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चाइनीज माँझे से उज्जैन में छात्रा की मौत के बाद MP पुलिस ने चलाया अब्दुल वहाब के घर पर JCB: फैक्ट चेक

मध्य प्रदेश के उज्जैन में शनिवार (15 जनवरी 2022) को दोपहिया वाहन से जा रही एक छात्रा के गले में चाइनीज माँझा फँस गया, जिससे उसका गला बुरी तरह कट गया। राहगीर उसे समीप स्थित निजी अस्पताल लेकर पहुँचे। हालाँकि, खून अधिक बहने से छात्रा की मौत हो गई। इस घटना के बाद हुई कार्रवाई को सोशल मीडिया पर सांप्रदायिक बताया जा रहा है।

सोशल मीडिया पर किया जाने वाला दावा

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे पोस्ट में अहमद खबीर ने दावा किया कि माँझे से एक छात्रा की मौत के बाद पुलिस और नगर निगम की टीम ने माँझा बेचने वाले दुकानदार “अब्दुल वहाब” के घर पर JCB चलवा दी। इसके साथ ही उसने शिवराज सरकार के इंसाफ पर भी निशाना साधा। 

वहीं रेडियो मिर्ची’ की RJ सायमा ने भी इसे सरकार की सांप्रदायिक कार्रवाई करार दी। उनका कहना था कि इस कार्रवाई को वैध तरीके से अंजाम नहीं दिया गया। हालाँकि बाद में RJ सायमा ने यह कहते हुए अपना ट्वीट डिलीट कर दिया कि यह कार्रवाई तीन अलग-अलग धर्म के दुकानदारों पर हुई। इसलिए इसे सांप्रदायिक नहीं कहा जा सकता। हालाँकि, उनका कहना था कि संपत्ति के नष्ट किए जाने को जस्टिफाय नहीं किया जा सकता।

वहीं स्वतंत्र पत्रकार अशरफ हुसैन ने इस कार्रवाई को साझा करते हुए लिखा, “मध्य प्रदेश के उज्जैन में चाइनीज माँझे से एक छात्रा की मौत के बाद पुलिस और नगर निगम की टीम ने माँझा बेचने वाले दुकानदार “अब्दुल वहाब” के घर को अतिक्रमित बताते हुए उस पर JCB चलवा दी। मेरा सवाल ये है कि आखिर चाइना से ये माँझे आते कैसे हैं? और उन व्यापारियों पर कार्रवाई क्यों नही…”

पत्रकार वसीम अकरम त्यागी ने भी इसे सांप्रदायिक करार देते हुए लिखा, “मध्य प्रदेश के उज्जैन मे मकर सक्रांति के त्यौहार पर होने वाली पतंगबाजी मे चाइनीज माँझे की चपेट में आने से युवती की जान चली गई। इसके बाद मध्य प्रदेश पुलिस ने कार्रवाई के नाम पर पतंग बेचने वाले मुस्लिम दुकानदार के घर को ढहा दिया। लेकिन माँझा बनाने वालो पर कोई एक्शन?”

सच क्या है?

चाइनीज माँझा से छात्रा की मौत के बाद रविवार (16 दिसंबर, 2022) को पुलिस-प्रशासन ने शहर में तीन बड़ी कार्रवाई की। प्रतिबंधित चाइना डोर बेचने वाले तीन दुकानदारों के घर और एक दुकान को भी तोड़ा गया। इस दौरान भारी पुलिस बल मौजूद रहा। नगर पुलिस अधीक्षक पल्लवी शुक्ला ने बताया कि महाकाल पुलिस ने अब्दुल जब्बार निवासी उपकेश्वर चौक, टोपखाना के चुलबुल पतंग सेंटर से चाइना डोर की 26 चक्रियाँ जब्त की गई हैं। रविवार को नगर निगम की टीम ने उनके तीन मंजिला मकान और दुकान के अवैध निर्माण को तोड़ा। कार्रवाई के दौरान अब्दुल के परिजनों और निवासियों ने इसका विरोध किया। फिर भी कार्रवाई नहीं रुकी।

दूसरी कार्रवाई विजय भावसार के घर पर हुई। शास्त्री नगर स्थित गली नंबर दो में रहने वाले विजय भावसार घर के बाहर किराना दुकान चलाते हैं। नीलगंगा पुलिस ने उसकी दुकान से चाइना डोर की नौ चक्रियाँ जब्त की थीं। विजय ने नगर निगम की अनुमति के बिना घर के बाहर अवैध रूप से दुकान बना ली थी। निगम की टीम ने जेसीबी से निर्माण को धराशायी किया।

इसी तरह इंदौर गेट स्थित मजहर अली का बड़ा निवासी ऋतिक जाधव के पास से महाकाल पुलिस ने चाइना डोर की 50 चक्रियाँ जब्त की थीं। रविवार को उनके कच्चे मकान को भी तोड़ दिया गया। कार्रवाई के दौरान परिजन गुहार लगाते रहे, हालाँकि किसी अधिकारी ने उनकी नहीं सुनी।

गला कटने से मौत

बता दें कि शनिवार को 11वीं की छात्रा नेहा अंजना फ्रीगंज के जीरो प्वाइंट ब्रिज से दोपहिया वाहन से गुजरते समय चाइना डोर की चपेट में आ गई। डोर से गला काटने से उसकी मौत हो गई। इसके बाद प्रशासन और पुलिस ने कार्रवाई शुरू कर दी। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी कार्रवाई के निर्देश दिए थे।

75 साल की बुजुर्ग से पहले 14 साल की लड़की की भी हत्या कर चुके थे माँ-बेटे रफीका और शफीक, रेप को छिपाना था मकसद

केरल के तिरुवनंतपुरम में 75 वर्षीया महिला शांता कुमारी की हत्या में गिरफ्तार रफीका, उसका बेटा और रफीका के दोस्त ने इससे पहले एक नाबालिग लड़की की हत्या करने का भी खुलासा किया है।विझिंजम (Vizhinjam) पुलिस द्वारा गिरफ्तार 50 वर्षीय रफीका बीवी और 23 वर्षीय उसका बेटा शफीक ने बताया कि दिसम्बर 2020 में दोनों ने बेटे द्वारा रेप की वारदात को छिपाने के लिए 14 साल की नाबालिग लड़की की हत्या कर दी थी। लड़की का यौन शोषण करने के बाद शफ़ीक़ को डर था कि वो उसकी पोल न खोल देगी। इसके बाद अम्मी-बेटे ने मिलकर हत्या कर दी।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुलिस पूछताछ में आरोपितों ने बताया कि पीड़ित लड़की केरल के Muttakkadu की रहने वाली थी। 13 दिसम्बर 2020 को वह अपने घर पर गंभीर हालत में मिली थी। अस्पताल ले जाते समय उसने दम तोड़ दिया था। घटना के दिन आरोपित शफीक ने पीड़िता के साथ दुष्कर्म किया था। उन्हें डर था कि पीड़िता कहीं उनकी हरकत अपने परिवार में बता न दे। हत्या करने के लिए सिर पर हथौड़े से वार किया गया था। किसी को शक न हो इसके लिए रफ़ीका घायल पीड़िता के साथ एबुलेंस में अस्पताल तक भी गई।

मृत लड़की को उनके माता पिता ने गोद लिया था। एक रिपोर्ट के मुताबिक, केरल पुलिस ने उसके माता-पिता को ही आरोपित मानते हुए उन्हें अपनी ही बेटी की हत्या करने का गुनाह कबूल करने का दबाव बनाया था। मृतका के दत्तक पिता आनंदन ने बताया, “पुलिस ने मुझ से अपनी ही बेटी को मार डालने का गुनाह कबूल करवाने के लिए बेरहमी से पीटा, पैरों के तलवों पर खूब मारा, घंटों की प्रताड़ना में मुझे थाने में नंगा तक किया गया था।”

मृत बच्ची को उनके माता जिन्हें केरल पुलिस ने प्रताड़ित किया था

गौरतलब है कि नए घटनाक्रम में आरोपितों ने शांता कुमारी की हत्या उनके गहने लूटने के लिए की थी। हत्या के लिए इस बार भी सिर पर हथौड़ा मारा गया था। घर छोड़ कर भागने के दौरान पुलिस ने इन सभी की मोबाइल लोकेशन ट्रेस की थी। आखिरकार 50 वर्षीय रफीका बीवी, उसका 23 वर्षीय बेटा शफीक और रफीका का 26 वर्षीय दोस्त अल आमीन कोझिकोड जाने वाली एक निजी बस से गिरफ्तार किए गए थे।

जीनत से शादी कर बुरा फँसा सचिन शर्मा, लड़की के मुस्लिम परिजनों के दबाव में इस्लाम कबूलने को विवश

उत्तर प्रदेश में बरेली के कैंट थाना क्षेत्र में रहने वाले सचिन शर्मा (Sachin Sharma) अपने ही गाँव की एक मुस्लिम युवती से शादी करके बुरा फँस गए हैं। सचिन अब अपने ससुरालियों के दबाव और प्रताड़ना से तंग आकर धर्म परिवर्तन (Religious conversion) करके मुस्लिम बनने को भी तैयार हो गए हैं। एक वायरल ऑडियो में सचिन जीनत की माँ से कह रहा है कि उसे धर्म परिवर्तन करने से कोई परेशानी नहीं है। अब तो उसके परिजन भी उसके खिलाफ हो गए हैं। धर्म परिवर्तन के बाद तो वैसे भी वह अपने घर में नहीं रह पाएगा।

जानकारी के मुताबिक, बरेली कैंट इलाके में रहने वाले सचिन का जीनत के साथ काफी समय से प्रेम प्रसंग चल रहा था। दोनों ने बीते दिनों (3-4दिन पहले) घर से भाग कर मंदिर में शादी कर ली थी। सचिन से शादी करने के बाद जीनत ने अपना नाम बदलकर ज्योति रख लिया था। इस बात की जानकारी जब जीनत के परिवार वालों को हुई तो उन्होंने उसे नाबालिग बताते हुए सचिन पर मुकदमा दर्ज करा दिया था। वहीं, युवती ने अपने परिजनों से जान का खतरा जताते हुए पुलिस से सुरक्षा की गुहार लगाई थी। वह अपना आधार कार्ड लेकर थाने पहुँची और पुलिस को बताया कि वह बालिग है।

बताया जा रहा है कि जीनत के घरवाले सचिन पर धर्म परिवर्तन कर मुसलमान बनने और जीनत से निकाह कर उसके साथ रहने का दबाव बना रहे थे। इस बात का ऑडियो भी वायरल हो रहा है, जिसमें एक महिला जीनत को बेटी बोलते हुए सचिन से कह रही है कि वह धर्म परिवर्तन कर मुसलमान बन जाए। उसके परिवार वाले मुसलमान बनाने के बाद उन्हें साथ रखने को तैयार हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, वीडियो में सचिन कह रहा है कि उसे धर्म परिवर्तन में कोई परेशानी नहीं है, लेकिन उसे इस्लाम के बारे में जानकारी नहीं है। इस पर लड़की के परिजन कहते हैं कि वो धीरे-धीरे हो जाएगी। मुसलमान बनने के लिए उसे वो करना होगा, जो वे बोलेंगे। अगर नहीं माने तो जेल जाने के लिए तैयार हो जाओ। ये सब सुनने के बाद सचिन धर्म परिवर्तन को तैयार हो गया। महिला ने कहा है कि सचिन के धर्म परिवर्तन कर निकाह करने के बाद वह मुकदमे में राजीनामा बनाकर केस वापस लें लेंगे।

बता दें कि जीनत और सचिन की शादी का एक वीडियो सामने आया था, जिसमें लड़की दुल्हन के रूप में दिखाई दे रही है। उसने खुद को नबीनगर की बताया है। जीनत के माथे पर बिंदी भी लगी है। पीछे भगवान विष्णु की तस्वीर दिखाई दे रही है। जीनत की माँ ने सचिन के खिलाफ अपनी बेटी को बहला-फुसलाकर ले जाने की शिकायत की थी। यह शिकायत बरेली के कैंट थाने में दी गई थी। मामला दो सम्प्रदायों का था, इसलिए पुलिस ने तुरंत केस दर्ज कर जाँच शुरू कर दी थी।

मायावती के समय 4000 दंगे और झड़प, अखिलेश यादव बने CM तो 16% बढ़ा अपराध: सपा-बसपा का यूपी, जिसमें ‘लड़कों’ से होती थी ‘गलती’

उत्तर प्रदेश में योगी सरकार के आने के बाद राज्य में नामी बदमाशों को घर से निकाल निकाल कर उनके अंजाम तक पहुँचाने वाली योगी सरकार इस समय विरोधी पार्टियों के निशाने पर है। लगातार सवाल उठाया जा रहा है कि आखिर योगी सरकार ने बीते 5 सालों में किया ही क्या है। जनसभाओं में दावे हो रहे हैं कि वर्तमान की योगी सरकार ने प्रदेश की कानून व्यवस्था को बदहाल कर दिया और यदि दोबारा राज्य में सुशासन चाहिए तो अखिलेश ‘बबुआ’ या मायवती ‘बुआ’ को चुनकर लाना होगा।

अब उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था बदहाल हुई है या बहाल- ये ऑपइंडिया आपको अपनी पिछली रिपोर्ट में बता ही चुका है। आज हम इस रिपोर्ट में आपको बताने जा रहे हैं 2017 से पहले का उत्तरप्रदेश…। जिसे लेकर मायावती कहती हैं कि उनकी सरकार रहते कभी कोई दंगा हुआ ही नहीं और अखिलेश कहते हैं कि उनकी सरकार में राज्य की सबसे बेहतरीन कानून व्यवस्था थी।

इन दोनों नेताओं की कही बातों में कितनी सच्चाई है, इसके लिए जरूरी है कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं को याद किया जाए ताकि पता चले कि आज सालों बाद जो बातें कही जा रही हैं क्या उनका क्या औचित्य है!

मायावती के कार्यकाल में हिंसा की घटनाएँ

पहले बात मायावती से शुरू करते हैं। 13 मार्च 2007 को मायावती ने यूपी की मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली थी और उनका कार्यकाल 6 मार्च 2012 तक चला था। जहाँ मायावती कहती हैं कि उनके कार्यकाल में दंगे हुए ही नहीं वहीं NCRB के आँकड़े बताते हैं कि इस दौरान हिंसा की हजारों घटनाएँ हुई थीं। तमाम झड़पों से लेकर राजनीतिक हिंसा के मामले मायावती के कार्यकाल पर वो धब्बा है जिन्हें वो चाहकर भी नहीं धो सकती। रिपोर्ट्स दावा करती हैं कि मायावती के कार्यकाल में केवल दंगों और झड़पों की 4000 से ज्यादा घटनाएँ सालाना हुई थीं।

इनमें जो प्रमुख घटनाएँ थी जिनका जिक्र आज भी मीडिया में पढ़ने को मिलता है उनमें साल 2007 का वो दंगा शामिल है जिसकी शुरुआत एक ट्रक दुर्घटना से हुई थी। उस समय कुछ मुसलमान ट्रक टकराने से मारे गए थे। लेकिन मुस्लिम समुदाय के अन्य लोगों ने अपना गुस्सा उतारने के लिए इतना हाहाकार मचाया कि ताजमहल के अंदर पर्यटकों को बंद करना पड़ा था और इलाके में कर्फ्यू लग गया था। फिर, साल 2008 में गोरखपुर में तत्कालीन भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ के काफिले पर आजमगढ़ से उपद्रवियों ने हमला किया था। इस घटना ने हिंसा को तूल दिया था और घटना में एक की मौत व कई घायल हुए थे। 

साल 2010 में ईद ए मिलाद के जुलूस में बरेली में हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच दंगा हुआ था। 2 मार्च को शुरू हुई हिंसा ने कई इलाकों में अपना असर दिखाया और दोनों समुदाय के लोग एक दूसरे पर डंडे चलाते व पत्थर फेंकते दिखे थे। इस दौरान दुकानें जलीं थीं। लोगों के घर टूटे थीं। स्थिति को काबू करने के लिए 2010 में भी कर्फ्यू लगाया गया था। साल 2011 में भूमि अधिग्रहण का विरोध करते हुए ज्यादा मुआवाजे की माँग करने वाले किसानों की पुलिस अधिकारियों से झड़प हुई थी। उस समय भी किसानों ने पत्थरों और लाठियों से पुलिस को मारा था। इस पूरी घटना में दो पुलिकर्मी और किसान की मौत हो गई थी।

अखिलेश यादव के कार्यकाल में हुआ अपराध में इजाफा

अब बात अखिलेश यादव के कार्यकाल की करते हैं। साल 2012 से 2016 तक अखिलेश यादव की सरकार थी। उनके मुताबिक ये कार्यकाल सबसे साफ सुथरा था। प्रदेश विकास की राह पर था, दंगाई कंट्रोल में थे और कानून व्यवस्था सबसे सर्वश्रेष्ठ थी। हालाँकि एनसीआरबी के आँकड़े अखिलेश के दावों से कुछ हैं। आँकड़ों की रिपोर्ट के अनुसार 2007 से 2012 में रही मायावती सरकार की तुलना में अखिलेश सरकार में क्राइम का दर 16 फीसद बढ़ा। बसपा शासन में यूपी में औसतन 5783 आपराधिक घटनाएँ हो रही थीं और अखिलेश सरकार में ये नंबर पहुँचे 6433।

दिलचस्प बात ये है कि जिस तरह आज अखिलेश यादव क्राइम के आँकड़ों को खोज-खोजकर योगी सरकार को नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं। वहीं अखिलेश यादव सपा सरकार के समय बताते थे कि ये आँकड़े इसलिए इतने आ रहे हैं क्योंकि सपा सरकार उन्हें दर्ज करती है। पहले की सरकार में ऐसा होता ही नहीं था इसलिए आँकड़े भी कम थे।

ऐसे ही दंगों की बातें करें तो बसपा सरकार में 22347 दंगे रिकॉर्ड किए गए थे लेकिन सपा सरकार में ये आँकड़े बढ़कर 25007 के लगभग हो गए। सबसे ज्यादा दंगे आगरा, गोरखपुर और आजमगढ़ में रिकॉर्ड हुए थे। इनमें से कुछ दंगों और विवादित की चर्चा हम अपनी रिपोर्ट में भी करेंगे। 

रिपोर्ट्स बताती हैं कि 2012 में अखिलेश सरकार आने के बाद यूपी 227 दंगे हुए थे। इसके बाद ये संख्या घटती-बढ़ती रहीं। 2013 में फिर प्रदेश ने मुजफ्फरनगर जैसे दंगों को झेला। लेकिन पाँच साल के कार्यकाल में कोई ये नहीं कह पाया कि अखिलेश सरकार ने दंगों को, हिंसा को, झड़पों को राज्य से खत्म कर दिया। अजीब बात ये थी कि अखिलेश कार्यकाल में हुए दंगे सिर्फ धार्मिक नहीं थे। कहीं छात्र झड़प हो रही थी और कहीं जातिगत संघर्ष। पुलिस इतनी बेबस थी कि जब वो मथुरा में अतिक्रमण हटाने के लिए गई तो पुलिस टीम पर हमला हुआ। नतीजन वहाँ एसपी और एसएचओ मारे गए। वहीं 23 पुलिसकर्मी अस्पताल में भर्ती हुए थे। बताया जाता है कि जिस रामवृक्ष यादव ने जवाहर पार्क में कब्जा किया हुआ ता उसे सपा नेताओं का संरक्षण प्राप्त था।

हाथरस मामले का इस्तेमाल आज भी योगी सरकार को घेरने के लिए किया जाता है। लेकिन शायद अखिलेश सरकार भूल गई है कि उस समय उनकी ही सत्ता थी जब बदायूं में दो नाबालिग लड़कियों का रेप के बाद मर्डर हुआ और वो पेड़ पर लटका दी गईं। इस मामले में भी आरोपित सपा सांसद के करीबी थे। मगर कार्रवाई कोई नहीं हुई। फिर बुलंदशहर में माँ-बेटी से रेप का मामला। 12 लोगों ने माँ-बेटी का रेप किया था। लेकिन उस समय न अखिलेश कानून व्यवस्था की दुआई देने आए और न ही उनके पिता मुलायम यादव जो रेप को जस्टिफाई करने के लिए कहते थे कि लड़के हैं उनसे गलती हो जाती है।

शाहजहाँ पुर में पत्रकार जगेंद्र का वो चेहरा याद करिए। उन्हें जिंदा जलाया गया था। मरते-मरते उन्होंने सपा मंत्री का नाम लिया था कि राममूर्ति वर्मा के कहने पर पुलिस ने उन्हें जला डाला। हालाँकि इस मामले में सपा नेता और जलाने वाले आरोपितों के विरुद्ध क्या कार्रवाई हुई, ये अब भी नामालूम है। इन सब घटनाओं के अलावा जो समाजवादी पार्टी आज आपके सामने कानून व्यवस्था सुधारने के लिए नए नए दावे कर रही है, उस सपा को लेकर साल 2018 में खबर आई थी कि वो सत्ता में रहते हुए 2007 में हुए  कचहरी सीरियल ब्लासट मामले के आरोपितों को छुड़ाने का प्रयास कर रही थी।

अब बात योगी आदित्यनाथ सरकार की

सपा-बसपा के कार्यकाल में मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद जैसे गुंडों का पूरे प्रदेश में खौफ हुआ करता था। आज यही गुंडे जेल की सलाखों के पीछे हैं वरना कहीं छिपकर बैठे हैं। जिस पुलिस पर सपा और बसपा सरकार में हमले होते थे उसी पुलिस के सामने अब गुंडे सामने आने से रोते हैं। आए दिन योगी सरकार के नेतृत्व में यूपी पुलिस नए मुकाम हासिल कर रही है।

यूपी पुलिस ने अकेले 2021 में विभिन्न मुठभेड़ों में 26 कुख्यात ढेर कर दिए हैं। 2020 की तुलना में पंजीकृत मुकदमों में 4.4% की कमी आई। डकैती की घटनाओं में 40%, लूट की घटनाओं में 23%, बलात्कार के मामलों में 17% और हत्या की घटनाओं में 11% की कमी आई।

अकेले 2021 में विभिन्न मुठभेड़ों में 3910 पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार किया गया। इतना ही नहीं, गैंगस्टर एक्ट के तहत भी 9933 अपराधियों को सलाखों के पीछे भेजा गया। 1012 करोड़ रुपए की संपत्ति को कबत किया गया। पूरे साढ़े 4 वर्षों की बात करें तो भाजपा सरकार में अब तक अपराधियों के 1900 करोड़ रुपए के साम्राज्य को ध्वस्त किया गया है। आलम ये है कि उत्तर प्रदेश में बदमाश खुद तख्ती लटका कर थाने में पहुँचते हैं और कहते हैं कि जेल में ले चलो।

महामंडेलश्वर यति नरसिंहानंद गिरि पर चौथी FIR, महिलाओं पर आपत्तिजनक टिप्पणी के बाद मीडिया से बदसलूकी का मामला: 14 दिन की न्यायिक हिरासत में

महिलाओं पर आपत्तिजनक टिप्पणी के मामले में शनिवार (15 जनवरी, 2022) को हरिद्वार के गिरफ्तार हुए जूना अखाड़े के महामंडलेश्वर स्वामी यति नरसिंहानंद गिरि पर एक और मुकदमा दर्ज हुआ है। यह उन पर दर्ज चौथा मामला है। यह मुकदमा नरसिंहानंद गिरी पर दिल्ली से उनके सत्याग्रह को कवर करने गई मीडिया टीम से बदसलूकी को लेकर दर्ज हुआ है। वहीं यति नरसिंहानंद गिरि को पुलिस ने हरिद्वार में आयोजित धर्म संसद मामले में मुस्लिमों के खिलाफ भड़काऊ भाषण देने के आरोप में गिरफ्तार किया है। यह इस मामले में दूसरी गिरफ्तारी है। नरसिंहानंद गिरी से पहले जितेंद्र त्यागी (पूर्व नाम वसीम रिजवी) को पुलिस ने शुक्रवार (14 जनवरी, 2022) को गिरफ्तार किया था।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, जितेंद्र नारायण त्यागी उर्फ वसीम रिजवी की गिरफ्तारी के विरोध में सत्याग्रह पर बैठे यति नरसिंहानंद का इंटरव्यू लेने के लिए दिल्ली से एक मीडिया टीम हरिद्वार गई थी। जहाँ कुछ आपत्तिजनक सवाल पूछने पर यति नरसिंहानंद मीडिया पर भड़क गए और यह आरोप लगाया जा रहा है कि उनके साथियों ने टीम को पकड़ कर उनके कैमरे आदि जब्त कर लिए। इस घटना को लेकर ही पुलिस ने मीडिया टीम के रिपोर्टर की तहरीर पर नरसिंहानंद के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया है।

एएनआई के अनुसार, हरिद्वार पुलिस ने बताया कि महिलाओं के बारे में अपमानजनक टिप्पणी करने के लिए दर्ज़ मुक़दमे में यति नरसिंहानंद की गिरफ्तारी हुई थी। हालाँकि उत्तराखंड पुलिस ने हरिद्वार की एक अदालत ने जब उन्हें पेश किया, तो उसमें हेट स्पीच के मामले का भी जिक्र था। बता दें कि कोर्ट ने नरसिंहानंद को रविवार (16 जनवरी, 2022) को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, हरिद्वार पुलिस थाने के थानाध्यक्ष रकिंदर सिंह कठैत ने बताया कि नरसिंहानंद को रोशनाबाद जेल भेजा गया है। उन्होंने बताया कि उनके खिलाफ भारतीय दंड विधान की धारा 295 (क) और 509 के तहत मामला दर्ज किया गया है।

बता दें कि यति नरसिंहानंद को हरिद्वार के गंगा तट से शनिवार रात गिरफ्तार किया गया था जहाँ वह धर्म संसद मामले में एक अन्य आरोपित जितेंद्र नारायण त्यागी (पूर्व नाम वसीम रिजवी) की गिरफ्तारी के विरोध में ‘सत्याग्रह’ कर रहे थे। उत्तराखंड पुलिस के हवाले से मीडिया रिपोर्ट में बताया गे था कि धर्म संसद मामले हेड स्पीच के कारण त्यागी की गिरफ्तारी के विरोध में यति नरसिंहानंद धरने पर बैठ गए थे, जहाँ से पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया था।

गौरतलब है कि गाजियाबाद के डासना मंदिर के महंत यति नरसिंहानंद गिरी ने 17-19 दिसंबर, 2021 तक हरिद्वार में धर्म संसद कार्यक्रम का आयोजन किया था।

बॉलीवुड को टक्कर देने के लिए एक और फिल्म का हिंदी डब लेकर आए अल्लू अर्जुन, ‘पुष्पा’ ने पार किया ₹350 Cr का आँकड़ा

‘पुष्पा: द राइज’ (Pushpa: The Rise) के सुपरहिट होने के बाद बॉलीवुड को टक्कर देने के लिए अल्लू अर्जुन (Allu Arjun) की जल्द ही एक और फिल्म हिंदी में डब करके सिनेमाघरों में रिलीज की जाएगी। अल्लू की फिल्म ‘पुष्पा’ ने बॉक्स ऑफिस कलेक्शन (Box Office Collection) के मामले में 350 करोड़ रुपए का आँकड़ा पार कर लिया है। इसमें सबसे अधिक कमाई हिंदी वर्जन में हुई है।

अल्लू अर्जुन और पूजा हेगड़े (Pooja Hegde) स्टारर फिल्म अला वैकुंठपुरमुलु (Ala Vaikunthapurramuloo) के निर्माताओं ने ‘पुष्पा: द राइज’ की बॉक्स ऑफिस पर बंपर कमाई के बाद इस फिल्म को हिंदी में डब करने का फैसला किया है। ट्रेड एनालिस्ट तरण आदर्श ने ट्विटर पर जानकारी दी है कि अला वैकुंठपुरमुलु को 26 जनवरी, 2022 को भारतीय सिनेमाघरों में रिलीज किया जाएगा।

अला वैकुंठपुरमुलु फिल्म के निर्माता अल्लू अर्जुन के पिता अल्लू अरविंद हैं। इस तेलुगू फिल्म को तेलंगाना और आंध्र प्रदेश में 12 जनवरी 2020 को सिनेमाघरों में रिलीज किया गया था, जो सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में से एक थी। इसे नेटफ्लिक्स पर तेलुगु के साथ मलयालम में भी डब करके रिलीज किया गया है। अला वैकुंठपुरमुलु का निर्देशन त्रिविक्रम श्रीनिवास (Trivikram Srinivas) ने किया है। त्रिविक्रम श्रीनिवास के डायरेक्शन में बनने वाली फिल्म में अल्लू अर्जुन और पूजा हेगड़े के अलावा तब्बू, जयराम, सुशांत, निवेथा पेथुराज, नवदीप और राहुल रामकृष्ण ने भी मुख्य भूमिका निभाई है।

महिला कॉन्ग्रेस प्रदेश अध्यक्ष-उपाध्यक्ष BJP में शामिल, भाजपा से निकाले गए हरक सिंह पर कॉन्ग्रेस में कलह: CM धामी ने बताया क्यों हुई कार्रवाई

उत्तराखंड में कॉन्ग्रेस को बड़ा झटका लगा है। नैनीताल से पूर्व विधायक और महिला कॉन्ग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष सरिता आर्य अपने बगावती सुर के बाद अब भाजपा में शामिल हो गईं हैं। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष मदन कौशिक ने उन्हें सोमवार (17 जनवरी 2022) को देहरादून में पार्टी की सदस्यता दिलवाई। इस दौरान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी मौजूद रहे। सरिता आर्य के साथ ही कॉन्ग्रेस महिला प्रदेश उपाध्यक्ष रेखा बोरा गुप्ता और वंदना गुप्ता भी भाजपा में शामिल हो गईं। वहीं सरिता आर्य को कॉन्ग्रेस पार्टी ने सभी पदों से हटाते हुए छह साल के लिए निष्कासित कर दिया है।

बीजेपी में शामिल होने के बाद सरिता आर्य ने कहा कि उन्होंने बिना किसी शर्त के बीजेपी ज्वाइन की है। उन्होंने कहा, “जहाँ सम्मान मिलेगा, मैं वहीं रहूँगी। अब से बीजेपी को मजबूत बनाने के लिए काम करूँगी। कॉन्ग्रेस ने महिला शक्ति और महिला वर्ग की उपेक्षा की है इसलिए मैं बीजेपी में शामिल हो रही हूँ।” कॉन्ग्रेस पर तीखे प्रहार करते हुए आर्य का कहना था कि कॉन्ग्रेस पार्टी में महिलाओं का सम्मान नहीं है। ‘लड़की हूँ लड़ सकती हूँ’ नारे को खोखला करार करते हुए आर्य का कहना था कि महिलाओं के विकास के लिए कॉन्ग्रेस में कोई रोडमैप नहीं है।

उन्होंने प्रियंका गाँधी के यूपी फार्मूले ‘लड़की हूँ, मैं लड़ सकती हूँ’ का जिक्र करते हुए कहा था कि उत्तराखंड में 40 नहीं तो कम से कम 20 प्रतिशत महिलाओं को टिकट मिले। महिला कॉन्ग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष होने के नाते पार्टी से जुड़ी तमाम महिलाओं के हकों की आवाज उठाना उनकी जिम्मेदारी है। लेकिन वह महिलाएँ उनसे पूछ रही हैं कि जब उनका (सरिता आर्य) ही टिकट पक्का नहीं है तो उनकी (महिलाओं) आवाज कैसे उठाएँगी।

हरक सिंह के कॉन्ग्रेस में शामिल होने के लिए हरीश रावत ने रखी ये शर्त

बता दें कि इससे पहले उत्तराखंड के कैबिनेट मंत्री डॉ हरक सिंह रावत को बीजेपी ने छह साल के लिए पार्टी से निकाल दिया था। हरक सिंह रावत के कॉन्ग्रेस में शामिल होने की खबरों के बीच बीजेपी ने उनके खिलाफ कड़ा कदम उठाते हुए उन्हें मंत्रिमंडल और बीजेपी दोनों से ही बाहर कर दिया है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का कहना था कि रावत पार्टी पर उनके परिवार के सदस्यों को टिकट देने का दबाव बना रहे थे।

हरक सिंह के कॉन्ग्रेस में शामिल होने की खबरों के बीच कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का बड़ा बयान सामने आया है। हरीश रावत ने कहा है कि अगर हरक सिंह रावत अपनी कॉन्ग्रेस छोड़ने की गलती मान लेते हैं तो हम पार्टी में उनका स्वागत करने के लिए तैयार हैं।

हरीश रावत ने कहा, “मैं इस पर कोई बयान नहीं देना चाहता। बीजेपी से निष्कासित हरक सिंह रावत अभी कॉन्ग्रेस पार्टी में शामिल नहीं हुए हैं। पार्टी कई पहलूओं पर विचार करने के बाद निर्णय लेगी। अगर वह कॉन्ग्रेस पार्टी छोड़ने की अपनी गलती स्वीकार करेंगे, तो हम उनका स्वागत करने के लिए तैयार हैं।”

2016 में कॉन्ग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए थे हरक सिंह रावत

हरक सिंह रावत 2016 में कॉन्ग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए थे। बात 18 मार्च 2016 की है। तब उत्तराखंड में हरीश रावत यानी कॉन्ग्रेस की सरकार थी। उत्तराखंड विधानसभा के अंदर नौ विधायकों ने अपनी की पार्टी से बगावत कर ली। उन नौ बागियों में हरक सिंह रावत की भूमिका काफी अहम थी। विधायकों के बगावत के चलते हरीश रावत सरकार को हटाकर राज्य में राष्ट्रपति शासन तक लगा। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचा। कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद हरीश रावत सरकार लौट तो आई तो लेकिन ज्यादा दिन तक नहीं चल पाई। हरक सिंह समेत सभी बागियों ने भाजपा ज्वॉइन कर ली। ऐसा लगता है कि हरीश रावत हरक सिंह के नेतृत्व वाले झुंड के विद्रोह को नहीं भूले हैं।

संत रविदास जयंती.. एक तिहाई जनसंख्या.. वाराणसी में समाधि का दर्शन… इस वजह से पंजाब में बदली गई मतदान की तारीख़

चुनाव आयोग ने संत रविदास की जयंती की वजह से पंजाब में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान की तारीख़ को आगे बढ़ा दिया है। कई दलों ने इस सम्बन्ध में माँग की थी। पंजाब में अब 14 फरवरी, 2022 (सोमवार) की जगह 20 फरवरी, 2022 (रविवार) को मतदान होगा। राजनीतिक दलों का कहना था कि ‘रविदास जयंती’ होने के कारण मतदान की तारीख़ को आगे बढ़ा दिया जाए। पंजाब में एक ही चरण में विधानसभा का चुनाव होना है। उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में 14 फरवरी को ही मतदान होना है।

पंजाब में बदली मतदान की तारीख़, EC ने जारी की सूचना

चुनाव आयोग ने सोमवार (17 जनवरी, 2022) को इस सम्बन्ध में एक बैठक के बाद इस फैसले के बारे में बताया। मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के अलावा भाजपा और कैप्टन अमरिंदर सिंह की ‘पंजाब लोक कॉन्ग्रेस पार्टी’ के पत्र पर विचार-विमर्श किया गया। ‘रविदास जयंती’ 16 फरवरी, 2022 को है। मायावती की बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने भी यही माँग की थी। ऐसे में राज्य का एक बड़ा वर्ग उस दिन वाराणसी की यात्रा करता है। इसीलिए, दलील दी जा रही थी कि उस दिन मतदान होने से ये लोग अपने मताधिकार के प्रयोग से वंचित रह सकते हैं।

राज्य में रविदासिया और रामदासी सिखों सहित अनुसूचित जाति की जनसंख्या एक तिहाई के करीब है और कहा जाता है कि वो सभी संत रविदास में अपनी श्रद्धा रखते हैं। वाराणसी में ही उनकी समाधि है, इसीलिए ये हर जयंती पर वहाँ दर्शन करने जाते हैं। ऐसे में मतदान के दिन लोग वहाँ के लिए निकल सकते थे, इसीलिए तारीख़ बढ़ा दी गई। अब जयंती के 4 दिन बाद मतदान होगा। पाँचों राज्यों के लिए मतगणना 10 मार्च को होगी। इससे पहले स्थानीय त्योहारों के कारण मिजोरम और झारखंड में भी मतदान की तारीखें बदली जा चुकी हैं।

‘विदेशी भाषा थोपना बंद हो’: PFI और कॉन्ग्रेस ने संस्कृत विश्वविद्यालय को बताया ‘बेकार’, खुद खुलवा रही थी ‘उर्दू यूनिवर्सिटी’

कर्नाटक में संस्कृत विश्वविद्यालय खोलने का कॉन्ग्रेस पार्टी विरोध कर रही है। पार्टी के नेता नटराज गौड़ा ने संस्कृत यूनिवर्सिटी को ‘बेकार’ तक बता दिया। मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई के नेतृत्व वाली राज्य की भाजपा सरकार ने संस्कृत विश्वविद्यालय के लिए 320 करोड़ रुपए का फंड जारी किया है। इसके लिए राज्य सरकार ने 100 एकड़ जमीन की व्यवस्था भी की है। हालाँकि, कई कट्टर कन्नड़ संगठन इसका विरोध कर रहे हैं और कॉन्ग्रेस पार्टी उनका साथ दे रही है।

इसके अलावा कट्टरवादी संगठन ‘पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI)’ ने भी इस कदम का विरोध किया है। कन्नड़ संगठनों ने संस्कृत को एक विदेशी भाषा तक बता दिया। कर्नाटक कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता नटराज गौड़ा ने राज्य सरकार के इस फैसले का विरोध करते हुए कहा कि राज्य को इसकी ज़रूरत ही नहीं है। उन्होंने इसे ‘बेकार’ बताते हुए कहा कि कर्नाटक के बच्चों को संस्कृत पढ़ाना ‘धर्मांधता’ की साजिश का एक हिस्सा है। उन्होंने सरकार को इसके उलट पर्यटन को बढ़ावा देने की सलाह दी।

कर्नाटक के विपक्षी दलों और कट्टर क्षेत्रवादी संगठनों ने इसके बाद सोशल मीडिया पर ‘Say No To Sanskrit (संस्कृत को ‘ना’ कहो)’ ट्रेंड कराया। कॉन्ग्रेस ने दावा किया कि जब राज्य का पर्यटन क्षेत्र संघर्ष कर रहा है, सरकार इन सब में रुपए खर्च कर रही है। उन्होंने कहा कि हमें ‘स्किल यूनिवर्सिटी’ की जरूरत है, संस्कृत की नहीं। रमनगरा के मगदी में ये परिसर बन रहा है। क्षेत्रीय संगठन इसे जबरदस्ती हिंदी को थोपने की साजिश का एक हिस्सा बता रहे हैं।

PFI कर्नाटक के अध्यक्ष यासिर हसन ने कहा कि राज्य में किसी भी ‘विदेशी’ भाषा को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि हमारे पूर्वजों ने इस भूमि पर कन्नड़ को बढ़ावा दिया है। उन्होंने इसे ‘हिंदी/संस्कृत थोपना’ बताते हुए कर्नाटक के लोगों को इसके खिलाफ आने की अपील की। सोशल मीडिया पर ट्रेंड करा कर कहा गया है कि सरकार इस फैसले को वापस ले। वहीं भाजपा ने इसे राज्य सरकार के खिलाफ लोगों को भड़काने की साजिश बताया है।

ये भी जानने लायक बात है कि कर्नाटक में कॉन्ग्रेस की पिछली सरकार अलग से ‘उर्दू यूनिवर्सिटी’ बनवाना चाहती थी। लेकिन, राज्य सरकार द्वारा संचालित विश्वविद्यालयों में उर्दू में छात्रों का कम नामांकन होने के कारण भाजपा ने सत्ता में आने के बाद इस प्रस्ताव को रद्द कर दिया। कलबुर्गी में इसे स्थापित कर के कर्नाटक और हैदराबाद के छात्रों को इसमें पढ़ाने की योजना थी। बेंगलुरु यूनिवर्सिटी में उस साल उर्दू में MA के लिए 54 में से 14 सीटें भी भर पाई थीं।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने ख़ारिज की BJP विधायक नितेश राणे की जमानत याचिका, महाराष्ट्र पुलिस ने हत्या के प्रयास का दर्ज किया था मुकदमा

भारतीय जनता पार्टी (BJP) के महाराष्ट्र (Maharashtra) से विधायक नितेश राणे (MLA Nitesh Rane) को मुंबई हाईकोर्ट (Mumbai High Court) से झटका लगा है। उच्च न्यायालय ने 17 जनवरी (सोमवार) को उनकी अग्रिम जमानत याचिका ख़ारिज कर दी। याचिका की सुनवाई जस्टिस सी वी भडांग (CV Bhadang) कर रहे थे। इससे पहले दिसम्बर 2021 में सिंधुदुर्ग जिला अदालत भी नितेश राणे की अग्रिम जमानत याचिका ख़ारिज कर चुकी है।

नितेश राणे केंद्रीय मंत्री नारायण राणे (Narayan Rane) के बेटे हैं। वो सिंधुदुर्ग जिले की कंकावली सीट से विधायक हैं। उन पर 44 साल के संतोष परब नाम के व्यक्ति ने अपनी हत्या के प्रयास की FIR दर्ज करवाई है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि कंकावली में नरवदे नाका के पास बाइक से जाते समय उसे कार से टक्कर मारी गई। कार इनोवा थी जिस पर नंबर नहीं पड़ा था। जब वह जमीन गिरा तब उसे लगभग 50 मीटर तक घसीटा गया। फिर हमलवार ने सतीश सावंत नाम के एक व्यक्ति के साथ उसे जान से मारने की धमकी दी। उसे मार डालने का प्रयास किया गया और उसके सीने में छुरा घोंपा गया।”

संतोष ने बताया कि उसने हमलावरों का नाम गोत्या सावंत और नितेश राणे सुना। यह केस कंकावली (Kankavli) पुलिस स्टेशन में दर्ज हुआ था। विधायक राणे की तरफ से वकील नितिन प्रधान ने बहस की। अभियोजन पक्ष ने बताया है कि राणे जाँच में सहयोग नहीं कर रहे हैं। उनके खिलाफ CCTV फुटेज, मोबाइल लोकेशन और अन्य चश्मदीदों के पर्याप्त प्रमाण मौजूद हैं।

यद्यपि, बचाव पक्ष के वकीलों का तर्क है कि इस मामले में विधायक नितेश राणे को साजिशन फँसाया जा रहा है। इस साजिश के पीछे उनके राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी हैं। शिकायतकर्ता किसी भी हमलावर को नहीं जानता है, इसलिए संभव है कि वो किसी के इशारे पर काम कर रहा हो।”