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स्तंभेश्वर महादेव: कार्तिकेय ने की थी स्थापना, दिन में दो बार आँखों से ओझल हो जाता है मंदिर

ऑपइंडिया की हिन्दू मंदिरों की श्रृंखला में आज एक ऐसे शिव मंदिर की बात जो दिन में दो बार आँखों से ओझल हो जाता है। हालाँकि मंदिर का गायब होना कोई चमत्कार नहीं, बल्कि एक अनूठी प्राकृतिक घटना है। गुजरात के वडोदरा से 75 किमी दूर कावी-कमोई गाँव में स्थित स्तंभेश्वर महादेव मंदिर की स्थापना भगवान शिव के पुत्र कार्तिकेय ने की थी।

इतिहास

भगवान शिव को समर्पित इस स्तंभेश्वर तीर्थ का वर्णन स्कन्द पुराण और श्री महाशिवपुराण की रुद्र संहिता में मिलता है। पौराणिक तथ्यों के अनुसार राक्षस ताड़कासुर ने भगवान शिव की तपस्या से उन्हें प्रसन्न कर लिया और वरदान माँग लिया कि उसका वध सिर्फ भगवान शिव का पुत्र ही कर पाए और वो भी मात्र 6 दिन की आयु का। वरदान पाकर ताड़कासुर ने हर जगह उत्पात मचाना शुरू कर दिया। राक्षस के उत्पात से तंग आकर मनुष्य और देवता, भगवान शिव के पास पहुँचे। तब भगवान शिव के तेज से उत्पन्न हुए शिव-शक्ति के पुत्र कार्तिकेय। अंततः 6 मुखों वाले कार्तिकेय ने मात्र 6 दिन की आयु में ताड़कासुर का संहार कर दिया।

जब कार्तिकेय को यह पता चला कि जिस राक्षस का उन्होंने वध किया है वह उनके पिता का बहुत बड़ा भक्त था, तब उनके मन में अशांति छा गई और वो व्यथित रहने लगे। इसके बाद भगवान विष्णु ने कार्तिकेय को यह सुझाव दिया कि जहाँ उन्होंने राक्षस का वध किया है, उस स्थान पर शिव मंदिर का निर्माण करा दें तो उनके मन को शांति मिलेगी। भगवान विष्णु के कहे अनुसार कार्तिकेय ने इस मंदिर का निर्माण कराया और सभी देवताओं ने मिलकर विश्वनंदक स्तंभ की स्थापना की जो स्तंभेश्वर महादेव के नाम से जाना गया। वर्तमान में इस मंदिर की खोज आज से लगभग 150 वर्ष पूर्व ही हुई है।

दो बार गायब होने वाला मंदिर

स्तंभेश्वर महादेव मंदिर का दिन में दो बार गायब होना कोई चमत्कारी घटना नहीं है, बल्कि प्रकृति का एक अद्भुत उदाहरण है। दरअसल मंदिर अरब सागर के तट पर स्थित है, या यूँ कहें कि अरब सागर में ही स्थित है। दिन में कम से कम दो बार ऐसी स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं जब समुद्र का जलस्तर बढ़ जाता है तब मंदिर पूरी तरह से पानी में डूब जाता है और जैसे ही जलस्तर कम होता है, मंदिर अपने आप पानी के बाहर आ जाता है।

इस प्राकृतिक घटना को देखने के लिए गुजरात समेत देश के कई हिस्सों से आने वाले लोग इस मंदिर की यात्रा जरूर करते हैं। यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं को किसी तरह की कोई परेशानी न हो इसलिए यहाँ पर्चे बाँटे जाते हैं ताकि श्रद्धालुओं को समुद्र के जलस्तर के बढ़ने और घटने की जानकारी मिलती रहे। श्रद्धालु भी जलस्तर कम होने की प्रतीक्षा करते हैं और उसके बाद ही भगवान शिव के दर्शन के लिए जाते हैं। इसी स्थान पर पौराणिक महिसागर नदी का समुद्र के साथ संगम होता है और भक्त यह मानते हैं कि समुद्र रोजाना 4 फुट ऊँचे स्वयंभू शिवलिंग का जलाभिषेक करता है। महाशिवरात्रि यहाँ का सबसे बड़ा त्योहार है इसके अलावा श्रावण महीने में भी यहाँ भक्तों की भीड़ लगी रहती है।

कैसे पहुँचे?

गुजरात के भरुच जिले की जम्बूसर तहसील में स्थित स्तंभेश्वर महादेव मंदिर का नजदीकी हवाई अड्डा वडोदरा में है जो मंदिर से लगभग 80 किमी दूर है। इसके अलावा सूरत हवाई अड्डा यहाँ से लगभग 180 किमी दूर है। मंदिर का नजदीकी रेलवे स्टेशन भरुच जंक्शन है, जिसकी मंदिर से दूरी लगभग 96 किमी है। भरुच पहुँचने के बाद आसानी से मंदिर पहुँचा जा सकता है क्योंकि गुजरात राज्य परिवहन के अलावा निजी परिवहन सेवाओं की उपलब्धता भी है। सड़क मार्ग से भी भरुच होते हुए गुजरात के किसी भी शहर से आसानी से स्तंभेश्वर महादेव मंदिर पहुँचा जा सकता है।

झंडा फहराने के समय ‘भारत माता की जय’ पर आपत्ति, लगाए देश-विरोधी नारे: दुकान और वाहन में तोड़फोड़, इंदौर पुलिस ने 3 को लिया हिरासत में

मध्य प्रदेश के इंदौर में झंडा फहराने के दौरान दो पक्षों में विवाद के बाद हुई हिंसा में दो लोग घायल हो गए हैं। वहीं, बवाल के दौरान दुकान और बाहर खड़ी गाड़ियों में भी तोड़-फोड़ की गई है। घटना की जानकारी मिलते ही एसपी, एएसपी और टीआई मौके पर पहुँच गए। मामला शहर के तेजाजी नगर का इलाके है।

दरअसल, इलाके के नायता मुंडला स्थित कावेरी बिल्डिंग में 15 अगस्त को झंडा फहराने का कार्यक्रम चल रहा था। झंडा फहराने के दौरान लोगों ने ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाए। इस पर दूसरे पक्ष ने आपत्ति जताई और दूसरे पक्ष के कुछ लोगों ने भारत विरोधी नारे लगाना शुरू कर दिए। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच विवाद होने लगा और मामले ने तूल पकड़ लिया।

इस दौरान लोगों ने पत्थर बरसाने शुरू कर दिये, जिसके बाद भगदड़ मच गई। उपद्रवी यहीं तक नहीं रूके, उन्होंने बाहर खड़े वाहनों में तोड़फोड़ शुरू कर दी। हमले में कार, बाइक और अन्य वाहनों को नुकसान पहुँचाया गया। दुकानों में भी तोड़फोड़ की गई।

घटना की सूचना मिलते ही एसपी आशुतोष बागरी के नेतृत्व में एएसपी, टीआई और कई थानों के पुलिस बल मौके पर पहुँच गए। पुलिस ने दोनों पक्षों को समझाया और घायलों को अस्पताल भिजवाया। उन्होंने बताया कि स्थिति नियंत्रण में है, लेकिन एहतियात के तौर पर इलाके में पुलिस बल तैनात कर दिया गया है।

एसपी बागरे ने कहा कि देश विरोधी नारे लगाने वाले और उत्पात करने वाले लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। दोनों पक्षों के 15-15 से अधिक लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया है। इनमें सद्दाम, सोहेल, शादाब, इमरान, रफीक, रजा भाइयों समेत 8 आरोपी नामजद हैं। आरोपियों के खिलाफ बलवा, पत्थरबाजी और मारपीट की धाराओं में केस दर्ज किया है। वहीं, 3 लोगों को हिरासत में भी लिया गया है।

उदित राज मुस्लिम लड़कियों को स्कर्ट ‘पहना’ रहे थे, फोटो भी डाले… कट्टरपंथियों ने गंदी-गंदी गालियों से दिया ‘शांतिप्रिय संदेश’

अफगानिस्तान में चल रहे संघर्ष और वहाँ बढ़ रहे तालिबान के प्रभाव के बीच कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता डॉ. उदित राज ने अफगानिस्तान में वर्षों पहले की स्थिति की तुलना भारत से करने की कोशिश की लेकिन अंततः उन्हें कट्टरपंथी मुस्लिमों से गालियाँ और आलोचना ही झेलनी पड़ी।

अपने ट्वीट में उदित राज ने कुछ छात्राओं की फोटो पोस्ट की, जो स्कर्ट में थीं और उनके बारे में लिखा कि यह 1960 के दशक के अफगानिस्तान के कॉलेज का दृश्य है लेकिन धर्मांधता ने आज कहाँ पहुँचा दिया। उन्होंने आगे लिखा कि आज वहाँ महिलाएँ गुलामी व बुर्का में कैद हो गई हैं और भारत भी इसी ओर बढ़ रहा है।

उदित राज के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

लेकिन उदित राज के इस पोस्ट के बाद कई कट्टरपंथी मुस्लिमों को उनकी यह बात पसंद नहीं आई और उन्होंने उदित राज के लिए अपशब्द कहे और कमेंट में गालियाँ भी दीं।

मुस्लिम महिलाओं के द्वारा भी उदित राज के ट्वीट पर अपशब्द कहे गए। कहा गया कि जब मुस्लिम महिलाओं को दिक्कत नहीं है तो तुम्हें क्यों?

उदित राज के फेसबुक पोस्ट पर किए गए कमेंट्स

ज्ञात हो कि तालिबान ने अफगानिस्तान के अंदर कई नियम-कायदे बनाने की बात कही है। इसमें महिलाओं के लिए बहुत ही कड़े नियम बनाए गए हैं और तालिबानी आतंकियों द्वारा अफगानी महिलाओं का शोषण भी किया जा रहा है।

मीडिया खबरों के मुताबिक तालिबानी आतंकी उन घरों से एक लड़की को उठा रहे हैं, जहाँ घरों में दो लड़कियाँ हैं और उन्हें तालिबानी लड़ाकों का सेक्स स्लेव बनाया जा रहा है। इसके अलावा अफगानी महिलाओं को तालिबानी आतंकियों से निकाह करने के लिए मजबूर भी किया जा रहा है।

अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने तालिबान को सत्ता सौंपा, देश छोड़ा: जानिए कौन हैं अंतरिम सरकार के प्रमुख बनने वाले अली अहमद जलाली

आतंकी संगठन तालिबान ने अंतत: अफगानिस्तान को घेर लिया और सत्ता पर काबिज हो गया। लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई अफगानिस्तान की सरकार के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने इस्तीफा दे दिया है और मिली खबरों के अनुसार, उन्होंने देश छोड़ दिया है। वहीं, अफगानिस्तान के उप-राष्ट्रपति अमरुल्लाह सलेह के देश छोड़ने की खबर नहीं है, लेकिन माना जा रहा है कि वे भी जल्दी ही अफगानिस्तान छोड़ देंगे।

शांतिपूर्ण सत्ता हस्तांतरण के साथ ही तालिबान ने काबुल को घेर कर खड़े संगठन के लड़ाकों को काबुल में प्रवेश करने इजाजत देे दी है। तालिबान को हस्तांतरित सत्ता में अली अहमद जलाली को प्रमुख बनाए जाने की खबर है। हालाँकि, खबर लिखे जाने तक तालिबान ने सार्वजनिक भवनों पर अभी तक अपना झंडा नहीं फहराया है और ना ही देश का नियंत्रण अपने हाथ में लेने की घोषणा की है।

खबर है कि अमेरिका में रहने वाले शिक्षाविद और राजनयिक अली अहमद जलाली को अंतरिम सरकार का प्रमुख बनाया जाएगा। रिपोर्ट के अनुसार, जलाली के नाम पर अमेरिका, तालिबान, पाकिस्तान और अफगानिस्तान सरकार के बीच सहमति बनी है। आइये जानें कि कौन हैं अली अहमद जलाली।

अली अहमद जलाली का जन्म काबुल में हुआ था लेकिन 1987 से अमेरिकी नागरिक हैं और अमेरिका के मेरीलैंड में रहते थे। सन 2003 में तालिबान सरकार के पतन के बाद अफगानिस्तान लौटे थे। उस वक्त बनी सरकार में उन्हें इंटीरियर मिनिस्टर यानी गृहमंत्री बनाया गया था। वे। सितंबर 2005 तक वे इस पद पर थे। जलाली जर्मनी में अफगानिस्तान के राजदूत की भूमिका भी निभा चुके हैं।

80 के दशक के अफगानिस्तान के मुजाहिदीनों का सोवियत संघ के साथ युद्ध चल रहा था तब जलाली सेना में कर्नल के पद पर तैनात थे। उस समय वे पाकिस्तान के पेशावर स्थित Afghan Resistance Headquarters में शीर्ष सलाहकार की भूमिका भी निभा रहे थे।

इस तरह जलाली एक ऐसे शख्स हैं जिनका अफगानिस्तान की वर्तमान सरकार, अमेरिका, पाकिस्तान और तालिबान सबके साथ मधुर संबंध हैं। प्रोफेसर से लेकर राजदूत और सैन्य अधिकारी से लेकर गृहमंत्री तक की भूमिका में रह चुके जलाली के नाम पर इन चारों पक्षों ने अपनी सहमति दी है।

वर्तमान घटनाक्रम को लेकर जलाली ने हाल ही में कहा था, “खराब नेतृत्व, लॉजिस्टिक स्थिरता की कमी और परिचालन एवं सामरिक समन्वय की कमी ने समर्पित अफगान सैनिकों के जीवन और प्रतिष्ठा पर भारी असर डाला है। एक सप्ताह के भीतर विद्रोही लड़ाकों के सामने अफगानिस्तान के एक तिहाई प्रांतीय राजधानियों का तेजी से पतन अफगान राष्ट्रीय रक्षा एवं सुरक्षा बल की दृढ़ता के प्रचारित दावे को लेकर बहुत कुछ कहता है।”

एक पुरानी सैन्य कहावत को ट्वीट कर जलाली ने कहा था, “जिन्होंने अच्छी तरह से शासन किया वे हथियार नहीं रखे, जो सशस्त्र थे उन्होंने अच्छी तरह युद्ध की रेखाएँ नहीं खींची, जिन्होंने युद्ध की रेखाएँ अच्छी तरह से खींचीं वे लड़े नहीं, जो अच्छी तरह से लड़े वे हारे नहीं, जो अच्छी तरह से हारे वे नष्ट नहीं हुए’।”

क्यों जरूरी है विभाजन के दंश को याद करना, ‘योम हाशाह’ से सीखें हिन्दू: बाबरी का मातम मनाने वाले नहीं समझेंगे

पश्चिमी एशिया में एक छोटा सा देश है – इजरायल। यहाँ हर साल (अप्रैल-मई में) ‘योम हाशाह’ मनाया जाता है। इसे अंग्रेजी में कह लीजिए- Holocaust Remembrance Day, अर्थात होलोकॉस्ट को याद करने का दिन। होलोकॉस्ट को संक्षेप में समझिए यहूदी नरसंहार। नाज़ी जर्मनी में हिटलर के शासनकाल में 1940 के दशक में 60 लाख यहूदियों का नरसंहार हुआ था। उन्हें ही श्रद्धांजलि देने और उन्हें याद करने के लिए ये दिवस मनाया जाता है।

इजरायल एक विकसित देश है, जो रक्षा तकनीक के मामले में दुनिया के शीर्ष देशों में आता है। या इजरायली बेवकूफ हैं? हम ऐसा इसीलिए पूछ रहे हैं क्योंकि भारत के लिबरल गिरोह ने ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस (Partition Horrors Remembrance day) को लेकर कुछ ऐसी ही प्रतिक्रिया दी है। किसी का कहना है कि विभाजन को क्यों याद करें तो कोई कह रहा है कि पुराने घाव क्यों ताज़ा करें।

हिन्दू धर्म में तो रीति-रिवाज है कि किसी के मरने के बाद उसका अंतिम-संस्कार और फिर श्राद्ध करते हैं। अगले वर्ष ठीक उसी तारीख़ पर ‘बरखी‘ मनाई जाती है, जिसमें ब्राह्मणों व लोगों को भोजन कराया जाता है। दान-पुण्य किए जाते हैं। पितृपक्ष में पितरों का तर्पण किया जाता है। अब यहाँ लिबरल लॉजिक लगाएँ तो क्या लोग अब मृत्यु के बाद अपने पूर्वजों को भी भूल जाएँ? मृतकों को याद करने का अर्थ सिर्फ ‘घाव कुरेदना’ नहीं होता।

आइए, कुछ और देशों की बात भी कर लेते हैं। कई देशों में ‘National day of mourning’, अर्थात शोक का दिवस मनाया जाता है। सामान्यतः किसी त्रासदी की याद में ऐसा किया जाता है। यूरोपियन यूनियन अमेरिका में हुए 9/11 हमले की बरसी पर शोक मनाता है। नवंबर 2015 में पेरिस में हुए आत्मघाती हमले की बरसी पर भी शोक मनाया जाता है। क्या लिबरल गिरोह पूरे यूरोप को मूर्ख बता देगा?

रूस-कोकेशियान युद्ध की याद में और उस दौरान हुए नरसंहार की याद में सिकैसियन (Circassian) समाज के लोग हर साल 21 मई को शोक दिवस मनाता है। ऑस्ट्रेलिया के स्थानीय निवासियों के खिलाफ हुए अत्याचार के विरोध में हर साल ‘नेशनल सॉरी डे’ मनाया जाता है। उत्तर-पूर्वी अमेरिका के न्यू इंग्लैंड में हर साल नेटिव अमरीकी ‘नेशनल डे ऑफ मोर्निंग’ मनाते हैं। फिलिस्तीन वाले हर साल ‘नकबा दिवस’ मनाते हैं, शरणार्थियों को याद करने के लिए।

इस तरह हमने देखा कि दुनिया के कई देश और समूह अपने ऊपर हुए अत्याचारों को याद करने के लिए, उस क्रूरता के पीड़ितों को सम्मान देने के लिए और नरसंहार के मृतकों को श्रद्धांजलि देने के लिए शोक दिवस मनाते हैं। फिर भारत में ऐसा क्यों नहीं हो सकता? हमारा देश तो सैकड़ों वर्षों तक आक्रांताओं से पीड़ित रहा है। देश का विभाजन एक त्रासदी थी, जिसने 20 लाख लोगों की जान लील ली। तभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 75वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर रविवार (15 अगस्त, 2021) को कहा,

“हम आजादी का जश्न मनाते हैं लेकिन बँटवारे का दर्द आज भी हिंदुस्तान के सीने को छलनी करता है। ये पिछली शताब्दी की सबसे बड़ी त्रासदी में से एक थी। आजादी के बाद इन लोगों को बहुत ही जल्द भुला दिया गया। कल ही (अगस्त 14, 2021) भारत ने एक भावुक निर्णय लिया है। अब से हर वर्ष 14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ के रूप में याद किया जाएगा। जो लोग विभाजन के समय अमानवीय हालात से गुजरे, जिन्होंने अत्याचार सहे, जिन्हें सम्मान के साथ अंतिम-संस्कार तक नसीब नहीं हुआ, उन लोगों का हमारी स्मृतियों में जीवित रहना भी उतना ही जरूरी है। आजादी के 75वें स्वतंत्रता दिवस पर ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस का तय होना, ऐसे लोगों को हर भारतवासी की तरफ से आदरपूर्वक श्रद्धांजलि है।”

और ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ का विरोध कौन लोग कर रहे हैं? वही लोग, जो हर साल बाबरी विध्वंस पर मातम मनाते हैं। हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी भविष्य की पीढ़ी को बाबरी के बारे में बताने की बात करते हैं। कभी राजदीप सरदेसाई की पूरी पत्रकारिता ही 2002 के गुजरात दंगों तक सीमित थी। राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की बरसी पर ज़हर उगले गए। यही लोग अब पूछ रहे कि पुरानी बातें क्यों याद की जाएँ?

ऐसा इसीलिए, क्योंकि डर है कि जब बात विभाजन की होगी, 20 लाख मौतों की होगी और 2 करोड़ लोगों के विस्थापन की होगी तो उन लोगों की आलोचना तो होगी ही, जिनके कारण देश को ये सब भुगतना पड़ा। वो लाखों परिवार आज भी इस दंश का सामना कर रहे हैं। जो इस त्रासदी के पीड़ित थे, उनसे और उनके परिवारों से जाकर पूछिए। उस समय के हर एक पीड़ित की व्यथा आज के प्रत्येक भारतवासी के पास पहुँचनी चाहिए, भविष्य की पीढ़ी को जाननी चाहिए।

इन्हें डर है कि विभाजन की बात होने पर उस मोहम्मद अली जिन्ना की बात होगी, जिसकी तस्वीर ‘अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU)’ में लगी थी। इन्हें डर है कि प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की गलतियों की बात होगी, जिन्होंने हाथ उठा कर विभाजन का समर्थन किया था। कॉन्ग्रेस की बात होगी, जिसने विभाजन को स्वीकार किया और जिसे इसके बाद सत्ता मिली। नेहरू पीएम बन गए और जिन्ना कायदे आजम, लेकिन आम जनता सड़क पर मरती रही।

खासकर बंगाल और पंजाब के लोगों से विभाजन के बारे में पूछिए। ये दोनों राज्य इस त्रासदी से सबसे ज्यादा पीड़ित रहे थे। मोहम्मद अली जिन्ना ने 16 अगस्त, 1946 को ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ की घोषणा की थी। इस दिन पूरे देश भर में जिन्ना के मुस्लिम अनुयायियों ने हिंसा की। खासकर कोलकाता में तो हिन्दुओं का नरसंहार हुआ। आधिकारिक आँकड़े ही कहते हैं कि 4000 लोग मारे गए। असली आँकड़े इससे काफी ज्यादा हो सकते हैं।

ये वो समय था, जब कॉन्ग्रेस और मुस्लिम लीग कंस्टिट्यूएंट एसेम्ब्ली में सबसे बड़े दल हुआ करते थे। जिन्ना ने कहा था कि या तो वो भारत का विभाजन कर देगा, नहीं तो इसे तबाह कर देगा। कोलकाता में 72 घंटों के भीतर 1 लाख लोगों के विस्थापन के लिए जिम्मेदार ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ के जवाब में कॉन्ग्रेस ने क्या किया? और ज्यादा खूनखराबे का रास्ता तैयार किया? जिस कॉन्ग्रेस के हाथ में सब कुछ था, वो हिन्दुओं और सिखों को मरती हुई देखती भर रही।

इसीलिए, उन 20 लाख मौतों और करोड़ों विस्थापितों के दर्द को याद करने के लिए ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ ज़रूरी है। हिन्दुओं के खिलाफ कत्लेआम के ऐलान इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा सालों से किए जाते रहे हैं, इसे याद करने के लिए विभाजन की स्मृति हमारे और हमारी आने वाली पीढ़ियों में होनी चाहिए। किसकी गलती थी, कौन मरे, मारने वाले कौन थे और कौन सब कुछ देख-सुन कर भी शांत था – इन चीजों पर नए सिरे से चर्चा के लिए ये ज़रूरी है।

कॉन्ग्रेस ने किया ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ का विरोध, पाकिस्तान क्या करेगा-क्या सोचेगा पर सीनियर नेता की हालत पतली

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 14 अगस्त 2021 को भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान लोगों के संघर्ष और बलिदान की याद में ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस (Partition Horrors Remembrance Day)’ के तौर पर मनाने का निर्णय लिया। उनके इस निर्णय से कॉन्ग्रेस सहमत नहीं दिखी। पार्टी के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम ने इस निर्णय का विरोध करते हुए कहा कि अगर पाकिस्तान 15 अगस्त को विभाजन विभीषिका निंदा दिवस के रूप में मनाए, तब भारत क्या करेगा?

पी चिदंबरम ने रविवार (15 अगस्त 2021) को ट्वीट करके कहा कि पीएम मोदी ने 14 अगस्त को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस घोषित किया है, लेकिन बँटवारे की हिंसा और नरसंहार सिर्फ एक ही दिन नहीं हुआ था। उन्होंने आगे लिखा कि भारत तब क्या करेगा अगर पाकिस्तान 15 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका निंदा दिवस’ घोषित कर दे। चिदंबरम का कहना था कि भारत को परिपक्व व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि भारत और पाकिस्तान पड़ोसी हैं और दोस्त बदले जा सकते हैं, लेकिन पड़ोसी नहीं।

चिदंबरम से पहले कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता रणदीप सिंह सूरजेवाला भी इस निर्णय से नाराज दिखाई दिए थे। उन्होंने एक दिन पहले ही कहा था कि जब चुनाव नहीं होता है तब पीएम मोदी पाकिस्तान के प्रति प्यार दिखाते हैं। अब उत्तर प्रदेश का चुनाव नजदीक आ रहा है, ऐसे में पीएम मोदी चुनाव की तैयारी कर रहे हैं। हालाँकि, चिदंबरम की भाषा से ऐसा ही लग रहा है, मानो उन्हें पीएम मोदी के इस निर्णय से पाकिस्तानी भावनाओं के आहत होने का भय हो।

ज्ञात हो कि 14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के तौर पर मनाने का निर्णय लेते हुए पीएम मोदी ने कहा कि देश के बँटवारे के दर्द को कभी भुलाया नहीं जा सकता। उन्होंने याद किया कि किस तरह नफरत और हिंसा की वजह से हमारे लाखों बहनों और भाइयों को विस्थापित होना पड़ा और अपनी जान तक गँवानी पड़ी थी। पीएम मोदी ने आशा जताई कि ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस (Partition Horrors Remembrance Day)’ का यह दिन लोगों को भेदभाव, वैमनस्य और दुर्भावना के जहर को खत्म करने के लिए न केवल प्रेरित करेगा, बल्कि इससे एकता, सामाजिक सद्भाव और मानवीय संवेदनाएँ भी मजबूत होंगी।

अफगानिस्तान में तालिबान को सत्ता, राष्ट्रपति अशरफ गनी के इस्तीफे की खबर: 129 लोगों को लेकर भारत चला विमान

अफगानिस्तान की सरकार ने आखिरकार तालिबान के आगे आत्मसमर्पण कर ही दिया। रविवार (15 अगस्त 2021) को तालिबानी आतंकियों ने राजधानी काबुल को चारों ओर से घेर लिया। इसके बाद अफगान प्रेसिडेंसियल पैलेस (ARG) में तालिबान को सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया पर बातचीत की प्रक्रिया शुरू हो गई। सूत्रों के मुताबिक, अली अहमद जलाली अंतरिम सरकार के प्रमुख हो सकते हैं।

खामा प्रेस न्यूज एजेंसी के मुताबिक, सुलह के लिए बनाई गई हाई काउंसिल के अध्यक्ष अब्दुल्ला अब्दुल्ला सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया में मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, अली अहमद जलाली अफगानिस्तान के वर्तमान राष्ट्रपति अशरफ गनी के इस्तीफा देने के बाद तालिबान के नेतृत्व में बनने वाली अंतरिम सरकार के प्रमुख हो सकते हैं।

हालाँकि, अफगानिस्तान के विदेश एवं आतंरिक मामलों के कार्यवाहक मंत्री अब्दुल सत्तार मिर्जाकवाल ने एक वीडियो जारी करके काबुल के निवासियों को आश्वासन दिया कि उनकी रक्षा की जाएगी और अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों की सहायता से काबुल पर होने वाले हमलों से बचाया जाएगा।

अपने बयान में तालिबान के प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद ने कहा कि अल्लाह के कारण और लोगों के सहयोग से तालिबान ने देश के लगभग सभी हिस्सों को अपने कब्जे में ले लिया है। हालाँकि, तालिबानी लड़ाके काबुल के गेट तक पहुँच चुके हैं लेकिन काबुल एक घनी जनसंख्या वाला शहर है, इसलिए किसी भी तरह के विरोध की आशंका के चलते आतंकी हिंसा नहीं करना चाहते हैं। तालिबान के प्रवक्ता ने यह भी कहा कि सत्ता हस्तांतरण की प्रक्रिया चल रही है और वो (तालिबानी आतंकी) किसी भी तरह की हिंसा नहीं करना चाहते हैं, बल्कि काबुल के लोगों के हितों को ध्यान में रखते हुए शांतिपूर्वक तरीके से सत्ता पर स्थापित होना चाहते हैं।

कई मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, तालिबानी कमांडर मुल्ला अब्दुल गनी बरादार के अफगानिस्तान के राष्ट्रपति बनने की खबर भी आई है। काबुल में तालिबान के प्रवेश करने के बाद मुल्ला बरादार के प्रतिनिधित्व में तालिबानी प्रतिनिधिमंडल सत्ता हस्तांतरण के लिए प्रेसिडेंसियल पैलेस के लिए पहुँचा।

हालाँकि, भारत सरकार ने फिलहाल काबुल में अपना दूतावास बंद करने की संभावनाओं से इंकार किया है, लेकिन वहाँ से भारतीयों को बाहर निकालने की योजनाओं पर काम किया जा रहा है। काबुल से एअर इंडिया का विमान 129 यात्रियों को लेकर रवाना हो गया है और रात तक दिल्ली पहुँच जाएगा।

इससे पहले आज काबुल पहुँचने वाली दिल्ली-काबुल एअर इंडिया की फ्लाइट को तनावपूर्ण हालात के कारण काबुल के आसमान में एक घंटे तक चक्कर लगाना पड़ा, इसके बाद जहाज को लैंड करने के लिए हरी झंडी मिली। रिपोर्ट के मुताबिक, जब विमान काबुल हवाईअड्डे के आसमान पर पहुँचा तो काबुल के हवाई नियंत्रण अधिकारी प्लेन को लैंड कराने के लिए मौजूद नहीं थे। किसी प्रकार की दुर्घटना न हो इसके लिए विमान के राडार को भी बंद करना पड़ा।

जबरन धर्मांतरण कर मुस्लिम लड़की से कराई गई थी निकाह: घरवापसी के बाद जावेद बना जय, पत्नी रुखसार बनी माया व बेटा औरंगजेब हुआ विजय

उत्तर प्रदेश झाँसी के रहने वाले एक व्यक्ति ने परिवार सहित समेत हिंदू धर्म में घर वापसी की है। करीब 20 वर्ष पहले जय सिंह ठाकुर का धर्मान्तरण कराके उनका नाम जावेद रख दिया गया था। शनिवार (14 अगस्त 2021) को उन्होंने अपनी पत्नी और बच्चे समेत हिंदू धर्म में घर वापसी की और अपना पुराना नाम जय सिंह रख लिया। झाँसी स्थित सिद्धेश्वर मंदिर में पूजा-पाठ के बाद उनकी घर वापसी कराई गई।

रिपोर्ट के मुताबिक, सैयर गेट के रहने वाले निर्मल सिंह और उनकी पत्नी 20 साल पहले इलियास नाम के व्यक्ति के पास अपने बेटे को छोड़कर चले गए थे। उसने बाद उसका धर्मान्तरण करवाकर उसका नाम जय से जावेद रखवा दिया था। इसके अलावा चार साल पहले ही उसकी शादी रुखसार नाम की मुस्लिम लड़की से करवाई थी। उन दोनों का एक बेटा औरंगजेब भी है। जावेद उर्फ जय सिंह ने करीब एक महीने पहले इलियास के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी।

इस मामले में जय सिंह ने इलियास पर जबरन उसका धर्मान्तरण कराने का आरोप लगाया है। युवक का कहना है कि वह खुशी से हिंदू धर्म में घर वापसी कर रहा है। हिंदू संगठनों की मदद से घर वापसी कर मोहम्मद जावेद से जय सिंह बने युवक की पत्नी ने भी अपना धर्म परिवर्तित कर हिंदू धर्म अपना लिया है। उसका नाम अब रुखसार से बदलकर माया हो गया है। वहीं, उन दोनों के बेटे औरंगजेब का नाम अब विजय हो गया है।

जय सिंह के मुताबिक, उसने मामले की शिकायत पुलिस से की थी, लेकिन जब उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की तो उसने बजरंग दल के विनोद अवस्थी से मदद माँगी। जय की पत्नी रुखसार उर्फ माया ने भी कहा है कि उसके पति का जबरन धर्मान्तरण कराया गया था और उन्हें प्रताड़ित भी किया जा रहा था। दंपति का कहना है कि उन्होंने डीएम व एसपी को प्रमाण पत्र देकर बताया है कि उन्होंने अपनी मर्जी से हिंदू धर्म में घर वापसी की है। वहीं, एसएसपी ने मामले जाँच किए जाने की बात कही है।

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बंगाल में चावल तौलने के बहाने नजरुल इस्लाम ने गोदाम में किया मजदूर की बच्ची का रेप, गुस्साई भीड़ ने जमकर धोया

पश्चिम बंगाल के मालदा में एक छोटी बच्ची के साथ रेप करने का मामला सामने आया है। गोदाम में चावल तौलने के नाम पर नजरुल इस्लाम ने बच्ची का रेप किया जिसे बाद में गुस्साई भीड़ ने पकड़कर पीट दिया। आरोपित को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।

घटना पश्चिम बंगाल के मालदा जिले के चाँदीपुर गाँव की है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक आरोपित नजरुल इस्लाम, गरीब लोगों को राशन की दुकान से मिले चावल को पहले अवैध तरीके से खरीदता है और बाद में उसे ऊँचे दामों पर बेच देता है। शुक्रवार (13 अगस्त 2021) को एक मजदूर परिवार ने भी इस्लाम को चावल बेचने की बात कही इस पर इस्लाम ने उन्हें गोदाम में चावल तौलने के लिए लाने को कहा।

मजदूर परिवार की दो बेटियाँ चावल लेकर आरोपित इस्लाम के गोदाम में पहुँची जहाँ इस्लाम ने छोटी बेटी को बाहर रोककर बड़ी बेटी को गोदाम में ले गया और उसके साथ रेप किया। रेप के बाद इस्लाम बच्ची के हाथ में 350 रुपये रख दिया और चला गया। बच्ची रोते हुए घर पहुँची और उसने अपनी माँ को घटना की जानकारी दी।

इसके बाद बच्ची के साथ रेप की यह घटना गाँव वालों को पता चली तो उन्होंने आरोपित नजरुल को घर से निकालकर उसकी पिटाई कर दी। घटना की सूचना मिलने पर हरिश्चंद्रपुर थाना पुलिस गाँव पहुँची जहाँ बड़ी मुश्किल से आरोपित नजरुल इस्लाम को गाँव वालों से छुड़ाया गया।

पुलिस ने आरोपित इस्लाम को गिरफ्तार कर लिया है और उसके ऊपर POCSO एक्ट के तहत मुकदमा दर्ज किया गया। शनिवार (14 अगस्त 2021) को इस्लाम को न्यायालय में पेश किया गया, जहाँ से उसे 14 दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया गया है। पुलिस के मुताबिक गाँव की स्थिति अब नियंत्रण में है और बच्ची को अस्पताल में भर्ती किया गया है, जहाँ उसका इलाज चल रहा है। स्वस्थ होने पर बच्ची का बयान दर्ज किया जाएगा।

‘पूरी दुनिया में लागू होगा इस्लामी कानून’: काबुल में सहमे अफगानियों ने तालिबान का किया स्वागत, गोपनीय दस्तावेज जलाकर निकलने को तैयार अमेरिका

अफगानिस्तान में तालिबान ने अब वहाँ के आखिरी गढ़ काबुल को भेद दिया है औऱ तालिबानी कट्टरपंथी इस्लामी काबुल में प्रवेश कर गए हैं। इस बीच रायटर्स को नाटो के एक अधिकारी ने बताया है कि यूरोपीय यूनियन के कई कर्मचारियों को काबुल में ही एक अज्ञात स्थान पर सुरक्षित ले जाया गया है। इसी कड़ी में काबुल में अमेरिकी दूतावास में अहम गोपनीय दस्तावेजों को जलाना शुरू कर दिया है। दूतावास की छत से धुएँ का गुबार उठता देखा गया है।

अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि अमेरिकी राजनयिक कागजातों को जला रहे हैं। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, इन हालातों में 50 से भी कम अमेरिकी दूतावास के अधिकारी अब अफगानिस्तान में रुकेंगे।

मीडिया रिपोर्ट के हवाले से कहा जा रहा है कि तालिबान ने अपने लड़ाकों को काबुल में किसी भी तरह की हिंसा नहीं करने को कहा है। वह शांतिपूर्ण तरीके से काबुल पर कब्जा करना चाहता है। तालिबान के अधिकारियों का दावा है कि वो अगले दो घंटे में काबुल पर कब्जा कर लेंगे।

हालाँकि, अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने काबुल में छिटपुट गोलाबारी का दावा किया है। उन्होंने एक ट्वीट कर काबुल पर हमला नहीं किए जाने का दावा किया और कहा कि वो देश की सुरक्षा और रक्षा बल शहर की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बातचीत कर रहे हैं। हालात नियंत्रण में हैं। वहीं, खबर आ रही है कि बिना खून-खराबे से सत्ता हस्तांतरण के लिए बातचीत की प्रक्रिया चल रही है।

सैयद वासिफ अली द्वारा शेयर किए गए वीडियो के मुताबिक, तालिबानी आतंकियों के काबुल में घुसने के खबर के बाद काबुल के लोग काबुल गेट पर उनके स्वागत के लिए आ गए हैं।

एक अन्य वीडियो में यूजर ने दावा किया है कि हेरात में जिन हेलीकॉप्टर को तालिबान ने कब्जाया था उसने उन्हें संचालित करना शुरू कर दिया है।

सीएनएन को तालिबान एक कमांडर ने बताया, “यह हमारा विश्वास है कि एक दिन मुजाहिदीन की जीत होगी, और इस्लामी कानून न केवल अफगानिस्तान, बल्कि पूरी दुनिया में आएगा। हम जल्दी में नहीं हैं। हमें विश्वास है कि यह एक दिन आएगा। हम अंतिम दिन तक जिहाद करेंगे।”