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CM उद्धव को साबित करना ही होगा बहुमत: सुप्रीम कोर्ट ने 30 जून को फ्लोर टेस्ट पर रोक लगाने से किया इनकार, शिवसेना के काम न आई सिंघवी की दलीलें

महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे को विधानसभा में फ्लोर टेस्ट के जरिए बहुमत साबित करने के लिए कहा है, जिसके खिलाफ शिवसेना सुप्रीम कोर्ट पहुँची है। पार्टी के चीफ व्हिप सुनील प्रभु ने ये याचिका दायर की। कॉन्ग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने बतौर अधिवक्ता उनकी पैरवी की। उनकी दलील थी कि बिना ये जाने वोटिंग कैसे कराई जा सकती है कि कौन इसके योग्य हैं और कौन नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने अभिषेक मनु सिंघवी से पूछा कि क्या फ्लोर टेस्ट के लिए कोई अवधि तय है, जिस पर उन्होंने जवाब दिया कि इसे 6 महीने के भीतर नहीं कराया जा सकता। सिंघवी ने कहा कि जिन लोगों को 21 जून को अयोग्य घोषित किया गया है, अगर स्पीकर के ऊपर निर्णय छोड़ दिया जाए तो वो उस दिन वोट नहीं दे सकेंगे। उन्होंने राज्यपाल र अतिरिक्त हड़बड़ी बरतने का आरोप लगाया। उन्होंने 34 विधायकों द्वारा राज्यपाल को भेजे पत्र को पढ़ते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के हिसाब से इसका अर्थ है कि वो अपनी सदस्यता खुद छोड़ रहे हैं।

उन्होंने दावा किया कि राज्यपाल का हर एक्शन कानूनी समीक्षा से गुजर सकता है। अभिषेक सिंघवी ने कहा कि क्या कल फ्लोर टेस्ट नहीं हुआ तो आसमान गिर पड़ेगा? उन्होंने विधायकों की बगावत को कानून का उल्लंघन करार दिया। इधर उद्धव ठाकरे ने कैबिनेट की बैठक बुलाई, जिसमें उन्होंने कहा उद्धव ठाकरे ने कैबिनेट में कहा- “मुझ से कोई ग़लती हुई हो तो माफ़ी चाहता हूँ, सबके सहयोग के लिए आभार।” कैबिनेट ने औरंगाबाद का नाम “संभाजी नगर” रखने का भी निर्णय लिया।

हालाँकि, विपक्षी वकील ने कहा कि विधानसभा के फ्लोर से अच्छा बहुमत साबित करने की अच्छी जगह कौन होगी? इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 30 जून को होने वाले फ्लोर टेस्ट पर रोक लगाने से इनकार कर दिया।

उस्मानाबाद का नाम ‘धाराशिव’ और औरंगाबाद बना ‘संभाजीनगर’: महाराष्ट्र सियासी संकट के बीच उद्धव का हिंदुत्व कार्ड, कैबिनेट ने लिए तीन अहम फैसले

महाराष्ट्र की कुर्सी पर सियासी संकट के बीच उद्धव ठाकरे सरकार ने बुधवार (29 जून, 2022) को हुई कैबिनेट मीटिंग में हिंदुत्व का कार्ड खेलते हुए तीन अहम फैसले लिए हैं। कैबिनेट ने औरंगाबाद शहर का नाम ‘संभाजीनगर’, वहीं उस्मानाबाद शहर का नाम ‘धाराशिव’ रखने और नवी मुंबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का नाम बदलकर स्वर्गीय डीबी पाटिल अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा रखने के लिए स्वीकृति दी है

हालाँकि, महाराष्ट्र सरकार ने ये फैसले ऐसे समय में लिए हैं जब राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने शिवसेना-एनसीपी-कॉन्ग्रेस की सत्तारूढ़ महा विकास अघाड़ी सरकार से 30 जून (गुरुवार) को बहुमत साबित करने को कहा है। लेकिन शिवसेना ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है और ऐसे में यदि शीर्ष अदालत का फैसला पक्ष में नहीं आया तो उद्धव ठाकरे को सत्ता गँवानी पड़ सकती है।

बता दें कि आज तेजी से महाराष्ट्र का घटनाक्रम बदलता नजर आया। जिस वक्त सुप्रीम कोर्ट में कल के फ्लोर टेस्ट को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई शुरू हुई, ठीक उसी समय महाराष्ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे ने कैबिनेट की बैठक बुलाई। इस कैबिनेट बैठक के आखिर में सीएम ठाकरे बेहद भावुक हो गए और कहा, “पिछले ढाई साल में आपने मेरा सहयोग किया उसके लिए मैं शुक्रगुजार हूँ लेकिन अगर मेरी किसी चीज से आपका दिल दुखा हो तो उसके लिए मुझे माफ करना।”

वहीं उन्होंने शिवसेना के बागी विधायकों पर निशाना साधते हुए कहा कि कई लोगों ने दगा भी किया। वहीं आज कैबिनेट बैठक में तय किया गया है कि अहमदनगर-बीड-परली वैजनाथ नई रेलवे लाइन परियोजना के पुनर्निर्माण को मंजूरी दी जाएगी और राज्य सरकार इसके लिए योगदान देगी। साथ ही कैबिनेट बैठक में ग्रामीण क्षेत्रों में विशेष पिछड़ा वर्ग एवं अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले घरकुल योजना लागू करने पर भी चर्चा हुई।

गौरतलब है कि पिछले दिनों मंत्री एकनाथ शिंदे ने शिवसेना में बगावत करके गोवाहाटी में डेरा डाल दिया है। वहाँ उनके खेमे में शिवसेना के करीब 39 विधायक हैं। वहीं एकनाथ शिंदे का दावा है कि निर्दलीय को मिलाकर उनके पास कुल 50 विधायक हैं। बता दें कि आज ही शिंदे ने दावा किया कि हमारे पास दो-तिहाई से अधिक विधायकों का समर्थन है, जो कि किसी भी शक्ति परीक्षण की आवश्यक संख्या से अधिक साबित होंगे। वहीं यह भी कयास लगाए जा रहे हैं कि कहीं उद्धव ठाकरे शक्ति परीक्षण से पहले ही इस्तीफ़ा न दे दें।

‘अगर शादी में सेक्स ना हो तो…’: संजय दत्त की बेटी ने इंस्टा पर खुल कर दिया जवाब, इटालियन बॉयफ्रेंड की मौत के बाद चली गई थीं सदमे में

बॉलीवुड अभिनेता संजय दत्त (Sanjay Dutt) की बेटी त्रिशला दत्त (Trishala Dutt) सोशल मीडिया पर काफी ऐक्टिव रहती हैं और अपना ओपिनियन साझा करती रहती हैं। वे अपने फॉलोवर (अपने क्लाइंट) के सवालों का जवाब भी देती हैं। रिलेशनशिप से लेकर सामाजिक मुद्दों पर बेबाकी से वह अपना विचार रखती हैं। इस बार उन्होंने सेक्स (Sex) के मुद्दे पर खुलकर अपने विचार रखे।

उनके एक फॉलोअर ने इंस्टा पर Ask Me सेशन में कहा कि ‘अगर शादी में सेक्स ना हो तो सामने वाला साफ तौर चीटिंग कर रहा है।’ इसके जवाब में त्रिशला ने इंस्टाग्राम पर एक पोस्ट लिखकर इसका जवाब दिया। उन्होंने कहा कि यह परिस्थितियों पर निर्भर करता है।

त्रिशला ने अपने जवाब में कहा, मैं कभी नहीं कहूँगी कि क्या करना चाहिए और ना ही आप पर अपने विचार थोपूँगी, खासकर तब जबकि मुझे पूरी कहानी पता ना हो।” उन्होंने कहा, “आप कैसे कह सकते हैं पति या पत्नी में कोई मेडिकल समस्या का सामना नहीं कर रहा है?”

उन्होंने आगे कहा, आप कैसे कह सकते हैं कि पति-पत्नी में से कोई एक सेक्सुअल ऐक्ट को लेकर नहीं शरमा रहा है और इसकी वजह से सेक्स से दूर भाग रहा है?” उन्होंने कहा कि इन सब जानकारियों के बिना समझदारी वाला जवाब देना मुश्किल है। उन्होंने अपने क्लाइंट से कहा कि उनका काम उद्देश्यपूर्वक सुनना और उसे आपके ध्यान में लाना है, जिसे अभी तक आपके द्वारा महसूस नहीं किया गया है। उसके बाद विचार देना।

उन्होंने कहा, “एक थेरेपिस्ट आसान तरीके से आपकी मदद करता है। मेरा काम आपको नीचा दिखाना नहीं है। मैं विकल्प खोजने में आपकी मदद करूँगी। उसके बाद आपको निर्णय लेने के लिए छोड़ दूँगी।” त्रिशाला ने अपने क्लाइंट को मदद करने का भरोसा दिया।

बता दें कि 34 वर्षीया त्रिशला साइकोथेरेपिस्ट हैं और अमेरिका के न्यूयॉर्क में रहती हैं। वह सोशल मीडिया के माध्यम से अपने फॉलोवर्स जुड़ी रहती हैं। वह उनकी समस्याओं पर अपने विचार रखती हैं। वह अपने बॉडी ट्रांसफॉर्मेशन को लेकर आजकल चर्चा में हैं।

संजय दत्त और ऋचा शर्मा की बेटी त्रिशला दत्त के इटालियन बॉयफ्रेंड की साल 2019 में मौत हो गई थी। इस सदमे से उबरने के लिए उन्होंने चिकित्सक की मदद ली थी। इस सदमे के बारे में इंस्टा पर साझा करते हुए उन्होंने लिखा था, “मैं अभी भी इससे डील कर रही हूँ। मैंने इसके लिए काफी मदद ली है और ले भी रही हूँ। कोविड की वजह से मैंने जो भी सपोर्ट ग्रुप ज्वॉइन किए थे वो वर्चुअल हो गए हैं। मैं अपने ग्रीफ थेरापिस्ट से हफ्ते में एक बार वर्चुअली मिलती हूँ।”

त्रिशला ने अपने बॉयफ्रेंड के साथ इटालियन रेस्टोरेंट का फोटो सोशल मीडिया पर साझा किया था। इसके बाद उनके रिलेशनशिप के बारे में चर्चा शुरू हुई थी। फोटो के साथ उन्होंने लिखा था- ”एक इटालियन लड़के को डेट करने का मतलब है कि ढ़ेर सारा पास्ता और खूब सारी वाइन।”

इसके अलावा उन्होंने अपने बॉयफ्रेंड संग भी एक तस्वीर शेयर की थी। तस्वीर शेयर करते हुए उन्होंने लिखा था, “उसने मेरा गला पकड़ा पर दबाया नहीं। उसने इतना जोरदार किस किया कि मैं भूल गई कि किसकी साँस ले रही हूँ।”

राजस्थान पुलिस ने कन्हैया लाल को किया था गिरफ्तार, फिर कराया था ‘समझौता’: बेटे ने कहा – हत्यारों का एनकाउंटर हो, पुलिस की भी गलती

नूपुर शर्मा के पैगंबर मुहम्मद को लेकर दिए गए कथित बयान का समर्थन करने पर जिस हिन्दू कन्हैया लाल (Kanhaiya Lal Murder) की हत्या इस्लामिक कट्टरपंथियों ने की थी। इस मामले में अब राजस्थान के एडीजी लॉ एँड ऑर्डर हवा सिंह घुमारिया ने बयान दिया है। उन्होंने ने कहा कि इस मामले में पुलिस ने एक्शन लेते हुए पहले कन्हैया लाल को गिरफ्तार किया था। जेल से छूटने के बाद उसकी शिकायत पर दोनों में हमने सुलह भी करवाई थी।

रिपोर्ट के मुताबिक, एडीजी घुमारिया ने कहा कि पैगंबर मुहम्मद पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के मामले में 10 जून 2022 को कन्हैया लाल के खिलाफ एक रिपोर्ट दर्ज़ हुई थी। इसमें उन पर आरोप लगाया गया था कि पैगंबर मुहम्मद पर की गई आपत्तिजनक टिप्पणी को उसने आगे प्रसारित किया था। बाद में पुलिस ने उसे गिरफ़्तार किया। 15 जून को कन्हैया लाल जमानत पर बाहर आए। उसके कुछ दिन बाद उन्होंने अपनी जान को ख़तरा बताते हुए पुलिस से संरक्षण माँगा था।

पुलिस अब कह रही है कि कन्हैया की शिकायत पर तत्काल एक्शन लेते हुए SHO ने कन्हैयालाल और जो उन्हें धमकी दे रहे थे, दोनों पक्षों से बातचीत कर हस्ताक्षर करवाया कि हम दोनों के बीच जो भी मनमुटाव था, वो दूर हो गया है। एक लिखित रिपोर्ट भी दी गई थी, जिसके बाद पुलिस ने आगे कोई कार्रवाई नहीं की। एडीजी ने दावा किया कि राज्य में जब भी इस तरह की कोई भी घटना घटी है तो पुलिस ने एक्शन लिया है।

इस बीच उदयपुर के धनमंडी थाने के एक सहायक उपनिरीक्षक (एएसआई) भंवर लाल को 28 जून 2022 को कन्हैया लाल की हत्या के बाद लापरवाही बरतने के आरोप में निलंबित कर दिया गया है।

कन्हैया लाल की पत्नी और बेटे का बयान

इस्लामिक कट्टरपंथियों का शिकार बने कन्हैया लाल की पत्नी ने न्याय की माँग करते हुए पति के हत्यारों को फाँसी देने की माँग की है। उनका कहना है, “सरकार इन हैवानों को फाँसी दे। इन्होंने आज एक को मारा है, कल ये दूसरों को मारेंगे।” वहीं मृतक के बेटे यश ने कहा है, “हम चाहते हैं कि या तो उनका (हत्यारों का) एनकाउंटर हो जाए या उन्हें फाँसी पर लटका दिया जाए। उनमें डर पैदा करने की जरूरत है।”

मामूली विवाद पर जला दिया था पुलिसकर्मी का पुतला: 10 भाई-बहन है उदयपुर का हत्यारा रियाज, परिवार का दावा – 20 साल से संपर्क नहीं

राजस्थान के उदयपुर में हिन्दू टेलर कन्हैया लाल की तालिबानी तरीके से बेरहम हत्या करने के आरोपित रियाज जब्बार और गौस मोहम्मद पुलिस की गिरफ्त में हैं। इन इस्लामिक कट्टरपंथियों को लेकर कई रिपोर्ट्स में कहा गया है कि रियाज जब्बार का लोगों को भड़काने का पुराना इतिहास रहा है। पता चला है कि इससे पहले भी रियाज ने उदयपुर और भीलवाड़ा के आसपास के इलाकों में मुस्लिमों को भड़काने का काम किया था। इसके लिए बकायदा उसने एक नेटवर्क तैयार कर रखा था।

जैसा कि इस तरह की किसी भी घटना के बाद होता है। इस केस में भी वैसा ही देखने को मिल रहा है। हत्या के मुख्य आरोपित रियाज के परिवार लोगों ने उसके कृत्य की निंदा करते हुए खुद को इस मामले से ही अलग कर लिया है। उसके परिवार वालों का दावा है कि पिछले 20 सालों से उसका परिवार से किसी भी तरह का कोई संबंध नहीं है। वो भीलवाड़ा के आसिंद का रहने वाला है और 20 साल पहले अपना घर छोड़कर उदयपुर चला गया था। उसके परिजनों का कहना है कि रियाज जब्बार इतने साल कहाँ था, उसने निकाह कब किया और जीवन यापन के लिए क्या करता है उन्हें कुछ नहीं पता। वहीं रियाज जब्बार ने उदयपुर में एक ऐसा नेटवर्क खड़ा कर लिया था कि इसके बल पर वो लोगों को उकसाता था।

जला चुका है पुलिसकर्मी का पुतला

सूत्रों का कहना है कि ये वही रियाज जब्बार है, जिसने एक साल पहले मामूली विवाद के बाद एक पुलिसकर्मी का पुतला फूँका था। रियाज ने पिछले साल हाथीपोल थाना क्षेत्र में हंगामा किया था। इस हंगामें को कंट्रोल करने के लिए पहुँच पुलिस बलों से भी वो भिड़ गया था। इस बीच रियाज को शांत कराने की कोशिश को तहत पुलिस के एक सहायक उप निरीक्षक ने अनजाने में उसकी दाढ़ी को छू लिया। इससे भड़के रियाज जब्बार ने चंद मिनटों के भीतर सैकड़ों कट्टरपंथियों की की भीड़ जमा कर ली और वहाँ पुलिसकर्मी का पुतला फूँका।

परिवार ने बनाई दूरी

कन्हैया लाल की हत्या के बाद आसिन्द में रियाज जब्बार के घर के पास भारी पुलिस बल तैनात है। दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, रियाज के बड़े भाई अब्दुल अयूब लोहार ने कहा, “रियाज हमारे बीच 10वाँ भाई है। मैं दूसरा हूँ। 2001 में हमारी बड़ी बहन का देहांत हो गया, जिसके बाद रियाज उदयपुर चला गया और वहीं रहने लगा। उसने वहीं काम किया और वहीं निकाह भी किया। मुझे ठीक-ठीक नहीं पता कि उसका काम क्या था।”

अब्दुल अयूब लोहार ने आगे कहा, “पिछले 20-22 सालों से हमारे बीच कोई बातचीत नहीं हुई। कल रात मुझे पता चला कि उसने (कन्हैया लाल की हत्या) ये किया है। उसने गलत काम किया है। कानून अपराध करने वाले को सजा देगा। धर्म के नाम पर ऐसी हरकत गलत है। भले ही वह हमारा भाई है, उसे अपराध की सजा मिलेगी। जब हम साथ रहते थे, तो वो ऐसा नहीं था। हम नहीं जानते कि उदयपुर जाने के बाद वो किससे प्रभावित हुआ। इसके बाद उसने परिवार से संपर्क नहीं किया। हमें नहीं पता कि उसने किससे शादी की।”

वेल्डर का काम करता है गौस मोहम्मद

कन्हैया लाल की हत्या का दूसरा आरोपित गौस मोहम्मद है। वो एक वेल्डर का काम करता है और उदयपुर का ही रहने वाला है। पिछले कई सालों से वो रियाज जब्बार का खास रहा है और संपत्तियों के लेन-देन में शामिल रहा है। गौस मोहम्मद रियाज के साथ कन्हैया लाल की दुकान पर गया और उनके सिर को कलम कर दिया।

राजसमंद में कॉन्स्टेबल संदीप के गर्दन पर धारदार हथियार से हमला, हालत गंभीर

नूपुर शर्मा के कथित तौर पर समर्थन करने के आरोप में राजस्थान के उदयपुर में इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा हिन्दू टेलर कन्हैया लाल की बेरहमी से हत्या से देश स्तब्ध है। कन्हैयालाल की हत्या के बाद राजसमंद में बुधवार (29 जून 2022) को भीड़ ने धारदार हथियार से संदीप नाम के एक पुलिस कान्स्टेबल पर जानलेवा हमला कर दिया। इसमें उन्हें गंभीर चोटें आई हैं।

गंभीर रूप से घायल अवस्था में इलाज के लिए पुलिसकर्मी को तुरंत अजमेर के एक अस्पताल में रेफर कर दिया गया है।

दरअसल, कन्हैया लाल की हत्या करके भाग रहे दो आरोपितों को मंगलवार को भीम पुलिस स्टेशन की पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया था, जिसके बाद से ही उदयपुर की ही तरह राजसमंद में भी हालात तनावपूर्ण बने हुए थे। दोनों ही आरोपितों को गिरफ्तारी का एक वीडियो भी पुलिस ने जारी कर दिया था।

दोपहर करीब 2 बजे राजसमंद के भीम थाना क्षेत्र में भीड़ ने विरोध प्रदर्शन किया, जिसे पुलिस लगातार काबू में करने की कोशिश कर रही थी। इसी दौरान भीड़ में से एक ने सिपाही संदीप की गर्दन पर धारदार हथियार से वार कर दिया। कांस्टेबल को घायल हालत में तुरंत अजमेर रेफर कर दिया गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक उनकी हालत गंभीर बताई जा रही है।

उल्लेखनीय है कि उदयपुर में कन्हैया लाल की गला रेत कर हत्या करने के बाद हत्यारे मोहम्मद रियाज अख्तर और गोस मोहम्मद मंगलवार को ही राजसमंद भाग गए थे। घटना के तुरंत बाद एक्शन में आई पुलिस ने दोनों को राजसमंद से गिरफ्तार कर लिया। कन्हैया लाल की हत्या के बाद हत्यारों ने एक वीडियो बनाकर अपने इस कुकृत्य को सोशल मीडिया पर भी अपलोड किया था। इसमें तेज धार वाला चाकू लहराते हुए कट्टरपंथी यह ऐलान करते दिखे कि वो पीएम मोदी की भी हत्या कर देंगे।

बहरहाल, बुधवार 29 जून को कन्हैया लाल का अंतिम संस्कार कर दिया गया। इस दौरान भारी संख्या में लोग मौजूद रहे। कन्हैया लाल उदयपुर में दर्जी का काम करते थे, जिन्होंने कथित तौर पर पैगंबर मुहम्मद वाले विवाद पर नूपुर शर्मा का समर्थन किया था। जबकि वह पोस्ट उनके 8 साल के मासूम बेटे द्वारा शेयर किया गया था। इसी को लेकर मंगलवार 28 जून को इस्लामिक कट्टरपंथियों ने सिर काट दिया गया था।

एनआईए ने संभाला जाँच का जिम्मा

इस बीच केंद्रीय गृह मंत्रालय के आदेश के बाद एनआईए ने कन्हैया की हत्या के मामले की जाँच की कमान संभाल ली है।

एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक, उदयपुर में जहाँ पर कन्हैया लाल की हत्या की गई थी, वहाँ पर पुलिस, एनआईए, एसआईटी, एफएसएल और एटीएस की टीमें पहुँच गई हैं। जाँच एजेंसियों ने मामले की छानबीन शुरू भी कर दी है।

‘आप पूछते हैं कि आपकी वफादारी पर सवाल क्यों उठाए जा रहे, ये आप खुद से पूछिए’: कन्हैया लाल की हत्या के बीच सुनिए सरदार पटेल ने मुस्लिमों से क्या कहा था

आजादी के बाद से ही देश में ‘हिंदू-मुस्लिम भाईचारा’ और ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ के मिथक का गढ़ा गया, लेकिन समय-समय पर यह मिथक टूटता रहा। राजस्थान के उदयपुर में कन्हैया लाल साहू नाम के एक हिंदू टेलर की खुलेआम हत्या इसी मिथक के भ्रम को तोड़ने वाला है। कन्हैया लाल ने भाजपा की निलंबित नेता नूपुर शर्मा का समर्थन किया था। नूपुर शर्मा पर आरोप है कि उन्होंने इस्लाम के पैगंबर मुहम्मद का एक टेलीविजन बहस के दौरान अपमान किया है।

मंगलवार (28 जून 2022) को उदयपुर में स्थित अपने टेलर की दुकान में कन्हैया लाल बैठे थे, तभी गौस मुहम्मद और रियाज नाम के दो इस्लामी चरमपंथी ग्राहक बनकर आए और कन्हैया लाल का गला काट दिया। पुलिस जब हत्यारों को गिरफ्तार कर ले आई तो राज्य के राजसमंद जिले में कट्टरपंथियों की भीड़ ने बवाल कर दिया और एक पुलिसकर्मी के गले पर वार कर दिया। इस तरह की घटनाएँ ‘मिथक-निर्माण’ और उसमें जीने के भ्रम को तोड़ती हैं।

‘मिथक-निर्माण’ किसी भी गणतंत्र की स्थापना की एक आंतरिक विशेषता है। सत्ता पर पकड़ मजबूत करने और अपना अस्तित्व कायम रखने के लिए हर देश के सत्तारूढ़ संस्थान ऐसे ही कुछ मिथकों को गढ़ते हैं, जो उन्हें उनकी विचारधारा को सही ठहराने में मदद करती है। भारत में नेहरूवादी धर्मनिरपेक्ष राज्य की स्थापना के साथ भी इसी तरह की घटना देखने को मिली। इस दौरान ‘गंगा-जमुनी तहज़ीब’ की विचारधारा का मिथक गढ़ा गया।

‘गंगा-जमुनी तहज़ीब’ की विचारधारा के मूल सिद्धांतों में से एक यह है कि 1947 में भारतीय मुसलमानों ने पाकिस्तान के इस्लामिक गणतंत्र को चुनने की बजाय ‘धर्मनिरपेक्ष भारत’ को चुना था, इसलिए अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के सभी दस्तूर जायज हैं। इसने न सिर्फ इस्लामी कट्टरपंथ पर पर्दा डालने को प्रोत्साहित किया, बल्कि इसका महिमामंडन भी किया।

इस स्पष्ट झूठ ने असदुद्दीन ओवैसी जैसे कट्टरपंथी इस्लामी नेताओं को यह कहने की खुली छूट दे दी है कि उन्होंने पाकिस्तान की बजाय भारत को ‘चुना’ था। ओवैसी के भाई हमेशा हिंसा और हिंदुओं को धमकी देते हुए पाए जाते हैं।

हालाँकि अब नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता के मूल सिद्धांत पर सवाल उठाने के लिए लगभग अक्षम्य हो गया है, स्वतंत्रता युग के राजनीतिक समर्थकों को अच्छी तरह से पता था कि मुसलमानों ने भारत में रहने के लिए नहीं चुना था क्योंकि उन्होंने एक इस्लामिक राज्य के दर्शन को अस्वीकार कर दिया था। सरदार पटेल ने जनवरी 1948 में कोलकाता में अपने भाषण में उन भावनाओं को आवाज़ दी जो हमारे ‘धर्मनिरपेक्ष’ नेताओं को गहरा मानसिक आघात दे सकते हैं।

सरदार पटेल ने कहा, “जो मुसलमान अभी भी भारत में हैं, उनमें से कई ने पाकिस्तान के निर्माण में मदद की … क्या उनका राष्ट्र रातोंरात बदल गया है? मुझे समझ नहीं आया कि यह इतना कैसे बदल गया। वे अब कहते हैं कि वे वफादार हैं और पूछते हैं कि उनकी वफादारी पर सवाल क्यों उठाया जा रहा है। तो मैं जवाब देता हूँ कि आप हमसे क्यों सवाल कर रहे हैं, खुद से पूछिए। यह आपको हमसे नहीं पूछना चाहिए।”

वो आगे कहते हैं, “मैंने एक बात कही, आपने पाकिस्तान बनाया, आपके लिए अच्छा है। उनका कहना है कि पाकिस्तान और भारत को एक साथ आना चाहिए। मैं कहता हूँ कि कृपया ऐसी बातें कहने से बचना चाहिए। पाकिस्तान को स्वर्ग बनने दो, हम इससे आने वाली ठंडी हवा का आनंद लेंगे।”

इतना कहते ही दर्शक ठहाके लगाने लगते हैं और वो अपनी बात जारी रखते हैं। यह पहली बार ने नहीं था जब सरदार पटेल भारतीय मुसलमानों के पाकिस्तान के प्रति वफादारी की बात की थी।

उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री जीबी पंत को लिखे अपने पत्र में 9 जनवरी 1950 को रामलला और माता सीता की मूर्तियों के बाबरी मस्जिद के भीतर अचानक से प्रकट होने के बाद पटेल ने लिखा था, “प्रधानमंत्री ने अयोध्या के घटनाक्रम पर चिंता व्यक्त करते हुए आपको पहले ही एक टेलीग्राम भेज दिया है। मैंने आपसे लखनऊ में इसके बारे में बात की थी। मुझे लगता है कि यह विवादित मुद्दा बहुत गलत समय पर उठाया गया है, देश के दृष्टिकोण से भी और अपने स्वयं के प्रांत के दृष्टिकोण से भी। हाल ही में व्यापक सांप्रदायिक मुद्दे केवल विभिन्न समुदायों की आपसी संतुष्टि के लिए हल किए गए हैं। जहाँ तक मुसलमानों का सवाल है, वे अपनी नई वफादारी के लिए सेटल हो रहे हैं।”

देश के प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी के 6 साल पूरे होने के बाद नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता की आड़ में अलग-थलग पड़े मिथक भी अब दूर हो रहे हैं। लेफ्ट के प्रिय ’बुद्धिजीवी’ शरजील इमाम ने नागरिकता संशोधन अधिनियम के पारित होने के बाद राष्ट्रीय राजधानी में भड़की हिंसा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उसने इस मामले पर विस्तार से लिखा और बोला है।

शरजील इमाम, पाकिस्तान के निर्माता मोहम्मद अली जिन्ना को एक भारतीय नेता मानता है। उसने जिन्ना का उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसे बहुत से सबक हैं जिनसे भारतीय मुसलमान सीख सकते हैं। उसके अनुसार, जिन्ना एक भारतीय मुस्लिम नेता थे, जो हिंदू पुनरुत्थानवाद की ताकतों के खिलाफ लड़ रहे थे। हालाँकि, उसने कहा कि मुसलमानों ने भारत को ‘धर्मनिरपेक्षता’ के आदर्शों के कारण नहीं चुना। उसका कहना था कि मुसलमान अपनी संपत्ति और अन्य कारणों के कारण भारत में ही रह गए।

इस प्रकार, सरदार पटेल के शब्द और लेफ्ट के प्रिय ’बुद्धिजीवी’ शरजील इमाम की बातों से स्पष्ट हो जाता है कि ‘मुसलमानों ने इस्लामिक पाकिस्तान की बजाय धर्मनिरपेक्ष भारत को चुना’ नेहरूवादी सेक्युलर राज्य के ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ की विचारधारा का एक स्थायी मिथक है। हालाँकि इस मिथक के साथ ही अन्य मिथकों को भी कूड़ेदान में डालाना समय की माँग है।

महाराष्ट्र सियासी संकट के बीच मिलिए शंकर सिंह वाघेला से, ऑपइंडिया से खास बातचीत: की थी ‘रिसोर्ट पॉलिटिक्स’ की शुरुआत, PM मोदी के रहे हैं दोस्त

महाराष्ट्र में महाविकास अघाड़ी सरकार का जाना लगभग तय माना जा रहा है। शिवसेना के बागी नेता एकनाथ शिंदे (Eknath Shinde) उनका समर्थन करने वाले अन्य विधायकों के साथ असम के गुवाहाटी में डेरा जमाए हुए हैं। इन बागी विधायकों ने उद्धव सरकार को घुटनों पर ला दिया है। इन सबके बीच रिसॉर्ट पॉलिटिक्स (Resort Poltics) खासा चर्चा में। रिसॉर्ट पॉलिटिक्स के तहत कई सरकारें बनाई और गिराई गईं। वर्ष 1995 में एक सफल तख्तापलट गुजरात में भाजपा के बागी नेता शंकर सिंह वाघेला ने किया था। गुजरात में बापू के नाम से मशहूर शंकर सिंह वाघेला ने मध्य प्रदेश के खजुराहो में कॉन्ग्रेस के शासन में अपने समर्थक विधायकों के साथ लंबे समय तक डेरा जमाया हुआ था।

ऑपइंडिया गुजराती के संपादक सिद्धार्थ छाया ने शंकर सिंह वाघेला के गाँधी नगर स्थित आवास पर जाकर उनका इंटरव्यू लिया। इस दौरान उन्होंने अपने समय के मित्र और विरोधी नरेंद्र मोदी सहित गुजरात की राजनीति के बारे में खुलकर चर्चा की।

ऑपइंडिया: बापू, अब क्या कर रहे हो?

शंकर सिंह वाघेला: इन दिनों मैं खेती कर रहा हूँ और अपने परिवार के साथ समय बिता रहा हूँ। मैं जरूरतमंदों की मदद करता हूँ, पुराने दोस्तों से मिलता हूँ, सामाजिक और राजनीतिक काम करता हूँ और दिन भर खुद को व्यस्त रखता हूँ। इसके अलावा सुबह 6 से 8 बजे तक मैं व्यायाम करता हूँ और प्रकृति के साथ समय बिताता हूँ, जहाँ मुझे तोते, मोर, गौरैया और कभी-कभी बंदर भी देखने को मिलते हैं। संक्षेप में कहूँ तो, मैं जीवन का आनंद ले रहा हूँ।

ऑपइंडिया: क्या आप राजनीति से दूर रहते हैं?

शंकरसिंह वाघेला : राजनीतिक काम ही चल रहा है। कुछ मुलाकातें होती रहती हैं। मैं लंबे से राजनीति से जुड़ा हुआ हूँ। यह काम 2022 तक जारी रहेगा।

ऑपइंडिया: आज महाराष्ट्र में जो हो रहा है वह आपके लिए नया नहीं है। इस पर आप क्या कहना चाहेंगे?

शंकरसिंह वाघेला : लोग कहते हैं कि यह सब राजनीतिक मतभेदों के कारण हो रहा है, लेकिन यह सब केवल मूर्ख बनाने वाली बातें हैं। 1965 तक राजनीतिक विचारधारा का अस्तित्व था। पहले देश, फिर पार्टी और आखिरी में अपना हित सर्वोपरि था। अब हर कोई खुद को प्राथमिकता दे रहा है। हर कोई चाहता है कि पार्टी बदले में उनके लिए कुछ करे, लेकिन जब उन्हें उम्मीद के मुताबिक वह सब नहीं मिलता, तो उनका इगो हर्ट हो जाता है और इस तरह के हालात बन जाते हैं।

वह आगे क​हते हैं, “शिवसेना में जो हो रहा है वह रातोंरात नहीं हुआ है। अगर आपको जल्दबाजी में कोई कदम उठाना है, तो आपको राजनीति में नहीं आना चाहिए। शिवसेना, कॉन्ग्रेस और राकांपा गठबंधन यानी महाविकास अघाड़ी (एमवीए) की शुरुआत ही एनसीपी में नाकाम बगावात से हुई थी। अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है। हकीकत में ऐसी बातें कोर्ट में नहीं जानी चाहिए थीं। कुछ ही मामले होने चाहिए जो कोर्ट तक पहुँचने चाहिए। याद है जब इंदिरा गाँधी पर चुनाव में धाँधली का आरोप लगाया गया और यह मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट तक पहुँच गया। शिवसेना के लोग हमेशा से महत्वाकांक्षी रहे हैं।”

उन्होंने कहा, “जिस तरह से चीजें चल रही हैं, उससे लगता है कि गुजरात और महाराष्ट्र में एक साथ चुनाव हो सकते हैं। यह सब देखकर लोग एंटरटेन हो रहे हैं। मुझे इस दिसंबर में महाराष्ट्र में चुनाव होने की उम्मीद है।”

ऑपइंडिया: महाराष्ट्र की ‘रिजॉर्ट पॉलिटिक्स’ गुजरात के लिए कोई नहीं बात नहीं है। हमने यहाँ खजुराहो तख्तापलट देखा है। किस बिंदु पर नेता को लगता है कि उसके पास बहुमत जुटाने के लिए समर्थक हैं?

शंकरसिंह वाघेला: यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि इसे कौन प्रायोजित कर रहा है। उस वक्त मेरे विधायकों ने मुझसे शिकायत की थी कि पार्टी में कोई उनकी बात नहीं सुन रहा है। उन्होंने मुझे भी नजरअंदाज किया, जिसने राज्य में पार्टी को सत्ता में लाने के लिए जमीनी स्तर पर काम किया था, वह भी टिपिंग पॉइंट था। जब मैंने महसूस किया कि पार्टी में राजनीति बढ़ गई है, तो विधायक खुद प्रायोजक बन गए। अगर कोई उस व्यक्ति की बात नहीं सुनता जिसने पार्टी की जीत दिलाने में जीतोड़ मेहनत की है, तो क्या इससे वह शख्स नाराज नहीं होगा? बागी विधायकों ने खुद ऐसा किया। एक मुख्यमंत्री को बनाने में सभी विधायकों का सामूहिक प्रयास होता है। जब कोई काम ही नहीं हो रहा था तो विधायक अपने चुने हुए लोगों को क्या कहेंगे? बस यही मुद्दा था।

उन्होंने कहा, “मैं उस समय कॉन्ग्रेस के नेताओं से नहीं मिला था। ना ही कॉन्ग्रेस ने मुझे अपना समर्थन दिया था। हम सब कॉन्ग्रेस को हराकर सत्ता में आए थे। फिर वे हमारा समर्थन क्यों करेंगे? 120 में से 105 विधायक एक तरफ आए थे। कॉन्ग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने का कोई मौका नहीं था। बात बस इतनी थी कि हम अपने स्वाभिमान से समझौता करके राजनीति नहीं कर सकते थे।” वाघेला ने बताया, “हमारे साथ पार्टी में बाहरी लोगों की तरह व्यवहार किया जाता था। यह हमारे स्वाभिमान के खिलाफ था। इसी वजह से खजुराहो वाली घटना हुई।”

ऑपइंडिया: खजुराहो ही क्यों?

शंकरसिंह वाघेला: ओह, हम तो यहीं थे, अपने गाँव में। किसी विधायक पर दबाव नहीं डाला गया था। सभी अपनी मर्जी से आने और जाने के लिए स्वतंत्र थे, लेकिन जब गुजरात पुलिस ने कड़ा रुख अपनाया, तो विधायकों ने गुजरात से बाहर सुरक्षित स्थान पर जाने के लिए कहा, क्योंकि वे यहाँ खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे थे।

उन्होंने कहा, “कहाँ जाना है, ये हमारा सवाल था। हमने गैर-भाजपा शासित राज्य में जाने का फैसला किया। उस समय केवल मध्य प्रदेश में कॉन्ग्रेस की सरकार थी। इसलिए हमने केंद्रीय मंत्री (उस वक्त केंद्र में भी कॉन्ग्रेस की सरकार थी) को फोन किया और कहा कि हमें खजुराहो हवाई पट्टी का इस्तेमाल नाइट लैंडिंग के लिए करने दें। चूँकि, यह एक चार्टर्ड फ्लाइट थी और राजनीतिक महत्व से जुड़ी थी, इसलिए वे सहमत हो गए।”

उन्होंने कहा, “हम खजुराहो गए क्योंकि इसका नाम सबसे पहले आया। अगर किसी और जगह का नाम आता तो हम कहीं और चले जाते। हमने होटल भी बुक नहीं किए थे। दिलीप पारिख ने इसमें मदद की और भुगतान भी उनके एक दोस्त ने किया।”

ऑपइंडिया: इस तरह से लंबे समय तक रिसॉर्ट में रहना जैसे आपके मामले में यह एक सप्ताह से अधिक चला। ऐस में विधायकों की मानसिक स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ता है? क्या वे रिसॉर्ट में घर जैसा महसूस करते हैं?

शंकर सिंह वाघेला: नहीं, ऐसा कुछ नहीं है। जब तक हमारा लक्ष्य पूरा नहीं हो जाता, तब तक रिसॉर्ट छोड़ने का कोई मतलब नहीं है। तब भी उमा भारती और काशुभाऊ ठाकरे हमसे मिलने आए थे, लेकिन उस वक्त वहाँ मौजूद सभी विधायकों ने कहा था कि वे वापस नहीं आना चाहते। बाद में जब हमें कॉन्ग्रेस से बिना शर्त समर्थन मिला और तब हमने एक गुट बनाया। उस समय एक भी कॉन्ग्रेस विधायक को मंत्री नहीं बनाया गया था।

ऑपइंडिया: क्या खजुराहो की घटना ऐसी पहली राजनीतिक घटना थी? अब ‘रिजॉर्ट पॉलिटिक्स’ फैशन बन गई है। क्या यह आगे भी जारी रहेगा या फिर आप आने वाले समय में इसका अंत देख रहे हैं?

शंकरसिंह वाघेला: नहीं, खजुराहो पहली घटना नहीं थी। इससे पहले 1967 में मध्य प्रदेश ने सरकार के लिए एक संयुक्त विधायक दल का गठन किया था। हरियाणा के अयाराम-गयाराम को तो सभी जानते हैं। पहले के समय में विपक्ष भी कहाँ था? 1969 में इंडिकेटेड सिंडिकेट के रूप में विपक्ष एक साथ आने लगा। यह एक प्रक्रिया है और लोकतंत्र का हिस्सा है। लोगों को इससे दूर नहीं भागना चाहिए। चिमनभाई पटेल भी समर्थन करने वाले विधायकों को अपने फार्महाउस पर ले गए थे।

उन्होंने कहा, “आपको अपने विधायकों की सुरक्षा के लिए आइसोलेशन की जरूरत है। राज्यसभा में जब भी बॉर्डर-केस होता है तो ऐसा ही होता है। वास्तव में मेरा मानना है कि राज्यसभा में चुनाव नहीं होने चाहिए। प्रत्येक पार्टी के पास आनुपातिक सीटें होनी चाहिए और उन्हें सिर्फ नामांकन फॉर्म दाखिल करना चाहिए।”

ऑपइंडिया: पिछले तीन दशकों से गुजरात में विपक्ष मजबूत क्यों नहीं है?

शंकर सिंह वाघेला: जब भी मैच फिक्सिंग होती है तो ऐसी स्थिति पैदा हो जाती है। अब कॉन्ग्रेस में कोई मैच फिक्सिंग नहीं है। अहमद पटेल के चुनाव के दौरान मानसिंह चौहान के अलावा किसी ने मुझसे यह नहीं पूछा था कि उन्हें वोट दूँ या नहीं। लेकिन अब पार्टी में दम नहीं रहा। जब आपसी तालमेल में कमी आ जाती है, तो ऐसी स्थिति पैदा हो जाती है। ऐसे में आपको अपने विधायकों का ध्यान रखने की जरूरत है। उन्होंने कहा, “अभी भले ही कॉन्ग्रेस गुजरात में जीतने की जीतोड़ कोशिश कर रही हो, लेकिन कॉन्ग्रेस में ऐसा कोई भी नहीं है जो उनका सही से मार्गदर्शन कर सके। उनके पास अनुभव के साथ-साथ भावनात्मक जुड़ाव की भी कमी है, जो एक बड़ी चिंता है।”

ऑपइंडिया: आपकी और नरेंद्र मोदी की दोस्ती की काफी चर्चा रही है। जब वे प्रधानमंत्री बने तो आप गुजरात विधानसभा में विपक्ष के दमदार नेता के रूप में नजर आए।

शंकरसिंह वाघेला: जब आप एक सार्वजनिक व्यक्ति होते हैं, तो आपको हमेशा मर्यादा बनाए रखनी चाहिए और दूसरों के प्रति सम्मानजनक होना चाहिए। जब मैं विपक्ष का नेता था तो मैंने कभी भी अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया। जब मैं जनसंघ और भाजपा में था, तो मैंने हमेशा इंदिरा गाँधी को इंदिरा जी कहकर बुलाया था। वे मेरी वैचारिक विरोधी थीं, दुश्मन नहीं।

उन्होंने कहा, “उस समय कॉन्ग्रेस नेता मोदी के शादीशुदा होने का विरोध करने जा रहे थे। मैं तब साबरकांठा में था और मीडिया के दोस्तों ने इस मामले में मुझे प्रतिक्रिया व्यक्त करने के लिए कहा। तब मैंने कहा था, मैं इस बात का गवाह हूँ कि नरेंद्र मोदी ने वास्तव में कभी भी वैवाहिक जीवन का सुख नहीं लिया (कानूनी रूप से विवाहित होने के बावजूद)। मैंने उस वक्त यह भी कहा था, इस मुद्दे को तूल देने से कॉन्ग्रेस को वोट नहीं मिलने वाले। यह उनका निजी मामला है। अतीत में उन्होंने मुझे अपना विश्वसनीय समझकर जो कुछ साझा किया था, वह आज भी मैंने अपने तक ही सीमित रखा है।”

वह आगे कहते हैं, “हम तब काफी करीब थे। मोटरसाइकिल और जीप पर साथ-साथ जाते थे। मुझे बीजेपी छोड़ो हुए 25 साल हो गए हैं। इन 25 सालों में हम 5 बार (सार्वजनिक रूप से) भी नहीं मिले हैं। मैं पिछले 7-8 सालों में दिल्ली में एक बार भी उनसे नहीं मिला हूँ। राजनीति में विरोधी विचार हो सकते हैं, लेकिन दुर्भावना नहीं रखनी चाहिए।”

ऑपइंडिया: कहा जाता है कि खजुराहो के दौरान आपकी एक शर्त थी कि मोदी गुजरात छोड़ दें?

शंकरसिंह वाघेला: देखिए, असल में केशुभाई पटेल ने मुझे नरेंद्र मोदी को ‘समस्या’ बताया था। मैंने तब कहा था कि उनके विचार यही हैं। जब मैं खजुराहो से लौटा तब भी गुजरात में आंतरिक दलगत राजनीति जारी थी। इसलिए, उस समय मैंने वाजपेयी को सुझाव दिया कि मोदी को पार्टी में एक बड़ा पद दिया जाए और गुजरात से बाहर भेज दिया जाए। उन्होंने तब सुझाव दिया था कि केशुभाई की जगह या तो कांशीराम राणा या सुरेश मेहता को मुख्यमंत्री बनाया जाए।

ऑपइंडिया: 2022 के बाद क्या? राजनीति से सन्यास?

शंकर सिंह वाघेला: अभी तो नहीं कह सकते, लेकिन मैं 2024 में गुजरात के रास्ते दिल्ली जाना चाहता हूँ।

कौन हैं शंकर सिंह वाघेला

81 वर्षीय शंकर सिंह वाघेला ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत भाजपा (जनसंघ) से की। इंदिरा गाँधी द्वारा लगाए गए आपातकाल के दौरान उन्हें जेल में डाल दिया गया था। इसके बाद वे भाजपा के वरिष्ठ नेता बने। 1996 में, उन्होंने अपनी खुद की राजनीतिक पार्टी राष्ट्रीय जनता पार्टी बनाई। इसके बाद कॉन्ग्रेस के समर्थन से केशुभाई पटेल की भाजपा सरकार को गिराकर गुजरात में सरकार बनाई। 1998 में, गुजरात में नए सिरे से चुनाव के बाद भाजपा फिर से सत्ता में आई। इसके बाद उनकी पार्टी का कॉन्ग्रेस में विलय हो गया। 2017 में उन्होंने कॉन्ग्रेस छोड़ दी, फिर एक और राजनीतिक संगठन, जन विकल्प मोर्चा बनाया। इस पर उन्होंने 2017 का चुनाव लड़ा लेकिन हार गए। 2019 से 2020 के बीच वह एनसीपी के सदस्य थे। उन्होंने जून 2020 में राकांपा छोड़ दी।

‘मदरसों में सिखाते हैं ईशनिंदा पर गला काटना’: कन्हैया लाल पर आरिफ मोहम्मद खान की दो टूक, कहा- हम गंभीर बीमारी को नजरअंदाज कर रहे

केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान (Kerala Governor Arif Mohammad Khan) ने उदयपुर में कन्हैया लाल की निर्मम हत्या को लेकर मदरसों पर सवाल उठाया है। उन्होंने बुधवार (29 जून 2022) को कहा कि मदरसों में कट्टरपंथी तालीम दी जाती है और वहाँ पढ़ने वाले बच्चों को ईशनिंदा पर सिर काटना सीखाया जाता है।

राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने कहा, “लक्षण दिखाई देने पर हम घबरा जाते हैं, लेकिन गंभीर बीमारी को नजरअंदाज कर देते हैं। मदरसों में बच्चों को पढ़ाया जा रहा है कि ईशनिंदा की सजा सिर काटना है। इसे अल्लाह के कानून के रूप में पढ़ाया जा रहा है। वहाँ जो पढ़ाया जा रहा है, उसकी जाँच होनी चाहिए।”

केरल के राज्यपाल खान ने कहा कि यह इस्लामी कानून कुरान से नहीं आया है। यह कानून शहंशाहों के जमाने में कुछ लोगों ने बनाए है। अब यही कानून बच्चों को सिखाया जा रहा है। इसे ही अब मदरसों में पढ़ाया जा रहा है और बच्चों को कच्ची उम्र में कट्टरता की शिक्षा दी जा रही है।

राज्यपाल खान इससे पहले भी कट्टरपंथी मुस्लिमों की आलोचना कर चुके हैं। उन्होंने इस साल फरवरी में कर्नाटक में बुर्का विवाद को लेकर कहा कि जिसे यूनिफॉर्म पसंद नहीं है तो उसे संस्थान छोड़ देना चाहिए। अनुशासन का पालन सभी को करना चाहिए। अनुशासन को तोड़ने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, क्योंकि अनुशासन संस्थानों की नींव है। 

उन्होंने आगे कहा था, “मेरा मानना है कि कौन क्या पहनता है, ये कभी भी विवाद का विषय नहीं होना चाहिए। यह हर व्यक्ति का अपना अधिकार है। शर्त सिर्फ इतनी है कि शालीनता होनी चाहिए, सभ्यता होनी चाहिए, संस्कृति होनी चाहिए। जो आर्मी में है वो ये नहीं कह सकता कि मैं जो चाहूँगा वह पहन लूँगा। पुलिसवाला यह नहीं कह सकता कि जो मैं चाहूँगा वह पहन लूँगा।”

इस दौरान उन्होंने यह भी कहा था कि कई चीजें जबरन मजहब से जोड़ी गई हैं। तीन तलाक को भी मजहब से जोड़ा गया। इसके साथ ही उन्होंने कुरान का हवाला देते हुए कहा था कि हिजाब शब्द का इस्तेमाल पर्दे के लिए किया गया है, पहनावे के लिए नहीं। पहनावे के लिए स्कार्फ होता है। हिजाब का इस्लाम से कोई लेना-देना नहीं है। यह किसी मजहब की पहचान नहीं है।

गौरतलब है कि राजस्थान के उदयपुर में मंगलवार (28 जून 2022) को टेलर कन्हैया लाल की नृशंस हत्या कर दी गई थी। दोपहर करीब ढाई बजे बाइक पर सवार मोहम्मद रियाज और गौस मोहम्मद आए। नाप देने का बहाना बनाकर वे दुकान में गए। इससे पहले कन्हैया लाल कुछ समझ पाते, दोनों इस्लामी हत्यारों ने उनकी गर्दन काट दी।

यही नहीं इस्लामवादी हत्यारों ने 17 जून को अपना वीडियो सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था। वीडियो में वह कह रहा था, “मैं मोहम्मद रियाज राजस्थान के उदयपुर, खांजीपीर से। ये वीडियो मैं जुमे के दिन बना रहा हूँ। माशाल्लाह और 17 तारीख है। मैं इस वीडियो को उस दिन वायरल ​करूँगा, जिस दिन अल्लाह की शान में गुस्ताखी करने वाला का सिर कलम कर दूँगा। आपको एक मैसेज देता हूँ कि रियाज ने सिर कलम करने की शुरुआत तो कर दी है। बाकी के जो बचे हैं उन सभी का सिर आपको कलम करना है। इस बात का ध्यान रखना।”

‘इस्लाम का तुष्टिकरण नहीं करें, यह बहुत भारी पड़ेगा’: जिस डच MP ने नूपुर शर्मा का किया था समर्थन, उन्होंने कन्हैया लाल पर भी किया अलर्ट

राजस्थान के उदयपुर में 28 जून 2022 को इस्लामी दरिंदों ने कन्हैया लाल का गला काट डाला था। इस घटना के बाद नीदरलैंड के सांसद गीर्ट वाइल्डर्स (Geert Wilders) ने इस्लामी कट्टरपंथ को लेकर भारत को फिर से आगाह किया है। वाइल्डर्स वही डच सांसद हैं जिन्होंने धमकियों के बावजूद नूपुर शर्मा का समर्थन किया था।

उदयपुर की घटना के बाद वाइल्डर्स ने कहा है कि कट्टरवाद, आतंकवाद और जिहादियों से हिंदुत्व को बचाना जरूरी है। उन्होंने ट्वीट कर कहा, “एक दोस्त होने के नाते मैं भारत को सलाह दे रहा हूँ कि असहिष्णुता के प्रति सहिष्णु होना बंद कीजिए। जिहादियों, आतंकवादियों और कट्टरपंथियों से हिंदुत्व की रक्षा कीजिए। इस्लाम का तुष्टिकरण नहीं करिए, नहीं तो यह बहुत भारी पड़ेगा। हिंदुओं को ऐसे नेता चाहिए जो शत प्रतिशत उनकी रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हों।”

एक अन्य ट्वीट में उन्होंने कहा है, “भारत में हिंदुओं को सुरक्षित होना चाहिए। यह उनका देश है। उनकी मातृभूमि है। भारत उनका है। भारत कोई इस्लामिक देश नहीं है।” गौरतलब है कि जून की शुरुआत में वाइल्डर्स ने नूपुर शर्मा का समर्थन करते हुए कहा था कि अपराधी और आतंकवादी अपनी धार्मिक असहिष्णुता और घृणा व्यक्त करने के लिए सड़क पर हिंसा करते हैं।

इसके बाद उन्हें कट्टरपंथियों की ओर से धमकी भी मिली थी। इसके स्क्रीनशॉट साझा करते हुए उन्होंने लिखा था, “यही कारण है कि मैं बहादुर नूपुर शर्मा का समर्थन कर रहा हूँ। जान से मारने की सैकड़ों धमकियाँ। यह मुझे उनका समर्थन करने के लिए और भी अधिक दृढ़ बनाता है। क्योंकि, बुराई कभी नहीं जीत सकती। कभी नहीं।”

डच सांसद ने मुस्लिम देशों की निंदा करते हुए कहा था, ”इस्लाम असहिष्णु है और इसकी विचारधारा दुनिया के लिए खतरा है। भारत को माफी माँगने के लिए कहने वाले मुल्क बेहद क्रूर शरिया शासन का पालन करते हैं और उनका मानवाधिकार का ट्रैक रिकॉर्ड बेहद खराब है।”