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दिल्ली दंगा: रिफाकत अली को भतीजी की निकाह का ‘इंतजाम’ करने के लिए बेल, हत्या का Video देख पिछली बार नहीं मिली थी जमानत

दिल्ली दंगों से जुड़े एक मामले के आरोपित रिफाकत अली को जमानत मिल गई है। उसे परिवार में होने वाले एक निकाह में शामिल होने के लिए अंतरिम जमानत दी गई है। उस पर हत्या से जुड़े एक मामले में संलिप्त होने का आरोप है। पिछली बार अदालत ने घटना का वीडियो देखने के बाद उसे जमानत देने से इनकार कर दिया था। रिर्पोटों के अनुसार वीडियो में वह हाथ में लोहे का रॉड लिए नजर आया था।

बार ऐंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार जमानत देते हुए अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अमिताभ रावत ने माना कि यह मामला दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा गठित उच्चाधिकार प्राप्त समिति के दिशा-निर्देशों के दायरे में नहीं आता, क्योंकि यह भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) के तहत दायर एक दंगा मामला है। लेकिन उसे राहत इस आधार पर दी गई कि वह परिवार का एकमात्र पुरुष सदस्य है। इस तरह की राहत विवाह और उससे जुड़े कार्यों को निपटाने के लिए एक खास अवधि के लिए दी जाती है। ऐसे में रिफाकत को अपनी रिहाई के दो सप्ताह बाद सरेंडर करना होगा।

इससे पहले रिफाकत के वकील ने अदालत को बताया कि वह अपने परिवार का सबसे बड़ा सदस्य है। परिवार आजीविका के लिए उस पर ही आश्रित था। ​बताया गया कि उसकी बहन भी साथ रहती थी और रिफाकत की गिरफ्तारी से पहले भतीजी का निकाह तय हो गया था। लेकिन उसकी गिरफ्तारी और आर्थिक कारणों की वजह से निकाह में देरी हुई। निकाह की व्यवस्था और अन्य इंतजाम की दलील देते हुए अंतरिम जमानत माँगी गई।

अदालत के सामने रिकॉर्ड पर निकाह के कार्ड और अन्य दस्तावेज भी पेश किए गए। इसके बाद अदालत ने यह बताते हुए कि उसके खिलाफ आरोप ‘काफी गंभीर’ हैं उसे अंतरिम जमानत दे दी। साथ ही बिना इजाजत दिल्ली नहीं छोड़ने, किसी गवाह से संपर्क नहीं करने और सबूतों के साथ छेड़छाड़ नहीं करने का निर्देश दिया। जाँच अधिकारी को अपना मोबाइल नंबर मुहैया कराने और फोन चालू रखने के भी निर्देश दिए हैं।

रिफाकत की भतीजी की निकाह 12 सितंबर को होनी है। इससे पहले बीते साल के आखिर में अदालत ने उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी। रिपोर्ट के अनुसार उस समय अदालत ने कहा था कि वह कथित तौर पर दंगों में सक्रिय रूप से शामिल था और उसे एक वीडियो फुटेज में हिंसक भीड़ के बीच लोहे की छड़ थामे देखा जा सकता है।

उस समय अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अमिताभ रावत ने कहा था कि अली ने कथित रूप से अन्य लोगों को घृणास्पद संदेश भेजे, जिन्हें बाद में उसने डिलीट कर दिया। डिलीट डाटा वापस हासिल करने के लिए उसका मोबाइल फोन विशेषज्ञों के पास भेजा गया है। साथ ही घटना के दिन उसने जो टोपी पहन रखी थी, उसे भी बरामद करने की बात कही गई थी।

यह मामला जाफराबाद इलाके में दंगों के दौरान गोली लगने से अमान नामक व्यक्ति की मौत से जुड़ा है। पिछले साल के अपने आदेश में अदालत ने कहा था, “आरोप-पत्र में कहा गया है कि इस पूरे घटनाक्रम में 19 पुलिसकर्मी घायल हो गए। घटनास्थल पर मौजूद रहे कई पुलिसकर्मियों को लगीं चोटों से हालात तथा अपराध की गंभीरता का पता चलता है। इसके अलावा इस बात में भी कोई संदेह नहीं है कि अमान की मौत भी घटना के दौरान गोली लगने से हुई।” आदेश में कहा गया था, “इसके अलावा इस मामले में आरोपित (अली) की एक वीडियो फुटेज भी मिली है। इसमें वह दंगाइयों के बीच दिख रहा है। उसने हिंसक भीड़ के बीच लोहे की छड़ भी थाम रखी है।”

इससे पहले दिल्ली की एक अदालत ने फरवरी 2020 के हिंदू विरोधी दंगों से जुड़े एक मामले शाह आलम, राशिद सैफी और शादाब को आरोप मुक्त किया था। शाह आलम इन दंगों के सूत्रधार रहे आम आदमी पार्टी (AAP) के पार्षद रहे ताहिर हुसैन का भाई है। तीनों को मुकदमा नंबर 93/2020 से बरी किया गया था। विशेष अदालत में मामले की सुनवाई कर रहे अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विनोद यादव ने इस दौरान दंगों को लेकर पुलिस की जाँच पर भी नाराजगी व्यक्त की थी। साथ ही सबूतों के अभाव में तीन आरोपितों को बरी करते हुए कहा था कि ये विफलता निश्चित रूप से लोकतंत्र के रखवालों को पीड़ा देगी।

मीया खलीफा, बक्कल और अल्ला हु अकबर से फायदा नहीं… किसानों के लाभ के लिए MSP से लेकर APMC तक कीजिए बात

मोदी सरकार द्वारा संसद में पास किए गए कृषि संबंधी कानूनों के विरोध को लगभग एक वर्ष होने आए। पिछले वर्ष इसी महीने में सोशल और परंपरागत मीडिया में कानूनों को लेकर चर्चा और तमाम मंचों पर उनका राजनीतिक विरोध शुरू हो गया था। देश के कुछ राज्यों में राजनीतिक लोगों को इकट्ठा कर किसानों के पक्ष में लड़ाई लड़ने का माहौल बनाया गया।

जिन माँगों को लेकर न केवल राजनीतिक दल बल्कि किसान भी दशकों से परेशान थे उन्हीं के लिए कानून बनाए जाने के बाद उनका विरोध किया गया। बाद में ‘किसानों’ का आंदोलन खड़ा किया गया और तथाकथित तौर पर एशिया की जियो-पॉलिटिक्स को बदलने की क्षमता रखने वाली एक क्रांति का दावा किया गया। 26 जनवरी को जो हुआ, वह दुनिया ने देखा।

इस तथाकथित आंदोलन पर देश ने राहुल गाँधी, रियाना, मीया खलीफा, रवीश कुमार और ग्रेटा थनबर्ग जैसे विचारकों के तर्क और उनका वृहद दर्शन भी सुना। कालांतर में आंदोलन स्थल पर मारपीट, हत्या और बलात्कार जैसे संगीन अपराधों का समावेश हुआ। जो-जो हो सकता था, लगभग वह सब हुआ पर इन कानूनों को लेकर ‘किसानों’ की आपत्ति का सही खुलासा न हो सका।

आपत्ति के नाम पर कभी सरकार द्वारा भविष्य में एमएसपी हटाने को लेकर शंका प्रकट की गई तो कभी उद्योगपतियों द्वारा किसानों की जमीन पर कब्ज़ा किए जाने की। इसी सोच को आगे रखकर उद्योग के विरोध में भी माहौल बनाया गया और पंजाब में कई जगहों पर रिलायंस के कम्युनिकेशन टॉवर उखाड़ दिए गए। एक दो जगहों पर तो टॉवर उखाड़ने के बाद वहाँ से लिए गए जनरेटर को गुरुद्वारे में उजाला करने के लिए रख लिया गया।

जैसा अक्सर देखा जाता है, जबरदस्ती खड़े किए गए आंदोलनों की प्रासंगिकता बनाए रखना बड़ी मेहनत और ढिठाई का काम होता है। रोज मुद्दे खोजने पड़ते हैं। इस किसान आंदोलन को ही देखें तो पाएँगे कि इसे लगातार चलाने के लिए नाच-गाने से लेकर ऊँची कूद और दौड़ से लेकर रक्तदान शिविर तक आजमाया जा चुका है। ट्रैक्टर रैली की वजह से क्या हुआ, वह सबने देखा है।

यही कारण है कि इस तथाकथित आंदोलन को चलाने वाला नेता पहले “बक्कल उतार दिए जाएँगे” का नारा लगाने के बाद बताता था कि “जम्मू-कश्मीर से 370 हटने की वजह से किसानों की मुश्किलें बढ़ गई हैं।” अब बक्कल खोलने की बात के साथ कहता है अल्ला हु अकबर। उसके समर्थन में खड़े लोग यह दावा करते हैं कि सीएए और एनआरसी से कृषि और किसानों का बड़ा नुकसान हुआ है इसलिए सीएए और एनआरसी को हटाना होगा। इसके अन्य नेता जो यह दावा करते रहे कि यह आंदोलन राजनीतिक नहीं है, अब अपनी पार्टी बनाकर पंजाब में चुनाव लड़ने की तैयारी में जुटे हैं।

सब कुछ हो चुका है पर कृषि कानूनों पर किसानों की आपत्ति को लेकर न तो कहा गया और न ही सुना गया। कुछ विशेषज्ञ और राजनीतिक या सामाजिक पंडित चाहे जो कहें पर किसान आंदोलन चलाने वाले नेताओं ने अब तक चन्द्रमा की तरह सारी कलाएँ दिखा दी हैं। साथ ही ये नेता बार-बार भाजपा को आगामी चुनावों में हराने की धमकी देते रहते हैं।

प्रश्न यह नहीं है कि राकेश टिकैत या चढुनी की राजनीतिक शक्ति कितनी है। प्रश्न यह है कि किसानों के नेता बने ये लोग क्या किसानों के हितों की रक्षा करने में सक्षम हैं? प्रश्न यह भी है कि अभी तक इस आंदोलन की आड़ में ये जो कुछ करते रहे हैं, उससे आम भारतीयों के मन में किसानों की कैसी छवि बनी है और उससे देश के किसानों के दीर्घकालीन हितों को ठेस पहुँच रही है या नहीं?

समय आ गया है कि खुद को किसानों का हितैषी बताने वाले नेता और विशेषज्ञ इस बात पर विचार करें और खुद से सवाल करें कि किसानों के नाम पर जो वे करते रहे हैं उससे किसानों का कितना लाभ हुआ है? किसानों के स्वघोषित नेताओं की ही नहीं बल्कि कृषि व्यापार हेतु बने एपीएमसी और सहकारिता का भारतीय कृषि में भूमिका पर पुनर्विचार होना आवश्यक है।

यह ऐसा विषय है, जिस पर कभी बहस ही नहीं हुई। ऐसे में बिना बहस के दशकों से बनी एकतरफा धारणाओं पर बहस या पुनर्विचार करने में कोई बुराई नहीं। देश जब राजनीति, समाज, अर्थव्यवस्था या अन्य और क्षेत्रों में दशकों से स्थापित मान्यताओं और धारणाओं की जाँच कर रहा है तो कृषि और संबंधी धारणाएँ इस प्रक्रिया से अछूती क्यों रहे? वैसे भी पहले से लागू कृषि कानून, सहकारिता कानून और स्थापित तरीकों को आजमा कर यदि सत्तर वर्षों के बाद भी किसान परेशान हैं तो यह सरकार, समाज और अन्य हिस्सेदारों की जिम्मेदारी है कि वे कुछ नया आजमाएँ।

वर्तमान सरकार द्वारा लाए गए कृषि कानून इसी दिशा में एक प्रयास थे पर उसे लागू न किए जाने और उसका निराधार विरोध अभी तक इन प्रयासों को रोकने में सफल रहा है। नए कानूनों को लेकर सरकार का विश्वास अभी तक डगमगाता हुआ दिखा नहीं है और यह बात कृषि सुधारों की आवश्यकता के पक्ष में जाती है। ऐसे में यह सोचना कि सरकार के ये कानून अभी तक पहले की सरकारों द्वारा कृषि पर व्यक्त की गई चिंताओं की तरह ही केवल कॉस्मेटिक बदलाव के लिए पास किए हैं, सही नहीं होगा।

ऐसा सोचने वालों को पिछले कुछ वर्षों में कृषि सुधार को लेकर वर्तमान सरकार के व्यावहारिक कामों को देखने की आवश्यकता है। यही कारण है कि वर्तमान में चल रहे कृषि आंदोलन को दो राज्यों के बाहर न्यूनतम समर्थन भी नहीं मिला है और अधिकतर अन्य राज्यों में कृषि संबंधी कामकाज सामान्य रहे हैं। कृषि कानूनों के लागू होने के बाद जिस तरह के बदलाव की उम्मीद की जा रही है वे बहुत तेज होंगे और देश के किसानों, कृषि उत्पादों के व्यापारियों और सरकार की संस्थाओं को इस बदलाव के लिए समय पर तैयार रहने की आवश्यकता है।

‘तुम भी मर जाओ’ से लगा सदमा: सिद्धार्थ शुक्ला की मौत के बाद ‘बिग बॉस’ की एक्स कंटेस्टेंट जसलीन अस्पताल में भर्ती, वीडियो वायरल

टीवी एक्टर व ‘बिग बॉस 13’ के विजेता सिद्धार्थ शुक्ला की मौत के गम से अभी तक उनके फैंस बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। वे अब तक यकीन नहीं कर पा रहे हैं कि सिद्धार्थ शुक्ला अब इस दुनिया में नहीं हैं। इसी बीच ‘बिग बॉस’ की एक्स कंटेस्टेंट जसलीन मथारू के अस्पताल में भर्ती होने की खबर सामने आई है। जसलीन मथारू ने सोमवार (6 सितंबर) को अपने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो शेयर किया है, जिसमें वह अस्पताल में बेड पर बीमार हालत में लेटी हुई नज़र आ रही हैं।

वीडियो में जसलीन मथारू ने बताया कि सिद्धार्थ शुक्ला मौत की खबर सुनने के बाद वह शॉक्ड हो गई थीं। उन्होंने बताया, “मैं सिड के घर पर गई थी, जहाँ माहौल बेहद गमगीन ​था। इस दौरान में आंटी (सिद्धार्थ शुक्ला की माँ) और शहनाज की हालात देखकर बहुत दुखी हुई। दोनों से मिलकर जब मैं अपने घर पर आई तो मैंने इंस्टाग्राम पर मैसेज पढ़ा, ‘तुम भी मर जाओ’।”

जसलीन ने आगे बताया, “ऐसे मैसेज से मैं पहली बार प्रभावित हुई। पहली बार मुझ पर इसका असर हुआ और मैं इसे बर्दाश्त नहीं कर पाईं। इसकी वजह से मेरी तबीयत खराब हो गई, जिसके बाद मुझे अस्पताल में भर्ती करवाया गया। मुझे कल रात को 104 डिग्री बुखार था, लेकिन अब मैं ठीक महसूस कर रही हूँ। आप लोग भी अपना ध्यान रखिए।” सोशल मीडिया पर जसलीन का यह वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, लोग उन्हें जल्दी ठीक होने की शुभकामनाएँ दे रहे हैं।

बता दें कि 2 सितंबर को 40 वर्षीय अभिनेता सिद्धार्थ शुक्ला की हार्ट अटैक की वजह से मौत हो गई थी। सिद्धार्थ को सबसे पहले लोगों ने कलर्स टीवी के मशहूर शो ‘बालिका वधू’ में देखा था। इस शो के साथ ही वो हर घर की पसंद बन गए थे।

‘…पागल कुत्ते के बगल में सो नहीं सकते’: बौद्ध भिक्षु आशिन विराथु को म्यांमार ने किया रिहा, मुस्लिमों के प्रति कट्टर सोच के लिए फेमस

फायरब्रांड बौद्ध भिक्षु आशिन विराथु को, पूर्व नेता आंग सान सू की के खिलाफ कथित अपमानजनक टिप्पणी के लिए उन पर देशद्रोह के आरोप लगाए जाने के दो साल बाद, सोमवार को बर्मी सेना द्वारा जेल से रिहा कर दिया गया।

महीनों तक भगोड़े के रूप में फरार रहने के बाद आखिरकार पिछले साल नवंबर में उन्होंने सरेंडर कर दिया था। आशिन विराथु पर नागरिक सरकार के खिलाफ ‘घृणा या अवमानना’ और ‘असंतोष भड़काने’ का आरोप लगाया गया था। म्यांमार सेना के प्रवक्ता, मेजर जनरल ज़ॉ मिन टुन ने कहा, “मामला बंद कर दिया गया था और उन्हें आज शाम रिहा कर दिया गया था लेकिन बाहर आने से पहले वह अभी भी तातमाडॉ अस्पताल में चिकित्सा लाभ ले रहे हैं।”

यह स्पष्ट नहीं है कि भिक्षु सैन्य अस्पताल में इलाज क्यों करवा रहे थे या वह किसका इलाज करवा रहे थे। म्यांमार में बौद्ध भिक्षु की रिहाई नागरिक सरकार के अपदस्थ होने के महीनों बाद हुई है।

कौन हैं आशिन विराथु

2013 में टाइम मैगज़ीन द्वारा आशिन विराथु को ‘बौद्ध आतंक का चेहरा’ करार दिया गया था। कुछ लोगों द्वारा उन्हें ‘बौद्ध बिन लादेन’ भी कहा गया है। टाइम मैगज़ीन में भिक्षु के हवाले से कहा गया था, “(मुसलमान) इतनी तेजी से जनसंख्या बढ़ा रहे हैं, और वे हमारी महिलाओं को अपनी जाल में फँसा कर गायब कर रहे हैं, उनका बलात्कार कर रहे हैं। वे हमारे देश पर कब्जा करना चाहेंगे, लेकिन मैंने उन्हें ऐसा नहीं करने दिया। हमें म्यांमार को बौद्ध रखना चाहिए।”

अपने हिस्से के लिए, विराथु ने टाइम मैगज़ीन पर ‘गंभीर मानवाधिकारों का उल्लंघन’ करने का आरोप लगाया, उन्हें अपने लेख में शब्दशः उद्धृत नहीं किया। “इससे पहले मैंने अरब दुनिया को वैश्विक मीडिया पर हावी होने के बारे में सुना था। लेकिन इस बार, मैंने इसे अपने लिए देखा है।”

2013 में एक अन्य साक्षात्कार में, उन्होंने घोषणा की, “मुसलमान अफ्रीकी कार्प की तरह हैं। वे जल्दी प्रजनन करते हैं और वे बहुत हिंसक होते हैं और वे अपनी तरह से खाते हैं। भले ही वे यहाँ अल्पसंख्यक हैं, लेकिन वे हमारे ऊपर जो बोझ डालते हैं, हम उसे भुगत रहे हैं।” एक अन्य अवसर पर, उन्होंने कहा, “आप दया और प्रेम से भरे हो सकते हैं लेकिन आप पागल कुत्ते के बगल में नहीं सो सकते।”

भिक्षु ने ‘969 आंदोलन’ का नेतृत्व किया, एक बौद्ध पुनरुत्थानवादी आंदोलन जिसने मुसलमानों के सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार की वकालत की और बौद्ध महिलाओं और मुस्लिम पुरुषों के बीच विवाह पर प्रतिबंध लगाने की माँग की। इस आंदोलन के ऐसे नाम की प्रेरणा उन्हें बौद्ध धर्मग्रंथों से आती है, पहले 9 बुद्ध के नौ विशेष गुणों को दर्शाते हैं, 6 उनके धर्म की छह विशेष विशेषताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं और 9 बौद्ध मठवासी आदेश, या बौद्ध संघ के नौ गुणों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

कुछ भिक्षुओं का मानना ​​है कि उन्होंने समुदायों के बीच नफरत फैलाई है। बहरहाल, जब टाइम मैगज़ीन ने उन्हें बौद्ध आतंक का चेहरा घोषित किया, तो देश के तत्कालीन राष्ट्रपति थेन सीन ने पत्रिका की आलोचना की और उस पर बौद्ध धर्म को बदनाम करने का आरोप लगाया। उन्होंने विराथु को ‘बुद्ध के पुत्र’ के रूप में वर्णित किया और शांति के लिए प्रतिबद्ध ‘महान व्यक्ति’ के रूप में उनका बचाव किया।

अपने हिस्से के लिए, विराथु ने दावा किया, “मैं अपने प्रियजनों की रक्षा कर रहा हूँ, जैसे आप अपने प्रियजन की रक्षा करेंगे। मैं केवल लोगों को मुसलमानों के बारे में चेतावनी दे रहा हूँ। इसे ऐसे समझें कि आपके पास एक कुत्ता है, जो आपके घर आने वाले अजनबियों पर भौंकता है- यह आपको चेतावनी देने के लिए है। मैं उस कुत्ते की तरह हूँ। मैं भौंकता हूँ।”

आशिन विराथु को उनके उपदेशों के लिए 2003 में भी गिरफ्तार किया गया था और उन्हें 9 साल जेल में बिताने पड़े थे। इसके बावजूद, उन्होंने देश में अपना सम्मानजनक स्थान बनाएं रखा। वह बौद्ध धर्म के थेरवाद स्कूल से संबंधित हैं। कुछ का मानना ​​है कि वह बर्मी सेना के साथ बने लीग का हिस्सा हैं।

बांग्लादेशी मामलों के विशेषज्ञ मुंशी फैज़ अहमद ने अरब न्यूज़ को बताया, “म्यांमार की सेना को देश के बौद्धों तक पहुँचने के लिए एक बड़े माध्यम की ज़रूरत थी। म्यांमार में बौद्धों पर राजनेताओं की तुलना में भिक्षुओं का अधिक प्रभाव है, इसलिए शक्तिशाली सेना ने विराथु को अपने उद्देश्य की पूर्ति के लिए भर्ती किया क्योंकि चरमपंथी भिक्षु के कुछ कट्टर अनुयायी हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “एक तरफ, महत्वाकांक्षी विराथु अपने अनुयायियों की संख्या बढ़ाना चाहते थे और दूसरी तरफ सेना अपनी शक्ति को मजबूत करना चाहती थी। इसलिए सेना के जनरलों ने रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाने में चरमपंथी बौद्ध भिक्षु का समर्थन करना शुरू कर दिया।”

सलमान खान, फरहान अख्तर के खिलाफ केस, कोर्ट में भी याचिका: रेप के बाद जला देने वाली पीड़िता का नाम-फोटो मामला

हैदराबाद की डॉक्टर ‘प्रीति रेड्डी’ (बदला हुआ नाम) के साथ गैंगरेप और उन्हें जला देने वाली खबर याद है? वही जिसके सभी आरोपित (मोहम्मद पाशा, नवीन, चिंताकुंता केशावुलु और शिवा) पुलिस एनकाउंटर में मारे गए थे? इस मामले में नई खबर है। खबर बॉलीवुड-एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री से जुड़ी है।

डॉक्टर ‘प्रीति रेड्डी’ की पहचान उजागर करने के कारण सलमान खान, फरहान अख्तर, अजय देवगन, अक्षय कुमार और अनुपम खेर समेत कुल 38 मशूहर हस्तियों के खिलाफ शिकायत दर्ज की गई है। एक रेप पीड़िता की पहचान उजागर करना कानूनन अपराध है और इससे संबंधित एक याचिका दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट में दाखिल की गई है।

दिल्ली स्थित गौरव गुलाटी नाम के वकील ने सब्जी मंडी पुलिस थाने में IPC की धारा 228A के तहत मामला दर्ज करवाया है। इसके साथ ही उन्होंने तीस हजारी कोर्ट में एक याचिका भी दाखिल की है। अपनी शिकायत में वकील गौरव गुलाटी ने कहा कि हीरो हों या सिलेब्रिटीज, उन्होंने नियमों को तोड़ते हुए पीड़िता की पहचान उजागर की है। सभी 38 लोगों को तुरंत गिरफ्तारी करने की माँग भी उनकी याचिका में है।

मरने के बाद भी रेप करते रहे थे

डॉक्टर ‘प्रीति रेड्डी’ से दरिंदगी से पहले आरोपितों ने जमकर शराब पी थी। पीड़िता को भी जबरन शराब पिलाई थी। इसके बाद आरिफ (एक आरोपित) ने उनका मुँह दबा दिया था ताकि वो चिल्ला न सकें। इसके बाद चारों आरोपितों ने बारी-बारी से उनके साथ रेप किया था। सॉंस नहीं ले पाने के कारण पीड़िता का दम घुट गया और उनकी मौत हो गई थी।

वहीं एनकाउंटर, जहाँ किया था जघन्य अपराध

हैदराबाद में पशु चिकित्सक ‘प्रीति रेड्डी’ (बदला हुआ नाम) के साथ गैंगरेप कर निर्मम हत्या करने वाले चारों आरोपित पुलिस एनकाउंटर में मारे गए थे। यह एनकाउंटर उसी जगह पर हुआ था, जहाँ उन दरिंदों ने पीड़िता के शव को जलाया था।

पुलिस पूरे क्राइम सीन को रिक्रिएट करने के लिए चारों आरोपितों को लेकर गई थी। लेकिन, वहाँ पर चारों पुलिस हिरासत से भागने की कोशिश करने लगे थे। तभी एनकाउंटर करना पड़ा और सभी मारे गए।

आप अल्लाह-हू-अकबर कहें, हम हर हर महादेव कभी नहीं कहेंगे: राकेश टिकैत को संदेश, ‘आजाद-मस्जिद’ की माँग, देखें Video

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में महापंचायत के दौरान अल्लाह-हू-अकबर का नारा लगाने वाले राकेश टिकैत को एक आम मुसलमान ने संदेश दिया है। ये संदेश अब सोशल मीडिया पर वायरल है। इसे प्रदेश मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के सूचना सलाहकार शलभ मणि त्रिपाठी ने भी शेयर किया है।

अपने ट्वीट में शलभ मणि त्रिपाठी मुस्लिम व्यक्ति की बातों के मुख्य बिंदु उजागर करते हैं। वह लिखते हैं, “हमें 113 मस्जिदें दो। मुजफ्फरनगर दंगों के लिए सभी जाटों की तरफ से माफी माँगो। तुम अल्लाह-हू-अकबर बोलो, हम हर हर महादेव कभी नहीं बोलेंगे!”

वायरल वीडियो के मुताबिक पश्चिमी यूपी का एक आम मुसलमान राकेश टिकैत को संदेश दे रहा है। वह कहता है, “अल्लाह-हू-अकबर कह देने से राकेश टिकैत के गुनाह नहीं धुलेंगे। अल्लाह-हू-अकबर कहने से न ही उनकी तौबा कबूल होगी। अगर राकेश टिकैत को मुसलमानों से आगे हाथ बढ़ाना है तो सबसे पहले जो 113 मस्जिदें वीरान है हमारे जनपद की, जो 2013 के दंगों में किसान यूनियन के लोगों ने वीरान की थी, पहले उन मस्जिदों को आजाद कराएँ। उसके बाद आपका अल्लाह-हू-अकबर कहना जायज है।”

वह कहते हैं, “अल्लाह-हू-अकबर कहने से अल्लाह ताला माफ नहीं करेंगे। आपको वो बच्चे माफ नहीं करेंगे जिनके साथ किसान यूनियन के लोगों ने बलात्कार किया। वो बेसहारा, यतीम बच्चे आपको माफ नहीं करेंगे। जमीयत उलेमा ए हिंद के लोगों ने उन्हें मकान दिया। आज भी उनके आँसू आप नहीं धो सकते अल्लाह-हू-अकबर कहने से। ये सब झूठ है, ढकोसला है। आप अल्लाह-हू-अकबर कहते रहें हम हर हर महादेव नहीं कहेंगे। हमारा ईमान अल्लाह-हू-अकबर पर है, ला इलाहा इल्लल्लाह पर है। आपके अल्लाह-हू-अकबर कहने से आप चाहते हैं मुसलमान आपको माफ कर देगा…नहीं करेगा। अगर आपको लगता है मुसलमान आपको माफ कर देगा तो बताइए कितने मुसलमान आपके साथ है, जमीयत उलेमा ए हिंद के लोग आपके साथ हैं?”

उल्लेखनीय है कि किसान नेता राकेश टिकैत ने रविवार (5 सितंबर) को किसान मोर्चा की महापंचायत में भीड़ से अल्लाह-हू-अकबर और हर-हर महादेव के नारे भी लगवाए थे। उन्होंने कहा था, ”यूपी की जमीन को दंगा करवाने वालों को नहीं देंगे।” राकेश टिकैत ने कहा था कि जब भारत सरकार हमें बातचीत के लिए आमंत्रित करेगी, हम जाएँगे। जब तक सरकार हमारी माँगे पूरी नहीं करती तब तक किसानों का आंदोलन जारी रहेगा। आजादी के लिए संघर्ष 90 साल तक चला, इसलिए मुझे नहीं पता कि यह आंदोलन कब तक चलेगा।

छत्तीसगढ़: CM भूपेश बघेल के पिता गिरफ्तार, कहा था- ब्राह्मण या तो सुधर जाएँ या गंगा से वोल्गा जाने के लिए तैयार रहें

छत्तीसगढ़ के कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के पिता नंद कुमार बघेल को गिरफ्तार किया गया है। ब्राह्मणों पर विवादित टिप्पणी के बाद उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी। गिरफ्तारी के बाद उन्हें रायपुर की अदालत में पेश किया गया।

रायपुर के डीडी नगर पुलिस स्टेशन में केस दर्ज होने के बाद उन्हें आगरा से गिरफ्तार किया गया। नंद कुमार बघेल ने पिछले दिनों लखनऊ में विवादित टिप्पणी की थी। विवाद गहराने के बाद मुख्यमंत्री बघेल ने पल्ला झाड़ते हुए कहा था कि वे पिता के रूप में उनका पूरा सम्मान करते हैं, लेकिन माहौल बिगाड़ने वाले लोगों पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान नंद कुमार बघेल ने ब्राह्मण समाज पर आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए कहा था, “वोट हमारा राज तुम्हारा नहीं चलेगा। हम ब्राह्मणों को गंगा से वोल्गा (रूस की एक नदी) भेजेंगे, क्योंकि वे परदेशी हैं। जिस तरह से अंग्रेज लोग आए और चले गए। उसी तरह से ये ब्राह्मण लोग या तो सुधर जाएँ या गंगा से वोल्गा जाने के लिए तैयार हों।”

नंद कुमार बघेल के इन बयानों के खिलाफ रायपुर पुलिस ने धारा 153-A और धारा 505-A के तहत मामला दर्ज किया था। पुलिस ने सांप्रदायिक माहौल ख़राब करने और सामाजिक सद्भाव बिगाड़ने की धाराओं के तहत केस दर्ज किया था। ब्राह्मण समाज के लोगों ने राज्यपाल से भी इस मसले पर मुलाक़ात की थी और कार्रवाई करने को लेकर ज्ञापन सौंपा था।

शिकायतकर्ता नवीन शर्मा ने इस संबंध में कहा था कि ब्राह्मणों के खिलाफ टिप्पणी करने वाले नंद कुमार बघेल को भारत से बाहर भेज दिया जाए। उनके इस बयान का मकसद समाज को बाँटना था। बता दें कि दीनदयाल विप्र समाज के सदस्यों ने बघेल के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराई थी। रायपुर में डीडी नगर थाने की प्रभारी योगिता खोपर्डे ने बताया था कि दो सितंबर को उन्हें सर्व ब्राह्मण समाज, सुंदर नगर से शिकायत मिली थी कि नंद कुमार बघेल ने ब्राह्मण समुदाय के खिलाफ टिप्पणी की थी। चार सितंबर को मामला दर्ज कर जाँच शुरू कर दी गई थी।

अधिकारी ने शिकायत के हवाले से बताया था कि नंद कुमार बघेल पर भगवान राम के बारे में भी कथित तौर पर अपमानजनक टिप्पणी करने का आरोप है। उन्होंने बताया था कि संगठन ने अपनी शिकायत में कहा है कि मुख्यमंत्री के पिता की कथित टिप्पणी का वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है।

सीएम बघेल ने एफआईआर दर्ज होने पर कहा था, “एक मुख्यमंत्री होने के नाते मेरी ये ज़िम्मेदारी है कि अलग-अलग समुदायों के बीच सद्भाव बनाए रखा जाए। अगर उन्होंने समाज के खिलाफ कोई बात कही है तो, मुझे इसका दुख है। उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी।”

इसके अलावा भूपेश बघेल ने यह भी कहा कि शुरू से ही उनके पिता के साथ उनके वैचारिक मतभेद रहे हैं और सबको इसके बारे में पता है। हमारे राजनीतिक विचार पूरी तरह से अलग हैं। एक पुत्र के रूप में मैं उनका सम्मान करता हूँ, लेकिन एक मुख्यमंत्री के नाते ऐसी गलती को माफ़ नहीं किया जा सकता है जिससे व्यवस्था बिगड़े। साथ ही उन्होंने कहा कि इस मामले में पुलिस द्वारा उचित कार्रवाई की जाएगी।

पाकिस्तान के खिलाफ नारे… महिलाएँ-बच्चों पर तालिबानी गोलियाँ: जिस होटल में ISI चीफ, वहीं हो रहा था विरोध-प्रदर्शन

अफगानिस्तान के काबुल में मंगलवार (7 सितंबर) को अफगान नागरिकों ने रैली निकालकर पाकिस्तान के खिलाफ जमकर विरोध प्रदर्शन किया। विरोध प्रदर्शन को रोकने के लिए तालिबान ने गोलीबारी की, जिसमें कई महिलाएँ और बच्चे घायल हो गए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, अफगानिस्तान पर तालिबानी शासन के बाद से पाकिस्तान के खिलाफ वहाँ के स्थानीय लोगों में काफी आक्रोश है, क्योंकि पाकिस्तान खुलकर तालिबानियों का समर्थन करता रहा है।

बताया जा रहा है कि मंगलवार को सैकड़ों अफगान नागरिक पाकिस्तान विरोधी रैली में काबुल की सड़कों पर उतरे, जिनमें अधिकतर महिलाएँ थीं। उन्होंने रैली में इस्लामाबाद और आईएसआई के खिलाफ नारे लगाए, लेकिन जैसे ही विरोध तेज हुआ, तालिबान ने प्रदर्शनकारियों पर ताबड़तोड़ गोलियाँ बरसाना शुरू कर दिया। सोशल मीडिया पर इसके कई वीडियो सामने आए हैं। समाचार एजेंसी एएफपी के मुताबिक, तालिबान ने काबुल में पाकिस्तान विरोधी रैली को तितर-बितर करने के लिए हवा में गोलियाँ चलाईं।

एक स्थानीय मीडिया आउटलेट असवाका न्यूज (Asvaka News) ने बताया कि तालिबान ने काबुल में राष्ट्रपति भवन के पास जमा हुए प्रदर्शनकारियों पर गोलियाँ चलाईं। प्रदर्शनकारी काबुल सेरेना होटल की ओर मार्च कर रहे थे, जहाँ पिछले सप्ताह से पाकिस्तान आईएसआई निदेशक ठहरे हुए हैं।

स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्विटर पर साझा किए गए वीडियो में सैकड़ों अफगान पुरुषों और महिलाओं को पाकिस्तान के खिलाफ नारे लगाते हुए और काबुल की सड़कों पर तख्तियाँ लिए हुए देखा जा सकता है। इस दौरान लोगों में पाकिस्तान के खिलाफ काफी रोष देखने को मिला। बुर्का पहने महिलाएँ अपने बच्चों को हाथ में उठाए काबुल की सड़कों पर पाकिस्तान के खिलाफ नारे लगा रही थीं। अफगान प्रदर्शनकारियों ने रैली में ‘आज़ादी, आज़ादी’, ‘पाकिस्तान को मौत’, ‘आईएसआई को मौत’ देने जैसे नारे लगाए।

ट्विटर पर साझा किए गए एक वीडियो में, एक अफगान महिला कहती है, “किसी को भी पंजशीर पर हमला करने का अधिकार नहीं है, न ही पाकिस्तान और न ही तालिबान।” तालिबान ने सोमवार (6 सितंबर) को दावा किया था कि उन्होंने पंजशीर घाटी पर कब्जा कर लिया है। वहीं, तालिबान पर खासा प्रभाव रखने वाली पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के प्रमुख ने शनिवार को काबुल का दौरा किया। अफगानिस्तान में अमेरिकी युद्ध के 20 वर्षों के दौरान पाकिस्तान तालिबान का प्रबल समर्थक रहा है। तालिबान ने पाकिस्तान को अपना ‘दूसरा घर’ भी कहा है।

करनाल महापंचायत में लाठी, लोहे की रॉड और तलवार… इन्हें अनाज मंडी से हटाएँ किसान नेता: प्रशासन ने हिंसा को लेकर किया अलर्ट

करनाल अनाज मंडी में मंगलवार (7 सितंबर 2021) को किसान महापंचायत के बीच शरारती तत्वों के घुसपैठ की आशंका जताई गई है। हिंसा को लेकर आगाह करते हुए पुलिस ने एक बयान जारी कर यह बात कही है। बयान में कहा गया है कि ऐसे तत्वों की मंशा ठीक नहीं है। यदि किसी भी परिस्थिति में कानून का उल्‍लंघन हुआ तो पुलिस और प्रशासन को सख्‍त कार्रवाई के लिए मजबूर होना पड़ेगा।

आईजी करनाल के ट्विटर हैंडल से जारी बयान में कहा गया है कि रम्बा, निसिंग और अन्य इलाकों से कुछ शरारती तत्वों के जेली, लोहे की रॉड, तलवारें लेकर अनाज मंडी पहुँचने की सूचना है। इस संबंध में किसान नेताओं को जानकारी देकर ऐसे लोगों को महापंचायत से बाहर निकालने का आग्रह किया गया है। बयान के मुताबिक, “ऐसा प्रतीत होता है कि शरारती तत्व नेताओं की बात नहीं सुन रहे और सभा स्थल छोड़कर जाने को तैयार नहीं हैं।”

ट्वीट में इंटेलिजेंस रिपोर्ट का हवाला देकर यह बात कही गई है। साथ ही उपद्रवी तत्वों को सख्त कार्रवाई की चेतावनी दी गई है। महापंचायत किसानों पर हुए लाठीचार्ज के विरोध में भारतीय किसान यूनियन की ओर से बुलाई गई है।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार किसान नेता गुरनाम सिंह चढूनी ने महापंचायत में आए लोगों से शांति बनाए रखने की अपील करते हुए कहा है कि हम हिंसा में शामिल नहीं होंगे। जब तक हमारी माँगें पूरी नहीं होती शांतिपूर्ण तरीके से विरोध जारी रहेगा। उनके अनुसार महापंचायत में शामिल किसी व्यक्ति के पास यदि हथियार है तो वह किसान नहीं है।

गौरतलब है कि करनाल के बसताड़ा टोल प्‍लाजा पर 28 अगस्त लाठीचार्ज के विरोध में यह महापंचायत हो रही है। किसान नेताओं ने लघु सचिवालय के घेराव का भी ऐलान कर रखा है। प्रशासन की अपील के बाद बातचीत के लिए संयुक्‍त किसान मोर्चा की 11 सदस्‍यीय समिति लघु सचिवालय पहुॅंची है।

किसान नेताओं के पहुँचने के बाद वहाँ किलेबंदी कर दी गई है। प्रशासन की ओर अलर्ट जारी किए जाने की बाद सुरक्षा-व्यवस्था और बढ़ा दी गई है। प्रशासन ने महापंचायत को देखते हुए पहले से ही जिले में इटंरनेट सेवा बंद कर रखी है। कुरुक्षेत्र, कैथल, जींद और पानीपत में भी इंटरनेट/एसएमएस सेवा 7 सितंबर तक के लिए निलंबित है। धारा 144 लागू कर केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की 10 कंपनियों सहित सुरक्षा बलों की 40 कंपनियां तैनात की गई हैं।

केरल में महिला ने दिखाई दरिंदगी: कुत्ते के 7 पप्पी और उनकी माँ को लगाई आग, देखें वीडियो

केरल में मदर डॉग और उसके सात पिल्लों को आग के हवाले कर देने का जघन्य मामला सामने आया है। घटना शनिवार रात को एर्नाकुलम जिले के परवूर के पास मंजली की बताई जा रही है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इस जघन्य कृत्य को दो महिलाओं ने अंजाम दिया। घटना में जहाँ जलने के जख्म के कारण कुत्ते के 7 बच्चों की मौत हो गई है वहीं मदर डॉग जले के निशान के साथ भागने में सफल रही।

इस मामले के एक NGO के संज्ञान में आने के बाद FIR दर्ज करवाई गई थी। दोनों महिलाओं में टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार एक नाम मैरी बताया जा रहा है जो करुमल्लूर पंचायत के वार्ड नंबर तीन की, मंजलि डायमंड मुक्कु की निवासी बताई जा रही है।

हालाँकि अभी तक यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि दोनों महिलाओं ने कुत्ते की माँ और उनके पप्पी को आग क्यों लगाया लेकिन शुरुआती रिपोर्टों में बताया जा रहा है कि मदर डॉग ने महिलाओं के परिसर में ही पप्पी को जन्म दिया था और तब से अपने बच्चों के साथ वहीं रह रही थी। दोनों महिलाओं ने डर और उनके पीछा करने से परेशान होकर कुत्ते की माँ और पिल्लों को आग लगा दी थी।

घटना का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। जिसमें महिलाओं को आग लगाते देखा जा सकता है। एक एनजीओ, दया एनिमल वेलफेयर ऑर्गनाइजेशन के अनुसार, मदर डॉग को गंभीर चोटें आई हैं, लेकिन वह जीवित है।

दया NGO के एक प्रवक्ता अश्विनी के अनुसार, “हमें इस भीषण घटना के बारे में शनिवार रात कुछ स्थानीय लोगों द्वारा सूचित किया गया था। रविवार को, हमने मदर डॉग की तलाश करने की कोशिश की, लेकिन हमारी टीम उसे नहीं ढूंढ पाई। सोमवार को भी, हमारी टीम मौके पर गई और उसका पता लगाने में सफल रही। फिलहाल, मदर डॉग के कान, गर्दन और पीठ पर चोट के निशान हैं। हम उसकी देखरेख कर रहे हैं और उसे चिकित्सा दी जा रही है।”

रिपोर्ट के अनुसार, महिला ने पुलिस को बताया है कि वे कुत्ते की माँ को डराना चाहती थीं और मारे गए सात बच्चों को दफना दिया गया है। NGO के प्रवक्ता ने बताया कि लोग इस तरह के जघन्य कृत्यों को इसलिए भी अंजाम दे रहे हैं क्योंकि वे जानते हैं कि वे मामूली जुर्माना देकर बच सकते हैं।

वर्तमान कानून के अनुसार, किसी जानवर को पीटना, लात मारना, प्रताड़ित करना, भूख से मारना, ओवरलोड करना, ओवरराइड करना और काटना सहित पशु क्रूरता के किसी भी कार्य में 50 रुपए का जुर्माना लगाया जाता है।