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‘आतंकवाद के आरोपित जेल में बंद मुस्लिमों का केस वापस’ – चुनाव के समय अखिलेश यादव ने कहा था, चुनाव फिर आने वाला है

उत्तर प्रदेश के ATS ने अपने एक ऑपरेशन में काकोरी से अल क़ायदा के दो आतंकवादियों को गिरफ्तार कर लिया। इन आतंकवादियों के पास से हथियार और गोला बारूद बरामद किए गए। उत्तर प्रदेश पुलिस के अनुसार पूछताछ के बाद अल क़ायदा द्वारा आतंकी घटनाओं को अंजाम देने की एक वृहद योजना का पता चला। जानकारी के अनुसार इन आतंकवादियों द्वारा प्रदेश के कई शहरों में बम ब्लास्ट करने की योजना का पर्दाफाश हुआ।

सूचना यह भी मिली कि पकड़े गए आतंकवादियों के तार और प्रदेशों में जुड़े हुए हैं। इन आतंकवादियों के पास से जो गाड़ी बरामद हुई, वह जम्मू कश्मीर में पंजीकृत है। इस गिरफ्तारी के बाद से प्रदेश के कई और शहरों में रेड अलर्ट जारी कर दिया गया और कई जगहों पर कॉम्बिंग ऑपरेशन शुरू हो गए। एक आतंकवादी ने पुलिस को जानकारी दी कि वह प्रेशर कुकर बम बनाने में माहिर है और केवल तीन हज़ार रुपयों में बम बना सकता है – कारीगरी के लिहाज से यह प्रोफेशनल कॉम्पिटेंन्स के दायरे में आएगा।

किसी भी राज्य के ATS के लिए यह एक सामान्य ऑपरेशन है पर इस ऑपरेशन पर आने वाली राजनीतिक प्रतिक्रिया सामान्य नहीं है। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से जब आतंकवादियों की गिरफ्तारी पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में प्रश्न पूछा गया तो उनक कहना था कि उत्तर प्रदेश पुलिस पर उन्हें भरोसा नहीं है और भाजपा सरकार पर तो बिलकुल नहीं है।

ऐसा नहीं कि अखिलेश यादव से इस बयान की उम्मीद बिलकुल नहीं की जा सकती, पर यह बयान इस मामले में सामान्य नहीं है कि पुलिस की यह कार्रवाई एक लोकतान्त्रिक सरकार की पुलिस कर रही है। अखिलेश यादव खुद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। उसी प्रदेश के जहाँ उनकी सरकार के ऊपर यह आरोप था कि पुलिस की भर्ती के दौरान उनकी सरकार ने एक जाति के लोगों को दरोगा के पद पर नियुक्त किया। ऐसे में आज यदि वही अखिलेश यादव कहें कि उन्हें उत्तर प्रदेश पुलिस पर भरोसा नहीं है तो यह बात कितनी तार्किक है?

अखिलेश यादव और उनका दल उत्तर प्रदेश की राजनीति के महत्वपूर्ण किरदार हैं। अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों में वर्तमान सरकार और उसके मुखिया योगी आदित्यनाथ के लिए सबसे बड़ी चुनौती शायद अखिलेश और उनके ही दल से आएगी। ऐसे में प्रश्न यह है कि यादव के लिए इस तरह के बयान देना कितना सही है, वो भी तब जब आधुनिक राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था में आतंकवाद को विश्व भर में सबसे बड़े खतरे के रूप में देखा जाता है?

एक बार के लिए उनका बयान भले असामान्य लगता है पर ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखने पर लगता है कि उनके इस बयान में आश्चर्यजनक बात नहीं है। वर्ष 2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के समय उनके दल ने अपने चुनावी वादों में एक वादा यह भी किया था कि; सत्ता में आते ही मुस्लिम समुदाय के उन लोगों का केस वापस लिया जाएगा, जो आतंकवाद के आरोप में जेल में बंद हैं। सत्ता प्राप्ति के बाद उनकी सरकार ने अपना यह वादा निभाया भी था।

अखिलेश यादव के बयान के साथ ही पूर्व मुख्यमंत्री मायावती का बयान भी आया, जिसमें उन्होंने कहा कि उन्हें ATS द्वारा की गई इन गिरफ्तारियों की टाइमिंग पर शंका है। मायावती ने अपने बयान में अखिलेश की तरह साफ़-साफ़ अपनी बात नहीं कही, पर उन्होंने दूसरे शब्दों के सहारे पुलिस और उत्तर प्रदेश सरकार पर सवाल खड़े कर दिए। मायावती का बयान आश्चर्यचकित करता है, खासकर इसलिए कि ऐसी आम धारणा है कि उनके शासन काल में कानून व्यवस्था की स्थिति समाजवादी सरकार की तुलना में बेहतर थी। वैसे भी पिछले कई महीनों में राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर मायावती के सार्वजनिक बयान अपेक्षाकृत सुलझे हुए रहे हैं।

अखिलेश यादव और मायावती के इन बयानों को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखने की आवश्यकता है। 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने जब POTA जैसा कानून पास किया, तभी से उसके विरुद्ध आवाज़ें उठने लगीं। कहीं अल्पसंख्यक समुदाय के ‘बुद्धिजीवियों’ की ओर से तो कभी सिविल सोसाइटी की ओर से। कानून के गलत इस्तेमाल के बारे में पुलिस सुधारों की बात नहीं की गई बल्कि उसे आगे रख कर एक माहौल बनाया गया कि कानून ही खराब है। माहौल बनाने की जो शुरुआत कॉन्ग्रेस ने की थी, उसमें और राजनीतिक दल शामिल होते गए। बड़ा आसान था यह विमर्श चलाना कि भाजपा अल्पसंख्यक विरोधी है, इसलिए ऐसा कानून ले आई है।

2004 के लोकसभा चुनावों में कॉन्ग्रेस ने अपने घोषणा की कि यदि वह सत्ता में आई तो POTA को रद्द कर देगी। UPA की सरकार बनी और आतंकवाद के विरुद्ध कानून रद्द कर दिया गया। उसके बाद पूरे देश में किस स्तर की आतंकवादी घटनाओं को अंजाम दिया गया, यह इतिहास का हिस्सा है। आतंकवाद के विरुद्ध देश की लड़ाई किस तरह से प्रभावित हुई, वह किसी से छिपा नहीं है। UPA के शुरुआती पाँच वर्ष ऐसे थे, जिस दौरान आतंकवादी घटनाओं की बाढ़ आ गई थी। यह वही समय था, जब हिन्दू आतंकवाद को लेकर विमर्श चलाने की भरपूर कोशिश की गई और उसी समय मुंबई में 26/11 हुआ।

ये घटनाएँ ऐसी थीं जिनकी वजह से एक बार UPA को भी लगा कि सरकार को आतंकवाद विरोधी कानून की सख्त आवश्यकता है और इसीलिए वीरप्पा मोइली को यह जिम्मेदारी सौंपी गई कि वे इसके बारे में एक रिपोर्ट दें। वीरप्पा मोइली ने रिपोर्ट दी कि आतंकवाद से लड़ाई लड़ने के लिए एक सख्त कानून की आवश्यकता है क्योंकि बिना किसी सख्त कानून के आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई कमजोर पड़ गई थी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि उनके द्वारा अनुशंसित कानून के ड्राफ्ट में आतंकवाद की घटनाओं पर गिरफ्तारी और जमानत की प्रक्रिया POTA से भी अधिक सख्त थी। POTA यानी वही कानून जिसके विरुद्ध माहौल बनाकर उसे हटाने का काम UPA ने किया था।

UPA के दौर की इन घटनाओं का जिक्र यहाँ इसलिए आवश्यक है ताकि आतंकवाद और उसके विरुद्ध लड़ाई को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखा जा सके। हमें समझने की जरूरत है कि आतंकवाद से खतरा कोई कहानी नहीं है और न ही इस सरकार या उस सरकार या इस समुदाय और उस समुदाय की बात है। यह खतरा काल्पनिक नहीं है, इसलिए इससे लड़ाई किसी दल के दर्शन पर नहीं बल्कि सरकार और प्रशासन पर निर्भर होनी चाहिए। ऐसे में आवश्यक है कि आतंकवाद को लेकर बयान योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्रीत्व या भाजपा की सरकार पर भरोसा या आस्था की बात से प्रभावित न हो बल्कि देश की नीति के आधार पर हो, फिर बयान सत्ताधारी दल के किसी नेता का हो या सत्ता से बाहर दल के नेता का।

राहुल गाँधी से मिले प्रशांत किशोर, सियासी अटकलों के बीच बड़ा सवाल- क्या बनेंगे कॉन्ग्रेस के तारणहार?

चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने मंगलवार (13 जुलाई 2021) को कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी से दिल्ली में उनके आवास पर मुलाकात की। इसके बाद से राजनीतिक गलियारों में अटकलें तेज हो गई हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक, बैठक के दौरान प्रियंका गाँधी, केसी वेणुगोपाल और पंजाब मामलों के प्रभारी हरीश रावत समेत पार्टी के कई वरिष्ठ नेता मौजूद थे।

यह बैठक पंजाब, राजस्‍थान और छत्‍तीसगढ़ में कॉन्ग्रेस इकाई में अंदरूनी कलह और उथल-पुथल को लेकर की गई। बीते कुछ महीनों से यहाँ सियासी संकट गहराया हुआ है। इसके अलावा उत्‍तर प्रदेश, उत्‍तराखंड, पंजाब, गोवा, मणिपुर और गुजरात में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में राहुल गाँधी से प्रशांत किशोर की मुलाकात को अहम माना जा रहा है।

हाल ही में पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने दिल्ली में सीएम के आवास कपूरथला हाउस में किशोर से मुलाकात की थी। अमरिंदर ने किशोर को प्रधान सलाहकार नियुक्त किया था। हाल ही में पश्चिम बंगाल सहित कुछ राज्यों में विधानसभा चुनावों के दौरान प्रशांत किशोर पंजाब गए थे। हालाँकि, नतीजे आने के तुरंत बाद, उन्होंने एक राजनीतिक रणनीतिकार के रूप में अपने पद से हटने की इच्छा व्यक्त की थी।

मीडिया रिपोर्ट्स में कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी का लखनऊ दौरा टलने की वजह पीके की राहुल से मुलाकात के साथ जोड़कर देखा जा रहा है। दरअसल, प्रियंका का यह दौरा 14 जुलाई को होने वाला था, लेकिन अब इसे टालकर 16 जुलाई को कर दिया गया है।

बता दें कि 2014 में नरेंद्र मोदी के राजनीति प्रचार-प्रसार की जिम्‍मेदारी प्रशांत ने ली थी। इसके बाद उन्‍होंने बिहार चुनाव में नीतीश कुमार, पंजाब में अमरिंदर सिंह, आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी और बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी के लिए काम किया था।

वसीम दूसरों जैसा नहीं… कह कर परिवार को ठुकराया, 3 साल बाद जहर खाकर मरी कीर्ति

मध्य प्रदेश के गुना जिले में एक जैन लड़की ने दूसरे समुदाय के युवक से निकाह करने के कुछ साल बाद आत्महत्या करके अपनी जान दे दी। मृतिका के परिजनों ने आरोप लगाया कि ये सब कुछ उससे जबरदस्ती करवाया गया। 11 जुलाई 2021 को परिजनों ने इस बाबत युवक और उसके परिवार के ख़िलाफ़ दहेज प्रताड़ना का मुकदमा दर्ज करवाया है।

स्वराज्य मैग्जीन की पत्रकार स्वाति गोयल शर्मा ने अपने ट्विटर अकॉउंट पर कीर्ति जैन नाम की लड़की की पूरी कहानी शेयर की है। उनके ट्वीट के मुताबिक, कीर्ति 3 साल पहले (2018 में) वसीम कुरैशी नाम के लड़के के साथ भाग गई थी और अब तीन दिन पहले खबर आई कि उसने सलफास खाकर आत्महत्या कर ली।

लड़की, गुना जिले के एक मध्यम वर्गीय परिवार से संबंध रखती थी, लेकिन वसीम के परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी अच्छी नहीं थी। वह कीर्ति के घर से कुछ किलोमीटर की दूरी पर रहता था और तबसे उसका पीछा करता था, जब वह एक नाबालिग थी और बस स्कूल जाया करती थी।

3 साल पहले कीर्ति जब 18 साल की पूरी हुई तो वसीम उसे अपने साथ भगा ले गया। उसके भाई कुलदीप ने बताया कि वसीम उन लोगों से कभी नहीं मिला था। मगर, जब उन्हें कीर्ति के साथ उसके संबंधों का मालूम हुआ तो उन्होंने उसका पता लगाया और मामला कोर्ट पहुँचने से पहले बाहर सुलझा लिया गया।

कुलदीप बताते हैं कि उन्होंने अपनी बहन को समझाने की बहुत कोशिश की थी। उनके समुदाय की साध्वियों ने भी उससे मुलाकात करके उसे समझाया। लेकिन कीर्ति यही दोहराती रही कि वह अब बालिग है और अपनी इच्छा से कुछ भी करने के लिए आजाद है। कुलदीप ने उसे समझाने के लिए ‘लव जिहाद’ के बारे में भी बताया, मगर उस पर वसीम का भूत सवार था।

अपने परिवार की बातों को नजरअंदाज करके उसने कहा कि वह लोग (परिवार वाले) वसीम को जानते ही नहीं हैं। वो तो मीट माँस भी छोड़ने को तैयार था। कीर्ति ने अपने घरवालों को आश्वस्त करते हुए कहा कि भले ही वसीम मुस्लिम है लेकिन इस वजह से उसका नाम या जीवनशैली पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

घटना के कुछ माह बाद कीर्ति फिर घर से भाग गई। दूसरी बार घरवालों ने पुलिस में शिकायत दी, लेकिन आखिर में उन्हें अपने हाथ बाँधने पड़े क्योंकि कोर्ट में लड़की ने ये कह दिया था कि वह अपनी मर्जी से भागी है। इसके बाद सोशल मीडिया पर उसकी एक वीडियो सामने आई जिसमें उसे कहते सुना गया कि उसने वसीम से निकाह कर लिया है।

स्वाति गोयल के ट्विट्स के अनुसार, कीर्ति ने जैनब बनने के बाद वसीम से निकाह किया था और फिर वह गुना से दूर रहने लगी। कुछ माह बाद उसने अपने घरवालों से संपर्क किया और बेहद परेशान हालत में बताया कि वसीम का परिवार तो बहुत ज्यादा गरीब है और वह खुद भी कुछ नहीं कमाता।

जब कीर्ति ने अपने परिजनों को संपर्क किया था उस समय वह गर्भ से थी। उसकी स्थिति जानकर घरवालों ने उसे 2 लाख रुपए डिलिवरी और उसकी तबीयत का ध्यान रखने के लिए दिए। लेकिन बाद में कीर्ति को परिजनों से मिलने से मना कर दिया गया। परिजनों ने दोबारा कहा कि अगर वह वसीम को छोड़कर लौटना चाहती है तो आ जाए। वह सब उसके साथ हैं।

हालाँकि, कीर्ति ने यह कदम नहीं उठाया। निकाह के एक साल में उसने बेटी को जन्म दिया और बाद में पैसों के लिए अपने मायके फोन करती रही। परिजनों से बात करते हुए उसने कहा कि उसे समझ नहीं आता कि जब वसीम कुछ कमाता ही नहीं है तो आखिर वह शादी से पहले उसे महंगी बाइक पर कैसे जगह-जगह घुमाता था।

कोरोना की दूसरी लहर में कीर्ति का अपने परिवार वालों से बातचीत बिलकुल बंद हो गई और इस हफ्ते उन्हें आत्महत्या का तब पता चला जब पुलिस ने कुलदीप से अस्पताल आने को कहा। वह वहाँ पहुँचे लेकिन कीर्ति तब तक दम तोड़ चुकी थी।

कुलदीप व उनके घरवालों ने उसका दाह संस्कार जैन रिवाजों से किया, जिसमें वसीम व उसके परिजन बीच में आ गए और कहने लगे कि कीर्ति मुसलमान बन गई थी, इसलिए उसे दफनाया जाना चाहिए। उनकी बात सुनकर पुलिस ने सबूत माँगा लेकिन वह ये सब साबित नहीं कर पाए।

अब वसीम और उसके परिवार के ख़िलाफ़ गुना पुलिस में मृतिका के परिजनों ने दहेज प्रताड़ना (498ए) व दहेज के लिए हत्या (304बी) का मामला दर्ज करवाया है। इस संबंध में पुलिस ने भी 11 जुलाई को बयान जारी किया है। वसीम की गिरफ्तारी हो चुकी है। इस बीच कीर्ति की एक वीडियो सामने आई है। इसमें वह सलफास खाने के बाद अस्पताल में है। बयान में वह कह रही है कि उसने गलती से जहर खाया जबकि कुलदीप का कहना है कि शायद उसे जहर पीने को मजबूर किया गया हो और ऐसा बयान देने के लिए दबाव बनाया गया हो।

‘शराब की लत किसी को भी, मेरे साथ भी… महिलाओं को इसे लेकर और अधिक ओपन माइंडेड होने की जरूरत’

बॉलीवुड अभिनेत्री पूजा भट्ट ने लंबे समय के बाद एक बार फिर से फिल्मी पर्दे पर एक एक्ट्रेस के तौर पर वापसी की है। करीब तीन दशकों के अपने फिल्मी करियर में पूजा भट्ट ने एक्टिंग के साथ प्रोडक्शन औऱ डायरेक्शन भी किया है। एक बार फिर से पूजा ने एक्टिंग की शुरुआत की है। लंबे समय के बाद अपनी पहली फिल्म ‘बॉम्बे बेगम्स’ को लेकर एक इंटरव्यू में बातचीत के दौरान उन्होंने शराब की लत समेत कई मुद्दों पर बात की।

पूजा भट्ट ने फिल्म को लेकर अपनी खुशी जाहिर करते हुए कहा है कि अब देश भर से महिलाएँ देख रही हैं कि वास्तविक जीवन में महिलाएँ किस तरीके से जीवन जीती हैं। पूजा भट्ट ने बताया कि वो देश की इन महिलाओं को देख कर काफी प्रभावित हैं।

‘बॉम्बे बेगम्स’ में अपने रोल को लेकर सवाल पर पूजा भट्ट ने कहा कि अगर एक दूसरे को नीचा दिखाने की बजाय बराबरी की बात करें तो दुनिया का दर्द कम हो जाएगा। पूजा भट्ट ने कहा कि अगर बॉम्बे बेगम्स में उनके किरदार (रानी ईरानी) को देखें, तो वह ऐसी है, जिसके पास कभी वह जीवन नहीं था, जो वो चाहती थी। उसे (रानी ईरानी) बहुत से राज को दबाना पड़ता था।

रानी ईरानी के किरदार को लेकर पूजा भट्ट का कहना है कि सभी के अपने तरीके होते हैं और कोई भी पूरी तरह से सही नहीं होता। ‘बॉम्बे बेगम्स’ की रानी को भी मास्क की तरह मेकअप करना होता है और अपनी असुरक्षा को ढँकना पड़ता है, मानो कोई उसे आँक रहा हो। ऐसा लग रहा है जैसे कोई उससे पूछ रहा हो कि क्या उसका मासिक धर्म रुक गया है? अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए पूजा भट्ट कहती हैं कि बुढ़ापा हकीकत है औऱ हम सभी ऐसी दुनिया में जीते हैं, जो बढ़ती उम्र को लेकर प्रभावित होती है। उन्होंने कहा कि जीवन के इस पड़ाव पर ‘रानी ईरानी’ का रोल निभाने से उन्हें खुशी मिली है।

‘रानी ईरानी’ के रोल को लेकर पूजा भट्ट ने कहा, “रानी को यौन शोषण का दंश झेलना पड़ता है। रानी जिस तरीके से इसे सह गई, मैं ऐसा नहीं कर पाती। यही वो चीज है, जिसने मुझे उसकी ओर खींचा। जब मुझे इस फिल्म के लिए कहा गया तो मुझे लगा कि जिंदगी मेरे दरवाजे पर दस्तक दे रही है। मैं अपना दरवाजा बंद नहीं कर सकती।”

शराब पीने की आदत को लेकर पूजा भट्ट ने कहा कि लोग कई चीजों को छुपाने की कोशिश करते हैं, लेकिन चार साल पहले जब उन्होंने यह फैसला किया तो तय किया इस पर खुल कर बात करेंगी। पूजा भट्ट ने कहा, “मैंने 1989 में आई डैडी फिल्म से अपने करियर को शुरू किया था। इसमें एक ऐसी लड़की थी, जो अपने पिता को शराब पीने से रोकती है। इसी परेशानियों से मुझे भी जूझना पड़ा। मैंने लोगों को बताया कि यह (शराब की लत) किसी के भी साथ हो सकता है। खास तौर पर महिलाओं को इसके बारे में और अधिक ओपन माइंडेड होना चाहिए।”

‘शादी के बिना अधूरी नहीं जिंदगी’

‘खुशहाल शादी’ के मुद्दे पर जब पूजा भट्ट से पूछा गया तो उन्होंने कहा, “इस बात से फर्क ही नहीं पड़ता कि हम महिलाएँ विश्व में क्या हासिल कर रही हैं। हम में से कई घर आती हैं और हमारी सफलता को लेकर कह दिया जाता है- ‘हाँ ठीक है न, तुमने नोबल प्राइज जीत लिया मगर अभी खाने में क्या है? तुम एक माँ हो या नहीं? तुम शादीशुदा हो या नहीं? मैं अब इनसे आगे बढ़ गई हूँ। मैंने शादी की, कोशिश की और लोगों को रिकमेंड भी किया। लेकिन अब मेरा जीवन अधूरा नहीं है क्योंकि मैं वैसे ही जीना चाहती हूँ जैसे मैं रहती हूँ।”

बता दें कि पूजा भट्ट ने मनीष मखीजा से साल 2003 में शादी की थी लेकिन शादी के 11 साल बाद यानी 2014 में दोनों एक दूसरे अलग हो गए।

साउथ सुपरस्टार विजय को मद्रास हाईकोर्ट ने दिया झटका: नसीहत के साथ ‘रोल्स रॉयस घोस्ट’ पर टैक्स चोरी में ठोका जुर्माना

मद्रास हाईकोर्ट से साउथ सुपरस्टार विजय को बड़ा झटका लगा है। कोर्ट ने एक्टर विजय की उस याचिका को खारिज कर​ दिया है, जिसमें उन्होंने अपनी इंपोर्टेड कार (Rolls Royce Ghost) के आयात में लगने वाले एंट्री टैक्स में राहत मिलने की माँग की थी। अदालत ने विजय पर टैक्स ना देने के आरोप में एक लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। ये रुपए कोविड-19 से लड़ने के लिए तमिलनाडु मुख्यमंत्री राहत कोष में जमा किए जाएँगे।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, हाईकोर्ट ने तमिल अभिनेता विजय की आलोचना करते हुए कहा, ”रील लाइफ हीरो टैक्स देने से झिझक रहे हैं।” कोर्ट ने कहा, ”इनके लाखों फैंस हैं। सभी फैंस फिल्मी सितारों को असली हीरो की तरह देखते हैं। तमिलनाडु जैसे राज्य में जहाँ फिल्मी सितारे राज्य को चलाने वाले भी बन चुके हैं, उनसे ये उम्मीद नहीं की जाती है कि वो सिर्फ रील हीरो की ही तरह पेश आएँ। टैक्स की चोरी करना असंवैधानिक है।”

मालूम हो कि साल 2012 में सुपरस्टार विजय ने इंग्लैंड से अपने लिए रॉल्स रॉयस घोस्ट कार इंपोर्ट की थी। तब कार पर टैक्स देने से बचने की कोशिश में विजय ने एक याचिका दायर कर गाड़ी के आयात में लगने वाले एंट्री टैक्स में राहत मिलने की माँग की थी।

विजय के एक फैन्स ने अपने ट्विटर अकाउंट पर उनकी कार का एक वीडियो शेयर किया है। बताया जा रहा है कि अभी तक पता नहीं चला है कि यह कार थलपति विजय चला रहे थे या उनके स्टाफ का कोई सदस्य, लेकिन अभिनेता कथित तौर पर कार के अंदर ही थे। डायरेक्टर शंकर के बाद विजय तमिलनाडु की दूसरी ऐसी हस्ती हैं, जिनके पास R बैज के साथ Rolls Royce Ghost कार है। अभिनेता को अक्सर अवार्ड शो में अपनी शानदार कार से आते हुए भी देखा गया है।

6.6 लीटर ट्विन-टर्बो वी12 इंजन रोल्स रॉयस घोस्ट की कीमत लगभग 6.95 से 7.95 करोड़ रुपए है। विजय ने ए.आर. मुरुगादॉस द्वारा निर्देशित फिल्म ‘सरकार’ (2018) में अपनी रोल्स रॉयस कार का इस्तेमाल किया था। बता दें कि अन्य सितारों की तुलना में विजय को साउथ की फिल्मों के लिए सबसे अधिक पेमेंट दिया जाता है।

‘ब्राह्मणों की बच्चियों को छीन कर लाता, उन्हें मुस्लिम बना बड़ा करता था’ – टीपू सुल्तान के हरम में 600 महिलाओं की कहानी

टीपू सुल्तान को अक्सर ‘टाइगर’ बता कर उसका महिमामंडन किया जाता है। मैसूर पर शासन करने वाले इस आक्रांता की याद में जयंती तक मनाई जाती है, जबकि उसकी क्रूरता के किस्से इतिहास में दर्ज हैं। ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ के लिए भाजपा विरोधी दलों ने उसे अपना नायक बनाया हुआ है और कर्नाटक में उसके नाम पर चुनाव जीतने की कोशिश होती है। लेकिन, क्या आपको पता है कि टीपू सुल्तान के हरम में कितनी महिलाएँ थीं?

श्रीरंगपट्टम मंदिर पर आक्रमण कर के उसे तहस-नहस करने वाले टीपू सुल्तान के कितने बच्चे थे, इसे लेकर इतिहासकारों में मतभेद है। कितने महिलाओं से उसके सम्बन्ध रहे और उसकी कितनी संतानें हुईं, इस बारे में इतिहासकारों में एकराय नहीं। यहाँ तक कि उसकी बीवियों की संख्या को लेकर भी अलग-अलग आँकड़े दिए जाते हैं। इतना स्पष्ट है कि उसकी पहली दोनों बीवियों में से एक इमाम साहिब बख्शी की बेटी थी और एक का नाम रुकैया बानू था।

इन दोनों के साथ उसने सन् 1774 में एक ही रात में निकाह किया था। 1796 में उसने खदीजा जमन बेगम से निकाह किया। लेकिन, एक साल बाद ही बच्चे को जन्म देते समय उस महिला की मौत हो गई। अंग्रेजों और मैसूर के बीच हुए चौथे युद्ध के बाद ब्रिटिश ने उसके जनानखाने को भी अपने कब्जे में ले लिया था। उस ‘जनाना’ का इंचार्ज बनाए गए एक अंग्रेज अधिकारी ने तय था कि उसकी एक चौथी पत्नी भी थी।

उसका नाम बुरांटी बेगम बताया गया था। उसी अधिकारी ने ये भी जानकारी दी कि टीपू सुल्तान के कुल 12 बेटों और 8 बेटियों के जीवित होने की बात कही थी, जिसमें सबसे बड़े वाले का नाम फतह बहादुर था। उसने इस बात पर हैरानी जताई थी कि टीपू सुल्तान की इन संतानों माँओं के बारे में कुछ जानकारी ही नहीं थी। ‘Tiger: The Life of Tipu Sultan‘ नामक पुस्तक में इतिहासकार केट ब्रिटलबैंक ने टीपू सुल्तान के हरम के बारे में जानकारी दी है।

टीपू सुल्तान के हरम में थीं 601 महिलाएँ

उन्होंने लिखा है कि 1799 में श्रीरंगपट्टम स्थित टीपू सुल्तान के हरम में 601 महिलाएँ थीं। ये महिलाएँ सिर्फ टीपू सुल्तान की ही नहीं, बल्कि उसके अब्बा हैदर अली की भी थीं। इनमें से 333 महिलाएँ टीपू सुल्तान की थीं और 268 महिलाएँ उसके अब्बा हैदर अली की। हैदर अली की मौत के बाद भी वो महिलाएँ उस हरम में थीं। ‘जनाना’ की रखवाली के लिए नपुंसकों/हिजड़ों (Eunuchus) को रखा गया था।

इस्लामी शासनकाल में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं, जहाँ ‘जनाना’ की रखवाली के लिए पुरुषों को नहीं रखा जाता था बल्कि ऐसे लोगों को रखा जाता था, जो ये तो नपुंसक थे या फिर नपुंसक बना दिए जाते थे। टीपू सुल्तान के हरम में शामिल इन महिलाओं में उसके परिवार की सदस्य, कई रखैलें और कामकाज के लिए रखी गई महिलाएँ भी शामिल थीं। टीपू सुल्तान का एक भाई भी था, अब्दुल करीम।

हैदर अली ने अपने उस बेटे की शादी सवानुर के नवाब की बेटी से कर रखी थी। ये शादी 1799 में हुई थी। अब्दुल करीम को इतिहास में अक्सर कमजोर दिमाग वाला और कम सूझबूझ वाला कहा जाता है। हालाँकि, ये भी कहा जाता है कि बुद्धिहीन होने के बावजूद वो अपनी बीवी के साथ बड़ी क्रूरता से पेश आता था। टीपू सुल्तान ने उसकी बीवी को भी अपने ही हरम में रखा हुआ था। वामपंथी इतिहासकार कहते हैं कि उसने उसकी ‘सुरक्षा’ के लिए ऐसा किया था।

हालाँकि, अपनी पुस्तक में केट ब्रिटलबैंक टीपू सुल्तान के हरम में इतनी बड़ी संख्या में महिलाओं के होने और उन पर अत्याचार होने का बचाव करती हैं। वो कहती हैं कि अंग्रेज ऐसी महिलाओं को हमेशा कैदी की तरह ही समझते थे, जबकि ऐसा नहीं था। इसके पीछे वो दलील देती हैं कि ऐसी टिप्पणियाँ करने वाले कभी ऐसे हरम के भीतर तक नहीं जाते थे। सिर्फ यूरोप के कुछ डॉक्टर ही थे जो कभी-कभार वहाँ जाते थे।

लेकिन, उनकी ही पुस्तक में ये भी स्वीकार किया गया है कि टीपू सुल्तान की हरम में जो उसकी बीवियाँ, रखैलें और अन्य महिलाएँ थीं, उनमें से कइयों को दासी के रूप में खरीदा गया था तो कई अन्य राजाओं को हराने के बाद वहाँ की महिलाओं का अपहरण कर के लाया गया था। ये सभी की सभी टीपू सुल्तान की इच्छा पर ही निर्भर थीं। साथ ही वो अपने राज्य की भी किसी भी लड़की को उठा कर वहाँ मँगवा लेता था।

यूरोप में कभी इस तरह की परंपरा हुआ करती थी, जिसे ‘droit du seigneur‘ कहा जाता था। इसका अर्थ हुआ कि राजा को अधिकार है कि वो अपनी प्रजा में से किसी को भी उठा कर मँगवा ले। यूरोप के जमींदार ‘लॉर्ड्स’ इस तरह किसी भी महिलाओं को उठा लेते थे और उनके साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाते थे। वो अपने मातहत महिलाओं की शादी की रात ही उनसे सम्बन्ध बना लेते थे। इसके तहत किसी भी कुँवारी या शादीशुदा महिला को उठा लिया जाता था।

टीपू सुल्तान भी इस परंपरा से काम करता था। केट ब्रिटलबैंक ये भी लिखती हैं कि ये मानने का कोई कारण नहीं है कि वो इन महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार करता होगा। वामपंथी इतिहासकार अक्सर टीपू सुल्तान को दलित महिलाओं का उद्धारक से लेकर न जाने क्या-क्या बताते हैं और कहते हैं कि उसने अपने शासन काल में शराब पर पाबंदी लगा रखी थी। वो अपने राज्य में शरिया का शासन चलाता था, क्या ये भी ‘समाजसेवा’ है?

ईसाईयों के साथ टीपू सुल्तान के अत्याचार की जानकारियाँ अंग्रेजों ने भी अपने रिकार्ड्स में दर्ज की हैं। उसने हजारों ईसाईयों को कई वर्षों तक बंधक बना कर प्रताड़ित किया था। ‘Moon-o-theism, Volume II‘ में योएल नटन लिखते हैं कि एक बार तो उसने हजारों ईसाईयों को 338 किलोमीटर तक चलवाया, जिसमें 6 सप्ताह लगे। कई बीच में ही मर गए। अंत में उनमें से कई महिलाओं और लड़कियों को उसकी फौज में बाँटा गया।

इनमें से कइयों को हराम में भेजा गया। साथ ही उन्हें मौत और इस्लाम अपनाने में से किसी एक को चुनने को कहा गया। जिन्होंने जिद की, उनके नाम-कान काट डाले गए और उनसे शौचालय साफ़ करवाया गया। इसी पुस्तक में एक पीड़ित का जिक्र है, जिसने बताया था कि वो अपने सामने अपने परिवार को मुस्लिम बनते देख रहा था और उसकी माँ व बहन, दोनों गर्भवती थीं। उसका कहना था कि दोनों के गर्भ में मुस्लिम ही पल रहे थे। उसने बताया था कि वो अपनी माँ-बहन से आँख तक नहीं मिला पाता था, क्योंकि वो उनके दर्द का सामना नहीं कर सकता था।

स्कॉटिश डॉक्टर का टीपू सुल्तान के हरम को लेकर खुलासा

अब हम आपको टीपू सुल्तान के जनाने या हरम के बारे में एक स्कॉटिश फिजिशियन के हवाले से बताते हैं, जो कई बार इसके अंदर भी गए थे। स्कॉटिश फिजिसियन फ्रांसिस बचनन-हैमिलटन (Francis Buchanan-Hamilton) टीपू सुल्तान कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच रहता था।

उसकी पुस्तक ‘A Journey From Madras Through The Countries of Mysore, Canara and Malabar…‘ में उन्होंने लिखा है कि टीपू सुल्तान के प्राइवेट कक्ष से जनाना के लिए एक रास्ता बनाया गया था। उन्होंने भी इसकी पुष्टि की है कि इसमें उसके और उसके अब्बा की 600 महिलाएँ थीं, जिनकी रखवाली के लिए नपुंसकों को लगाया गया था। लेकिन, वो महिलाएँ कौन थीं – इस बारे में उन्होंने जो लिखा है वो जानने लायक है।

Macquarie University की वेबसाइट पर फ्रांसिस हैमिलटन के अनुभव

वो लिखते हैं, “उनमें से कई हिंदुस्तानी थीं। कई ब्राह्मणों और राजाओं की बेटियाँ थी, जिन्हें उनके अभिभावकों के सामने ही बलपूर्वक उठाया गया था। काफी कम उम्र में ही उन्हें जनाना में बंद कर दिया गया था। उन्हें कुछ इस तरह बड़ा किया जा रहा था, जिससे उनमें इस्लाम के प्रति अच्छी भावनाएँ आएँ। मुझे नहीं लगता कि उनमें से कोई उस कैद से बाहर निकलना चाहती थीं क्योंकि उन्हें पता तक नहीं था कि बाहर क्या चल रहा है और जीवन कैसे जीते हैं।”

78 दिन, 18 स्थान, 2500 लोक कलाकार: UP में 24 जुलाई से 16 जिलों में करवाए जाएँगे ‘रामराज्य’ के दर्शन

उत्तर प्रदेश में संस्कृति एवं पर्यटन विभाग प्रदेश के विभिन्न जिलों में ‘रामायण कॉन्क्लेव’ आयोजित करने जा रहा है। इस दौरान योगी सरकार 18 स्थानों पर रामराज्य के दर्शन करवाएगी। 24 जुलाई को गुरु पूर्णिमा के अवसर पर इस सम्मेलन का शुभारंभ भगवान राम की जन्मस्थली अयोध्या से किया जाएगा और इसका समापन 12 अक्टूबर 2021 को लखनऊ में होगा।

जानकारी के मुताबिक, अलग-अलग जिलों में अलग-अलग थीम पर रामराज्य के दर्शन करवाए जाएँगे। जैसे चित्रकूट में इसका आयोजन ‘वाल्मिकी के राम’ की थीम पर होगा और बुंदेलखंड लोक कलाकार ‘वनवासी राम’ के दर्शन करवाएँगे।

दैनिक जागरण की खबर के अनुसार, प्रदेश संगीत नाटक अकादमी के सदस्य एवं जगदगुरु रामभद्राचार्य दिव्यांग विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ गोपाल कुमार मिश्र ने चित्रकूट में होने वाले आयोजन के बारे में बताया कि संस्कृति एवं पर्यटन विभाग के प्रमुख सचिव मुकेश मेश्राम ने आयोजन को अंतिम रूप दे दिया है।

रामायण कॉन्क्लेव से प्रदेश के 16 जिलों में संगोष्ठियों के साथ-साथ करीब 2500 लोक कलाकार सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ करके रामराज्य को दिखाएँगे, जबकि 16 और 17 अगस्त को चित्रकूट में जो कार्यक्रम होगा, उसके लिए जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने ‘वाल्मीकि के राम’ नाम की थीम दी है। उनके मुताबिक महर्षि के कहने पर ही भगवान राम चित्रकूट में रहे थे। 

इस दौरान रामायण के विभिन्न प्रसंगों पर आधारित चित्रकार शिविर होंगे। भगवान श्रीराम के जीवन की विभिन्न लीलाओं पर आधारित सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे। विविध प्रसंगों पर चित्रकला, मूर्तिकला व अभिलेखों की प्रदर्शनी होगी। स्थानीय कलाकर लोक प्रस्तुति करेंगे। राम लीला होगी, नौटंकी होगी, स्वांग व भजन होंगे। राम जीवन पर आधारित कवि सम्मेलन होगा। साथ ही बच्चों में रामायण के प्रति आकर्षण उत्पन्न हो, इसके लिए क्विज प्रतियोगिताएँ रखी जाएँगी। इसके अलावा कोरोना प्रोटोकॉल का पूर्ण पालन करते हुए समस्त कार्यक्रम का ऑनलाइन प्रसारण किया जाएगा।

बता दें कि रामराज्य को दिखाने के लिए शुरू होने वाला ये सम्मेलन अयोध्या, गोरखपुर, बलिया, वाराणसी, विंध्यांचल, शृंगवेरपुर, चित्रकूट, ललितपुर, बिठूर (कानपुर), मथुरा, गढ़मुक्तेश्वर, गाजियाबाद, सहारनपुर, बिजनौर, बरेली में आयोजित होगा। वहीं इसका समापन राज्य की राजधानी लखनऊ में किया जाएगा।

‘AAP ने मेरे विजन को हमेशा पहचाना, उन्हें पता है मैं पंजाब के लिए लड़ रहा’: सिद्धू के सियासी तीर ने बढ़ाई पंजाब में हलचल

पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच जारी विवाद थमने का नाम ही नहीं ले रहा है। इसी बीच सिद्धू के एक और बयान ने पंजाब का सियासी पारा बढ़ा दिया है। मंगलवार (13 जुलाई 2021) को अपने ताजा ट्वीट में सिद्धू ने एक वीडियो क्लिप शेयर किया है। इसमें आम आदमी पार्टी के नेता उनकी सराहना करते हुए नजर आ रहे हैं।

सिद्धू ने ट्वीट किया, ”हमारे विपक्ष आम आदमी पार्टी (AAP) ने हमेशा पंजाब के लिए मेरे काम और विजन को पहचाना है। चाहे 2017 से पहले हो- बेअदबी, ड्रग्स, किसान मुद्दों, भ्रष्टाचार और बिजली संकट जैसे मुद्दे जो मैंने पंजाब के लोगों के लिए उठाए या फिर आज जिस पंजाब मॉडल के लिए मैं बात कर रहा हूँ। यह साफ है कि वे जानते हैं कि कौन वास्तव में पंजाब के लिए लड़ रहा है।”

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पंजाब सरकार के पूर्व मंत्री सिद्धू ने सोशल मीडिया पर ‘आप’ के सांसद और पंजाब प्रमुख भगवंत मान को जवाब देते हुए आम आदमी पार्टी की तारीफ की थी। बताया जा रहा है कि सिद्धू ने यह पोस्ट भगवंत मान के उस सवाल पर लिखा था, जिसमें उन्होंने पूछा था कि सिद्धू थर्मल प्लांट द्वारा कॉन्ग्रेस को चंदा दिए जाने के मुद्दे पर चुप क्यों हैं।

हालाँकि, कुछ देर बाद सिद्धू ने एक और ट्वीट किया। सिद्धू ने लिखा, “विपक्ष की मुझसे सवाल करने की हिम्मत है, लेकिन वह मेरे जनता के प्रति भाव पर कुछ नहीं कह सकते।”

गौरतलब है कि कुछ दिन पहले ही सिद्धू ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर निशाना साधा था। सिद्धू ने ट्वीट किया था, ”प्रदेश को दिल्ली मॉडल की नहीं, बल्कि पंजाब मॉडल की जरूरत है। नीति पर काम न करने वाली राजनीति महज नकारात्मक प्रचार है और लोकपक्षीय एजेंडे से वंचित नेता राजनीति सिर्फ बिजनेस के लिए करते हैं। इसलिए विकास बगैर राजनीति उनके लिए कोई मायने नहीं रखती है।” 

बता दें कि मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच पिछले कई दिनों से आपसी खींचतान चल रही है। पंजाब में बिजली की स्थिति पर शुक्रवार (2 जुलाई 2021) को कॉन्ग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू ने शिरोमणि अकाली दल-भारतीय जनता पार्टी की पूर्ववर्ती सरकार के दौरान किए गए बिजली खरीद समझौते (PPA) को रद्द करने के लिए नया कानून लाने का आग्रह किया था।

परोक्ष रूप से मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह पर निशाना साधते हुए सिद्धू ने कहा था कि अगर राज्य ‘सही दिशा में’ काम करता है, तो पंजाब में बिजली कटौती या कार्यालय के समय को विनियमित करने की कोई आवश्यकता नहीं होगी। लेकिन आपको जानकार हैरानी होगी कि सिद्धू पर प्रदेश की बिजली कंपनी का आठ लाख रुपए से अधिक का बकाया है। पंजाब राज्य विद्युत् निगम लिमिटेड (PSPCL) की वेबसाइट के अनुसार, अमृतसर स्थित सिद्धू के घर का बिजली बिल 9 महीने से नहीं भरा गया है और कुल बिल 8,67,540 हो गया है जो अब तक जमा नहीं किया गया है।

शबाना आजमी की दारू की बोतल गायब: मुंबई पुलिस ने 26 लोगों की टीम लगाई पीछे, कई IIT वाले भी टीम में

बॉलीवुड अभिनेत्री शबाना आजमी के साथ ऑनलाइन ठगी करने वाले धोखेबाजों की पहचान हो चुकी है। अब पुलिस उनको जल्द गिरफ्तार करेगी। सोमवार (जुलाई 12, 2021) को इस संबंध में राज्य की साइबर पुलिस ने सूचना दी। उन्होंने बताया कि साइबर क्रिमिनल्स को पकड़ने के लिए उन्होंने 26 ग्रैजुएट लोगों की टीम को हायर किया है। इनमें डोमेन स्पेशलिस्ट के तौर पर IIT ग्रैजुएट भी शामिल हैं, जिनका काम राज्य में बढ़ते अपराधों का पता लगाना है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, केवल साल 2017 से 2021 के बीच में 8,284 साइबर क्राइम मुंबई में रजिस्टर किए गए। लेकिन इनमें से सॉल्व सिर्फ 945 ही हो पाए। साइबर सेल का कहना है कि ये नए 26 साइबर स्पेशलिस्ट न केवल नगर के बल्कि पूरे राज्य के ‘पिछले’ मामलों को सुलझाने में भी मदद करेंगे।

नए विशेषज्ञों का काम साइबर एनालिसिस करना और सरकार के साइबर ऑडिट का ध्यान रखना होगा। ये सभी स्पेशलिस्ट गूगल के साइबर सुरक्षा ऑडिट के माध्यम से ऐसे मामलों में अनुभवी हैं, विशेष रूप से विदेशी हैकर्स से संबंधित मामलों में। ये टीम इस बात की निगरानी भी करेगी कि साइबर आतंकवाद से बचाव के लिए महत्वपूर्ण लोगों और रेलवे सिग्नल के बुनियादी ढाँचे को कैसे मजबूत किया जाए।

शबाना आजमी के साथ ऑनलाइन ठगी मामला

उल्लेखनीय है कि पिछले माह 24 जून को शबाना आजमी ने जानकारी दी थी कि वह ऑनलाइन ठगी का शिकार हुई हैं। उनके साथ ये धोखाधड़ी उस समय हुई जब उन्होंने शराब की डिलिवरी करने वाले एक जाने-माने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के नाम पर ऑर्डर किया और एडवांस में पेमेंट भी कर दिया। लेकिन, बाद में उन्हें डिलिवरी नहीं मिली। धोखाधड़ी का अहसास होने पर आजमी ने ट्वीट कर पूरे मामले की जानकारी दी और मुंबई पुलिस से कार्रवाई की माँग की।

अपने ट्वीट में आजमी ने पेटीएम पेमेंट बैंक के उस एकाउंट नंबर और आईएफएससी कोड की जानकारी दी जिस पर पैसा भेजा था। साथ ही फैंस से ऐसे धोखेबाजों से सावधान रहने को भी कहा। आजमी ने यह नहीं बताया है कि उन्होंने कितना भुगतान किया है। कई यूजर्स ने उन्हें पुलिस में शिकायत दर्ज कराने की सलाह दी थी। उन्हें बताया था कि अक्सर शराब स्टोर्स के नाम पर धोखाधड़ी करने वाले अपना कॉन्टैक्ट नंबर दर्ज कर देते हैं जिससे लोग धोखाधड़ी के शिकार हो जाते हैं।

FREE की डुगडुगी के साथ गुजरात में AAP की एंट्री: भाजपा या कॉन्ग्रेस- किसको रहेगा डर?

इस साल की शुरुआत में सूरत नगर निगम चुनावों में 27 सीटें जीतकर उत्साहित आम आदमी पार्टी की निगाहें अब दिसंबर 2022 में होने वाले गुजरात विधानसभा चुनावों पर हैं। फरवरी 2021 में हुए सूरत नगर निगम चुनावों में भाजपा को सबसे ज्यादा सीटें (120 में से 93) मिलीं। वहीं ‘आप’ 27 सीटें जीतकर विपक्षी दल की भूमिका में है। हालाँकि, कॉन्ग्रेस इस चुनाव में अपना खाता भी नहीं खोल पाई थी।

इसलिए अब ‘आप’ को भरोसा है कि वह दिल्ली की तरह उद्यमी गुजरातियों को मुफ्त उपहार, स्कीम का झाँसा देकर लुभा सकती है। ‘आप’ सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार के निरंकुश शासन के बावजूद सूरत के प्रसिद्ध हीरा व्यवसायी महेश सवानी आम आदमी पार्टी में शामिल हुए। ‘आप’ ने मनीबैग रियाल्टार महेश सवानी, जिस पर अपहरण व जबरन वसूली का आरोप है और एक गुजराती पत्रकार इसुदान गढ़वी को अपनी पार्टी में शामिल किया है। ताकि वह हिंदू समाज के लोगों का विरोध झेल रहे गोपाल इटालिया जैसे नेताओं की भरपाई कर सकें।

गुजरात परंपरागत रूप से दो दलों वाला राज्य रहा है। यहाँ लोग या तो भाजपा (हाल के दिनों में मोदी) के वफादार हैं या कॉन्ग्रेस के वफादार हैं। इनके बीच में कोई भी नहीं है। यही कारण है कि कोई भी महत्वपूर्ण क्षेत्रीय दल यहाँ अपनी जगह नहीं बना पाया है। इसके अलावा, 1998 के बाद से जब से केशुभाई पटेल ने भाजपा को जीत दिलाई, गुजरात में हमेशा भाजपा ही सत्ता में रही है। एक पूरी पीढ़ी सिर्फ बीजेपी शासनकाल में पली-बढ़ी है। ऐसे में ‘आप’ द्वारा गुजरात के चुनावी मैदान में कूदने को लेकर हम यहाँ क्या उम्मीद कर सकते हैं?

जाति की राजनीति का घिनौना सच

केजरीवाल ने वादा किया है कि वह यहाँ कि राजनीति बदल देंगे, लेकिन उन्होंने ऐसा कभी नहीं कहा कि वह यहाँ इससे बेहतर माहौल बनाएँगे। इसलिए यहाँ केवल जाति की राजनीति की जा रही है। आप देखिए, गुजरात में कॉन्ग्रेस जाति की राजनीति की अग्रदूत थी। पूर्व मुख्यमंत्री और कॉन्ग्रेस के बड़े नेता माधवसिंह सोलंकी वोट बैंक की राजनीति के लिए KHAM (Kshatriya, Harijan, Adivasi, Muslim) सिद्धांत लेकर आए थे।

‘आप’ सिर्फ इसे आगे बढ़ा रही है। 2017 के गुजरात विधानसभा चुनावों से पहले आम आदमी पार्टी ने पाटीदार समुदाय का समर्थन किया था, जहाँ अब कॉन्ग्रेस नेता हार्दिक पटेल ओबीसी समुदाय के रूप में आरक्षण के लिए आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे। इटालिया एक ऐसे पाटीदार नेता हैं, जो हार्दिक पटेल के करीबी सहयोगी थे और अब गुजरात में आम आदमी पार्टी के अध्यक्ष हैं।

सूरत में आरएसएस (RSS) के एक नेता ने ऑपइंडिया से बात करते हुए कहा कि आम आदमी पार्टी ने पाटीदार और मुस्लिम मतदाताओं को एकजुट करने की कोशिश की है। पाटीदार भाजपा से असंतुष्ट हैं और मुसलमान कॉन्ग्रेस के लिए पारंपरिक वोट बैंक रहे हैं। उन्होंने कहा, “आम आदमी पार्टी एक सीधा खतरा नहीं है, लेकिन यह निश्चित रूप से एक सेंध लगाएगी। ऐसे में भाजपा को सत्ता में बने रहने के लिए जी तोड़ मेहनत करनी होगी। यह एक अभूतपूर्व 25 साल की सत्ता विरोधी लहर है, जिसका भाजपा सामना कर रही है। गुजराती शायद ‘आप’ को एक मौका देना चाहते हैं।”

क्या आप गुजरात में सरकार बना सकती है?

गुजरात के एक वरिष्ठ पत्रकार ने ऑपइंडिया से बात करते हुए कहा कि यह कल्पना से परे है कि ‘आप’ वास्तव में गुजरात में सरकार बनाएगी। उन्होंने कहा, “आप महौल बनाकर असंतुष्ट भाजपा समर्थकों को अपनी पार्टी में शामिल कर रही है। केजरीवाल पाटीदार आंदोलन के दौरान पटेल वोट बैंक का फायदा उठाना चाहते थे। पटेलों में एक तरह का असंतोष है, जहाँ वे खुद नेता बनना चाहते हैं, जैसे हार्दिक पटेल, जिन्होंने नेता के रूप में उभरने के लिए जाति का कार्ड खेला। पटेल समुदाय उनकी बयानबाजी से प्रभावित हो गया, लेकिन जब वह कॉन्ग्रेस में शामिल हुए तो उनका मोहभंग हो गया।”

उन्होंने आगे कहा कि 2017 के चुनावों में पाटीदार समुदाय ने बीजेपी की बजाए कॉन्ग्रेस को वोट दिया था। हालाँकि, इस बार वे ‘आप’ को वोट दे सकते हैं, जिससे कॉन्ग्रेस को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने कहा कि ‘आप’ 25 साल की सत्ता विरोधी लहर पर भरोसा कर रही है। केजरीवाल को लगता है कि इतने सालों से गुजरात में बीजेपी की सत्ता से लोग ऊब चुके हैं। 2017 में पहली बार वोट शेयर में मामूली वृद्धि के बावजूद बीजेपी सीट की संख्या 100 से नीचे चली गई थी। उन्होंने कहा कि जहाँ AAP को कुछ सीटें मिल सकती हैं, वहीं कॉन्ग्रेस 10-15 अपनी पारंपरिक सीटें जीत सकती हैं।

सूरत के एक आरएसएस नेता ने कहा, “गुजरात में कॉन्ग्रेस के पुनरुत्थान का कोई संकेत नहीं है।” हालाँकि, उन्होंने आशंका व्यक्त की कि ‘आप’ और कॉन्ग्रेस गुजरात में अपने दम पर सरकार नहीं बना सकते हैं। अगर भाजपा बहुमत के आँकड़े को पार करने में विफल रहती है, तो दोनों दल गठबंधन कर सकते हैं और सत्ता में आ सकते हैं। उन्होंने कहा, “अगर कॉन्ग्रेस महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ गठबंधन कर सकती है, तो उसे ‘आप’ के साथ हाथ मिलाने से कौन रोक सकता है।”

भाजपा ‘आप’ को इतना भी महत्वपूर्ण नहीं मानती कि उसे गंभीरता से ले

हालाँकि, गुजरात में भाजपा आम आदमी पार्टी के शोर-शराबे से बेफिक्र है। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता ने ऑपइंडिया को बताया, “हम उन्हें गंभीरता से नहीं लेते हैं। वे हमारे लिए इतने महत्वहीन हैं कि उन्हें वास्तविक खतरा भी नहीं माना जा सकता।” उन्होंने कहा कि उन्हें चुनाव लड़ना चाहिए, क्योंकि भारत एक लोकतांत्रिक देश है और अगर वे सीटें जीतते हैं, तो उनके लिए अच्छा है। मजबूत लोकतंत्र जरूरी है, लेकिन गुजराती तार्किक और मेहनती लोग हैं। मुफ्त बिजली के ये वादे, जिसमें वोल्टेज में उतार-चढ़ाव अन्य मुद्दे हैं, गुजरातियों के लिए अच्छा नहीं होगा।

गुजरात दो दलों वाला राज्य है

गुजरात परंपरागत रूप से दो दलों वाला राज्य रहा है। 1995 में केशुभाई पटेल के राज्य में पहली बार भाजपा की सरकार बनने तक, गुजरात में केवल एक गैर-कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री थे। जनता पार्टी के बाबूभाई पटेल, जो 1975 में इंदिरा गाँधी के दौरान एक साल से भी कम समय के लिए बने मुख्यमंत्री थे और 1977 में फिर से लगभग तीन साल तक के लिए आपातकाल लगाया था।

साल 1996 में भाजपा के पूर्व नेता शंकरसिंह वाघेला ने पार्टी छोड़ दी थी और राष्ट्रीय जनता पार्टी के नाम से अपनी खुद की राजनीतिक पार्टी बनाई थी। कॉन्ग्रेस के बाहरी समर्थन से वे गुजरात के दूसरे गैर-कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री बने। कॉन्ग्रेस द्वारा समर्थन वापस लेने की धमकी और एक अन्य राजपा (RJP) नेता दिलीप पारिख के सीएम बनने के बाद उन्हें यह पद छोड़ना पड़ा था। बाद में पार्टी का कॉन्ग्रेस में विलय हो गया था।

साल 2007 में गोरधन जदाफिया, जो 2002 के गुजरात दंगों के समय गुजरात के गृह मंत्री थे, उन्होंने भी ‘महागुजरात जनता पार्टी’ के नाम से अपनी खुद की राजनीतिक पार्टी बनाई। 2012 में राज्य विधानसभा चुनावों से पहले केशुभाई पटेल ने एक राजनीतिक दल ‘गुजरात परिवर्तन पार्टी’ का गठन किया। जदाफिया ने बाद में अपनी पार्टी का गुजरात परिवर्तन पार्टी में विलय कर दिया, जो अंततः भाजपा में शामिल हो गई।

मार्च 1998 के बाद से गुजरात में केवल भाजपा का मुख्यमंत्री रहा है। हालाँकि, गुजरात में कौन चुनाव जीतेगा, इसकी भविष्यवाणी अभी से करना जल्दबाजी होगी, लेकिन एक बात तो पक्की है कि कॉन्ग्रेस को गर्त में धकेला जा सकता है, क्योंकि भाजपा को ‘आप’ के प्रवेश से लाभ मिल सकता है।