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13000+ प्रॉपर्टी, कीमत ₹1 लाख करोड़… जानिए क्या होती है शत्रु संपत्ति, कैसे हड़पना चाहता था वक्फ बोर्ड: यदि कॉन्ग्रेस सांसदों की चलती तो आज नीलाम नहीं हो पाती परवेज मुशर्रफ की जमीन

उत्तर प्रदेश के बागपत में 2 दिन पहले पाकिस्तान के पूर्व तानाशाह परवेज मुशर्रफ की जमीन सरकार ने नीलाम कर दी। कुछ दिन पहले उत्तराखंड में राजा महमूदाबाद की संपत्ति को सरकार ने पार्किंग प्लेस में बदल दिया, तो बीते साल दिसंबर में पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान की संपत्ति (जिसमें 1918 में बनी मस्जिद भी शामिल थी) को कोर्ट के आदेश के बाद सरकार ने अपने कब्जे में ले लिया।

इस जमीन को लेकर दावा किया गया था कि देश की आजादी से पहले ही इसे वक्फ कर दिया गया था, जो दावा फर्जी निकला। ऐसे में मस्जिद होने और वक्फ के दावे के बावजूद ये जमीन सरकार को मिली, क्योंकि ये जमीन एनिमी प्रॉपर्टी (शत्रु संपत्ति) के दायरे में आती थी।

तीनों मामलों को देखें तो इनमें एक लिंक कॉमन था। वो था शत्रु संपत्ति का होना और अब ऐसी संपत्तियों को भारत सरकार अपने हितों के मुताबिक इस्तेमाल कर सकती है। ऐसा इसलिए हो पाया, क्योंकि साल 2017 में मोदी सरकार एक कानून लाई थी, जिसका नाम शत्रु संपत्ति (संशोधन और सत्यापन) विधेयक 2016 था। इस कानून के मुताबिक, सिर्फ दुश्मन देश में गया व्यक्ति ही नहीं, दुश्मन देश गए व्यक्ति के वारिस भी दुश्मन की श्रेणी में आएँगे और वो दुश्मन संपत्ति यानी शत्रु संपत्ति पर कोई दावा नहीं कर पाएँगे।

मोदी सरकार के इस कदम से देश भर की 13 हजार से अधिक संपत्तियाँ, जिनकी कीमत 1 लाख करोड़ रुपए से अधिक है, वो अब सरकार की होंगी। इस बारे में आगे विस्तार से बताएँगे… फिलहाल ये बता दें कि मोदी सरकार जो वक्फ संसोधन कानून लेकर आई है, जिसमें भी एविक्टी (शत्रु संपत्ति) पर वक्फ के दावों को नकार दिया गया है। इसका असर दूरगामी है।

मोदी सरकार ने दोनों कानून लाकर वो काम किया है, जो कॉन्ग्रेस की पूर्ववर्ती सरकारें तमाम वजहों से करने से बचती रही हैं। कॉन्ग्रेस का जिक्र आया ही है और शत्रु संपत्ति के मामले में, तो एक अहम जानकारी आपको जो होनी चाहिए- वो दे देते हैं। लेकिन उससे पहले बताते हैं कि आखिर शत्रु संपत्ति है क्या और कैसे मोदी सरकार वो कानून लेकर आई, जिसे न लाकर कॉन्ग्रेस नीत यूपीए सरकार ने हजारों करोड़ की संपत्ति देश के दुश्मनों के वारिसों दे दी थी।

शत्रु संपत्ति क्या है?

शत्रु संपत्ति वो संपत्तियाँ हैं, जो उन लोगों के पास थीं, जिन्होंने 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान या 1962 (चीन के साथ युद्ध), 1965 और 1971 (पाकिस्तान के साथ युद्ध) के बाद भारत छोड़कर पाकिस्तान या चीन की नागरिकता ले ली। भारत सरकार ने इन्हें ‘शत्रु’ माना, क्योंकि ये लोग उन देशों के साथ चले गए, जो भारत के खिलाफ युद्ध में थे। ऐसी संपत्तियों को जब्त करने का मकसद था कि इनका इस्तेमाल देश की सुरक्षा और विकास के लिए हो।

शत्रु संपत्ति अधिनियम 1968 के तहत इन संपत्तियों की देखरेख के लिए कस्टोडियन ऑफ एनिमी प्रॉपर्टी फॉर इंडिया (CEPI) बनाया गया, जो गृह मंत्रालय के अधीन काम करता है। देश भर में ऐसी 13,252 संपत्तियाँ हैं, जिनमें से 12,485 पाकिस्तानी नागरिकों और 126 चीनी नागरिकों की हैं। इनकी कुल कीमत 1.04 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा है। इसमें भी सबसे ज्यादा संपत्तियाँ उत्तर प्रदेश (6,255) और पश्चिम बंगाल (4,088) में हैं।

उदाहरण के लिए, मुजफ्फरनगर में पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान की आठ बिसवा जमीन थी, जिस पर मस्जिद और दुकानें बनी थीं। जाँच में पाया गया कि ये शत्रु संपत्ति थी। इसी तरह भोपाल में नवाब हमीदुल्लाह खान की बेटी आबिदा सुल्तान (जो 1950 में पाकिस्तान चली गई थीं) की संपत्तियाँ- जैसे फ्लैग स्टाफ हाउस और नूर-उस-सबाह पैलेस (कीमत 15,000 करोड़ रुपये से ज्यादा) भी शत्रु संपत्ति घोषित हुईं। परवेज मुशर्रफ की बागपत में 13 बीघा जमीन को 2024 में 1.38 करोड़ रुपये में नीलाम किया गया। ये सारी संपत्तियाँ भारत सरकार के कब्जे में हैं, ताकि इनका दुरुपयोग न हो।

शत्रु संपत्ति और वक्फ का टकराव

अब सवाल ये है कि शत्रु संपत्ति और वक्फ संपत्ति का आपस में क्या झगड़ा है? दरअसल, कई बार ऐसा हुआ कि जो संपत्तियाँ शत्रु संपत्ति थीं, उन्हें वक्फ बोर्ड ने अपने कब्जे में लेने की कोशिश की। इसका सबसे बड़ा कारण 1984 और 1995 के वक्फ कानूनों में कुछ खामियाँ थीं।

1984 में इंदिरा गाँधी सरकार ने वक्फ कानून में एक संशोधन किया, जिसके तहत ‘इवैक्यूई प्रॉपर्टी’ (यानी वो संपत्तियाँ जो विभाजन के दौरान छोड़ी गई थीं) को वक्फ घोषित करने की छूट दी गई। अगर कोई संपत्ति पहले वक्फ थी, लेकिन बाद में शत्रु संपत्ति बन गई, तो उसे फिर से वक्फ में बदला जा सकता था। इसका मतलब ये हुआ कि जो संपत्तियाँ देश छोड़कर गए लोगों की थीं, उन्हें वक्फ बोर्ड अपने नाम कर सकता था।

मोदी सरकार ने साल 2017 में कानून में किया संशोधन: 2017 में शत्रु संपत्ति (संशोधन और सत्यापन) अधिनियम लाया गया, जिसने इस कानून को और सख्त किया। इस संशोधन ने कई अहम बदलाव किए-

शत्रु की परिभाषा का विस्तार: अब शत्रु के वारिस, भले ही वे भारत के नागरिक हों, इन संपत्तियों पर दावा नहीं कर सकते।

कस्टोडियन का मालिकाना हक: शत्रु संपत्ति का मालिक अब कस्टोडियन (भारत सरकार) है।

सिविल कोर्ट की भूमिका खत्म: शत्रु संपत्ति से जुड़े मामले अब सिविल कोर्ट में नहीं, बल्कि खास ट्रिब्यूनल में सुने जाएँगे।

बिक्री की अनुमति: सरकार अब ऐसी संपत्तियों को बेच सकती है, और इसका पैसा देश के खजाने (Consolidated Fund of India) में जाएगा।

राजा महमूदाबाद की हजारों करोड़ की संपत्तियों का मामला

राजा महमूदाबाद, यानी मोहम्मद अमीर अहमद खान एक प्रमुख शिया मुस्लिम परिवार से थे। महमूदाबाद एस्टेट के तहत उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में विशाल साम्राज्य था। उनके अब्बू महाराजा सर मोहम्मद अली मोहम्मद खान ने 1931 में अपनी मृत्यु के बाद विशाल संपत्ति छोड़ी, जिसमें लखनऊ का बटलर पैलेस, हजरतगंज में महमूदाबाद मेंशन, नैनिताल में मेट्रोपोल होटल और सीतापुर में 956 एकड़ जमीन, एक चीनी मिल, पॉलिटेक्निक संस्थान और डिग्री कॉलेज शामिल थे।

मोहम्मद अमीर अहमद खान 1945 में इराक चले गए और 1957 में पाकिस्तानी नागरिकता ले ली। वे मुस्लिम लीग के कोषाध्यक्ष और मोहम्मद अली जिन्ना के करीबी सहयोगी थे, जिन्होंने पाकिस्तान आंदोलन को वित्तीय और राजनीतिक समर्थन दिया। खास बात ये है कि अमीर अहमद खान ने अपनी सारी संपत्तियाँ पाकिस्तान को दान दे दी थी, जो उनके पास थी। लेकिन भारत में उनकी संपत्तियाँ छूटी हुई थी। ऐसे में भारत सरकार ने उनकी संपत्तियों को शत्रु संपत्ति अधिनियम 1968 के तहत जब्त कर लिया

उनके बेटे मोहम्मद अमीर मोहम्मद खान (जिन्हें सुलैमान मियाँ भी कहा जाता था) भारतीय नागरिक थे और उन्होंने 1974 से अपनी पैतृक संपत्तियों को वापस पाने के लिए कानूनी लड़ाई शुरू की। यह लड़ाई 37 साल तक चली, जिसमें जिला अदालत, बॉम्बे हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट शामिल थे। साल 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला दिया, जिसमें कहा गया कि सुलैमान मियाँ भारतीय नागरिक हैं और ‘शत्रु’ नहीं हैं। कोर्ट ने उनकी सभी संपत्तियों को वापस करने का आदेश दिया, जिनकी कीमत उस समय 20,000 से 50,000 करोड़ रुपये बताई गई। इनमें लखनऊ का बटलर पैलेस, हजरतगंज की प्राइम रियल एस्टेट, महमूदाबाद का किला और सीतापुर की विशाल जमीनें शामिल थीं।

संपत्तियाँ लौटाने के खेल में कॉन्ग्रेस सरकार की भूमिका

साल 2005 में जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया, तब केंद्र में मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व में कॉन्ग्रेस नीत यूपीए सरकार थी। इस फैसले ने सरकार को असहज स्थिति में डाल दिया, क्योंकि इतनी विशाल संपत्तियाँ एक ऐसे परिवार को लौटाना, जिसके अब्बा ने पाकिस्तान आंदोलन का समर्थन किया था, राष्ट्रीय सुरक्षा और जनभावना के लिए संवेदनशील मुद्दा था। लेकिन यूपीए सरकार ने इस फैसले को प्रभावी ढंग से लागू करने की दिशा में कदम उठाए। लखनऊ जिला प्रशासन ने 21 दिसंबर 2005 को बटलर पैलेस की चाबी और छह अन्य संपत्तियों के दस्तावेज सुलैमान मियाँ को सौंप दिए।

कॉन्ग्रेस सरकार की इस कार्रवाई की कई वजहें थीं। जिनमें…

  1. सुप्रीम कोर्ट का फैसला लागू करना कानूनी रूप से जरूरी था।
  2. सुलैमान मियाँ खुद 1985 और 1989 में कॉन्ग्रेस के टिकट पर महमूदाबाद से विधायक रह चुके थे, जिससे उनका पार्टी के साथ गहरा रिश्ता था।
  3. उस समय कॉन्ग्रेस की राजनीति में मुस्लिम वोट बैंक को मजबूत करने की रणनीति थी।

कई लोग मानते हैं कि कॉन्ग्रेस ने इस मामले में ढील बरती और सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में मजबूती से अपना पक्ष नहीं रखा, जिसके कारण इतनी बड़ी संपत्तियाँ राजा महमूदाबाद को लौटाने का रास्ता साफ हुआ।

हालाँकि, इस फैसले के बाद भारी विवाद हुआ। कई राजनीतिक दलों खासकर बीजेपी ने इसे राष्ट्रीय हितों के खिलाफ बताया। इसके जवाब में यूपीए सरकार ने 2010 में एक आकस्मिक अध्यादेश (Ordinance) लाने की कोशिश की, जिसमें कहा गया कि शत्रु संपत्तियों पर केवल सरकार का अधिकार होगा। लेकिन यह अध्यादेश संसद में विधेयक के रूप में पेश नहीं हो सका, क्योंकि कॉन्ग्रेस के भीतर और बाहर से दबाव था। इस दबाव में सलमान खुर्शीद की अहम भूमिका थी, जिसने सुप्रीम कोर्ट वाले केस में राजा महमूदाबाद की पैरवी की थी और अगले ही साल वो यूपीए की केंद्र सरकार में कानून मंत्री जैसी हैसियत में था।

सलमान खुर्शीद की पर्दे के पीछे की भूमिका

वरिष्ठ वकील और कॉन्ग्रेस नेता सलमान खुर्शीद उस समय केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री थे। वे राजा महमूदाबाद के वकील के तौर पर सुप्रीम कोर्ट में उनके पक्ष में लड़े। इस केस में उनके सामने पी. चिदंबरम, अरुण जेटली और राम जेठमलानी जैसे दिग्गज वकील थे, जो सरकार की तरफ से थे। खुर्शीद ने तर्क दिया कि सुलैमान मियाँ भारतीय नागरिक हैं और उनके पिता की गतिविधियों के आधार पर उन्हें ‘शत्रु’ नहीं माना जा सकता। उनकी दलीलों ने 2005 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में अहम भूमिका निभाई।

लेकिन सलमान खुर्शीद की भूमिका सिर्फ कोर्टरूम तक सीमित नहीं थी। 2010 में जब यूपीए सरकार ने शत्रु संपत्ति अधिनियम को संशोधित करने के लिए अध्यादेश लाने की कोशिश की, तो खुर्शीद ने इसका विरोध किया। उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात कर एक मुस्लिम सांसदों के समूह का नेतृत्व किया, जिसमें लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव और मोहम्मद अदीब जैसे नेता शामिल थे। इस समूह ने तर्क दिया कि शत्रु संपत्ति कानून में संशोधन ‘मुस्लिम विरोधी’ है और इससे भारतीय मुस्लिम समुदाय की भावनाएँ आहत होंगी।

खुर्शीद की अगुआई में इस दबाव के चलते अध्यादेश को संसद में विधेयक के रूप में पेश नहीं किया गया। इसके अलावा अध्यादेश में एक प्रावधान था कि शत्रु संपत्ति के वारिस को 120 दिनों के भीतर अपनी भारतीय नागरिकता साबित करनी होगी। लेकिन जब विधेयक तैयार हुआ, तो इस प्रावधान को हटा दिया गया, जिससे शत्रु संपत्तियों पर दावे आसान हो गए। कई विश्लेषकों का मानना है कि खुर्शीद ने अपनी कानूनी और राजनीतिक पहुँच का इस्तेमाल कर राजा महमूदाबाद के पक्ष में माहौल बनाया और कॉन्ग्रेस सरकार को इस मामले में नरम रुख अपनाने के लिए मजबूर किया।

इसके पीछे की वजहें थीं, जिसमें…

  1. सलमान खुर्शीद का कॉन्ग्रेस में मजबूत प्रभाव और उनकी मुस्लिम समुदाय के बीच लोकप्रियता।
  2. राजा महमूदाबाद का कॉन्ग्रेस से पुराना रिश्ता, क्योंकि सुलैमान मियाँ दो बार कॉन्ग्रेस विधायक रह चुके थे।
  3. यूपीए सरकार की वह रणनीति, जिसमें वह मुस्लिम वोट बैंक को खुश रखना चाहती थी।

इस पूरे मामले में खुर्शीद की भूमिका को साफ तौर पर ‘वोट बैंक की राजनीति’ से जोड़कर देखा जा सकता है, क्योंकि उन्होंने इसे मुस्लिम समुदाय के हितों से जोड़ा, भले ही इसका राष्ट्रीय सुरक्षा पर असर पड़ता।

मोदी सरकार का वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024, शत्रु संपत्तियों को वक्फ बनने से रोकना

मोदी सरकार ने वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024 में शत्रु संपत्तियों को वक्फ बनने से रोकने के लिए कई सख्त कदम उठाए। पुराने वक्फ अधिनियम 1995 में कुछ खामियाँ थीं, जिनके चलते वक्फ बोर्ड मनमाने तरीके से संपत्तियों को वक्फ घोषित कर सकता था। उदाहरण के लिए, धारा 40 के तहत बोर्ड बिना ठोस सबूत के किसी भी संपत्ति को वक्फ बता सकता था और इसे केवल वक्फ ट्रिब्यूनल में चुनौती दी जा सकती थी। इससे कई शत्रु संपत्तियाँ जैसे मुजफ्फरनगर में लियाकत अली खान की जमीन, वक्फ के दावे में फँस गई थीं।

वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024 ने इन खामियों को दूर किया और इन अहम प्रावधानों के जरिए शत्रु संपत्तियों को वक्फ बनने से रोका..

धारा 40 का खात्मा: पुराने कानून में धारा 40 वक्फ बोर्ड को अनियंत्रित शक्ति देती थी। अब इसे हटा दिया गया है, जिससे बोर्ड बिना दस्तावेजी सबूत के किसी संपत्ति को वक्फ नहीं बता सकता। इससे शत्रु संपत्तियों पर वक्फ का दावा करना लगभग असंभव हो गया है। उदाहरण के लिए – भोपाल में नवाब की संपत्तियाँ जो शत्रु संपत्ति हैं, अब वक्फ नहीं बन सकतीं।

केंद्रीय वक्फ संपत्ति पोर्टल: इस विधेयक ने एक केंद्रीय पोर्टल की व्यवस्था की है, जहाँ सभी वक्फ संपत्तियों का रिकॉर्ड पारदर्शी तरीके से रखा जाएगा। इससे केवल वैध दस्तावेजों वाली संपत्तियाँ ही वक्फ मानी जाएँगी। शत्रु संपत्तियों जैसे लियाकत अली खान की जमीन अब वक्फ के नाम पर कब्जा नहीं किया जा सकेगा।

शत्रु संपत्ति को वक्फ में बदलने पर रोक: पुराने कानून की धारा 108 और 108A जो शत्रु संपत्तियों को वक्फ में बदलने की छूट देती थीं, अब खत्म कर दी गई हैं। इससे यह सुनिश्चित हुआ है कि कोई भी शत्रु संपत्ति वक्फ नहीं बन सकती। उदाहरण के लिए -विजयपुरा (कर्नाटक) में 123 एकड़ जमीन पर वक्फ बोर्ड का दावा खारिज हुआ, क्योंकि वह शत्रु संपत्ति थी।

जिला कलेक्टर की जाँच: अब जिला कलेक्टर को वक्फ संपत्तियों की जाँच का अधिकार है। अगर कोई संपत्ति शत्रु संपत्ति निकलती है, तो कलेक्टर उसे वक्फ घोषित होने से रोक सकता है। यह प्रावधान वक्फ बोर्ड की मनमानी को रोकता है।

मुतवल्ली की जवाबदेही: विधेयक में मुतवल्ली (वक्फ संपत्ति के प्रबंधक) की जवाबदेही बढ़ाई गई है। अगर कोई मुतवल्ली रिकॉर्ड नहीं रखता या संपत्ति का दुरुपयोग करता है, तो उसे हटाया जा सकता है। इससे शत्रु संपत्तियों को गलत तरीके से वक्फ बताने की कोशिशें रुकेंगी।

मोदी सरकार ये प्रावधान न करती तो क्या होता?

अगर वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024 में ये प्रावधान न किए जाते तो शत्रु संपत्तियाँ वक्फ बोर्ड के कब्जे में जा सकती थीं। उदाहरण के लिए – महमूदाबाद की संपत्तियाँ, जिनकी कीमत 50,000 करोड़ रुपये से ज्यादा थी, वक्फ के नाम पर जा सकती थीं। इससे न सिर्फ आर्थिक नुकसान होता, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा को भी खतरा हो सकता था, क्योंकि ऐसी संपत्तियों का दुरुपयोग देश के खिलाफ हो सकता था। साथ ही वक्फ बोर्ड की अनियंत्रित शक्तियाँ और बढ़ जातीं, जिससे आम लोगों की संपत्तियों पर भी गलत दावे हो सकते थे। जैसे, विजयपुरा में 123 एकड़ जमीन और मुनंबम (केरल) में कई संपत्तियों पर वक्फ बोर्ड ने दावे किए थे, जो शत्रु संपत्तियाँ थीं।

कॉन्ग्रेस नीत यूपीए सरकार ने 2005 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राजा महमूदाबाद को हजारों करोड़ रुपये की संपत्तियाँ लौटाने में अहम भूमिका निभाई। इस प्रक्रिया में सलमान खुर्शीद की भूमिका निर्णायक थी, जिन्होंने न सिर्फ कोर्ट में सुलैमान मियाँ का पक्ष मजबूती से रखा, बल्कि 2010 में अध्यादेश को कमजोर करने के लिए मुस्लिम सांसदों का नेतृत्व कर सरकार पर दबाव बनाया। लेकिन वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024 और शत्रु संपत्ति (संशोधन) अधिनियम 2017 ने ऐसी संपत्तियों को वक्फ बनने से रोकने के लिए सख्त कदम उठाए।

मोदी सरकार ने राजा महमूदाबाद की संपत्तियों को वापस करने से इनकार कर दिया है। ये मामला कोर्ट में लंबित है और अब मौजूदा कानूनों के तहत इनका वापस राजा महमूदाबाद के वारिसों तक पहुँचना असंभव दिखता है। ऐसे में साफ है कि मोदी सरकार के लाए इन कानूनों ने न सिर्फ वक्फ बोर्ड की मनमानी पर लगाम लगाई, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया कि शत्रु संपत्तियाँ देश के हित में रहें। मोदी सरकार का यह कदम न सिर्फ आर्थिक और कानूनी पारदर्शिता को बढ़ाते हैं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा को भी मजबूत करते हैं।

लग्जरी गाड़ियाँ, पेट्रोल पंप, रेस्टोरेंट-बार, कोठी-जमीन… UP से लेकर देहरादून तक फैला है एक MY जोड़े का करप्शन: जानिए कौन हैं इंस्पेक्टर नरगिस खान, क्या है सपा से कनेक्शन

यूपी पुलिस की एक इंस्पेक्टर नरगिस खान जो कभी मेरठ में महिला थाना प्रभारी थीं, आजकल अपनी ढेर सारी संपत्ति और पुराने विवादों को लेकर खूब चर्चा में हैं। एंटी करप्शन विभाग की जाँच में पता चला है कि उनकी और पति सुरेश कुमार यादव की संपत्ति उनकी कमाई से दोगुनी है, और ये सब करोड़ों में है। नरगिस खान का नाम पहले भी कई बड़े विवादों से जुड़ा रहा है। नरगिस को एक नाबालिग बच्ची को गलत तरीके से सौंपने के मामले में निलंबित भी किया जा चुका है।

‘सपा’ से कनेक्शन

नरगिस खान का पुलिस महकमे में हमेशा से अच्छा-खासा दबदबा रहा है। मेरठ में 10 साल पहले जब वो महिला थाना प्रभारी थीं, तब की बातें आज भी पुलिसकर्मी बताते हैं। नरगिस ने एक बार नाबालिग बच्ची को गलत तरीके से किसी को सौंपा था, जिसके बाद DIG लक्ष्मी सिंह ने नरगिस को सस्पेंड कर दिया था।

यूपी में जब समाजवादी पार्टी की सरकार थी, उस दौरान इंस्पेक्टर नरगिस खान की तूती बोलती थी। नरगिस ने कई बार अपने पति सुरेश कुमार यादव को सपा नेता शिवपाल यादव का OSD (ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी) बताकर भी अफसरों और नेताओं पर रौब जमाया है।

नरगिस खान के घर शिवपाल यादव आया-जाया करते है, जिसके बाद उनका रुतबा और अधिक बढ़ गया था। नरगिस के पति सुरेश कुमार यादव खुद एक शराब कारोबारी हैं और मेरठ में उनका एक ‘नंदिनी बार’ भी है।

सपा सरकार के कार्यकाल में नरगिस खान कई मुख्य थानों की प्रभारी भी रही हैं। नरगिस ने मेरठ और आसपास के जिलों में करीब 23 सालों तक काम किया। नरगिस की तैनाती और काम करने का तरीका पहले भी सवालों के घेरे में रहा है।

महँगी गाड़ियों का शौक

एंटी करप्शन विभाग के मुताबिक, नरगिस खान को महँगी गाड़ियों का बहुत शौक है। नरगिस के पास BMW, मर्सिडीज, रेंज रोवर और थार जैसी गाड़ियाँ मौजूद हैं, जिनकी कुल कीमत करीब ₹3 करोड़ बताई जा रही है।

नरगिस के पति के पास भी 3 पेट्रोल और डीजल टैंकर के साथ 7 मोबाइल टैंकर हैं, जिनकी कीमत भी करीब ₹3 करोड़ बताई जा रही है।

पति की हालिया गिरफ्तारी

नरगिस खान और उनके पति सुरेश पहले भी विवादों में रहे हैं। साल 2021 में उन्हें लखनऊ से गिरफ्तार किया गया था। उन पर गाजियाबाद के कविनगर थाने में डिप्टी लेबर कमिश्नर कार्यालय से करोड़ों रुपये के घोटाले का आरोप था। इसके अलावा भी पति-पत्नी पर कई आरोप लगे और पुलिस ने उनके खिलाफ मुकदमे दर्ज किए।

हाल ही में, नरगिस के पति सुरेश को एक भाई की हत्या के मामले में कानपुर पुलिस ने गिरफ्तार किया था, जिसकी पैरवी खुद नरगिस खान कर रही थीं। शिकायतकर्ता उमा ने बताया है कि नरगिस खान 1990 बैच की दरोगा रही हैं और 1994-95 में बुलंदशहर में पोस्टिंग के दौरान वे सुरेश के संपर्क में आई थीं, जिसके बाद दोनों ने शादी कर ली।

करोड़ों की संपत्ति का भंड़ाफोड़

जाँच एजेंसियों ने इंस्पेक्टर नरगिस के बैंक खातों और लेन-देन की जाँच की है। इसमें नरगिस की संपत्ति उनकी आय से दोगुनी मिली है। नरगिस ने अपने पति के नाम पर कई अचल संपत्तियाँ भी खरीदी हैं, जिनमें मेरठ, गाजियाबाद, नोएडा, अमरोहा, बरेली, लखनऊ, कानपुर देहात और देहरादून में बेशकीमती कोठियाँ, प्लॉट, दुकानें, बार, रेस्टोरेंट और पेट्रोल पंप शामिल हैं। इन सभी संपत्तियों की अनुमानित कीमत करोड़ों में है।

अकेले मेरठ में करीब ₹20 करोड़, अमरोहा में ₹10 करोड़ का एक प्लॉट है। इसके अलावा, कानपुर देहात में ₹9 करोड़ की एक और संपत्ति है, जो अनुसूचित जाति के एक व्यक्ति के नाम पर ‘अवैधानिक’ तरीके से खरीदी गई बताई जा रही है।

जानकारी के मुताबिक, नरगिस खान ने ₹7 करोड़ की जमीन अपने बेटे वेदांत और पति के नाम पर खरीदी है, और करोड़ों की बेनामी संपत्ति भी उनके पति के नाम पर होने का शक जताया जा रहा है।

यह मामला अब पुलिस विभाग में बड़े सवाल खड़े कर रहा है कि एक इंस्पेक्टर के पास इतनी संपत्ति कैसे आई और उनके विवादित अतीत के बावजूद उन्हें लगातार अहम पदों पर क्यों रखा गया।

‘घर लाकर 12 साल की बच्ची का चंद्रशेखर ने किया शोषण’: वाल्मीकि समाज की लड़की ने ‘भीम आर्मी’ संस्थापक की खोली पोल, कहा- मुझे भी अपना क्राइम पाटर्नर बनाना चाहता था

उत्तर प्रदेश के नगीना से लोकसभा सांसद और ‘भीम आर्मी’ के संस्थापक चंद्रशेखर आज़ाद ‘रावण’ पर एक बार फिर उत्पीड़न के आरोप लगे हैं। इन आरोपों का खुलासा स्विट्जरलैंड में Ph.D कर रहीं रोहिणी घावरी ने किया है। वह ऐसे आरोप पहले भी रावण पर लगा चुकी हैं।

रोहिणी घावरी ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट साझा किया है। इसमें उसने एक चैट का स्क्रीनशॉट लगाया है। इस पोस्ट में उसने रोहिणी ने चंद्रशेखर की सताई हुई एक लड़की से बात करने का दावा किया है। रोहिणी ने पोस्ट में लिखा है कि यह चंद्रशेखर के विक्टिम नंबर 3 है।

रोहिणी ने पोस्ट में लिखा, “एक 12 साल की बच्ची नेहा राजपूत से चंद्रशेखर ट्रेन में मिला। फिर उसे अपने घर ले आया। उस बच्ची को नौकर बना कर रखा। उसका खूब शोषण किया। इसके बाद अपने भाई से उसकी शादी करा दी जिससे एक बेटा हुआ। उस बेटी को इतना प्रताड़ित किया की वो इनके घर से भाग कर छुप के रहने लगी।”

पीड़िता की कहानी आगे बताते हुए रोहिणी ने लिखा, “इस लड़की को चंद्रशेखर के घरवाले न तो इज्जत देते हैं और मन ही उसे अपने बेटे से मिलने देते हैं। ऐसी कई लड़कियाँ हैं जिनका जीवन बर्बाद हुआ है। अब इन सब बेटियों को न्याय मैं दिलाऊँगी।”

रोहिणी ने खुद के उत्पीड़न का भी लगाया था आरोप

रोहिणी घावरी ने 2023 में चंद्रशेखर आजाद ‘रावण’ पर उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। एक्स पर ही रोहिणी ने एक वीडियो शेयर किया, जो इन दोनों के वीडियो कॉल के दौरान का था। इसमें रावण रोता हुआ दिख रहा था। रोहिणी ने लिखा कि झूठे आँसू दिखा कर और अपनी शादी छिपा कर ‘रावण’ कई मासूम लड़कियों का जीवन बर्बाद कर चुका है।

रोहिणी घावरी ने अपनी पोस्ट में चंद्रशेखर के काले कारनामे में उसकी पत्नी के साथ देने का आरोप लगाया। साथ ही आंदोलन से मोटा पैसा आने की बात कही। रोहिणी ने लिखा, “ये ‘महिला’ भी इसमें उसका साथ देती रही, क्योंकि आंदोलन से करोड़ों रुपए आ रहे थे।”

रोहिणी ने रावण पर आरोप लगाते हुए अपने हालिया पोस्ट में लिखा, “यह चाहता था की मैं इसकी क्राइम पार्टनर बनूँ और काले कारनामे में साथ दूँ, लेकिन मैं इनकी तरह नीच नहीं हूँ, अपना जमीर नहीं बेच सकती।”

रोहिणी ने ‘रावण’ को छल-कपट-षड्यंत्र वाला व्यक्ति करार देते हुए आरोप लगाया कि वो कभी दलित समाज का नेता नहीं बन सकता।

कौन हैं रोहिणी घावरी

रोहिणी घावरी वाल्मीकि समाज से आती हैं और खुद को दलितों का ठेकेदार बताने वाले कुछ नेताओं द्वारा ब्राह्मणों के प्रति घृणा फैलाए जाने से ताल्लुक नहीं रखती। उलटा उन्होंने बताया है कि वो वाल्मीकि समाज से आती हैं और ब्राह्मणों का उनके जीवन में बहुत योगदान है

रोहिणी घावरी संयुक्त राष्ट्र (UN) में भी संबोधन दे चुकी हैं। उन्होंने बताया था कि वहाँ भी जाने के लिए उनके एक पंडित अंकल ने उनका मार्गदर्शन किया। UN में राम मंदिर को लेकर रोहिणी पाकिस्तान को खरी-खरी सुना चुकी हैं। उन्होंने ‘जय श्री राम’ का उद्घोष करते हुए कहा था कि दुनिया के हर हिन्दू के लिए राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा वाला दिन ऐतिहासिक है।

इस खबर के संबंध में ऑपइंडिया ने अधिक जानकारी के लिए डॉ. रोहिणी घावरी से संपर्क किया। हालाँकि उनसे अब तक बात नहीं हो सकी है। संपर्क होने के बाद खबर को आगे अपडेट किया जाएगा।

कर्नाटक के जिस लक्कुंडी में मिले थे वीरभद्रेश्वर मंदिर के निशान, वहाँ 20 साल बाद ASI ने फिर शुरू की खुदाई: होयसल राजवंश का खुलेगा इतिहास

कर्नाटक के लक्कुंडी में दूसरी बार खुदाई शुरू हुई है। 20 साल पहले यहाँ एक बार खुदाई की गई थी। इस बार कोटे वीरभद्रेश्वर मंदिर की वस्तुएँ, सिक्के और शिलालेख को जमा करने के लिए पर्याप्त जगह बनाई गई है। सेवानिवृत वैज्ञानिक केशव और एएसआई की टीम साथ में काम कर रही है।

इतिहासकार खुदाई में निकलनेवाली कलाकृतियों को लेकर काफी उत्साहित है। इससे पहले लक्कुंडी में खुदाई के काम के लिए 10 टीमें लगाई गई थी। इनलोगों ने 5 कुएँ, 6 शिलालेख और 600 नक्काशी की गई ऐतिहासिक पत्थर को निकाला था।

इस बार एएसआई अधिकारियों ने एक खुला संग्रहालय बनाया है जहाँ खुदाई में मिलनेवाली वस्तुओं को एकत्रित किया जाएगा। लक्कुंडी हेरिटेज डेवलपमेंट अथॉरिटी के मुताबिक राष्ट्रकूट, कल्याणी, चालुक्य और होयसल काल के सिक्के, कुछ और कुएँ, मंदिर और दूसरी वस्तुएँ खुदाई में यहाँ मिलने की उम्मीद हैं।

दक्षिण के साम्राज्य की समृद्ध कला

राष्ट्रकूट राजवंश और होयसल राजवंश के साक्ष्य उनकी कला, वास्तुकला, अभिलेख और साहित्यिक स्रोतों से मिलते हैं।

राष्ट्रकूट सामाज्य ने 8वीं से 10 वीं शताब्दी तक दक्कन के क्षेत्र में फैला सबसे अहम साम्राज्यों में एक था। दन्तिदुर्ग ने इस साम्राज्य की स्थापना की थी। इस साम्राज्य में करीब साढ़े सात लाख गाँव शामिल था। राष्ट्रकूटों ने दक्कन की स्थापत्य कला में जबरदस्त योगदान दिया।

एलोरा की गुफाएँ राष्ट्रकूट राजाओं ने बनवाई

राष्ट्रकूट साम्राज्य की वास्तुकला में एलोरा की गुफाएँ, खासकर कैलाशनाथ मंदिर महत्वपूर्ण हैं, ये मंदिर चट्टान को काटकर बनाए गए हैं। मंदिरों की दीवारों पर शिव-पार्वती और दूसरे देवी-देवताओं की कथाओं की शानदार मूर्तियाँ बनाई गई है। इनलोगों ने हाथी के शानदार रॉक कट गुफा का निर्माण करवाया।

वहीं होयसल ने हलेबिड का होयसलेश्वर मंदिर और बेलूर का चेन्नाकेशव मंदिर समेत कई मंदिरों का निर्माण कराया। इनकी नक्काशी और मूर्तियाँ समृद्ध कला को दर्शाती हैं। मंदिरों के शिलालेख होयसल शासकों के बारे में जानकारी देती हैं। UNESCO ने बेलूर, हेलबिदु और सोमनाथपुरा के मंदिर को विश्व धरोहर माना है।

होयसल साम्राज्य के अवशेष खास कर मंदिर और शिलालेख उनके शासनकाल में कला और संस्कृति की संपन्नता को दर्शाता है।

10वीं से 14वीं शताब्दी तक दक्कन क्षेत्र में होयसल राजवंश का शासन था। इनलोगों ने 317 वर्ष तक शासन किया। मूल रूप से कर्नाटक और कावेरी नदी के उपजाऊ क्षेत्र वाले तमिलनाडू में इसका शासन था। नृप काम द्वितीय 1026 ई. में होयसल राज की नींव रखी। विंष्णुवर्धन जैसे कई प्रभावशाली राजा हुए जिनके कार्यकाल में वैष्णव संप्रदाय यहाँ फला-फूला।

पहले सोशल मीडिया पर बने ‘वोक-लिबरल’, किया फिलिस्तीन का समर्थन: अब अमेरिकी वीजा लेने को पोस्ट डिलीट कर रहे भारतीय छात्र, ट्रंप ने किया है स्टैंड में बदलाव

अमेरिका में पढ़ाई करने का सपना देख रहे भारतीय छात्रों के लिए अब उनका सोशल मीडिया अकाउंट एक बड़ी रुकावट बन रहा है। दरअसल, अमेरिकी वीज़ा अप्लाई करने के लिए भारतीय छात्र अपने सोशल मीडिया से ऐसे पोस्ट हटा रहे हैं, जिनसे उन्हें लगता है कि उनके वीज़ा पर कोई आँच आ सकती है।

ट्रंप सरकार का सख्त रुख

ट्रंप ने सभी अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए सोशल मीडिया की कड़ी जाँच को अनिवार्य करने पर विचार किया है। इसका सीधा और साफ मतलब है कि आपके सोशल मीडिया पर कोई भी राजनीतिक पोस्ट, कोई मज़ाक या एक्टिविज़्म से जुड़ी सामग्री अमेरिकी वीज़ा अधिकारियों द्वारा गलत समझी जा सकती है और आपका वीज़ा रद्द हो सकता है।

यह नई सख्ती 2024 में अमेरिकी कॉलेज परिसरों में हुए फिलिस्तीन समर्थक प्रदर्शनों और यहूदी विरोधी घटनाओं के बाद ट्रंप सरकार की अंतरराष्ट्रीय छात्रों पर कड़ी निगरानी रखने की कोशिश का हिस्सा है।

कौन-कौन डिलीट कर रहा है पोस्ट?

  • मान्या (बदला हुआ नाम): एक छात्रा ने अपने वीज़ा काउंसलर की सलाह पर अपने इंस्टाग्राम और लिंक्डइन प्रोफाइल ही हटा दिए।
  • दिलजीत (बदला हुआ नाम): इन्होंने अपने सोशल मीडिया अकाउंट्स को प्राइवेट कर दिया है।
  • सूरज (बदला हुआ नाम): एक आइवी लीग यूनिवर्सिटी में मास्टर्स के लिए चुने गए सूरज ने अपना लिंक्डइन अकाउंट हटा दिया है और अब वो किसी भी विरोध प्रदर्शन में शामिल नहीं होते।
  • JNU के एक पीएचडी स्कॉलर: इन्होंने भी अपने सोशल मीडिया से फिलिस्तीन समर्थक सामग्री हटाई है। इसके अलावा फेसबुक और इंस्टाग्राम से भी डिलीट करने की संभावना जताई जा रही है।

पोस्ट डिलीट करने की वजह

छात्र मुख्य रूप से वीज़ा रिजेक्ट होने के डर से ऐसा कर रहे हैं। उन्हें लगता है कि ज़रा सा भी राजनीतिक या हिंसक एक्टिविज़्म उनके अमेरिकी वीज़ा के लिए खतरा बन सकता है। अमेरिकी प्रशासन फेसबुक, एक्स, लिंक्डइन और टिकटॉक जैसे सभी प्लेटफॉर्म की जाँच करने की योजना बना रहा है, और उन्हें पिछले पाँच सालों के सोशल मीडिया हैंडल की जानकारी भी देनी होती है।

एक्सपर्ट्स चेतावनी देते हैं कि सिर्फ पोस्ट करना ही नहीं, बल्कि अमेरिकी कानून के तहत अवैध मानी जाने वाली गतिविधियों से संबंधित पोस्ट को लाइक करना, कमेंट करना या शेयर करना भी वीज़ा रद्द होने का कारण बन सकता है। ‘आपत्तिजनक’ सामग्री क्या मानी जाएगी, यह अभी पूरी तरह से साफ नहीं है, लेकिन फिलिस्तीन समर्थक विचार या अमेरिकी विरोधी भावनाएँ खास तौर पर कड़ी जाँच के दायरे में आ सकती हैं।

छात्र क्या करें?

वीज़ा काउंसलर यह भी चेतावनी दे रहे हैं कि अचानक से ढेर सारे पोस्ट डिलीट करना भी अधिकारियों के लिए ‘रेड फ्लैग‘ बन सकता है। इससे उन्हें शक हो सकता है कि छात्र कुछ छिपा रहा है। अमेरिकी सरकार पहले से ही AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) का इस्तेमाल करके उन विदेशी छात्रों के वीज़ा रद्द कर रही है जो कुछ समूहों का समर्थन करते हुए दिखाई देते हैं।

शिक्षा सलाहकार छात्रों को सलाह दे रहे हैं कि वे अपने डिजिटल फुटप्रिंट पर नज़र रखें और सोच-समझकर पोस्ट करें। उन्हें ऐसे पोस्ट करने चाहिए जिससे उनके पढ़ाई के लक्ष्य और दुनिया को समझने का नज़रिया दिखाई दे। अपनी प्राइवेसी सेटिंग्स को मजबूत करें, लेकिन इतना भी नहीं कि आप कुछ छिपाते हुए दिखें।

पुलिस ने किया मना, फिर भी कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार नहीं मानी… RCB के जश्न समारोह में हुई 11 मौतों का कौन जिम्मेदार: CM बोले- कुंभ में भी तो हुआ था, डिप्टी CM बोले- कार्यक्रम 10 मिनट में निपटा

IPL में रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु की जीत के बाद चिन्नास्वामी स्टेडियम के बाहर मची भगदड़ में 11 जानें चली गईं, मगर कॉन्ग्रेस अब भी इस पर सफाई देने से नहीं थक रही हैं। अभी तक इस मामले में एक तरफा होकर बेंगलुरु पुलिस को जिम्मेदार ठहराया जा रहा था, लेकिन हाल में जब ये बात सामने आई कि इस परेड को निकालने के लिए पुलिस ने मना किया था, तो सवाल उठने लगा कि अगर पुलिस की मनाही के बावजूद सम्मान समारोह आयोजित हुआ तो इसमें कर्नाटक के कॉन्ग्रेस प्रशासन की गलती नहीं तो किसकी गलती है।

देख सकते हैं कि भगदड़ के बाद मौके पर पहुँचे क्रिकेट पत्रकार विक्रांत गुप्ता ने वीडियो में इस बात की जानकारी दी कि उन्हें पता चला है कि बेंगलुरु पुलिस ने सुरक्षा कारणों से परेड को निकालने से मना किया था। उनके अलावा मीडिया में भी अगर देखें तो यही खबरें आ रही थी कि पुलिस ने परेड निकालने से सख्त मना कर दिया। पुलिस ने कहा था- कोई विजय परेड नहीं होगी। पार्किंग की जगह सीमित है, इसलिए लोगों को मेट्रो या बाकी पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है।

दुखद बात ये है कि पुलिस प्रशासन द्वारा ये मना करने के बावजूद कॉन्ग्रेस ने अपनी वाह-वाही के लिए इस कार्यक्रम को आयोजित करवाया। जब हादसा हो गया तब एक तरफ मुख्यमंत्री इस मामले पर कहते दिखे कि उन्हें इस मामले पर कोई राजनीति नहीं करनी। दूसरी तरफ उप मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार स्वीकारते मिले कि ये सम्मान समारोह उन्हीं की सरकार की देखरेख में हुआ, लेकिन चूँकि भीड़ ज्यादा थी इसलिए इसे 10 मिनट में ही निपटवा दिया गया था।

फोटो साभार: बेंगलुरु पुलिस

अब इसी रवैये को देखते हुए भाजपा ने उन्हें घेरना शुरू किया है। उनका कहना है कि ये बात अच्छे से जानते हुए कि क्रिकेट प्रेमी अपनी पसंदीदा टीम के जीतने पर कैसे उत्साह दिखाते हैं, कैसे सड़कों पर जश्न मनाते हैं, सरकार ने लोगों की सुरक्षा की अनदेखा की और केवल राजनीति साधी। कई नेता इस घटना पर मुख्यमंत्री का इस्तीफा माँग रहे हैं। मगर, सीएम अपना बचाव इस घटना की तुलना दूसरी घटना से करके कर रहे हैं।

भाजपा नेता के बयानों पर अपना पक्ष रखते हुए उन्होंने इस घटना को कमतर दिखाने का प्रयास किया। उन्होंने कहा, “मैं उनकी तुलना करके और यह कहकर इसका बचाव नहीं करने जा रहा हूँ कि यह यहाँ हुआ और वह वहाँ हुआ। कुंभ मेले में 50-60 लोग मारे गए थे। मैंने आलोचना नहीं की। अगर कॉन्ग्रेस आलोचना करती है, तो यह अलग बात है। क्या मैंने या कर्नाटक सरकार ने आलोचना की?”

उनके इस बयान के बाद केंद्रीय मंत्री एचडी कुमारस्वामी का बयान आया। उन्होंने सलाह दी- “मै उन्हें सलाह देता हूँ कि वे महाकुंभ कि तुलना इस घटना से न करें। यह सरकार की विफलता है। जब वे विधान सौधा और चिन्नास्वामी स्टेडियन के सामने सम्मान समारोह आयोजित करना चाहते थे तो पुलिस अधिकारियों ने पहले ही सलाह दी थी कि दोनों जगह पर एक साथ सुरक्षा देना असंभव है, लेकिन उन्होंने इस सलाह को नजरअंदाज किया।”

बता दें कि ये पहली बार नहीं है कि क्रिकेट में जीत के बाद टीम भारी-भरकम भीड़ के बीच परेड निकाले। पिछले साल ऐसी परेड मुंबई में आयोजित हुई थी जब भारत ने टी20 वर्ल्ड कप जीता था। ओपन रूफ वाली बस में भारतीय क्रिकेट ने मरीन ड्राइव तक परेड निकाली थी। इस दौरान सैंकड़ों लोग वहाँ जमा हुए थे और पुलिस व्यवस्था से सब अच्छे से हुआ था। अगर वहाँ पर परेड कार्यक्रम थोड़ी सूझ-बूझ के कारण अच्छे से निपट सकता था, तो बेंगलुरु में भी। मगर, अपनी वाह-वाही के कारण कॉन्ग्रेस ने पुलिस की सुनी और न लोगों की सुरक्षा की सोची।

140 नए OBC समूह, 97 मुस्लिम समुदाय और 17% आरक्षण: 2024 में हाई कोर्ट ने लगा दी थी रोक, मानसून सत्र में फिर सर्वे पेश करेंगी ‘ममता दीदी’

पश्चिम बंगाल में ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) आरक्षण का मुद्दा इन दिनों गरमाया हुआ है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सरकार ने हाल ही में एक नया ओबीसी सर्वे पूरा किया है, जिसमें 140 नए उप-समूहों को ओबीसी कैटेगरी में शामिल करने की बात कही जा रही है। सरकार इस रिपोर्ट को 9 जून 2025 से शुरू होने वाले विधानसभा के मानसून सत्र में पेश करने जा रही है और संकेत दिए हैं कि 17% ओबीसी आरक्षण नीति को बरकरार रखा जाएगा।

मुस्लिमों को आरक्षण क्यों मिल रहा है?

  • बंगाल में ओबीसी आरक्षण दो श्रेणियों में बंटा हुआ है। पहला ‘ओबीसी ए’- इसमें 10% आरक्षण है और कुल 81 समुदाय शामिल हैं, जिनमें से चौंकाने वाले 56 मुस्लिम समुदाय से हैं।
  • ओबीसी बी- इसमें 7% आरक्षण है और कुल 99 समुदाय शामिल हैं, जिनमें से 41 मुस्लिम समुदाय से हैं।

इसका मतलब यह है कि बंगाल के कुल ओबीसी आरक्षण का एक बड़ा हिस्सा मुस्लिम समुदायों को दिया गया है। बंगाल सरकार का तर्क है कि ये मुस्लिम समुदाय सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े हैं और इसलिए उन्हें आरक्षण की आवश्यकता है। सरकार का दावा है कि ये फैसले दो सर्वे और पिछड़ा वर्ग आयोग की सुनवाई जैसी ‘तीन-स्तरीय प्रक्रिया’ के बाद लिए गए हैं।

कोर्ट क्यों लगा रही है रोक?

यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब मई 2024 में कलकत्ता हाई कोर्ट ने बंगाल सरकार द्वारा जारी किए गए करीब 12 लाख ओबीसी प्रमाणपत्रों को रद्द कर दिया। हाई कोर्ट ने अपने कड़े फैसले में साफ तौर पर कहा था कि ‘धर्म ही इन समुदायों को ओबीसी घोषित करने का एकमात्र मानदंड प्रतीत होता है।’

भारतीय संविधान के तहत आरक्षण केवल सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर दिया जा सकता है, धर्म के आधार पर नहीं। हाई कोर्ट ने पाया कि बंगाल सरकार ने कई मुस्लिम समुदायों को केवल उनके धर्म के आधार पर ओबीसी सूची में डाल दिया, जो असंवैधानिक है।

कोर्ट का मानना है कि इससे आरक्षण के मूल सिद्धांत का उल्लंघन होता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी बंगाल सरकार को इन उप-समूहों के सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन को स्पष्ट करने के लिए कहा था, न कि केवल धार्मिक पहचान के आधार पर उन्हें शामिल करने के लिए।

बीजेपी यह मुद्दा उठा रही है कि अगर धर्म के आधार पर आरक्षण दिया जाता है, तो हिंदू और अन्य समुदाय के जो सच्चे हकदार ओबीसी हैं, उन्हें उनके अधिकारों से वंचित किया जाएगा। यह एक ऐसा मुद्दा है जो हिंदू मतदाताओं के बीच अपील कर सकता है।

ममता बनर्जी सरकार इस मामले में कई मोर्चों पर सवालों के घेरे में-

हाई कोर्ट का फैसला सीधे तौर पर बंगाल सरकार पर ‘धर्म आधारित’ आरक्षण देने का आरोप लगाता है, जो एक गंभीर संवैधानिक उल्लंघन है। यह आरोप ममता सरकार की धर्मनिरपेक्षता की छवि को धूमिल करता है और उस पर मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने की राजनीति का आरोप लगता है।

बंगाल सरकार को बार-बार अदालतों से फटकार मिल रही है, जो उसकी नीतियों की वैधता पर सवाल उठाती है। 12 लाख ओबीसी प्रमाणपत्रों का रद्द होना सरकार के लिए एक बड़ा झटका है और उसकी प्रशासनिक क्षमता पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।

बंगाल सरकार ने दावा किया है कि उसने ‘तीन-स्तरीय प्रक्रिया’ का पालन किया है, लेकिन हाई कोर्ट के फैसले से पता चलता है कि यह प्रक्रिया शायद उतनी पारदर्शी और संवैधानिक नहीं थी जितनी होनी चाहिए थी। तेजी से नए सर्वे को पूरा करना भी संदेह पैदा करता है कि क्या यह पूरी तरह से वैज्ञानिक और निष्पक्ष तरीके से किया गया है। सुप्रीम कोर्ट की समय-सीमा और लाखों नौकरी आवेदकों के प्रभावित होने का दबाव सरकार को तेजी से फैसले लेने पर मजबूर कर रहा है, जिससे गलतियों की संभावना बढ़ जाती है।

आगे क्या?

बंगाल सरकार अब नए सर्वे को विधानसभा में पेश करेगी और हो सकता है कि यह मामला एक बार फिर कानूनी और राजनीतिक रूप से गरमा भी सकता है। यह देखना बाकी है कि सुप्रीम कोर्ट इस नए सर्वे और उसमें शामिल 140 उप-समूहों पर क्या रुख अपनाता है, और क्या बंगाल में ओबीसी आरक्षण का मुद्दा एक नई राजनीतिक लड़ाई का कारण हो सकता है।

11 मौतों के बाद कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने दिए न्यायिक जाँच के आदेश, स्टेडियम के बाहर मची थी भगदड़.. भीतर चल रहा था ‘सरकारी जश्न’: PM मोदी ने जताया दुख

बेंगलुरु में रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु (RCB) की ऐतिहासिक IPL 2025 जीत का जश्न उस वक्त मातम में बदल गया, जब चिन्नास्वामी स्टेडियम के बाहर भगदड़ में 11 लोगों की जान चली गई। RCB ने पंजाब किंग्स को 6 रन से हराकर 18 साल बाद पहली बार IPL खिताब जीता। बुधवार (4 जून 2025) को जब टीम बेंगलुरु पहुँची, तो एयरपोर्ट पर हजारों फैंस ने गर्मजोशी से स्वागत किया। टीम जब मुख्यमंत्री सिद्धारमैया से मिलने विधान सौध पहुँची, तो सड़कों पर फैंस तालियाँ और नारे लगाते दिखे।

लेकिन चिन्नास्वामी स्टेडियम के बाहर जश्न बेकाबू हो गया। स्टेडियम की क्षमता 35 हजार की थी, मगर 3 लाख से ज्यादा फैंस जमा हो गए। शाम 4:40 बजे भीड़ में खींचतान और नारेबाजी के बीच भगदड़ मच गई। इस दौरान पुलिस ने लाठियाँ भी भाँजी।

प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, फैंस खिलाड़ियों की एक झलक पाने को बेताब थे और कुछ लोग स्टेडियम में कूदने की कोशिश कर रहे थे। पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए बल प्रयोग किया, जिससे स्थिति और बिगड़ गई।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने 11 मौतों की पुष्टि की है और 33 लोगों के घायल होने की भी जानकारी उन्होंने दी है।

मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने दुख जताते हुए मृतकों के परिजनों को 10 लाख रुपये की सहायता राशि देने की घोषणा की। उन्होंने कहा कि घायलों का मुफ्त इलाज कराया जा रहा है और सभी अब खतरे से बाहर हैं। उन्होंने ज्यूडिशियल इन्क्वॉयरी के भी आदेश दे दिए हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी शोक व्यक्त करते हुए घायलों के जल्द स्वस्थ होने की कामना की।

कर्नाटक के डिप्टी सीएम डीके शिवकुमार ने कहा कि पुलिस ने क्राउड मैनेजमेंट के लिए कार्यक्रम को छोटा किया और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए अतिरिक्त फोर्स तैनात की।

BCCI सचिव देवजीत सैकिया ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए भविष्य में ऐसे आयोजनों के लिए नए नियम बनाने की बात कही। स्टेडियम के अंदर जश्न जारी रहा, क्योंकि पुलिस ने अंदर के फैंस को भगदड़ की जानकारी नहीं दी, ताकि और हंगामा न हो। इस दुखद घटना ने RCB की जीत की खुशी को फीका कर दिया।

इधर सेना के अपमान पर राहुल गाँधी को हाई कोर्ट ने लगाई फटकार, उधर कॉन्ग्रेस के ‘युवराज’ के बयान को हथियार बना भारत के खिलाफ इस्तेमाल कर रहा पाकिस्तान

पाकिस्तान राहुल गाँधी के बयानों को हथियार बनाकर भारत के खिलाफ प्रचार कर रहा है, तो दूसरी ओर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उनके बयानों पर कड़ी फटकार लगाई है। राहुल गाँधी और कॉन्ग्रेस पार्टी के बयानों ने पाकिस्तानी मीडिया को मौका दिया है कि वे भारत को नीचा दिखाने की कोशिश करें, खासकर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और ट्रम्प की मध्यस्थता के दावों को लेकर। राहुल के बयानों को पाकिस्तानी मीडिया ने इसे भारत की हार के रूप में पेश किया।

उधर, हाई कोर्ट ने साफ कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब सेना के खिलाफ अपमानजनक बातें कहना नहीं है। राहुल के बयानों को लेकर उनके खिलाफ मानहानि का केस चल रहा है, जिसे बंद करने की याचिका दाखिल की गई थी, लेकिन उसे कोर्ट ने खारिज कर दिया।

गाँधी परिवार और उनकी पार्टी ने एक बार फिर अपने बयानों के जरिए पाकिस्तान को भारत के खिलाफ हथियार दे दिया, ताकि वे कुछ राजनीतिक फायदा उठा सकें। राहुल गाँधी ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के उस दावे का समर्थन किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि वे भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता कर रहे हैं।

रायबरेली के सांसद ने तंज कसते हुए कहा, “नरेंद्रजी ने ट्रम्प का हुक्म माना, जिन्होंने कहा ‘नरेंद्र, आत्मसमर्पण करो’ और उन्होंने जवाब दिया ‘हाँ, सर’।” उन्होंने 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम का हवाला देते हुए कहा, “भारत ने अमेरिका की धमकी के बावजूद 1971 में पाकिस्तान को तोड़ा था। कॉन्ग्रेस के शेर और शेरनियाँ महाशक्तियों से लड़ते हैं और कभी नहीं झुकते।”

इस बीच, कॉन्ग्रेस ने भी एक शर्मनाक मीम के जरिए इसकी हिमायत की, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ट्रम्प से निर्देश लेते हुए दिखाया गया, जैसे कि उन्होंने युद्धविराम की घोषणा कर दी, जिसे ‘आत्मसमर्पण’ के तौर पर पेश किया गया।

पाकिस्तानी मीडिया ने भारत की सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी द्वारा दिए गए इस मौके को फौरन लपक लिया और इसे अपनी गलत मंशा वाली कहानी को आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया। Geo.tv के एक पत्रकार ने कहा, “कॉन्ग्रेस पहले से ही पीएम मोदी की ट्रम्प के मध्यस्थता के दावे पर चुप्पी की आलोचना कर रही थी। अब उन्होंने उनका मजाक उड़ाना भी शुरू कर दिया है।”

इसके बाद उन्होंने कॉन्ग्रेस के आधिकारिक हैंडल से पोस्ट किए गए अपमानजनक मीम का जिक्र किया और वह वीडियो भी दिखाया, जिसमें राहुल गाँधी ने पीएम मोदी का मजाक उड़ाया था।

पत्रकार ने आगे कहा, “भारत का विपक्ष यह सवाल उठा रहा है कि क्या युद्धविराम पाकिस्तान के कहने पर शुरू हुआ था या ट्रम्प के प्रस्ताव की वजह से। अगर ऐसा है, तो सरकार ने इसे क्यों मान लिया, खासकर जब हम युद्ध जीत रहे थे? अगर यह सच नहीं है, तो केंद्र सरकार के दावे गलत और भ्रामक हैं।” उन्होंने इस गंभीर समय में भी विपक्षी नेताओं की छोटी-मोटी राजनीति पर रोशनी डाली।

बता दें कि OpIndia ने पहले ही बताया था कि राहुल गाँधी के खतरनाक बयान इस्लामिक गणराज्य को प्रचार के लिए और सामग्री देंगे। उनके विदेश मंत्री एस जयशंकर पर लगाए गए झूठे आरोप और ‘ऑपरेशन सिंदूर‘ के नतीजे पर सवाल उठाने वाले बयानों को भी पाकिस्तान ने रिपोर्ट किया था।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने लगाई राहुल गाँधी को फटकार

इस बीच, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने राहुल गाँधी को फटकार लगाई है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार भारतीय सेना के खिलाफ अपमानजनक बातें कहने तक नहीं जाता। हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी तब की, जब उसने विपक्ष के नेता राहुल गाँधी की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने 2022 की भारत जोड़ो यात्रा के दौरान भारतीय सेना के खिलाफ कथित तौर पर अपमानजनक टिप्पणियों के लिए लखनऊ की एक अदालत द्वारा जारी समन आदेश को चुनौती दी थी।

सिंगल जज जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने कहा, “इसमें कोई शक नहीं कि भारत के संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति और बोलने की आजादी की गारंटी देता है, लेकिन यह आजादी उचित प्रतिबंधों के अधीन है और इसमें किसी व्यक्ति या भारतीय सेना के खिलाफ अपमानजनक बयान देने की आजादी शामिल नहीं है।” लखनऊ की अदालत के अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट आलोक वर्मा ने राहुल गाँधी को मानहानि के मामले में 24 मार्च को सुनवाई के लिए पेश होने का निर्देश दिया था। इस आदेश को चुनौती देते हुए राहुल ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी।

शिकायत वकील विवेक तिवारी ने उदय शंकर श्रीवास्तव की ओर से दायर की थी, जो बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइजेशन के पूर्व निदेशक थे और सेना में कर्नल के बराबर रैंक रखते थे। तिवारी ने आरोप लगाया कि राहुल गाँधी ने 16 दिसंबर 2022 को भारत और चीन की सेनाओं के बीच 9 दिसंबर 2022 को हुए टकराव के बारे में जो टिप्पणी की, वह भारतीय सेना के लिए अपमानजनक और मानहानिकारक थी।

राहुल ने कहा था कि “अरुणाचल प्रदेश में चीनी सैनिक भारतीय सेना के जवानों को पीट रहे हैं” – यह बयान सरकार की वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चीन की हरकतों की आलोचना के लिए था। राहुल की मजिस्ट्रेट के आदेश के खिलाफ याचिका खारिज करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि CrPC की धारा 199(1) के तहत, कोई व्यक्ति जो अपराध का सीधा शिकार नहीं है, उसे भी ‘पीड़ित व्यक्ति’ माना जा सकता है, अगर उस अपराध से उसे नुकसान हुआ हो या उसका बुरा असर पड़ा हो।

गौरतलब है कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद अभी भी कॉन्ग्रेस पार्टी और राहुल गाँधी लगातार भारतीय सेना, उसके शौर्य और पहलगाम हमले पर सवाल उठा रहे हैं।

IRCTC ने बंद किए 2.5 करोड़ फर्जी यूजर ID, 20 लाख यूजर ID की फिर से होगी जाँच: यूँ ही नहीं बुकिंग खुलते ही खत्म हो जाते हैं ट्रेनों के टिकट, चल रहा बड़ा फर्जीवाड़ा

भारतीय रेलवे के आईआरसीटीसी पोर्टल से तत्काल टिकट बुक करना लगभग असंभव काम जैसा है। सुबह 10 बजे पोर्टल खुलते ही पेज फ्रीज होना, पेमेंट गेटवे क्रैश होना और कुछ देर बाद ही उपलब्ध सीटें खत्म होना आम बात है। इसके पीछे की गुत्थी अब रेलवे ने सुलझा ली है। आईआरसीटीसी ने खुलासा किया है कि इसके पीछे कौन है?

टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक भारतीय रेलवे को पिछले 5 महीनों में 2.9 लाख संदिग्ध पीएनआर का पता चला है। ये वो सामान्य और तत्काल टिकट हैं, जिसे बुकिंग शुरू होने के 5 मिनट के अंदर खरीदे गए थे।

रेलवे अधिकारियों के मुताबिक, ” जनवरी से मई 2025 में 2.5 करोड़ फर्जी यूजर आईडी बंद कर दी गई है। इनमें से कई खाते एजेंटों या सॉफ्टवेयर से जुड़े थे, जो सिस्टम में खामियों का फायदा उठा रहे थे। इसके अलावा 20 लाख यूजर आईडी को दोबारा जाँच के लिए रखा गया है। जानकारी के मुताबिक इस दौरान राष्ट्रीय साइबर अपराध पोर्टल पर 134 शिकायतें दर्ज की गईं, 6800 से ज्यादा डिस्पोजेबल ईमेल डोमेन को ब्लॉक किया गया।”

डिस्पोजेबल ईमेल का इस्तेमाल यात्रियों से ज्यादा पैसे वसूलने के लिए किया जाता है। धोखाधड़ी करने वाले एजेंट हर संपर्क या काम के लिए एक अलग आईडी का इस्तेमाल करता है जिसे डिस्पोजेबल ईमेल कहा जाता है।

सभी टिकटों के जल्दी बुक हो जाने की समस्या कुछ खास ट्रेनों और रूटों पर ज्यादा है। इसलिए ऐसे यूजर्स को ब्लॉक करना थोड़ा आसान रहा।

अधिकारियों का कहना है कि आईआरसीटीसी ने सिस्टम में सुधार के लिए कई कदम उठाए हैं। संदिग्ध डोमेन और आईडी को ब्लॉक करने के अलावा एंटी-बॉट सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया है। पोर्टल पर ट्रैफिक बढ़ने पर बेहतर तरीके से निपटने के लिए एक प्रमुख कंटेंट डिलीवरी नेटवर्क के साथ साझेदारी की गई है। इसमें आम लोगों के इस्तेमाल करने और स्वचालित मशीन के इस्तेमाल के बीच का अंतर समझा जा सकेगा। माना जाता है कि ‘सुपर तत्काल’ और ‘नेक्सस’ जैसे अवैध सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल टिकट बुकिंग के लिए किया जाता है जो इंसान की तुलना में लॉन इन करने, फॉर्म भरने और भुगतान करने में तेज हैं।

आईआरसीटीसी का दावा है कि 22 मई 2025 की सुबह 10 बजे 31814 टिकट प्रति मिनट बुक की गई। उन्होंने ये भी बताया है कि अक्टूबर 2024 और मई 2025 के बीच बुकिंग के प्रयास की सफलता का अनुपात 43.1% से बढ़ कर 62.2% हो गया।

थायरोकेयर के संस्थापक ए वेलुमनी ने सोशल मीडिया पर बुकिंग सिस्टम में बदलाव के सुझाव दिए हैं। उनके मुताबिक “यात्रियों को एक साथ बुकिंग करने के बजाय निर्धारित स्लॉट में बुकिंग क्यों नहीं करने दी जाती?”

वेलुमणि की पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए संदीप सभरवाल ने कहा है कि तत्काल में टिकट बुकिंग करने की कोशिश में वे 90 फीसदी बार असफल रहे।

ऐसे कितने ही रेलवे यात्री टिकट बुकिंग से परेशान होकर एजेंटों के पास पहुँचते हैं और तय कीमत से दोगुनी या तिगुनी कीमत पर टिकट कटवाते हैं।