दिल्ली से सटे गाजियाबाद में एक पत्रकार को ‘सिर-तन-से-जुदा’ की धमकी दिए जाने का एक मामला सामने आया है। पत्रकार का नाम निशांत आजाद है। वे आरएसएस की पत्रिका ‘ऑर्गेनाइजर’ में काम करते हैं। निशांत को यह धमकी व्हाट्सएप पर एक अनजान मैसेज द्वारा दी गई। पत्रकार ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवा दी है। अब पुलिस मामले की जाँच कर रही है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार निशांत के व्हाट्सएप पर किसी अजनबी का धमकी भरा मैसेज आया। धमकी वाले इस मैसेज में लिखा था, “गुस्ताख-ए-नबी की एक ही सजा, सिर तन से जुदा सिर तन से जुदा, इस्लाम के खिलाफ एजेंडे का प्रचार बंद करो।” इस संदेश के साथ धमकी देने वाले ने पत्रकार द्वारा कॉन्ग्रेस के खिलाफ किए गए एक ट्वीट का स्क्रीनशॉट भी भेजा।
धमकी भरा संदेश
बता दें इन मैसेज के जवाब में निशांत ने धमकी देने वाले से उसके बारे में पूछने की कोशिश की तो उसने सामने से जवाब दिया कि वह निशांत के बारे में सब कुछ जानता है और अगर वह इस तरह के मुद्दों पर फिर से लिखना जारी रखता है, तो उसे परिणाम भुगतने होंगे। बताया यह भी जा रहा है धमकी देने वाले ने कन्हैया कुमार और उमेश कोल्हे का भी जिक्र किया था।
आरएसएस की पत्रिका के पत्रकार को 10 सितंबर को मैसेज के माध्यम से धमकी मिली। धमकी देने वाले की ओर से यह भी कहा गया कि यदि पत्रकार इसी तरह हिंदुत्व संगठनों का समर्थन करता है तो उसका सिर काट दिया जाएगा। एफआईआर में निशांत ने बताया कि उसे अज्ञात यूएस-आधारित नंबर से 10 सितंबर की शाम लगभग 7:00 बजे के करीब धमकी भरे मैसेज मिले।
धमकी देने वाले ने निशांत के जिस ट्वीट का स्क्रीन शॉट शेयर किया, उसमें निशांत ने कॉन्ग्रेस के एक ट्वीट की आलोचना की थी। ये वही ट्वीट था जिसमें कॉन्ग्रेस ने आरएसएस की जलती हुई वर्दी की तस्वीर साझा की थी। निशांत ने अपने इस ट्वीट में लिखा था, “संघ को खत्म करते-करते पुश्तें निकल गई लल्ला तुम्हारी। एक दिन पता चला खुद ही खत्म हो जाओगे। अभी तो बस चंद राज्य में बचे हो न। यही हाल रहा तो अगले चुनाव में वहाँ से भी निपट जाओगे।”
धमकी देने वाले ने भेजा कॉन्ग्रेस पर किया गया ट्वीट
गौरतलब है कि अब तक जिन-जिन लोगों को ‘सिर तन से जुदा’ की धमकी मिली, उन्होंने या तो किसी विशेष धर्म के लोगों की भावनाओं को आहत किया या फिर पैगंबर मोहम्मद को लेकर कुछ विवादित बयान दिए। परंतु इस मामले में निशांत को ये धमकी इसलिए मिली है क्योंकि उन्होंने कॉन्ग्रेस की आलोचना की
बॉलीवुड अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा के पति निक जोनस आज अपना 30वाँ जन्मदिन सेलिब्रेट कर रहे हैं। उनका जन्म 16 सितंबर 1992 को हुआ था। निक और प्रियंका की शादी 1 दिसंबर 2018 को जोधपुर में हुई थी। दोनों सोशल मीडिया पर अक्सर चर्चा में रहते हैं। कई बार मीडिया से बातचीत करते हुए दोनों ने अपने पर्सनल सीक्रेट्स भी शेयर किए हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार बॉलीवुड एक्ट्रेस प्रियंका चौपड़ा और इंटरनेशनल सिंगर निक जोनस ने बेहद खुले विचारों वाले हैं और अक्सर सोशल मीडिया पर अपनी क्लॉजी तस्वीरें भी शेयर करते रहते हैं। इसी क्रम में जब उनसे पर्सनल लाइफ के बारे में सवाल किया जाता है तो वे बेबाक होकर उसका जवाब दे देते हैं।
प्रियंका के पति निक ने जीक्यू मैगजीन से बातचीत करते हुए ‘सेक्स प्लेलिस्ट’ के बारे में खुलासा किया था। निक ने बताया था कि हर किसी के पास उनकी एक सेक्स प्लेलिस्ट होनी चाहिए। उन्होंने आगे कहा, “मेरे और पीसी (प्रियंका चौपड़ा) के पास भी अपनी एक सेक्स प्लेलिस्ट है। हालाँकि मैं इस प्लेलिस्ट में अपने गाने शामिल नहीं करता हूँ। ये काफी अलग है। मैं चाहूँगा कि कोई और अपने अनुभव के लिए मेरे गानों का इस्तेमाल करे।“
निक के साथ-साथ देसी गर्ल प्रियंका भी काफ़ी ओपन माइन्ड की हैं। कॉफी विद करण के एक शो में उन्होंने फोन सेक्स की बात को भी बेबाकी से कबूल किया था। प्रियंका ने एक इंटरव्यू के दौरान यह भी बताया कि जब काम के कारण वे निक से दूर रहती हैं तो दोनों एक दूसरे को खुद की सेक्सी तस्वीरें भी शेयर करते हैं।
अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा से एक बार बच्चों की प्लानिंग के बारे में सवाल पूछा गया तो प्रियंका ने कहा कि अभी तो वे बस प्रैक्टिस ही कर रहे हैं। बता दें कि निक का आज 30वाँ जन्मदिन है और वे इसको सेलिब्रेट करने के लिए बहुत एक्साइटेड हैं। उन्होंने इससे जुड़ा एक वीडियो भी शेयर किया है और लिखा है ‘हेअर वी गो…30’
सुप्रीम कोर्ट में हिजाब विवाद पर कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई जारी है। मुस्लिम याचिकाकर्ताओं ने गुरुवार (15 सितंबर 2022) को सुप्रीम कोर्ट में हाई कोर्ट के फैसले पर आपत्ति जताई, जिसमें उन्होंने भीमराव अंबेडकर का जिक्र किया था। उन्होंने कहा, “अंबेडकर का बयान एकतरफा और पूरी तरह से पक्षपातपूर्ण है। अब इस तरह की चीजों को भारत में नहीं दोहराया जा सकता है।”
मुस्लिम याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस ने जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस सुधांशु धूलिया की पीठ से कहा, “भीमराव अंबेडकर का बयान महान है, लेकिन यह एक आपत्तिजनक बयान भी है। यह ऐसा नहीं है, जिसे भारत में दोहराया जाना चाहिए। यह पूरी तरह से पक्षपाती बयान है।” इस पर जस्टिस धूलिया ने कहा, “डॉ अंबेडकर ने उस समय के संदर्भ में यह टिप्पणी की थी।”
कॉलिन गोंजाल्विस ने कहा, “हाई कोर्ट द्वारा की गई कई टिप्पणियों ने समुदाय की धार्मिक भावनाओं को आहत किया और अन्य धर्मों को इस्लाम के बारे में भ्रामक जानकारी दी।” गोंजाल्विस के अनुसार:
“हाई कोर्ट का फैसला बहुसंख्यक समुदाय से जुड़ा है, जहाँ अल्पसंख्यक दृष्टिकोण को आंशिक रूप से देखा गया। इसमें संवैधानिक स्वतंत्रता नहीं है। फैसले में चौंकाने वाले तथ्य हैं, जो आहत करते हैं। हिजाब को भी सिख पगड़ी और कृपाण की तरह संरक्षण मिलना चाहिए।”
Gonsalves : The wrong equation of hijab with law and order problem is a shocking formulation.#Hijab#SupremeCourt
जस्टिस हेमंत गुप्ता ने गोंजाल्विस से कहा कि कोर्ट को हर केस का फैसला उसके सेटअप के आधार पर करना होता है। इस केस में मामला यह था कि क्या यह (हिजाब) एक आवश्यक धार्मिक प्रथा है। हाई कोर्ट ने इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए अपना फैसला सुनाया है। दलील देने का सवाल यह था कि क्या इन लड़कियों ने विवाद से पहले हिजाब पहन रखा था।
सुप्रीम कोर्ट के पीठ की इस टिप्पणी पर वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस ने जवाब दिया कि पूछा जाने वाला सवाल यह नहीं है कि कुछ लड़कियों ने हिजाब पहना था या नहीं। सवाल यह है कि क्या हिजाब इस्लाम का एक हिस्सा है, तो इसका जवाब है कि यह निश्चित रूप से है। लाखों लड़कियाँ इसे पहनती हैं। वे इसे जरूरी मानती हैं।
गोंजाल्विस ने हाई कोर्ट के फैसले को आहत करने वाला बताते हुए उन टिप्पणियों का भी उल्लेख किया, जिसमें हिजाब पहनने पर जोर देना महिलाओं की आजादी के खिलाफ बताया गया है। उन्होंने कहा:
“यह न्याय की भाषा नहीं है। यह कोई निर्णय नहीं है, जिसे पारित किया जाना चाहिए। हाई कोर्ट का फैसला अल्पसंख्यक समुदाय के लिए सम्मानजनक नहीं है। यह एकतरफा दृष्टिकोण था। इस निर्णय को रद्द कर हाई कोर्ट की एक अलग पीठ को वापस भेजा जाना चाहिए।”
पर्दा प्रथा पर अंबेडकर की टिप्पणी
गौरतलब है कि हाई कोर्ट ने हिजाब विवाद पर अपना फैसला सुनाते हुए संविधान निर्माता बाबा साहब भीमराव अंबेडकर का भी जिक्र किया था। अदालत ने शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पर रोक को सही ठहराते हुए पर्दा प्रथा पर अंबेडकर की टिप्पणी का जिक्र करते हुए कहा था:
“पर्दा प्रथा पर उनकी वह राय हिजाब के मसले पर भी लागू होती है। पर्दा, हिजाब जैसी चीजें किसी भी समुदाय में हों तो उस पर बहस हो सकती है। इससे महिलाओं की आजादी प्रभावित होती है। यह संविधान की उस भावना के खिलाफ है, जो सभी को समान अवसर प्रदान करने, सार्वजनिक जीवन में हिस्सा लेने और पॉजिटिव सेक्युलरिज्म की बात करती है।”
हिजाब विवाद पर हाईकोर्ट का फैसला
बता दें कि कर्नाटक हाई कोर्ट में 14 मार्च को हिजाब मामले में फैसला आया था। इसमें कहा गया था कि छात्राएँ तय यूनिफॉर्म को पहन कर आने से इनकार नहीं कर सकती हैं। इसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में 23 याचिकाएँ डालकर चुनौती दी गई है।
बिहार के बेगूसराय से एक वीडियो वायरल हो रहा है। यह वीडियो चलती ट्रेन का है जिसमें एक कथित मोबाइल चोर को खिड़की से लटका कर ले जाया जा रहा है। चोर बार-बार ट्रेन में बैठे लोगों से मिन्नतें करता है, लेकिन उसकी कोई सुनवाई नहीं होती। करीबन 15 किलोमीटर उसे खिड़की पर यूँही लटा कर रखा जाता है। बाद में पुलिस वाले उसे चोरी के इल्जाम के जेल भेज देते हैं।
घटना 12 सितंबर की है। मोबाइल चोर की पहचान पंकज कुमार के तौर पर हुई है। वह बेगूसराय के साहेबपुर कमाल थाना क्षेत्र का निवासी है। वीडियो में देखा जा सकता है कि कैसे वह ट्रेन में यात्रियों से बार-बार कह रहा है कि छोड़ना मत भैया, हाथ टूट जाएगा, मर जाएँगे। वहीं यात्रियों को कहते सुना जा सकता है कि इसे खगड़िया तक ऐसे ही लेकर चलो।
ये वीडियो बिहार के बेगूसराय का बताया जा रहा है।
जहां चलती ट्रेन से मोबाईल चोरी करने वाले व्यक्ति को लोगों ने पकड़ लिया और फिर कई किमी दूर तक ये यूंही लटका रहा। वीडियो में चोर लोगों से हाथ ना छोड़ने की मिन्नतें करता नज़र आ रहा है। pic.twitter.com/y2pKVge8Sn
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पंकज ने समस्तीपुर-कटिहार पैसेंजर ट्रेन में बैठे व्यक्ति से मोबाइल छीनने की कोशिश की थी। उसने फोन को तब खिड़की से छीना था जब ट्रेन बेगूसराय से साहेबपुर कमाल स्टेशन के लिए चलने लगी। तभी उसने यात्री के फोन पर झपट्टा मारा। हालाँकि यात्री ने फौरन उसे पकड़ लिया और फिर दूसरे यात्रियों ने भी उसके दूसरे हाथ को पकड़े रखा।
इसके बाद गाड़ी चल दी और वह वैसे ही लटका-लटका गाड़ी से 15 किलोमीटर दूर खगड़िया ले जाया गया। खगड़िया स्टेशन पर आकर उसे जीआरपी के हवाले किया गया और वहाँ सारी बात बताकर उसके खिलाफ मामला दर्ज करवाकर उसे जेल भेज दिया गया।
बता दें कि इस पूरी घटना के दौरान कुछ लोगों ने उसकी वीडियो बनाई जो अब सोशल मीडिया पर वायरल है। लोग इसे शेयर करके कह रहे हैं कि इस घटना में उसकी जान जा सकती थी और चोरी करने की सजा जान तो नहीं हो सकती है।
अफगानिस्तान में तालिबान आने के बाद गैर-मुस्लिमों का वहाँ से पलायन आम बात हो गई है। इसी क्रम में बीते दिनों 60 सिखों का एक समूह अपने साथ गुरु ग्रंथ साहिब लेकर भारत लौट रहा था, लेकिन रास्ते में उन्हें तालिबानियों ने रोक लिया। अब इस समूह ने पीएम मोदी से मदद की अपील की है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार गुरु ग्रंथ साहिब के साथ 60 अफगान सिखों का एक समूह बीते शनिवार (10 सितंबर 2022) को दिल्ली पहुँचने वाला था, लेकिन अफगानिस्तान की तालिबान सरकार के विदेश मंत्रालय (Foreign Ministry) ने प्रोटोकॉल का हवाला देते हुए गुरु ग्रंथ साहिब को अफगानिस्तान से बाहर नहीं ले जाने दिया।
अफगान सरकार के विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने बताया कि अफगानिस्तान के सूचना एवं संस्कृति मंत्रालय ने गुरु ग्रंथ साहिब को देश से बाहर ले जाने पर आपत्ति जताई है। अफगानिस्तान से बाहर गुरु ग्रंथ साहिब को तब तक नहीं ले जाया जा सकता, जब तक मंत्रालय से इसे यहाँ से ले जाने की मंजूरी नहीं मिलती। इस मामले में तमाम सिखों को नियमों का पालन करने के निर्देश भी दिए गए हैं।
अब इस मामले में अमृतसर स्थित सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) के अध्यक्ष हरजिंदर सिंह धामी ने तालिबान के इस फैसले की निंदा करते हुए तालिबान सरकार के निर्णय को सिखों के धार्मिक मामलों में सीधा हस्तक्षेप करना बताया है। हरजिंदर सिंह धामी ने इस मामले में कहा,
“अगर अफगान सरकार वास्तव में सिखों की परवाह करती है तो उसे उनके जीवन, संपत्ति और धार्मिक स्थलों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए। उन्हें पूजा स्थलों पर हमलों से परेशान नहीं करना चाहिए।”
धामी के मुताबिक अफगानिस्तान में अल्पसंख्यक बन चुके सिखों पर अत्याचार कर उन्हें अपने ही देश को छोड़ने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
इसके अलावा धामी ने भारत सरकार, प्रधानमंत्री कार्यालय और विदेश मंत्रालय से इस मामले में हस्तक्षेप करने और अफगानिस्तान में सिखों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की अपील की है। वहीं आईडब्ल्यूएफ के अध्यक्ष पुनीत सिंह चंडोक ने कहा, “अफगानिस्तान का संस्कृति मंत्रालय गुरु ग्रंथ साहिब को अपने देश की विरासत का ही एक भाग समझता है।”
चंडोक ने कहा, “जब हम अधिकारियों के पास पहुँचे तो उन्हें बताया गया कि उनकी यात्रा पर कोई प्रतिबंध नहीं है, लेकिन वे गुरु ग्रंथ साहिब नहीं ले जा सकते हैं। हम अफगान शासन से अफगान सिखों को धार्मिक ग्रंथ भारत लाने की अनुमति देने और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुरूप धार्मिक स्वतंत्रता की सुविधा देने का आग्रह करते हैं।”
बिहार के बेगूसराय में मंगलवार (13 सितंबर 2022) को राह चलते लोगों को गोली मारने के मामले में पुलिस ने चार संदिग्धों की पहचान की है। इनमें से दो को गिरफ्तार कर अज्ञात स्थान पर पूछताछ की जा रही है। वहीं, दो अन्य आरोपितों की गिरफ्तारी के लिए जगह-जगह छापेमारी की जा रही है।
उधर, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस घटना को जातीय रंग देने की कोशिश की है। पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा, “करने वाला जान-बूझकर ही ये धंधा किया है। एक तरफ जहाँ पर किया है गड़बड़ी वहाँ सब पिछड़े वर्ग हैं और दूसरी तरफ जहाँ हंगामा हुआ है वहाँ मुस्लिम कम्युनिटी के हैं। इस तरह से करके कोई ना कोई धंधा जरूर किया।”
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मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस बयान की हर तरफ आलोचना हो रही है। केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने ट्वीट कर कहा, “नीतीश कुमार जिस तरह बेगूसराय में सीरियल फायरिंग को जाति से जोड़कर उन्माद फैलाने की कोशिश कर रहे हैं, उससे लगता है कि नीतीश कुमार ने ही फायरिंग करवाई है।”
नीतीश कुमार जिस तरह बेगूसराय में सीरियल फायरिंग को जाति से जोड़कर उन्माद फैलाने की कोशिश कर रहे हैं, उससे लगता है कि नीतीश कुमार ने ही फायरिंग करवाई है।
बता दें कि मंगलवार को हुए इस गोलीकांड में बाइक सवार दो बदमाशों ने 40 किलोमीटर के दायरे में 11 लोगों को गोली मारी है। इनमें से चंदन कुमार नाम के एक व्यक्ति की मौत हो गई है, जबकि अन्य कई लोग घायल हैं। पुलिस ने इन दोनों बदमाशों को साइको बताया था।
दोनों शूटर्स ने राह चलते लोगों को गोली मारी है। इनमें मल्हीपुर में 2 लोगों को, बरौनी थर्मल चौक के पास 3 लोगों को, बरौनी में 2 लोगों को, तेघड़ा में 2 लोगों को और बछवाड़ा में 2 लोगों को गोली लगी है। इस मामले में पुलिस ने दो संदिग्धों को गिरफ्तार किया है।
हाल में कई रिपोर्टें आई हैं जो बताती हैं कि नेपाल-भारत सीमा पर तेजी से डेमोग्राफी में बदलाव हो रहा है। मस्जिद-मदरसों की संख्या लगातार बढ़ रही है। जमीनी हालात का जायजा लेने के लिए 20 से 27 अगस्त 2022 तक ऑपइंडिया की टीम ने सीमा से सटे इलाकों का दौरा किया। हमने जो कुछ देखा, वह सिलसिलेवार तरीके से आपको बता रहे हैं। इस कड़ी की 13वीं रिपोर्ट:
पिछली रिपोर्ट में हमने बलरामपुर जिला मुख्यालय से नेपाल के जरवा बॉर्डर जाने वाली सड़क पर दिखने वाली इबादतगाहों के बारे में बताया था। तब हमने बताया था कि कैसे वह लगभग 50 किलोमीटर लम्बी सड़क कई मस्जिदों, मज़ारों और इबादतगाहों से घिरी हुई है। इसके बाद हमने बलरामपुर जिला मुख्यालय के सीमावर्ती तुलसीपुर बाजार से नेपाल के सबसे व्यस्त सीमावर्ती क्षेत्रों में से एक बढ़नी बॉर्डर की तरफ बढ़ने का फैसला किया। यह रास्ता भी लगभग 60 किलोमीटर लम्बा है।
यह रिपोर्ट एक सीरीज के तौर पर है। इस पूरी सीरीज को एक साथ पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
हाइवे पर मज़ारें और मदरसे
बढ़नी बॉर्डर की तरफ तुलसीपुर बाजार से मुख्य मार्ग से आगे बढ़ते ही हमें एक इबादतगाह दिखाई दी। इबादतगाह को हरे रंग से रंगा गया था और आस-पास सन्नाटा था। इस इबादतगाह में एक मीनार थी और आस-पास पक्का निर्माण हुआ था। इसकी हाइवे से अधिकतम दूरी 50 मीटर के आस-पास थी।
हाइवे के ठीक बगल इबादतगाह
इस मज़ार से हम अधिकतम आधे किलोमीटर ही आगे बढ़े होंगे कि हमें सड़क की बाईं तरफ मदरसे का एक बोर्ड दिखा। इस बोर्ड पर ‘मदरसा अरबिया अहले सुन्नत कादरिया’ लिखा हुआ था। बोर्ड के ही मुताबिक मदरसा गाँव पुरुषोत्तमपुर में बना हुआ था, जिसे प्राइमरी स्तर पर मान्यता मिली बताया गया। बोर्ड के ही मुताबिक यह मदरसा साल 2001 से चल रहा था, जिसे मौलाना नसरुद्दीन कादरी संचालित कर रहे।
मदरसा अरबिया अहले सुन्नत कादरिया
इस मदरसे से अधिकतम 2 किलोमीटर आगे बढ़ने पर हमें बीच बाजार में बनी 1 मीनार वाली मस्जिद दिखाई दी। मस्जिद के बाहर एक लाइन से दुकानें बनी हुई थीं। यहाँ हम अपनी पिछली रिपोर्ट का जिक्र करना चाहते हैं, जिसमें एक मौलाना ने हमें सिंगल मीनार वाली मस्जिदों को सऊदी अरब के सहयोग से बनवाया जाना बताया था।
1 मीनार वाली मस्जिद
इसी मुख्य हाइवे पर बढ़नी की दिशा में आगे बढ़ने के बाद हमें अपनी बाईं तरफ एक और मदरसा दिखा। इस मदरसे का नाम ‘दारुल उलूम हबीबा फैज़ान ताज्जुशारीया’ है। यहाँ बकायदा पानी की टंकी आदि साफ देखी जा सकती है। ये मदरसा मटेहना नाम की जगह पर बना हुआ है।
मदरसा दारुल उलूम हबीबा
मटेहना के बाद मुख्य हाइवे पर केवलपुर बाजार पड़ता है। यहाँ हमें सड़क से एकदम सटा कर बनाई गई एक दरगाह दिखी। दरगाह पर कुछ लोगों की भीड़ भी दिखी। इसमें इंट्री गेट पर अरबी भाषा में कुछ लिखा हुआ था।
केवलपुर में सड़क से सटी दरगाह
इसी मज़ार से अधिकतम 100 मीटर आगे बढ़ने पर केवलपुर में ही एक मस्जिद दिखाई दी, जो सड़क से लगभग 200 मीटर अंदर की तरफ बनी है। ये मस्जिद 2 मीनारों वाली है।
केवलपुर की 2 मीनारों वाली मस्जिद
इस मस्जिद से अधिकतम 100 मीटर आगे बढ़ने पर हमें एक मदरसे का गेट दिखाई दिया। वह गेट मुख्य सड़क पर लगा था, जो कनेक्टिंग मार्ग पर ले जाता है। बोर्ड पर इसका नाम ‘मदरसा दारुल उलूम सदयेहक़ नईमियाँ’ लिखा हुआ है। इस गाँव का नाम राजाबाग था, जो सीमावर्ती गैंसड़ी इलाके में आता है।
मदरसा दारुल उलूम सदयेहक़ नईमियाँ
हम अभी बमुश्किल 1 किलोमीटर भी नहीं चल पाए होंगे कि हमें मुख्य सड़क के बगल एक और मदरसा दिखाई पड़ा। इस मदरसे का नाम ‘मदरसा ख़दीजातुल कुबलियल बनात’ है। सफेद रंग में रंगे इस मदरसे की बॉउंड्री चारों तरफ से घिरी हुई है।
मदरसा ख़दीजातुल
बढ़नी जा रही सड़क पर अभी हम पिछले मदरसे से लगभग 3 किलोमीटर ही आगे बढ़े थे कि हमें फातिमा डिग्री कॉलेज जाने वाले रोड पर गैंसड़ी क्षेत्र में एक और मदरसा दिखा। यह भी सड़क के किनारे पर ही है। इसका नाम ‘मदरसा मैकुलिया ज़ोहरा’ है। इसमें कुछ मौलवी जैसे दिख रहे लोग पढ़ाते और कई बच्चे पढ़ते दिखाई दिए। मदरसे के आगे सरकारी नल लगा हुआ है।
मदरसा मैकुलिया ज़ोहरा
गैंसड़ी क्षेत्र पार करते ही जैसे ही हम पचपेड़वा बाजार में पहुँचे, वैसे ही हमें एक बड़ी मस्जिद दिखी। मस्जिद सड़क के बगल में मुख्य बाजार के बीचो-बीच बनी है। यहाँ से एक और छोटा सा रास्ता नेपाल सीमा की तरफ जाता है और इस बाजार से नेपाल की सीमा के उस पार के पहाड़ साफ दिखाई देते हैं। यह मस्जिद भी 2 मीनारों वाली थी।
स्थानीय निवासी एसके मिश्रा ने हमें बताया कि सड़क पर जितनी इबादतगाहें या मदरसे दिखाई दे रहे हैं, उससे कहीं ज्यादा गाँवों के अंदर बने हुए हैं। मिश्रा ने पचपेड़वा की मस्जिद को इलाके की सबसे प्रमुख इबादतगाह बताया।
पचपेड़वा की मस्जिद
जैसे ही हमने पचपेड़वा बाजार को पार किया और बढ़नी बॉर्डर की तरफ आगे बढ़े, वैसे ही हमें जूड़ीकुईयाँ नाम के चौराहे पर एक और मस्जिद दिखाई दी। तब तक हम अधिकतम 1 किलोमीटर ही आगे बढ़े थे। ये मस्जिद भी सड़क के किनारे सफेद रंग में बनी हुई है। मस्जिद के आगे ही पंचर की एक दुकान है।
जूड़ीकुईयाँ बाज़ार में मस्जिद
हर गाँव में इबादतगाह
जूड़ीकुईयाँ नाम के चौराहे से जैसे ही हम लगभग 2 किलोमीटर आगे बढ़े, हमें फिर से सड़क से कुछ ही दूर पर एक और इबादतगाह दिखी। 2 मीनारों वाली यह मस्जिद गाँव शंकरपुर कलाँ में मौजूद है।
गाँव शंकरपुर कलाँ में मस्जिद
शंकरपुर कलाँ गाँव से अधिकतम 1 किलोमीटर ही हम आगे बढ़े होंगे कि हमें विष्णुपुर गाँव में एक और मस्जिद दिखाई दी। यह मस्जिद हमारे बाएँ हाथ पर थी। मस्जिद सड़क और रेलवे लाइन के ठीक बगल में बनी हुई है। यह रेलवे लाइन दिल्ली से नेपाल सीमा पर बने बढ़नी रेलवे स्टेशन को जोड़ती है। यह भी 2 मीनारों वाली मस्जिद है।
विष्णुपुर गाँव में रेलवे लाइन के बगल बनी मस्जिद
पिछले सभी बाजार और गाँव नेपाल की सीमा को छूते हुए चल रहे थे। इन सभी स्थानों से महज 10 किलोमीटर के अंदर ही नेपाल की सीमा शुरू हो जाती है। फ़िलहाल विष्णुपुर से निकलने के बाद हम नारायणपुर गाँव में पहुँच गए। इस गाँव में भी हमें सड़क के बगल ही मस्जिद दिखाई पड़ी। नारायणपुर की सबसे खास बात ये रही कि यहाँ सिंगल मीनार और डबल मीनार वाली मस्जिदें अलग-बगल बनी हुई हैं।
गाँव नारायणपुर की इबादतगाहें
नारायणपुर से कुछ ही दूर और आगे चलने के बाद हमें लक्ष्मीनगर पुलिस पिकेट दिखाई दी, जो बलरामपुर जिले के पचपेड़वा थाना के अंतर्गत आती है। इसी पुलिस पिकेट के ठीक दूसरी पटरी पर एक और मदरसा बना हुआ है। इस मदरसे का नाम ‘फ़ज़ल रहमानिया’ है। इस मदरसे की भी बाकायदा पक्की बॉउंड्री आदि हो रखी है।
फ़ज़ल रहमानिया
इस मदरसे से अधिकतम 2 से 3 मिनट हम अपनी कार से आगे बढ़े होंगे कि हमें बाई तरफ एक बड़ी मस्जिद दिखाई दी। यह मस्जिद एक मीनार वाली थी, जिसके आस-पास इस्लामी झंडे लगे हुए हैं।
लक्ष्मीनगर के आगे मस्जिद
नए बने ओवरब्रिज और पुलों के नीचे मज़ारें
इस सफर के दौरान हमने एक खास बात पर गौर किया कि कुछ समय पहले ही बने बढ़नी से बलरामपुर को जोड़ने वाले हाइवे पर नए बने ओवरब्रिजों के नीचे मजारों और कर्बलों का निर्माण हो चुका है। निर्माण और पेंटिंग से ये सभी कर्बले नए दिखे। हालाँकि उनके बारे में आस-पास का रहने वाला कोई व्यक्ति बोलने को तैयार नहीं हुआ।
बढ़नी जाने वाले हाइवे पर गाँव बिशुनपुर टनटनवा के ठीक सामने सड़क पर ओवरब्रिज बना हुआ है। इस ओवरब्रिज से जब हमने आस-पास का नजारा लिया, तब पाया कि लगभग आधे किलोमीटर दूर गाँव में हरे रंग की एक इबादतगाह दिख रही।
ओवरब्रिज से कुछ ही दूर बनी इबादतगाह
जब हमने इसके आस-पास और नजर दौड़ाई तो हमें एक और इबादतगाह पहली इबादतगाह से कुछ ही दूरी पर दिखाई दी। दोनों इबादतगाहों की दूरी हाइवे पर बने ओवरब्रिज से लगभग एक समान है। दूसरी इबादतगाह 2 मीनारों वाली मस्ज्दि है। बिशुनपुर टनटनवा गाँव के स्थानीय निवासियों ने हमें उस गाँव में मदरसा होने की भी जानकारी दी।
बिशुनपुर टनटनवा गाँव में बनी मस्जिद
पचपेड़वा थानक्षेत्र में घुसे हमें एक पुल के पास नई मज़ार बनी दिखी। यह मज़ार बंजरिया नाम के गाँव के पास बनी है। सड़क पर बने पुल से मजार की दूरी अधिकतम 100 मीटर थी। आस-पास सन्नाटा था और कोई बस्ती भी नहीं दिख रही थी। मज़ार पर इस्लामी झंडे लगे हुए दिख रहे थे। मज़ार को घेर कर एक लम्बा-चौड़ा चबूतरा बना दिया गया था। मज़ार से सटा एक तालाब भी है। यहाँ हमे कोहंड़ौरा गाँव के अरबाज़ मिले लेकिन वो मज़ार का इतिहास नहीं बता पाए।
पुल के पास बनी मजार
गैंसड़ी बाजार को जैसे ही हमने पार किया, वैसे ही हमें हाइवे पर एक ओवरब्रिज दिखा। ओवरब्रिज से ठीक नीचे हमें एक नवनिर्मित मज़ार दिखी। कुछ लोग इसे कर्बला बता रहे थे। इस मज़ार की ओवरब्रिज से दूरी लगभग उतनी ही थी, जितनी पचपेड़वा की मज़ार की दूरी सड़क पर बने पुल से थी। इस मज़ार का रंग और साइज भी पिछली मज़ार जैसा ही था। इस पर भी इस्लामी झंडे लहरा रहे थे। इस मज़ार से बगल एक नदी भी बहती है।
गैंसड़ी ओवरब्रिज के नीचे बनी मज़ार
तुलसीपुर से गैंसड़ी बाजार के बीच हाइवे पर बने एक और ओवरब्रिज के नीचे हमें एक और मज़ार दिखाई दी। यहाँ से गैंसड़ी लगभग 5 किलोमीटर दूर है। इस मज़ार का रंग भी ठीक पहले वाली मजारों जैसा था। मज़ार के आस-पास हरे रंग के कई झड़े लगाए गए थे। स्थानीय नागरिक इस निर्माण के बारे में हमें ज्यादा जानकारी नहीं दे पाए।
तुसलीपुर-गैंसड़ी ओवरब्रिज के नीचे बनी मज़ार
मज़ारों और मस्जिदों के बढ़नी बॉर्डर तक मिलने का सिलसिला जारी रहा। पचपेड़वा बॉर्डर के बाद बलरामपुर जिला समाप्त हो गया और उत्तर प्रदेश का ही सिद्धार्थनगर जिला शुरू हो गया। इस जिले में हमें जो दिखा, वो हम आने वाली रिपोर्ट में आपको बताएँगे।
उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी स्थित निघासन गाँव में दो सगी नाबालिग बहनों की रेप के बाद हत्या की घटना को लेकर बवाल मचा हुआ है। पीड़ित ने दोनों का अंतिम संस्कार करने से मना कर दिया था, लेकिन प्रशासन के समझाने-बुझाने के बाद शवों का 24 घंटे बाद गुरुवार (15 सितंबर 2022) को अंतिम संस्कार कर दिया गया।
पीड़ित परिवार प्रशासन द्वारा 5 वादे करने के बाद अंतिम संस्कार के लिए राजी हुआ। प्रशासन ने वादा किया कि आरोपितों के खिलाफ SC-ST ऐक्ट के तहत दोनों मृतक लड़कियों को 8-8 लाख रुपए का मुआवजा दिया जाएगा। कुल 16 लाख रुपए की पहली किश्त शुक्रवार (16 सितंबर 2022) को परिजनों के खाते में भेज दिया जाएगा।
अपने दूसरे वादे में प्रशासन ने कहा कि रानी लक्ष्मीबाई योजना के तहत मान्य राशि अभियोग के विवेचना की समाप्ति के तुरंत बाद दे दिया जाएगा। इसके अलावा, प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत पीड़ित परिवार को घर बनाने की कार्यवाही ब्लॉक के माध्यम से जल्दी ही शुरू की जाएगी।
चौथे वादे में प्रशासन ने कहा कि नौकरी एवं अन्य आर्थिक सहायता के लिए शासन को जल्दी ही आवेदन भेजा जाएगा। वहीं, प्रशासन ने कहा कि आरोपितों को फाँसी की सजा दिलाने के लिए मामले की सुनवाई फास्टट्रैक कोर्ट में सुनिश्चित की जाएगी।
प्रशासन द्वारा पीड़ित परिवार से किए गए वादे (साभार: आजतक)
इससे पहले मृतक बहनों के परिजनों ने अंतिम संस्कार करने से इनकार करते हुए अपनी माँगें रखी थीं। परिजनों ने अंतिम संस्कार करने के लिए तीन शर्तें रखी थीं। परिजनों का कहना है कि परिवार को एक करोड़ रुपए की मुआवजा राशि सरकार की दी जाए। मृतक के परिजनों के बेटे को योग्यता अनुसार सरकारी नौकरी दी जाए और सभी आरोपितों को फाँसी की सजा सुनाई जाए।
बता दें कि 2 दलित बहनों की रेप के बाद हत्या के आरोप में पुलिस ने अब तक कुल 6 आरोपितों को गिरफ्तार किया है। इनके नाम जुनैद, सोहैल, आरिफ, हाफ़िज़, छोटे और करीमुद्दीन हैं। पुलिस से हुई मुठभेड़ में जुनैद को गोली लगी है। आरोपितों पर पीड़िता को बहला-फुसला कर खेत में ले जाने और वहाँ रेप के बाद हत्या कर देने का आरोप है। घटना बुधवार (14 सितम्बर 2022) की है।
घटना की जानकारी देते हुए खीरी के पुलिस अधीक्षक IPS संजीव सुमन ने बताया कि सभी नामजद अभियुक्तों को गिरफ्तार किया जा चुका है। पुलिस के मुताबिक छोटू नाम के व्यक्ति ने सबसे पहले आरोपितों को लड़की से परिचित करवाया था और सभी में दोस्ती हुई थी।
SP ने आगे कहा कि दोस्ती के बाद तीनों लड़के गाँव में आकर लड़कियों को बहला-फुसला कर खेत में ले गए। बताया गया कि खेत में लड़कियों के विरोध के बाद भी उनसे शारीरिक संबंध बनाए गए तो वहाँ लड़कियाँ आरोपितों से शादी की जिद करने लगीं।
पुलिस ने आगे बताया कि शादी की जिद से नाराज हो कर आरोपितों ने लड़कियों के ही दुपट्टे से गला दबा कर उनकी हत्या कर डाली। बाद में सभी आरोपितों ने सबूत मिटाने के लिए दोनों लड़कियों की लाशों को पेड़ पर टाँग दिया। आरोपी सोहेल और जुनैद ने दोनों लड़कियों के साथ रेप किया था। छोटी बहन की सोहेल से दोस्ती थी। बड़ी लड़की की दोस्ती जुनैद से थी। दोनों बहनों की दोस्ती हाल ही में हुई थी। छोटू नाम के आरोपित ने
टेनिस के दिग्गज खिलाड़ी रोजर फेडरर (Roger Federer) ने अपने संन्यास का ऐलान कर दिया है। गुरुवार (15 सितंबर 2022) को उन्होंने अपने संन्यास की घोषणा की है। उन्होंने यह भी बताया कि उनका आखिरी टेनिस टूर्नामेंट लेवर कप होने वाला है।
आपको बताते चलें कि लेवर कप अगले हफ्ते लंदन में होने वाला है। इसके बाद रोजर फेडरर टेनिस को हमेशा के लिए अलविदा कहने वाले हैं। स्विट्जरलैंड के रोजर फेडरर ने कुल 20 ग्रैंड स्लैम जीते हैं। इस सूची में 8 विम्बलडन, 5 यूएस ओपन, 1 फ्रेंच ओपन और 6 ऑस्ट्रेलियन ओपन का खिताब शामिल है।
रोजर फेडरर ने संन्यास की घोषणा करते हुए एक नोट जारी किया। इसमें उन्होंने लिखा, “टेनिस ने मुझे इतने वर्ष में कई उपहार दिए हैं, उनमें से सबसे बड़ा उपहार वह लोग हैं, जिनसे मैं इस रास्ते पर मिला हूँ। मेरे दोस्त, मेरे प्रतियोगी और सभी प्रशंसक जो खेल को अपना जीवन देते हैं, वह सभी मेरे उपहार हैं।”
Tennis legend Roger Federer announces retirement from professional tennis after Laver Cup 2022 pic.twitter.com/6CIRXuTkKn
रोजर फेडरर ने अपने करियर के जिस आखिरी टूर्नामेंट ‘लेवर कप’ की बात कही, वो 23 सितंबर से 26 सितंबर तक लंदन में आयोजित किया जा रहा है। मतलब 26 सितंबर के बाद रोजर फेडरर (Roger Federer) पेशेवर टेनिस को अलविदा कह देंगे।
Roger Federer His frequent opponents… 50 (W23-L27)- Novak Djokovic 46.0%win 40 (16-24)- Rafael Nadal 40.0% 27 (18-9) – Lleyton Hewitt 66.7% 26 (23-3) – Stan Wawrinka 88.5% 26 (20-6) – Tomas Berdych 76.9% 25 (14-11)- Andy Murray 56.0% 25 (18-7) – Juan Martin Del Potro 72.0%
विरोधी खिलाड़ियों के मुकाबले जीत के रिकॉर्ड की बात करें तो ऊपर का ट्वीट मायने रखता है। नोवाक जोकोविक और राफेल नडाल के अलावा जितने भी बड़े टेनिस खिलाड़ियों के खिलाफ उन्होंने खेला है, सबसे जीत का प्रतिशत 50 से ऊपर है।
तमिलनाडु में वक्फ बोर्ड द्वारा एक हिंदू बहुल गाँवों को वक्फ संपत्ति घोषित कर दिया गया है। इसको लेकर देश भर में बवाल मचा हुआ है। अब इसको लेकर वक्फ बोर्ड ने अपनी प्रतिक्रिया दी है और कहा कि इस जमीन का आवंटन सन 1954 में सरकार द्वारा सर्वेक्षण के बाद किया गया था।
बता दें कि तमिलनाडु के त्रिची जिले के 18 गाँवों की 389 एकड़ भूमि के स्वामित्व को वक्फ बोर्ड ने मुस्लिमों की बताई थी। थिरुचेंदुरई गाँव का एक ग्रामीण अपनी जमीन बेचने गया तो उसे बताया गया कि यह वक्फ की संपत्ति है और उसे वक्फ बोर्ड से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) लाना होगा।
वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष एम अब्दुल रहमान ने इंडिया टुडे को बताया, “1954 से हमारे वक्फ बोर्ड के रिकॉर्ड में सरकार द्वारा सर्वेक्षण की गई भूमि की जानकारी दर्ज है। जानकारी के अनुसार, हमने उप-पंजीयक कार्यालय को सर्वेक्षण संख्या और गाँव के नाम के साथ विवरण भेजा है। ये गाँव एक विशाल क्षेत्र में हैं।”
रहमान ने कहा, “हम अर्काइव से डिटेल निकाल कर उप-पंजीयक कार्यालय को देंगे। लोग जमीन पर अपना कामकाज जारी रख सकते हैं, लेकिन इसके स्वामित्व का दावा नहीं कर सकते।” मंदिर पर कब्जे का खंडन करते हुए उन्होंने कहा, “हमें गर्व है कि वक्फ की संपत्ति मंदिरों और इसके तालाबों के निर्माण के लिए दी गई थी। हमने एक हिंदू किसान को खेती के लिए 300 एकड़ जमीन दी है।”
बता दें कि यह पूरा मामला तब सामने आया, जब राजगोपाल नाम के एक व्यक्ति ने अपनी 1 एकड़ 2 सेंट जमीन राजराजेश्वरी नामक व्यक्ति को बेचने का प्रयास किया। राजगोपाल जब अपनी जमीन बेचने के लिए रजिस्ट्रार ऑफिस पहुँचे तो उन्हें पता चला कि जिस जमीन को बेचने के बारे में वह सोच रहे हैं वह उनकी नहीं, बल्कि जमीन वक्फ हो चुकी है।
राजगोपाल का कहना है कि उनसे यहाँ के रजिस्ट्रार मुरली ने कहा, “जिस जमीन को आप बेचने आए हैं उस जमीन का मालिक वक्फ बोर्ड है। वक्फ बोर्ड के निर्देश के अनुसार इस जमीन को बेचा नहीं जा सकता। आपको चेन्नई में वक्फ बोर्ड से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) प्राप्त करना होगा।” थिरुचेंदुरई गाँव के राजगोपाल की घटना सामने आने के बाद पता चला कि आसपास के अन्य 17 गाँवों की जमीन भी उनकी नहीं, बल्कि वक्फ बोर्ड की है।
राजगोपाल ने जब गाँव वालों को आपबीती सुनाई तो पूरा गाँव यह जानकर हैरान रह गया कि जिस जमीन में वह सालों से रहते आ रहे हैं वह उनकी नहीं है। ग्रामीणों ने सोचा कि वक्फ बोर्ड पूरे गाँव का मालिक होने का दावा कैसे कर सकता है जब उनके पास आवासीय और कृषि दोनों के लिए उनके पास जमीनों के आवश्यक दस्तावेज हैं।
इसके बाद, परेशान ग्रामीण इस पूरे मामले को लेकर जब कलेक्टर के पास पहुँचे तो उन्होंने कहा है कि इसकी जाँच करनी पड़ेगी उसके बाद किसी प्रकार की कार्रवाई हो सकती है। वहीं, त्रिची जिले के भाजपा नेता अल्लूर प्रकाश ने कहा, “त्रिची के पास तिरुचेंदुरई गाँव हिंदुओं का एक कृषि क्षेत्र है। वक्फ बोर्ड का तिरुचेंदुरई गाँव से क्या संबंध है?”
उन्होंने आगे कहा, “गाँव में मानेदियावल्ली समीथा चंद्रशेखर स्वामी मंदिर है। कई दस्तावेजों और सबूतों के मुताबिक यह मंदिर 1,500 साल पुराना है। मंदिर के पास तिरुचेंथुरई गाँव और उसके आसपास 369 एकड़ की संपत्ति है। क्या यह मंदिर संपत्ति भी वक्फ बोर्ड के स्वामित्व में है? वक्फ बोर्ड बिना किसी बुनियादी सबूत के कैसे घोषणा कर सकता है कि यह जमीन उसकी है, जबकि गाँव के लोगों के पास जमीन के आवश्यक दस्तावेज हैं।”
भारत में वक्फ और वक्फ बोर्डों का इतिहास
भारत में वक्फ का इतिहास दिल्ली सल्तनत के शुरुआती दिनों से ही माना जाता है। सुल्तान मुइज़ुद्दीन सैम घोर ने मुल्तान की जामा मस्जिद के पक्ष में दो गाँव समर्पित किए और इसका प्रशासन शेखुल इस्लाम को सौंप दिया। जैसे-जैसे दिल्ली सल्तनत और बाद में इस्लामी राजवंश भारत में फले-फूले, भारत में वक्फ संपत्तियों की संख्या बढ़ती चली गई।
19वीं शताब्दी के अंत में भारत में वक्फ की समाप्ति का भी एक मामला सामने आया था। उस दौरान ब्रिटिश शासन के समय में लंदन की प्रिवी काउंसिल में एक वक्फ संपत्ति पर विवाद शुरू हुआ था। इस मामले की सुनवाई करने वाले चार ब्रिटिश न्यायाधीशों ने वक्फ को “सबसे खराब और सबसे हानिकारक” बताते हुए अमान्य घोषित कर दिया था।
भारत में इस निर्णय को स्वीकार नहीं किया गया और 1913 के मुसलमान वक्फ मान्यकरण अधिनियम ने भारत में वक्फ को बचा लिया था। इसके बाद से अब तक वक्फ पर अंकुश लगाने का कोई प्रयास नहीं किया गया है। यही कारण है कि वक्फ बोर्ड अब सशस्त्र बलों और भारतीय रेलवे के बाद भारत में तीसरा सबसे बड़ा भूमि मालिक है।
नेहरू सरकार द्वारा पारित वक्फ अधिनियम 1954 ने वक्फों के केंद्रीयकरण की दिशा में एक रास्ता बनाया था। यही नही, भारत सरकार द्वारा 1954 के इसी वक्फ अधिनियम के तहत साल 1964 में सेंट्रल वक्फ काउंसिल ऑफ इंडिया की स्थापना की गई थी।
तत्कालीन भारत सरकार द्वारा स्थापित किया गया सेंट्रल वक्फ काउंसिल ऑफ इंडिया एक केंद्रीय संस्था है। यह संस्था विभिन्न राज्य के वक्फ बोर्डों के काम की देखरेख करता है, जो वक्फ की धारा 9 (1) के प्रावधानों के तहत स्थापित किए गए थे। 1954 वक्फ अधिनियम को साल 1995 में मुस्लिमों के लिए और भी अधिक अनुकूल बनाया गया। इसके बाद से यह एक अधिभावी कानून है और इस पर कोई विधायी शक्तियाँ काम नहीं कर सकती हैं। एडवोकेट दवे ने भी कोर्ट में यही तर्क दिया।
वक्फ अधिनियम 1995
22 नवंबर 1995 को वक्फ अधिनियम 1995 लागू किया गया। यह अधिनियम वक्फ परिषद, राज्य वक्फ बोर्डों और मुख्य कार्यकारी अधिकारी की शक्ति और कार्यों के साथ-साथ मुतवल्ली के कामकाज को भी देखता है।
यह अधिनियम एक वक्फ ट्रिब्यूनल की शक्ति और प्रतिबंधों का भी वर्णन करता है, जो अपने अधिकार क्षेत्र के तहत एक सिविल कोर्ट की तरह कार्य करता है। वक्फ ट्रिब्यूनल को एक सिविल कोर्ट माना जाता है और सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के तहत एक सिविल कोर्ट द्वारा प्रयोग की जाने वाली सभी शक्तियों का उपयोग और कार्यों को करने की क्षमता रखता है।
वक्फ ट्रिब्यूनल ऐसा है कि इसका निर्णय अंतिम और सभी पक्षों पर बाध्यकारी होगा। इस अधिनियम के तहत अगर कोई भी मसला वक्फ ट्रिब्यूनल द्वारा निर्धारित किया जाना है तो वो विवाद या कानूनी कार्यवाही किसी दीवानी अदालत के अधीन नहीं जा सकती है। सीधे शब्दों में कहें तो वक्फ ट्रिब्यूनल के फैसले किसी भी सिविल कोर्ट से ऊपर हैं।
एक बार वक्फ की संपत्ति, हमेशा के लिए वक्फ की संपत्ति
वक्फ के मामले में संपत्ति का स्वामित्व वक्फ से अल्लाह को ट्रांसफर किया जाता है और कोई भी संपत्ति अल्लाह से वापस नहीं ली जा सकती है। इसलिए एक बार संपत्ति वक्फ बन जाने के बाद यह हमेशा वक्फ रहेगी। इसका मालिक अल्लाह होगा लेकिन उपयोग वक्फ बोर्ड करेगा।
ठीक ऐसा ही बेंगलुरु ईदगाह मैदान के मामले में भी देखा गया। भले ही सरकार के अनुसार किसी भी मुस्लिम संगठन को इस भूमि का मालिकाना हक नहीं दिया गया है। लेकिन, वक्फ का दावा है कि यह 1850 के दशक से वक्फ की संपत्ति थी, इसका मतलब है कि यह अब हमेशा के लिए वक्फ संपत्ति है।