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शहजाद अली के 6 दुकानों पर चला शिवराज सरकार का बुलडोजर, कार्रवाई के बाद सुराना गाँव के हिंदुओं ने हटाई मकान बेचने वाली सूचना

मध्य प्रदेश के रतलाम जिले के सुराना गाँव में हिंदू आबादी ने मुस्लिमों पर प्रताड़ित करने का आरोप लगाते हुए सामूहिक पलायन की धमकी दी। हालाँकि मामला संज्ञान में आते ही प्रशासन सक्रिय हो गई। गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने स्थानीय प्रशासन की टीम को गाँव में भेजा और रिपोर्ट ली। प्रशासन की कार्रवाई के बाद हिंदू समुदाय ने अपने घरों पर लिखी गई मकान बेचने की सूचना को मिटा दिया है।

इस मामले के संज्ञान में आने पर रतलाम के जिला कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक ने दौरा किया और सामने जो बात आई है वह सामान्य मामलों का विवाद है। गृह मंत्री के निर्देश पर बुधवार (19 जनवरी) को कलेक्टर कुमार पुरुषोत्तम और एसपी गौरव तिवारी सहित अन्य प्रशासनिक अमला सुराना गाँव पहुँचा और लोगों को समझाया।

रतलाम के कलेक्टर कुमार पुरुषोत्तम ने कहा, “रतलाम के सुराना गाँव में 2 लोगों के बीच शुरुआती झड़प के बाद (जो ज्यादा गंभीर नहीं था) एसपी और मैं वहाँ गए। अतिक्रमण के मुद्दे के खिलाफ कार्रवाई का निर्देश देते हुए अस्थायी पुलिस चौकी स्थापित कर दी गई है। किसी को पलायन करने की आवश्यकता नहीं है।”

साभार: नई दुनिया

इससे पहले हिंदुओं की शिकायत के बाद शिवराज सरकार प्रशासन ने गाँव में अतिक्रमण कर बनाए गए मकानों की नाप की और बुलडोजर चलाकर शहजाद अली द्वारा नाले पर बनाई गई छह दुकानें तोड़ दीं। इसके बाद पुलिस ने रात में गाँव में मयूर खान, शेरू उर्फ शेर अली व हैदर अली को हिरासत में लेकर इनके खिलाफ धारा 151 के तहत प्रतिबंधात्मक कार्रवाई की।

गौरतलब है कि मंगलवार को सुराना गाँव में मुस्लिमों की प्रताड़ना से तंग होकर हिंदुओं ने गाँव छोड़ने की चेतावनी दी थी। गाँव के हिंदू परिवारों ने कलेक्टर को ज्ञापन सौंपा था, जिसमें कहा गया था कि वह दुखी हैं, उनको अपनी जन्मभूमि छोड़ने को मजबूर किया जा रहा है। हिंदू परिवारों को कहना था कि दो पक्षों के बीच विवाद इतना बढ़ गया कि परेशान होकर गाँव छोड़ने की नौबत आ गई है, इसलिए सभी हिंदू परिवार सामूहिक पलायन करेंगे। यही नहीं, गाँव के कई हिंदू परिवारों ने अपने घरों के बाहर ‘मकान बिकाऊ है’ तक लिखवा दिया था।

गाँव वालों का आरोप था कि पुलिस उनकी मदद नहीं कर रही है। उल्टे उन्हीं के खिलाफ केस दर्ज किया जा रहा है। पीड़ित हिंदुओं ने आरोप लगाया कि पिछले दिनों जब विवाद हुआ तो वे इसकी शिकायत लेकर एसपी के पास गए। लेकिन, एसपी गौरव तिवारी ने उन्हें ही घर तोड़ने और उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कार्रवाई की धमकी दे दी थी। उन्होंने कहा है कि गाँव में हालात सामान्य हैं।

हिन्दुओं के खिलाफ जहर उगलने वाले वक्ता को IIT दिल्ली ने राजनीति पर बोलने के लिए बुलाया, सोशल मीडिया पर बवाल के बाद रद्द हुआ आयोजन

फेक न्यूज के लिए कुख्यात हिंदूफोबिक ट्विटर यूजर अशोक स्वैन (Ashok Swain) को IIT दिल्ली ने 23 जनवरी को प्रस्तावित अपने ऑनलाइन लिटरेचर फेस्टिवल ‘लिटराती’ में वक्ता के तौर पर आमंत्रित करने के बाद इस आयोजन को रद्द कर दिया। इसके बाद स्वैन दुखी नजर आ रहे हैं। माना जा रहा है कि लेफ्ट प्रोपेगेंडानिस्ट को स्वैन को इस आयोजन में बुलाने के बाद आईआईटी दिल्ली को सोशल मीडिया यूजर्स का भारी विरोध सहना पड़ा था।

स्वैन को आमंत्रित करने पर यूजर्स ने आईआईटी दिल्ली को जेएनयू (JNU) की तरह ‘अर्बन नक्सल हब’ बताते हुए कहा था कि सरकारी द्वारा वित्तपोषित संस्थान द्वारा ऐसे फेक न्यूज फैलाने वाले व्यक्ति को बुलाना ‘शर्मनाक’ है।

आईआईटी दिल्ली की कई सोशल मीडिया यूजर ने लताड़ लगाई थी।

अशोक स्वैन ने गुरुवार (20 जनवरी 2022) को ट्विटर पर इस आयोजन के रद्द होने के बारे में जानकारी साझा की। स्वैन ने कहा कि उन्हें आमंत्रित किए जाने के बाद हिंदू दक्षिणपंथियों ने इसके खिलाफ अभियान चलाया, जिसके कारण इस आयोजन को संस्थान ने कोविड के नाम पर रद्द कर दिया।

उन्होंने आगे कहा कि वह IIT दिल्ली से निमंत्रण पाकर हैरान थे। अपनी वार्षिक व्याख्यान श्रृंखला में IITD ने अजय गुडावर्ती, अशोक स्वैन और कवलप्रीत कौर के साथ ‘राजनीतिक रुख और पहचान’ का एक सत्र निर्धारित किया था, जो अब रद्द हो गया।

उप्साला विश्वविद्यालय में खुद को ‘Peace and Conflict Research’ का प्रोफेसर बताने वाले अशोक स्वैन फेक न्यूज फैलाने, झूठ फैलाने और हिंदुओं के प्रति घृणा के लिए कुख्यात हैं। साल 2018 में उन्होंने कहा था कि भारत सरकार राजनीतिक फायदे के लिए भारत-पाकिस्तान के बीच संघर्ष पैदा कर रही है। इस दावे को पाकिस्तानी मीडिया ने खूब हवा दी थी। इस पर स्वैन ने बड़े गर्व से कहा था कि उनका ट्वीट पाकिस्तानी मीडिया के प्राइम टाइम शो में शामिल किया जा रहा है।

इतना ही नहीं, पुलिस द्वारा फेक न्यूज बताने के बावजूद उन्होंने यह झूठ फैलाया था कि मुस्लिम युवक द्वारा जय श्रीराम नहीं कहने पर हिंदुत्ववादियों ने उसे आग के हवाले कर दिया। NASA द्वारा चुनी गई एक हिंदू किशोरी की साइबर बुलिंग करने का भी उन पर आरोप है।

नसीरुद्दीन के भाई जमीर उद्दीन शाह ने की हिंदू-मुस्लिम के बीच शांति की वकालत, भड़के इस्लामी कट्टरपंथियों ने उन्हें ट्विटर पर घेरा

हिंदुओं के खिलाफ जहर उगलने वाले बॉलीवुड एक्टर नसीरुद्दीन शाह (Nasiruddin Shah) के भाई और एक्स इंडियन आर्मी ऑफिसर जमीर उद्दीन शाह (Zameer Uddin Shah) को हिंदू-मुस्लिमों के बीच सौहार्द के लिए बातचीत की सलाह देना भारी पड़ गया है। इस सुझाव के बाद सोशल मीडिया (Social Media) पर कट्टरपंथी इस्लामिस्ट उनके खिलाफ लगातार बयानबाजी कर रहे हैं।

दरअसल, पिछले साल सेना के पूर्व अधिकारी ने इंडियन एक्सप्रेस में एक आर्टिकल लिखा था। जिसका शीर्षक था, “क्यों मोहन भगत की हिंदू-मुस्लिम संचार की अपील सही रास्ते में एक कदम है।” बस उसी लेख को लेकर अब वो कट्टरपंथियों को निशाने पर आ गए हैं। उनकी आलोचना की शुरुआत मुस्लिम स्पेसेस नाम के एक ट्विटर यूजर ने की।

इसके बाद कई अन्य इस्लामवादियों ने भी उन्हें ट्रोल करना शुरू कर दिया। पूर्व सैन्य अधिकारी को ट्रोल करते हुए ट्विटर पर इस्लामवादियों ने कहा कि उनकी यह ‘मंकी बैलेंसिंग’ की कोशिश ही उन्हें आगे ले जाएगी।

अपने आर्टिकल में जमीर उद्दीन शाह ने 4 जुलाई 2021 को गाजियाबाद में मेवाड़ संस्थान में RSS प्रमुख मोहन भागवत (Mohan Bhagwat) द्वारा मुस्लिम राष्ट्रीय मंच के ख्वाजा इफ्तिखार अहमद की पुस्तक, ‘द मीटिंग ऑफ माइंड्स-ए ब्रिजिंग इनिशिएटिव’ के विमोचन के दौरान किए गए संबोधन का जिक्र किया था। भागवत के भाषण का विश्लेषण करते हुए उन्होंने कहा था कि वो भी दोनों समुदायों के बीच शांति स्थापित करने के लिए हिंदू-मुस्लिम बातचीत के पक्षधर हैं।

इंडियन एक्सप्रेस में छपा जमीर उद्दीन का लेख

हालाँकि, जमीर उद्दीन शाह के द्वारा लिखा गया उनका ये पुराना आर्टिकल अब उनकी मुसीबतें बढ़ा रहा है। ट्विटर पर उनके ही समुदाय के लोग उनकी आलोचना कर रहे हैं। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि शायद इस्लाम में शांति और सुधार की बात करना इस्लामवादियों के लिए सच्चा मुस्लिम नहीं है।

बहरहाल उन्होंने बुधवार को मुस्लिम स्पेसेस के ट्वीट का जबाव देते हुए ट्वीट किया, “मेरा दृढ़ विश्वास है कि हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच लगातार वार्ता ही सौहार्द और प्रगति की कुंजी है। दुर्भाग्य से दोनों तरफ हार्ड लाइनर्स हैं। लेकिन ये अधिक उत्साहजनक है कि समझदार लोगों की बढ़ती जमात कट्टरता से नफरत करती है।”

इसके बाद मुस्लिम स्पेस ने जमीर उद्दीन शाह के ट्वीट का जबाव देते हुए उनके द्वारा 11 अक्टूबर, 2019 को लिखे गए दूसरे आर्टिकल का स्क्रीनशॉट शेयर किया। जिसमें अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति ने कहा था, “स्थायी शांति के लिए मुस्लिमों को अयोध्या की जमीन हिंदुओं को सौंप देनी चाहिए।”

फिर क्या था जमीर उद्दीन शाह ने अपने बयान ट्विटर पर सही ठहराया। उन्होंनें लिखा, “मेरे पास ऐसा कहने के अच्छे कारण थे। मुझे पता था कि न्यायाधीश शायद ही कभी जनता की राय के खिलाफ जाते हैं और मुझे यकीन था कि अयोध्या का फैसला क्या होगा। हम मस्जिद को फिर से हासिल नहीं करते, लेकिन हारे नहीं होते। अब हम न केवल केस हार चुके हैं बल्कि चौतरफा हार चुके हैं।”

जमीरुद्दीन शाह पर बरसे कट्टरपंथी

अपने आर्टिकल के जबाव में ज़मीर उद्दीन शाह कल से ऐसे कई कट्टरपंथी इस्लामवादियों को जवाब दे रहे हैं, जिनके मन और मस्तिष्क में लंबे वक्त से हिंदुओं के लिए नफरत भरी हुई है।

ये बड़ी ही दिलचस्प बात है कि कट्टरपंथी इस्लामी नसीरुद्दीन शाह के भाई को निशाना बना रहे हैं, क्योंकि वो उनकी चरमपंथी विचारधारा के खिलाफ हैं। लेकिन इन चरमपंथियों ने उस वक्त चुप्पी साध ली थी, जब उन्होंने 2002 के गोधरा दंगों को लेकर गुजरात की तत्कालीन नरेंद्र मोदी सरकार के बारे में झूठ बोला था।

जमीरुद्दीन शाह ने गुजरात दंगे पर बोला था झूठ

नसीरुद्दीन शाह के भाई लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत) जमीर उद्दीन शाह की आगामी पुस्तक ‘द सरकार मुसलमान’ के कुछ अंश 6 अक्टूबर 2018 में प्रकाशित किए गए थे। इसमें उन्होंने दावा किया था कि फरवरी 2002 में साबरमती एक्सप्रेस ट्रेन के नरसंहार के बाद गुजरात में दंगे भड़क उठे थे। अयोध्या से लौटने वाले तीर्थयात्रियों को जिंदा जला दिया गया था। लेकिन, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली गुजरात सरकार सेना को तत्काल परिवहन प्रदान नहीं करा पाई थी, जिससे दंगा प्रभावित राज्य में सेना की तैनाती में देरी हुई थी।

उन्होंने दावा किया था कि अगर मोदी सरकार आवश्यक साजो-सामान मुहैया कराती तो जानमाल की हानि को कम किया जा सकता था। हालाँकि, उसके बाद ऑपइंडिया ने इस बात खुलासा किया था कैसे लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) के दावे बिल्कुल निराधार और अनुचित थे।

‘उस समय माहौल बहुत खौफनाक था…’: वे घाव जो आज भी कैराना के हिंदुओं को देते हैं दर्द, जानिए कैसे योगी सरकार बनी सुरक्षा कवच

मध्य प्रदेश के रतलाम जिले का एक गाँव है- सुराना (Surana)। करीब 2200 की आबादी वाले इस गाँव में 60 फीसदी मुस्लिम हैं। अल्पसंख्यक हिंदुओं को यहाँ इस कदर प्रताड़ित किया गया कि वे अपनी घर-जमीन सबकुछ छोड़कर जाने को मजबूर हो गए। लेकिन, जैसे ही मामला संज्ञान में आया प्रशासन हरकत में आ गया। गाँव तक कलेक्टर-एसपी पहुँचे। अस्थायी पुलिस चौकी बनाने के निर्देश दिए गए। हिंदुओं को भरोसा दिलाया कि उन्हें अपना ही घर छोड़कर नहीं जाना पड़ेगा। 2016 में उत्तर प्रदेश के कैराना (Kairana) में हिंदुओं को ये भरोसा तब का प्रशासन नहीं दिला पाया था, जबकि कैराना में करीब 33 फीसदी ही मुस्लिम हैं।

ऐसे में सहज सवाल उठता है कि कैराना और सुराना में अंतर क्या है? अंतर केवल इतना है कि सुराना के हिंदुओं के सामने जब पलायन की नौबत आई तो मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार चल रही है, जबकि कैराना में जब हिंदू पलायन (Kairana Hindu exodus) को मजबूर किए गए तब उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव के नेतृत्व में समाजवादी पार्टी (SP) की सरकार चल रही थी। कैराना के हिंदुओं की इस हालत के बारे में लोगों को पता भी नहीं चलता यदि वहाँ के तत्कालीन बीजेपी सांसद हुकुम सिंह ने देश के संज्ञान में यह मामला नहीं लाया होता।

कैराना में उस समय चल क्या रहा था, यह आप वरुण सिंघल के बयान से समझ सकते हैं। वरुण उस व्यापारी विनोद सिंघल के भाई हैं, जिन्हें 16 अगस्त 2014 को कैराना में फुरकान नाम के बदमाश ने दिनदहाड़े गोलियों से भून दिया था। विनोद ने द न्यू इंडियन की प्रियंका शर्मा को बताया, “उस समय माहौल बहुत खौफनाक था। कोई भी व्यापारी अपने आप को सुरक्षित नहीं मानता था। दुकानें शाम 7 बजे बंद हो जाती थी। इतनी दहशत थी व्यापारियों में, लोगों में। उनसे रंगदारी माँगी जाने लगी तो लोग डर से छोड़-छोड़कर जाने लगे। जब यहाँ बीजेपी की सरकार 2017 में आई तो माहौल बहुत अच्छा हुआ और व्यापारी अपने आप को बहुत सुरक्षित महसूस करता है।”

योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार के दौरान कैराना में यह बदलाव तब आया जब यहाँ से निवर्तमान विधायक सपा के वह नाहिद हसन हैं जो हिन्दुओं के पलायन के मास्टरमाइंड बताए जाते हैं। आज जब उत्तर प्रदेश में फिर से विधानसभा चुनाव हो रहा है सपा ने एक बार फिर नाहिद को मैदान में उतारा है। कई आपराधिक मामलों में आरोपित नाहिद हसन को 15 जनवरी 2022 को गैंगस्टर एक्ट में गिरफ्तार किया गया था। कोर्ट से जमानत नहीं मिलने के बाद ऐसी चर्चा है कि सपा उनकी बहन इकरा को मैदान में उतार सकती है। भाई के पक्ष में डोर टू डोर कैंपेन कर रही इकरा इससे इनकार करती हैं। लेकिन आपके लिए यह जानना दिलचस्प होगा कि दिल्ली यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई करने वाली इकरा ने ब्रिटेन से उस नागरिकता संशोधन कानून (CAA) का विरोध किया था, जिसका भारतीयों से कोई सरोकार नहीं है। लंदन से इंटरनेशनल लॉ की पढ़ाई करने वाली इकरा हाल ही में देश लौटी हैं।

कैराना में पहले चरण में 10 फरवरी को मतदान होना है। बीजेपी ने यहाँ से दिवंगत हुकुम सिंह की बेटी मृगांका को मैदान में उतारा है। इस विधानसभा क्षेत्र में कुल मतदाता 318294 हैं। इनमें से करीब 1.37 लाख मुस्लिम हैं। द न्यू इंडियन की रिपोर्ट बताती है कि बीजेपी सरकार में कैराना के व्यापारी और हिंदू खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं और वे नहीं चाहते कि दोबारा गुंडई का वही दौर लौटे। वे बताते हैं कि 2017 से पहले फिरौती की माँग और हत्या आम थी। गुंडों को तत्कालीन सत्ताधारी दल सपा का संरक्षण हासिल था और प्रशासन मूकदर्शन बनी रहती थी। कई हिंदू इसका विरोध करने पर मार डाले गए। कारोबारी विजय मित्तल कहते हैं, “योगी आदित्यनाथ की सरकार बनने के बाद हिंदुओं की सुरक्षा सुनिश्चित हो पाई।”

यही वजह है कि बीते 5 साल में कैराना में वे हिंदू परिवार फिर से लौटे हैं जिन्हें पलायन को मजबूर किया गया था। ऐसे ही लोगों से 8 नवंबर 2021 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कैराना में मुलाकात की और उनका हाल जाना था। इस दौरान सीएम योगी ने बगल में बैठी एक बच्ची से पूछा था, “अब तो कोई डर नहीं है ना?” बच्ची ने सिर हिलाते हुए ‘ना’ में इसका जवाब दिया था। उस समय सीएम योगी ने मीडिया को बताया था कि जो परिवार यहाँ से गए थे, उनमें से ज्यादातर वापस आ चुके हैं। उनको भरोसा दिया गया था कि अपराध, अपराधियों के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति जारी रहेगी।

योगी सरकार की क्राइम को लेकर जीरो टॉलरेस की नीति ही वह सुरक्षा कवच है जो कैराना के हिंदुओं को भरोसा दिलाती है कि 2017 से पहले का वह दौर नहीं लौटेगा, जिसकी बात करते हुए वे आज भी सहम जाते हैं। जिनके पन्ने खोलते ही उनके घाव हरे हो जाते हैं। जो घाव मुकीम काला और फुरकान जैसे गुंडों और उनके राजनीतिक संरक्षकों ने यहॉं के हिंदुओं को दिए।

स्कूल में पढ़ना है तो ईसाई धर्म अपनाना होगा: तमिलनाडु में मिशनरी स्कूल की प्रताड़ना से तंग आकर 12वीं की छात्रा ने की आत्महत्या

तमिलनाडु के तंजावुर में सेक्रेड हार्ट हायर सेकेंडरी स्कूल, तिरुकट्टुपाली में कक्षा 12 वीं में पढ़ने वाली एम लावण्या नाम की एक छात्रा ने आत्महत्या कर लिया। दरअसल लावण्या पर स्कूल के अधिकारियों ने ईसाई धर्म में परिवर्तित होने का दवाब डाला। लावण्या ने इससे इनकार कर दिया, जिसके बाद स्कूल के अधिकारियों ने उसे प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। इस प्रताड़ना से तंग आकर छात्रा ने खुदकुशी कर लिया। बताया जा रहा है कि अधिकारियों की तरफ से उसे कहा गया कि अगर वह स्कूल में अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती है तो उसे ईसाई धर्म अपनाना होगा।

लावण्या पिछले पाँच वर्षों से सेंट माइकल गर्ल्स हॉस्टल में रह रही थीं। यह हॉस्टल उसके स्कूल के पास ही है। सरकारी सहायता प्राप्त ईसाई मिशनरी स्कूल उस पर ईसाई धर्म अपनाने का दबाव बना रहा था। हालाँकि, लावण्या अपना धर्म नहीं छोड़ने पर अड़ी थी और उसने धर्म परिवर्तन करने से इनकार कर दिया। लावण्या के विरोध से नाराज स्कूल प्रशासन ने पोंगल समारोह के लिए उनकी छुट्टी का आवेदन रद्द कर दिया। लावण्या छुट्टियों में अपने घर जाना चाहती थी, लेकिन उसे स्कूल के शौचालयों की सफाई, खाना पकाने और बर्तन धोने जैसे काम करने के लिए मजबूर किया गया। कथित तौर पर प्रताड़ना से परेशान लावण्या ने अपनी जीवन लीला समाप्त करने के लिए स्कूल के बगीचे में इस्तेमाल किए गए कीटनाशकों का सेवन कर लिया।

9 जनवरी की रात को लावण्या को बेचैनी और लगातार उल्टी होने के बाद स्थानीय क्लिनिक ले जाया गया। हॉस्टल के वार्डन ने उसके माता-पिता को बुलाया और उसे घर ले जाने के लिए कहा। इसके बाद लावण्या को तंजौर के सरकारी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में भर्ती कराया गया। उसका इलाज आईसीयू में चल रहा था और उसके लगभग 85 फीसदी फेफड़े में जहर पहुँच चुका था। बताया जा रहा है कि लावण्या ने 19 जनवरी,2022 को अस्पताल में अंतिम साँस ली।

सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है। इसमें लावण्या बेहोशी की हालत में अपने साथ हुए टॉर्चर के बारे में बताती है। मूल रूप से यह वीडियो तमिल में है, जिसका अनुवाद द कम्यून ने किया है। इसके मुताबिक वीडियो में कहा गया है, “मेरा नाम लावण्या है। उन्होंने (स्कूल) मेरे माता-पिता से मेरी उपस्थिति में पूछा था कि क्या वे मुझे ईसाई धर्म में परिवर्तित कर सकते हैं और आगे की पढ़ाई के लिए मदद कर सकते हैं। चूँकि मैंने नहीं माना, वे मुझे डाँटते रहे।” लावण्या ने इस दौरान राचेल मैरी का भी नाम लिया जिसने कथित तौर पर उसे प्रताड़ित किया था।

लावण्या के परिजन 17 जनवरी को तिरुकट्टुपल्ली पुलिस थाने के सामने जमा हो गए और स्कूल के खिलाफ कार्रवाई की माँग को लेकर प्रदर्शन किया। उन्होंने आरोप लगाया कि हॉस्टल वार्डन सगयामरी ने उसे धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया था इसलिए लावण्या ने कीटनाशकों का सेवन किया था।

घटना का संज्ञान लेते हुए, विश्व हिंदू परिषद, हिंदू मुन्नानी और राजनीतिक संगठन इंदु मक्कल काची जैसे हिंदू संगठनों ने लावण्या को न्याय दिलाने और हिंदुओं के धर्मांतरण के खिलाफ आवाज उठाई है। विहिप के प्रदेश प्रवक्ता अरुमुगा कानी ने कहा कि विश्व हिंदू परिषद तब तक चैन से नहीं बैठेगी जब तक लावण्या को न्याय नहीं मिल जाता। पहले कदम के तौर पर विहिप 19 जनवरी को तंजावुर जिला सचिव मुथुवेल के नेतृत्व में भूख हड़ताल किया। उन्होंने कहा, “हमें यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि ऐसी घटनाएँ दोबारा न हों। तब तक हम विरोध करेंगे।”

इंदु मक्कल काची के संस्थापक अर्जुन संपत ने ट्विटर पर लावण्या के निधन की सूचना दी की और स्कूल प्रशासन पर गंभीर सवाल उठाए।

गौरतलब है कि इसी तरह की घटना 2019 में त्रिपुरा में हुई थी जब ईसाई धर्म में जबरन धर्मांतरण का विरोध करने के लिए एक हॉस्टल वार्डन द्वारा बेरहमी से प्रताड़ित किए जाने के बाद एक 15 वर्षीय छात्र की मौत हो गई थी। इसके अलावा, तमिलनाडु में, मुस्लिम संगठनों द्वारा हिंदुओं के जबरन धर्मांतरण को रोकने के प्रयास में एक कार्यकर्ता की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी।

उत्तराखंड में 59 नामों का BJP ने किया ऐलान, खटीमा से लड़ेंगे CM धामी: गोवा में पर्रिकर के पुत्र को टिकट नहीं, AAP-शिवसेना ने डाले डोरे

उत्तराखंड विधानसभा चुनावों के लिए भाजपा ने गुरुवार (20 जनवरी 2022) को उम्मीदवारों की पहली सूची जारी की। इस सूची में प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के निर्वाचन क्षेत्र की घोषणा की गई है। वहीं, गोवा में जारी की गई भाजपा उम्मीदवारों की सूची में प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर के बेटे उत्पल पर्रिकर को जगह नहीं मिली है। इसके बाद आम आदमी पार्टी और शिवसेना उन्हें अपनी ओर खींचने के लिए डोरे डाल रही है।

सबसे पहले बात करते हैं उत्तराखंड की। उत्तराखंड के कुल 70 विधानसभा सीटों में 59 विधानसभा सीटों के लिए उम्मीदवारों की सूची जारी की गई है। इसमें मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी खटीमा और सतपाल महाराज चौबट्टाखाल विधानसभा सीट से चुनाव लड़ेंगे। प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक हरिद्वार से चुनाव लड़ेंगे। वहीं, चार साल तक प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे त्रिवेंद्र सिंह रावत ने टिकटों के ऐलान से पहले ही चुनाव नहीं लड़ने का ऐलान कर दिया था।

गोवा में 14 फरवरी को एक ही चरण में होने वाले मतदान के लिए भाजपा ने अपने उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर दी है। प्रदेश की कुल 40 सीटों में से 34 सीटों के लिए नामों की घोषणा की गई है। इनमें से 9 उम्मीदवार ईसाई समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। पहली सूची में छह विधायकों के टिकट कटे हैं, जबकि प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और दिवंगत भाजपा नेता मनोहर पर्रिकर के बेटे उत्पल पर्रिकर का नाम इस सूची में शामिल नहीं है। उत्पल पणजी सीट से दावेदार थे।

बता दें कि मनोहर पर्रिकर के निधन के बाद पणजी सीट पर हुए उप-चुनाव में कॉन्ग्रेस के अतनासियो मोंटेसेरेट ने जीत दर्ज की थी। बाद में वह भाजपा में शामिल हो गए थे और इस बार भी भाजपा ने उन पर विश्वास जताते हुए पणजी सीट से अपना उम्मीदवार बनाया है।

इस मुद्दे पर गोवा के चुनाव प्रभारी देवेंद्र फणनवीस ने कहा, ‘‘मनोहर पर्रिकर जी का परिवार हमारा परिवार है। उत्पल पर्रिकर से चर्चा हुई है। हमने उन्हें दो विकल्प दिए हैं। उन्होंने पहले विकल्प को खारिज कर दिया। दूसरे विकल्प पर उनसे चर्चा हो रही है। हम समझते हैं कि वह मान जाएँगे।’’

उत्पल पर्रिकर को टिकट नहीं मिलने पर आम आदमी पार्टी (आप) और शिवसेना ने राजनीति शुरू कर दी है। शिवसेना नेता संजय राउत ने कहा, “यह उत्पल पर्रिकर पर निर्भर है कि वह गोवा विधानसभा चुनाव लड़ें या नहीं। गोवा में बीजेपी को स्थापित करने में उनके परिवार का बहुत बड़ा योगदान है। अगर वह स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ते हैं तो हम उनका समर्थन करेंगे।”

उधर प्रदेश में अपनी जमीन तलाश रही आम आदमी पार्टी ने कहा उत्पल को पार्टी में शामिल होकर चुनाव लड़ने का खुला ऑफर दे दिया है। आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल ने कहा, “उत्पल जी (दिवंगत पूर्व सीएम मनोहर पर्रिकर के बेटे उत्पल पर्रिकर) का आप में शामिल होने और पार्टी की टिकट पर चुनाव लड़ने के लिए स्वागत है।”

दिल्ली दंगों में स्पेशल कोर्ट ने सुनाई पहली सजा: दिनेश यादव को 5 साल की जेल, लगाया ₹12000 का जुर्माना

देश की राजधानी दिल्ली में फरवरी 2020 में हुए हिन्दू विरोधी दंगों (Delhi riots) के मामले में स्पेशल कोर्ट (special court) ने गुरुवार 20 जनवरी, 2022 को बड़ा कदम उठाते हुए इसमें शामिल एक आरोपित दिनेश यादव (25) को 5 साल कैद की सजा सुनाई है। यादव पूर्वोत्तर दिल्ली में हुए दंगे में दोषी ठहराया गया पहला व्यक्ति है।

उसे पिछले महीने की शुरुआत में ही दिल्ली में दंगा करने और 73 साल की एक वृद्ध महिला के घर में आग लगाने के मामले में दोषी करार दिया गया था। कोर्ट ने दोषी दिनेश यादव पर 12,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया है। कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान एडवोकेट शिखा गर्ग ने दिनेश यादव की पैरवी की थी।

दिल्ली के दंगे में शामिल रहे दिनेश यादव को 8 जून 2020 को गिरफ्तार किया गया था। 3 अगस्त 2021 को उसके खिलाफ कोर्ट में आरोप तय किए गए थे। हालाँकि, उस दौरान उसने कहा था कि वो दोषी नहीं है। इसके बाद पिछले महीने 6 दिसंबर 2021 को एडिशनल सेशन जज वीरेंद्र भट ने दिनेश यादव को इस मामले में दोषी करार दिया था।

उल्लेखनीय है देश की राजधानी दिल्ली में फरवरी 2020 में नागरिकता संशोधन अधिनियम के समर्थकों और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प के बाद साम्प्रदायिक दंगे भड़क उठे थे। बड़ी संख्या में मुस्लिमों की उन्मादी भीड़ ने चुन-चुनकर हिंदुओं को निशाना बनाया, उनके घर और दुकानों पर पथराव किए थे। इसके अलावा सुनियोजित तरीके से दंगे को अंजाम देने के लिए मुस्लिमों ने अपने घरों की छतों पर तेजाब की बोतलें और दूसरे ज्वलनशील पदार्थ जमा कर रखे थे। इन दंगों में 53 लोगों की मौत हुई थी, जबकि 700 लोग बुरी तरह से घायल हुए थे।

इस मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने कोर्ट में ये साबित किया कि दिनेश यादव दंगाइयों की भीड़ में शामिल था। उसने 25 फरवरी 2020 की रात को मनोरी नाम की एक 73 वर्षीय महिला के घर में तोड़फोड़ की और आग लगाया था। मनोरी ने ये आरोप लगाया था कि करीब 150 से 200 दंगाइयों ने उनके घर पर हमला किया था। मनोरी के मुताबिक, हमले के वक्त उनका परिवार घर में नहीं था। दंगाइयों ने कई सामानों और उनकी भैंस समेत घर में लूटपाट के बाद उसमें आग लगा दी थी।

फरवरी 2020 में दिल्ली में हुए दंगे के मामले में कोर्ट ने पहली बार किसी को सजा सुनाई है। गौरतलब है कि दिल्ली में कड़कड़डूमा कोर्ट ने दिनेश यादव को आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी ठहराया था। उस पर धारा 143 (गैरकानूनी सभा का सदस्य), 147 (दंगा करने की सजा), 148 (घातक हथियारों से दंगा), 457 (घर में अतिचार), 392 (डकैती), 436 (आगजनी), 149 के तहत कार्रवाई की गई है।

गाली वाला ऑडियो और ‘छुट्टी’ पर BharatPe के को-फाउंडर: IIT-IIM से पढ़े अशनीर ग्रोवर को जानिए

यूपीआई पेमेंट ऐप (UPI Payment App) भारतपे (BharatPe) के मैनेजिंग डायरेक्टर (MD) व सह संस्थापक अशनीर ग्रोवर मार्च अंत तक स्वैच्छिक छुट्टी (voluntary leave) पर चले गए हैं। दावा किया जा रहा है कि इस निर्णय के पीछे सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा उनका वह ऑडियो क्लिप है, जिसमें वे कथित तौर पर कोटक महिंद्रा बैंक के एक कर्मचारी को गालियाँ दे रहे हैं। ग्रोवर इस क्लिप को फर्जी बता रहे हैं। लेकिन, इसके आधार पर नेटिजन्स भारतपे के कल्चर को लेकर सवाल उठा रहे थे। छुट्टी पर जाने के फैसले को भारतपे और खुद अशनीर ने कम्पनी की बेहतरी के लिए जरूरी बताया है।नेटिज़ेंस ने इसी आधार पर भारतपे कम्पनी के कल्चर पर सवाल उठाए हैं। लेकिन इसको लेकर तमाम तरह की चर्चाएँ हैं।

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) दिल्ली और भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM) अहमदाबाद से पढ़े ग्रोवर साल 2013 तक कोटक इन्वेस्टमेंट बैंकिंग के वाइस प्रेसिडेंट रहे थे। उन्होंने 30 अक्टूबर 2021 को कोटक महिंद्रा बैंक को अपनी कानूनी फर्म Regstreet से नोटिस भेजा था। इस नोटिस में उन्होंने आरोप लगाया था कि कोटक वेल्थ मैनेजमेंट ने उन्हें और उनकी पत्नी को नायका आईपीओ के लिए फाइनेंस नहीं किया। नोटिस में उन्होंने बैंक से हर्जाना भी माँगा था। हालाँकि बैंक ने उनके सभी आरोपों को ख़ारिज कर दिया था।

5 जनवरी को एक अनजान व्यक्ति ने एक ऑडियो क्लिप को ट्वीट किया था। यह ऑडियो क्लिप साउंड क्लाउड प्लेटफॉर्म पर था। यह ऑडियो बैंक के स्टाफ और 2 ग्राहकों के बीच की बातचीत थी। इस बातचीत में ग्राहक की तरफ से बैंक स्टाफ को गालियों के साथ धमकी भी दी जा रही थी। बैंक का स्टाफ उन्हें शांत करने का प्रयास करता रहा। बाद में यह ट्वीट और ऑडियो सोशल मीडिया के तमाम प्लेटफॉर्म से डिलीट कर दिया गया।

ऑडियो के वायरल होने के बाद आरोप लगाया गया कि ग्राहक की आवाज अशनीर और उनकी पत्नी माधुरी की है। साथ ही बैंक का स्टाफ़ कोटक महिंद्रा का है। अशनीर ने इसे फर्जी ऑडियो बताते हुए अपने खिलाफ पैसे की उगाही की साजिश बताया था। इस मामले का खुलासा तब हुआ जब 9 जनवरी को कोटक महिंद्रा बैंक ने अपने स्टाफ से गाली-गलौज करने वाले ग्राहकों के विरुद्ध कानूनी कार्रवाई की घोषणा की थी।

फिलहाल बोर्ड के सदस्य सुहैल समीर और भाविक कोलाडिया भारतपे का कामकाज देखेंगे। साल 2020 में जब सुहैल समीर ने CEO के तौर पर ज्वाइन किया था, तब ग्रोवर को कम्पनी की छवि बेहतर करने और विदेशों से निवेश जुटाने के लिए कहा गया था।

चौतरफा घिरने के बाद बैकफुट पर राजस्थान की कॉन्ग्रेस सरकार, किसानों की जमीन की नीलामी पर CM अशोक गहलोत ने लगाई रोक

राजस्थान के दौसा जिले के रामगढ़ पचवारा में एक किसान की जमीन की नीलामी का मामला तूल पकड़ने के बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने किसानों की जमीनों की कुर्की और नीलामी पर रोक लगाने से संबंधित निर्देश जारी किया है। प्रदेश में कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा किसानों की कर्जमाफी के किए गए वादों व दावों के विपरीत, ऋण नहीं चुकाने वाले किसानों की जमीनें बैंकों व वित्त संस्थानों द्वारा नीलाम की जा रही थी।

किसान की जमीन नीलामी का मामला सामने आने के बाद किसान संगठनों ने आंदोलन छेड़ दिया था। दौसा के किसानों ने जयपुर में सीएम आवास के बाहर प्रदर्शन कर माँग की कि राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार कृषि भूमि की नीलामी रुकवाए। इसके बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने गुरुवार (20 जनवरी 2022) को आदेश जारी कर नीलामी पर रोक लगाने का आदेश दिया।

सीएम गहलोत ने Removal of Difficulties Act के तहत किसानों की जमीनें नीलाम करने पर रोक लगाने के दिशा-निर्देश जारी किए। सीएम गहलोत ने आदेश में कहा कि किसानों के कर्ज का भुगतान नहीं करने पर बैंकों द्वारा ‘Removal of Difficulties Act’  के तहत पूरे प्रदेश में कृषि भूमि की नीलामी रोक दी जाए।

सीएम अशोक गहलोत ने ट्वीट किया कि प्रदेश में रिजर्व बैंक के नियंत्रण में आने वाले व्यवसायिक बैंकों द्वारा किसानों के लोन न चुका पाने के कारण RODA एक्ट (Removal of Difficulties Act) के तहत भूमि कुर्की व नीलामी की कार्यवाही की जा रही है। राज्य सरकार ने अधिकारियों को इसे रोकने के निर्देश दिए हैं। राजस्थान सरकार ने सहकारी बैंकों के लोन माफ किए हैं व भारत सरकार से आग्रह किया है कि व्यवसायिक बैंकों से वन टाइम सैटलमेंट कर किसानों के लोन माफ करें। राज्य सरकार भी इसमें हिस्सा वहन करने के लिए तैयार है।

उन्होंने आगे कहा, “हमारी सरकार ने पाँच एकड़ तक कृषि भूमि वाले किसानों की जमीन नीलामी पर रोक का बिल विधानसभा में पास किया था, परन्तु अभी तक राज्यपाल महोदय की अनुमति ना मिल पाने के कारण यह कानून नहीं बन सका है। मुझे दुख है कि इस काननू के ना बनने के कारण ऐसी नौबत आई है। मैं आशा करता हूँ कि इस बिल को जल्द अनुमति मिलेगी, जिससे आगे ऐसी नीलामी की नौबत नहीं आएगी।”

क्या है मामला?

गौरतलब है कि राजस्थान के दौसा जिले के रामगढ़ पचवारा में कर्ज नहीं चुका पाने के कारण एक किसान कजोड़ मीणा की जमीन को नीलाम (Land Auctioned) करने की खबर आई। बताया गया कि कर्ज में डूबे किसान की जमीन को पहले कुर्क किया गया और फिर मंगलवार (18 जनवरी 2022) को उसे नीलाम कर दिया गया। इसके बाद परिवार ने आत्महत्या की धमकी दी थी।

कजोड़ मीणा ने राजस्थान मरुधरा ग्रामीण बैंक से किसान क्रेडिट कार्ड के तहत कर्ज लिया था। वर्ष 2017 तक किसान ने सात लाख रुपए नहीं चुकाया। दुर्भाग्य से कुछ दिन बाद कजोड़ मीणा की मौत भी हो गई। इसके बाद बैंक उसके बेटे पर पैसे जमा करने के लिए दबाव बनाने लगी, लेकिन बेटे ने असमर्थता जताई। आर्थिक स्थिति कमजोर होने की वजह से और सरकार के कर्जमाफी के इंतजार में ऋण जमा नहीं हो पाया। अंत में बैंक के अधिकारियों ने जमीन को नीलाम करने का फैसला लिया।

‘कश्मीर छोड़ो-दिल्ली पहुँचो’: आतंकियों से सिख फॉर जस्टिस, बोला पन्नू- 26 जनवरी को मोदी और तिरंगा को ब्लॉक करें

खालिस्तानी संगठन ‘सिख फॉर जस्टिस (SFJ)’ के प्रमुख गुरुपतवंत सिंह पन्नू (Gurupwant Singh Pannu) ने 20 जनवरी 2022 (गुरुवार) को एक वीडियो जारी किया। इसमें उसने कथित ‘कश्मीरी स्वतंत्रता सेनानियों’ से गणतंत्र दिवस के मौके पर घाटी छोड़कर दिल्ली पहुँचने की अपील की। वीडियो में पन्नू ने देश को तोड़ने की कोशिश करने वाले अलगाववादियों और आतंकियों को ‘स्वतंत्रता सेनानी’ करार दिया है। उसका यह बयान खालिस्तान के लिए ‘अभी या कभी नहीं’ की तर्ज पर था।

प्रोपेगैंडा वीडियो की शुरुआत में बुर्का पहने हुए एक महिला दिखती है। इसमें वो कहती है, “26 जनवरी को हम कश्मीर और खालिस्तान का झंडा उठाकर मोदी और तिरंगे का रास्ता रोक देंगे। 26 जनवरी को दिल्ली पहुँचें। कश्मीर और खालिस्तान को आजाद करें।”

SFJ के वीडियो का स्क्रीनशॉट

महिला के इस स्पीच के बाद पन्नू नजर आता है। वो कहता है, “यह संदेश इंडियन आर्मी का सामना कर रहे कश्मीरी लोगों और स्वतंत्रता सेनानियों (इस्लामी आतंकियों) के लिए है। ये संदेश कश्मीर के उन लोगों के लिए है, जिन्हें भारतीय संविधान और इंडियन आर्मी फेक एनकाउंटर के जरिए मार रही है। ये फ्रीडम फाइटर्स का वक्त है। ये वक्त है कश्मीर के लोगों का। आप सब 26 जनवरी को दिल्ली पहुँचकर मोदी और तिरंगा को ब्लॉक करें। जहाँ सिख समुदाय खालिस्तान के झंडे लहरा रहा है, वहाँ आपको कश्मीर का झंडा उठाना चाहिए।”

अपने प्रोपेगैंडा वीडियो में पन्नू कहता है, “दुनिया में किसी को कोई खबर नहीं है कि आप हर दिन बारामुला, अनंतनाग और शोपियाँ में फर्जी मुठभेड़ों में मारे जा रहे हैं। लेकिन 26 जनवरी को जब आप दिल्ली पहुँचोगे तो दुनिया ये देखेगी कि कश्मीर को आजादी चाहिए। 26 जनवरी को दिल्ली पहुँचना है। सिख आजादी चाहते हैं। अभी नहीं तो कभी नहीं।” उसकी स्पीच के दौरान वीडियो में इस्लामी आतंकियों को भी दिखाया गया है।

SFJ के वीडियो का स्क्रीनशॉट

SFJ के पन्नू के बयान के बाद बुर्के वाली महिला एक बार फिर से वीडियो में दिखती है। वो कहती है, “मेरे कश्मीरी भाइयों और बहनों। सिख फॉर जस्टिस ने सही कहा है कि 26 जनवरी को कश्मीर और खालिस्तान का झंडा फहराकर हमें मोदी और तिरंगे को रोकना चाहिए। कश्मीर को आजाद कराने के लिए हमने अपना खून दिया है। अब समय आ गया है कि जब हम सिख भाई-बहनों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर पंजाब और कश्मीर को आजाद कराने के लिए कश्मीर और खालिस्तान का झंडा उठा लें और तिरंगे को उखाड़ फेंकें। ये संदेश कश्मीर के मेरे भाइयों और बहनों के लिए है। 26 जनवरी को दिल्ली पहुँचें। मुक्त कश्मीर और खालिस्तान। मोदी और तिरंगा को रोको।”

पन्नू ने ये भी कहा कि पहले भारत के संविधान के तहत सिखों की हत्याएँ की जाती थीं, लेकिन उसी संविधान की आड़ लेकर अब कश्मीर के लोगों की हत्या की जा रही है। खास बात ये कि वीडियो में पन्नू के बाईं ओर के फ्रेम में आतंकी संगठन हिजबुल मुजाहिदीन का पूर्व कमांडर आतंकी बुरहान वानी भी दिखाई देता है। बता दें कि हिजबुल के पोस्टरब्वॉय को 8 जुलाई 2016 को इंडियन आर्मी ने ढेर कर दिया था।

SFJ के वीडियो का स्क्रीनशॉट

पीएम मोदी और सेना को कोसा

खालिस्तानी आतंकी ने देश में अपराधों के लिए भारतीय सेना, संविधान और पीएम मोदी को कोसा। उसने कहा, “दिन-रात छोटे बच्चों और लड़कियों के साथ रेप किया जा रहा है। इसके लिए इंडियन आर्मी, भारतीय संविधान और मोदी जिम्मेदार हैं। अनुच्छेद 370 हटाकर आपको भारत का हिस्सा बना दिया गया। अभी आपके पास वक्त है, विश्व को संदेश देना चाहते हैं तो बारामूला, अनंतनाग और शोपियाँ में मुठभेड़ों में मत मरो। हथियार उठाकर अपनी जान मत दो। दिल्ली पहुँचो, ताकि दुनिया की हर ताकत, वर्ल्ड मीडिया और वर्ल्ड लीडर ये देखे कि कश्मीर आजादी चाहता है। अभी नहीं तो कभी नहीं। खालिस्तान के झंडे के साथ कश्मीर का झंडा उठाएँ।”

इसके साथ ही एसएफजे ने एक पत्र भी रिलीज किया है, जिसमें उसने आतंकियों और अलगाववादियों से दिल्ली पहुँचने की अपील की है। इसमें बुर्के में नजर आने वाली महिला को पीओके के मुजफ्फराबाद की एक महिला कार्यकर्ता बताया गया है। लेटर में लिखा गया है, “मुजफ्फराबाद स्थित एक महिला कार्यकर्ता के साथ अलगाववादी समूह सिख फॉर जस्टिस (एसएफजे) ने #खालिस्तान2कश्मीर स्वतंत्रता आंदोलन का अंतरराष्ट्रीयकरण करने के लिए कश्मीर के स्वतंत्रता सेनानियों को भारत के गणतंत्र दिवस पर 26 जनवरी को ‘घाटी छोड़ो, दिल्ली पहुँचो’ अभियान के तहत ‘मोदी-तिरंगा को ब्लॉक’ करने का आह्वान किया।”

SFJ के द्वारा जारी पत्र

पत्र में एसएफजे के काउंसल जनरल पन्नू ने बुर्के वाली महिला के साथ मिलकर कश्मीर में स्वतंत्रता संग्राम छेड़ने का आह्वान किया और कहा कि अनुच्छेद 370 को समाप्त करने और खालिस्तान जनमत संग्रह में मतदान के साथ #खालिस्तान2कश्मीर आंदोलन ‘अभी या कभी नहीं’ के चरण में प्रवेश कर गया है। इसके लिए उसने 26 जनवरी को इंडिया गेट और लाल किले पर कश्मीर-खालिस्तान के झंडे लगाने का आह्वान किया है।

‘अभी नहीं तो कभी नहीं’ पाकिस्तान की ISI का खालिस्तान के लिए प्रोपेगैंडा

गौरतलब है कि पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर हाल ही में खुफिया विभाग ने चौकन्ना किया था कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) पंजाब में अशांति फैलाकर चुनाव प्रक्रिया को बाधित करना चाहती है। इसके लिए उसने अपने आतंकी संगठनों को सक्रिय कर दिया है। दरअसल, आईएसआई सोचती है कि मौजूदा पंजाब का विधानसभा चुनाव खालिस्तान चरमपंथ के उभार के लिए ‘अभी नहीं तो कभी नहीं’ के जैसा है। ISI ने न केवल पंजाब, बल्कि उत्तर प्रदेश में भी अपने आतंकी मॉड्यूल के जरिए पंजाब में खालिस्तानी फुटप्रिंट्स को आगे बढ़ा रहा है।

यहीं नहीं, 17 जनवरी 2022 को तो खालिस्तानी आतंकी संगठन ने सुप्रीम कोर्ट में उसके खिलाफ मामला दर्ज कराने की कोशिश करने वाले वकीलों को भी परिणाम भुगतने की धमकी दी थी। टेरर ऑर्गनाइजेशन के धमकी दी थी कि वो गणतंत्र दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तिरंगा नहीं फहराने देगा। इससे पहले पंजाब में पीएम मोदी के काफिले को रोकने की जिम्मेदारी भी एसएफजे ने ही ली थी। इसी तरह से पिछले साल 13 जनवरी 2021 को एसएफजे ने लाल किले पर खालिस्तानी झंडा फहराने वाले को 1.8 करोड़ रुपए का ईनाम देने का ऐलान किया था। इसके बाद 26 जनवरी 2021 को कथित किसान प्रदर्शनकारियों ने सिखों के पवित्र चिन्ह के साथ दो झंडे फहराए।