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वर्ल्ड चैंपियन मुक्केबाज निखत जरीन ने आसन की तस्वीर शेयर कर बताए योग के फायदे, कट्टरपंथी बोले- मैडम 5 वक्त की नमाज पढ़ो

वर्ल्ड चैंपियन भारतीय महिला मुक्केबाज निखत जरीन (Nikhat Zareen) ने योग दिवस पर तस्वीरें इंस्टाग्राम और ट्विटर पर शेयर की। इन तस्वीरों में वह योग करते हुए नजर आ रही हैं। उन्होंने कैप्शन में योग के फायदे भी बताए। उन्होंने लिखा, “योग करने के कई फायदे हैं। इससे होने वाला लाभ कभी कम नहीं होता है। योग वह प्रकाश है, जो एक बार जला दिया जाए तो कभी कम नहीं होता है। इसकी लौ हमेशा तेज रहेगी। योग का अभ्यास करें। आप सभी को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की बधाई और शुभकामनाएँ।”

लेकिन योग को लेकर निखत जरीन का यह सन्देश कट्टरपंथियों को रास नहीं आया। वे इस्लाम की दुहाई देते हुए योग की बजाए दिन में 5 बार नमाज अदा करने की सलाह दे रहे हैं। वूमेन्स वर्ल्ड बॉक्सिंग चैम्पियनशिप में गोल्ड मेडकर जीतकर इतिहास रचने वाली निखत की तस्वीर पर एक यूजर ने लिखा, “नमाज सबकी अम्मी है।”

एक ने कमेंट किया, “योग करने से बेहतर दिन में 5 बार नमाज अदा करना है।”

फोटो साभार: निखत जरीन का इंस्टाग्राम

जिद्दी जेहन ने निखत जरीन द्वारा योग के फायदे बताने पर कमेंट किया, “अच्छा तो ये बताओगी अब आप?”

फोटो साभार: निखत जरीन का इंस्टाग्राम

शारूक्नी ने लिखा, “मैडम 5 वक्त की नमाज पढ़ो, बस वहीच दुनिया का सबसे बड़ा योग है।”

फोटो साभार: निखत जरीन का इंस्टाग्राम

गौरतलब है कि निखत जरीन थाईलैंड की जितपोंग जुटामेंस को 5-0 से हराकर विश्व चैंपियन बनने वाली भारत की पाँचवीं महिला मुक्केबाज हैं। तेलंगाना के निजामाबाद की रहने वाली महिला बॉक्सर निखत जरीन ने पिछले महीने एक इंटरव्यू में कहा था, “मैं एक ऑर्थोडॉक्स (रूढ़िवादी) समुदाय से आती हूँ। जब भी मैं बॉक्सिंग करती थी, तो लोग बहुत ज्यादा कमेंट करते थे। हालाँकि, मैंने किसी की भी नहीं सुनी, क्योंकि मुझे मेरा सपना पता था कि मुझे मेरे देश का प्रतिनिधित्व करके देश के लिए मेडल जीतना है। इसीलिए मेरा ध्यान केवल बॉक्सिंग करने और मेडल पर था।”

निखत ने यह भी कहा था, “मेरे खुद के घर में मेरी दो बहनें हिजाब पहनती हैं। मैं इसलिए नहीं पहनती क्योंकि मैं स्पोर्ट्स में हूँ। एक भारतीय के तौर पर देश को रिप्रेजेंट कर रही हूँ तो मैं कोशिश करती हूँ कि स्पोर्ट्स में धर्म न आए, क्योंकि खेल का कोई धर्म नहीं होता।” इसके साथ ही बॉक्सिंग स्टार ने सलमान खान से मिली बधाई पर कहा था कि वो बचपन से सलमान खान को ही पसंदीदा हीरो मानती थीं और जब सलमान खान ने उनके लिए ट्वीट किया तो वो रोईं भी।

एलन मस्क का बेटा बन गया लड़की, बदला अपना नाम: कहा – बायोलॉजिकल पिता से किसी भी सूरत में कोई रिश्ता नहीं रखना चाहती

दुनिया के सबसे अमीर शख्स एलन मस्क की ट्रांसजेंडर बेटे ने अपने पिता से सारे रिश्ते तोड़ते हुए अपने नाम से ‘मस्क’ सरनेम भी हटा दिया है। ‘ज़ेवियर मस्क’ के रूप में पहचाने जाने वाली एलन मस्क के बेटे ने कैलिफोर्निया के सैंटा मोनिका में दस्तावेजी प्रक्रिया पूरी करते हुए अपना नया नाम ‘विवियाना जेन्ना विल्सन’ रख लिया है और लड़की बन गई है। उन्होंने अपनी ‘जेंडर आइडेंटिटी’ को इसका एक कारण बताया है। वहीं दूसरा कारण चौंकाने वाला है।

उनका कहना है कि वो अब अपने बायोलॉजिकल पिता के साथ नहीं रहती हैं और किसी भी स्थिति में उनके साथ किसी भी प्रकार का सम्बन्ध रखने की इच्छुक नहीं हैं। ये भी स्पष्ट नहीं है कि एलन मस्क की 213 बिलियन डॉलर (16.6 लाख करोड़ रुपए) की संपत्ति में से कोई हिस्सा मिलेगा या नहीं। लॉस एंजेंस काउंटी सुपीरियर कोर्ट में दायर याचिका में उन्होंने अपना नया बर्थ सर्टिफिकेट बनवाने और नाम बदलने की बात कही है।

पूर्व में ‘ज़ेवियर एलेक्जेंडर मस्क’ फ़िलहाल 18 वर्ष की हैं, ने अदालत में दायर याचिका में कहा है कि उनका जेंडर वाला पहचान पुरुष की जगह स्त्री रखा जाए। कैलिफोर्निया में 18 वर्ष के बाद ‘एज ऑफ कंसेंट’ होता है, जहाँ इस तरह की चीजों के लिए अनुमति है। ऑनलाइन दस्तावेजों में उनके नए नाम को संशोधित कर दिया गया है। उनकी माँ जस्टिन विल्सन के साथ एलन मस्क का 2008 में ही तलाक हो चुका है। वो एक कनाडाई लेखिका हैं, जिन्होंने 2000 में एलन मस्क से शादी की थी।

एलन मस्क का ट्रांसजेंडर कम्युनिटी को लेकर रुख पर भी आलोचना होती रही है। एक बार उन्होंने ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए ‘प्रोनाउन’ पर टिप्पणी की थी। एक बार उन्होंने कहा था कि वो ट्रांस के खिलाफ नहीं हैं। हाल ही में एलन मस्क ने अमेरिका में महिलाओं के फर्टिलिटी रेट गिरने पर चिंता जताई थी। उन्होंने कहा था कि वो अपना योगदान दे रहे हैं। उन्होंने कहा था कि जो जितना अमीर होता है, उसके उतने कम बच्चे होते हैं। उन्होंने इसे ‘डेमोग्राफिक डिजास्टर’ नाम दिया था।

RJD के बाहुबली नेता अनंत सिंह को 10 साल सश्रम कारावास की सजा, घर में मिला था AK-47 और ग्रेनेड, अब विधायकी पर संकट

बिहार के मोकामा से RJD के बाहुबली विधायक अनंत सिंह (Anant Singh) उर्फ ‘छोटे सरकार’ को AK-47 मामले में सजा सुनाई गई है। पटना स्थित जज त्रिलोकी दुबे की MP-MLA कोर्ट ने मंगलवार (21 जून 2022) को 10 साल सश्रम कारावास की सजा सुनाई। कोर्ट ने इस मामले में 14 जून को उन्हें दोषी करार दिया था। सजा मिलने के बाद अनंत सिंह की विधानसभा की सदस्यता जाने का खतरा है।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के अनुसार, दो वर्ष या इससे ज्यादा की सजा होने पर विधानसभा या संसद की सदस्यता स्वत: खत्म हो जाती है। हालाँकि, उनके वकील सुनील कुमार ने कहा कि सजा के फैसले को पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी जाएगी। अदालत ने अनंत सिंह के पैतृक आवास के केयर टेकर को भी 10 साल की सजा सुनाई है।

इस कांड की सुनवाई स्पीडी ट्रायल के तहत 32 महीने तक चली। इस कांड में विधायक अनंत सिंह को सुप्रीम कोर्ट तक से जमानत नहीं मिली थी। अनंत सिंह 25 अगस्त 2019 से पटना के बेऊर जेल में बंद हैं। इस मामले में विधायक और उनके केयर टेकर पर 15 अक्टूबर 2020 में आरोप तय किया गया था। इसके बाद विशेष लोक अभियोजक ने 13 पुलिस अभियोजन गवाहों को कोर्ट में पेश किया। विधायक की ओर से बचाव पक्ष में 34 गवाह पेश किए गए।  

क्या है पूरा मामला

पटना पुलिस ने सूचना के आधार विधायक अनंत कुमार सिंह के पैतृक आवास बाढ़ थाना के लदवां गाँव में 16 अगस्त 2019 को छापेमारी की थी। इस मामले में बाढ़ की तत्कालीन एसपी लिपि सिंह के नेतृत्व में पुलिस की ये रेड करीब 11 घंटे तक चली थी।

छापेमारी में विधायक के पुश्तैनी घर से एक प्रतिबंधित हथियार AK-47, 33 जिंदा कारतूस और दो ग्रेनेड बरामद हुए थे। इस रेड के बाद अनंत सिंह फरार हो गए थे। बिहार पुलिस उनकी तलाश में जुटी थी तो वे पुलिस को चकमा देने लगे और सोशल मीडिया पर एक के बाद एक वीडियो जारी कर रहे थे।

विधायक के खिलाफ लुकआउट नोटिस भी जारी हुआ था

पुलिस ने फरार चल रहे अनंत सिंह की गिरफ्तारी के लिए लुकआउट नोटिस भी जारी किया था। विधायक ने दिल्ली के साकेत कोर्ट में अगस्त में सरेंडर किया था। इसके बाद पटना पुलिस उन्हें ट्रांजिट रिमांड पर पटना ले आई थी। 

एमपी-एमएलए के विशेष कोर्ट ने दोनों आरोपितों के खिलाफ आर्म्स एक्ट की 7 धारा, भारतीय दंड संहिता (IPC) की दो धारा और दो विस्फोटक अधिनियम के तहत आरोप तय किया था। दोनों के खिलाफ आपराधिक षड्यंत्र रचने का भी आरोप तय हुआ था। विधायक अनंत सिंह पर एमपी-एमएलए विशेष कोर्ट में 5 आपराधिक मामले सेशन ट्रायल और 4 आपराधिक मामले न्यायिक दंडाधिकारी एमपी-एमएलए के विशेष कोर्ट में चल रहा है।

इसके अलावा दानापुर, गया व बाढ़ में भी उनके खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं।

कब-कब क्या हुआ

  • 16 अगस्त 2019: मोकामा विधायक अनंत सिंह के पैतृक आवास लंदावा से एके-47 और 2 ग्रेनेड बरामद 
  • 16 अगस्त 2019: बाढ़ थाने में दर्ज कराई गई थी एफआईआर 
  • 25 अगस्त 2019: दिल्ली के साकेत कोर्ट में किया था सरेंडर  
  • 5 नवंबर 2019: पुलिस ने चार्जशीट दायर की
  • 17 जून 2020: एमपी-एमएलए के विशेष कोर्ट में ट्रायल के लिए ट्रांसफर
  • 15 अक्टूबर 2020: आरोप गठित हुआ 
  • 14 जून 2022: अनंत सिंह दोषी करार
  • 21 जून 2022: अनंत सिंह को 10 साल की जेल की सजा

बता दें कि बाहुबली अनंत सिंह को बिहार का कद्दावर नेता माना जाता है और भूमिहार समाज में उनकी गहरी पैठ है। वे पहले नीतीश कुमार के करीबी थे, लेकिन 2015 में करीबी टूट गई। इसके बाद वे RJD में शामिल हो गए थे। एक बार उन्होंने नीतीश कुमार के ‘सुशासन की सरकार’ को ‘$%ड़ा की सरकार है’ बताया था। इसका वीडियो खूब वायरल हुआ था और सोशल मीडिया पर खूब मीम बने थे।

प्रियंका जी, आपने 1 माँगा हम मोहम्मद जुबैर के 35 फेक न्यूज दे रहे, हिंदू घृणा में इतना सना कि बच्चियों का भी करता है शिकार

फेक न्यूज फैलाने के कारण अक्सर सोशल मीडिया पर लताड़ खाने वाला ऑल्ट न्यूज का मोहम्मद जुबैर लिबरलों का चहेता है। यही वजह है कि यदि कोई उसे फेक न्यूज फैलाने वाले कहे तो सारे लिबरल बिलबिला उठते हैं। कुछ ऐसा ही इस बार शिवसेना की महिला नेता प्रियंका चतुर्वेदी के साथ हुआ।

प्रियंका चतुर्वेदी ने मोहम्मद जुबैर के कारण एक सामान्य यूजर को फटकार लगाई और उसे मुँह बंद रखने को कहा। यूजर की गलती यही थी कि वो जुबैर को फेक न्यूज फैलाने वाला बता रहा था। प्रियंका ने यूजर को लिखा, “कृपया जुबैर द्वारा फैलाई गई एक फर्जी खबर ढूँढने में मेरी मदद कर दो। अगर ऐसा नहीं कर सकते तो मुँह बंद करके बैठ जाओ।”

प्रियंका के ट्वीट पर अभी (खबर लिखने तक) तक यूजर ने जवाब नहीं दिया, लेकिन ऑपइंडिया प्रियंका की मदद के लिए ऐसे 35 मामले ढूँढ कर लाया है जब जुबैर ने खुले में झूठी खबर फैलाई और लिबरलों ने इस पर मौन धारण किए रखा। इनमें 35 केसों से जुबैर की हिंदू घृणा स्पष्ट तौर पर देखी जा सकती है।

  1. मोहम्मद जुबैर ने एक वीडियो शेयर कर के आरोप लगाया था कि लोनी में अब्दुल समद नाम के एक बुजुर्ग से जबरन ‘जय श्री राम’ बुलवाया गया, जबकि आरोपितों में आरिफ, आदिल और मुशाहिद भी शामिल थे। पुलिस की जाँच में ये मामला सांप्रदायिक नहीं निकला।
  2. मोहम्मद जुबैर ने एक अखबार की कटिंग ट्वीट की। इस खबर का शीर्षक था- “गो सेवा के नाम पर 20 लाख का दान जूता फरार हुआ पुजारी।” जो तस्वीर मोहम्मद जुबैर ने ट्वीट की वो उस समय की खबर नहीं बल्कि चार साल पहले राजस्थान की एक घटना थी। मोहम्मद जुबैर का ये तस्वीर पोस्ट करने का असली उद्देश्य श्रीराम मंदिर निर्माण को लेकर चल रहे देशव्यापी समर्पण निधि अभियान से जुड़ा हुआ साबित करते हुए लोगों को गुमराह करने का था।
  3. प्रोपेगेंडा वेबसाइट ‘ऑल्टन्यूज़’ के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर ने ‘दी लल्लनटॉप’ वेबसाइट के इंटरव्यू का एक हिस्सा शेयर किया। इस वीडियो में एक व्यक्ति मोदी सरकार की खामियों को गिनाता नजर आता है। साथ ही दावा किया गया कि यह शख्स मोदी समर्थक है। उसका फेसबुक प्रोफ़ाइल खँगालने पर पता चला कि उसने खुद को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का भावी विधायक उम्मीदवार बताया था
  4. मोहम्मद जुबैर ट्विटर पर तनिष्क विवाद का फायदा उठाते हुए यह साबित करने का प्रयास करते देखा गया कि लोग ‘जय श्री राम’ का नारा लगाकर तनिष्क के शोरूम पर हमला करने की प्लानिंग कर रहे हैं या फिर तनिष्क स्टोर में मौजूद लोगों को डराने का प्रयास कर रहे हैं। वीडियो सामने आने के बाद पता चला कि वहाँ कोई हिंसा या धमकी नहीं दी गई, बल्कि शांतिपूर्ण विरोध हुआ।
  5. हाथरस कांड के बाद सोशल मीडिया पर राहुल-प्रियंका के ठहाकों का वीडियो के वायरल हुआ, जो कार से वहाँ जा रहे थे। ऑल्टन्यूज़ ने ‘इंडिया टुडे’ से एक कदम आगे जाते हुए पूरी धूर्तता के साथ शीर्षक तो ‘हाथरस जाते हुए वीडियो’ का रखा लेकिन अपने आकाओं की जिस तस्वीर का फैक्टचेक किया है वह राहुल-प्रियंका के हाथरस जाते समय की नहीं बल्कि 2019 के आम चुनावों से पहले की है।
  6. जुबैर ने दावा किया कि उत्तर प्रदेश में गोंडा के विश्व हिंदू परिषद (VHP) के कुछ सदस्यों ने पुलवामा आतंकी हमले के ख़िलाफ़ विरोध रैली में देश विरोधी नारे लगाए। गोंडा पुलिस ने साफ़ किया कि VHP के विरोध प्रदर्शन से जुड़े वीडियो का इस्तेमाल ‘भ्रष्ट’ उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है और कहा कि इस तरह के नारे आयोजन के दौरान नहीं लगाए गए थे।
  7. जामिया की लाइब्रेरी में जब पुलिस पर पत्थरबाजी हुई तो प्रोपेगेंडा पोर्टल ‘ऑल्टन्यूज़’ ने दावा किया कि वीडियो में दिख रहे छात्र के हाथ में पत्थर नहीं, वॉलेट है। मोहम्मद जुबैर ने उस खबर को आगे बढ़ाया, लेकिन पोल खुलने पर लोगों का जवाब देना ही बंद कर दिया।
  8. मोहम्मद जुबैर ने ट्विटर पर एक वीडियो शेयर किया, जिसमें दो जैन मुनि बैठे दिख रहे हैं और कुछ लोग हाथ जोड़ कर खड़े हैं। बस, फिर क्या था! इसी तस्वीर के सहारे उसने दावा कर दिया कि ये लॉकडाउन का उल्लंघन हो रहा है। जबकि सच्चाई ये थी कि जैन मुनि कोरोना काल में जनसेवा कर रहे थे और लोगों व पशु-पक्षियों को भोजन दे रहे थे। उस फंक्शन की एक और तस्वीर थी, जिसे ज़ुबैर ने छिपा लिया। उस तस्वीर में भोजन सामग्रियों के पैकेट्स और फल-फूल रखे हुए थे, जिनका वितरण किया जा रहा था।
  9. ज़ुबैर के AltNews सहित मीडिया के कई प्रमुख स्रोतों ने इस खबर को स्पष्ट तौर पर यह साबित करने का प्रयास किया है कि अमरोहा में एक दलित को मंदिर में जाने के कारण गोली से मार दिया गया। जुबैर ने खुद इस फेक न्यूज़ को ट्वीट किया। अमरोहा पुलिस ने खुद छानबीन के बाद एक वीडियो जारी कर स्पष्ट करते हुए कहा कि इस घटना में युवक की जाति और मंदिर में प्रवेश का कोई प्रसंग था ही नहीं।
  10. एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें अल्लामा कौकब नूरानी नाम का एक मौलवी, कोरोना वायरस की वैक्सीन को लेकर बेहद भ्रामक जानकारी और अफवाह फैलाते हुए देखा जा सकता था। जुबैर ने उक्त मौलाना का बचाव करते हुए अपना पाकिस्तान प्रेम जाहिर किया और लिखा, “वो आदमी पाकिस्तान से है (Raukab Noorani Okarvl), भारत से नहीं। वैसे वीडियो देख के, नैनो चिप वाली नोट का वीडियो याद आ गया।”
  11. ज़ुबैर ने दावा किया कि जहाँ मेक्सिको में टीवी के माध्यम से पढ़ाई कराई जा रही है, भारत में दूरदर्शन पीएम मोदी के ‘मन की बात’ के प्रसारण में लगा हुआ है। बाद में जब लोगों ने बताया कि भारत में 3 दर्जन से भी अधिक चैनल पठन-पाठन के काम में लगे हुए हैं, उसने अपनी ट्वीट्स डिलीट कर दी।
  12. उसने सोलापुर में आग लगने की खबर शेयर की। उसने अप्रैल में ये वीडियो शेयर किया जबकि ये फ़रवरी का निकला। बाद में उसने भी माना कि उसने जिस वीडियो को रीट्वीट किया था, वो 2 महीने पुराना है।
  13. इसके बाद उसने दावा किया कि पीएम मोदी के ‘मन की बात’ के वीडियो पर छात्रों के विरोध प्रदर्शन के डर से कमेंट्स ऑफ कर दिया गया है। हालाँकि, पीएमओ इंडिया के पेज पर सारे वीडियोज पर कमेंट्स वर्षों से ऑफ हैं। जबकि नरेंद्र मोदी और भाजपा के यूट्यूब चैनल पर इसी वीडियो पर कमेंट किया जा सकता है।
  14. जब महंत गोपालदास के कोरोना पॉजिटिव होने की खबर आई तो उसने एडिटेड फोटो शेयर कर के दावा किया कि सरसंघचालक मोहन भागवत उनके बगल में ही बैठे थे। जबकि ये तस्वीर फोटोशॉप्ड है।
  15. खबर आई थी कि अमेरिका के टाइम्स स्क्वायर पर राम मंदिर का बिलबोर्ड दिखाया जाएगा। जुबैर ने दावा किया कि इस कार्यक्रम को कैंसल कर दिया गया है। जबकि तय समय पर राम मंदिर के डिजिटल बिलबोर्ड का प्रदर्शन हुआ।
  16. उसने अपने पेज ‘अनऑफिसियल सुब्रमण्यन स्वामी’ से दावा किया कि भाजपा स्ट्रांग रूम से ईवीएम चुरा रही है। फैक्टहंट द्वारा फैक्ट चेक के बाद उसने पेज के एडमिन्स में से एक पर दोष डाल कर इतिश्री कर ली।
  17. उसने एक तस्वीर शेयर कर के दावा किया कि किसानों के साथ पुलिस आतंकियों की तरह व्यवहार कर रही है। बाद में खुलासा हुआ कि ये वीडियो 2013 है, जब केंद्र में यूपीए की सरकार थी। ये तस्वीर कविता कृष्णन ने ट्वीट की थी, जिसे जुबैर ने आगे बढ़ाया।
  18. श्रीलंका में हुए हमले के बाद वहाँ के एक मंत्री ने पत्र लिखा, जिसमें कहा गया था कि ख़ुफ़िया अधिकारियों को पहले से इसकी भनक थी। जब अभिजीत मजूमदार और आनंद रंगनाथन जैसे लोगों ने इस पत्र को आगे बढ़ाया तो जुबैर ने आतंकियों के बचाव के लिए उसे फेक करार दिया। जबकि मंत्री ने खुद अपने हैंडल से उसे डाल रखा था।
  19. उसने एक विरोध प्रदर्शन का वीडियो शेयर कर के लिखा कि दिल्ली में इतना बड़ा विरोध होने के बावजूद मीडिया इसे नहीं दिखा रहा। जबकि असलियत ये थी कि वो वीडियो मुंबई का था।
  20. जब देश भर में मॉब लिंचिंग को लेकर मुद्दा गरमाया हुआ था और इसे लेकर नैरेटिव बनाया जा रहा था, तब मोहम्मद जुबैर ने कॉन्ग्रेस शासनकाल का एक विरोध प्रदर्शन का वीडियो शेयर किया, ताकि लोग मोदी सरकार पर हमला बोल सकें।
  21. उसने दावा किया कि विश्व हिन्दू परिषद् के कार्यकर्ताओं ने ‘हिंदुस्तान मुर्दाबाद’ का नारा लगाया। गोंडा पुलिस ने इन ख़बरों का खंडन करते हुए कहा कि ऐसा कुछ हुआ ही नहीं था।
  22. उसने अपने फेसबुक पेज से किया कि कश्मीरी छात्र रक्तदान कर रहे हैं। जबकि वो तस्वीर एक घायल व्यक्ति की थी, जो विरोध प्रदर्शन के दौरान जख्मी हो गया था। अस्पताल में उसका इलाज हो रहा था।
  23. मोहम्मद जुबैर ने अंजू घोष को बांग्लादेशी अभिनेत्री बताते हुए भाजपा की आलोचना की। लेकिन, दिलीप घोष ने उनका जन्म प्रमाण पत्र शेयर कर के उसके झूठ पर विराम लगाया।
  24. पीएम मोदी ने बताया था कि प्रधानमंत्री बनने से पहले वो अपने कपड़े खुद धोया करते थे। बाद में जुबैर ने एक खबर शेयर कर किया, जिसमें लिखा था कि वो पीएम मोदी का धोबी था। उसकी हार्ट अटैक से मृत्यु हुई। उसने ये साबित करने का प्रयास किया कि पीएम मोदी अपने कपड़े खुद नहीं धोते थे, वो झूठ बोल रहे। जबकि उसी खबर में लिखा था कि वो धोबी मोदी के कपड़े प्रेस करता था, धोता नहीं था।
  25. जम्मू कश्मीर के डिप्टी ग्रैंड मुफ़्ती ने दूसरे समुदाय के लिए अलग मुल्क की माँग की, जिस पर ऑपइंडिया ने खबर प्रकाशित की। जुबैर ने किसी अन्य क्लेम का फैक्ट-चेक शेयर कर के दावा कर दिया कि ये खबर गलत है।
  26. कठुआ मामले में विशाल जंगोत्रा निर्दोष है या नहीं, इस सम्बन्ध में ऑपइंडिया ने जब खबर प्रकाशित की तो जुबैर ने इसकी आलोचना की। जबकि बाद में वो कोर्ट से भी निर्दोष साबित हुआ, तब जुबैर की बोलती बंद हो गई।
  27. उसने उस ट्वीट को आगे बढ़ाया, जिसमें ग्रेटर नोएडा हत्याकांड के आरोपित सोनू पाठक का भाजपा से जुड़ाव बताया गया था। बाद में पता चला कि वो कोई और सोनू पाठक है, हत्या आरोपित नहीं।
  28. कन्हैया कुमार ने दावा किया कि बेगूसराय में एक फेरीवाले को पाकिस्तान जाने की बात कह के गोली मार दी गई। जबकि बाद में खुलासा हुआ कि ये घटना सांप्रदायिक थी ही नहीं, किसी चीज की खरीद-बेच को लेकर झगड़ा हुआ था, जिसके बाद ये घटना हुई।
  29. जब तबलीगी जमात वालों ने महामारी फैलाई और मौलाना साद के ऑडियो वायरल हुआ, जिसमें वो समुदाय के लोगों को कोरोना से न डरते हुए सारी इस्लामी गतिविधियाँ जारी रखने की सलाह दी, तो मोहम्मद जुबैर ने इस ऑडियो को फेक बताया। दिल्ली पुलिस ने इन दावों को ही फेक बता दिया और ऑडियो सही निकला।
  30. उसने दावा किया कि एक दलित लड़के को मंदिर में घुसने पर मार डाला गया। सच्चाई ये थी कि 5000 रुपए के लोन को लेकर ये वारदात हुई थी। उस मंदिर का इतिहास रहा है कि उसमे दशकों से दलित जाकर पूजा-पाठ करते आ रहे हैं।
  31. उसने दावा किया कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री येदियुरप्पा कभी टीपू जयंती समारोह में हिस्सा लेते थे और अब इसका विरोध करते हैं। साथ ही उसने समारोह की तस्वीर भी शेयर की। जबकि वो फोटो ”कर्नाटक जनता पक्ष अल्पसंखज्यक समारोह’ का था, टीपू जयंती का नहीं।
  32. मोहम्मद जुबैर ने दावा किया कि नीतेश कुमार ने 263 करोड़ रुपए की लागत से जिस सत्तर घाट पुल का उद्घाटन किया था, वो बाढ़ से ढह गया है। जबकि सच्चाई ये है कि सत्तर घाट पुल से 2 किलोमीटर दूर स्थित एक छोटी पुलिया का पहुँच पथ टूटा था, पुल नहीं।
  33. अर्बन नक्सलियों के पास से आपत्तिजनक पुस्तक ‘वॉर एंड पीस’ जब्त हुआ, जिसकी चर्चा बॉम्बे हाईकोर्ट में हुई। बाद में पीएम मोदी का भी ‘वॉर एंड पीस’ पुस्तक पढ़ते हुए तस्वीर जुबैर ने वायरल की। उसे ये नहीं पता था कि किताब का नाम तो समान था लेकिन नक्सलियों वाली इसी नाम की पुस्तक विश्वजीत रॉय ने लिखी थी जबकि पीएम मोदी लिओ टॉलस्टॉय की किताब पढ़ रहे थे।
  34. उसने एक फेक न्यूज़ शेयर कर के दावा किया कि मेजर गोगोई को एक लड़की के साथ आपत्तिजनक अवस्था में गिरफ्तार किया गया है।
  35. उसने एक तस्वीर शेयर कर के दावा किया कि सीएम योगी आदित्यनाथ ने विवेक तिवारी के परिवार से बातचीत के समय उन्हें अपने से दूर रखा जबकि एक अन्य तस्वीर में सीएम योगी परिवार के बच्चों को पास बुला कर उनकी पीठ थपथपाते हुए बात करते दिख रहे हैं। उसने इस तस्वीर को छिपा लिया।

महामहिम नहीं कठपुतली: जब सोमनाथ और हिंदू कोड बिल पर राजेंद्र प्रसाद ने निकाली नेहरू की हेकड़ी, बताया- सेक्युलरिज्म मतलब संस्कारों से दूर होना नहीं

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद से अक्सर बचते थे। असल में नेहरू चाहते भी नहीं थे कि राजेंद्र प्रसाद दोबारा राष्ट्रपति बनें, लेकिन डॉ प्रसाद की लोकप्रियता के कारण उनके मंसूबे सफल नहीं हो पाए। डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद एक आध्यात्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति थे, जो ज्योतिष में भी विश्वास रखते थे। भारतीय सनातन संस्कृति में उनकी अटूट श्रद्धा थी। जबकि नेहरू वामपंथी वाला झुकाव रखते थे।

ये भी जगजाहिर है कि डॉ राजेंद्र प्रसाद को राष्ट्रपति बनने से रोकने के लिए नेहरू ने झूठ बोला था। 1957 में जवाहरलाल नेहरू एस राधाकृष्णन को राष्ट्रपति बनाना चाहते थे। इसी तरह वो 1952 में चक्रवर्ती राजगोपालचारी के पक्ष में थे। लेकिन उन्हें दोनों बार निराशा हाथ लगी। नेहरू ने 1950 में डॉ प्रसाद को चिट्ठी लिख कर राष्ट्रपति का चुनाव न लड़ने की सलाह दी और कहा कि सरदार पटेल भी ऐसा ही चाहते हैं। जबकि, उन्होंने पटेल की कोई सहमति नहीं ली थी

डॉ राजेंद्र प्रसाद के आखिरी दिन: जवाहरलाल नेहरू ने किया अनदेखा

अरबपति कारोबारी और पूर्व राज्यसभा सांसद रवींद्र किशोर (RK) सिन्हा ने अपनी पुस्तक ‘बेलाग लपेट‘ में इसका विस्तृत रूप से जिक्र करते हुए बताया है कि कैसे 12 वर्षों तक राष्ट्रपति रहने के बाद जब राजेंद्र प्रसाद पटना जाकर रहने लगे, तब नेहरू ने उनके लिए एक सरकारी आवास तक की व्यवस्था नहीं की थी। वो सदाकत आश्रम स्थित बिहार विद्यापीठ में एक सीलन वाले कमरे में रहते थे। दमा के रोगी थे, लेकिन उनके स्वास्थ्य का कोई ख्याल नहीं रखा गया।

इस दौरान भारतीय संविधान सभा के प्रथम अध्यक्ष और भारत के पहले राष्ट्रपति से मिलने पहुँचे जयप्रकाश नारायण से उनकी हालत देखी नहीं गई। 28 फरवरी, 1963 को जिस कमरे में डॉ राजेंद्र प्रसाद का निधन हुआ, उसे किसी तरह अपने सहयोगियों के साथ मिल कर जयप्रकाश नारायण ने ही रहने लायक बनाया था। उनके अंतिम संस्कार में भाग लेने भी नेहरू नहीं पहुँचे। वो इस दौरान जयपुर में ‘तुलादान’ नामक एक साधारण से कार्यक्रम में शिरकत कर रहे थे।

उस समय संपूर्णानंद राजस्थान के राज्यपाल थे और उनकी बड़ी इच्छा थी कि वो डॉ प्रसाद की अंत्येष्टि में भाग लेने पटना जाएँ, लेकिन उन्हें नेहरू ने ये कहते हुए रोक दिया कि प्रधानमंत्री के दौरे में राज्यपाल ही नदारद रहेगा तो ये ठीक नहीं होगा। संपूर्णानंद ने खुद इसका खुलासा किया है। दिल्ली में बैठे बिहार के बड़े नेताओं ने राजेंद्र बाबू के अंतिम दर्शन नहीं किए, इसका संपूर्णानंद को मलाल था। डॉ राधाकृष्णन को भी नेहरू ने पटना न जाने की सलाह दी थी, लेकिन वो गए।

आरके सिन्हा लिखते हैं कि पटना में राजेंद्र बाबू के साथ बेरुखी वाला व्यवहार होना और उन्हें मामूली स्वास्थ्य सुविधाएँ तक न मिलना, ये सब केंद्र के इशारे पर हुआ था। कफ निकालने वाली एक मशीन उनके कमरे में थी, जिसे राज्य सरकार ने पटना मेडिकल कॉलेज में भिजवा दिया। वो खाँसते-खाँसते चल बसे। ये भी जानने लायक बात है कि सोमनाथ मंदिर को लेकर भी जवाहरलाल नेहरू और डॉ राजेंद्र प्रसाद में तनातनी हुई थी।

जवाहरलाल नेहरू ने डॉ राजेंद्र प्रसाद से कहा था – सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन करने मत जाइए

क्या डॉ प्रसाद के सामने नेहरू खुद को इतना बौना महसूस करते थे कि उनके सरल और ऊँचे व्यक्तित्व के कारण अपने मन में हीन भावना पैदा कर ली थी? राष्ट्रपति का पद बड़ा होता है, लेकिन नेहरू क्यों हमेशा डॉ प्रसाद को आदेश देने की मुद्रा में रहते थे? 1951 में किसी तरह गुजरात के सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन हुआ। इस मंदिर को बनवाने के लिए तत्कालीन केंद्रीय मंत्री केएम मुंशी ने दिन-रात एक कर दिया था। उन्हें सरदार पटेल का भी सहयोग मिला था।

ज्ञात हो कि महात्मा गाँधी ने महमूद गजनी द्वारा ध्वस्त किए गए सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार में सरकारी रुपया खर्च न करने की बात कही थी, जिसके बाद चंदा जुटा कर इसे बनवाया गया। नेहरू का कहना था कि एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के प्रमुख को मंदिर के उद्घाटन से बचना चाहिए। लेकिन, डॉ प्रसाद मंदिर में शिव मूर्ति की स्थापना में बतौर मुख्य अतिथि पहुँचे। उनका कहना था कि सेकुलरिज्म का ये मतलब थोड़े ही है कि कोई अपने संस्कारों से दूर हो जाए अथवा धर्म का विरोधी हो जाए?

उन्होंने मंदिर के उद्घाटन के दौरान कहा भी था कि हमारा देश धर्मनिरपेक्ष तो है, लेकिन नास्तिक नहीं है। वो सभी धर्मों के प्रति समान और सार्वजनिक सम्मान के प्रदर्शन के हिमायती थे। ये भी याद कीजिए कि कैसे डॉ प्रसाद को सोमनाथ मंदिर जाने से रोकने वाले नेहरू खुद 1956 में कुंभ में डुबकी लगाने प्रयागराज पहुँच गए थे और अचानक दौरे से फैली अव्यवस्था ने 800 लोगों की जान ले ली थी। ये दोहरा रवैया आखिर क्यों था?

असल में 1947 में जूनागढ़ रियासत की आज़ादी के समय सरदार पटेल सोमनाथ गए थे, जहाँ उन्हें मंदिर को जीर्णशीर्ण आस्था में देख कर दुःख हुआ। रजनीकांत पुराणिक अपनी पुस्तक ‘Nehru’s 127 Major Blunders‘ में लिखते हैं कि तत्कालीन शिक्षा मंत्री मौलाना आज़ाद इसे खंडहर ही बने रहने देना चाहते थे और इसे ASI को सौंपने की वकालत कर रहे थे। हाँ, मजारों-मस्जिदों की मरम्मत के समय उनके पास ऐसा कोई सुझाव नहीं होता था।

सरदार पटेल के निधन के बाद केएम मुंशी ने इसका जिम्मा सँभाला, जिन पर तंज कसते हुए नेहरू ने कहा था कि उन्हें ये प्रयास पसंद नहीं, क्योंकि ये ‘हिन्दू पुनरुत्थानवाद’ है। जब डॉ प्रसाद को इसके उद्घाटन का न्योता आया तो नेहरू ने उन्हें पत्र भेज कर वहाँ न जाने की सलाह दी, क्योंकि उन्हें लगता था कि इसके कई निहितार्थ हैं। डॉ प्रसाद ने स्पष्ट कर दिया कि वो मंदिर के उद्घाटन के लिए जाएँगे, किसी मस्जिद-चर्च के लिए भी उन्हें न्योता मिला होता तो वो जाते।

हिन्दू कोड मिल पर भी दिखाया आईना

डॉ प्रसाद और जवाहरलाल नेहरू के बीच ‘हिन्दू कोड बिल’ पर भी एक राय नहीं बन पाई। जवाहरलाल नेहरू का कहना था कि इस कानून से हिन्दुओं का पारिवारिक जीवन व्यवस्थित होगा। तब डॉ प्रसाद का कहना था कि लोगों के जीवन और संस्कृति को इतने बड़े स्तर पर प्रभावित करने वाला कानून नहीं लाया जाना चाहिए। 1951 में इसे संसद में लाया गया था, लेकिन नेहरू ने इसे 1948 में भी पारित करने की कोशिश की थी।

तब डॉ प्रसाद ने अध्यक्ष रहते इसका विरोध करते हुए कहा था कि संविधान सभा किसी संप्रदाय के व्यक्तिगत कानून से निपटने के लिए नहीं, देश के संविधान के निर्माण के लिए बना है। 1951 में जब फिर से ये बिल लाया गया, तब डॉ प्रसाद का मत था कि पहला लोकसभा चुनाव हो जाने के बाद जो संसद गठित हो, उसमें इस पर विचार होना चाहिए। उन्होंने कहा कि उस समय की संसद एक कार्यवाहक निकाय थी, जिसे संविधान के निर्माण के लिए बनाया गया था।

चुनाव में 4 महीने ही थे, ऐसे में जवाहरलाल नेहरू की हड़बड़ी समझ से परे थी। राजेंद्र प्रसाद ने तब पीएम नेहरू को लिखे पत्र में कहा था कि संसद चाहे तो विवाह प्रथा ख़त्म करने या किसी समाज में बहु-विवाह को लागू करने का कानून भी बना सकती है, परन्तु इस प्रकार का क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए मतदाताओं का विचार नहीं लिया गया है। उन्होंने बता दिया कि इस सम्बन्ध में अब तक जो भी लोकमत आया है, वो इस बिल के खिलाफ ही है।

डॉ प्रसाद ने लिखा था, “हमारा संविधान बहुत हद तक इंग्लैंड के संविधान को नमूना मान कर बनाया गया है। जहाँ हमारा संविधान ऐसा आवश्यक नहीं मानता, वहाँ भी मुझे सलाह दी जाती है कि मैं इंग्लैंड में चल रही परिपाटी के हिसाब से ही कार्य करूँ। आज उसी इंग्लैंड में आम चुनाव में मतदाताओं के सामने मुद्दा रख कर उनकी स्पष्ट स्वीकृति पाए बना वहाँ की सरकार ऐसा प्रस्ताव ला सकती है या संसद ऐसा कानून बना सकती है, ये मेरे कल्पना के बाहर है।”

हिन्दुओं के सिविल कोड में अंग्रेजों ने भी ज्यादा हस्तक्षेप नहीं किए थे, लेकिन नेहरू इसके लिए जिद पर अड़े हुए थे। भारी विरोध के बाद 1952-47 लोकसभा के बीच इसे तीन टुकड़ों में लाया गया। किसी अन्य जाति में शादी, तलाक और बहुविवाह के सम्बन्ध में अलग-अलग कानून बनाए गए। संपत्ति में हिस्सेदारी से लेकर गोद लेने तक के नियमों में बदलाव किया गया। माँग UCC (समान नागरिक संहिता) की हो रही थी, लेकिन नेहरू हिन्दुओं के पीछे पड़े थे।

‘क्या पाकिस्तान को दे देना चाहिए कश्मीर?’: MPPSC की परीक्षा में पूछा सवाल, प्रोफेसर अब नहीं तैयार कर पाएगा प्रश्न पत्र

मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) की परीक्षा में कश्मीर पर पूछे गए विवादित सवाल पर आयोग ने पेपर सेट करने वाले पर एक्शन लिया है। लोक सेवा आयोग ने पेपर सेट करने वाले पर कड़ी कार्रवाई करते हुए उस पर भविष्य में प्रश्न पत्र तैयार करने पर रोक लगा दी है। वहीं प्रदेश के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा (Narottam Mishra) ने भी इस संबंध में ट्​वीट किया है। उन्होंने कहा, “MPPSC की परीक्षा में कश्मीर से जुड़ा विवादित प्रश्न पूछने का प्रसंग आपत्तिजनक है। विवादास्पद प्रश्न पूछने वाले दोनों पेपर सेटर्स पर भविष्य में प्रश्न पत्र तैयार करने पर रोक लगा दी गई है।”

दरअसल, मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) की रविवार (19 जून 2022) को हुई राज्य सेवा एवं वन सेवा प्रारंभिक परीक्षा में कश्मीर को लेकर एक विवादित प्रश्न पूछा गया था, “क्या भारत को कश्मीर पाकिस्तान को देने का फैसला करना चाहिए?” पूछा गया था।

उत्तर चुनने के 2 तर्क भी दिए गए थे-

  1. हाँ, इससे भारत का धन बचेगा
  2. नहीं, ऐसे निर्णय से इसी तरह की और भी माँगे बढ़ जाएँगी।

यह हम सभी जानते हैं कि कश्मीर हमारा अभिन्न अंग है। इसको लेकर सोशल मीडिया पर पेपर सेट करने वाले के खिलाफ आक्रोश फैल गया है। वहीं, मामले को गंभीरता से लेते हुए आपत्तिजनक सवाल पूछने वाले पर कड़ी कार्रवाई की गई है। लोक सेवा आयोग ने प्रश्नपत्र सेट करने वाले को नोटिस भेजते हुए MPPSC के सभी कामों को करने से रोक लगा दी है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, आयोग ने प्रश्नपत्र बनाने वाले को नोटिस जारी करते हुए लिखा कि इस सवाल के अवलोकन के बाद संज्ञान में आया है कि प्रश्न विवादास्पद है। इसके साथ ही सवाल तैयार करने के दौरान दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया गया। इसे कदाचरण की श्रेणी में मान कर आपको भविष्य के लिए आयोग के सभी कार्यों से हटाया जाता है।

मध्य प्रदेश की बोर्ड परीक्षा में पूछा गया भारत-विरोधी सवाल

गौरतलब है कि मार्च 2020 में भी, मध्य प्रदेश में दसवीं की बोर्ड की परीक्षा में सामाजिक विज्ञान के पेपर में ‘आजाद कश्मीर’ को लेकर सवाल पूछा गया था। आज़ाद कश्मीर’ शब्द का इस्तेमाल पाकिस्तान कश्मीर के उस हिस्से के लिए करता है जिस पर उसने कब्जा कर रखा है, यानी ‘पाक अधिकृत कश्मीर’ अथवा ‘Pakistan Occupied Kashmir (PoK)’ के लिए करता है।

बता दें कि पाक द्वारा कब्जा किए हुए इलाक़े को ‘आज़ाद’ कह कर मध्य प्रदेश की कॉन्ग्रेस सरकार ने भारत विरोधी स्टैंड को आगे बढ़ाया था। उस वक्त राज्य में विपक्षी पार्टी भाजपा ने इस प्रश्न-पत्र को लेकर सवाल उठाए थे। तब भाजपा ने कहा था कि राज्य में कॉन्ग्रेस की सरकार है, ऐसे में इन सवालों का पूछा जाना आश्चर्य की बात नहीं है। पार्टी ने यह भी कहा था कि कॉन्ग्रेस तो वैसे भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अलगाववादी आन्दोलनों का समर्थन करती रही है।

हरियाणा के करनाल में स्कूल-कॉलेज की दीवार पर लिखे मिले खालिस्तानी नारे, पंजाब में मंदिर की दीवार पर लिख दिया था ‘खालिस्तान जिंदाबाद’

हरियाणा के करनाल में खालिस्तान के समर्थन में नारे लिखे जाने का मामला सामने आया है। ये नारे डीएवी स्कूल और दयाल सिंह कॉलेज की दीवारों पर लिखे गए थे। इससे पहले पंजाब के संगरूर में भी काली माता मंदिर की दीवार पर खालिस्तान समर्थक नारे लिखे मिले थे।

करनाल के एसपी गंगा राम पुनिया ने बताया कि डीएवी स्कूल और दयाल सिंह कॉलेज के सामने की दीवार पर खालिस्तान के संबंध में कुछ नारे लिखे थे। सूचना मिलने पर पुलिस की टीम मौके पर पहुँची और घटनास्थल की वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी करवाई गई। इसके बाद खालिस्तानी नारे को मिटा दिया गया।

पुलिस ने कहा कि थाना सिविल लाइन में अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ धारा 153A, 120B और UAPA के तहत मामला दर्ज किया गया है। पुलिस ने मामले की जाँच शुरू कर दी है।

वहीं संगरूर में ये नारे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के दौरे से पहले लिखे मिले थे। संगरूर में चुनाव आचार संहिता भी लागू है। 23 जून 2022 को यहाँ उपचुनाव के लिए मतदान होना है। इससे पहले पंजाब के जालंधर में जालंधर शक्ति पीठ, देवी तालाब मंदिर के पास दीवारों पर खालिस्तान समर्थक नारे लिखे पाए गए थे। इस महीने की शुरुआत में, पंजाब के फरीदकोट में एक सेशन कोर्ट के जज के आवास की दीवारों पर खालिस्तान समर्थक नारे लिखे गए थे। पिछले महीने, हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में भी राज्य विधानसभा की दीवारों और गेट पर खालिस्तानी झंडे बाँधे गए थे और साथ ही नारे लिखे गए थे।

इतना ही नहीं ऑपरेशन ब्लूस्टार की 38वीं बरसी पर भी स्वर्ण मंदिर में खालिस्तान समर्थक नारे भी लगे थे। बताया गया कि कट्टरपंथी सिख संगठनों और शिरोमणि अकाली दल (अमृतसर) के समर्थकों ने नारेबाजी की थी। युवकों ने बैनर और तख्तियों पर ‘खालिस्तान जिंदाबाद’ लिखा हुआ था और जरनैल सिंह भिंडरावाले की तस्वीर वाली टी-शर्ट पहन रखी थी। इसके अतिरिक्त किसान आंदोलन के दौरान भी ऐसी अलगाववादी घटनाएँ देखने को मिली थी।

नौकरी-मकान का लालच दे बनाते मेंबर, मदरसा में कबूल करवाते इस्लाम: हिंदुओं को मुस्लिम बनाने वाला रैकेट पकड़ा गया

उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में इस्लामिक धर्मान्तरण का एक बेहद चौकाने वाला मामला सामने आया है। जहाँ इस्लामिक संगठन के जरिए बेरोजगार हिन्दू युवकों को अपना निशाना बनाते हुए अवैध धर्मान्तरण किया जा रहा था। इस्लामिक संगठन की आड़ में मदरसे में इस कथित इस्लामिक धर्मांतरण रैकेट का उस वक्त भंडाफोड़ हुआ, जब वाराणसी जिले के रहने वाले सुधांशु चौहान ने धर्मांतरण करने से साफ इनकार कर दिया।

क्या है मामला

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, बेरोजगार हिन्दू युवकों को इस्लाम कबूल करवाने से पहले किसी बड़ी कंपनी में नौकरी, मकान और लाखों रुपए कमाने का सपना दिखाकर पहले अपने संगठन का सदस्य बनाते हैं। और जब हिन्दू युवक इस्लामिक संगठन का सदस्यता ले लेता है तो उसे मदरसे में भेजा जाता है, जहाँ पर मदरसे का मौलवी हिन्दू युवकों को इस्लाम कबूल करने और उसका प्रचार-प्रसार करने की एक सप्ताह की ट्रेनिग देता है। पूरी प्रक्रिया के तहत सख्त निगरानी राखी जाती थी। इस ट्रेनिंग के दौरान जब मौलवी बेरोजगार हिन्दू युवाओं का ब्रेनवॉश करने में कामयाब हो जाता है तो उनका जबरन धर्मांतरण करवा देता है।

ऐसे हुआ खुलासा

रिपोर्ट के अनुसार, वाराणसी के रहने वाले सुधांशु चौहान को इस्लाम कबूल करवाकर मुस्लिम बनाने की कवायद चल रही थी। जिसपर उसने साफ मना कर दिया। लेकिन सुधांशु के मना करने के बाद मदरसे में ही उसे कई दिनों तक बंधक बनाकर बुरी तरह से शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया।

मामले की भनक परिवार को लगते ही सुधांशु के परिजन केंद्रीय मंत्री कौशल किशोर के पास पहुँचे और उनसे अपने बेटे को इस्लामिक संगठन के चंगुल से छुड़ाने की गुहार लगाई। जिसपर मंत्री ने फतेहपुर जिले के मंत्री प्रतिनिधि अंशू सिंह सेंगर को फोन कर तत्काल पूरे मामले में कार्रवाई कराए जाने की बात कही। मामले का पता लगने के बाद शिकायत सदर कोतवाली पुलिस से की गई।

कहा जा रहा है कि धर्मान्तरण के इस मामले में केंद्रीय मंत्री के जिला प्रतिनिधि अंशू सिंह सेंगर ने सुधांशू चौहान के परिजनों से संपर्क कर पूरा घटनाक्रम जाना। वहीं पुलिस ने इस पूरे मामले में पुलिस ने एक्शन लेते हुए इस्लामिक संगठन की आड़ में लखनऊ बाईपास स्थित एक किराए के मकान में चल रहे मदरसे में दबिश डालकर कर 3 आरोपितों को मौके से गिरफ्तार कर लिया और मदरसे में ही बंधक बनाए गए हिन्दू युवक सुधांशु को भी बरामद कर फतेहपुर थाने ले आई।

पुलिस के मुताबिक, पीड़ित सुधांशू ने इस पूरे मामले में जानकारी देते हुए बताया कि वह वाराणसी के सिगरा थाना क्षेत्र के हबीबपुरा चंदुआ का रहने वाला है। 14 जून को गाजीपुर जिले के अरमान अली ने उसे फोन कर ट्रांसपोर्ट कंपनी में नौकरी दिलाने की बात कही थी। इस पर वह दो दिन बाद अरमान अली के बताए गए पते पर फतेहपुर आबकारी कार्यालय के पास पहुँचा, जहाँ से अरमान अली उसे तुराबअली का पुरवा ले गया और अगले दिन उसे एक मुस्लिम युवक के साथ लखनऊ बाईपास स्थित मार्केटिंग कंपनी के ऑफिस भेज दिया। जहाँ उनलोगों ने रजिस्ट्रेशन के नाम पर पहले 1000 रुपए और फिर बाद में 10000 और ले लिए गए।

सुधांशू ने आगे बताया कि जब वह 17 जून को उसी ऑफिस पहुँचा, तो वहाँ से से मोहसिन, यासीन नाम के मुस्लिम युवक उसे और करीब 20 हिंदू लड़कों को 30 से 40 मुस्लिम लोगों के साथ शहर के एक मदरसे में ले गए। मदरसे में उन्हें यह झाँसा दिया गया कि वह लोग उनके अनुसार चलेंगे तो हर महीने एक से दो लाख कमा सकते हैं। फिर सेमिनार के नाम पर एक तकरीर हुआ, जिसमें वक्ताओं ने इस्लामिक संगठन से जुड़कर रुपए कमाने की बात कही।

सुधांशू ने इस पूरे मामले से नकाब हटाते हुए बताया कि, 19 जून की सुबह करीब 50 हिंदू लड़कों और 100 मुस्लिम लड़कों के साथ उसे भी शहर के एक मस्जिद में ले गए। जहाँ उनके फोन वगैरह जब्त कर लिए गए और मस्जिद में मौजूद मौलवी ने मुस्लिम धर्म अपनाने और प्रचार-प्रसार की बात कही। जहाँ करीब सप्ताह भर की ट्रेनिंग के बाद उसे इस्लाम कबूल करने के लिए मजबूर करने लगे। लेकिन सुधांशु के इनकार करने पर मामला बिगड़ता नजर आया। और कहा जा रहा है कि मकान मालिक अलीम ने धर्म परिवर्तन के लिए उसे जबरन बाध्य करते हुए बंधक बना लिया था।

हालाँकि, बाद में परिजनों की शिकायत पर इस्लामी धर्मान्तरण के इस पूरे मामले का खुलासा हुआ। वहीं इस्लामी संगठन के लोगों द्वारा बंधक बनाए गए सुधांशु को छुड़ा लेने के बाद इस मामले की जाँच की जा रही है। बता दें कि बाद में पुलिस ने सुधांशु की तहरीर पर कंपनी के हेड इकलाख, यासीन, मकान मालिक अलीम, मोहसिन, मौलवी, अरमान अली और उसके एक अज्ञात मुस्लिम साथी के खिलाफ बंधक बनाने, अवैध धर्म परिवर्तन, धोखाधड़ी की धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है। वहीं गिरफ्तार किए गए मोहसिन, यासीन और मकान मालिक आलिम को पुलिस ने न्यायिक हिरासत में जेल भेजते हुए मौलवी सहित अन्य आरोपितों की तलाश तेज कर दी है।

कभी UGC के ‘बेस्ट टीचर’, आज अग्निपथ हिंसा के ‘गुरु’: पटना में घर-कोचिंग पर छापे, जानिए कौन हैं हिंदू लड़की से शादी करने वाले रहमान सर

केंद्र सरकार की अग्निपथ योजना के बाद बिहार के दानापुर में भड़की हिंसा मामले में गुरु रहमान के पटना के घर और उनके कोचिंग सेंटर पर पुलिस ने छापेमारी की। गुरु रहमान पर छात्रों को हिंसा के लिए भड़काने का आरोप है। पुलिस ने उन्हें इस केस में आरोपित बनाया है।

रहमान ने अपनी सफाई में कहा है कि वह इस योजना का विरोध कर रहे थे क्योंकि देश भर के अन्य छात्र इसके विरोध में हैं। उन्होंने अपने बयान में कहा कि ये स्कीम न किसी को समझ आई और न किसी ने इसे समझाने की कोशिश की। लेकिन उन्होंने (गुरु रहमान) फिर भी हमेशा बच्चों को अहिंसा पर चलने को कहा।

बता दें कि गुरु रहमान का ये बयान सामने आने के बाद हमने गुरु रहमान के वीडियो खंगाले। देख सकते हैं कि लाइव सिटीज से बात के दौरान उन्होंने साफ तौर पर छात्रों को कहा था कि वह बिना डरे ट्रेन रोक दें। वीडियो में गुरु रहमान कहते हैं- “ट्रेन रोक सकते हैं आप क्योंकि आपकी जिंदगी रोकी जा रही है।” इस वीडियो में उन्होंने दावा किया हुआ था कि सेना का भी प्राइवेटाइजेशन होने वाला है।

वीडियो में गुरु रहमान ने अग्निपथ योजना पर बात करते हुए सरकार से नाराजगी जताई। साथ ही विपक्ष को लेकर पूछा कि आखिर वो कहाँ गए हैं तो सत्ता में बैठी सरकार इतने गलत फैसले लेती जा रही है। वीडियो में रहमान कहते हैं कि वो किसी कीमत पर सरकार का साथ नहीं देंगे क्योंकि सरकार छात्रों के साथ अन्यायपूर्ण कार्य कर रही है।

बता दें कि बिहार हिंसा में कोचिंग सेंटरों पर गाज गिरी तो उनमें एक नंबर गुरु रहमान के कोचिंग का भी आया है। गुरु रहमान का कोचिंग सेंटर पटना के मशहूर कोचिंग सेंटरों में से एक है। इसके संचालक गुरु रहमान सारण जिले के बसंतपुर निवासी हैं। उन्होंने बीएचयू से प्राचीन भारत और पुरात्व में ग्रेजुएशन और मास्टर्स किया। इसके बाद कोचिंग में पढ़ाना शुरू किया। फिर पटना विश्वविद्यालय में अपनी सर्विस दी। वहाँ रहमान को यूजीसी से बेस्ट टीचर अवार्ड मिला।

टीवी 9 पर प्रकाशित जानकारी के अनुसार, 1997 में रहमान ने हिंदू लड़की अमिता से शादी करने का मन बनाया, जिसे परिवार द्वारा नहीं स्वीकारा गया। घर के लोग चाहते थे अमिता इस्लाम कबूले। मगर जब ऐसा नहीं हुआ तो रहमान ने अपनी बीवी के साथ घर छोड़ दिया। शादी के 7 साल रहमान ने पत्नी को लॉज में रखा। 2010 में दोनों के बेटी हुई और साथ ही एक कोचिंग सेंटर को शुरू किया गया। आज गुरु रहमान का कोचिंग सेंटर पटना के नामी कोचिंग संस्थानों में से एक माना जाता है।

छात्रों पर उनका इतना प्रभाव है कि पुलिस ने जब उपद्रवी छात्रों के मोबाइल खंगाले तो संबंधित स्कीम पर बात करते हुए उनके वीडियो छात्रों के मोबाइल में मिले। दानापुर पुलिस ने उनके विरुद्ध केस दर्ज किया है। इसी संबंध में सोमवार को उनके आवास पर छापेमारी की गई थी।

‘उद्धव पर हनुमान जी का प्रकोप, फडणवीस होंगे CM’: शिवसेना के बागी विधायकों के साथ सूरत में एकनाथ शिंदे, महाराष्ट्र का सियासी गणित बदला?

महाराष्ट्र (Maharashtra) में मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) के नेतृत्व में महाविकास अघाड़ी (MVA) की सरकार पर संकट के बादल छाए हुए हैं। एक तरफ वसूली मामले में आरोपित सचिन वाजे को दबाव डालकर बहाल कराने के आरोप सामने आए हैं तो दूसरी तरफ गठबंधन सरकार में बगावत के सुर उठने लगे हैं। जो हालात बने हैं, वह उद्धव ठाकरे सरकार के लिए सही साबित नहीं हो रहे हैं।

मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की कार्य-प्रणाली से गठबंधन सरकार के सहयोगी खुश नहीं हैं। इसका असर पहले राज्य सभा चुनावों और फिर महाराष्ट्र विधान परिषद की चुनावों में दिखा। हार के बाद ये सवाल उठने लगे हैं कि महाराष्ट्र की उद्धव सरकार अब कितने दिन की मेहमान है।

इधर, उद्धव ठाकरे की राजनीतिक प्रतिशोध का शिकार बने अमरावती से निर्दलीय विधायक रवि राणा (Ravi Rana) ने यह कहकर इन कयासों को और हवा दे दी है कि अगले दो महीनों में भाजपा नेता देवेंद्र फडणवीस (Devendra Fadnavis) महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बन जाएँगे।

राज्यसभा चुनावों में शिवसेना के संजय पवार की भाजपा के तीसरे उम्मीदवार धनंजय महाडिक से हार हुई थी। इसके बाद पार्टी के प्रवक्ता संजय राउत ने कहा था कि बहुजन विकास आघाडी के हितेंद्र ठाकुर के तीन विधायकों और दो निर्दलीय विधायकों ने धोखा दिया, जिसकी वजह से हार का मुँह देखना पड़ा।

वहीं, विधान परिषद चुनावों में करारी हार के बाद मंथन के लिए सीएम उद्धव ठाकरे ने पार्टी की आपातकालीन बैठक बुलाई है। इस बैठक में सभी विधायकों को शामिल रहने का सख्त निर्देश दिया गया है। हालाँकि, पार्टी के असंतुष्ट विधायक एकनाथ शिंदे अपने समर्थक विधायकों के साथ गुजरात के सूरत में हैं।

शिवसेना नेता संजय राउत ने सोमवार को कहा था कि शिवसेना के कुछ विधायक और एकनाथ शिंदे फिलहाल नहीं पहुँच से दूर हैं। उन्होंने कहा था कि एमवीए सरकार को गिराने की कोशिश की जा रही है, लेकिन बीजेपी को यह याद रखना होगा कि महाराष्ट्र, राजस्थान या मध्य प्रदेश से बहुत अलग है।

सोमवार (20 जून 2022) को सामने आए विधान परिषद के 10 सीटों के नतीजों में भाजपा के 5 उम्मीदवार और शिवसेना एवं राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (NCP) के दो-दो उम्मीदवार जीते हैं। वहीं, कॉन्ग्रेस का उम्मीदवार जीता है। शिवसेना की इस हार में पार्टी के वरिष्ठ नेता और मंत्री एकनाथ शिंदे का हाथ बताया जा रहा है।

कहा जा रहा है कि उद्धव ठाकरे की कार्य-प्रणाली से असंतुष्ट शिंदे ने अपने 20 समर्थक विधायकों के साथ क्रॉस वोटिंग की, जिसकी वजह से भाजपा को फायदा और शिवसेना को नुकसान हुआ है। यह सीधे तौर पर उद्धव ठाकरे से बगावत का बिगुल है। वह सूरत के एक होटल में अपने विधायकों के साथ हैं और आज 2 बजे के करीब प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे। संभावना है कि इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में वह कुछ बड़ी घोषणा करेंगे।

कहा जा रहा है कि शिंदे पार्टी और सरकार में अपनी उपेक्षा से नाराज हैं। मुख्यमंत्री ठाकरे और पर्यटन मंत्री आदित्य ठाकरे के हस्तक्षेप के चलते वे शहरी विकास और लोक निर्माण (एमएसआरडीसी) समेत अपने विभागों को स्वतंत्र रूप से नहीं चला पाते हैं।

इतना ही नहीं, शिवसेना के शिंदे समर्थक विधायकों का भी आरोप है कि उनके निर्वाचन क्षेत्रों के लिए सरकार द्वारा पर्याप्त राशि आवंटित नहीं की जाती है। इनका आरोप है कि रांकपा नेता और उप-मुख्यमंत्री अजित पवार दूसरी पार्टी के दलों के साथ सौतेला व्यवहार कर रहे हैं।

यही आरोप कॉन्ग्रेस के नेताओं ने भी अजित पवार पर लगाया था और अपने हाईकमान से दिल्ली में मुलाकात की थी। वित्त और योजना विभाग अजीत पवार के पास ही है। हालाँकि, मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे नहीं शिवसेना और कॉन्ग्रेस की नेताओं की आपत्तियों का निराकरण नहीं किया।

उधर कॉन्ग्रेस के दलित नेता और पूर्व मंत्री चंद्रकांत हंडोरे के विधान परिषद चुनाव में हार हुई है। कहा जा रहा है कि कॉन्ग्रेस के अगर सात विधायकों ने क्रॉस वोटिंग नहीं की होती हो तो भाई जगताप के साथ ही हंडोरे भी जीत गए होते। इस सब को लेकर चेंबूर में कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ता अपने हाईकमान के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया और कॉन्ग्रेस मुर्दाबाद के नारे लगाए।

उधर एकनाथ शिंदे की बगावत के बाद महाराष्ट्र सरकार में शामिल गठबंधन पार्टियों की NCP प्रमुख शरद पवार ने एक बैठक बुलाई है, लेकिन पार्टी में बगावत की आशंका के बीच संजय राउत शामिल नहीं होंगे। इधर भाजपा में भी राजनीतिक हलचल बढ़ गई है।

रवि राणा का कहना है, “आने वाले दो महीने के भीतर उद्धव ठाकरे सीएम नहीं रहेंगे। देवेंद्र फडणवीस सीएम बनेंगे। गुप्त मतदान के बाद भाजपा के पास विधानसभा अध्यक्ष होगा। विधान परिषद के अध्यक्ष भी भाजपा के ही होंगे। शिवसेना और कॉन्ग्रेस के कई विधायक हमारे संपर्क में हैं। शिवसेना और कॉन्ग्रेस में बड़े पैमाने पर दलबदल देखने को मिलेगा। हम निश्चित रूप से अविश्वास प्रस्ताव लाएँगे।”

रवि राणा ने कहा, “सीएम ने हनुमान चालीसा का अपमान किया है। उन्होंने हिंदुत्व का गला घोंटा है। जो व्यक्ति भगवान हनुमान के लिए नहीं है, वह भगवान राम के पक्ष में कैसे हो सकता है? उद्धव ठाकरे को इसका भुगतना पड़ा है। हनुमान चालीसा पढ़ते हुए मैंने भविष्यवाणी की थी कि हनुमान जी उन्हें सबक सिखाएँगे। राज्यसभा के बाद उन्हें एक बड़ा झटका लगा।”

रवि राणा की भविष्यवाणी और महाराष्ट्र के हालात इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि उद्धव ठाकरे एक बड़े राजनीतिक संकट के दौर से गुजर रहे हैं। वहीं, कॉन्ग्रेस भी शिवसेना से संतुष्ट नजर नहीं आ रही है।