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‘राहुल, प्रियंका को अनुभव नहीं, विधानसभा चुनाव में सिद्धू के खिलाफ खड़ा करूँगा मजबूत उम्मीदवार’: कैप्टेन अमरिंदर सिंह

पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने बुधवार (22 सितंबर 2021) को कॉन्ग्रेस पार्टी के नेताओं पर हमला बोला। उन्होंने कहा, “कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी वाड्रा में अनुभव की कमी है।” अमरिंदर सिंह ने कहा कि वह आगामी विधानसभा चुनावों में राज्य के कॉन्ग्रेस चीफ नवजोत सिंह सिद्धू के खिलाफ एक मजबूत उम्मीदवार खड़ा करेंगे।

पूर्व सीएम ने कहा, ”सिद्धू को पंजाब का सीएम उम्मीदवार बनने से रोकने के लिए वह पूरी ताकत लगा देंगे। कैप्टन ने सिद्धू को खतरनाक आदमी बताते हुए कहा कि ऐसे लोगों से देश को बचाने की जरूरत है। उन्होंने कहा, ”वह राज्य को ऐसे खतरनाक आदमी से बचाने के लिए कोई भी कदम उठाने को तैयार हैं।”

अमरिंदर सिंह ने एक इंटरव्यू में कहा, ”प्रियंका गाँधी और राहुल गाँधी मेरे बच्चे जैसे हैं। कोई चीज ऐसे नहीं खत्म होनी चाहिए। मैं आहत हूँ।” उन्होंने कहा कि राहुल और प्रियंका अनुभवी नहीं हैं। उनके सलाहकार उन्हें गुमराह कर रहे हैं।

कैप्टन ने खुलासा किया कि उन्होंने कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी को 3 हफ्ते पहले ही अपने इस्तीफे की पेशकश कर दी थी, लेकिन उन्होंने उन्हें पद पर बने रहने को कहा था। पूर्व सीएम ने कहा, ”अगर वह मुझे बुलाकर इस्तीफा देने के लिए कहतीं तो मैं तुरंत इस्तीफा दे देता।” उन्होंने आगे कहा कि बतौर एक फौजी मुझे पता है कि कैसे काम करना है और कैसे वापस आना है।

उन्होंने एक बयान में कहा, “मैं विधायकों को गोवा या कहीं और फ्लाइट में नहीं ले जाता। मैं इस तरह से काम नहीं करता। मैं नौटंकी नहीं करता और दोनों भाई-बहन जानते हैं कि यह मेरा तरीका नहीं है।”

अमरिंदर सिंह ने हाल ही में प्रदेश कॉन्ग्रेस में अंदरूनी कलह के बीच पंजाब के सीएम पद से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने कॉन्ग्रेस आलाकमान से कहा था कि वो अपमान बर्दाश्त नहीं करेंगे। उन्होंने राजभवन जाकर पंजाब के राज्यपाल बनवारीलाल पुरोहित को अपना इस्तीफा सौंपा था।

गुजरात के दुष्प्रचार में तल्लीन कॉन्ग्रेस क्या केरल पर पूछती है कोई सवाल, क्यों अंग विशेष में छिपा कर आता है सोना?

गुजरात में मुंद्रा पोर्ट पर हेरोइन का एक कन्साइनमेंट पकड़ा गया। चूँकि मुंद्रा पोर्ट का प्रबंधन अडानी ग्रुप के पास है इसलिए सोशल मीडिया पर अडानी ग्रुप के विरुद्ध एक दुष्प्रचार चलाया गया। इस दुष्प्रचार की शुरुआत कॉन्ग्रेस पार्टी के ट्विटर हैंडल से की गई जिसमें पूछा गया कि; देश में और भी तो पोर्ट हैं लेकिन ड्रग्स स्मगलर केवल गुजरात को ही क्यों इस्तेमाल करना चाहते हैं?

एक और ट्वीट में सवाल किया गया कि; क्या कारण हैं कि 3000 किलो ड्रग्स की बरामदगी उस राज्य से हुई जिस राज्य से प्रधानमंत्री आते हैं, गृह मंत्री आते हैं और वो भी एक निजी पोर्ट पर बरामद होना। आखिर क्या कारण है कि यहाँ सब चुप हैं? बाद में सोशल मीडिया पर सक्रिय लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम ने उसे आगे बढ़ाने का काम किया। 


तरह-तरह के प्रश्न उठाए गए। उद्देश्य एक ही था; हमेशा की तरह गुजरात और अडानी की मानहानि की जाए। प्रश्न इस तरह से उठाए गए जैसे व्यापार के लिए सदियों से प्रसिद्ध गुजरात में केवल ड्रग्स का व्यापार होता है या फिर वहाँ का प्रशासन ड्रग्स के इस व्यापार को एक तरह की सुरक्षा प्रदान करता है। 


गुजरात लगभग ढाई दशकों से लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम को राजनीतिक कारणों से खटकता रहा है। इसके पीछे का कारण यह है कि पिछले लगभग पच्चीस वर्षों से कॉन्ग्रेस के पास गुजरात की सत्ता नहीं रही है। इसलिए कभी मोदी को आगे रखकर राज्य की आलोचना की जाती है तो कभी भाजपा और हिंदुत्व को आगे रखकर, कभी गुजरात मॉडल के नाम पर तो कभी अर्थवाद के नाम पर। विरोध का माहौल इतना घिनौना है कि गुजरात और गुजरातियों पर शाकाहार के नाम पर भी आसानी से निशाना साध लिया जाता है और इस आलोचना को सामान्य बनाने की कोशिश होती है। एक लेफ्ट-लिबरल बुद्धिजीवी ने तो गुजरात की आलोचना यह कहते हुए भी की थी कि गुजरातियों के नाम पर सेना में कोई रेजिमेंट नहीं है। तब उनकी बात सुनकर यह लगा था कि सेना में एक शायर रेजिमेंट होता तो गुजरात रेजिमेंट न रहने को लेकर उनकी शिकायत को उचित ठहराने के लिए पूरा इकोसिस्टम महीनों तक लड़ता।

गुजरात के विरुद्ध इस दुष्प्रचार की शुरुआत प्रदेश को हिंदुत्व की प्रयोगशाला घोषित करने के साथ हुई थी। लगभग ढाई दशक पहले राज्य को मीडिया डिस्कोर्स में हिंदुत्व की प्रयोगशाला बताना आम बात थी। हाल यह था कि अर्थव्यवस्था और फ़िल्म सम्बंधित बहस में भी किसी न किसी बहाने लेफ्ट-लिबरल-सेक्युलर संपादक यह एक वाक्य बोलना नहीं भूलते थे और दिन में कम से कम दो बार राज्य को हिंदुत्व की प्रयोगशाला बताते थे। इसके साथ ही हिंदुत्व को हिंदुइज्म से अलग करने के प्रयासों की शुरुआत हुई थी जिसमें दोनों के बीच एक बनावटी अंतर बता हिंदुत्व को राजनीतिक सत्ता के साथ जोड़कर आम हिंदुओं से अलग करने की एक पूरी नीति अपनाई गई थी।

मीडिया डिस्कोर्स में गुजरात के विरुद्ध की गई यही शुरुआत आगे चलकर अलग-अलग रूप में सामने आती गई। मुंद्रा पोर्ट पर राजस्व खुफिया निदेशालय (DRI) द्वारा ड्रग्स की बरामदगी को लेकर कॉन्ग्रेस पार्टी ने जो दुष्प्रचार किया, वह लगभग ढाई दशक से गुजरात के विरुद्ध चल रहे दुष्प्रचार का सबसे नया संस्करण है। गुजरात को इतने स्तरों और इतनी बातों के बहाने निशाना बनाने के बावजूद इसे लेकर गुजरात में कोई विशेष विरोध नहीं देखा गया। कारण चाहे जो हो, ऐसे विरोधों को नजरअंदाज कर देने का राज्य और राज्य वासियों का गुण सहज जान पड़ता है। पर क्या किसी और राज्य के विरुद्ध इस तरह का दुष्प्रचार लगातार चलाना किसी भी व्यक्ति, संस्था या राजनीतिक दल के लिए सरल रहता?

इसे लेकर हम सब अपना-अपना अनुमान लगा सकते हैं। जैसे पिछले लगभग डेढ़ वर्षों से केरल के हवाई अड्डों पर शरीर के एक ही अंग में सोना छिपा कर लाने के मामले लगातार होते रहे हैं। उसे लेकर क्या देश की किसी राष्ट्रीय पार्टी द्वारा यह पूछा जा सकता है कि; देश में और तमाम हवाई अड्डे हैं पर केवल केरल के ही हवाई अड्डों पर अंग विशेष में सोना छिपा कर क्यों लाया जा रहा है? क्या वहाँ की सरकार या उसके मंत्री इन स्मगलर से मिले हुए हैं? कल्पना कीजिए कि यदि भारतीय जनता पार्टी यही प्रश्न पूछ लेती तो क्या-क्या हो सकता था?       

अडानी ग्रुप द्वारा एक प्रेस विज्ञप्ति जारी कर दी गई है पर कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा शुरू किया गया यह दुष्प्रचार जल्द खत्म हो जाएगा, इसकी संभावना कम ही है। यह कॉन्ग्रेसी और लेफ्ट-लिबरल प्रोपेगेंडा का चरित्र रहा है कि उसे तथ्यों के सार्वजनिक होने के बाद भी कोई फर्क नहीं पड़ता। पार्टी की यह रणनीति हम कई और मामलों में देख चुके हैं। सर्वोच्च न्यायालय में रफाल को लेकर हुए मुक़दमे और उसका फैसला आने के बाद माफी माँगने वाले राहुल गाँधी बीच-बीच में फिर वही बातें दोहराने लगते हैं जिनके लिए उन्होंने माफी माँगी थी। ऐसे में कॉन्ग्रेस पार्टी दुष्प्रचार को लेकर अपने उस रिकॉर्ड की रक्षा के लिए सबकुछ करेगी जिसमें तथ्यों से उसका कुछ लेना-देना नहीं होता। दुष्प्रचार की यह कॉन्ग्रेसी मशीन चलती रहेगी और प्रोपेगंडा का उत्पादन होता रहेगा।

‘मुंबई डायरीज 26/11’: Amazon Prime पर इस्लामिक आतंकवाद को क्लीन चिट देने, हिन्दुओं को बुरा दिखाने का एक और प्रयास

देश के लोग आज भी 26 नवंबर 2008 की तारीख को नहीं भूला पाए हैं, जब पाकिस्तानी आतंकवादियों ने सैकड़ों लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया था। तब से पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के खिलाफ भारत की लड़ाई जारी है। भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई को झकझोर देने वाले हमले ने न केवल हमें अपने सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने का एहसास कराया, बल्कि हम सभी को खासकर सरकारी महकमे को नींद से जगाने का काम किया है। वीडियो फुटेज के कई दृश्य अभी भी हमारी यादों में ताजा हैं।

ओटीटी प्लेटफॉर्म पर 26/11 की घटना पर बनी दो वेब सीरीज ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा है। पहली ‘स्टेट ऑफ सीज: 26/11’ जो मार्च 2020 में Zee 5 पर रिलीज की गई थी और दूसरी हाल ही में Amazon Prime पर रिलीज हुई ‘मुंबई डायरीज 26/11′ है। ‘मुंबई डायरीज 26/11’ वेब सीरीज को डॉक्टरों, नर्सों, वार्ड बॉय, सुरक्षा गार्ड, पुलिसकर्मियों, पत्रकारों के नजरिए से दिखाया गया है, जिन्होंने आतंकी हमले के दिन धैर्य और साहस से काम लिया।

मोहित रैना और कोंकणा सेन शर्मा ने इस वेब सीरीज में दमदार प्रदर्शन किया है। ये भी कह सकते हैं कि ये उनका अब तक का शायद सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है, लेकिन यह वास्तविकता से हटकर है। दरअसल, ‘मुंबई डायरीज 26/11’ में आतंकवाद की बजाए धर्मनिरपेक्षता को अधिक महत्व दिया गया है।

हमेशा की तरह, ‘मुस्लिम’ धर्मनिरपेक्ष और सहिष्णु है

इस बार 26/11 हमले को ओटीटी प्लेटफॉर्म पर धर्म के चश्मे से दिखाने का प्रयास किया गया है। हिंदू बुरे, मुस्लिम अच्छे को इतना जोर देकर दिखाया गया है कि इसे कोई भी स्वीकार नहीं करेगा। इतना ही नहीं हिन्दुओं को मुंबई के सरकारी अस्पताल ‘बॉम्बे जनरल अस्पताल’ में तोड़फोड़ करने वाले जिहादियों के खिलाफ कुछ अपशब्द बोलते हुए दिखाया गया है। कुल मिलाकर इस वेब सीरीज में मु​सलमानों का महिमामंडन किया गया है। इसमें बताया गया है कि इस्लाम बुरा नहीं है। वास्तव में, यह शांति और सहिष्णुता का धर्म है।

गौरतलब है कि ‘मुंबई डायरीज 26/11’ में मोहित रैना, कोंकणा सेन शर्मा, मृण्मयी देशपांडे, नताशा भारद्वाज, सत्यजीत दुबे, प्रकाश बेलावाड़ी, श्रेया धनवंतरी, सहित कई अन्य किरदार अहम भूमिका में हैं। निखिल आडवाणी और निखिल गोंसाल्विस इसके डायरेक्टर हैं।

मंदिर से माथे पर तिलक लगाकर स्कूल जाता था छात्र, टीचर निशात बेगम ने बाहरी लड़कों से पिटवाया: वीडियो में बच्चे ने बताई पूरी बात

मध्यप्रदेश के रायसेन जिले में आठवीं क्लास के एक छात्र को स्कूल में तिलक लगाकर जाने पर बेरहमी से पीटने का मामला प्रकाश में आया है। कथिततौर पर, स्कूल में पढ़ाने वाली निशात (निशाद) बेगम नाम की टीचर ने बाहरी लड़कों से कह कर पवन सेन नामक बच्चे को मार पड़वाई। अब पवन अस्पताल में भर्ती है। पुलिस ने परिजनों की शिकायत पर रिपोर्ट दर्ज करके केस की जाँच शुरू कर दी है।

वहीं निशात बेगम ने मामले में अपनी सफाई देकर घटना से संबंध होने पर इंकार किया है। मगर, सेन समाज के लोगों ने मिल कर कलेक्टर को ज्ञापन दिया है और कार्रवाई की माँग की है। पूरा मामला गैरतगंज तहसील के शासकीय नवीन माध्यमिक शाला गैरतगंज का है। बच्चे की वीडियो सामने आई है इसमें वह अपने साथ घटी घटना बता रहा है।

मामले से रायसेन जिला अधिकारी को अवगत कराते हुए एनसीपीसीआर ने अधिकारी से बच्चे के उम्र के प्रमाण, मेडिकल रिपोर्ट जैसे विभिन्न दस्तावेज माँगे हैं।

कहा जा रहा है कि पवन को तिलक लगाकर स्कूल आने से बार-बार मना किया गया था लेकिन छात्र क्योंकि स्कूल जाने से पहले मंदिर जाता था और मंदिर से तिलक लगवाकर स्कूल जाता था। इसलिए तिलक माथे पर रहता था। इसी बात से नाराज एक टीचर ने पवन को ऐसा पिटवाया कि वो बेहोश हो गया।

इसके बाद छात्र को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया गया। वहाँ उसे प्राथमिक उपचार दिया गया और बाद में जिला अस्पताल भेज दिया गया। दूसरी ओर केस दो संप्रदायों से जुड़ा होने के कारण गरमा गया है। शिक्षिका का कहना है कि ये सब छात्रों के आपसी झगड़े में हुआ। निशात बेगम ने कहा पीड़ित छात्र को बाहरी लड़कों ने पीटा है। वहीं पीड़ित छात्र के पिता ने कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को ज्ञापन सौंपकर शिक्षिका के विरुद्ध कार्रवाई की माँग की है।

गौरतलब है कि ये पहली बार नहीं जब मध्य प्रदेश में किसी नाबालिग छात्र को तिलक लगाकर स्कूल आने पर पीटा गया हो। इससे पहले साल 2017 में एक खबर आई थी किं खंडवा के मिशनरी स्कूल में हिंदू बच्चों के साथ दुर्व्यवहार हो रहा था। एक बार तो स्कूल में एक बच्चा तिलक लगाकर पहुँचा तो उसे प्रताड़ित किया गया था। उससे पूर्व रक्षा सूत्र, राखी कटवाने का काम भी स्कूल में होता था।

‘मुसलमानों का इलाका है, नाराज होगा, सेंसेटिव मामला है…’: DC अबु इमरान और कॉन्ग्रेसी MLA बंधु तिर्की का ऑडियो वायरल

झारखंड के लातेहार जिले के DC अबु इमरान का विवादित ऑडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। यह ऑडियो डीसी और प्रदेश कॉन्ग्रेस के कार्यकारी अध्‍यक्ष और विधायक बंधु तिर्की के बीच फोन पर हुई बातचीत का है, जिसमें वह अबु इमरान को मुस्लिम बहुल इलाके में जाने से रो​क रहे हैं। दरअसल, बालूमाथ थाना क्षेत्र के सेरेगाड़ा इलाके में 7 आदिवासी बच्चियों की डूबने से मौत हो गई थी। बंधु तिर्की शोक व्यक्त करने के लिए उनके परिवारों से मिलने जा रहे थे।

इसी दौरान डीसी अबु इमरान ने उनसे फोन पर बात की और कहा, ”सेंसेटिव मामला है वहाँ पर। आस-पास मुसलमानों का इलाका है। बचाने वाला मुसलमान है, सीओ भी मुसलमान है, डीसी भी मुसलमान है। ये दूसरा टर्न ले लेगा तो फिर मुसलमान काफी नाराज होगा।” बंधु तिर्की ने इस ऑडियो की पुष्टि की है, लेकिन इसे सामान्य बातचीत बताया है। वहीं बीजेपी ने डीसी अबु इमरान पर तत्काल कार्रवाई की माँग की है।

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने ट्वीट​ कर राज्यपाल रमेश बैस से कॉन्ग्रेसी विधायक बंधु तिर्की और लातेहार के DC अबू इमरान के बीच हुई बातचीत के संबंध में पत्र लिखकर कार्रवाई का आग्रह किया है। उन्होंने लिखा है कि बातचीत से स्पष्ट है कि कॉन्ग्रेसी विधायक को आदिवासी समाज की बच्चियों के प्रति कोई संवेदना नहीं है। DC का आचरण भी निंदनीय है।

ऑडियो को लेकर सोशल मीडिया पर भी प्रतिक्रियाएँ सामने आई हैं। एक यूजर ने लिखा, “झारखंड में तुष्टिकरण की राजनीति आज प्रदेश को कहाँ तक लेकर आ गई है इसका अंदाज़ा इस बातचीत से लगाया जा सकता है। लातेहार ज़िले के DC अबु इमरान कॉन्ग्रेस विधायक से कह रहे हैं कि आपलोग मुस्लिम का वोट से जीतते हैं, मुस्लिम का इलाका है आप लोग इतना विजिट करिएगा तो मुस्लिम नाराज हो जाएगा!”

इस मामले पर बीजेपी प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव ने कहा कि यह पहला मामला है, जिसमें एक IAS ने इस तरह की भाषा का प्रयोग किया है। एक IAS धर्म और जाति के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकते हैं। बंधु तिर्की ने इस ऑडियो की पुष्टि की है। वो उस जगह पर गए थे, जहाँ आदिवासी 7 बच्चियों की मौत हुई थी, लेकिन डीसी कह रहे हैं कि यह मुसलमान का इलाका है। आप लोग यहाँ बार-बार क्यों आ रहे हैं। यह बेहद आपत्तिजनक प्वाइंट है। उन्होंने कहा कि यह पूरा मामला बेहद संगीन है। इस पूरे मामले में तीन बार मुसलमान शब्द का प्रयोग बेहद आपत्तिजनक है। इस संबंध में राज्य सरकार को तत्काल कार्रवाई करनी चाहिए।

भारत के कड़े रुख के बाद ब्रिटेन ने कोविशील्ड वैक्सीन को दी मंजूरी, लेकिन CoWIN प्रमाणपत्र को मान्यता देने से किया इनकार

भारत के कड़ी आपत्ति जताने के बाद ब्रिटेन ने अपनी ‘भेदभावपूर्ण’ वैक्‍सीन नीति में बदलाव किया है। अब उसने कोविशील्‍ड वैक्सीन को मान्‍यता देने की बात कही है। इससे पहले ब्रिटेन ने कहा था कि वह कोविशील्ड टीके की दोनों खुराक लेने वालों को मान्यता नहीं देगा और ब्रिटेन पहुँचने पर उन्‍हें भी 10 दिनों तक क्‍वारंटीन में रहना होगा।

दरअसल, यूके में ऑक्सफोर्ड और एस्ट्राजेनेका द्वारा विकसित की गई कोविड-19 वैक्सीन का नाम AZD1222 है। वहीं भारत में इस वैक्सीन को कोविशील्ड के नाम से तैयार किया गया है। ऐसे में यूके की यात्रा के दौरान कोविशील्ड की दोनों डोज लेने के बाद ब्रिटेन पहुँचने पर भारतीयों को 10 दिनों तक क्‍वारंटीन रहना भारत को काफी भेदभावपूर्ण लग रहा है। इस पर भारत ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि वह भी फिर इसी तरह के कदम उठाएगा।

इंग्लैंड की यात्रा के लिए यूके सरकार द्वारा जारी नई गाइडलाइंस के अनुसार, Oxford-AZ वैक्सीन के भारतीय संस्करण को अब देश में मंजूरी दे दी गई है। गाइडलाइंस कहती है, “4 वैक्सीन जैसे एस्ट्राजेनेका, कोविशील्ड, एस्ट्राजेनेका वैक्सजेवरिया और मॉडर्न टाकेडा को मान्‍यताप्राप्‍त माना जाएगा।” नई गाइडलाइंस 4 अक्टूबर के बाद से लागू होगी।

बताया जा रहा है कि भारत से जाने वाले कोविशील्‍ड की दोनों डोज ले चुके यात्रियों को अब भी ‘सर्टिफिकेशन’ कारणों से क्‍वारंटीन रहने की आवश्‍यकता होगी। लेकिन अगर उन्‍होंने कोविशील्‍ड की दोनों डोज ले ली है तो उनके टीकाकरण को मान्‍यता प्राप्‍त होगी।

दरअसल, ब्रिटेन ने नई गाइडलाइंस में उन देशों के नाम लिखे हैं, जहाँ वैक्सीन लगवाने पर उसे मान्‍यता प्राप्‍त माना जाएगा। इसमें भारत का नाम नहीं है। ब्रिटेन की ओर से जारी नई यात्रा अपडेट के मुताबिक, 4 अक्टूबर के बाद कोई भी पूरी तरह से टीकाकृत के रूप में मान्‍य होगा, यदि उन्होंने यूके, यूरोप, अमेरिका या विदेशों में यूके वैक्‍सीन प्रोग्राम के तहत ऑक्सफोर्ड/एस्‍ट्राजेनेका, फाइजर, बायोटेक, मॉर्डना या जैनसेन वैक्‍सीन की पूरी डोज ऑस्ट्रेलिया, एंटीगुआ व बारबुडा, बारबाडोस, बहरीन, ब्रुनेई, कनाडा, डोमिनिका, इजरायल, जापान, कुवैत, मलेशिया, न्यूजीलैंड, कतर, सऊदी अरब, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया या ताइवान में सार्वजनिक स्‍वास्‍थ्‍य निकाय से वैक्सीन लगवाई हो।

इसका मतलब यह है कि यूरोप के अलावा, यूके केवल कुछ ही देशों के टीकाकरण को मान्यता देता है। यह अधिकांश एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका में किए गए टीकाकरण पर विचार नहीं करता है, जबकि सभी देश यूके द्वारा स्वीकृत समान टीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं।

गौरतलब है कि ब्रिटेन ने इससे पहले एस्‍ट्राजेनेका वैक्सजेवरिया को तो मान्‍यता देने की बात कही थी, लेकिन एस्‍ट्राजेनेका के ही फॉर्मूले से भारत में तैयार कोविशील्‍ड को मान्‍यता देने से इनकार करते हुए कहा था कि कोविशील्ड वैक्सीन की दोनों डोज लगवाने के बाद भी लोग बिना टीका लगवाए हुए माने जाएँगे। ऐसे लोगों को ब्रिटेन पहुँचते ही 10 दिनों के लिए क्वारंटीन कर दिया जाएगा। इसका मतलब यह है कि ब्रिटेन CoWIN पोर्टल से जारी किए गए वैक्सीन प्रमाणपत्रों को मान्यता नहीं देता है।

जम्मू-कश्मीर में हमीद, जफर, रफी सहित आतंकियों के मददगार 6 सरकारी कर्मचारियों पर एक्शन: किया गया बर्खास्त

जम्मू-कश्मीर में आतंकियों के साथ मिलकर काम करने के आरोपित 6 कर्मचारियों पर राज्य सरकार ने बड़ी कार्रवाई करते हुए उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया है। ये ओवर ग्राउंड वर्कर के रूप में काम कर रहे थे। बर्खास्त किए गए कर्मियों में अनंतनाग का एक शिक्षक हमीद वानी भी शामिल है। वह आतंकी संगठन अल्लाह टाइगर के जिला कमांडर के तौर पर काम कर रहा था।

रिपोर्ट के मुताबिक, आतंकी संगठन जमात-ए-इस्लामी ने हमीद वानी को सरकारी नौकरी दिलाने में मदद की थी। उस पर आरोप है कि जब साल 2016 में सेना ने बुरहान वानी को ढेर किया था तो उसके बाद कश्मीर में चलाई गई देश विरोधी गतिविधियों में हमीद वानी को चीफ स्पीकर के तौर पर बुलाया जाता था।

इसके साथ ही राज्य सरकार ने जफर हुसैन भट्ट को भी नौकरी से बर्खास्त करने की सिफारिश की है। वह किश्तवाड़ जिले का रहने वाला है। जम्मू के ही रोड एंड बिल्डिंग डिपार्टमेंट में जूनियर असिस्टेंट के तौर पर कार्यरत मोहम्मद रफी को भी बर्खास्त किया गया है। वो भी किश्तवाड़ का ही रहने वाला है। रफी पर किश्तवाड़ में हिज्बुल मुजाहिदीन के आतंकियों को वारदात को अंजामे देने के लिए स्थान मुहैया कराने का आरोप है। उसे राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) गिरफ्तार भी कर चुकी है। उसके खिलाफ चार्जशीट भी दाखिल की जा चुकी है।

इस मामले में कुछ वक्त पहले राज्य सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए आदेश जारी किया था, जिसके मुताबिक राष्ट्र विरोधी तत्वों का समर्थन करने वाले सरकारी कर्मियों को नौकरी से बाहर का रास्ता दिखाने की बात कही गई थी। आदेश में कहा गया है कि जानबूझकर या गलती से भी अगर कोई कर्मचारी राष्ट्र विरोधी तत्वों अथवा विदेशी ताकतों का समर्थन करता हुआ पाया जाता है तो उसे बर्खास्त किया जाएगा। उसी के तहत यह कार्रवाई की गई है।

सोहा ने कब्र पर किया अब्बू को याद: भड़के कट्टरपंथियों ने इस्लाम से किया बाहर, कहा- ‘शादियाँ हिंदुओं से, बुतों की पूजा, फिर कैसे मुस्लिम’

बॉलीवुड एक्ट्रेस व कुणाल खेमू से शादी करने वाली सोहा अली खान हाल में अपने पिता (अब्बू) मंसूर अली खान पटौदी की 10 वीं डेथ ऐनिवर्सरी पर उनकी कब्र पर पहुँची। उनके साथ उनकी माँ शर्मिला टैगोर और बेटी इनाया भी थे। कब्र पर फूल चढ़ाते समय उन्होंने कुछ फोटो खिंचवाई और उसे इंस्टा पर शेयर किया। इस तस्वीर पर सोहा ने कैप्शन दिया, “आप कभी भी हमारे लिए नहीं मर सकते, जब तक आपको याद करना नहीं भूल जाते।”

सोहा ने ये तस्वीर किस भाव से शेयर की, इसे बिन जाने कट्टरपंथी उन्हें ताने देने लगे। सैयद आलिना नाम की यूजर ने कहा, “वैसे सच में आप लोग पूजा करते हो तो फिर आप लोगों को फातिहा आती भी है कि नहीं और आप लोग कैसे सारे मजहब मानते हों।”

आयशा जाहिद कहती हैं, “शादियाँ हिंदुओं से करते हैं ये लोग, बुतों की पूजा करके शिर्क करते हैं फिर कब्र बना खुद को मुस्लिम कहते हैं। बड़ा ही अजीम ईमान है इनका।”

कुछ मजहबी ठेकेदार ऐसे भी थे जिन्होंने सोहा अली खान और शर्मिला टैगोर को कहा, “इतना भी पता नहीं है कि कब्रिस्तान में लड़कियाँ नहीं जातीं।”

रुखसार लिखती हैं, “वाकई आप लोगों में थोड़ी भी शर्म नहीं कि कब्रिस्तान तक को नहीं छोड़ दो। वहाँ भी सेल्फी।”

निखत लिखती हैं, “बाहर तो कब्र को आपने फूल और बगीचों से कब्र सजा लिए अंदर तो उनका हाल अल्लाह ही जानता है।”

बता दें कि सोहा अली खान ने शादी कुणाल खेमू से की है और उनके भाई सैफ अली कान ने शादी करीना कपूर से की है। ऐसे में कट्टरपंथियों को शिकायत ये रहती है कि ये लोग हिंदू त्योहार क्यों मनाते हैं। शायद यही वजह है कि वो सोहा अली खान के पोस्ट पर भावनाओं को समझने की बजाय घृणा दिखाने लगे। कुछ लोगों ने ये सवाल भी किया कि सोहा अली खान तो अपने पिता की कब्र पर आ गईं लेकिन सैफ अली खान, करीना कपूर, तैमूर और जेह यहाँ कब आएँगे।

गैंडे असमी संस्कृति का हिस्सा, जलाए गए 2479 सींग: CM हिमंत बिस्वा सरमा ने मृत गैंडों का किया प्रतीकात्मक दाह संस्कार

विश्व गैंडा दिवस के मौके पर आज (22 सितंबर 2021) को असम में प्राकृतिक आपदाओं अथवा शिकार के कारण अपनी जान गंवाने वाले करीब 2,500 एक सींग वाले गैंडों का अंतिम संस्कार किया गया है। गैंडों की सीगों को जलाने से पहले असम के काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने एक प्रतीकात्मक अनुष्ठान किया। हिंदू धर्म की रीति-रिवाजों के अनुसार अनुष्ठान के बाद इसका अंतिम संस्कार कर दिया गया।

इस कार्यक्रम को राइनो संरक्षण की दिशा में मील का पत्थर बताया जा रहा है। इसका उद्देश्य गैंडे को लेकर फैले मिथकों को समाप्त करना था। असम के वन्यजीव वार्डन एमके यादव ने कहा, “शिकारियों और तस्करों के लिए यह एक स्पष्ट संदेश है कि इन चीजों का कोई मूल्य नहीं है।”

कार्यक्रम के बाद मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने बताया कि हिंदू-परंपराओं के अनुसार अनुष्ठान किया गया है। ऐसा करके हमने शिकारियों का सख्त संदेश दिया है कि गैंडे की सीगों का कोई औषधीय महत्व नहीं है। इस दाह संस्कार के जरिए हम ये संदेश देना चाहते हैं कि गैंडे असमी संस्कृति का हिस्सा हैं औऱ ये बहुत ही महत्वपूर्ण हैं।

इन सीगों को एकत्र करने की कवायद दशकों पहले शुरू हुई थी, इकट्ठा करने के बाद कोषागार में सुरक्षित रखा गया था। वन विभाग के मुताबिक, पारंपरिक दवाओं में गैंडे की सींगों का उपयोग किए जाने के कारण काला बाजार में इसकी काफी कीमत है। पिछले सप्ताह ही राज्य मंत्रिमंडल ने गैंडों की सीगों का री-वेरिफिकेशन करने का आदेश दिया था।

गौरतलब है कि 22 सितंबर को दुनिया भर में गैंडों की सभी पाँच प्रजातियों के लिए जागरूकता फैलाने के लिए मनाया जाता है। विश्व गैंडा दिवस पहली बार 2011 में मनाया गया था।

कानून देता है अनुमति

कार्यक्रम में सरकार द्वारा गैंडों की सीगों को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 की धारा 39(3) (C) के तहत जलाया गया है। पिछले महीने, गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने समारोह को लेकर एक जन सुनवाई की थी, लेकिन जनता से कोई आपत्ति नहीं मिली।

मृत गैंडों का अंतिम संस्कार कर असम सरकार शिकारियों को कड़ा संदेश देने की कोशिश कर रही है कि असम गैंडों को परिवार का सदस्य मानता है औऱ जो भी उन्हें नुकसान पहुँचाने की कोशिश करेगा उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी।

न जुबान चढ़ी और न आँख…फाँसी कैसे? नरेंद्र गिरि को भू-समाधि: सुसाइड लेटर में दो पेन के प्रयोग से गहराया संदेह, उत्तराधिकारी पर टला फैसला

अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष और बाघम्बरी मठ के प्रमुख महंत नरेंद्र गिरि के पार्थिव शरीर को एक ओर जहाँ आज भू-समाधि दी गई। वहीं, इसी बीच उनके उत्तराधिकारी को लेकर नया विवाद शुरू हो गया। पंचपर्मेश्वर की बैठक में महंत नरेंद्र गिरि के सुसाइड नोट को फर्जी कहा गया है।

इसी के साथ उनके उत्तराधिकारी की घोषणा के लिए 25 सितंबर की तारीख तय की गई है। निरंजनी अखाड़े के सचिव रविंद्र पुरी ने सुसाइड लैटर को फर्जी बताते हुए उत्तराधिकारी की घोषणा करने से मना कर दिया। जिसके बाद संत बलवीर के उत्तराधिकारी बनने पर फिलहाल के लिए फैसला टल गया। बैठक की अगली दिनांक यानी 25 सितंबर को इस बाबत फैसला लेकर घोषणा की जाएगी।

‘आज तक’ से बातचीत में निरंजनी अखाड़ा के रविंद्र पुरी ने कहा कि जो सुसाइड नोट मिला है, वह उनके (महंत नरेंद्र गिरि) द्वारा नहीं लिखा गया है। इस मामले की जाँच होनी चाहिए। ऐसा लगता है किसी बीए पास लड़के ने यह पत्र लिखा है। इस संबंध में अखाड़ा अपने स्तर से भी जाँच कर रहा है।

रविंद्र पुरी ने सवाल किया कि आखिर फाँसी में पीछे चोट कैसे हो सकती है? इसके अलावा न जुबान चढ़ी थी और न आखें…तो ये फाँसी कैसे हो सकती है। पुरी ने जानकारी दी कि महंत के निधन पर अखाड़े में भी 7 दिन का शोक जारी है। उत्तराधिकारी को लेकर उन्होंने कहा कि कथित सुसाइड नोट में बलवीर गिरि लिखा है जबकि वो पुरी हैं। महंत नरेंद्र गिरि ऐसी गलती नहीं कर सकते थे।

इसके अलावा सुसाइड लेटर को लेकर यह बातें भी कही जा रही है कि कुल 12 पन्ने के सुसाइड नोट को दो बार में और दो अलग-अलग कलम से लिखा गया है। पहले आठ पेज 13 सितंबर को लिखे गए जबकि अगले चार पेज 20 सितंबर को। अजीब बात यह है कि 13 सितंबर को जिन पेजों को लिखा गया, उस पर तारीख को काट कर 20 सितंबर कर दिया गया है। शुरुआती पेजों में 25 जगह कटिंग नोटिस की गई है जबकि अगले चार पेजों में 11 जगह।

बता दें कि बुधवार को पोस्टमार्टम के बाद महंत नरेंद्र गिरि के पार्थिव शरीर को फूलों से सजे वाहन में रखकर गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के पावन संगम पर लाया गया। यहाँ उन्हें स्नान कराने के बाद मंत्रोच्चार और विधि-विधान के साथ श्री मठ बाघम्बरी गद्दी में उनके गुरु के बगल में समाधि दी गई।

महंत नरेंद्र गिरि पद्मासन मुद्रा में ब्रह्मलीन हुए। अब एक साल तक यह समाधि कच्ची ही रहेगी। इस पर शिवलिंग की स्थापना कर रोज पूजा अर्चना की जाएगी। इसके बाद समाधि को पक्का बनाया जाएगा। इस बीच उनकी आत्महत्या के मामले में ये नया मोड़ ही है जो प्रयागराज में हुई पंचपर्मेश्वर की बैठक में महंत नरेंद्र गिरि के सुसाइड नोट को फर्जी कहा गया। इसके साथ ही उनके उत्तराधिकारी घोषित किए जाने की बात पर भी विवाद हुआ।