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काबुल एयरपोर्ट पर भेड़-बकरी की तरह इंसान, फायरिंग में मौतें: तालिबान के आते ही बुर्के के लिए भी मारामारी

अफगानिस्तान की स्थिति को बयान करने वाली कुछ भयावह तस्वीरें इस समय सोशल मीडिया पर वायरल हैं। तस्वीरों में दिख रहा है कि किस तरह सैंकड़ों अफगानिस्तानी आज इतने मजबूर हो गए हैं कि वह भेड़-बकरियों की तरह एक ऊपर एक लदकर हवाई जहाज में चढ़ रहे हैं। सैंकड़ों की भीड़ देश छोड़ना चाहती है और जो बचे हैं वो खुद की किस्मत को कोस रहे हैं। शिक्षा की चाह रखने वाली महिलाओं को अपना जीवन शून्य की ओर जाता दिख रहा है। वहीं बुर्के का कारोबार है जो तालिबान की एंट्री के बाद एकदम से उछला है। इस बीच काबुल एयरपोर्ट पर फायरिंग की घटना भी हुई है। फायरिंग में मरने वालों की संख्या की आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पाई है। कुछ रिपोर्टों में मृतकों की संख्या 3 तो कुछ में 8 तक बताई गई है।

बता दें कि पिछले दिनों कुछ अफगानिस्तानी शरण लेने भारत आए हैं और यहाँ आकर उन्होंने मीडिया को आपबीती सुनाई है:

अफगानिस्तान की जारा, जो अब दिल्ली में हैं, रो-रोकर अपने देश के हालात पर कहती हैं, “इतना कभी लाचार, निराश और होपलेस महसूस नहीं किया। हमारे 20 साल की सारी उपलब्धियाँ कुछ ही दिनों में धुल गई हैं।”

जंगपुरा में रहने वाले हिदायतउल्लाह कहते हैं, “नेता भाग रहे हैं। नागरिकों को चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। मैंने अपने दोस्तों से बात की, उन्होंने बताया काबुल में तालिबान आ गया है। हाल में मैंने इसी के कारण अपने कजन को खो दिया।”

अब्दुल कजीर कहते हैं, “मेरे रिश्तेदार हेरात में रहते हैं। सबकुछ वहाँ बंद है। कोई शांति नहीं है। महिलाएँ और लड़कियाँ बिना सदरी के बाहर नहीं आ सकतीं। हमें स्वतंत्रता चाहिए।”

अरीफा कहती हैं, “हालात बहुत भयंकर हैं। हमें सदरी नहीं पहननी। हमें स्वतंत्रता चाहिए। हम शांति में खाना और सोना चाहते हैं।” 

काबुल से दिल्ली पहुँची महिला कहती हैं, “मैं यकीन नहीं कर पा रही, पूरी दुनिया ने हमें छोड़ दिया है। हमारे दोस्त मारे जा रहे हैं। वह हमें मार देंगे। हमारी महिलाओं के पास कोई अधिकार नहीं बचेगा।”

पक्तिया प्रांत के सांसद सैयद कहते हैं, “मैं देश नहीं छोड़ना चाहता। मैं यहाँ मीटिंग के लिए आया हूँ और सच में वहाँ हालात बहुत बुरे हैं। खासकर आज रात तो बहुत बुरे हैं।”

अफगान सरकार के पूर्व सांसद हामिद करजई कहते हैं, “जब मैंने देश छोड़ा काबुल पर तालिबान कब्जा कर चुका था। मुझे लगता है वहाँ नई सरकार होगी। जो भी हुआ वो अशरफ गनी के कारण हुआ। उन्होंने अफगानिस्तान को धोखा दिया। लोग उन्हें माफ नहीं करेंगे।”

काबुल से दिल्ली आया एक बीबीए छात्र वहाँ के हालात बयां करते हुए कहता है, “लोग बैंक जा रहे हैं। मैंने कोई हिंसा नहीं देखी लेकिन मैं ये नहीं कहूँगा हिंसा नहीं हो रही। मेरा परिवार अफगानिस्तान में है। मेरी फ्लाइट प्री-प्लॉन्ड थी। कई लोगों ने काबुल छोड़ा है।”

उल्लेखनीय है कि तालिबान के अफगानिस्तान पर कब्जा करने के बाद अब महिलाओं की आजादी पर सवाल खड़ा हो रहा है। कई महिलाएँ तो डर से देश छोड़ चुकी हैं और कुछ अपने सपनों को गर्त में जाता देख रो रही हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार, एक 22 वर्षीय लड़की जो अंतरराष्ट्रीय संबंध में डिग्री ले रही थी, वो निराश मन से कहती है कि अब नहीं लगता कि वो कभी ग्रैजुएट हो पाएगी।

तालिबान राज में एक ओर जहाँ महिलाओं की शिक्षा और भविष्य को लेकर सवाल खड़ा है। वहीं दूसरी ओर तालिबान के काबुल पहुँचते ही बुर्के का काम फल-फूल रहा है वहाँ बुर्का खरीदने के लिए दुकानों पर महिलाओं की भीड़ है। कुछ लड़कियाँ ऐसी भी हैं जो मान कर चल रही हैं कि नया तालिबान उन्हें नौकरी करने देगा, उनके हिसाब से जीने देगा। हालाँकि, अन्य लोगों को तालिबान के किसी भी नए चेहरे पर संदेह है क्योंकि वह कहते हैं कि उन्होंने पहले के तालिबान को देखा है, जहाँ महिलाओं को बुर्के में रहने के निर्देश थे और पुरुषों को दाढ़ी बढ़नाे के।

CAA विरोधी ‘कैप्टन’ को अब याद आए अफगानिस्तान के सिख: विदेश मंत्री से लगाई गुहार, कहा- गुरुद्वारे में फँसे हैं 200

पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह को अब अफगानिस्तान में फँसे सिखों की याद आई है। उन्होंने केंद्रीय विदेश मंत्री एस जयशंकर से गुहार लगाई है कि वो अफगानिस्तान में फँसे सभी भारतीयों को वहाँ से निकालने के लिए त्वरित आधार पर कार्रवाई शुरू करें। CAA के विरोधी रहे पंजाब सीएम कहा कि अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद वहाँ के एक गुरुद्वारे में 200 सिख फँसे हुए हैं, जिन्हें वापस लाना ज़रूरी है।

साथ ही उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान में फँसे भारतीयों को वापस निकालने के लिए केंद्रीय विदेश मंत्रालय को पंजाब सरकार से किसी भी प्रकार की मदद चाहिए तो वो इसके लिए तैयार हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि अफगानिस्तान पर तालिबान का कब्ज़ा भारत के लिए अच्छा नहीं है। पंजाब सीएम ने इसके पीछे चीन-पाकिस्तान के साजिश की आशंका जताई और कहा कि चीन ने उइगर मुस्लिमों के खिलाफ पहले ही तालिबान से मदद माँगी थी।

उन्होंने कहा कि ये घटनाक्रम सही संकेत नहीं दे रहे हैं और भारत को सीमा पर अतिरिक्त सतर्कता बरतनी चाहिए। लेकिन, आज अफगानिस्तान में फँसे सिखों को याद कर रहे कैप्टेन अमरिंदर सिंह ‘नागरिकता संशोशण कानून (CAA)’ के मुखर विरोधी हैं और उन्होंने इस कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट तक जाने की भी बात कही थी। इस कानून से पड़ोसी मुल्कों से प्रताड़ित होकर भारत आए शरणार्थियों को यहाँ की नागरिकता व अधिकार दिए जा रहे हैं।

अफगानिस्तान पर तालिबान के कब्जे के बाद पंजाब CM कैप्टेन अमरिंदर सिंह के ट्वीट्स

जनवरी 2020 में पंजाब के मुख्यमंत्री ने कहा था कि वो केरल सरकार की तर्ज पर CAA के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाएँगे। साथ ही उन्होंने कहा था कि पंजाब जैसे राज्यों में इसे लागू करने के लिए इसमें संशोधन करने होंगे। साथ ही उन्होंने NRC का भी विरोध किया था। इतना ही नहीं, केरल के बाद पंजाब की विधानसभा ही थी जिसने CAA के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया था। इस कानून को ‘विभाजनकारी’ और ‘स्वच्छ लोकतंत्र के खिलाफ’ बताया गया था।

उनकी सरकार ने कहा था कि धर्म के आधार पर नागरिकता दिया जाना गलत है और CAA से भारत के लोगों की भाषाई व सांस्कृतिक स्वतंत्रता पर आँच आएगी। तब भाजपा और अकाली दल ने इस प्रस्ताव का विरोध किया था। आम आदमी पार्टी (AAP) इस प्रस्ताव के समर्थन में थी। CAA के अंतर्गत शरणार्थी सिख भी आते हैं, लेकिन बावजूद इसके कैप्टेन अमरिंदर सिंह लगातार इसका विरोध करते रहे।

इसी महीने कॉन्ग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता जयवीर शेरगिल ने खुद को ‘सिख समुदाय का एक जिम्मेदार भारतीय नागरिक’ बताते हुए अफगानिस्तान से 650 सिखों व 50 हिन्दुओं को सुरक्षित निकाले जाने के लिए केंद्रीय विदेश मंत्रालय को पत्र लिखा था। जबकि दिसंबर 2019 में उन्होंने ट्वीट किया था, ‘CAB = Communal Atom Bomb’, जिसका अर्थ है – ‘नागरिकता संशोधन विधेयक = सांप्रदायिक परमाणु बम।’

हिंदुओं के जख्मों पर ‘खेला होबे’: बंगाल ने न डायरेक्ट एक्शन डे से सीखा, न गोपाल पाठा को याद रखा

डायरेक्ट एक्शन डे! धार्मिक आधार पर भारतवर्ष के विभाजन की मुस्लिम लीग की माँग का जब राजनीतिक हल न निकल सका तब जिन्ना ने घोषणा की कि मुसलमान लड़कर पकिस्तान लेंगे। डायरेक्ट एक्शन डे 16 अगस्त 1946 के दिन मोहम्मद अली जिन्ना की घोषणा का परिणाम था। जिन्ना ने कलकत्ता को इसलिए चुना क्योंकि बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार थी और हुसैन सुहरावर्दी बंगाल का मुख्यमंत्री था। दंगे इतने भीषण थे कि अनुमान के अनुसार पहले ही दिन चार हज़ार से अधिक लोग मारे गए। जिन्ना, सुहरावर्दी और शेख मुजीबुर्रहमान ने मुस्लिम लीग की ओर से बंगाल के मुसलामानों का नेतृत्व किया। यह जिन्ना के आह्वान का ही परिणाम था कि कलकत्ते के साथ-साथ नोआखाली और बिहार में भी भीषण दंगे हुए। इन दंगों का असर यह रहा कि कॉन्ग्रेस पार्टी ने जिन्ना की अलग देश की माँग को स्वीकार कर लिया।

सोशल मीडिया के लोकप्रिय होने से पहले कलकत्ता दंगों की बात कही और सुनी तो जाती थी पर यह बात आम नहीं थी कि ये दंगे जिन्ना की डायरेक्ट एक्शन डे की घोषणा का परिणाम थे। एक आम भारतीय के लिए डायरेक्ट एक्शन डे जैसे ऐतिहासिक घटना के बारे में न जान पाने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं? आखिर ऐसा क्यों एक भारतीय नागरिक को इतनी भीषण ऐतिहासिक घटना के बारे में सहजता से जानने का मौका न मिले? यह किस सरकारी नीति का परिणाम होगा? क्या स्वतंत्रता के पश्चात की कॉन्ग्रेस सरकारों द्वारा सांप्रदायिक सौहार्द्र बनाए रखने की आड़ में यह तय किया गया कि डायरेक्ट एक्शन डे जैसे इतिहास के घिनौने अध्याय को आम भारतीय केवल इसलिए न पढ़ सकें क्योंकि उन्हें पता चल जाएगा कि इन दंगों के परिणामस्वरूप ही कॉन्ग्रेस पार्टी ने जिन्ना की माँग स्वीकार कर ली थी?

डायरेक्ट एक्शन डे के दिन शुरू हुए दंगे चार दिनों तक चले और उसमें करीब दस हज़ार लोग मारे गए। महिलाएँ बलात्कार का शिकार हुईं और जबरन लोगों का धर्म परिवर्तन करवाया गया। इन दंगों में हिन्दुओं की ओर से गोपाल चंद्र मुख़र्जी, जिन्हें गोपाल पाठा के नाम से भी जाना जाता है, की भूमिका की कहानी बहुत प्रसिद्ध है। गोपाल मुख़र्जी ने एक वाहिनी का गठन किया था जिसने इन दंगों के दौरान हिन्दुओं की रक्षा की और वाहिनी इस तरह से लड़ी कि मुस्लिम लीग के नेताओं को गोपाल मुख़र्जी से खून-खराबा रोकने के लिए अनुरोध करना पड़ा। आज भी गोपाल पाठा के बारे में सोशल मीडिया पर काफी उत्सुकता पाई जाती है। आज के पश्चिम बंगाल की परिस्थितियाँ शायद गोपाल मुख़र्जी को और प्रासंगिक बना देती हैं।

इस घटना के बारे में कहा जाता है कि ऐसा ‘अनुमान’ है कि जिन्ना की मंशा दंगे करवाने की नहीं थी। वो बस इतना चाहते थे कि उनके आह्वान के परिणामस्वरूप शहर के लोग अपनी दुकानें और अपने कारोबार बंद रखें। यह बात किसी भी दृष्टिकोण से तार्किक प्रतीत होती है? बंद या हड़ताल का आह्वान करते हुए कोई नेता उसे डायरेक्ट एक्शन डे का नाम किस मंशा से या किन परिस्थितियों में देगा? किस तरफ से यह एक तार्किक बात लगती है? प्रश्न यह उठता है कि आज भी किताबों में ऐसा लिखने के पीछे क्या मंशा हो सकती है? प्रश्न यह भी उठता कि 16 अगस्त 1946 का दिन यदि हड़ताल के बारे में ही था तो मुस्लिम लीग ने इतनी बड़ी रैली कैसे की जिसमें लीग के नेताओं ने भड़काऊ भाषण दिए? गोपाल मुख़र्जी के बारे में भी आम भारतीयों को अधिक नहीं पता, यह अलग बात है कि वे साल 2005 तक जीवित थे। ऐसे में एक आम भारतीय के लिए ये सारे प्रश्न उत्सुकता का कारण होंगे ही।

डायरेक्ट एक्शन डे के बारे में जितनी जानकारियाँ पहले थीं वे क्या पर्याप्त थीं? इस प्रश्न का आम भारतीय का उत्तर लगभग एक जैसा होगा। ऐसे में स्वाभाविक बात है कि यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के रूप में मनाने का आह्वान करते हैं तो क्या गलत करते हैं? देश या पश्चिम बंगाल के नागरिकों का डायरेक्ट एक्शन डे के बारे में जानने का उतना ही अधिकार है जितना किसी भी अन्य ऐतिसाहिक घटना के बारे में जानने का। पर प्रश्न यह है कि ऐसा क्यों है जो पश्चिम बंगाल के लोगों ने डायरेक्ट एक्शन डे जैसी भीषण ऐतिहासिक घटना से कुछ भी नहीं सीखा? क्योंकि यदि सीखा होता तो क्या वर्तमान में सत्ता पर काबिज दल 16 अगस्त के दिन खेला होबे दिवस मनाने की सार्वजनिक घोषणा कर पाती? क्या यह केवल संयोग की बात है कि खेला होबे दिवस मनाने के लिए मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने 16 अगस्त को चुना?

आखिर बंगाल के लोग डायरेक्ट एक्शन डे को क्यों नहीं याद रख पाए? यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि वामपंथियों की राजनीतिक संस्कृति को देखते हुए प्रदेश के लोगों को राजनीतिक तौर पर काफी सक्रिय माना जाता है। आम भारतीयों के मन में यह धारणा है कि बंगाल के लोग राजनीतिक रूप से अन्य प्रदेश के लोगों की अपेक्षा अधिक सक्रिय होते हैं। इसका एक संभावित उत्तर यह हो सकता है कि राजनीतिक रूप से सक्रिय होना और राजनीतिक रूप से अभिज्ञ होना सर्वथा अलग-अलग बात है।

डायरेक्ट एक्शन डे तो 75 साल पहले की घटना है, यहाँ तो लोगों को वामपंथियों द्वारा किया गया मरीचझांपी नरसंहार का ही पता नहीं है जो अपेक्षाकृत हाल की घटना है। एक आम बंगालवासी को आनंदमार्गियों की हत्या भी याद नहीं। यह कहने में कोई जोखिम नहीं है कि लगभग चार दशकों की वाम राजनीति और राजनीतिक संस्कृति ने बंगाल के लोगों को बहुत कुछ याद करने से रोक रखा था। उसके ऊपर मुस्लिम लीग द्वारा पाकिस्तान बनाने की माँग को लेकर सीपीआई का दृष्टिकोण अब स्पष्ट रूप से सार्वजनिक हो चुका है। ऐसे में आश्चर्य की बात नहीं कि बंगाल के हिन्दुओं को डायरेक्ट एक्शन डे याद नहीं है।

आम नागरिक के लिए डायरेक्ट एक्शन डे जैसी ऐतिहासिक घटनाओं को जानबूझकर याद न रखना या उन्हें भूल जाना बंगाल की राजनीतिक संस्कृति के लिए नई बात नहीं है। यह अलग बात है कि लगातार बदल रही राजनीति, नेताओं का राजनीतिक दृष्टिकोण और डेमोग्राफी में बदलाव के कारण आज यह महत्वपूर्ण हो गया है कि लोग ऐसी ऐतिहासिक घटनाओं के लिए अपने स्मृति पटल पर थोड़ी जगह खाली रखें। इससे भूतकाल में हुई घटनाओं को सँवारा नहीं जा सकता, पर इन्हें याद करके भविष्य में इनकी पुनरावृत्ति को लेकर सतर्क हुआ जा सकता है। ऐसा करना एक आम नागरिक को जानने में सहायक साबित हो सकती है कि यदि किसी नेता ने 16 अगस्त के दिन ही खेला होबे दिवस मनाने की घोषणा की है तो उसका राजनीतिक और सांस्कृतिक महत्व क्या है और ऐसे कदम राज्य या देश को किस ओर ले जा सकते हैं। यह प्रदेश ही नहीं, देश के भविष्य की बात है।

‘मदरसे की जगह स्कूल गए होते तो दिक्कत नहीं होती’: झंडा फहराने के बाद राष्ट्रगान भूले सपा नेता, सांसद ST हसन भी थे मौजूद

मुरादाबाद में समाजवादी पार्टी के नेताओं ने रविवार (15 अगस्त, 2021) को 75वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर झंडा तो फहराया, लेकिन इस दौरान वो राष्ट्रगान ही भूल गए। हैरानी की बात ये है कि उस वक़्त सपा के सांसद डॉक्टर सैयद तुफैल हसन भी वहाँ पर मौजूद थे। पूरा राष्ट्रगान भी नहीं हुआ और उलटा-पुलटा गा कर सपा नेता वहाँ से चलते बने। ST हसन मुरादाबाद के मेयर भी रहे हैं। इससे पहले वो बसपा में थे।

इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया, जिसके बाद लोगों ने एक से बढ़ कर एक प्रतिक्रिया दी। ब्रह्मा सेठी नाम के ट्विटर यूजर ने लिखा कि यहाँ राष्ट्रगान भूलने की बात कहाँ से आ गई, क्योंकि इनलोगों ने तो कभी राष्ट्रगान याद ही नहीं किया।

अंकिता सिंह नाम की ट्विटर यूजर ने लिखा, “काश ये मदरसा की जगह स्कूल गए होते तो अभी इतनी दिक्कत नहीं होती।”

देवीदत्त राउत नाम के व्यक्ति ने इस वीडियो पर प्रतिक्रिया देते हुए सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव का बयान शेयर किया, जिसमें उन्होंने कहा था, “लड़के हैं, गलती हो जाती है।” बता दें कि मुरादाबाद में ही मुलायम ने अप्रैल 2014 में रेप की सजा फाँसी होने का विरोध करते हुए कहा था कि लड़कों से गलती हो जाती है।

मुरादाबाद में राष्ट्रगान भूले सपा नेता तो लोगों ने जताया आक्रोश

एक ट्विटर यूजर ने लिखा कि यही नेता अखिलेश यादव के कुशल नेतृत्व में समाजवाद लाएँगे। एक ट्विटर यूजर ने कहा कि इन्होंने कभी गाया ही नहीं होगा राष्ट्रगान तो कैसे याद रहेगा? लोगों ने कहा कि इन नेताओं को शर्म आनी चाहिए। एक ट्विटर यूजर ने संभावना जताई कि ये वीडियो आगामी चुनाव के लिए तैयार किया जा रहा था और सांसद महोदय राष्ट्रगान याद कर के भी आए थे, लेकिन फर्स्ट टाइम में गलती हो ही जाती है।

क्षितिज जायसवाल नाम के यूजर ने हैरानी जताई कि यहाँ 50 से ज्यादा लोग खड़े हैं लेकिन किसी को राष्ट्रगान तक याद नहीं है तो यही लोग सत्ता में किस तरह काम करते होंगे? उन्होंने कहा कि आजकल 5 साल के बच्चे को भी राष्ट्रगान याद रहता है।

राष्ट्रगान भूलने के मामले पर सपा सांसद ने दी सफाई

बता दें कि सांसद ST हसन के साथ मौके पर सपा के जिलाध्यक्ष डीपी यादव और महानगर अध्यक्ष शाने अली सहित कई कार्यकर्ता उपस्थित थे। राष्ट्रगान की एक पंक्ति गाने के बाद ये आगे का भूल गए। सांसद ने अपनी सफाई में कहा है कि राष्ट्रगान गाने के लिए दूसरी टीम थी जिसने गलत गा दिया और उन्होंने उनलोगों को टोका भी था। उन्होंने कहा कि उनकी याददाश्त कमजोर नहीं है और वो बचपन से राष्ट्रगान गाते आ रहे हैं।

आरफा जैसे नाम वाले तालिबान के अफगान फतह पर फूल कर कुप्पा, राष्ट्रवादियों के लिए दिखा रहे नफरत भी

अफगानिस्तान में तालिबानियों के कब्जे के बाद भी भारत का लिबरल गिरोह इस मुद्दे पर पूरी तरह से शांत बैठा हुआ है। यदि कोई इस मामले पर लिख भी रहा है तो केवल और केवल दक्षिणपंथियों को निशाना बनाते हुए। इजरायल और फलीस्तीन के विवाद के दौरान फलीस्तीन को खुल कर अपना समर्थन देने वाला ये गुट अब ऐसा बर्ताव कर रहा है जैसे इनका अफगानिस्तान के हालातों से कोई लेना-देना ही न हो।

आरफा खानुम शेरवानी तो इन हालातों पर भी दक्षिणपंथियों को कोसने से बाज नहीं आ रहीं। आरफा लिखती हैं, “दक्षिणपंथी भारतीय मुसलमानों को ट्रोल कर रहे हैं क्योंकि तालिबान ने काबुल पर कब्जा कर लिया है। सबसे बड़ी मानव त्रासदी भी इनके लिए केवल अवसर है। शर्म आनी चाहिए तुम्हें संघियों!”

अब दिलचस्प बात ये है कि आरफा खानुम शेरवानी के लिए मुद्दा ये है कि ‘संघी’ भारतीय मुसलमानों से सवाल कर रहे हैं और दूसरी ओर एक क्लबहाउस टॉक की ऑडियो वायरल हो रही है। इस ऑडियो में ‘भारतीय मुसलमान’ इस बात का जश्न मना रहे हैं कि अफगानिस्तान में तालिबान ने कब्जा कर लिया है और राष्ट्रपति अशरफ गनी रिजाइन देकर, देश छोड़ कर चले गए हैं।

इसके अलावा कई कट्टरपंथी हैं, जो आकर पूछ रहे हैं कि आखिर लोगों को समस्या क्या है अगर कुछ लोगों ने अपने देश को वापस से पा लिया है।

दूसरा यूजर लिखता है, “अगर तुमको समस्या है कि मुस्लिम सरकार शरीया कानून मुस्लिमों के लिए लगा रही है तो तुम्हें सेकुलर लोगों से भी समस्या होनी चाहिए कि वो सेकुलर लोगों पर सेकुलर लॉ लगा रही है? लेकिन यहाँ तो सेकुलर लॉ सब पर लगता है।”

इनके अलावा ट्विटर पर कुछ घोर लिबरल किस्म के लोग भी हैं। इनसे डायरेक्ट तालिबान के ख़िलाफ़ पोस्ट नहीं लिखा जा रहा। कुछ भी करके इन्हें उसमें भारत को जोड़ना है। एक जेएनयू के प्रोफेसर का ट्वीट देख कर तो ऐसा लगता है कि उन्हें याद ही नहीं है कि नरेंद्र मोदी सरकार लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता में आई है और उनके आने के 7 साल बाद भी देश लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में काम कर रहा है। अफगानिस्तान के हालातों को भारत से जोड़ना केवल पूरे मुद्दे को दूसरी दिशा देने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।

मालूम हो कि यह वही लोग हैं जिन्होंने भारतीय पत्रकार दानिश सिद्दीकी की मौत के बाद भी भारत के दक्षिणपंथियों को कोसने का काम किया था। लिबरल गिरोह के वरिष्ठ सदस्य रवीश कुमार ने तालिबानियों को प्रत्यक्ष रूप से दोषी बताने की जगह उन गोलियों को लानत भेजी थी जो दानिश के सीने पर लगीं और जिसके कारण उनकी मौत हुई। आज तालिबान अफगानिस्तान पर कब्जा जमा चुका है लेकिन लिबरल गिरोह किसी और मुद्दे को सोशल मीडिया पर भुनाने में लगा है। वहीं इस्लामी कट्टरपंथी हैं जिन्हें मजा आ रहा है कि तालिबानियों ने आजादी की जंग जीत ली है।

महिला कॉन्ग्रेस की अध्यक्ष सुष्मिता देव ने छोड़ी पार्टी, 4 पीढ़ियाँ पार्टी में खपी थी: असम में ‘हाथ’ के घाव और गहरे

‘ऑल इंडिया महिला कॉन्ग्रेस (AIMC)’ की अध्यक्ष सुष्मिता देव ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने अपने ट्विटर बायो में ‘कॉन्ग्रेस की पूर्व सदस्य’ और ‘महिला कॉन्ग्रेस की पूर्व अध्यक्ष’ लिख दिया है। सुष्मिता देव उन नेताओं में शामिल थीं, जिनके खिलाफ ट्विटर ने हाल ही में कार्रवाई की थी। दिल्ली की 9 वर्षीय रेप पीड़िता के माता-पिता की तस्वीर शेयर करने पर पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी सहित कई नेताओं का ट्वीट डिलीट कर दिया गया था और उनके हैंडल्स लॉक कर दिए गए थे।

सुष्मिता देव के बारे में बता दें कि वो कॉन्ग्रेस के दिवंगत दिग्गज नेता संतोष मोहन देव की बेटी हैं। संतोष मोहन देव 5 बार असम के सिल्चर और 2 बार त्रिपुरा वेस्ट से सांसद रहे थे। वो राजीव गाँधी के सबसे विश्वस्त सिपहसालारों में से एक थे। यूपीए काल में भी वो केंद्रीय मंत्री थे। उनके पिता सतीन्द्र मोहन देव पश्चिम बंगाल के स्वतंत्रता सेनानी थे। उनके दादा काली मोहन देव भी कॉन्ग्रेस के सक्रिय सदस्य थे। इस तरह सुष्मिता देव चौथी पीढ़ी की कॉन्ग्रेसी थीं।

सुष्मिता देव ने भी अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए असम के सिल्चर को ही अपनी राजनीतिक कर्मभूमि बनाया। वो 2011 में यहाँ से विधायक चुनी गईं। 2014 में मोदी लहर के बीच वो जीत कर सांसद बनीं। हालाँकि, 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्हें भाजपा उम्मीदवार डॉक्टर राजदीप रॉय के हाथों हार झेलनी पड़ी। सुष्मिता देव की माँ भीतिका देव भी सिल्चर से 2006 में विधायक रही हैं।

महिला कॉन्ग्रेस की अध्यक्ष सुष्मिता देव ने सोनिया गाँधी को सौंपा अपना इस्तीफा

मीडिया रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि सुष्मिता देव के TMC (तृणमूल कॉन्ग्रेस) में शामिल होने की संभावना है और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की मौजूदगी में वो पार्टी जॉइन करेंगी। पिछले 30 वर्षों से कॉन्ग्रेस से जुड़ीं सुष्मिता देव ने पार्टी अध्यक्ष सोनिया गाँधी को भेजे गए इस्तीफे में कोई कारण नहीं बताया है। वो फ़िलहाल कोलकाता में हैं। ट्विटर ने हाल ही में सुष्मिता देव का हैंडल भी लॉक किया था।

असम में कॉन्ग्रेस पार्टी की बुरी हार को भी सुष्मिता देव के इस्तीफे का कारण बताया जा रहा है। इस चुनाव में कॉन्ग्रेस ने बदरुद्दीन अजमल की AIUDF, BPF, CPI, CPI(M), बोडोलैंड डेमोक्रेटिक फ्रंट (BDF) और आंचलिक गण मोर्चा (AGM) के साथ एक बड़ा गठबंधन तैयार किया था। राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी ने भी चुनाव प्रचार किया था। कॉन्ग्रेस को 29 सीटें मिलीं और भाजपा ने 60 सीटें जीत कर सरकार बनाई।

कपिल सिब्बल ने सुष्मिता देव के कॉन्ग्रेस छोड़ने पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “सुष्मिता देव ने कॉन्ग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया है। जहाँ एक तरफ युवा नेता पार्टी छोड़ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ हम बुजुर्गों पर आरोप मढ़े जाते हैं कि हम पार्टी को मजबूत करने के लिए कुछ नहीं कर रहे। और पार्टी अपनी आँखें पूरी तरह बंद किए चल रही है।” असम में कॉन्ग्रेस पार्टी को तगड़ा झटका लगा है।

‘मुगलों और अंग्रेजों ने दबाया भारत का इतिहास, हमारी किताबों में ज्यादातर विदेशी शासक’: अजय देवगन

हाल ही में अजय देवगन ‘भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया’ रिलीज हुई। इसमें उन्होंने भारतीय वायुसेना स्क्वाड्रन लीडर विजय कार्णिक का किरदार निभाया है, जो 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय भुज एयरपोर्ट के इंचार्ज थे। इसमें बताया गया है कि कैसे भुज एयरपोर्ट के ध्वस्त होने के बाद स्थानीय महिलाओं की मदद से इसे बनाया गया था। अब अजय देवगन ने कहा है कि सही इतिहास को सामने लाना ज़रूरी है। हाल ही में केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह से मुलाकात कर के भी उन्होंने उन्हें इस फिल्म की झलकियाँ दिखाई थीं।

BBC को दिए गए इंटरव्यू में अजय देवगन ने कहा कि भारत के असल इतिहास को सामने लाना ज़रूरी है, क्योंकि इसे दबा दिया गया है। उन्होंने कहा कि मौजूदा पीढ़ी को इसकी जानकारी होनी चाहिए कि देश किनके बलिदानों पर खड़ा है। उन्होंने भारत के नौजवानों को इन कहानियों को बताने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि अंग्रेज इतने साल रहे और उन्होंने इतिहास को दबाया क्योंकि लोगों को इतने बलिदानों के बारे में पता चलता तो वो बगावत पर उतर आते।

उन्होंने मुगलों के द्वारा भी भारत के इतिहास को दबाए जाने की बात करते हुए कहा कि उससे पहले जो हमारे राजाओं ने जो भी किया था, उसे छिपा दिया गया। उन्होंने इस बात से आपत्ति जताई कि हमारी किताबों में हमारे देश से ज्यादा विदेशी शासकों के बारे में पढ़ाया जाता है। हालाँकि, उन्होंने कहा कि ये स्वाभाविक है कि जिसका शासन होता है इतिहास उसी हिसाब से लिखा जाता है। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि तानाजी के बारे में हमारे समय में सिर्फ आधा पन्ना पढ़ाया गया था।

उन्होंने कहा कि आज की पीढ़ी को तानाजी के बारे में पता भी नहीं, क्योंकि उन्हें इतिहास की पुस्तक में ऐसा कुछ पढ़ाया ही नहीं गया। उन्होंने कहा कि कितने लोगों के बलिदान और निःस्वार्थ मेहनत से ये देश खड़ा हुआ है, आज़ादी मिली है – ये लोगों को पता चलना चाहिए, तभी वो इस स्वतंत्रता का सम्मान करेंगे। विजय कार्णिक के किरदार पर उन्होंने कहा कि इस तरह की फिल्म में व्यक्ति की प्रतिष्ठा कहानी व परफॉर्मेंस में बनी रहनी चाहिए।

अजय देवगन ने कहा कि भारत के लोग ये तो जानते हैं कि अमेरिका में क्या हुआ था, लेकिन खुद के इतिहास के बारे में उन्हें कुछ नहीं पता। उन्होंने कहा कि अगर इस तरह की फ़िल्में बनाने से 2% भी बदलाव आता है तो ऐसा किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसी फिल्मों पर ‘अंधराष्ट्रीयता’ के आरोप लगते हैं, लेकिन देश के लिए लड़ने वालों ने बलिदान दिया है, उसे वास्तविक रूप में दिखाना ज़रूरी है।

‘भुज: द प्राइड ऑफ इंडिया’ में अजय देवगन के अलावा संजय दत्त, सोनाक्षी सिन्हा, नोरा फ़तेही और शरद केलकर ने भी अहम किरदार निभाए हैं। बता दें कि भारतीय वायुसेना के खिलाफ पाकिस्तान ने दिसंबर 1971 में ‘ऑपरेशन चंगेज खान’ लॉन्च किया था। 11 भारतीय एयरफील्ड्स पर बमबारी हुई थी। भुज में 14 दिनों में 34 बार किए गए हमले में 92 बम और 22 रॉकेट्स दागे गए थे। विजय कार्णिक ने कैसे दुश्मन को धूल चटाई, ये फिल्म इसी की कहानी है।

‘काफिरों! तुम्हारा अंत अब ज्यादा दूर नहीं…’: जरा याद उन हिंदुओं को भी कर लो जिनका कत्लेआम डायरेक्ट एक्शन डे के नाम

15 अगस्त 2021 को भारत अपनी स्वतंत्रता के 75वें वर्ष में प्रवेश कर गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के ठीक एक साल पहले 16 अगस्त 1946 को भारत ने मजहबी कट्टरपंथ का वह रूप देखा जो दशकों तक याद रखा जाने वाला था। मुस्लिम लीग के नेता और पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने इस दिन घोषणा की थी ‘डायरेक्ट एक्शन डे (Direct Action Day)’ की, जिसके बाद लाखों की संख्या में मुस्लिम, कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) के अंदर इकठ्ठा हुए थे और महज कुछ घंटों के भीतर हजारों हिन्दुओं को मौत के घाट उतार दिया गया था। इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा हिन्दुओं का किया गया यह नरसंहार इतना क्रूर था कि कभी यह पता ही नहीं चल पाया कि उस ‘द ग्रेट कलकत्ता किलिंग’ के दौरान मरने वाले हिन्दुओं की संख्या कितनी थी।

पृष्ठभूमि

1946 का समय था जब भारतीय स्वतंत्रता संग्राम अपने चरम पर पहुँच चुका था और अंग्रेजी शासन अपने अंतिम समय में। अंग्रेजी हुकूमत द्वारा भारतीयों को सत्ता हस्तांतरण की तैयारियाँ शुरू हो चुकी थीं। ऐसे में ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने एक 3 सदस्यीय दल, जिसे कैबिनेट मिशन कहा गया, भारत भेजा। कैबिनेट मिशन का उद्देश्य था भारतीयों को सत्ता हस्तांतरित करने की अंतिम योजना को मूर्त रूप देना।

16 मई 1946 को कैबिनेट मिशन के द्वारा भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस और ऑल इंडिया मुस्लिम लीग के प्रतिनिधियों से चर्चा की गई। इस चर्चा के बाद यह तय किया गया कि एक भारतीय गणराज्य की स्थापना होगी जिसे अंततः सत्ता हस्तांतरित की जाएगी। इसके बाद मुस्लिम लीग के नेता मोहम्मद अली जिन्ना ने तत्कालीन अविभाजित भारत के उत्तर-पश्चिमी और पूर्वी भाग में एक अलग ऑटोनॉमस और संप्रभु राज्य की माँग रख दी और संविधान सभा का बहिष्कार भी कर दिया। जुलाई 1946 में जिन्ना ने मुंबई (बॉम्बे) में अपने घर पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की, जिसमें कहा गया कि मुस्लिम लीग एक अलग मुल्क ‘पाकिस्तान’ के लिए ‘संघर्ष की तैयारी’ कर रही है और अगर मुस्लिमों को पाकिस्तान नहीं दिया गया तो वो (मुस्लिम) ‘डायरेक्ट एक्शन’ को अंजाम देंगे। अंततः जिन्ना ने घोषणा कर दी कि 16 अगस्त का दिन ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ होगा।

जब हिन्दुओं के खून से लाल हुआ कलकत्ता

16 अगस्त के एक दिन पहले तक किसी को यह नहीं पता चला था कि आखिरकार मुस्लिम लीग का डायरेक्ट एक्शन डे क्या है? वैसे तो जिन्ना ने पूरे देश को डायरेक्ट एक्शन की धमकी दी थी, लेकिन तत्कालीन बंगाल में मुस्लिम लीग का ही शासन था और वहाँ सत्ता में बैठा हुआ था प्रधानमंत्री हसन शहीद सुहरावर्दी जिसे बंगाल में हिन्दुओं के खिलाफ किए गए भीषण नरसंहार का साजिशकर्ता माना जाता है। उसकी शह पर मुस्लिम लीग ने डायरेक्ट एक्शन के नाम पर बंगाल में खुलकर अपने हिन्दू विरोधी मंसूबे पूरे किए।

16 अगस्त 1946 के दिन भी सुबह तक हालात सामान्य दिखाई दे रहे थे। लेकिन दोपहर आते-आते शहर के विभिन्न इलाकों से तोड़फोड़, आगजनी और पत्थरबाजी की घटनाओं की सूचना मिलने लगी। फिर भी किसी को अंदाजा नहीं था कि ये छुटपुट घटनाएँ हिन्दुओं के भीषण नरसंहार में बदलने वाली हैं। कलकत्ता और उसके आसपास के इलाकों से मुस्लिमों की भीड़ जुटनी शुरू हो चुकी थी। नमाज का समय था ऐसे में मुस्लिमों की भीड़ इकट्ठी होती ही थी, लेकिन उस दिन मुस्लिमों की संख्या असामान्य थी। फिर समय हुआ दोपहर 2 बजे की नमाज का। इस दौरान लाखों की संख्या में मुस्लिम इकट्ठे हो गए और अधिकांश के हाथों में लोहे की रॉड और लाठी-डंडे थे। मुस्लिमों की इस भीड़ के सामने भाषण हुआ ख्वाजा नजीमुद्दीन और सुहरावर्दी का। इन दोनों के भाषणों के बाद मुस्लिमों की सामान्य सी दिखने वाली भीड़ हिंसक दंगाइयों की भीड़ में बदल गई जो हिन्दुओं के खून की प्यासी दिखाई दे रही थी।

डायरेक्ट एक्शन डे से जुड़ी रिपोर्ट्स में नमाज के लिए इकठ्ठा हुए मुस्लिमों की अलग-अलग संख्या बताई जाती है, लेकिन अधिकांश रिपोर्ट्स में यह आँकड़ा बताया गया कि संभवतः मुस्लिमों की संख्या 5 लाख से भी अधिक थी। कई रिपोर्ट्स में यह भी बताया जाता है कि ट्रकों में भरकर भी मुस्लिम बाहर से कलकत्ता लाए गए थे, जिनके पास भारी मात्रा में हथियार थे। खैर मुस्लिम भीड़ अपने काम में लग गई। हिन्दुओं को निशाना बनाया जाने लगा। राजा बाजार, केला बागान, कॉलेज स्ट्रीट, हैरिसन रोड और बर्राबाजार जैसे इलाकों में हिन्दुओं के घरों और दुकानों को जलाया जाने लगा। शाम होते-होते दंगा प्रभावित इलाकों में कर्फ्यू लगा दिया गया और रात 8-9 के बीच सैनिकों की तैनाती शुरू हो गई।

इसके बाद लगा कि हालात सामान्य हो जाएँगे लेकिन अगले दिन यानी 17 अगस्त को इस्लामी कट्टरपंथियों का सबसे खूँखार स्वरूप दिखाई दिया। 16 अगस्त को जो भी हुआ था, अगले दिन उसका कई गुना नुकसान किया गया। हिंदुओं को चुन-चुन कर मारा गया, हिन्दू महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया, हिंदुओं की संपत्तियों को जला दिया गया। पूर्वी बंगाल के नोआखाली में भी हिन्दुओं का भीषण नरसंहार हुआ। 17 अगस्त को जहाँ भी सैनिकों की तैनाती हो पाई वहाँ हालत कुछ काबू में हुए, लेकिन मुख्य शहर के अलावा स्लम बस्तियों और ग्रामीण इलाकों में जहाँ सेना नहीं पहुँच पाई वहाँ मुस्लिम की भीड़ हिन्दुओं पर भूखे भेड़ियों की तरह टूट पड़ी।

मौतों का आँकड़ा

16 अगस्त से शुरू हुआ नरसंहार 20 अगस्त तक चलता रहा। उसके बाद भी हिंसा की घटनाएँ होती रहीं। कलकत्ता छोड़ने को मजबूर हुए हिन्दुओं का पलायन शुरू हो गया। लेकिन सवाल यह है कि मुस्लिम लीग के इस नरसंहार में कितने हिन्दू मौत के घाट उतार दिए गए? कलकत्ता में ही 72 घंटों के भीतर लगभग 6,000 हिन्दू मार दिए गए। मजहबी दंगाइयों के शिकार हुए लगभग 20,000 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए और लगभग 100,000 लोगों को अपना सबकुछ छोड़कर जाना पड़ा।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम पर गौर से नजर रखने वाले अमेरिकी पत्रकार फिलिप टैलबॉट ने इंस्टीट्यूट ऑफ करंट वर्ल्ड अफेयर्स को भेजे गए अपने खत में डायरेक्ट एक्शन डे के बाद हुई मौतों के बारे में लिखा था,

“प्रांतीय सरकार ने मरने वालों का आँकड़ा 750 बताया जबकि सैन्य आँकड़ा 7,000 से 10,000 मौतों का है। 3,500 लाशों को तो इकट्ठा किया जा चुका है लेकिन कोई नहीं जानता कि हुगली में कितने लोगों को फेंका गया, कितने लोग शहर के बंद पड़े नालों में घुट कर मर गए। 1200 के लगभग हुई भीषण आगजनी की घटनाओं में कितने लोग जला दिए गए और कितने लोगों का उनके रिश्तेदारों ने चुपचाप अंतिम संस्कार कर दिया। एक सामान्य अंदाजा लगाया जाए तो मरने वालों की संख्या 4000 से अधिक और घायल होने वाले लोग लगभग 11000 थे।”

हालाँकि जिस तरीके से मुस्लिम भीड़ ने कलकत्ता और उसके आसपास के इलाकों में दंगे को अंजाम दिया था उससे यह नहीं लगता कि मरने वाले हिन्दुओं की संख्या इतनी कम रही होगी। इसके अलावा हिन्दुओं की लाशों को नदी में भी बड़ी संख्या में फेंक दिया गया था। इसलिए मौतों का सही आँकड़ा क्या था, यह कहना बहुत मुश्किल है। जुगल चंद्र घोष नाम के एक स्थानीय प्रत्यक्षदर्शी ने बताया था कि उसने 4 ट्रक देखे थे जिसमें 3 फुट की ऊँचाई तक लाशें भरी हुई थीं और इन लाशों से खून और विभिन्न अंग बाहर आ रहे थे। एक अन्य प्रत्यक्षदर्शी ने बताया था कि 17 अगस्त जो कि डायरेक्ट एक्शन डे का सबसे खतरनाक दिन माना जाता है, उस दिन कलकत्ता की सड़कों पर चारों ओर सिर्फ, ‘अल्लाह-हु-अकबर’, ‘नारा-ए-तकबीर’, ‘लड़ के लेंगे पाकिस्तान’ और ‘कायदे आजम जिंदाबाद’ ही सुनाई दे रहा था।

हर बार की तरह इस बार भी हिन्दुओं की मौतों का आँकड़ा बस इतिहास के पन्नों में सिमटकर रह गया। उसके बाद के हालात कुछ ऐसे थे कि अधिकांश हिन्दू कलकत्ता लौट ही नहीं पाए और जो लौटे उनका कुछ बचा ही नहीं था। लेकिन आँकड़ों से भी महत्वपूर्ण है वह विचारधारा जिसके कारण ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के दौरान बंगाल में हिन्दुओं का कत्लेआम किया गया। यह वही विचारधारा है जिसके कारण दिल्ली के दंगों में हिन्दुओं की हत्याएँ हुई और गुजरात के गोधरा में ट्रेन से लौट रहे रामभक्तों को जिंदा जला दिया गया था।

तथागत रॉय की किताब ‘My People, Uprooted: A Saga of the Hindus of Eastern Bengal’ में बताया गया है कि किस तरह मुस्लिमों ने एक प्लान के तहत हिन्दू विरोधी दंगों की तैयारियाँ की और अंततः 16 अगस्त 1946 को उन तैयारियों को नरसंहार के रूप में अंजाम दिया। कलकत्ता के मेयर और कलकत्ता मुस्लिम लीग के सचिव एसएन उस्मान ने बांग्ला भाषा में लिखे हुए पत्रक बाँटे थे जिनमें लिखा हुआ था, “काफेर! तोदेर धोंगशेर आर देरी नेई। सार्बिक होत्याकांडो घोतबे”, जिसका मतलब था, “काफिरों! तुम्हारा अंत अब ज्यादा दूर नहीं है। अब हत्याकांड होगा।”

डायरेक्ट एक्शन डे के रूप में इतिहास से एक सबक मिलता है, (अब इसे सबक ही कहा जाना चाहिए लेकिन लिबरल और वामपंथी इसे इस्लामोफोबिया कहेंगे) कि जहाँ भी इस्लामिक कट्टरपंथी सत्ता में पहुँच जाते हैं वहाँ रक्तपात होता है और ऐसा रक्तपात कि उसका जिक्र सदियों तक होता रहे। भारत में पूर्व में इस्लामी शासन के दौरान हुआ हिन्दू नरसंहार इसी सबक का एक उदाहरण है। इसके अलावा आधुनिक समय में इराक, सीरिया, नाइजीरिया, पाकिस्तान भी इस तथ्य को सत्य साबित करते हैं। अफगानिस्तान में जो हो रहा है वह भी इस्लामिक कट्टरपंथ का सीधा उदाहरण है। हमें यह बात गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि डायरेक्ट एक्शन डे, एक अलग देश के लिए कम, बल्कि हिन्दू नरसंहार के लिए आतुर मुस्लिम कट्टरपंथियों के मन में सुलग रही मजहबी इच्छा का दिन था।

‘अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना हटे… बहुत दिन हो गए हिंदुओं का कत्लेआम किए’: TV पर ‘दुआ’ माँगते पाकिस्तानी का पुराना Video वायरल

अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना हटने के बाद कथिततौर पर पाकिस्तानी सहयोग पाकर तालिबान ने एक दफा फिर वहाँ अपना दबदबा कायम कर लिया है। तालिबानी लड़ाकों द्वारा काबुल को कब्जे में लेने के बाद वहाँ के राष्ट्रपति अशरफ गनी और उपराष्ट्रपति अमीरुल्ला सालेह ने अपने कुछ करीबियों के साथ देश को छोड़ दिया है। वहीं तालिबानी नेता मुल्ला बरादर का कहना है कि उन्होंने खुद नहीं सोचा था कि इतनी आसानी से उन्हें जीत मिल जाएगी।

बता दें कि पिछले दिनों एक रिपोर्ट में सामने आया था कि तालिबानियों के पीछे पाकिस्तान का हाथ है, बिन उनके ये लोग कुछ नहीं कर सकते। हालाँकि, अब एक ऐसी वीडियो सामने आई है जिससे साफ हो जाता है कि पाकिस्तानी किस हद तक इंतजार में थे कि अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना हटे और वह वहाँ हिंदुओं के कत्लेआम को अंजाम दें।

यह वीडियो पाकिस्तानी बुद्धिजीवी जैद हामिद का है। इस वीडियो में देख सकते हैं कि जैद किस तरह ऑन टीवी हिंदुओं के लिए जहर उगल रहे हैं और उनके नरसंहार की बात कर रहे हैं। इसमें वह कहते है,

“मैं अल्लाह से दुआ कर रहा हूँ कि अमेरिकन वहाँ से निकलें और इंडियन्स को वहाँ छोड़कर जाएँ। बहुत अरसा हो गया है कि हमने अफगानिस्तान में हिंदुओं का कत्लेआम नहीं किया। आम तौर पर ये हमेशा ही हुआ करता था, जिस वजह से अफगानिस्तान के पहाड़ों का नाम हिंदु कुश रखा गया। हिंदुओं को कत्ल करने वाली जगह। वो जगह जो हिंदुओं को कत्ल करती है। तारीखी तौर पर जब भी हिंदू अफगानिस्तान में दाखिल हुए हैं तो उन्हें जबां किया गया है। हम दुआ कर रहे हैं अल्लाह से अमेरिकन वहाँ से जाएँ और बनिए को छोड़ कर जाएँ।”

मालूम हो कि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि ये वीडियो कब की है, लेकिन ऐसी ही जानकारी रेडिट पर 8 वर्ष पहले पब्लिश हुई थी। डिस्कशन को देख अंदाजा लगा सकते हैं कि पाकिस्तान में हिंदुओं के नरसंहार की बातें टीवी के डिबेट का टॉपिक हैं। ऐसे में किसी को क्या हैरानी होगी, जब वो जानेगा कि पाकिस्तान में आए दिन हिंदुओं पर अत्याचार होते हैं, उन्हें मारा जाता है, उनकी बहू-बेटियों को किडनैप कर इस्लाम कबूल करवा दिया जाता है। इसके अलावा एक 8 साल का हिंदू बच्चा भी वहाँ ईशनिंदा का आरोपित बनने के बाद मौत का हकदार करार दिया जाता है।

काबुल पर कब्जे के साथ तालिबान ने की युद्ध समाप्ति की घोषणा, मुल्क छोड़ भागे राष्ट्रपति गनी: US ने लिया एयर ट्रैफिक का कंट्रोल

अफगानिस्तान में राजधानी काबुल पर कब्जे के साथ ही आतंकी संगठन तालिबान ने युद्ध समाप्ति की घोषणा कर दी है, क्योंकि मुल्क के राष्ट्रपति और सारे राजनयिक देश छोड़ कर भाग खड़े हुए हैं। अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने ये कहते हुए देश छोड़ दिया कि वो खूनखराबा नहीं चाहते हैं। रविवार (15 अगस्त, 2021) को दिन भर काबुल के नागरिकों में डर का माहौल रहा। पश्चिमी देश अपने लोगों को वहाँ से निकालने में लगे रहे।

तालिबान ने अफगानिस्तान के राष्ट्रपति भवन पर भी कब्जा जमा लिया है। अफगानिस्तान के कई नागरिक भी वहाँ से भागने की चेष्टा में लगे रहे। काबुल एयरपोर्ट पर भारी भीड़ देखी गई। तालिबान ने कहा है कि वो दुनिया से अलग-थलग नहीं रहना चाहता और नई सरकार कैसी होगी, उसकी रूपरेखा क्या होगी – जल्द ही इन सबकी घोषणा की जाएगी। साथ ही आतंकी संगठन ने दुनिया से शांतिपूर्ण रिश्ते की बात भी कही है।

ttअलिबन ने घोषणा किया कि वो जो लक्ष्य लेकर चला था, वो मिल गया है और इसके साथ ही मुल्क व मुल्क के लोग ‘आजाद’ हो गए हैं। तालिबान ने कहा कि वो अपनी सरजमीं का इस्तेमाल किसी को नुकसान पहुँचाने के लिए नहीं होने देगा और वो किसी को नुकसान नहीं पहुँचाना चाहता है। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मॉरिसन ने कहा कि वो इस घटना से व्यथित हैं और काबुल से ऑस्ट्रेलिया के लोगों को बाहर निकाला जा रहा है।

भारत में अफगानिस्तान दूतावास के प्रेस सचिव अब्दुल आजाद ने कहा कि उन्होंने ‘भारत में अफगनिस्तानी दूतावास’ के ट्विटर हैंडल पर नियंत्रण खो दिया है। साथ ही उन्होंने आधिकारिक हैंडल से किए गए एक ट्वीट का स्क्रीनशॉट भी शेयर किया, जिसे उनके दोस्त ने भेजा था। उन्होंने आशंका जताई कि इसे हैक कर लिया गया है। अफगनिस्तानी दूतावास की ट्वीट में कहा गया था कि हम सब का सिर शर्म से झुक गया है।

इसमें लिखा था, “अशरफ गनी अपने धूर्त साथियों के साथ मुल्क छोड़ कर निकल गए हैं। उन्होंने सब कुछ बर्बाद कर दिया। इस ‘भगोड़े’ के अंतर्गत काम करने के लिए हम सब आपसे क्षमा माँगते हैं। अल्लाह इस ‘देशद्रोही’ को सज़ा दे। उनका कार्यकाल हमारे इतिहास पर एक काले धब्बे की तरह होगा।” अमेरिका ने बताया कि अधिकतर पश्चिमी देशों के राजनयिक काबुल से निकल गए हैं। 60 देशों ने बयान जारी कर कहा है कि अफगानिस्तान के जो लोग देश छोड़ कर जाना चाहते हैं, उन्हें जाने दिया जाना चाहिए।

वहीं अमेरिका ने काबुल एयरपोर्ट को अपने नियंत्रण में ले लिया है, ताकि पश्चिमी देशों के राजनयिकों व कर्मचारियों को वहाँ से निकाला जा सके। वहाँ से लोगों को निकालने के लिए मिलिट्री फ़्लाइट्स का इस्तेमाल किया जा रहा है। लगभग 6000 अमेरिकी सैनिक वहाँ तैनात किए जा रहे हैं, जिनका काम लोगों को सुरक्षित निकालना होगा। वहाँ के एयर ट्रैफिक का कंट्रोल भी अमेरिका ने अपने हाथों में ले लिया है।

अमेरिका के स्पेशल इमिग्रेंटस वीजा के तहत अफगानिस्तान के जो लोग पात्र हैं, उन्हें भी निकालने की बात अमेरिका ने कही है। अमेरिका ने बताया कि ऐसे 2000 नागरिकों को अमेरिका भेजा जा चुका है। अशरफ गनी के पूर्व सलाहकार ने राष्ट्रपति के वहाँ से भागने को विचित्र करार देते हुए कहा कि उन्होंने लोगों को धोखा दिया है। उन्होंने कहा कि गनी ने कई सालों के निवेश और मेहनत को बर्बाद कर दिया।