद्र पवार और नवीन मोरे को भेजी, जो वहाँ रहते हैं।”

महिला ने बताया, “जब ओमान में एजेंटों को पता चला कि मैंने क्या किया है तो उन्होंने मुझ पर हमला कर दिया। इसके साथ ही उन्होंने मुझे 7-8 अन्य महिलाओं के साथ एक कमरे में बंद कर दिया। उसमें से AC हटा दिया और वहाँ से भाग गए। इसके बाद मैंने उन महिलाओं को सीधे भारतीय दूतावास जाने के लिए कहा।”

महिला ने कहा, “हमारे एनजीओ के दो सदस्यों के साथ हमने अपना लोकेशन साझा किया और वे आकर मुझे बचाए। हमारे एनजीओ के सदस्यों ने मुझे वहाँ से निकालने के लिए ओमान को एजेंटों को 1.6 लाख रुपए का भुगतान भी किया।” महिला ने कहा कि उसने भारत, श्रीलंका, बांग्लादेश, मलेशिया और नाइजीरिया सहित अन्य अफ्रीकी देशों की लगभग 70 महिलाओं को देखा।

महिला ने दावा किया कि ओमान में एजेंटों ने महिलाओं को चुना और उन्हें ग्राहकों के पास भेज दिया। जब महिलाएँ वापस कैंप में आईं तो उन्होंने बताया कि कैसे ग्राहकों ने उनका यौन उत्पीड़न किया और उन्हें पूरे दिन काम करने के लिए मजबूर किया। महिला ने कहा कि उसने पहले इस ऑपरेशन का खुलासा इसलिए नहीं किया, क्योंकि वह चाहती थी कि पुलिस आरोपितों को पकड़े।

महिला का कहना है कि 2 अगस्त 2022 को वह भारत लौटी तो उसने इस बारे में प्रधानमंत्री और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को पत्र लिखा। महिला का कहना है कि जब उसने महाराष्ट्र महिला आयोग तो चिट्ठी लिखी तो पुलिस ने जाँच शुरू की।

‘लव जिहाद के आए 1 लाख+ मामले’ : महाराष्ट्र विधानसभा में मंत्री प्रताप लोढा का दावा, बोले- अब नहीं होने देंगे श्रद्धा जैसी कोई हत्या

महाराष्ट्र के महिला एवं बाल विकास मंत्री मंगल प्रभात लोढ़ा (Mangal Prabhat Lodha) ने लव जिहाद (Love Jihad) पर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने बुधवार (8 मार्च 2023) को विधानसभा में दावे के साथ कहा कि महाराष्ट्र में लव जिहाद के 1 लाख से ज्यादा मामले सामने आ चुके हैं। श्रद्धा वॉकर हत्या जैसे मामले को रोकने की जिम्मेदारी राज्य सरकार की है। प्रभात लोढ़ा ने अपने ट्विटर हैंडल पर भी इसका वीडियो साझा किया है।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीन तलाक पर प्रतिबंध लगाकर भारत की महिलाओं के साथ न्याय किया। जिन महिलाओं को डरा धमकाकर रखा गया था। उन्हें खुलकर बोलने का मौका दिया। इस फैसले के बाद उन्हें बेहतर माहौल मिला है।

महिला एवं बाल विकास मंत्री ने अपनी बात को जारी रखते हुए आगे कहा, “हम महिलाओं के उत्थान की बात तो करते हैं। पर जब इसमें लव जिहाद का विषय आ जाता है। महिलाओं पर होने वाले क्रूर अत्याचार की बात आती है, राज्य की नाराज जनता हो जाती है। इसके खिलाफ महाराष्ट्र के कई जिलों में 50-50 हजार की भीड़ में मोर्चे निकल रहे हैं। क्या ये मोर्चे अपने आप निकल रहे हैं? लोगों के अंदर काफी गुस्सा है।”

मंत्री ने यह भी कहा कि महाराष्ट्र में लव जिहाद के 1 लाख से ज्यादा मामले सामने आए, उससे समाज कहीं न कहीं व्यथित है। राज्य में किसी और श्रद्धा की हत्या ना हो इसकी जिम्मेदारी राज्य सरकार की है। और इसीलिए इंटर फेथ मैरिज कमिटी बनाई है। हर उस बच्ची का जिसका शादी के बाद अपने घर से संपर्क टूट चुका है, उनको सुरक्षा प्रदान करना सरकार और महिला विकास मंत्रालय की जिम्मेदारी है ।

दरसअल, महाराष्ट्र विधानसभा में इस समय बजट सत्र चल रहा है, जो 26 मार्च तक चलेगा। इस बजट में महिलाओं के हितों को ध्यान में रखा गया है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर सदन में महिला नीति पर भी बहस शुरू की गई। इसके जवाब में लोढ़ा ने कहा कि राज्य सरकार महिलाओं के कल्याण, सुरक्षा और सशक्तीकरण के संबंध में विधायकों की ओर से दिए गए सभी सुझावों पर गौर करेगी।

बता दें कि पिछले साल दिसंबर में महाराष्ट्र सरकार ने घोषणा की थी कि अंतर-जातीय और अंतर-धार्मिक विवाहों के बारे में जानकारी एकत्र करने के लिए एक समिति का गठन किया गया है। राज्य महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा 13 दिसंबर 2022 को जारी एक सरकारी प्रस्ताव (जीआर) में कहा गया है, “अंतर-जाति/अंतर-धार्मिक विवाह-परिवार समन्वय समिति (राज्य स्तर) मुख्य रूप से विवाहों की संख्या पर डेटा सारणीबद्ध करेगी। इसके अलावा किसी अन्य धर्म या जाति के व्यक्ति से शादी के बाद अपने परिवार से अलग हो गई महिलाओं के मुद्दों पर ध्यान दिया जाए।” जनवरी तक, राज्य सरकार की इंटरफेथ मैरिज फैमिली कोऑर्डिनेशन कमेटी को इंटरफेथ मैरिज के 152 मामलों की जानकारी मिली। कमेटी के सदस्यों के जरिए 152 मामले प्रकाश में आए हैं।

श्रद्धा वॉकर हत्याकांड

गौरतलब है कि आफताब अमीन पूनावाला ने 18 मई 2022 को अपनी लिव-इन-पार्टनर श्रद्धा वॉकर की हत्या कर दी थी। इसके बाद उसने शव के 35 टुकड़े कर दिल्ली के महरौली व अलग-अलग इलाकों में फेंक दिए थे। श्रद्धा की हत्या के बाद किसी को उस पर शक न हो इसलिए वह लगातार ऑफिस जाता रहा। यही नहीं, हत्या के बाद श्रद्धा के परिवार वालों और फ्रेंड्स की नजरों में श्रद्धा को जिंदा दिखाने के लिए आफताब उसके इंस्टाग्राम अकाउंट को यूज करता रहा। यहाँ तक कि उसने उसके इंस्टाग्राम से कुछ पोस्ट्स भी किए थे। मामले का खुलासा नवंबर में हुआ था। 12 नवम्बर, 2022 को श्रद्धा की हत्या के आरोप में पुलिस ने आफताब को गिरफ्तार किया था।

सतीश कौशिक को अस्पताल ले गए लेकिन पुलिस को बताया तक नहीं, जावेद अख्तर-शबाना की पार्टी: जहाँ अली फजल-रिचा चड्ढा भी थे, वहाँ क्या हुआ?

बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता और डायरेक्टर सतीश कौशिक का दिल्ली का दौरा पड़ने से 8 मार्च 2023 की देर रात 66 वर्ष की अवस्था में निधन हो गया। उन्हें गुरुग्राम के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था, लेकिन बचाया नहीं जा सका। पुलिस पता लगाने की कोशिश कर रही है कि उनकी मौत के पीछे कोई संदिग्ध परिस्थितियाँ तो नहीं रही हैं।

मौत से पहले सतीश कौशिक दिल्ली में थे। उन्होंने होली के जश्न वाली तस्वीरें अपने ट्विटर पर अकाउंट से शेयर की थी और सभी को शुभकामनाएँ दी थीं। यह होली सेलिब्रेशन गीतकार जावेद अख्तर और शबाना आजमी की मेजबानी में ‘जानकी कुटीर’ नामक फार्म हाउस में रखी गई थी। इसमें अली फजल और उनकी बीवी ऋचा चड्ढा भी थी।

मौत से पहले उन्होंने बेचैनी की शिकायत की थी। इसके बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया, लेकिन रास्ते में ही उन्हें दिल का दौरा पड़ गया। इस बारे में पुलिस को भी कोई जानकारी नहीं दी गई थी। अनुपम खेर ने बताया, “वह असहज महसूस कर रहे थे और उन्होंने ड्राइवर से उन्हें अस्पताल ले जाने को कहा और रास्ते में रात करीब एक बजे उन्हें दिल का दौरा पड़ा।”

पोस्टमार्टम को लेकर दिल्ली पुलिस ने बताया, “पुलिस CrPC की धारा 174 (आत्महत्या आदि से संबंधित पुलिस की जाँच) के तहत नियमित कार्यवाही कर रही है। इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि क्या मृत्यु रहस्यमय परिस्थितियों में हुई या व्यक्ति की मृत्यु अप्राकृतिक कारणों से हुई है।”

दिल्ली के दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल में उनका पोस्टमार्टम किया गया। कहा जा रहा है कि मौत का कारण हार्ट अटैक ही है। कहा जा रहा है कि हार्ट अटैक के पीछे सतीश कौशिक का मोटापा एक प्रमुख कारण हो सकता है। डॉक्टरों का कहना है कि मोटापा के कारण व्यक्ति में हार्ट अटैक का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

इस बात को लेकर मीडिया में चर्चा है कि होली सेलिब्रेशन पार्टी के दौरान सतीश कौशिक ने शराब पी होगी। हालाँकि, उनके जानने वालों का कहना है कि पार्टी में सतीश कौशिक ने शराब नहीं पी थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बा उनका विसरा सुरक्षित कर लिया गया है, जिसकी आगे जाँच की जाएगी। इससे पता चलेगा कि मौत से पहले सतीश कौशिक ने क्या खाया-पीया था।

सतीश कौशिक की पहचान एक हास्य अभिनेता के रूप में भी थी। उन्हें एक जिंदादिल इंसान माना जाता था। हालाँकि, उनकी व्यक्ति जिंदगी भी संघर्षों से भरी पड़ी थी। सतीश कौशिक ने साल 1985 में शशि कौशिक संग शादी की थी और अगले साल उनके घर में एक बेटे ने जन्म लिया, जिसका नाम उन्होंने शानू कौशिक रखा गया।

करीब दो साल की उम्र में उनके बेटे की निधन हो गया। इसके बाद वे अंदर तक टूट गए। बेटे की मौत के बाद उन्हें कोई दूसरी संतान नहीं हुई। इसके बाद 56 साल की उम्र में सतीश कौशिक ने सरोगेसी का रास्ता अपनाया। साल 2012 में सरोगेसी के जरिए सतीश कौशिक और शशि कौशिक फिर माता-पिता बने। हालाँकि, होनी को कुछ और मंजूर था। अब माँ-बेटी अकेली रह गए।

सतीश कौशिक का जन्म साल 1956 में हरियाणा के महेंद्रगढ़ में हुआ था। उन्होंने स्कूली पढ़ाई के बाद दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज में नामांकन लिया और यहाँ से स्नातक की पढ़ाई की। इसके बाद वे नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) में एडमिशन लिया। ऐक्टिंग का गुर सीखने के बाद वे मुंबई चले गए और साल 1983 में एक्टिंग में ‘जाने भी दो यारों’ से डेब्यू किया। 

सतीश कौशिक ने 100 से अधिक फिल्मों में काम किया था। साल 1993 में उन्होंने अनिल कपूर और श्रीदेवी की मुख्य भूमिका वाली फिल्म ‘रूप की रानी, चोरों का राजा’ से बतौर निर्देशक उन्होंने अपनी पारी शुरू की। आगे चलकर उन्होंने एक दर्जन से अधिक फिल्मों का निर्देशन किया।

इसी बीच आमिर खान (Aamir Khan) का एक इंटरव्यू सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इस वीडियो में आमिर खान ने बताया था अनिल कपूर की फिल्म ‘मिस्टर इंडिया’ के लिए वो काम करना चाहते थे, लेकिन सतीश कौशिक ने उन्हें इस फिल्म के लिए रिजेक्ट कर दिया था। आमिर ने इस इंटरव्यू में अपने रिजेक्शन का खुलासा किया था।

सतीश कौशिक कैसे व्यक्ति थे, इसका अंदाजा अभिनेत्री नीना गुप्ता की बायोग्राफी में उनके बयान से लगाया जा सकता है। नीना गुप्ता ने अपनी बायोग्राफी में लिखा है, “जब मैं प्रेग्नेंट थी, बच्चे के पिता से मैं शादी नहीं कर सकती थी और मुझे ये बच्चा चाहिए था, तब सतीश ने शादी के लिए मुझे प्रपोज किया था। मैं और सतीश साल 1975 से एक-दूसरे को जानते थे और बेस्ट फ्रेंड्स थे। उन्होंने कहा था कि मैं तुमसे शादी करने के लिए तैयार हूँ और बच्चे को अपना नाम भी दूँगा।”

नीना गुप्ता ने अपनी बायोग्राफी ‘सच कहूँ’ में सतीश कौशिक को लेकर आगे लिखा है, “सतीश ने मुझसे यहाँ तक कह दिया था कि यदि बच्चा डार्क पैदा हो तो कह देना मेरा है। हम दोनों शादी कर लेंगे और किसी को कोई शक भी नहीं होगा।” नीना गुप्ता ने कहा है कि सतीश कौशिक उन्हें उन्हें कुँवारी माँ बनने के बाद होने वाली परेशानी से बचाना चाहते थे।

सतीश कौशिक ऐसे इंसान थे कि उनको लेकर हर किसी के पास कोई ना कोई कहानी है। होली के दिन इस कहानी का अंत हो गया। उनके पार्थिव शरीर को मुंबई ले जाया जा रहा है, जहाँ शाम को 6 बजे उसका अंतिम संस्कार किया जाएगा। सतीश के निधन पर गृह मंत्री अमित शाह से लेकर अभिनेता अनुपम खेर और कंगना रणौत तक ने अपनी श्रद्धांजलि दी है।

‘बताओ न अब किसे टपकाया?’: जेल में बंद अतीक अहमद के बेटे को सताया ‘एनकाउंटर’ का डर, पुलिस से रोज पूछता है सवाल

उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में उमेश पाल हत्याकांड के बाद यूपी पुलिस के एक्शन से माफिया अतीक अहमद का बेटा अली अहमद खौफ में है। प्रयागराज के नैनी जेल में बंद अली अहमद जेल में तैनात जवानों से पूछता रहता है कि अब किसका एनकाउंटर किया गया है। दरअसल, उमेश पाल हत्याकांड के आरोपितों की धड़-पकड़ के दौरान हुए मुठभेड़ में पुलिस ने अब तक 2 आरोपितों को एनकाउंटर में मार गिराया है। बाकी आरोपितों की तलाश में पुलिस की टीम राज्य और राज्य के बाहर भी अभियान चला रही है।

विधायक राजू पाल हत्याकांड के गवाह उमेश पाल की दिन दहाड़े हत्या के बाद योगी सरकार और यूपी पुलिस पूरे एक्शन में है। एक तरफ अपराधियों और उनके करीबीयों के अवैध निर्माण पर एक्शन चल रहा है तो दूसरी तरफ हत्याकांड के आरोपितों की धड़पकड़ के लिए अभियान चलाए जा रहे हैं। इस दौरान मुठभेड़ में उमेश पाल हत्याकांड के 2 आरोपितों को पुलिस ने एनकाउंटर में मार गिराया है। इस एक्शन से कभी खौफ का पर्याय रहे अतीक अहमद का बेटा अली अहमद खौफ के साये में जी रहा है।

अतीक का बेटा अली अहमद इस वक्त नैनी सेंट्रल जेल में बंद है। नेटवर्क 18 की रिपोर्ट के मुताबिक अली अहमद जेल में सुरक्षा में तैनात जवानों से एनकाउंटर को लेकर सवाल करता रहता है। दिन में कई बार वह सुरक्षाकर्मियों से पूछता है कि अब किसे टपकाया गया है। जानकारी है कि उस्मान के एनकाउंटर के बाद से बेचैन अली अहमद को अपने एनकाउंटर का भी डर सता रहा है। अली अहमद सुरक्षाकर्मियों से यह भी पूछता रहता है कि उसे दूसरे जेल में शिफ्ट तो नहीं किया जा रहा।

अली अहमद को जेल बदलने के नाम पर रास्ते में एनकाउंटर का डर सता रहा है। अली अहमद नैनी जेल में रंगदारी के एक मामले में बंद है। उसने 30 जुलाई, 2022 को प्रयागराज कोर्ट में सरेंडर किया था। उस पर प्रॉपर्टी डीलर से 5 करोड़ रुपए की रंगदारी माँगने का आरोप है।

नरेंद्र मोदी स्टेडियम में बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी का अंतिम और निर्णायक टेस्ट: भारत और ऑस्ट्रेलिया के PM चाय पर चर्चा करते देख रहे मैच

भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच खेले जा रहे बॉर्डर-गावस्कर ट्रॉफी का अंतिम टेस्ट मैच आज गुजरात के अहमदाबाद में खेला जा रहा है। खास बात यह है कि मैच देखने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज भी नरेंद्र मोदी स्टेडियम पहुँचे। मैच शुरू होने से पहले दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने अपने-अपने देश के क्रिकेट टीम के कप्तान को सम्मानित किया। इसके बाद एक खास वाहन में दोनों नेताओं ने स्टेडियम का चक्कर लगाया।

टीम इंडिया और ऑस्ट्रेलिया के बीच 4 टेस्ट मैचों की सीरीज का चौथा और आखिरी मैच बेहद खास है। यह मुकाबला भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच क्रिकेट के माध्यम से 75 साल की दोस्ती का यादगार भी बन रहा है। यही वजह है कि मैच देखने के लिए दोनों देशों के प्रधानमंत्री भी स्टेडियम पहुँचे। उनके स्वागत के लिए स्टेडियम परिसर में विशाल होर्डिंग्स लगाए गए हैं। होर्डिंग्स पर लिखा है -“75 इयर्स ऑफ फ्रेंडशिप थ्रू क्रिकेट”। होर्डिंग्स में दोनों देशों के पूर्व और वर्तमान क्रिकेट के दिग्गजों को भी दिखाया गया है।

मैच में टॉस के लिए भी खास सिक्का बनाया गया था। जिसमें 75 वर्षों के दौरान दोनों देशों के क्रिकेट से जुड़ी यादों को दिखाने की कोशिश की गई थी। बीसीसीआई अध्यक्ष रोजर बिन्नी ने ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री और बीसीसीआई सचिव जय शाह ने पीएम मोदी को खास तोहफा भी दिया, जिसमें दोनों देशों के 75 साल के क्रिकेट के संबंधों को दर्शाया गया है।

राष्ट्रगान के समय दोनों देशों के प्रधानमंत्री अपनी-अपनी टीम के खिलाड़ियों के साथ खड़े नजर आए। पीएम मोदी कप्तान रोहित शर्मा के साथ मैदान में दाखिल हुए और टीम इंडिया के दूसरे खिलाड़ियों के साथ मुलाकात की।

टॉस जीतकर पहले बल्लेबाजी करते हुए ऑस्ट्रेलियाई टीम ने पहले सेशन के खेल खत्म होने तक 29 ओवरों के बाद दो विकेट के नुकसान पर 75 रन बना लिए हैं। भारत की तरफ से एक विकेट रविचंद्रन अश्विन को मिला जबकि दूसरा विकेट मोहम्मद शमी को।

‘राहुल गाँधी पागल, इटली को अपनी मातृभूमि मानते हैं’ – कॉन्ग्रेसी मंत्री के बेटे ने किया टारगेट, सचिन पायलट के करीबी

राजस्थान सरकार में मंत्री विश्वेन्द्र सिंह के बेटे अनिरुद्ध सिंह राहुल गाँधी पर हमलावर हैं। विदेशी धरती से भारत का अपमान करने का आरोप लगाते हुए अनिरुद्ध सिंह ने एक के बाद एक ट्वीट कर पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष को निशाने पर लिया। उन्होंने कहा कि राहुल गाँधी शायद इटली को ही अपनी मातृभूमि मानते हैं। पिछले दिनों राहुल गाँधी ने ब्रिटिश पार्लियामेंट में बोलते हुए यह आरोप लगाया था कि भारत की संसद में कॉन्ग्रेसी नेताओं की ओर से बोलने पर माइक बंद कर दिया जाता है।

7 मार्च, 2023 को टाइम्स नाउ की एक खबर को कोट करते हुए अनिरुद्ध ने लिखा, “राहुल गाँधी पागल हो गए हैं। वो दूसरे देश की संसद में भारत का अपमान कर रहे हैं। या फिर वो (राहुल गाँधी) इटली को अपनी मातृभूमि मानते हैं।” इसी पोस्ट पर अन्य ट्विटर यूजर्स के कमेंट का जवाब देते हुए अनिरुद्ध का राहुल गाँधी पर हमला जारी रहता है। एक यूजर के कमेंट पर अनिरुद्ध लिखते हैं कि इटली के माफिया भारत की जमीनें हड़प रहे हैं।

कॉन्ग्रेस पार्टी के ऑफिशियल हैंडल से राहुल गाँधी की एक तस्वीर शेयर की गई थी। इस तस्वीर पर कटाक्ष करते हुए अनिरुद्ध ने लिखा – “हाँ, राहुल मानते हैं कि वे एक इटालियन हैं।”

लंदन में आयोजित एक अन्य कार्यक्रम में राहुल गाँधी ने कहा था कि बीजेपी हमेशा सत्ता में नहीं रहने वाली। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए अनिरुद्ध ने लिखा कि क्या यह सब बकवास भारत में नहीं किया जा सकता था या राहुल गाँधी अनुवांशिक रूप से यूरोपीय मिट्टी को पसंद करते हैं?

अनिरुद्ध सिंह, कॉन्ग्रेस और विवाद

यह पहली बार नहीं है जब कॉन्ग्रेस नेता और मंत्री विश्वेन्द्र सिंह के बेटे अनिरुद्ध सिंह के ट्वीट से विवाद खड़ा हो गया हो और कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने इसकी आलोचना की हो। इसके पहले भी अनिरुद्ध के ट्वीट ने भरतपुर इलाके में बड़ा विवाद खड़ा किया था। अनिरुद्ध ने दिसंबर 2022 में ब्रिटिश शासन की 1935 में प्रकाशित किताब ‘द इंडियन स्टेट्स’ का उल्लेख करते हुए लिखा था कि भरतपुर रियासत के सिनसिनवार जाट जादौन राजपूतों के वंशज हैं।

अनिरुद्ध सिंह की इस बात को लेकर बहुत हंगामा हुआ। जाट महासभा की बैठक में इस बात को खारिज कर दिया गया था। जाट महासभा ने सिनसिनवार जाटों को श्री कृष्ण का वंशज बताते हुए यदुवंशी जाट क्षत्रिय करार दिया था।

बताया जाता है कि अनिरुद्ध और उनके पिता विश्वेन्द्र सिंह के संबंध भी अच्छे नहीं हैं। मई 2021 में अनिरुद्ध ने अपने पिता पर शराब का सेवन करने और माता के प्रति हिंसक होने का आरोप लगाया था। इस दौरान उन्होंने दावा किया था कि 6 हफ्तों से वे अपने पिता के संपर्क में नहीं हैं। अनिरुद्ध ने खुद को मदद करने वाले अपने दोस्तों के कारोबार को नष्ट करने का आरोप भी अपने पिता पर लगाया था। अनिरुद्ध खुद को सचिन पायलट का समर्थक मानते हैं।

कौन खा गए बिहार के गाँव-गाँव के रोजगार, कारीगरों को मजदूर बनाने में किसका फायदा: कॉन्ग्रेस+लालू+नीतीश की कोख से उपजा है ये पलायन

बिहार से पलायन की मजबूरी गाहे-बगाहे ही चर्चा में आता है। अभी तमिलनाडु में बिहार के श्रमिकों के साथ कथित हिंसा के बाद इस मुद्दे पर बात हो रही है। इससे पहले कोरोना लॉकडाउन के समय जब किसी तरह अपने घर पहुँचने की होड़ लगी थी, तब यह मुद्दा गरम हुआ था। वैसे गाहे-बगाहे होने वाली इन चर्चाओं का जमीन पर कोई असर नहीं होता है। यदि होता तो बिहार के लोग मजदूर बन पलायन को अभिशप्त नहीं होते।

2020 के विधानसभा चुनावों के दौरान बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसकी वजह एक तरह से बिहार में समुद्र के न होने को बता दिया था। उन्होंने कहा था कि बड़े उद्योग उन राज्यों में लगते हैं जो समुद्र किनारे होते हैं। उसी समय राजद नेता और बिहार के वर्तमान उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने अपनी सरकार बनने पर पहली कैबिनेट बैठक में 10 लाख सरकारी नौकरी देने का वादा किया था। अगस्त 2022 से चच्चा-भतीजा की जोड़ी बिहार की सत्ता में बैठी है, कई कैबिनेट बैठक हो चुकी है, पर 10 लाख नौकरी देने की शुरुआत तक न हुई है। यह दूसरी बात है कि इसी बीच नौकरी माँगने, नियमित किए जाने को लेकर प्रदर्शन करने वाले लोगों को बिहार पुलिस दौड़ा-दौड़ाकर पीट चुकी है। हाल ही में चच्चा-भतीजा ने इस 10 लाख ‘सरकारी नौकरी’ को 10 लाख ‘रोजगार’ पैदा करने से जोड़ दिया है।

सवाल है कि क्या बिहार से पलायन करने की मजबूरी को रोकने का इलाज सरकारी नौकरी ही है? बड़े कल-कारखाने ही हैं? क्या बड़ी इंडस्ट्रियों के बगैर राज्य में रोजगार का सृजन नहीं हो सकता? क्या विशेष राज्य के दर्जे या केंद्रीय पैकेज के बिना राज्य में बदलाव संभव नहीं है?

बिहार का गया भीड़भाड़ वाला शहर है। इसी शहर से करीब 28 किमी दूर केनार चट्टी है। कभी यह जगह कांसा और पीतल बर्तन निर्माण के लिए जाना जाता था। बिहार के अलग-अलग हिस्सों से लेकर, आसपास के राज्यों, यहाँ तक कि नेपाल से भी कारोबारियों का केनार चट्टी आना लगा रहता था। यहाँ के 50 परिवार सीधे तौर पर बर्तन निर्माण के काम से जुड़े थे। आज यह सिमटकर 5 घरों तक पहुँच गया है। शेष परिवार के लोग या तो फेरी लगाते हैं या कारीगर से मजदूर बन गए हैं। जो परिवार अभी भी इस काम से जुड़े हैं, उनके घर के भी कुछेक सदस्य अब मजदूरी के लिए पलायन कर चुके हैं।

2020 में जब मैं केनार चट्टी गया था तो 60 साल के राजमोहन कसेरा ने बताया था, “जब से मैं होश सँभाला हूँ सरकार से कोई फायदा नहीं हुआ है। बहुत से विधायक आए। फोटो ले गए। आश्वासन देकर गए आपका उद्योग बढ़ाएँगे। लेकिन फिर लौटकर नहीं आए। इससे हमलोगों का आशा टूट गया तो हमलोग दूसरा-दूसरा रोजगार करना शुरू कर​ दिए। पेट चलाने के लिए करना पड़ता है न। सरकारी मदद मिल जाए तो पहले 50 परिवार जो ये काम करते थे उनका दिन बदल जाएगा।”

2023 में भी केनार चट्टी की किस्मत नहीं बदली है, जबकि 2020 के विधानसभा चुनावों में पलायन रोकने को लेकर बड़े-बड़े वादे हुए थे। इसकी वजह यह थी कि कोरोना की वजह से घर लौटे प्रवासी श्रमिक बड़ी संख्या में वोट डालने के लिए राज्य में मौजूद थे। कोरोना से जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था उबरी वे फिर से अपना घर छोड़ देश के अलग-अलग हिस्सों में जा चुके हैं। आज आप गाँवों में जाएँ तो पाएँगे कि अमूमन वे पुरुष ही रह गए हैं जो वृद्ध हैं या कुछ भी करने में असमर्थ।

सवार होने की पुरानी मारामारी : बिहार से महानगरों की ओर आने वाली ट्रेनें हों या फिर महानगरों से बिहार जाने वाली ट्रेनें, हालात वही

यह केवल एक केनार चट्टी की कहानी नहीं है। बिहार के ​हर हिस्से का कभी इसी तरह अपना उद्योग था। इनमें से ज्यादातर उद्योग कृषि आधारित थे। इसकी वजह से किसानों के लिए खेती आज की तरह घाटे का सौदा नहीं थी। साथ ही मजबूरी में दूसरे राज्यों में पलायन ही एकमात्र विकल्प नहीं था।

दरभंगा में इम्पल्स कोटा नाम से शिक्षण संस्थान चलाने वाले राजेश झा कहते हैं, “1951 में पूरे देश मे 6982 रजिस्टर्ड फैक्ट्री थी। इनमें से 455 बि​हार में थी। यानी पूरे भारत की 6.51% रजिस्टर्ड फैक्ट्री अकेले बिहार में थी। आजादी के बाद पूरे देश में 56 चीनी मिल थी। इनमें 33 बिहार में थी। इन चीनी मिलों में सकरी, रैयाम, लोहट में निर्मित चीनी एक्सपोर्ट क्वालिटी में सबसे बेहतरीन थी। चीनी मिल से मिल रहे रोज़गार का प्रतिशत 29.50% था। इसके कारण पलायन की समस्या इतनी गंभीर नहीं थी।”

जगदीश चंद्र झा ने Migration and Achievements of Maithil Pandits में लिखा है कि बेहतर अर्थ लाभ के लिए मैथिल हमेशा से देश के अन्य क्षेत्रों में जाते रहे हैं। हालाँकि तब और अब के पलायन में एक मोटा फर्क है। तब लोग जड़ों की ओर लौटते वक्त अमूमन अपने साथ कृषि की नई तकनीक, स्वस्थ जीवन जीने के तरीके, घरेलू उद्योग लगाने के गुर सीख कर आते थे। इसकी वजह से पुराने वक्त में बिहार में पलायन के साथ उद्योग फल-फूल भी रहा था। मसलन, मधुबनी में मलमल, दुलालगंज में सस्ते कपड़ों और किशनगंज में कागज का उद्योग चला। दरभंगा हाथी दाँत से बने सामान का प्रमुख उत्पादन केंद्र बना। खगड़िया, किशनगंज जैसे इलाके पीतल, कांसे के बर्तन के लिए जाने जाते थे। भागलपुर सिल्क तो मुंगेर घोड़े की नाल, स्टोव, जूते के लिए प्रसिद्ध था। पूर्णिया सिंदूर उत्पादन और निर्यात के साथ टेंट हाउस के सामान बनाने के लिए प्रसिद्ध था।

इसके अलावा चीनी मिल, वस्त्र, जूट, तंबाकू, दाल मिल, आटा चक्की मिलें, तेल मिल वगैरह के साथ-साथ स्वतंत्र भारत में कई सार्वजनिक उपक्रम भी राज्य के अलग-अलग हिस्सों में लगे। निजी क्षेत्र में रोहतास इंडस्ट्रीज लिमिटेड (डालमिया नगर), अशोक पेपर मिल (दरभंगा), हिन्द इंजीनियरिंग कम्पनी (बरौनी) जैसे कई बड़े नाम थे। बरौनी में 1946 में खाद कारखाना स्थापित किया गया। फिर यहीं तेल शोधक कारखाना भी लगा। मुंगेर के जमालपुर में रेलवे वर्कशाप तो मोकामा में भारत वैगन एवं इंजीनियरिंग कम्पनी लिमिटेड शुरू किया गया। बिहार से अलग होकर बने झारखंड वाले हिस्से की पहचान ही उद्योगों और खनिजों से थी। अलग-अलग शहर अलग-अलग कामों के लिए जाने जाते थे। मसलन;

लाख उद्योग: गया, पूर्णिया
तेल मिल: पटना, मुंगेर, शाहाबाद
कागज व लुग्दी उद्योग: डालमिया नगर, समस्तीपुर, दरभंगा, पटना, बरौनी
प्लाईवुड: हाजीपुर
चमड़ा उद्योग: गया, दीघा, मोकामा
सीमेंट उद्योग: डालमिया नगर, खेलारी
तंबाकू उद्योग: मुंगेर, बक्सर, गया, आरा
शराब कारखाना: मुंगेर, पटना, मानपुर, पंचरूखी
शीशा उद्योग: पटना
बंदूक उद्योग: मुंगेर
बटन उद्योग: दलसिंहसराय
दियासलाई: कटिहार
कंबल उद्योग: गया, पूर्णिया, औरंगाबाद, मोतिहारी
बीड़ी उद्योग: बिहारशरीफ, झाझा, जमुई
हथकरघा उद्योग: मधुबनी, भागलपुर, बिहारशरीफ, गया, पटना, मुंगेर
बर्तन उद्योग: सीवान, बिहटा

आज इनमें से किसी भी स्थानीय उद्योग का नाम नहीं बचा है। कल-कारखाने खंडहर बन चुके हैं। जो कभी कारीगर थे वे आज मजदूर हैं। अपने घर से दूर हैं। समय-समय पर अलग-अलग राज्यों में उनको टारगेट करने की खबरें भी आती रहती हैं।

वीरानी ही पहचान: दरभंगा का अशोक पेपर मिल

यह सच है कि इस स्थिति के लिए कोई एक जिम्मेदार नहीं है। लेकिन पिछले कुछ दशकों में मजबूरी में पलायन की जो तेजी बिहार ने देखी है, उसकी जिम्मेदारी सीधे तौर पर कॉन्ग्रेस, लालू यादव के जंगलराज और नीतीश कुमार के कथित सुशासन की ही है।

जब कॉन्ग्रेस का केंद्र से लेकर राज्य तक एकछत्र राज्य था, उसने इन उद्योग-धंधों की उपेक्षा की। ऐसे कानून बनाए जो बिहार के खनिज संसाधनों का इस्तेमाल कर बाहर उद्योग लगाने को उद्योगपतियों को प्रोत्साहित करते थे। जंगलराज लाने वाले लालू प्रसाद याद सत्ता में आए तो उन्होंने खुलकर कहना शुरू किया कि विकास उनका एजेंडा नहीं है। उनका एजेंडा सोशल जस्टिस है। इससे विकास की दौड़ में बिहार करीब-करीब ठहर सा गया। पुराने उद्योग-धंधे एक-एक कर उजड़ गए। नीतीश कुमार के आने के बाद विकास की बातें तो खूब हुई है, लेकिन रोजगार के मौके पैदा नहीं किए गए। भले वे सत्ता में बीजेपी के साथ रहे या फिर राजद और अन्य दलों के साथ।

नॉर्वे में चिकित्सक और गिरमिटिया मजदूरों पर आधारित किताब ‘कुली लाइन्स’ के लेखक प्रवीण झा ने 2020 में ऑपइंडिया से बातचीत में कहा था, “पलायन को यदि प्रवास कहें तो यह अवसर है। यही कारण है कि भारत के समृद्ध राज्यों (गुजरात और पंजाब) से भी प्रवास होता रहा है। विदेशी धन का संचार उन्हें समृद्ध करता रहा है। इसे विस्थापन में ‘पुल फैक्टर’ कहते हैं। यानी, जब आप बेहतर अवसर के लिए किसी स्थान पर जाते हैं। लेकिन पलायन शब्द तब संताप से जुड़ जाता है जब इसमें ‘पुल फैक्टर’ से अधिक ‘पुश फैक्टर’ की भूमिका होती है। बिहार से पलायन का बड़ा कारण ‘पुश फैक्टर’ है। इसी पलायन की वजह स्थानीय उद्योगों का बंद होना और जंगलराज रहा है।”

पटना कॉलेज के पूर्व प्राचार्य और समाजशास्त्री नवल किशोर चौधरी इसकी वजहें सामाजिक और आर्थिक दोनों मानते रहे हैं। उनके अनुसार बिहार से पलायन ने इन वजहों से जोर पकड़ा;

  • 90 के दशक में बिहार ने जातीय हिंसा का भीषण दौर देखा है। प्रभावित इलाकों के अलग-अलग हिस्सों से अलग-अलग वर्ग का सामूहिक पलायन हुआ।
  • राज्य में उद्योग-धंधे एक-एक कर बंद होते गए और नए लगे नहीं। इससे न केवल रोजगार के नए अवसर ही पैदा नहीं हुए, बल्कि पहले से उपलब्ध अवसर भी समाप्त हो गए। इसने लोगों को बड़े पैमाने पर देश के दूसरे राज्यों में श्रमिक के तौर पर जाने के लिए मजबूर किया।
  • सत्ता में बदलाव के बाद उपेक्षित वर्ग में इस भावना ने जोर पकड़ा कि महानगरों में जाकर मजदूरी कर लेंगे, लेकिन अपने गॉंव में नहीं करेंगे। हमारी सामाजिक सरंचना भी ऐसी है जिसमें स्थानीय स्तर पर जो काम करने में लोग लज्जा महसूस करते हैं, वही काम वे बाहर जाकर आराम से करते हैं। उनके मन में यह भाव होता है कि यहॉं उन्हें कोई देख नहीं रहा।
  • पुश्तैनी धंधों के खात्मे ने भी श्रमिक के तौर पर पलायन के लिए लोगों को मजबूर किया। यह दो तरह से हुआ। मसलन, गॉंवों में नाई, लुहार, कुम्हार का जो काम कर रहे थे उनमें से एक वर्ग ऐसा था जो इस काम को आगे ले जाने को तैयार नहीं था। वह शहरों की ओर निकल गया। जो लोग पुश्तैनी धंधे से जुड़े रहना चाहते थे उनके लिए गॉंवों से अन्य वर्गों के पलायन के कारण रोजी-रोटी का संकट पैदा हो गया। धीरे-धीरे उन्होंने भी महानगरों की राह पकड़ ली।
  • हर साल आने वाली बाढ़ और सुखाड़ ने भी ग्रामीण इलाकों से बड़े पैमाने पर निकलकर महानगरों में मजदूरी करने को लोगों को मजबूर किया।
दुर्दशा पर रो रहा है पंडौल सूत मिल

बिहार के वरिष्ठ पत्रकार सुरेंद्र किशोर की नजर में इसकी एक बड़ी वजह रेल भाड़ा सामान्यीकरण कानून भी है। स्वतंत्रता के बाद केंद्र सरकार का बनाया यह कानून 90 के दशक में खत्म हुआ था। इस कानून के तहत धनबाद से राँची कोयला की ढुलाई में जितना रेल किराया लगता था, उतने ही भाड़े में यह धनबाद से मद्रास (अब चेन्नई) भी पहुँच जाता था। इसने उद्योगपतियों को समुद्र किनारे कोयला आधारित उद्योग लगाने को प्रोत्साहित किया।

सुरेंद्र किशोर ने ऑपइंडिया से बातचीत में कहा था, “यदि यह कानून अंग्रेजों के जमाने में होता तो टाटा नगर न होता। फिर टाटा बंबई जैसे शहरों में अपना उद्योग खड़ा करते। केंद्र सरकार की इस बेईमानी की वजह से बिहार को कम से कम 10 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ। उद्योगों का राज्य में अपेक्षित विकास नहीं हुआ। न खेती का पंजाब की तरह विकास हुआ। आबादी बढ़ती गई। स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर पैदा नहीं हो रहे थे। ऐसे में पलायन होना ही था।”

जाहिर है कि बिहार से मजबूरी में पलायन को रोकने का उपचार केवल बड़े उद्योग-धंधे, सरकारी नौकरियाँ, विशेष दर्जा या केंद्र सरकार के पैकेज नहीं हैं। इसे अलग-अलग इलाकों के हिसाब से दोबारा उद्योग-धंधे खड़े कर ही रोका जा सकता है। यह आजमाया हुआ मॉडल भी है। लेकिन, न तो यह बिहार के आम लोगों की प्राथमिकता में है और न राजनीतिक दलों की। ऐसे में कोई भी नहीं जानता कि इस प्रवृत्ति पर विराम कब लगेगा। जब तक मजबूरी के पलायन पर रोक नहीं लगती तब तक बिहार का मतलब ‘बीमारू’ राज्य और बिहारी का मतलब ‘गाली’ ही रहेगा।

मेरे शौहर नवाजुद्दीन ने बेटी को पुरुष मैनेजर के साथ दुबई भेजा, होटल में साथ रुकवाया: बीवी ने जारी किया ऑडियो

अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने हाल ही में अपनी पत्नी आलिया के इस आरोप को नकार दिया था कि उन्होंने अपने बीवी-बच्चों को घर से बाहर निकाल दिया। अब आलिया सिद्दीकी नए आरोपों के साथ सामने आई हैं। उन्होंने अपने शौहर को ‘गैर-जिम्मेदार अब्बा’ बताते हुए कहा है कि उनके मैनेजर ने उनकी बेटी को अनुचित तरीके से गले लगाया था। उनका आरोप है कि उक्त मैनेजर ने ऐसा कई बार किया, आपत्ति जताने के बावजूद वो ऐसा करता रहा।

आलिया सिद्दीकी ने आरोप लगाया कि नवाजुद्दीन ने न सिर्फ अपनी बेटी को अपने पुरुष मैनेजर के साथ दुबई भेजा, बल्कि एक ही होटल यूनिट में उन्हें रुकने के लिए कहा। आलिया का कहना है कि ये सब उन्हें जानकारी दिए बिना और उनकी सहमति लिए बिना ही हुआ। आलिया का कहना है कि इसी अवधि में उक्त मैनेजर ने उनकी बेटी को कई बार गलत तरीके से गले लगाया, जबकि वो आपत्ति जताती रही। उन्होंने कहा कि नवाजुद्दीन इस हरकत को नकार नहीं सकते, क्योंकि उस समय न ही वो और न ही मैं वहाँ थी।

आलिया सिद्दीकी का कहना है कि इन सबके बावजूद नजवाजुद्दीन अपने उस मैनेजर पर आँख बंद कर के विश्वास करते रहे, वो उनकी माँ होने के कारण जब उन्होंने आपत्ति जताई तो उन्हें धमकियाँ दी गईं। आलिया का दावा है कि इस आरोप को साबित करने के लिए उनके पास कई सबूत हैं। आलिया सिद्दीकी का ये भी कहना है कि नवाजुद्दीन अपनी राजनीतिक और आर्थिक शक्तियों का इस्तेमाल कर के उनके खिलाफ केस फाइल कर रहे हैं।

आलिया सिद्दीकी ने पुलिस पर भी पक्षपात का आरोप मढ़ा। उन्होंने कहा कि उनके शौहर ने न तो उनकी और न ही बच्चों की कोई फ़िक्र की। आलिया का कहना है कि नवाजुद्दीन उनसे नहीं मिलना चाहते थे, इसीलिए उन्होंने अपनी अम्मी से कह कर उन्हें घर से बाहर निकलवा दिया। आलिया ने एक ऑडियो क्लिप भी जारी किया, जिसमें कथित तौर पर नवाजुद्दीन कहते नजर आ रहे हैं कि उन्हें अपने मैनेजर पर विश्वास है और वो चाहें तो पुलिस में शिकायत कर सकती हैं।

होली के दिन DU के महिला हॉस्टल में लड़कियों को नहीं निकलने दिया बाहर: छात्राओं का प्रदर्शन, कहा – हमें अंदर कैद कर दिया, गार्जियन को बुलाने के लिए कहा

दिल्ली विश्वविद्यालय के एक महिला छात्रावास में होली के दिन छात्राओं के बाहर जाने पर पाबंदी लगाई गई थी। इसको लेकर छात्राओं ने हॉस्टल के भीतर जमकर नारेबाजी की। हालाँकि, इसको लेकर हॉस्टल प्रशासन ने बाकायदा नोटिस जारी किया था। लेकिन इसके बाद भी छात्राएँ बाहर निकलने की माँग को लेकर हँगामा करती रहीं। मामला बुधवार (8 मार्च, 2023) का है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, दिल्ली विश्वविद्यालय के राजीव गाँधी हॉस्टल फॉर गर्ल्स के लिए 2 मार्च, 2023 को एक नोटिस जारी किया था। इस नोटिस में कहा गया था कि होली के चलते हॉस्टल में रहने वाले सभी लोगों को 7 और 8 मार्च को देर रात लौटने या छुट्टी की अनुमति नहीं होगी। इसके अलावा 8 मार्च को हॉस्टल शाम 6 बजे तक बंद रहेगा।

हालाँकि छात्राएँ हॉस्टल के बाहर जाना चाहती थीं। इसलिए उन्होंने हॉस्टल प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी करने के साथ ही जमकर हंगामा किया। छात्राओं का कहना है कि अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर ही उन्हें हॉस्टल में कैद किया है रहा है। वहीं, दिल्ली विश्वविद्यालय प्रबंधन का कहना है कि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है बल्कि इस तरह के नोटिस हर साल जारी किए जाते थे।

छात्रावास में रहने वाली एमए इतिहास की फाइनल ईयर की छात्रा दीपांशी ने कहा है, “हम अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने की योजना बना रहे थे लेकिन हमें छात्रावास के अंदर बंद कर दिया गया। हम अन्य छात्रावासों में रहने वाले अपने दोस्तों से बातचीत करने के लिए भी नहीं जा सके। वहाँ भी इसी तरह के प्रतिबंध लगाए गए हैं। लड़कों के छात्रावास पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया गया है।”

दीपांशी ने आगे कहा, “हॉस्टल प्रबंधन द्वारा परिवार के सदस्यों का कॉन्टैक्ट नंबर माँगा जा रहा है। यहाँ तक ​​कि अगर छात्रों को खाना लेने के लिए बाहर जाना है तो उन्हें एक अंडरटेकिंग पर हस्ताक्षर करने के लिए कहा जा रहा है।”

इस पूरे मामले में दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रॉक्टर रजनी अब्बी का कहना है, “होली का दिन कई बार समस्याओं का सामना करना पड़ता है। समस्या से बचने के लिए छात्रावास प्रशासन हर साल कोई न कोई कदम उठाता है। चूँकि, छात्राएँ विरोध कर रही थीं, इसलिए हमने उनसे कहा कि वे अपने स्थानीय अभिभावकों को बुला सकती हैं और उनके साथ बाहर जा सकती हैं। यदि ऐसा नहीं कर सकतीं तो फिर एक शपथ पत्र दे दें कि वह हॉस्टल के बाहर स्वयं की जिम्मेदारी पर जा रहीं हैं।”

हिन्दू त्योहार पर प्रताड़ित महिला का वीडियो, ईद पर खुश बुर्कानशीं औरत की तस्वीर: ‘Bharat Matrimony’ का दावा – होली पर महिलाएँ प्रताड़ित

हिन्दू त्योहारों को बदनाम करने की साजिश नई नहीं है। मीडिया, तथाकथित बुद्धिजीवियों और सेलब्रिटीज का एक गिरोह है जो लगातार इसी काम में लगा रहता है। बीच-बीच में कुछ ब्रांड्स भी हिन्दुओं को ही निशाना बनाते हैं। अब इस कड़ी में नया नाम जुड़ा है ‘Bharat Matrimony’ का, जो शादी-विवाह के लिए मैच कराने वाला प्लेटफॉर्म है। लोग इसके बॉयकॉट की माँग कर रहे हैं। कारण – इसने होली को महिला विरोधी त्योहार बताया।

इस वीडियो के कैप्शन में ‘Bharat Matrimony’ ने दावा किया कि कई महिलाओं ने होली खेलना बंद कर दिया है, क्योंकि उन्हें इस दिन प्रताड़ना का सामना करना पड़ता है। साथ ही होली के दिन ‘महिला दिवस’ बनाने की अपील की गई और इस त्योहार को महिला सुरक्षा के खिलाफ बताने का प्रयास किया गया। वीडियो में दिखाया गया है कि रंग लगाए जाने के बाद एक महिला अपना चेहरा धो रही होती है, लेकिन उसके आँख के पास एक काला निशान बन गया होता है जो नहीं जाता है।

साथ ही वीडियो में लिखा गया कि कुछ रंग आसानी से नहीं जाते हैं और होली के दौरान प्रताड़ना के कारण महिलाओं को मानसिक जख्म का सामना करना पड़ता है। साथ ही बिना किसी सबूत ये आँकड़ा बताया गया कि इस कारण एक तिहाई महिलाओं ने होली मनाना बंद कर दिया है। इस्कॉन के प्रवक्ता राधारमण दास ने इस दौरान ‘Bharat Matrimony’ का एक पुराना ट्वीट शेयर किया, जो उसने ईद के दौरान किया था। इस ट्वीट में उसने मुस्लिमों को बिना कोई ज्ञान देते हुए मुबारकबाद दी थी।

इतना ही नहीं, ‘भारत मैट्रिमोनी’ ने ईद के दौरान एक खुश महिला की तस्वीर भी डाली थी, जो बुर्के में थी। बता दें कि हिजाब के खिलाफ ईरान जैसे इस्लामी मुल्कों में ही महिलाओं ने लाखों की संख्या में सड़क पर आकर शरीयत का विरोध किया। कई महिलाओं ने भी लिखा कि वो वर्षों से होली मनाती आ रही हैं और उन्हें ऐसी किसी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा। VHP के प्रवक्ता विनोद बंसल ने भी लिखा कि हिन्दू त्योहार आते ही ये लोग सक्रिय हो जाते हैं लेकिन मदरसों व चर्चों में हो रहे व्यभिचार पर चुप रहते हैं।