उत्तर प्रदेश के गोंडा में एक जज ने अपने अर्दली को बिस्किट और चाय और परोसने में ही गड़बड़ी पर कड़ी फटकार लगाई है। उसे आधिकारिक तौर पर नोटिस भी जारी किया गया है। इस अर्दली से इस ‘घोर त्रुटि’ के लिए जवाब भी माँगा गया है। इस नोटिस का फोटो सोशल मीडिया में वायरल है।
सोशल मीडिया पर यह नोटिस गोंडा के अपर जनपद एवं सत्र न्यायाधीश के नाम से वायरल है। यह पत्र राकेश कुमार नाम के एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को जारी किया गया है जो जज का अर्दली (एक तरह का चपरासी) है। वायरल नोटिस में 30 मई, 2025 की तारीख लिखी हुई है।
इस वायरल नोटिस में जज इस बात के लिए अर्दली से जवाब माँग रहे है कि वह जज के कहने के बावजूद चाय के साथ बिस्किट क्यों नहीं लाया। इसके अलावा इस बात पर भी सफाई पेश करने की बात कही गई है कि जज के सामने गन्दी और खराब दालमोठ क्यों पेश की गई।
इस वायरल नोटिस में लिखा है, “यह कि आज दिनांक 30/05/2025 को लन्च समय में मेरे विश्राम कक्ष में सिविल जज / FTC नवीन गोण्डा सुश्री शर्मिष्ठा साहू मिलने आयी थी जिस पर मेरे द्वारा आपको चाय/बिस्कुट लाने हेतु कहा गया, जबकि आपके द्वारा केवल दो चाय लायी गयी।”
आगे इस नोटिस में लिखा है, “मेरे द्वारा पुनः बिस्कुट लाने के लिए कहा गया, किन्तु आपके द्वारा बिस्कुट न लाकर पुरानी खराब स्थिति में जिसमें से गन्दी गंध आ रही थी, दालमोठ रखी गई, जबकि आलमारी में दो डिब्बे में अच्छी स्थिति में बिस्कुट रखे हुए थे, बावजूद आपके द्वारा जानबूझकर खराब पुरानी दालमोट रखी गयी, जो कि फेंकने की स्थिति में थी।”
इस नोटिस में राकेश कुमार से स्पष्टीकरण 31 मई, 2025 तक माँगा गया था। इस पूरी घटना को नोटिस में ‘जानबूझकर’ की गई ‘घोर त्रुटि’ बताया गया था। इस नोटिस के बाद कर्मचारी पर क्या एक्शन हुआ, यह स्पष्ट नहीं है। हालाँकि, इस नोटिस के सामने आने के बाद लोग सरकारी तौर तरीके की आलोचना कर रहे हैं।
यह ऐसा कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले 2023 में इलाहाबाद हाई कोर्ट से भी एक ऐसा ही मामला मामला आ चुका है। एक ट्रेन के लेट होने पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक जज ने नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण माँग लिया था। उन्हें यह समस्या थी कि पैंट्री और पुलिस वाले ने उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं दिया था।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस गौतम चौधरी को ट्रेन यात्रा के दौरान असुविधा हुई थी। यह यात्रा 8 जुलाई 2023 (शनिवार) को नई दिल्ली से प्रयागराज के बीच पुरुषोत्तम एक्सप्रेस में की गई थी। हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार के लिखे लेटर के अनुसार इस दिन ट्रेन 3 घंटे लेट थी।
लेटर में बताया गया कि न्यायाधीश द्वारा बार-बार बुलाए जाने के बावजूद TTE सहित किसी भी रेलकर्मी द्वारा कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया था। इस नोटिस में GRP स्टाफ और पैंट्री कार मैनेजर से स्पष्टीकरण माँगा गया था। बाद के इस घटना पर सुप्रीम कोर्ट ने भी नाराजगी जाहिर की थी।
भारत देश की नींव संविधान पर टिकी है, जिसके तहत हर नागरिक को समान अधिकार और सम्मान की बात कही गई है। लेकिन आज देश की दो हाई कोर्ट्स के दो अलग-अलग फैसलों ने इस सपने पर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक तरफ बॉम्बे हाई कोर्ट ने खदीजा शेख को जमानत दे दी, जिसने ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ जैसे नारे लगाए। दूसरी तरफ कोलकाता हाई कोर्ट ने शर्मिष्ठा पनोली को जमानत देने से इनकार कर दिया, जिसने ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’ कहा।
इन दोनों मामलों में आरोपित छात्राएँ हैं। दोनों ने ही अपनी अभिव्यक्ति व्यक्त की.. लेकिन एक को बेल मिल गई, तो दूसरी को जेल में ठूँट दिया गया। इन दोनों मामलों में न्याय का तराजू एक तरफ झुका हुआ क्यों दिखता है? आखिर क्या वजह है कि एक को उसकी जिंदगी और करियर की चिंता में राहत मिलती है, जबकि दूसरी को जेल की सलाखों के पीछे धमकियाँ और परेशानी झेलनी पड़ रही है? ये सवाल हर भारतीय के मन में उठ रहे हैं।
दो छात्राएँ, दो हाई कोर्ट, दो फैसले, दो कहानियाँ
खदीजा शेख को रिहाई: पुणे की इंजीनियरिंग छात्रा खदीजा ने सोशल मीडिया पर ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ लिखा। उसने भारत के ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की आलोचना की, जिसमें भारत ने पाकिस्तान में आतंकी ठिकानों को नष्ट किया था। खदीजा ने इसे ‘फासीवादी’ करार दिया और जम्मू-कश्मीर को ‘अधिकृत’ बताया। उसकी पोस्ट में भारत की संप्रभुता को चुनौती थी, फिर भी बॉम्बे हाई कोर्ट ने उसे जमानत दे दी।
कोर्ट ने कहा कि खदीजा ने माफी माँग ली है, वह एक छात्रा है और उसकी जिंदगी बर्बाद नहीं करनी चाहिए। कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को फटकार लगाई कि एक छात्रा को उसकी राय के लिए इस तरह सजा देना गलत है। कोर्ट ने यह भी सुनिश्चित किया कि खदीजा बिना किसी डर के अपनी परीक्षाएँ दे सके।
शर्मिष्ठा पनोली को कैद: 22 साल की लॉ स्टूडेंट शर्मिष्ठा ने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो डाला, जिसमें उसने ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’ कहा। उसका गुस्सा जायज था – पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 24 हिंदुओं की हत्या के बाद, जिसमें आतंकियों ने धर्म पूछकर गोली मारी थी। शर्मिष्ठा ने पाकिस्तान के खिलाफ बोलते हुए कुछ शब्दों का इस्तेमाल किया, जिससे भारत के कुछ इस्लामी कट्टरपंथी नाराज हो गए। यहाँ तक कि हिंदू देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ करने वाले वजाहत खान ने एफआईआर करा दी।
नतीजा? बंगाल पुलिस ने उसे 1500 किमी दूर आकर हरियाणा के गुरुग्राम से गिरफ्तार कर लिया। उसके खिलाफ IPC की धारा 295A (धार्मिक भावनाएँ आहत करना), 505(2) (सांप्रदायिक वैमनस्य फैलाना) और 504 (जानबूझकर अपमान) के तहत केस दर्ज हुआ। कोलकाता हाई कोर्ट ने उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी, यह कहते हुए कि ‘दो दिन जेल में रहने से आसमान नहीं टूट पड़ेगा‘ और उसके वीडियो ने ‘लोगों की भावनाएँ आहत’ की हैं।
खदीजा को बेल, शर्मिष्ठा को जेल क्यों?
दोनों मामले देखने के बाद सवाल उठता है – अगर खदीजा को छात्र होने के नाते, माफी माँगने के बाद और उसकी शिक्षा व करियर की चिंता करते हुए जमानत मिल सकती है, तो शर्मिष्ठा को क्यों नहीं? अगर खदीजा की अभिव्यक्ति की आजादी का सम्मान किया जा सकता है, तो शर्मिष्ठा की क्यों नहीं? अगर खदीजा की पोस्ट – जिसमें उसने भारत की संप्रभुता को चुनौती दी, ‘भावनात्मक’ मानी जा सकती है, तो शर्मिष्ठा का भारत के दुश्मन देश और आतंकवाद के संरक्षक पाकिस्तान के खिलाफ बोलना अपराध कैसे हो गया? वो भी तब, जब भारत और पाकिस्तान ने हाल ही में एक लड़ाई लड़ी हो और पूरा मामला उसी के इर्द-गिर्द घूम रहा हो।
शर्मिष्ठा ने अपनी याचिका में बताया कि उसे जेल में धमकियाँ मिल रही हैं। उसे साफ पानी तक नहीं मिल रहा और जेल की हालत ऐसी है कि उसकी सेहत को खतरा है। फिर भी कोलकाता हाई कोर्ट ने उसकी जमानत खारिज कर दी। दूसरी तरफ बॉम्बे हाई कोर्ट ने खदीजा के लिए कहा कि उसे बिना डर के पढ़ाई का मौका मिलना चाहिए। क्या शर्मिष्ठा का करियर, उसकी सुरक्षा, उसकी अभिव्यक्ति का अधिकार मायने नहीं रखता?
क्या धर्म के आधार पर हो रहा है भेदभाव?
सबसे बड़ा सवाल जो हर भारतीय के मन में उठ रहा है – क्या भारत की न्यायपालिका धर्म के आधार पर फैसले दे रही है? क्या खदीजा को इसलिए जमानत मिली क्योंकि वह मुस्लिम है, और शर्मिष्ठा को इसलिए जमानत नहीं मिली क्योंकि वह हिंदू है? यह सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि शर्मिष्ठा का मामला नुपुर शर्मा के मामले से मिलता-जुलता है। 2022 में नुपुर शर्मा को भी इस्लामी कट्टरपंथियों के गुस्से का शिकार होना पड़ा था।
उनकी टिप्पणी को गलत तरीके से पेश किया गया और उनके खिलाफ देशभर में हिंसा भड़की। नुपुर ने माफी माँगी, लेकिन उनकी माफी को स्वीकार नहीं किया गया। उल्टा सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें ही ‘लूज टंग’ कहकर दोषी ठहराया। इस हिंसा में दो हिंदुओं – कन्हैया लाल और उमेश कोल्हे की बेरहमी से हत्या कर दी गई, सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्होंने नुपुर का समर्थन किया था।
शर्मिष्ठा के मामले में भी यही पैटर्न दिखता है। उसने माफी माँगी, वीडियो हटा लिया, लेकिन फिर भी उसे जेल में डाल दिया गया। दूसरी तरफ खदीजा की पोस्ट, जिसमें उसने भारत के खिलाफ और पाकिस्तान के पक्ष में बात की, उसे ‘भावनात्मक’ मानकर माफ कर दिया गया। क्या यह दोहरा मापदंड नहीं है?
अभिव्यक्ति की आजादी सिर्फ एक समुदाय को?
भारत में संविधान के तहत अभिव्यक्ति की आजादी हर नागरिक का अधिकार है। लेकिन क्या यह आजादी सिर्फ एक समुदाय के लिए है? अगर कोई हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करता है, तो उसे अभिव्यक्ति की आजादी का हवाला दिया जाता है। लेकिन अगर कोई इस्लाम या इस्लामी कट्टरपंथ के खिलाफ बोलता है, तो उसे ‘धार्मिक भावनाएँ आहत’ करने का दोषी ठहराया जाता है। शर्मिष्ठा ने पाकिस्तान के खिलाफ बोला, जो भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देता रहा है। फिर भी, उसे अपराधी की तरह जेल में डाल दिया गया। दूसरी तरफ, खदीजा ने भारत की संप्रभुता को चुनौती दी, लेकिन उसे ‘छात्रा’ और ‘भावनात्मक’ कहकर छोड़ दिया गया।
यह पैटर्न सिर्फ शर्मिष्ठा या नुपुर शर्मा तक सीमित नहीं है। 2019 में कमलेश तिवारी और 2022 में किशन भरवाड़ की हत्या सिर्फ इसलिए कर दी गई क्योंकि इस्लामी कट्टरपंथियों ने उनकी टिप्पणियों को ‘ब्लासफेमी’ यानी ईशनिंद माना। क्या भारत में अब राष्ट्रवाद अपराध बन गया है? क्या ‘भारत माता की जय’ कहने वालों को जेल मिलेगी और ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ कहने वालों को बेल?
कलकत्ता हाई कोर्ट की कड़ाई और ममता सरकार की वोटबैंक पॉलिटिक्स
कोलकाता हाई कोर्ट का यह कहना कि “दो दिन जेल में रहने से आसमान नहीं टूट पड़ेगा” शर्मिष्ठा के लिए बेहद कठोर है। क्या कोर्ट को यह नहीं सोचना चाहिए कि एक युवा छात्रा, जो अपनी पढ़ाई और करियर के लिए मेहनत कर रही है, उसकी जिंदगी और सुरक्षा का क्या होगा? दूसरी तरफ बॉम्बे हाई कोर्ट ने खदीजा के करियर और शिक्षा की चिंता की, लेकिन शर्मिष्ठा के लिए ऐसी कोई चिंता क्यों नहीं दिखाई गई?
पश्चिम बंगाल की टीएमसी सरकार ने भी इस मामले में शर्मिष्ठा को राहत देने का विरोध किया। क्या यह सिर्फ वोटबैंक की राजनीति है? क्या बंगाल में राष्ट्रवाद को अपराध मान लिया गया है? शर्मिष्ठा ने अपनी याचिका में बताया कि उसे जेल में जान से मारने की धमकियाँ मिल रही हैं, साफ पानी तक नहीं मिल रहा और उसकी सेहत खराब हो रही है। फिर भी न तो कोर्ट और न ही सरकार ने उसकी सुरक्षा की चिंता की।
जनता का भरोसा डगमगा रहा है मीलॉर्ड
भारत की न्यायपालिका और संविधान पर हर भारतीय को गर्व है। लेकिन जब ऐसे फैसले सामने आते हैं, जो धर्म के आधार पर भेदभाव की बू देते हैं, तो लोगों का भरोसा डगमगाने लगता है। अगर खदीजा को माफी और जमानत मिल सकती है, तो शर्मिष्ठा को क्यों नहीं? अगर खदीजा की अभिव्यक्ति की आजादी और करियर की चिंता हो सकती है, तो शर्मिष्ठा की क्यों नहीं? क्या हिंदू छात्रा का भविष्य मुस्लिम छात्रा जितना महत्वपूर्ण नहीं है?
जब कोर्ट इस्लामी कट्टरपंथियों की ‘आहत भावनाओं’ को इतना गंभीरता से लेते हैं, लेकिन हिंदुओं की भावनाओं को नजरअंदाज करते हैं, तो यह सवाल उठता है कि क्या न्यायपालिका का तराजू संतुलित है? जब इस्लामी कट्टरपंथी ‘सर तन से जुदा’ की धमकियाँ देते हैं, और कोर्ट उन पर कार्रवाई करने के बजाय पीड़ित को ही दोषी ठहराते हैं, तो यह कट्टरपंथ को बढ़ावा देने जैसा नहीं है?
बाबा साहेब आंबेडकर ने एक ऐसे भारत की कल्पना की थी, जहाँ धर्म, जाति या लिंग के आधार पर कोई भेदभाव न हो। लेकिन आज जब शर्मिष्ठा जैसी हिंदू छात्रा को सिर्फ इसलिए जेल में डाल दिया जाता है क्योंकि उसने आतंकवाद के खिलाफ बोला और खदीजा जैसी छात्रा को भारत के खिलाफ बोलने के बावजूद राहत मिलती है, तो क्या यह बाबा साहेब के सपने का अपमान नहीं है?
“क्या अब देश से प्यार करना अपराध है?” यह सवाल आज हर उस भारतीय का है, जो इस दोहरे मापदंड को देखकर आहत है। क्या हमारी न्यायपालिका और सरकार इस भेदभाव को खत्म करने के लिए कुछ करेगी? क्या शर्मिष्ठा जैसे राष्ट्रवादियों की आवाज को सुना जाएगा, या उन्हें जेल में धमकियाँ झेलने के लिए छोड़ दिया जाएगा?
यह समय है कि हम भारत के नागरिक इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठाएँ। हमें अपने संविधान, अपनी न्यायपालिका और अपने देश पर भरोसा है। लेकिन जब ऐसे फैसले सामने आते हैं, जो हिंदू-मुस्लिम के आधार पर भेदभाव का शक पैदा करते हैं, तो हमें सवाल पूछने का हक है। आखिर क्या यही है वह भारत, जिसका सपना बाबा साहेब ने देखा था? क्या यही है वह न्याय, जिसके लिए हमारा संविधान बना था?
अमेरिका में दो चीनी नागरिकों यून्किंग जियान (33) और जुनयोंग लियू (34) को एक खतरनाक बायोलॉजिकल पैथोजन ‘फ्यूजेरियम ग्रैमिनीरम’ की तस्करी करने के आरोप में गिरफ्तार किया है, जो अनाज की फसलों को बर्बाद कर सकता है।
काश पटेल ने X पर दी जानकारी
काश पटेल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पहले ट्वीटर) पर बताया कि FBI ने अमेरिका में चीनी नागरिक को गिरफ्तार किया है, जिस पर खतरनाक बायोलॉजिकल पैथोजन की तस्करी का आरोप है।
New… I can confirm that the FBI arrested a Chinese national within the United States who allegedly smuggled a dangerous biological pathogen into the country.
The individual, Yunqing Jian, is alleged to have smuggled a dangerous fungus called "Fusarium graminearum," which is an…
— FBI Director Kash Patel (@FBIDirectorKash) June 3, 2025
गिरफ्तार किए गए व्यक्ति की पहचान युनकिंग जियान के रूप में हुई है, जिस पर फ्यूसैरियम ग्रैमिनेरम नामक फंगस की तस्करी का आरोप है। पटेल ने इसे ‘एग्रोटेररिज्म एजेंट’ बताया, जिसका मतलब है कि इसका इस्तेमाल फसलों को नुकसान पहुँचाकर कृषि-आतंकवाद फैलाने के लिए किया जा सकता है।
कैसे पकड़े गए दोनों चीनी नागरिक?
27 जुलाई 2024 को लियू ने अमेरिका में प्रवेश करते समय अधिकारियों को बताया कि वह अपनी गर्लफ्रेंड से मिलने आया है और जल्द ही लौट जाएगा। उसने दावा किया कि उसके पास कोई ‘काम की चीज’ नहीं है। हालाँकि, उसके सामान की दूसरी बार जाँच करने पर अधिकारियों को चीनी भाषा में एक नोट, फिल्टर पेपर का एक टुकड़ा और चार प्लास्टिक की थैलियाँ मिलीं, जिनमें लाल रंग की पौधों की सामग्री के छोटे-छोटे गुच्छे थे।
शुरुआत में लियू ने कहा कि उसे नहीं पता कि ये चीजें उसके बैग में कैसे आईं। लेकिन कड़ी पूछताछ के बाद उसने सच कबूल कर लिया। उसने बताया कि उसने जानबूझकर नमूनों को टिशू के एक बंडल में छिपाया था क्योंकि उसे पता था कि इनके आयात पर प्रतिबंध है। उसका मकसद अमेरिका में अपना रिसर्च जारी रखना था।
क्या है पूरा मामला?
अमेरिका के जस्टिस डिपार्टमेंट के बयान के अनुसार, जियान और लियू पर साजिश रचने, तस्करी करने, झूठे बयान देने और वीजा धोखाधड़ी जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। ये दोनों कथित तौर पर अपनी रिसर्च के लिए चीनी सरकार से फंडिंग ले रहे थे। लियू, जो चीन की एक यूनिवर्सिटी में इस रोगाणु पर रिसर्च कर रहा था, डेट्रॉयट मेट्रोपॉलिटन एयरपोर्ट के रास्ते इसे अमेरिका लाने की कोशिश कर रहा था।
उसका मकसद मिशिगन यूनिवर्सिटी की लैब में इस पर रिसर्च करना था, जहाँ उसकी गर्लफ्रेंड जियान काम करती है। अधिकारियों का मानना है कि ये दोनों चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े हो सकते हैं।
इतिहास में भी इस तरह के हमले हो चुके हैं, जिसमें जर्मनी, जापान और भारत शामिल है। इस तरह के मामले ने अमेरिका समेत दुनिया को फिर से चेताया है कि जैविक आतंकवाद केवल थ्योरी नहीं, बल्कि एक हकीकत बनता जा रहा है, जिससे वैश्विक खाद्य सुरक्षा को बड़ा खतरा है।
पाकिस्तान के लिए जासूसी करने के आरोप में गिरफ्तार शकूर खान से पूछताछ में लगातार एक ओर पुलिस को कई परेशानियाँ झेलनी पड़ रही हैं तो वहीं कई नई बातें भी सामने आ रही हैं। ताजा जानकारी ये है कि शकूर खान के पाकिस्तान जाने की बात हर बार राजस्थान के पूर्व कैबिनेट मंत्री सालेह मोहम्मद को रहती थी। साथ ही शकूर, सालेह के लिए पाकिस्तान से तोहफा भी लाया था।
पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के लिए जासूसी के आरोप में कॉन्ग्रेस के पूर्व मंत्री सालेह मोहम्मद के निजी सहायक शकूर खान को पुलिस ने 28 मई 2025 को गिरफ्तार किया था। वह जैसलमेर के रोजगार कार्यालय में सरकारी कर्मचारी था। सालेह मोहम्मद राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार में कैबिनेट मंत्री था।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, शकूर खान पुलिस की पूछताछ में कई बार वह अपने ब्लड प्रेशर बढ़ने तो कभी किसी और बीमारी का बहाना बना देता है। या फिर कभी पूछताछ के बीच नींद आने की बात कहता है।
पुलिस की जाँच में ये बात भी सामने आई है कि शकूर खान के साथ जैसलमेर से कुछ और लोग भी पाकिस्तान गए थे। जाँच एजेंसियाँ उन लोगों के बारे में खोजबीन कर पता लगाने की कोशिश कर रही हैं।
सालेह मोहम्मद को रहती थी खबर
शकूर खान जैसलमेर के ढाणी का रहने वाला है। इसी गाँव से कॉन्ग्रेस नेता सालेह मोहम्मद भी है। पूछताछ में पुलिस को शकूर ने बताया कि पाकिस्तान जाने के बारे में कॉन्ग्रेस नेता और पूर्व कैबिनेट मंत्री सालेह मोहम्मद को हर बार पता होता था। एक बार तो शकूर को पाकिस्तान जाने के लिए सालेह के कार्यालय से आर्थिक सहायता भी दी गई थी।
जाँच एजेंसियों को शकूर खान के खिलाफ देश की जासूसी करने के कई अहम साक्ष्य मिले हैं। सरकारी कर्मचारी होने के बावजूद शकूर ने कई बार पाकिस्तान ती यात्रा बिना सरकार को बताए की थी। इसके अलावा सीमा से सटे हुए क्षेत्रों में शकूर पाकिस्तान के ISI एजेंट्स को गुप्त सूचनाएँ साझा करता था।
दानिश से थी दोस्ती
रिपोर्ट्स के अनुसार, शकूर ने दानिश उर रहीम दोस्ती होने की बात कबूली है। बता दें कि दानिश पाकिस्तानी उच्चायोग में अधिकारी था और साथ में ISI के लिए भारत की जासूसी कर रहा था। इसके बाद भारत सरकार ने उसे ‘पर्सोना नॉन ग्राटा’ यानी देश के लिए अवांछित व्यक्ति करार देकर पाकिस्तान वापस भेज दिया था।
शकूर के मोबाइल फोन के डेटा को भी रिकवर किया गया था। जाँच एजेंसियों ने जब उससे इस डेटा में शामिल चैट और अन्य रिकॉर्ड पर सवाल पूछे तो शकूर ने चुप्पी साध ली।
शकूर को जैसलमेर से गिरफ्तार किया गया था। पाकिस्तान के लिए जासूसी करने की पुष्टि होने के बाद सुरक्षा एजेंसियों ने उसे गिरफ्तार कर 3 जून को कोर्ट में पेश किया। कोर्ट ने जाँच एजेंसियों को शकूर को 7 दिन की रिमांड पर लेने की मंजूरी दी है।
अफ्रीका के इस्लामी मुल्क मोरक्को में बकरीद पर कुर्बानी पर रोक लगा दी गई है। मोरक्को में 99 फीसदी मुस्लिम आबादी है, इसके बावजूद ये फैसला किंग मोहम्मद VI ने लिया है। इस रोक की दुनिया भर में चर्चे हैं। मोरक्को ने अपना पशु बाजार बंद कर दिया है। किंग ने अपने आदेश में बकरे समेत किसी भी पशु की कुर्बानी नहीं देने का आदेश दिया है। इस आदेश को लागू कर दिया गया है।
क्यों लगाई गई पशु की कुर्बानी पर रोक?
किंग मोहम्मद VI ने रोक के पीछे आर्थिक और पर्यावरण संकट की बात कही है। देश में पिछले 7 साल से गंभीर सूखा पड़ा हुआ है। फसलों की पैदावार नहीं हो पा रही है। पशुओं को चारे और पानी की किल्लत हो रही है। इसकी वजह से पशुओं की संख्या में 33 फीसदी की कमी आई है। वहीं चारे की कीमत 50 फीसदी बढ़ गए हैं। इसका असर किसानों और पशुपालकों पर पड़ा है। इसके अलावा माँस की कीमत में इजाफा हुआ है। इससे गरीब और मध्यम वर्ग के लिए ‘कुर्बानी’ की व्यवस्था करना मुश्किल हो गया है।
किंग मोहम्मद VI मोरक्को के मजहबी प्रमुख भी हैं। उनका कहना है कि इस साल बदहाली की स्थिति है ऐसे में बकरीद पर कुर्बानी नहीं देना इस्लाम के सिद्धांतों के अनुरूप है। किंग के मुताबिक इस्लाम में कुर्बानी को अच्छा माना गया है लेकिन ये अनिवार्य नहीं है। इसलिए ‘प्रतिकात्मक कुर्बानी’ भी दी जा सकती है।
पशुओं की खरीद-बिक्री बंद
पशुओं की खरीद-बिक्री को रोकने के लिए पशु बाजारों और मंडियों को बंद कर दिया गया है। देशभर के गवर्नरों और स्थानीय प्रशासन को इसे सख्ती से लागू करने के आदेश दिये गये हैं। बकरीद से पहले आम तौर पर जिन बाजारों में जबरदस्त भीड़भाड़ होती थी और पशुओं की खरीद बिक्री होती थी वहाँ अब शांति छाई हुई है।
मोरक्को का ये कदम दुनिया भर के मुस्लिम समुदाय के लिए उदाहरण है। किंग ने इस साल की शुरुआत में ही मोरक्को की जनता से पारंपरिक बलि से दूर रहने की अपील की थी, ताकि माँस की बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाया जा सके और पशुधन की वृद्धि हो।
ऑस्ट्रेलिया से मँगाई जा रही 1 लाख भेड़ें
मोरक्को ने माँस और पशुओं के आयात पर टैक्स में कटौती की है। मोरक्को अब ऑस्ट्रेलिया से 1 लाख भेड़ों का आयात करने जा रहा है। ऐसा देश में माँस की कमी को दूर करने के लिए किया जा रहा है। मोरक्को सरकार ने 6.2 बिलियन दिरहम यानी ₹ 532.66 करोड़ का कार्यक्रम शुरू किया है।
इसका मकसद पशुपालकों को आर्थिक सहायता मुहैया करना और पशुओं की वृद्धि करना है। पशुओं के लगातार कटने से उनकी संख्या में उल्लेखनीय कमी आई है। किंग के इस फैसले का आम तौर पर लोगों ने स्वागत किया है लेकिन कई कट्टरपंथी संगठनों ने इसे मजहबी मामलों में दखल बताया है।
न्यूजीलैंड की संसद में एक सांसद लौरा मैकक्लुरे ने अपनी फर्जी नग्न डीपफेक तस्वीर इसलिए दिखाई, जिससे लोगों को जानकारी मिल सके, कि AI-जेनरेटेड पोर्नोग्राफी का इस्तेमाल करना कितना गंभीर साबित हो सकता है। महिला सांसद ने बताया कि यह तस्वीर उन्होंने केवल 5 मिनट में ऑनलाइन से बनाई थी। सासंद लौरा मैकक्लुरे जानती थीं कि यह असली नहीं है, फिर भी यह इतनी वास्तविक लग रही थी कि उन्हें डर लगा।
मैकक्लुरे का मानना है कि डीपफेक पोर्न असली नग्न तस्वीरों जितना ही हानिकारक है और इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए कानून में बदलाव की आवश्यकता है। मैकक्लुरे ने युवा पीढ़ी को इस तकनीक के खतरों के बारे में जागरूक करने पर जोर दिया, क्योंकि इसका इस्तेमाल अक्सर ब्लैकमेल और उत्पीड़न के लिए किया जाता है, जिसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
मैकक्लुरे ने एक उदाहरण भी दिया। इसमें ऑस्ट्रेलिया में हाल के मामलों और न्यूजीलैंड में एक 13 साल की लड़की द्वारा आत्महत्या के प्रयास से पता चलता है। साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ सुसान मैकलिन भी मानती हैं कि इस समस्या का समाधान केवल तकनीकी नियंत्रण में नहीं है, बल्कि सामाजिक जागरूकता और शिक्षा में भी है।
‘डीपफेक’ क्या है और ये कैसे काम करता है?
डीपफेक एक AI-आधारित तकनीक है जो किसी एक व्यक्ति के चेहरे को दूसरे के चेहरे से बदलकर फर्जी वीडियो, फोटो और ऑडियो बनाती है। यह इतनी प्रभावी हो सकती है कि असली और नकली में अंतर करना मुश्किल हो जाता है। इसका सबसे अधिक उपयोग फर्जी पोर्न वीडियो बनाने के लिए किया जाता है।
एनकोडर और डीकोडर: इसमें उन दो चेहरों की ढेर सारी तस्वीरें और वीडियो एक AI प्रोग्राम ‘एनकोडर’ में डाले जाते हैं, जिनके चेहरों को आपस में बदलना है। एनकोडर इन चेहरों में समानताएं ढूंढता है और उन्हें मिलाकर एक नई कंप्रेस्ड इमेज बनाता है। फिर ‘डीकोडर’ उस कंप्रेस्ड इमेज को इस तरह से फिर से बनाता है कि यह असली लगे, यानी यदि मूल व्यक्ति रो रहा है, तो बदला हुआ चेहरा भी रोता हुआ दिखाई देगा।
जनरेटिव एड्वर्सियल नेटवर्क (GAN): इसमें एक AI को “गड़बड़” (यानी, बदली हुई) तस्वीर और एक “सही” (असली) तस्वीर दी जाती है। AI इन दोनों के कोड को समझकर उन्हें आपस में मिलाता है और एक नई, विश्वसनीय दिखने वाली इमेज या वीडियो बनाता है।
क्या इसे पहचानना नामुमकिन है?
यह बात इस निर्भर करती है कि डीपफेक के जरिए बनाई गई फोटो या वीडियो कितने कौशल से बनाए गए हैं। हालाँकि, इन वीडियो को ध्यान से देखने पर बोलते समय होंठों का मूवमेंट, हाथ-पैर का चलना और चेहरे पर आने वाले अन्य भाव को देख कर पता लगाया जा सकता है कि वीडियो असली है नकली।
समस्या यह है कि अब तकनीक इतनी ज्यादा मजबूत होती जा रही है कि सामान्य व्यक्तियों की पकड़ में कई वीडियो नहीं आने वाली। इनको बहुत ही उच्च क्षमता के कंप्यूटर और आधुनिक तकनीक से लम्बी मेहनत के बाद बनाया जाता है। डीपफेक की समस्या से लड़ने के लिए लगातार बड़े बड़े विश्वविद्यालयों समेत कई कंपनियां रिसर्च कर रही हैं। इसकी कमियों को ढूँढने का लगातार प्रयास किया जाता रहा है जिससे लोग जन सके कि कोई वीडियो फर्जी है नहीं।
केरल हाई कोर्ट ने एक मुस्लिम से हिन्दू बने एक शख्स को स्कूल रिकॉर्ड में अपना धर्म और नाम बदलवाने करवाने की अनुमति दे दी है। हाई कोर्ट ने इसे संवैधानिक अधिकार माना है। इससे पहले केरल सरकार के शिक्षा विभाग ने उस शख्स ने यह अर्जी खारिज कर दी थी।
हाई कोर्ट ने यह फैसला मुस्लिम से हिन्दू बने शख्स की याचिका पर सुनाया है। केरल हाई कोर्ट ने कहा कि अगर कोई व्यक्ति आधिकारिक तौर पर अपना धर्म बदलता है तो उसे स्कूल रिकार्ड्स में भी अपने धर्म की जानकारी अपडेट करना का अधिकार है।
केरल हाई कोर्ट ने क्या कहा?
केरल हाई कोर्ट ने कहा, “यदि किसी व्यक्ति ने बिना किसी दबाव, धोखाधड़ी, अनुचित प्रभाव आदि के अपना धर्म परिवर्तित किया है, तो ऐसे काम को भारत के संविधान की प्रस्तावना के साथ-साथ अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षण प्राप्त होगा।”
उन्होंने आगे कहा, ” संवैधानिक योजना के तहत, प्रत्येक व्यक्ति को न केवल अपनी पसंद के धार्मिक विश्वास को मानने का मूल अधिकार है, बल्कि अपने विश्वास और विचारों को इस तरह से दिखाने का भी अधिकार है, जिससे दूसरों के धार्मिक अधिकार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन न होता हो।”
क्या था मामला?
यह याचिका एक ऐसे शख्स ने लगाई थी जो बचपन से मुस्लिम था लेकिन बाद में हिन्दू बन गया था। इस शख्स का नाम पहले मोहम्मद रियाजुद्दीन था और उसका पिता एक मुस्लिम था जबकि माँ हिन्दू थी। उसकी माँ ने उसे हिन्दू रीति-रिवाज से पाला था।
रियाजुद्दीन के स्कूल रिकॉर्ड में उसे मुस्लिम लिखा गया था। हालाँकि, बड़े होने पर रियाजुद्दीन ने हिन्दू धर्म में आस्था दिखाते हुए आधिकारिक तौर पर इस्लाम छोड़ दिया। उसने यह पूरी कार्यवाही सरकारी तौर की और इसकी सूचना गजट समेत बाकी जगह भी दी।
रियाजुद्दीन ने इसके बाद अपना नाम सुधीन कृष्णा कर लिया। उसने अपना नाम स्कूल रिकॉर्ड में भी बदलना चाहा। हालाँकि, केरल सरकार ने इसकी अनुमति देने से मना कर दिया और कहा कि उनके पास स्कूल के रिकॉर्ड में धर्म बदलने का कोई नियम नहीं है।
इसके खिलाफ रियाजुद्दीन उर्फ़ सुधीन कृष्णा ने केरल हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जहाँ से उन्हें राहत मिली।
क्यू.एस. वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग–2025 में अमेरिका, ब्रिटेन, चीन जैसे देश भारत से बहुत ऊपर हैं। इसी प्रकार द टाइम्स हायर एजुकेशन रैंकिंग–2025 में एशिया के पहले 10 विश्वविद्यालयों में चीन के पाँच, हाँगकाँग के 2, सिंगापुर के 2 और जापान का एक विश्वविद्यालय शामिल है। इस रैंकिंग में भी भारत की स्थिति सम्मानजनक नहीं है। ये रैंकिंग भारत के उच्च शिक्षातंत्र की वर्तमान बदहाली को बयान करती हैं।
भारत के संकटग्रस्त शिक्षातंत्र का पुनरुत्थान करने और उसे गुणवत्तापूर्ण, पेशेवर और प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए लंबे समय से उसके अंतरराष्ट्रीयकरण की आवश्यकता महसूस की जा रही थी। इसी बात को ध्यान में रखते हुए अब उच्च प्रतिष्ठित विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में परिसर खोलने की अनुमति दी जा रही है ताकि भारत के शैक्षिक परिदृश्य में गुणात्मक सुधार किया जा सके।
विदेशी विश्वविद्यालयों के भारत में प्रवेश के आवश्यक कारकों में से एक भारत की विशाल और निरंतर बढ़ती छात्र आबादी है। भारतीय छात्रों के बीच अंतरराष्ट्रीय शिक्षा की भारी माँग है। सत्र 2023-24 में विदेश में पढ़ने वाले भारतीय छात्रों की संख्या जहाँ लगभग 15 लाख थी, वहीं 2024-25 में यह संख्या करीब 18 लाख हो गयी। पिछले 10 साल के आँकड़ों का अध्ययन करने से स्पष्ट होता है कि यह संख्या 15-20 प्रतिशत वार्षिक की दर से क्रमशः बढ़ रही है।
कनाडा, अमेरिका और ब्रिटेन स्थित संस्थान भारतीय छात्रों के सबसे पसंदीदा तीन अध्ययन स्थल हैं। इनके बाद जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया और फ़्रांस जैसे देशों के संस्थान हैं। इतनी बड़ी संख्या में भारतीय छात्रों के अध्ययन हेतु विदेश जाने से हमारे धन का लगभग 40 बिलियन अमेरिकी डॉलर (₹34,14,14,36,40,000-34 लाख करोड़ रुपए से अधिक) बाह्यप्रवाह हो रहा है। यह भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 3% है।
इसका सीधा असर भारतीय वित्तीय और मानव पूँजी के चिंताजनक अभाव के रूप में दिखेगा। वित्तीय घाटे के अलावा, राष्ट्र को अपनी भारी मानव प्रतिभा का भी नुकसान झेलना पड़ रहा है, क्योंकि विदेशों में अध्ययन हेतु गए छात्र अक्सर वहीं काम करते रहने और बसने का विकल्प चुनते हैं। यह प्रतिभा पलायन और धन का बाह्यप्रवाह चिंताजनक है।
अभी हाल ही में ब्रिटेन के लिवरपूल विश्वविद्यालय ने भारत के बेंगलुरु शहर में अपना परिसर प्रारम्भ करने का निर्णय लेते हुए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और शिक्षा मंत्रालय के साथ समझौता-पत्र पर हस्ताक्षर किये हैं। अब तक भारत में पाँच अन्य प्रतिष्ठित विदेशी संस्थान अपने परिसर खोलने की दिशा में कदम बढ़ा चुके हैं। इनमें ब्रिटेन का साउथैम्प्टन विश्वविद्यालय गुरुग्राम में, अमेरिका का इलिनॉयस इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी मुंबई में, ऑस्ट्रेलिया की डाकिन यूनिवर्सिटी और वोलोंगोंग यूनिवर्सिटी गिफ्ट सिटी, गुजरात में अपने परिसर खोल रहे हैं।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने आशा व्यक्त की है कि इस वर्ष कम से कम 15 प्रतिष्ठित विदेशी विश्वविद्यालय भारत में अपने परिसर प्रारंभ करेंगे। यह भारतीय उच्च शिक्षा क्षेत्र के अंतरराष्ट्रीयकरण की महत्वाकांक्षी परियोजना है। भारत में ऐसे नामचीन विश्वविद्यालयों द्वारा परिसर स्थापना भारत की वैश्विक शैक्षणिक साझेदारी की दिशा में मील का पत्थर साबित होगी। यह भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, अन्तर्निहित अवसरों और संभावनाओं का परिणाम है। यह शैक्षणिक साझेदारी भारत को एक नॉलेज इकॉनोमी बनाते हुए उसकी सॉफ्टपॉवर को भी नई धार देगी।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP)-2020 में उच्च शिक्षा के अंतरराष्ट्रीयकरण का प्रस्ताव है। इसी संकल्पना के अनुरूप विश्वविद्यालय अनुदान आयोग प्रतिष्ठित विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में परिसर स्थापित करने की अनुमति प्रदान कर रहा है। विदेशी विश्वविद्यालय/संस्थान अब भारत में अपने परिसर स्थापित कर पा रहे हैं,क्योंकि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा भारत में विदेशी संस्थानों की स्थापना और संचालन के लिए ‘भारत में विदेशी उच्च शिक्षण संस्थानों के परिसर की स्थापना और संचालन विनियम -2023’ को लागू कर दिया गया है। इससे भारतीय उच्च शिक्षा के स्तर में गुणात्मक वृद्धि होगी और छात्रों के भारत छोड़कर विदेश जाने की संख्या में भी काफी हद तक कमी आएगी।
ये विनियम विदेशी विश्वविद्यालयों को उनकी प्रवेश प्रक्रिया, शुल्क संरचना, शिक्षकों की सेवाशर्तें और पारिश्रमिक तय करने और उनके द्वारा अर्जित धनराशि को स्थापना के दस वर्ष बाद स्वदेश भेजने की स्वायत्तता प्रदान करते हैं। यह भी तय किया गया है कि ये विश्वविद्यालय देश भर के अपने सभी परिसरों में ऑनलाइन या दूरस्थ शिक्षा के बजाय ऑफलाइन माध्यम में पूर्णकालिक कार्यक्रम प्रदान करेंगे। सिर्फ वही विदेशी संस्थान भारत में अपने परिसर स्थापित कर सकेंगे जिन्होंने समग्र अथवा विषय-वार वैश्विक रैंकिंग के शीर्ष 500 में अपनी जगह बनाई हो या कि अपने गृह क्षेत्र में एक प्रतिष्ठित संस्थान का दर्जा प्राप्त कर रखा हो। नियमानुसार प्रारंभिक स्वीकृति 10 वर्षों के लिए दी जाएगी।
इससे भारतीय छात्रों को सस्ती कीमतों पर विदेशी विश्वविद्यालयों से प्राप्त होने वाली डिग्री, कौशल और शिक्षण अनुभव प्राप्त होगा। साथ ही भारत अध्ययन हेतु एशिया और अफ्रीका जैसे महाद्वीपों के छात्रों के लिए एक आकर्षक और वहनीय वैश्विक गंतव्य भी बनेगा। दिलचस्प बात यह है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली मौजूदा सरकार ने भारत में उच्च शिक्षा क्षेत्र के अंतरराष्ट्रीयकरण हेतु गंभीर पहल की है, क्योंकि विदेशी संस्थानों के परिसरों को भारत में स्थापित करवाने के ऐसे प्रयास पहले भी हो चुके हैं।
पहली बार वर्ष 1995 में एक विधेयक लाया गया था लेकिन वह आगे नहीं बढ़ सका। साल 2007 में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) सरकार के दौरान भी ऐसा ही एक प्रस्ताव सामने आया था, जिसका क्रियान्वयन न हो सका। शिक्षा का यह प्रारूप पहले से ही कई देशों में अपनाया जा चुका है; उदाहरण के लिए – न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के परिसर आबूधाबी और शंघाई में भी हैं। इनके अलावा इसके शिक्षण केंद्र बर्लिन, ब्यूनस आयर्स और मैड्रिड जैसे शहरों में भी हैं। इस प्रकार भारतीय शिक्षा प्रणाली में, यह समयबद्ध और ठोस कार्य योजना एक सर्वसमावेशी और वैश्विक दूरंदेशी दृष्टि की परिचायक सिद्ध होगी।
भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों के परिसरों की स्थापना उच्च अध्ययन के लिए विदेश जाने की इस प्रवृत्ति को निश्चित तौर पर कम कर सकती है और साथ ही विदेशी मुद्रा की आवश्यकता को भी कम कर सकती है। भारतीयों के साथ-साथ उपमहाद्वीप और अधिसंख्य विकासशील देशों के छात्र भी इन संस्थानों में शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं जो कि बहु-संकृतिवाद को प्रोत्साहित करते हुए अन्यान्य देशों के साथ गहरे संबंध स्थापित करने में भारत की मदद करेगा।
कुशल कार्यबल के लिए बहुत सारे रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे क्योंकि नए परिसरों की स्थापना के लिए विशाल कार्यबल, निर्माण-सामग्री आदि की आवश्यकता होगी। साथ ही विदेशी विश्वविद्यालयों के पास बेहतर संसाधन उपलब्ध हैं; जैसे धन की उपलब्धता, प्रशिक्षित एवँ पेशेवर संकाय, आधुनिक बुनियादी ढाँचा, बेहतर शिक्षण /शोध पद्धतियाँ और तकनीकी संसाधन। इसलिए विदेशी विश्वविद्यालय प्रतिभाशाली प्राध्यापकों और शोधकर्ताओं को बेहतर काम करने हेतु अवसर प्रदान करते हुए देश में अनुसंधान एवँ विकास को प्रोत्साहित करेंगे।
इस प्रकार विदेशी संस्थानों का भारत में प्रवेश प्रतिभा पलायन रोकने के साथ कम लागत पर भारतीय छात्रों को बेहतरीन एवँ प्रतिभाशाली छात्रों के साथ शोध और अध्ययन करने का अवसर/अनुभव प्रदान करेगा। यह अनुमान लगाया गया है कि यदि भारत में पर्याप्त विदेशी विश्वविद्यालय स्थापित हो जाते हैं तो उच्च शिक्षा के लिए देश छोड़ने वाले 75 प्रतिशत भारतीय छात्र भारत में ही रह सकते हैं। यह निश्चित रूप से हमारी पूँजी के बहिर्वाह और प्रतिभा पलायन को रोकेगा। इसके अलावा सस्ती और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराते हुए ‘ग्लोबल साउथ’ के बहुत से छात्रों को आकर्षित करते हुए विदेशी धन और प्रतिभा का आगमन भी सुनिश्चित करेगा।
भारत में 1000 से अधिक विश्वविद्यालय और 42000 से अधिक महाविद्यालय हैं। विश्व का सर्वाधिक वृहत उच्च शिक्षा तंत्र होने के बावजूद उच्च शिक्षा में भारत का सकल नामांकन अनुपात (G।R) सिर्फ 27.1% है, जो कि विश्व में सबसे कम है। ऐसे कई क्षेत्र हैं, जहाँ वर्तमान भारतीय उच्च शिक्षा प्रणाली में सुधार हेतु उचित कदम उठाए जाने की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए, हमारा कोई भी विश्वविद्यालय QS रैंकिंग में शीर्ष 100 में नहीं है।
भारतीय अकादमिक संस्थानों का जोर मुख्य रूप से अंक देने और डिग्री बाँटने पर होता है। इसलिए अनुसंधान और विकास की अनदेखी कर दी जाती है। अनावश्यक सरकारी हस्तक्षेप, योग्य शिक्षकों और कर्मचारियों की कमी, कम टर्नओवर/निवेश, छात्रों का ड्रॉपआउट और राजनीतिकरण जैसी शिक्षण के मोर्चे की चुनौतियाँ भारतीय अकादमिक संस्थाओं के मूल्यवर्द्धन की बाधाएँ हैं।
नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के घोषित लक्ष्य, जो कि उच्च शिक्षा के माध्यम से मानव की पूर्ण क्षमता को विकसित करते हुए एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में उसकी राष्ट्र की प्रगति में भूमिका सुनिश्चित करना है, को ध्यान में रखते हुए हमें सीखने की प्रक्रिया में बदलाव कर वर्तमान समय की माँग के अनुरूप नए दृष्टिकोण को अपनाने की आवश्यकता है। समय आ गया है कि उच्च गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और विकसित सूचना तकनीक के माध्यम से शैक्षणिक स्वायत्तता, न्यूनतम शासन, दूरदर्शी प्रबंधन, बेहतर फैकल्टी, उद्योगों और समाज के साथ समन्वय और छात्रों की बहुआयामी सक्रियता और कौशलपरक शिक्षा के मद्देनज़र भारत में उच्च शिक्षा के स्तर को बढ़ाने हेतु विदेशी संस्थानों का स्वागत किया जाय।
कैरियर परामर्श और रोजगारपरकता भी एक क्षेत्र है जिसमें भारतीय संस्थान अपने विदेशी समकक्षों से बहुत पीछे हैं। हमारा पाठ्यक्रम उन लोगों से चर्चाओं पर आधारित नहीं होता है जो अंततः हमारे छात्रों को रोजगार देते हैं या अपने यहाँ काम पर रखते हैं।
वहीं दूसरी तरफ, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त शैक्षणिक संस्थान भविष्य की संभावनाओं को समझने के लिए लगातार व्यापार, उद्योग, समाज और सरकार के साथ जुड़े रहते हैं। नौकरियों की संख्या और कर्मचारियों की माँगों में तेजी से बदलाव हो रहा है जो सीधे – सीधे शिक्षा प्रदाताओं को यह जिम्मेदारी देता है कि वे इस बदलाव का अनुमान लगाएँ और छात्रों को इसके अनुरूप तैयार करें।
विदेशी विश्वविद्यालयों ने अनुमान लगाने, परखने, छात्रों को तैयार करने की कला में महारत हासिल की है। विदेशी संस्थानों के आने की वजह से हमारे देश में में भी सीखने के लिए ऐसे अनुकूल पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण होने की सम्भावना है जिसका सीधा प्रभाव छात्रों के दृष्टिकोण और व्यवहार पर पड़ेगा और शिक्षा के फलागम में वृद्धि करेगा।
विदेशी विश्वविद्यालयों के भारत में आगमन से भारत के उच्च शिक्षा क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा का भाव भी पैदा होगा। ख्यातिलब्ध प्रोफेसरों, गहन शोधकर्ताओं और परिश्रमी और प्रतिभाशाली छात्रों को आकर्षित करने हेतु विदेशी विश्वविद्यालय भारत में मौजूद विश्वविद्यालयों के साथ स्वस्थ होड़ करेंगे। विदेशी विश्वविद्यालयों के साथ शोध परियोजनाओं, पारस्परिक सहयोग और नवाचार, प्रतिभाशाली छात्रों और शिक्षकों के लिए प्रभावी ढंग से प्रतिस्पर्धा हेतु भारतीय विश्वविद्यालय अपने स्वयं के मानकों में वृद्धि को प्रेरित होंगे।
ऐसी स्वस्थ प्रतिस्पर्धा विश्वविद्यालयों में शिक्षा के समग्र स्तर को सुधारने में मदद करेगी। भारतीय छात्रों को कम दाम में सर्वोत्तम शिक्षा मिलेगी। इन विश्वविद्यालयों द्वारा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त कोर्स भारत में लाने से भारतीय छात्रों को विश्व स्तर पर क्रेडिट हस्तांतरण का मौका भी प्राप्त होगा। इसलिए ऐसी अपेक्षा की जा रही है कि विदेशी विश्वविद्यालय भारतीय छात्रों की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुँच बढ़ाने में मदद करेंगे और भारत की आबादी को समर्थ, सक्षम और समृद्ध बनाने में भी सहायता प्रदान करेंगे।
भारत के लिए, छात्र गतिशीलता और वैश्विक स्तर पर छात्रों का आदान-प्रदान कोई नई अवधारणा नहीं है। तक्षशिला, नालंदा, वल्लभी, विक्रमशिला, शारदा, भद्रकाशी, पुष्पगिरी और उदन्तगिरी जैसे प्राचीन भारतीय विश्वविद्यालय 7वीं शताब्दी ईसा पूर्व में शिक्षा के वैश्वीकरण के प्रतिष्ठित उदाहरण हैं। दुनिया भर के विभिन्न विषयों के हजारों छात्रों को ये विश्वविद्यालय आकर्षित करते थे। अब वैश्विक ब्रांडों के प्रवेश से देश में अत्याधुनिक विश्वस्तरीय परिसरों की संख्या में वृद्धि होगी। भारत फिर से उच्च शिक्षा के एक वैश्विक केंद्र के रूप में उभर सकता है और साथ ही दुनिया के विभिन्न हिस्सों के छात्रों को आकर्षित कर सकता है।
इससे न केवल विदेशी मुद्रा अर्जन के रूप में वित्तीय और मौद्रिक लाभ होगा बल्कि यह भारत के सॉफ्ट पावर को भी बढ़ावा देगा। दूसरी ओर, संभावित विदेशी विश्वविद्यालय, भारत में खुद को स्थापित करने हेतु एवँ स्थानीय वास्तविकताओं के अनुरूप बेहतर शैक्षणिक परिसर स्थापित करने हेतु विश्वसनीय स्थानीय उत्प्रेरक संगठनों, पेशेवर एजेंसियों और रचनात्मक व्यक्तियों के साथ सहयोग के आकांक्षी होंगे जो सीधे स्थानीय प्रतिभाओं को रोजगार के अवसर प्रदान करेगा। इसके अलावा, ढाँचागत विकास से भारत में धन का सुलभ प्रवाह सुनिश्चित होगा जिसके परिणामस्वरूप हमारी अर्थव्यवस्था में गतिशीलता आएगी।
उच्च शिक्षातंत्र में सरकारी निवेश बढ़ाने की भी आवश्यकता है। अगर सरकार ऐसा नहीं करना चाहती है तो पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप बढ़ाने की दिशा में विचार किया जा सकता है। विदेशी संस्थानों और स्वदेशी औद्योगिक घरानों को 49 प्रतिशत हिस्सेदारी देकर निवेश बढ़ाया जा सकता है। ऐसा करके ही धन की कमी, खस्ताहाल आधारभूत ढाँचे और लालफीताशाही से जूझ रहे भारतीय संस्थानों में प्राण फूँके जा सकते हैं। इन संस्थानों के प्रबंधन और प्रशासनिक तंत्र को भी राजनीतिक हस्तक्षेप से बचाने एवँ पेशेवर बनाने की आवश्यकता है।
भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों के परिसरों की स्थापना एक स्वागत योग्य कदम है। अकादमिक व्यवस्था, भूस्वामित्व, कराधान और शिक्षकों की भर्ती आदि से संबंधित नियामक तंत्र इत्यादि चिंता के सामान्य विषय हैं। पूर्व चेतावनी के रूप में, इस बात को ध्यान में रखना चाहिए कि विदेशी संस्थाएँ भारत में अपने परिसरों की स्थापना सहयोग और ज्ञान-साझाकरण को बढ़ावा देने हेतु करें, न कि इन मुख्य मुद्दों को दरकिनार कर, सिर्फ व्यावसायिक हितों के लिए काम करने वाली शिक्षा की दुकानें बन कर रह जाएँ।
इन संस्थाओं को केवल आभिजात्य और अमीर वर्ग के लिए अवसर न बनकर हाशिए पर रहने वाले और वंचित वर्गों से आने वाले छात्रों के हितों की रक्षा भी करनी चाहिए और उनके समावेशन के लिए विशेष प्रावधान भी करने चाहिए। इसलिए सरकार को शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009 के दायरे को बढ़ाने की दिशा में विचार करना चाहिए। प्रतिष्ठित विदेशी विश्वविद्यालयों को आकर्षित करने के अलावा उपरोक्त चिंताओं का भी ध्यान रखने की आवश्यकता है। ऐसा करके ही भारतीय उच्च शिक्षा प्रणाली का लक्षित और वास्तविक अंतरराष्ट्रीकरण सुनिश्चित किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने पश्चिम बंगाल में 2021 विधानसभा चुनावों के दौरान हुए हमलों को लेकर TMC पर कड़ी टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि भाजपा का समर्थन करने वाले हिंदू परिवारों और महिलाओं पर हुए ये हमले ‘लोकतंत्र की जड़ों पर गहरा हमला’ हैं।
इन घटनाओं को अंजाम देने वाले तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 6 कार्यकर्ताओं की जमानत सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दी है, जिन्हें पहले पश्चिम बंगाल पुलिस की कथित मिलीभगत से जमानत मिल गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाई कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ फैसला सुनाया, जिसमें शेख जमीर हुसैन, शेख नूरई, शेख अशरफ, शेख करीबुल और जयंत डोन को जमानत दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि यह हमला चुनाव परिणाम घोषित होने के दिन किया गया था। इससे स्पष्ट होता है कि इन हमलों का मकसद केवल बदला लेना था, क्योंकि पीड़ित परिवारों ने भाजपा का समर्थन किया था।
अदालत का कड़ा रुख और निर्देश
जस्टिस मेहता ने टिप्पणी की, “यह घटना न केवल मानवता के खिलाफ है, बल्कि यह लोकतंत्र के खिलाफ भी है।” कोर्ट ने खासकर महिलाओं के साथ हुए दुर्व्यवहार का जिक्र करते हुए कहा कि अगर आरोपित जमानत पर रहेंगे तो निष्पक्ष और स्वतंत्र सुनवाई संभव नहीं होगी।
कोर्ट ने निर्देश दिया है कि इस मामले की सुनवाई 6 महीने के भीतर पूरी की जाए। साथ ही, पीड़ित परिवारों और गवाहों को पूरी सुरक्षा दी जाए ताकि वे बिना किसी डर के अदालत में गवाही दे सकें। इसके लिए पश्चिम बंगाल के गृह सचिव और पुलिस प्रमुख को आदेश दिया गया है कि वे इन सुरक्षा निर्देशों का पालन सुनिश्चित करें।
TMC के खिलाफ न्यायिक हस्तक्षेप और कानून-व्यवस्था पर सवाल
यह कोई पहला मामला नहीं है, जब TMC कार्यकर्ताओं पर इस तरह के आरोप लगे हैं। हाल ही में मुर्शिदाबाद में हुई हिंसा में भी TMC कार्यकर्ताओं पर हिंदू परिवारों पर हमला करने का आरोप लगा था, जिसमें 3 लोगों की मौत हुई थी।
पीड़ित हिंदू परिवारों पर TMC कार्यकर्ताओं ने इसलिए हमला किया था क्योंकि वे भाजपा का समर्थन कर रहे थे। एक पीड़ित महिला को अपमानित किया गया और उनके घर को भी लूटा गया। पीड़ित महिला ने हमला रोकने के लिए खुद पर कैरोसिन डाला, जिसके बाद मुस्लिम भीड़ वहाँ से भाग गई।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस ने कई मामले दर्ज नहीं किए और गवाहों को सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं दी गई। परिणाम यह हुआ कि शिकायतकर्ता को गाँव छोड़कर जाना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट के इस हस्तक्षेप से आरोपितों की जमानत रद्द हुई और सुरक्षा सुनिश्चित करने का आदेश मिला। यह पूरा मामला पश्चिम बंगाल में कानून और व्यवस्था की स्थिति पर गंभीर सवाल उठाता है और इन घटनाओं के दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग तेज हो गई है।
बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने 1 जून 2025 को जमात-ए-इस्लामी को बहाल कर दिया है, जिससे एक दशक लंबे प्रतिबंध के बाद मुख्यधारा की राजनीति में इसकी वापसी का रास्ता साफ हो गया है।
बांग्लादेश के सुप्रीम कोर्ट ने जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश को राजनीतिक पार्टी के रूप में एक बार फिर पंजीकृत कर लिया है। इसके अलावा पार्टी की छात्र शाखा ‘इस्लामी छात्र शिबिर’ का राजनीतिक पंजीकरण भी बहाल कर दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट बांग्लादेश के इस फैसले के बाद ये संगठन चुनाव आयोग की सूची में शामिल हो सकता है। जून 2026 में बांग्लादेश में आम चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में जमात-ए-इस्लाम के शामिल होने का रास्ता साफ हो गया है।
अगस्त 2013 में बांग्लादेश के उच्च न्यायालय ने ही जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध लगा दिया था। कोर्ट को ये सबूत मिले थे कि कट्टरपंथी संगठन ने चुनाव नियमों का उल्लंघन किया था और उसके पास एक चार्टर था जो बांग्लादेश को एक संप्रभु और स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में मान्यता देने से इनकार करता था। साथ ही चार्टर देश की ‘धर्मनिरपेक्ष भावना’ के खिलाफ था।
Bangladesh top court restores largest Islamist party
ये फैसला ऐसे समय आया है जब कुछ दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने जमात ए इस्लामी से जुड़े 1971 युद्ध के अपराधी अजहरुल इस्लाम को बरी कर दिया था। इससे देश में कट्टरपंथी इस्लामिक संगठनों को बढ़ावा मिला है, जिन्हें अब मुहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली सरकार का समर्थन हासिल है।
इतिहास के आईने में जमात-ए-इस्लामी
जमात-ए-इस्लामी की स्थापना 1941 में अबुल अला मौदूदी नामक एक इस्लामी चरमपंथी ने की थी। इसे पाकिस्तान में दो बार 1959 और 1964 में प्रतिबंधित किया गया था।
बांग्लादेश की स्थापना के तुरंत बाद देश के पहले राष्ट्रपति और संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान ने 1971 के बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान पाकिस्तान का साथ देने और बंगाली आबादी के खिलाफ नरसंहार करने के कारण चरमपंथी संगठन पर प्रतिबंध लगा दिया था। हालाँकि शेख मुजीबुर रहमान की हत्या के बाद ये प्रतिबंध हटा लिया गया
शेख मुजीबुर रहमान की बेटी शेख हसीना ने इसके बाद अवामी लीग सरकार का नेतृत्व किया। अगस्त 2024 में आतंकवाद विरोधी अधिनियम के तहत जमात ए इस्लामी और उसके छात्र संगठन ‘इस्लामी छात्र शिबिर’ पर एक बार फिर प्रतिबंध लगा दिया गया।
ये भी ध्यान देने वाली बात है कि इस चरमपंथी संगठन को शुरू से ही खालिदा जिया के नेतृत्व वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी का समर्थन प्राप्त है।
मई 1979 में जियाउर रहमान के शासन में जमात-ए-इस्लामी ने सक्रिय राजनीति में कदम रखा और 1991 में खालिदा जिया की पार्टी का समर्थन किया। इससे बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी को सत्ता हासिल हुई।
1971 बांग्लादेश मुक्ति युद्ध और जमात-ए-इस्लामी की भूमिका
दिसंबर 1970 में हुए आम चुनावों में शेख मुजीबुर रहमान के नेतृत्व में अवामी लीग ने पूर्वी पाकिस्तान की प्रांतीय विधायिका में भारी बहुमत (167 सीटें) हासिल की।
पूर्वी पाकिस्तान के मामलों में कट्टरपंथी नेताओं द्वारा लगातार हस्तक्षेप से रहमान परेशान थे। इसलिए रहमान ने अधिक क्षेत्रीय स्वायत्तता की माँग शुरू कर दी थी।
यह भारतीय उपमहाद्वीप के विभाजन के ठीक 13 वर्ष के भीतर की बात है, जब मुसलमानों ने अपने लिए एक अलग देश की माँग की थी।
इस्लामिक देश होने के बावजूद पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान एक-दूसरे के खिलाफ हो गए। 1970 के चुनावों में पश्चिमी पाकिस्तान में सबसे ज्यादा सीटें हासिल करने वाली पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) क्षेत्रीय स्वायत्तता के खिलाफ थी।
पीपीपी के नेता ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने शेख मुजीबुर रहमान की माँगों को नकार दिया। उन्होंने धमकी दी थी कि अगर पीपीपी को पूर्वी पाकिस्तान की सरकार में शामिल नहीं किया गया तो वे विधानसभा का बहिष्कार करेंगे और प्रांतीय विधानमंडल भंग करने की माँग करेंगे।
पूर्वी पाकिस्तान को स्वायत्तता न दिए जाने से नाराज शेख मुजीबुर रहमान ने 7 मार्च 1971 को सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू किया। भुट्टो को गृह युद्ध की आशंका थी। इसको देखते हुए राष्ट्रपति याह्या खान ने मार्शल लॉ घोषित कर दिया। रहमान और दूसरे नेताओं को गिरफ्तार करने के आदेश दिए गए।
आंदोलन को नियंत्रित करने के लिए पाकिस्तानी फौज ने 26 मार्च 1971 को ऑपरेशन सर्चलाइट शुरू किया। राष्ट्रपति याह्या खान और भूट्टो के रवैये से निराश रहमान ने पहले ही पश्चिमी पाकिस्तान से स्वतंत्रता का आह्वान कर दिया था।
पाकिस्तानी फौज ने राजारबाग और पीलखाना इलाके में बंगाली समुदाय पर हमला किया । उन्होंने मुजीबुर रहमान को सलाखों के पीछे डाल दिया। पाकिस्तानी फौज के हमले में ढाका विश्वविद्यालय में 9 शिक्षक और 200 छात्र मारे गए।
पाकिस्तानी फौज ने पुराने ढाका, तेजगांव, इंदिरा रोड, मीरपुर, कालाबागान और अन्य स्थानों पर बंगाली नागरिकों पर बर्बर हमला जारी रखा।
उसी रात चटगाँव में पाकिस्तानी फौज ने कई लोगों को गोली मार दी। दैनिक इत्तेफाक, दैनिक संगबाद समेत राष्ट्रीय अखबारों को बंद कर दिया गया और उनके दफ़्तरों में आग लगा दी गई। इस घटना में कई मीडियाकर्मी मारे गए। सामूहिक कब्रें खोदी गईं और आनन-फानन में बुलडोजर से गिरा दी गईं।
ढाका में करीब 700 लोग जलकर मर गए। उन्होंने झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों के घरों को आग लगा दी, जान बचाने के लिए भाग रहे लोगों पर गोलियाँ चलाईं, काली मंदिर को ढहा दिया और सेंट्रल शहीद मीनार को भी नष्ट कर दिया गया।
एक अनुमान के मुताबिक ऑपरेशन सर्चलाइट के दौरान पाकिस्तानी फौज ने 10,000-35,000 बंगालियों को मार दिया था। बांग्लादेश मुक्ति आंदोलन के दौरान कुछ ही महीने में मरने वालों की संख्या बढ़कर 3 लाख से अधिक हो गई थी।
बंगाली आबादी के खिलाफ नरसंहार बढ़ता ही जा रहा था। माना जाता है कि करीब 4 लाख बंगाली महिलाओं के साथ पाकिस्तानी फौज ने बलात्कार किया, इन महिलाओं में से अधिकांश हिंदू थे।
पाकिस्तानी फौज द्वारा मानवता के विरुद्ध किए गए ये सभी अत्याचार और अपराध को जमात-ए-इस्लामी का समर्थन था। ये संगठन उस वक्त ‘अल बद्र’, ‘अल शम्स’ और ‘रजाकार’ नामक तीन सशस्त्र संगठनों का संचालन करते थे।
हालात और खराब हो गए, जिससे पड़ोसी भारत को नरसंहार को रोकने के लिए कदम उठाना पड़ा। 14 दिनों में ए.के. नियाजी के नेतृत्व में पाकिस्तानी फौज ने घुटने टेक दिए और 16 दिसंबर 1971 को बांग्लादेश के रूप में एक नए राष्ट्र का उदय हुआ।
2010 में स्थापित अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण (बांग्लादेश) ने जमात-ए-इस्लामी से जुड़े 10 चरमपंथियों को 1971 के नरसंहार में शामिल पाया । इनके नाम हैं-
अब्दुल कादर मुल्ला (दिसंबर 2013 में फांसी दी गई)
गुलाम आज़म
मुहम्मद कमरुज्जमां (अप्रैल 2015 में फाँसी)
दिलवर हुसैन सईदी
अली अहसान मोहम्मद मुजाहिद (नवंबर 2015 में फांसी दी गई)
अबुल कलाम आज़ाद
मोतीउर रहमान निज़ामी (मई 2016 में निष्पादित)
मीर कासिम अली (सितंबर 2016 में फांसी दी गई)
अबुल कलाम मुहम्मद यूसुफ
चौधरी मुईन-उद्दीन
गुलाम आजम और अबुल कलाम मुहम्मद यूसुफ की मृत्यु 2014 में हुई जबकि दिलवर हुसैन सईदी की मृत्यु 2023 में प्राकृतिक कारणों से हुई। अबुल कलाम आजाद आज तक फरार है। चौधरी मुईन-उद्दीन अब ब्रिटिश नागरिक है और उसे गिरफ्तार नहीं किया गया है।
दिसंबर 2013 से सितंबर 2016 के बीच ‘जमात-ए-इस्लामी’ बांग्लादेश से जुड़े 5 चरमपंथियों को फाँसी पर लटका दिया गया था।
1971 के बाद भी जमात-ए-इस्लामी के निशाने पर हिन्दू
6 दिसंबर 1992 को बाँस की लाठियों और हथियारों से लैस 5000 मुस्लिम भीड़ ने ढाका नेशनल स्टेडियम में भारत और बांग्लादेश के बीच खेले जा रहे क्रिकेट मैच पर धावा बोलने की कोशिश की। हालाँकि पुलिस ने ये कोशिश विफल कर दी। पुलिस ने भीड़ पर आँसू गैस और रबर की गोलियाँ बरसाई।
यूनाइटेड प्रेस इंटरनेशनल की एक रिपोर्ट के अनुसार , 1000 मुस्लिम भीड़ ने ढाका के थाटारी बाजार जिले में स्थित हिंदू शिव मंदिर को तोड़ दिया।
इस्लामिक कट्टरपंथियों ने नरिंदा जिले में एक हिंदू मंदिर पर भी हमला किया और बम विस्फोट में 88 वर्षीय हिंदू पुजारी को गंभीर रूप से घायल कर दिया। मुस्लिम भीड़ ने ढाका में ढाकेश्वरी मंदिर में भी घुसने की कोशिश की।
उन्होंने हिंदुओं की दुकानें भी लूट लीं और कारों को लाठियों और लोहे के रॉड से तोड़ दिया।
बांग्लादेश अल्पसंख्यक मानवाधिकार कॉन्ग्रेस (एचआरसीबीएम) के अनुसार, इस नरसंहार को कट्टरपंथी इस्लामी संगठन जमात-ए-इस्लामी ने अंजाम दिया था , जो सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा थी।
दंगे अचानक नहीं हुए थे, बल्कि सुनियोजित तरीके से करवाए गए। अनुमान है कि 2400 हिंदू महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया और उन्मादी मुस्लिम भीड़ ने 3500 मंदिरों और धार्मिक प्रतिष्ठानों को नष्ट कर दिया।
हिंदू समुदाय के 28000 से ज्यादा घर और 2500 व्यावसायिक प्रतिष्ठान तबाह कर दिए गए। अनुमान है कि इस नरसंहार में 700 हिंदू मारे गए। उस समय के कई प्रमुख राजनेताओं ने माना था कि ये संख्या वास्तविकता से दूर थी।
2001 में जमात-ए-इस्लामी ने अपने सहयोगी बीएनपी के साथ मिलकर बांग्लादेश में चुनाव जीता था, जिसके बाद हिंदू समुदाय पर जमकर अत्याचार किए गए। योजनाबद्ध नरसंहार के बाद कई बांग्लादेशी हिंदुओं को देश छोड़कर भागने पर मजबूर होना पड़ा।
बीबीसी की एक रिपोर्ट में कहा गया है, “हिंदू नेताओं ने कहा कि उनके खिलाफ हत्या, लूटपाट और बलात्कार समेत कई हमले हुए, जो परिणाम घोषित होने के बाद शुरू हुए। उन्होंने कहा कि इस्लामिक कट्टरपंथियों और बीएनपी ने उन्हें इसलिए निशाना बनाया क्योंकि उन्होंने उन चुनावों में प्रतिद्वंद्वी अवामी लीग का समर्थन किया था।
2013 में हिन्दू मंदिर पर हमला हुआ
फरवरी 2013 में जमात-ए-इस्लामी और उसके छात्र संगठन ‘इस्लामी छात्र शिबिर’ ने 50 से ज्यादा हिंदू मंदिरों पर हमला किया और 1,500 से ज्यादा घरों और व्यापारिक प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया। उन्होंने बांग्लादेश के कई जिलों जैसे गैबांधा, चटगाँव, रंगपुर, सिलहट, बोगरा आदि में आगजनी की ।
एक साल बाद फरवरी 2014 में बीएनपी सदस्यों और जमात-ए-इस्लामी चरमपंथियों ने हिंदू समुदाय पर 160 हमले किए ।
इस वर्ष 12 फरवरी को, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त कार्यालय (ओएचसीएचआर) ने 104 पृष्ठों की एक रिपोर्ट [पीडीएफ] प्रकाशित की। रिपोर्ट में बांग्लादेश के हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ किए गए अत्याचारों का विवरण दिया गया है।
रिपोर्ट का शीर्षक है ‘बांग्लादेश में जुलाई और अगस्त 2024 के विरोध प्रदर्शनों से संबंधित मानवाधिकार उल्लंघन और दुर्व्यवहार।’
रिपोर्ट में कहा गया है कि हिंदू समुदाय पर अधिकांश हमले पूर्व बांग्लादेशी प्रधानमंत्री शेख हसीना को पद से हटाने की ‘खुशी’ में निकाले गए ‘विजय जुलूसों’ के दौरान हुए।
ओएचसीएचआर ने कहा कि हमलावर बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी के स्थानीय समर्थक थे। रिपोर्ट के पेज 62 में कहा गया है –
” बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी विपक्षी दलों के कुछ स्थानीय सदस्य और समर्थक हिंदू समुदाय पर हुए हमलों और मानवाधिकार हनन के लिए जिम्मेदार हैं। “
सितंबर 2024 में मानवाधिकार कार्यकर्ता और निर्वासित बांग्लादेशी ब्लॉगर असद नूर ने खुलासा किया कि हिंदुओं को ‘जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश’ में शामिल होने के लिए मजबूर किया जा रहा है।
नूर ने बताया कि कट्टरपंथी इस्लामी संगठन के सदस्यों ने लालमोनिरहाट सदर उपजिला के खुनियागाच संघ के कलमाटी वार्ड नंबर 2 में प्रवेश किया। उन्होंने 27 गरीब, बेसहारा हिंदुओं को अपना शिकार बनाया और उन्हें ‘जमात-ए-इस्लामी’ में शामिल होने के लिए मजबूर किया।
असद नूर के अनुसार, कट्टरपंथियों ने पीड़ितों को जान से मारने और देश से निकाल देने की धमकी दी थी। मजबूरन गरीब हिंदुओं को उनके हुक्म का पालन करना पड़ा। जमात-ए-इस्लामी के सदस्यों ने उन्हें कुछ फॉर्म पर हस्ताक्षर करवाए और उन्हें इस्लामी किताबें दीं ताकि उनका धर्मपरिवर्तन कराया जा सके।
जमात-ए-इस्लामी (लालमोनिरहाट शाखा) के सहायक सचिव हाफिज मोहम्मद शाह आलम हिंदुओं को कट्टरपंथी संगठन में जबरन शामिल करने के दौरान मौजूद थे।