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वो सफाईकर्मी बने MLA जो लॉकडाउन में रिक्शाचालकों के लिए ‘पूड़ी-सब्जी’ की गाड़ी लेकर चलते थे: बोले धनघटा से जीते गणेश चंद्र चौहान- यह BJP में ही संभव

उत्तर प्रदेश के संतकबीर नगर जिले की धनघटा सीट से एक सफाई कर्मचारी विधायक चुने गए हैं। ये हैं, बीजेपी के गणेश चंद्र चौहान (Ganesh Chandra Chauhan)। उन्होंने सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के उम्मीदवार अलगू प्रसाद को 10,553 वोटों से हराया है। गणेश चंद्र ने अपनी जीत के बाद कहा है कि उन जैसी पृष्ठभूमि के व्यक्ति का विधायक बनना बीजेपी में ही संभव है।

नतीजों के बाद गणेश चौहान ने पार्टी का शुक्रिया अदा करते हुए कहा, “मुझे टिकट देकर बीजेपी ने संकेत दिया है कि बेहद साधारण व्यक्ति भी सत्ता के शीर्ष तक पहुँच सकता है।” उन्होंने कहा, “प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इलाहाबाद (प्रयागराज) में सफाईकर्मियों का सम्मान किया। उन्होंने सफाईकर्मियों के पैर धोए और संदेश दिया कि सफाईकर्मी किसी से कम नहीं हो सकते। अगर वे समाज की गंदगी साफ कर रहे हैं तो यह दिखाता है कि वे निश्चित तौर पर महान हैं।” 

गणेश ने अपने सफर के बारे में बताते हुए कहा, “कोरोना महामारी के दौरान मैं रिक्शा चलाने वालों के लिए गाड़ी में ‘पूड़ी-सब्जी’ लाया करता था। बिहार के कई लोग संत कबीर नगर में रहते हैं। मुझे जब टिकट मिला तो लोग मुझसे मिलने आए। वे लोग बहुत भावुक थे। मेरी जीत होते ही रिक्शावालों ने मुझे उठा लिया था।”

सफाईकर्मी से सियासत तक का सफर

गणेश चौहान का राजनीति में आने का सफर बेहद दिलचस्प रहा। पिता राजमिस्त्री का काम करते हैं। चौहान ने ग्रैजुएशन तक की पढ़ाई की और कमाई के लिए मजदूरी के काम में जुट गए। इस दौरान वह RSS के साथ जुड़े। 2009 में आई सफाई कर्मी की वैकेंसी में उनकी नियुक्ति हो गई, अपने वर्ग में पढ़े लिखे और तेज तर्रार होने के चलते 2009 में ही वह सफाई कर्मचारी संघ के ब्लॉक अध्यक्ष बन गए। यहाँ से उन्होंने राजनीति में अपना रास्ता बनाने की ठान ली।

साल 2010 में गणेश चौहान ने अपने पिता को जिला पंचायत सदस्य का चुनाव लड़वाया। वो तीसरे नंबर पर आए। लेकिन गणेश ने हार नहीं मानी। 2014 में वह सफाई कर्मचारी संघ के प्रदेश संगठन मंत्री बन गए। गणेश ने 2017 में भी बीजेपी से विधानसभा चुनावों में टिकट की माँग कर रहे थे, लेकिन उस बार नहीं मिला। 2021 में उन्होंने अपनी पत्नी को ब्लॉक प्रमुख का चुनाव लड़वाया, लेकिन सिर्फ 3 वोट से वह हार गईं। 2022 के विधानसभा चुनावों में टिकट मिलने के बाद उन्होंने सफाई कर्मचारी पद से इस्तीफा दे दिया और चुनाव में जबरदस्त जीत दर्ज की।

5-0 से भी कुछ नहीं बदला, कॉन्ग्रेस को गाँधी-वाड्रा ही जोतते रहेंगे: चिता पर लेटी पार्टी चिंतन शिविर करेगी, 5 घंटे की बैठक के बाद फिर वही कहानी निकली

2014 के बाद भारत की राजनीति पूरी तरह बदल चुकी है। लेकिन एक चीज जो नहीं बदली, वह है- कॉन्ग्रेस बैठकों की वही घिसी-पिटी स्क्रिप्ट। 5 राज्यों के हालिया विधानसभा चुनाव में बुरी तरह परास्त हुई पार्टी ने रविवार (13 मार्च 2022) को वर्किंग कमिटी की बैठक की खानापूर्ति की। लेकिन घंटों की कवायद के बाद वही कहानी निकली जो सफाए के कगार पर खड़ी पार्टी पहले भी तमाम मौकों पर पेश कर चुकी है। यानी, गाँधी-वाड्रा फैमिली ने अपनी तरफ से जिम्मेदारी से मुक्त होने की पेशकश की, बैठक में मौजूद लोगों ने कहा कि ऐसा नहीं होगा क्योंकि आप ही हमारे ‘तारणहार’ हैं, फिर गाँधी नेतृत्व करते रहने को मान गए और चिंतन शिविर वाली एक और खानापूर्ति जल्द ही कर लेने का फैसला कर लिया गया।

वर्किंग कमिटी की बैठक अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी की अध्यक्षता में हुई। बैठक में पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी, पार्टी महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा, वेणुगोपाल, राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे, लोकसभा में पार्टी नेता अधीर रंजन चौधरी, पी चिदंबरम आदि शामिल हुए। इसके अलावा G-23 के गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा और मुकुल वासनिक ने भी बैठक में शिरकत की।

तकरीबन 5 घंटे तक चली बैठक में कॉन्ग्रेस ने विधानसभा चुनावों में हार पर ‘गंभीर’ चिंता प्रकट करते हुए फैसला किया कि जल्द ही एक ‘चिंतन शिविर’ का आयोजन किया जाएगा, जिसमें आगे की रणनीति तैयार की जाएगी। 

इस दौरान सोनिया गाँधी ने इस्तीफे की पेशकश करते हुए कहा कि अगर पार्टी नेताओं को लगता है कि हार के लिए वो जिम्मेदार हैं तो वो तीनों (सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी वाड्रा) इस्तीफे के लिए तैयार हैं। हालाँकि, पार्टी नेताओं ने उन पर पूर्ण विश्वास जताया और उनसे संगठनात्मक चुनाव पूरे होने तक पार्टी की कमान सँभालने का आग्रह किया। अधीर रंजन चौधरी, मल्लिकार्जुन खड़गे, केसी वेणुगोपाल और दिनेश गुंडू राव समेत कई कॉन्ग्रेस नेताओं ने इसकी पुष्टि की और कहा कि सोनिया गाँधी के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस 2024 का चुनाव लड़ेगी। कई नेताओं ने एक बार फिर राहुल गाँधी को अध्यक्ष बनाए जाने की भी माँग की।

चुनाव के नतीजों को स्वीकार करते हुए कॉन्ग्रेस पार्टी ने अपने कार्यकर्ताओं और देशवासियों को भरोसा दिलाया कि वह एक सतर्क और जीवंत विपक्ष बनी रहेगी। कहा, “कॉन्ग्रेस पार्टी 2022 और 2023 के साथ-साथ 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव की चुनौतियों का सामना करने के लिए पूरी तरह से तैयार है।” 

बैठक में पाँच राज्यों में हुई हार पर प्रभारियों और पर्यवेक्षकों ने अपनी-अपनी रिपोर्ट सौंपी। इसमें हार के कारणों, खामियों और क्या खोया, क्या पाया, इसकी जानकारी दी गई। हार से कैसे उबरा जाए और जनता तक अपनी बात कैसे पहुँचाए, इस पर गुलाम नबी आजाद और दिग्विजय सिंह ने अपनी बात रखी। 

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा और मणिपुर में कॉन्ग्रेस का बुरा हाल रहा तो वहीं पंजाब में उसने बुरे प्रदर्शन के साथ सत्ता गँवा दी। उत्तर प्रदेश में प्रियंका गाँधी ने चुनाव प्रचार की कमान सँभाली थी, लेकिन कॉन्ग्रेस को महज दो सीटें ही जीत पाई। यूपी की 380 सीटों पर कॉन्ग्रेस प्रत्याशियों की जमानत तक जब्त हो गई।

BJP की जीत के बाद शर्त से मुकरा शेर अली, 1 साल के लिए विजय सिंह को अब नहीं दे रहा खेत: SP की हार के बाद भी अवधेश ने निभाया वादा

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2022 में योगी आदित्यनाथ की हार और अखिलेश यादव की जीत पर लगी चर्चित शर्त में शेर अली अपने वादे से मुकर गए हैं। भाजपा की जीत पर विजय सिंह को अपने 4 बीघे खेत 1 साल तक देने का पंचायत नामा अब शेर अली नहीं मान रहे। वहीं विजय सिंह ने इस वादाखिलाफी की शिकायत पुलिस में करने का मन बनाया है। यह मामला UP के बदायूँ विधानसभा के शेखूपुर विधानसभा का है।

सोशल मीडिया पर यह शर्त बहुत वायरल हुई थी। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक विधानसभा चुनाव परिणाम आ जाने के बाद विजय सिंह ने शेर अली से खेत देने को कहा। इस पर शेर अली ने सीधे इनकार कर दिया। साथ ही शेर अली ने धमकाते हुए कहा, “जाओ थाने में शिकायत कर दो, हम तब भी खेत नहीं देंगे।” विजय सिंह पंचायत के आगे शर्त में हुए करार को लागू करवाना चाह रहे हैं।

गौरतलब है कि इस शर्त में था कि यदि बीजेपी की सरकार बनी तो शेर अली शाह अपनी चार बीघा जमीन विजय सिंह को एक साल तक खेती के लिए देंगे। वहीं, यदि सपा की जीत हुई तो विजय सिंह को 4 बीघा जमीन एक साल के लिए शेर अली के हवाले करनी होगी। कोई बात से न पलटे इसके लिए गाँव के 12 लोग गवाह बनाए गए थे।

बांदा जिले में लगी बाइक की शर्त पूरी हुई

वहीं उत्तर प्रदेश के ही बांदा जिले में भाजपा और सपा समर्थक के बीच बाइक की शर्त लगी थी। मटौंध थाना क्षेत्र के गाँव बसहरी में प्लास्टिक सामान की फेरी लगाने वाले सपा समर्थक अवधेश कुशवाहा और भाजपा समर्थक टेम्पो चालक ब्रजकिशोर सैनी के बीच 100 रुपए के स्टाम्प पर शर्त लगी थी। इसमें कहा गया था कि अगर बीजेपी की सरकार नहीं बनी तो ब्रजकिशोर अपनी टेंपो अवधेश को देगा। वहीं अगर सपा हारेगी तो अवधेश अपनी बाइक ब्रजकिशोर सैनी को देंगे। 10 मार्च को परिणाम आने के बाद अवधेश कुशवाहा ने अपनी बाइक ब्रजकिशोर सैनी को दे दी है।

अवधेश कुशवाहा (बाएँ) और बृजकिशोर सैनी (दाएँ) चित्र साभार – दैनिक भास्कर

जिसने कबूली थी कश्मीरी हिंदुओं की हत्या, उसे इंडिया टुडे ने ‘यूथ आइकन’ बता दिया था मंच: जानिए आनंद महिंद्रा ने क्या कहा था

‘द कश्मीर फाइल्स’ फिल्म के रिलीज के बाद एक बार फिर से कश्मीरी पंडितों के साथ घाटी में हुई बर्बरता के बारे में चर्चा जगह-जगह शुरू हो गई हैं। इसी बीच उन नामों का भी खुलासा हो रहा है जिनके हाथ कश्मीरी पंडितों के खून से रंगे हैं। जेकेएलएफ का यासीन मलिक उनमें से एक है जिसने ऑन टीवी एक बार कश्मीरी पंडित की हत्या को स्वीकारा था, लेकिन फिर भी इंडिया टुडे ने साल 2008 के कॉन्क्लेव में उसे यूथ आइकन बनाकर पेश किया था।

इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में आनंद महिंद्रा ने दिया ‘आतंकी’ यासीन पर परिचय

दिलचस्प बात ये है कि तमाम विवादों के बाद इंडिया टुडे के कॉन्कलेव में यासीन मलिक को बुलाया गया और उसका परिचय देते हुए महिंद्रा ने उसके कुकर्मों को जस्टिफाई करने का प्रयास किया था। महिंद्रा ने यासीन को लेकर कहा था,

“यासीन मलिक जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट का अध्यक्ष है। ये दल सेकुलर और अलगाववादी है जो जम्मू-कश्मीर की आजादी की बात करता है न सिर्फ भारत से बल्कि पाकिस्तान से भी। मलिक जेकेएलएफ से एक आतंकी के तौर पर अस्तित्व में आया था और पाकिस्तान में ट्रेनिंग के लिए भी गया था। बाद में उसने सरेंडर किया और इसे शांतिपूर्ण प्रदर्शन में तब्दील कर दिया। जेकेएलएफ शुरूआत में एक आतंकी संगठन था लेकिन 1995 के बाद इन्होंने हर हिंसा को छोड़ दिया और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी माँग मनवाने को आगे बढ़ा। यासीन मलिक कश्मीरी पंडितों की घाटी में वापसी की भी वकालत करता है जिन्हें घाटी से निकलने पर मजबूर किया गया। स्पष्ट तौर पर उनके पेनेल में चयन कुछ विवादों का हिस्सा बना जैसा कि आपने शो के शुरू में हल्ला सुना। मुझे लगता है कि हम इस निर्णय का आदर करते हैं जहाँ हर आवाज सुनी जाती है। मुझे लगता है लोकतंत्र की खासियत वार्ता है।”

हैरान करने वाली चीज ये है कि यासीन मलिक को जब इस पेनल में शामिल करने की बात आई थी, तब तमाम हिंदुओं ने इसका विरोध किया था लेकिन उनकी कोई सुनवाई नहीं हुई और यासीन के साथ इंडिया टुडे ने मंच साझा किया। इतना ही नहीं आदित्य राज कौल नामक पत्रकार का दावा है कि उन्होंने इस संबंध में आनंद महिंद्रा से सवाल किए तो उन्हें ट्विटर पर ब्लॉक कर दिया गया और आज तक उन्हें अनब्लॉक नहीं किया गया है। 

बता दें कि यासीन मलिक के ऊपर टेरर फंडिंग समेत तमाम आरोपों को लेकर वर्तमान में केस चल रहा है। लेकिन कश्मीरी पंडितों की हत्या वो मामला है जिसे उसने खुद ऑन टीवी स्वीकारा था कि उसने नीलकंठ गंजू नामक जज को मौत के घाट उतारा था क्योंकि वह जेकेएलएफ नेता के विरुद्ध सजा-ए-मौत सुनाने वाले थे। इतना ही नहीं यासीन मलिक के जेकेएलएफ पर निहत्थे IAF सैनिकों को मारने के भी आरोप हैं। नीलकंठ गंजू के पोते अनमोल ने तो साल 2019 में यासीन मलिक को सार्वजनिक तौर पर फंदे पर लटकाने की माँग भी की थी। इसके अलावा उन्होंने यासीन मलिक को कॉन्ग्रेस की मनमोहन सरकार से मिले समर्थन पर भी सवाल खड़े किए थे। आदित्य राज कौल द्वारा साझा वीडियो में पूर्व पीएम मनमोहन सिंह को उनसे हाथ मिलाते देखा जा सकता है।

कॉन्ग्रेस की सफाई

उल्लेखनीय है कि यासीन मलिक जैसे अलगाववादियों को समर्थन देने वाली कॉन्ग्रेस ने हाल में द कश्मीर फाइल्स फिल्म के जरिए दिखाए गए सच से लोगों को भ्रमित करने के लिए अपने ट्वीट में सारा इल्जाम तत्कालीन राज्यपाल जगमोहन पर लगाया और दावा किया कश्मीरी पंडितों का पलायन उनके कारण शुरू हुआ। हालाँकि हकीकतत कहती है कि अगर उस दौर में जगमोहन हस्तक्षेप नहीं करते तो शायद हिंदुओं के मारे जाने की तादाद और हजारों में होती।

रंगभरी एकादशी: कश्मीरी पंडितों की रजत पालकी पर विराजमान महादेव कराएँगे माँ गौरा का गौना, 358 वर्षों से जीवंत है काशी की यह परम्परा, शुरू होगा होली का हुड़दंग

ब्रज के बाद यदि कहीं की पौराणिक, आध्यात्मिक और परंपरागत होली प्रसिद्ध है तो वह है महादेव बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी (वाराणसी) की। धर्म और अध्यात्म की नगरी काशी में फाल्गुन शुक्ल एकादशी को रंगभरी एकादशी के रूप में मनाया जाता है, जिसे आमलकी एकादशी भी कहते हैं। होली से पहले रंगभरी एकादशी वैसे तो पूरे देश में मनाई जाती है, पर इसका सर्वाधिक उत्‍साह और महत्त्व काशी में ही देखने को मिलता है। इस दिन महादेव शिव के गौना की रस्म ही रंगभरी एकादशी के रूप में मनाई जाती है। ज्ञात इतिहास की बात करें तो 358 वर्षों से यह परंपरा अपने भव्यतम स्वरूप में निरंतर निभाई जा रही है। इसके पहले कहा जाता है कि मुग़लों के शासन में लम्बे समय तक यह परंपरा बाधित रही।

रंगभरी एकादशी होली से 5 दिन पहले आती है। ब्रज में होली की शुरुआत होलाष्टक से होती है। वहीं बनारस में यह रंगभरी एकादशी से शुरू होती है। इस वर्ष 14 मार्च, 2022 को रंगभरी एकादशी से लेकर बुढ़वा मंगल तक अब हर तरफ “होली ही होली” नज़र आएगी बनारस में। काशी के साथ ही जहाँ-जहाँ भी महादेव शिव के मंदिर हैं उन सभी मंदिरों में भक्त अपने भगवान को रंग-गुलाल से सराबोर कर उत्सव के रंग में डूब जाएँगे।

क्या है इस बार खास

इस बार रंगभरी एकादशी पर बाबा विश्वनाथ 11 किलो चाँदी से निर्मित पालकी में भक्तों को दर्शन देने के लिए निकलेंगे। दरअसल, बाबा काशी विश्वनाथ, माता गौरा पार्वती की चल प्रतिमा की पालकी यात्रा के लिए चाँदी का नया सिंहासन बनवाया गया है। वाराणसी के टेढ़ीनीम स्थित महंत डॉ. कुलपति तिवारी के आवास पर बाबा विश्वनाथ के लिए यह नई पालकी तैयार की गई है। खास बात यह है कि इस बार कश्मीर के शैव भक्तों (कश्मीरी पंडितों) और दिल्ली के भक्तों की तरफ से बाबा विश्वनाथ को लगभग 11 किलो चाँदी के साथ ही कश्मीर से चिनार और अखरोट की खास लकड़ियाँ भी दान में दी गई हैं।

रजत पालकी पर सवार होंगे महादेव शिव और माता पार्वती

जो लोग काशी की इस परंपरा से परिचित न हों उनके लिए बता दें कि महाशिवरात्रि पर शिव विवाह हुआ था और आमलकी एकादशी या रंगभरी एकादशी पर काशी विश्वनाथ के गौना से दो दिन पहले से संगीत का उत्सव शुरू हो जाता है। परंपरा के रूप में महंत के आवास पर ही माँ गौरा पार्वती की रजत प्रतिमा को तेल-हल्दी लगाकर गौने की तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं। यह परंपरा हर वर्ष सुहागिनों और गवनहारियों द्वारा निभाई जाती है। इस अवसर पर महिलाओं द्वारा मंगल गीत भी गाए जाते हैं।

गौने से पहले की परंपरा का निर्वाह

इस बार गाए गए कुछ मंगलगीतों की बात करूँ तो कुछ के बोल हैं- “गौरा के हरदी लगावा, गोरी के सुंदर बनावा..’, ‘सुकुमारी गौरा कइसे कैलास चढ़िहें’…’, ‘गौरा गोदी में लेके गणेश, विदा हाेइहैं ससुरारी… जैसे कई गीतों पर महिलाओं ने जमकर नृत्य किया। इसके साथ ही दूल्हे यानि महादेव शिव के भोग के लिए खास तौर से पकवान तैयार किए जाते हैं। एक तरफ माँ पार्वती का साज शृंगार हुआ तो दूसरी तरफ हल्दी की रस्म के बाद नजर उतारने के लिए साठी के ‘चाउर चूमिय चूमिय’.. गीत भी गाए गए। महिलाओं गौना की परंपरा का निर्वाह करते हुए गौरा पार्वती की रजत मूर्ति को चावल से चूमा।

पौराणिक मान्यता से काशी की लोकपर्व बनने की यात्रा

महाश्मशान की नगरी काशी में माँ अन्नपूर्णा के रूप में निवास करने वाली देवी गौरी के पहली बार काशी आगमन के साथ ही बनारस में होली का आगाज़ हो जाता है। इस दिन से वाराणसी में रंग-गुलाल खेलने का सिलसिला प्रारंभ हो जाता है जो लगातार छह दिन तक चलता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार रंगभरी एकादशी के दिन ही भगवान शिव माता पार्वती से विवाह के बाद पहली बार काशी पधारे थे। कहते हैं कि इस मंगल खुशी में भगवान शिव के गण रंग-गुलाल उड़ाते हुए और खुशियाँ मनाते हुए आए थे। मान्यता है कि रंगभरी एकादशी को बाबा विश्वनाथ अपने भक्तों के साथ रंग और गुलाल से होली खेलते हैं।

गौना के बाद उत्सव मनाते काशीवासी

परंपरा के निर्वाह की कड़ी में महाशिवरात्रि को परिणय सूत्र (विवाह) में बंधने के बाद बाबा विश्वनाथ पहली बार माँ गौरा का गौना कराने उनके नइहर यानी श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के महंत के घर पहुँचते हैं। ससुराल पहुँचने पर बाबा विश्वनाथ का स्वागत घर की महिलाओं द्वारा मंगल गीत के साथ किया जाता है। वहीं महादेव के इस उत्सवप्रेमी मस्तमौला शहर काशी को तो बस बहाना चाहिए। काशीपुराधिपति बाबा भोलेनाथ अपनी दुल्हन लेकर निकलें और उनके गण के रूप में काशीवासी उल्लासित न हों ऐसा कैसे संभव है। बाबा भोले के भक्त बाबा विश्वनाथ से आशीर्वाद लेकर रंग-गुलाल की होली खेलते, नाचते-गाते-झूमते हुए गौना लेने निकलते हैं।

वहीं यदि लौकिक परंपरा की बात करें तो रंगभरी एकादशी पर महादेव शिव के पूरे परिवार की चल प्रतिमाएँ काशी विश्वनाथ मंदिर में लाई जाती हैं और बाबा विश्वनाथ मंगल वाद्ययंत्रों की मधुर ध्वनि के बीच नगर भ्रमण पर निकलकर भक्तों को आशीर्वाद देते हैं।

शिव विवाह का प्रसंग

बात काशी की हो, माँ गौरी के गौने की हो और उनके अनन्य प्रेमी शिव के विवाह की बात छूट जाए ये कैसे हो सकता है। तो थोड़ी चर्चा शिव विवाह की भी कर लेते हैं।

महाशिवरात्रि पर शिव और पार्वती का विवाह कितने अड़भंगी तरह से हुआ था, इसकी परंपरा आज भी काशी में महाशिवरात्रि पर शिव बारात के रूप में देखी जा सकती है। कहते हैं, इससे पहले ऐसा विवाह कभी किसी ने नहीं देखा था। उनकी शादी में एक से बढ़कर एक अतरंगी लोग शामिल हुए। देवताओं के साथ ही असुर भी वहाँ पहुँचे। शिव पशुपति भी हैं, मतलब सभी जीवों के देवता भी हैं, तो कहा जाता है सारे जानवर, कीड़े-मकोड़े और अन्य जीव भी उनके विवाह में बाराती बने। यहाँ तक कि भूत-पिशाच, अपंग और विक्षिप्त लोग भी उनके बारात में मेहमान बन कर पहुँचे।

शिव विवाह (पेंटिंग राजा रवि वर्मा, साभार-पिंटरेस्ट)

कहने को यह एक राजसी विवाह था। एक राजकुमारी पार्वती की शादी हो रही थी। इसलिए विवाह समारोह से पहले एक अहम समारोह का आयोजन होना था। वर-वधू दोनों की वंशावली घोषित की जानी थी। एक राजा के लिए उसकी वंशावली सबसे अहम चीज होती है, जो उसके जीवन का गौरव होता है। ऐसे में हिमालय पुत्री पार्वती की वंशावली का बखान खूब धूमधाम से किया जाने लगा। यह कुछ देर तक चलता रहा और आखिरकार जब उन्होंने अपने वंश के गौरव का बखान खत्म किया, तो वे उस ओर मुड़े जिधर वर के रूप में भूतभावन महादेव विराजमान थे।

सभी अतिथि इंतजार करने लगे कि वर की ओर से कोई उठकर शिव के वंश के गौरव के बारे में बोलेगा मगर किसी ने एक शब्द भी नहीं कहा। वधू का परिवार आश्चर्य में पड़ गया, “क्या शिव के खानदान में कोई ऐसा नहीं है जो खड़े होकर उनके वंश की महानता के बारे में बता सके?” मगर वाकई कोई नहीं था। वर के माता-पिता, रिश्तेदार या परिवार से कोई वहाँ नहीं आया था, क्योंकि उनके परिवार में कोई था ही नहीं। वह सिर्फ अपने साथियों, गणों के साथ ही आए जो विकृत जीवों की तरह दिखते थे।

फिर पार्वती के पिता पर्वत राज हिमालय ने शिव से अनुरोध किया, “कृपया अपने वंश के बारे में कुछ बताइए।” शिव कहीं शून्य में देखते हुए चुपचाप बैठे रहे। वह न तो दुल्हन की ओर देख रहे थे, न ही शादी को लेकर उनमें कोई उत्साह नजर आ रहा था। वह बस अपने गणों से घिरे हुए बैठे रहे और शून्य में घूरते रहे। वधू पक्ष के लोग बार-बार उनसे यह सवाल पूछते रहे, क्योंकि कोई भी अपनी बेटी की शादी ऐसे आदमी से नहीं करना चाहेगा, जिसके वंश का अता-पता न हो। उन्हें जल्दी थी, क्योंकि विवाह के लिए शुभ मुहूर्त तेजी से निकला जा रहा था। मगर शिव मौन रहे।

कहा जाता है, समाज के लोग, कुलीन राजा-महाराजा और पंडित बहुत घृणा से शिव की ओर देखने लगे और विवाह मंडप में तुरंत फुसफुसाहट शुरू हो गई, “इसका वंश क्या है? यह बोल क्यों नहीं रहा है? हो सकता है कि इसका परिवार किसी नीच जाति का हो और इसे अपने वंश के बारे में बताने में शर्म आ रही हो।”

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, फिर नारद मुनि, जो उस सभा में मौजूद थे, ने यह सब तमाशा देखकर अपनी वीणा उठाई और उसकी एक ही तार खींचते रहे। वह लगातार एक ही धुन बजाते रहे- टोइंग टोइंग टोइंग। इससे खीझकर पार्वती के पिता पर्वत राज अपना आपा खो बैठे, “यह क्या बकवास है? हम वर की वंशावली के बारे में सुनना चाहते हैं मगर वह कुछ बोल नहीं रहा। क्या मैं अपनी बेटी की शादी ऐसे आदमी से कर दूँ? और आप यह खिझाने वाला शोर क्यों कर रहे हैं? क्या यह कोई जवाब है?’ नारद ने जवाब दिया, “वर के माता-पिता नहीं हैं।” राजा ने पूछा, “क्या आप यह कहना चाहते हैं कि वह अपने माता-पिता के बारे में नहीं जानता?”

“नहीं, इनके माता-पिता ही नहीं हैं। इनकी कोई विरासत नहीं है। इनका कोई गोत्र नहीं है। इसके पास कुछ नहीं है। इनके पास स्वयं के सिवा कुछ नहीं है।” पूरी सभा चकरा गई। पर्वत राज ने कहा, “हम ऐसे लोगों को जानते हैं जो अपने पिता या माता के बारे में नहीं जानते। ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति हो सकती है। मगर हर कोई किसी न किसी से जन्मा है। ऐसा कैसे हो सकता है कि किसी का कोई पिता या माता ही न हो।”

नारद मुनि ने तत्क्षण जवाब दिया, “क्योंकि यह स्वयंभू हैं। इन्होंने स्वयं अपनी रचना की है। इनके न तो पिता हैं न माता। इनका न कोई वंश है, न परिवार। यह किसी वंश-परंपरा से भी सम्बन्ध नहीं रखते और न ही इनके पास कोई राज्य है। इनका न तो कोई गोत्र है, और न कोई नक्षत्र। न कोई भाग्यशाली तारा इनकी रक्षा करता है। यह इन सब चीजों से परे हैं। यह एक योगी हैं और इन्होंने सारे अस्तित्व को अपना एक हिस्सा बना लिया है। इनके लिए सिर्फ एक वंश है- ध्वनि। आदि, शून्य, प्रकृति जब अस्तित्व में आई, तो अस्तित्व में आने वाली पहली चीज थी- ध्वनि। इनकी पहली अभिव्यक्ति एक ध्वनि के रूप में है। ये सबसे पहले एक ध्वनि के रूप में प्रकट हुए। उसके पहले ये कुछ नहीं थे। यही वजह है कि मैं यह तार खींच रहा हूँ।”

महादेव शिव : काशी में विशेष महत्त्व

महादेव शिव के बारे में ऐसी अनेक कथाएँ प्रचलित हैं। जो शिव के उस रूप का बोध कराती हैं जो कहता है, “शिव अर्थात वह जो नहीं है।” जो सर्वेश्वर सर्वशक्तिमान अनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक भगवान हैं। ये अलग बात है कि महादेव रसरीति से अत्यंत सुलभ साधारण भोलेनाथ हो जाते हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि प्रेमदेवता जिसको छू लेता है, वह कुछ-का-कुछ हो जाता है। अल्पज्ञ सर्वज्ञ हो जाता है और सर्वज्ञ अल्पज्ञ हो जाता है। अल्पशक्तिमान सर्वशक्तिमान हो जाता है, वहीं सर्वशक्तिमान का भी महाविनाश हो जाता है।

जिस नगरी के कर्ता-धर्ता स्वयं महादेव शिव हों उसकी बात ही क्या! काशी तो शिव के ताल पर नृत्य करती है। ये भी कहा जाता है कि प्रेम के स्पर्श से कुछ-का-कुछ हो जाता है। प्रेमरंग में रंगे हुए प्रेमी के लिए सम्पूर्ण संसार ही प्रेमास्पद प्रियतम हो जाता है। शिव अपने प्रेम की पराकाष्ठा की वजह से ही महादेव हुए, कल्याण के हर रंग के उन्नायक हुए। यह जो रंगभरी एकादशी है, इसमें भी रंग क्या है? जिसके द्वारा जगत रंगों से सराबोर हो उठता है- ‘उड़त गुलाल लाल भए अम्बर’ अर्थात् गुलाल के उड़ने से आकाश लाल हो गया। आकाश इस सारे भौतिक प्रपंच का उपलक्षण है और काशी भौतिकता से आध्यात्मिक यात्रा का महामार्ग।

काशी का कोई ज्ञात इतिहास नहीं मिलता। आप कोई भी कालखंड की बात करेंगे उसमें काशी का जिक्र जरूर आएगा। ऐसे में प्राचीन नगर युगों से उत्सवधर्मिता और आध्यात्म की अलख जगाए हुए है, जब भी जीवन में खुशियों के रंग कम होने लगे तो आइए काशी, जहाँ मरघट पर भी जीवन का उत्सव नज़र आएगा। जहाँ मृत्यु अंत नहीं बल्कि नए जीवन का प्रस्थान बिन्दु है। मोक्ष का मार्ग है। रंगभरी एकादशी के अवसर पर संसार को काशी जीवन में रंग और उमंग के साथ ही फक्कड़पने में भी मस्ती-उल्लास-आनन्द का सन्देश देती है।

राजस्थान के मदरसे में हेडमास्टर ने 10वीं की छात्रा के साथ की छेड़खानी, कोई FIR नहीं: बोलीं महिलाएँ – ऐसे शिक्षकों को गोली मार देनी चाहिए

राजस्थान के नागौर स्थित एक मदरसा के हेड मास्टर द्वारा 10वीं की छात्र से छेड़छाड़ करने का मामला प्रकाश में आया है। आरोप है कि आरोपित हेड मास्टर ने पीड़िता के साथ अश्लील बातें और छेड़छाड़ की। इस मामले की जानकारी जैसे ही पीड़िता के परिजनों को लगी तो उन्होंने हंगामा किया, जिसके बाद आरोपित हेड मास्टर और महिला शिक्षिका को हटा दिया गया।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक, यह घटना नागौर के गाँधी चौक स्थित हनीफिया सूफिया सीनियर सेकेंडरी मदरसे की है। यह एक प्राइवेट मरदसा है। इसके हेडमास्टर विपिन बागड़ा (38) पर ही छात्रा से छेड़छाड़ का आरोप है। इस मामले में पीड़ित छात्रा के चाचा का कहना है कि उनकी भतीजी बीते 4 दिन से काफी उदास थी। जब उससे इसका कारण पूछा गया तो उसने हेडमास्टर की करतूत के बारे में बताया।

लेकिन रविवार (13 मार्च 2022) को जब इसकी शिकायत लेकर मदरसे में गए तो हेड मास्टर उल्टा पीड़िता के घरवालों को ही धमकाने लगा। छात्रा के परिजनों का आरोप है कि हेड मास्टर ने छात्रा के साथ बदसलूकी की। इससे पहले भी वो इस तरह की करतूत करता रहा है। उसकी वजह से कई लड़कियों ने मजबूरन अपनी पढ़ाई छोड़ दी। बड़े पैमाने पर आऱोपित हेड मास्टर को हटाए जाने की माँग उठी।

इस बीच जानकारी मिलते ही बाकी छात्रों के भी अभिभावक वहाँ इकट्ठे हो गए। इनका कहना था कि ये आखिर किस भरोसे अपनी बच्चियों को पढ़ने के लिए भेजें। एक बुजुर्ग महिला ने कहा कि इस तरह की घटनाओं के बाद अपनी बच्चियों को कौन मदरसों में भेजेगा, ये वीरान हो जाएँगे। ऐसे मास्टरों को गोली मार देनी चाहिए। एक अन्य महिला ने कहा कि अगर बच्चियाँ स्कूल में सुरक्षित नहीं होंगी तो कहाँ होंगी।

हंगामा बढ़ता देख पुलिस भी मौके पर पहुँच गई। इस बीच मदरसा सदर मोहम्मद शरीफ ने परिजनों की शिकायत पर आरोपित हेड मास्टर को हटा दिया गया है। हालाँकि, उसके खिलाफ पुलिसिया कार्रवाई नहीं की गई।

फिर से 4 गायों के कटे सिर मिले, इससे पहले 18 मिले थे: पंजाब में थम नहीं रहा गोहत्याओं का सिलसिला, भगवंत मान ने दिए जाँच के आदेश

पंजाब में गोहत्या का सिलसिला थमता नहीं दिख रहा है। जहाँ एक तरफ होशियारपुर में 18 गायों के कटे हुए सिर मिले थे, वहीं दूसरी तरफ अब जालंधर में 4 और गायों के सिर बरामद किए गए हैं। जालंधर में मकसूदां थाने के अंतर्गत 4 गायों के कटे हुए सिर मिलने के इलाके में तनाव फ़ैल गया और कई धार्मिक संगठन भी घटनास्थल पर पहुँचे। ये घटना वरियाणा गाँव के पास की है। पुलिस भी मौके पर पहुँच गई है। हिन्दू संगठन आक्रोशित हैं

इससे पहले होशियारपुर जिले में टांडा उड़मुड़ स्थित झाँस गाँव के एक रेलवे ट्रैक के पास गायों के 18 सिर बरामद किए गए थे। जिला मुख्यालय होशियारपुर शहर से 36 किलोमीटर की दूसरी पर ये घटना हुई। शनिवार (12 मार्च, 2022) को सुबह हुई इस घटना से क्षेत्र में तनाव व्याप्त हो गया। ‘पंजाब गौसेवा आयोग’ ने इस घटना की जाँच के लिए दो सदस्यीय टीम का गठन किया है। साथ ही एक सप्ताह के भीतर रिपोर्ट सौंपने को भी कहा गया है।

पंजाब के भावी मुख्यमंत्री और AAP नेता भगवंत मान ने भी इस घटना की निंदा की और साथ ही पुलिस महानिरीक्षक (DGP) को इस मामले की विस्तृत जाँच करने के लिए कहा है। उन्होंने कहा कि असामाजिक तत्वों को इस तरह की हरकतों से बाज आना चाहिए, क्योंकि कानून व्यवस्था को हर कीमत पर बनाए रखना है। उन्होंने कहा कि इस तरह के अपराधों से राज्य के शांतिपूर्ण वातावरण को दूषित करने की अनुमति किसी को भी नहीं दी जाएगी।

उन्होंने इस घटना में शामिल पाए जाने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई के लिए भी DGP को निर्देश दिया। स्थानीय एसपी मुख़्तार राय ने कहा कि रेलवे ट्रैक के पास सुनसान इलाके में गायों के सिर मिले। साथ ही वहीं से चटाई की 12 बोरियाँ भी मिलीं, जिनमें आलू भरे हुए थे। ‘बजरंग दल’ समेत कई संगठनों के हिन्दू कार्यकर्ता घटनास्थल पर पहुँचे। ‘शिव सेना (बाल ठाकरे)’ के राज्य उपाध्यक्षों रंजीत राणा और प्रिंस कटना के अलावा भाजपा के पूर्व मंत्री टिकासन सूद भी वहाँ पहुँचे।

हिन्दुओं ने जालंधर-पठानकोट GT रोड पर धरना देकर अपने आक्रोश को प्रदर्शित किया। इस दौरान टांडा में ट्रैफिक भी रोका गया। पुलिस ने दोषियों पर कार्रवाई की बात की, तब जाकर प्रदर्शन ख़त्म हुआ। नए विधायक जसवीर सिंह राजा और पंजाब के पूर्व मंत्री संगत सिंह गिलजियां भी मौके पर पहुँचे। पुलिस का कहना है कि शुक्रवार की रात कुछ अनजान लोगों ने ये चीजें यहाँ छोड़ी हैं और गायों की चमड़ी वो अपने साथ ले गए।

पुलिस ने घटना की सूचना मिलने के बाद वहाँ पहुँच कर जाँच शुरू की। IPC की धारा-295A (शांति भंग करने के उद्देश्य से किसी धर्म का अपमान) के साथ-साथ ‘पशुओं के प्रति क्रूरता रोकथाम अधिनियम’ के तहत भी FIR दर्ज की। स्थानीय लोगों ने इसे सोची-समझी साजिश के तहत हुई घटना करार देते हुए दोषियों की जल्द गिरफ़्तारी की माँग की। पूरे पंजाब में विरोध प्रदर्शन की चेतावनी दी गई। स्थानीय DSP का कहना है कि कहीं और से गायों के अंग यहाँ लाए गए। ‘एनिमल हसबेंडरी डिपार्टमेंट’ ने वहाँ पहुँच कर गायों के शवों की ऑटोप्सी भी की।

‘…तब मैं पत्रकार था फिर भी कश्मीर पर चुप रहा’ : द कश्मीर फाइल्स के ‘डॉक्टर महेश’ ने माँगी हिंदुओं से माफी, कहा- शर्मिंदा हूँ

द कश्मीर फाइल्स फिल्म में नजर आए कन्नड़ अभिनेता प्रकाश बेलवाड़ ने फिल्म रिलीज होने के बाद कश्मीरी पंडितों के नरसंहार पर लंबे समय तक चुप्पी साधे रखने के लिए माफी माँगी। उन्होंने एक वीडियो साझा करते हुए बताया कि 90 के दशक में एक पत्रकार होने के बावजूद उन्होंने इस मुद्दे पर चुप्पी साधी थी।

इस वीडियो में उन्होंने कहा, “मुझे ‘द कश्मीर फाइल्स’ का हिस्सा बनने का सौभाग्य मिला है। जब मुझे विवेक अग्निहोत्री द्वारा स्क्रिप्ट भेजी गई, तो मैं चौंक गया क्योंकि तब तक मेरे पास 1990 के दशक में जम्मू-कश्मीर राज्य में कश्मीरी पंडितों के साथ हुई भयावहता और पलायन की जानकारी नहीं थी।”

उन्होंने कहा, “मैं शर्मिंदगी महसूस करता हूँ, मैं खुद को दोषी भी समझता हूँ हूँ क्योंकि मैं उस समय एक पत्रकार था और समकालीन घटनाओं से जुड़े होने पर खुद पर गर्व करता था। लेकिन अब मैं देखता हूँ कि तब ऐसा नहीं था मुझे लगता है कि लंबे समय तक इस मुद्दे पर चुप रहने के लिए मेरे लिए इस समुदाय से माफी माँगना ही सही है।”

वह फिल्म निर्देशक की तारीफ करते हुए कहते हैं, “मैं इस विषय पर रिसर्च करने और कहानी को दुनिया के सामने के साहस और प्रतिबद्धता से रखने के लिए विवेक अग्निहोत्री को बधाई और आभार देता हूँ। मैं हर भारतीय से आग्रह करता हूँ कि यह फिल्म देखें ताकि पता चले कि हमारे पीठ पीछे क्या हुआ था। हमें ये कहना होगा कि न्याय उनका अधिकार हैं और वो जमीन उनकी है।” अपनी वीडियो की आखिर में उन्होंने पत्रकार साथी आरके मट्टू को धन्यवाद दिया जो कि कर्नाटक में कश्मीरी पंडितों को इंसाफ दिलाने वाले नेता रहे हैं। वह बोले कि मट्टू की अपील के बाद ही उन्होंने इस वीडियो को बनाया है। बता दें कि द कश्मीर फाइल्स में प्रकाश ने डॉ महेश का किरदार निभाया है।

‘वो राज्य को विकास के पथ पर और आगे ले जाएँगे’: दिल्ली दौरे पर PM मोदी से मिले CM योगी, शपथग्रहण में आने का न्योता भी दिया

उत्तर प्रदेश में भाजपा की ऐतिहासिक जीत के बाद प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ रविवार (13 मार्च 2022 ) दिल्ली के दौरे पर आए। यहाँ उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। इसके बाद पीएम मोदी ने ट्वीट कर उन्हें जीत की बधाई दी और अगले पाँच साल तक प्रदेश की जनता के लिए काम करने की सलाह भी दी।

प्रधानमंत्री ने सीएम योगी की तारीफ करते हुए उनके बीते पाँच साल के कार्यकाल की सराहना की और कहा कि पाँच साल तक उन्होंने लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए काम किया और मुझे पूरा विश्वास है कि वे राज्य को विकास के पथ पर आगे ले जाएँगे। सीएम योगी ने पीएम मोदी को लखनऊ में शपथग्रहण समारोह में आने का न्योता भी दिया।

वहीं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी प्रधानमंत्री के साथ मुलाकात की तस्वीरों को ट्विटर पर साझा किया। सीएम योगी ने ट्वीट किया, “विश्व के सर्वाधिक लोकप्रिय राजनेता, ‘आत्मनिर्भर भारत’ के शिल्पकार, ‘एक भारत-श्रेष्ठ भारत’ के स्वप्नदृष्टा आदरणीय प्रधानमंत्री जी से आज नई दिल्ली में स्नेहिल भेंट हुई। अपनी व्यस्ततम दिनचर्या से समय प्रदान करने व आत्मीय मार्गदर्शन करने हेतु प्रधानमंत्री जी का हृदयतल से आभार!”

इससे पहले सीएम योगी ने उपराष्ट्रपति एम वेकैंया नायडू से, भाजपा के संगठन महासचिव बीएल संतोष और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव जेपी नड्डा से भी मुलाकात की। माना जा रहा है कि इस दौरान सीएम योगी ने केंद्रीय नेताओं के साथ अपने 2.0 कार्यकाल को लेकर चर्चाएँ की। कहा जा रहा है कि सीएम योगी आदित्यनाथ दो दिनों तक दिल्ली में रुकेंगे।

गौरतलब है कि यूपी के विधानसभा चुनावों में प्रदेश की 403 सीटो पर हुए चुनाव में भाजपा ने अकेले ही 255 सीटों पर जीत हासिल की है, जबकि सहयोगी दलों ने भी 18 सीटों पर जीत दर्ज की है। इस तरह से एनडीएन ने कुल 273 सीटों पर जीत हासिल की है। ऐसा 37 साल बाद हुआ है कि प्रदेश की सत्ता में कोई मुख्यमंत्री रिपीट हुआ है। इतना ही नहीं, उन्होंने नोएडा से जुड़े हार के मिथक को भी धराशाई कर दिया। पहले कहा जाता था कि जो सीएम नोएडा जाएगा, वो दोबारा सत्ता में वापसी नहीं करेगा।

‘बुल्लीदाऊद के चमचे गए सदमें में’ : द कश्मीर फाइल्स पर बॉलीवुड की चुप्पी देख कंगना रनौत का तंज, बोलीं- 6 बजे थिएटर भरना आम बात नहीं

11 मार्च को थिएटर में रिलीज हुई द कश्मीर फाइल्स को लेकर आम जन की क्या प्रतिक्रिया है इसे आपने सोशल मीडिया पर देख ही लिया होगा। लेकिन बॉलीवुड के कलाकार या उसे जुड़े अधिकांश लोग इस पर क्या कह रहे हैं, ये शायद आप ढूँढने पर भी नहीं पाएँगे। ऐसा इसलिए क्योंकि 90 के दशक में हुए हिंदुओं के नरसंहार को बताने वाली इस फिल्म पर चुनिंदा लोगों को छोड़कर बाकी सबने चुप्पी साधी हुई है जिसके कारण एक बार फिर कंगना रनौत ने बॉलीवुड को निशाने पर लिया है और इस फिल्म की कामयाबी पर अपनी प्रतिक्रिया दी।

कंगना रनौत ने इंस्टाग्राम पर साझा की गई अपनी स्टोरी में लिखा, “कृपया द कश्मीर फाइल्स फिल्म को लेकर फिल्म इंडस्ट्री की चुप्पी पर ध्यान डालें। इस फिल्म का न सिर्फ कंटेंट बल्कि बिजनेस भी बहुत अच्छा हुआ है। अगर इस फिल्म के निवेश और लाभ की चर्चा करें तो यह एक केस स्टडी है कि यह फिल्म इतनी सफल भी है और प्रॉफिटेबल भी है। इस फिल्म ने इस भ्रम को भी तोड़ा है कि सिनेमाघरों में बड़े बजट की फिल्मों या विजुअल इफेक्ट से जुड़ी फिल्में ही पसंद की जाती हैं… मल्टीप्लेक्स में सुबह 6:00 बजे का शो भी भरा हुआ है जो कि बेहद असाधारण बात है। बुल्लीदाऊद और उनके चमचे सदमे में चले गए हैं। कोई कुछ कह नहीं रहा है, सारी दुनिया देख रही है इनको लेकिन फिर भी कुछ नहीं कह रहे हैं। उनका समय खत्म हो गया है।”

उल्लेखनीय है कि फिल्म निर्देशक विवेक अग्निहोत्री की मल्टी स्टारर फिल्म द कश्मीर फाइल्स इन दिनों लगातार सोशल मीडिया पर चर्चाओं में बनी हुई हैं। लेकिन बॉलीवुड के अक्षय कुमार, विद्युत जामवाल जैसे चुनिंदा नाम ही अपने सोशल मीडिया अकॉउंट पर इसे लेकर बात कर रहे हैं और निर्देशक की हिम्मत को सराह रहे हैं कि उन्होंने 32 साल बाद कश्मीरी पंडितों के उस दर्द को जस का तस दिखाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। इनके चुनिंदा नामों के अलावा अन्य कोई भी बॉलीवुड से जुड़ा शख्स इस पर बात करने से बच रहा है। कुछ दिन पहले तो खबर ये भी आई थी कपिल शर्मा ने इसका प्रमोशन करने से मना कर दिया। हालाँकि बाद में कपिल ने अपनी सफाई में कहा कि हर बात के दो पहलू होते हैं।

मालूम हो कि यह फिल्म 1990 के दशक में जम्मू-कश्मीर में हिंदुओं के नरसंहार और पलायन पर बनी है और 11 मार्च को सिनेमाघरों में रिलीज हुई थी। इससे पहले इस फिल्म की स्पेशल स्क्रीनिंग जम्मू और दिल्ली में हुई थी, जिसे देख दर्शक काफी भावुक हो गए। उन्होंने उस दर्द को गहराई से महसूस किया जो कभी कश्मीरी हिन्दुओं को झेलनी पड़ी थी।