सोमवार (14 मार्च, 2022) को, वाशिंगटन पोस्ट की स्तंभकार राणा अय्यूब ने झूठा दावा किया कि भारत के आतंकवादियों और दुश्मनों के लिए लगाया गया नारा आम भारतीय मुसलमानों को टार्गेट करने के लिए था।
शुक्रवार (11 मार्च) को फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ की रिलीज के बाद, रोहित बिश्नोई नाम के एक ट्विटर यूजर ने एक मूवी थियेटर से एक दृश्य साझा किए थे जिसमें दर्शकों को भारत के आतंकवादियों और दुश्मनों के खिलाफ नारे लगाते हुए सुना गया था।
वीडियो में, दर्शकों में से एक व्यक्ति चिल्ला रहा था, “देश के गद्दारों को, गोली मारो सालो को।” वहीं वीडियो में सुनाई देने वाले अन्य नारे ‘भारत माता की जय’ के थे।
जल्द ही वहाँ कई दूसरे दर्शक भी इस नारेबाजी में शामिल हो गए। बता दें कि विवेक अग्निहोत्री की फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ में कश्मीरी पंडितों के नरसंहार को दर्शाया गया है। और उन पीड़ितों को 3 दशक बाद आज भी न्याय मिलना बाकी है।
वीडियो देख कर यह साफ पता चलता है कि फिल्म में कश्मीरी पंडितों के नरसंहार को देखकर लोगों का गुस्सा आतंकवादियों के प्रति था, जिन्होंने हिंदू पंडितों के खिलाफ इस तरह के अकथनीय अत्याचार किए, जो अलगाववादियों, भारत के दुश्मनों के साथ मिले हुए थे, जो कश्मीर को भारत से अलग करना चाहते हैं। हालाँकि, ‘पत्रकार’ राणा अय्यूब ने सिर्फ यह मान लिया कि नारा भारतीय मुसलमानों के खिलाफ था, भले ही उस नारे में मुस्लिम शब्द या किसी धार्मिक पहचान का कोई उल्लेख नहीं है। ‘गद्दार’ का मतलब सिर्फ देश के दुश्मनों से है।
हालाँकि, यह स्पष्ट नहीं है कि राणा अय्यूब ने यह दावा क्यों किया कि भारतीय मुसलमानों को ‘गद्दार’ कहा जा रहा है। यह भी समझ में नहीं आता है कि पत्रकार भारतीय मुस्लिमों की तुलना ‘देशद्रोही’ से क्यों करती हैं या उन्होंने यह निष्कर्ष क्यों निकाला है कि भारत माता की जय-जयकार करने वाला नारा ‘भारतीय मुस्लिमों के खिलाफ’ है।
राणा अय्यूब ने दरअसल, ऐसे नारा लगाने वालों को निशाना बनाकर आतंकियों के कुकृत्यों पर पर्दा डालने की कोशिश की। वाशिंगटन पोस्ट के स्तंभकार ने आतंकवाद विरोधी नारेबाजी को हिंदुओं द्वारा ‘मुस्लिम विरोधी नफरत’ का प्रतीक करार दिया।
यहाँ तक कि राणा अय्यूब को समस्या फिल्म द कश्मीर फाइल्स के टैक्स फ्री करने को लेकर भी है। उन्होंने ट्वीट में कहा कि फिल्म को टैक्स फ्री इसलिए किया जा रहा है क्योंकि निर्देशक प्रधानमंत्री के साथ फोटो सेशन करा रहे हैं और कुछ बीमार लिबरल फासीवाद को हराने के लिए मुस्लिमों को उपदेश देंगे।
दरअसल, राणा अय्यूब ने फिल्म देखकर आक्रोशित कुछ दर्शकों के नारों का इस्तेमाल आतंकवादियों के प्रति सहानुभूति रखने और हिंदू पंडितों के खिलाफ अत्याचार को बड़ी चालाकी से मुस्लिमों को खतरा है कि तरफ मोड़ने की कोशिश की।
हालाँकि, यह उनके लिए कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि ‘पत्रकार’ को कट्टरपंथी मुस्लिमों के प्रति सहानुभूति रखने के लिए जाना जाता है। इस तरह से कहा जाए तो राणा अय्यूब ने कश्मीर घाटी में हिन्दू नरसंहार में सबसे आगे रहने वाले आतंकवादियों के पक्ष में नैरेटिव सेट करने की कोशिश की।
सुप्रीम कोर्ट ने अधिवक्ता साई दीपक जे ने कश्मीरी पंडितों के नरसंहार पर बनी फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ पर चल रही चर्चा के बीच कर्नाटक में हिन्दुओं को निशाना बनाए जाने का मुद्दा उठाया है। उन्होंने आरोप लगाया कि कर्नाटक में निशाना बना कर हिन्दुओं की हत्याएँ की जा रही हैं। उन्होंने इस दौरान जनवरी 1990 में कश्मीरी पंडित सतीश टिक्कू का उदाहरण दिया। आतंकी बिट्टा कराटे ने बाद में कबूल किया था कि पंडित होने और RSS से जुड़े होने के कारण उसने सतीश की हत्या की।
साई दीपक जे ने इस दौरान हर्षा की हत्या का उदाहरण दिया, जिन्हें कर्नाटक में मार डाला गया था। उन्होंने कहा कि केरल और कर्नाटक में कुछ लोगों की हत्याएँ केवल हिन्दू होने के कारण ही हुई हैं। याद दिला दें कि र्षीय हर्षा की हत्या 20 फरवरी, 2022 को कर्नाटक के शिवमोगा जिले में चाकू मारकर कर दी गई थी। हत्या के वक्त वे दोस्तों के साथ खाना खाने बाहर निकले थे। हत्या से पहले उन्होंने कर्नाटक में चल रहे हिजाब विवाद को लेकर फेसबुक पर पोस्ट किया था। हाल ही में स्कूल-कॉलेजों में बुर्का के लिए भी कर्नाटक में इनसे की गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने अधिवक्ता ने लिखा, “इसका कोई तुक नहीं बनता कि BJP, BJYM और RSS से जुड़े लोगों की हत्याओं को अलग-अलग घटनाओं की तरह देखा जाए। ये एक सोची-समझी साजिश के तहत हो रहा है। इसीलिए, इस संगठित अपराध को अंजाम देने वालों और इसके पीछे जिन लोगों का हाथ है, उन्हें कड़ी सज़ा मिले। हर्षा और इस तरह की अन्य हत्याओं में IPC के साथ-साथ ‘Karnataka Organised Crime Control Act, 2000 (KCOCA)’ के तहत भी कार्रवाई हो।”
2. It makes no sense whatsoever to treat d killings of individuals associated with d RSS, BJP or BJYM as lone incidents.These killings are part of a larger organised attempt to silence Hindutvawadis.Therefore,d culprits & their benefactors must be prosecuted for organised crimes.
उन्होंने कहा कि हम देश के किसी भी इससे में कश्मीरी हिन्दू नरसंहार की पुनरावृत्ति नहीं होने दे सकते। लेकिन, साथ ही उन्होंने कहा कि कर्नाटक, केरल और पश्चिम बंगाल में खतरा वही है, मानसिकता भी वही वाली है और हथकंडे भी नए नहीं हैं। उन्होंने पूछा कि क्या देर होने से पहले इन राज्यों को ऐसे अपराधों की पहचान कर के कार्रवाई नहीं करनी चाहिए? उन्होंने सवाल किया कि एक के बाद एक हत्याएँ होती रहें और हम उनमें तार जोड़ते फिरें, ऐसा कब तक चलेगा?
जे साई दीपक का ये भी सवाल है कि जब हम वर्तमान और इतिहास को ठीक नहीं करेंगे तो भला इतिहास को जानने-समझने का फायदा ही क्या? उन्होंने कहा कि इतिहास को समझना एक अकादमिक प्रक्रिया नहीं है, ये वास्तविक होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि पीड़ित परिवारों को मुआवजा देना एकदम ज़रूरी है, लेकिन ऐसे अपराधों पर लगाम लगनी चाहिए। अधिवक्ता ने उम्मीद जताई कि ‘द कश्मीर फाइल्स’ से जो जागरूकता आई है, उससे समाज और सरकारों के रुख में बदलाव आएगा।
6. Providing compensation for affected families is a must, but preventing and creating deterrence is equally important. I genuinely hope that the churn initiated by #TheKashmirFiles translates to change in the attitudes of the society as well as *the State*.
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता ने कहा, “इन मामलों में KCOCA लगाए जाने के अलावा हर्षा जैसे हिन्दू कार्यकर्ताओं की हत्याओं के मामले में UAPA के तहत भी कार्रवाई होनी चाहिए। ये एक सामान्य और किए जाने लायक सलाह हैं। अपने हितों को लेकर आवाज़ उठाने के कारण हिन्दू समाज कीमत नैन चुका सकता। मैं तमिलनाडु में महालिंगम की हत्या का जिक्र भी करना चाहूँगा। कोयम्बटूर-सालेम क्षेत्र जिहाद का गढ़ बना हुआ है। इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि 1998 में यहाँ बम ब्लास्ट हुआ था।”
आपको ‘मार्तंड सूर्य मंदिर’ के बारे में पता है? अब जब कश्मीरी पंडितों के नरसंहार पर बनी फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ सुपरहिट हो रही है और इसी बहाने कश्मीर के सनातन इतिहास की बातें भी छिड़ रही हैं, तो इसमें मार्तंड सूर्य मंदिर की चर्चा ज़रूरी हो जाती है। पता है आपने इसको कहाँ देखा होगा? विशाल भारद्वाज की फिल्म ‘हैदर (2014)’ में। नहीं, पूजा-पाठ या कोई अच्छी चीज नहीं, भारतीय इतिहास के इस गौरव का इस्तेमाल ‘Devil Dance (शैतान का नृत्य)’ के लिए किया गया है।
विवेक अग्निहोत्री ने की ‘हैदर’ और मार्तंड सूर्य मंदिर में ‘डेविल डांस’ की चर्चा
नई दिल्ली में ‘The Kashmir Files’ के निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस ओर भी इशारा किया। उनसे जब पूछा गया कि पिछले 32 वर्षों में कश्मीर की सच्चाई दिखाने वाली कोई फिल्म क्यों नहीं बनी, जिसके जवाब में उन्होंने कहा कि ‘रोजा (1992)’ उनकी फेवरिट फिल्म है और उन्हें लगता है कि भारत में इतनी अच्छी फिल्म बनी ही नहीं। उन्होंने सवाल उठाया कि उसी पीरियड में सेट होने के बावजूद उसमें कहीं भी हिन्दू नरसंहार का कोई जिक्र तक नहीं है।
इसी तरह उन्होंने ‘फ़िज़ा (2000)’, ‘मिशन कश्मीर (2000)’ और ‘फना (2006)’ की भी बात की। हालाँकि, विधु विनोद चोपड़ा की ‘शिकारा (2020)’ की याद दिलाए जाने पर उन्होंने कहा कि वो ‘फिल्मों’ की बात कर रहे हैं। इसी क्रम में उन्होंने ‘हैदर’ नाम लेते हुए कहा कि ये अच्छी फिल्म है और लोग इसे पसंद भी करते हैं। लेकिन, नुकसान क्या है, इसके जवाब में उन्होंने बताया कि मार्तंड सूर्य मंदिर पर पूरा कश्मीर और हिंदुस्तान गर्व करता था – उसे आतंकवादी दौर में तोड़े जाने से पहले केरल तक से हिन्दू दर्शन करने जाते थे।
उन्होंने बताया, “हर वहाँ पर आदमी प्रार्थना या पूजा करने नहीं जाता था। नालंदा विश्वविद्यालय में सब कोई पढ़ने नहीं जाते थे। वो उस अभूतपूर्ण संरचना को देखने जाते थे। मार्तंड सूर्य मंदिर की जितनी शोभा और सम्मान पूरे विश्व में थी। मैं आपको एक पीड़ा भरी बात बताता हूँ। जिस मंदिर की कलाकृतियों और आध्यात्मिकता के लिए इतना सम्मान था, उसे आज कश्मीर में ‘शैतान की गुफा’ के नाम से जाना जाता है। मैं जब कश्मीरी लड़कों को फोन किया कि मुझे वहाँ शूटिंग करनी है, तो वो पूछने लगे कि ये आखिर है कहाँ?”
विवेक अग्निहोत्री ने बताया कि जब उन्होंने उस मंदिर की लोकेशन ‘गूगल मैप’ के माध्यम से स्थानीय लोगों को भेजी और उन्हें इस मंदिर की तस्वीरें भेजी, तब उन्होंने कहा कि अच्छा आप ‘शैतान की गुफा’ के बारे में बात कर रहे हैं। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे ‘ज़िन्दगी न मिलेगी दोबारा (2011)’ के कारण स्पेन का पर्यटन बढ़ गया था। फिल्मों की ताकत समझाते हुए उन्होंने कहा कि कश्मीर पर बनी एक भी फिल्म में कश्मीरी पंडितों के नरसंहार का जिक्र नहीं किया गया।
हालाँकि, अनुपम खेर ने इस दौरान कहा कि वो पीठ पीछे फिल्म इंडस्ट्री के बारे में कोई बात नहीं कर सकते, क्योंकि जैसे आप सब (पत्रकारों की तरफ इशारा करते हुए) एक समूह में हैं और किसी की बुराई नहीं करते, वैसे ही हमलोग भी हैं। लेकिन, उन्होंने माना कि अब बदलाव आया है और इस तरह की फ़िल्में बन रही हैं। उन्होंने इस दौरान ये भी पूछा कि 60 वर्षों में अनुच्छेद-370 क्यों नहीं हट पाया, अब उसे हटाया गया है।
कश्मीरी पंडितों ने 2014 में भी किया था ‘हैदर’ का विरोध, गाने पर जताई थी आपत्ति
बता दें कि शाहिद कपूर के मुख्य किरदार वाली फिल्म ‘हैदर’ के गाने ‘बिस्मिल’ को मार्तंड सूर्य मंदिर में ही फिल्माया गया है। इसमें शाहिद कपूर डरावनी वेशभूषा में डांस करते हैं। फिल्म में उनका किरदार मुस्लिम होता है। साथ ही बैकग्राउंड में मंदिर में ही काले कपड़ों में ‘शैतान’ जैसी आकृति खड़ी दिखाई गई है। इस गाने में के के मेनन, तब्बू और श्रद्धा कपूर भी बैठे दिखाई देते हैं। इसे लेकर तब विरोध बी खूब हुआ था, लेकिन इसे दबा दिया गया था।
एक प्राचीन मंदिर को इस तरह गलत रूप में दिखाने के लिए कश्मीरी पंडितों ने ‘हैदर’ फिल्म को प्रतिबंधित करने की माँग की थी। वैसे किसी भी बॉलीवुड निर्देशक की हिम्मत नहीं है कि वो किसी मस्जिद में इस तरह का डांस दिखाए, वो भी किसी हिन्दू किरदार द्वारा। मार्तंड सूर्य मंदिर को ‘शैतान की गुफा’ के रूप में फिल्म में दिखाया गया था। ‘ऑल पार्टीज मीग्रेंट्स कोऑर्डिनेशन कमिटी (APMCC)’ के अध्यक्ष विनोद पंडित ने कहा था कि इससे न सिर्फ कश्मीरी पंडितों, बल्कि पूरे हिन्दू समाज की भावनाएँ आहत हुई हैं।
तब हुए विरोध प्रदर्शनों में CBFC (केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड) और ASI (भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण) के अलावा निर्देशक विशाल भारद्वाज के पोस्टर्स भी जलाए गए थे। इस मंदिर को 1700 वर्ष पुराना बताते हुए कश्मीरी पंडितों ने कहा था कि 2 अक्टूबर, 2009 को यहाँ वर्षों बाद हवन हुआ था और इसे अब ‘शैतान की गुफा’ बताना इसका अपमान है। भारत के गिने-चुने सूर्य मंदिरों में से ये एक है। ओडिशा के कोणार्क और गुजरात के मोढेरा दो अन्य बड़े सूर्य मंदिर हैं।
मार्तंड सूर्य मंदिर: सिकंदर शाह मीरी ने इसे कर दिया था ध्वस्त
बताया जाता है कि मार्तंड सूर्य मंदिर की स्थापना कश्मीर के महान राजा ललितादित्य मुक्तिपीड ने की थी। इस मंदिर की संरचना आठवीं शताब्दी की थी, लेकिन इससे कई सौ वर्षों पूर्व से ये यहाँ पर है। इस मंदिर में कुंड भी हैं। अभी इसकी हालत जर्जर है, लेकिन कभी ये पूरे कश्मीर की शान था। इसके आसपास दर्जनों छोटे-छोटे मंदिरों के अवशेष हैं। वर्षों इसमें तोड़फोड़ हुई, लेकिन अभी भी बहुत कुछ बचा है। सुल्तान सिकंदर शाह मीरी ने इसे ध्वस्त किया था और इसमें उसे महीनों लगे थे।
ये मंदिर अनंतनाग से 9 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। ASI ने मंदिर के जीर्णोद्धार के नाम पर कुछ पेड़-पौधे रूप कर इतिश्री कर ली। इस मंदिर की महत्ता मराठी साहित्य ‘मार्तंड महात्मय’ में भी मिलती है। सिकंदर शाह मीरी ने सैफुद्दीन के साथ मिल कर कश्मीर से हिन्दुओं और उनके सभी प्रतीकों को मिटाने की साजिश रची। वहाँ के प्राचीन मुस्लिम इतिहासकारों ने ही लिखा है कि हिन्दू राजाओं द्वारा बनवाए गए कई मंदिर कश्मीर में दुनिया के आश्चर्य हुआ करते थे।
सिकंदर शाह मीरी ने उनमें से कई मंदिरों को ध्वस्त कर के उन्हीं ईंट-पत्थरों का इस्तेमाल कर मस्जिदें बनवाई। कहा जाता है कि पूरे एक साल तक उसने मार्तंड सूर्य मंदिर को ध्वस्त करने की कोशिश की, लेकिन असफल रहा। इसके बाद उसने इसकी जड़ों को खोदना शुरू किया और उनमें से पत्थर निकाल कर लकड़ियाँ भर देता था। इसके बाद उन लकड़ियों में वो आग लगवा देता था। इस तरह उसने मार्तंड सूर्य मंदिर को ध्वस्त कर डाला। फिर उसने कई अन्य मंदिरों के भी नामोंनिशान मिटा दिए।
कश्मीरी पंडितों के नरसंहार और पलायन पर बनी फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ की काफी चर्चा हो रही है। हर कोई इसे मार्मिक बता रहे हैं। लोगों को ये फिल्म रूला रही है। सोशल मीडिया पर फिल्म को लेकर काफी लोग लिख रहे हैं। इस बीच अभिनेता कमाल राशिद खान (KRK) ने फिल्म के बहाने राजनीति का जिक्र किया। राहुल गाँधी की राजनीति का।
केआरके का कहना है कि ‘द कश्मीर फाइल्स’ की सफलता ये बताती है कि राहुल गाँधी राजनीति में कभी भी सफल नहीं हो सकते हैं। केआरके ने कहा कि इसलिए बेहतर है कि राहुल गाँधी को राजनीति छोड़ देनी चाहिए। राजनीति के मौजूदा दौर को देखते हुए केआरके ने ये टिप्पणी की है।
Success of #TheKashmirFiles is proof that Rahul Gandhi can’t succeed, So better he should leave politics. Because development education employment etc. have nothing to do with today’s politics. Rahul Gandhi is not capable to do polarisation to defeat BJP.
केआरके ने ट्वीट में लिखा, “द कश्मीर फाइल्स की सफलता इस बात का प्रमाण है कि राहुल गाँधी सफल नहीं हो सकते, इसलिए बेहतर है कि उन्हें राजनीति छोड़ देनी चाहिए। क्योंकि विकास शिक्षा रोजगार आदि का आज की राजनीति से कोई लेना-देना नहीं है। राहुल गाँधी बीजेपी को हराने के लिए ध्रुवीकरण करने में सक्षम नहीं हैं।”
If #KashmirFiles is made before 2014 so it will be a disaster. But today it’s a blockbuster. Again proved that each good story is good at a right time. 95% actors don’t know about timing of a particular story. And this is why, 95% films become flop.
केआरके ने अपने एक अन्य ट्वीट में कहा कि अगर कश्मीर फाइल्स 2014 से पहले बनती है तो यह एक आपदा होती। लेकिन आज यह ब्लॉकबस्टर है। एक बार फिर साबित कर दिया कि हर अच्छी कहानी सही समय पर अच्छी होती है। 95 प्रतिशत अभिनेता किसी विशेष कहानी के समय के बारे में नहीं जानते हैं और इसी वजह से 95 प्रतिशत फिल्में फ्लॉप हो जाती हैं।
उन्होंने इस फिल्म को हिट या सुपहिट नहीं, बल्कि ब्लॉकबस्टर बताया और इसके लिए फिल्म निर्माता विवेक अग्निहोत्री को ‘शुभकामनाएँ’ भी दीं। इसके साथ उन्होंने ये भी दावा किया कि विवेक की अगली फिल्म ‘गोधरा कांड’ पर होगी।
इसके अलावा केआरके ने तीनों खान को भी नसीहत दी है कि अगर उन्हें बिजनेस में बने रहना है तो उन्हें भी ऐसी ही फिल्में बनानी होगी। अभिनेता ने लिखा, “अगर खान बिजनेस में बने रहना चाहते हैं तो उन्हें उरी, कश्मीर फाइल्स, गोडसे फाइल्स आदि जैसी फिल्में करनी होंगी। पठान, टाइगर आदि जैसी फिल्में अब काम नहीं करेंगी।”
गौरतलब है कि इससे पहले कमाल राशिद खान ने इस फिल्म पर ‘मुग़ल ए आज़म’ न होने का तंज कसा था। यद्यपि बाद में उस पर कपिल शर्मा ने सफाई भी दी थी। फिल्म को रोकने की याचिका को भी बॉम्बे हाईकोर्ट ख़ारिज कर चुका है।
द कश्मीर फाइल्स के रिलीज होने के बाद पाकिस्तान के हितैषी और कश्मीरी पंडितों के नरसंहार में भागीदार यासीन मलिक की चर्चा सोशल मीडिया पर जोरों-शोरों से हो रही है। लेकिन यासीन से जुड़ी ये हालिया चर्चा उन मीडिया संस्थानों जैसी नहीं है जहाँ पर यासीन जैसे अलगाववादी को ‘सर-सर’ कहकर उसकी बातें सुनीं जाएँ। उसके विचारों के लिए उसे पूरा मंच सौंप दिया जाए या कॉन्ग्रेस की मनमोहन सरकार की तरह उसकी पीएम आवास में आवभगत की जाए।
इंडिया टुडे का यूथ आइकन
सोशल मीडिया यूजर्स खुलकर इस अलगाववादी यासीन के कृत्यों को साझा कर रहे हैं और उन लोगों को भी लताड़ रहे हैं जिन्होंने इसके कुकर्मों को न केवल छिपाने का प्रयास किया बल्कि इसे मसीहा की तरह दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 2008 में इंडिया टुडे के कॉन्क्लेव में यासीन मलिक को यूथ आइकन बनाकर उतारा गया और उसके अलगाववादी संगठन को सेकुलर कहा गया। इस मंच का इस्तेमाल करके मलिक ने पूरे 12 मिनट ऑन टीवी अपने अलगाववादी विचारों का प्रचार प्रसार बुद्धिजीवी बनकर किया था।
बीबीसी पर स्वीकारी थी मलिक ने कश्मीरी पंडितों की हत्या की बात
इससे पहले बीबीसी जैसा विदेशी मीडिया भी यासीन को अपने चैनल के माध्यम से हीरो दिखाने का प्रयास कर चुका था और इसी शो में उसने स्वीकार किया था कि उसने कश्मीरी हिंदू रिटायर्ड जज नीलकंठ गंजू को मारा। उसका तर्क था कि आखिर गंजू ने जिसे फाँसी की सजा सुनाई उस मकबूल भट की गलती ही क्या थी। उसके मुताबिक आतंकी मकबूल को जो गंजू ने सजा दी वो राजनीति से प्रेरित फैसला था। हैरानी की बात ये है कि इसी इंटरव्यू में यासीन मलिक ने हँस-हँस कर चार निहत्थे इंडियन एयर फोर्स सैनिकों को कश्मीर में मारने की बात स्वीकारी थी। उसके हाथ अन्य कश्मीरी हिंदुओं के खून से भी रंगे कहे जाते हैं।
जब रवीश के मुँह से यासीन मलिक के लिए निकला ‘सर’
इंडिया टुडे और बीबीसी की इस रेस में ध्यान रहे एनडीटीवी भी पीछे नहीं था। एनडीटीवी चैनल के प्राइम टाइम एंकर रवीश कुमार ने साल 2013 में यासीन मलिक को तब बोलने का मंच दिया था जब वह भूख हड़ताल के नाम पर हाफिज सईद के साथ बैठा दिखा था। आपको जानकर शायद हैरानी न हो कि रवीश कुमार इस शो में कश्मीरी पंडितों की हत्या की बात कबूल चुके यासीन को यासीन साहब और सर-सर कहकर बुला रहे थे।
यासीन मलिक को मनमोहन सरकार में मिला प्यार
इनके अलावा यासीन मलिक को यूपीए सरकार में कॉन्ग्रेस पार्टी से भी खूब प्यार मिला था। साल 2006 में मनमोहन सिंह ने जेके एलएफ के अध्यक्ष यासीन मलिक को नई दिल्ली में पीएम आवास पर बुलाया और कई मुद्दों पर उससे चर्चा की। आज भी यासीन मलिक के साथ पूर्व पीएम मनमोहन सिंह की मुस्कुराती फोटो, वीडियो आपको वायरल होती मिल जाएगी।
दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों के आरोप में गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत जेल में बंद कॉन्ग्रेस की पूर्व पार्षद इशरत जहाँ को जमानत मिल गई है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अमिताभ रावत की कोर्ट ने फैसला सुनाया। उन्हें 26 फरवरी 2020 को गिरफ्तार किया गया था।
Delhi court grants bail to former municipal councillor Ishrat Jahan, an accused in NorthEast Delhi violence larger conspiracy case. She was arrested by Delhi Police Special Cell under Unlawful Activities (Prevention) Act.
बता दें कि इशरत जहाँ लगातार भड़काऊ भाषण देकर नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली के मुस्लिमों को भड़का रही थी। इशरत जहाँ ने भड़काऊ भाषण देते हुए कहा था, “हम मर भी जाएँ लेकिन यहाँ से नहीं हटेंगे। हम आज़ादी लेकर रहेंगे।” इशरत के समर्थक उमर खालिद ने भीड़ से पुलिस पर जम कर पत्थरबाजी करने को कहा था। वहीं साबू अंसारी उस भीड़ का नेतृत्व कर रहा था, जिसने पुलिस को खदेड़ते हुए पत्थरबाजी की थी।
इशरत पर दंगे के लिए फंडिंग लेने का भी आरोप लगा था। दिल्ली पुलिस की चार्जशीट में खुलासा हुआ था कि कॉन्ग्रेस की पूर्व पार्षद इशरत जहाँ, एक्टिविस्ट खालिद सैफी, आम आदमी पार्टी के पार्षद रहे ताहिर हुसैन, जामिया मिल्लिया इस्लामिया एलुमनाई एसोसिएशन के अध्यक्ष शिफा उर रहमान और जामिया के ही मीरान हैदर को हिन्दू-विरोधी दंगों के लिए 1.61 करोड़ रुपए की फंडिंग मिली थी। दिसंबर 10, 2019 को ही इशरत जहाँ के बैंक अकाउंट में एक कॉर्पोरेशन बैंक अकाउंट से 4 लाख रुपए पहुँच गए थे।
इस केस में इससे पहले नताशा नरवाल, देवांगना कलीता, आसिफ इकबाल तन्हा समेत पाँच लोगों को जमानत मिल चुकी है। इसी मामले में आरोपित शरजील इमाम और सलीम खान की जमानत अर्जी पर 22 मार्च को कोर्ट फैसला सुनाएगा।
फ़रवरी 2020 में भड़के थे दंगे
गौरतलब है कि फ़रवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए दंगों में 53 लोगों की मौत हो गई थी, करीब 700 लोग घायल हुए थे। इस दौरान करोड़ों रुपए की संपत्तियों का नुकसान भी हुआ। कई के खिलाफ आईपीसी की अलग-अलग धाराओं में मुकदमा दर्ज किया गया। जिनपर चार्जशीट दाखिल की गई है।
केंद्र सरकार ने सोमवार (14 मार्च) को एयरपोर्ट पर काम करने वाले सिख स्टाफ के लिए कृपाण (सिख पंथ के 5 अभिन्न अंगों में से एक छोटी तलवार) रखने से प्रतिबंध वाले अपने आदेश में संशोधन किया है। अब नागरिक उड्डयन मंत्रालय के नए आदेश के मुताबिक सिख स्टाफ कृपाण के साथ एयरपोर्ट पर काम कर सकेंगे। इसी महीने केंद्र सरकार ने सिखों के लिए एयरपोर्ट पर काम करने के दौरान कृपाण रखने पर रोक लगा दी थी।
हवाई जहाज में यात्रा करने वाले सिख यात्रियों को कृपाण ले जाने की छूट और एयरपोर्ट स्टाफ पर प्रतिबंध के इस फैसले का शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) ने विरोध किया था। साथ ही इस आदेश को वापस लेने की माँग की थी। इस माँग के बाद केंद्र सरकार ने एक नया आदेश जारी करते हुए सिख स्टाफ को कृपाण के साथ काम करने की छूट दे दी है।
आदेश
ANI के एक भ्रामक ट्वीट ने कुछ लोगों के मन में शंका पैदा कर दी थी कि केंद्र सरकार ने सिख यात्रियों को उड़ान के दौरान केबिन में कृपाण ले जाने पर रोक लगा दी है। इसके बाद कई लोग सरकार विरोधी बातें करने लगे थे।
Kirpan may be carried by a Sikh pax,on his person, provided length of blade doesn’t exceed 15.24 cms & total length of Kirpan doesn’t exceed 22.86 cms. Allowed while traveling on Indian aircraft within India operating from Domestic Terminals only:Bureau of Civil Aviation Security pic.twitter.com/NZXAyqs3Up
जबकि असलियत ये है कि नियमों में कोई भी बदलाव नहीं हुआ है। इस ट्वीट ने कई ट्विटर यूजर के मन में भ्रम की स्थिति जरूर पैदा कर दी थी।
Unhinged madness by @MoCA_GoI. I love the Sikhs & revere their Gurus, and we are defended and safe in large measure because of them, but this is downright dangerous for other passengers, not to mention an invitation for hostage situations and hijacking.
अपने पहले ट्वीट से पैदा हो रही भ्रम की स्थिति के कुछ ही घंटों बाद ANI ने सफाई के तौर पर दूसरा ट्वीट किया। उस ट्वीट में कहा गया था कि सरकार ने एयरपोर्ट पर काम करने वाले स्टाफ के लिए अपने फैसले में बदलाव किया है। लेकिन उतनी देर में यह अफवाह तेजी से फ़ैल गई कि सरकार ने जहाज़ों की केबिन में कृपाण को बैन कर दिया है।
अंत में सारांश के तौर पर यह कहा जा सकता है कि घेरलू उड़ानों में कृपाण को ले कर कोई भी बदलाव नहीं किया गया है। सिख पहले की तरह तय साइज की कृपाण अपने साथ ले जा सकते हैं। एयरपोर्ट पर काम करने वाले सिख स्टाफ के लिए जो प्रतिबंध लगाया भी गया था उसे हटा लिया गया है।
आपने ‘द कश्मीर फाइल्स (The Kashmir Files)’ फिल्म अगर देखी है तो जरा इसे बनाने के पीछे लगी मेहनत और की गई रिसर्च को भी समझ लीजिए। अगर नहीं देखी है, तो ये सब जानने के बाद आप खुद देख आएँगे। फिल्म के निर्देशक विवेक अग्निहोत्री, अभिनेता अनुपम खेर, अभिनेत्री पल्लवी जोशी, निर्माता अभिषेक अग्रवाल और ‘ग्लोबल कश्मीरी पंडित डायस्पोरा’ के अध्यक्ष सुरिंदर कौल की मौजूदगी में नई दिल्ली में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में फिल्म के पीछे की मेहनत और रिसर्च को एक डॉक्यूमेंट्री के रूप में पेश किया गया।
इसमें बताया गया है कि तमाम तमाम फतवों के बावजूद कैसे इस फिल्म के निर्माण को पूरा किया गया। निर्देशक विवेक अग्निहोत्री का कहना है कि जब कश्मीर में पंडितों के नरसंहार से जुड़ी मानवीय कहानियों से उनका परिचय हुआ, तब जाकर उन्होंने इस विषय पर फिल्म बनाने का निर्णय लिया। वीडियो में विवेक अग्निहोत्री अपनी पत्नी पल्लवी जोशी से ये चर्चा भी करते दिख रहे हैं कि ऐसा क्या है, जो अभी तक लोगों तक नहीं पहुँचा है और रिपोर्ट नहीं किया गया है।
कश्मीरी पंडित राजेंद्र कौल ने बताया कि ‘कश्मीर’ नाम इतना प्राचीन है कि महाभारत के समय में भी इसका उल्लेख मिलता है। वहीं सुरिंदर कौल का कहना है कि 1100-1200 ईस्वी तक वहाँ केवल हिन्दू ही रहा करते थे। भारत के सबसे बड़े साम्राज्यों में से एक ललितादित्य का शासनकाल था, जब भारत के अधिकतर हिस्सा उनके अंतर्गत आता था – ये भी बताया गया है। वहीं डॉक्टर राकेश कौल ने बताया कि कैसे कश्मीर के शाही राजा लोग हिन्दू थे, जिन्होंने अफगानिस्तान में शासन किया।
इसके बाद आक्रांता लोग आने लगे, जिन्होंने पहले मदद का दिखावा किया और फिर वहाँ कब्ज़ा करने लगे। इसी तरह शम्सुद्दीन ऐराकी भी ईराक से आया और उसने न सिर्फ जबरन धर्मांतरण किया, बल्कि कई मंदिरों को भी तोड़ा। उसने अपने आत्मकथा में भी लिखा है कि कैसे उसने कश्मीर में लोगों को मुस्लिम बनाया। विशेषज्ञ कहते हैं कि ये एक निरंतर नरसंहार है, जो कई वर्षों से हो रहा है और लगातार होता रहा। नब्बे के दशक से पहले भी ये हो रहा था।
इसी तरह एक विशेषज्ञ ने बताया कि कैसे कश्मीरी नेता शेख अब्दुल्ला ने भाषण दिया था कि कश्मीरी पंडित स्वाभाविक रूप से ‘मुस्लिमों के दुश्मन’ हैं। उन्होंने कश्मीरी पंडितों की तुलना शैतान से कर दी। विशेषज्ञ के अनुसार, और जब कश्मीरी पंडितों का प्रतिनिधिमंडल तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मिलने पहुँचा, जब नेहरू ने कहा – ‘ये तो शेख अब्दुल्ला का साथ दो, या जहन्नुम में जाओ।’ कश्मीरी समस्या के लिए ब्रिटिश को भी जिम्मेदार ठहराया जाता है, क्योंकि वो जहाँ भी गए वहाँ दिक्कतें खड़ी हो गईं।
इसी तरह जीवन ज़ुत्शी ने बताया कि पुराने कश्मीर के निवासी अथवा कश्मीरी पंडितों ने 1947 से ही घाटी को छोड़ना शुरू कर दिया था। इसी तरह बंसी पंडित ने बताया कि 1967 में वो कॉलेज में थे और तब एक लड़की थी, जिसका नाम परमेश्वरी था। उस नाबालिग हिन्दू लड़की का अपहरण कर के इस्लामी धर्मांतरण करा दिया गया था और ‘परवीन अख्तर’ नाम दे दिया गया। इसके बाद उसकी शादी एक मुस्लिम से कर दी गई। राज्य और केंद्र सरकार शांत रही।
वीडियो में बताया गया कि कैसे 700 पीड़ितों से विवेक अग्निहोत्री ने बातचीत की। वो खुद कार ड्राइव कर-कर के वहाँ पहुँचे और उनसे बातचीत की। पीड़ितों ने बताया कि कैसे मस्जिद में नमाज के बाद मुस्लिम भीड़ उग्र हो जाती थी। मुस्लिम लड़कों के दिमाग में हिन्दू घृणा भरी जाती थी। वो दाढ़ी बढ़ाने लगे। एक महिला ने बताया कि ये कश्मीरी लड़के भगवान शिव की प्रतिमा पर पेशाब कर देते थे। मोहन लाल रैना ने बताया कि एक पुजारी की हत्या हुई और उसके बाद उनके होठ सिल कर उन्हें एक पेड़ पर लटका दिया गया था।
वहीं सुनंदा वशिष्ठ ने बताया कि मुस्लिम परिवारों के 16-25 उम्र के बच्चे कट्टरपंथी बनने लगे थे। कश्मीर के एक पूर्व अधिकारी ने बताया कि उस समय ख़ुफ़िया सूचना मिली थी कि 100 कश्मीरी युवकों को पाकिस्तान ले जाकर ‘प्रशिक्षण’ दिया गया था। वहीं अंजलि रैना ने बताया कि रात के अँधेरे में बंदूक चलाने की प्रैक्टिस करते लोग दिखते थे। अनुपम खेर ने बताया कि कश्मीर में पंडितों से कहा जाता था कि अपनी कंट्री में जाओ, जबकि भारत के अंदर ही कश्मीर है।
इसी तरह एक पीड़िता मंजू काक कौल ने एक पुरानी घटना याद की, जब वो 7वीं-8वीं कक्षा में थीं। उन्होंने बताया कि तब एक कट्टरवादी ने उन्हें पकड़ के दीवार से टकरा दिया और अपने हाथ उनके शरीर पर फेरते हुए कहा – बहुत बकवास करती हो। इसी तरह सुनीता दरवेश कौल ने बताया कि कैसे एक लड़के ने उनसे कहा था कि हिन्दुओं को यहाँ मार डाला जाएगा। ये 1988 की घटना है। पाकिस्तान में कई आतंकी ट्रेनिंग कैम्प्स थे।
सुरिंदर कौल का कहना है कि 1988 आते-आते माहौल बदलने लगा था और JKLF की एक नोटिस में लिखा था कि हिन्दू इलाका छोड़ कर चले जाएँ। मधुसूदन कौल के एक हाथ की एक उँगली ही चली गई, आतंकियों की गोली से। ये भी याद दिलाया गया है कि कैसे जस्टिस गंजू की हत्या में यासीन मलिक ने अपना हाथ कबूल किया था। नवीन धार ने बताया कि छोटे-छोटे बच्चे पेट्रोल बम मार रहे थे और पत्थरबाजी कर रहे थे।
मस्जिदों से घोषणा की जाती थी – मुस्लिम बन जाओ, इलाका छोड़ दो या मरो। एक महिला ने बताया कि जब कश्मीर में उनके परिवार को पता चला कि मारने आ रहे हैं तो उनके दादा ने कहा कि अगर वो लोग आते हैं तो वो सबसे पहले अपनी ही पोती को मार देंगे। कश्मीर में उस समय महिलाओं के लिए डर का ये आलम था। बिट्टा कराटे ने कबूला भी था कि वो अपनी सगी बहन या माँ को भी मार देता, इस मकसद के लिए।
एक पीड़ित ने बताया कि उनके पिता को मार कर उनके शरीर के साथ ईंटें बाँध कर नदी में फेंक दिया गया था। अनुराधा नाम की एक महिला ने बताया कि किसी ने अपने पिता को नंगा नहीं देखा होगा, उन्होंने देखा है। उनके पिता के शरीर में कई गोलियाँ मारी गई थीं और पोस्टमॉर्टम के बाद ठीक से सिला भी नहीं गया था। नीरज साधु नामक एक महिला ने बताया कि उनका घर कश्मीर में था और माँ इसे काफी साफ़-सुथरा रखती थीं, ऐसे में वो दोबारा उस घर को गलत हालत में देख कर रो पड़ेंगी।
नई दिल्ली में ‘द कश्मीर फाइल्स’ को लेकर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अनुपम खेर और पल्लवी जोशी
रेणु रैना नाम की महिला ने बताया कि एक सरदार जी जब कुछ लोगों को जा रहे थे, जब उनके पिता ने कहा था कि मुझे नहीं जाना है लेकिन मैं चाहता हूँ कि मेरी बेटी यहाँ से निकल जाए। अभिनव रैना का कहना है कि अधिकतर टेंट में पड़े हुए थे। इसी तरह एक अन्य युवक ने बताया कि उनकी माँ ने अपने बचे-खुचे गहने बेच कर बच्चों को पढ़ाया। विशेषज्ञों की मानें तो 1 लाख घर वीरान हो गए, जो 35 बिलियन डॉलर (2.68 लाख करोड़) की संपत्ति होते हैं। इसी तरह, 3.3 लाख करोड़ रूपए की जमीनें वहाँ कश्मीरी पण्डितों से छीन ली गईं।
शिवानी नाम की एक लड़की का कहना है कि हमलोग अपने माता-पिता से पूछते हैं कि हमारा अपना शहर कहाँ है। उस समय आज़ादी के नारे लगते थे। पाकिस्तान से लेकर कश्मीर तक इन कट्टरवादियों के कई आका बैठे थे। इसी तरह जनवरी 1989 का एक वाकया विजय कुमार गंजू ने सुनाया। उन्होंने बताया कि तब तत्कालीन प्रधानमंत्री से किसी पत्रकार ने कश्मीर को लेकर पूछा तो उन्होंने कहा कि स्थिति अच्छी नहीं है और हम भी चिंतित हैं, लेकिन हम क्या कर सकते हैं क्योंकि वो (फारूक अब्दुल्लाह) मेरे दोस्त हैं।
इस डॉक्यूमेंट्री में इस पर भी ध्यान दिलाया गया कि कैसे भारत की GDP कभी दुनिया का 40% हुआ करती थी, लेकिन आज़ादी आते-आते वो 2% पर आ गई। इसी तरह UN ने कश्मीर में हुई घटना को ‘Near Genocide (नरसंहार के करीब)’ बताया, जबकि ये नरसंहार की हर परिभाषा को पूरा करता है। कश्मीरी पंडितों को आशा है कि वो जल्द ही अपने घर जाएँगे। वो कहते हैं कि अनुच्छेद-370 को हटाने का मोदी सरकार का फैसला भारत की स्वतंत्रता के बाद सबसे बड़ा फैसला है।
कश्मीरी हिंदुओं के नरसंहार और पलायन पर बनी फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ (The Kashmir Files) इन दिनों चर्चा में है। थिएटर्स से फिल्म देखकर बाहर निकलने वाले लोग अपने आँसू नहीं रोक पा रहे हैं। ऐसे कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। लोगों का कहना है कि बॉलीवुड में पहली बार किसी डायरेक्टर ने इतनी हिम्मत दिखाते हुए 32 साल पहले कश्मीरी हिंदुओं के साथ हुई बर्बरता की सच्चाई दिखाने की कोशिश की है।
इस बीच सोमवार (14 मार्च, 2022) को फिल्म निर्माता विवेक अग्निहोत्री ने ट्विटर पर वाशिंगटन डीसी के एक थिएटर के बाहर की तस्वीर को शेयर किया। इसमें कश्मीर फाइल्स देखने गए लोगों के एक ग्रुप ने तिरंगा पकड़े हुआ है। तस्वीर में स्वर्गीय जज नीलकंठ गंजू के बेटे भी हैं। उनके चेहरे पर लंबी मुस्कान है।
From Washington DC. The gentleman (4th from left) is swargiya Judge Neelkanth Ganjoo’s son. Indian judiciary & system never punished the terrorists who killed him in broad daylight. #TheKashmirFiles is a small step in bringing justice to Judge Ganjoo’s sacrifice. #RightToJusticepic.twitter.com/VnHXCOZ7WV
— Vivek Ranjan Agnihotri (@vivekagnihotri) March 14, 2022
नीलकंठ गंजू की हत्या
साल 1990 में कश्मीरी पंडितों का घाटी से पलायन भारत के इतिहास का एक काला पन्ना है। कश्मीरी पंडितों की हत्या की शुरुआत साल 1989 से हो गई थी। इसमें सबसे नृशंस हत्या रिटार्यड जज नीलकंठ गंजू की थी। बीजेपी नेता टीका लाल टपलू की हत्या के सात हफ्ते बाद ही नीलकंठ गंजू की 4 नवंबर 1989 को श्रीनर हाई स्ट्रीट मार्केट के पास स्थित हाईकोर्ट के पास गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। हत्या के बाद दो घंटे तक उनका शव सड़क पर ही पड़ा रहा था। उनकी हत्या के बाद, रेडियो कश्मीर पर एक घोषणा की गई, “अज्ञात हमलावरों ने श्रीनगर के महाराज बाजार में एक पूर्व सत्र न्यायाधीश की गोली मारकर हत्या कर दी।”
बता दें कि गंजू वो शख्स थे, जिन्होंने आतंकी मकबूल भट को फाँसी की सजा सुनाई थी। टपलू के बाद जस्टिस गंजू भी ऐसे कश्मीरी पंडित बने, जिन्हें आतंकियों ने निशाना बनाया। बाद में में जम्मू कश्मीर लिब्रेशन फ्रंट के लीडर और अलगाववादी नेता यासीन मलिक ने इस हत्याकांड की जिम्मेदारी ली थी। इसे आतंकी मकबूल भट की मौत का बदला बताया था।
कौन था मकबूल भट?
मकबूल भट जम्मू कश्मीर लिब्रेशन फ्रंट (JKLF) का संस्थापक था। उसने 1966 में सीआईडी सब इंस्पेक्टर अमर चंद की हत्या कर दी। अगस्त 1968 में मकबूल भट को तत्कालीन सेशन जज नीलकंठ गंजू ने फाँसी की सजा सुनाई। मगर वह तिहाड़ जेल से भाग गया और पाकिस्तान चला गया। साल 1976 में उसने कश्मीर के कुपवाड़ा स्थित एक बैंक में डाका डाला और मैनेजर की हत्या की। इस दौरान वह पकड़ा गया और दोबारा उसे फाँसी की सजा सुनाई गई। मकबूल के आतंकी संगठन ने उसे जेल से छुड़ाने के प्रयास में इंग्लैंड स्थित भारतीय उच्चायोग रविंद्र म्हात्रे का अपहरण कर हत्या कर दी। इसके बाद साल 1984 में उसे फाँसी पर लटका दिया।
जानने वाले पीयूष बबेले को पत्रकार कहते हैं। खैर वे पत्रकार कभी न हुए। इंडिया टुडे, दैनिक भास्कर, न्यूज 18 जैसे संस्थानों में काम करते हुए उन्होंने पत्रकारिता का चोला ओढ़ कॉन्ग्रेस के प्रोपेगेंडा वाहक बनने की अपनी भूमिका के साथ पूरा न्याय किया। बाद में एक दिन खबर आई कि बबेले अब मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस की टीम का हिस्सा हो गए हैं। इसके बाद बबेले वे सारे कर्म खुलकर करने लगे जो कभी वे दबे-छिपे कर रहे थे। स्वयंभू बुद्धिजीवी बबेले ने कश्मीरी हिंदुओं को लेकर ट्विटर पर जो दस्त की है, वह उसका ही एक नमूना है।
बबेले को बुद्धि व्याधि ही नहीं है। वे शेरो-शायरी भी कर लेते हैं। उन्होंने एक किताब लिख रखी है। नाम है- नेहरू मिथक और सत्य। पत्रकार रहते वे अक्सर अपने कनिष्ठों को एक कहानी सुनाते थे। वो कुछ इस तरह होता था: इंडिया टुडे ने व्यापमं घोटाले पर स्टोरी की थी। मैग्जीन के कवर पर शिवराज (शिवराज सिंह, मुख्यमंत्री, मध्य प्रदेश) की तस्वीर लगी थी और उनके चेहरे पर खून के छींटे थे। शिवराज मुझसे बड़े नाराज हुए। पर मुझे कोई फर्क नहीं पड़ा। एक दिन शिवराज मिले तो कहा- बबेले जी आपने तो मुझे खूनी बना दिया। मैंने उनसे कहा- होई वही जो राम रचि राखा… शिवराज जी फिर नि:शब्द हो गए।
इंडिया टुडे का वो कवर जिसको लेकर बबेले अक्सर शेखी बघारते रहते हैं
अब बबेले ने एक ट्विटर थ्रेड में बताया है कि यदि लालकृष्ण आडवाणी ने रथयात्रा नहीं निकाली होती तो कश्मीर में कश्मीरी पंडितों के खिलाफ माहौल नहीं बनता। उनका यह भी कहना है कि पलायन कॉन्ग्रेस राज में नहीं हुआ था। यह तब हुआ जब केंद्र में बीजेपी के समर्थन से विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार चल रही थी। साथ ही लिखा है, “भाजपा दंगों की पृष्ठभूमि तैयार करने और फिर उनसे होने वाले विनाश को भुनाने में हमेशा ही बहुत आगे रही है। आपदा पैदा करना और फिर आपदा में अवसर ढूंढना उनकी रणनीति का हिस्सा है। जिसे इन तथ्यों पर संदेह हो वह गूगल कर सकता है।”
कश्मीर फाइल्स जिसे देखनी हो देखे और जिसे ना देखनी हो ना देखे। लेकिन यह तथ्य ध्यान में रखें कि अगर भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने रथयात्रा न निकाली होती और पूरे भारत में मुसलमानों के खिलाफ माहौल नहीं बनाया होता तो कश्मीर में भी कश्मीरी पंडितों के खिलाफ माहौल नहीं बनता। 1/3
हमने बबेले की सलाह पर गौर करते हुए गूगल किया। गूगल बताता है कि कश्मीर से हिंदुओं के पलायन के करीब आठ महीने बाद आडवाणी की रथ यात्रा निकली थी। हम पर भरोसा न हो तो बबेले आज तक की स्टोरी का लिंक पढ़ सकते हैं, जो उसी समूह का हिस्सा है जिससे जुड़े इंडिया टुडे में कभी वह काम किया करते थे। यह बताता है कि 25 सितंबर 1990 को पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती पर लाल कृष्ण आडवाणी ने गुजरात के सोमनाथ से अयोध्या तक की अपनी रथ यात्रा शुरू की थी। जबकि तथ्य यह है कि जनवरी 1990 में कश्मीर से बड़े पैमाने पर हिंदुओं का पलायन हुआ था। अब बबेले के कैलेंडर में जनवरी से पहले सितंबर आता हो तो हमें कुछ न कहना!
यदि जनवरी बबेले के कैलेंडर में भी सितंबर से पहले आता हो तो उन्हें यह भी जान लेना चाहिए कि अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण बीजेपी के एजेंडे में पालमपुर अधिवेशन में शामिल हुआ था। यह अधिवेशन 9 से 11 जून 1989 को हुआ था। यह सत्य है कि जब पलायन हुआ तो केंद्र में वीपी सिंह की सरकार थी। उसे बीजेपी का समर्थन हासिल था। यह भी सत्य है कि जगमोहन उस समय जम्मू-कश्मीर के गवर्नर थे, जिन्हें कश्मीरी पंडित मसीहा और कॉन्ग्रेस गुनहगार बताती रही है।
लेकिन कश्मीर की कहानी परिवारों की कहानी है। एक राजपरिवार और तीन राजनीतिक (नेहरू-गॉंधी, अब्दुल्ला और सईद) परिवार। बॅंटवारे के बाद पाकिस्तानी कबायली सेना ने हमला किया तो कश्मीर के महाराजा हरि सिंह (उनके बेटे कर्ण सिंह कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता हैं) ने भारत के साथ विलय की संधि की। शेख अब्दुल्ला कश्मीर के प्रधानमंत्री बने। उन्हें नेहरू का समर्थन हासिल था। बाद में दोनों के रिश्तों में कड़वाहट आ गई। 1953 में अब्दुल्ला गिरफ्तार कर लिए गए।
बाद में नेहरू की बेटी इंदिरा गाँधी ने शेख अब्दुल्ला से सुलह कर ली। उन्हें 1975 में कश्मीर का मुख्यमंत्री बनाया। यह रिश्ता इंदिरा ने शेख अब्दुल्ला के बेटे फारूक के साथ भी शुरुआत में निभाया। फिर इंदिरा ने 1984 में फारूख को हटाकर गुल शाह को सीएम बनवाया। शाह ने जम्मू के न्यू सिविल सेक्रेटेरिएट एरिया के एक प्राचीन मन्दिर परिसर के भीतर मस्जिद बनाने की अनुमति दे दी ताकि मुस्लिम कर्मचारी नमाज पढ़ सकें। इस फैसले का जम्मू में विरोध हुआ और दंगे भड़क गए। घाटी में पंडितों पर अत्याचार का सिलसिला यहीं से शुरू हुआ।
इंदिरा की हत्या के बाद फारूक ने उनके बेटे राजीव से दोस्ती गाँठी और 1986 में दोबारा सीएम बने। इधर, पंडितों के खिलाफ अलगाववादियों की साजिश चरम पर पहुॅंच गई थी। कई कश्मीरी पंडितों को मारा गया, लेकिन फारूक अब्दुल्ला ने कुछ नहीं किया। ऐसे वक्त में वे मार्तण्ड सूर्य मन्दिर के भग्नावशेष पर सांस्कृतिक कार्यक्रम करा रहे थे। इसी बीच, दिसंबर 8, 1989 को वीपी सिंह सरकार के मंत्री मुफ़्ती मुहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद अगवा कर ली गईं। बदले में आतंकी छोड़े गए।
जगमोहन जब वीपी सिंह के जमाने में दूसरी बार गवर्नर (पहली बार उन्हें कश्मीर का राज्यपाल इंदिरा ने बनाया था) बनकर आए थे, उससे पहले ही 1987-88 से पंडितों ने घाटी छोड़ना शुरू कर दिया था। 14 सितंबर 1989 को भाजपा नेता पंडित टीका लाल टपलू की निर्मम हत्या कर दी गई थी। इसके कुछ समय बाद ही जज नीलकंठ गंजू की हत्या कर दी गई। गंजू ने जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के नेता मकबूल भट्ट को मौत की सजा सुनाई थी। जुलाई से नवंबर 1989 के बीच 70 अपराधी जेल से रिहा किए गए थे। घाटी में हमें पाकिस्तान चाहिए। पंडितों के बगैर, पर उनकी औरतों के साथ जैसे नारे लग रहे थे।
इस तरह से कुछ परिवारों की गलती से बदतर हुए हालात पर काबू पाने के लिए जगमोहन दूसरी बार श्रीनगर भेजे गए थे। आलोचक कहते हैं कि सुरक्षित रास्ता देकर जगमोहन ने पंडितों को घाटी से पलायन के लिए प्रेरित किया। उनकी हिफाजत नहीं की। यानी, पंडितों को घाटी में मरने के लिए अकेले नहीं छोड़ना जगमोहन की गलती थी। इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि जगमोहन ने कश्मीरी पंडितों को घाटी से सुरक्षित निकलने का मौका मुहैया कराया था, जिसके लिए पंडित उन्हें आज भी मसीहा मानते हैं।
जाहिर है कि कश्मीर में हिंदुओं के साथ जो कुछ हुआ उसका न तो आडवाणी की रथ यात्रा से लेना है, न जून 1989 से जब बीजेपी के एजेंडे में राम मंदिर आया और न वीपी सिंह की सरकार के समय इसके बीज बोए गए। जगमोहन की गलती यह थी कि उनके कारण पंडितों जिंदा बचकर घाटी से निकल आए। दूसरी गलती उन्होंने बाद में भाजपा में शामिल होकर की! इससे वे ‘सेक्युलर’ गिरोह के आसान निशाना बन गए! बबेले को भी खाद-पानी इसी गिरोह से मिलता है।
पर काश बबेले की शेरो-शायरी की तरह ही हल्की होती गिरिजा टिक्कू को बलात्कार के बाद आरी से चीर देना। काश की कश्मीरी पंडितों का पलायन बबेले के ट्वीट की तरह ही छिछला होता। काश की मस्जिदों की लाउडस्पीकर से निकलने वाले नारे… काश!!!