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सोनम वांगचुक को सफदरजंग अस्पताल में दिल्ली पुलिस ने कराया भर्ती, क्या इरोम शर्मिला की तरह ही होगा इस खेल का अंत?

जंतर-मंतर पर भूख-हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक को दिल्ली पुलिस ने सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया है। दिल्ली पुलिस ने कहा कि उसने हाई कोर्ट के आदेश पर ऐसा किया। हालाँकि सोनम वांगचुक की पत्नी ने दिल्ली पुलिस द्वारा उन्हें अस्पताल में न सिर्फ भर्ती कराने का विरोध किया, बल्कि उनकी अनुमति के बिना किसी तरह की दवाई-भोजन देने का भी विरोध किया।

यहाँ ये बताना अहम है कि जंतर-मंतर पर पिछले काफी दिनों से एक राजनीतिक तमाशा चल रहा है, जिसे युवाओं के विरोध प्रदर्शन के नाम पर पेश किया जा रहा है। अभिजीत दीपके द्वारा स्थापित कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) इस प्रदर्शन का नेतृत्व कर रही है। दावा किया जा रहा है कि यह आंदोलन भारतीय छात्रों के भविष्य की रक्षा करने और पेपर लीक सहित शिक्षा व्यवस्था में हुई कई चूकों को लेकर केंद्र सरकार से जवाबदेही तय कराने के लिए किया जा रहा है।

हालाँकि इस पूरे प्रदर्शन का केंद्र मुख्य रूप से सोनम वांगचुक हैं, जो उपरोक्त माँगों के समर्थन में भूख हड़ताल पर बैठे। वह 28 जून से केवल पानी पीकर अनशन कर रहे थे, हालाँकि शनिवार (18 जुलाई 2026) को दिल्ली पुलिस हाई कोर्ट के निर्देश के बाद उन्हें जबरन अस्पताल ले गई।

इसलिए आमतौर पर इस तरह के मुद्दों पर सक्रिय रहने वाले समूहों में शामिल CJP, जिसे आम आदमी पार्टी (AAP) से जुड़ा बताया जाता है, अन्य विपक्षी दल और उनका पूरा इकोसिस्टम उन्हें एक ऐसे नायक के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसके सामने मोदी सरकार को खलनायक के रूप में दिखाया जा सके।

हालाँकि इन सभी ने जानबूझकर एक अहम सवाल को नजरअंदाज किया है। वह कौन-से रचनात्मक समाधान, वैकल्पिक प्रस्ताव या व्यवहारिक आलोचना पेश कर रहे हैं? यह सच है कि सरकार की कमियों, खासकर देश के भविष्य से जुड़े मुद्दों पर, उसकी जवाबदेही तय की जानी चाहिए। लेकिन ये चुनौतियाँ न तो नई हैं और न ही अभूतपूर्व।

यह एक व्यवस्थागत समस्या है, जिसके लिए गहन और सावधानीपूर्ण दृष्टिकोण की आवश्यकता है। इसमें राजनीतिक नाटकबाजी की कोई जगह नहीं होनी चाहिए और छात्रों पर बिना किसी स्वार्थ या छिपे उद्देश्य के वास्तविक ध्यान दिया जाना चाहिए। हालाँकि यह बात वांगचुक पर लागू होती हुई नहीं दिखती, क्योंकि उनका अतीत भी काफी विवादास्पद रहा है।

छात्रों की समस्याओं से निपटने के लिए उनकी कार्ययोजना क्या है या वे वास्तव में उनके समाधान में क्या योगदान दे सकते हैं, इस पर स्पष्टता माँगने के बजाय उनकी झूठी महिमा गढ़ने का एक सुनियोजित प्रयास स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।

दिवंगत कॉन्ग्रेस विधायक के पुत्र वांगचुक को हाल ही में राजकुमार हिरानी की फिल्म 3 इडियट्स के किरदार फुंसुख वांगडू का वास्तविक जीवन का रूप बताया गया, जबकि स्वयं उन्होंने पहले इस दावे से इनकार किया था। इसके अलावा फिल्म के निर्देशक राजकुमार हिरानी और आमिर खान, जिन्होंने फिल्म में यह भूमिका निभाई थी, दोनों ने भी स्पष्ट किया था कि उनकी फिल्म सोनम वांगचुक के जीवन से प्रेरित नहीं थी।

जब वांगचुक की भूख हड़ताल के बीच जल उठा लेह

छात्रों से जुड़ी गंभीर समस्याओं को मजाक, राजनीतिक दिखावे और एक स्पष्ट प्रहसन तक सीमित कर दिया गया है। हालाँकि यह वांगचुक के मामले में कोई नई बात नहीं लगती, क्योंकि वह पहले भी इसी तरह के तरीके अपना चुके हैं। पिछले साल सितंबर में उन्होंने लद्दाख को राज्य का दर्जा देने और उसे भारतीय संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की माँग को लेकर लेह में भूख हड़ताल शुरू की थी।

हालाँकि इसके बाद भड़के हिंसक प्रदर्शनों के दौरान स्थानीय भारतीय जनता पार्टी (BJP) के कार्यालय में आग लगा दी गई, चार लोगों की मौत हो गई और कई अन्य घायल हो गए। इसके बाद उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत गिरफ्तार करना पड़ा।

उस समय लद्दाख के पुलिस महानिदेशक (DGP) रहे एसडी सिंह जमवाल ने कहा था, “हाल ही में हमने पाकिस्तान के एक पाकिस्तान इंटेलिजेंस ऑपरेटिव को गिरफ्तार किया था, जो पाकिस्तान को सूचनाएँ भेज रहा था। इसका रिकॉर्ड हमारे पास है। वांगचुक पाकिस्तान में डॉन के एक कार्यक्रम में शामिल हुए थे। वह बांग्लादेश भी गए थे। इसलिए उन पर एक बड़ा सवालिया निशान है। मामले की जाँच की जा रही है।”

उन्होंने कहा कि वांगचुक के विरोध मंच ने ऐसा माहौल बनाया, जिसने हिंसा के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ पैदा कीं और यह सब पहले से योजनाबद्ध तथा समन्वित था। उन्होंने आगे कहा, “वांगचुक का लोगों को भड़काने का इतिहास रहा है। उन्होंने अरब स्प्रिंग, नेपाल और बांग्लादेश का उल्लेख किया है। विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) के उल्लंघन को लेकर उनकी फंडिंग की जांच चल रही है।”

लेह के जिला मजिस्ट्रेट ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था, “हिरासत के आधारों में उल्लेखित अनुसार वांगचुक राज्य की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने और समुदाय के लिए आवश्यक सेवाओं के प्रतिकूल गतिविधियों में शामिल थे। मैं उनकी हिरासत से संतुष्ट था और अब भी संतुष्ट हूँ।”

गृह मंत्रालय ने भी कहा था कि साथी नेताओं की ओर से बार-बार अपील किए जाने के बावजूद वांगचुक ने अपना अनशन जारी रखा, जैसा कि वह इस समय भी कर रहे हैं। मंत्रालय के अनुसार, उन्होंने “अरब स्प्रिंग और नेपाल में जनरेशन Z के प्रदर्शनों जैसे भड़काऊ संदर्भ देकर जनता को गुमराह किया।”

आखिरकार मार्च में वांगचुक को 170 दिन बाद जोधपुर जेल से रिहा कर दिया गया। उनकी ये गतिविधियाँ उनके एजेंडे की स्पष्ट झलक पेश करती हैं और यह भी संकेत देती हैं कि आगे क्या हो सकता है।

सोनम वांगचुक से पहले थीं इरोम शर्मिला

जहाँ सोनम वांगचुक के समर्थक उन्हें गलती से फिल्मों के काल्पनिक किरदारों और यहाँ तक कि अन्ना हजारे के अनशन से जोड़कर देख रहे हैं, वहीं भारत में एक ऐसी शख्सियत पहले भी रही है जिसने नई दिल्ली पर दबाव बनाने के लिए 16 वर्षों तक इसी तरह का तरीका अपनाया था। उनका नाम इरोम शर्मिला चानू है और वह मणिपुर से हैं।

5 नवंबर 2000 को मलोम में असम राइफल्स ने एक बस स्टॉप पर 10 नागरिकों को गोली मार दी थी। इससे पहले हमलावरों ने पास से गुजर रहे अर्धसैनिक बल के काफिले पर बम हमला किया था। इस घटना के बाद इरोम शर्मिला ने इसे आधार बनाकर एक ऐसा आंदोलन शुरू किया, जो 16 वर्षों तक चला।

उन्होंने भोजन करना छोड़ दिया और सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम (AFSPA) के विरोध में भूख हड़ताल शुरू कर दी। यह कानून उस संवेदनशील राज्य में लागू था, जो दशकों से हिंसक उग्रवाद से जूझ रहा था और जिसका असर आम नागरिकों के साथ-साथ सुरक्षा बलों पर भी पड़ा था।

उनका उद्देश्य केंद्र सरकार पर इस कानून को वापस लेने का दबाव बनाना था, जबकि ऐसे क्षेत्रों में सार्वजनिक व्यवस्था और शांति बनाए रखने के लिए इस कानून को महत्वपूर्ण माना जाता है। हालाँकि भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) और भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) – दोनों सरकारों ने उनकी इस रणनीति को स्वीकार नहीं किया।

उनका मानना था कि ऐसा करने से क्षेत्रीय सुरक्षा और स्थिरता पर खतरा पैदा हो सकता था, साथ ही सीमा पार आतंकवाद और जातीय तनाव बढ़ने की आशंका भी थी। बेशक कोई भी व्यक्ति लंबे समय तक बिना भोजन के जीवित नहीं रह सकता। इसलिए इरोम शर्मिला को भोजन देने के लिए उनकी नाक में नासोगैस्ट्रिक ट्यूब डाली गई।

दिलचस्प बात यह है कि इस ट्यूब को व्यक्ति स्वयं भी निकाल सकता है, लेकिन यह कहानी बनाई गई कि सरकार उन्हें ‘जबरन खाना खिला रही है’, ताकि उनके आंदोलन को अधिक महत्व दिया जा सके। बेशक मामला इतना आगे नहीं बढ़ता, लेकिन इरोम ने एक महत्वपूर्ण मुद्दे का इस्तेमाल अपनी सार्वजनिक छवि बनाने के लिए किया।

बाद में उन्होंने इसी छवि के आधार पर राजनीति में कदम रखा, हालाँकि उनका राजनीतिक सफर सफल नहीं रहा। इस दौरान भारत विरोधी वैश्विक ताकतों को भी भारत के आंतरिक मामलों में दखल देने का अवसर मिला। यह उल्लेखनीय है कि विशेष कानून और प्रावधान किसी क्षेत्र की परिस्थितियों को देखते हुए लागू किए जाते हैं।

समय के साथ जब हालात बदले, तो मोदी सरकार के दौरान इन विशेष कानूनों को भी धीरे-धीरे हटाया गया। बेहतर सुरक्षा व्यवस्था और उग्रवाद की घटनाओं में उल्लेखनीय कमी आने के कारण पूर्वोत्तर के कई हिस्सों में AFSPA का दायरा काफी घटाया गया।

त्रिपुरा और मेघालय से इसे पूरी तरह हटा दिया गया, जबकि असम, नागालैंड, मणिपुर और अरुणाचल प्रदेश में इसे केवल कुछ जिलों और पुलिस थाना क्षेत्रों तक सीमित कर दिया गया। हालाँकि तथ्यों से काफी दूर इरोम शर्मिला का यह प्रदर्शनकारी आंदोलन जारी रहा और वह लगातार भारतीय राज्य पर अपनी माँगें मानने का दबाव बनाती रहीं।

लेकिन हर दिखावा एक न एक दिन खत्म होता है और उनके मामले में भी ऐसा ही हुआ, जब उन्होंने राजनीति में प्रवेश करने का फैसला किया। 9 अगस्त 2016 को उन्होंने अपना अनशन समाप्त किया और राजनीति में कदम रखा।

उन्होंने ‘पीपुल्स रिसर्जेंस एंड जस्टिस एलायंस’ (PRJA) नामक पार्टी बनाई और 2017 के मणिपुर विधानसभा चुनाव में थौबल सीट से चुनाव लड़ा, जहाँ उनका मुकाबला पूर्व मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह से था। ‘आयरन लेडी ऑफ मणिपुर’ के नाम से प्रसिद्ध 54 वर्षीय इरोम शर्मिला को चुनाव में केवल 90 वोट मिले।

मार्च 2017 में विधायक बनने का उनका सपना बुरी तरह टूट गया। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने कहा था कि यदि वह सफल नहीं हुईं तो 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ेंगी, लेकिन बाद में उन्होंने कहा कि वह ‘इस राजनीतिक व्यवस्था से तंग आ चुकी हैं’ और सक्रिय राजनीति छोड़ दी।

वर्तमान में उनकी शादी एक ब्रिटिश नागरिक से हो चुकी है और वह अपने पति और जुड़वा बेटियों के साथ बेंगलुरु में शांत जीवन बिता रही हैं।

क्या सोनम वांगचुक का अनशन भी इरोम शर्मिला की राह पर?

इरोम शर्मिला की प्रासंगिक बने रहने की कोशिश अंततः उनके असफल राजनीतिक करियर की कठोर सच्चाई पर जाकर समाप्त हुई। अब ऐसा प्रतीत होता है कि सोनम वांगचुक भी लगातार सुर्खियों में बने रहने की इसी राह पर चल रहे हैं।

यदि ऐसा नहीं होता, तो वह रचनात्मक संवाद शुरू करते या कम से कम छात्रों द्वारा उठाई गई समस्याओं के समाधान के लिए कोई सकारात्मक दिशा प्रस्तुत करते। लेकिन उन्होंने CJP का साथ चुना और छात्रों के मुद्दे को राजनीतिक रंग दे दिया, जिससे विवाद पैदा हुआ और वास्तव में प्रभावित छात्रों के मुद्दों से ध्यान हटकर उन पर केंद्रित हो गया।

वांगचुक की इस नाटकीय शैली ने उस मामले को और उलझा दिया है, जो सरकार और छात्रों के बीच बातचीत से बिना किसी राजनीतिक रंग के सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझाया जा सकता था। लेकिन अब यह पूरा मुद्दा एक व्यक्ति और उसकी गतिविधियों तक सिमटकर रह गया है।

वहीं इस प्रदर्शन की गंभीरता पर भी सवाल उठे, जब CJP के नेता, जिनमें अभिजीत दीपके भी शामिल हैं, वांगचुक के अनशन के दौरान उनके साथ रहते हुए पकौड़े, कचौड़ी और अन्य नाश्ते का आनंद लेते हुए दिखाई दिए थे। हालाँकि सोनम वांगचुक को पुलिस द्वारा अस्पताल लिए जाने के बाद अभिजीत दीपके ने भूख हड़ताल शुरू करने की घोषणा की है।

(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

पूजा पाल से लेकर रोली-ऋचा तक… जब-जब सपा के शीर्ष नेतृत्व पर उठाए सवाल, तब-तब अखिलेश के पाले गुंडों ने गैर-यादव महिला नेताओं के चरित्र पर किया वार

समाजवादी पार्टी (सपा) खुद को ‘लोहियावादी’ और ‘सामाजिक न्याय’ का पैरोकार कहती नहीं थकती। लेकिन जब बात महिलाओं के सम्मान और पार्टी के भीतर उनके आत्मसम्मान की आती है, तो इस दल का असली और बेहद खौफनाक चेहरा सामने आ जाता है। सपा का एक पुराना और ढर्रे वाला इतिहास रहा है, जहाँ महिलाओं को केवल एक राजनीतिक मोहरे के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

यदि कोई महिला नेता, चाहे वह पार्टी के भीतर हो या बाहर, सपा की नीतियों, उनके नेताओं की हरकतों या किसी खास वर्ग के वर्चस्व पर सवाल उठाने की जुर्रत कर दे, तो पार्टी का पूरा तंत्र और उनके पाले हुए गुंडे-मवाली उस महिला के चरित्र हनन पर उतारू हो जाते हैं।

चाहे वह पूजा पाल हों, रोली तिवारी मिश्रा हों या फिर ऋचा राजपूत (लोधी), इन सभी महिलाओं ने जब-जब सपा के शीर्ष नेतृत्व से तीखे सवाल किए, तब-तब इन्हें जवाब में गालियाँ, धमकियाँ और बेहद अभद्र ट्रोलिंग का सामना करना पड़ा।

समाजवादी पार्टी के भीतर गैर-यादव समाज और महिलाओं के लिए भाषा का जो स्तर अपनाया जाता है, वह इतना ओछा और शर्मनाक है कि कोई भी सभ्य समाज इसे स्वीकार नहीं कर सकता। पार्टी छोड़ने के बाद या पार्टी में रहते हुए आवाज उठाने वाली महिलाओं को किस तरह गंदे ढंग से निशाना बनाया जाता है।

पूजा पाल का सीधा सवाल: ‘सपा में सिर्फ सैफई परिवार, अतीक-मुख्तार और आजम का ही भविष्य’

ताजा विवाद कौशांबी की चायल विधायक सीट से पूजा पाल के एक राजनीतिक सवाल के बाद शुरू हुआ, जिसने सपा के जातिवादी और संकीर्ण दायरे पर सीधी चोट की। पूजा पाल ने अखिलेश यादव को टैग करते हुए एक X पर पोस्ट किया, “श्री अखिलेश यादव जी, आप पूछ रहे थे कि मुझे क्या मिला? आज आपके प्रश्न का जवाब देती हूँ। अखिलेश जी, मुझे गर्व है कि मैं पाल समाज की बेटी हूँ और भाजपाई हूँ। मैं उस पार्टी में हूँ जहाँ चाय वाला भी प्रधानमंत्री बन सकता है। ये मेरी क्षमता पर निर्भर करता है। अखिलेश जी, मैं उस पार्टी में हूँ, जहाँ पाल समाज का बेटा या बेटी विधायक, सांसद, मंत्री, उपमुख्यमंत्री, मुख्यमंत्री, राज्यपाल, प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बन सकता है। सपा में अतीक, मुख्तार, आजम और सैफई परिवार के अलावा किसी का कोई भविष्य न पहले कभी था और ना होगा।”

इस पोस्ट के बाद सपा के जातिवादी ट्रोल्स ने पूजा पाल के खिलाफ मर्यादा की सारी हदें पार कर दीं। एक पिछड़े समाज की बेटी ने जब योग्यता और हिस्सेदारी पर बात की, तो सपा कुनबा उनके चरित्र और जाति पर हमला करने लगा। यह दिखाता है कि सपा में गैर-यादव समाज के नेताओं को सिर्फ एक सीमा तक ही बर्दाश्त किया जाता है।

रोली तिवारी मिश्रा: ‘सपा में राजनीति करनी है तो गालियाँ सुनने की आदत डाल लो’

सपा की पूर्व राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ रोली तिवारी मिश्रा ने जब सनातन धर्म और श्रीरामचरितमानस के सम्मान में आवाज उठाई, तो उन्हें पार्टी के भीतर ही प्रताड़ित किया गया। रोली तिवारी को एक गुंडे ने मैसेज में बेहद अभद्र गालियाँ दीं, जिसकी डीपी पर अखिलेश यादव की तस्वीर लगी थी। इस पर रोली ने अखिलेश यादव को घेरते हुए लिखा था, “श्री अखिलेश यादव जी आपकी DP लगाकर किये गए इस गुंडे के मैसेज को ध्यान से पढ़ियेगा और सोंचियेगा ये मैसेज आपकी बेटियों टीना और अदिति को किया गया है फिर बताइयेगा कि आपको कैसा लग रहा है ?? अगर बुरा लगे तो अपनी पार्टी में पल रहे गुंडों पर अंकुश लगाइये। अगर आप की पार्टी के ये गुंडे नहीं सुधरे तो एक दिन आ0 योगी आदित्यनाथ जी इन गुंडों का खात्मा ही कर देंगे। क्या श्रीरामचरितमानस सम्मान यात्रा निकालना इतना बड़ा अपराध हो गया कि धमकी और गालियाँ मिल रही हैं ??”

यही नहीं, रोली तिवारी मिश्रा ने 17 जून के एक ट्वीट में सपा के अंदरूनी कचरे को साफ करते हुए लिखा था कि अखिलेश यादव का एक सलाहकार (जो जाति से ठाकुर है) ही 2016 की लड़ाई का सूत्रधार था। रोली ने बताया कि जब वह राष्ट्रीय प्रवक्ता थीं और उन्हें सपाई हिस्ट्रीशीटर मनुरोजन यादव ने गालियाँ दीं, तो रोली ने एफआईआर (FIR) करने की बात कही। इस पर उन्हें दोटूक और ओछा जवाब मिला था, “सपा में राजनीति करनी है तो अहीरों से र@#$ कहने की आदत डलवा लो पंडिताइन।” यह बयाँ करता है कि सपा के भीतर महिलाओं को किस मानसिक प्रताड़ना से गुजरना पड़ता है।

ऋचा राजपूत के खिलाफ सपा के ऑफिशियल हैंडल की अश्लीलता: ‘शूर्पनखा-पूतना’ जैसी अभद्र भाषा

महिला उत्पीड़न और ओछेपन की पराकाष्ठा तब भी देखने को मिली जब समाजवादी पार्टी के ‘आधिकारिक ट्विटर हैंडल’ से डॉ ऋचा राजपूत (लोधी) को खुलेआम अपमानित किया। जिस मनीष जगन अग्रवाल को बचाने के लिए खुद अखिलेश यादव DGP मुख्यालय से लेकर जेल के चक्कर काट रहे थे, उसके समर्थन में सपा के हैंडल से ऋचा राजपूत के खिलाफ बेहद शर्मनाक ट्वीट किए गए।

ऋचा राजपूत को समाजवादी पार्टी के ऑफिश्यिल हैंडल से लिखा, “पूतनाएँ और शूर्पनखाएँ ज्ञान ना दें, वे अपना राक्षसी काम करें जैसा वे करती हैं, अब चल निकल भाग, तुझे सम्मान इज्जत दी वो तुझे हजम नहीं हुई, तू जा, जाकर चिनमयानंद, राम रहीम, सेंगर की सेवा कर, तुझे वहीं सही लड्डू मिलेगा, वही प्रसाद लड्डू जो आश्रम सीरिज में बाबा निकाला खिलाता है।”

समाजवादी पार्टी के हैंडल का दूसरा ट्विट, “दीदी आप बस तो बस चोरी हुई टोंटी, टोंटा नल का जत्था हत्था जो भी हो उसके बारे में बताओ, बकायदा फिटिंग करके संतुष्टिजनक सर्विस मिलेगी, वैसे लगता है भाजपा नेता चिन्मयानंद और कुलदीप सेंगर की स्किल एंड सर्विस से आपकी काफी शिकायतें हैं?”

समाजवादी पार्टी के हैंडल से एक महिला डॉक्टर और नेता के खिलाफ ‘फिटिंग’, ‘संतुष्टिजनक सर्विस’ और ‘विशिष्ट सेवाएँ’ जैसे घिनौने और द्विअर्थी शब्दों का प्रयोग करना यह साफ करता है कि सपा में महिलाओं को लेकर किस कदर की विकृत सोच भरी हुई है।

‘लड़के हैं, गलती हो जाती है’ की विरासत ढोते अखिलेश यादव और उनका डिजिटल गुंडा तंत्र

मुलायम सिंह यादव का वह दौर तो सबने देखा था जब उन्होंने बलात्कारियों का यह कहकर बचाव किया था कि ‘लड़के हैं, लड़कों से गलती हो जाती है।’ आज उनके बेटे अखिलेश यादव ने उस सोच को डिजिटल रूप दे दिया है। जब रोली तिवारी को ‘रं@#$’ सुनने की सलाह दी जाती है, जब ऋचा राजपूत को ‘शूर्पनखा’ कहकर अश्लील तंज कसे जाते हैं, और जब पूजा पाल जैसी पिछड़ी जाति की मजबूत महिला नेता को अपमानित किया जाता है, तब अखिलेश यादव की ‘रहस्यमयी चुप्पी’ इन गुंडों की पीठ थपथपाती है।

अखिलेश यादव सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर खुद को कितना भी आधुनिक और प्रगतिशील दिखाने का ढोंग कर लें, लेकिन हकीकत यही है कि उनकी पार्टी आज भी अपराधियों, माफियाओं (अतीक-मुख्तार) और लंपट तत्वों के भरोसे ही सांस ले रही है। जब खुद राष्ट्रीय अध्यक्ष एक महिला विरोधी ट्रोलर (मनीष जगन) को बचाने के लिए थाने-थाने दौड़ते हैं, तो नीचे के कार्यकर्ताओं का हौसला बढ़ना लाजिमी है।

मुलायम परिवार की आँखों में खटक रहा राम मंदिर, ससुर ने कारसेवकों का कराया नरसंहार-पति ने चंदाचोरी पर फैलाई नफरत: अब डिंपल यादव बोली- राम मंदिर में बुलडोजर क्यों नहीं चला?

समाजवादी पार्टी की सांसद डिंपल यादव इन दिनों दिल्ली के जंतर-मंतर पर शिक्षा सुधार और नीट (NEET) पेपर लीक के मुद्दे को लेकर अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक के समर्थन में उतरी हुई हैं। जंतर-मंतर पहुँचकर डिंपल यादव ने वांगचुक का समर्थन तो किया, लेकिन इस दौरान मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी मामले को लेकर उन्होंने भारतीय जनता पार्टी की सरकार पर तीखा हमला बोला। डिंपल यादव ने राम मंदिर और बुलडोजर कार्रवाई को लेकर एक ऐसा विवादित बयान दे दिया है, जिसने दिल्ली से लेकर लखनऊ तक की सियासत में भूचाल ला दिया है।

राम मंदिर पर डिंपल का ‘बुलडोजर’ राग और पुराना इतिहास

डिंपल यादव ने भाजपा सरकार को घेरते हुए कहा कि देश में इस समय ‘बुलडोजर सरकार’ चल रही है, जो छात्रों के भविष्य पर बुलडोजर चला रही है। उन्होंने मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी मामले का जिक्र करते हुए सवाल उठाया। डिंपल ने कहा, “जब राम मंदिर में इतनी बड़ी चोरी हो गई तो वहाँ पर बुलडोजर थक गया है। तो आखिर बुलडोजर क्यों थम गया, सवाल इस बात का है।”

इस बयान के बाद अब डिंपल यादव खुद चौतरफा घिर गई हैं। आलोचक और राजनीतिक विश्लेषक सवाल उठा रहे हैं कि क्या एक कर्मचारी पर लगे कथित चोरी के आरोप के आधार पर पवित्र राम मंदिर की तुलना किसी अवैध निर्माण से करना जरा भी उचित है? इतिहास गवाह है कि मुलायम सिंह यादव के समय में अयोध्या में कारसेवकों पर गोलियाँ चलवाई गई थीं, जिसे लोग नरसंहार तक कहते हैं।

इसके बाद अखिलेश यादव ने राम मंदिर के चंदे को लेकर बयानबाजी की थी। अब डिंपल यादव के इस बयान के बाद लोग पूछ रहे हैं कि क्या डिंपल भी राम मंदिर पर बुलडोजर चलवाकर वहाँ पुराना बाबरी ढांचा वापस देखना चाहती हैं? पूरा यादव परिवार ही राम विद्रोही बनकर सामने आ रहा है।

अखिलेश का पुराना बयान और पूरा परिवार घेरे में

अखिलेश यादव ने भी पहले राम मंदिर के संदर्भ में एक बड़ा बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि हमें सांचा नहीं, बल्कि ‘ढांचा बदलना’ होगा। उनके इस पुराने बयान को डिंपल यादव के ताजा बयान से जोड़कर देखा जा रहा है। देश जानता है कि पूरा मुलायम परिवार शुरू से ही राम विरोधी रहा है और डिंपल का यह बयान उसी सोच को आगे बढ़ाता है। अब जंतर-मंतर के बहाने इनके अंदर की कड़वाहट भी बाहर आ रही है। मुद्दा पेपर लीक मामले का है, लेकिन निशाना राम मंदिर पर आकर रूक जाता है।

अयोध्या में भव्य श्री राम मंदिर का निर्माण होने के बाद से ही यह मंदिर मुलायम परिवार की आँखों में और ज्यादा खटकने लगा है। राम मंदिर में सुरक्षा और व्यवस्था से जुड़े एक कर्मचारी पर चोरी का आरोप क्या लगा, डिंपल यादव ने सीधे पूरे मंदिर परिसर पर बुलडोजर चलाने की माँग जैसी भाषा का इस्तेमाल कर दिया। जनता के बीच अब यह सवाल तेजी से गूँज रहा है कि क्या एक कथित चोरी के बहाने पूरे राम मंदिर को निशाना बनाना और वहाँ बुलडोजर की बात करना तुष्टिकरण की राजनीति का हिस्सा नहीं है?

सपा सांसदों का जमावड़ा

इस पूरे सियासी घमासान की शुरुआत सोनम वांगचुक के धरने से जुड़ी हुई है। सोनम वांगचुक शिक्षा में बड़े सुधार, नीट पेपर लीक मामले में सख्त एक्शन और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की माँग को लेकर पिछले 21 दिनों से जंतर-मंतर पर कड़े धरने पर बैठे हैं। वे ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के बैनर तले यह बड़ा आंदोलन चला रहे हैं। इतने दिनों से लगातार अनशन पर रहने के कारण वांगचुक की तबीयत काफी बिगड़ चुकी है और शनिवार (18 जुलाई) सुबह ही अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

सोनम वांगचुक के बिगड़ते स्वास्थ्य के बीच समाजवादी पार्टी के सांसदों का एक बड़ा दल लगातार जंतर-मंतर पहुँच रहा है। इससे पहले सपा सांसद प्रिया सरोज भी वांगचुक के अनशन स्थल पर पहुँची थीं और उन्होंने संसद से लेकर सड़क तक उनके मुद्दों को उठाने का वादा किया था। खुद सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी सोनम वांगचुक से अपना अनशन समाप्त करने की अपील की थी। लेकिन अब इस आंदोलन के मंच का इस्तेमाल राजनीतिक बयानों के लिए होने लगा है।

‘अब कोई भी खुद को रिपोर्टर बताता है’: जिन पत्रकारों को मुस्लिम भीड़ ने पीटा, उन्हें ही दिल्ली HC देने लगा नसीहत; आबिद अली और फुरकान को दी जमानत

दिल्ली हाई कोर्ट ने 16 जुलाई 2026 को पिछले साल सीमापुरी में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की कवरेज के दौरान पत्रकारों पर हुए हमले के मामले में आरोपित आबिद अली और फुरकान को जमानत दे दी।

बता दें कि 04 जुलाई 2025 को रिपोर्टर सुप्रिया पाठक और उनके कैमरामैन श्याम पर उस समय बेरहमी से हमला किया गया था, जब वे सीमापुरी इलाके में सरकारी जमीन पर बने अवैध अतिक्रमण और झुग्गियों की रिपोर्टिंग कर रहे थे। यह इलाका सीमापुरी थाना क्षेत्र में आता है।

पीड़ितों के अनुसार, बुर्का पहने महिलाओं और नाबालिग लड़कों की भीड़ ने उन पर हमला कर दिया। दोनों को बुरी तरह पीटा गया और उनके कैमरे सहित अन्य सामान, नकदी और निजी सामान भी छीन लिया गया। ऑपइंडिया से बातचीत में सुप्रिया पाठक और श्याम ने बताया था कि भीड़ ने उन्हें अलग-अलग घेरकर हमला किया। उन्होंने कहा कि उन पर पथराव किया गया और बेल्ट से भी मारा गया। हमले के दौरान दोनों अपनी जान बचाकर वहाँ से निकलने की कोशिश करते रहे।

इस मामले की सुनवाई दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस की सिंगल बेंच ने की। सुनवाई के दौरान आरोपित आबिद अली ने कोर्ट में कहा कि वह उस बस के अंदर नहीं गया था, जिसमें हमला होने के बाद दोनों पत्रकार अपनी जान बचाने के लिए छिपे थे। उसने अपने बचाव में यह भी दावा किया कि उसकी अम्मी ने उसे बस में चढ़ने से रोक दिया था।

दिलचस्प बात यह है कि आबिद अली के वकील ने यह भी दलील दी कि पीड़ित किसी ‘बड़े या स्थापित मीडिया संस्थान’ से नहीं जुड़े थे, बल्कि केवल एक ‘यूट्यूब चैनल के लिए फ्रीलांस रिपोर्टिंग’ कर रहे थे। वहीं दूसरे आरोपित फुरकान ने कोर्ट में दावा किया कि घटना के समय वह मौके पर मौजूद ही नहीं था। उसके वकील ने यह भी कहा कि दोनों पत्रकारों को केवल ‘मामूली चोटें’ आई थीं।

दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इस मामले के चार अन्य आरोपितों को पहले ही जमानत मिल चुकी है। आबिद अली और फुरकान ही ऐसे आरोपित थे, जो 05 जुलाई 2025 से जेल में बंद थे।

सुनवाई के दौरान जाँच अधिकारी और सब इंस्पेक्टर वीरेंद्र कुमार कोर्ट में मौजूद नहीं थे। साथ ही चार्जशीट में भी कुछ ‘विसंगतियाँ’ थीं, जैसे फुरकान द्वारा पहनी गई शर्ट के रंग को लेकर अलग-अलग जानकारी दी गई थी। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए जस्टिस गिरीश कठपालिया ने आबिद अली और फुरकान को ₹10 हजार के निजी मुचलके पर जमानत दे दी। कोर्ट ने कहा, “किसी भी आरोपित को बिना वजह अनिश्चित समय तक जेल में नहीं रखा जा सकता।”

सुनवाई के दौरान सरकारी वकील ने कोर्ट से कहा कि आबिद अली और फुरकान को जमानत नहीं दी जानी चाहिए। उनका कहना था कि दोनों आरोपितों ने उस समय पत्रकारों पर हमला किया, जब वे भीड़ से बचकर वहाँ से निकलने की कोशिश कर रहे थे।

सुनवाई के दौरान जस्टिस गिरीश कठपालिया ने इस बात पर भी चर्चा की कि किसी व्यक्ति को ‘पत्रकार’ किस आधार पर माना जा सकता है। यह चर्चा ऐसे मामले में हुई, जिसमें दो रिपोर्टरों पर हिंसक भीड़ द्वारा हमला किए जाने का आरोप है।

कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “मामला संवेदनशील था। इसके बावजूद शिकायतकर्ताओं ने रिपोर्टिंग शुरू करने से पहले स्थानीय पुलिस को इसकी जानकारी नहीं दी। हालाँकि, इससे उन पर हुए हमले को किसी भी तरह सही नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन अभियोजन पक्ष ने यह तर्क दिया है कि यह हमला प्रेस की आजादी पर हमला था, इसलिए इस पहलू पर भी विचार करना जरूरी है।”

इसके बाद जस्टिस कठपालिया ने अपने फैसले में करीब तीन पन्नों तक भारतीय मीडिया की मौजूदा स्थिति पर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि आज मीडिया का एक बड़ा हिस्सा बिना किसी स्पष्ट नियम और संगठन के काम कर रहा है। उन्होंने अपने आदेश में लिखा, “आज के समय में मोबाइल फोन और माइक्रोफोन रखने वाला लगभग कोई भी व्यक्ति खुद को ‘रिपोर्टर’ बता सकता है।”

जस्टिस कठपालिया ने आगे कहा कि ‘खुद को पत्रकार’ बताने वाले कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो लोगों के सामने अचानक माइक्रफोन लेकर पहुँच जाते हैं। और अगर सामने वाला व्यक्ति उनके सवालों का जवाब नहीं देता, तो वे यह कहने लगते हैं कि ‘वह सवालों से बच’ रहा है। जस्टिस ने दावा किया कि इस तरह की रिपोर्टिंग से जनता के बीच ‘गुमराह करने वाली धारणा’ बनती है और लोगों पर ‘बेवजह दबाव’ पड़ता है।

दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने आदेश में आगे कहा, “इतनी ही चिंता की बात यह भी है कि मीडिया का एक वर्ग चुनिंदा रिपोर्टिंग, सनसनी फैलाने वाली खबरों या बिना पुष्टि वाले आरोपों के जरिए किसी खास सामाजिक समूह को निशाना बनाता है या उसकी छवि खराब करता है।” कोर्ट ने कहा कि ऐसी रिपोर्टिंग से समाज में विभाजन बढ़ सकता है, सांप्रदायिक तनाव पैदा हो सकता है और कानून-व्यवस्था की स्थिति भी बिगड़ सकती है।

यह ध्यान देने वाली बात है कि यह मामला सीमापुरी में सरकारी जमीन पर हुए अवैध अतिक्रमण की रिपोर्टिंग से जुड़ा है। रिपोर्टर सुप्रिया पाठक और उनके कैमरामैन श्याम इसी विषय पर रिपोर्टिंग कर रहे थे, जब उन पर हमला हुआ था। अब, हमले का शिकार हुए इन पत्रकारों के मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने ‘पत्रकारिता की नैतिकता’ और मीडिया की भूमिका पर भी टिप्पणी की, जबकि इसी मामले में हिंसा के आरोपितों को जमानत भी दे दी गई।

इस फैसले में कोर्ट का लहजा जरूरत से ज्यादा उपदेश देने वाला और संरक्षणवादी नजर आता है। ऐसा भी लगता है कि कहीं न कहीं पीड़ितों पर ही सवाल उठाए जा रहे हैं। सबसे हैरानी की बात यह है कि कोर्ट ने इसी मामले के जरिए पत्रकारों के लिए नया नियामक ढाँचा बनाने की बात भी कही।

जस्टिस गिरीश कठपालिया ने कहा, “अब समय आ गया है कि संसद ऐसा कानून बनाने पर विचार करे, जिससे प्रेस की आजादी बनी रहे, लेकिन साथ ही पत्रकारों की जवाबदेही, पेशेवर नैतिकता, कानून का सम्मान, नागरिकों के अधिकार और जनहित भी सुरक्षित रहें।”

इस मामले में अब सभी आरोपित जमानत पर बाहर हैं। वहीं जिन पत्रकारों पर हमला हुआ था, उन्हें एक साल बाद कोर्ट में ‘यूट्यूब चैनल के लिए काम करने वाले फ्रीलांसर’ के रूप में पेश किया गया, जिससे उनकी पत्रकारिता की पहचान और भूमिका पर सवाल खड़े होने की बात कही गई है।

नूपुर शर्मा केस की याद दिलाता मामला

यह पहली बार नहीं है जब कोर्ट ने हिंसा करने वालों की जिम्मेदारी तय करने के बजाय पीड़ित पक्ष पर ही सवाल उठाए हों। जुलाई 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने भाजपा की पूर्व प्रवक्ता नुपुर शर्मा को पैगंबर मोहम्मद पर की गई उनकी टिप्पणी को लेकर कड़ी फटकार लगाई थी। कोर्ट ने कहा था कि उदयपुर में हुई नृशंस हत्या जैसी घटनाओं के लिए उनकी टिप्पणियाँ जिम्मेदार हैं और उन्हें ‘पूरे देश से माफी माँगनी चाहिए।’

जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जेबी पारदीवाला की बेंच ने कहा था, “जिस तरह इन्होंने पूरे देश में लोगों की भावनाएँ भड़काई हैं, उसके लिए यही अकेले जिम्मेदार हैं। देश में जो कुछ भी हो रहा है, उसके लिए यही महिला जिम्मेदार है।”

नुपुर शर्मा को जिम्मेदार ठहराते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस्लामी कट्टरपंथियों की ओर से की गई हिंसा और नफरत को नजरअंदाज कर दिया था। जबकि नुपुर शर्मा ने केवल वही बातें कही थीं, जिनका उल्लेख इस्लामी हदीसों में मिलता है और जिन्हें दुनिया भर के कई इस्लामी स्कॉलर भी स्वीकार करते हैं।

एक धर्मनिर्पेक्ष और लोकतांत्रिक देश की सर्वोच्च अदालत, जिससे निष्पक्षता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की उम्मीद की जाती है, उसने उस समय ऐसा रुख अपनाया जो मध्यकालीन चर्च के मुकदमों की याद दिलाता है। दिल्ली हाई कोर्ट का हालिया फैसला भी इस मामले से अलग नहीं है।

(मूलरूप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में लिखी गई है, जिसे पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।)

भारत की पहली नाइट सफारी बनेगा UP का कुकरैल रिजर्व फॉरेस्ट, सुप्रीम कोर्ट से मिली हरी झंडी: जानिए क्या होंगी इसकी विशेषताएँ

उत्तर प्रदेश की देश में एक नई पहचान बन रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार राज्य को विकास की नई ऊँचाइयों पर ले जा रही है। इसी कड़ी में सुप्रीम कोर्ट से योगी सरकार को एक बहुत बड़ी जीत मिली है। देश की सबसे बड़ी अदालत ने लखनऊ के कुकरैल में बनने वाले ‘नाइट सफारी और जूलॉजिकल पार्क’ प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली तीन जजों की बेंच ने इस प्रोजेक्ट के खिलाफ दायर सभी याचिकाओं और आपत्तियों को खारिज कर दिया है।

अदालत ने अपने फैसले में बहुत साफ शब्दों में कहा कि देश में विकास के कामों को हमेशा के लिए पूरी तरह से रोकना बिल्कुल ठीक नहीं है। कोर्ट ने माना कि पुरानी तकनीक और पुराने चिड़ियाघर अब आउटडेटेड हो चुके हैं। जनता की भलाई और आधुनिक मनोरंजन के लिए नए प्रोजेक्ट बहुत जरूरी हैं। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यह प्रोजेक्ट लोगों के हित में है। हालाँकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि विकास के साथ पर्यावरण की सुरक्षा भी जरूरी है। इसलिए केंद्रीय कमेटियों और पर्यावरण मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा तय की गई सभी शर्तों का कड़ाई से पालन करना होगा।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या लगाई शर्तें?

सुप्रीम कोर्ट ने इस बड़े प्रोजेक्ट को हरी झंडी देने के साथ ही एक मजबूत और पारदर्शी सिस्टम भी तैयार किया है। कोर्ट ने केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) के सदस्यों को एक विशेष जिम्मेदारी सौंपी है। इस कमेटी के अफसरों को समय-समय पर खुद लखनऊ के कुकरैल जंगल का दौरा करना होगा। वे वहाँ जाकर यह देखेंगे कि काम नियमों के मुताबिक हो रहा है या नहीं।

इसके साथ ही, अदालत ने आदेश दिया है कि अगले 3 महीने के भीतर काम की पहली प्रोग्रेस रिपोर्ट कोर्ट में जमा करनी होगी। जो लोग इस प्रोजेक्ट को लेकर चिंतित हैं या विरोध कर रहे थे, कोर्ट ने उन्हें भी अपनी बात रखने का मौका दिया है। वे लोग अपने सुझाव और आपत्तियाँ इसी कमेटी के सामने पेश कर सकते हैं।

इस ₹1,500 करोड़ के बहुत बड़े प्रोजेक्ट से पर्यावरण को कोई नुकसान न हो, इसके लिए कुछ जरूरी बदलाव किए गए हैं। सीईसी (CEC) ने सुझाव दिया कि 72 एकड़ में फैले पुराने लखनऊ चिड़ियाघर को पूरी तरह कुकरैल में शिफ्ट करने के बजाय उसके स्वरूप को संतुलित रखा जाए। इसके अलावा, जंगल के बीच से निकलने वाली सड़क को बहुत चौड़ा नहीं किया जाएगा।

पहले इसे चार लेन (फोर-लेन) का बनाने का प्लान था, लेकिन अब इसे सिर्फ दो लेन (टू-लेन) का ही बनाया जा सकेगा। पर्यावरण की संवेदनशीलता को देखते हुए जंगल के अंदर बनने वाले एडवेंचर जोन, ट्रैम सेवा और ऑगमेंटेड रियलिटी थिएटर के प्लान को भी अब पूरी तरह रद्द कर दिया गया है ताकि प्राकृतिक शांति बनी रहे।

जानिए लखनऊ की जान ‘कुकरैल जंगल’ की कहानी: यहाँ है घड़ियालों का संसार और दुर्लभ पक्षी

कुकरैल रिजर्व फॉरेस्ट को लखनऊ शहर का ‘आखिरी हरा फेफड़ा‘ (Green Lung) माना जाता है। सरकार ने साल 1950 में इसे एक सुरक्षित जंगल घोषित किया था। यह पूरा जंगल लगभग 4,500 से 5,000 हेक्टेयर के बहुत बड़े इलाके में फैला हुआ है। यह खूबसूरत और शांत जगह लखनऊ शहर के बाहरी किनारे पर स्थित है। इस जंगल में बहुत घने पेड़-पौधे और देखने में बेहद सुंदर नजारे हैं।

यहाँ एक बहुत प्यारी प्राकृतिक जलधारा भी बहती है। यह जगह शहर के शोर-शराबे और भागदौड़ वाली जिंदगी से दूर लोगों को बहुत सुकून देती है। इस जंगल की सबसे बड़ी और खास बात यह है कि यहाँ मगरमच्छ और घड़ियाल रहते हैं। यहाँ भारत की इन संकट में पड़ी प्रजातियों के लिए एक विशेष नर्सरी यानी प्रजनन केंद्र चलाया जाता है।

इसके अलावा, कुकरैल जंगल के अंदर एक बहुत ही सुंदर डियर पार्क (हिरण पार्क) भी बनाया गया है। बच्चों के खेलने के लिए यहाँ एक चिल्ड्रेन पार्क, खाने-पीने के लिए कैफेटेरिया और रुकने के लिए एक रेस्ट हाउस भी मौजूद है। यह पूरी जगह लखनऊ के लोगों के लिए पिकनिक मनाने की सबसे पसंदीदा जगह है। लोग यहाँ दूर-दूर से सुंदर और दुर्लभ पक्षियों को देखने (बर्ड वाचिंग) के लिए भी आते हैं।

प्रदूषण से बेहाल लखनऊ के लिए क्यों जरूरी है कुकरैल रिजर्व फॉरेस्ट?

लखनऊ बहुत तेजी से एक बड़ा शहर बनता जा रहा है। यहाँ हर तरफ बड़ी-बड़ी इमारतें और कंक्रीट के मकान खड़े हो रहे हैं, जिसकी वजह से पेड़-पौधे लगातार कम हो रहे हैं। अगर हम पुरानी बात करें, तो साल 1950 में पूरे लखनऊ में सिर्फ 8,000 गाड़ियाँ हुआ करती थीं। लेकिन अब साल 2025-2026 आते-आते यहाँ गाड़ियों की संख्या बढ़कर 40 लाख से भी ज्यादा हो चुकी है।

इसके साथ ही शहर में रहने वाले लोगों की आबादी भी पहले के मुकाबले करीब 20 गुना बढ़ गई है। आज के माहौल में लखनऊ के पर्यावरण को ठीक रखने के लिए कुकरैल रिजर्व फॉरेस्ट जैसे कम से कम तीन से चार बड़े जंगलों की सख्त जरूरत है। सरकारी आँकड़ों को देखें तो पता चलता है कि साल 2001 से 2023 के बीच लखनऊ ने अपनी 20 फीसदी हरियाली (ग्रीन कवर) हमेशा के लिए खो दी है।

आजकल लखनऊ की हवा इतनी ज्यादा खराब हो चुकी है कि यहाँ का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) अक्सर 300 के पार चला जाता है, जिसे सेहत के लिए बहुत खतरनाक माना जाता है। ऐसे खराब माहौल में कुकरैल रिजर्व फॉरेस्ट का यह घना जंगल पूरे लखनऊ शहर के तापमान को बढ़ने से रोकता है और मौसम को बनाए रखता है। यह जंगल बारिश के पानी को सोखकर जमीन के नीचे के पानी (वाटर लेवल) को बढ़ाने का बहुत जरूरी काम भी करता है।

इसके साथ ही, यह हवा में फैले प्रदूषण और जहरीली गैसों को सोखकर शहर के लिए एक विशाल ‘कार्बन सिंक’ (हवा साफ करने वाली मशीन) की तरह काम करता है। यही सबसे बड़ी वजह है कि पर्यावरण से प्यार करने वाले लोग इस जंगल में किसी भी तरह की तोड़फोड़ या निर्माण कार्य का लगातार विरोध कर रहे थे और इस पूरी लड़ाई को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) तक लेकर गए थे।

योगी सरकार का दमदार विजन

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार के लिए यह ‘अर्बन नाइट सफारी’ प्रोजेक्ट राज्य की प्रगति का एक बड़ा प्रतीक है। यह पूरे देश का पहला ऐसा प्रोजेक्ट है जो शहर के पास किसी विशाल जंगल में बनने जा रहा है। अगर हम इतिहास उठाकर देखें तो पिछली सरकारों ने उत्तर प्रदेश के पर्यटन और पर्यावरण के विकास के लिए कभी ऐसे बड़े और आधुनिक कदम नहीं उठाए थे। पुरानी सरकारों की सुस्ती, इच्छाशक्ति की कमी और राजनीतिक फायदे की सोच के कारण UP ऐसे ग्लोबल प्रोजेक्ट्स से हमेशा वंचित रहा। पिछली सरकारों के पास राज्य को आगे ले जाने का कोई साफ विजन नहीं था।

इसके विपरीत, योगी सरकार विकास और आधुनिक बदलावों के लिए हमेशा तत्पर रहती है। सरकार का बड़ा सपना है कि इस जगह को पूरी दुनिया के सामने बेहतरीन इको-टूरिज्म सेंटर के रूप में पेश किया जाए, जिससे यूपी का नाम वैश्विक स्तर पर चमके। अब जब सुप्रीम कोर्ट से हरी झंडी मिल गई है, तो योगी सरकार बिना किसी देरी के इसके पहले चरण (फेज) का काम तेजी से शुरू करने जा रही है। सरकार का मुख्य मकसद यह है कि पर्यावरण को कोई नुकसान भी न पहुँचे और राज्य में पर्यटन का एक नया अध्याय शुरू हो। इसके साथ ही, इस बड़े प्रोजेक्ट के धरातल पर उतरने से स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और बिजनेस के बहुत सारे नए मौके भी पैदा होंगे।

पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति का पूरा सम्मान

योगी सरकार ने इस बात पर भी पूरा ध्यान दिया है कि विकास के साथ-साथ प्रकृति का संतुलन भी बना रहे। कोर्ट के निर्देशों के मुताबिक, जंगल के केवल उन्हीं चुनिंदा पेड़ों को हटाया जाएगा जिन्हें प्रोजेक्ट के मूल डिजाइन और इंजीनियरिंग के लिए काटना बेहद जरूरी होगा। इसके साथ ही एक सख्त नियम भी तय किया गया है कि अगर प्रोजेक्ट के लिए कोई 1 पेड़ काटा जाता है, तो उसके बदले में सरकार की तरफ से 10 नए पौधे लगाए जाएँगे।

इसके अलावा, कुकरैल जंगल में उग आए उन सभी बाहरी और नुकसानदेह जंगली पौधों (इन्वेसिव स्पीशीज) को चुन-चुनकर पूरी तरह साफ किया जाएगा जो वहाँ के मूल इकोसिस्टम को खराब कर रहे हैं। इस वैज्ञानिक सफाई और सौंदर्यीकरण से जंगल के अंदर रहने वाले स्थानीय पशु-पक्षियों और वन्यजीवों को रहने के लिए एक बेहतर, साफ और पूरी तरह सुरक्षित माहौल मिल सकेगा। योगी सरकार का यह कदम साबित करता है कि वे राज्य को आधुनिक बनाने के साथ-साथ पर्यावरण को भी सुरक्षित रखने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं।

पंजाब में खालिस्तानी आतंकियों ने हिंदू पहचान को बनाया निशाना, बाजारों-बसों-ट्रेनों में हुए कत्लेआम: जानें- ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ के पहले से ही कैसे बहाया जा रहा था खून

वो 6 जुलाई 1987 की रात थी। हरियाणा रोडवेज की एक बस चंडीगढ़ से ऋषिकेश के लिए रवाना हुई थी। बस में सवार यात्रियों में ज्यादातर तीर्थयात्री, मजदूर, महिलाएँ, बच्चे और पुरुष थे, जो सिर्फ यही उम्मीद कर रहे थे कि वे शायद थोड़ा देर से पहुँचेंगे। जब बस लालरू पार करने वाली थी, तभी एक कार ने उसका रास्ता रोक लिया। हथियारबंद लोग बस के अंदर चढ़ गए, बस को मेन हाइवे से दूर ले गए, यात्रियों को गालियाँ दी, उनके कीमती सामानों को लूट लिया गया और बस के दोनों तरफ से गोलियाँ बरसानी शुरू कर दीं।

खालिस्तानी आतंकियों के चंडीगढ़ बस हमले में उस रात पाँच महिलाओं और चार बच्चों समेत 38 लोग मारे गए। यह कोई आमने-सामने की मुठभेड़ नहीं थी। वहाँ कोई भ्रम नहीं था। पीड़ितों को चुन-चुनकर मौत के घाट उतारा गया क्योंकि वे हिंदू थे, जो एक ऐसे इलाके में सफर कर रहे थे जहाँ खालिस्तानी आतंकवाद ने आम यात्रा को ही हथियार बनाना सीख लिया था।

यह कोई इकलौती घटना नहीं थी। पंजाब में उग्रवाद के दौरान इस तरह की घटनाओं को अलग-अलग तरीकों से दोहराया गया। कहीं बस रोकी गई, तो कहीं चेन खींचकर ट्रेन रोकी गई। दाढ़ी, पगड़ी, नाम, बोलने के तरीके या बंदूक की नोक पर पूछे गए सवालों के जवाब से पहचान की जाँच की जाती थी। सिख यात्रियों को एक तरफ हटने के लिए कहा जाता था। महिलाओं और बच्चों को कभी जाने दिया जाता था, तो कभी नहीं।

हिंदू पुरुषों को कतार में खड़ा किया जाता था, बस से उतरने का हुक्म दिया जाता था या ट्रेन के डिब्बे के भीतर ही फंसाकर उन्हें बेहद करीब से गोली मार दी जाती थी। जब हत्याओं का यह सिलसिला सड़कों से आगे बढ़ा, तो इसने बाजारों, ईंट-भट्टों, सुबह की शाखाओं और कारखानों को भी अपनी चपेट में ले लिया। जब इन सभी घटनाओं को एक साथ देखा जाता है, तो यह सिर्फ आम नागरिकों की आकस्मिक मौत नहीं, बल्कि सांप्रदायिक आतंकवाद का एक बार-बार दोहराया जाने वाला तरीका नजर आता है।

ऑपरेशन ब्लू स्टार से पहले ही दिखने लगा था खालिस्तानी आतंकियों का यह तरीका

पंजाब में उग्रवाद को लेकर एक आम भ्रम यह है कि हिंदू नागरिकों की सुनियोजित हत्याएँ जून 1984 में हुए ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद ही शुरू हुईं। लेकिन इतिहास के आँकड़े इस बात की गवाही नहीं देते। ‘हिंद समाचार समूह’ के संस्थापक और अलगाववादी उग्रवाद के प्रखर आलोचक लाला जगत नारायण की हत्या 9 सितंबर 1981 को ही कर दी गई थी।

इसके कुछ ही हफ्तों के भीतर दल खालसा के अपहरणकर्ताओं ने इंडियन एयरलाइंस के विमान 423 का अपहरण कर लिया और खालिस्तानी आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाले को रिहा करने की माँग की। लाला जगत नारायण की हत्या अलगाववादी उग्रवाद के विरोधियों के खिलाफ चलाए गए अभियान के शुरुआती दौर में ही कर दी गई थी, जो जून 1984 से काफी पहले की बात है।

अक्टूबर 1983 की शुरुआत तक इस हिंसा ने एक नया और बेहद खौफनाक रूप ले लिया था। 5 और 6 अक्टूबर 1983 को ढिलवाँ बस हत्याकांड में ढिलवाँ से जालंधर जा रही एक बस से छह हिंदू यात्रियों को उतार लिया गया। हमलावरों ने यात्रियों से उनका धर्म पूछने के बाद उन्हें गोली मार दी।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, उग्रवाद के दौर में यह पहला ऐसा कुख्यात बस हत्याकांड था जिसमें हिंदुओं को चुनकर गोली मारी गई थी। इस घटना के तुरंत बाद पंजाब में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया।

लेकिन राष्ट्रपति शासन भी इन हत्याओं को रोक नहीं सका। 18 नवंबर 1983 को कपूरथला जिले में एक और बस को रोका गया और चार हिंदू यात्रियों की हत्या कर दी गई। ध्यान देने वाली बात यह है कि ढिलवाँ और कपूरथला दोनों ही घटनाओं में हाईजैक की गई बसों को अमृतसर के पास एक ही सीमावर्ती इलाके में लावारिस छोड़ दिया गया था। हालाँकि ये उग्रवाद के सबसे बड़े हमले नहीं थे, लेकिन इन्होंने दिखा दिया कि सार्वजनिक वाहन अब सांप्रदायिक आधार पर लोगों को चुनने और उन्हें मारने का जरिया बन चुके थे।

फरवरी 1984 में ब्लू स्टार से पहले का यह इतिहास और ज्यादा खून-खराबे वाला हो गया। 23 फरवरी को एक के बाद एक कई हमले हुए, जिसमें 11 हिंदुओं की मौत हो गई और दो दर्जन से ज्यादा लोग घायल हो गए। इस दौरान ट्रेनों और बसों दोनों को निशाना बनाया गया। भले ही यह किसी एक जगह पर हुआ हत्याकांड नहीं था और इसमें कई घटनाएँ शामिल थीं, लेकिन ये सभी हत्याएँ एक ही दिन के भीतर हुईं।

सेना के स्वर्ण मंदिर परिसर में दाखिल होने से महीनों पहले खालिस्तानी आतंकवादी आम लोगों को परिवहन नेटवर्क से खींचकर बाहर निकाल रहे थे और बसों तथा ट्रेनों को सांप्रदायिक आतंक का जरिया बना रहे थे। सरकारी और अखबारों के आँकड़ों के मुताबिक, ऑपरेशन ब्लू स्टार शुरू होने से पहले, 1984 के शुरुआती पाँच महीनों में ही सैकड़ों हिंसक घटनाएँ दर्ज की गईं और करीब 300 लोगों की जान चली गई।

मोगा के पास बस रूट पर जून से पहले की एक और घटना दर्ज हुई। 21 मई 1984 को छह खालिस्तानी आतंकवादियों ने मोगा के पास एक बस को हाईजैक कर लिया और चार हिंदू यात्रियों की हत्या कर दी। इस हमले में दस अन्य लोग घायल भी हुए।

हिंदुओं को क्यों बनाया जा रहा था निशाना?

उस समय की रिपोर्टों में बेहद साफ तौर पर बताया गया था कि इन हमलों के दौरान हिंदुओं को ही क्यों निशाना बनाया जा रहा था। जुलाई 1986 में मुक्तसर हत्याकांड के बाद ‘लॉस एंजिल्स टाइम्स’ ने लिखा था कि यह हमला साफ तौर पर सिख और हिंदू समुदायों के बीच ध्रुवीकरण पैदा करने के लिए चलाए जा रहे एक तेज अलगाववादी अभियान की ओर इशारा करता है। रिपोर्ट में इसे पंजाब से हिंदुओं को बाहर खदेड़ने के मकसद से चलाया गया एक व्यापक अभियान बताया गया।

नवंबर 1986 में होशियारपुर हत्याकांड के बाद ‘लॉस एंजिल्स टाइम्स’ ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि इन हत्याओं का मकसद सिख और हिंदू आबादी के बीच खाई पैदा करना था। पुलिस अधिकारियों के हवाले से कहा गया कि आतंकवादी चाहते थे कि पंजाब से बाहर रहने वाले सिख पंजाब के अंदर आ जाएँ और पंजाब के अंदर रहने वाले हिंदू राज्य से बाहर चले जाएँ।

जुलाई 1987 में लालरू हत्याकांड के बाद ‘द वाशिंगटन पोस्ट’ ने भी कुछ ऐसा ही रुख अपनाया और लिखा कि आतंकवादियों ने ऐसी रणनीति अपनाई है जिसका मकसद हिंदुओं को राज्य छोड़ने के लिए मजबूर करना और देश के अन्य हिस्सों में तनाव पैदा करना है।

अधिकारियों के बयानों ने भी इस बात की पुष्टि की। मुक्तसर हत्याकांड के बाद, बरनाला प्रशासन ने लोगों से अपील की कि वे ‘भाईचारे के खून-खराबे’ की साजिश रचने वाली ताकतों के जाल में न फँसें। होशियारपुर हत्याकांड के बाद कॉन्ग्रेस नेता राजीव गाँधी ने इसे धर्मनिरपेक्षता और भाईचारे के लिए एक ‘गंभीर उकसावा’ करार दिया। 1989 में मोगा हत्याकांड के बाद तत्कालीन गृह मंत्री बूटा सिंह ने साफ शब्दों में इस हमले को आतंकवादियों द्वारा सांप्रदायिक तनाव भड़काने की एक कोशिश बताया।

यह कोई दशकों बाद जबरन थोपी गई कोई वैचारिक व्याख्या नहीं थी। यह उस समय की सरकार द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा थी, जो उस पैटर्न के जवाब में थी जिसे वे अपनी आँखों के सामने घटते देख रहे थे। आतंकवादियों का रणनीतिक मकसद बेहद क्रूर और सीधा था। अगर पंजाब में हिंदुओं को असुरक्षित महसूस कराया जा सके और देश के अन्य हिस्सों में सिखों के खिलाफ जवाबी हिंसा भड़क उठे, तो सदियों पुराना भाईचारा टूट जाएगा।

इसके बाद पंजाब को उग्रवादियों के फायदे के लिए एक ऐसे क्षेत्र के रूप में पेश किया जा सकता था, जहाँ गैर-सिख सुरक्षित नहीं रह सकते। यही वजह थी कि बसों, ट्रेनों, बाजारों और दफ्तरों जैसी जगहों को निशाना बनाया गया, जहाँ आम, मिली-जुली और बेफिक्र जिंदगी हर रोज चलती थी। उस माहौल में आतंक फैलाने का मकसद आपसी भाईचारे को शक में बदलना था।

यहां एक और जरूरी पहलू पर बात करना जरूरी है। यह खालिस्तानी आतंकवादियों की एक रणनीति थी और यह नहीं कहा जा सकता कि पूरे सिख समुदाय का भी यही मकसद था। आतंकवादी हमलों में खुद सिख भी मारे गए, जिनमें उदारवादी, नेता, पुलिसकर्मी और उनके खिलाफ आवाज उठाने वाले लोग शामिल थे।

हरचंद सिंह लोंगोवाल जिन्होंने जुलाई 1985 में राजीव-लोंगोवाल समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, की अगस्त में शांति प्रयासों के विरोधी आतंकवादियों द्वारा हत्या कर दी गई थी। हिंदू विरोधी हत्याओं का अस्तित्व ऐतिहासिक रूप से सच है। ठीक उसी तरह, यह भी एक हकीकत है कि आतंकवादियों ने उन सिखों को भी निशाना बनाया जो उनके खिलाफ खड़े हुए थे। किसी भी ईमानदार इतिहास में इन दोनों सच्चाइयों को एक साथ रखना होगा।

जब बसें और ट्रेनें बन गईं मौत का मैदान

ढिलवाँ, अक्टूबर 1983: ढिलवाँ की घटना इसलिए अहम नहीं है क्योंकि यह शुरुआती दौर की थी, बल्कि इसलिए क्योंकि इसने एक ऐसा खाका तैयार कर दिया जो सालों तक दोहराया गया। बस रोकी गई, पहचान पूछी गई और हिंदू यात्रियों को अलग करके गोली मार दी गई। लोगों के जेहन में छपी यह याद बेहद गहरी थी। इसने तय कर दिया कि परिवहन के रास्तों को सांप्रदायिक बँटवारे और मौत के मैदान में बदला जा सकता है।

कपूरथला, नवंबर 1983: कपूरथला जिले में नवंबर में हुई हत्याओं ने दिखाया कि ढिलवाँ की घटना कोई इकलौती घटना नहीं थी। एक और बस को रोकने के बाद चार हिंदू यात्रियों की हत्या कर दी गई। लोगों के मन में इस दोहराव ने इस तरीके को एक नया अर्थ दे दिया: जो अक्टूबर में एक अनहोनी घटना लग रही थी, वह अब एक सोची-समझी रणनीति बनती दिख रही थी।

मुक्तसर, 25 जुलाई 1986: जब हमलावरों ने मुक्तसर के पास हमला किया, तब तक यह तरीका बेहद क्रूर और सुनियोजित हो चुका था। ‘लॉस एंजिल्स टाइम्स’ की रिपोर्ट के नुताबिक, खालिस्तानी आतंकवादी बस में चढ़े और उन्होंने महिलाओं, बच्चों और सिख यात्रियों (जिनकी पहचान उनकी पगड़ी और दाढ़ी से थी) को नीचे उतरने का आदेश दिया। इसके बाद उन्होंने बचे हुए लोगों पर गोलियाँ चला दीं।

अखबार की रिपोर्ट के अनुसार, मरने वालों में से कम से कम 14 लोगों के हिंदू होने का अंदेशा था और एक बिना दाढ़ी-मूँछ वाले सिख की भी मौत इसलिए हो गई क्योंकि उन्हें गलती से हिंदू समझ लिया गया था। इस एक छोटी सी बात से हमले की पूरी सांप्रदायिक सोच उजागर हो जाती है। आपकी धार्मिक पहचान ही आपके जिंदा बचने का पैमाना बन चुकी थी।

होशियारपुर या खुड्डा, 30 नवंबर 1986: चार महीने बाद इस उग्रवाद के दौर का सबसे भयावह बस हत्याकांड हुआ। होशियारपुर जिले के खुड्डा के पास खालिस्तानी आतंकवादियों ने एक सरकारी बस से हिंदू यात्रियों को नीचे उतरने का हुक्म दिया और उतरते समय उन पर गोलियाँ बरसा दीं।

पुलिस के बयानों के आधार पर ‘लॉस एंजिल्स टाइम्स’ की रिपोर्ट के मुताबिक, इस घटना में 24 लोग मारे गए और सात घायल हुए। रिपोर्ट में इसे उस साल पंजाब में हुई सबसे बड़ी आतंकवादी घटना बताया गया और इसे सीधे मुक्तसर हमले से जोड़ा गया, जिसमें कहा गया कि दोनों का मकसद सिखों और हिंदुओं को बाँटना था।

लालरू, 6 जुलाई 1987: लालरू अपनी क्रूरता और बड़े पैमाने पर हुई हत्याओं के कारण बेहद कुख्यात हुआ। बस को सिर्फ रोककर गोलियों की बौछार ही नहीं की गई थी। ‘द वाशिंगटन पोस्ट‘ और बाद में बचे हुए लोगों के बयानों के आधार पर तैयार की गई रिपोर्ट के अनुसार, आतंकवादियों ने गाड़ी का पीछा किया, उस पर कब्जा कर लिया, उसे हाईवे से दूर ले गए, यात्रियों को लूटा, पुलिस प्रमुख जूलियो रिबेरो का मजाक उड़ाया और फिर बस के दोनों छोरों से करीब पाँच मिनट तक गोलियाँ बरसाईं। मरने वालों में महिलाएँ और बच्चे भी शामिल थे।

मौके पर छोड़े गए एक नोट में कथित तौर पर धमकी दी गई थी कि राज्य द्वारा मारे गए हर सिख युवक के बदले सौ हिंदुओं को मारा जाएगा। यह नरसंहार न केवल सांप्रदायिक था, बल्कि इसे एक खौफनाक संदेश और चेतावनी के रूप में फैलाने के लिए अंजाम दिया गया था।

फतेहाबाद, 7 जुलाई 1987: एक दिन बाद यह हिंसा हरियाणा की सीमा में दाखिल हो गई लेकिन यह पंजाब के उग्रवाद से ही जुड़ी थी। फतेहाबाद के पास दो बसों पर हमला किया गया; जिसमें 34 हिंदू यात्रियों की मौत हो गई और 18 घायल हो गए। बाद की रिपोर्टों में इस हमले के तरीकों को लालरू से मिलता-जुलता बताया गया, जिसमें बस को रोकने के लिए दूसरी गाड़ी का इस्तेमाल, लूटपाट, चीनी ऑटोमैटिक राइफलें और पंजाब सीमा की तरफ भागने का रास्ता शामिल था। लालरू और फतेहाबाद ने मिलकर दिखाया कि आतंक की लहरें एक के बाद एक उठ रही थीं, जहाँ एक सदमे से लोग उबर भी नहीं पाते थे कि दूसरा नरसंहार सामने खड़ा होता था।

लुधियाना जिला, 15 जून 1991: लुधियाना जिले में दो यात्री ट्रेनों पर हुए हमलों ने इस परिवहन आतंक को और भी बड़े पैमाने पर पहुँचा दिया। मरने वालों की सही संख्या को लेकर अलग-अलग दावे हैं; उस समय की रिपोर्टों में मरने वालों की संख्या कम से कम 80 बताई गई थी, जबकि बाद के आँकड़ों में यह संख्या 100 से ऊपर पहुँच गई। लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि उग्रवादियों ने इमरजेंसी चेन खींचकर ट्रेनों को रोका और चुनावी हिंसा के बीच डिब्बों के अंदर अंधाधुंध गोलियाँ चला दीं।

जून 1991 के हमलों में मारे गए हर शख्स को शायद एक ही तरह से चुनकर निशाना नहीं बनाया गया था, इसलिए इसके सांप्रदायिक पहलू को बेहद सावधानी से समझने की जरूरत है। लेकिन यह नरसंहार साफ तौर पर इस बात का हिस्सा है कि कैसे पंजाब में रेल यात्रा को आम नागरिकों के कत्लेआम की जगह में बदल दिया गया था।

सोहियाँ, 26 दिसंबर 1991: सोहियाँ के पास दिसंबर में हुआ नरसंहार और भी अधिक चुनिंदा था। आतंकवादियों ने लुधियाना से फिरोजपुर जा रही एक लोकल ट्रेन पर कब्जा कर लिया, सोहियाँ के पास इमरजेंसी चेन खींची और फिर 50 से अधिक उन यात्रियों को गोली मार दी जो हिंदू जैसे दिख रहे थे।

बाजार, ईंट-भट्टे और कारखाने में भी कल्तेआम

सार्वजनिक परिवहन भले ही इन हत्याओं का सबसे बड़ा जरिया था, लेकिन यह अकेला नहीं था। 29 मार्च 1986 को आतंकवादियों ने जालंधर के पास मल्लियाँ में करीब 20 मजदूरों की हत्या कर दी।

25 जून 1989 के मोगा हत्याकांड ने दिखाया कि निशाना किसी एक जगह पर इकट्ठा हुए हिंदू भी हो सकते हैं। आतंकवादियों ने नेहरू पार्क में आरएसएस की सुबह की शाखा पर एक वैन से अंधाधुंध गोलियाँ बरसाईं। ‘द वाशिंगटन पोस्ट’ की शुरुआती रिपोर्टों में कहा गया कि कम से कम 24 लोग मारे गए; बाद के आँकड़ों और मोगा जिला मेमोरियल पेज के अनुसार मरने वालों की संख्या 25 या 26 थी, जिसमें गोलीबारी के बाद हुए बम धमाकों में भी कई लोगों की मौत हुई थी। बूटा सिंह ने इसे सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काने की एक गंभीर साजिश बताया था। शहीदी पार्क में बना आधिकारिक स्मारक आज भी स्थानीय लोगों की यादों में इस घटना को जिंदा रखे हुए है, लेकिन देश की बड़ी यादों में ये आँकड़े सिर्फ बनकर रह गए हैं।

7 मार्च 1990 को अबोहर में इस आतंक को एक शहर के व्यावसायिक केंद्र के भीतर लाया गया। बंदूकधारियों ने एक भीड़भाड़ वाले बाजार में गोलियाँ चलाईं और 22 हिंदुओं की जान ले ली। आम नागरिकों से भरे बाजार को इसलिए चुना गया क्योंकि ऐसी जगह डर को कई गुना बढ़ा देती है। एक बाजार युद्ध के मैदान का बिल्कुल उल्टा होता है; और आतंकवादियों ने ठीक इसी वजह से उसे चुना।

यह हिंसा पंजाब से बाहर भी फैली। उत्तर प्रदेश के रुद्रपुर में 17 अक्टूबर 1991 को रामलीला उत्सव के दौरान दो बम धमाके हुए, पहला धमाका मेला मैदान में और दूसरा उस अस्पताल के पास हुआ, जहाँ घायलों को ले जाया जा रहा था। इस घटना में 40 से अधिक लोगों की मौत और करीब 140 लोगों के घायल होने की खबर थी। बाद की रिपोर्टों में कहा गया कि खालिस्तानी समूहों ने इसकी जिम्मेदारी ली थी। रुद्रपुर की यह घटना इसलिए मायने रखती है क्योंकि यह दर्शाती है कि वही उग्रवादी नेटवर्क पंजाब की सीमाओं के बाहर भी सांप्रदायिक भय पैदा करने की रणनीति के तहत हिंदू नागरिकों को निशाना बना सकता था।

इसके बाद 11 मार्च 1992 को हरकिशनपुरा की घटना हुई। रिपोर्टों के अनुसार, उग्रवादियों द्वारा 16 हिंदू मजदूरों की हत्या कर दी गई थी। ये पीड़ित एक फैक्ट्री के कर्मचारी थे और आतंकवादी कथित तौर पर पुलिस की वर्दी में आए थे, जबकि कुछ रिपोर्टों में इस हमले को उग्रवादियों के बंद के आदेश की नाफरमानी से जोड़ा गया। काम पर लगे पुरुषों को एक कारखाने के भीतर ही मार दिया गया क्योंकि वे उसी नागरिक समूह का हिस्सा थे जिसे उग्रवाद ने बार-बार निशाना बनाया था।

पीड़ित सिर्फ आँकड़े नहीं, बल्कि राहगीर, मजदूर और परिवार थे

इन नरसंहारों में मारे गए लोग केवल कागजी आँकड़ों में ‘यात्री’ या ‘नागरिक’ नहीं थे। वे बसों में बच्चों को गोद में लिए महिलाएँ थीं, मंदिरों की ओर जाते पुरुष थे, भट्ठों पर काम करने वाले मजदूर थे, सुबह की शाखाओं में हिस्सा लेने वाले स्वयंसेवक थे, बाजार जाने वाले लोग, फैक्ट्री कर्मचारी, प्रवासी और दफ्तर जाने वाले लोग थे। अकेले लालरू में महिलाओं और बच्चों को मारा गया; मुक्तसर में कुछ महिलाओं और बच्चों को छोड़ दिया गया जबकि पुरुषों को मार डाला गया, जो अपने आप में दिखाता है कि कैसे आतंकवादियों ने अपने खौफनाक प्रभाव के लिए इस आतंक का पूरा खाका तैयार किया था। इसे इस तरह अंजाम दिया गया ताकि जीवित बचे लोग इसे देखें, याद रखें और दूसरों को सुनाएँ।

कई हमलों से यह भी पता चलता है कि कैसे बाहरी धार्मिक पहचान ही जिंदगी और मौत का फैसला करने लगी थी। मुक्तसर में अपनी पगड़ी और दाढ़ी से पहचाने जाने वाले सिख यात्रियों को बस से उतरने को कहा गया, जबकि एक बिना दाढ़ी-मूँछ वाले सिख की मौत सिर्फ इसलिए हो गई क्योंकि उन्हें हिंदू समझ लिया गया था। सोहियाँ में यात्रियों को कथित तौर पर इसलिए गोली मार दी गई क्योंकि वे हिंदू ‘दिख’ रहे थे। इसलिए यह हिंसा केवल शरीरों पर नहीं थी; यह एक मिले-जुले समाज में धार्मिक पहचान की सामाजिक पहचान पर हमला था। हमलावर का सवाल यह नहीं था कि किसने क्या किया, बल्कि यह था कि कौन कैसा दिखता है।

यही वजह है कि इन नरसंहारों को सरकार और आतंकवादियों के बीच की लड़ाई में केवल एक दुर्भाग्यपूर्ण ‘अप्रत्यक्ष नुकसान’ (कोलैटरल डैमेज) कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। बार-बार अपनाया गया यह तरीका कुछ और ही बयाँ करता है। गाड़ियों को रोका गया। यात्रियों से पूछताछ की गई। धार्मिक पहचान जाँची गई। कुछ को छोड़ दिया गया और दूसरों को गोली मार दी गई। मोगा और रुद्रपुर की तरह कभी-कभी आतंक को बढ़ाने या बचाने वालों को मारने के लिए बमों का इस्तेमाल भी किया गया। ऐतिहासिक दस्तावेजों के जितना करीब जाएँगे, इस सांप्रदायिक साजिश से इनकार करना उतना ही मुश्किल हो जाएगा।

साजिश पूरी तरह सफल नहीं हुई, पर यादें धुँधली पड़ गईं

उग्रवादी केवल हत्याओं से बढ़कर कुछ चाहते थे। वे एक बड़ा बिखराव चाहते थे। एक ऐसा पंजाब जहाँ हिंदुओं और सिखों का आम जीवन कभी सामान्य न रह सके और एक ऐसा भारत जहाँ हर अत्याचार देश के किसी दूसरे हिस्से में एक और जवाबी हिंसा को जन्म दे। कुछ पल ऐसे भी आए जब वे इसके बेहद करीब पहुँच गए थे।

मुक्तसर हत्याकांड के बाद पश्चिमी दिल्ली में हिंदू-सिख दंगे भड़क उठे और होशियारपुर हत्याकांड के बाद भी जवाबी हमलों का डर पैदा हो गया। लेकिन यह साजिश कभी पूरी तरह सफल नहीं हो पाई। कई सिखों ने इस अलगाववादी अभियान को सिरे से खारिज कर दिया और कईयों ने इसके लिए अपनी जान भी गँवाई। लोंगोवाल की हत्या इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, लेकिन वे अकेले नहीं थे।

यह कहना कि खालिस्तानी आतंकवादियों ने हिंदू नागरिकों के नरसंहार की योजना बनाई, सिखों पर आरोप लगाना नहीं है, बल्कि अपराधियों की सही पहचान करना है। असल में इतिहास खुद इस अंतर की माँग करता है, क्योंकि उग्रवाद ने उन सिख राजनेताओं, सिख पुलिसकर्मियों, सिख विरोधियों और सिख नागरिकों को भी मारा जो उनकी बात नहीं मान रहे थे। जिन लोगों ने बसों और ट्रेनों को रोका, वे एक ऐसा बँटवारा पैदा करने की कोशिश कर रहे थे जिसका पंजाब की सामाजिक जिंदगी ने हमेशा विरोध किया था।

इसके बाद जो हुआ वह एक शांत अन्याय की तरह है। मोगा जैसी कुछ जगहों पर आज भी स्मारक बने हुए हैं। लेकिन ज्यादातर घटनाएँ केवल जगहों के नाम और हताहतों की संख्या के रूप में ही लोगों के जेहन में बची हैं। कई पीड़ितों के नाम ढूँढ पाना उन उग्रवादियों की जीवनी तलाशने से ज्यादा मुश्किल है जिन्होंने उन्हें मारा था। जहाँ दस्तावेज मौजूद भी हैं, वे बिखरे हुए हैं। कहीं अखबार की कोई कतरन है, कहीं जिला स्मारक है, तो कहीं कोई पुरानी तारीख। नतीजा यह है कि मारे गए लोग आँकड़ों में तो दर्ज हैं, लेकिन इंसानी शक्ल में उनकी यादें गायब हो चुकी हैं।

इसलिए ध्यान फिर से उसी लालरू की बस, मुक्तसर की बस, होशियारपुर के पास की बस, लुधियाना जिले में रोकी गई ट्रेनों, अबोहर के बाजार और मोगा की उस सभा पर जाता है। वहाँ मौजूद लोग कोई लड़ाके नहीं थे। वे वर्दी पहने सैनिक नहीं थे, न ही थाने पर हमला करने वाले लोग थे और न ही किसी गुटीय रंजिश में हथियार उठाए प्रतिद्वंद्वी थे। वे बस यात्रा कर रहे थे, काम कर रहे थे, खरीदारी कर रहे थे, कसरत कर रहे थे और अपने घरों को लौट रहे थे। उन पलों में केवल उनकी हिंदू पहचान ही उनके खिलाफ एकमात्र गुनाह बन गई। पंजाब उग्रवाद का कोई भी सच्चा इतिहास इसे कभी छोड़ नहीं सकता।

(मूल रूप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

‘हिंदू बेच रहे मकान, मुस्लिम बस्ती बन रहा इलाका’: अंकित शर्मा की हत्या और ताहिर हुसैन के दोषी करार होने के बाद चाँद बाग में क्या है माहौल, पढ़ें- ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट

दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों के करीब 6 वर्ष बाद अंकित शर्मा की हत्या के मामले में AAP के पूर्व पार्षद ताहिर हुसैन सहित 5 लोगों को कड़कड़डूमा कोर्ट द्वारा दोषी करार दिए जाने के बाद ऑपइंडिया की टीम दिल्ली के चाँद बाग स्थित उस गली में पहुँची जहाँ अंकित शर्मा का परिवार रहता था।

60 फुटा रोड के अंदर जाकर अंकित शर्मा के घर पहुँचने से पहले हमारी मुलाकात घर के दरवाजे पर बैठे एक बुजुर्ग से हुई और हमारे पूछने पर उन्होंने अंकित शर्मा के घर का पता तो बता दिया, लेकिन इसके आगे हमने उनसे अंकित शर्मा और उनके परिवार के बारे में जानने की कोशिश की तो वह कुछ देर चुप रहकर बोले कि आपको क्या करना है?

कोर्ट के फैसले पर मैंने उनकी टिप्पणी ली तो उन्होंने कहा कि यह बहुत अच्छा हुआ है क्योंकि एक निर्दोष (अंकित शर्मा) की हत्या हुई थी और इनको (ताहिर हुसैन सहित सभी दोषियों को) तभी फाँसी की सजा हो जानी चाहिए थी। वह आगे दंगों के बारे में बताते हैं, “उस समय बुजुर्ग होने के कारण हम तो घर से बाहर नहीं निकले लेकिन यहाँ जितने भी मुसलमान हैं, वो इधर आ रहे थे, बहुत भयानक मंजर था। माहौल इतना खतरनाक था कि यहाँ लोगों को अपनी जान बचाना मुश्किल हो रहा था। वह तो अच्छा हुआ कि दूसरी तरफ से गुर्जर समाज के बड़ी संख्या में लोग आ गए। तब जाकर वह लोग भागे। वरना पता नहीं उस घटना में कितने लोग मारे जाते।”

अंकित शर्मा के घर में 5 वर्ष से रह रहे किराएदार

बातचीत के बाद हम एक संकरी सी गली में प्रवेश करते हुए आगे बढ़ गए। हम अंकित शर्मा के मकान वाली गली में पहुँच गए। दरवाजे के अंदर घर में पोंछा लगा रही एक महिला से हमने अंकित शर्मा के घर के बारे में पूछा तो उन्होंने बिना बोले इशारा करते हुए बगल में उनके घर के बारे में बता दिया। इससे पहले कि हम और कुछ पूछते उन्होंने अपने घर का दरवाजा बंद कर लिया। इसके बाद हमने आगे बढ़कर देखा तो नजर आया कि अंकित शर्मा के घर का दरवाजा बंद है। हमने एक शख्स ने ताहिर हुसैन को दोषी ठहराए जाने को लेकर बात करने की कोशिश की लेकिन वो शांत ही रहे।

हमने घंटी बजाई और अंकित शर्मा के घर से एक बच्चा व एक महिला सामने आए लेकिन महिला ने कैमरा देखते ही अपना चेहरा गेट के पीछे छिपा लिया और हमसे किसी भी तरह की बातचीत करने से मना कर दिया। हमारे पूछने पर उन्होंने सिर्फ इतना कहा कि अंकित का परिवार अब यहाँ नहीं रहता और हम करीब 5 सालों से किराएदार के रूप में यहाँ रह रहे हैं।

‘अब मुसलमानों से उठ गया भरोसा, नहीं करते दोस्ती’

इस बीच गली से गुजर रहीं राजवती नाम की एक महिला से हमारी मुलाकात हुई। तो हमने उनसे दंगों के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि दंगों के समय में यहीं अपने घर पर ही थी। हमारा घर ताहिर हुसैन के ठीक पीछे है। उन्होंने हमें बताया, “ताहिर की छत से आग (पेट्रोल बम) फेंकी जा रही थी। नीचे गाड़ियाँ जल रहीं थीं। हमें डर था कि अगर हमारे घर (घनी आबादी) की तरफ अगर आग फेंकी गई तो सब कुछ बर्बाद हो जाएगा। मुसलमान इकट्ठा होकर ईंट-पत्थर बरसा रहे थे। दंगाइयों की भीड़ इतना थी कि हिंदू चाहकर भी कुछ नहीं कर पा रहे थे।”

अंकित शर्मा के बारे में राजवती कहती हैं कि वह हमारा ही पड़ोसी था। तभी ड्यूटी से आया था और फिर घर पर बैग रख वापस चला गया। वो बताती हैं, “उसने माँ के कहने पर चाय भी नहीं पी थी। तभी उसे बड़ी बिल्डिंग के सामने मुसलमान की भीड़ ने घर लिया और फिर वह कभी वापस घर नहीं लौटा। इसके घर हमारा खूब आना-जाना था। वह बहुत अच्छा लड़का था।”

राजवती आगे कहती हैं कि उन दंगों के बाद से इलाके के लोगों में इतना डर है कि लोग अपने मकान और दुकान बेचकर जा रहे हैं। अब सामने रोड पार वाला इलाका पूरा मुस्लिम हो चुका है।

उन्होंने आगे कहा, “यह लोग कसाई हैं और घरों में बकरा काटता हैं तो ऐसे ही उनके बच्चे हो जाते हैं। इसीलिए ये लोग सबसे पहले अपने दोस्त को ही मार देते हैं और हिंदुओं में हमसे कोई अनजाने में जीव जंतु की हत्या हो जाती है तो हम (हिंदू) उसके लिए एकादशी का व्रत रखते हैं। मुसलमानों से दोस्ती करना बिल्कुल ठीक नहीं है। मैं खुद और अपने बच्चों को भी इनसे दूर रखती हूँ। इनके अंदर इंसानियत नहीं है और ये लोग अब भरोसे के लायक नहीं है।”  

ताहिर हुसैन दोषी उसने ही कराए दंगे: विष्णु शर्मा

उसी गली में रहने वाले विष्णु शर्मा कोर्ट के फैसले कहते हैं कि ताहिर हुसैन दोषी है उसने ही दंगे कराए थे। वे बताते हैं, “उस समय बहुत बुरा हाल था। यहाँ पेट्रोल बम फेंके जा रहे थे और हमारे भाई अंकित शर्मा को घर के अंदर ले जाकर मार दिया था और फिर नाले में फेंक दिया था। वह बहुत अच्छे इंसान थे। भगवान का शुक्र है कि हम उस घटना में जिंदा बच गए। उस समय हमने मौत को बेहद करीब से देखा था।”  

इसके बाद हम उस नाले तक भी पहुँचे, जिसमें अंकित शर्मा का शव मिला था लेकिन आज भी वह नाला गंदगी से भरा हुआ है। रोड पार मूँगा नगर में रहने वाले एक व्यक्ति ने कहा कि हम ताहिर हुसैन को लेकर कुछ नहीं कह सकते। अंकित शर्मा के बारे में भी हमें बाद में पता चला था लेकिन उन दंगों में ऐसे न जाने कितने अंकित शर्मा मारे गए थे। कहने के लिए 56 लोग मारे गए लेकिन यहाँ सैकड़ों लोग मारे गए थे।

सीता निवास, श्रीराम निवास, मुन्नी निवास में अब रह रहे अब्दुल और सलीम

कोर्ट के फैसले पर माथे पर तिलक लगाए एक अन्य युवक ने कहा कि ताहिर हुसैन ने जो किया है वह उसे भुगतना पड़ेगा। हैरानी मुझे इस बात की है कि ताहिर हुसैन को दोषी बताने में कोर्ट को 6 वर्ष क्यों लग गए। युवक ने कहा, “उस घटना के बाद इलाके में डर का माहौल इस तरह है कि आज भी मकानों पर नेम प्लेट तो सीता निवास, श्रीराम निवास, मुन्नी निवास लिखा हुआ है लेकिन उसमें रहने वाला अब कोई अब्दुल या सलीम ही है। जब से दिल्ली में भाजपा की सरकार आई है तब से यहाँ सुरक्षा का माहौल है लेकिन हिंदुओं का पलायन बंद नहीं है।”

ताहिर हुसैन के घर के सामने गुटखा-सिगरेट की छोटी सी दुकान लगाने वाली सरस्वती कहती हैं कि वह 15 साल से यह दुकान लगा रही हैं और घटना वाले दिन वह दुकान पर ही थी। वह बताती हैं, “अचानक से ईंट-पत्थर बरसने शुरू हो गए। चार नंबर गली से इसकी शुरुआत हुई थी। हम कैसे भी अपनी जान बचाकर भागे लेकिन बाद में पता चला कि हमारी भी दुकान को जला दिया गया है।”

वह ताहिर हुसैन के घर की ओर इशारा करते हुए कहती हैं कि दंगाइयों ने अंकित शर्मा को इसी मकान में खींचकर मारा था। उन्होंने कहा, “वह हमारी दुकान पर आता था। वह इतना सुंदर था कि उसका चेहरा आज भी मेरी नजर से नहीं हटता है।”

जिस मंदिर पर चढ़े थे दंगाई उसके पुजारी ने बात करने से किया इंकार

इसके बाद हम ताहिर हुसैन के सामने वाली उस गली में मौजूद शिव मंदिर पर पहुँचे जिसे दंगाइयों ने अपना निशाना बनाया था। वहाँ मौजूद मंदिर के पुजारी ने हमसे कैमरे पर बातचीत करने से मना कर दिया। इसके बाद वहाँ मौजूद वीरेंद्र शर्मा नाम के शख्स ने बताया कि उनका मकान मंदिर के बगल में है और दंगे वाले दिन यहाँ बहुत भयानक मंजर था। उन्होंने कहा, “मैंने मौतें होते देखीं, खून देखा, गोलियाँ चलते  देखीं, पेट्रोल बम चलते देखे। चार दिन तक गली में लाइट नहीं आई थी।”

उस भयावह मंजर को याद कर वे आगे बताते हैं, “हमें खाना तक नसीब नहीं हुआ था। हर दिन दोपहर 2 बजे के बाद दंगा शुरू होता था क्योंकि मस्जिद से नमाज पढ़ने का बाद बड़ी संख्या में लोग निकलते थे। मेरी दो गाड़ियों को लगा दी गई थी, दंगाई मंदिर की छत पर चढ़ गए थे। मैंने अपने परिवार को बचाने के लिए उन्हें रातों-रात रिश्तेदार के यहाँ भेज दिया। उस घटना से आज भी लोग इतने डरे हुए हैं कि अपना मकान बेचकर यहाँ से पलायन कर रहे हैं।”

बहरहाल, दिल्ली के चाँद बाग इलाके में हुए हिंदू विरोधी दंगों का खौफ आज भी हिंदुओं के दिमाग में बैठा हुआ है। इस बात का अंदाजा आप ऐसे लगा सकते हैं कि यहाँ से न सिर्फ हिंदू पलायन कर रहे हैं बल्कि यहाँ रहने वाला हिंदू आज भी ताहिर हुसैन के बारे में कैमरे पर खुलकर बोलने के लिए तैयार नहीं है लेकिन ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान मेरे मन में एक सवाल बार-बार उठा। वह ये कि जिस ताहिर हुसैन की बहु-मंजिला इमारत को मैंने 6 वर्ष पूर्व दंगाइयों के केंद्र में देखा था।

वह इमारत ताहिर हुसैन के दोषी घोषित होने के बाद आज भी न सिर्फ खड़ी हुई है बल्कि उसमे कई छोटी मोटी फैक्ट्रियाँ संचालित होने के साथ ही उसमें कई लोग किराएदार रहते हैं। जबकि हमने इसके उलट यूपी में दंगाइयों की संपत्ति को बुलडोज होते देखा है और यह भी देखा है कि यूपी पुलिस कैसे दंगाइयों को घुटनों पर लाती है। यह हम सबने देखा है।

अचानक लंबी दाढ़ी, नकाब और अरबी शब्द… गुजरात में ‘कट्टरपंथियों’ को पहचानने के लिए बने नियम: ‘The Wire’ बिलबिलाया, जानिए ARC की गाइडलाइंस पर क्यों रो रहे वामपंथी

गुजरात सरकार ने कट्टरपंथ पर लगाम लगाने के लिए बड़ी कार्रवाई की शुरुआत कर दी है। सरकार ने अपने एंटी-रेडिकलाइजेशन सेल (ARC) को औपचारिक रूप से लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाया है। गुजरात स्टेट पुलिस सर्विस (SPS) ने राज्य के सभी जिला और पुलिस कमिश्नरेट कार्यालयों को विस्तृत स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) भेजी है।

14 जुलाई 2026 को गाँधीनगर स्थित स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो की ओर से जारी इस पत्र पर DCI (C) प्रफुल वाणिया के हस्ताक्षर हैं और इसे सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी के बाद राज्यभर की पुलिस इकाइयों को लागू करने के लिए भेजा गया।

जिला पुलिस अधीक्षकों और वरिष्ठ रेंज अधिकारियों को भेजे गए इस परिपत्र में कहा गया है कि नवगठित एंटी-रेडिकलाइजेशन सेल स्थानीय पुलिस इकाइयों, जेल प्रशासन, स्पेशल ऑपरेशंस ग्रुप (SOG) और स्टेट इंटेलिजेंस ब्यूरो के अधिकारियों के साथ समन्वय करके काम करेगा।

SOP के साथ राज्य सरकार ने मासिक रिपोर्ट का प्रारूप भी जारी किया है, जिसे जिला इकाइयों को हर महीने की 5 तारीख तक इंटेलिजेंस मुख्यालय को भेजना होगा।

यह कदम गुजरात गृह विभाग द्वारा 2026-27 सेवा वर्ष के तहत एंटी-रेडिकलाइजेशन सेल के ढाँचे के लिए जिला और पुलिस कमिश्नरेट कार्यालयों में 100 से अधिक नए पदों को मंजूरी दिए जाने के कुछ महीनों बाद उठाया गया है।

गुजरात सरकार ने तैयार किया एंटी-रेडिकलाइजेशन का अलग ढाँचा

आधिकारिक पत्र के अनुसार, गुजरात गृह विभाग ने राज्यभर में एंटी-रेडिकलाइजेशन सेल (ARC) का नेटवर्क स्थापित करने के लिए विभिन्न संवर्गों में 136 नए पदों के सृजन को मंजूरी दी है। इन पदों पर भर्ती और तैनाती की प्रक्रिया फिलहाल जारी है।

ARC का उद्देश्य कट्टरपंथी विचारधाराओं के प्रसार को रोकना, कट्टरपंथ की ओर बढ़ रहे लोगों की पहचान करना, उनकी काउंसलिंग और डी-रेडिकलाइजेशन की प्रक्रिया चलाना, उनके पुनर्वास में मदद करना और यह सुनिश्चित करना है कि वे दोबारा किसी कट्टरपंथी नेटवर्क से न जुड़ें।

SOP में ‘कट्टरपंथी व्यक्ति’ की परिभाषा ऐसे व्यक्ति के रूप में दी गई है, जो उग्रवादी विचारधाराओं से प्रभावित होकर राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल हो, देश की एकता और अखंडता को नुकसान पहुँचाने की कोशिश करे, लोगों के बीच भय फैलाए या दूसरों को भी कट्टरपंथी विचारधारा अपनाने के लिए प्रभावित करे।

दस्तावेज में ऐसे लोगों का भी उल्लेख किया गया है, जो अन्य धर्मों के अनुयायियों के प्रति शत्रुता फैलाने या यह प्रचार करने का प्रयास करते हैं कि केवल उनका मजहब ही सही है और बाकी सभी गलत हैं। अधिकारियों का कहना है कि यह व्यवस्था जिला पुलिस अधिकारियों को एक संगठित ढाँचा उपलब्ध कराने के लिए बनाई गई है।

ताकि वे कट्टरपंथ के शुरुआती संकेतों की समय रहते पहचान कर सकें और किसी व्यक्ति के आपराधिक या आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने से पहले आवश्यक हस्तक्षेप कर सकें।

कट्टरपंथ से निपटने के लिए 5 चरणों का मॉडल: रोकथाम, पहचान, हस्तक्षेप, पुनर्वास और निगरानी

SOP में कट्टरपंथ से निपटने के लिए पाँच चरणों वाला मॉडल तय किया गया है। इसका पहला चरण ‘रोकथाम (Prevention)’ है, जिसका उद्देश्य ऑनलाइन माध्यमों की निगरानी करना और कट्टरपंथी प्रचार के प्रसार को रोकना है। इसके तहत पुलिस इकाइयों को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन फोरम, मैसेजिंग एप्लिकेशन और उन संदिग्ध नेटवर्कों पर नजर रखने के निर्देश दिए गए हैं, जहाँ कट्टरपंथी सामग्री का प्रसार किया जा सकता है।

दस्तावेज में विशेष रूप से कट्टरपंथी प्रचारकों, सांप्रदायिक संगठनों, कट्टरपंथ से प्रभावित कैदियों और उग्रवादी विचारधारा से जुड़े लोगों पर निगरानी रखने की बात कही गई है। इसमें सलफी और वहाबी विचारधारा से जुड़े ऐसे प्रभावशाली लोगों (इन्फ्लुएंसर्स) पर भी नजर रखने का उल्लेख है, जिनका इस्तेमाल जाँच एजेंसियों के अनुसार कट्टरपंथी नेटवर्क नए लोगों की भर्ती के लिए कर सकते हैं।

जिला इकाइयों को संवेदनशील क्षेत्रों में अपने खुफिया स्रोत विकसित करने और संभावित खतरों की शुरुआती स्तर पर पहचान के लिए स्थानीय समुदायों के साथ लगातार संपर्क बनाए रखने के भी निर्देश दिए गए हैं। SOP का दूसरा चरण ‘पहचान (Detection)’ है।

इसमें ऐसे व्यवहारिक, वित्तीय और डिजिटल संकेतों का उल्लेख किया गया है, जिन्हें अधिकारियों को किसी व्यक्ति के कट्टरपंथ की ओर बढ़ने के संभावित मामलों की पहचान करते समय ध्यान में रखना होगा।

SOP में बताए गए व्यवहार संबंधी संकेतों में अचानक दाढ़ी बढ़ाना, नकाब पहनना, बातचीत में बार-बार अरबी शब्दों का इस्तेमाल करना, दोस्तों और परिवार से संपर्क कम कर देना, मुस्लिम समुदाय से जुड़े वैश्विक घटनाक्रमों पर तीव्र विरोध जताना, आतंकवादियों का महिमामंडन करना या संघर्ष प्रभावित विदेशी क्षेत्रों की यात्रा के बाद व्यवहार में बदलाव दिखाई देना शामिल है।

दस्तावेज में कुछ ऐसी संदिग्ध गतिविधियों का भी उल्लेख किया गया है, जिन पर अन्य खुफिया सूचनाओं के साथ मिलाकर विशेष निगरानी रखने की आवश्यकता हो सकती है। इनमें अमोनियम नाइट्रेट या पोटैशियम नाइट्रेट जैसे विस्फोटक बनाने में इस्तेमाल होने वाले रसायनों की खरीद, सुनसान स्थानों पर बिना स्पष्ट कारण बार-बार जाना, संघर्षग्रस्त या आतंकवाद प्रभावित क्षेत्रों में मौजूद लोगों से लगातार संपर्क में रहना और असामान्य रूप से बड़ी नकद निकासी करना शामिल है।

डिजिटल स्तर पर SOP में अधिकारियों को एन्क्रिप्टेड संचार प्लेटफॉर्म के इस्तेमाल, कट्टरपंथी ऑनलाइन समूहों में भागीदारी, उग्रवादी प्रचार सामग्री के प्रसार और ऐसे लोगों द्वारा बिना किसी स्पष्ट आय स्रोत के क्रिप्टोकरेंसी के असामान्य इस्तेमाल पर निगरानी रखने के निर्देश दिए गए हैं।

एंटी-रेडिकलाइजेशन सेल (ARC) को कट्टरपंथी तत्वों का रिकॉर्ड तैयार करने, चिन्हित व्यक्तियों की अलग डोजियर (विस्तृत फाइल) बनाने, उन्हें हर महीने अपडेट करने और ऐसे व्यक्तियों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों का रिकॉर्ड सुरक्षित रखने के भी निर्देश दिए गए हैं।

काउंसलिंग और मुख्यधारा में वापसी पर भी जोर

आतंकवाद से निपटने के केवल दंडात्मक उपायों के बजाय गुजरात एंटी-रेडिकलाइजेशन सेल (ARC) की SOP में काउंसलिंग और पुनर्वास पर भी विशेष जोर दिया गया है।

‘हस्तक्षेप (Intervention)’ चरण के तहत जिला प्रशासन को ऐसे प्रभावशाली सामुदायिक नेताओं, मजहबी विशेषज्ञों, मनोवैज्ञानिकों, शिक्षकों, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और गैर-सरकारी संगठनों (NGO) की पहचान करने के निर्देश दिए गए हैं, जो डी-रेडिकलाइजेशन की प्रक्रिया में सहयोग कर सकें।

SOP में परिवार के सदस्यों, मजहबी विशेषज्ञों, मनोचिकित्सकों और विभाग के प्रशिक्षित कर्मियों की मौजूदगी में काउंसलिंग सत्र आयोजित करने की सिफारिश की गई है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया है कि काउंसलिंग से गुजर रहे व्यक्तियों की पहचान पूरी तरह गोपनीय रखी जाएगी।

अधिकारियों को ऐसे लोगों को दोबारा शिक्षा या रोजगार से जोड़ने में मदद करने और हस्तक्षेप की प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी उनके साथ नियमित संपर्क बनाए रखने के निर्देश दिए गए हैं। हालाँकि दस्तावेज में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि काउंसलिंग और अन्य प्रयासों के बावजूद कोई व्यक्ति अपराध करता है या उसकी तैयारी करता है, तो उसके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के संबंधित प्रावधानों के तहत कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

इस ढाँचे का चौथा चरण पुनर्वास और समाज की मुख्यधारा में दोबारा शामिल करने पर केंद्रित है। इसके तहत सेमिनार, सामुदायिक पुलिसिंग कार्यक्रम, खेल प्रतियोगिताएं, कौशल विकास पहल और रोजगार मेलों जैसी गतिविधियों के माध्यम से लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने की बात कही गई है।

अंतिम चरण में डी-रेडिकलाइजेशन कार्यक्रम से गुजर चुके लोगों की लंबे समय तक निगरानी करने का प्रावधान है, ताकि वे दोबारा कट्टरपंथ की ओर न लौटें। इसके लिए शुरुआत में उनकी गतिविधियों की मासिक रिपोर्ट तैयार की जाएगी और उसके बाद समय-समय पर उनकी निगरानी जारी रखी जाएगी।

जिला ARC इकाइयों के लिए मंथली रिपोर्टिंग व्यवस्था लागू

SOP के तहत जिला स्तर की एंटी-रेडिकलाइजेशन सेल (ARC) इकाइयों के लिए विस्तृत मासिक रिपोर्टिंग व्यवस्था भी लागू की गई है। अब पुलिस अधिकारियों को हर महीने आयोजित किए गए काउंसलिंग सत्रों, डी-रेडिकलाइजेशन कार्यक्रम से गुजर रहे लोगों की संख्या, महीने के दौरान खोले गए नए डोजियर, कट्टरपंथी तत्वों के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों, आयोजित सेमिनारों और जागरूकता कार्यक्रमों तथा शैक्षणिक और मजहबी संस्थानों में आयोजित व्याख्यान सत्रों की जानकारी देनी होगी।

जिला इकाइयों को सोशल मीडिया पर कट्टरपंथी विचारों का मुकाबला करने के लिए किए गए हस्तक्षेपों, ऑनलाइन पहचानी गई आपत्तिजनक सामग्री और उसके खिलाफ की गई कार्रवाई का विवरण भी अपनी मासिक रिपोर्ट में शामिल करने के निर्देश दिए गए हैं।

SOP पर ‘द वायर’ ने जताई आपत्ति, मुस्लिमों को निशाना बनाने का लगाया आरोप

SOP की जानकारी सोशल मीडिया पर सामने आने के कुछ ही समय बाद वामपंथी पोर्टल द वायर ने इस पर तीखी आलोचना करते हुए एक रिपोर्ट प्रकाशित की। “For Gujarat Police, Beard, Niqab Make ‘Radicalisation’ Checklist, Cow Vigilantism Doesn’t” शीर्षक वाली इस रिपोर्ट में दावा किया गया कि यह ढाँचा मुख्य रूप से इस्लामी कट्टरपंथ पर केंद्रित है, जबकि अन्य प्रकार के उग्रवाद पर इसमें कोई चर्चा नहीं की गई है।

रिपोर्ट में कहा गया कि SOP में बताए गए कुछ संकेत, जैसे दाढ़ी रखना, नकाब पहनना, बार-बार अरबी शब्दों का इस्तेमाल करना या एतिकाफ (Itikaf) जैसी मजहबी प्रथाओं का पालन करना, आम मुस्लिमों को भी संदेह की नजर से देखने का कारण बन सकते हैं।

सूरत निवासी फिरोज खान के हवाले से ‘द वायर’ ने लिखा, “क्या हमें अपनी दाढ़ी मुंडवा लेनी चाहिए और मुस्लिम पैदा होने की सजा खुद को देनी चाहिए?” प्रकाशन ने यह भी दावा किया कि SOP में मजहबी पहचान और सुरक्षा संबंधी चिंताओं को एक साथ जोड़ दिया गया है।

रिपोर्ट में यह सवाल भी उठाया गया कि दस्तावेज में अफगानिस्तान या मध्य-पूर्व की यात्रा, सिग्नल (Signal) और एलिमेंट (Element) जैसे एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग ऐप्स के इस्तेमाल तथा कुछ मजहबी संस्थानों या विद्वानों से संपर्क का विशेष रूप से उल्लेख क्यों किया गया है।

रिपोर्ट में SOP के उस निर्देश की भी आलोचना की गई, जिसमें पुलिस अधिकारियों से मदरसा शिक्षकों का रिकॉर्ड रखने और यह पता लगाने को कहा गया है कि उनका किसी उग्रवादी संगठन से संबंध है या नहीं।

द वायर के अनुसार, यह SOP ‘आम मुस्लिमों को दंडित करने के उद्देश्य से तैयार की गई प्रतीत होती है’ और इसमें उस प्रकार के संकेत शामिल नहीं किए गए हैं, जिन्हें उसने ‘हिंदू कट्टरपंथ’ या देश के विभिन्न हिस्सों में वर्षों के दौरान हुई गौरक्षा के नाम पर हिंसा से जोड़कर देखा।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि गुजरात के पत्रकार साहिल कुरैशी ने दावा किया है कि SOP से संबंधित उनकी सोशल मीडिया पोस्ट वायरल होने के बाद पुलिस अधिकारियों ने उन्हें चेतावनी दी। रिपोर्ट के अनुसार, उनका आरोप है कि अधिकारियों ने उनसे पोस्ट हटाने के लिए कहा, क्योंकि इससे राज्य में सांप्रदायिक सौहार्द प्रभावित हो सकता है।

पहले से चल रही थी एंटी-रेडिकलाइजेशन सेल की तैयारी

भले ही गुजरात में एंटी-रेडिकलाइजेशन सेल (ARC) का औपचारिक गठन हाल ही में हुआ है, लेकिन इसकी अवधारणा नई नहीं है। समर्पित डी-रेडिकलाइजेशन तंत्र की अवधारणा को राष्ट्रीय स्तर पर पहली बार 2015 में गुजरात के रण ऑफ कच्छ में आयोजित पुलिस महानिदेशकों (DGP) और पुलिस महानिरीक्षकों (IGP) के सम्मेलन के दौरान प्रमुखता मिली थी।

उस बैठक में तेलंगाना पुलिस के डी-रेडिकलाइजेशन मॉडल पर चर्चा हुई थी और इसे अन्य राज्यों के लिए संभावित मॉडल के रूप में देखा गया था। इसके बाद वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के अन्य सम्मेलनों में भी यह मुद्दा उठा, जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी शामिल हुए थे।

बाद में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने गुजरात विधानसभा चुनाव के अपने घोषणापत्र में एंटी-रेडिकलाइजेशन सेल की स्थापना का वादा किया और इसे लागू करने की दिशा में तैयारियाँ शुरू कीं। इसके लिए पुलिस अधिकारियों, आतंकवाद-रोधी विशेषज्ञों और शिक्षाविदों की एक टास्क फोर्स भी गठित किए जाने की जानकारी सामने आई, जिसे इस विषय का अध्ययन कर संस्थागत ढाँचा तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।

इस वर्ष की शुरुआत में प्रशासनिक मंजूरी और बजटीय आवंटन मिलने के बाद एंटी-रेडिकलाइजेशन सेल के ढाँचे को औपचारिक रूप से लागू किया गया। इसके बाद जिला इकाइयों को SOP जारी कर दी गई।

क्या है इस SOP का उद्देश्य?

SOP जारी होने और एंटी-रेडिकलाइजेशन सेल (ARC) के लिए अलग से पद सृजित किए जाने के साथ गुजरात उन चुनिंदा राज्यों में शामिल हो गया है, जिन्होंने खुफिया जानकारी जुटाने, काउंसलिंग, पुनर्वास और दीर्घकालिक निगरानी को एक ही व्यवस्था के तहत जोड़ने वाला राज्यव्यापी एंटी-रेडिकलाइजेशन ढाँचा तैयार किया है।

हालाँकि वामपंथी पोर्टल द वायर ने आरोप लगाया कि SOP में दिए गए संकेतों का असर असमान रूप से मुस्लिमों पर पड़ता है, लेकिन दस्तावेज में किसी भी विशेष समुदाय को स्वभावतः कट्टरपंथी या विशेष निगरानी के योग्य नहीं बताया गया है।

इसके बजाय ARC का ढाँचा उन व्यक्तियों पर केंद्रित है, जो उग्रवादी विचारधाराओं को अपनाते हैं या उनका प्रचार करते हैं, राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल होते हैं, मजहबी श्रेष्ठता का प्रचार करते हैं, हिंसक लामबंदी करते हैं या दूसरों को कट्टरपंथ की ओर ले जाने का प्रयास करते हैं, चाहे उनकी पहचान कुछ भी हो।

SOP में बताए गए कई व्यवहारिक और डिजिटल संकेत, जैसे आतंकवादियों का महिमामंडन, उग्रवादी संगठनों से संबंध, ऑनलाइन प्रचार नेटवर्क में भागीदारी, उग्रवादी समूहों द्वारा एन्क्रिप्टेड संचार माध्यमों का इस्तेमाल, संघर्षग्रस्त क्षेत्रों से विदेशी संपर्क और कट्टरपंथ के साथ व्यवहार में अचानक बदलाव, पिछले कई वर्षों में भारत और विदेशों की सुरक्षा एजेंसियों द्वारा की गई अनेक आतंकवाद संबंधी जाँचों और डी-रेडिकलाइजेशन मामलों में सामने आते रहे हैं।

गुजरात पुलिस की यह SOP ऐसे संकेतों को एक प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली (Early Warning Framework) का हिस्सा बनाती है, ताकि किसी व्यक्ति के उग्रवादी विचारों से आगे बढ़कर आपराधिक गतिविधियों में शामिल होने का इंतजार करने के बजाय पहले ही हस्तक्षेप किया जा सके।

दस्तावेज में गौरक्षा के नाम पर हिंसा या तथाकथित ‘हिंदू कट्टरपंथ’ का उल्लेख न होने को लेकर की गई आलोचना के संबंध में भी यह कहा गया है कि ARC की SOP उसी कट्टरपंथ की परिभाषा के दायरे में काम करती है, जिसे दस्तावेज में निर्धारित किया गया है।

यह ढाँचा संगठित वैचारिक कट्टरपंथ, उग्रवादी भर्ती और उन प्रक्रियाओं की पहचान के लिए तैयार किया गया है, जो आगे चलकर आतंकवाद या राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में बदल सकती हैं। वहीं भीड़ हिंसा, स्वयंभू सतर्कता (विजिलेंटिज्म) या सांप्रदायिक झड़पों से जुड़े अपराध मौजूदा आपराधिक कानूनों और पुलिस व्यवस्था के तहत ही आते हैं, जब तक कि वे ARC की परिभाषा में तय किए गए मानकों पर खरे न उतरें।

(मूल रुप से यह रिपोर्ट अंग्रेजी में प्रकाशित है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।)

गगनयान से पहले ISRO में ‘ब्रेन ड्रेन’… 100+ वैज्ञानिक छोड़ चुके नौकरी, सरकार को बदलने पड़े इस्तीफे के नियम: भारत के स्पेस मिशनों पर संकट तो नहीं आएगा?

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) इस समय एक अभूतपूर्व मानव संसाधन संकट से जूझ रहा है। देश के इस प्रतिष्ठित अंतरिक्ष संस्थान से हाल के महीनों में कई वरिष्ठ और अनुभवी वैज्ञानिकों ने अचानक इस्तीफे दिए हैं या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (VRS) ले ली है।

इस बड़े पलायन को रोकने और देश के महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष मिशनों को समय पर पूरा करने के लिए भारत सरकार के अंतरिक्ष विभाग (DoS) ने एक बेहद सख्त कदम उठाया है।

अंतरिक्ष विभाग ने इसरो के प्रमुख केंद्रों को एक नया आंतरिक निर्देश जारी किया है, जिसके तहत अब ‘गगनयान’ जैसे महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स से जुड़े वैज्ञानिकों के इस्तीफे या VRS को सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत आसानी से स्वीकार नहीं किया जाएगा।

नया सरकारी निर्देश: अब आसानी से नहीं मिलेगा इस्तीफा

अंतरिक्ष विभाग (DoS) द्वारा 14 जुलाई को जारी किए गए आधिकारिक ज्ञापन के अनुसार, गगनयान और अन्य राष्ट्रीय महत्व के मिशनों से जुड़े ग्रुप A के वैज्ञानिक और तकनीकी कर्मियों के इस्तीफे और VRS के अनुरोधों को अब रूटीन तरीके से स्वीकार नहीं किया जाएगा।

इस नए आदेश के जरिए सरकार ने साल 2020 में किए गए एक बड़े प्रशासनिक बदलाव को पलट दिया है। पहले के नियमों के अनुसार, इसरो के विभिन्न केंद्रों के निदेशकों को यह अधिकार दिया गया था कि वे ‘साइंटिस्ट/इंजीनियर-SG’ स्तर तक के ग्रुप A कर्मचारियों के इस्तीफे और स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति को अपने स्तर पर ही मंजूरी दे सकते थे।

अब इस व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया गया है और केंद्र निदेशकों से यह शक्ति वापस ले ली गई है। नए नियमों के तहत किसी भी वैज्ञानिक का इस्तीफा या VRS का आवेदन सीधे अंतरिक्ष विभाग (DoS) को भेजा जाएगा, जिसके साथ संबंधित केंद्र के निदेशक को अपनी स्पष्ट सिफारिश भी लिखकर भेजनी होगी और इस पर अंतिम निर्णय केवल अंतरिक्ष विभाग के स्तर पर ही लिया जाएगा। इस फैसले का मुख्य उद्देश्य महत्वपूर्ण मिशनों की निरंतरता को बनाए रखना और अनुभवी प्रतिभाओं को अचानक संगठन छोड़ने से रोकना है।

कौन-कौन से प्रमुख केंद्र और वैज्ञानिक हुए प्रभावित?

हाल के महीनों में इसरो के कई महत्वपूर्ण केंद्रों से करीब 100 से 120 वैज्ञानिकों और इंजीनियरों ने अपनी नौकरी छोड़ी है। इस पलायन से सबसे ज्यादा प्रभावित बेंगलुरु स्थित यू आर राव सैटेलाइट सेंटर (URSC) हुआ है।

जहाँ से सबसे अधिक लगभग 80 वैज्ञानिकों ने इस्तीफा दिया है और इनमें ‘स्पेस डॉकिंग एक्सपेरिमेंट’ (SpaDeX) के प्रोजेक्ट डायरेक्टर जैसे बेहद महत्वपूर्ण पदों पर तैनात वैज्ञानिक भी शामिल हैं।

इसके साथ ही तिरुवनंतपुरम के विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (VSSC) से भी लगभग 20 वैज्ञानिकों के जाने की खबर है, जिसमें सबसे बड़ा झटका तब लगा जब वरिष्ठ वैज्ञानिक विक्टर जोसेफ टी ने फरवरी में इस्तीफा दे दिया, जो गगनयान मिशन के लिए इस्तेमाल होने वाले ‘जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल (LVM3)’ प्रोजेक्ट के डायरेक्टर के रूप में काम कर रहे थे।

इन दोनों प्रमुख केंद्रों के अलावा सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र (SDSC), लिक्विड प्रोपल्शन सिस्टम्स सेंटर (LPSC), स्पेस एप्लीकेशन सेंटर (SAC), नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC), इसरो टेलीमेट्री, ट्रैकिंग एंड कमांड नेटवर्क (ISTRAC) और मास्टर कंट्रोल फैसिलिटी (MCF) को भी यह कड़ा निर्देश भेजा गया है क्योंकि इन केंद्रों में भी इस्तीफों का असर देखा गया है।

आखिर क्यों इसरो छोड़ रहे हैं वैज्ञानिक?

हालाँकि अंतरिक्ष विभाग या इसरो ने आधिकारिक तौर पर वैज्ञानिकों के इस तरह सामूहिक रूप से जाने का कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया है, लेकिन इसके पीछे के मुख्य कारणों को भारत के तेजी से बढ़ते निजी अंतरिक्ष क्षेत्र से जोड़कर देखा जा रहा है।

भारत सरकार ने साल 2020 में अंतरिक्ष क्षेत्र को निजी कंपनियों के लिए खोल दिया था और 2023 में ‘इंडियन स्पेस पॉलिसी’ लॉन्च की थी। इसके बाद से देश में अंतरिक्ष स्टार्टअप्स की बाढ़ आ गई है।

वर्तमान में भारत में 400 से अधिक पंजीकृत स्पेस स्टार्टअप्स सक्रिय हैं, जिन्होंने कुल 500 मिलियन डॉलर का भारी-भरकम निवेश आकर्षित किया है, जिसमें से लगभग 150 मिलियन डॉलर का निवेश अकेले साल 2025 में आया है।

पिक्ससेल, ध्रुव स्पेस, स्काईरूट एयरोस्पेस, अग्निकुल कॉस्मॉस और बेलाट्रिक्स एयरोस्पेस जैसी निजी कंपनियाँ इसरो के अनुभवी वैज्ञानिकों को बेहद आकर्षक वेतन पैकेज, बेहतर पद और काम करने की अधिक स्वतंत्रता की पेशकश कर रही हैं, जो वैज्ञानिकों को अपनी ओर खींच रही हैं।

संगठनात्मक चुनौतियाँ

विशेषज्ञों और पूर्व इसरो अधिकारियों का मानना है कि केवल प्रशासनिक कड़ाई या जबरन रोकने से इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता। इसके लिए इसरो के भीतर करियर ग्रोथ, नेतृत्व के अवसर, काम के माहौल और वैज्ञानिकों की प्रेरणा जैसे बुनियादी मुद्दों पर ध्यान देना होगा।

गौरतलब है कि साल 2017 में सामने आई एक RTI रिपोर्ट से खुलासा हुआ था कि 5 वर्षों के भीतर करीब 300 वैज्ञानिक इसरो छोड़ चुके थे, जो यह दर्शाता है कि यह समस्या पुरानी है।

इसरो के हालिया झटके और आगामी चुनौतियाँ

यह मानव संसाधन संकट ऐसे समय में आया है जब इसरो को तकनीकी मोर्चे पर भी कुछ झटकों का सामना करना पड़ा है। इसरो के सबसे भरोसेमंद रॉकेट PSLV को पिछले एक साल में लगातार दो असफलताओं का सामना करना पड़ा है।

इनमें पहली विफलता जनवरी में PSLV-C62 के दौरान हुई, जब EOS-N1 अर्थ-ऑब्जर्वेशन सैटेलाइट और वाणिज्यिक पेलोड ले जा रहा यह रॉकेट तीसरे चरण के अंत में आई गड़बड़ी के कारण अपने तय पथ से भटक गया था।

इससे पहले पिछले साल मई में PSLV-C61 मिशन भी विफल रहा था, जिसमें RISAT-1B (EOS-09) उपग्रह को ले जा रहा रॉकेट तीसरे चरण में अचानक दबाव कम होने के कारण अपनी कक्षा तक नहीं पहुँच सका और मिशन को नष्ट करना पड़ा था।

इन चुनौतियों के बावजूद इसरो आने वाले समय में देश के सबसे बड़े और ऐतिहासिक अंतरिक्ष मिशनों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। इसमें गगनयान मिशन शामिल है, जिसका लक्ष्य भारत को अंतरिक्ष में इंसान भेजने वाला दुनिया का चौथा देश बनाना है।

इसके अलावा चंद्रमा से मिट्टी और पत्थरों के नमूने वापस लाने के लिए चंद्रयान-4, भारत का अपना अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने के लिए भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन (BAS), और मंगल ग्रह के लिए भारत का दूसरा खोजी मिशन मंगलयान-2 जैसे बेहद महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स पर काम चल रहा है।

इसरो प्रमुख और सरकार का रुख

इस सामूहिक इस्तीफे की खबरों पर चिंता को कम करते हुए इसरो के चेयरमैन वी नारायणन ने एक बयान में कहा, “हाँ, कई लोग संगठन छोड़ते हैं, लेकिन यह हर संस्थान का हिस्सा है।

सरकार के इस नए कदम का उद्देश्य केवल लोगों को रोकना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि देश के महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स पर अचानक कोई बुरा असर न पड़े। अगर कोई व्यक्ति जाता भी है, तो उसकी जगह कोई और जिम्मेदारी संभालेगा। हम इस स्थिति को पूरी तरह संभाल रहे हैं।”

वैज्ञानिकों की कमी को दूर करने के लिए सरकार ने इसरो के कार्यबल वर्क्फोर्स को मजबूत करने की प्रक्रिया भी शुरू कर दी है। अधिकारियों के अनुसार, एक कैडर रिव्यू को मंजूरी दे दी गई है और वर्तमान में संगठन में विभिन्न पदों पर लगभग 1050 रिक्तियों को भरने के लिए भर्ती प्रक्रिया तेजी से चल रही है।

अब देखना यह होगा कि सरकार के इन कड़े प्रशासनिक नियमों से वैज्ञानिकों के पलायन पर रोक लगती है या फिर इसरो को अपने टैलेंट को रोकने के लिए अपनी आंतरिक नीतियों में कुछ और बदलाव करने होंगे।

इंग्लैंड का सपना टूटा, अर्जेंटीना का जुनून जीता: जानिए मेस्सी के दो असिस्ट और 7 मिनट में पलटे मैच की पूरी कहानी

प्यारे लियो,

आज से सालों पहले जब तुम्हें बार्सिलोना की, तीस नंबरी, गहरी मरून व नीली धारियों वाली फुल बाजू की जर्सी पहने खेलते हुए देखना शुरू किया था तो पहली दफा यकीन हुआ था कि हां, सचमुच में जादू होता है।

तुम्हारा हर एक टैकल, हर एक गोल मुझे आज भी हूबहू याद है।

एक ही सीजन में छह खिताब।

तुमने क्या कुछ नहीं जीता था बार्सिलोना के साथ।

तुम जब जब भी मैदान में उतरते, विपक्षी कोच व खिलाड़ी कांपने लगते और स्टेडियम में मौजूद दर्शक खुशी से झूमने लगते। तुम खुशियों का पर्यायवाची शब्द ही तो हो गए थे। तुम जब भी खेलने मैदान पर उतरते, सब अपने अपने काम छोड़ बस तुम्हें ही खेलते हुए देखते रहते। जाने वो कैसा जादू था तुम्हारे खेल में। तुम्हें खेलते हुए देख कर हम, कुछ पलों के लिए ही सही, अपने तमाम दुख-दर्द भूल जाते थे।

लेकिन फिर, वो जर्मनी के खिलाफ 2014 विश्व कप के फाइनल में मिली हार। पूरे टूर्नामेंट में अकेले ही तुमने टीम की ज़िम्मेदारियों का बोझ ढोया था।

कितना नैराश्य, कितना दुख छा गया था उस एक हार के पश्चात।

लेकिन, अभी तो तुम्हें और भी तोड़ा जाना बाकी था। लगातार अर्जेंटीनी जर्सी पहने कोपा अमेरिका का कप हारते चले जाना। और, बार्सिलोना का वह काला अतीत। रोमा और ऐन्फील्ड की वो उदास रातें। एक ऐसा शख्स जो सब जीत चुका था, उससे सबकुछ छिनता चला जा रहा था।

तुम्हारी नैनों में अश्रु थे। लेकिन संपूर्ण जगत तुम पर हंसने लगा था। शायद यह कुछ ऐसा था कि खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे।

मगर, कहते हैं ना कि हर रात के बाद सूर्य तो उदित होता ही है। सूर्य को उदित होना ही था।

पहले लगातार कोपा अमेरिका की जीतें।

और फिर, कतर विश्व कप का वह फाइनल मुकाबला। फ्रांस बनाम अर्जेंटीना।

आखिरकार, ऊपर बैठे फुटबॉल के खुदा ने जैसे, उस रात, अपनी सबसे बेहतरीन अधूरी कविता पूरी कर ली हो।

तुम विश्व विजेता बन गए थे लियो। तुमने जग जीत लिया था।

अब इससे आगे भला क्या ही होता।

मगर नहीं, बीती रात, तुमने अर्जेंटीना को एकबार फिर विश्व कप के फाइनल में पहुंचा दिया है।

आज भी, अकेले ही तुम खेल को नियंत्रित करते हो।

जब जब गेंद तुम्हारे कदमों को चूमती है, तो मानो कुछ जादुई घटित हो रहा होता है। लोग सब कामकाज छोड़कर बस तुम्हें खेलते हुए देखते रहते हैं।

कुछ भी तो नहीं बदला।

लेकिन, एक रोज ऐसा भी होगा कि वाकई तुम इस खेल को अलविदा कह दोगे। तब, सालों पहले, जो नैराश्य तुमने देखा था, वही कुछ हमारे दिलों पर बीतेगी। तुम जिस दिन मैदान छोड़ोगे, उस रोज़ करोड़ों दिलों को धक्का सा लगेगा। हम सभी हताश हो जाएंगे।

मगर, उससे पहले एक बात है जो तुमसे कहनी है लियो।

शुक्रिया, इस खेल को चुनने के लिए। गोल स्कोर करने वाले कई खिलाड़ी आगे भी आएंगे, मगर, फिर कभी कोई दूसरा लियोनेल आंद्रेस मेस्सी नहीं आएगा। तुम्हारे जाने के साथ तमाम रोशनियां धूमिल हो उठेंगी।

तुमने हमें खुशियां दी।

तुमने हमें सिखलाया – अंतिम क्षणों तक लड़ना।

तुम थे तो इस खेल में जादू था। तुम चले जाओगे तो शायद तुम्हारे साथ इस खेल का जादू भी चला जाएगा।

शुक्रिया लियो, हमारी आम ज़िंदगियों में जादू भरने के लिए।

बीती रात, अर्जेंटीना ने फीफा विश्व कप के दूसरे सेमीफाइनल मुकाबले में इंग्लैंड को 2-1 से हरा कर फाइनल में जगह बना ली। खबर बस इतनी सी है। मगर, इस एक जीत पर, आप एक पूरी थीसीस लिख सकते हैं।

कल रात हम सभी खेलप्रेमियों ने कुछ जादुई घटित होता देखा।

बीती रात, साढ़े बारह बजे से, अटलांटा स्टेडियम में फीफा विश्व कप का दूसरा सेमीफाइनल मुकाबला खेला जाना था। एक तरफ थी अर्जेंटीना, जो स्विट्जरलैंड को हराकर यहां पहुंची थी। वहीं दूसरी ओर थी, बेहतरीन फॉर्म में चल रही इंग्लैंड। अर्जेंटीना इस विश्व कप में अपना नैसर्गिक खेल खेलती नजर नहीं आई है। मगर, फिर भी, हमेशा अंत तक लड़ने का हौसला लिए वो यहां तक पहुंच चुकी थी। ‘थ्री लायन्स’ एक संतुलित टीम लेकर इस टूर्नामेंट में उतरे थे। निश्चित ही यह एक जोरदार मुकाबला रहने वाला था।

मैच से पूर्व इंग्लिश लीजेंड जो कोल ने मीडिया को संबोधित करते हुए कहा था,” मेस्सी पहली दफा इंग्लैंड से टकराने जा रहा है। हम उसे चिर निद्रा में सुला देंगे। निश्चित ही, हम उसे चिर निद्रा में सुला देंगे। सौ प्रतिशत।”

ट्रॉए डीनी ने कहा था,” हम उन्हें धो डालेंगे। हम बेहद आराम से कम से कम 2-0 से यह मैच जीत जाएंगे।”

इंग्लिश खिलाड़ी अपने जीवन का सबसे बड़ा मैच खेलने जा रहे थे। वो 2018 विश्व कप में भी सेमीफाइनल में थे जहां उन्हें क्रोएशियाई टीम से 2-1 से हार कर बाहर होना पड़ा था। वो, आज, एक नया इतिहास लिखना चाहते थे। अर्जेंटीना, पिछली दफा भी, इस चरण से गुजर चुकी थी। मगर, इतने बड़े मौके पर एक अलग ही दबाव होता है।

माहौल बन चुका था। मंच सज गया था।

अल्बीसेलेस्त के कोच लियोनेल स्कालोनी ने आज एक परिवर्तन करते हुए 4-1-3-2 के बजाए 4-4-2 की फॉर्मेशन में अपनी टीम को मैदान में उतारा था। फॉरवर्ड लाइन में इस बड़े मुकाबले में एक बार फिर लियोनेल मेस्सी का साथ देने के लिए हूलियन अल्वारेज़ खड़े थे। उनके पीछे लिआन्द्रो पारेदेस़, एंजो फर्नाडेज़, एलेक्सिस मैकऐलिस्टर व गुईलियानो सिमिओनी की सेना थी। ख़राब फॉर्म से गुजर रहे रॉड्रिगो दी पॉल आज बेंच पर थे। रक्षापंक्ति में एकबार फिर मोलीना, रोमेरो, लीसान्द्रो मार्टीनेज़ व ताग्लियाफीको थे और गोलपोस्ट की रक्षा करने एमिलियानो मार्टिनेज खड़े थे।

गत विजेता अपने पिछले नॉकआउट मुकाबलों में विरोधियों के खिलाफ संघर्ष करते नजर आए थे। आज निश्चित ही उनपर जरूरत से ज्यादा दबाव था, यह साबित करने का कि आखिर क्यों वो पिछले संस्करण के विजेता हैं।

इंग्लैंड के लिए सेंट्रल फॉरवर्ड हेरी केन का साथ देने, उनके ठीक पीछे मॉर्गन रॉजर्स, ज्यूड बेलिंघम व एंथोनी गोर्डन की तेज रफ्तार वाली तिकड़ी थी। डिफेंसिव मिडफील्डर के तौर पर अनुभवी डेक्लन राइस का साथ युवा एलियट एंडरसन दे रहे थे। और, रक्षण की जिम्मेदारी थी जॉन स्टोन्स, मार्क गुएही, रीस जेम्स व जे़ड स्पेन्स के कंधों पर।

रेफरी इस्माइल ऐल्फात व्हिस्ल बजाते हैं। 4-3-2-1 की फॉर्मेशन के साथ मैदान में उतरी इंग्लिश टीम खेल के शुरुआती क्षणों से ही अटैक शुरू कर देती है। अर्जेंटीना भी जरूरी कार्रवाई कर रही थी। दोनों ही टीमें आक्रामक अंदाज में फुटबॉल खेल रही थीं। हांलांकि, खेल काफी फिजिकल हो गया था। लगातार दोनों ही ओर से काफी फाउल्स भी किए जा रहे थे।

मैच के पहले हाफ की समाप्ति पर स्कोर 0-0 से बराबरी पर था। दोनों ही टीमें गोल स्कोर करने में नाकाम रही थीं।

दूसरे हाफ का खेल शुरू होता है। पचपनवें मिनट में कप्तान हैरी केन अपने ही हाफ से एक लॉन्ग बॉल बांई फ्लैंक पर खड़े साथी खिलाड़ी की ओर बढ़ाते हैं। बांई छोर से एक शानदार क्रॉस अर्जेंटीनी गोलपोस्ट की ओर भेजा जाता है। चार से पांच अर्जेंटीनी डिफेंडर बॉक्स के भीतर मौजूद थे। मगर एंथोनी गोर्डन शानदार तरीके से गेंद को गोलपोस्ट के भीतर भेज देते हैं। देर से ही सही, मगर इंग्लैंड ने इस हाई वोल्टेज मुकाबले में आखिरकार बढ़त ले ली थी। स्टेडियम में मौजूद तमाम अर्जेंटीनी समर्थक अथाह दुख के सागर में डूबे चुके थे।

मैच आगे बढ़ता जाता है। पैंसठ मिनट का खेल हो चुका था। बढ़त अब भी इंग्लैंड के पास थी। उनका एक कदम फाइनल में था। कोच थॉमस टुकेल अपने अटैकिंग प्लेयर्स को एक एक कर बाहर बुलाने लगे थे। और, उनकी जगह तीन एक्स्ट्रा डिफेंडर मैदान में उतार दिए गए थे। थॉमस टुकेल अर्जेंटीना के खिलाफ लगभग आधा घंटा डिफेंसिव खेल खेलते हुए 1-0 की बढ़त को बनाए रखना चाहते थे।

लेकिन, उनका यह फैसला अर्जेंटीना को अटैक करने की आजादी दे देता है। कोच लियोनेल स्कालोनी तुरंत नीको गोंजालेज को इंग्लिश डिफेंस को स्ट्रेच करने व लाउतारो मार्टिनेज को मैदान के सेंट्रल इलाके से खतरा पैदा करने उतार देते हैं। रॉड्रिगो डि पॉल भी अंदर आ चुके थे।

लियोनेल मेस्सी वापस मैदान के दाईं छोर पर आ गए थे। वह लगातार विपक्षी गोलपोस्ट की दिशा में क्रॉस डाले जा रहे थे। एक के बाद एक अर्जेंटीनी टीम ने कई हमले करने शुरू कर दिए थे। कभी ऐंजो फर्नानदेज़ बॉक्स के बाहर से किक लगाते कभी मैकएलिस्टर हेडर लगाते। जॉर्डन पिकफॉर्ड लगातार बेहतरीन बचाव किए जा रहे थे। उन्होंने इंग्लैंड को किसी तरह गेम में बनाए रखा था। अचानक ही अर्जेंटीना खतरनाक हमले करती दिख रही थी। इंग्लिश टीम बस रक्षण करती दिख रही थी।

इसका फायदा अल्बीसेलेस्त को मिलता है मैच के पिच्चासीवें मिनट में। कप्तान लियोनेल मेस्सी मैदान की दाईं ओर से ड्रिबल कर आगे बढ़ते हैं और ऐसा अहसास दिलाते हैं कि वह गेंद क्रॉस के जरिए इंग्लैंड के बॉक्स में भेजेंगे। मगर वह गेंद को बढ़ा देते हैं बॉक्स से काफी बाहर खड़े ऐंजो फर्नानदेज़ की दिशा में। ऐंजो फर्नानदेज़ इंग्लिश गोलपोस्ट से लगभग चालीस मीटर की दूरी से पोस्ट की ओर एक जोरदार रॉकेट दागते हैं। इस दफा, इस जानदार किक का, लगातार ही बेहद शानदार बचाव कर रहे जॉर्डन पिकफॉर्ड के पास कोई जवाब नहीं था। स्कोर बराबर हो चुके थे। अल्बीसेलेस्त समर्थकों की खुशी का ठिकाना नहीं था। सारा अटलांटा स्टेडियम उनकी चीख से गूंज उठा था।

नब्बे मिनट का खेल पूर्ण हो चला था। सात मिनट का इंजरी टाइम रेफरी द्वारा दिया गया था। ऐंजो फर्नानदेज़ के गोल के ठीक सात मिनट बाद मेस्सी एक बार फिर बहुत तेज गति से मैदान के दाईं छोर से गेंद लेकर आगे बढ़ते हैं। अपने आगे खड़े दो इंग्लिश खिलाड़ियों को चकमा देकर वह एक सटीक क्रॉस गोलपोस्ट की दिशा में डालते हैं। लाउतारो मार्टिनेज तेज गति से आगे बढ़ते हैं। वह जोरदार हेडर लगाते हैं। पिकफॉर्ड को एक दफा फिर हवा तक नहीं लगती। गेंद जाल में समा चुकी थी। अर्जेंटीना 2-1 से बढ़त ले चुकी थी।

किसी को भी यकीन नहीं हो रहा था कि यह क्या हो गया था। सात मिनट के भीतर दो गोल। लियोनेल मेस्सी के दो असिस्ट। यह वाकई कमाल हो गया था। इंग्लैंड के खिलाफ ऐसा कर पाना लगभग नामुमकिन था। मगर अर्जेंटीना ने आज नामुमकिन को मुमकिन कर दिया था। मैच 2-1 के स्कोर पर समाप्त हो जाता है।

आज अर्जेंटीनी टीम ने इंग्लैंड को हराकर एक दफा फिर विश्व कप के फाइनल में जगह बना ली थी। इस के लिए काफी हद तक इंग्लिश कोच थॉमस टुकेल की अति रक्षात्मक रणनीति भी जिम्मेदार थी। आप आधे घंटे तक अर्जेंटीना को गेंद नहीं सौंप सकते। यह एक हाराकिरी सरीखा था। एक आत्मघाती कदम जो सालों तक उन्हें रातों में सोने न देगा।

अर्जेंटीना के खिलाफ खेलने का पहला कायदा ही यही है कि आपको मेस्सी को आगबबूला नहीं करना है। ज्यूड बेलिंघम का फुटबॉल के सबसे बड़े खिलाड़ी से बद्तमीज़ी से पेश आना उन्हें भारी पड़ गया था। उनतालीस वर्षीय लियोनेल मेस्सी के दो असिस्ट ने सात मिनट के भीतर फाइनल में लगभग पहुंच ही चुकी इंग्लैंड को घर की राह दिखा दी थी। ज्यूड बेलिंघम को शायद समझ आ गया हो कि एक अच्छे और एक महान खिलाड़ी में क्या अंतर होता है।

इंग्लैंड, एकबार फिर, विश्व कप की ट्रॉफी के बेहद करीब आकर भी ट्राफी से बहुत दूर रह गई थी। इक्कीसवीं सदी में दो ही दफा ऐसा हुआ है कि किसी टीम ने सेमीफाइनल में पहला गोल दागते हुए भी फाइनल के लिए क्वालीफाई न किया हो। पहले, सन् 2018 में क्रोएशियाई टीम के खिलाफ इंग्लैंड और आज एक बार फिर इंग्लैंड ही। इंग्लिश खिलाड़ियों का दिल टूट चुका था। यह ऐसा जख्म था जो ताउम्र नहीं भरेगा।

अर्जेंटीना के खिलाड़ियों की आंखों में आंसू थे। एमिलियानो मार्तिनेज़ फफक-फफक कर रो रहे थे। मेस्सी की आंखों में अश्रु थे। जीत दिलाने वाला गोल दागने वाले लाउतारो मार्टिनेज की आंखों में नमी थी। वह रोते-रोते कह रहे थे,” बचपन में पहली बार जब मैंने फुटबॉल बूट्स पहने थे, तब से मैंने अपने राष्ट्र के लिए यह गोल लगाने का ख्वाब देखा है।” सब भावुक हो गए थे। स्टेडियम में मौजूद पचास हजार समर्थकों की आंखें भी नम थीं। अंत तक हार ना मानने का यकीन मन में लिए अर्जेंटीनी खिलाड़ियों ने फिर एक चमत्कार कर दिखाया था। अर्जेंटीना फिर फाइनल में जगह बना चुकी थी। तमाम खिलाड़ी आगे बढ़ कर अपने समर्थकों का अभिवादन स्वीकार कर रहे थे। सभी युवा खिलाड़ी अपने प्रेरणास्रोत, अपने आईडल लियोनेल मेस्सी को हवा में उछाल रहे थे। वह सभी बेहद खुश थे। यह बेहद भावुक करने वाला पल था।

अर्जेंटीना आज से ठीक दो दिन बाद स्पेन के खिलाफ न्यू जर्सी स्टेडियम में विश्व कप का फाइनल मुकाबला खेलने उतरेगी। स्पेन यूरोपीयन चैंपियन है तो अर्जेंटीना विश्व विजेता। यहां एक अप्रेंटिस का सामना अपने माएस्ट्रो से होगा। लामीन यमाल का सामना खुद भगवान से होगा। स्पेन का काव्यात्मक शैली का खेल अर्जेंटीनी दक्षिण अमेरिकी कठोर फुटबॉल से टकराएगा। जिस बार्सिलोना की जड़ों को लियोनेल मेस्सी ने अपनी मेहनत से सींचा उसके आठ खिलाड़ी स्पेन का हिस्सा हैं। यह फाइनल कहीं न कहीं ‘ला मासिया ‘ में पला पोसा है। यह टकराव ऐतिहासिक होगी।

इस मैच में हारे जीते कोई भी, जीत अंततः फुटबॉल की होगी।

यह मैच फुटबॉल जगत के सबसे ज्यादा जगमगाते सितारे का आखिरी मैच भी हो सकता है। हम खेत खलिहानों में बिना फुटबॉल बूट्स और बिना जर्सी पहने फुटबॉल खेलने वाले लड़कों ने वैश्विक मंच पर जिस जमात के खिलाड़ियों को खेलते देख इस खेल से इश्क किया था, उस जमात के अंतिम खिलाड़ी के संभवतः इस आखिरी मुकाबले को हमें तमाम मनमुटाव मिटा कर देखना चाहिए। हमें इस मैच को उनके एक अंतिम जश्न के तौर पर देखना चाहिए।

फाइनल मुकाबले से जुड़ी बातें आगे जारी रहेंगी। बने रहिएगा साथ।

अलविदा।