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उमा भारती ने बताया- भारत माता का घाव, फिर भी कॉन्ग्रेस लेकर आई प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट: समझिए उस कानून को जो है विवादित ढाँचों की ढाल

वाराणसी के ज्ञानवापी विवादित ढाँचे (Gyanvapi Controversial Structure in Varanasi) के वीडियोग्राफी सर्वे में शिवलिंग और अन्य हिंदू प्रतीकों को सामने आने के बाद इसे हिंदू समुदाय को सौंपने की माँग तेज हो गई है। वहीं, एक तरफ विरोधी मुस्लिम पक्ष शिवलिंग को फव्वारा बताकर तथ्यों को नकार रहा है तो दूसरी ओर उनके वकील पूजास्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 (The Places of Worship (Special Provisions) Act, 1991) को आधार बनाकर ढाँचे के स्वरूप एवं मालिकाना हक को लेकर किसी भी तरह के बदलाव की गुंजाइश को खारिज कर रहे हैं।

इन तथ्यों का इतिहास साक्षी है कि मुस्लिम आक्रमणकारियों ने देश में आक्रमण करने के दौरान और उसके बाद भी सिर्फ धन-संपत्ति की ही लूट-पाट नहीं की थी, बल्कि अपने धार्मिक उन्माद के कारण हजारों-हजार की संख्या में मंदिरों का विध्वंस किया था और कई मंदिरों को मस्जिदों में रूपांतरित कर दिया था। इस बात के साक्ष्य आज भी देश की कई मस्जिदों में स्पष्ट नजर आते हैं और इन्हीं साक्ष्यों को आधार बनाकर हिंदू समुदाय अपनी धरोहर पर फिर से दावा ठोक रहा है। लेकिन, मुस्लिम समुदाय इस कानून को आधार बनाकर अड़ंगा डालने की कोशिश कर रहा है।

साल 1991 में जब पूजास्थल अधिनियम लोकसभा में पेश किया गया था, तब मध्य प्रदेश के खजुराहो से भाजपा की तत्कालीन सांसद उमा भारती (Uma Bharati) ने इसका जमकर विरोध किया था। इस कानून से अयोध्या के तत्कालीन बाबरी ढाँचे और श्रीराम जन्मभूमि विवाद को अलग रखा गया था, लेकिन उमा भारती और भाजपा नेताओं ने वाराणसी के ज्ञानवापी ढाँचा-काशी विश्वनाथ मंदिर और मथुरा के ईदगाह ढाँचा-श्रीकृष्म जन्मभूमि जैसे विवादित स्थलों को भी अपवाद रखने की माँग की थी।

पूजास्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम का उमा भारती ने किया था विरोध

पूजास्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम को 9 सितंबर 1991 को लोकसभा में पेश किया गया था। बहस के दौरान उमा भारती ने इस विधेयक का विरोध करते हुए कहा था कि इसमें जिस तरह से अयोध्या को छूट दी गई है, उसी तरह काशी के विश्वनाथ मंदिर और मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर को भी छूट मिलनी चाहिए। उन्होंने इस बिल को महाभारत के ‘द्रौपदी चीरहरण’ बताते हुए सदन के सभी सदस्यों से इसका विरोध करने का आग्रह किया था।

बिल का लोकसभा में विरोध करते हुए उमा भारती ने कहा था, “मैं ज्ञानवापी के दर्शन के लिए वाराणसी गई थी। मैंने मंदिर के अवशेषों पर बनी मस्जिद को देखा तो मेरे शरीर में क्रोध की लहर दौड़ गई। मुझे अपने पूर्वजों के भाग्य पर शर्मिंदगी महसूस हुई, जो मुझे लगता है कि मेरी नारीत्व को चुनौती दे रहे थे और मुझसे पूछ रहे थे कि औरंगजेब का इरादा केवल एक मस्जिद बनाने का था तो मंदिर के अवशेष क्यों छोड़े गए?”

उन्होंने इतिहास के पन्ने पलटते हुए कहा था, “क्या औरंगजेब का इरादा मंदिर के अवशेषों पर मस्जिद को खड़ा करके हिंदुओं को उनके ऐतिहासिक भाग्य की याद दिलाते रहना और मुस्लिमों की आने वाली पीढ़ियों को उनके अतीत के गौरव और शक्ति की याद दिलाना नहीं था?”

उमा भारती ने तर्क दिया था कि गाँवों में बैलगाड़ियों के मालिक बैलों की पीठ पर घाव बना देते हैं और जब वे चाहते हैं कि उनकी बैलगाड़ी तेज चले तो वे घाव पर वार करते हैं। इसी तरह, ये विवाद ‘भारत माता’ पर घाव और गुलामी के निशान हैं। जब तक बनारस में ‘ज्ञानवापी’ अपनी वर्तमान स्थिति में बनी रहेगी, तब तक यह हिंदुओं को औरंगजेब द्वारा किए गए अत्याचारों की याद दिलाती रहेगी।

भाजपा ने बिल के विरोध में सदन से किया था वॉकआउट

लोकसभा में इस बिल के पेश होने पर बहस में सिर्फ 21 सांसदों ने हिस्सा लिया था, जिनमें 4 सांसदों ने विरोध किया था। विरोध करने वालों में भाजपा के तीन और शिवसेना के सांसद शामिल थे। भाजपा की ओर तत्कालीन सांसद लालकृष्ण आडवाणी, उमा भारती, राम नाईक और मदन लाल खुराना और शिवसेना की ओर से अशोक आनंदराव देशमुख शामिल थे।

लोकसभा में बिल के पेश होने के बाद भाजपा नेता संसद से वॉकआउट कर गए थे। उनका नेतृत्व लालकृष्ण आडवाणी ने किया था, जबकि राज्यसभा में भाजपा नेता सिकंदर बख्त ने भाजपा की ओर विरोध की कमानी संभाली थी। हालाँकि, 9 सितंबर के अगले दिन यानी 10 सितंबर को यह बिल लोकसभा में पास हो गया। यह बिल राज्यसभा में भी 12 सितंबर 1991 को ही पास हो गया।

तब भाजपा के दिग्गज नेता लालकृष्ण आवाणी ने कहा था, “मुझे नहीं पता कि यह विधेयक कितना मददगार बनेगा, लेकिन मैं इतना जरूर जानता हूँ कि हम उन समस्याओं को हल नहीं कर रहे हैं, जो सभी तनावों के पीछे हैं। हम इस विधेयक को उन जगहों पर तनाव पैदा करने के लिए पारित कर रहे हैं, जहाँ यह समस्या नहीं है।”

क्यों लाया गया था यह बिल?

साल 1986 में अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि का ताला खोले जाने के बाद भाजपा ने अपने राम मंदिर आंदोलन को गति देना शुरू कर दिया था। भाजपा के दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में अयोध्या में श्रीराम मंदिर के निर्माण के लिए देश भर के लोगों का समर्थन जुटाने के लिए रथयात्रा का ऐलान किया गया। इस रथयात्रा के संयोजक वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी थे।

लालकृष्ण आडवाणी ने 25 सितंबर 1990 को गुजरात के सोमनाथ मंदिर में पूजा कर अपनी रथयात्रा की शुरुआत की। यह रथयात्रा दिल्ली सहित 8 राज्यों से होते हुए 30 अक्टूबर को अयोध्या में खत्म होनी थी। देश भर में राम नाम का गुणगान हो रहा था और बच्चे-बच्चे की जुबान पर राम का नाम था। गाँव के आखिरी व्यक्ति तक राममंदिर को लेकर उत्साह था।

लेखक उस दौरान किशोरावस्था में प्रवेश करने की ओर अग्रसर था और ग्रामीण और कस्बाई इलाकों की स्थिति को बहुत नजदीक से देखा था। गाँवों-शहरों में लोगों ने अपने घर की दीवारों पर ‘मंदिर वहीं बनाएँगे’, ‘एक ईंट राम के नाम’ जैसे नारे लिखे थे। लोगों के उत्साह के कारण भाजपा को अपार जनसमर्थन मिल रहा था। इसको देखकर कॉन्ग्रेस और वामपंथियों में खलबली मच गई। 

इसी बीच तत्कालीन प्रधानममंत्री राजीव गाँधी की हत्या हो गई और सहानुभूति की लहर पर सवार कॉन्ग्रेस को 1991 के लोकसभा चुनावों में 232 सीटें मिलीं। पहली बार गाँधी-नेहरू परिवार अलग हटकर दक्षिण भारत के कॉन्ग्रेसी नेता पीवी नरसिम्हा राव के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस ने केंद्र में सरकार बनाई। सरकार बनने के बाद कॉन्ग्रेस सरकार ने इस बिल को सदन में लाने का निर्णय लिया।

बिल का समर्थन करते हुए तत्कालीन गृहमंत्री और कॉन्ग्रेस नेता एसबी चव्हाण ने कहा था, “पूजा स्थलों के रूपांतरण के संबंध में समय-समय पर होने वाले विवादों को देखते हुए इसके लिए उपाय करना आवश्यक है, ताकि भविष्य में सांप्रदायिक माहौल ना खराब हो।”

तब भाजपा नेता उमा भारती ने तर्क दिया था कि यह कानून बिल्ली-कबूतर की स्थिति जैसी है। उन्होंने कहा था कि बिल्ली को आता देख कबूतर अपनी आँखें बंद कर लेता है और सोचता है कि वह सुरक्षित हो गया, लेकिन ऐसा नहीं होता। उन्होंने कहा कि 1947 की तरह धार्मिक स्थलों पर यथास्थिति बनाए रखना, बिल्लियों के आगे बढ़ने के खिलाफ कबूतरों की तरह आँखें बंद करने जैसा है। यह आने वाली पीढ़ियों के बीच तनाव को बनाए रखेगा।

इस बिल का कॉन्ग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर और गुलाम नबी आजाद ने खुलकर समर्थन किया था। मणिशंकर अय्यर ने कहा था कि इस बिल का पेश होना धर्मनिरपेक्ष ताकतों को एक साथ आने और सांप्रदायिक ताकतों से लड़कर सांप्रदायिकता की राजनीति से छुटकारा पाने का अवसर है।

क्या है पूजास्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991

पीवी नरसिम्हा राव के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा लाए गए पूजास्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम में कहा गया है कि 15 अगस्त 1947 तक अगर किसी धर्म का कोई पूजास्थल है तो उसे दूसरे धर्म के पूजास्थल में नहीं बदला जा सकता। कानून में इसके लिए एक से तीन साल तक की जेल और जुर्माना का प्रावधान किया गया है। इस कानून में अयोध्या को अलग रखा गया है, क्योंकि उस समय यह मामला कोर्ट में था।

इस कानून की धारा-2 में कहा गया है कि अगर 15 अगस्त 1947 में मौजूद किसी धार्मिक स्थल में बदलाव को लेकर अगर किसी अदालत, न्यायाधिकरण या अन्य प्राधिकरण में कोई याचिका लंबित है तो उसे रद्द किया जाएगा। कानून की धारा-3 में कहा गया है कि किसी पूजास्थल को पूरी तरह या आंशिक रूप से दूसरे धर्म के पूजास्थल में नहीं बदला जा सकता है।

वहीं, इस कानून के धारा-4(1) में कहा गया है कि किसी भी पूजास्थल का चरित्र देश की स्वतंत्रता के दिन का वाला ही रखना होगा। इस कानून का धारा-4(2) उन मुकदमों, अपीलों और कानूनी कार्यवाहियों पर रोक लगाता है, जो पूजास्थल कानून के लागू होने की तिथि पर लंबित थे।

पूजास्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 को कोर्ट में चुनौती

भाजपा और दक्षिणपंथी संगठनों के लिए यह कानून शुरू से ही विवाद का विषय रहा है। भाजपा ने कानून के पहले दिन से ही इसका विरोध किया है। भाजपा नेता और सुप्रीम कोर्ट में अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने इस कानून को निरस्त करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दायर की है। इसके अलावा, इस कानून के खिलाफ याचिका लखनऊ के विश्व भद्र पुजारी पुरोहित महासंघ ने भी दायर की है।

इन याचिकाओं में कहा गया है कि पूजास्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 न्यायिक समीक्षा पर रोक लगाता है, जो कि संविधान की बुनियादी विशेषता है। इसके साथ ही यह कानून जो तिथि निश्चित करता है, वह हिन्दू, जैन, बुद्ध और सिख धर्मावलंबियों के अधिकारों को सीमित करता है।

अश्विनी उपाध्याय द्वारा मार्च 2021 में दायर की गई याचिका में कहा गया है कि इस कानून के प्रावधान मनमाने और असंवैधानिक हैं। यह कानून हिंदू, जैन, सिख और बौद्ध लोगों को उनके पूजास्थलों पर हुए अवैध अतिक्रमण के खिलाफ कोर्ट जाने से रोकता है। उन्होंने कहा है कि यह कानून संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21, 25, 26, 29 और 49 का उल्लंघन करता है।

असंवैधानिक है पूजास्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991: अश्विनी उपाध्याय

ऑपइंडिया से बात करते हुए भाजपा नेता और कानूनविद अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि इस कानून को बनाने का अधिकार केंद्र सरकार के पास नहीं है। यह कानून पब्लिक ऑर्डर (कानून व्यवस्था) बनाए रखने की आड़ में बनाया गया, जबकि कानून-व्यवस्था स्टेट सब्जेक्ट है, केंद्र का सब्जेक्ट नहीं।

उन्होंने कहा, “यह कानून धार्मिक स्थान की यथास्थिति के नाम पर बनाया गया है। भारत से बाहर के धार्मिक स्थल केंद्र सरकार का विषय है, भारत के अंदर के नहीं। जैसे पाकिस्तान स्थिति नानकाना साहिब, चीन स्थित कैलाश मानसरोवर, कंबोडिया स्थित मंदिर, हज आदि से संबंधित कानून बनाने का अधिकार भारत सरकार के पास है। भारत के अंदर तीर्थ स्थानों को लेकर कानून बनाने का अधिकार राज्य के पास है।”

एडवोकेट उपाध्याय ने कहा कि पार्लियामेंट कानून बनाकर अवैध काम को वैध नहीं बना सकता। कानून बनाकर वह ऐतिहासिक गलतियों को सही नहीं ठहरा सकता। ऐतिहासिक गलतियों को सुधारना सरकार का काम है, उस पर ठप्पा लगाना सरकार का काम नहीं है। उन्होंने कहा कि अगर धार्मिक स्थलों की स्थिति के लिए अगर इस कानून में कटऑफ तय करना ही था तो वह 15 अगस्त 1947 नहीं हो सकता। कायदे से कटऑफ डेट इसकी 1192 ईस्वी होनी चाहिए।

हिंदू-बौद्ध-जैन-सिखों के धार्मिक अधिकारों का उल्लंघन

ऑपइंडिया से बातचीत में अश्विनी उपाध्याय ने बताया कि न्यायिक समीक्षा संविधान की मूल संरचना है। पूजास्थल कानून कहता है कि धार्मिक स्थलों को लेकर जो मुकदमा चल रहा है, वह खत्म हो जाएगा और आगे से कोई मुकदमा दर्ज नहीं होगा। यह कानून न्यायिक समीक्षा को ही खत्म कर रहा है। संविधान का एक स्तंभ न्यायपालिका है, यह उसी पर चोट कर रहा है। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक देशों में विवाद का समाधान कोर्ट के जरिए नहीं होगा तो लोकतंत्र खत्म हो जाएगा और भीड़तंत्र हावी हो जाएगा।

अश्विनी उपाध्याय ने आगे कहा, “न्यायिक समीक्षा संविधान के अनुच्छेद 14 का हिस्सा है। हमारे देवी-देवता ज्यूरिस्टिक पर्सन हैं। इनको भी वैधानिक अधिकार है, संपत्ति का अधिकार है। इस कानून के जरिए राम और कृष्ण के बीच भेद करना अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है, क्योंकि यह कानून (पूजास्थल कानून, 1991) कहता है कि अयोध्या का मामला इस कानून के दायरे में नहीं आएगा, लेकिन मथुरा पर लागू होगा। इस तरह राम और कृष्ण के बीच में भेदभाव लागू कर दिया गया।”

अपनी याचिका में दिए गए तथ्यों पर बात करते हुए उन्होंने आगे बताया, “अनुच्छेद 15 कहता है कि हमारे यहाँ (हिंदू धर्म) में जो मंदिर या मठ की जमीन होती है, वह उस देवता के नाम पर होती है। जो जमीन मंदिर के देवता के नाम पर एक बार चली गई, वह हमेशा मंदिर के देवता के नाम पर रहती है। उसे छीन नहीं सकते। उस संपत्ति को मैनेजमेंट कमिटी मैनेज तो करती है, लेकिन उसका मालिकाना हक मैनेजमेंट कमिटी के पास नहीं होता। जैसे कि अयोध्या मंदिर की जमीन को कोई पुजारी या महात्मा नहीं बेच सकता। वह भगवान राम के नाम पर जमीन है।”

एडवोकेट उपाध्याय ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 21 में राइट टू जस्टिस (न्याय का अधिकार) है। कोर्ट जाना, वहाँ दलील देना और वहाँ से न्याय लेना इसमें आता है। लेकिन यह कानून कोर्ट का दरवाजा ही बंद कर दे रहा है। इसलिए इसमें संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन हो रहा है।

पूजास्थल कानून को धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का हनन करने वाला बताते हुए उन्होंने कहा, “संविधान के अनुच्छेद 25 में धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार है। इसके तहत हमें (हिंदू), बौद्ध, जैन, सिख को भी अपने धर्म का पालन करना, उसका प्रचार-प्रसार करना, पूजा करना, परिक्रमा करना, रीति-रिवाज मानने आदि का अधिकार है। जब हमारे महादेव या कृष्ण या किसी देवता का स्थान ही कब्जे में होगा तो हम अपने अनुच्छेद 25 का पालन कैसे कर पाएँगे? इसलिए इस कानून से हमारे अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है।”

इसके साथ ही उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 26 का हवाला दिया। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 26 अपने धार्मिक स्थानों के रख-रखाव का अधिकार देता है। उन्होंने पूछा कि जब मंदिर का मालिकाना हक ही हिंदुओं के पास नहीं है तो उसका रख-रखाव कैसे होगा। उन्होंने इसे संविधान के अनुच्छेद 26 का खुला उल्लंघन बताया।

भाजपा नेता उपाध्याय ने कहा, “संविधान का अनुच्छेद 29 कहता है कि इस देश में हमें अपनी संस्कृति को बचाने व उसका संरक्षण करने का अधिकार है। यह राइट टू कल्चर कहलाता है। कृष्ण जन्मभूमि दुनिया में एक ही है, मथुरा में। भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों का कोई स्थानापन्न (सब्सिट्यूट) नहीं है। कृष्ण का कोई दूसरा मंदिर, मथुरा का सब्सिट्यूट नहीं हो सकता। इस तरह यह कानून हमें अपने कल्चर को फॉलो करने से रोक रहा है।”

उन्होंने कहा कि संविधान का आर्टिकल 49 कहता है कि सरकार की ये जिम्मेदारी है कि वह सांस्कृतिक धरोहरों को संजोए, उनका रख-रखाव करे। काशी, मथुरा, भद्रकाली, भोजशाला आदि सब सांस्कृतिक धरोहर हैं। ये सब धार्मिक के साथ-साथ सांस्कृतिक विषय भी हैं।

इस्लामिक कानून के तहत साबित करना होगा कि वहाँ मस्जिद थी

मथुरा, काशी, भोजशाला जैसे मंदिरों की चर्चा करते हुए अश्विनी उपाध्याय ने ऑपइंडिया को बताया, “ये सब स्थान मस्जिद हैं नहीं। इन्हें मस्जिद प्रूव करने के लिए सबसे पहले इस्लामिक लॉ से प्रूव करना पड़ेगा। मंदिर है या नहीं है, ये हिंदू लॉ से प्रूव करना है। कोई भी स्थान ऐसा नहीं हो सकता कि वह मंदिर भी हो और मस्जिद भी हो। वह या तो मंदिर होगा या मस्जिद। अगर यह मस्जिद है तो आपको (मुस्लिम पक्ष को) चार बातें साबित करनी पड़ेंगी।”

इस्लामिक कानून के तहत मस्जिद बनाने के लिए आवश्यक शर्त की बात करते हुए उन्होंने कहा, “मस्जिद बनाने के लिए सबसे पहले यह साबित करना होगा कि ये कि यह जमीन मेरी है या हमने इसे किसी से खरीदा या फिर किसी अपनी इच्छा (बिना डर-भय, लालच के) से इसे दान किया है। सबसे महत्वपूर्ण बात कि वहाँ पहले कोई स्ट्रक्चर नहीं था। इस्लामिक लॉ में मस्जिद के लिए यह पहली कंडीशन होती है। धार्मिक स्ट्रक्चर तो होना ही नहीं चाहिए। अगर किसी मकान, दलान, दुकान आदि घरेलू ढाँचा है और वहाँ मस्जिद बनाना चाहते हैं…. मान लीजिए हमारे पास एक दुकान है और हम उसे अब नहीं चलाना चाहते और वहाँ एक मस्जिद बनाना चाहते हैं तो सबसे पहले उस दुकान की एक-एक ईंट उखाड़नी पड़ेगी। इस्लामिक लॉ ये कहता है कि नींव में पहले के ढाँचे का एक ईंट भी नहीं होनी चाहिए। पहली ईंट जो लगनी चाहिए, वो मस्जिद के नाम की लगनी चाहिए।”

हिंदू कानून और इस्लामिक कानून के बीच फर्क का जिक्र करते हुए एडवोकेट उपाध्याय ने कहा कि मंदिरों में पहले मंदिर बन जाता है फिर नामकरण होता है, मस्जिदों में पहले नामकरण हो जाता है फिर मस्जिद बनती है। मस्जिद का जो नाम रख दिया जाता है, उसी के नाम की पहली ईंट नींव में रखी जाएगी।

ज्ञावापी मामले में मुस्लिमों को औरंगजेब के इतिसकारों को झूठा साबित करना होगा: उपाध्याय

अश्विनी उपाध्याय ने ज्ञानवापी मामले को लेकर ऑपइंडिया से कहा, “आप (मुस्लिम) कहते हैं कि ज्ञानवापी मस्जिद है तो आपको सबसे पहले औरंगजेब को झूठा साबित करना पड़ेगा। जो उसके इतिहासकार हैं, उनको झूठा साबित करना पड़ेगा। उसके ये भी साबित करना पड़ेगा कि फलाने आदमी ने जमीन दान किया या उससे खरीदा। यह भी साबित करना पड़ेगा कि फलाने बादशाह ने इस मस्जिद की पहली ईंट रखी थी यहाँ पर।”

ज्ञानवापी को मंदिर बताते हुए उन्होंने कहा, “हिंदू लॉ कहता है कि एक बार वहाँ भगवान की प्राण-प्रतिष्ठा कर दिया, उसके बाद उसकी दीवार तोड़ दीजिए, गुंबद उड़ा दीजिए, नमाज पढ़िए चाहे उसकी नींव की एक-एक ईंट उखाड़ दीजिए वह मंदिर ही रहेगा। एक बार मंदिर हो गया तो वह किसी भी रूप में हमेशा मंदिर ही रहेगा। जब तक वहाँ से मूर्ति का विसर्जन नहीं होगा, तब तक वह मंदिर ही कहलाएगा।”

मुस्लिम पक्ष को पता है कि कानून गलत है, इसलिए PIL का विरोध नहीं किया: उपाध्याय

अश्विनी उपाध्याय का कहना है कि उपरोक्त ग्राउंड पर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में पूजास्थल कानून, 1991 के खिलाफ PIL दाखिल किया है। मुस्लिम पक्ष ने इस PIL का अभी तक विरोध नहीं किया है। अश्विनी उपाध्याय कहते हैं, “उन्हें पता है कि पूजास्थल कानून घटिया है, इसलिए इसका विरोध नहीं किया। जबसे मैंने PIL दाखिल किया है, दो साल में ये लोग सुप्रीम कोर्ट आ गए होते। अगर कोई इसका विरोध नहीं किया तो इसका मतलब है कि मेरे द्वारा दिए गए तथ्यों का कोई जवाब नहीं है।”

बता दें कि एडवोकेट उपाध्याय की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को अपना जवाब दाखिल करने के लिए नोटिस जारी किया है। इसको लेकर उपाध्याय का कहना है कि सरकार ने दो साल से इस नोटिस का जवाब नहीं दिया है। इसका मतलब है कि ऊपर दिए गए जो तथ्य उठाए गए हैं, उसका सरकार के पास कोई जवाब नहीं है। इसलिए जवाब नहीं आया।

उन्होंने बताया कि पूजास्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 को संसद में बिल द्वारा खत्म किया जा सकता है या सुप्रीम कोर्ट इस कानून को खत्म कर सकता है। उन्होंने कहा कि उनकी PIL यानी, इस विवादित कानून पर सुनवाई पूरे हुए ज्ञानवापी या मथुरा के ईदगाह मस्जिद को लेकर सुनवाई पूरी नहीं हो सकती।

मथुरा में शाही ईदगाह हटाने की याचिका को कोर्ट ने स्वीकारा, विवादित ढाँचे में लड्डू गोपाल के ‘जलाभिषेक’ पर भी होगी सुनवाई

मथुरा के शाही ईदगाह विवादित ढाँचे के भीतर लड्डू गोपाल के जलाभिषेक और पूजा का अधिकार माँगने वाली याचिका को स्वीकारे जाने के बाद इस मामले पर कोर्ट ने एक और याचिका को स्वीकार किया है। जानकारी के मुताबिक, गुरुवार (19 मई 2022) को श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह विवादित ढाँचे मामले में मथुरा कोर्ट ने मंदिर के पास बने विवादित ढाँचे को हटाने की माँग वाली याचिका स्वीकार ली।

याचिका लखनऊ निवासी रंजना अग्निहोत्री द्वारा केशव देव मंदिर के लिए दायर की हुई थी। कोर्ट ने इस संबंध में याचिका स्वीकारते हुए कहा कि रंजना की ओर से दायर अपील सुनवाई करने योग्य है। केस भगवान श्रीकृष्ण विराजमान के नाम से दायर है। वकील हरिशंकर जैन ने बताया कि कोर्ट ने उन तमाम याचिकाओं में से एक याचिका को स्वीकारा है जिसमें कहा गया था कि मस्जिद को मंदिर की जमीन पर खड़ा किया गया। अब कोर्ट ने इस मामले को सिविल कोर्ट में सुनवाई के लिए भेजा है।

बता दें कि इससे पहले साल 2020 के सितंबर में मथुरा सिविल कोर्ट ने शाही ईदगाह विवादित ढाँचे को हटाने की माँग वाली याचिका को खारिज कर दिया था। इस याचिका में शाही ईदगाह को हटाने और भगवान श्रीकृष्ण विराजमान को 13.37 एकड़ जमीन हस्तांतरित करने की माँग थी। लेकिन सिविल कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। इसके बाद ये मामला जिला अदालत पहुँचा। जहाँ सुनवाई के बाद एक याचिका स्वीकारी गई।

मालूम हो कि ज्ञानवापी सर्वे के बाद से मथुरा श्रीकृष्ण जन्मभूमि को लेकर भी कोर्ट में तेजी से याचिकाएँ जा रही है। हाल में श्रीकृष्ण जन्मभूमि- शाही ईदगाह विवाद के संबंध में मनीष यादव नामक व्यक्ति ने याचिका डालकर संदेह जताया था कि कुछ लोग शागी ईदगाह से वो प्रमाण मिटाने की कोशिश कर सकते हैं जो साबित करती है कि वो शादी ईदगाह का भाग हैं।

गौरतलब है कि इससे पहले अखिल भारतीय हिंदू महासभा के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष दिनेश कौशिक ने बुधवार को सिविल जज सीनियर डिवीजन मथुरा में एक याचिका दायर कर शाही ईदगाह पर लड्डू गोपाल के जलाभिषेक की अनुमति माँगी थी। अदालत ने उस याचिका को स्वीकार करके अगली सुनवाई के लिए 1 जुलाई की तारीख तय की।

मुख्यमंत्री घर-घर राशन योजना रद्द, केजरीवाल सरकार को दिल्ली हाईकोर्ट ने दिया झटका, कहा- केंद्र की योजना का नहीं कर सकते इस्तेमाल

दिल्ली हाई कोर्ट ने केजरीवाल सरकार की घर-घर राशन योजना पर रोक लगा दी है। इससे पहले इस योजना को लेकर केंद्र और केजरीवाल सरकार में टकराव की स्थिति सामने आई थी। वहीं अब दिल्ली हाई कोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने राशन वितरण के लिए दिल्ली सरकार की योजना को रद्द किया है। हाई कोर्ट द्वारा गुरुवार (19 मई, 2022) को सुनाए गए इस फैसले के बाद अब राशन की डोरस्टेप डिलिवरी से जुड़ी केजरीवाल सरकार की योजना फिलहाल दिल्ली में लागू नहीं होगी।

लाइव लॉ की रिपोर्ट के अनुसार, हाई कोर्ट ने मुख्यमंत्री घर-घर राशन योजना को चुनौती वाली राशन डीलरों की दो याचिकाओं को मंजूरी दे दी थी। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विपिन संघी और न्यायमूर्ति जसमीत सिंह ने कहा कि घर-घर चीजें पहुँचाने के लिए दिल्ली सरकार कोई और योजना लाने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन वह केंद्र सरकार की ओर से उपलब्ध कराए गए अनाज का इस्तेमाल घर-घर पहुँचाने की योजना के लिए नहीं कर सकती। जहाँ दिल्ली सरकार इस योजना को बीते साल 25 मार्च को लागू करने की तैयारी की थी। वहीं, इससे पहले ही केंद्र ने 19 मार्च को उसे एक पत्र भेजकर इसमें अपनी आपत्ति जताई थी।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली की सरकारी राशन डीलर्स संघ और दिल्ली राशन डीलर्स यूनियन की ओर से दायर याचिकाओं पर उच्च न्यायालय ने 10 जनवरी, 2022 को आदेश सुरक्षित रख लिया था। दरअसल, ये घर-घर राशन योजना दिल्ली सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक थी, लेकिन इसको लेकर केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच खींचतान देखने को मिली। वहीं आज दिल्ली हाईकोर्ट ने इस योजना को रद्द कर दिया है।

इस मामले में पहली आपत्ति योजना के नाम में ‘मुख्यमंत्री’ शब्द के इस्तेमाल को लेकर थी। केंद्र का कहना था कि राशन का वितरण नेशनल फूड सिक्योरिटी ऐक्ट (NFSA) के अंतर्गत होता है। दूसरा तर्क यह दिया गया कि NFSA में किसी तरह के बदलाव के लिए कानून में बदलाव करना होगा और ऐसा करने का अधिकार सिर्फ संसद के पास है।

इसका नतीजा यह हुआ कि राशन वितरण योजना को लेकर एक ही शहर में केंद्र और राज्य सरकारें आमने-सामने आ गईं। इधर, केंद्र ने योजना को लागू किए जाने का विरोध करते हुए कहा कि यह NFSA के प्रावधानों का उल्लंघन करती है और इसे लागू करने से दिल्ली में रहने वाले प्रवासी राशन से वंचित हो जाएँगे। वहीं केजरीवाल सरकार ने इससे कालाबाजारी पर लगाम लगने का दावा किया और कहा कि इससे राशन माफियाओं पर लगाम लगेगी और राशन सीधे लाभार्थियों तक पहुँचेगा।

गौरतलब है कि एक रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में 72 लाख से ज्यादा लोग सब्सिडी वाला राशन पाने के हक़दार हैं, वहीं मात्र इनमें 17 लाख राशन कार्ड धारक हैं। और घर-घर योजना को लेकर दिल्ली की केजरीवाल सरकार और उपराज्यपाल के बीच विवाद सामने आया था।

बता दें कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुँचा था, लेकिन तब सर्वोच्च अदालत ने दिल्ली हाई कोर्ट के अंतरिम आदेश में किसी भी तरह के दखल से इनकार कर दिया था। वहीं दिल्ली हाई कोर्ट ने बीते साल सितंबर में मामले में अंतरिम आदेश जारी कर दिल्ली सरकार के उस फैसले को बरकरार रखा था, जिसके तहत डोरस्टेप डिलीवरी का विकल्प चुनने वालों के हिस्से का राशन राशन डीलरों को सप्लाई नहीं करने का आदेश दिया गया था।

खून की सजा खून… बलिदानी रवि खन्ना की पत्नी ने कहा- नहीं बचेगा यासीन मलिक: उस समय को किया याद जब PM से हाथ मिला रहा था आतंकी

जम्मू-कश्मीर में टेरर फंडिंग के मामले में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) की स्पेशल कोर्ट ने आतंकी यासीन मलिक को दोषी करार दिया है। उसे 25 मई को सजा सुनाई जाएगी। मलिक को दोषी करार दिए जाने के बाद बलिदानी स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना की पत्नी निर्मल खन्ना की प्रतिक्रिया सामने आई है। रवि खन्ना की हत्या मलिक के आतंकी साथियों ने कर दी थी।

निर्मल खन्ना ने कहा है, “स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना का खून इसका पीछा कर रहा है। ये उस केस में भी नहीं बचेगा। खून की सजा खून, मौत की सजा मौत। मैं इंतजार कर रही हूँ। हमें इंसाफ जरूर मिलेगा।”

उन्होंने कहा, “अगर यहाँ तक इंसाफ हुआ है, तो उसमें भी होगा। ये स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना का खूनी है। यासीन मलिक ने तो बड़ी सफाई से हाथ धोके, सोचा था कि मैं तो इतने गुनाह करके भी बच गया। कभी प्रधानमंत्री उससे हाथ मिला रहा है। कभी दिल्ली की एक डॉक्टर, जो कौल है उससे हाथ मिला रही हैं। क्या उन्हें नहीं पता उसके बारे में, जबकि वह भी कश्मीरी पंडित हैं। उन्होंने उसे अपने घर में बुलाकर दावतें दीं। इनको शादी की मुबारकबाद दीं। कैसे कलेजे हैं इन लोगों के। मेरे घर का बच्चा अगर खराब निकले तो… ये मदर इंडिया है ना, जो खुद अपने बच्चे के सीने में गोली आर-पार कर देती है। मैं उसी की बेटी हूँ। मैं सच कह रही हूँ आपसे। अहिल्याबाई होलकर के बारे में आपको पता होगा, जिसके बच्चे ने गाय के बच्चे को मार दिया था। वो अपने बेटे को मारने चली गई थी, लेकिन उस गाय ने आगे आकर उसे बचा लिया था। ये वो देश है। हर कोई अपने बच्चे को नेक राह पर चलाए। उनके अच्छे भविष्य की कामना करे।”

गौरतलब है कि वर्ष 1990 में जम्मू-कश्मीर में भारतीय वायुसेना के 4 निहत्थे जवानों की हत्या कर दी गई थी। इनमें स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना भी शामिल थे। जिन आतंकियों ने जवानों की हत्या की थी, वे यासीन मलिक द्वारा संचालित आतंकी संगठन के सदस्य थे। यह घटना जनवरी 25 1990 को हुई थी।

स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना की पत्नी निर्मल खन्ना अपने पति के हत्यारों को सज़ा दिलाने के लिए लड़ रही हैं। भारतीय वायुसेना के इन जवानों की हत्या तब की गई थी, जब उनके पास कोई भी हथियार नहीं था। वे एयरपोर्ट जाने के लिए बस का इन्तजार कर रहे थे। वहाँ भारतीय वायुसेना के 14 जवान थे। तभी अचानक से एक मारुति जिप्सी और एक बाइक से 5 आतंकी पहुँचे और इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता, उन्होंने एके-47 से ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। जवानों के अलावा 2 कश्मीरी महिलाओं की भी हत्या कर दी गई, जो बस का इंतजार कर रही थीं। आतंकियों ने ख़ून से लथपथ जवानों के सामने डांस करते हुए जिहादी नारे भी लगाए थे।

नवजोत सिंह सिद्धू को जेल: सुप्रीम कोर्ट ने 34 साल पुराने मामले में सुनाई सजा, 4 साल पहले ₹1000 जुर्माना लगा छोड़ दिया था

पंजाब कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू को सुप्रीम कोर्ट ने जेल की सजा सुनाई है। 34 साल पुराने रोडरेज के मामले में एक साल सश्रम कारावास की सजा सुनाए जाने के बाद कॉन्ग्रेस नेता को या तो सरेंडर करना होगा या फिर उनकी गिरफ्तारी होगी। सजा सुनाए जाने के बाद सिद्धू ने ट्वीट कर कानून का फैसला स्वीकार करने की बात कही है।

1988 के इस रोडरेज केस में एक बुजुर्ग की मौत हो गई थी। चार साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में 1000 रुपए का जुर्माना लगाकर क्रिकेटर से नेता बने सिद्धू को छोड़ दिया था। रिपोर्ट के मुताबिक, इस केस में गुरुनाम सिंह नाम के जिस बुजुर्ग की की मौत हुई थी, उनके परिवार ने सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन दायर की थी। शीर्ष अदालत का ताजा फैसला इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए आया है।

क्या है पूरा मामला

यह घटना 27 दिसंबर वर्ष 1988 की है। पटियाला में नवजोत सिंह सिद्धू और उनके दोस्त कंवर सिंह संधू ने एक व्यक्ति को पीट दिया था। सिद्धू उस दौरान भारतीय क्रिकेट टीम के स्टार प्लेयर हुआ करते थे। बताया जाता है कि गुरुनाम सिंह और दो अन्य लोग बैंक से पैसा निकालने के लिए जा रहे थे। सड़क पर जिप्सी लगी थी, जिसे उन्होंने हटाने को कहा। इसको लेकर उनकी सिद्धू के साथ बहस हुई। पुलिस के मुताबिक, सिद्धू मारपीट के बाद मौके से फरार हो गए। बाद में गुरुनाम सिंह को जब हॉस्पिटल ले जाया गया तो उनकी मौत हो चुकी थी।

इस मामले में सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने सिद्धू को 2006 में 3 साल कैद की सजा सुनाई थी। उन्हें गैर इरादतन हत्या का दोषी ठहराया था। इस फैसले को उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट का फैसला बदलकर 1000 रुपए का जुर्माना लगाया। इसे गुरुनाम सिंह के परिवार की ओर से चुनौती दी गई थी।

‘हिन्दू कोई धर्म नहीं, ज्ञानवापी मस्जिद में शिवलिंग नहीं फव्वारा है’: मौलाना साजिद रशीदी ने सनातन संस्कृति का उड़ाया मजाक, कोर्ट के फैसले पर भी उठाया सवाल

ज्ञानवापी विवादित ढाँचे को लेकर चल रही सुनवाई के बीच अखिल भारतीय इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी ने बेतुका बयान देते हुए गुरुवार (19 मई 2022) को कहा कि हिन्दू धर्म कोई धर्म नहीं है। लोग फालतू में ही ज्ञानवापी मस्जिद के विवादित ढाँचे में मिले शिवलिंग से खुश हो रहे हैं। मौलाना ने हिन्दू संस्कृति और आस्था का मजाक उड़ाते हुए शिवलिंग को ‘फव्वारा’ करार दिया।

एक्टिविस्ट अंबर जैदी को दिए एक इंटरव्यू के दौरान मौलाना साजिद रशीदी ने कोर्ट पर भी सवाल उठाते हुए उस पर पक्षपातपूर्ण तरीके से हिन्दुओं के पक्ष में फैसला सुनाने का आऱोप लगाया। उनका कहना था, “भारत में किसी भी अदालत को साल 1947 से मौजूद धार्मिक स्थलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है और कोई भी अदालत वर्शिप एक्ट 1991 का उल्लंघन करने वाली किसी भी याचिकाओं की सुनवाई की इजाजत नहीं दे सकता। इस मामले में सेशन कोर्ट ने याचिका को इजाजत देकर और वीडियोग्राफी सर्वेक्षण की अनुमति के बाद अब वजूखाना में मुस्लिमों के प्रवेश पर रोक लगाकर मस्जिदों की धार्मिक प्रथाओं का उल्लंघन किया है। वुज़ू नमाज़ का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है और इस्लामिक धार्मिक प्रथा को बर्बाद करने के लिए कोर्ट जिम्मेदार है।”

इसके साथ ही मौलाना ने राम मंदिर पर फैसले को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस रंजन गोगोई की आलोचना की। रशीदी का आरोप है कि कोर्ट ने तथ्यों को दरकिनार कर अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए हिंदुओं के पक्ष में फैसला सुनाया। गोगोई को राज्यसभा सीट चाहिए थी। कोर्ट का निर्णय एएसआई सर्वेक्षण या अन्य प्रासंगिक तथ्यों पर आधारित नहीं था।

इसके साथ ही मौलाना ने ये भी दावा किया कि ज्ञानवापी मस्जिद मुगल आक्रान्ता अकबर के शासन के बाद से अस्तित्व में है और औरंगजेब ने मंदिर को तोड़कर इसे नहीं बनाया था। उन्होंने कहा, “कोई मंदिर नहीं तोड़ा गया। वहाँ कोई शिवलिंग नहीं है। हाल ही में खोजा गया स्ट्रक्चर एक फव्वारे का हिस्सा है न कि शिवलिंग।” बेतुका दावा करते हुए मौलाना ने आगे कहा, “इस्लामी शासक मंदिरों का ध्वंस करने के बाद शिवलिंग को 100 से भी अधिक सालों तक बचाए रखने का काम क्यों करेंगे? अगर उनकी योजना मंदिरों को तोड़ने की थी, तो वे शिवलिंग क्यों रखते।”

वहीं जब अंबर जैदी ने पूछा कि मुस्लिम समुदाय के लोग शिवलिंग का सोशल मीडिया पर क्यों मज़ाक उड़ा रहे हैं और हिन्दुओं की धार्मिक भावनाओं को आहत कर रहे हैं’, तो इसके जबाव में मौलाना रशीदी ने कहा कि हिन्दुओं ने खुद ही अपना मजाक उड़ाया है। रशीदी के मुताबिक, फव्वारे को शिवलिंग कहना अपने आप में एक बड़ा मजाक है। लोग इसका मजाक क्यों नहीं उड़ाएँगे? उन्होंने ये भी कहा कि हिन्दू कोई धर्म है ही नहीं।

साजिद रशीदी की हिन्दुओं को चेतावनी

हिन्दू विरोधी बयानों के लिए कुख्यात मौलाना साजिद रशीदी ने इसी साल 8 जनवरी 2022 को हिन्दुओं को धमकी देते हुए कहा था कि भविष्य में कोई मोहम्मद बिन कासिम अयोध्या के राम मंदिर को ध्वस्त कर सकता है। इसके साथ ही रशीदी ने दावा किया था कि भारत पर राज कर चुके मुस्लिम शासक लिबरल औऱ धर्मनिरपेक्ष थे, जिन्होंने मस्जिदों के साथ ही मंदिरों का भी निर्माण करवाया था। इस्लामिक शासकों ने हिन्दू धार्मिक स्थलों की सुरक्षा के लिए दान भी दिया था।

गौरतलब है कि इससे पहले अगस्त 2020 में राम मंदिर के भूमि पूजन के दौरान भी रशीदी ने विवादित टिप्पणी की थी। तब मौलाना ने धमकी दी थी कि राम मंदिर को ध्वस्त कर फिर से मस्जिद बनाई जाएगी। इसके साथ ही पीएम मोदी के अयोध्या के कार्यक्रम में शामिल होने को भी संविधान का उल्लंघन बताया था।

ज्ञानवापी के विवादित ढाँचे में मिला शिवलिंग

गौरतलब है कि हाल ही वारणसी कोर्ट के आदेश के बाद विवादित ज्ञानवापी ढाँचे के वीडियो सर्वे के दौरान वहाँ वुजुखाना के अंदर एक शिवलिंग मिला था। वुजुखाना मस्जिद के अंदर की वो जगह है, जहाँ पर नमाज से पहले मुस्लिम अपने हाथ-पैर धोते हैं। मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने भी विवादित ढाँचे से उस जगह को बचाने के आदेश जारी किए, जहाँ शिवलिंग मिला था।

ऑपइंडिया की एडिटर इन चीफ नुपूर शर्मा को डिजिटल पत्रकारिता का ‘देवऋषि नारद सम्मान’, इस साल 12 पत्रकारों को मिला है यह अवॉर्ड

पत्रकारिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने वाले मीडियाकर्मियों को आरएसएस की संचार शाखा इंद्रप्रस्थ विश्व संवाद की ओर से 18 मई को देवऋषि नारद सम्मान 2022 से सम्मानित किया गया। इस दौरान 12 पत्रकारों को विभिन्न श्रेणियों में अवार्ड मिले। इनमें एक नाम ऑपइंडिया की एडिटर-इन-चीफ नुपूर शर्मा का भी है। उन्हें डिजिटल पत्रकार नारद सम्मान से सम्मानित किया गया।

नारद पुरस्कार पाने वाले पत्रकारों के नाम

नुपूर शर्मा के साथ जिन पत्रकारों को विभिन्न कैटगरी में अवार्ड मिला उनमें हिंदुस्तान समाचार के आशुतोष कुमार पांडे (युवा पत्रकार नारद सम्मान पाने वाले ); ऑर्गनाइजर के निशांत कुमार आजाद (स्त्री सरोकार/महिला संवेदना पत्रकार नारद सम्मान); इंडियन साइंस वायर के उमाशंकर मिश्रा (ग्रामीण पत्रकारिता नारद सम्मान); दूर्दशन न्यूज के सुरेश कुमार जायसवाल (न्यूज रूम सहयोग नारद सम्मान); न्यूज जंक्शन की प्रियंका देव (सोशल मीडिया पत्रकार नारद सम्मान); पंजाब केसरी के मिहिर सिंह (फोटो पत्रकार नारद सम्मान); न्यूजनेशन के विद्यानाथ झा (टीवी का वीडियो पत्रकार नारद सम्मान); पीएम नारायणन (विदेशी पत्रकारिता नारद सम्मान); वरिष्ठ पत्रकार दीपक उपाध्याय (उत्कृष्ट पत्रकार नारद सम्मान); और पूर्व पत्रकार, स्तंभरकार बलबीर पुंज (आजीवन सेवा नारद सम्मान) का नाम शामिल है।

सम्मानित पत्रकार

पत्रकारिता निष्पक्ष हो, सकारात्मक दिशा में आगे जाए

इस कार्यक्रम में आरएसएस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर मुख्य वक्ता के तौर पर और राज्यमंत्री डॉ संजीव कुमार बालियान व नेटवर्क 18 के प्रबंध संपादक एंकर आनंद नरसिम्हन विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए। सुनील आंबेकर ने कार्यक्रम संबोधित करते हुए जिम्मेदार पत्रकारिता पर बात की और कहा कि पत्रकारिता में सत्य को लेकर आगे जाना और सत्य के साथ कभी कोई समझौता नहीं करना, या किस सत्य को लोगों तक पहुँचाना चाहते हैं, यह बहुत महत्वपूर्ण है। वहीं राज्यमंत्री संजीव बालियान ने कहा कि पत्रकारिता इतनी महत्वपूर्ण है कि वो हर जनमानस को प्रभावित करती है। इसलिए ये सकारात्मक दिशा में होनी चाहिए। सभी विचारों का सम्मान करके इसे हमेशा निष्पक्ष होना चाहिए।

कॉन्ग्रेस सबसे बड़ी जातिवादी, सच बोलो तो बदनाम करती है: इस्तीफे के बाद बरसे हार्दिक पटेल, मोबाइल-चिकन सैंडविच पर फोकस की भी खोल चुके हैं पोल

कॉन्ग्रेस से इस्तीफा देने के बाद गुजरात के नेता हार्दिक पटेल (Hardik Patel) ने देश की सबसे पुरानी पार्टी पर जमकर हमला बोला है। उन्होंने गुरुवार (19 मई 2022) को कहा, “गुजरात में सिर्फ हार्दिक ही नहीं, बल्कि कई नेता कॉन्ग्रेस से नाराज हैं। कॉन्ग्रेस में सच बोलो तो बड़े नेता आपको बदनाम करते हैं। यही उनकी रणनीति है।” इसके साथ ही पटेल ने आरोप लगाया कि कॉन्ग्रेस सबसे बड़ी जातिवादी पार्टी है।

पाटीदार नेता ने अहमदाबाद में पत्रकारों से बातचीत में कहा कि गुजरात में चाहे पाटीदार समुदाय हो या कोई अन्य समुदाय, उन्हें कॉन्ग्रेस में भुगतना पड़ा है। उन्होंने कहा, “7-8 लोग 33 साल से कॉन्ग्रेस चला रहे हैं। मेरे जैसे कार्यकर्ता रोजाना 500-600 किमी का सफर तय करते हैं। मैं लोगों के बीच जाकर उनका हाल जानने की कोशिश करता हूँ, तो यहाँ के बड़े नेता एसी चेंबर में बैठकर मेरे इस प्रयास को बाधित करने की कोशिश करते हैं।”

पटेल यही नहीं रुके उन्होंने कॉन्ग्रेस पर एक के बाद एक गम्भीर आरोप लगाते हुए कहा, “गुजरात में कई नेता और विधायक हैं, जो कॉन्ग्रेस का इस्तेमाल करते हैं। सत्ता में बैठने और पार्टी की प्रशंसा करने का मतलब यह नहीं है कि पार्टी उन्हें मुख्यमंत्री बना सकती है।” इसके साथ ही उन्होंने भाजपा में जाने की अटकलों को लेकर कहा कि अभी इस बारे में कोई फैसला नहीं किया है।

गौरतलब है कि गुजरात विधानसभा चुनाव से पहले 18 मई को हार्दिक पटेल ने कॉन्ग्रेस से इस्तीफा देकर पार्टी की राज्य इकाई को बड़ा झटका दिया था। पटेल ने ट्विटर पर हिंदी, अंग्रेजी और गुजराती में पत्र साझा करते हुए लिखा था, “आज मैं हिम्मत करके कॉन्ग्रेस पार्टी के पद और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा देता हूँ। मुझे विश्वास है कि मेरे इस निर्णय का स्वागत मेरा हर साथी और गुजरात की जनता करेगी। मैं मानता हूँ कि मेरे इस कदम के बाद मैं भविष्य में गुजरात के लिए सच में सकारात्मक रूप से कार्य कर पाऊँगा।”

अपने बयान में हार्दिक पटेल ने यह भी कहा था कि कॉन्ग्रेस पार्टी देशहित व समाज हित के बिलकुल विपरीत कार्य कर रही है। उन्होंने कॉन्ग्रेस में एक सक्षम और मजबूत नेतृत्व न होने को लेकर अपनी शिकायत की थी। साथ ही कहा था कि कॉन्ग्रेस पार्टी सिर्फ विरोध की राजनीति कर रही है जबकि देश के लोग विकल्प चाहते हैं जो उनके भविष्य के लिए सोचता हो। उन्होंने इस्तीफे में कहा था कि पार्टी का शीर्ष नेतृत्व गंभीर नहीं है। उनका ध्यान गुजरात की परेशानियों से ज्यादा मोबाइल व बाकी की चीजों पर है। पार्टी के बड़े नेताओं की चिंता होती है कि पार्टी नेतृत्व ने चिकन सैंडविच खाया या नहीं।

टेरर फंडिंग में आतंकी यासीन मलिक दोषी करार, 25 मई को सजा सुनाएगी NIA की स्पेशल कोर्ट

जम्मू कश्मीर में कश्मीरी हिन्दुओं के नरसंहार के आरोपितों में एक आतंकी यासीन मलिक को टेरर फंडिंग के मामले में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) की अदालत ने दोषी करार दिया है। अब उसे कितनी सजा दी जाए, इसको लेकर 25 मई से कोर्ट सुनवाई करेगा। कोर्ट ने जाँच एजेंसी को मलिक के फाइनैंशियल लेन-देन को लेकर भी एक रिपोर्ट को सौंपने का आदेश दिया है।

गुरुवार (19 मई 2022) को मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली की अदालत ने यासीन मलिक को गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत और इंडियन पीनल कोड के तहत साजिश और देशद्रोह का दोषी पाया। कोर्ट ने मलिक को सुनवाई की अगली तारीख तक अपनी वित्तीय संपत्ति के संबंध में एक एफिडेविड कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करने का भी निर्देश दिया है।

बता दें कि टेरर फंडिंग के मामले में अदालत ने मार्च में आरोप तय किए थे। उस दौरान ये पाया गया था कि मलिक, शब्बीर शाह, राशिद इंजीनियर, अल्ताफ फंटूश, मसरत और हुर्रियत/संयुक्त प्रतिरोध नेतृत्व (JRL) सीधे आतंकी फंड लेते थे। इसके अलावा मलिक ने जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी और अन्य गैरकानूनी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए फंड जुटाने के लिए दुनियाभर में एक मैकेनिज्म तैयार कर दिया था।

कबूल चुका है आतंकवाद के आरोप

गौरतलब है कि इसी महीने 2022 में यासीन मलिक ने कोर्ट में आतंकवाद के आरोपों को कबूल किया था। उसने पटियाला हाउस कोर्ट की एनआईए अदालत में अपनी गलती मानते हुए कोर्ट से कानून के मुताबिक सजा देने की माँग की थी।

कौन है यासीन मलिक

यासीन मलिक वो आतंकी है, जो कि घाटी में हिंदुओं के नरसंहार में सीधे तौर पर शामिल था। वो जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट का अध्यक्ष होने के साथ ही पाकिस्तान का कट्टर समर्थक भी है। उस पर जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद के अपहरण का भी आरोप है। इतना ही नहीं 1990 में वायुसेना के 4 अधिकारियों की बेरहमी से हत्या का आरोप भी यासीन मलिक पर ही है।

महाराष्ट्र में जुवेनाइल बोर्ड ने ISIS आतंकी को छोड़ा, स्कूल के बच्चों को पढ़ाने और वृद्धाश्रम में सेवा का दिया आदेश

महाराष्ट्र के औरंगाबाद से हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है। राज्य के किशोर न्याय बोर्ड (Juvenile Justice Board) ने आतंकी संगठन आईएसआईएस (ISIS) से जुड़े एक आतंकी को रिहा करने का फैसला किया है। यही नहीं अपने विवादास्पद आदेश में बोर्ड ने उसे दोषी ठहराए जाने के बावजूद अपने इलाके में स्कूल के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने की अनुमति भी दी है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, तीन सदस्यीय किशोर न्याय बोर्ड (जेजेबी) की अध्यक्षता कर रहे एक प्रधान मजिस्ट्रेट ने कानून का उल्लंघन करने वाले और आतंकवादी मामले में दोषी ठहराए गए एक नाबालिग (CCL) की रिहाई का आदेश देकर उसे सेट-ऑफ बेनिफिट दिया है। वह तीन साल (23 जनवरी, 2019 से अब तक) की सजा एक ऑब्जर्वेशन होम (Observation Home) में बिता चुका है।

11 मई को अपने फैसले में जेजेबी ने आतंकी गतिविधियों में संलिप्त अपराधी को ‘Child in Conflict with the Law (CCL)’ के तहत रिहा करने का फैसला किया। सीसीएल यानी उसे एक वर्ष की अवधि के लिए अच्छे व्यवहार के तौर पर रिहा किया गया है। ठाणे में एक परिवीक्षा अधिकारी (Probation Officer) की देखरेख में उसे रखा गया है।

इसके साथ ही अदालत ने यह भी आदेश दिया है कि दोषी अगले छह महीनों तक महीने में दो बार वृद्धाश्रम में जाकर बुजुर्गों की सेवा करेगा और सामाजिक कार्यों में अपना योगदान देगा। इसके रूप में उसे अपने इलाके में कक्षा 7 और 9 के बच्चों को गणित और अंग्रेजी में ट्यूशन देने का भी आदेश दिया गया है।

जेजेबी ने ISIS आतंकवादी को दोषी ठहराया, लेकिन रिहा कर दिया

जेजेबी ने आरोपित ISIS आतंकी को आईपीसी की धारा 120-बी (आपराधिक साजिश) और 201 (सबूत नष्ट करना) के अलावा, धारा 18 (साजिश), 20 (एक आतंकवादी गिरोह या संगठन का सदस्य होने के नाते), 38 और 39 (आतंकवादी संगठन की सदस्यता और समर्थन से संबंधित अपराध) के तहत आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने का दोषी ठहराया है।

किशोर न्याय बोर्ड ने पहले यह आदेश दिया कि आतंकी संगठन ISIS से जुड़े एक किशोर को दोषी पाया गया है, उसे तीन साल के लिए विशेष गृह भेजा जाए। लेकिन उसके कुछ देर बाद ही जेजेबी ने उस अवधि पर विचार किया, जब वह तीन साल की सजा के तौर पर एक ऑब्जर्वेशन होम में था। इसे ध्यान मे रखते हुए जेजेबी ने उसकी रिहाई का आदेश दिया था।

महाराष्ट्र एटीएस ने 2018 में किया था गिरफ्तार

महाराष्ट्र आतंकवाद विरोधी दस्ते (एटीएस) ने दोषी को उसके अन्य सदस्यों के साथ 27 दिसंबर, 2018 को गिरफ्तार किया था। उस वक्त वह 17 साल का था। उसे प्रतिबंधित इस्लामिक आतंकी संगठन आईएसआईएस के एक संगठित मॉड्यूल का हिस्सा होने के लिए गिरफ्तार किया गया था। उस वक्त बताया गया था कि महाराष्ट्र एटीएस ने औरंगाबाद और मुंबई में आतंकी वारदातों को अंजाम देने के लिए ‘उम्मत-ए-मुहम्मदिया’ नाम का संगठन बनाने वाले आतंकियों को गिरफ्तार किया है।

अगस्त 2018 में, राज्य एटीएस की औरंगाबाद इकाई ने आईएसआईएस से प्रभावित और आतंकी हमले की योजना बनाने के संदेह में नाबालिग संदिग्ध सहित नौ लोगों को हिरासत में लिया था। एटीएस ने आरोप लगाया था कि नौ आरोपित आतंकवादी संगठन आईएसआईएस की विचारधारा से प्रेरित थे। उन्होंने मुंबई, औरंगाबाद और अन्य जगहों पर कुछ जहरीले पदार्थ और विस्फोटकों का इस्तेमाल कर आतंकी हमले को अंजाम देने की साजिश रची थी।

एटीएस ने किशोर न्याय बोर्ड में दलील दी थी कि नाबालिग आरोपित के साथ वयस्क जैसा व्यवहार किया जाए। हालाँकि, जेजेबी ने अक्टूबर 2019 में एटीएस की याचिका को खारिज कर दिया था। इसके बाद एटीएस सेशन कोर्ट में गई थी, जिसने मई 2021 में जेजेबी के आदेश को भी बरकरार रखा। वहीं, बॉम्बे उच्च न्यायालय ने भी क्रिमिनल रिवीजन अपील को खारिज कर दिया था।

बता दें कि गिरफ्तार किए गए लोगों की पहचान सलमान खान, फहद शाह, जमान कुटेपदी, मोहसीन खान, मोहम्मद मजहर शेख, तकी खान, सरफराज अहमद, जाहिद शेख और एक 17 वर्षीय नाबालिग के रूप में हुई थी। गिरफ्तार किए गए लोगों में से एक दाऊद इब्राहिम के करीबी रशीद मालाबारी का बेटा बताया गया था। वहीं ये सभी आरोपित शिक्षित बताए गए थे। उनमें से दो इंजीनियर और एक 11 वीं कक्षा का छात्र भी था।