तमिलनाडु के हेलीकॉप्टर हादसे में सीडीएस जनरल बिपिन रावत की जान जाने के बाद सोशल मीडिया स्टोरी पर उन्हें ‘वार क्रिमिनल’ कहने वाली हाजी पब्लिक स्कूल की पूर्व निदेशक सब्बा हाजी को जमानत पर रिहा कर दिया गया। सब्बा को यह बेल सीआरपीसी की धारा 107, 108 के तहत निष्पादित बांड पर दी गई है।
जम्मू और कश्मीर में डोडा जिले के कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने सीआरपीसी की धारा 107, 108 और 151 के तहत शक्तियों का प्रयोग करते हुए इस आदेश को पारित किया।
Sabbah Haji who called Bipin Rawat 'war criminal' released on bail by Executive Magistrate
Executive Magistrate of Doda district in Jammu & Kashmir passed an order to that effect in exercise of powers under Sections 107, 108 and 151 of CrPC. https://t.co/KNg7gYEblY
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, एक अधिकारी ने बताया, “उन्हें इस शर्त पर जमानत मिली है कि वह 14 से 17 दिसंबर तक तीन दिनों के लिए डोडा के महिला पुलिस थाने में सुबह 10 बजे से दोपहर 2 बजे तक मौजूद रहेंगी और 17 दिसंबर को डोडा के कार्यकारी मजिस्ट्रेट के सामने पेश होंगी।”
— Touseef Malik #helpjkcareforyoungo (@Touseefmalik91) December 12, 2021
बता दें कि 8 दिसंबर की घटना के बाद सब्बा का ‘वार क्रिमिनल’ वाला पोस्ट सोशल मीडिया पर जमके शेयर हुआ था। ऐसे में मामले को संज्ञान में लेकर डोडा जिले के कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने उसके विरुद्ध जाँच की। कई लोगों की इस दौरान माँग थी कि उस स्कूल को भी बंद किया जाए जहाँ वह निदेशक थीं। हालाँकि स्कूल ने अपने बयान में कहा कि सब्बा के विचार संस्था के विचार नहीं हैं।
स्कूल प्रशासन ने अपनी आधिकारिक साइट पर लिखा है, “हाजी पब्लिक स्कूल का प्रशासन इस बात को स्पष्ट करना चाहता है कि घटनाक्रम को लेकर मीडिया में किया गया अवांछित पोस्ट का स्कूल से कोई लेना-देना नहीं है।” प्रशासन ने सब्बा के पोस्ट से पल्ला झाड़ते हुए कहा कि स्कूल से उनका कार्यकाल खत्म होने के बाद अब वह अपनी क्षमता पर काम करती हैं। मिस सब्बा हाजी स्कूल से किसी मायनों में नहीं जुड़ी हैं।
जब से मोदी सरकार ने न सिर्फ हिन्दू बल्कि मुस्लिम, ईसाई सहित सभी धर्मों-मजहबों की लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ाने का फैसला किया है। तब से इसका विरोध करते हुए समाजवादी पार्टी ने राजनीतिक बयानबाजी तेज कर दी है। जहाँ सपा सांसद शफीक उर रहमान बर्क ने कहा कि हम सदन में इसका विरोध करेंगे, शादी की उम्र 18 की बजाय 17 करनी चाहिए। वहीं सपा सांसद ST हसन ने कहाकि फर्टिलिटी एज के बाद शादी का क्या फायदा, लेट शादी से बच्चे पैदा होना भी मुश्किल है।
#WATCH | Girls should be married when they attain age of fertility. There is nothing wrong if a mature girl is married at 16. If she can vote at age of 18, why can't she marry?: Samajwadi Party MP ST Hasan on Govt's decision to raise legal age of marriage for women to 21 years pic.twitter.com/UZxHrMcjrh
दरअसल, शफीक उर रहमान के सुर में सुर मिलाते हुए अब समाजवादी पार्टी के एक और सांसद एसटी हसन ने भी आपत्तिजनक बयान दिया है। उन्होंने अपने बयान में कहा है, “लड़कियों की शादी की उम्र 21 नहीं 16-17 कर दी जानी चाहिए… अगर शादी में देर होगी तो बच्चे नेट देखतें है, गन्दी वीडियो (अश्लील) देखेंगे। गंदी फिल्में देखेंगे और यह आवारगी ही है। इसमें कोई फर्क नहीं है। शादी की उम्र सीमा बढ़ाने से लड़कियाँ आवारगी करेंगी।”
मैं समझता हूं कि अगर बच्ची समझदार है तो बच्ची की शादी 16 साल की उम्र में भी हो जाए तो उसमें कोई बुराई नहीं है। अगर लड़की 18 साल की उम्र में वोट दे सकती है तो शादी क्यों नहीं कर सकती है: महिलाओं की शादी की कानूनी उम्र 18 से 21 साल करने के प्रस्ताव पर एस.टी. हसन, समाजवादी पार्टी pic.twitter.com/76j1uT5wIj
एसटी हसन ने आगे यह भी कहा, “शादी जल्दी होगी तो वो बच्चे जल्दी पैदा कर पाएँगी, क्योंकि फर्टिलिटी की उम्र 15 से 30 साल होती है। ऐसे में शादी की उम्र में देरी नहीं होनी चाहिए। मैं समझता हूँ कि अगर बच्ची समझदार है तो बच्ची की शादी 16 साल की उम्र में भी हो जाए तो उसमें कोई बुराई नहीं है। अगर लड़की 18 साल की उम्र में वोट दे सकती है तो शादी क्यों नहीं कर सकती है।”
वहीं शफीक उर रहमान वर्क के बयान पर कई नेताओं ने आपत्ति जताई है। एटा में राज्यसभा सांसद हरनाथ सिंह यादव ने कहा, “यह गुलामी करवाने वाले लोगों की मानसिकता है, जो हमेशा लड़कियों को गुलाम बनाए रखना चाहते हैं। मोदी सरकार संविधान के साथ से सबको बराबरी का अधिकार दे रही है।”
गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2020 को लाल किले की प्राचीर से अपने स्वतंत्रता दिवस भाषण के दौरान लड़कियों की शादी की उम्र को 18 वर्ष से बढ़ाकर 21 वर्ष किए जाने संबंधी प्रस्ताव का ऐलान किया था। PM ने इसके पीछे की वजह बताते हुए कहा था, ”सरकार बेटियों और बहनों के स्वास्थ्य को लेकर हमेशा से चिंतित रही है। बेटियों को कुपोषण से बचाने के लिए, ये जरूरी है कि उनकी शादी सही उम्र में हो।”
बता दें कि अभी भारत में महिलाओं की शादी की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष और पुरुषों की 21 वर्ष है। कानून में बदलाव के बाद अब महिला और पुरुष दोनों के लिए शादी की न्यूनतम उम्र 21 वर्ष हो जाएगी।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गुरुवार (16 दिसंबर 2021) को विपक्षी दलों, खासतौर से समाजवादी पार्टी पर निशाना साधते हुए कहा कि इस देश को न साम्यवाद चाहिए, न समाजवाद चाहिए, इस देश को केवल रामराज्य चाहिए। कुछ ही महीनों बाद उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले विधानसभा के अंतिम सत्र को संबोधित करते हुए योगी आदित्यनाथ ने यह बात कही।
इस देश को न साम्यवाद चाहिए, इस देश को न समाजवाद चाहिए
उन्होंने आगे कहा, “रामराज्य का मतलब जो सार्वकालिक है, सार्वदेशिक है, सार्वभौमिक है और काल-परिस्थिति से प्रभावित हुए बिना शाश्वत है, वही रामराज्य है। हमने जो कहा था, सो करके दिखा दिया।” सीएम योगी ने कहा कि आचार्य रजनीश आधुनिक युग के बहुत चर्चित दार्शनिक थे और उन्होंने बहुत अच्छी बातें कही थी। सीएम योगी ने कहा, “आचार्य रजनीश ने कहा था कि समाजवाद अमीरों को गरीब बनाता है, गरीबों को गुलाम बनाता है, बुद्धिजीवियों को बेवकूफ बनाता है। केवल अपने स्वार्थ के लिए अपने नेताओं को शक्तिशाली बनाता है।”
सीएम योगी कहते हैं, “आज के युग का जो सबसे बड़ा अंधविश्वास है, वह समाजवाद है और इसके कई बहुरूपिया ब्रांड हैं। ये अच्छे काम का स्वागत नहीं कर सकते हैं। इनको ये लगता है कि किसी माफिया को गले लगाएँगे तो न जाने स्वर्ग की कितनी हुरियाँ मिल गई हों। इनके लिए माफिया ही सब कुछ हैं। ऐक्शन के माध्यम से करोड़ों हिंदुओं का कत्लेआम कराने वाला जिन्ना भारत का आदर्श कभी नहीं हो सकता है। निर्दोष लोगों का हत्यारा है वो, लेकिन अपने क्षणिक वोट बैंक के जिन्ना को महिमामंडित करना…. इससे ज्यादा शर्मनाक और कुछ भी नहीं है।”
परिवारवाद को लेकर समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव पर परोक्ष रूप से निशाना साधते हुए सीएम योगी ने देश के पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर को याद किया। सीएम योगी ने कहा, “स्वर्गीय चंद्रशेखर जी ने अपने रहते-रहते अपने पुत्रों को, अपने परिवार को कभी राजनीति में नहीं सक्रिय होने दिया था। परिवार के लिए कोई जगह नहीं थी। संतति और संपत्ति से समाजवादी को दूर रहना चाहिए।”
सीएम ने कहा, “हमने तो जनता को जनार्दन माना है। हमने तो हमेशा उसको सिर-आँखों पर बैठाया है। ये कभी हुआ कि देश का प्रधानमंत्री रात के 1:30 बजे सड़कों पर उतर कर गरीब जनता की सुविधा को देख रहा होगा। किसी ने देखा कभी इस बात को। परिवारवादी समाजवाद, माफियावादी समाजवाद, अराजकतावादी समाजवाद, दंगावादी समाजवाद, आतंकवादी समाजवाद, ये सभी जो बहुरूपिए ब्रांड हैं। प्रदेश की जनता भी इस चीज को मानने लग गई है कि समाजवाद एक रेड अलर्ट है और इस रेड अलर्ट से अब मुक्ति मिलनी ही चाहिए।”
बिहार के बक्सर जिले में 12 साल पहले गायब हुए छवि मुसहर के पाकिस्तान की जेल में होने की जानकारी मिली है। छवि के परिजनों ने उन्हें मृत मान कर उनका अंतिम संस्कार भी दिया था और पत्नी ने दूसरी शादी कर उसके बच्चों को अपने साथ लेकर चली गई। छवि के जिंदा होने की खबर सुनकर परिजन खुश हैं और उसे भारत लाने की माँग कर रहे हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, छवि चौसा नगर पंचायत के खिलाफतपुर दलित बस्ती के निवासी हैं। घर वालों ने बताया कि एक दिन छवि अचानक ही घर से गायब हो गए। तब उनकी उम्र लगभग 20 वर्ष थी। उनकी दिमागी हालत भी ठीक नहीं थी। पहले भी वो घर से कहीं जाकर वापस आ चुके थे, लेकिन अंतिम बार उसका कुछ पता नहीं चला। घर वालों को एक बार विश्वास ही नहीं हुआ कि जिन्हें वो मरा हुआ मान चुके थे वो जीवित है। वो इस बात से भी हैरान हैं कि छवि पाकिस्तान कैसे पहुँच गए। छवि की बुजुर्ग माँ वृति ने भी अपने बेटे से अपनी मृत्यु से पहले मिलने की इच्छा जताई है।
छवि के जिंदा होने और पाकिस्तान की जेल में बंद होने की बात तब सामने आई, जब विदेश मंत्रालय से थाना मुफस्सिल में पहचान के लिए कागजात आए। इसके बाद पुलिस ने छवि के घर वालों से सम्पर्क किया। मुफस्सिल थाना प्रभारी अमित कुमार के मुताबिक, युवक की पहचान के लिए आए कागज़ातों की शिनाख्त छवि के घर वालों ने कर ली है। छवि पाकिस्तान की जेल में कब से है या क्यों है, इसकी जानकारी संबंधित विभाग ही दे पाएगा। जिले के पुलिस अधीक्षक नीरज कुमार सिंह के निर्देश पर अधीनस्थ अधिकारियों ने रिपोर्ट तैयार कर मंत्रालय को भेज दी है।
माँग पत्र
छवि की रिहाई की माँग को लेकर बिहार के एक सामाजिक संगठन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी भी लिखी है। जनशक्ति नाम के संगठन ने चिट्ठी में लिखा है कि छवि मुसहर की मानसिक हालत ठीक न होने के चलते वह भटक कर पाकिस्तान चले गए। वहाँ उन्हें यातना दी जा रही है। इसलिए उन्हें वापस लाया जाए।
पिछले दिनों दिल्ली के प्रेस क्लब में एक कार्यक्रम हुआ। जामिया मिलिया इस्लामिया में 2019 की हिंसा के नाम पर STATE REPRESSION, WITCH-HUNT & RESISTANCE (सत्ता का दमन, चुन-चुन कर शिकार और प्रतिरोध) नामक चर्चा आयोजित की गई थी। इस दौरान जो कुछ हुआ उतना हास्यास्पद शायद ही हाल-फिलहाल में कहीं और हुआ हो। वहाँ शरजील इमाम को हीरो बताने वाले, उसे किसानों का मार्गदर्शक समझने वाले कई लोग मौजूद थे। बौद्धिक स्तर उनका इतना था कि बात कर रहे थे कि कोई भी व्यक्ति पीएम सिर्फ 5 साल के लिए बने, उसके बाद किसी और का नंबर आए, फिर किसी और का। दिलचस्प ये है कि इन बुद्धिजीवियों ने ये चर्चा भाजपा के केंद्र में आने से पहले कभी नहीं उठाई थी और अब ये इस बिंदु को लोकतांत्रिक माँग बताते हैं।
खैर! ये जमात 15 दिसंबर को प्रेस क्लब में इकट्ठा क्यों हुई, क्यों इन्होंने शरजील इमाम को याद किया और क्यों मोदी सरकार को इस्लोमोफोबिक जैसे शब्दों से नवाजा… इसके लिए 2 साल पहले यानी 2019 के दिसंबर महीने में जाना जरूरी है। वैसे तो मोदी सरकार से कट्टरपंथियों-वामपंथियों की दिक्कत कई साल पुरानी है, मगर 9 दिसंबर को जब नागरिकता संशोधन बिल लोकसभा ने पास किया और 11 दिसंबर 2019 को ये बिल एक कानून बना तो हर जगह इस्लामी बुद्धिजीवी बिलबिला उठा।
‘बुद्धिजीवी’ शब्द यहाँ बार-बार इसलिए इस्तेमाल किया जा रहा है क्योंकि समुदाय के सामान्य वर्ग में सीएए-एनआरसी की गलत परिभाषा डालने का काम इसी वर्ग द्वारा किया गया था। इसके बाद दिल्ली हिंदू विरोधी दंगों के रूप में फरवरी 2020 में क्या परिणाम सामने आए ये पूरे देश ने देखा। वो दिसंबर 2019 का ही माह था जब सीएए-एनआरसी के ख़िलाफ़ जामिया में सैंकड़ों की तादाद में कथित छात्र बिदके और प्रदर्शन के नाम पर उपद्रव शुरू हुआ। पुलिस ने कार्रवाई की तो उनकी वीडियो बनाकर जगह-जगह दर्शाया गया कि दिल्ली पुलिस कितनी बर्बर है जो कॉलेज परिसर में घुसकर छात्रों को पीट रही है।
इन सबके बीच जो कुछ घटनाएँ छिपाने की कोशिश हुईं उनकी एक झलक याद करिए:
13 दिसंबर 2019 से जामिया में प्रदर्शन शुरू हुआ और 15 दिसंबर 2019 को जामिया नगर में बसों को आग के हवाले करने की घटना सामने आई। आग किसने लगाई? आज इस पर कोई बात नहीं करता, मगर आप सिर्फ कल्पना करिए कि यदि इस हरकत के बाद उस दिन बस में लगे सीएनजी सिलिंडर फट जाते तो उस इलाके का हाल क्या होता…।
आग लगाने वालों ने बस में बैठे न ड्राइवर का ख्याल किया और न ही यात्रियों का। आसपास मौजूद लोग बड़ी मुश्किल से अपनी जान बचाकर वहाँ से भागे। स्थिति हाथ से निकल रही थी, उपद्रवी हर सीमा लांघ रहे थे, तभी दिल्ली पुलिस एक्शन में आई और लाठीचार्ज कर अपनी कार्रवाई शुरू की। आँसू गैस तक छोड़े गए मगर हिंसा ने थमने का नाम नहीं लिया। बड़ी मशक्कत के बाद जब चीजें थमीं तो सोशल मीडिया पर उन वीडियोज ने हक्का-बक्का कर दिया जिसमें खुलेआम छात्रों की भीड़ इस्लामी नारे लगा रही थी।
जून 2020 में इस संबंध में दिल्ली पुलिस ने हाईकोर्ट में एक हलफनामा दायर किया और स्पष्ट किया कि जामिया की हिंसा कोई मामूली घटना नहीं थी। वह सुनियोजित घटना थी, जिसमें दंगाइयों के पास पत्थर थे, लाठियाँ थी, पेट्रोल बम थे, ट्यूबलाइट थी। इतना ही नहीं पुलिस ने हिंसा की बाबत ये भी बताया कि जामिया में आँसू गोले से बचने के लिए पहले से गीले कंबलों को साथ रखा गया था। अब सोचिए कि आखिर छात्रों के ‘सामान्य’ और शांतिपूर्ण प्रदर्शन में ये सारी तैयारी क्या कहती हैं और किस ओर इशारा करती हैं।
सबसे अजीब बात जो इस हिंसा के बाद देखने को मिली वो प्रशासन का रवैया था। प्रशासन ने उपद्रवियों की लिस्ट से छात्रों को निकालने के लिए कहा कि जो लोग उस दिन हिंसा कर रहे थे वो बाहर के थे। हालाँकि, बाद में कॉलेज के भीतर की तस्वीरें सामने आईं जो बता रही थीं कि माहौल बिगाड़ने का काम अंदर से शुरू हुआ। दीवारों पर पीएम मोदी की तुलना हिटलर से की जाने वाले पोस्टर बने थे। फिर ‘जिंदा कौम 5 साल का इंतजार नहीं करती’ जैसी बाते थीं और ‘अमित शाह दुनिया छोड़ो’ जैसे स्लोगन थे।
जामिया कैंपस की दीवारों पर लिखे गए भड़काऊ नारे
17 दिसंबर को शरजील की एक वीडियो ने जगह-जगह हड़कंप मचा दिया। वीडियो में वो मुसलमानों को भड़काते हुए दिल्ली के चक्का जाम करने की बात कर रहा था और साथ ही कह रहा था मुसलमान हिंदुस्तान के 500 शहरों में चक्का जाम कर सकता है। शरजील की बातें साफ बता रही थीं कि उसने इन बातों पर कितना गहन शोध किया है कि आखिर मुसलमान क्या कर सकते हैं क्या नहीं।
इधर, शरजील इमाम जैसे लोग सीएए-एनआरसी के ख़िलाफ़ जगह-जगह जनता को भड़काने का काम कर रहे थे और दूसरी ओर शाहीन बाग का प्रोटेस्ट जोर पकड़ रहा था। शुरुआती कुछ दिनों में इस प्रदर्शन को मुस्लिम खातूनों के चेहरे पर चलाया गया। उनके प्रदर्शन से जुड़ने को उनका सशक्तिकरण कहा गया। लेकिन कुछ समय बाद इस प्रदर्शन की असली तस्वीर सामने आना शुरू हुई। वहाँ कभी खुले में हिंदुओं के विरोध में नारे लगे, तो कभी काली माँ का अपमान हुआ। कट्टरपंथियों ने स्थानीयों को तो इकट्ठा किया ही, साथ में बाहरी शहरों से भी लोग लाए जाने लगे।
दिल्ली ने उन महीनों में कितनी दिक्कतों का सामना किया ये सिर्फ दिल्ली वासी ही जानते हैं। जामिया की हिंसा में सैंकड़ों की संपत्तियों के नुकसान से दिल्ली उभरती कि इससे पहले कट्टरपंथी उत्तर-पूर्वी दिल्ली को अपना निशाना बना चुके थे। 23-24 फरवरी 2020 को दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगों की शुरुआत हुआ। इसके बाद कहीं नारा-ए-तकबीर के नारों के बीच विनोद को मारा गया तो कहीं पुलिस कॉन्सटेबल रतनलाल की हत्या की गई। ये भीड़ सामान्य नहीं थी। बड़े बड़े गुलेल लगाकर हिंदुओं के घरों पर पेट्रोल बम फेंकने की हरकत बताती है कि उस समय मंशा क्या थी। बर्बरता का यदि अंदाजा लगाना हो तो एक बार अंकित शर्मा को याद करिए। जिन्हें इस कट्टरपंथी भीड़ ने घंटों चाकुओं से गोदा और दिलबर नेगी का शव याद करिए जिसके हाथ-पाँव काटकर उसे जलती आग में फेंकने का काम हुआ।
दिसंबर 2019 से 2021
वो दिसंबर 2019 का महीना था जिसमें शुरू हुआ मुस्लिम और वामपंथियों का विरोध प्रदर्शन दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगे बनकर थमा और आज दिसंबर 2021 का महीना है जब दिल्ली की एक अदालत ने 2020 में पूर्वोत्तर दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों के मामले में 10 के खिलाफ आरोप तय किए हैं। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने माना कि इनका मुख्य मकसद हिंदू समुदाय के मन में डर और दहशत पैदा करना था। हिंदुओं को देश छोड़ने की धमकी देना और उनकी संपत्तियों को लूटना तथा जलाना था।
आरोपितों की पहचान मोहम्मद शाहनवाज, मोहम्मद शोएब, शाहरुख, राशिद, आजाद, अशरफ अली, परवेज, मोहम्मद फैजल, राशिद उर्फ मोनू और मोहम्मद ताहिर के तौर पर हुई है। इनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 147, 148, 436, 452, 454, 392, 427 और 149 के तहत आरोप तय किए गए हैं। यह गैरकानूनी जमावड़ा 25 फरवरी 2020 को हुआ था। आरोप है कि इनलोगों ने हिंसा की और हिंदुओं के घरों में लूटपाट कर उनकी संपत्तियों को आग के हवाले कर दिया।
जाहिर है वह दिसंबर एक साजिश थी हिंदुओं के खिलाफ। उस दिसंबर को हम न भूले हैं, न भूलेंगे, न भूलने देंगे।
केंद्र की मोदी सरकार ने लड़कियों की शादी की न्यूनतम आयु 18 से 21 साल किए जाने का प्रस्ताव पास किया है। इसके लिए बाल विवाह निषेध कानून, स्पेशल मैरिज एक्ट और हिंदू मैरिज एक्ट में संशोधन किया जाएगा। लेकिन, एक वर्ग को यह फैसला रास नहीं आ रहा है। इनमें समाजवादी पार्टी (SP) के सांसद शफीकुर्रहमान बर्क से लेकर मौलाना इश्तियाक कादरी जैसे लोग शामिल हैं।
अक्सर अपने विवादित बयान को लेकर सुर्खियों में रहने वाले SP नेता अबू आजमी ने तो इस फैसले को बिल्कुल गलत बताया है। उनका कहना है कि इससे लड़कियाँ गलत राह पर जा सकती हैं। इसके पीछे का तर्क देते हुए उन्होंने कहा कि जिस तरह से किसी अपने की मृत्यु के बाद हम उसका दाह-संस्कार कर देते हैं, ठीक उसी तरह लड़की के एडल्ट होने पर उसकी शादी कर देनी चाहिए। जब तक शादी के लिए सुटेबल मैच नहीं मिलता है, इंतजार करना चाहिए, लेकिन जोड़ा मिलते ही शादी कर देनी चाहिए।
उन्होंने कहा, “शादी का जोड़ा मिलने के बावजूद अगर किसी और कारणों से लेट करोगे तो उस लड़की या लड़के ने कोई गुनाह किया, किसी और के संपर्क में आकर कोई पाप किया तो वो पूरा पाप माँ-बाप के सिर पर होगा, क्योंकि उन्होंने शादी के लिए देर किया, उन्होंने इंतजार किया।” आजमी ने आगे कहा, “अगर मेरी बेटी, मेरी बहन घर में अकेले है तो मेरे संस्कार में बताया गया है कि अकेली बेटी के साथ मत रहो। शैतान कभी भी सवार हो सकता है।”
इतना ही नहीं उन्होंने यह तक कह दिया कि जो यह बदलाव ला रहे हैं, उनके लड़का-लड़की हैं ही नहीं, क्या करेंगे बेचारे। इस पर जब एंकर ने उन्हें टोका कि क्या वो प्रधानमंत्री की बात कर रहे हैं, तो उन्होंने टालमटोल करते हुए कुतर्क करने शुरू कर दिए।
यह है समाजवादी पार्टी की सोच। यह उत्तर प्रदेश की सारी महिलाओं का अपमान है।
वहीं सपा सांसद शफीकुर्रहमान बर्क ने आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए कहा कि इससे आवारगी का मौका मिलेगा। संभल से सपा सांसद बर्क ने कहा, “लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ाने से हालात बिगड़ेंगे। पहले जो 18 साल की उम्र थी वह भी काफी थी। लंबे समय से यही उम्र थी, वरना इससे ज्यादा आवारगी का मौका मिलेगा।” हालॉंकि बाद में सफाई देते हुए उन्होंने कहा कि उनके कहने का यह मतलब नहीं था। उनके बयान को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया।
#WATCH | India a poor country and everybody wants to marry off their daughter at an early age… I will not support this Bill in Parliament: Samajwadi Party MP Shafiqur Rahman Barq on Union Cabinet giving nod to raise legal age of marriage for women from 18 to 21 years pic.twitter.com/kxyXalJFpm
उन्होंने कहा, “भारत एक गरीब देश है और हर कोई चाहता है कि बेटी की शादी जल्दी से हो जाए। मैं संसद में इस विधेयक का समर्थन नहीं करूँगा। रही बात लड़की की पढ़ाई की तो वह अपनी ससुराल में भी पढ़ सकती है। बेटियाँ हम सबकी होती हैं। मेरी बेटी हो आपकी बेटी हो, बेटियों के लिए सोच अच्छी होनी चाहिए। मेरे बयान का गलत मतलब निकाला गया। मैंने कहा था कि माहौल खराब है।”
लखनऊ में एक #जिल्लेइलाही है नाम है मौलाना इश्तियाक क़ादरी पेशे से मुस्लिम धर्मगुरु है बता रहे की लड़कियों की शादी कम उम्र में ही कर देनी चाहिए। सरकार ने इसको बढ़ा कर नौजवानों की आजादी छीन ली है। pic.twitter.com/oGEHtUwyCI
— Saurabh Bhadouria ( सौरभ सिंह ) (@Bhadourialive) December 16, 2021
वहीं लखनऊ के मौलाना इश्तियाक कादरी का कहना है कि लड़कियों की शादी की उम्र 18 साल ही रहने दी जानी चाहिए। सरकार ने इस बदलाव से नौजवानों की आजादी छीन ली है। मुस्लिम संगठन जमीयत-उलेमा-ए-हिंद के सचिव गुलजार आजमी ने कहा कि वे इसे नहीं मानेंगे। इससे लड़किया गलत राह पर जाएँगी। उनके अनुसार यह बिलकुल गलत है। उनके मजहब में लड़का-लड़की 14-15 साल में ही बालिग हो जाते हैं।
प्यार में दूरी बढने से परेशान प्रेमिका ने अपने प्रेमी को मिलने के बुलाया, फिर उसके साथ सिगरेट पी और प्रेमी के गालों को चूमने के बाद उसे गोली मार दी। मामला पश्चिम बंगाल के पूर्वी बर्धमान जिले का है। सर्कस मैदान इलाके में बुधवार (15 दिसंबर) की शाम 22 साल की प्रेमिका मनीषा खातून ने अपने रिलेशनशिप का अंत इस खौफनाक अंदाज में किया, जिसकी आशा प्रेमी ने कभी सपने में भी नहीं की होगी।
मिली जानकारी के अनुसार, आरोपी मनीषा खातून बगान पाड़ा की रहने वाली है, जबकि उसका प्रेमी लालचंद शेख कटवा के केसिया माठपाड़ा का रहने वाला है। इन दोनों का लगभग चार सालों से प्रेम प्रसंग चल रहा था। इसी बीच प्रेमिका को पता चला कि उसका प्रेमी लालचंद उससे दूरी बनाने की कोशिश की कर रहा है। उसके बाद उसने लालचंद को बुलाया और घटना को अंजाम दिया।
वहीं, कुछ मीडिया रिपोर्ट में यह भी कहा जा रहा है कि दहेज की माँग पूरी नहीं होने के बाद लालचंद शेख प्रेमिका से धीरे-धीरे दूरी बनाने लगा। शादी के प्रस्ताव को बार-बार टालने पर मनीषा परेशान हो गई। इस कारण दोनों के बीच विवाद भी पैदा हो गया था। यही कारण है कि प्रेमिका ने घटना को अंजाम दिया।
पुलिस सूत्रों के अनुसार, मनीषा खातून रात करीब साढ़े आठ बजे कटवा सर्कस मैदान की एक गली में अपनी प्रेमी लालचंद को मिलने के लिए बुलाया। इस दौरान दोनों के बात की। साथ में सिगरेट पिए। लड़की ने प्रेमी का चुंबन भी लिया, फिर शादी के प्रस्ताव ठुकराने पर गोली मार दी। गोली की आवाज सुनने के बाद इलाके में दहशत फैल गया। इसका फायदा उठाकर प्रेमिका मौके से फरार हो गई।
लालचंद ने बताया कि उसकी प्रेमिका के साथ किसी दूसरे के साथ अफेयर चल रहा था और वह एक साल पहले कटवा छोड़कर झारखंड चली गई थी और वहीं रह रही थी। इस कारण उसने मनीषा खातून से रिश्ता तोड़ लिया। बीते मंगलवार की रात वह झारखंड से कटवा घर लौटी और सर्कस मैदान की एक गली में बुलाया। हालाँकि, इस घटना में गोली प्रेमी को छूते हुए उसके जैकेट के आर-पार निकल गई और वह बाल-बाल बच गया।
वहीं, लड़की के परिवजनों का दावा है कि लालचंद प्रेमिका मनीषा पर शारीरिक संबंध बनाना चाहता था, लेकिन वह तैयार नहीं हुई। परिजनों का यह भी आरोप है कि लालचंद के पास बंदूक थी और वह मनीषा को मजबूर कर रहा है। इसी दौरान गोली चल गई।
गोली की आवाज सुनकर डरे लोगों ने इसकी जानकारी पुलिस को दी। सूचना मिलते ही कटवा थाने की पुलिस मौके पर पहुँची और लालचंद को अस्पताल में भर्ती कराया। वहाँ प्राथमिक उपचार किया गया। पुलिस आरोपी मनीषा खातून की तलाश कर रही है। पुलिस यह भी जाँच कर रही है कि मनीषा को बंदूक कैसे मिली और उसके साथ कोई और भी था या वह अकेली थी।
तमाम प्रशासनिक प्रतिबंधों और खुद मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के आदेश के बाद भी आज शुक्रवार (17 दिसंबर, 2021) को गुरुग्राम के एक पार्क में फिर से नमाज़ी जमा हुए। इस भीड़ को रोकने के लिए हिन्दू संगठनों के लोग आए तो उनकी आपस में काफी बहस हुई। मौके पर हरियाणा पुलिस ने पहुँच कर किसी तरह मामले को शांत करवाया। फ़िलहाल खुले में नमाज़ रोक दी गई। इस बहस का वीडियो भी वायरल हो रहा है।
गुरुग्राम में जुमे की नमाज के लिए पार्क में फिर से जुटे नमाजी, CM खट्टर के आदेश और हिन्दू संगठनों के विरोध को किया नजरअंदाज
ऑपइंडिया ने इस मामले में खुले में नमाज़ का विरोध करने वाली हिन्दू संघर्ष समिति गुरुग्राम के सदस्य रितुराज से बात की। उन्होंने बताया, “नमाज़ियों की यह भीड़ गुरुग्राम के उद्योग विहार क्षेत्र में जमा हुई थी। स्थान फेज़ 4 और फेज़ 5 के बीच में बना एक सार्वजनिक पार्क था। यहाँ पर आम लोग आया-जाया करते हैं। इसी पार्क में लगभग 300 की संख्या में नमाज़ियों की भीड़ अचानक ही आ गई। उन्होंने दरी आदि बिछा कर नमाज़ पढ़नी शुरू कर दी। जब उन्हें रोका गया तब उन्होंने बहसबाजी शुरू कर दी।”
तमाम प्रशासनिक आदेशों और शासन के निर्देश होते हुए भी गुरुग्राम में आज भी उद्योग विहार के पार्क में जमा हुए नमाज़ी..
रितुराज ने आगे बताया, “उनकी इस हरकत का विरोध स्थानीय लोग कर रहे थे। विरोध करने वालों की संख्या नमाज़ियों से काफी कम 50 के आस-पास थी। मामले की जानकारी पुलिस को हुई तो वो फ़ौरन वहाँ पहुँची। यदि पुलिस समय से न आती तो शायद विरोध करने वालों पर हमला भी किया जा सकता था। नमाज़ियों की तरफ से भीड़ बढ़ती ही जा रही थी। पुलिस के आने के बाद नमाज़ी और हिन्दू संगठन के लोग तितर-बितर हुए। कुछ लोग तब तक नमाज़ पढ़ चुके थे। लेकिन बाद में जो आए उन्हें रोक दिया गया।”
गौरतलब है कि खुद हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने सार्वजानिक स्थलों पर नमाज़ न पढ़ने और इसका समाधान निकालने के अधिकारियों को निर्देश दिए थे। वहीं मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने खुले में नमाज़ का विरोध करने वाले हिन्दू संगठनों को आतंकवादी कहा था। इससे पहले भी नमाज़ का खुले में कई बार विरोध हो चुका है। तब भी पुलिस ने हस्तक्षेप करके मामले को शांत करवाया था।”
अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा ने उस वक्त लोगों को हैरत में डाल दिया जब उन्होंने अपने नाम के आगे से जोनस सरनेम हटा लिया था और अब उन्हे निक जोनस (Nick Jonas) की पत्नी कहलाना भी पसंद नहीं आ रहा है। बॉलीवुड से निकलकर ग्लोबल स्तर पर अपनी पहचान बनाने वाली प्रियंका इन दिनों अपनी हॉलीवुड फिल्म मैट्रिक्स रिसरेक्शंस के प्रमोशन में जुटी हैं, जो भारत में भी 22 दिसम्बर को सिनेमाघरों में रिलीज होगी। इस सिलसिले में अमेरिकी पब्लिकेशंस और वेबसाइट्स में प्रिंयका के प्रमोशंस की खबरें छप रही हैं। ऐसी ही एक खबर पर जब प्रियंका चोपड़ा की नजर पड़ी तो गुस्से से आग-बबूला हो गईं।
इसके बारे में उन्होंने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी पर कुछ खबरों के स्क्रीनशॉट्स साझा किए हैं जिसमें उन्हें ‘निक जोनस की पत्नी’ कहकर संबोधित किया गया था। प्रियंका का कहना है कि इतना कुछ हासिल करने के बाद उनकी पहचान निक जोनस की पत्नी के रूप में सीमित कर दी गई। प्रियंका ने इस रिपोर्ट का स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए लिखा, “बहुत ही दिलचस्प है कि मैं दुनिया की सबसे आइकॉनिक फ्रेंचाइजी में से एक का प्रमोशन कर रही हूँ और मुझे फिर भी वाइफ ऑफ… कहकर बुलाया जाता है। प्रियंका ने आगे लिखा कि कृपया, जवाब दीजिए कि औरतों के साथ आज भी ऐसा क्यों होता है? क्या मुझे अपने बायो में आईएमडीबी लिंक जोड़कर रखना चाहिए?”
प्रियंका चोपड़ा के इंस्टा स्टोरी का स्क्रीनशॉट
बता दें कि प्रियंका ने इस पोस्ट में निक जोनस को भी टैग किया है। वहीं प्रियंका द्वारा साझा किए गए स्क्रीनशॉट में साफ पढ़ा जा सकता है, “निक जोनस की पत्नी ने गुड मॉर्निंग अमेरिका शो के दौरान मैट्रिक्स फिल्म के सह-कलाकार कीनू रीव्स के बारे में बातें कीं।” इस खबर को ही पढ़ते हुए प्रियंका ने लिखा, “बहुत दिलचस्प है कि मैं अब तक की सबसे प्रतिष्ठित फिल्म फ्रेंचाइजी में से एक का प्रचार कर रही हूँ और मुझे अभी भी ‘निक जोनस की पत्नी’ के रूप में बताया जा रहा है।
गौरतलब है कि अमेरिकन सिंगर और एक्टर निक जोनस प्रियंका से दस साल छोटे हैं। दोनों की शादी 1-2 दिसम्बर को 2018 में हुई थी। प्रियंका तब तक हॉलीवुड में भी अपनी पहचान बना चुकी थीं। प्रियंका ने 2017 की फिल्म बेवॉच से हॉलीवुड में डेब्यू किया था। इसके बाद अ किड लाइक जेक, इज इंट इट रोमांटिक, वी कैन बी हीरोज और द वाइट टाइगर जैसी फिल्मों में वो अहम भूमिकाएँ निभा चुकी हैं। ऐसे में प्रियंका को निक जोनस की पत्नी लिखे जाने पर उन्हें भड़कना ही था।
नॉर्थ कोरिया (North Korea) के तानाशाह किम जोंग-उन (Kim Jong-un) ने एक बार फिर अपने नागरिकों के लिए अजीब-ओ-गरीब फरमान जारी कर देश में हँसने और शॉपिंग करने पर रोक लगा दी है। यह फरमान किम जोंग-उन (Kim Jong-un) ने अपने पिता और देश के पूर्व तानाशाह किम जोंग-इल (Kim Jong-il) की 10वीं पुण्यतिथि के अवसर पर सुनाया है।
नए फरमान के तहत अगले 11 दिनों तक देश में न कोई हँस सकता है, न शराब पी सकता है, न शॉपिंग कर सकता है और न ही कोई खुशी मना सकता है। यदि किसी ने इस फरमान का उल्लंघन किया तो उसे कड़ी सजा दी जाएगी। दरअसल, किम जोंग-इल की पुण्यतिथि को नॉर्थ कोरिया में राष्ट्रीय शोक के रूप में मनाया जा रहा है।
किम जोंग-इल की मृत्यु के दस साल बाद उत्तर कोरियाई लोगों को 11 दिनों के शोक की अवधि का पालन करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। इसके अलावा, आज (17 दिसंबर 2021) से अगले दिनों तक नॉर्थ कोरिया के लोगों को किराने का सामान तक खरीदने की अनुमति नहीं है। हालाँकि, सरकारी कंपनियों से कहा गया है कि राष्ट्रीय शोक की अवधि में गरीब लोगों के लिए खाने की व्यवस्था का ध्यान रखें।
जानकारी के मुताबिक, पिछली बार शोक के दौरान कई लोग शराब का सेवन करते या खुशी मनाते पकड़े गए थे। इसके बाद इन लोगों को वैचारिक अपराधी मानते हुए गिरफ्तार कर लिया गया था। गिरफ्तार लोगों को अनजान जगह ले जाया गया था और उसके बाद से ये लोग दोबारा नहीं दिखे।
इतना ही नहीं, शोक के दौरान यदि किसी के परिवार में निधन हो जाता है तो वे जोर से रोके नहीं सकते। इतना ही नहीं, मृत व्यक्ति का अंतिम संस्कार भी इस अवधि में नहीं कर सकते। यहाँ तक कि अगर किसी का जन्मदिन भी इस बीच आता है तो उसे अपना जन्मदिन मनाने के लिए 11 दिनों तक इंतजार करना होगा।
दक्षिण ह्वांगहे के दक्षिण-पश्चिमी प्रांत के एक निवासी के अनुसार, पुलिस अधिकारियों से कहा गया कि वे ऐसे लोगों पर नज़र रखें, जो शोक की अवधि के दौरान उदास न दिखें। दिसंबर के पहले दिन से ही पुलिस अधिकारियों को खास तरह की ड्यूटी पर लगा दिया जाता है, ताकि वे शोक की अवधि में लापरवाही करने वालों के खिलाफ एक्शन ले सकें।
हर वर्ष शोक केवल 10 दिनों के लिए मनाया जाता था, परंतु इस बार दसवीं पुण्यतिथि के अवसर पर इसे 11 दिन का रखा गया है। किम जोन्ग-इल की उपलब्धियों को दर्शाने के लिए नॉर्थ कोरिया में इस बार कई कार्यक्रम का आयोजन किया गया है। किम जोंग-इल की मौत 17 दिसंबर 2011 को 69 साल की उम्र में हार्ट अटैक से हो गई थी। उन्होंने 1994 से 2017 तक देश पर शासन किया था।