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नीरज चोपड़ा के गोल्ड से मोदी सरकार पर निशाना: असम की ‘खिलाड़ी’ पिंकी के कंधे पर रखा बंदूक – ऐसे खुली मीडिया की पोल

मीडिया में पिंकी करमाकर नाम की एक ‘ओलम्पिक टॉर्चबियरर’ की कहानी चलाई जा रही है। मंगलवार (10 अगस्त, 2021) को कई मीडिया संस्थानों और सोशल मीडिया में भी लोगों ने इस खबर को ऐसे पेश किया, जैसे वो किसी ‘खिलाड़ी की दुर्दशा’ दिखा रहे हों। दरअसल, खबर ये थी कि कभी ओलंपिक टॉर्चबियरर’ रहीं पिंकी करमाकर अब असम के डिब्रूगढ़ में स्थित के चाय के बागान में काम कर रही हैं।

ANI ने पिंकी करमाकर के बयान को भी प्रकाशित किया, जिसमें उन्होंने कहा था, “मुझे सरकार से कोई सुविधा नहीं मिली। मुझे नहीं पता है कि क्यों। UNISEF ने मेरा चयन किया था। मेरे सारे सपने टूट गए हैं।” खबरों में बताया गया कि 18 वर्ष की उम्र से ही वो सामाजिक गतिविधियों में लगी रही हैं और अपने क्षेत्र के महिलाओं को पढ़ाया भी करती थीं। बताया गया है कि वो स्कूल में कई खेल गतिविधियों में भी हिस्सा लेती थीं।

साथ ही वो 2012 में हुए ओलंपिक खेलों के दौरान ‘टॉर्चबियरर’ रही थीं। असल में उन्हें ‘संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (UNICEF)’ के ‘स्पोर्ट्स फॉर डेवलपमेंट (S4D)’ कार्यक्रम के तहत इसके लिए चुना गया था। इसी कार्यक्रम के तहत उन्हें लंदन में हुए ओलंपिक खेलों में बतौर ‘टॉर्चबियरर’ ले जाया गया था। ओलंपिक के दौरान ‘टॉर्चबियरर’ वो होते हैं, जो विभिन्न हिस्सों में ओलंपिक की मशाल लेकर दौड़ते हैं।

क्या पिंकी करमाकर एक खिलाड़ी हैं?

इसका सीधा सा जवाब है कि उन्होंने किसी खेल टूर्नामेंट में हिस्सा नहीं लिया है और ज़रूरी नहीं है कि ‘टॉर्चबियरर’ कोई खिलाड़ी ही हो। मीडिया ने इस खबर को इस तरह से चलाया, जैसे कि वो कोई एथलीट हों। जबकि ऐसा नहीं है। ‘इनसाइड स्पोर्ट’ नाम की एक वेबसाइट ने तो पिंकी करमाकर को ‘फ्लैबियरर’ ही बतया दिया और शीर्ष दिया – “नीरज चोपड़ा की उपलब्धि के बीच भारत के लिए शर्म की बात – ओलंपिक ‘फ्लैगबियरर’ असम में मजदूर के रूप में काम करती हुई पाई गईं।”

‘इनसाइड स्पोर्ट्स’ ने नीरज चोपड़ा से की पिंकी करमाकर की तुलना

इन अस्पष्ट और झूठी सूचनाओं की जड़ ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ की एक खबर है, जिसे 8 अगस्त को प्रकाशित किया गया था। अख़बार में उनकी दिक्कतों का जिक्र किया गया था। TOI में लिखा था कि लंदन ओलंपिक से वो एक ‘मेडल विजेता’ के रूप में भारत आई थीं और उनका स्वागत हुआ था। उन्होंने अख़बार को बताया था, “मेरे सपने काफी बड़े थे, लेकिन अब कोई आशा ही नहीं बची है। माँ की मौत के बाद वित्तीय समस्याओं के कारण मुझे कॉलेज की पढ़ाई भी छोड़नी पड़ी।”

इसी में उन्होंने बताया था कि अब वो एक चाय के बागान में बतौर मजदूर काम करती हैं। हालाँकि, ANI को जैसे ही पता चला कि ये सूचना सही नहीं है, उन्होंने अपनी खबर को डिलीट कर दिया। ANI ने उस खबर का स्क्रीनशॉट ट्विटर पर शेयर कर के जानकारी दी कि उसे हटा दिया गया है क्योंकि वो एक भ्रामक खबर था और अस्पष्ट सूचनाओं को फैला रहा था। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में ये खबर अब भी मौजूद है।

फ्लैगबियरर और टॉर्चबियरर में होते हैं अंतर

ओलंपिक के दौरान फ्लैगबियरर होते हैं, और उनके अलावा ‘टॉर्चबियरर’ भी होते हैं। दोनों का अपना अलग-अलग महत्व है। लेकिन, इन दोनों के बीच कोई समानता नहीं है। ओलंपिक की वेबसाइट के अनुसार, फ्लैगबियरर अपने देशों के प्रतिनिधि होते हैं और टीम के कप्तान के रूप में उन्हें देखा जाता है। वो ओलंपिक की ओपनिंग सेरेमनी के दौरान टीम के साथ आगे-आगे अपने देश का राष्ट्रीय ध्वज लेकर चलते हैं।

अक्सर किसी वरिष्ठ और सफल खिलाड़ी को इसकी जिम्मेदारी दी जाती है। जैसे, इस बार टोक्यो ओलंपिक में भारत की तरफ से वरिष्ठ बॉक्सर मैरी कॉम और भारतीय हॉकी टीम के कप्तान मनप्रीत सिंह भारत के ‘फ्लैगबियरर’ थे। ये काम एथलिट का ही होता है, जो ओलंपिक के एक या उससे अधिक प्रतिस्पर्धाओं में हिस्सा ले रहे हों। लेकिन, जो ‘टॉर्चबियरर’ होते हैं, वो इनसे बिलकुल अलग होते हैं।

‘टॉर्चबियरर’ ओलंपिक की मशाल को पूरे स्टेडियम में घुमाते हैं। ये कोई एथलिट नहीं होते, बल्कि किसी भी क्षेत्र में अच्छा काम करने वाले लोग होते हैं। जैसे हालिया टोक्यो ओलंपिक में टकसिघे शो नाम के एक जादूगर का नाम ‘टॉर्चबियरर्स’ की सूची में शामिल था। 2008 में बॉलीवुड अभिनेता आमिर खान भी ‘टॉर्चबियरर’ थे। उसी साल बीजिंग में में हुए ओलंपिक में भारतीय फुटबॉल स्टार बाइचुंग भुटिया ने ‘टॉर्चबियरर’ की जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया था।

तिब्बत में चीन के अत्याचारों के विरोध में उन्होंने ये फैसला लिया था। पिंकी ने बताया कि उन्हें टॉर्च रिले में शामिल होने के लिए वित्तीय सहायता देने का वादा किया गया था। उन्होंने बताया कि अब तक उन्हें कुछ नहीं मिला है और सच्चाई ये है कि एक मजदूर की बेटी अब भी मजदूर है। असल में तकनीकी रूप से ‘टॉर्चबियरर’ अपने देश के प्रतिनिधि नहीं होते, बल्कि ओलंपिक की भावना और मेजबान देश का प्रतिनिधित्व करते हैं।

इस साल हुए ‘टोक्यो 2020’ ओलंपिक खेलों को ही ले लीजिए। ‘टॉर्च रिले परेफरेंस टास्क फ़ोर्स (PTFs)’ ने इस साल 10,000 ‘टॉर्चबियरर्स’ को चुना था। साथ ही ‘टॉर्चबियरर्स’ को खुद के खर्च से यात्रा करने को कहा जाता है। UNICEF जैसी संस्थाएँ कुछ लोगों को चुनती रही हैं और उनके जाने-आने की व्यवस्था करती हैं। इसीलिए, इसके लिए भारत सरकार को दोष देना और ‘खिलाड़ियों की दुर्दशा’ वाला नैरेटिव गलत है।

चापाकल माफ करना! मैं बचपन से बेवजह तुम्हे कॉन्ग्रेस के नाम करता रहा

बिहार के मधुबनी जिले का एक गाँव है नवटोली। वैसे तो जिले में कई नवटोली हैं, लेकिन मैं जिसकी बात कर रहा, वह बेनीपट्टी प्रखंड के नगवास पंचायत में है। ये मेरा पैतृक गाँव है। 7 अगस्त की रात दिल्ली से गाँव पहुँचा। घर के बाहर की स्ट्रीट लाइट जल नहीं रही थी। चौंकिएगा मत! अब विकास की किरण गाँवों तक भी इतनी पहुँच चुकी है कि बिजली के खंभों पर बल्ब लगे हैं। हाँ, उनकी बत्ती का रोशन रहना आप पर निर्भर है। जरूरी है कि आप उसका ध्यान रखें और बीच-बीच में कुछ छोटा-मोटा हो जाए तो जेब से भी खर्च कर दें। सरकार भरोसे रहे तो बत्ती गुल ही रहेगी।

इस बल्ब को ठीक करने के लिए बिजली मिस्त्री को बुलाया गया जो पड़ोस के गाँव का है। उस वक्त दरवाजे पर कई लोग बैठे थे। पिता जी साथ गाँव आए हैं तो बैठे लोगों में बुजुर्ग भी थे। एक तो करीब 100 साल के वृद्ध हैं उनमें। बरही से एक साहब भी आए हुए थे। हाल ही में रिटायर हुए हैं। मोटे और खाए-पीए हैं। गाँव में कोठी बनवा रहे हैं। बात शुरू हुई जल निकासी की। गाँव के घर में इस्तेमाल होने वाला पानी हम यूँ ही नहीं बहाते, जैसे अमूमन गाँवों में दिखता है। हमने इसके सीधे जमीन के भीतर जाने की व्यवस्था कर रखी है। अब धीरे-धीरे गाँवों में भी जल निकासी और ग्राउंड वाटर लेवल के गिरते स्तर को लेकर जागरुकता आ रही है तो पता चला कि पिछले दो-चार साल में मकान बनवाने वाले कई लोगों ने मेरे घर में बने इस सोख्ता का अनुसरण किया है और वे साहब भी ऐसा करने जा रहे हैं।

सोख्ता से बात चापाकल (Hand pump) गड़वाने पर आई। साहब ने लाल कक्का से पूछा कि किससे गड़वाएँ? इसी बीच बिजली मिस्त्री मेरे घर के सामने लगे चापाकल की तरफ इशारा करते बोल पड़ा- हमलोग सुनते हैं कि सबस पहिल कल यैह छई (सबसे पहला चापाकल यही है)। मैंने मन ही मन सोचा बेवकूफ है ये तो दस साल पहले ही गड़ा है। फिर शतायु बुजुर्ग ने उस चापाकल की ओर इशारा किया जो लाल कक्का के घर के सामने गड़ा है, जिसकी तस्वीर ऊपर लगी है।

अब चौंकने की बारी मेरी थी। इस चापाकल को मैंने बचपन से देखा है। पहले यह दालान (जिसका अब ​अस्तित्व नहीं) पर था। जब बड़का कक्का रिटायर हुए और बँटवारा हुआ तो जमीन का वह टुकड़ा उनके हिस्से चला गया और चापाकल लाल कक्का के हिस्से आया। उस वक्त इस चापाकल को जगह बदलते देखा था। मेरे बचपन के दिनों में गाँव में गिने-चुने लोगों के पास ही चापाकल था। वो सारे भी सरकारी थे। कॉन्ग्रेस राज में जब कभी जनप्रतिनिधि हमारे गाँव आते तो मेरा दालान उनका ठिकाना होता था। पिताजी को ऐसे कई मौकों पर चापाकल के लिए पैरवी करते और उन्हें लगते देखा था। आज वे सारे चापाकल प्राइवेट प्रॉपर्टी हैं। खैर अब चापाकल कोई दुर्लभ वस्तु भी नहीं रही तो किसी को इससे फर्क भी नहीं पड़ता। घर-घर में है चापाकल। साथ में हर घर नल जल योजना भी। लिहाजा अपने दालान पर लगे चापाकल को लेकर भी मेरा मानना था कि यह कॉन्ग्रेस जमाने के किसी फंड से आई है। इस चापाकल पर मैंने हर वक्त लगने वाला जमावड़ा भी देखा है। आसपास के कई घर इसके ही भरोसे थे।

पर कभी सोचा नहीं था कि ये गाँव का सबसे पुराना चापाकल होगा। कभी घर के किसी बुजुर्ग ने भी इस बात की चर्चा नहीं की थी। उस दिन जब बात चली तो शतायु के करीब हुए वे वृद्ध खतिहान खोलकर बैठ गए। इतिहास खुलना शुरू हुआ तो कई भ्रम एक साथ टूट गए। पता चला कि यह चापाकल पहली बार वहाँ गड़ा भी नहीं था, जहाँ इसे मैंने देखा था। यानी मेरे पैदा होने से पहले भी इसने जगह बदली थी। उन्होंने जो जगह बताई, जमीन का वो टुकड़ा अब मेरे हिस्से में है और मेरे परदेस रहने के कारण वहाँ जंगल है। इसकी पुष्टि मेरे पिता सहित वहाँ मौजूद उन सभी लोगों ने की जो जीवन के छठे या सातवें दशक में हैं। उस वृद्ध ने बताया कि इस चापाकल को गाड़ने के लिए लोग कलकत्ता से आए थे। सारे सामान भी वहीं से आए थे। किसी कारणवश फिल्टर लाना लोग भूल गए। चापाकल को गाड़ने से पहले फिल्टर की स्थानीय बाजार में तालाश शुरू हुई। कई बाजार घूमने के बाद जयनगर में फिल्टर मिला था।

फिर उन्होंने इसे गाड़ने का जो तरीका बताया वो सुनकर बेहद श्रमसाध्य लगा। करीब तीन दशक पहले जैसे चापाकल को गड़ते देखा था उससे भी कठिन। आजकल तो ये फटाफट का काम ही समझ लीजिए। उनके अनुसार उस समय चापाकल को गड़ते देखने के लिए दूर-दूर से लोग आए थे।

गाँव का वो बल्ब, जिसकी वजह से चापाकल का इतिहास सामने आया

फिर भी यह विश्वास नहीं हो रहा था कि यह पहला चापाकल होगा। मैंने आसपास के कुछ पुश्तैनी अमीरों के नाम लिए। पता चला कि इनके यहाँ चापाकल तो साठ और सत्तर के दशक के लोगों ने लगते देखा है। फिर परजुआर के एक पुराने धनाढ्य रमाकांत झा की चर्चा हुई। उन शतायु बुजुर्ग ने बताया कि तीन साल लगातार सूखा पड़ा था। सारे कुएँ-तालाब सूख गए थे। मेरे गाँव का बड़का पोखर, जिसे मैंने अपने पूरे जीवन लबालब भरा ही देखा है, के लिए बताया कि सूख कर उसमें मोटी-मोटी दरारें हो गईं थी। उस वक्त रमाकांत झा का हाथी इस चापाकल के पास लाया जाता था। बाल्टी भर-भर कर उसके साथ आए नौकर उसे पानी पिलाते थे। इस घटना के बाद उन्होंने भी चापाकल गड़वाया था। इसके लिए भी लोग कलकत्ता से ही बुलवाए गए थे। फिर आसपास के गाँवों के कुछेक लोगों के नाम आए और पता चला कि इनलोगों के यहाँ भी चापाकल उसी समय गड़ा था। कलकत्ता से आए वे कारीगर तब कई महीने तक इसी इलाके में रुके थे।

उन बुजुर्ग से पूछा कि ये कब की बात रही होगी तो उन्हें साल याद नहीं था। खैर साल तो उन्हें अपने पैदा होने का भी पता नहीं। जब पहली बार चापाकल गड़ा था तब वे खुद के 5-6 साल के होने का दावा करते हैं। गाँव में उनकी उम्र को लेकर जो अनुमान है और इस चापाकल को लेकर उन्होंने जो दावे किए उससे यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह चापाकल अपने उम्र के 90वें दशक में है। 75 साल के इसके होने में तो कोई संदेह ही नहीं दिखता, क्योंकि लाल कक्का का कहना है कि उनको जब से समझ है उन्होंने इस चापाकल को देखा है। हालाँकि इसके कल-पुर्जे बदलते कई बार मैंने भी देखे हैं। अब ‘विकास’ की वजह से इसे हैंडल मारने वाला भी कोई नहीं है। उपेक्षित पड़ा है।

हम देश की स्वतंत्रता के 75वें वर्ष में प्रवेश करने जा रहे हैं। इस चापाकल ने गुलामी का वो दौर देखा है। इस चर्चा से यह एहसास हुआ कि हम अपनी स्मृतियों में बेवजह बहुत सारी अच्छी चीजों का श्रेय कॉन्ग्रेस को देकर बैठे हैं, जबकि उसका इससे दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है। इतिहास को केवल पाठ्यपुस्तकों में ही दुरुस्त करने की जरूरत नहीं है। स्मृतियों के तथ्यों को भी खँगालने की जरूरत है।

5 पीढ़ियों का गला तर कर चुका ये चापाकल असल में 8 भाइयों में से उस एक के पुरुषार्थ का नतीजा था, जिसने दशकों पहले परिवार के लिए कलकत्ता जाने और वहाँ अपने ज्योतिष ज्ञान का उपयोग करने का फैसला किया था और मेरी यादों में अल्पज्ञान की वजह से कॉन्ग्रेस बरसों से इसका क्रेडिट लिए बैठी थी।

दिल्ली पुलिस ने अश्विनी उपाध्याय समेत 6 को गिरफ्तार किया, 6 घंटे चली पूछताछ: अमानतुल्लाह खान ने भी की थी शिकायत

जंतर-मंतर पर हुए विरोध प्रदर्शन के बाद दिल्ली पुलिस ने भाजपा नेता व सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय समेत 6 लोगों को गिरफ्तार कर लिया है। उस कार्यक्रम के एक वायरल वीडियो के आधार पर आरोप लगाया गया था कि विरोध प्रदर्शन के दौरान मुस्लिम विरोधी नारेबाजी की गई। AAP विधायक अमानतुल्लाह खान ने भी इस मामले में पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। उन्होंने इस बात पर आपत्ति जताई थी कि FIR अज्ञात लोगों के खिलाफ क्यों हुई है।

दिल्ली पुलिस ने बड़ी कार्रवाई करते हुए मंगलवार (10 अगस्त, 2021) को अश्विनी उपाध्याय को गिरफ्तार किया। उनके अन्य सहयोगियों विनोद शर्मा, दीपक सिंह, दीपक, विनीत क्रांति और प्रीत सिंह को भी पुलिस ने गिरफ्तार किया है। प्रीत सिंह, सेव इंडिया फाउंडेशन का निदेशक है, जिसके बैनर तले 8 अगस्त को जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया था। दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच इस मामले को देख रही है।

इन सभी से लगभग 6 घंटे तक पूछताछ चली, जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया। सुबह के तड़के 3 बजे ही अश्विनी उपाध्याय थाने पहुँचे थे। अश्विनी उपाध्याय ने अपनी सफाई में कहा था कि वो उस आंदोलन में कई अन्य लोगों की तरह गए थे, इसीलिए आपत्तिजनक नारेबाजी करने वालों से उनका कोई सरोकार नहीं है। उन्होंने जाँच में पूरा सहयोग का आश्वासन देते हुए कहा था कि उनकी तबीयत ठीक नहीं है।

‘भारत छोड़ों आंदोलन’ की वर्षगाँठ पर जंतर-मंतर पर ‘भारत जोड़ो आंदोलन’ का आयोजन किया गया था, जिसमें हजारों लोग पहुँचे थे। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने इस आंदोलन के खिलाफ आवाज़ उठाने के लिए आज शाम को एक और प्रदर्शन की योजना बनाई है। दिलीप मंडल ने भी ट्विटर पर अश्विनी उपाध्याय को गिरफ्तार किए जाने की माँग की थी। उपाध्याय ने कहा था कि वीडियो में दिख रहे लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हो, वो उन्हें नहीं जानते।

उन्होंने दिल्ली पुलिस को भेजे गए पत्र में लिखा था, “सोशल मीडिया में एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें एक व्यक्ति उन्मादी भाषण दे रहा है। कुछ लोग मुझे बदनाम करने के लिए मेरा नाम लेकर यह वीडियो ट्विटर फेसबुक और व्हाट्सएप्प पर शेयर कर रहे हैं जबकि वीडियो में दिख रहे लोगों को न तो मैं जानता हूँ, न तो इनमें से किसी से मिला हूँ और न तो इन्हें बुलाया गया था। कानून बहुत ही घटिया और कमजोर है इसीलिए प्रसिद्धि पाने के लिए भी कई बार लोग उन्मादी वीडियो जारी करते हैं।”

कॉन्ग्रेसी नेता के सोशल मीडिया पर समलैंगिक पोर्न वाली फोटो, बाद में कहा – ‘अकाउंट हैक हो गया था’

कॉन्ग्रेस नेता भाई जगताप के फेसबुक अकाउंट पर समलैंगिक पोर्न इमेज शेयर की गई। बाद में इसे हटा भी लिया गया। फिर इसके बाद कॉन्ग्रेस नेता ने फेसबुक पर एक नई पोस्ट में विक्टिम कार्ड खेला। उन्होंने दावा किया कि उनका अकाउंट किसी ने हैक कर लिया था। यह भी बताया कि साइबर एक्सपर्ट की मदद से उसे फिर से रिस्टोर कर लिया गया है।

कॉन्ग्रेस नेता ने लिखा, “कृपया इनबॉक्स में संदेशों को अनदेखा करें, जैसा कि कई यूजर्स दावा कर रहे हैं क्योंकि यह वायरस के कारण हुआ हो सकता है।” जगताप ने आगे कहा कि कुछ घटिया मानसिकता वाले लोगों ने ये हरकत की है और वो उन सभी को कानून के कटघरे में लाएँगे।

साभार: भाई जगताप का फेसबुक

कॉन्ग्रेस नेता भाई जगताप के फेसबुक अकाउंट के जरिए एक अश्लील तस्वीर शेयर करने के बाद उन्हें खासी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा। दरअसल, भाई जगताप के अकाउंट से सबसे पहले अगस्त क्रांति कार्यक्रम की तस्वीरों को साझा किया गया लेकिन इसके बाद मुखमैथुन में लिप्त मर्दों के एक समूह की तस्वीर भी साझा की गई।

भाई जगताप के फेसबुक पर समलैंगिक पोर्न इमेज

पोर्न फिल्म की तस्वीरों को फेसबुक अकाउंट पर पोस्ट होने के तुरंत बाद कई सोशल मीडिया यूजर्स ने उन्हें टैग किया कि उन्होंने अगस्त क्रांति कार्यक्रम से अपनी इमेज के साथ ही एक समलैंगिक-कामुक तस्वीर भी साझा की है। इसके थोड़ी देर बाद पोस्ट को डिलीट कर दिया गया। हालाँकि, तब तक काफी देर हो चुकी थी और सोशल मीडिया यूजर्स ने इसके स्क्रीनशॉट्स ले लिए थे। सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में इसे फिर से शेयर किया गया है।

इसके बाद कॉन्ग्रेसी नेता भाई जगताप ने दावा किया कि उनके अकाउंट को हैक कर लिया गया था। उन्होंने इसे ऑनलाइन की गई गलती बताकर खुद को इससे अलग कर लिया। ऐसा इससे पहले भी कई बार हो चुका है, ऐसे में कोई भी अनुमान लगा सकता है कि हकीकत में उनका फेसबुक अकाउंट हैक हुआ था या उन्होंने केवल शर्मिंदगी से बचने के लिए ऐसा किया है।

गाजियाबाद के डासना मंदिर में चाकुओं से जानलेवा हमला, दो साधु अस्पताल में भर्ती: बगल के कमरे में सो रहे थे महंत नरसिंहानंद

गाजियाबाद एक ऐसा इलाका है, जो राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से सटा हुआ है। लेकिन, इसके बावजूद यहाँ डासना में स्थित शिव-शक्ति धाम पर खतरा कम नहीं हो रहा है। अब इस मंदिर में फिर से दो साधुओं पर चाकुओं से हमले की घटना सामने आई है। दोनों साधुओं पर जानलेवा हमले के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ उनका इलाज चल रहा है। घटना की सूचना के बाद मंदिर प्रबंधन सहित आसपास के हिन्दुओं में भी आक्रोश का माहौल है।

‘दैनिक जागरण’ की खबर के अनुसार, मसूरी थाना क्षेत्र के डासना देवी मंदिर परिसर में सो रहे साधुओं पर चाकुओं से हमला किया गया। मंगलवार (10 अगस्त, 2021) को तड़के सुबह 4 बजे हुई इस घटना में दोनों साधु बुरी तरह घायल हो गए। पुलिस इस मामले की जाँच कर रही है, लेकिन लोगों ने मंदिर की सुरक्षा-व्यवस्था पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं, वो भी तब ये ये पीठ पहले से ही आतंकियों व इस्लामी कट्टरपंथियों के निशाने पर रहा है। 

घायल साधुओं में से एक नरेशानंद कुछ दिनों पहले ही बिहार से आए थे और यहाँ प्रवास कर रहे थे। वो समस्तीपुर के रहने वाले हैं। हमलावरों का कुछ पता नहीं चल सका है। चाकुओं से ताबड़तोड़ वार करने के बाद वो वहाँ से फरार हो गए थे। डासना पीठ वही है, जहाँ के मुख्य महंत यति नरसिंहानंद सरस्वती हैं। उन पर भी इससे पहले हमले की कोशिश हो चुकी है। वो अपने बयानों की वजह से अक्सर चर्चा में रहते हैं।

खतरों व पुरानी घटनाओं के कारण 24 घंटे मंदिर और पुजारियों की सुरक्षा के लिए पुलिस का पहरा रहता है, इसके बावजूद इस तरह का हमला होना लोगों के आक्रोश का कारण बन रहा है। पुलिस CCTV फुटेज खँगाल रही है। महंत यति नरसिंहानंद सरस्वती भी इस हमले के समय मंदिर परिसर में ही मौजूद थे और अपने कमरे में सो रहे थे। यशोदा अस्पताल में दोनों साधुओं का इलाज कराया जा रहा है।

‘दैनिक भास्कर’ के पत्रकार सचिन गुप्ता ने सोशल मीडिया के माध्यम से जानकारी दी है कि पुलिस को डासना देवी मंदिर से दो पेपर कटर मिले हैं। संभवतः इन्हीं से साधुओं पर हमला हुआ। मंदिर परिसर के CCTV बंद मिले हैं। मंदिर गेट पर 24 घंटे तैनात रहने वाली पुलिस पिकेट को 15 मिनट बाद इस हमले की सूचना अंदर से दी गई। उन्होंने एक घायल साधु की तस्वीर भी शेयर की, जिन्हें खून से लथपथ देखा जा सकता है।

वहीं महंत यति नरसिंहानंद सरस्वती के करीबी अनिल यादव ने इस घटना पर बयान देते हुए कहा, “हमला करने वाले इस्लामी जिहादी हैं। वह पहले भी कई बार मंदिर में घुस चुके हैं। रात महंत यति नरसिंहानंद सरस्वती नहीं मिले तो दूसरे स्वामीजी पर हमला कर दिया।” घायल नरेशानंद महंत यति के शिष्य हैं। मंदिर प्रबंधन के लोगों का कहना है कि ये लोग महंत यति की हत्या के इरादे से ही आए थे।

लेखक संदीप देव ने बताया कि ‘जंतर मंतर’ पर हुए आंदोलन में भाग लेने के लिए समस्तीपुर से स्वामी नरेशानंद जी आए थे। उन्होंने बताया, ” चूँकि मैं गृहस्थ हूँ, अतः मैंने उनके रुकने का प्रबंध यति नरसिंहानंद जी के डासना मंदिर में करवाया था। एक मजहबी समूह ने मंदिर में घुसकर सोए हुए नरेशानंद जी को चाकुओं से गोद दिया। अपराधियों ने भगवा वस्त्र के कारण शायद उन्हें यति नरसिंहानंद समझ कर हमला किया है।”

बता दें कि हाल ही में राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) को गाजियाबाद के डासना मंदिर के महंत यति नरसिंहानंद सरस्वती के खिलाफ संबंधित धाराओं में प्राथमिकी दर्ज करने का निर्देश दिया था। यह निर्देश उनके कथित भाषण का वीडियो ट्विटर पर वायरल होने के बाद आया था। वीडियो में यति नरसिंहानंद ने कहा था, “ज्यादातर कॉलगर्ल हिंदू महिलाएँ होती हैं। ये वो महिलाएँ होती हैं, जो प्रेम के चक्कर में जेहादी मुस्लिमों के चंगुल में फँसकर अपनी फोटो खिंचवा बैठती हैं।”

झारखंड के जिस SDM ने छात्राओं को दौड़ा-दौड़ा कर लाठी से पीटा, गाली दी… उस पर वसूली व जमीन धांधली के भी आरोप

झारखंड के धनबाद में प्रस्थापित SDM (सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट) सुरेंद्र कुमार पर छात्राओं पर लाठीचार्ज के आरोप लगे हैं। धनबाद कलेक्ट्रेट में पुलिस ने राज्यमंत्री बन्ना गुप्ता के समक्ष ही विरोध प्रदर्शन कर रही छात्राओं पर लाठियाँ बरसाई। 6 जुलाई की इस घटना के दौरान खुद SDM सुरेंद्र कुमार को लाठी लेकर लड़कियों को पीटते हुए देखा गया। जब इस घटना का विरोध हुआ तो जाँच की बात कह के इतिश्री कर ली गई।

बता दें कि झारखंड में हेमंत सोरेन के नेतृत्व में झामुमो व कॉन्ग्रेस गठबंधन की सरकार चल रही है। मीडिया में भी इस खबर को दबा दिया गया, जिससे इसके बारे में ज्यादा बात ही नहीं हुई। SDM सुरेंद्र कुमार पर आरोप है कि उन्होंने बेवजह और बिना चेतावनी दिए ही इंटर की छात्राओं पर लाठियाँ चटकाई। भाजपा समेत कई विपक्षी दलों ने राज्य सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। बन्ना गुप्ता के निर्देश के बाद उपयुक्त संदीप कुमार ने एक जाँच समिति बनाई।

धनबाद के SDM सुरेंद्र कुमार का विवादों से पुराना नाता रहा है। इससे पहले भी उन पर वसूली के आरोप लगे थे। उनके खिलाफ तब भी जाँच बिठाई गई थी। जाँच रिपोर्ट राज्य सरकार के पास भी भेजी गई, लेकिन कार्रवाई के नाम पर कुछ नहीं हुआ। अब फिर से समिति बनाई गई है। 3 दिन में जाँच पूरी कर लिए जाने की बात कही जा रही है। कार्रवाई का आश्वासन भी मिला है। दरअसल, ये पूरा मामला झारखंड बोर्ड के 12वीं के परिणामों से जुड़ा है।

जो छात्राएँ इस परीक्षा में फेल कर दी गई हैं, उन्होंने आंदोलन छेड़ रखा है। पिछले 10 दिनों से वो सड़क पर हैं। इसी बीच उन्हें स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता के धनबाद समाहरणालय में आने की सूचना मिली थी, जिसके बाद वो वहाँ उनसे मिल कर अपनी बात रखने के लिए जमा हो गईं। अधिकारियों ने उन्हें मंत्री से मिलवाने से इनकार कर दिया तो प्रदर्शनकारी छात्राएँ वहीं धरने पर बैठ गईं। इसी बीच SDM सुरेंद्र कुमार ने लाठीचार्ज शुरू कर दिया। कई छात्राएँ घायल हुईं।

अंदर मंत्री बैठक करते रहे, बाहर SDM सुरेंद्र कुमार और उनके निर्देश पर पुलिसकर्मी छात्राओं को दौड़ा-दौड़ा कर पीटते रहे। कइयों को तो अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। पुलिस ने 10 छात्राओं को हिरासत में भी ले लिया। विरोध में अगले दिन ABVP ने बंद का आह्वान किया था। SDM सुरेंद्र कुमार पर आरोप है कि उन्होंने न सिर्फ छात्राओं को लाठी से पीटा, बल्कि उनके हाथ पकड़ कर खींच दिए और कंधा पकड़ कर नीचे ठेल दिया।

छात्राओं का कहना था कि अधिकारी ने उन्हें गालियाँ भी दीं। लाठीचार्ज के बाद मौके पर कई छात्राओं के पर्स व पर्स व चप्पल वहाँ छूट गए। महिला पुलिसकर्मियों तक को नहीं बुलाया गया था, पुरुष पुलिसकर्मी ही लाठीचार्ज करते रहे। जमीन पर गिरी छात्राएँ किसी तरह वहाँ से भागने लगीं। एक छात्रा की माँ को भी पुलिस ने हिरासत में ले लिया। दो बेहोश छात्राओं को गाड़ी से अस्पताल पहुँचाना पड़ा। किसी के हाथ जख्मी थे तो किसी की पीठ पर निशान बन गए थे।

भाजपा और ABVP (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद) इस घटना को लेकर खासा मुखर है। इससे पहले यही अधिकारी सरकारी जमीन की बंदोबस्ती मामले में फँसे थे। नवंबर 2020 में उनके खिलाफ जाँच बिठाई गई थी। उन पर सरकारी जमीन को बंदोबस्त करने और कब्जा कराने का आरोप था, जिसके बाद राजस्व विभाग ने जाँच की अनुशंसा की थी। आरोप था कि उनके कार्यकाल में सैकड़ों एकड़ सरकारी जमीन व वन भूमि की रसीद काटी गई।

इसी में से एक 35 एकड़ भूमि की रसीद उर्मिला बजाज के नाम से काटी गई थी। जिस जमीन की रसीद कटी, वो सरकारी जमीन थी। बालीडीह टोल प्लाजा के समीप आदिवासी खाते की जमीन की रसीद भी काट डाली गई थी। इतनी सारी गड़बड़ियाँ मिलने के बाद सरकार ने जमीन की जमाबंदी को रद्द करने की कार्रवाई शुरू कर दी थी। कठोर कार्रवाई की बात तो कही गई, लेकिन अब तक उनके खिलाफ कुछ नहीं हुआ।

हसनंबा मंदिर: जलता दीपक, ताजे फूल और प्रसाद… 1 साल बाद भी उसी रूप में… चमत्कार जो खटक रहे क्रिश्चियन मिशनरी को

चमत्कार अक्सर तर्कों और तथ्यों से परे होते हैं। ये भक्तों के विश्वास और उनकी आस्था का जीता-जागता प्रमाण हैं। भारत में कई ऐसे स्थान हैं, जो अपनी चमत्कारी प्रवृत्ति और अविश्वसनीय मान्यताओं के लिए प्रसिद्ध हैं। ऐसा ही एक स्थान कर्नाटक के हासन जिले में है, जो अपने चमत्कारों के लिए ही पूरे भारत में विख्यात है। इस मंदिर में श्रृद्धालुओं की भक्ति इतनी प्रगाढ़ है कि क्रिश्चियन मिशनरियों द्वारा किए गए लगातार प्रयासों के बाद भी भक्तों का विश्वास उसी तरह बना हुआ है, जैसे सदियों पहले था। हम बात कर रहे हैं हसनंबा मंदिर की जो दीपावली के समय खुलता है और फिर एक साल के लिए फिर बंद हो जाता है।

मंदिर का इतिहास

मंदिर के विषय में पौराणिक मान्यता कई युगों पहले भगवान शिव से जुड़ी हुई है। एक राक्षस था, अंधकासुर नाम का। इसने भीषण तपस्या करके ब्रह्मा जी से अदृश्य होने का वरदान प्राप्त कर लिया था। ऐसा वरदान पाकर अंधकासुर ने चारों ओर अत्याचार मचा दिया। ऐसे में भगवान शिव ने अंधकासुर का अंत करने का बीड़ा उठाया। लेकिन ब्रह्मा जी के वरदान के कारण उन्हें अंधकासुर से कड़ा संघर्ष करना पड़ा। तब भगवान शिव ने अपनी शक्तियों से योगेश्वरी को उत्पन्न किया, जिन्होंने अंधकासुर का नाश कर दिया।

योगेश्वरी के साथ आईं थीं 7 देवियाँ, जिन्हें सप्तमातृका कहा गया। ये सप्तमातृकाएँ थीं, ब्राह्मी, महेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इंद्राणी और चामुण्डी। ये सातों देवियाँ दक्षिणी भाग से काशी की ओर आ रही थीं लेकिन मार्ग में उन्हें एक स्थान इतना सुंदर लगा कि उन्होंने वहीं निवास करने का निर्णय लिया। यही स्थान हासन है। इन सातों देवियों में से वैष्णवी, महेश्वरी और कौमारी ने चींटियों की बाम्बी में रहना पसंद किया। चामुंडी, वाराही और इंद्राणी पास ही स्थित कुंड में रहने लगीं और ब्राह्मी केंच्चम्मना होसकोटे में।

मंदिर के निर्माण और गर्भगृह में मूर्ति स्थापना के विषय में कोई पुख्ता जानकारी नहीं है लेकिन जिस प्रकार की मंदिर की संरचना और वास्तुकला है, उससे यह अंदाजा लगाया जाता है कि हसनंबा मंदिर होयसल वंश के राजाओं द्वारा 12वीं शताब्दी में बनवाया गया। हालाँकि मंदिर के मुख्य द्वार पर स्थित गोपुरम 12वीं शताब्दी के बाद बनाया गया है।

हसनंबा मंदिर से जुड़ी प्रथा और उसका चमत्कार

यह मंदिर अपनी रोचक प्रथाओं के लिए जाना जाता है। हिन्दू कैलेंडर के अनुसार प्रत्येक अश्विन मास के पहले गुरुवार को यह मंदिर एक सप्ताह के लिए ही श्रृद्धालुओं के लिए खोला जाता है। इस दौरान हसनंबा जात्रा महोत्सव मनाया जाता है। मंदिर के कपाट खुलने पर देश के कोने-कोने से भक्त माता के दर्शन के लिए आते हैं। इसके बाद आखिरी दो दिनों में मंदिर में विशेष अनुष्ठान का आयोजन होता है, जिस दौरान मंदिर आम श्रृद्धालुओं के लिए बंद रहता है।

हासन जिले में स्थित हसनंबा मंदिर जिस कारण से प्रसिद्ध है, वह है यहाँ होने वाला चमत्कार। दरअसल जब मंदिर के कपाट फिर से बंद किए जाते हैं, तब यहाँ एक दीप जलाया जाता है, माता को ताजे पुष्प अर्पित किए जाते हैं और प्रसाद चढ़ाया जाता है। साल भर बाद जब पुनः इस मंदिर के पट खुलते हैं, तब भी दीपक जलता हुआ ही पाया जाता है। माता को अर्पित किए गए पुष्प ताजी अवस्था में मिलते हैं और प्रसाद के रूप में अर्पित किया गया पकाया चावल भी पवित्र रूप में मिलता है।

माता हसनंबा के भक्त इसे चमत्कार ही मानते हैं लेकिन कई प्रगतिवादी और सुधारवादी समाजसेवी चाहते हैं कि मंदिर के चमत्कारों का सच सामने लाया जाए। इसके लिए समय-समय पर प्रयास होता रहता है। दलित संघर्ष समिति के प्रतिनिधि, सीपीएम नेताओं के साथ मिलकर मंदिर के रहस्यों को साबित करने के लिए प्रशासन का सहयोग चाहते हैं लेकिन वहीं दूसरी ओर भक्तों का यह मानना है कि क्रिश्चियन मिशनरियाँ मंदिर के महत्व को समाप्त करने के लिए उसकी प्रथाओं को निशाना बना रही हैं। लेकिन भक्तों की आस्था भी अडिग है और संसार में सबको जीता जा सकता है लेकिन एक भक्त के विश्वास को नहीं।

कैसे पहुँचें?

हासन पहुँचने के लिए नजदीकी अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट बेंगलुरु है जो यहाँ से लगभग 207 किलोमीटर (किमी) दूर है। इसके अलावा मैसूर हवाईअड्डा मंदिर से लगभग 127 किमी की दूरी है।

हासन रेलमार्ग से बेंगलुरु, मंगलौर, शिवमोग्गा और मैसूर जैसे शहरों से जुड़ा हुआ है। हासन जंक्शन से मंदिर की दूरी मात्र 2.6 किमी है। इसके अलावा सड़क मार्ग से हासन कर्नाटक के सभी बड़े शहरों से जुड़ा हुआ है।

सिखों के 5वें गुरु की जिसने की हत्या, सैफ अली खान-करीना कपूर के दूसरे बेटे का नाम वही: ‘प्रेग्नेंसी बाइबल’ से खुलासा

सैफ अली खान और करीना कपूर ने अपने दूसरे बेटे का नाम ‘जहाँगीर (Jehangir)’ रखा है। इससे पहले करीना कपूर खान के पिता रणधीर कपूर ने बताया था कि बच्चे का नाम ‘जेह (Jeh)’ रखा गया है, लेकिन अब खुलासा हुआ है कि ‘जहाँगीर’ का ही शॉर्ट फॉर्म ‘जेह’ था। बताते चलें कि जहाँगीर एक मुग़ल आक्रांता था, जिसने सिखों के पाँचवें गुरु अर्जुन सिंह की हत्या करवाई थी। वो एक क्रूर बादशाह था।

करीना कपूर और सैफ अली खान के दूसरे बेटे की अब तक कोई तस्वीर नहीं जारी की गई है। जहाँ उनके पहले बेटे तैमूर के जन्म के समय ही उसकी तस्वीर सामने आ गई थी और उसके बाद से वो लगातार मीडिया में बने रहता है, वहीं जहाँगीर के मामले में सैफ-करीना ने सोशल मीडिया पर कोई चेहरे वाली तस्वीर नहीं डाली है। करीना कपूर ने अपने इंस्टाग्राम हैंडल पर एक तस्वीर डाली ज़रूर, लेकिन उसमें चेहरा ढक दिया गया था।

सैफ अली खान की चौथी संतान के नाम का खुलासा प्रेग्नेंसी पर आई करीना कपूर की किताब से हुआ है। ‘लाल सिंह चड्ढा’ की अभिनेत्री ने इस पुस्तक में बताया है कि किस तरह परिवार व काम के बीच उन्होंने संतुलन बिठाया। खबर के अनुसार, इसी किताब में एक तस्वीर के कैप्शन में उन्होंने अपने दूसरे बेटे को ‘जहाँगीर’ कह कर सम्बोधित किया है। सैफ-करीने के पहले बेटे के नाम को लेकर भी विवाद हो चुका है।

बता दें कि इतिहास में तैमूर एक तुर्क-मंगोल आक्रांता आक्रांता था, जिसने भारत में आकर सैकड़ों लोगों को मौत के घाट उतार दिया था और भारी लूटपाट मचाई थी। महिलाओं की इज्जत के साथ खिलवाड़ किया गया था और बच्चों तक को नहीं बख्शा गया था। इसीलिए, लोगों ने बेटे का तैमूर नाम रखने पर सैफ अली खान व करीना कपूर को आड़े हाथों लिया था। दोनों ने अपने इस फैसले का बचाव भी किया था।

करीना कपूर ने अगस्त 2020 में खुद के प्रेग्नेंट होने की घोषणा की थी। उन्होंने 21 फरवरी, 2021 को अपने दूसरे बेटे को जन्म दिया। बॉलीवुड एक्ट्रेस करीना कपूर खान की किताब ‘प्रेगनेंसी बाइबल’ के लॉन्च के बाद ईसाई संगठनों ने विरोध जताया था। ‘अल्फा ओमेगा क्रिश्चियन महासंघ’ ने शिवाजी नगर थाने में शिकायत करवाते हुए माँग की थी कि लेखक के विरुद्ध ईशनिंदा के आरोप में कार्रवाई हो।

15 साल पहले दबाव में मुस्लिम बने 3 परिवारों के 18 सदस्यों ने अपनाया हिंदू धर्म, कहा- अपना धर्म अपना ही होता है

उत्तर प्रदेश के शामली में सोमवार (9 अगस्त) को तीन मुस्लिम परिवारों ने हिंदू धर्म में वापसी की है। कांधला कस्बे के सूरज कुंड मंदिर में पहले इन परिवारों का पूजा-पाठ के साथ शुद्धिकरण किया गया, इसके बाद 18 मुस्लिमों का धर्म परिवर्तन कर उनकी घरवापसी कराई गई। घरवापसी करने वालों में 7 महिलाएँ, 4 पुरुष और 4 बच्चे शामिल हैं।

इन सभी लोगों ने हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार पूजा-अर्चना करने के बाद जनेऊ धारण किया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, 15 साल पहले इन लोगों ने दबाव में आकर मुस्लिम धर्म को अपना लिया था, लेकिन बीतते समय के साथ इन्होंने हिंदू धर्म में वापसी का निर्णय लिया। घरवापसी के बाद इन लोगों ने अपने मुस्लिम नाम का त्याग कर हिंदू नाम रखा।

मंदिर के पुजारी यशवीर महाराज ने घरवापसी करने वाले सभी लोगों को गायत्री मंत्र का उच्चारण कराने के साथ-साथ हवन कराकर शुद्धिकरण किया। महाराज ने कहा कि जीवन में कई बार इंसान से अनजाने में गलतियाँ हो जाती हैं। उसी गलती के कारण इन सभी ने इस्लाम मजहब अपना लिया था, लेकिन आज उन्होंने फिर से हिंदू धर्म अपनाकर घरवापसी की है। इन सभी का सनातन धर्म में स्वागत है।

बता दें कि ये सभी लोग हिंदू धर्म अपनाने के बाद से बेहद खुश नजर आ रहे हैं। हिंदू धर्म अपनाकर शहजाद से विकास बने युवक ने बताया कि करीब 15 साल पहले उन्होंने मुस्लिम धर्म अपना लिया था, लेकिन आज फिर से उन्होंने हिंदू धर्म अपनाकर समाज को संदेश दिया है कि अपना धर्म अपना ही होता है।

PM मोदी को बदनाम करने के लिए TMC उपाध्यक्ष यशवंत सिन्हा ने शेयर की एडिटेड तस्वीर, सोशल मीडिया पर लोगों ने लिया आड़े-हाथ

इस साल मार्च में ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कॉन्ग्रेस (टीएमसी) में शामिल हुए भाजपा के पूर्व नेता यशवंत सिन्हा ने सोशल मीडिया पर अपनी निम्न मानसिकता का परिचय दिया है। उन्होंने केंद्रीय मंत्री व पूर्व खेल मंत्री किरेन रिजूजी द्वारा टोक्यो ओलंपिक में सिल्वर मेडल जीतने वाली मीराबाई चानू को सम्मानित करने के लिए आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान लगाए गए पोस्टर को लेकर पीएम मोदी पर निशाना साधा है। दरअसल, यशवंत सिन्हा ने वेटलिफ्टर मीराबाई चानू के पीछे लगाए गए पोस्टर की फोटो अपने ट्विटर अकाउंट पर साझा की है। इस पोस्टर में चानू को भारत के लिए पदक दिलाने में मदद करने के लिए पीएम मोदी को धन्यवाद दिया गया है।

मोदी विरोधी सिन्हा ने प्रधानमंत्री को बदनाम करने के लिए पोस्टर पर पीएम को धन्यवाद देने वाली लाइन पर ही फोकस किया है। उन्होंने फोटो के साथ लिखा, “कृपया पीछे की फोटो देखिए और जो लिखा है उसे एक बार पढ़िए। मेडल मीराबाई चानू मेहनत करके लाई हैं या मोदी जी ने।” साथ ही उन्होंने कैप्शन में लिखा, ”अगर किसी को ओलंपिक पर मेरे आखिरी ट्वीट पर कोई आपत्ति है तो इस तस्वीर की पृष्ठभूमि में क्या लिखा है कृपया उसे देखें।” सिन्हा ने इस ट्वीट में जिस ‘आखिरी ट्वीट’ का जिक्र किया, उसका मकसद भी प्रधानमंत्री का मजाक उड़ाना था।

फैक्ट चे​क

प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) ने 27 जुलाई को वास्तविक तस्वीर शेयर की गई थी, जहाँ यह स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है कि पोस्टर पर ‘धन्यवाद मोदी जी’ वाली लाइन नहीं हैं।

Source: PIB

पीआईबी ने इवेंट का एक वीडियो भी शेयर किया था, जिसमें पोस्टर साफ नजर आ रहा है।

दिलचस्प बात यह है कि 26 जुलाई को कार्यक्रम होने के बाद इंडिया टुडे ने भी इस खबर को कवर किया था। इस मीडिया हाउस ने भी टोक्यो ओलंपिक के लिए मीराबाई चानू को सम्मानित करते हुए वास्तविक पोस्टर का फोटो के रूप में इस्तेमाल किया था।

इंडिया टुडे की रिपोर्ट में यही तस्वीर है

इंडिया टुडे द्वारा 26 जुलाई को प्रकाशित रिपोर्ट की तस्वीरों को गौर से देखा जाए तो बैकग्राउंड पोस्टर पर ‘धन्यवाद मोदी जी’ का कोई संदेश नहीं दिख रहा है। इससे स्पष्ट है कि यह टीएमसी नेता की पीएम मोदी के लिए नफरत ही है, जो उन्हें बदनाम करने के लिए मॉर्फ्ड फोटो (morphed photo) का इस्तेमाल किया गया।

उसी संपादित फोटो को राष्ट्रीय लोक दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयंत चौधरी ने भी साझा किया था। उन्होंने लिखा, ”पदक विजेता का अभिनंदन तो ठीक है, लेकिन ‘धन्यवाद मोदी जी मेडल दिलाने के लिए’ कुछ ज़्यादा नहीं हो गया? भक्ति, चापलूसी और प्रोपगेंडा में खिलाड़ी का अपमान तो मत करो!”

हालाँकि, दोनों में केवल यह अंतर है कि जयंत चौधरी ने अनजाने में संपादित की गई फोटो को साझा करने के लिए माफी माँगी है। वहीं, यशवंत सिन्हा ने माफी माँगने की भी जहमत नहीं उठाई।