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कौन बनेगा जज… कौन बनेगा मुख्य चुनाव आयुक्त और EC – सबका फैसला लेगा सुप्रीम कोर्ट: 33 साल पुरानी कमिटी के सहारे ऑर्डर

सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (2 मार्च 2023) को एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) एवं चुनाव आयुक्तों (EC) की नियुक्ति केंद्र सरकार के बजाय एक पैनल करेगी। इस पैनल में प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष के नेता और देश के मुख्य न्यायाधीश में होंगे। बता दें कि अब तक CEC की नियुक्ति राष्ट्रपति केंद्र की सलाह पर करते रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा कि ये समिति मुख्य चुनाव आयुक्त एवं चुनाव आयुक्तों के नामों की सिफारिश राष्ट्रपति को करेगी। इसके बाद राष्ट्रपति इन पर अपनी मुहर लगाएँगे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह प्रक्रिया तब तक लागू रहेगी, जब तक संसद चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर कोई कानून नहीं बना लेती।

जस्टिस केएम जोसेफ की अध्यक्षता वाली पीठ में जस्टिस अजय रस्तोगी, अनिरुद्ध बोस, ऋषिकेश राय और सी टी रविकुमार शामिल थे। इस पीठ ने तर्क दिया कि चुनाव आयुक्तों की चयन प्रक्रिया केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) के डायरेक्टर की तर्ज पर होनी चाहिए। जस्टिस जोसेफ ने कहा कि लोकतंत्र को बनाए रखने के लिए चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता जरूरी है, नहीं तो इसके अच्छे परिणाम नहीं होंगे। 

सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता संभ्रांत कृष्ण ने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय के दो पहलू हैं। नियुक्ति के नये तरीक़े से चुनाव आयोग की निष्पक्षता और स्वीकार्यता भले बढ़ जाए, लेकिन इसके लिए बाध्य करना सरकार के अधिकार क्षेत्र का हनन है। एडवोकेट संभ्रांत ने कहा कि संविधान ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का अधिकार केन्द्र सरकार को साफ़ शब्दों में दे रखा है।

बता दें कि संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग से संबंधित है। इसमें कहा गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी। हालाँकि, इसकी प्रक्रिया के बारे में नहीं बताया गया है। इस तरह इनकी नियुक्ति प्रधानमंत्री की सलाह पर राष्ट्रपति करते हैं।

चुनाव आयुक्तों के भी कॉलेजियम की माँग

बता दें कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त की नियुक्ति को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कई जनहित याचिकाएँ (PIL) दाखिल कर इसके लिए कानून बनाने की माँग की गई थी। इस संबंध में पहली जनहित याचिका 2015 में अनूप वर्णवाल ने दायर की थी। इसको लेकर साल 2018 में भाजपा नेता एवं अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने दायर किया था।

इसके बाद इस मामले को संविधान पीठ को भेज दिया गया था। कोर्ट ने नवंबर 2022 में मामले की सुनवाई की थी। इस मामले में कोर्ट ने उस दौरान नियुक्त किए गए CEC को लेकर कहा था कि चुनाव आयुक्त के रूप में अरुण गोयल की नियुक्ति ‘बिजली की गति’ से की गई थी। इस प्रक्रिया में 18 नवंबर को शुरू से अंत तक 24 घंटे से भी कम समय लगा।

दरअसल, 1985 बैच के पंजाब कैडर के भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के अधिकारी अरुण गोयल ने 18 नवंबर 2022 को अपनी पिछली पोस्टिंग से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली थी। इसके बाद 19 नवंबर 2022 को उन्हें चुनाव आयुक्त नियुक्त किया गया था और 21 नवंबर 2022 को वे कार्यभार संभाल लिए थे।

दरअसल, चुनाव आयोग (चुनाव आयुक्तों की सेवा की शर्तें और व्यापार का लेन-देन) अधिनियम 1991 (ईसी अधिनियम) के लिए आवश्यक है कि चुनाव आयोग और सीईसी को छह साल की अवधि या पद पर नियुक्त करना चाहिए। यह कानून अनिवार्य रूप से मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की सेवा की शर्तें हैं।

अनूप वर्णवाल ने अपनी याचिका में माँग की थी कि चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के लिए कॉलेजियम जैसा सिस्टम होना चाहिए। दरअसल, कॉलेजियम सिस्टम का प्रयोग जजों की नियुक्ति के लिए होता है। इसमें सुप्रीम कोर्ट के जज हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए केंद्र सरकार को नाम को भेजते हैं।

बता दें कि कॉलेजियम सिस्टम को सरकार गलत बताती है। सरकार का कहना है कि भारत अकेला देश है, जहाँ जज ही जज को नियुक्त करते हैं। सरकार का कहना है कि जजों की नियुक्ति प्रशासनिक काम है और यह काम केंद्र सरकार के अधीन आता है। वहीं, कॉलेजियम सिस्टम को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार को कई बार चेतावनी दे चुका है।

दिनेश गोस्वामी कमिटी की सिफारिश

सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर जो आदेश दिया है, वह दिनेश गोस्वामी कमेटी की सिफारिशों पर आधारित है। इस मामले की सुनवाई में संविधान पीठ ने इस कमिटी का जिक्र भी किया था। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में समिति में प्रधानमंत्री को भी रखा है। दरअसल, चुनाव सुधारों को लेकर यह समिति 1990 में बनी थी। हालाँकि, यह सिफारिश कभी अमल में नहीं लाई गई।

कमिटी की सिफारिश में कहा गया था कि मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति भारत के मुख्य न्यायाधीश और लोकसभा में विपक्ष के नेता से सलाह करने के बाद राष्ट्रपति करेंगे। इस प्रक्रिया को संवैधानिक ढाँचा के रूप में विकसित किया जाएगा। इसके बाद दो अन्य आयुक्तों की नियुक्ति भारत के मुख्य न्यायाधीश, लोकसभा में विपक्ष के नेता और मुख्य चुनाव आयुक्त की सलाह पर राष्ट्रपति करेंगे।

दिनेश गोस्वामी कमिटी में यह भी कहा गया था कि चुनाव आयोग के पद से हटने के बाद कोई भी आयुक्त किसी सरकारी सिस्टम का हिस्सा नहीं होगा। उसे राज्यपाल भी नियुक्त नहीं किया जाएगा। गोस्वामी कमिटी की सिफारिशों के आधार पर 1990 में 70वाँ संविधान संशोधन विधेयक पेश किया गया, लेकिन यह पास नहीं हो सका। 1993 में इसे वापस ले लिया गया।

कॉलेजियम सिस्टम खत्म करने के लिए केंद्र का NJAC कानून

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला दिया है, जिसमें केंद्र का एकाधिकार खत्म होगा और न्यायपालिका की भूमिका बढ़ेगी। इससे सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार के बीच और तकरार बढ़ने की आशंका बढ़ जाएगी। केंद्र सरकार नहीं चाहेगी कि उसके अधिकार क्षेत्र में कोई हस्तक्षेप करे। इसके साथ ही इसी तर्क वह कॉलेजियम सिस्टम को खत्म करने का भी दबाव डाल सकती है।

बता दें कि कॉलेजियम सिस्टम को खत्म करने का केंद्र की मोदी सरकार ने प्रयास किया था। पहली बार भारी बहुमत से केंद्र में सरकार बनते ही मोदी सरकार ने 14 अगस्त 2014 को संविधान में संशोधन कर नेशनल जूडिशियल एप्वॉइंटमेंट कमीशन (NJAC) कानून पास किया था। इसे 16 राज्यों की मंजूरी भी मिली और 31 दिसंबर 2014 को राष्ट्रपति ने दस्तखत कर दिया।

इसके बाद जजों को नियुक्त करने वाला यह सिस्टम 13 अप्रैल 2015 से लागू हो गया। हालाँकि, 16 अक्टूबर 2015 को 4-1 के बहुमत से सुप्रीम कोर्ट ने जजों की नियुक्ति से संबंधित इस कानून को असंवैधानिक ठहरा दिया और कॉलेजियम सिस्टम को जारी रखा।

इस न्यायिक आयोग में छह सदस्यों का प्रावधान किया गया था। आयोग में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, दो अन्य वरिष्ठ न्यायाधीश, केंद्र सरकार के कानून मंत्री और समाज के दो प्रतिष्ठित व्यक्ति शामिल किया गया था। इन दो प्रतिष्ठित सदस्‍यों को मुख्य न्‍यायाधीश, प्रधानमंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता द्वारा चुनने का अधिकार रखा गया था। आयोग में शामिल ये छह लोग जजों की नियुक्ति के लिए जिम्मेदार ठहराए गए थे।

प्यार के नाम पर दलित लड़के को करवाया इस्लाम कबूल, फिर खतना… बॉम्बे HC ने कहा ‘ये लव जिहाद नहीं’: आरोपित मुस्लिम महिला को जमानत

बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा है कि सिर्फ इसलिए कि लड़का और लड़की अलग धर्म से हैं किसी रिश्ते को लव जिहाद नहीं कहा जा सकता। इसके साथ ही कोर्ट ने आरोपित मुस्लिम महिला और उसके परिवार को अग्रिम जमानत दे दी। इस मामले में पीड़ित हिंदू व्यक्ति का आरोप था कि उसे लव जिहाद में फँसाकर धर्मांतरण के लिए मजबूर किया गया। यही नहीं, जबरन खतना कराने का भी आरोप लगाया था।

गत 26 फरवरी 2023 को हुई सुनवाई में जस्टिस विभा कंकनवाड़ी और अभय वाघवासे की खंडपीठ ने लव जिहाद के तर्क को खारिज करते हुए कहा है कि पीड़ित ने एफआईआर में कहा था कि उसके और आरोपित महिला के बीच संबंध था। साथ ही कई मौकों के बाद भी दोनों ने संबंध समाप्त नहीं किए। ऐसे में सिर्फ इसलिए कि लड़का और लड़की अलग-अलग धर्मों से हैं। यह लव जिहाद का मामला नहीं हो सकता। बल्कि यह एक-दूसरे के लिए पूरी तरह से प्रेम का मामला हो सकता है।

कोर्ट ने यह भी कहा है कि ऐसा प्रतीत होता है कि इस मामले को लव-जिहाद का रंग देने की कोशिश की गई है। जब प्यार को स्वीकार कर लिया जाता है तो किसी को सिर्फ दूसरे के धर्म में परिवर्तित करने के लिए फँसाए जाने की संभावना कम होती है।

क्या था मामला…

पीड़ित ने आरोप लगाते हुए कहा था कि वह साल 2018 से मुस्लिम महिला के साथ संबंध में था। वह अनुसूचित जाति समुदाय का है। लेकिन उसने इस बारे में महिला को नहीं बताया था। कुछ समय तक रिश्ते में रहने के बाद महिला उस पर इस्लाम कबूल कर शादी करने का दवाब बनाने लगी। इसके बाद पीड़ित ने महिला के माता-पिता को अपनी जाति के बारे में बता दिया। इस पर महिला के परिवार वालों ने उसकी जाति को लेकर कोई आपत्ति नहीं की।

हालाँकि इसके बाद पीड़ित व्यक्ति ने दिसंबर 2022 में महिला और उसके परिवार वालों के खिलाफ मामला दर्ज कराया था। पीड़ित का आरोप था कि महिला और उसके परिवार ने उसे धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया। साथ ही, जबरन उसका खतना करा दिया गया था। इसके अलावा जाति को लेकर भी उसके साथ दुर्व्यवहार किया गया था।

14 साल के बच्चे ने गलती से गिराई कुरान, माफी भी माँगी… फिर भी कट्टरपंथी दे रहे हत्या की धमकी: माँ ने रोते-रोते कहा- ‘मेरा बेटा छोड़ दो, वो छोटा है’

इंग्लैंड के वेस्ट यॉर्कशायर (West Yorkshire) के वेकफील्ड(Wakefield) स्थित एक स्कूल के किशोर को इस्लामवादी जान से मारने की धमकी दे रहे हैं। जानकारी के अनुसार कुछ किशोरों ने गलती से कुरान की एक प्रति गिरा दी थी। मामले को लेकर स्कूल प्रशासन ने पहले ही 4 बच्चों को निलंबित कर दिया है। उन्हीं में से एक को जान से मारने की धमकी मिल रही है। इस बात की जानकारी 14 वर्षीय किशोर की माँ ने दी है।

रिपोर्टों के अनुसार मामला केटलथोर्प हाई स्कूल (Kettlethorpe high school) का है। जहाँ 10वीं कक्षा के कुछ बच्चों के बीच वीडियो गेम का खेल चल रहा था। इस दौरान हारने वाले ग्रुप को हर्जाने के तौर पर कुरान लाने के लिए कहा गया। अगले दिन जब किशोर कुरान लेकर स्कूल पहुँचा तो उससे कुरान नीचे गिर गई और थोड़ी क्षतिग्रस्त हो गई। इसी घटना पर इस्लाम को मानने वाले छात्रों ने इस पर आपत्ति जताई।

स्कूल में हुई इस घटना में शामिल सभी चार छात्रों को निलंबित कर दिया गया। साथ ही बात पुलिस तक पहुँच गई। वेस्ट यॉर्कशायर पुलिस का कहना है कि जिस तरह मामले को तूल दिया गया है यह चिंता का विषय है। पुलिस का कहना है कि कुछ स्थानीय नेताओं और इस्लामवादियों ने घटना को लेकर झूठ फैलाना शुरू कर दिया। कहा जा रहा है कि मुस्लिम छात्रों के अभिभावकों और इस्लामवादियों ने कुरान जलाए जाने जैसी झूठी अफवाहें फैलानी शुरू कर दीं, जिससे हालात खराब होने लगे। कथिततौर पर एक स्थानीय मस्जिद में इसे लेकर बैठक भी हुई। अफवाहों की वजह से लोकल नेता और अभिभावक चिंतित हैं।

सोशल मीडिया पर 14 वर्षीय किशोर की माँ का एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें वह इस्लामवादियों से क्षमा याचना करती सुनी जा रही हैं। बेटे को मिल रही मौत की धमकियों से डरी एक माँ ने कहा है कि उनका बेटा निर्दोष है। उसकी उम्र सिर्फ 14 साल है और उससे जो भी हुआ वह गलत इरादे से नहीं बल्कि गलती से हुआ। उन्होंने कहा कि घटना से उनके बेटे को भी दुख पहुँचा है। वह इसके लिए माफी माँग रहा है।

किशोर की माँ कह रही हैं कि उसे जान से मारने की धमकियाँ मिली हैं कहा जा रहा है कि यदि वह स्कूल वापस जाता है तो उसे पीटा जाएगा। इससे किशोर और उसकी माँ सहमे हुए हैं। घटना की जाँच कर रहे अधिकारियों का कहना है कि कि घटना में कुरान को मामुली सा नुकसान पहुँचा है। यह कोई अपराध का नहीं बल्कि बच्चों की शरारत का मामला है।

पुलिस ने कहा है कि इसे गैर अपराधिक घृणा की घटना (Non criminal hate incident) के रूप में पंजीकृत किया गया था। स्कूल के हेडमास्टर ट्यूडर ग्रिफिथ्स ने भी कहा है कि बच्चों ने किसी दुर्भावनापूर्ण इरादे के साथ कुरान की बेअदबी नहीं की। लेकिन छात्रों को इसलिए सस्पेंड किया गया क्योंकि उन्होंने कुरान को संभाल कर नहीं रखा जिससे वह गिर गया। कुरान जैसी किताब को सम्मानित तरीके से रखने की जरूरत थी।

निवेशकों को किया गुमराह, कमाया ₹75 लाख: SEBI ने एक्टर अरशद वारसी को बीवी, साले सहित किया बैन, 45 यूट्यूबर्स पर कार्रवाई

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) ने बॉलीवुड अभिनेता अरशद वारसी (Arshad Warsi) सहित 45 यूट्यूबर्स को शेयर पंप एंड डंप मामले में दोषी पाया है। सेबी ने गुरुवार (2 मार्च 2023) को सभी दोषियों पर कार्रवाई करते हुए बाजार में ट्रेडिंग से तत्‍काल रोक लगा दी। इस मामले में अरशद वारसी, उनकी बीवी मारिया गोरेट्टी (Maria Goretti) और साले पर भी पाबंदी लगाई गई है। इन लोगों पर निवेशकों को गुमराह करने और शेयर बाजार को नुकसान पहुँचाने का आरोप लगा है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, साधना ब्रॉडकास्ट (Sadhna Broadcast) और शार्पलाइन ब्रॉडकास्ट (Sharpline Broadcast) नाम की दो कंपनियों के शेयर में हेराफेरी करने के मामले में यह कार्रवाई की गई है। सेबी ने अपनी जाँच में पाया कि अपराधियों ने कृत्रिम रूप से बढ़ाए गए साधना ब्रॉडकास्ट के शेयर बेचे। इसके लिए 45 यूट्यूबर्स ने 41.90 करोड़ रुपए का अवैध लाभ भी कमाया। साधना ब्रॉडकास्ट के शेयरों को लेकर ‘द एडवाइजर’ और ‘मनीवाइज’ नाम के YouTube चैनलों ने निवेशकों को गुमराह किया।

सेबी ने उन अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई की है, जिन्होंने इन कंपनियों के शेयरों को पंप और डंप करने के लिए यूट्यूब जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया। साधना ब्रॉडकास्ट के अपराधियों की सूची में बॉलीवुड अभिनेता अरशद वारसी, उनकी बीवी मारिया और उनके भाई इकबाल वारसी शामिल हैं। सभी अपराधियों पर एक साल का प्रतिबंध लगाया गया है।

दरअसल, सेबी लंबे समय से यूट्यूब इंफ्लूएंशर्स पर शिकंजा कसने की तैयारी कर रहा था। इसको लेकर दो साल पहले ही नियम बनाने की कवायद शुरू हो गई थी। सेबी ने कहा है कि मामले में दोषी पाए गए अरशद वारसी सहित कई यूट्यूबर्स निवेशकों को गुमराह करके अपना वॉल्‍यूम बढ़ा रहे थे और महीने में 75 लाख रुपए तक की कमाई कर रहे थे। सेबी ने अभिनेता की बीवी के साथ इस बारे में हुई बातचीत को भी रिकॉर्ड किया है। सेबी ने अपने आदेश में कहा किसाधना ब्रॉडकास्ट के लिए उन्होंने 27 अप्रैल, 2022 से 30 सितंबर, 2022 के बीच जाँच की, जबकि शार्पलाइन ब्रॉडकास्ट की जाँच 12 अप्रैल, 2022 से 19 अगस्त, 2022 के बीच की गई थी।

इसको लेकर सोशल मीडिया पर यूजर्स अरशद वारसी के जमकर मजे ले रहे हैं। उन पर मीम्स बना रहे हैं। अभिषेक लिखते हैं, “अरशद वारसी को जब पंप और डंप यूट्यूबर्स का कॉल आए।”

एक और यूजर ने लिखा कि भाई सर्किट का करियर तो शुरू होते ही खत्म हो गया।

प्रेम दोशी लिखते हैं कि हम हैरान क्यों हैं? साधना ब्रॉडकास्ट सर्किट में ही चलता था। सर्किट तो होगा ही ना! साधना ब्रॉडकास्ट x अरशद वारसी।

बता दें कि सेबी ने अपने आदेश में यह भी कहा है कि Moneywise, The Advisor, MidCap Calls और Profit Yatra के अलावा इस मामले में शामिल अन्य यूट्यूब चैनल्‍स अपना काम बनने के बाद उसे डिलीट कर देते हैं।

5 साल में 47 रैलियाँ… नॉर्थ-ईस्ट के इतिहास में PM मोदी ने बनाया रिकॉर्ड: राहुल-प्रियंका चुनाव के समय भी बर्फ से खेलते रहे, कॉन्ग्रेस बोली- उम्मीदें टूट गईं

पूर्वोत्तर राज्यों त्रिपुरा, मेघालय और नागालैंड के विधानसभा चुनावों को लेकर रुझान सामने आ गए हैं। इन रुझानों के अनुसार, भाजपा एक बार फिर त्रिपुरा और नागालैंड में सरकार बनाती दिख रही है। वहीं, नागालैंड में भी भाजपा की स्थिति में सुधार हुआ है। अब तक सामने आए परिणामों को कॉन्ग्रेस अपने लिए झटका मान रही है। हालाँकि यह भी कहना है कि यह भाजपा के प्रचार के जीत है। इन नतीजों को पूरा देश का रुझान मानना गलत होगा।

दरअसल, कॉन्ग्रेस नेता आखिलेश प्रताप सिंह ने कहा है कि पूर्वोत्तर के तीनों राज्यों के चुनाव परिणाम उनकी उम्मीदें से अलग हैं। यह कॉन्ग्रेस के लिए बड़ा झटका है। वहीं, कॉन्ग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत का कहना है कि इन चुनाव परिणामों को पूरे देश के नजरिए से देखना गलत होगा। इसे पूरे देश का रुझान कहना सही नहीं है। यह जीत भाजपा की नहीं बल्कि उनके प्रचार की जीत है। श्रीनेत ने यह भी कहा है कि पूर्वोत्तर राज्यों के चुनाव परिणाम इस बात पर तय करते हैं कि केंद्र में किसकी सरकार है।

बेशक कॉन्ग्रेस नेता भाजपा की इस जीत को उनके प्रचार की जीत बता रहे हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या कॉन्ग्रेस ने इन तीनों राज्यों में चुनाव प्रचार नहीं किया। यदि प्रचार नहीं किया है तो फिर चुनाव मैदान में उतरने का क्या मतलब था। यदि प्रचार किया है तो फिर हार और जीत के बीच की कड़ी को प्रचार बताकर कॉन्ग्रेस अपनी ही खामियों को उजागर कर रही है।

दरअसल, कॉन्ग्रेस के चुनाव प्रचार को लेकर कई राजनीतिक विश्लेषक भी सवाल उठा चुके हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि आखिर राहुल गाँधी ने इन राज्यों में प्रचार क्यों नहीं किया। क्या कॉन्ग्रेस राहुल गाँधी को इस लायक नहीं मानती या फिर राहुल के लिए चुनावों में हार जीत से कहीं अधिक महत्वपूर्ण उनकी ‘भारत जोड़ो यात्रा’ थी।

हालाँकि राहुल गाँधी ने मेघालय में एक रैली जरूर की थी। लेकिन त्रिपुरा जैसे राजनीतिक और रणनीतिक रूप से अहम राज्य से कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता गायब थे। वास्तव में न केवल राहुल गाँधी बल्कि कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और प्रियंका गाँधी भी त्रिपुरा से नदारद रहीं। दिलस्चप बात यह है कि इस दौरान भाजपा अपने दिग्गज नेताओं को उतारकर लगातार चुनाव प्रचार कर रही थी। वहीं, प्रियंका और राहुल गुलमर्ग में बर्फबारी का मजा ले रहे थे। यह हालत तब थी जब राहुल, खड़गे और प्रियंका गाँधी का नाम स्टार प्रचारकों की सूची में शामिल था।

वहीं, दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी का प्रचार करने के लिए न केवल पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा, केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू समेत कई बड़े चेहरे इन चुनावों के दौरान रैली करते नजर आए।

पूर्वोत्तर राज्यों को लेकर भारतीय जनता पार्टी द्वारा किए गए प्रयासों को देखें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साल 2017 के बाद से 47 दौरे किए हैं। यह एक ऐसा आँकड़ा है जो पूर्वोत्तर के इतिहास में सबसे अधिक प्रभावित करने वाला है। दरअसल, आजादी के बाद से किसी भी प्रधानमंत्री ने इतने दौरे नहीं किए जितने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते 5 सालों में किए हैं। चुनाव से पहले भी पीएम मोदी ने त्रिपुरा, मेघालय और नागालैंड में 3 बड़ी रैलियाँ की हैं।

बता दें कि तीनों राज्यों त्रिपुरा, मेघालय और नागालैंड में अब तक भाजपा सत्ता में थी। अब तक सामने आए रुझानों में त्रिपुरा और नागालैंड में भाजपा फिर से सत्ता में वापसी करती दिख रही है। वहीं, मेघालय में भाजपा और एनपीपी ने चुनाव से पहले गठबंधन तोड़ दिया था। हालाँकि अब यदि बीजेपी-एनपीपी गठबंधन बनता है तो तीनों राज्यों में भाजपा एक बार फिर सत्ता में होगी।

सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में बनाई कमिटी, कामथ-नीलकेणि भी शामिल: हिंडेनबर्ग-अडानी जाँच रिपोर्ट 2 महीने में SEBI से माँगी

अंतरराष्ट्रीय एजेंसी हिंडेनबर्ग (Hindenburg) ने अडानी समूह (Adani Group) को लेकर दी गई रिपोर्ट ने सनसनी फैला दी है। इसको लेकर विपक्षी दल सरकार पर हमलावर भी है। अब इस मामले में सु्प्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने सेवानिवृत जज की निगरानी में विशेषज्ञ दल बनाया है। इसके साथ ही SEBI से निश्चित समय में रिपोर्ट देने के लिए कहा है।

दरअसल, अडानी-हिंडनबर्ग मामले की सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (2 मार्च 2023) को सुनवाई की। सुनवाई में बनाई समिति हिंडेनबर्ग द्वारा रिपोर्ट में अडानी समूह पर लगाए गए आरोपों की जाँच करेगी। इसके साथ ही भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने सुनवाई के दौरान कहा कि बाजार नियामक सेबी (SEBI) अपनी जाँच को दो महीने में पूरा कर रिपोर्ट दे। 

इस समिति का अध्यक्ष पूर्व न्यायाधीश अभय मनोहर सप्रे को बनाया गया है। पूर्व जस्टिस सप्रे की अध्यक्षता वाली समिति में प्रख्यात बैंकर केवी कामथ और ओपी भट, इंफोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलकेणि, ओपी भट और पूर्व जज जेपी देवधर शामिल होंगे। यह समिति शेयर बाजार के नियामक तंत्र के मौजूदा ढाँचे की समीक्षा करेगी।

इधर, सुप्रीम कोर्ट ने SEBI को यह भी जाँच करने का निर्देश दिया कि नियमों का उल्लंघन हुआ है या नहीं। इसके साथ ही SEBI यह भी जाँच करे कि शेयर की कीमतों में हेरफेर किया गया है या नहीं। सर्वोच्च न्यायालय ने इस जाँच में समिति को केंद्र सरकार, वित्तीय सांविधिक निकायों, सेबी चेयरपर्सन को पूरा सहयोग देने का निर्देश दिया है। 

बता दें कि अडानी समूह पर हिंडेनबर्ग द्वारा अपनी रिपोर्ट में लगाए को आरोपों की जाँच SEBI पहले से ही कर रही है। इस जाँच को ही दो महीने में पूरा करने और शेयरों की कीमतों में हेरफेर आदि को लेकर जाँच करने के लिए कहा है। गौतम अडानी ने कोर्ट ने निर्देशों का स्वागत किया और कहा कि इससे सच्चाई सामने आएगी।

इसके पहले 10 फरवरी 2023 को मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आरोपों के कारण अडानी समूह के शेयरों में गिरावट को देखते हुए निवेशकों के हितों की रक्षा की जानी चाहिए। कोर्ट ने इसके लिए केंद्र सरकार को समिति बनाने का निर्देश दिया था।

बता दें कि हिंडेनबर्ग की रिपोर्ट आने के बाद अडानी समूह के शेयरों में भारी गिरावट देखी गई है। अडानी के शेयर्स दो-तिहाई से अधिक तक गिर गए हैं। इस उथल-पुथल के कारण शेयर बाजार में भारी बिकवाली की स्थिति बनी हुई थी। इससे भारतीय निवेशकों को बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ था। अडानी ग्रुप ने इस रिपोर्ट को पक्षपाती बताया था।

देश के प्रसिद्ध वकील हरीश साल्वे (Harish Salve) ने अडानी समूह के प्रमुख गौतम अडानी (Gautam Adani) का बचाव किया था। उन्होंने कहा था कि किसी भारतीय व्यवसायी की वैश्विक उपस्थिति से कोई खुश नहीं हैं। इस तरह की रिपोर्ट तो आनी ही थी। उन्होंने कहा था कि समूह पर लगाए गए अधिकांश आरोप सही नहीं लगते। उन्होंने कहा कि गौतम अडानी की अधिकांश संपत्ति रेग्युलेटेड है। उनकी ज्यादातर कंपनियाँ स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध हैं। उनके सारे रिकॉर्ड पब्लिक डोमेन में हैं।

दरअसल, कुछ समय पहले अपनी रिसर्च रिपोर्ट में कंपनी को टारगेट करने के आरोप में अमेरिका के न्याय विभाग ने 30 इन्वेस्टमेंट एवं रिसर्च कंपनियों एवं उनसे जुड़े लोगों के खिलाफ जाँच शुरू की थी। जिन कंपनियों के खिलाफ जाँच शुरू हुई थी, उनमें हिंडेनबर्ग रिसर्च भी शामिल है। ये कंपनियाँ किसी को टारगेट करके उसकी वित्तीय रिपोर्ट जारी करते थे और उसके स्टॉक पर अपना शॉर्ट पोजीशन बनाते थे। जब उस कंपनी का स्टॉक जितना ही, गिरता उतना ही ये लाभ कमाते थे।

गौरतलब है कि हिंडेनबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में अडानी समूह पर कई आरोप लगाए हैं। इनमें मनी लॉन्ड्रिंग, अनऑथोराइज्ड ट्रेडिंग, वित्तीय गड़बड़ी, भारी-भरकम लोन सहित कई गंभीर आरोप हैं, जो किसी कंपनी के लिए घातक हो सकता है। इस तरह की रिपोर्ट बाजार में आते ही निवेशकों के बीच आफरा-तफरी मच जाती है और कंपनी के स्टॉक धाराशायी होने लगते हैं।

हिंडेनबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अडानी समूह ने मॉरीशस और कैरेबियन द्वीप समूह जैसे टैक्स हेवन में संस्थाओं का उपयोग किया और अपनी कंपनियों की सूचीबद्ध शेयरों को बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया। यानी रिसर्च फर्म ने अडानी ग्रुप पर टैक्स चोरी, मनी लॉन्ड्रिंग और भ्रष्टाचार के भी आरोप लगाए।

CM योगी ने बनाया UP का सबसे बड़ा रिकॉर्ड (राजनीतिक): मुलायम-मायावती-अखिलेश-कॉन्ग्रेसी… सबको छोड़ा पीछे

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नाम एक नया रिकॉर्ड दर्ज हो गया है। वह उत्तर प्रदेश के इतिहास में सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले व्यक्ति बन गए हैं। इससे पहले यह रिकॉर्ड कॉन्ग्रेस के डॉ. सम्पूर्णानंद के नाम पर था।

योगी आदित्यनाथ ने 19 मार्च 2017 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में कमान संभाली थी। तब से वह लगातार सूबे के मुखिया बने हुए हैं। मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ का कार्यकाल 5 साल और 347 दिन का हो गया है। इससे पहले कॉन्ग्रेस के डॉ. संपूर्णानंद 5 साल और 345 दिन मुख्यमंत्री रहे। संपूर्णानंद उत्तर प्रदेश के दूसरे मुख्यमंत्री थे। वह 28 दिसंबर 1954 से लेकर 7 दिसंबर 1960 तक मुख्यमंत्री रहे।

बड़ी बात यह है कि योगी आदित्यनाथ के इस बड़े रिकॉर्ड ने कॉन्ग्रेस, बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के सभी मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल को पीछे छोड़ दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री चौधरी चरण सिंह, नारायण दत्त तिवारी और अखिलेश यादव जैसे नेताओं के कार्यकाल भी योगी आदित्यनाथ के आगे फीके दिखाई दे रहे हैं। यही नहीं, उत्तर प्रदेश में 4 बार मुख्यमंत्री बनने वाली मायावती और 3 बार मुख्यमंत्री रहे मुलायम सिंह यादव भी इस रिकॉर्ड में बहुत पीछे हैं।

योगी आदित्यनाथ उत्तर प्रदेश के उन गिने चुने नेताओं में से एक हैं, जिनके नेतृत्व में लगातार दूसरी बार सरकार बनी है। इससे पहले एनडी तिवारी के नेतृत्व में साल 1985 में कॉन्ग्रेस सरकार बनी थी। वहीं, उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड अलग होने के बाद से देखें तो योगी आदित्यनाथ ऐसे पहले मुख्यमंत्री हैं, जो लगातार दूसरी बार मुख्यमंत्री बने हैं।

सीएम योगी ने तोड़ा नोएडा मिथक

उत्तर प्रदेश की राजनीति में ऐसा कहा जाता था कि जो भी मुख्यमंत्री नोएडा जाएगा, उसकी कुर्सी चली जाएगी। इसी मिथक के चलते मायावती से लेकर अखिलेश यादव तक मुख्यमंत्री रहते हुए कभी भी नोएडा नहीं गए। हालाँकि अपने 5 साल और 347 दिनों के कार्यकाल में योगी आदित्यनाथ करीब 25 बार नोएडा गए। कुर्सी जाने की बात तो दूर मिथकों को तोड़ते हुए योगी दोबारा मुख्यमंत्री बने हैं।

भारतीय शराब में झूमेगा रूस: ऑफिसर्स चॉइस बनाने वाली कंपनी का दारू बिकेगा वहाँ, बैन के कारण अंग्रेजी व्हिस्की मार्केट से गायब

रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध के चलते कई पश्चिमी देशों ने रूस में शराब की बिक्री रोक दी। इससे वहाँ की 70 हजार से अधिक दुकानों और करीब 20 हजार बार की बिक्री प्रभावित हुई। अब हालाँकि रूस के लोगों के लिए अच्छी खबर है। अब, भारतीय कंपनी एलाइड ब्लेंडर्स एंड डिस्टिलर्स रूस में अपनी शराब बेचेगी।

दरअसल, भारतीय कंपनी एलाइड ब्लेंडर्स एंड डिस्टिलर्स (ABD) ने मंगलवार (28 फरवरी 2023) को ऐलान किया है कि रूस की वोदका बनाने वाली कंपनी अल्कोहल साइबेरियन ग्रुप (एएसजी) एबीडी के दो ब्रांड बेचेगी। रिपोर्ट्स में रूसी अखबार कोमर्सेंट के हवाले से कहा जा रहा है कि पश्चिमी देशों के ब्रांड द्वारा सप्लाई बंद करने के बाद खाली हुए बाजार को भारतीय कंपनी टारगेट करने जा रही है। बड़ी बात यह है कि एबीडी ने अब से पहले कभी भी रूस में शराब नहीं बेची है हालाँकि यह 20 से अधिक देशों को शराब निर्यात करती है।

भारतीय कंपनी एलाइड ब्लेंडर्स एंड डिस्टिलर्स ने फरवरी में अपनी शराब रूस में भेजना शुरू किया था। एबीडी और रूसी कंपनी अल्कोहल साइबेरियन ग्रुप के बीच शराब बिक्री को लेकर 2 साल के लिए कॉन्ट्रैक्ट हुआ है। इस कॉन्ट्रैक्ट के तहत रूसी कंपनी अक्टूबर 2025 तक भारतीय कंपनी की शराब बेचेगी। हालाँकि शराब कितनी बेची जानी है, इसको लेकर दोनों कंपनियों ने डील को सार्वजनिक नहीं किया है।

भारतीय कंपनी एलाइड ब्लेंडर्स एंड डिस्टिलर्स दुनिया की तीसरी सबसे लोकप्रिय व्हिस्की, ‘ऑफिसर्स चॉइस’ का उत्पादन करती है। कहा जा रहा है कि रूस में स्कॉच माल्ट और इंडियन ग्रेन स्पिरिट से बनी ऑफिसर्स च्वाइस ब्लू व्हिस्की की 0.75 लीटर की बोतल की कीमत 1,000 से 1,200 रूबल (1000-1320 रुपए) के बीच होगी। वहीं, स्टर्लिंग रिजर्व प्रीमियम ब्लेंड की कीमत प्रति बोतल 1,100 से 1,500 रूबल (1100-1650 रुपए) के बीच होगी।

बता दें कि इंग्लैंड समेत अन्य पश्चिमी देशों द्वारा शराब की सप्लाई बंद करने के बाद बोतलबंद व्हिस्की का साल 2022 में आयात आधा रह गया था। जॉनी वॉकर, जैक डेनियल, बुशमिल्स, जिम बीम और व्हाइट हॉर्स सहित कुछ ब्रांडों को सप्लाई की अनुमति थी। इससे कुछ हद तक मार्केट में शराब उतरी थी। NielsenIQ के आँकड़ों के अनुसार, साल 2022 के पहले नौ महीनों में 36 नए स्थानीय व्हिस्की ब्रांड रूस के बाजार में दिखाई दिए।

‘हम राम और कृष्ण के वंशज’: कॉन्ग्रेस MLA सफिया जुबेर, पार्टी विधायक अमीन खान बोले – भारत हिन्दू राष्ट्र बन जाए, फिर भी हमें कोई नहीं मारेगा

राजस्थान विधानसभा में बुधवार (01 मार्च, 2023) को कॉन्ग्रेस के मुस्लिम विधायकों ने बड़ी बातें बोलीं। कॉन्ग्रेस विधायक साफिया जुबेर ने खुद को राम और कृष्ण का वशंज बताया। उन्होंने कहा कि भले हमने धर्म बदल लिया हो लेकिन खून तो राम और कृष्ण का ही है। कॉन्ग्रेस विधायक अमीन खान ने भी बड़ा बयान दिया। अमीन खान ने कहा कि हमें भी हिंदू धर्म का ज्ञान है और यदि भारत हिंदू राष्ट्र हो भी गया तो हमें कोई नहीं मारेगा।

विधानसभा में शिक्षा विभाग की अनुदान माँगों पर बहस के दौरान साफिया जुबेर और अमीन खान का संबोधन चर्चा का विषय बना हुआ है। अलवर जिले की रामगढ़ सीट से कॉन्ग्रेस विधायक साफिया जुबेर अपने संबोधन के दौरान मेव समुदाय की बात की। उन्होंने कहा,”मेव लोग अलवर,भरतपुर, नूँह और थोड़ा मथुरा में बसते हैं, जहाँ कृष्ण जी का जन्म हुआ था। मैंने भी जागाओं (वंशावली की जानकारी रखने वालों) से अपना इतिहास निकलवाया है। उसमें यह निकलकर आया कि मेव तो राम और कृष्ण के वंशज हैं। चाहे धर्म का परिवर्तन हो गया हो लेकिन खून तो नहीं बदलता। खून तो हम में राम और कृष्ण का ही है।

बाड़मेर के शिव से कॉन्ग्रेस विधायक अमीन खान ने कहा कि 31 अक्टूबर, 1984 के बाद से भारत को हम सेक्युलर नहीं मानते हैं। बता दें इसी दिन पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की हत्या कर दी गई थी। कॉन्ग्रेस विधायक ने आगे कहा कि देश हिंदू राष्ट्र बन जाएगा तो भी हमको कोई नहीं मारेगा। उन्होनें कहा कि हम भी हिंदू धर्म का ज्ञान रखते हैं। हिंदू भी दूसरे इन्सान की रक्षा करेंगे। धर्मनिरपेक्षता सिर्फ कागजों में है। उन्होंने इसके बाद स्कूलों में होने वाली प्रार्थना पर भी सवाल उठाया।

उन्होंने कहा कि राजस्थान के हर स्कूल में संप्रदाय के नाम की पूजा से कार्यक्रम शुरू करते हो, यह धर्मनिरपेक्ष देश की मजबूती के निशान नहीं हैं। लोग डर से नहीं बोलते हैं जानते सब हैं।

बता दें कि अनुदान माँगों पर चर्चा के दौरान राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत को अपने ही विधायकों की नाराजगी का सामना करना पड़ रहा है। विधानसभा में कॉन्ग्रेस के विधायक अपनी ही सरकार की खामियाँ गिनावा रहे थे। राजसथान सरकार में राज्य मंत्री राजेंद्र गुढ़ा और विधायक हरीश मीणा ने गहलोत सरकार को कानून व्यवस्था और पेपर लीक मामले में जमकर घेरा। यहाँ तक की मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के करीबी माने जाने वाले कॉन्ग्रेस विधायक गणेश घोररा ने भी पुलिस की कार्यशैली पर सवाल खड़े करते हुए सरकार को घेरा।

‘इस्लाम पसंद नहीं, जीवन भर हिन्दू रहूँगी’: नरगिस ने आलोक से रचाई शादी, कहा – अब्बू करते थे पिटाई

उत्तर प्रदेश के आगरा की रहने वाली नरगिस ने हिंदू धर्म स्वीकार कर मैनपुरी के आलोक से शादी रचाई है। मंगलवार (28 फरवरी, 2023) को मैनपुरी में नरगिस और आलोक का विवाह संपन्न हुआ। दोनों एक दूसरे को साल भर से जानते थे। उनकी दोस्ती सोशल मीडिया के जरिए हुई। इसके बाद दोनों ने विवाह करने का निश्चय किया।

मीडिया रिपोर्टों की मानें तो अपनी शादी से खुश नरगिस ने कहा है कि उसे बचपन से ही सनातन धर्म पसंद था। कभी-कभी वह मंदिर भी चली जाती थी जिससे नाराज अब्बू (पिता) उसकी पिटाई भी किया करते थे। शुद्धिकरण की प्रक्रिया के बाद नरगिस से निक्की बनी नई -नवेली दुल्हन ने बताया कि इस्लाम उसे कभी पसंद नहीं था। निक्की के अनुसार, आलोक से उसकी दोस्ती इंस्टाग्राम पर हुई थी। कुछ दिनों की बातचीत के बाद दोनों ने एक होने का निश्चय कर लिया।

निक्की का कहना है कि अब वह जीवन भर हिंदू बनकर रहना चाहती हैं। मैनपुरी के मंदिर में विवाह के दौरान आलोक के परिजन व दोस्त मौजूद रहे, जबकि निक्की के घर से किसी ने विवाह समारोह में हिस्सा नहीं लिया। बताया गया है कि निक्की की माँ की मौत हो चुकी है। निक्की और आलोक ने कोर्ट में भी विवाह (कोर्ट मैरिज) करने वाले हैं।

आलोक को मिली थी प्यार करने की सजा

आलोक और निक्की के प्यार के बीच निक्की के वालिद (पिता) दीवार बनकर खड़े थे। माँ की मौत के बाद निक्की और उसके अब्बू ही घर में रह गए थे। निक्की के मुताबिक, एक बार जब आलोक निक्की से मिलने आगरा पहुँचा था तो निक्की के पिता को इसकी भनक लग गई थी। इसके बाद उन्होंने निक्की की पिटाई की थी। इस बात की जानकारी होते ही आलोक निक्की को लेकर मैनपुरी चले आए।

निक्की के पिता ने आलोक की शिकायत कर दी। इसके बाद पुलिस ने आलोक को पकड़ लिया और निक्की को उसके पिता के हवाले कर दिया। पुलिस की गिरफ्त से छूटने के बाद आलोक और निक्की ने विवाह कर लेने का फैसला किया। निक्की का कहना है कि मैं बालिग हूँ और मुझे अपने पसंद के लड़के से विवाह करने का अधिकार है। मैंने बिना देरी किए आलोक के साथ 28 फरवरी को शादी कर लिया। वहीं आलोक का कहना है कि नरगिस से निक्की बनने के लिए हमारी तरफ से कोई दबाव नहीं डाला गया। यह फैसला उसका अपना है।