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महाराष्ट्र चुनाव के नाम पर कब तक ‘गंध’ फैलाती रहेगी कॉन्ग्रेस? कोर्ट से लेकर EC तक, हर जगह मुँह की खाई : कितनी बार आग पर चढ़ाएगी काठ की हाँडी?

‘आप किसी सोते हुए व्यक्ति को जगा सकते हैं, लेकिन जो जागते हुए सोने का नाटक कर रहा हो, उसे नहीं जगा सकते’ यह कहावत मौजूदा भारतीय राजनीतिक परिदृश्य पर बिल्कुल सटीक बैठती है।

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में पिछली हार के बाद से कॉन्ग्रेस पार्टी लगातार ईवीएम और वीवीपैट में गड़बड़ी के आरोप लगा रही है। विशेष रूप से राहुल गाँधी चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर बार-बार सवाल उठा रहे हैं।

कॉन्ग्रेस का आरोप है कि शाम 6 बजे के बाद डाले गए लगभग 76 लाख वोटों की वैधता संदिग्ध है और उनका इशारा साफ है कि चुनाव आयोग ने बीजेपी गठबंधन को अनुचित लाभ पहुँचाया।

चुनाव आयोग ने 2024 में हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में अनियमितताओं के आरोपों को लेकर विपक्ष के नेता राहुल गाँधी को बातचीत के लिए आमंत्रित किया। इसके जवाब में कॉन्ग्रेस पार्टी ने गुरुवार (26 जून 2025) को एक आधिकारिक पत्र भेजा।

पत्र में कॉन्ग्रेस ने चुनाव आयोग के सामने दो प्रमुख माँग रखी। इसमें महाराष्ट्र की मतदाता सूची की मशीन से पढ़े जाने वाली डिजिटल कॉपी और महाराष्ट्र और हरियाणा में मतदान दिवस के वीडियो फुटेज शामिल था। कॉन्ग्रेस ने अनुरोध किया कि यह डेटा उन्हें पत्र की तारीख से एक सप्ताह के भीतर ही उपलब्ध कराया जाए।

पार्टी ने कहा कि यह कोई नया अनुरोध नहीं है, बल्कि लंबे समय से किया जा रहा है, जिसे चुनाव आयोग के लिए पूरा करना कठिन नहीं होना चाहिए। कॉन्ग्रेस ने यह भी स्पष्ट किया कि उन्हें जैसे ही ये जानकारियाँ प्राप्त होगी, वे चुनाव आयोग से मिलने को तैयार हैं और उस बैठक में अपने डेटा विश्लेषण के निष्कर्ष भी पेश करेंगे।

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में बीजेपी के नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन ने 288 में से 235 सीटें जीतकर बड़ी सफलता हासिल की थी। इससे कॉन्ग्रेस, एनसीपी और शिवसेना (यूबीटी) के गठबंधन- महाविकास अघाड़ी (एमवीए) को बड़ा झटका लगा।

चुनाव के नतीजों के बाद कॉन्ग्रेस लगातार चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठा रही है। विपक्ष के नेता राहुल गाँधी ने चुनाव आयोग से महाराष्ट्र समेत सभी राज्यों के लोकसभा और विधानसभा चुनावों के लिए एक साथ डिजिटल और मशीन से पढ़ी जा सकने वाली मतदाता सूची प्रकाशित करने की माँग की। उनका कहना है कि चुनाव आयोग को ‘सच बोलकर’ अपनी विश्वसनीयता को बनाए रखना चाहिए।

राहुल गाँधी ने एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया कि महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के निर्वाचन क्षेत्र में सिर्फ पाँच महीनों में मतदाता सूची में 8 प्रतिशत की अचानक बढ़ोतरी हुई, जिसे उन्होंने ‘वोट चोरी’ करार दिया।

उन्होंने एक्स पर लिखा कि कुछ मतदान केंद्रों पर मतदाताओं की संख्या में 20 से 50 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हुई है। बीएलओ (बूथ लेवल ऑफिसर) ने अज्ञात लोगों द्वारा वोट डालने की शिकायत की है और मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार हजारों वोटर्स ऐसे पाए गए जिनके पते ही सत्यापित नहीं थे।

राहुल गाँधी ने चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा, “और चुनाव आयोग? चुप्पी या फिर मिलीभगत। ये गड़बड़ियाँ अलग-थलग नहीं हैं, यह साफ तौर पर वोट चोरी है और जब गड़बड़ियों को छिपाया जाता है तो वह खुद एक कबूलनामा बन जाता है।” उन्होंने चुनाव आयोग से मशीन से तत्काल पढ़ी जा सकने वाली डिजिटल मतदाता सूची और सीसीटीवी फुटेज जारी करने की माँग की है।

कॉन्ग्रेस पार्टी न्यूजलॉन्ड्री की हाल ही में छपी एक रिपोर्ट के आधार पर चुनाव में बड़े स्तर पर धांधली के आरोप लगा रही है। राहुल गाँधी ने इस रिपोर्ट का हवाला देकर दावा किया कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के निर्वाचन क्षेत्र नागपुर पश्चिम में महज पाँच महीनों में 29,219 नए मतदाता जोड़े गए। रिपोर्ट के अनुसार, यह आँकड़ा प्रतिदिन औसतन 162 नए मतदाताओं का है, जो कुल मिलाकर 8.25 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाता है।

रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया है कि नागपुर पश्चिम के 378 बूथों में से 263 बूथों पर मतदाताओं की संख्या में 4 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी देखी गई। इनमें से 26 बूथों पर 20 प्रतिशत से ज्यादा और 4 बूथों पर 40 प्रतिशत से ज्यादा की वृद्धि दर्ज की गई।

इन दावों के आधार पर कॉन्ग्रेस चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल उठा रही है और इसे ‘वोट चोरी’ और ‘साजिश’ का हिस्सा बता रही है, जबकि अन्य विपक्षी दलों का आरोप है कि आयोग इन गड़बड़ियों पर चुप्पी साधे हुए है। दूसरी ओर आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए चुनाव प्रक्रिया की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर भरोसा जताया है।

राहुल गाँधी ने हाल ही में चुनाव आयोग पर हमला करते हुए जो एक्स पोस्ट लिखा था, उसमें न्यूज़लॉन्ड्री की रिपोर्ट का हवाला दिया गया था

न्यूज़लॉन्ड्री की रिपोर्ट के आधार पर राहुल गाँधी द्वारा लगाए गए आरोपों का मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने स्पष्ट रूप से खंडन किया है। उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र में सिर्फ नागपुर पश्चिम ही नहीं, बल्कि 25 से ज्यादा ऐसे निर्वाचन क्षेत्र हैं जहाँ लोकसभा और विधानसभा चुनावों के बीच मतदाताओं की संख्या में 8% से ज्यादा की वृद्धि हुई है और इनमें से कई सीटों पर कॉन्ग्रेस ने जीत हासिल की है।

फडणवीस ने राहुल गाँधी को सीधे संबोधित करते हुए कहा, “राहुल गाँधी जी, मैं समझता हूँ कि महाराष्ट्र में मिली करारी हार का दर्द दिन-ब-दिन बढ़ रहा है, लेकिन आप कब तक बिना तथ्यों के हवा में तीर चलाते रहेंगे?” उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि नागपुर पश्चिम से सटे दक्षिण-पश्चिम क्षेत्र में 7% यानी 27,065 मतदाता बढ़े, और वहाँ से कॉन्ग्रेस के विकास ठाकरे जीते।

इसी तरह, उत्तर नागपुर में 7% (29,348) मतदाता बढ़े और वहाँ भी कॉन्ग्रेस के नितिन राउत विजयी रहे। पुणे जिले के वडगाँव शेरी में 10% (50,911) मतदाता बढ़े और वहाँ शरद पवार गुट के बापूसाहेब पठारे ने जीत दर्ज की। मालाड पश्चिम में 11% (38,625) और मुंब्रा में 9% (46,041) मतदाता बढ़े, जहाँ कॉन्ग्रेस के असलम शेख और शरद पवार गुट के जितेंद्र आव्हाड ने जीत हासिल की।

फडणवीस ने तंज कसते हुए कहा कि राहुल गाँधी को कम से कम ट्वीट करने से पहले अपनी ही पार्टी के नेताओं से बात कर लेनी चाहिए थी। इससे कॉन्ग्रेस के अंदर की संवादहीनता इतनी साफ तौर पर उजागर न होती।

झूठ, चिल्लाहट, माँगें: कॉन्ग्रेस का तरीका या लोकतंत्र खतरे में?

राहुल गाँधी ने पहले भी चुनाव आयोग की पारदर्शिता और ईमानदारी पर गंभीर सवाल उठाए हैं। यह आरोप लगाया कि आयोग सबूत नष्ट कर रहा है, जिसमें 45 दिनों की सीसीटीवी फुटेज भी शामिल है।

राहुल गाँधी ने अपने एक्स पोस्ट में लिखा, “वोटर लिस्ट? मशीन-पठनीय प्रारूप नहीं मिलेगा। सीसीटीवी फुटेज? कानून बदलकर उसे छिपा दिया गया। चुनाव की फोटो और वीडियो? अब 1 साल नहीं, सिर्फ 45 दिनों में नष्ट कर दी जाएँगी। जिससे जवाब चाहिए था, वही सबूत नष्ट कर रहा है। यह साफ है, मैच फिक्स है। और फिक्स चुनाव लोकतंत्र के लिए जहर है।”

राहुल गाँधी ने माँग की कि मतदान केंद्रों की सीसीटीवी फुटेज सार्वजनिक की जाए। हालाँकि चुनाव आयोग ने इस माँग को खारिज करते हुए कहा कि मतदान केंद्रों की वेबकास्टिंग फुटेज सार्वजनिक करना मतदाताओं की गोपनीयता और सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है।

चुनाव आयोग ने कॉन्ग्रेस पार्टी की आलोचना करते हुए कहा कि इस तरह की माँगें दिखने में तो लोकतांत्रिक पारदर्शिता के लिए लगती हैं, लेकिन इनका असली मकसद उल्टा है। आयोग के अनुसार, राहुल गाँधी जैसे नेता चुनाव आयोग पर दबाव बनाकर फुटेज जारी करवाना चाहते हैं ताकि मतदाताओं और गैर-मतदाताओं की पहचान की जा सके।

चुनाव आयोग के अधिकारियों ने कहा कि अगर किसी पार्टी को किसी बूथ पर कम वोट मिले हों, तो वो सीसीटीवी फुटेज से यह पता लगा सकती है कि किसने वोट डाला और किसने नहीं। इससे मतदाताओं की पहचान उजागर हो सकती है और उन्हें डराया-धमकाया जा सकता है।

आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि सीसीटीवी फुटेज को सिर्फ 45 दिनों तक इसलिए रखा जाता है क्योंकि यही चुनाव याचिका दाखिल करने की कानूनी अवधि होती है। यह फुटेज सिर्फ आंतरिक प्रशासनिक जरूरतों के लिए होती है। यदि किसी ने 45 दिनों के भीतर चुनाव याचिका दाखिल की हो, तो फुटेज सहेजा जाता है और कोर्ट के आदेश पर उपलब्ध कराया जा सकता है।

चुनाव आयोग ने कहा कि 45 दिनों से अधिक समय तक यह फुटेज रखने से इसका गलत इस्तेमाल हो सकता है, जैसे झूठी सूचनाएँ फैलाना या राजनीतिक साजिश रचना। इसलिए सुरक्षा, निष्पक्षता और लोकतांत्रिक अखंडता बनाए रखने के लिए यह नीति अपनाई गई है।

कॉन्ग्रेस नेता ने शिरडी में 7,000 फर्जी वोटर का दावा किया, झूठ पकड़ा गया

इस साल फरवरी में संसद में बोलते हुए राहुल गाँधी ने एक और गंभीर आरोप लगाया था। उन्होंने दावा किया कि पिछले लोकसभा चुनाव के बाद सिर्फ पाँच महीनों में महाराष्ट्र के शिरडी निर्वाचन क्षेत्र की एक ही इमारत से 7,000 फर्जी मतदाता पंजीकृत किए गए थे। उनका कहना था कि एक सामान्य पते का उपयोग कर वोटर लिस्ट में गलत तरीके से नाम जोड़े गए।

हालाँकि बाद में जाँच से पता चला कि राहुल गाँधी का यह दावा काफी हद तक भ्रामक था। असल में यह संख्या 7,000 नहीं, करीब 3,000 थी और वह भी किसी एक इमारत से नहीं। ये मतदाता शिरडी सीट के तहत आने वाले लोनी शहर के छात्रावासों में रहने वाले छात्र थे। इन छात्रों ने अपने कॉलेज या छात्रावास का पता मतदाता पंजीकरण फॉर्म में दिया था, जो पूरी तरह से वैध है।

इस मामले में और जानकारी देते हुए अहमदनगर के जिला कलेक्टर सिद्धराम सलीमथ ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि जब किसी राजनीतिक दल ने शिकायत की, तो उन्होंने चुनाव आयोग को स्थिति से अवगत कराया। उन्होंने बताया कि लोनी क्षेत्र में कई शैक्षणिक संस्थान हैं और नए मतदाता उन्हीं संस्थानों के छात्र हैं, जो छात्रावासों में रहते हैं।

कलेक्टर ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर कोई व्यक्ति 18 वर्ष से अधिक आयु का है और उसके पास वैध दस्तावेज हैं, तो वह यह चुन सकता है कि उसे कहाँ से वोट डालना है। छात्र चूंकि छात्रावास में रह रहे थे, इसलिए उनके कॉलेज के प्रवेश पत्रों को निवास प्रमाण के रूप में स्वीकार किया गया।

अधिकारियों ने यह भी बताया कि यह सुनिश्चित करने के लिए गहराई से जाँच की गई कि कोई भी मतदाता दो बार पंजीकृत न हो, लेकिन ऐसी कोई गड़बड़ी नहीं मिली। इस तरह राहुल गाँधी का यह दावा भी तथ्यों की कसौटी पर खरा नहीं उतर सका और भ्रामक साबित हुआ।

राहुल गाँधी ने अमेरिका यात्रा में महाराष्ट्र चुनाव के 65 लाख फर्जी वोटों पर झूठ बोला

अप्रैल 2025 में अमेरिका की दो दिवसीय यात्रा के दौरान राहुल गाँधी ने महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव को लेकर चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि बीजेपी के नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन को जीत दिलाने के लिए चुनावी प्रक्रिया में गड़बड़ी की गई। उन्होंने दावा किया, ‘सिस्टम में कुछ बहुत गड़बड़ है।’

राहुल गाँधी ने उदाहरण देते हुए कहा कि शाम 5:30 बजे तक चुनाव आयोग ने जो वोटिंग डेटा दिया, उसके बाद सिर्फ दो घंटों यानी 5:30 से 7:30 बजे के बीच में अचानक 65 लाख नए वोट जुड़ गए। उन्होंने इस आँकड़े को असंभव बताया और कहा, “हमारे लिए यह बिल्कुल साफ है कि चुनाव आयोग ने समझौता किया है। महाराष्ट्र में जितने वयस्क हैं, उससे ज्यादा लोगों ने मतदान किया।”

उन्होंने आगे कहा कि एक व्यक्ति को वोट डालने में औसतन 3 मिनट लगते हैं और अगर इतने कम समय में इतने सारे वोट पड़े होते, तो दोपहर 2 बजे तक भी मतदान केंद्रों पर लंबी लाइनें होनी चाहिए थीं लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

राहुल गाँधी ने यह भी आरोप लगाया कि जब उनकी पार्टी ने चुनाव की वीडियोग्राफी की माँग की, तो न केवल चुनाव आयोग ने इस माँग को खारिज कर दिया, बल्कि बाद में कानून भी ऐसा बना दिया गया जिससे अब पार्टियाँ वीडियोग्राफी की माँग भी नहीं कर सकती।

इंडियन एक्सप्रेस ने राहुल गाँधी को महाराष्ट्र और लोकसभा चुनावों पर झूठ फैलाने का मंच दिया

राहुल गाँधी ने जून 2025 में द इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख लिखा, जिसमें उन्होंने 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस की हार को ‘औद्योगिक पैमाने’ पर धांधली का नतीजा बताने की कोशिश की। उन्होंने चुनाव प्रक्रिया, चुनाव आयोग और मतदाता पंजीकरण से लेकर मतदान प्रतिशत तक लगभग हर पहलू पर सवाल उठाए।

गाँधी ने न सिर्फ चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर शक जताया, बल्कि मतदाता पंजीकरण में हुए इजाफे को भी संदिग्ध बताया। उन्होंने दावा किया कि मतदान में अचानक हुई बढ़ोतरी असामान्य थी और बिना किसी ठोस आधार के लोकसभा और विधानसभा चुनाव नतीजों को एक साथ जोड़कर दोनों में कॉन्ग्रेस के खराब प्रदर्शन को धांधली से जोड़ा।

उनकी पूरी कोशिश यही दिखी कि वे हार की जिम्मेदारी ‘सिस्टम’ पर डालें। या तो ये एक रणनीतिक राजनीति का हिस्सा हो सकता है या पिर अपनी पार्टी की विफलताओं से ध्यान भटकाने का बेहतर तरीका भी कहा जा सकता है।

हालाँकि, ऑपइंडिया ने राहुल गाँधी के इस लेख और उनके दावों का तथ्यों के जरिए खंडन किया। रिपोर्ट में बताया गया कि उन्होंने कई भ्रामक और गलत आँकड़े पेश किए और चुनाव प्रक्रिया को लेकर जो सवाल उठाए। असल में वे वास्तविकता से मेल नहीं खाते।

चुनाव आयोग ने महाराष्ट्र चुनाव में मतदान प्रतिशत के कॉन्ग्रेस के झूठ दावों को किया खारिज

महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों 2024 के बाद,  भारत के चुनाव आयोग (ECI) ने कॉन्ग्रेस पार्टी को एक विस्तृत पत्र भेजकर उनके लगाए गए आरोपों को बिंदुवार तरीके से खारिज किया और तथ्यों के साथ उनकी गलतियों को उजागर किया।

कॉन्ग्रेस का दावा था कि मतदान के आखिरी घंटों में अचानक वोटिंग प्रतिशत बढ़ा, जिसे उन्होंने गड़बड़ी बताया। इस पर चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि मतदान के आखिरी घंटों में वोटिंग प्रतिशत में बढ़ोतरी होना एक सामान्य प्रक्रिया है।

आयोग ने यह भी बताया कि वोटिंग खत्म होने के समय फॉर्म 17C वहीं मौजूद उम्मीदवारों के अधिकृत एजेंटों को दे दिया जाता है। इसमें हर मतदान केंद्र का सटीक वोटिंग आँकड़ा होता है। ऐसे में मतदान प्रतिशत में हेरफेर करना संभव ही नहीं है।

चुनाव आयोग ने कॉन्ग्रेस के इस आरोप को भी खारिज कर दिया कि मतदाताओं की संख्या को मतदाता सूची में मनमाने तरीके से जोड़ा या हटाया गया।

इतना ही नहीं, कॉन्ग्रेस ने नवंबर 2024 में भी प्रोपेगेंडा वेबसाइट ‘द वायर’ की एक संदिग्ध रिपोर्ट के आधार पर भी चुनावों में गड़बड़ी के आरोप लगाए थे। रिपोर्ट में दावा किया गया था कि चुनाव के दौरान 5,04,313 अतिरिक्त वोट डाले गए। लेकिन महाराष्ट्र के मुख्य चुनाव अधिकारी (सीईओ) ने इस रिपोर्ट को झूठा बताया। उन्होंने बताया कि यह संख्या दरअसल 5,38,225 डाक मतपत्रों की थी, जो चुनाव आयोग की ओर से पहले से जारी आँकड़ों का हिस्सा थे। रिपोर्ट में इन्हें गलत तरीके से ‘अतिरिक्त वोट’ के रूप में दिखाया गया था।

इसके बाद अब कॉन्ग्रेस न्यूजलॉन्ड्री की एक और इसी तरह की रिपोर्ट का सहारा ले रही है, जिसमें तथ्य न के बराबर और प्रचार 100 प्रतिशत तक शामिल है। इन सभी मामलों में देखा गया है कि राहुल गाँधी बार-बार चुनाव प्रक्रिया पर सवाल उठाते हैं, लेकिन वे कभी अपने आरोपों को ठोस तथ्यों से साबित नहीं कर पाते। चुनाव आयोग ने हर बार उनके दावों को तथ्यों के आधार पर खारिज किया है। इसके बावजूद राहुल गाँधी इन आरोपों को दोहराते रहते हैं।

दरअसल, ऐसा लगता है कि राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस पार्टी का उद्देश्य पारदर्शिता या जवाबदेही लाना नहीं है, बल्कि बार-बार मिल रही चुनावी हार का दोष किसी और पर डालकर खुद को बचाना है। यही वजह है कि उनके ये आरोप अब एक पुराने, घिसे-पिटे बहाने बन चुके हैं, जो अब भारत में चुनाव हारने वाली हर पार्टी के लिए एक  ‘स्टैंडर्ड स्क्रिप्ट’ की तरह इस्तेमाल होने लगे हैं।

कॉन्ग्रेस ने महाराष्ट्र मतदाता सूची में अनियमितताओं का दावा किया, चुनाव आयोग ने बेनकाब किया झूठ

इस साल अप्रैल में चुनाव आयोग ने महाराष्ट्र की मतदाता सूची में लगे अनियमितताओं के आरोपों को साफ तौर पर खारिज किया। आयोग ने बताया कि जनवरी 2025 में प्रकाशित मतदाता सूची के विशेष सारांश संशोधन (6-7 जनवरी को) के दौरान, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 22, 23 और 24 के तहत बहुत ही कम आपत्तियाँ या सुधार के अनुरोध मिले।

चुनाव आयोग के अनुसार, 9.7 करोड़ पंजीकृत मतदाताओं में से केवल 89 अपील जिला चुनाव कार्यालयो में और सिर्फ 1 अपील मुख्य निर्वाचन कार्यालय में दर्ज की गई।

आयोग ने इस बेहद कम संख्या को आधार बनाकर कहा कि यह आँकड़ा संसद के शीतकालीन सत्र में विपक्षी दलों द्वारा उठाए गए बड़े-बड़े दावों को गलत साबित करता है। यानी, जो अनियमितता और धांधली के आरोप लगाए जा रहे थे, उनकी कोई ठोस पुष्टि नहीं हुई। आयोग ने जोर देकर कहा कि यह संख्या दर्शाती है कि मतदाता सूची में कोई बड़ी गड़बड़ी नहीं थी।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने 2024 महाराष्ट्र चुनाव की याचिका खारिज कर कॉन्ग्रेस को दिया झटका

बॉम्बे हाईकोर्ट ने बुधवार (25 जून 2025) को नवंबर 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों में कथित मतदान अनियमितताओं के आधार पर चुनाव के नतीजे रद्द करने की माँग वाली याचिका को खारिज कर दिया।

यह याचिका मुंबई निवासी चेतन चंद्रकांत अहिरे ने दायर की थी। इसकी पैरवी वंचित बहुजन अघाड़ी के नेता प्रकाश अंबेडकर ने की थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि शाम 6 बजे की समय सीमा के बाद लगभग 76 लाख वोट डाले गए। इनकी वैधता पर सवाल थे। याचिका में चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी और देर से मतदान में असामान्य वृद्धि का दावा किया गया था।

हालाँकि, जस्टिस जीएस कुलकर्णी और आरिफ डॉक्टर की पीठ ने इस दावे में कोई ठोस आधार नहीं पाया। उन्होंने कहा कि 2024 के लोकसभा चुनावों समेत पिछले सभी चुनावोंमें भी शाम 6 बजे के बाद वोटिंग के इसी तरह के रुझान देखे गए थे और उन्हें कभी चुनौती नहीं दी गई। अदालत ने साफ कहा कि जब तक शाम 6 बजे के बाद डाले गए वोटों को किसी उम्मीदवार की जीत से जोड़ने वाले स्पष्ट सबूत नहीं मिलते, तब तक ये आरोप निराधार हैं।

याचिका को खारिज करते हुए कोर्ट ने सुनवाई में काफी सममय लगने के बाद भी जुर्माना नहीं लगाया। चुनाव आयोग के वकील ने याचिकाकर्ता के अधिकार क्षेत्र और विजयी उम्मीदवारों की अनुपस्थिति पर सवाल उठाए, जिनसे कोर्ट ने सहमति जताई।

कोर्ट ने कहा, “यह याचिका पूरी तरह से आधारहीन है। इसे खारिज न करने का कोई आधार नहीं मिल रहा। हमने याचिका की सुनवाई में पूरा दिन लगा दिया, इसलिए यह निश्चित रूप से जुर्माने के साथ खारिज करने योग्य है, लेकिन हम ऐसा नहीं कर रहे।”

दरअसल, यह पूरा मामला न्यायिक समय की बर्बादी साबित हुआ, क्योंकि चुनाव आयोग ने कई बार इन आरोपों को खारिज किया था और चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भरोसा जताया था। 1 लाख से ज्यादा बूथ अधिकारियों, 288 रिटर्निंग अधिकारियों और कॉन्ग्रेस के 28,421 एजेंटों समेत 1 लाख से अधिक बूथ एजेंटों ने चुनावों की निगरानी की।

फिर भी कॉन्ग्रेस और उसके प्रधानमंत्री पद के अघोषित उम्मीदवार राहुल गाँधी डिजिटल मतदाता सूची, सीसीटीवी फुटेज जैसी माँगे कर रहे हैं और नियमित चुनावी प्रक्रियाओं को भ्रामक तरीके से अनियमितताओं के रूप में पेश कर रहे हैं, सिर्फ इसलिए क्योंकि उनकी पार्टी चुनाव जीतने में असफल रही।

कॉन्ग्रेस क्यों चुप है? क्या वह बिना तथ्य और षड्यंत्र की कहानियों पर भरोसा कर रही है?

ईवीएम हैकिंग और वीवीपैट छेड़छाड़ के कॉन्ग्रेस के आरोपों ने पार्टी को केवल आलोचना और शर्मिंदगी ही दी हैं। फिर भी कॉन्ग्रेस, महायुति गठबंधन के हाथों करारी हार के बाद, अपने कमजोर नेतृत्व और चुनावी रणनीति की असफलताओं को स्वीकार करने के बजाय चुनाव आयोग और मतदाता संख्या पर गंभीर सवाल उठाकर ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है।

कोर्ट और मतदाताओं ने कॉन्ग्रेस के ईवीएम और वीवीपैट दावों को निराधार ठहराया है तो पार्टी अब ‘अतिरिक्त मतदाताओं’ की साजिश वाली थ्योरी पर जोर दे रही है। लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट ने इन दावों को खारिज करते हुए कहा कि चुनाव प्रक्रिया पारदर्शी और ठीक थी।

मतदाता यह देख रहे हैं कि कॉन्ग्रेस जीतने पर चुनाव आयोग के परिणाम स्वीकार करती है, लेकिन हारने पर लगातार षड्यंत्र के सिद्धांत गढ़ती है। अपनी थोड़ी-बहुत जीत को ‘व्यवस्था से लड़ाई’ बताती है और हार को ‘मजबूरी’ बताकर बचाव करती है।

अपने झूठे दावों को बार बार दोहरा कर कॉन्ग्रेस असल में अपने वोटर्स से ही दूर हो रही है। मतदाता पार्टी की ओर से ह रही इस बयानबाजी को ‘खट्टे अंगूर’ के तौर पर देखते हैं। वोटर लिस्ट और सीसीटीवी फुटेज की माँग पर जोर देकर कॉन्ग्रेस गॉबेल्सियन रणनीति अपनाती है, झूठ को बार-बार दोहराना ताकि वह सच लगने लगे।

अगर कॉन्ग्रेस का उद्देश्य सचमुच जवाब पाना होता, तो वह चुनाव आयोग से संवाद करती और अपने चुनावी असफलताओं पर आत्मनिरीक्षण करती। लेकिन इसके बजाय, वह चुनाव आयोग पर भाजपा के साथ मिलीभगत का आरोप लगाकर अपनी विफलताओं से किनारा करती नजर आती है। इससे पार्टी को नुकसान होता है, क्योंकि अंततः उसके समर्थक उसके आरोपों पर विश्वास करते हैं।

यह रिपोर्ट मूलतः अंग्रेजी की श्रद्धा पांडे ने लिखी है, जिसको विस्तार से पढ़ने के लिए लिंक पर क्लिक करे।

‘अनिवार्य हिंदी’ के फर्जी दावों के साथ संजय राउत और उद्धव सेना शुरू कर रही एक और भाषाई विवाद: जानिए – क्या है इसका सच, नई शिक्षा नीति क्या कहती है

शिवसेना नेता और राज्यसभा सांसद संजय राउत एक नया विवाद खड़ा करने की कोशिश में हैं। तमाम हथकंडे अपनाने के बाद भी जब शिवसेना (यूबीटी) को सफलता नहीं मिली, तो अब मामले को मराठी वर्सेज हिंदी की तरफ मोड़ने की कोशिश हो रही है। इसी कड़ी में शुक्रवार (27 जून 2025) को संजय राउत ने एक ट्वीट किया जिसमें उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे की तस्वीर है।

संजय की पोस्ट में लिखा है, “जय महाराष्ट्र! ‘There will be a single and united march against compulsory Hindi in Maharashtra schools. Thackeray is the brand!'”

इस पोस्ट को देखकर लगता है कि यह सिर्फ भाषा के मुद्दे पर नहीं, बल्कि राजनीतिक फायदे के लिए उठाया गया कदम है।

राज और उद्धव का मिलन: बहाना या सचमुच का मराठी अस्मिता का सवाल?

संजय राउत का यह ट्वीट दिखाता है कि उद्धव ठाकरे (शिवसेना-UBT) और राज ठाकरे (एमएनएस) एक साथ आ रहे हैं। दोनों ठाकरे भाई, जो पहले एक-दूसरे से दूर थे, अब मराठी अस्मिता और हिंदी के खिलाफ एक मोर्चे पर खड़े हैं। राउत का कहना है कि 5 जुलाई 2025 को महाराष्ट्र में स्कूलों में हिंदी को अनिवार्य करने के खिलाफ एक संयुक्त मार्च निकाला जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सचमुच मराठी भाषा की रक्षा के लिए है या फिर अपनी सियासी जमीन बचाने की कोशिश?

पिछले कुछ सालों में एमएनएस और शिवसेना दोनों की लोकप्रियता में कमी आई है, खासकर 2024 के विधानसभा चुनाव में एमएनएस का सूपड़ा साफ हो गया था। ऐसे में यह मिलन राजनीतिक फायदा उठाने का एक तरीका लगता है।

संजय राउत और उद्धव सेना झूठे दावों के साथ फिर से भाषा का झगड़ा खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं, जिसमें वे कह रहे हैं कि ‘हिंदी को अनिवार्य किया जा रहा है’। आइए जानें कि ऐसा क्यों नहीं है और नई शिक्षा नीति (NEP) क्या कहती है।

सच यह है कि हिंदी को कहीं भी जबरदस्ती लागू नहीं किया जा रहा। नई शिक्षा नीति 2020 में तीन भाषाओं का फॉर्मूला है, जिसमें मराठी, अंग्रेजी और एक तीसरी भाषा शामिल है। यह तीसरी भाषा छात्र अपनी मर्जी से चुन सकते हैं – हिंदी, संस्कृत, उर्दू या कोई और। स्कूलों में हिंदी इसलिए पढ़ाई जाती है क्योंकि यह पसंद की जाती है, शिक्षक आसानी से मिल जाते हैं, और बच्चों को यह भाषा पहले से थोड़ी-बहुत आती है। लेकिन अगर कोई स्कूल या माँ-बाप चाहें, तो दूसरी भाषा भी चुन सकते हैं।

नई शिक्षा नीति (NEP) कहती है कि शुरुआती कक्षा (कम से कम 5वीं तक और अगर हो सके तो 8वीं तक) में पढ़ाई मातृभाषा, स्थानीय भाषा या क्षेत्रीय भाषा में होनी चाहिए। इसका मतलब साफ है – कोई भी भाषा थोपी नहीं जा रही।

महाराष्ट्र सरकार ने 2025 तक 80% शिक्षकों को नई शिक्षा पद्धति के लिए प्रशिक्षित करने की योजना बनाई है, लेकिन कहीं भी यह नहीं कहा गया कि हिंदी पढ़ना जरूरी है। अगर कोई स्कूल हिंदी नहीं पढ़ाना चाहता, तो वह दूसरी भाषा चुन सकता है। फिर भी संजय राउत और उद्धव ठाकरे की शिवसेना-UBT इस मुद्दे को बढ़ा-चढ़ाकर पेश कर रही है, ताकि लोगों की भावनाएँ भड़कें और उन्हें सियासी फायदा मिले।

राजनीतिक फायदा और भावनाओं का खेल

संजय राउत और उद्धव ठाकरे की शिवसेना-UBT इस मुद्दे को बढ़ाकर मराठी लोगों की भावनाओं को भड़का रही है। पिछले कुछ सालों में मुंबई में मराठी वोट बैंक कमजोर हुआ है और बीएमसी जैसे अहम पदों से शिवसेना का कब्जा छूट गया है। ऐसे में हिंदी विरोध का नारा फिर से उनकी सियासी जमीन तैयार कर सकता है। वहीं राज ठाकरे, जिनकी पार्टी चुनावों में पिछड़ गई, वो भी इस मौके को भुनाना चाहते हैं। उनकी कोशिश है कि मराठी अस्मिता का मुद्दा उठाकर वे फिर से लोगों के बीच अपनी पहचान बनाएँ। लेकिन सच यह है कि यह सब राजनीतिक स्वार्थ से प्रेरित है, न कि मराठी भाषा की चिंता से।

राज ठाकरे और हिंदी-उत्तर भारतीय विरोध का इतिहास

राज ठाकरे की राजनीति का इतिहास हिंदी और उत्तर भारतीयों के खिलाफ रुख से भरा पड़ा है। 2006 में जब उन्होंने शिवसेना से अलग होकर एमएनएस बनाई, तो उनका नारा था ‘मराठी मानुस’। उन्होंने मुंबई में उत्तर भारतीयों और बिहारियों के खिलाफ हिंसक प्रदर्शन भी कराए, जिसकी वजह से उन्हें जेल भी जाना पड़ा। 2008 में एक ट्रेन हादसे के बाद हिंदी मीडिया की कवरेज को लेकर हिंसा भड़की थी।

राज का कहना था कि बाहरी लोग महाराष्ट्र की नौकरियाँ छीन रहे हैं। बाद में 2020 में उन्होंने अपनी पार्टी का झंडा भगवा कर हिंदुत्व की ओर रुख किया, लेकिन मराठी अस्मिता का मुद्दा हमेशा उनके एजेंडे में रहा। अब हिंदी को स्कूलों में अनिवार्य करने का विरोध करके वे फिर से पुरानी रणनीति पर लौट रहे हैं।

बता दें कि पिछले दशकों में ठाकरे परिवार ने कई बार भाषा और क्षेत्रवाद के नाम पर सियासत की है। उदाहरण के लिए, मुंबई में 30 साल तक सत्ता में रहते हुए शिवसेना ने मराठी माणस के लिए कुछ खास नहीं किया। चॉल में रहने वाले मराठी लोगों को 2 घंटे पानी मिलता था, जबकि बाहरी लोगों के टावरों में 24 घंटे सुविधा थी। अब जब सत्ता हाथ से निकल रही है, तो उन्हें मराठी याद आ रही है। यह दोहरा चेहरा साफ दिखता है।

हिंदी को अनिवार्य करने का दावा गलत है। NEP 2020 में छात्रों और अभिभावकों को भाषा चुनने की आजादी है। संजय राउत का यह पोस्ट और ठाकरे भाइयों का मिलन महज एक राजनीतिक स्टंट है, जो मराठी अस्मिता के नाम पर वोट बटोरने की कोशिश है। हमें इस खेल को समझना होगा और भावनाओं में बहकर फैसले लेने से बचना होगा। महाराष्ट्र की तरक्की तभी होगी जब हम एकता और शिक्षा पर ध्यान दें, न कि भाषा के नाम पर लड़ाई लड़ें।

डॉन बॉस्को स्कूल के मैनेजमेंट से जुड़े कॉन्ग्रेसी नेता ने पीड़ित परिवार को धमकाया, ‘छोटी घटना’ बताकर केस वापस लेने का डाल रहा: ईसाई महिला टीचर ने हिंदू छात्रा के माथे से पोछा था तिलक

असम के सिराजुली में डॉन बॉस्को स्कूल में एक हिंदू बच्ची को परेशान करने के बाद अब बच्ची के परिवार को केस वापस लेने के लिए डराया-धमकाया जा रहा है। दरअसल स्कूल में केजी में पढ़ने वाले छात्र के माथे पर लगा तिलक जबरन हटा दिया था और क्लास टीचर ने उसे पिटाई करने की धमकी दी थी।

ऑपइंडिया ने 6 वर्षीय बच्ची के चाचा अवध किशोर वर्मा से बात की। उन्होंने बताया कि स्थानीय कॉन्ग्रेस नेता मिल्खास टोपो ने फोन पर परिवार को धमकी दी है। फोन कॉल की एक ऑडियो क्लिप भी उन्होंने साझा की। मिल्खास टोपो खुद को स्कूल की प्रबंधन समिति का सदस्य होने का दावा करता है।

अवध ने बताया कि यह फोन कॉल उनके भाई विनय कुमार वर्मा को बुधवार (25 जून) को आया था। गौरतलब है कि 24 जून को परिवार ने आरोपित शिक्षिका रिनी रोज और स्कूल प्रशासन के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी।

आरोपित कॉन्ग्रेस नेता ने माना है कि उसे स्कूल प्रबंधन ने परिवार से बात करने को कहा था। विनय ने बच्ची के साथ हुए वारदात की जानकारी दी। मिल्खास टोपो ने शिक्षिका और स्कूल प्रशासन के इस कुकृत्य को ‘छोटी घटना’ बताने की कोशिश की।

ऑडियो क्लिप में उसे यह कहते हुए सुना गया, “यह एक बड़ा स्कूल है। प्रिंसिपल वहाँ होने वाली हर बात पर नजर नहीं रख सकता। क्या वह व्यक्तिगत रूप से हर किसी की जानकारी रख सकता है?”

मिल्खास ने पूरी घटना को ‘महत्वहीन’ बताते हुए कहा, “यह एक ईसाई स्कूल है। आपको एडमिशन के समय एक डायरी दी गई थी। उसमें लिखे दिशा-निर्देशों को पढ़ें।” कॉन्ग्रेस नेता ने विनय के ऑफिस का पता भी लिया और कहा कि AASU (ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन) के कार्यकर्ता वहाँ आकर बात करेंगे।

मिल्खास ने पीड़ित परिवार को निर्देश दिया कि वे अपनी जरूरी धार्मिक मान्यताओं को अपने घर तक ही रखें और उन्हें स्कूल में न लाएँ। बातचीत के दौरान मिल्खास ने विनय को अपशब्द भी कहे।

इसके बाद स्थानीय कॉन्ग्रेस नेता ने पीड़ित के दादा बलराम वर्मा से बात की और स्कूल का समर्थन किया। उन्होंने कहा, “अगर बच्ची का तिलक मिटा भी दिया गया तो इसमें बड़ी बात क्या है?”

मिल्खास टोपो ने बलराम वर्मा से स्कूल की ‘डायरी गाइडलाइन पढ़ने’ की सलाह दी और अपनी बात कहते हुए पीड़ित के दादा के साथ दुर्व्यवहार किया। अवध किशोर वर्मा के अनुसार, मिल्खास ढेकियाजुलु में कॉन्ग्रेस पार्टी का उपाध्यक्ष है।

पुलिस में शिकायत के बारे में पूछे जाने पर पीड़ित के चाचा ने बताया कि स्कूल प्रशासन मंगलवार (24 जून) को थाने गया और लिखित में वादा किया है कि ऐसी घटना दोबारा नहीं होगी।

अवध किशोर वर्मा द्वारा दर्ज कराई गई पुलिस शिकायत का स्क्रीनशॉट

हालाँकि मिल्खास टोपो के धमकाने का सिलसिला 24 जून को भी जारी रहा। बुधवार (25 जून) को डॉन बॉस्को स्कूल के प्रिंसिपल पीड़ित के घर आए और आश्वासन दिया कि ऐसा अब नहीं होगा। उन्होंने पीड़ित के परिजनों से पुलिस में दर्ज शिकायत वापस लेने का भी अनुरोध किया।

अवध कुमार वर्मा ने ऑपइंडिया को बताया कि परिजनों ने बच्ची को स्कूल से निकालने का मन बना लिया है।

क्या था मामला?

सोमवार (23 जून) को डॉन बॉस्को स्कूल की शिक्षिका रिनी रोज ने KG में पढ़ने वाली छात्रा के माथे पर लगा तिलक जबरन मिटा दिया था।

इस घटना से बच्ची सदमे में है। जब पीड़िता ने अपने माता-पिता को इस बारे में बताया तो वे स्कूल पहुँचे और प्रिंसिपल (पिता) से शिकायत की। उन्हें आश्वासन दिया गया कि ऐसी घटना दोबारा नहीं होगी।

बच्ची के साथ अगले दिन यानी मंगलवार (24 जून) को भी ऐसा ही व्यवहार किया गया। हिंदू संस्कृति और धर्म दोनों के लिए पवित्र तिलक को जबरन उसके माथे से हटा दिया गया।

इसके अलावा, किंडरगार्टन की छात्रा को धमकी दी गई कि अगर वह फिर से माथे पर तिलक लगाकर स्कूल आई तो उसकी पिटाई होगी। क्लास टीचर रिनी रोज की धमकी से बच्ची काफी परेशान हो गई। बच्ची के चाचा अवध किशोर वर्मा ने ढेकियाजुलु पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी के पास शिकायत दर्ज कराई। ऑपइंडिया के पास शिकायत की एक प्रति एक्सक्लूसिव तौर पर मौजूद है।

वर्मा ने अपनी शिकायत में कहा, “इस कृत्य ने न केवल हमारी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाई है, बल्कि यह हमारे संविधान द्वारा दिए गए धर्म का पालन करने के मौलिक अधिकार का भी उल्लंघन है। यह धार्मिक भेदभाव का मामला है और हिंदू धर्म का जानबूझकर अपमान किया गया है।”

उन्होंने आगे कहा, “मैं जाँच में पूरा सहयोग करने के लिए तैयार हूँ और कोई भी अतिरिक्त जानकारी या सबूत देने के लिए तैयार हूँ। इस गंभीर मामले पर ध्यान देने के लिए आपका धन्यवाद।”

अवध किशोर वर्मा ने ऑपइंडिया को खास बातचीत में बताया कि कुछ दिन पहले ही कैथोलिक स्कूल के अधिकारियों ने एक हिंदू बंगाली छात्र की तुलसी माला जबरन उतार दी थी।

12 दिन की यात्रा पर चले भगवान जगन्नाथ, अहमदाबाद में अमित शाह ने की मंगला आरती: रथयात्रा की सुरक्षा में लगे 10000 पुलिसकर्मी, कृष्ण-सुभद्रा-बलराम की सवारी देखने दुनियाभर से पहुँचते हैं लोग

ओडिसा के पुरी में स्थित भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा शुक्रवार (27 जून 2025) को शुरू हो चुकी है। इसे लेकर देश के अलग-अलग हिस्सों में कई आयोजन किए जाते हैं। इस वर्ष रथयात्रा के 148वें वर्ष पर गुजरात के अहमदाबाद में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने श्री जगन्नाथ मंदिर पहुँचकर मंगला आरती की।

गृह मंत्री के साथ इस अवसर पर गुजरात के मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल भी साथ दिखे। उन्होंने पूजा- अर्चना करे बाद रथ खींचने की रस्म निभाई। इसे लेकर अमित शाह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट साझा की।

उन्होंने लिखा कि जगन्नाथ रथ यात्रा के पावन अवसर पर अहमदाबाद में मंगला आरती में शामिल होना अपने आप में एक दिव्य और अलौकिक अनुभव है।

गृहमंत्री ने आगे लिखा, “महाप्रभु जगन्नाथ जी मंगला आरती में शामिल होकर दर्शन-पूजन किया। महाप्रभु सभी पर अपना आशीर्वाद बनाए रखें।”

12 दिन तक चलेगी रथयात्रा

27 जून 2025 से शुरू होकर ये रथयात्रा 8 जुलाई 2025 तक चलेगी। भगवान श्री कृष्ण, बलराम और सुभद्रा के रथों को खींच कर गुंडिचा मंदिर तक लेकर आया जाता है। यहाँ वे एक सप्ताह तक निवास करते हैं। उसके बाद उन्हें वापस जगन्नाथ मंदिर ले जाया जाता है।

रथयात्रा के अवसर पर श्रद्धालुओं में भारी उत्साह देखने को मिलता है। दुनियाभर से लोग इस रथयात्रा को देखने पुरी आते हैं। सभी भगवान जगन्नाथ के रथ को खींचने के लिए लालायित दिखते हैं। इस बार की जगन्नाथ यात्रा को लेकर सुरक्षा के भी व्यापक इंतजाम किए गए हैं। पुरी हो या अहमदाबाद, तक हर जगह पर भारी पुलिस बल तैनात किया गया है।

पुरी में रथयात्रा को मद्देनजर रखकर लगभग 10,000 सुरक्षाकर्मियों की तैनाती की गई है। इनमें केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की आठ कंपनियाँ भी शामिल हैं। इसके अलावा ट्रैफिक व्यवस्था भी दुरुस्त रखी गई है, ताकि श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की कोई असुविधा न हो।

ओडिशा के पूरी में स्थित जगन्नाथ मंदिर से हर साल आषाढ़ शुक्ल द्वितीया तिथि के दिन यह भव्य रथ यात्रा निकाली जाती है। रथयात्रा में तीन रथ होते हैं। भगवान जगन्नाथ यानी श्रीकृष्ण के रथ को ‘नंदीघोष’ या ‘गरुड़ध्वज’ कहते हैं। इसका रंग लाल और पीला होता है।

इसके अलावा इस यात्रा में बलराम का भी रथ होता है। यह हरे और लाल रंग का होता है। इस रथ को ‘तालध्वज’ कहते हैं, वहीं सुभद्रा के रथ को ‘दर्पदलन’ या ‘पद्म रथ’ कहा जाता है। यह काले या नीले और लाल रंग का होता है। रथयात्रा में सबसे आगे बलराम का रथ होता है, वहीं बीच में सुभद्रा और सबसे पीछे भगवान जगन्नाथ का रथ होता है।

जगन्नाथ यात्रा: एक प्राचीन परम्परा

पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा निकालने की परंपरा बहुत पुरानी है। पुरी के पंडित और स्थानीय लोगों का मानना है कि सुभद्रा के द्वारिका दर्शन की इच्छा पूरी करने के लिए श्रीकृष्ण और भगवान बलराम ने रथ में बैठकर पूरे नगर की यात्रा की थी। तब से हर साल पुरी में रथयात्रा को आयोजन किया जाता है।

यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ का रथ मंदिर से चलकर करीब 200 मीटर की दूरी पर स्थित सालबेग की मजार पर आने के बाद रुक जाता है और कुछ देर यहाँ रुकने के बाद रथ फिर से आगे बढ़ता है। दरअसल सालबेग को भगवान जगन्नाथ का सबसे बड़ा भक्त माना जाता है।

सालबेग मुस्लिम परिवार से थे। एक बार वह पुरी आए जहाँ उन्होंने भगवान जगन्नाथ के भक्तों से उनकी महिमा सुनी तो उनके मन में भी भगवान के दर्शन की इच्छा हुई। लेकिन गैर-हिंदू होने के कारण उन्हें मंदिर में प्रवेश करने से उन्हें रोक दिया गया।

इस घटना के बाद से सालबेग के मन में भगवान जगन्नाथ के प्रति भक्ति और बढ़ गई। वो उसी क्षेत्र में रहकर दिन रात उनकी भक्ति करने लगे। कहा जाता है कि एक रात सालबेग ने सपने में भगवान जगन्नाथ के दर्शन पाए। भगवान ने उनसे कहा “मैं तुम्हारी भक्ति से बहुत प्रसन्न हूँ। इसलिए मैं खुद तुम तक आऊँगा और तुम्हें दर्शन दूँगा।

इसके बाद आयोजित हुई रथयात्रा के दौरान जैसे ही भगवान जगन्नाथ का रथ उस जगह पहुँचा जहाँ सालबेग ठहरे थे, वहीं अटक गया। हजारों लोगों की मशक्कत के बाद भी रथ आगे नहीं बढ़ा। अंत में भक्तों ने भगवान जगन्नाथ की फूलों की माला सालबेग तक पहुँचाई, जिसके बाद रथ निकल गया। तब से हर साल जगन्नाथ यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ के रथ को सालबेग की मजार पर रोका जाता है।

भारत के साथ ‘बड़ी ट्रेड डील’ करने का ट्रंप ने किया दावा, घट सकता है टैरिफ: बातचीत के लिए भारतीय दल पहुँचा अमेरिका, ₹41 लाख करोड़ से भी अधिक का होगा फायदा

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा है कि वे भारत के साथ एक ‘बहुत बड़ी ट्रेड डील’ करने जा रहे हैं। गुरुवार (26 जून 2025- स्थानीय समय के अनुसार) को ट्रंप ने व्हाइट हाउस में आयोजित ‘बिग ब्यूटीफुल बिल’ कार्यक्रम में भारत के लिए दरवाजे खोलने की बात कही है। ट्रंप का यह बयान चीन के साथ एक नए समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद सामने आया है।

व्हाइट हाउस में कार्यक्रम के दौरान ट्रंप ने लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि हर कोई चाहता है कि वे ट्रेड डील करे और इसका हिस्सा बने। हम हर देश के साथ डील नहीं करने जा रहे। ट्रंप ने कहा, “आपको याद है कुछ महीने पहले प्रेस ने कहा था कि क्या आपको सचमुच लगता है कि इसमें किसी को रुचि होगी? खैर, हमने कल चीन के साथ एक डील साइन की है।”

ट्रंप ने आगे कहा, “हम हमारे पास कुछ बेहतरीन डील्स हैं और हम उसे लेकर आ रहे हैं- शायद भारत के साथ। हम इंडिया के साथ एक बहुत बड़ी डील की शुरुआत करने जा रहे हैं। चीन के साथ ट्रेड डील करके हम चीन के लिए भी नए रास्ते खोलने जा रहे हैं।”

अमेरिका पहुँची भारतीय टीम

भारत से वाणिज्य मंत्रालय के विशेष सचिव राजेश अग्रवाल के नेतृत्व में ट्रेड डील पर बातचीत के लिए एक टीम अमेरिका पहुँची है। अमेरिकी टीम से भारतीय समूह दो दिन से बातचीत कर रहा है। भारत और अमेरिका वर्तमान में एक अंतरिम व्यापार समझौते पर काम कर रहे हैं।

अमेरिका ने 2 अप्रैल 2025 को भारत से निर्यात होने वाले सामानों पर 26% अतिरिक्त टैक्स लगाने का ऐलान किया था, लेकिन इसे 90 दिनों के लिए टाल दिया गया। यह 90 दिन 9 जुलाई 2025 को समाप्त हो रहे हैं।

भारतीय समूह अमेरिकी टीम के साथ बातचीत कर 9 जुलाई से पहले इस समझौते पर अपनी डील सुनिश्चित करना चाहता है। अगर यह ट्रेड डील नहीं होती है तो भारत से निर्यात होने वाले सामानों पर अतिरिक्त टैक्स लागू हो जाएगा।

भारत-अमेरिका को होगा फायदा

भारतीय समूह के साथ अगर अमेरिका की यह ट्रेड दिल सकारात्मक रूप लेती है तो भारत और अमेरिका के बीच 2030 तक व्यापार 500 अरब डॉलर यानी लगभग 41 लाख 75,000 करोड़ रुपए तक पहुँच जाएगा। इस समय यह 191 अरब डॉलर (15 लाख 94 हजार 961 करोड़ रुपए) है। इसकी वजह से भारत के लिए अमेरिकी कंपनियों में भी कई अवसर खुल सकते हैं।

मुरुगन पहाड़ी पर बनी दरगाह में कुर्बानी हो या नहीं, इस पर बंटा मद्रास हाई कोर्ट: जस्टिस निशा बानू पक्ष में तो जस्टिस श्रीमती S ने अनुमति देने से किया इनकार, नाम सिकंदर हिल्स रखने को दोनों ने किया खारिज

मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु के मदुरै में थिरुपरनकुन्द्रम पहाड़ी पर मौजूद सिकंदर बदहुशा अवुलिया दरगाह में पशु बलि की प्रथा और पहाड़ी का नाम बदलने की माँग वाली याचिकाओं पर अपना फैसला सुनाया। इस मामले को सुनने वाली मद्रास हाई कोर्ट में जस्टिस जे. निशा बानु और जस्टिस एस. श्रीमती की बेंच ने पहाड़ी का नाम बदलने की माँग को एकमत से खारिज कर दिया।

हालाँकि पशु बलि के मुद्दे पर दोनों जजों की राय अलग-अलग रही, यानी उन्होंने इस पर एकराय नहीं दिखाई। इस थिरुपरनकुन्द्रम पहाड़ी पर एक दरगाह, दो हिंदू मंदिर (अरुलमिगु सुब्रमणिया स्वामी मंदिर और काशी विश्वनाथ मंदिर) और प्राचीन जैन गुफाएँ हैं, जिसके चलते यह मामला काफी चर्चा में रहा है।

पहाड़ी का नाम नहीं बदलेगा

जज जे. निशा बानु और जज एस. श्रीमती ने साफ-साफ कहा कि थिरुपरनकुन्द्रम पहाड़ी का नाम बदलकर ‘सिकंदर हिल्स‘ करने की कोई जरूरत नहीं है। दोनों जज इस बात पर सहमत थे कि पहाड़ी का मौजूदा नाम ही रहेगा।

पशु बलि पर दोनों जजों की राय अलग

मद्रास हाई कोर्ट में बुधवार (25 जून 2025) को आए फैसले में पशु बलि के मुद्दे पर दोनों जजों ने अलग-अलग तर्क दिए। जस्टिस जे. निशा बानु ने पशु बलि की प्रथा को सही ठहराया। उन्होंने कहा कि दरगाह और मंदिर पहाड़ी पर अलग-अलग जगहों पर हैं, इसलिए एक समुदाय की धार्मिक प्रथाएँ दूसरे समुदाय के पवित्र स्थानों पर असर नहीं डालतीं।

जस्टिस बानु ने अपने फैसले में कहा कि थिरुपरनकुन्द्रम पहाड़ी का मालिकाना हक अरुलमिगु सुब्रमणिया स्वामी मंदिर के पास है और इस बारे में कोई विवाद नहीं है। सिविल कोर्ट पहले ही मंदिर के हक को मान्यता दे चुके हैं।

जस्टिस बानु ने यह भी कहा कि पशु बलि की प्रथा न सिर्फ मुस्लिम समुदाय बल्कि हिंदू समुदाय में भी पुराने समय से चली आ रही है। उन्होंने बताया कि तमिलनाडु में 1950 का एक कानून था, जो पशु और पक्षी बलि पर रोक लगाता था, लेकिन इसे 2004 में तमिलनाडु एक्ट 20 के तहत हटा लिया गया। यानी अब तमिलनाडु में धार्मिक स्थानों पर पशु बलि की प्रथा पर कोई कानूनी रोक नहीं है। इसलिए जस्टिस बानु ने कहा कि दरगाह में पशु बलि की प्रथा को रोका नहीं जा सकता, क्योंकि यह एक पुरानी धार्मिक परंपरा है।

दूसरी तरफ जस्टिस एस. श्रीमती ने पशु बलि के खिलाफ फैसला दिया। उनका कहना था कि सिकंदर दरगाह में कँधूरी पशु बलि की प्रथा पुराने समय से चली आ रही है, इसका कोई ठोस सबूत नहीं है। उन्होंने कहा कि रीजनल डेवलपमेंट ऑफिसर (RDO) ने सही निष्कर्ष निकाला था कि इस प्रथा को साबित करने के लिए दोनों पक्षों को सिविल कोर्ट जाना चाहिए। जज श्रीमती ने अपने फैसले में कहा कि सिकंदर दरगाह में कँधूरी पशु बलि की प्रथा होने का कोई पक्का सबूत नहीं है। अगर दरगाह वाले इस प्रथा को सही साबित करना चाहते हैं, तो उन्हें सिविल कोर्ट में जाना होगा।

जस्टिस एस श्रीमती ने यह भी निर्देश दिया कि दरगाह को यह साबित करना होगा कि रमजान, बकरीद और अन्य इस्लामी त्योहारों के दौरान पशु बलि और प्रार्थना की प्रथा 1920 में दायर एक मुकदमे (O.S.No.4 of 1920) से पहले से चली आ रही थी। इसके लिए उन्हें सिविल कोर्ट का रास्ता अपनाना होगा।

कब से चल रहा ये विवाद?

यह विवाद पिछले साल 27 दिसंबर को शुरू हुआ, जब मलैयादीपट्टी के 53 साल के सैयद अबू दाहिर और उनके परिवार ने पशु बलि के लिए थिरुपरनकुन्द्रम पहाड़ी पर जानवर ले जाने की कोशिश की। पुलिस ने उन्हें रोक लिया, जिसके बाद 20 मुस्लिमों ने पुलिस के खिलाफ प्रदर्शन किया। इसके बाद जनवरी में मुस्लिम समुदाय ने पहाड़ी पर खुली पहुँच और पशु बलि को पुरानी परंपरा बताते हुए इसकी अनुमति माँगी। उन्होंने पहाड़ी को ‘सिकंदर हिल्स’ नाम देना शुरू कर दिया।

इसी दौरान पुलिस ने सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) जैसे इस्लामी संगठनों को पहाड़ी पर पशु बलि (कुर्बानी) करने से रोक दिया। SDPI प्रतिबंधित आतंकी संगठन पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) का राजनीतिक संगठन है। पुलिस ने मुस्लिम समुदाय को पका हुआ मांस दरगाह में ले जाकर खाने की इजाजत दी, लेकिन पशु बलि पर रोक लगा दी। ऐसा इसलिए क्योंकि इस पहाड़ी पर प्राचीन जैन गुफाएँ और भगवान मुरुगन का मंदिर भी है।

विवाद तब और बढ़ गया, जब कुछ अज्ञात लोगों ने पहाड़ी पर मौजूद प्राचीन जैन गुफाओं को हरे रंग से रंग दिया। इससे हिंदू समुदाय में भारी गुस्सा फैल गया। फरवरी में भारत हिंदू मुन्नानी जैसे कई हिंदू संगठनों ने थिरुपरनकुन्द्रम पहाड़ी पर पशु बलि के खिलाफ प्रदर्शन किए। मुस्लिम समुदाय का दावा है कि पूरी पहाड़ी वक्फ बोर्ड की संपत्ति है और पशु बलि उनकी पुरानी परंपरा है। वे पहाड़ी को ‘सिकंदर हिल्स’ कहकर बुला रहे हैं, जिससे यह विवाद और गहरा गया है।

गौरतलब है कि थिरुपरनकुन्द्रम पहाड़ी हिन्दुओं के लिए काफ़ी पवित्र है और भगवान मुरुगन के 6 निवास स्थलों में से एक है। हिन्दुओं का कहना है कि पहाड़ी पर कुर्बानी करना मतलब भगवन मुरुगन के शीर्ष पर कुर्बानी करना होगा क्योंकि उनका मंदिर पहाड़ी की तलहटी में स्थित है। हिन्दुओं ने आरोप लगाया कि नाम बदलना और क़ुरबानी को लेकर झगड़े करना उन्हें मंदिर जाने से रोकने का प्रयास है। यहाँ पर सिर्फ प्राचीन मुरुगन मंदिर मंदिर ही नहीं, बल्कि ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी की जैन गुफाएँ भी हैं। इस पर ब्राह्मी लिपी में अभिलेख भी हैं।

हालाँकि अब हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि न तो पहाड़ी का नाम बदलेगा और न ही पशुओं की बलि दी जा सकेगी, क्योंकि ऐसा करने से पहले मुस्लिमों को O.S.No.4 of 1920 मामले को लेकर सिविल कोर्ट में जाना होगा।

मुरादाबाद से दिल्ली पल्लेदारी करने आया था तौफीक, खाना-पानी माँग नेहा को बनाया बहन… 3 साल में निकाह का डालने लगा प्रेशर: नहीं मानी तो छत से फेंका, OPindia से बोले परिजन- नहीं मालूम था कसाई निकलेगा

“उसके बहुत ऊँचे-ऊँचे सपने थे। वो बस यही कहती रहती थी कि अच्छी जगह नौकरी करूँगी, घर को सपोर्ट करूँगी। तौफीक ईद पर सेवइयाँ लेकर आता था…” आँसुओं में डूबी नेहा की बड़ी बहन बार-बार यही दोहरा रही है। उत्तर-पूर्वी दिल्ली के अशोक नगर में सोमवार (23 जून 2025) को सुबह साढ़े सात बजे 19 साल की नेहा का कत्ल हो गया। दिहाड़ी मजदूरी करने वाले तौफीक ने उसे घर की पाँचवीं मंजिल से नीचे फेंक दिया।

इस हत्याकांड की तह तक पहुँचने के लिए ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट टीम नेहा के घर पर पहुँची और घरवालों से हर मुद्दे पर बातचीत की। घरवारों ने तौफीक और उसके इरादों के बारे में विस्तार से जानकारी दी।

राखी बँधवाई, सेवइयाँ खिलाई और ले ली जान

तौफीक ने कहा कि मेरी कोई बहन नहीं है। कथित तौर पर उसने नेहा को बहन बना लिया। बड़ी बहन कहती है कि वो रक्षाबंधन पर राखी भी बँधवाता था। ईद पर सेवइयाँ खिलाता था। तीन साल बाद उसने शादी का प्रस्ताव दे दिया।

इसके बाद नेहा की माँ ने तौफीक को घर पर आने से मना कर दिया। नेहा की माँ के मुताबिक, तौफीक इस बात से बहुत नाराज हो गया था। 23 जून को सुबह साढ़े सात बजे वो बुरखा पहनकर नेहा की बिल्डिंग में आता है।

उसे पता था कि इस समय नेहा छत पर कपड़े धो रही होगी। पाँचवीं मंजिल की छत पर वो सीधे जाता है। इतने में नेहा के पिता भी छत पर आते हैं। कुछ कहा-सुनी होती है। इसके बाद वो नेहा को छत से नीचे खाली पड़े प्लॉट में फेंक देता है और भाग जाता है।

नेहा की ये कहानी सिर्फ रिश्तों में बात बिगड़ जाने के बाद हुई हत्या की नहीं है। ये उससे कहीं अधिक है।

मुरादाबाद से दिल्ली आकर करता था पल्लेदारी

आसपास के लोग बताते हैं कि तौफीक तीन-चार साल पहले मुरादाबाद से दिल्ली के इस इलाके में आया था। उसके साथ मुरादाबाद के करीब पंद्रह मुस्लिम लड़के बगल की होलसेल मार्केट में पल्लेदारी का काम करते थे। एक मजदूर की दिन की कमाई करीब एक हजार रुपये थी। दुकानदार बताते हैं कि मजदूरों को रहने-खाने की व्यवस्था हम ही देते थे।

नेहा के पड़ोसी OpIndia से बात करते हुए बताते हैं कि करीब तीन साल पहले तौफीक इस मोहल्ले में पहली बार आया था। वो लोगों से कहता था कि अकेला रहता हूँ, तो खाने-पीने की सही से व्यवस्था नहीं है।

परिवार ने की मदद, नेहा ने बाँधी राखी, लेकिन तौफीक के इरादे कुछ और

मोहल्ले के कुछ लोगों ने शुरुआत में एक-दो बार खाना-पीना दिया भी। लेकिन रोज-रोज यूँ किसी अजनबी को खाना खिलाना सही नहीं लगा। मोहल्ले में अधिकतर लोगों ने खाना देना बंद कर दिया था।

फिर तौफीक की नजर मोहल्ले के तिराहे पर बने पाँच मंजिला मकान पर पड़ी। इस मकान के पहले फ्लोर पर राकेश (बदला हुआ नाम) का परिवार दिखा। परिवार में तीन बड़ी बेटियाँ और दो छोटे बेटे थे।

उसने उस परिवार से नजदीकियाँ बढ़ानी शुरू की। परिवार धार्मिक था, लेकिन उन्हें तौफीक में सिर्फ एक घर से दूर रहने वाला लाचार मजदूर दिखा। शुरुआत में कभी-कभी वो खाना खाने आता। फिर लगातार दिन में ठंडा पानी माँगने के लिए आने लगा।

उसने घर में जगह बनाई। फिर रक्षाबंधन आया। तौफीक को नेहा ने राखी बाँधी। अगले तीन वर्षों तक ये संबंध बरकरार रहा। लेकिन इसी दौरान तौफीक की नजरें बदल गईं। वो अब नेहा को अपनी बीवी बनाना चाहता था।

भइया से सैंया बनने की चाह में बना हत्यारा

नेहा तौफीक को भइया बुलाती थी। लेकिन हत्या के कुछ महीने पहले ही तौफीक ने शादी का प्रस्ताव रख दिया। परिवार और नेहा के लिए ये प्रस्ताव चौंकाने वाला था। लेकिन तौफीक ने मन बना लिया था।

वो किसी भी कीमत पर नेहा से शादी करना चाहता था। नेहा की माँ ने तौफीक के घर में आने पर पाबंदी लगा दी थी। लेकिन वो छुप-छुपकर नेहा से मिलता रहा। शायद नेहा को उम्मीद नहीं थी कि इस छुपने-छुपाने के खेल का अंजाम उसकी मौत होगा। तौफीक लगातार मिल रहे इनकार से आग-बबूला हो चुका था।

नेहा भाई-बहनों में दूसरे नंबर की लड़की थी। तौफीक को पता था कि सुबह सात बजे वो कपड़े धुलने घर की छत पर जाती है। 23 जून को भी वो कपड़े धुलने जाती है। तौफीक ने जुर्म कबूल करते हुए बताया, “उस दिन मैं पहले से छत पर मौजूद था। नेहा के आने का इंतजार कर रहा था। साढ़े सात बजे नेहा छत पर आती है।”

पिता के सामने नेहा को पाँचवीं मंजिल से फेंका नीचे

नेहा के पिता कहते हैं, “वो नेहा पर चिल्ला रहा था। सामने से नेहा भी चिल्लाती है। आवाज सुनकर मैं छत पर जाता हूँ। मेरी आँखें फटी रह जाती हैं। वो दुपट्टे से नेहा का गला दबा रहा था। मैं अपनी बेटी को बचाने के लिए झपट पड़ता हूँ। तौफीक मुझे भी धक्का दे देता है। मैं जब तक उठ पाता, उतनी देर में उसने नेहा को छत से नीचे फेंक दिया। मैं कुछ समझ पाता, इतनी देर में वो सीढ़ियों से नीचे भागने लगा। नेहा ईंट के ढेर पर जा गिरी थी। वो चीख रही थी, मैं भी मदद के लिए चिल्लाता हूँ।”

शोर सुनकर आसपास के लोग इकट्ठा हो जाते हैं। जिस प्लॉट में नेहा गिरी थी, उसका दरवाजा बंद था। बड़ी मशक्कत के बाद उसका ताला तोड़ा जाता है। नेहा की बड़ी बहन बताती है – “वो तड़प रही थी, उसका शरीर तीन हिस्सों में टूट चुका था, वो बस पानी माँग रही थी।”

आसपास के लोग उसे ऑटो में रखते हैं। बुरी तरह घायल नेहा को GTB अस्पताल ले जाया जाता है। करीब पाँच घंटे के इलाज के बाद नेहा की मौत हो जाती है।

पानी पिलाने की इतनी बड़ी सजा मिली

OpIndia की टीम नेहा के घर पहुँचती है। बाहर पुलिसवालों का जमावड़ा है। ग्राउंड फ्लोर पर बड़ी बहन आँसुओं में डूबी बैठी है। कुछ रिश्तेदार और मीडिया के लोगों ने उसे घेर रखा है। पहली मंजिल पर नेहा के पिता मौजूद हैं। दरवाजे पर राम और गणेश सहित कई हिंदू देवी-देवताओं के चित्र लगे हैं। अंदर पिता बिस्तर पर बेसुध लेटे हैं। नेहा का छोटा भाई टीवी पर अपनी बहन की हत्या की खबर देख रहा है।

माइक लगाने पर वो बोलने की कोशिश करते हैं। गला भर आता है। आँखों से आँसू टपकने लगते हैं। उठने की कोशिश करते हैं, लेकिन उठ नहीं पाते। रोते हुए कहते हैं कि पता नहीं था तौफीक इतना बड़ा कसाई निकलेगा।

मैं उनकी आँखों से निकलते आँसुओं में उस अफसोस को पढ़ पा रहा था। अफसोस इस बात का कि क्यों नहीं वक्त रहते मैं तौफीक को पहचान पाया? इतिहास तो साँपों को दूध पिलाने की सजा के उदाहरण देता है, लेकिन पानी पिलाने की सजा इतनी बड़ी कैसे हो गई?

बांग्लादेश में यूनुस सरकार ने गिराया हिन्दू मंदिर, इस्लामी भीड़ पहले से दे रही थी तोड़ने की धमकी: भारत ने लताड़ा, कहा- मूर्तियाँ तो दूसरी जगह रख देते

बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस की सरकार ने एक हिन्दू मंदिर को जमींदोज कर दिया है। राजधानी ढाका में इस मंदिर को तोड़ने की कोशिश इस्लामी कट्टरपंथी पहले से कर रहे थे। हिन्दू इस तोड़फोड़ का विरोध ना कर पाएँ, इसके लिए बांग्लादेश की फ़ौज भी लगा दी गई थी। भारत ने बांग्लादेश की इस मामले में आलोचना की है।

राजधानी ढाका में गिराया गया यह मंदिर माँ दुर्गा को समर्पित था। इसे बांग्लादेश रेलवे के ढाका डिवीजन के डिप्टी कमिश्नर और डिविजनल एस्टेट ऑफिसर मोहम्मद नासिर उद्दीन महमूद के आदेश पर गिराया गया है। मंदिर गिराने की यह कार्रवाई गुरुवार (26 जून, 2025) को की गई।

मंदिर गिराए जाने के समय बड़ी संख्या में हिंदू पुरुष और महिलाएँ वहाँ मौजूद थे, जो रोते हुए मंदिर को गिरते देख रहे थे। मंदिर को गिराने के लिए ढाका के पूर्वाचल आर्मी कैंप से फ़ौज और पुलिसबल भी बुलाया गया था। यहाँ बुलडोजर भी साथ लाया गया था। विरोध करने वाले हिन्दुओं को फ़ौज ने हटा दिया और मंदिर को तोड़ दिया।

ढाका के खिलखेत सर्वजनीन दुर्गा मंदिर को गिराए जाने से पहले हिंदू समुदाय ने प्रशासन से रथ यात्रा निकालने की अनुमति देने और उसके बाद तोड़फोड़ को कुछ समय के लिए स्थगित करने का अनुरोध किया था। हालाँकि, प्रशासन ने इस अपील को अस्वीकार कर दिया।

गुरुवार को मंदिर गिराए जाने की कार्रवाई में मंदिर की मूर्तियाँ, पूजा सामग्री और अन्य धार्मिक वस्तुएँ भी नष्ट हो गई। देवी काली और भगवान शिव की मूर्तियाँ बुलडोजर के नीचे आकर टुकड़े-टुकड़े हो गई। यह मंदिर करीब 50 साल से अधिक समय से दुर्गा पूजा का केंद्र रहा है। मंदिर में देवी काली की मूर्ति भी थी, जिसकी नियमित पूजा की जाती थी।

यह मंदिर लोहे की नालीदार चादरों से बना एक अस्थायी ढाँचा था और रेलवे की जमीन पर स्थित था, लेकिन बांग्लादेश जैसे इस्लामी देश में अल्पसंख्यक हिंदुओं के लिए यह एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल था। इस घटना से पहले, 24 जून, 2025 की रात को एक मुस्लिम भीड़ ने मंदिर पर हमला किया था।

उन्होंने मंदिर को खाली करने के लिए 12 घंटे की धमकी दी थी। इस्लामी भीड़ ने मंदिर को तोड़ने की कोशिश की थी और भक्तों को गालियाँ और जान से मारने की धमकियाँ भी दीं। इसके बाद प्रशासन ने भारी सुरक्षा के बीच मंदिर को गिरा दिया जिससे हिंदू समुदाय में गहरा आक्रोश और दुख है।

मुस्लिम भीड़ ने मंगलवार (24 जून 2025) को हिंदू श्रद्धालुओं को दोपहर 12 बजे तक का अल्टीमेटम दिया और कहा कि अगर उस समय तक मंदिर नहीं हटाया गया, तो वे खुद ही मंदिर को तोड़ देंगे। इस धमकी के बाद, स्थानीय हिंदू नेताओं ने खिलखेत पुलिस से सुरक्षा की माँग की लेकिन प्रशासन ने उनकी कोई मदद नहीं की।

इसके दो दिन बाद, मंदिर को बेदखली के नाम पर अचानक गिरा दिया गया। मोहम्मद यूनुस के मातहत बांग्लादेश रेलवे विभाग ने कहा कि यह कार्रवाई अध्यादेश संख्या 24, 1970 की धारा 5(1) और 5(2) के तहत की गई। उनके अनुसार, यह अभियान कुरील बिश्वा रोड चौराहे से खिलखेत बाजार तक रेलवे की जमीन से ‘अवैध कब्जे हटाने’ के लिए चलाया गया था।

हालांकि, हिंदू समुदाय का कहना है कि यह मंदिर लंबे समय से पूजा स्थल के रूप में इस्तेमाल हो रहा था और इसे अचानक गिराना  भीड़ के दबाव में लिया गया एक अन्यायपूर्ण फैसला था।

प्रशासन का कहना है कि खिलखेत दुर्गा मंदिर रेलवे की सरकारी जमीन पर अवैध रूप से बना हुआ था, इसलिए उसे हटाया गया। लेकिन हिंदू समुदाय का कहना है कि यह मंदिर लंबे समय से प्रशासन की जानकारी में वहाँ मौजूद था और इसे कभी भी अवैध नहीं माना गया।

मंदिर को जगन्नाथ यात्रा से ठीक पहले गिराया जाना हिंदू समुदाय के लिए और भी दर्दनाक रहा। इस घटना ने पूरे बांग्लादेश में हिंदुओं में गहरा आक्रोश पैदा कर दिया है। जहाँ सरकार इसे अतिक्रमण हटाने की सामान्य कार्रवाई बता रही है, वहीं हिंदू समुदाय का मानना है कि यह कदम अल्पसंख्यकों पर हो रहे लगातार अत्याचारों का हिस्सा है।

लोगों ने यह भी सवाल उठाया है कि मूर्तियों को नष्ट करने के बजाय उन्हें सम्मानपूर्वक दूसरी जगह क्यों नहीं स्थानांतरित किया गया। कुछ स्थानीय निवासियों का दावा है कि यह जमीन वास्तव में रेलवे द्वारा मंदिर के लिए दान की गई थी, जिससे यह पूरी कार्रवाई और भी विवादास्पद बन गई है।

भारत ने बांग्लादेश को लताड़ा

ढाका में मंदिर गिराने पर भारत ने बांग्लादेश को लताड़ लगाई है। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने गुरुवार (26 जून, 2025) को इस मामले में टिप्पणी की है। उन्होंने कहा, “हम समझते हैं कि कट्टरपंथी खिलखेत, ढाका में दुर्गा मंदिर को ध्वस्त करने के लिए चिल्ला रहे थे। अंतरिम सरकार ने मंदिर को सुरक्षा प्रदान करने के बजाय, इस घटना को अवैध भूमि उपयोग के मामले के रूप में पेश किया और आज मंदिर को ध्वस्त करने की अनुमति दी।”

उन्होंने आगे कहा, “इससे देवता की मूर्ति को नुकसान पहुँचा है, इससे पहले कि उसे स्थानांतरित किया जाता। हम इस बात से दुखी हैं कि बांग्लादेश में ऐसी घटनाएँ बार-बार हो रही हैं। मैं इस बात पर जोर देना चाहता हूँ कि हिंदुओं, उनकी संपत्तियों और उनके धार्मिक संस्थानों की रक्षा करना बांग्लादेश की अंतरिम सरकार की जिम्मेदारी है।”

सोनिया गाँधी पर दर्ज होगा चोरी का मुकदमा? नेहरू के एडविना-अरुणा अली वाले पत्रों पर एक्शन लेगा PMML: प्रधानमंत्री मोदी वाली बैठक में उठा मुद्दा, UPA काल में हुए इधर-उधर हुए थे 51 बक्से

कॉन्ग्रेस नेता सोनिया गाँधी पर जल्द ही चोरी का मुकदमा दर्ज हो सकता है। प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय (PMML) सोसाइटी देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से जुड़े कुछ निजी दस्तावेजों को वापस पाने के लिए इस एक्शन पर विचार कर रही है। ये दस्तावेज वर्ष 2008 में UPA सरकार के दौरान हटाए गए थे।

इस मामले में 23 जून, 2025 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अध्यक्षता में एक बैठक हुई थी। यह बैठक PMML सोसाइटी की थी। PMML की यह वार्षिक बैठक थी। इस बैठक में इस मुद्दे पर भी गंभीर चर्चा की गई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, बैठक में शामिल सदस्यों के बीच सहमति बनी कि अब इस मामले को कानूनी रास्ते से सुलझाया जाना चाहिए।

PMML ट्रस्ट के सूत्रों ने बताया कि वे इन दस्तावेजों की कथित ‘चोरी’ को लेकर कानूनी जाँच पर विचार कर रहे हैं। PMML के लोगों का कहना है कि ये दस्तावेज पहले दान किए गए थे और इसलिए ये अब कानूनी रूप से संस्थान की संपत्ति हैं।

अगर यह साबित होता है कि इन दस्तावेजों को गैरकानूनी तरीके से संस्थान के कब्जे से हटाया गया था, तो सोनिया गाँधी को इस मामले में कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। मामले में गंभीर जाँच होने की संभावना है, जो सोनिया गाँधी पर शिकंजा बढ़ाएगी।

UPA काल में 51 डिब्बों में भर ले गए थे दस्तावेज

इस पूरे विवाद की जड़ पंडित जवाहरलाल नेहरू के निजी संग्रह से जुड़े उन ऐतिहासिक दस्तावेजों में है, जिनमें कई मशहूर हस्तियों के साथ उनकी पत्रों से बातचीत शामिल है। इनमें एडविना माउंटबेटन, अल्बर्ट आइंस्टीन, जयप्रकाश नारायण, विजया लक्ष्मी पंडित, बाबू जगजीवन राम और अरुणा आसफ अली जैसे बड़े नाम शामिल हैं।

ये दस्तावेज 1971 से लेकर 2008 तक नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी (NMML) में रखे गए थे। NMML का नाम बदल कर अब प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय (PMML) हो गया है। यह पूरा विवाद वर्ष 2008 में चालू हुआ था। तब यह कागज कथित तौर प 51 बक्सों में पैक कर सोनिया गाँधी द्वारा संग्रहालय से निकाल लिए गए।

बताया गया है कि इनमें वे दस्तावेज भी शामिल थे जिन्हें पहले इंदिरा गाँधी और बाद में सोनिया गाँधी ने NMML को दान किया था, क्योंकि गाँधी परिवार उत्तराधिकारी के रूप में काम कर रहा था। PMML इससे पहले कई बार सोनिया गाँधी के कार्यालय को कई बार पत्र भेजकर उन दस्तावेजों को लौटाने की अपील कर चुका है।

गुजरात के इतिहासकार और PMML सोसाइटी के सदस्य प्रोफेसर रिजवान कादरी ने भी सितंबर 2024 में सोनिया गाँधी और फिर दिसंबर, 2024 में राहुल गाँधी को पत्र लिखे। उन्होंने निवेदन किया कि अगर दस्तावेज वापस नहीं दिए जा सकते, तो कम से कम उनकी फोटोकॉपी या डिजिटल स्कैन ही भेज दिए जाएँ।

लगातार कहने के बावजूद सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी ने कोई जवाब नहीं दिया है। इसके चलते यह मामला काफी गंभीर हो गया है। अब PMML इस मामले में कानूनी रास्ते तलाश रहा है और जल्द एक्शन ले सकता है।

पीएम मोदी वाली बैठक में भी हुई वापसी की माँग

प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय (PMML) सोसाइटी की 47वीं वार्षिक आम बैठक (AGM) हाल ही में तीन मूर्ति भवन में आयोजित की गई। इस बैठक की अध्यक्षता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने की। इसमें सोसाइटी के उपाध्यक्ष और केन्द्रीय मंत्री राजनाथ सिंह, निर्मला सीतारमण, धर्मेंद्र प्रधान और अश्विनी वैष्णव सहित कई प्रमुख नेता शामिल हुए।

अन्य प्रमुख सदस्यों में भाजपा नेता स्मृति ईरानी, गीतकार प्रसून जोशी और रेलवे बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष अश्विनी लोहानी भी मौजूद थे। लोहानी अब PMML के निदेशक के रूप में कार्य कर रहे हैं। बैठक में इस मुद्दे पर दोबारा चर्चा की गई। यह इससे पहल फरवरी 2024 की AGM में उठाया गया था।

PMML के सदस्यों का मानना है कि ये दस्तावेज सिर्फ परिवार की निजी संपत्ति नहीं हैं, बल्कि राष्ट्रीय धरोहर हैं और इन्हें संस्थान के पास सुरक्षित रहना चाहिए। इस पर सभी सदस्यों की आम सहमति बनी।

फरवरी की बैठक के बाद इस मामले में कानूनी सलाह ली गई और इसी के आधार पर सोनिया गाँधी के कार्यालय को एक औपचारिक पत्र भेजा गया। इसमें पहली बार आधिकारिक तौर पर यह रिकॉर्ड में रखा गया कि दस्तावेज वापस ले लिए गए हैं और उन्हें लौटाने का अनुरोध किया गया है। हालाँकि, गाँधी परिवार की ओर से अभी तक कोई जवाब नहीं आया।

अब PMML सोसाइटी के सदस्य 2014 से पहले की प्रशासनिक चूक को सुधारने की दिशा में कदम उठा रहे हैं, ताकि नेहरू से जुड़े ये ऐतिहासिक दस्तावेज दोबारा सार्वजनिक संग्रह में आ सकें।

ट्रस्ट ने बताया- दान किए कागज नहीं हो सकते वापस

प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय (PMML) ट्रस्ट अब कानूनी सलाह पर विचार कर रहा है। इसके अनुसार, एक बार जो दस्तावेज दान कर दिए जाते हैं, उनको वापस नहीं लिया जा सकता। इसलिए ट्रस्ट का मानना है कि नेहरू गाँधी परिवार द्वारा दान किए गए दस्तावेज अब भी संग्रहालय की वैध संपत्ति हैं।

बैठक में इन कागजों के मालिकाना हक़, इनके संरक्षण, कॉपीराइट और इन ऐतिहासिक दस्तावेजों को शोधकर्ताओं द्वारा इस्तेमाल किए जाने से जुड़ी चिंताओं पर भी चर्चा हुई। खासतौर पर नेहरू और एडविना माउंटबेटन के बीच हुए पत्राचार की पूरी जानकारी रखने पर जोर दिया गया।

सदस्यों ने यह भी माँग की कि जो दस्तावेज संग्रहालय से लिए गए थे, उनका फोरेंसिक ऑडिट कराया जाए ताकि यह साफ हो सके कि कहीं कोई अहम कागज गुम तो नहीं हो गया।

जनवरी 2025 में PMML की कार्यकारी परिषद का पुनर्गठन हुआ था। इसमें कई नए और प्रमुख लोगों को शामिल किया गया था। स्मृति ईरानी, नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष राजीव कुमार, रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन, फिल्म निर्देशक शेखर कपूर और कलाकार वासुदेव कामथ को इसमें सदस्य बनाया गया था।

नृपेंद्र मिश्रा को परिषद का अध्यक्ष बनाए रखा गया और उन्हें 5 साल का नया कार्यकाल दिया गया। इस बैठक में सिर्फ नेहरू पेपर्स का मामला ही नहीं उठा, बल्कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देशभर के संग्रहालयों की स्थिति को बेहतर बनाने के लिए दो नए सुझाव भी दिए।

उन्होंने पूरे देश में ‘म्यूजियम मैप’ बनाने और सभी संग्रहालयों का एक राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करने का प्रस्ताव रखा। इसके साथ ही उन्होंने आपातकाल की 50वीं वर्षगाँठ के मौके पर उससे जुड़े सभी कानूनी दस्तावेजों और घटनाओं को इकट्ठा करने की योजना भी पेश की।

भाजपा ने दस्तावेजों को बताया ऐतिहासिक

दिसंबर 2024 में भाजपा सांसद संबित पात्रा ने नेहरू से जुड़े दस्तावेजों के मामले पर प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने साफ कहा कि ये सिर्फ पारिवारिक पत्र नहीं हैं, बल्कि राष्ट्रीय महत्व के दस्तावेज हैं। पात्रा ने यह भी कहा कि जनता को यह जानने का पूरा हक है कि उन कागजों में क्या लिखा है।

यह मुद्दा पहले भी संसद में उठ चुका है, जिससे साफ होता है कि अगर सोनिया गाँधी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू होती है, तो मामला और तूल पकड़ सकता है।

राजस्थान में मिला सरस्वती नदी का ‘पेलियोचैनल’, ‘मिथक’ बताने वाले वामपंथियों के सिले होठ: सदानीरा नदी के किनारे बसती थी प्राचीन वैदिक सभ्यता, रिसर्च से आया सामने

जब भी लोग ऋग्वेद में वर्णित पवित्र सरस्वती नदी की बात करते हैं, तो वामपंथी अक्सर इसे इतिहास नहीं, बल्कि एक मिथक (कहानी) कहते हैं। लेकिन अब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने एक अहम खोज की है। राजस्थान के डीग जिले के बहज गाँव में जमीन के 23 मीटर नीचे एक प्राचीन सूखी नदी का रास्ता मिला है। यह खोज यह साबित करने में मदद कर सकती है कि सरस्वती नदी वास्तव में अस्तित्व में थी।

पेलियोचैनल एक सूखी और बंद हो चुकी पुरानी नदी का रास्ता होता है। अप्रैल 2024 से मई 2025 के बीच खुदाई में कुछ अहम चीजें मिलीं। इतिहासकारों और पुरातत्वविदों का मानना है कि यह सूखा हुआ नदी मार्ग प्राचीन सरस्वती नदी का हिस्सा हो सकता है, जिसका जिक्र ऋग्वेद में है। खुदाई में यह भी पता चला कि यहाँ लगभग 3500 से 1000 ईसा पूर्व के बीच लोग रहते थे। ये सब निशान कुषाण, मगध और शुंग (या शुंगा) राजवंश के समय के हैं। भारत के पुरातात्विक इतिहास में यह पहली बार है जब किसी पेलियोचैनल की खोज हुई है।

बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में एक कार्यक्रम के दौरान एएसआई जयपुर के वरिष्ठ पुरातत्वविद विनय गुप्ता ने कहा कि यह प्राचीन नदी प्रणाली शुरुआती मानव बस्तियों के विकास में मददगार थी और बहज क्षेत्र को बड़ी सरस्वती नदी सभ्यता से जोड़ती है।

उन्होंने यह भी कहा कि यह पेलियोचैनल (सूखी नदी का मार्ग) एक अनोखी खोज है, जो यह साबित करती है कि प्राचीन जल स्रोतों ने यहाँ सभ्यता को पनपने में मदद की थी। ASI ने अपनी रिपोर्ट संस्कृति मंत्रालय को सौंप दी है, जो अब यह तय करेगा कि इस जगह को कैसे संरक्षित किया जाए। इस सूखी नदी के अलावा, ASI की टीम को मिट्टी के खंभों वाले मकानों के अवशेष, परतों वाली दीवारें, भट्ठियाँ और लोहे व ताँबे की चीजें भी मिली हैं।

टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI) की रिपोर्ट के अनुसार, खुदाई में मिले छोटे-छोटे पत्थर के औजार (जिन्हें माइक्रोलिथिक टूल्स कहते हैं) यह बताते हैं कि इस जगह पर इंसानों की बस्ती अत्यंत प्राचीन समय यानी होलोसीन काल से भी पहले की हो सकती है।

टीम को कई हिंदू धार्मिक वस्तुएँ भी मिलीं। इनमें 15 यज्ञ कुंड, शक्ति पूजा के लिए बनाए गए छोटे जल कुंड, और शिव व पार्वती की मिट्टी की मूर्तियाँ शामिल हैं, जो लगभग 1000 ईसा पूर्व की हैं। इसके अलावा, महाजनपद काल के भी यज्ञ कुंड मिले हैं। इनमें से ज्यादातर कुंडों में रेत भरी हुई थी और उनमें छोटे मटके थे, जिनमें बिना लिखावट वाले तांबे के सिक्के रखे गए थे।

सबूतों के बावजूद सरस्वती नदी के अस्तित्व को नकारते रहे वामपंथी

ऋग्वेद में सरस्वती नदी को ‘अम्बितमे, नदितमे, देवितमे’ कहा गया है, जिसका अर्थ है: ‘सबसे उत्तम माँ, सबसे उत्तम नदी और सबसे उत्तम देवी।’ ऋग्वेद के मंत्रों में लगभग 50 बार सरस्वती नदी का उल्लेख मिलता है, जो यह दिखाता है कि यह नदी ऋग्वैदिक समाज और हिंदू धर्म के लिए कितनी महत्वपूर्ण थी।

सरस्वती को ‘गुप्तगामिनी’ भी कहा जाता है, जिसका मतलब है, ‘वह नदी जिसका प्रवाह छिपा हुआ है।’ प्राचीन काल में यह एक विशाल और पवित्र नदी मानी जाती थी, लेकिन समय के साथ इसकी वास्तविकता पर विवाद शुरू हो गया।

हालाँकि अब वैज्ञानिक और पुरातात्विक खोजें यह संकेत दे रही हैं कि एक विशाल प्राचीन नदी प्रणाली वास्तव में मौजूद थी, जो ऋग्वेद के वर्णनों से मेल खाती है, फिर भी कुछ वामपंथी इतिहासकार और प्रोपेगंडा फैलाने वाले मीडिया समूह लगातार इस विषय पर सच्चे शोध को भी खारिज करते रहे हैं। वे सरस्वती को केवल एक मिथक या प्रतीकात्मक कल्पना बताने की कोशिश करते हैं, न कि एक वास्तविक भौगोलिक नदी।

सरस्वती नदी के अस्तित्व या संभावित अस्तित्व को लेकर वामपंथी ‘विद्वानों’ और ‘मीडिया’ का जो रवैया दिखता है, वह ऊपर से देखने पर केवल एक शैक्षणिक असहमति लगता है। लेकिन असल में यह केवल शैक्षणिक नहीं है। हिंदू विरोधी वामपंथी समूह लंबे समय से उन शोधों और खोजों को नजरअंदाज या खारिज करते आ रहे हैं जो वैदिक परंपराओं की प्राचीनता और निरंतरता को साबित करते हैं। ये लोग ऋग्वेद और अन्य वैदिक ग्रंथों की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्ता को कमजोर करने की कोशिश करते हैं, जबकि ये ग्रंथ हिंदू सभ्यता की नींव माने जाते हैं।

असल में वामपंथी मीडिया में बार-बार सरस्वती नदी को ‘मिथक’ (काल्पनिक) कहकर बुलाना एक सुनियोजित प्रयास है, जिससे आम लोगों खासकर हिंदुओं के मन में यह बैठाया जा सके कि सरस्वती नदी सिर्फ एक कहानी है, न कि हकीकत। यह एक तरह की ब्रेनवॉशिंग है, जबकि पुरातात्विक साक्ष्य और वैज्ञानिक शोध बता रहे हैं कि यह नदी वास्तव में अस्तित्व में थी।

वामपंथी प्रोपगैंडा पोर्टल ‘द वायर’ ने भी लगातार सरस्वती नदी के अस्तित्व से इनकार किया है। यह पोर्टल न केवल इस विषय पर हो रहे शोध को नकारात्मक रूप से पेश करता है, बल्कि भारत की प्राचीन नदी प्रणालियों पर हो रही वैज्ञानिक खोजों का भी बिना सोचे-समझे मजाक उड़ाता है।

फरवरी 2019 में द वायर ने एक लेख छापा जिसका शीर्षक था ‘सरस्वती: वह नदी जो कभी थी ही नहीं, लेकिन हमेशा लोगों के दिलों में बहती रही।’ इस लेख में लेखक ने रोमिला थापर, इरफान हबीब और कुछ अन्य वामपंथी इतिहासकारों का जिक्र किया, जो पहले भी इस्लामी आक्रमणकारियों और अत्याचारियों का महिमामंडन और साथ ही साथ हिंदू इतिहास को कमजोर या छोटा करके दिखाने की कोशिश करते रहे हैं।

द वायर ने अपने एक लेख में दावा किया कि सरस्वती नदी शायद वैदिक आर्यों की एक मानसिक कल्पना मात्र थी, जो उन्होंने तब गढ़ी जब वे सिंधु और यमुना के बीच के शुष्क इलाके में पहुँचे, जहाँ पानी की बहुत कमी थी। लेख में कहा गया कि हाल की खोजों से यह साबित नहीं होता कि हड़प्पा काल में इस क्षेत्र में कोई ‘बारह-मासी नदी’ थी। लेख में इस बात पर भी नाराजगी जताई गई कि सरकार ने एक ‘अस्तित्वहीन’ नदी की खोज पर 50 करोड़ रुपये खर्च करने का फैसला किया।

2021 में द वायर ने फिर सरकार की आलोचना की जब हरियाणा के कुरुक्षेत्र में सरस्वती नदी पर शोध के लिए ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस फॉर रिसर्च ऑन द सरस्वती रीवर’ (CERSR) की स्थापना की गई। द वायर ने अपने लेख का शीर्षक रखा ‘हाउ द इंडियन गवरमेंट इज पुशिंग मनी डाउन अ माइथोलॉजिकल रीवर’। इसमें मोदी सरकार के सरस्वती नदी का पता लगाने के प्रयासों को एक ‘हिंदू परियोजना’ कहा गया।

एक वास्तुकार और मूर्तिकार द्वारा लिखे गए लेख में इस बात पर भी अफसोस जताया गया था कि केंद्र सरकार चार धाम को जोड़ने और काशी-विश्वनाथ कॉरिडोर पर पैसा खर्च कर रही है, जिससे पता चलता है कि सरकार हिंदू ‘पौराणिक कथाओं’ को बढ़ावा दे रही है। 

इसमें यह भी कहा गया कि सरस्वती एक पौराणिक नदी है और पौराणिक कथाएँ तत्काल परिणाम देती हैं जबकि विज्ञान धीमा और साक्ष्य-आधारित है, इसलिए मोदी सरकार को इससे तुरंत लाभ नहीं मिल सकता है।

अगस्त 2018 में द वायर ने पत्रकार से यूट्यूबर बने रविश कुमार को भी मंच दिया, जहाँ उन्होंने सरस्वती नदी पर हो रहे शोध और सरकार के प्रयासों का मजाक उड़ाया। उन्होंने इस पूरे प्रयास को एक तरह के राजनीतिक और धार्मिक एजेंडे के तौर पर पेश किया।

जनवरी 2018 में ‘स्क्रॉल’ ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी, जिसमें सरस्वती नदी के अध्ययन के लिए एक स्थाई समिति के गठन की बात की गई थी। लेख के आखिरी पैराग्राफ में हमेशा की तरह सरस्वती नदी के अस्तित्व पर संदेह जताया गया।

ऐसे कई लेख हैं जो सरस्वती नदी को ‘मिथक’ (पौराणिक) नदी कहते हैं। जहाँ इस नदी की खोज को एक ‘हिंदू प्रोजेक्ट’ बताया जाता है, और जो भी विद्वान, इतिहासकार या पुरातत्वविद वेदों में वर्णित विवरणों के आधार पर इतिहास और अवशेषों की खोज करते हैं, उन्हें ‘हिंदुत्व से प्रभावित’ कहा जाता है।

वाममपंथी विचारधारा वाले ‘बुद्धिजीवियों’ द्वारा लिखे जाने वाले इन लेखों में अक्सर यह संकेत दिया जाता है कि प्राचीन हिंदू ग्रंथों में दिए गए वर्णनों से मेल खाने वाली जगहों की खुदाई का चलन अब आम हो गया है और इसे हिंदू राष्ट्रवादियों के ‘पुनर्जागरणवादी एजेंडे’ का हिस्सा बताया जाता है।

2001 में आयोजित इंडियन हिस्ट्री कॉन्ग्रेस में मुगल शासन की तारीफ करने और हिंदुओं को नकारात्मक रूप में दिखाने वाले वामपंथी इतिहासकार इरफान हबीब ने एक शोध पत्र प्रस्तुत किया था। इस लेख का शीर्षक था – ‘इमौजिन रीवर सरस्वती : अ डिफेंस ऑफ कॉमन सेंस।’

इसमें इरफान हबीब ने न सिर्फ कभी समृद्ध रही सरस्वती नदी की भव्यता को खारिज किया, बल्कि यह भी दावा किया कि सरस्वती के अस्तित्व से जुड़ी बातें बढ़ा-चढ़ाकर पेश की गई हैं, ताकि हिंदू केंद्रित इतिहास को बढ़ावा दिया जा सके। रोमिला थापर भी उन वामपंथी-मार्क्सवादी इतिहासकारों में शामिल रही हैं, जिन्होंने घग्गर-हकरा नदी तंत्र को प्राचीन सरस्वती नदी से जोड़ने वाले शोध और निष्कर्षों को नकारा है।

वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोग वैदिक ग्रंथों और हिंदू शास्त्रों को अविश्वसनीय मानते हैं। उनके लिए इन ग्रंथों में जो कुछ भी लिखा है, वह ‘मिथक’ यानी काल्पनिक होता है। लेकिन अब वैज्ञानिक शोध की बढ़ती संख्या यह संकेत दे रही है कि उत्तर-पश्चिम भारत में ऐसे पेलियोचैनल (प्राचीन नदी मार्ग) पाए गए हैं, जो वेदों में वर्णित सरस्वती नदी के विवरणों से मेल खाते हैं।

2019 में IIT बॉम्बे और फिजिकल रिसर्च लैब, अहमदाबाद के वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं की एक टीम ने एक रिपोर्ट में कहा कि उन्होंने उत्तर-पश्चिम भारत के मैदानों में एक सदानीरा (हमेशा बहने वाली) नदी के प्रमाण पाए हैं। इसी नदी के किनारे प्रारंभिक हड़प्पा सभ्यता का विकास हुआ था।

इससे पहले यह माना जाता था कि हड़प्पा सभ्यता पूरी तरह मानसून पर निर्भर थी, लेकिन अब शोध से यह पता चला है कि इस क्षेत्र में मौजूद घग्गर नदी के पुराने रास्ते के साथ-साथ कई हड़प्पा बस्तियाँ बसी हुई थीं। यह नदी अब मौसमी (सीजनल) बहाव वाली है, लेकिन इसके प्राचीन मार्ग सरस्वती नदी से जुड़े माने जा रहे हैं।

फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी-अहमदाबाद और IIT बॉम्बे के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए संयुक्त शोध में यह बताया गया है कि उत्तर-पश्चिम भारत में, आज की घग्गर नदी के मार्ग के साथ-साथ एक समय में सदानीरा (हमेशा बहने वाली) नदी बहती थी। वैज्ञानिकों का मानना है कि यही नदी प्राचीन सरस्वती नदी थी, जिसका उल्लेख ऋग्वेद में हुआ है।

शोध के अनुसार, यह सरस्वती नदी हिमालय के ऊपरी क्षेत्रों से 7000 ईसा पूर्व से 2500 ईसा पूर्व तक बहती रही। इसी नदी के किनारे हड़प्पा सभ्यता की सबसे पहली बस्तियाँ 3000 ईसा पूर्व से 1900 ईसा पूर्व के बीच बसी थीं। शोध में यह भी कहा गया है कि जब सरस्वती नदी का प्रवाह कम हुआ और अंत में समाप्त हो गया, तो इसका सीधा असर हड़प्पा सभ्यता के पतन पर पड़ा।

इसके अलावा नदी और सभ्यता दोनों का पतन लगभग उसी समय हुआ जब करीब 4200 साल पहले ‘मेघालय चरण’ की शुरुआत हुई। यह एक ऐसा समय था जब दुनियाभर में जलवायु शुष्क होने लगी। अध्ययन में शामिल वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि जहाँ सरस्वती का उद्गम गंगा, यमुना और सतलज के समान हिमालय के हिमनद क्षेत्रों में था, वहीं वर्तमान घग्गर का उच्च हिमालय से कोई सीधा संबंध नहीं है तथा इसका उद्गम हिमालय की तराई शिवालिक से होता है।

शोध के दौरान फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी (PRL) में रेडियोकार्बन और ऑप्टिकल स्टिमुलेटेड ल्यूमिनेसेंस (OSL) तरीकों से सतह की उम्र का निर्धारण किया गया। वैज्ञानिक जे.एस. रे बताते हैं कि उन्होंने पाया कि सरस्वती नदी का प्रवाह लगभग 80,000 साल पहले से निरंतर बहता था और यह 20,000 साल पहले तक चलता रहा। इसके बाद नदी का प्रवाह बर्फीले युग (ग्लेशियल पीरियड) के अत्यधिक शुष्क होने के कारण घटने लगा। हालाँकि लगभग 9000 साल पहले नदी का प्रवाह फिर से मजबूत हुआ और 4500 साल पहले तक यह लगातार बहती रही।

शोध में यह भी कहा गया कि सरस्वती नदी के प्रवाह के घटने की मुख्य वजह सतलज से जुड़े जल मार्गों का सूखना था। बाद के हिंदू ग्रंथों जैसे महाभारत में भी सरस्वती नदी के घटते प्रवाह से गायब होने तक का वर्णन मिलता है।

शोध रिपोर्ट में कहा गया है, “घग्गर नदी का यह पुनर्जीवित सदानीरा (हमेशा बहने वाली) रूप, जिसे सरस्वती से जोड़ा जा सकता है, संभवतः हड़प्पा सभ्यता के शुरुआती बस्तियों के विकास में मददगार था। नदी का यह अंततः घटता हुआ प्रवाह, जो सभ्यता के पतन का कारण बना, लगभग उसी समय हुआ जब मेघालय चरण की शुरुआत हुई।”

शोध में यह भी बताया गया, “हमारा अध्ययन यह सामने लाता है कि हड़प्पा सभ्यता के लोग अपनी शुरुआती बस्तियाँ घग्गर नदी के उस मजबूत चरण के किनारे बसा रहे थे, जो लगभग 9000 से 4500 साल पहले था, और जिसे बाद में सरस्वती नदी कहा गया। हालाँकि जब यह सभ्यता परिपक्व हुई, तब तक नदी ने अपनी ग्लेशियल (बर्फीली) कनेक्टिविटी खो दी थी।”

अपनी किताब ‘द लैंड ऑफ सेवेन रीवर्स’ में प्रसिद्ध इतिहासकार और अर्थशास्त्री संजीद सान्याल ने टिप्पणी की है कि सरस्वती नदी के मार्ग के बदलने में भूवैज्ञानिक बदलाव (टेक्टोनिक शिफ्ट) की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। गुजरात का धोलावीरा जो कच्छ के रण में स्थित है, भी इसका एक उदाहरण है। वह कहते हैं, ‘यदि वहाँ पानी का कोई स्रोत नहीं होता, तो कोई भी सभ्यता उस जगह पर शहर नहीं बसा सकती थी।’

सान्याल ने यह भी माना है कि हड़प्पा सभ्यता का अंत सरस्वती नदी के समाप्त होने के कारण हो सकता है। उन्होंने यह सुझाव दिया कि इन शहरों में रहने वाले लोग नदी के खत्म होने के बाद गंगा के मैदानी इलाकों की ओर चले गए होंगे।

दिलचस्प बात यह है कि 2013 में लोकसभा में हरीश चौधरी द्वारा सरस्वती नदी के बारे में एक सवाल पूछा गया था। चूँकि ISRO प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के तहत कार्य करता है, इसलिए इस सवाल का जवाब सीधे प्रधानमंत्री को दिया गया। इस सवाल के जवाब में सरकार ने कहा कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने उत्तर-पश्चिम भारत में पेलियोचैनल्स का अध्ययन किया और उन्हें सरस्वती नदी के चैनलों से जोड़ा है।

सरकार ने कहा, “सरस्वती नदी के एकीकृत पेलियोचैनल मानचित्र को हिमालय से लेकर कच्छ के रण तक तैयार किया गया है। उत्तर-पश्चिम भारत में सरस्वती नदी के पेलियोचैनल के मानचित्र वाले मार्ग का संबंध हिमालय की सदानीरा (हमेशा बहने वाली) स्रोत से किया गया है, जो सतलज और यमुना नदियों के माध्यम से जुड़ा हुआ था।”

सरकार ने यह भी बताया कि उत्तर-पश्चिम भारत में सरस्वती नदी के पूरे मार्ग का निर्धारण भारतीय रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट डेटा और डिजिटल ऊँचाई मॉडल (DEM) का उपयोग करके किया गया। सैटेलाइट इमेजेज मल्टीस्पेक्ट्रल और मल्टीटेम्पोरल होती हैं, जिनमें एक सिनॉप्टिक (समग्र) दृश्य मिलता है, जो पेलियोचैनल्स का पता लगाने में मदद करता है।

पेलियोचैनल्स को ऐतिहासिक मानचित्रों, पुरातात्त्विक स्थलों, जलविज्ञान और ड्रिलिंग डेटा का उपयोग करके प्रमाणित किया गया। यह भी देखा गया कि प्रमुख हड़प्पा स्थल जैसे कालिबंगन (राजस्थान), बनावली और रेखीगढ़ी (हरियाणा), धोलावीरा और लोथल (गुजरात) सरस्वती नदी के किनारे स्थित हैं।

घग्गर-हकरा नदी प्रणाली के आसपास कई प्रमुख हड़प्पा स्थलों की खोज हुई है, जैसे कालिबंगन, रेखीगढ़ी और धोलावीरा। इससे संकेत मिलता है कि इस क्षेत्र में कभी एक बड़ी नदी बहती थी, जिसने सिंधु घाटी सभ्यता (जिसे कई बार सिंधु-सरस्वती सभ्यता भी कहा जाता है) के विकास में अहम भूमिका निभाई।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के पूर्व महानिदेशक पुरातत्वविद ब्रज बासी लाल (बी.बी. लाल)इस मत के मजबूत पक्षधर रहे हैं कि इन हड़प्पा स्थलों का जो भौगोलिक वितरण है, वह सरस्वती नदी के मार्ग से मेल खाता है, न कि केवल सिंधु (इंडस) नदी से। इसका मतलब यह है कि सरस्वती नदी भी हड़प्पा सभ्यता का एक केंद्रीय हिस्सा रही होगी।

यह भी दिलचस्प है कि कालिबंगन में हुई खुदाई में वैदिक यज्ञ वेदियाँ और यूप स्तंभ मिले हैं, जो वैदिक और हड़प्पा सभ्यताओं के बीच सांस्कृतिक और धार्मिक निरंतरता का संकेत देते हैं। हालाँकि, बी.बी. लाल जैसे विद्वानों को कई बार वामपंथी-लिबरल समूह द्वारा ‘हिंदुत्व-प्रभावित’ कहकर बदनाम किया गया है, जबकि उनका काम ठोस शोध पर आधारित रहा है।

सरस्वती नदी को जानबूझकर ‘मिथक’ (काल्पनिक) कहकर खारिज करना, एक सोची-समझी कोशिश है ताकि हिंदू धर्मग्रंथों, खासकर वेदों की ऐतिहासिक विश्वसनीयता को कमजोर किया जा सके। यह बात तो समझी जा सकती है कि केवल धार्मिक ग्रंथों पर ही इतिहास लिखना उचित नहीं है, भले ही वे ग्रंथ हिंदू संस्कृति की नींव हों और वैदिक युग के जीवन व समाज की विस्तृत जानकारी देते हों, लेकिन समस्या तब होती है जब वामपंथी विचारधारा से जुड़े लोग वैध शोध पत्रों, पुरातात्त्विक खोजों और अन्य प्रमाणों को खारिज कर देते हैं, वो भी सिर्फ इसलिए कि कोई बात उनके एजेंडे से मेल नहीं खाती। वे न सिर्फ इन तथ्यों को नकारते हैं, बल्कि इस दिशा में आगे और शोध या खोज को रोकने की कोशिश भी करते हैं।

वामपंथी और अन्य हिंदू-विरोधी तत्व, जो लंबे समय से आर्य आक्रमण सिद्धांत (Aryan Invasion Theory – AIT) के समर्थक रहे हैं, केवल हिंदू ग्रंथों की ऐतिहासिकता को कमजोर करने के उद्देश्य से ही नहीं, बल्कि सरस्वती नदी को ‘मृत नदी’ कहकर उसकी खोज और अध्ययन का भी विरोध करते हैं। जबकि शोध यह दिखाते हैं कि सरस्वती नदी का सदानीरा रूप लगभग 9,000 से 4,500 साल पहले तक रहा और ऋग्वेद में इसका उल्लेख एक विशाल और बहती हुई नदी के रूप में है, जो 1900 ईसा पूर्व से पहले का समय हो सकता है।

कई विद्वानों का मानना है कि यह समय-सीमा वैदिक युग को परिपक्व हड़प्पा काल (2600-1900 ईसा पूर्व) के साथ जोड़ती है। इसका मतलब यह हो सकता है कि वैदिक और हड़प्पा सभ्यताएँ समकालीन (एक ही समय में मौजूद) थीं या शायद एक ही संस्कृति का हिस्सा थीं। यह खास बात है कि हड़प्पा स्थलों पर वैदिक धार्मिक तत्वों की खोज, किसी भी तरह के हिंसक आक्रमण के पुरातात्त्विक प्रमाणों की कमी और आनुवांशिक अध्ययनों में भारतीयों में बहुत कम स्टेपी (Steppe) वंश का पाया जाना, इन सभी ने आर्य आक्रमण सिद्धांत (Aryan Invasion Theory) के समर्थकों को बड़ा झटका दिया है।

अब तक के अध्ययनों ने विघटनकारी और हिंसक विदेशी आक्रमण के बजाय सांस्कृतिक निरंतरता का संकेत दिया है। यहाँ तक कि जब वामपंथी इतिहासकारों और विद्वानों ने ‘आक्रमण’ शब्द की जगह ‘प्रवासन’ (immigration) का इस्तेमाल कर नैरेटिव को बदलने की कोशिश की, तब भी उन्हें खास सफलता नहीं मिली।

सरस्वती नदी के अस्तित्व से इनकार करना, वामपंथियों को आर्य आक्रमण सिद्धांत (AIT) को किसी तरह जिंदा रखने में मदद करता है। अगर सरस्वती नदी को वास्तविक माना जाए, तो उन्हें ऋग्वेद की समय-सीमा को सिंधु घाटी सभ्यता के साथ मिलाने की जरूरत पड़ेगी, जो उनके नैरेटिव को पूरी तरह उल्टा कर देता है।

इसी वजह से जब NCERT ने अपने पाठ्यक्रम में हड़प्पा सभ्यता का नाम बदलकर ‘सिंधु-सरस्वती सभ्यता’ किया, तो वामपंथी और तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग में बड़ी नाराजगी देखी गई। असल में सरस्वती नदी के अस्तित्व को स्वीकार करना न केवल वैदिक संस्कृति की प्राचीनता को प्रमाणित करता है, बल्कि मैक्समूलर जैसे विदेशी विद्वानों द्वारा फैलाए गए उस पुराने और विभाजनकारी दावे को भी झूठा साबित करता है जिसमें कहा गया है कि विदेशी आर्यों ने भारत आकर मूल द्रविड़ों को हराया और सिंधु घाटी सभ्यता को नष्ट कर दिया।

दिलचस्प बात यह है कि नवबौद्ध विचारधारा से जुड़े कुछ लोग आज भी आर्य-आक्रमण सिद्धांत को ही सच मानते हैं, जबकि ऑपइंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, उनके सबसे बड़े प्रेरणास्रोत डॉ. भीमराव अंबेडकर ने भी अपने तर्कों और तथ्यों के आधार पर आर्य आक्रमण सिद्धांत को खारिज कर दिया था।

निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि भले ही वामपंथी-लिबरल समूह ने हिंदू इतिहास को बदनाम करने और सरस्वती नदी को केवल एक ‘मिथक’ साबित करने के लिए हर संभव कोशिश की, लेकिन लगातार मिल रहे पुरातात्विक प्रमाण इस ओर इशारा करते हैं कि जिसे वे ‘मिथक’ कहते हैं, वह वास्तव में एक ऐतिहासिक सच हो सकता है, जिसे अब तक पूरी तरह खोजा नहीं गया है।

इसलिए जरूरत है कि सरस्वती नदी पर और अधिक गहराई से शोध किया जाए, ताकि उसके हड़प्पा और वैदिक संस्कृतियों से संबंध को बेहतर तरीके से समझा जा सके। वहीं सरस्वती नदी और हड़प्पा और वैदिक संस्कृतियों से इसके संबंध पर भी और अधिक शोध किया जाना चाहिए ताकि प्राचीन नदी और स्वदेशी वैदिक-हड़प्पा सातत्य में इसकी भूमिका का पता लगाया जा सके।

यह लेख मूल रूप से अंग्रेजी भाषा में श्रद्धा पाण्डेय ने लिखी है। इसे पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।