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काशी-मथुरा पाने की लड़ाई यह भी: SC में लड़ रहे अश्विनी उपाध्याय, कहा- वर्शिप एक्ट जैसा कानून बनाने का केंद्र को अधिकार ही नहीं

उत्तर प्रदेश के वाराणसी (Varanasi, Uttar Pradesh) में काशी विश्वेश्वर मंदिर (Kashi Visheshwar Temple) को तोड़कर उसके खंडहर पर बनाए गए ज्ञानवापी विवादित ढाँचे (Gyanvapi Controversial Structure) की वीडियोग्राफी सर्वे में कई बातें स्पष्ट हो चुकी हैं। शिवलिंग और हिंदू प्रतीकों का मिलना इस बात की पुष्टि करता है कि वहाँ मंदिर था। हालाँकि, मुस्लिम पक्ष पूजास्थल (विशेष प्रावधान)-1991 की आड़ लेकर मामले को दबाने की कोशिश कर रहा है।

तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव (Former PM Narsimha Rao) के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा साल 1991 में बनाए गए इस कानून को भाजपा नेता और सुप्रीम कोर्ट वकील (BJP Leader & Supreme Court Advocate Ashwini Upadhyay) ने चुनौती दी है। उन्होंने इस कानून को असंवैधानिक बताया है।

एडवोकेट उपाध्याय का कहना है कि हिंदू लॉ कहता है कि जहाँ एक बार मंदिर बन गया है, वहाँ अगर एक-एक ईंट भी तक उखाड़ दी जाए तो वह मंदिर ही रहेगा, जब तक कि विग्रह का विसर्जन ना किया जाए। वहीं, इस्लामिक लॉ में कहा गया है कि जिस स्थान पर मस्जिद बनेगी वह अपनी होनी चाहिए या किसी से खरीदा गया या दान (बिना भय, धमकी या लालच के) में प्राप्त होनी चाहिए। उसमें पहली ईंट भी मस्जिद के नाम की ही होनी चाहिए। किसी दूसरे धर्म के धार्मिक स्थल पर तो इसे बनाने का सवाल ही नहीं है।

केंद्र को ऐसा कानून बनाने का अधिकार नहीं

ऑपइंडिया से बात करते हुए एडवोकेट उपाध्याय ने कहा कि पूजास्थल (विशेष प्रावधान) कानून का बनाने का अधिकार केंद्र सरकार के पास नहीं है। यह कानून पब्लिक ऑर्डर (कानून व्यवस्था) बनाए रखने के नाम पर बनाया गया है, जबकि कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी राज्य की होती है और यह राज्य सरकार का विषय है।

उन्होंने कि यह कानून धार्मिक स्थान की यथास्थिति बनाए रखने के नाम पर लाया गया है। भारत से बाहर के धार्मिक स्थल केंद्र सरकार का विषय है। जैसे पाकिस्तान स्थिति नानकाना साहिब, चीन स्थित कैलाश मानसरोवर, कंबोडिया स्थित मंदिर, हज आदि से संबंधित कानून बनाने का अधिकार भारत सरकार के पास है। भारत के अंदर स्थित तीर्थ स्थानों को लेकर कानून बनाने का अधिकार राज्य के पास है।

भाजपा नेता ने कहा कि संसद में कानून बनाकर अवैध काम को वैध नहीं बनाया जा सकता। संसद कानून बनाकर ऐतिहासिक गलतियों को सही नहीं ठहरा सकता। उन्होंने कहा कि अगर धार्मिक स्थलों की स्थिति के लिए अगर इस कानून में कटऑफ तय करना ही था तो वह 15 अगस्त 1947 नहीं हो सकता। कायदे से कटऑफ डेट इसकी 1192 ईस्वी होनी चाहिए।

याचिका में हिंदुओं के अधिकारों का हनन का मुद्दा

अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में दी गई अपनी याचिका में कहा गया है कि पूजास्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 न्यायिक समीक्षा पर रोक लगाता है, जो कि संविधान की बुनियादी विशेषता है। इसके साथ ही यह कानून जो तिथि निश्चित करता है, वह हिन्दू, जैन, बुद्ध और सिख धर्मावलंबियों के अधिकारों को सीमित करता है।

ऑपइंडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि यह कानून हिंदू, जैन, सिख और बौद्ध धर्मावलंबियों को उनके पूजास्थलों पर हुए अवैध अतिक्रमण के खिलाफ कोर्ट जाने से रोकता है। यह संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21, 25, 26, 29 और 49 का सीधा उल्लंघन है।

एडवोकेट उपाध्याय ने कहा कि न्यायिक समीक्षा संविधान की मूल संरचना है और पूजास्थल कानून इस मूल संरचना को ही खत्म करता है। यह कानून कहता है कि धार्मिक स्थलों को लेकर जो मुकदमा चल रहा है, वह खत्म हो जाएगा और आगे से कोई मुकदमा दर्ज नहीं होगा। यह संविधान के एक स्तंभ न्यायपालिका पर सीधा है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विवाद का निपटारा कोर्ट के जरिए नहीं होगा तो लोकतंत्र खत्म हो जाएगा और भीड़तंत्र हावी हो जाएगा।

अश्विनी उपाध्याय ने कहा, “न्यायिक समीक्षा संविधान के अनुच्छेद 14 का हिस्सा है। हमारे देवी-देवता ज्यूरिस्टिक पर्सन हैं। इनको भी वैधानिक अधिकार है। संपत्ति का अधिकार है। इस कानून के जरिए राम और कृष्ण के बीच भेद करना अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है, क्योंकि पूजास्थल कानून, 1991 कहता है कि अयोध्या का मामला इसके दायरे में नहीं आएगा, लेकिन यह मथुरा पर लागू होगा। इस तरह राम और कृष्ण के बीच में भेदभाव कर दिया गया।”

अपनी याचिका में दिए गए तथ्यों पर बात करते हुए उन्होंने बताया, “संविधान का अनुच्छेद 15 कहता है कि हिंदू धर्म के मंदिर या मठ की जमीन देवता के नाम पर होती है। जो जमीन मंदिर के देवता के नाम पर एक बार चली गई, वह हमेशा देवता के नाम पर ही रहती है। उसे छीना नहीं जा सकता। उस संपत्ति को मैनेजमेंट कमिटी भले मैनेज करे, लेकिन उसका मालिकाना हक मैनेजमेंट कमिटी के पास नहीं होता। इसलिए मंदिर की जमीन को कोई पुजारी या महात्मा नहीं बेच सकता।”

अनुच्छेद 21 में दिए गए राइट टू जस्टिस (न्याय का अधिकार) का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि कोर्ट जाना, वहाँ दलील देना और वहाँ से न्याय लेना इसके अंतर्गत आता है। पूजास्थल कानून कोर्ट का दरवाजा बंद कर दे रहा है, जिससे संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन हो रहा है।

पूजास्थल कानून को धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का हनन करने वाला बताते हुए उन्होंने कहा, “संविधान के अनुच्छेद 25 में दिए गए धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के तहत हिंदू, बौद्ध, जैन, सिख को भी अपने धर्म का पालन करना, उसका प्रचार-प्रसार करना, पूजा करना, रीति-रिवाज मानने आदि का अधिकार है। जब हमारे महादेव या कृष्ण या किसी देवता का स्थान ही कब्जे में होगा तो हम अपने अनुच्छेद 25 का पालन कैसे कर पाएँगे?”

इसके साथ ही उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 26 का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 26 अपने धार्मिक स्थानों के रख-रखाव का अधिकार देता है। उन्होंने पूछा कि जब मंदिर का मालिकाना हक ही हिंदुओं के पास नहीं है तो उसका रख-रखाव कैसे होगा। उन्होंने इसे संविधान के अनुच्छेद 26 का खुला उल्लंघन बताया।

भाजपा नेता उपाध्याय ने कहा, “संविधान का अनुच्छेद 29 में राइट टू कल्चर के तहत इस देश में हमें अपनी संस्कृति को बचाने व उसका संरक्षण करने का अधिकार है। कृष्ण जन्मभूमि दुनिया में एक ही है, मथुरा में। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों का कोई स्थानापन्न (सब्सिट्यूट) नहीं है। कृष्ण का कोई दूसरा मंदिर, मथुरा का सब्सिट्यूट नहीं हो सकता। इस तरह यह कानून हमें अपने कल्चर को फॉलो करने से रोक रहा है।”

उन्होंने कहा कि संविधान का आर्टिकल 49 कहता है कि सरकार की ये जिम्मेदारी है कि वह सांस्कृतिक धरोहरों को संजोए, उनका रख-रखाव करे। काशी, मथुरा, भद्रकाली, भोजशाला आदि सब सांस्कृतिक धरोहर हैं। ये सब धार्मिक के साथ-साथ सांस्कृतिक विषय भी हैं।

मुस्लिम पक्ष जानता है कि कानून गलत है

अश्विनी उपाध्याय का कहना है कि उपरोक्त ग्राउंड पर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में पूजास्थल कानून, 1991 के खिलाफ PIL दाखिल किया है। मुस्लिम पक्ष ने इस PIL का अभी तक विरोध नहीं किया है। अश्विनी उपाध्याय कहते हैं, “उन्हें पता है कि पूजास्थल कानून घटिया है, इसलिए इसका विरोध नहीं किया। जबसे मैंने PIL दाखिल किया है, दो साल में ये लोग सुप्रीम कोर्ट आ गए होते। अगर कोई इसका विरोध नहीं किया तो इसका मतलब है कि मेरे द्वारा दिए गए तथ्यों का कोई जवाब नहीं है।”

बता दें कि एडवोकेट उपाध्याय की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को अपना जवाब दाखिल करने के लिए नोटिस जारी किया है। इसको लेकर उपाध्याय का कहना है कि सरकार ने दो साल से इस नोटिस का जवाब नहीं दिया है। इसका मतलब है कि ऊपर दिए गए जो तथ्य उठाए गए हैं, उसका सरकार के पास कोई जवाब नहीं है। इसलिए जवाब नहीं आया।

उन्होंने बताया कि पूजास्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 को संसद में बिल द्वारा खत्म किया जा सकता है या सुप्रीम कोर्ट इस कानून को खत्म कर सकता है। उन्होंने कहा कि उनकी PIL यानी, इस विवादित कानून पर सुनवाई पूरे हुए ज्ञानवापी या मथुरा के ईदगाह मस्जिद को लेकर सुनवाई पूरी नहीं हो सकती।

बीफ लेकर स्कूल पहुँचीं महिला प्रिंसिपल दलीमा, बच्चों के मीड डे मील में भी बाँटने को कहा: स्थानीय लोगों की शिकायत के बाद गिरफ्तार

असम में गोलपारा जिले में एक सरकारी स्कूल की प्रिंसिपल को लंच में बीफ लाने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया है। आरोपिता प्रिंसिपल का नाम दलीमा नेसा है। वह मुस्लिम समुदाय से हैं और लखीमपुर के सरकारी स्कूल में पोस्टेड थीं। उनके खिलाफ स्थानीय लोगों ने शिकायत की थी। यह घटना 14 मई 2022 (शनिवार) की है। प्रिंसिपल की गिरफ्तारी मंगलवार (17 मई 2022) को हुई है।

रिपोर्ट्स के अनुसार, दलीमा नेसा बीफ को अपने घर से बना कर ले गई थीं। उन्होंने स्कूल में मिड डे मील बनाने वाले वर्कर्स से उसे बच्चों में बाँटने के लिए कहा। उन बच्चों में कई हिन्दू समुदाय के छात्र भी थे। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक आरोपिता प्रिंसिपल की उम्र 56 साल है। पुलिस को दी गई शिकायत में कहा गया है कि दलीमा की हरकत से स्कूल के बाकी सदस्यों को समस्या हुई। शिक्षा विभाग के एक अधिकारी के मुताबिक प्रिंसिपल के खिलाफ ब्लॉक स्तरीय जाँच भी शुरू कर दी गई है। वहीं 2 दिनों की सरकारी छुट्टी के चलते दलीमा का निलंबन आदेश जारी नहीं किया जा सका था।

बता दें कि अब तक हुई जाँच में सामने आया है कि महिला प्रिंसिपल लंच में चिकन और बीफ दोनों ले कर आई थी। यह माँस बाहर से प्रोग्राम में आने वाले लोगों को परोसा जाना था। बाहर से आने वाले लोग और महिला प्रिंसिपल एक ही समुदाय से हैं। हालाँकि, रसोइए ने इसे परोसने से मना कर दिया था। बाद में यह खबर स्कूल के अन्य स्टाफ को पता चली और देखते ही देखते बाहर फैल गई और लोग भड़क गए। बाद में स्कूल मैनेजमेंट कमेटी ने इसकी शिकायत पुलिस में की।

फिलहाल महिला प्रिंसिपल न्यायिक हिरासत में है। शिक्षा विभाग के मुताबिक दलीमा निस्सा लगभग डेढ़ साल से हेडमास्टर के पद पर हैं। उनके रिटायरमेंट में लगभग 4 साल बचे हैं। दलीमा नेस्सा पर IPC की धारा 153-A (2 समुदायों के बीच द्वेष फैलाने) और 295-A (किसी की धार्मिक भावनाएँ आहत करने) की धाराओं में केस दर्ज किया गया है।

ज्ञानवापी का वजू खाना सील, नमाजियों के लिए 50 लोटा-2 ड्रम पानी का इंतजाम: अंजुमन इंतजामिया ने कहा- मोहल्ले की मस्जिदों में पढ़े नमाज

वाराणसी के विवादित ज्ञानवापी ढाँचे के (Gyanvapi Masjid Shivling) वजू खाना शिवलिंग मिलने के बाद सील कर दिया गया है। इसे देखते हुए वाराणसी के जिलाधिकारी कौशल राज शर्मा ने नमाजियों के लिए विशेष इंतजाम करवाया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक प्रशासन ने शुक्रवार (20 मई 2022) यानी जुम्मे की नमाज से पहले वजू करने के लिए विवादित ढाँचे में 50 लोटे और दो ड्रम पानी का इंतजाम करावाया है।

वहीं, वाराणसी के अंजुमन इंतजामिया मस्जिद कमेटी ने लोगों से अपील की है कि वे शुक्रवार की नमाज अदा करने के लिए बड़ी संख्या में मस्जिद में न आएँ। इसका कारण ज्ञानवापी का वजूखाना सील किया जाना बताया गया है। लोगों से अपने मोहल्‍ले की मस्जिदों में ही जुम्मे की नमाज अता करने की अपील की गई है।

बताया जा रहा है कि जुम्मे की नमाज से पहले गुरुवार (19 मई 2022) को जिलाधिकारी कौशल राज शर्मा ने वाराणसी के मुस्लिम प्रतिनिधियों और धर्मगुरुओं के साथ बैठक की थी। इस बैठक में उन्होंने मुस्लिमों से शांति-व्यवस्था बनाए रखने की अपील करते हुए उन्हें नमाज से पहले वजू के लिए पूरा इंतजाम कराने की जानकारी दी। जिलाधिकारी ने कहा कि ज्ञानवापी में नमाजियों को वजू करने में कोई समस्या न आए, इसके लिए परिसर में 2 ड्रम पानी और 50 लोटों का बंदोबस्त किया गया है।

गौरतलब है कि वाराणसी स्थित ज्ञानवापी विवादित (Gyanvapi Mosque Survey) ढाँचे में तीन दिनों तक सर्वे का काम चला था। तीसरे दिन हिन्दू पक्ष की तरफ से सोमवार (16 मई, 2022) को करीब 12 फीट 8 इंच लंबा शिवलिंग नंदी के सामने वजूखाने में मिलने का दावा किया गया था। जिसके बाद वाराणसी सिविल कोर्ट के जज रवि कुमार दिवाकर ने उस जगह को सील कर सीआरपीएफ के हवाले करने का निर्देश दिया था। वहीं सुप्रीम कोर्ट ने जिला प्रशासन को आदेश दिया था कि जिस स्थान पर शिवलिंग मिला है, उसे सील कर पूरी सुरक्षा दी जाए, लेकिन इसके चलते नमाज में बाधा नहीं आनी चाहिए।

क्या होता है वजू खाना

वजू खाना वह जगह है, जहाँ नमाज से पहले नमाजी अपने हाथों और पैरों को धोते हैं। इस्लामी मान्यताओं के मुताबिक, ऐसा इबादत से पहले साफ-सफाई के लिए किया जाता है। वजूखाना मूलतः 2 शब्दों से मिल कर बना है। पहला वजू जिसका अर्थ होता है शरीर के अंगों को साफ करना और दूसरा खाना जिसका मतलब उस जगह से है जहाँ वजू किया जाता है।

UP के एटा में DM आवास से सटे दरगाह पर चला बुलडोजर: लगातार बढ़ता जा रहा था कब्जा, गुरुवार को लगता था मेला

उत्तर प्रदेश के एटा जिले में अतिक्रमण विरोधी अभियान के तहत मुल्लेशाह दरगाह पर किए गए अतिक्रमण पर बुलडोजर चला है। यह कार्रवाई 15 मई 2022 (रविवार) को की गई। सोशल मीडिया पर इस कार्रवाई की तारीफ की जा रही है। वहीं समाजवादी पार्टी प्रशासन के इस एक्शन का विरोध कर रहा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक एटा जिला के ADM प्रशासन ने इस कार्रवाई की पुष्टि की है। उन्होंने कहा, “दरगाह सुरक्षित रखी जाएगी, लेकिन उसके ऊपर जो कमरे बन रहे हैं उसे तोड़ा गया है। इस कमरे में लोग रहना शुरू कर दिए थे।” वहीं समाजवादी पार्टी ने प्रशासन की इस कार्रवाई का विरोध किया है। दिबियापुर से सपा विधायक प्रदीप यादव ने कहा, “हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के निर्देश पर 7 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने इस मामले की जाँच की है। हम इस कार्रवाई का विरोध करते हैं। इसकी जाँच रिपोर्ट अखिलेश यादव को सौंपी जाएगी। साथ ही इस मुद्दे को विधानसभा में उठाया जाएगा।”

समाजवादी पार्टी के एटा जिलाध्यक्ष परवेज जुबैरी ने भी इस कार्रवाई को गलत बताया है। उन्होंने कहा, “बहुत गलत काम हुआ है ये। ऐसा नहीं होना चाहिए। ये हमारी एकता को तोड़ने का प्रयास है।”

गुरुवार को लगता था मेला

गौरतलब है कि मुल्लेशाह की दरगाह पर हर गुरुवार को मेला लगता था। मेले में चादर आदि बिकती थी जिसको चढ़ाने और अगरबत्ती जलाने पर मन्नत पूरी होने जैसी बातें कही जाती थी। यहाँ का केयर टेकर सोनू कुमार नाम के व्यक्ति को बनाया गया था। यह दरगाह कितनी पुरानी है, आज स्पष्ट नहीं है। लेकिन केयरटेकर इसे 100 साल पुराना बता रहे हैं।

DM बंगले से सटी हुई थी मजार

ऑपइंडिया से बातचीत में स्थानीय निवासियों ने बताया, “मुल्लेशाह की दरगाह एटा में जिला जज के आवास के ठीक सामने बनी थी। यह दरगाह DM बंगले की बॉउंड्री से भी सटी हुई थी। पहले दरगाह छोटी सी थी जो बाद में आसपास अवैध निर्माण कर बड़ी हो गई थी। यहाँ पर कभी DM एटा के ड्राइवर रहे और अब रिटायर्ड प्रेमपाल सिंह ने अतिक्रमण कर के मकान आदि बनाना शुरू कर दिया था। बाद में यहाँ मेला लगने लगा था। दरगाह सुरक्षित है और उसके बगल अतिक्रमण को हटाया गया है।”

विराजमान थे राम-जानकी, मंदिर की एक-एक ईंट निकाल खोल ली बिरयानी रेस्टोरेंट: पाकिस्तानी आबिद रहमान की कानपुर में पंक्चर बनाने वाले मुख्तार से ये कैसी डील

उत्तर प्रदेश के कानपुर से एक हैरान करने वाला मामला सामने आया है। सरकारी रिकॉर्ड में जो जगह राम-जानकी मंदिर के तौर पर दर्ज है, वहाँ आज बिरयानी की रेस्टोरेंट की चल रही है। शत्रु संपत्तियों की तलाश के दौरान यह बात सामने आई है।

रिपोर्टों के अनुसार यह जगह कानपुर के बेकनगंज स्थित डॉक्टर बेरी चौराहा पर है। भवन संख्या 99/14ए रिकॉर्ड में राम-जानकी मंदिर ट्रस्ट का है। यहाँ भगवान श्रीराम का मंदिर था। बताया जाता है कि अस्सी के दशक तक यहाँ पूजा हुआ करती थी। लेकिन अब मंदिर का कुछ ही हिस्सा बचा हुआ है। वह भी जर्जर हाल में है। मंदिर के अन्य हिस्सों को तोड़कर उसका इस्तेमाल रेस्टोरेंट की रसोई के तौर पर किया जा रहा है।

रेस्टोरेंट चलाने वाले व्यक्ति का दावा है कि उसने यह संपत्ति आबिद रहमान से खरीदी थी। रिपोर्ट के अनुसार आबिद रहमान 1962 में पाकिस्तान चला गया था, जहाँ उसका परिवार पहले से ही रह रहा था। 1982 में उसने यह संपत्ति मंदिर परिसर में साइकिल मरम्मत की दुकान चलाने वाले मुख्तार बाबा को बेच दी।

मुख्तार के बेटे महमूद उमर का दावा है कि उसके पास इससे संबंधित सभी आवश्यक कागजात मौजूद हैं और वह जल्द ही प्रशासन के नोटिस का जवाब देगा। यह भी बताया जा रहा है कि रेस्टोरेंट बनाने के लिए मंदिर ट्रस्ट के आगे हिंदुओं की जो 18 दुकानें थीं उसे भी एक-एक कर तोड़ दिया गया

ईटीवी भारत ने शत्रु संपत्ति प्रभारी व एसीएम-सात दीपक पाल के हवाले से बताया है कि उनके पास इस जमीन को लेकर पिछले साल सितंबर-अक्टूबर में शिकायत आई थी। एसडीएम की जाँच में पता चला कि इशहाक बाबा नाम का व्यक्ति इस मंदिर का केयरटेकर था। बाद में उसका बेटा मुख्तार बाबा यहीं साइकिल मरम्मत और पंक्चर बनाने का काम करने लगा।

शत्रु संपत्ति संरक्षक कार्यालय के मुख्य पर्यवेक्षक और सलाहकार कर्नल संजय साहा ने कहा कि इस मामले में लोगों को नोटिस भेजा गया है। उन्हें जवाब देने के लिए दो सप्ताह का समय दिया गया है। कर्नल संजय साहा ने बताया, “हमने उन्हें पाँच विशिष्ट सवालों के साथ नोटिस भेजा है और उनके जवाबों का हमें इंतजार हैं। हालाँकि, अभी तक कोई भी प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।”

मिली जानकारी के अनुसार पिछले साल शत्रु संपत्ति संरक्षण संघर्ष समिति द्वारा शिकायत दर्ज किए जाने के बाद इस मामले में जाँच शुरू की गई थी। लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि जो जमीन राम-जानकी मंदिर ट्रस्ट के नाम से दर्ज है, जहाँ कभी मंदिर था, उसे कोई मुस्लिम व्यक्ति कैसे बेच या खरीद सकता है?

शत्रु संपत्ति अधिनियम

शत्रु संपत्ति अधिनियम (Enemy Property Act), 1968 पाकिस्तान से 1965 में हुए युद्ध के बाद पारित हुआ था। इस अधिनियम के अनुसार, जो लोग 1947 के विभाजन या 1965 में और 1971 में लड़ाई के बाद पाकिस्तान चले गए और वहाँ की नागरिकता ले ली, उनकी सारी अचल संपत्ति ‘शत्रु संपत्ति’ घोषित कर दी गई और भारत सरकार ने उसे जब्त कर लिया। यह अधिनियम शत्रु की संपत्ति की देखभाल का अधिकार संपत्ति के लीगल वारिस या लीगल प्रतिनिधि को देता है।

इस कानून में संशोधन के बाद शत्रु संपत्ति अधिनियम, 2017 आया। इसने शत्रु संपत्ति की परिभाषा बदल दी है। इसके मुताबिक, अब वे लोग भी शत्रु हैं, जो भले ही भारत के नागरिक हो, लेकिन उन्हें विरासत में ऐसी संपत्ति मिली है जो कि किसी पाकिस्तानी नागरिक के नाम है। इस संशोधन ने ऐसी सम्पतियों का मालिकाना हक भी भारत सरकार को दे दिया है।

इस्लामी जिहाद के खिलाफ अब धर्म संसद नहीं करेंगे यति नरसिंहानंद: सार्वजनिक जीवन से संन्यास, कहा- सनातन और गीता के प्रचार-प्रसार में लगाऊँगा जीवन

गाजियाबाद के डासना देवी मंदिर के महंत और जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर यति नरसिंहानंद गिरी ने एक चौंकाने वाली घोषणा की है। उन्होंने सार्वजानिक जीवन से संन्यास लेकर पूरी तरह अपना जीवन धार्मिक कार्यों में लगाने की बात कही है। उन्होंने इस्लामी जिहाद के खिलाफ अपनी लड़ाई और धर्म संसद के आयोजन से खुद को अलग करने की भी घोषणा की है।

यति नरसिंहानंद ने ये बातें 19 मई 2022 (गुरुवार) को कही। जितेंद्र नारायण त्यागी (पूर्व वसीम रिज़वी) के खिलाफ हुई कार्रवाई के लिए भी खुद को दोषी बताया है। एक वीडियो जारी कर यति नरसिंहानंद ने कहा, “हम सभी जितेंद्र नारायण त्यागी को जेल में से लेने आए थे। उनकी रिहाई हो गई है। वे हमसे मिलने से पहले ही चले गए हैं। उनसे हमारा यहीं तक का साथ था। उनके साथ हमारे सुखद या दुखद अनुभव का पूर्णतया दोषी मैं हूँ। उनकी कोई गलती नहीं है। उन्होंने केवल सच बोला। मेरी कमजोरी के चलते उन्हें 4 महीने से ज्यादा समय तक जेल में रहना पड़ा। इसके लिए मैं उनसे क्षमाप्रार्थी हूँ।”

उन्होंने आगे कहा, “मैं हिन्दू समाज से कहना चाहता हूँ कि मैंने अपना जीवन जितना भी था उसे इस्लाम के जिहाद से लड़ने में लगाया। लेकिन अब बचा हुआ जीवन मैं माँ और महादेव के यज्ञ के साथ योगेश्वर की गीता के प्रचार-प्रसार में लगाना चाहता हूँ। मैं अब तक अपने से हुई गलतियों के लिए माफी माँगता हूँ। आज के बाद मैं सार्वजानिक जीवन में नहीं हूँ। मेरे जीवन में अब नया अध्याय केवल एक धार्मिक व्यक्ति के तौर पर शुरू होता है।”

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक यति नरसिंहानंद ने यह फैसला हिन्दू समाज की उदासीनता के चलते लिया है। उन्होंने कहा, “वर्ष 2012 से मैंने देवबंद के इस्लामी जिहाद के खिलाफ धर्म संसद शुरू की थी। लेकिन वो आज समाप्त हो रही। धर्म संसद में जेल गए साथियों के लिए संघर्ष में हिन्दू समाज ने हमारा साथ नहीं दिया। हिन्दू समाज के योद्धाओं की दुर्गति हो रही है।”

गौरतलब है कि कि हरिद्वार में 17-20 दिसंबर को धर्म संसद का आयोजन हुआ था। इस धर्म संसद में भड़काऊ बयान का आरोप लगाते हुए मुस्लिम पक्ष द्वारा शिकायत दर्ज करवाई गई थी। शिकायत के बाद यति नरसिंहानंद गिरी और जितेंद्र नारायण त्यागी की गिरफ्तारी हुई थी। सुप्रीम कोर्ट तक में इस धर्म संसद के विरुद्ध याचिका दाखिल हुई थी।

जमीन दो, रेलवे में जॉब लो: लालू यादव ऐंड फैमिली के 17 ठिकानों पर CBI की रेड, दिल्ली से लेकर बिहार तक जाँच एजेंसी एक्टिव

भ्रष्टाचार के मामले में राजद सुप्रीमो और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) की मुश्किलें फिर बढ़ गईं हैं। केंद्रीय जाँच ब्यूरो (CBI) ने शुक्रवार (20 मई 2022) को उनसे जुड़े 17 ठिकानों पर छापेमारी की। यह कार्रवाई दिल्ली से लेकर बिहार के अलग-अलग जगहों पर की गई। यह मामला जमीन लेकर रेलवे में नौकरी देने से जुड़ा बताया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए-1 की सरकार में लालू यादव रेल मंत्री हुआ करते थे।

सीबीआई की टीम ने लालू यादव, उनकी पत्नी पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी और बेटी मीसा भारती के आवास सहित बिहार और दिल्ली में भी कई स्थानों पर एक साथ कार्रवाई की। इस दौरान सीबीआई की एक टीम राबड़ी देवी के सरकारी आवास 10 सर्कुलर रोड पर भी पहुँची।

सीबीआई सूत्रों ने इंडिया टुडे को बताया कि यह घोटाला उस वक्त हुआ था, जब लालू प्रसाद रेल मंत्री थे। उन्होंने कहा, “जब लालू प्रसाद रेल मंत्री थे, तब कुछ लोगों से नौकरी के बदले जमीन ली गई थी।” रिपोर्ट्स के मुताबिक, राबड़ी आवास पर पहुँची सीबीआई की टीम में कुल 10 लोग हैं। इसमें महिला और पुरुष अधिकारी दोनों ही शामिल हैं। ये सभी राबड़ी के आवास में जाँच कर रहे हैं। इस दौरान आवास में किसी को भी आने-जाने से रोक दिया गया है। राबड़ी देवी के पटना आवास के बाहर पुलिस बल मौजूद है।

जानकारी के मुताबिक, सीबीआई की टीम लालू यादव, उनकी बेटी मीसा के अलावा अन्य रिश्तेदारों के यहाँ पड़ताल कर रही है। चारा घोटाला (Fodder Scam) में राजद नेता को जमानत मिलने के कुछ हफ्ते बाद ही यह मामला सामने आया है।

गौरतलब है कि अप्रैल 2022 में झारखंड हाई कोर्ट (Jharkhand High Court) ने लालू यादव को 10 लाख रुपए के निजी मुचलके पर जमानत दी थी। लालू की तरफ से डोरंडा कोषागार में सीबीआई (CBI) की विशेष अदालत के फैसले को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में जमानत याचिका दाखिल की गई थी। अपनी बढ़ती उम्र और 17 प्रकार की बीमारी के अलावा आधी सजा जेल में काटने का हवाला देते हुए लालू ने जमानत माँगी थी। वहीं, सीबीआई ने जमानत का विरोध करते हुए कहा था कि डोरंडा कोषागार से अवैध निकासी से जुड़े मामले में लालू की आधी सजा अभी पूरी नहीं हुई है तो ऐसे में उन्हें जमानत नहीं मिलनी चाहिए।

गंगा तट पर फिर दिखे समाधि दिए गए दर्जनों शव: कोरोना की दूसरी लहर में यही दिखाकर मीडिया गिरोह ने रची थी भारत को बदनाम करने की साजिश

संगम नगरी कहे जाने वाले उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (Prayagraj, Uttar Pradesh) में गंगा के किनारे रेत में समाधी दिए गए शव बड़ी संख्या में फिर सामने आए हैं। यह दृश्य कोरोना काल की याद दिला रहा है, जिसमें कुछ राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया संगठनों और प्रोपगेंडानिस्टों ने इसे कोरोना से हुई मौतें बताकर राज्य की योगी आदित्यनाथ सरकार (Yogi Adityanath Government) और केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार (Narendra Modi Government) को बदनाम करने की कोशिश की थी।

सामने आए दर्जनों शव प्रयागराज के फाफामऊ घाट की है। यहाँ पर शवों को समाधि देने के बाद उनके ऊपर लाल या गेरुआ रंग का कपड़ा लटका दिया जाता है। आमतौर यह काम वैसे हिंदू करते हैं, जिनके पास दाह-संस्कार के लिए पैसे नहीं होते। वहीं, कुछ लोग परंपरा की वजह से इन्हें समाधि देते हैं।

शवों को समाधि देने वाले लोग चाहते हैं कि उनके प्रियजनों को भी इस नश्वर संसार से मुक्ति मिले, इसलिए गंगा के तट पर वे शवों को समाधिस्थ कर देते हैं। हिंदू धर्म शवों को जलाने की परंपरा है, लेकिन कई इलाकों, खासकर गंगा के किनारे के क्षेत्रों में शवों को समाधि देने की भी परंपरा है।

लोगों का मानना है कि बरसात के दिनों में जब गंगा नदी में पानी का स्तर बढ़ेगा तब ये सारे शव में उसमें प्रवाहित हो जाएँगे। इसके बाद उनके प्रियजनों को मुक्ति मिल जाएगी। इसलिए वे अस्थायी तौर पर शवों को गंगा के किनारे समाधि देते हैं। उनका मानना है कि रेत में समाधि देने से खर्च का भार उन पर नहीं पड़ता। शायद इसीलिए फाफामऊ घाट पर यूपी के कई जिलों के लोग शवों को लेकर आते हैं।

बता दें कि कोरोना की दूसरी लहर के दौरान दुनिया भर के देशों के साथ-साथ भारत में इसका काफी असर हुआ था। लेकिन, जिस तरह अंतर्राष्ट्रीय मीडिया ने इन समाधि वाले शवों को छापकर भारत को बदनाम करने की कोशिश की थी, वह स्पष्ट रूप से प्रोपगेंडा था। उस सरकार तथा कई संस्थानों ने स्पष्ट किया था शवों को दफन करने की हिंदू धर्म में भी परंपरा है, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय मीडिया अपना ही प्रोपगेेंडा चलाता है। यही वजह है कि कोरोना के बाद राष्ट्रीय या अंतराष्ट्रीय मीडिया ने इसकी जाँच करने की कोशिश नहीं की।

बता दें कि गंगा तट पर शवों को समाधि देने पर राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (NGT) और जिला प्रशासन ने रोक लगा रखी है। इसके बावजूद लोग खर्च से बचने और परंपरा के कारण शवों को रेत में समाधि दे रहे हैं। प्रयागराज के निगम कमिश्नर रवि रंजन ने ANI को बताया कि इसे रोकने के लिए जल्दी ही घाटों पर इलेक्ट्रिक शवदाह गृह बनाए जाएँगे। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे गंगा तट पर रेत में शवों को समाधि ना दें।

दलित दूल्हे की बारात पर मस्जिद के सामने हुई थी पत्थरबाजी, राजगढ़ प्रशासन ने आरोपितों के घरों पर चलाया बुलडोजर: मध्य प्रदेश का मामला

मध्य प्रदेश के राजगढ़ में दलित दूल्हे को घोड़ी पर बैठने और मस्जिद के सामने डीजे बजाने को लेकर उपद्रवियों द्वारा किए गए हमले के मामले में प्रशासन ने ऐसी कार्रवाई की है कि दोबारा ऐसी हरकत करने से पहले ऐसे लोग कई बार सोचेंगें। प्रशासन ने दलित दूल्हे पर पथराव करने वालों के घरों पर बुलडोजर चला दिया है। उनके घरों को ढहा दिया गया है।

इस मामले में पुलिस ने 8 लोगों को चिन्हित कर केस दर्ज किया था। गुरुवार (19 मई 2022) की सुबह से ही प्रशासन ने कार्रवाई करते हुए आरोपितों के घरों को जमीदोज कर दिया। अब इस मामले में कॉन्ग्रेस ने तुष्टिकरण की राजनीति भी शुरू कर दी है। इसकी शुरुआत कॉन्ग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने की है। उन्होंने आरोपितों को निर्दोष बताते हुए कहा कि निर्दोषों के घरों तोड़ना निंदनीय है। उन्होंने कहा कि आरोपित गिरफ्तार तो हो गए हैं, ऐसे में निर्दोषों के घरों पर ये कार्रवाई सही नहीं है।

फोटो साभार: ट्विटर

क्या है पूरा मामला

गौरतलब है कि राजगढ़ जिले के जीरापुर में मंगलवार (17 मई 2022) को एक दलित के घर बारात आई थी। इस बारात में डीजे बज रहा था और दूल्हा घोड़ी पर बैठकर आ रहा है। बारात जैसे ही माता जी मोहल्ले में मस्जिद के सामने से निकली, कुछ मुस्लिम युवकों ने बारातियों पर पथराव शुरू कर दिया। इस दौरान बैंड और ढोल बजाने पर दूल्हे के साथ-साथ बारातियों से भी जमकर मारपीट की गई।

पीड़ित के पक्ष के अंकित मालवीय ने बताया कि उसकी चचेरी बहन अंजू की बारात सुसनेर के सुरेश चौहान के यहाँ से आई थी। वे सब बारात का स्वागत करने के लिए गेट पर खड़े थे। बारात जैसे ही मस्जिद के पास पहुँची, मुस्लिमों ने बैंड और ढोल बंद करवा दिए और कहा कि इस गाँव में मस्जिद के सामने बैंड बाजे बजाने की मनाही है।

इसके बाद बारात आगे बढ़ी और शीतला माता मंदिर के पास पहुँची और फिर बैंड और ढोल बजने लगे और बारात में शामिल महिला-पुरुष नाचने लगे। तभी मुस्लिम समुदाय के 20-25 लोगों ने हंगामा करते हुए ढोल वाले की जमकर पिटाई कर दी। उन लोगों ने बरातियों पर पथराव भी किया। मामले में पुलिस ने फरहान, जुनैद, सोहैल, साबिर, अनस कसाई सहित सात लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया था।

ओडिशा सरकार ने माता तारा तारिणी मंदिर का कराया जीर्णोद्धार: देश की प्राचीन शक्तिपीठों में से है एक, पुराणों में भी वर्णन

ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक (Odisha CM Naveen Patnayak) ने बुधवार (18 मई 2022) को राज्य के गंजम जिले में पुनर्निर्मित माँ तारा तारिणी मंदिर परिसर का उद्घाटन किया और मंदिर में पूजा-अर्चना की। मुख्यमंत्री ने इसके निर्माण में भाग लेने वाले कारीगरों एवं कलाकारों की प्रशंसा की और माँ तारा तारिणी के मंदिर के नए रूप को ‘ओडिशा की कला, वास्तुकला और मूर्तिकला का अनूठा उदाहरण’ बताया।

मुख्यमंत्री ने राज्य में ऋषिकुल नदी के तट पर कुमारी पहाड़ियों पर स्थित सबसे प्रतिष्ठित मंदिरों में से एक माँ तारा तारिणी मंदिर के सौंदर्यीकरण और विकास के लिए 100 करोड़ रुपए मंजूर किए थे। इससे पहले 17 मई को मुख्य सचिव सुरेश चंद्र महापात्र, सचिव वीके पांडियन और अन्य अधिकारियों ने एक सप्ताह के उत्सव “प्रतिष्ठा महोत्सव” से पहले विकास कार्यों का जायजा लेने के लिए देश के प्राचीन शक्तिपीठों में से एक तारा तारिणी मंदिर का दौरा किया।

इस दिव्य मंदिर की अपनी यात्रा के बाद ओडिशा के सीएम पटनायक ने ट्वीट किया, “#ओडिशा सरकार के निरंतर प्रयासों और #गंजम के लोगों के अटूट समर्थन के साथ #मातारातारिणी मंदिर आधुनिक समय की उत्कृष्ट कृति बन गया है। नए मंदिर की वास्तुकला पवित्रता की भावना देता है और परंपराओं से दृढ़ता से जुड़ा हुआ है।”

यहाँ यह बताना आवश्यक है कि मंदिर परिसर के डिजाइन में पारंपरिक ओडिया सौंदर्यशास्त्र, मूर्तिकला और कलात्मक परंपराओं को प्रमुखता दी गई है।

नीचे बाईं ओर हमने मंदिर के पुराने स्वरूप को साझा किया है और दाईं ओर अपने वर्तमान पुनर्निर्मित रूप में माँ तारा तारिणी मंदिर का हवाई दृश्य है।

माँ तारा तारिणी मंदिर के पहले और बाद का दृश्य

इस शक्ति पीठ को एक शानदार मंदिर के रूप में बहाल किया गया है, जो ओडिया विरासत का प्रतीक है और ओडिया भावनाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। शक्ति पीठ की परिधि को पूरी तरह से बदल दिया गया है, जिसमें सिंहद्वार प्रवेश द्वार का नवीनीकरण के साथ-साथ तीर्थयात्रियों की सुविधाओं के लिए पेयजल की सुविधा, व्याख्या केंद्र, मुंडन हॉल, प्रसाद सेवन मंडप, सार्वजनिक शौचालय आदि का विकास शामिल हैं।

पुनर्निर्मित सिंहद्वार प्रवेश द्वार (सिंहद्वार) को प्रसिद्ध मुक्तेश्वर संरचना की तरह डिजाइन किया गया है।

साभारछ pragativadi.com

मंदिर के प्रांगण में की गई रोशनी से मंदिर का आकर्षण और बढ़ जाता है। सोशल मीडिया यूजर्स ने मंदिर परिसर के रात के दृश्य की कुछ चौंकाने वाली तस्वीरें साझा कीं। पुनर्निर्मित मंदिर में अब पारंपरिक ओडिया मूर्तियाँ हैं। इन्हें राज्य के प्राचीन मंदिरों की तरह डिजाइन किया गया है, जो मास्टर शिल्प कौशल से सजाए गए हैं।

साभार: ट्विटर
साभार: ट्विटर

ओडिशा के माँ तारा तारिणी मंदिर का इतिहास

माँ तारा तारिणी मंदिर ओडिशा के गंजम जिले में ब्रह्मपुर शहर के पास ऋषिकुल नदी के तट पर कुमारी पहाड़ियों पर 17वीं शताब्दी में स्थापित एक प्राचीन मंदिर है। यह प्रमुख शक्ति पीठों में से एक है और इसे स्थान तीर्थ (स्थान पीठ) और आदि शक्ति के रूप में पूजा जाता है। मंदिर के गर्भगृह तक पहुँचने के लिए 999 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं।

माँ तारा तारिणी को कलिंग साम्राज्य के शासकों की प्रमुख देवी कहा जाता था। इस मंदिर में माँ तारा और तारिणी की पत्थर की मूर्तियाँ स्थापित की गई हैं। माता की मूर्तियों को सोने और चाँदी के अलंकरणों के साथ-साथ कीमती पत्थरों से सजाया गया है। दो पीतल के सिर, जिन्हें उनकी चलंती प्रतिमा या जीवित छवि के रूप में जाना जाता है, रखे जाते हैं।

प्राचीन पुराणों के अनुसार, माँ तारा तारिणी की उत्पत्ति सीधे सतयुग में दक्ष प्रजापति के जगन से हुई है। बिमला, तारा-तारिणी, दक्षिण कालिका और कामाक्षी के प्रसिद्ध शाक्त पीठों की उत्पत्ति देवी सती की दिव्य लाश के अंगों से हुई थी। शिव पुराण, कालिका पुराण और देवी भागवत जैसे प्राचीन ग्रंथ इस तथ्य की पुष्टि करते हैं। दक्षिणी ओडिशा के अधिकांश घरों में माता तारा-तारिणी उनकी अधिष्ठात्री देवी हैं।