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‘अब तो तालिबान ने भी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दिया, यहाँ 7 साल से..’: मिलिए भारत में तालिबान की ‘PR मंडली’ से

अफगानिस्तान पर कब्जे के बाद तालिबान ने पहली बार प्रेस कॉन्फ्रेंस किया। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में तालिबान ने अच्छी-अच्छी बातें तो की, लेकिन भारत में कुछ ‘वोक लिबरल’ इसे लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कोसने लगे। उन्होंने इस प्रेस कॉन्फ्रेंस को ‘अनस्क्रिप्टेड’ बताते हुए स्क्रिप्टेड पीआर की एक मिशाल पेश की। ये सभी ट्विटर के ब्लू टिक धारी एक्टिविस्ट हैं, जो रहते तो भारत में हैं लेकिन गुणगान तालिबान का करते हैं।

खुद को लेखक और ऑटो इंजिनियर बताने वाली पूजा त्रिपाठी ने अपने ट्विटर हैंडल पर लिखा, “अब तो तालिबान भी प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल ले रहा है। मैं बस कह रही हूँ।” ऋचा सिंह ने कत्थक डांसर और क्लासिकल गायिका भी हैं। इसी तरह ‘महिला कॉन्ग्रेस’ से जुड़ीं डॉक्टर पूजा त्रिपाठी ने लिखा, “अब तो तालिबान भी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहा है। मैं बस कह रही हूँ।” वहीं खुद को छात्र एक्टिविस्ट कहने वाली गुरमेहर कौर ने लिखा, “अब तो तालिबान भी मीडिया से अनस्क्रिप्टेड सवाल ले रहा है।”

इसी फेहरिस्त में अगला नाम आता है अभिषेक मुखर्जी का। खुद को ‘क्रिकेट पर्सन’ बताने वाले अभिषेक मुखर्जी की एकमात्र पहचान यही है कि वो प्रणब मुखर्जी के बेटे नहीं हैं। उन्होंने लिखा, “अब तो तालिबान भी प्रेस कॉन्फ्रेंस अटेंड कर रहा है।” खुद को ब्लॉगर और बंगाली कविताएँ की पुस्तक लिखने वाले अग्नीवो नियोगी ने लिखा, “अब तो तालिबान ने भी प्रेस कॉन्फ्रेंस किया। लेकिन, पिछले 7 वर्षों से तो…”

इसी कड़ी में अगला नाम आता है शुनाली खुल्लर श्रॉफ का। वो भी लेखक ही हैं। साथ ही खुद को ट्रैवलर भी बताती हैं। उन्होंने ट्विटर पर लिखा, “यहाँ तक कि तालिबान भी प्रेस कॉन्फ्रेंस करता है। लेकिन, हमारे नेतृत्व के मामले में हम इतने भाग्यशाली नहीं हैं।” वहीं कोलंबिया यूनिवर्सिटी के ‘स्कूल ऑफ इंटनेशनल एंड पब्लिक रिलेशन्स’ में फेलो असाद हन्ना ने लिखा, “तालिबान को प्रेस कॉन्फ्रेंस व मीडिया कवरेज को देखें तो पता चलता है कि अफगानिस्तान पर शासन के लिए वो पूरी तरह तैयार था।”

इसी तरह ट्विटर ट्रोल अभिषेक बक्सी ने भी लिखा कि अब तो तालिबान ने भी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दिया। वो खुद का परिचय फ्रीलांस टेक जर्नलिस्ट के रूप में देते हैं। इस तरह ये 8 मुख्य चेहरे हैं, जो तालिबान के पीआर का भारत में नेतृत्व कर रहे हैं। ये तालिबान के पक्ष में माहौल बना रहे हैं। तालिबान की करतूतों को ढक कर उसे निर्दोष साबित कर रहे हैं। सिर्फ इसीलिए, क्योंकि उसने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दिया और सारे पाप धुल गए।

भारत में तालिबान का महिमामंडन करने वाले लोग

अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में तालिबान ने कहा कि वो किसी तरह की आतंरिक व बाहरी दुश्मनी नहीं चाहता, इसीलिए अफगानिस्तान की जमीन का इस्तेमाल किसी भी देश के खिलाफ नहीं होने देगा। साथ ही उसने महिलाओं को भी सरकार में शामिल होने के लिए कहा। उधर यूके अफगानिस्तान से 20,000 लोगों को शरण दे रहा है। मुल्क में अभी भी भगदड़ का माहौल है। जिन दुकानों पर महिलाओं की तस्वीर थी, उन्हें हटा दिया गया है।

उधर अफगानिस्तान के उपराष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह ने तालिबान के सामने घुटने टेकने से साफ़ इनकार कर दिया। उन्होंने खुद को देश का कार्यवाहक राष्ट्रपति घोषित करते हुए कहा कि इस मामले पर अमेरिकी राष्ट्रपति जो बायडेन से बहस करना बेकार है। उन्होंने कहा, “हम अफगानिस्तानियों को खुद ही अपनी लड़ाई लड़नी होगी। अमेरिका और नाटो ने भले ही अपना हौसला खो दिया हो, लेकिन हमारी उम्मीद अभी बाकी है।”

जाना था बनारस पर स्वप्न में आईं भगवती, प्राण-प्रतिष्ठा के लिए जुटे 1 लाख से अधिक ब्राह्मण: कोलकाता का दक्षिणेश्वर काली मंदिर

पश्चिम बंगाल दुर्गा पूजा के लिए देश भर में जाना जाता है। यहाँ कई ऐसे मंदिर हैं जिनका इतिहास सालों पुराना है और इनमें से अधिकतर माँ दुर्गा और उनके विभिन्न रूपों को समर्पित हैं। ऐसा ही एक मंदिर कोलकाता में हुगली नदी के तट पर स्थित है, दक्षिणेश्वर काली मंदिर। अद्भुत संरचना के लिए प्रसिद्ध इस मंदिर का निर्माण एक विधवा ने कराया था जो माता काली के दर्शन के लिए बनारस जाना चाहती थीं, लेकिन खुद माँ काली ने उन्हें हुगली नदी के किनारे ही मंदिर बनाने का आदेश दिया था।

इतिहास

कोलकता (तत्कालीन कलकत्ता) के प्राचीनतम मंदिरों में से एक है, दक्षिणेश्वर काली मंदिर। इसका निर्माण उस समय की एक समाज सेविका रानी रासमणि ने कराया था। रानी समाज सेवी होने के साथ एक काली भक्त भी थीं। मंदिर के निर्माण का एक अनोखा इतिहास है जो किसी चमत्कार से कम नहीं है। रानी रासमणि विधवा थीं लेकिन उनके पास उनके पति का व्यापार और अच्छी-खासी संपत्ति थी। काफी समय तक यह सब सँभालने के बाद रानी के मन में तीर्थ यात्रा करने की इच्छा हुई। इसके लिए उन्होंने अपने रिश्तेदारों को तैयार किया और सबसे पहले वाराणसी जाकर माँ काली की उपासना करने की योजना बनाई।

कहा जाता है कि वाराणसी के लिए प्रस्थान करने से पहले एक रात माँ काली, रानी रासमणि के सपने में आईं और कहा कि उन्हें माता के दर्शन के लिए वाराणसी जाने की कोई जरूरत नहीं है। यहीं नदी के तट पर उनका मंदिर बनाया जाए और वह वहीं प्रकट होकर भक्तों को दर्शन देंगी और रानी द्वारा बनवाए गए मंदिर में निवास करेंगी। माँ काली के आदेश के बाद रानी ने वाराणसी जाने की योजना रद्द कर दी और मंदिर निर्माण के लिए भूमि तलाश करने लगी। कहा जाता है कि जब रानी मंदिर के लिए भूमि की खोज कर रही थीं तब वो उस जगह पर पहुँची जहाँ आज मंदिर स्थित है तब एक बार फिर उन्हें एक अदृश्य आवाज सुनाई दी जिसने उस स्थान को मंदिर निर्माण के लिए उपयुक्त बताया। इसके बाद रानी ने वह जमीन खरीदी और सन् 1847 में मंदिर का निर्माण शुरू हुआ जो सन् 1855 में पूरा हुआ।

संरचना

कोलकाता का दक्षिणेश्वर काली मंदिर न केवल पश्चिम बंगाल, अपितु पूरे भारत में अपनी सुंदरता और बनावट के लिए जाना जाता है। इस मंदिर का निर्माण बंगाल वास्तुकला की नवरत्न शैली में हुआ है। तीन मंजिल वाले इस मंदिर की ऊपरी दो मंजिलों पर 9 मीनारों का निर्माण किया गया है जो इस मंदिर की सुंदरता को कई गुना बढ़ा देती हैं। मंदिर 46 फुट लंबा चौड़ा है साथ ही इसकी ऊँचाई 100 फुट है।

गर्भगृह में माँ काली की प्रतिमा स्थापित है जिन्हें भवतारिणी के नाम से पूजा जाता है। माँ काली भगवान शिव के छाती पर चरण रखकर खड़ी हुई हैं। इसके अलावा गर्भगृह में चाँदी का कमल का फूल बनाया गया है, जिसकी हजार पंखुड़ियाँ हैं। इसी कमल के फूल पर माँ काली की प्रतिमा को विराजमान किया गया है। मंदिर से जुड़ा हुआ वह कमरा जहाँ स्वामी विवेकानंद के गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस से जुड़ी स्मृतियाँ हैं। साथ ही मंदिर के बाहर रानी रासमणि और स्वामी रामकृष्ण परमहंस की पत्नी श्री शारदा माता की समाधि है। इसके अलावा वह वट वृक्ष भी मौजूद है जिसके नीचे स्वामी परमहंस ध्यान किया करते थे।

कोलकाता के दक्षिणेश्वर काली मंदिर में माँ काली और अन्य प्रतिमाओं की स्थापना हिन्दुओं के पवित्र स्नान यात्रा दिवस पर की गई थी। रानी रासमणि ने इस कार्य के लिए देश भर से एक लाख से अधिक विद्वान ब्राह्मणों को बुलाया था। जिनके द्वारा मंदिर में प्रतिमाओं की प्राण-प्रतिष्ठा का कार्य किया गया था। कहा जाता है कि इस मंदिर में स्वामी रामकृष्ण परमहंस को भी माँ काली के दर्शन प्राप्त हुए थे।

कैसे पहुँचे?

कोलकाता देश के चार प्रमुख महानगरों में से एक है, ऐसे में यहाँ पहुँचने के लिए परिवहन के साधनों की अनुपलब्धता का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। दक्षिणेश्वर काली मंदिर से कोलकाता के नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे की दूरी लगभग 11 किमी है। इसके प्रसिद्ध हावड़ा जंक्शन, दक्षिणेश्वर मंदिर से मात्र 10 किमी दूर है। कोलकाता पहुँचने के बाद मंदिर पहुँचना काफी आसान है और माना जाता है कि कोलकाता जाकर भी अगर दक्षिणेश्वर काली माता मंदिर की यात्रा न की तो यात्रा अधूरी ही मानी जाएगी।

‘भारत सभी भारतीयों की सकुशल वापसी को लेकर प्रतिबद्ध’: अफगानिस्तान पर PM मोदी ने की बड़ी बैठक, हर घटनाक्रम पर है पैनी नजर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार (17 अगस्त) को अफगानिस्तान की सत्ता पर तालिबान के काबिज होने के बाद पैदा हुए हालात पर सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति की बैठक की। समाचार एजेंसी एएनआई के मुताबिक, इस बैठक में पीएम मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, गृह मंत्री अमित शाह, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल, विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला, अफगानिस्तान में भारत के राजदूत आर. टंडन सहित कई अन्य वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे।

हालाँकि, बैठक में किन मामलों पर चर्चा हुई इस बारे में अभी ज्यादा बातें सामने नहीं आई हैं।

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि इस दौरान अफगानिस्तान में फँसे भारतीयों को कैसे सुरक्षित निकाला जाए इस पर बातचीत की गई। इससे पहले, काबुल में भारतीय राजदूत और दूतावास के कर्मियों समेत 120 लोगों को लेकर भारतीय वायुसेना का एक विमान आज अफगानिस्तान से भारत पहुँचा है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, विदेश मंत्रालय ने कहा, ”भारत सभी भारतीयों की अफगानिस्तान से सकुशल वापसी को लेकर प्रतिबद्ध है। काबुल एयरपोर्ट से वाणिज्यिक उड़ानों की बहाली होते ही वहाँ फँसे अन्य भारतीयों को स्वदेश लाने का प्रबंध किया जाएगा।”

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस पूरे हालात पर करीब से नजर बनाए हुए हैं। उन्होंने अफगानिस्तान में भारतीयों की स्थिति को लेकर अधिकारियों से भी संपर्क किया है। पीएम मोदी ने निर्देश दिया है कि देश लौटने वाले सभी लोगों के लिए भोजन उपलब्ध कराने के लिए पर्याप्त व्यवस्था की जाए।

‘बाइडेन से बहस बेकार, हम अफगानिस्तानियों को अपनी लड़ाई लड़नी होगी’: उपराष्ट्रपति सालेह ने खुद को घोषित किया कार्यवाहक राष्ट्रपति

अफगानिस्तान के उपराष्ट्रपति अमरुल्लाह सालेह ने तालिबान के सामने घुटने टेकने से साफ़ इनकार कर दिया है। उन्होंने मंगलवार (17 अगस्त) को खुद को देश का कार्यवाहक राष्ट्रपति घोषित कर दिया है। उनका कहना है कि इस मामले पर अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन से बहस करना बेकार है। हम अफगानिस्तानियों को खुद ही अपनी लड़ाई लड़नी होगी। उन्होंने आगे कहा कि अमेरिका और नाटो ने भले ही अपना हौसला खो दिया हो, लेकिन हमारी उम्मीद अभी बाकी है।

सालेह ने ट्वीट किया, ”स्पष्टीकरण: अफगानिस्तान के संविधान के अनुसार, राष्ट्रपति की अनुपस्थिति, पलायन, इस्तीफे या मृत्यु की हालत में उपराष्ट्रपति कार्यवाहक राष्ट्रपति बन जाता है। मैं इस समय अपने देश में हूँ और वैध कार्यवाहक प्रेसिडेंट हूँ। मैं सभी नेताओं से उनके समर्थन और आम सहमति के लिए संपर्क कर रहा हूँ।”

वहीं, अफगानिस्तान से सेना को वापस बुलाने को लेकर अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन की अपने ही देश में लगातार आलोचना जारी है। अब डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसद जिम लैंगविन ने लेख लिखकर कहा है कि उन्होंने सेना वापसी का विरोध किया था। डेमोक्रेट नेता ने अफगानिस्तान की हालिया स्थिति पर सवाल खड़े किए हैं।

विदेश नीति पर अपने लेख में उन्होंने कहा, ”मई 2021 में सेना वापसी को लेकर U.S. House Armed Services Committee की एक बैठक हुई थी। इसमें लैंगविन ने सेना के वरिष्ठ अधिकारी से पूछा था कि अगर अफगानिस्तान से सेना की वापसी के बाद वहाँ की स्थिति बिगड़ती है और अफगान सरकार मदद माँगती है, तो अमेरिका का क्या स्टैंड होगा? इस पर अधिकारी ने कहा था कि वो काल्पनिक सवालों के चक्कर में नहीं पड़ना चाहते हैं। लैंगविन ने लेख में आगे कहा है कि कमेटी के सभी सदस्यों ने इससे संबंधित सवाल पूछे थे, लेकिन उन्हें कोई तर्कसंगत जवाब नहीं मिला था।”

रिपोर्ट्स के मुताबिक, अफगानिस्तान में तेजी से बदलते घटनाक्रम का ब्योरा देते हुए ब्रिटिश रेडियो पर ब्रिटेन के रक्षा सचिव बेन वालेस अचानक रो पड़े। उन्होंने कहा कि कुछ स्थानीय अफगान कर्मचारी वहाँ से वापस नहीं लौट पाएँगे। रक्षा सचिव ने कहा कि उन्हें वास्तव में बेहद अफसोस हो रहा है कि ब्रिटेन के लिए रवाना होने के योग्य सभी अफगान लोगों को अफगानिस्तान से निकाल पाना संभव नहीं होगा।

ऋषभ नहीं कबाड़ी इमरान के साथ नैनीताल घूमने गईं थीं दीक्षा मिश्रा, होटल में मिली लाश: परिजनों ने जताई लव-जिहाद की आशंका

नोएडा की रहने वाली दीक्षा मिश्रा की नैनीताल के एक होटल में हत्या कर दी गई। हत्या करने के बाद आरोपित इमरान फरार है जिसकी तलाश में पुलिस जुटी हुई है हालाँकि दीक्षा के परिजनों ने इसे लव-जिहाद करार दिया है और बताया है कि इमरान ने पहले अपना नाम ऋषभ तिवारी बताया था।

ज्ञात हो कि नोएडा के होरिजन होम्स एक्सटेंशन की रहने वाली दीक्षा मिश्रा 14 अगस्त 2021 को इमरान और अपने दो अन्य दोस्तों के साथ नैनीताल घूमने गए थे। 15 अगस्त को दीक्षा का जन्मदिन मनाने के बाद सभी ने एक ही कमरे में पार्टी की और उसके बाद सभी अपने कमरे में चले गए। इसी दौरान रात में इमरान के दीक्षा की हत्या करके फरार होने का संगीन आरोप है। कोतवाली पुलिस ने फ़िलहाल इमरान के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर लिया है और एसआई नितिन बहुगुणा के नेतृत्व में पुलिस की एक टीम आरोपित इमरान की गिरफ्तारी के लिए नोएडा के लिए रवाना हुई।

दीक्षा एक रियल इस्टेट कंपनी में एक अच्छे पद पर काम करती थी जबकि इमरान एक कबाड़ी था। दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार दीक्षा के परिजनों ने लव-जिहाद का आरोप लगाते हुए कहा है कि आरोपित इमरान ने अपना नाम ऋषभ तिवारी बताया था। दीक्षा के भाई अंकुर मिश्रा का कहना है कि जब वह आरोपित इमरान से मिला था तब उसने अपना नाम ऋषभ तिवारी बताया था साथ ही दोस्तों ने भी यह आरोप लगाया है कि आरोपित की फेसबुक आईडी भी ऋषभ तिवारी के नाम से ही थी।

हत्या का आरोपित इमरान दीक्षा का फोन लेकर फरार हुआ है। बताया जा रहा है कि उसने दीक्षा की 11 साल की बेटी को फोन लगाकर दीक्षा के फोन का पासवर्ड पूछा। इसके अलावा वह दीक्षा के फ्लैट से जरूरी कागजात भी अपने साथ ले गया है। दीक्षा की सन् 2008 में शादी हुई थी लेकिन पति द्वारा शराब पीकर मारपीट करने के बाद दीक्षा अपने पति से अलग रह रही थी। दीक्षा की एक 11 साल की बेटी भी है।

कई रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि दीक्षा के सीने में इमरान के नाम का टैटू था ऐसे में संभावना जताई जा रही है कि दीक्षा, इमरान की असलियत से वाकिफ थी लेकिन दीक्षा के परिजनों का यही कहना है कि वह अकेले रहकर अच्छी-खासी कमाई करती थी इसलिए इमरान ने किसी तरह उसे अपने जाल में फँसा लिया होगा। हालाँकि पुलिस मामले की जाँच कर रही है जिसके पूरे होने पर ही पूरी सच्चाई सामने आ पाएगी।

तालिबान ने अफगानिस्तान की जेलों में बंद TTP, ISIS के 2300 कुख्यात आतंकियों को किया रिहा: घबराए पाकिस्तान के छूटे पसीने

अफगानिस्तान की सत्ता में आते ही तालिबान ने यहाँ की विभिन्न जेलों में बंद 2,300 खूंखार आतंकियों को रिहा कर दिया है। बताया जा रहा है कि तालिबान ने टीटीपी के डिप्टी चीफ फकीर मोहम्मद के अलावा अलकायदा, आईएसआईएस और तहरीक-ए-तालिबान के कई खूंखार आतंकियों को जेल से बाहर कर दिया गया है। ये सभी अफगान की विभिन्न जेलों में बंद थे।

रिपोर्ट्स के मुताबिक तालिबान ने बैतुल्ला मेहसूद, आतंकी फकीर मोहम्मद, वकास मेहसूद, हमजा मेहसूद, जरकावी मेहसूद, जईतुल्ला मेहसूद, हमीदुल्ला मेहसूद और हमीद महसूद जैसे कुख्यात आतंकियों सहित 2,300 आतंकियों को रिहा कर दिया। वहीं, पाकिस्तान ने तहरीके तालिबान पाकिस्तान (TTP) के आतंकियों को छोड़ने पर भी चिंता व्यक्त की है, क्योंकि टीटीपी पाकिस्तान में काफी सक्रिय आतंकी संगठन है।

तालिबान ने 15 अगस्त 2021 को काबुल में प्रवेश के साथ ही पूरे अफगानिस्तान पर अपना कब्जा जमा लिया है। अफगान के राष्ट्रपति अशरफ गनी भी देश छोड़कर भाग चुके हैं।

गौरतलब है कि अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के पीछे जिन बड़े सरगनाओं का नाम सामने आ रहा है, उसमें खैरुल्लाह खैरख्वाह भी शामिल है। ये वही व्यक्ति है, जिसे बराक ओबामा के कार्यकाल में ग्वांतानामो वे जेल से छोड़ा गया था। 2014 में ओबामा प्रशासन द्वारा छोड़े गए तालिबानी कैदी ने अब काबुल में तालिबान की सत्ता की पूरे रूपरेखा तय की और इसकी रणनीति तैयार की है। उसके साथ-साथ कई अन्य आतंकी भी छोड़े गए थे।

इनमें से एक मोहम्मद नबी है, जो कलात में तालिबान का ‘सिक्योरिटी चीफ’ हुआ करता था। एक अन्य का नाम मोहम्मद फ़ज़ल था। ‘ह्यूमन राइट्स वॉच’ संस्था के अनुसार, 2000-2001 में अफगानिस्तान में जो शिया मुस्लिमों का नरसंहार हुआ था, उसके पीछे इसकी ही भूमिका थी। एक अन्य का नाम अबुल हक़ वासिक था, जो ‘इंटेलिजेंस’ में तालिबान का डिप्टी मिनिस्टर था। मुल्ला नरुल्लाह नोरी इसमें अगला नाम था।

‘अब्बाजान कब से असंसदीय हो गया? सपा को मुस्लिम वोट तो चाहिए लेकिन अब्बाजान से परहेज क्यों?’: CM योगी

समाजवादी पार्टी (सपा) द्वारा ‘अब्बाजान’ शब्द पर आपत्ति जताए जाने के बाद मंगलवार (17 अगस्त 2021) को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विधान परिषद में सत्र की कार्यवाही के दौरान कहा कि अब्बाजान शब्द कब से असंसदीय हो गया?

सत्र की कार्यवाही के दौरान सीएम आदित्यनाथ ने विपक्ष को निशाने पर लिया और सपा से सवाल किया कि ‘अब्बाजान’ कब से असंसदीय हो गया? साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि सपा को मुस्लिम वोट तो चाहिए लेकिन अब्बाजान से परहेज है। सीएम आदित्यनाथ ने यह बात तब कही जब सपा के सदस्य हंगामा करते हुए सदन के वेल तक जा पहुँचे।

सीएम आदित्यनाथ ने यह भी कहा कि उन्होंने किसी का नाम भी नहीं लिया लेकिन वो कौन से चेहरे हैं जो कहते थे कि वैक्सीन नहीं लेंगे, वैक्सीन भाजपा की है, मोदी की है लेकिन जब इनके अब्बाजान ने वैक्सीन लगवाई तब सब लगवा रहे हैं। उन्होंने कोरोना वायरस महामारी से निपटने में प्रदेश के प्रयासों के बारे में बात करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश और प्रदेश ने किस तरीके से कोरोना से लड़ाई की है, वह किसी से छुपा हुआ नहीं है। सीएम आदित्यनाथ ने कहा कि Covid-19 के संक्रमण की जाँच का पहला सैम्पल पुणे भेजने वाला राज्य आज 4 लाख टेस्ट रोजाना कर रहा है।

ज्ञात हो कि सीएम आदित्यनाथ ने तंज कसते हुए कहा था, “उनके अब्बाजान (मुलायम सिंह यादव) कहते थे कि वहाँ (अयोध्या में) परिंदे को भी पर नहीं मारने देंगे, लेकिन अब वहाँ राम मंदिर का निर्माण शुरू हो गया है। अगले तीन साल में वहाँ एक बड़ा भव्य मंदिर होगा।” उन्होंने यह भी कहा था कि 1990 में भी कहा गया था कि जहाँ रामलला विराजमान हैं, वहीं मंदिर बनेगा, तब इन लोगों ने गोली चलवा दी थी, लेकिन अब मंदिर का काम शुरू हो चुका है और जल्द इसे पूरा किया जाएगा।

सीएम आदित्यनाथ द्वारा अब्बाजान शब्द का उपयोग किए जाने पर अखिलेश यादव गुस्सा हो गए थे और उन्होंने कहा था कि मुख्यमंत्री उनके पिता के बारे में ऐसी भाषा का इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं? मुख्यमंत्री को अपनी भाषा पर संतुलन रखना चाहिए और अगर सीएम आदित्यनाथ उनके पिता के बारे में कहेंगे तो अपने पिता के बारे में भी सुनने के लिए तैयार रहें।

अखिलेश यादव द्वारा अब्बा शब्द पर आपत्ति जताने के बाद यूपी के कैबिनेट मंत्री सिद्धार्थनाथ सिंह ने सपा अध्यक्ष पर सवाल खड़े किए थे। सिद्धार्थनाथ सिंह ने अखिलेश यादव से पूछा था कि जब मुलायम सिंह यादव उन्हें ‘टीपू’ बुलाते हैं तो उन्हें अपने पिता के लिए ‘अब्बा’ शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति क्यों है?

कुलगाम में भाजपा नेता की आतंकियों ने की हत्या, पिछले 15 दिन में J&K में 4 BJP नेता हो चुके हैं आतंक के शिकार

जम्मू-कश्मीर के कुलगाम जिले के ब्राजलु इलाके में आतंकियों ने मंगलवार (17 अगस्त) को बीजेपी नेता जावेद अहमद डार की गोली मारकर हत्या कर दी। जावेद अहमद डार होमशालिबुग विधानसभा क्षेत्र के पार्टी प्रभारी थे। भाजपा जम्मू-कश्मीर के प्रवक्ता अल्ताफ ठाकुर ने इस हमले की निंदा करते हुए कहा कि कुलगाम में जावेद अहमद डार की हत्या आतंकियों की हताशा को दर्शाती है। यह कायरतापूर्ण कृत्य है। जावदे के परिवार के साथ पार्टी की संवेदनाएँ हैं।

उन्होंने पुलिस से डार के हत्यारों को पकड़ने और उन्हें कड़ी सजा देने का आग्रह किया है। बीते गुरुवार (12 अगस्त) को रात करीब 9 बजे इस्लामी आतंकियों ने जम्मू-कश्मीर के राजौरी जिले में भाजपा नेता जसबीर सिंह के घर पर ग्रेनेड से हमला किया था। हमले में जसबीर सिंह, उनके पिता सहित परिवार के पाँच सदस्य गंभीर रूप से घायल हो गए थे। वहीं, 5 वर्षीय मासूम बच्चे ने दम तोड़ दिया है।

केंद्र शासित प्रदेश में पिछले 3 महीने में इस्लामी आतंकी 7 बीजेपी नेताओं-कार्यकर्ताओं को अपना निशाना बना चुके हैं। वहीं बात करें केवल अगस्त महीने की तो 15 दिन के भीतर आतंकियों ने 4 BJP नेताओं की हत्या की है। 9 अगस्त को कश्मीर के अनंतनाग जिले में इस्लामी आतंकियों ने दिनदहाड़े भाजपा नेता गुलाम रसूल डार और उनकी पत्नी पर ताबड़तोड़ गोलियाँ बरसाईं थीं, जिसकी वजह से दोनों की मौत हो गई थी। वहीं, 4 अगस्त को कुलगाम में आखरन नौपुरा में बीजेपी नेता और सरपंच आरिफ अहमद पर जानलेवा हमला किया गया था।

गौरतलब है कि आतंकियों का समर्थन करने वाले जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने इस घटना को भयावह बताते हुए इसे ‘कोल्ड ब्लडेड मर्डर’ कहा है। साथ ही डार के शोक परिवार के प्रति संवेदनाएं प्रकट की है।

अफगानिस्तान के 99% लोगों ने किया था देश में इस्लामिक शरिया कानून का समर्थन: तालिबानी शासन के पहले हुआ था Pew का सर्वे

प्यू (Pew) रिसर्च सेंटर ने 30 अप्रैल 2013 को अपने एक सर्वे का परिणाम प्रकाशित किया था जिसमें 99% अफगानियों ने देश के आधिकारिक कानून के रूप में इस्लामिक शरिया कानून को समर्थन दिया था, तब अफगानिस्तान में अमेरिका की सैन्य उपस्थिति मजबूत हुआ करती थी। Pew के द्वारा की गई इस सर्वे का शीर्षक था, “The World’s Muslims: Religion, politics and society” जिसके अंतर्गत 23 देशों में इस्लामिक शरिया कानूनों को लेकर प्रश्न पूछे गए थे। अफगानिस्तान में तालिबान के शासन से पहले यह सर्वे किया गया था।

आधिकारिक कानून के रूप में शरिया

इस सर्वे में अफगानिस्तान के 99% मुस्लिम शरिया को देश का आधिकारिक कानून बनाने के पक्ष में थे। इसके अलावा 84% पाकिस्तानियों ने भी शरिया के पक्ष में अपनी स्वीकार्यता दिखाई थी। इस सर्वे में बताया गया था कि अधिकांश दक्षिण एशियाई देशों में ऐसे लोगों की संख्या अच्छी-खासी रही जिन्होंने शरिया का समर्थन किया।

सर्वे में एक रोचक तथ्य भी सामने आया कि जो मुस्लिम दिन में कई बार नमाज पढ़ते हैं या इबादत करते हैं उन्होंने शरिया को लेकर कहीं अधिक अपना समर्थन जताया बजाय उन मुस्लिमों के जो अपेक्षाकृत कम इबादत करते हैं।

Source: Pew Research Center

सर्वे के मुताबिक 23 में से 17 देशों में कम से कम आधे मुस्लिमों ने शरिया को अल्लाह का कहा हुआ माना, न कि मानव द्वारा बनाया गया। इस सर्वे के अनुसार लगभग 81% पाकिस्तानी मुस्लिमों ने शरिया को अल्लाह का कहा माना, जबकि अफगानिस्तान के 73% मुस्लिमों ने इसके बारे में अपना समर्थन दिया।

Source: Pew Research Center

गैर मुस्लिमों पर शरिया कानून

जब यह प्रश्न पूछा गया कि शरिया क्या सिर्फ मुस्लिमों के लिए लागू होना चाहिए या गैर-मुस्लिमों के लिए भी? इस प्रश्न पर सर्वे में भाग लेने वाले अफगानिस्तान के 61% लोगों ने कहा था कि शरिया गैर-मुस्लिमों पर भी लागू होना चाहिए। हालाँकि पाकिस्तान में यह संख्या कम रही और 34% लोगों ने ही गैर-मुस्लिमों पर शरिया लागू करने की बात कही।

Source: Pew Research Center

क्या शरिया घरेलू और निजी मुद्दों पर भी लागू हो?

शादी, तलाक और उत्तराधिकार कुछ ऐसे घरेलू और निजी मुद्दे हैं जो इस्लामिक कानूनों के अंतर्गत आते हैं। शरिया को राज्य का आधिकारिक कानून बनाने के समर्थन में रहने वाले अधिकांश मुस्लिमों ने माना है कि शरिया इन मुद्दों पर भी लागू होना चाहिए।

Source: Pew Research Center

दक्षिण-पूर्वी एशिया, दक्षिण एशिया, मध्य पूर्व और उत्तरी अफ्रीका में ऐसे लोगों की संख्या बहुतायत में है जो पारिवारिक मुद्दों के निपटारे के लिए शरिया कानूनों का समर्थन करते हैं। पाकिस्तान में 87% और अफगानिस्तान में 78% लोगों ने संपत्ति और पारिवारिक विवादों में शरिया कोर्ट की दखल को स्वीकार किया था।

हुदुद सजा के बारे में मुस्लिमों के विचार

सर्वे के मुताबिक 20 में से 10 देशों के कम से कम आधे लोगों ने हुदुद सजा का समर्थन किया है। इसके तहत चोरों और लुटेरों के हाथों को काटने का प्रावधान है। पाकिस्तान में 88% और अफगानिस्तान में लगभग 81% लोगों ने इस तरह की सजा का समर्थन किया था। हुदुद, इस्लाम में पवित्र माने जाने वाली कुरान में वर्णित है।

Source: Pew Research Center

इसके अलावा पाकिस्तान के 89% मुस्लिमों और अफगानिस्तान के 85% मुस्लिमों ने व्यभिचार जैसे अपराधों के लिए सजा के तौर पर पत्थर मारने का। साथ ही 2013 में किए गए इस सर्वे में 79% अफगानी मुस्लिमों और 76% पाकिस्तानी मुस्लिमों ने इस्लाम छोड़ने वालों के लिए मौत की सजा का समर्थन किया।

जब से तालिबान ने अफगानिस्तान पर अपना शासन स्थापित किया है, यह रिपोर्ट्स आ रही हैं कि इस्लामिक संगठन तालिबान देश में शरिया कानून लागू करना चाहता है। हालाँकि 2013 में Pew किए गए सर्वे में यह दावा किया गया था सबसे अधिक अफगानी लोगों ने ही शरिया कानून का समर्थन किया था और तब जब देश तालिबान के शासन में नहीं था।

अफगानिस्तान में भी केरल मॉडल? कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर का दावा- तालिबान ने की 2 मलयाली पुरुषों की भर्ती

कॉन्ग्रेस नेता व तिरुवनंतपुरम से सांसद शशि थरूर ने मंगलवार (17 अगस्त) को एक ट्वीट करके चौंकाने वाला दावा किया है। उन्होंने अफगानिस्तान में आतंक मचाने वाले तालिबानियों में दो भारतीयों के शामिल होने की आशंका जताई है। शशि थरूर ने अफगानिस्तान पर कब्जा करने के बाद तालिबान की ओर से जश्न मनाए जाने से संबंधित एक वीडियो मंगलवार को ट्विटर पर साझा किया।

कॉन्ग्रेस नेता ने दावा किया है कि उन्होंने वीडियो में दो भावुक तालिबानियों को मलयालम में बातचीत करते हुए सुना है। थरूर ने लिखा, “ऐसा प्रतीत होता है कि तालिबान ने केरल के कम से कम दो मलयाली लोगों को भर्ती किया है। इनमें से एक को 8 सेकेंड के आसपास ‘संसारिककिट्टे’ (मलयाली शब्द) बोलते हुए सुना जा सकता है और दूसरा तालिबानी इसे समझता है।” आप वीडियो में देख सकते हैं कि तालिबान का एक सदस्य काबुल पहुँचने के बाद कैसे खुशी से रो रहा है।

इसको लेकर कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता नेटिजन्स के निशाने पर आ गए हैं। इस कुकत्य का महिमामंडन करने के लिए उन्हें जमकर ट्रोल​ किया जा रहा है। जहाँ एक यूजर ने उनके लिए ‘मालीबान’ शब्द का इस्तेमाल करने को कहा, वहीं दूसरे ने सवाल किया कि क्या उन्हें इन तालिबानियों पर गर्व है?

एक अन्य नेटिजन ने थरूर और कॉन्ग्रेस पार्टी का मजाक उड़ाते हुए कहा, “अपने कार्यकर्ताओं को भेजने के लिए बधाई।”

कुछ लोगों ने यहाँ तक कहा कि वीडियो में मलयाली शब्द नहीं हैं। थरूर को सुर्खियों में बने रहने के लिए इस तरह की झूठी खबरें नहीं फैलानी चाहिए।

कई ट्विटर यूजर्स ने थरूर के ट्वीट का हवाला देते हुए पौराणिक ‘केरल मॉडल’ पर चुटकी ली।

एक अन्य यूजर ने थरूर को अपने लोगों की क्षमता को समझने और उन्हें खुश करने के लिए ‘सच्चा नेता’ कहा।

थरूर ने अभी तक अपने बयान को ना ही डिलीट किया है और ना तो वापस लिया है।

केरल आईएसआईएस के लिए प्रजनन स्थल

जाँच में पता चला है कि आईएसआईएस ने 2014 में केरल में अपने जड़ें जमा ली थीं, जिसमें मॉड्यूल धार्मिक धर्मांतरण को प्रायोजित करते थे। लोगों को अफगानिस्तान और सीरिया में आतंकी संगठन में भर्ती करने के लिए उनका माइंड वॉश करते थे। पिछले साल आतंकवाद पर अपनी रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्र ने चेताया था कि भारत के केरल राज्य में बड़ी संख्या में आईएसआईएस आतंकवादी मौजूद हैं। मालूम हो कि आईएसआईएस भारतीय सहयोगी (हिंद विलायह), जिसकी घोषणा 10 मई, 2019 को की गई थी, इसमें 180 से 200 सदस्य थे।