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1 महिला ने 8 पर किया रेप का केस, सारे निकले फर्जी… गैंगरेप का 1 केस निकला ‘निजी दुश्मनी’ में फँसाने की साजिश: क्या मर्द होना अब अपराध बन चुका है?

दिल्ली की अदालतों में दर्ज बलात्कार मामलों से जुड़ी एक आरटीआई ने हमारी न्याय व्यवस्था की काली सच्चाई को बेपर्दा कर दिया है। 2017 से 2024 के बीच दर्ज 3,097 रेप मामलों में से सिर्फ 133 में दोष सिद्ध हुआ। यानी सिर्फ 4.3% मामलों में सज़ा मिली, जबकि 95% से ज़्यादा मामलों में आरोपित या तो निर्दोष साबित हुए या सबूतों के अभाव में बरी कर दिए गए। यह आँकड़ा दर्शाता है कि गंभीर अपराध के नाम पर न्याय प्रणाली का दुरुपयोग किया जा रहा है।

हमारे देश में, जहाँ सैनिक अपनी जान जोखिम में डालकर भारत माता की रक्षा करते हैं, वहीं कुछ महिलाएँ इन रक्षकों को भी झूठे बलात्कार के झूठे आरोपों में फँसाकर उनकी जिंदगी तबाह कर देती हैं। एक देशभक्त जवान, जिसने देश के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया, उसे झूठे केस में फँसा कर समाज ने अपराधी की तरह तिरस्कारित किया। मानसिक आघात, परिवार का टूटना और समाज का कलंक, ये सब उसके हिस्से आए। बाद में वह निर्दोष साबित हुआ, लेकिन उसके मन और समाज में लगी चोट को कोई ठीक नहीं कर पाया। यह केवल एक सैनिक की कहानी नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की गहरी विफलता का कड़वा सच है।

दिल्ली-NCR में कई ऐसे उदाहरण हैं जो इस सामाजिक बीमारी को बयां करते हैं:

दिल्ली की एक महिला ने 8 पुरुषों पर झूठे रेप आरोप लगाए, जिन्हें पुलिस ने ‘आदतन झूठी शिकायतकर्ता’ बताया।

दिल्ली हाईकोर्ट ने एक गैंगरेप FIR को रद्द करते हुए कहा कि इसे ‘निजी दुश्मनी निकालने के लिए कानून का दुरुपयोग’ किया गया।

नोएडा में एक महिला ने शादी से इंकार करने पर रेप का झूठा केस दर्ज कराया, जबकि संबंध पूरी तरह सहमति से थे।

गुरुग्राम में एक व्यक्ति को आठ महीने जेल में रहना पड़ा, लेकिन CCTV और कॉल रिकॉर्ड ने साबित किया कि मामला पूरी तरह फर्जी था।

साथ ही, सरकार ने बलात्कार पीड़िताओं को मुआवज़े के रूप में 88 करोड़ रुपए से अधिक वितरित किए, लेकिन झूठे मामलों के लिए केवल 6 लाख की वसूली हो सकी।

झूठे आरोपों का खामियाजा पुरुषों को सामाजिक बहिष्कार, मानसिक उत्पीड़न और आत्महत्या तक भुगतना पड़ता है। यह अन्याय न केवल पीड़ित पुरुषों के साथ होता है, बल्कि समाज को भी गहरे नुकसान पहुंचाता है।

बलात्कार एक जघन्य अपराध है और इसे कठोर सजा मिलनी चाहिए, लेकिन झूठे आरोप भी समान रूप से घातक, अमानवीय और समाज विरोधी हैं। यह वक्त आ गया है कि हमारा देश Gender-Neutral Laws अपनाए , न्याय ऐसा हो जो लिंग के आधार पर न हो, बल्कि सच्चाई और निष्पक्षता पर आधारित हो। सभी नागरिकों के अधिकारों का संरक्षण तब ही संभव होगा, जब पुरुष और महिला दोनों को बराबरी का न्याय मिलेगा। तभी हम एक मजबूत, समावेशी और न्यायपूर्ण समाज की ओर बढ़ सकेंगे।

मोदी सरकार पर फिर भड़की भारत विरोधी प्रोफेसर निताशा कौल, सोशल मीडिया पर भड़ास निकाली: पढ़िए किस OCI कार्ड के रद्द होने पर फूटा गुस्सा, क्यों है ये जरूरी

लंदन में रहने वाली भारत विरोधी शिक्षाविद प्रोफेसर निताशा कौल ने ओवरसीज सिटिजनशिप ऑफ इंडिया यानी OCI कार्ड रद्द करने पर भारत सरकार की आलोचना की है।

सोशल मीडिया एक्स पर उन्होने लिखा, “आज घर पहुंचने के बाद मुझे OCI (ओवरसीज सिटीजनशिप ऑफ इंडिया) रद्द होने की सूचना मिली। मोदी शासन की अल्पसंख्यक विरोधी और लोकतंत्र विरोधी नीतियों को उजागर करने पर मुझे दंडित किया गया है।”

प्रोफेसर कौल के पास ब्रिटिश पासपोर्ट और ओसीआई कार्ड है। फरवरी 2024 की घटना को याद करते हुए उन्होने कहा कि कैसे उन्हें कांग्रेस के नेतृत्व वाली कर्नाटक सरकार द्वारा आमंत्रित किया गया लेकिन भारत में एंट्री नहीं मिली। उन्होंने लिखा, “मोदी सरकार ने खुद को अपमानित किया और कर्नाटक सरकार का अपमान किया। पिछले साल मुझे आमंत्रित किया गया था और मेरे साथ बुरा व्यवहार किया गया। ‘भारत विरोधी’ कहे जाने पर मेरे 20,000 शब्दों के जवाब के बावजूद प्रवेश नहीं दिया गया।”

उन्होंने आगे कहा, “क्या भारत सरकार के विदेशी पीआर प्रतिनिधिमंडल बताएंगे कि ‘लोकतंत्र की माँ’ ने मुझे मेरी माँ तक पहुँचने से क्यों रोका?”

OCI एक विशेषाधिकार है। ये भारतीय मूल के व्यक्तियों (पीआईओ) को दिया जाने वाला एक दीर्घकालिक आवासीय वीजा है। 26 जनवरी 1950 या उसके बाद भारत के नागरिक को दिया जाता है। यह उन लोगों को भी दिया जाता है जिनके परिवार के सदस्य भारत में रहते हैं। कोई व्यक्ति जो किसी भारतीय से शादी की उन्हें ये वीजा मिलता है। हालाँकि पाकिस्तान, बांग्लादेश जैसे देशों के नागरिकों को OCI नहीं मिलता है।

भारत सरकार को ओसीआई कार्ड रद्द करने का अधिकार भी है। ओसीआई कार्ड तब रद्द किया जा सकता है जब कार्ड धोखाधड़ी से प्राप्त किया गया हो, तथ्यात्मक जानकारी छिपाई गई हो, भारतीय संविधान के प्रति असम्मान प्रदर्शित करता हो, दुश्मन राज्य के साथ गैरकानूनी व्यापार या संचार में संलग्न हो या भारत की संप्रभुता और अखंडता के विरुद्ध कार्य किया हो।

निताशा का OCI कार्ड उसकी भारत विरोधी गतिविधियों के कारण रद्द कर दिया गया था। भारत सरकार ने जो पेपर दिए थे उसमें लिखा था, “ यह भारत सरकार के संज्ञान में लाया गया है कि आप भारत विरोधी गतिविधियों में लिप्त पाई गई हैं। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों और सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर अपने भारत विरोधी लेखों, भाषणों और पत्रकारिता के माध्यम से भारत और उसके संस्थानों को निशाना बना कर देश की संप्रभुत्ता को खतरे में डालती रही हैं।”

निताशा का भारत विरोधी अभियान का एक लंबा इतिहास रहा है। मई 2024 में उसने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) पर संदेह जताने के लिए एक काल्पनिक कहानी साझा की। उन्होने कहा कि उसने सपना देखा था कि भारत में ईवीएम वोटों की गिनती नहीं कर रही है। उन्होंने ईवीएम के बारे में कांग्रेस पार्टी द्वारा फैलाई गई साजिश के सिद्धांत को पुख्ता करने के लिए एक मनगढ़ंत कहानी गढ़ी।

फरवरी 2024 में निताशा के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी किया गया था, जिसके आधार पर उन्हें बेंगलुरु हवाई अड्डे पर पहुंचने पर रोका गया था। भारतीय एजेंसियों ने उनके “अलगाववादी समर्थक” टिप्पणियों और सार्वजनिक तौर पर कश्मीर पर भारतीय रुख का विरोध करती रही हैं। कौल ने कहा कि उन्हें हवाई अड्डे पर अधिकारियों ने हिरासत में लिया था, जिन्होंने उन्हें देश में प्रवेश की अनुमति नहीं देने के लिए “दिल्ली से आदेश” का हवाला दिया था। उन्होंने कहा कि उनके पास अपनी यात्रा के लिए सभी आवश्यक दस्तावेज थे।

उन्होंने दावा किया कि वह ‘विपरीत परिस्थितियों’ के बावजूद ‘लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता’ की वकालत करना जारी रखेंगी।

उन्होंने पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के बारे में झूठ फैलाया था, और ‘स्टैंड विद कश्मीर (एसडब्ल्यूके)’, ‘कश्मीर सॉलिडैरिटी मूवमेंट (केएसएम)’ और ‘इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (आईएएमसी)’ जैसे कट्टरपंथी इस्लामी संगठनों द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में भाग लिया था।

भारत विरोधी प्रचारक ने दिसंबर 2021 में पूर्व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीओडीएस) बिपिन रावत की मौत का भी मजाक उड़ाया।

निताशा कौल ने उन्हें ‘कश्मीरियों का दुश्मन’ बताकर उनकी असामयिक मौत को सही ठहराया था।

जैसे दानिश ने ज्योति मल्होत्रा को बनाया गद्दार, वैसे ही कभी ISI के ट्रैप में फँसी थी माधुरी गुप्ता: पाकिस्तान में तैनाती के बाद बनी ‘मुस्लिम’, गुमनामी की मौत मरी

यूट्यूबर ज्योति मल्होत्रा सहित छह लोगों को पाकिस्तान को संवेदनशील जानकारी लीक करने के आरोप में 17 मई 2025 को गिरफ्तार किया गया। जाँच में सामने आया कि ज्योति पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के एजेंटों के संपर्क में थीं, जिन्होंने उसकी पाकिस्तान यात्रा की व्यवस्था की और भारत के संवेदनशील क्षेत्रों की जानकारी माँगी।

वह भारत में पाकिस्तान उच्चायोग में तैनात एहसान उल रहीम उर्फ दानिश के संपर्क में थी, जिसे हाल ही में ‘अवांछित व्यक्ति’ घोषित कर 24 घंटे के भीतर देश छोड़ने का आदेश दिया गया। दानिश ISI एजेंट था, जो राजनयिक की आड़ में भारत में जासूसी कर रहा था।

इस मामले के सामने आने के बाद लोगों के दिमाग में 15 साल पुराना माधुरी गुप्ता जासूसी कांड ताजा हो गया। माधुरी गुप्ता, इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायोग में तैनात थीं। 55 वर्षीय गुप्ता पर पाकिस्तानी अधिकारियों से अनधिकृत संपर्क रखने और उन्हें गोपनीय जानकारी देने का आरोप था। इस खुलासे ने भारतीय राजनयिक हलकों में उस समय भारी हलचल मचा दी थी।

माधुरी गुप्ता केस का संक्षिप्त विवरण

भारत में अप्रैल 2010 में उस समय अशांति मच गई जब इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायोग में तैनात वरिष्ठ राजनयिक माधुरी गुप्ता को पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI के लिए जासूसी करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। यह गिरफ्तारी 26/11 मुंबई हमलों के दो साल से भी कम समय बाद हुई थी, जिससे मामला और संवेदनशील बन गया। जाँच के दौरान कई चौंकाने वाली जानकारियाँ सामने आईं, जिसने राजनयिक और सुरक्षा चक्र में हड़कंप मचा दिया।

दोनों परमाणु-सशस्त्र पड़ोसी देशों के बीच पहले से ही कूटनीतिक संबंध तनावपूर्ण थे, और भारत 26/11 जैसी सुरक्षा विफलता से उबरने की कोशिश कर रहा था। ऐसे समय में विदेश सेवा की एक अधिकारी का दुश्मन देश की राजधानी में रहते हुए ISI के लिए जासूसी करना सत्ता और सुरक्षा एजेंसियों के लिए बड़ा झटका था, जिससे देश के उच्च स्तरों पर हलचल मच गई।

माधुरी गुप्ता की कहानी महज जासूसी की नहीं थी, यह भारत की खुफिया व्यवस्था की आंतरिक कमजोरियों को उजागर करने वाली एक बड़ी चेतावनी बन गई। उनकी गिरफ्तारी ने सरकारी तंत्र में निगरानी की खामियों को सामने लाया और मीडिया में तूफान खड़ा कर दिया। किसी ने उन्हें एक रोमांटिक मूर्ख कहा, तो किसी ने एक अवसरवादी या प्रतिद्वंद्वी एजेंसियों के बीच संघर्ष का मोहरा।

समय बीतने के साथ उनके मुकदमे, दोषसिद्धि और फिर गुमनामी में डूबी उनकी खामोशी ने इस ओर गंभीर सवाल उठाए कि विरोधी क्षेत्रों में काम करने वाले भारतीय राजनयिकों और खुफिया तंत्र की आंतरिक सतर्कता कितनी प्रभावी है।

IFS माधुरी गुप्ता अविवाहित थीं, अकेली रहती थीं और भारत में उनका कोई करीबी पारिवारिक संपर्क नहीं था, सिवाय एक भाई के जो अमेरिका में रहता है। पूछताछ और अदालत में उन्होंने खुद को अपने काम की प्रति समर्पित बताया। उनकी गहरी रुचि इतिहास और सूफीवाद में थी और उन्होंने फारसी कवि रूमी पर पीएचडी भी शुरू की थी।

माधुरी गुप्ता की बौद्धिक प्रवृत्ति और स्वतंत्र जीवनशैली ने कुछ लोगों की प्रशंसा अर्जित की, जबकि अन्य ने उनसे दूरी बनाए रखी। वरिष्ठता, संवेदनशील जानकारी तक पहुँच और व्यक्तिगत अकेलेपन के इस संयोजन ने उन्हें पाकिस्तानी जासूसी नेटवर्क के लिए हनी ट्रैप का आसान लक्ष्य बना दिया। उनका मामला भारत के सबसे चर्चित जासूसी मामलों में से एक बन गया, खासकर इसलिए क्योंकि न्यायिक प्रक्रिया के दौरान ही एक वर्ग ने उन्हें मीडिया ट्रायल के चलते पीड़ित के रूप में चित्रित करना शुरू कर दिया था।

प्रारंभिक चेतावनियाँ और बढ़ता संदेह

संदेह की पहली झलक 2009 के अंत में तब सामने आई जब इस्लामाबाद में तैनात भारतीय खुफिया अधिकारियों ने माधुरी गुप्ता के व्यवहार में अनियमितताओं को देखा। गुप्ता प्रेस और सूचना विंग में एक लो-प्रोफाइल राजनयिक के रूप में कार्यरत थीं, लेकिन उन्होंने कुछ पाकिस्तानी अधिकारियों और स्थानीय पत्रकारों के साथ असामान्य रूप से घनिष्ठ संबंध बना लिए थे, जिससे उनकी गतिविधियाँ जाँच के दायरे में आ गईं।

भारत की इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB)  ने माधुरी गुप्ता पर निगरानी शुरू की, जो सामान्य एहतियाती निगरानी से कहीं अधिक थी। उनके मामले में स्पष्ट खतरे के संकेत मिले, जिसके चलते उन्हें संदेह के घेरे में लिया गया। गुप्ता का नाम गोपनीय चैनलों में एक संभावित अधिकारी के रूप में उभरने लगा जो संवेदनशील जानकारी लीक कर सकता था। शुरुआत में ये संदेह अस्पष्ट लग रहे थे, लेकिन जैसे-जैसे IB ने उनकी गतिविधियों पर करीब से नजर रखी, स्थिति गंभीर होती गई। एजेंसी ने कथित तौर पर उनके संचार को इंटरसेप्ट किया और रणनीतिक जवाबी कदम उठाने शुरू कर दिए।

नई दिल्ली स्थित गृह मंत्रालय में 2010 की शुरुआत में एक गोपनीय उच्च स्तरीय बैठक बुलाई गई, जिसमें रॉ प्रमुख केसी वर्मा, इंटेलिजेंस ब्यूरो के निदेशक राजीव माथुर और गृह सचिव जीके पिल्लई शामिल हुए। इस बैठक का उद्देश्य इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायोग में कार्यरत माधुरी गुप्ता द्वारा संभावित जासूसी के मामले पर चर्चा करना था, जिसे एक गंभीर आंतरिक सुरक्षा उल्लंघन माना गया। हैरानी की बात ये है कि तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम को इस बैठक की जानकारी नहीं थी, जिसका कारण आज भी स्पष्ट नहीं है।

माधुरी गुप्ता के मामले में विदेश मंत्रालय को जानबूझकर अंधेरे में रखा गया ताकि गुप्ता या उसके किसी संभावित सहयोगी को सतर्क न किया जा सके। पूरी कार्रवाई को अत्यंत गोपनीय रखा गया न कोई लिखित रिकॉर्ड था और न ही कोई इलेक्ट्रॉनिक ट्रेल।

आईबी ने एक रणनीतिक कदम उठाते हुए अपने चैनलों के माध्यम से जानबूझकर गलत जानकारी भेजनी शुरू की। मकसद ये था की अगर यह झूठी सूचना पाकिस्तान तक पहुँचती है और वहाँ भारतीय स्रोतों से उसकी पुष्टि होती है, तो यह साबित हो जाएगा कि जानकारी गुप्ता के जरिए लीक हो रही है। यह एक सटीक और गहराई से जाँच करना था जो सफल भी रहा।

इस पुष्टि के बाद खुफिया एजेंसियों ने गुप्ता को बिना किसी शोर-शराबे के भारत वापस लाने की योजना बनाई ताकि इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायोग के अन्य अधिकारियों को भी इसकी भनक न लगे। साथ ही, यह भी जरूरी था कि कोई संभावित पाकिस्तानी संचालक या सहयोगी जानकारी से दूर रहे। इसलिए, पूरे अभियान में पूर्ण गोपनीयता बनाए रखना भी जरूरी था।

माधुरी गुप्ता की संदिग्ध गतिविधियों की जाँच के दौरान विदेश मंत्रालय को जानबूझकर इस मामले से अलग रखा गया ताकि गुप्ता या उसके किसी संभावित सहयोगी को सतर्क न किया जा सके। गोपनीयता अत्यंत आवश्यक थी, इसलिए न तो कोई लिखित रिकॉर्ड तैयार किया गया और न ही कोई डिजिटल  प्रमाण छोड़ा गया।

इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) ने एक रणनीतिक योजना के तहत अपने चैनलों में जानबूझकर गलत जानकारी फैलानी शुरू की। उद्देश्य था कि यदि यह झूठी जानकारी पाकिस्तान तक पहुँचती है और वहाँ के भारतीय स्रोतों द्वारा इसकी पुष्टि हो जाती है, तो यह प्रमाणित हो जाएगा कि जानकारी लीक करने वाली माधुरी गुप्ता ही हैं। यह एक बेहद संवेदनशील परीक्षण था, जो की पूरी तरह सफल रहा।

इस पुष्टि के बाद यह स्पष्ट हो गया कि गुप्ता भारत के खिलाफ काम कर रही थी। अब अगला कदम उसे बिना किसी संदेह के भारत वापस लाना था, ताकि इस्लामाबाद स्थित उच्चायोग के अन्य अधिकारियों को भी इसकी भनक न लगे। खुफिया एजेंसियों के लिए यह भी जरूरी था कि पाकिस्तानी संचालक या सहयोगी इस घटनाक्रम से अनजान रहें। इसी कारण पूरे ऑपरेशन में गोपनीयता बनाए रखना जरूरी था।

आखिर उसने क्या लीक किया?

ऑपइंडिया को मिले अदालती दस्तावेजों के अनुसार, जुलाई 2010 में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने माधुरी गुप्ता के खिलाफ आरोप पत्र दाखिल किया। जाँच में खुलासा हुआ कि गुप्ता के जीमेल अकाउंट [email protected] से कुल 73 ईमेल बरामद हुए, जिनमें 54 भेजे गए और 19 मेल आए थे।

गुप्ता ने बताया कि यह ईमेल आईडी उसके पाकिस्तानी संपर्क मुबशर रजा राणा ने बनाई थी, जो ISI का ऑपरेटिव था। इसके अलावा एक अन्य पाकिस्तानी हैंडलर, जिसे केवल जमशेद या ‘जिम’ के नाम से जाना गया, उसको सूचनाओं का प्रमुख रिसीवर बताया गया। रिपोर्ट के अनुसार, गुप्ता के साथ उसका कथित रूप से रोमांटिक संबंध भी था।

माधुरी गुप्ता द्वारा भेजे गए ईमेल की सामग्री, जो 300 से अधिक पृष्ठों में दर्ज की गई थी, उसमें  इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायोग के कर्मचारियों के नाम, जीवनी संबंधी विवरण, नौकरी की भूमिकाएँ और उनकी आने जाने की जानकारी शामिल थी।

कुछ मामलों में, इन कर्मचारियों के खुफिया एजेंसियों से कथित संबंधों का भी खुलासा किया गया था। गुप्ता पर R&AW अधिकारियों की गुप्त पहचान उजागर करने, विदेश मंत्रालय को भेजे गए आंतरिक आकलनों को लीक करने और यहाँ तक कि ‘भारत के लिए संभावित गुप्त मार्गों’ की जानकारी पाकिस्तान को देने का गंभीर आरोप लगाया गया था।

अभियोजन पक्ष ने स्पष्ट रूप से कहा कि माधुरी गुप्ता द्वारा बताई गई जानकारी ‘संवेदनशील और गोपनीय’ थी। हालांकि, कुछ मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, कुछ खुफिया विशेषज्ञ इस वर्गीकरण से सहमत नहीं थे और उन्होंने इन सूचनाओं को हल्के में लेते हुए इसे महज ‘व्हिस्की-सोडा बातचीत’ करार दिया।

हालाँकि कुछ विशेषज्ञों ने जानकारी की संवेदनशीलता पर सवाल उठाए, अदालत ने कड़ा रुख अपनाया। अदालत ने माना कि भले ही सारी सामग्री सीधे रक्षा से संबंधित न हो, लेकिन उसका सामूहिक रूप से खुलासा होना राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा है। विशेषकर पाकिस्तान जैसे शत्रु देश में, जहाँ स्टाफ के डेटा को भी हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि गुप्ता द्वारा भेजे गए ईमेल ‘शत्रु देश के लिए स्पष्ट रूप से संवेदनशील और उपयोगी’ थे और उनकी गोपनीयता को सर्वोच्च महत्व दिया जाना चाहिए था।

खुफिया अभियानों में समस्या सिर्फ सूचना लीक होने की नहीं होती, बल्कि यह होती है कि वह किस तरीके से लीक की गई। माधुरी गुप्ता के कबूलनामे, सूचनाओं तक उनकी पहुँच और पीछे छोड़े गए डिजिटल साक्ष्यों ने उनके खिलाफ मामला पूरी तरह मजबूत कर दिया। भले ही लीक की गई जानकारी ओपन-सोर्स और गोपनीय जानकारी के बीच के ग्रे ज़ोन में क्यों न रही हो। मुख्य बात यह रही कि उसने  जानबूझकर संवेदनशील जानकारी साझा की, और जो दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त था।

अभियोजन पक्ष का कथन- हनीट्रैप और विश्वासघात

जाँचकर्ताओं ने गुप्ता के कथित विश्वासघात की भयावह तस्वीर पेश की। अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि गुप्ता एक क्लासिक आईएसआई हनीट्रैप का शिकार हो गई, जो एक भावनात्मक उलझन से सक्रिय सहयोग में बदल गई। इस संदर्भ में महत्वपूर्ण व्यक्ति जमशेद था, जिसे गुप्ता के ईमेल एक्सचेंजों में ‘जिम’ के रूप में संदर्भित किया गया था। कथित तौर पर उसकी उम्र 30 के दशक में थी और वह गुप्ता से लगभग दो दशक छोटा था। उसे एक प्रशिक्षित ऑपरेटिव के रूप में वर्णित किया गया था, जिसे खुफिया उद्देश्यों के लिए गुप्ता को तैयार करने का कार्य सौंपा गया था।

चार्जशीट में 3 अक्टूबर 2009  को गुप्ता द्वारा ‘जावेरिया’ उपनाम से अपनी हैंडलर ‘सुल्ताना’ (जिसे राणा के रूप में पहचाना गया) को भेजे गए ईमेल का उल्लेख किया गया है। इस ईमेल में, गुप्ता ने जिम के साथ अपने रिश्ते को समाप्त करने की बात की। उसने दिल टूटने, हताशा और मोहभंग का वर्णन करते हुए जिम पर आरोप लगाया कि वह उसे नियंत्रित करने, अधिकार जताने और अपमानित करने की कोशिश कर रहा था।

गुप्ता ने लिखा, “जिम मेरे साथ कुत्ते जैसा व्यवहार करता है… उसे किसी भी पाकिस्तानी के साथ मेरे मेलजोल पर सख्त आपत्ति है। उसे अपने ही लोगों के बारे में इतनी खराब राय क्यों है?” पत्र का अंत कड़वाहट से हुआ, जिसमें उसने कहा, “जिम से कहो कि पाकिस्तानियों को आजमा के देख लिया।”

जाँचकर्ताओं के अनुसार, गुप्ता द्वारा भेजे गए ईमेल ने उसकी भावनात्मक कमज़ोरी और उसकी संलिप्तता की गहराई को स्पष्ट किया। गुप्ता ने कथित तौर पर स्नेह, मान्यता और शादी के वादे के बदले में भारतीय कर्मचारियों, पदों और आंतरिक सारांशों से संबंधित संवेदनशील जानकारी लीक करना शुरू कर दिया था। स्पेशल सेल इंस्पेक्टर पंकज सूद के अनुसार, गुप्ता ने स्वेच्छा से अपने अपराध स्वीकार किए, पासवर्ड सौंपे, दोनों हैंडलरों की पहचान की और अपने सहयोग की सीमा का खुलासा किया।

अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि गुप्ता एक पूर्ण-स्तरीय संपत्ति थी, जो बुद्धिमान, इच्छुक और भावनात्मक रूप से निवेशित थी। उसे सामान्य जानकारी देने के लिए धोखा नहीं दिया गया था, उसने सक्रिय रूप से ऐसी जानकारी की तलाश की जो उसके संचालकों को प्रभावित कर सके। गुप्ता के ब्लैकबेरी डिवाइस को एक समझौता किए गए ईमेल खाते के उपयोग के लिए कॉन्फ़िगर किया गया था, और मेटाडेटा विश्लेषण ने पाकिस्तानी संपर्कों के साथ नियमित संचार की पुष्टि की।

अधिकारियों ने जोर देकर कहा कि विश्वासघात खासतौर पर गंभीर था, न केवल इसलिए कि जानकारी लीक हुई, बल्कि क्योंकि गुप्ता ने स्वेच्छा से और व्यक्तिगत संतुष्टि के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता किया। उसका मामला 26/11 के बाद बढ़े हुए भारत-पाकिस्तान तनाव के समय सामने आया था। अदालत में, अभियोजन पक्ष ने यह बात दोहराई कि एक वरिष्ठ राजनयिक को एक विदेशी एजेंट ने विचारधारा या पैसे के लिए नहीं, बल्कि प्यार के भ्रम में बहकाया था।

बचाव पक्ष का जवाब, तुच्छ डेटा और प्रतिशोध

अभियोजन पक्ष के तर्क के विपरीत, गुप्ता की बचाव टीम ने अदालत में दावा किया कि वह हनीट्रैप की शिकार नहीं थी, बल्कि कार्यालय की राजनीति और संस्थागत प्रतिशोध का निशाना बनी। उनका प्रतिनिधित्व एडवोकेट जोगिंदर सिंह दहिया ने किया, जिन्होंने दलील दी कि गुप्ता के पास कभी भी जरूरी   गुप्त खुफिया जानकारी नहीं थी और न ही उन्हें ऐसी जानकारी तक पहुँच प्राप्त थी। बचाव पक्ष के अनुसार, गुप्ता का कार्य केवल उर्दू प्रेस की निगरानी करना और सारांश तैयार करना था, और उनकी भूमिका में कोई रणनीतिक निर्णय या रक्षा संबंधी जानकारी शामिल नहीं थी।

गुप्ता ने पूरे मुकदमे के दौरान खुद को निर्दोष बताया और जोर देकर कहा कि उन्हें जानबूझकर फंसाया गया है। उन्होंने दावा किया कि भारतीय उच्चायोग के कुछ ईर्ष्यालु वरिष्ठ अधिकारियों के साथ उनके संबंध तनावपूर्ण थे, और उन्हीं अधिकारियों ने उन्हें फंसाने की साजिश रची।

गुप्ता के मुकदमे को एक इंटर-एजेंसी संघर्ष के उदाहरण के रूप में भी देखा गया, जिसमें इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) और रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RAW) की होड़ ने उनकी दोषसिद्धि को प्रभावित किया हो सकता है। उनकी गिरफ्तारी के कुछ ही दिनों बाद इस्लामाबाद में उस समय के रॉ स्टेशन प्रमुख आर.के. शर्मा का नाम लीक हो गया, जिससे यह संदेह और गहराया कि मामला केवल जासूसी नहीं बल्कि आंतरिक राजनीति का हिस्सा भी था, और गुप्ता इस संघर्ष की संपार्श्विक क्षति बन गईं।

उनके समर्थकों का दावा था कि गुप्ता एक बलि का बकरा थीं। एक आसान लक्ष्य जो उच्च स्तरीय खुफिया संघर्ष में फंस गईं और उन्हें उनके कर्मों के बजाय उनके व्यक्तित्व या व्यक्तिगत जीवन के कारण दंडित किया गया। हालाँकि, तथ्य यह है कि गुप्ता ने आईएसआई एजेंट के साथ भावनात्मक संबंध के चलते संवेदनशील जानकारी लीक की, जिसे अदालत ने राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा माना।

न्याय का दिन- आरोप, दोषसिद्धि और सजा

मामले की प्रगति के साथ, गुप्ता के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी (आपराधिक साजिश) और आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम (OSA) की धारा 3(1)(c) के तहत आरोप तय करने के लिए पर्याप्त प्रथम दृष्टया साक्ष्य पाए गए। इन धाराओं के तहत दोषी पाए जाने पर अधिकतम सजा तीन साल की हो सकती थी।

हालाँकि, जनवरी 2012 में पटियाला हाउस कोर्ट ने OSA की धारा 3(1) के पहले हिस्से जिसके तहत अधिकतम सजा 14 साल है, उसके तहत मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं दी। इस निर्णय को दिल्ली सरकार ने दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी। इस बीच, ट्रायल कोर्ट में मामला आगे बढ़ता रहा और माधुरी गुप्ता ने खुद को निर्दोष बताते हुए मुकदमा पूरी तरह चलाने की माँग की।

उच्च न्यायालय ने राज्य की याचिका को स्वीकार कर लिया, लेकिन कार्यवाही धीमी गति से आगे बढ़ी। गुप्ता की कानूनी टीम ने मुकदमे में अनियमितताओं का हवाला देते हुए, ईमेल से जुड़े तकनीकी सबूतों की कमी पर सवाल उठाए और लंबे समय तक प्री-ट्रायल हिरासत को राहत के आधार के रूप में प्रस्तुत किया।

उन्होंने यह तर्क किया कि गुप्ता की सजा दबाव में किए गए कबूलनामे और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर निर्भर थी, जिसमें मजबूत फोरेंसिक समर्थन का अभाव था।  इस बीच, अभियोजन पक्ष सत्र न्यायालय के निष्कर्षों पर कायम रहा और कहा कि हालाँकि सजा कृत्य की गंभीरता की तुलना में हल्की थी, लेकिन वह न्यायसंगत थी।

यह मामला कई वर्षों तक न्यायालय में विचाराधीन रहा और विभिन्न कारणों से इसकी सुनवाई बार-बार स्थगित होती रही। फिर, जनवरी 2016 में, न्यायमूर्ति प्रतिभा रानी ने निचली अदालत के आदेश के खिलाफ राज्य की पुनर्विचार याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने माधुरी गुप्ता मामले में निचली अदालत के आदेश के खिलाफ राज्य की पुनरीक्षण याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया। सत्र न्यायालय ने गुप्ता पर पहले आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम (OSA) की धारा 3(1) (भाग II) के तहत आरोप तय किए थे, जिसमें अधिकतम तीन साल की सजा का प्रावधान है।

हालाँकि, राज्य ने याचिका में यह तर्क दिया कि गुप्ता द्वारा भेजे गए ईमेलों में भारत की सुरक्षा से जुड़ी संवेदनशील और रणनीतिक जानकारी मौजूद थी, इसलिए उन पर OSA की धारा 3(1) के अधिक गंभीर प्रावधान के तहत मुकदमा चलना चाहिए था, जिसमें अधिकतम 14 साल की सजा हो सकती है। अदालत ने इस आधार को मानते हुए याचिका को  आंशिक रूप से स्वीकार किया।

उच्च न्यायालय ने राज्य के तर्क से सहमति जताई कि आरोप निर्धारण के चरण में अपराध की गंभीरता का आकलन नहीं किया जाना चाहिए। विशेषज्ञों का मानना था कि रिकॉर्ड में मौजूद गंभीर आरोपों को नजरअंदाज करना प्रक्रिया में त्रुटि है।

इस आधार पर, अदालत ने निचली अदालत के आदेश को आंशिक रूप से खारिज करते हुए निर्देश दिया कि माधुरी गुप्ता पर आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम की अधिक कठोर धारा 3(1) (भाग I) के तहत आरोप तय किए जाएँ, जिसमें अधिकतम 14 साल की सजा का प्रावधान है।

जिसके बाद माधुरी गुप्ता का मुकदमा बाधित नहीं हुआ। दिल्ली उच्च न्यायालय ने गंभीर आरोपों के साथ पुनः कार्यवाही की अनुमति दी और निर्देश दिया कि यदि आवश्यक हो, तो गुप्ता को गवाहों से दोबारा जिरह करने का मौका दिया जाए। साथ ही, अदालत ने राज्य के इस आश्वासन को रिकॉर्ड में लिया कि केवल आरोपों की गंभीरता के आधार पर गुप्ता की ज़मानत रद्द नहीं की जाएगी।

लगभग आठ वर्षों की कानूनी प्रक्रिया और कई बार सुनवाई स्थगित होने के बाद, 18 मई 2018 को पटियाला हाउस कोर्ट, नई दिल्ली के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सिद्धार्थ शर्मा ने अंतिम फैसला सुनाया। अदालत ने माधुरी गुप्ता को आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम, 1923 की धारा 3(1)(c) भाग II, धारा 5 और भारतीय दंड संहिता की धारा 120-बी (आपराधिक साजिश) के तहत दोषी करार दिया।

हालाँकि, धारा 3(1) भाग I के अंतर्गत गंभीर आरोप, जिसमें 14 साल तक की सजा का प्रावधान है। उसको अदालत ने यह मानते हुए खारिज कर दिया कि लीक की गई जानकारी सीधे रक्षा अभियानों से संबंधित नहीं थी।

पटियाला हाउस कोर्ट ने 19 मई 2018 में माधुरी गुप्ता को तीन साल के साधारण कारावास की सजा सुनाई, जो आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम (OSA) की संबंधित धाराओं के तहत अधिकतम सजा अवधि थी। अदालत ने यह भी आदेश दिया कि OSA की दोनों धाराओं के तहत दी गई सज़ाएँ साथ-साथ चलेंगी। साथ ही, गुप्ता को भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 428 के अंतर्गत राहत दी गई, जिसके तहत 2010 से 2012 के बीच बिताए गए 20 महीने की हिरासत अवधि को सजा में समायोजित किया गया।

अदालत के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सिद्धार्थ शर्मा ने सजा सुनाते हुए अपने फैसले में कहा, “निस्संदेह, उनके कद और पद पर आसीन किसी व्यक्ति से यह अपेक्षा की जाती है कि वह एक सामान्य नागरिक की तुलना में कहीं अधिक ज़िम्मेदारी से व्यवहार करे। गुप्ता के कृत्य ने देश की प्रतिष्ठा को धूमिल किया है और भारत की सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा उत्पन्न किया है।”

माधुरी गुप्ता की उम्र, अकेलेपन और सेवानिवृत्ति लाभों के संभावित नुकसान का हवाला देते हुए सजा में नरमी की अपील को अदालत ने अस्वीकार कर दिया। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सिद्धार्थ शर्मा ने स्पष्ट किया कि एक वरिष्ठ राजनयिक, जिसने यूपीएससी जैसी प्रतिष्ठित परीक्षा पास की हो और संवेदनशील पद पर कार्यरत रही हो, उससे अधिक जिम्मेदार और सतर्क व्यवहार की अपेक्षा की जाती है।

हालाँकि, अदालत ने गुप्ता के अपील के अधिकार को मान्यता देते हुए उन्हें अंतरिम राहत दी। सजा को 30 दिनों के लिए निलंबित कर दिया गया, ताकि वह दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर सकें। उन्हें 25,000 रुपए का व्यक्तिगत और जमानती बांड जमा करने की शर्त पर जमानत पर रिहा रहने की अनुमति दी गई।

उच्च न्यायालय में अपील और फैसले के बाद का घटनाक्रम

सजा सुनाए जाने के बाद, माधुरी गुप्ता ने 19 मई 2018 को दिल्ली उच्च न्यायालय में ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती दी। ट्रायल कोर्ट ने अपील दाखिल करने का समय देने के लिए उसकी तीन साल की सजा को औपचारिक रूप से 30 दिनों के लिए निलंबित कर दिया गया। गुप्ता ने 25,000 रुपये के व्यक्तिगत और जमानती बांड जमा कर दिए और अपील लंबित रहने तक वह जमानत पर रहीं।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने उसकी याचिका स्वीकार कर ली, लेकिन कानूनी कार्यवाही धीमी गति से आगे बढ़ती रही। बाद में, कोविड-19 महामारी के दौरान अदालतों का कामकाज प्रभावित हुआ, जिससे उसकी  सुनवाई कई बार स्थगित होती रही और मामला लंबा खिंच गया।

मौत, जिसने जासूसी मामले को हमेशा के लिए दफन कर दिया

माधुरी गुप्ता का निधन अक्टूबर 2021 में राजस्थान के भिवाड़ी में गुमनामी में हो गया, जहाँ वो अकेले रह रही थीं। उसकी मृत्यु की कोई आधिकारिक पुष्टि विदेश मंत्रालय की ओर से नहीं की गई, लेकिन उसके पुराने मित्र और वकील जोगिंदर दहिया ने बताया कि उन्हें यह जानकारी गुप्ता के भाई से कुछ दिनों बाद मिली।

गुप्ता की मृत्यु के साथ ही उसके खिलाफ चल रही कानूनी प्रक्रिया अपने आप ही खत्म हो गई। दिल्ली उच्च न्यायालय में लंबित अपील पर कोई अंतिम निर्णय नहीं आया। ऐसे में ट्रायल कोर्ट की धारणा वैध बनी रही और उसे किसी उच्च निर्णय द्वारा पलटा नहीं गया।

IB बनाम रॉ

यह मामला केवल जासूसी का नहीं था, बल्कि इसने देश की खुफिया एजेंसियों आईबी और रॉ के बीच गहरे और पुराने संस्थागत मतभेदों को उजागर किया। गुप्ता की अप्रैल 2010 में गिरफ्तारी के कुछ ही दिनों बाद, इस्लामाबाद में भारत के रॉ स्टेशन प्रमुख आरके शर्मा का नाम और पदनाम मीडिया में लीक हो गया, जिससे उनकी पहचान सार्वजनिक हो गई और उनका सुरक्षा कवच खत्म हो गया। यह स्पष्ट नहीं हुआ कि यह लीक कैसे हुआ, लेकिन इससे खुफिया एजेंसियों के बीच आपसी समन्वय की कमी और भीतर की खींचतान उजागर हो गई। इसने दिखाया कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मामलों में भी एजेंसीगत होड़ किस हद तक जा सकती है।

खुफिया सूत्रों और पूर्व अधिकारियों द्वारा पुष्टि किए गए एक रिपोर्ट के अनुसार, मामले को लगभग पूरी तरह से भारतीय खुफिया ब्यूरो (IB) ने संभाला था, जबकि रिसर्च एंड एनालिसिस विंग (RAW) को अंत तक इस प्रक्रिया से बाहर रखा गया था। आईबी कई महीनों से गुप्ता पर निगरानी रख रहा था, जबकि रॉ के स्थानीय ऑपरेशन, जिसमें उनकी अपनी संदेहजनक या आंतरिक मूल्यांकन शामिल थे, उसको स्पष्ट रूप से नज़रअंदाज़ किया गया था। अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि इस अंतर-एजेंसी विश्वास की कमी के कारण समानांतर सूचना प्रवाह और दोहराई गई निगरानी की स्थिति उत्पन्न हुई, जो इस्लामाबाद जैसे जटिल और प्रतिकूल वातावरण में खतरनाक रूप से बेअसर साबित हुई।

इस मामले में संजय माथुर, जो उस समय इस्लामाबाद में आईबी के प्रेस और सूचना अधिकारी थे, उनपर  गुप्ता को जावेद रशीद से मिलवाने का आरोप था, जो कथित तौर पर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई से जुड़ा एक पत्रकार था। हालाँकि, यह आरोप अदालत में टिक नहीं पाए। संजय माथुर को पाकिस्तान से समय से पहले वापस बुलाए जाने और उनके बाहर निकलने के आसपास की घटनाओं ने लोगों को चौंका दिया।

आर.के. शर्मा, जो एक वरिष्ठ रॉ अधिकारी थे,  इस मामले में अप्रत्यक्ष क्षति का शिकार हो गए। जबकि उनके खिलाफ गलत काम के कोई ठोस सबूत नहीं थे, फिर भी उन्होंने खुद को इसके परिणामों में फँसा हुआ पाया। इस घटनाक्रम का परिणाम न केवल एक समझौता मिशन था, बल्कि भारत की सबसे महत्वपूर्ण विदेशी चौकियों में से एक पर खुफिया स्थिति भी प्रभावित हुई और कमजोर हो गई।

मीडिया सर्कस

ऐसे मामलों में सबसे बड़ी चुनौती होती है मीडिया ट्रायल, जो अक्सर बिना ठोस तथ्यों के भी व्यापक सार्वजनिक प्रतिक्रिया को जन्म देता है। इस मामले में भी, मीडिया में तूफान उठना स्वाभाविक था, क्योंकि आरोप था कि पाकिस्तान में तैनात एक वरिष्ठ भारतीय राजनयिक ने दुश्मन की खुफिया एजेंसी को संवेदनशील जानकारी दी। यह न केवल उनकी सेवा शपथ का उल्लंघन था, बल्कि राष्ट्र द्वारा उन पर किए गए भरोसे का भी गंभीर विश्वासघात था। ऐसे समय में जब देश पहले से ही सीमा पार आतंकवाद और जासूसी के खतरों का सामना कर रहा है, जनता का यह जानना स्वाभाविक था कि राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता करने वाला अंदरूनी व्यक्ति कौन था।

माधुरी गुप्ता का निजी और पेशेवर जीवन मीडिया के लिए जाँच-पड़ताल और सनसनीखेज रिपोर्टिंग का विषय बन गया। समाचार चैनलों और अखबारों ने उनके बारे में तथ्यों को खंगालने के साथ-साथ कई बार गढ़ने की भी कोशिश की, ताकि दर्शकों को परोसा जा सके। एक उम्रदराज, उर्दू में पारंगत भारतीय राजनयिक का दुश्मन देश के जाल में फँसना और संवेदनशील भारतीय खुफिया जानकारी लीक करने का आरोप अपने आप में एक आकर्षक हेडलाइन थी।

इस कवरेज ने जहाँ एक ओर उन्हें लेकर भारी जनचर्चा और आलोचना को जन्म दिया, वहीं उनके कुछ समर्थकों ने उन्हें एक ‘पीड़ित’ के रूप में पेश करने की कोशिश भी की। हालाँकि, कवरेज की आलोचना करने वालों ने इसे ‘मीडिया ट्रायल’ करार दिया, पर यह तथ्य बना रहा कि माधुरी गुप्ता कोई निर्दोष शिकार नहीं थीं। उन्होंने स्वयं यह स्वीकार किया था कि उन्होंने जानबूझकर एक शत्रु राष्ट्र के एजेंटों को संवेदनशील जानकारी दी थी। वास्तव में, उनके खिलाफ की गई जाँच उनकी ग़लती की गंभीरता को दर्शाती थी।

गुप्ता लोगों की नजर में सिर्फ एक अकेली महिला नहीं रहीं, बल्कि वो एक गहरी और व्यापक चेतावनी का प्रतीक बन गईं। उनका मामला इस बात का प्रतीक बन गया कि जब संस्थागत भरोसा भीतर से टूटता है, तो वह किसी बाहरी खतरे से कहीं ज़्यादा गंभीर और स्थायी नुकसान छोड़ सकता है।

सुरक्षा, गोपनीयता और निगरानी पर बड़े सवाल

माधुरी गुप्ता का मामला सिर्फ एक राजनयिक द्वारा विश्वासघात की कहानी नहीं थी, बल्कि इसने उससे कहीं आगे जाकर भारतीय खुफिया और सुरक्षा ढाँचे से जुड़े असहज सवालों को उजागर किया। इसने विशेष रूप से पाकिस्तान जैसे संवेदनशील और प्रतिकूल क्षेत्रों में तैनात मिशनों के भीतर आंतरिक सुरक्षा प्रबंधन की जटिलताओं को सामने रखा।

गुप्ता की गतिविधियाँ निस्संदेह व्यक्तिगत स्तर पर गंभीर विफलता थीं, लेकिन उन्होंने बड़ी संस्थागत खामियों की ओर भी इशारा किया, जैसे खुफिया एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी, सुरक्षा प्रक्रियाओं की ढिलाई, और मौजूदा खतरों की पहचान में नाकामी।

सबसे चिंताजनक बात यह थी कि इस्लामाबाद जैसी उच्च-जोखिम वाली पोस्टिंग में भी निगरानी तंत्र पर्याप्त मजबूत नहीं थे। गुप्ता महीनों तक एक निजी ईमेल के जरिए संवेदनशील जानकारी साझा करती रहीं, उन्होंने अनधिकृत संबंध बनाए रखे, और फिर भी वह औपचारिक जाँच के दायरे में देर से आईं। यह दर्शाता है कि जब कर्मचारी राजनयिक कवर के तहत कार्यरत हों और नियमित रूप से बाहरी संपर्क में हों, तब अंदरूनी खतरों का प्रबंधन करना कितना जटिल और चुनौतीपूर्ण हो सकता है।

यह ध्यान देना महत्वपूर्ण है कि तथाकथित खुफिया विफलताओं की घटनाओं में हाल के वर्षों में उल्लेखनीय कमी आई है, विशेषकर 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पदभार संभालने के बाद। केंद्र सरकार ने खुफिया एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय को प्राथमिकता दी है, तकनीकी आधुनिकीकरण को बढ़ावा दिया है, और आंतरिक सुरक्षा तंत्र के गहन एकीकरण की दिशा में ठोस कदम उठाए हैं।

हालाँकि इन पहलों के अधिकांश विवरण गोपनीय हैं और  होना भी चाहिए, मगर बाद की घटनाओं में संस्थागत प्रतिक्रियाओं से यह स्पष्ट है कि माधुरी गुप्ता जैसे मामलों से जरूरी सबक लिए गए हैं और उन्हें नजरअंदाज नहीं किया गया।

बेशक, कुछ खुफिया विफलताएँ अब भी हुई हैं, जिनके कारण जान-माल की हानि हुई है। फिर भी, कुल मिलाकर खुफिया एजेंसियाँ अब उस दिशा में अग्रसर हैं जहाँ कम से कम साझा हितों वाले मामलों में वे अधिक समन्वय और सहयोग के साथ काम कर रही हैं।

निष्कर्ष – महत्वाकांक्षा, कमजोरी और राष्ट्रीय लागत की कहानी

माधुरी गुप्ता का मामला केवल एक अधिकारी द्वारा विश्वासघात की कहानी नहीं है, बल्कि यह व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा, भावनात्मक भेद्यता और संस्थागत निगरानी की विफलता के खतरनाक संगम का उदाहरण है, जो भारतीय कूटनीति के सबसे संवेदनशील और भू-राजनीतिक रूप से तनावग्रस्त मंचों में से एक इस्लामाबाद में सामने आया। वह एक ऐसी अधिकारी थीं, जिन्हें भारत के हितों और छवि की रक्षा का जिम्मा सौंपा गया था, लेकिन उन्होंने बार-बार, जानबूझकर उस भरोसे को तोड़ा, और वह भी एक ऐसे समय में जब भारत ऐसी किसी चूक का जोखिम नहीं उठा सकता था।

न्यायालय संबंधित दस्तावेजों के लिंक

माधुरी गुप्ता हाई कोर्ट.pdf

माधुरी गुप्ता सेशन कोर्ट.pdf

माधुरी गुप्ता सत्र न्यायालय सजा.pdf

नोट: मूल रूप से अंग्रेजी में लिखे गए इस लेख का हिंदी अनुवाद विवेकानंद मिश्रा ने किया है।

ऑपरेशन सिंदूर की तारीफ करने के वक्त युसूफ पठान ‘बिजी’, मुर्शिदाबाद हिंसा के वक्त ले रहे थे चाय की चुस्की: TMC ने बनाई 59 सदस्यों वाली डेलिगेशन से दूरी, अपने सांसदों को विदेश भेजने से किया इनकार

बंगाल में मुर्शिदाबाद हिंसा के दौरान चाय की चुस्की लेने वाले सांसद युसूफ पठान को ऑपरेशन सिंदूर की तारीफ करने में कोई दिलचस्पी नहीं है। मिशन को वैश्विक मंच तक पहुँचाने वाले डेलिगेशन में उनका नाम शामिल था, लेकिन अब खबर है कि सांसद उस डेलिगेशन का हिस्सा नहीं बनेंगे। वहीं, ममता बनर्जी ने भी साफ कर दिया है कि युसूफ पठान या उनकी पार्टी का कोई भी नेता इस डेलिगेशन का हिस्सा नहीं बनेगा।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कॉन्ग्रेस पार्टी सरकार के इस कदम से सहमत नहीं है कि वह उनके नेतृत्व से सलाह किए बिना ही सांसद का चयन करेगी। इस संबंध में बात करते हुए कोलकाता में पार्टी के महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी ने बयान भी जारी किया।

उन्होंने कहा, “केंद्र सरकार तृणमूल के प्रतिनिधि पर कैसे फैसला कर सकती है? उन्हें विपक्ष के साथ चर्चा करके तय करना चाहिए था कि कौन-सी पार्टी किस प्रतिनिधि को भेजेगी। बीजेपी कैसे तय कर सकती है कि तृणमूल किस प्रतिनिधि को भेजेगी?” सांसद ने आगे कहा कि तृणमूल प्रतिनिधिमंडल का बहिष्कार नहीं कर रही है और यह एकमात्र पार्टी है जिसने राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले का राजनीतिकरण नहीं किया है।

वहीं, पूर्व क्रिकेटर और सांसद युसूफ पठान का नाम ऑपरेशन सिंदूर को वैश्विच मंच तक पहुँचाने वाले प्रतिनिधिमंडल में था। लेकिन TMC ने उन्हें यात्रा पर जाने से इनकार कर दिया है। बता दें कि युसूफ पठान को डेलिगेशन में शामिल होने के लिए JD(U) सांसद संजय झा ने कहा था।

उधर, TMC सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय भी अब डेलिगेशन का हिस्सा नहीं बनेगें। उन्होंने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए डेलिगेशन में शामिल होने से इनकार कर दिया है।

बता दें कि 22 अप्रैल 2025 को जम्मू-कश्मीर के पहलगाम आतंकी हमले में 28 पर्यटकों की हत्या कर दी गई थी। इसके जवाब में 6 और 7 मई 2025 को भारत ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत पाकिस्तान में 9 आतंकी ठिकानों पर एयर स्ट्राइक कर तबाह कर दिया था। अब भारत ने दुनिया को ऑपरेशिन सिंदूर को वैश्विच मंच तक पहुँचाने के लिए 59 सदस्यों का 7 डेलिगेशन बनाया है। इसमें शामिल प्रतिनिधि 33 देशों में ऑपरेशन सिंदूर के बारे में दुनिया को बताएँगे।

नशे की हालत में हामिद शेख पहुँचा राम की दुकान, बहसबाजी के बाद चलने लगे चाकू: अरविंद गुप्ता समेत 3 की मौत, 4 घायल; मुंबई के गणपत पाटिल का मामला

मुंबई के दहिसर के गणपति पाटिल में दो परिवारों के बीच खूनी संघर्ष हुआ है। दहिसर वेस्ट इलाके में गणपति पाटिल की झोपड़पट्टी में रहना वाला हामिद शेख और राम नवल गुप्ता के परिवार ने एक दूसरे पर हमला कर दिया। इस दौरान तीन लोगों की मौत हो गई जबकि 4 लोग घायल हो गए।

बताया गया है कि 18 मई 2025 को शाम करीब साढ़े चार बजे राम नवल गुप्ता और हामिद शेख के बीच कहासुनी के बाद उनके बेटों के बीच जमकर मारपीट हुई। इस दौरान चाकू और दूसरे धारदार हथियारों का इस्तेमाल किया गया। घटना में राम नवल गुप्ता, उनके बेटे अरविंद गुप्ता और हामिद शेख की मौत हो गई। राम नवल के दो बेटों और हामिद शेख के दो बेटे चाकूबाजी में बुरी तरह घायल हो गए । इनलोगों को नजदीक की अस्पताल में भर्ती कराया गया है। पुलिस ने मारे गए राम नवल गुप्ता उनके बेटे अरविंद गुप्ता और हामिद शेख के शवों को पोस्टमॉटम के लिए भेज दिया है।

दोनों परिवार गणपति नगर के झोपड़पट्टी में रहता है और 2022 से इनके बीच दुश्मनी थी। दोनों परिवारों ने एक-दूसरे के खिलाफ केस भी दर्ज कराया था।

क्या है पूरा मामला

रविवार (18 मई 2025) को हामिद शेख नशे में गली नंबर 14 में मौजूद राम नवल गुप्ता के दुकान के सामने पहुँचा। राम नवल गुप्ता की नारियल की दुकान है जहाँ कुछ लोग भी थे। हामिद नशे में था इसलिए पुरानी बातें शुरू कर दी और दोनों में बहस शुरू हो गयी। बहसबाजी के बीच दोनों ने अपने-अपने बच्चों को बुलाया। एक तरफ राम नवल गुप्ता और उसके बेटे अमर गुप्ता, अरविंद गुप्ता और अमित गुप्ता थे जबकि दूसरी तरफ हामिद शेख और उसका बेटा अरमान शेख और हसन शेख थे। दोनों तरफ से बहसबाजी फिर शुरू हुई और चाकू जैसे दूसरे हथियारों से जानलेवा हमला हुआ जिसमें राम नवल गुप्ता, अरविंद गुप्ता और हामिद शेख की जान चली गई।

पुलिस ने घटना की जानकारी देते हुए कहा है कि दोनों की ओर से हत्या का केस दर्ज किया गया है। आरोपित बेटों को गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया है इसलिए गिरफ्तार नहीं किया गया है।

30 दिन के भीतर करो पहचान, दस्तावेज देखो और निकालो देश से बाहर: बांग्लादेशी और म्यांमार के घुसपैठियों पर गृह मंत्रालय हुआ और सख्त, राज्यों से कहा- इन्हें ढूँढकर रखो डिटेंशन सेंटर में

भारत का केंद्रीय गृह मंत्रालय बांग्लादेशी और म्यांमार के घुसपैठियों के खिलाफ और सख्त हो गया है। मंत्रालय ने घुसपैठियों की पहचान और दस्तावेजों के सत्यापन के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 30 दिन की समय सीमा निर्धारित की है। गृह मंत्रालय ने निर्देश दिया है कि सभी राज्यों को अपनी वैधानिक शक्तियों का उपयोग करते हुए घुसपैठियों की पहचान करनी होगी और उनकी जाँच के बाद निर्वासन की प्रक्रिया शुरू करनी होगी।

इसके साथ ही, हर राज्य को जिला स्तर पर पर्याप्त डिटेंशन सेंटर स्थापित करने का आदेश दिया गया है, जहाँ संदिग्ध प्रवासियों को निर्वासन की प्रक्रिया पूरी होने तक रखा जाएगा। इन केंद्रों में उनकी बायोमेट्रिक जानकारी भी ली जाएगी ताकि आगे भी ये लोग किसी तरह की धोखाधड़ी न करें। सीमा सुरक्षा बल (BSF) और असम राइफल्स जैसे सुरक्षा बलों को भी इस प्रक्रिया में शामिल किया गया है ताकि सीमाओं पर अवैध घुसपैठियों पर नजर रखी जा सके।

अपने निर्देश में मंत्रालय ने कहा है कि जिन लोगों पर संदेह है कि वो घुसपैठिए हैं, उनके दस्तावेजों का वेरिफिरेशन 30 दिन के भीतर होना जारूरी है। यदि कोई व्यक्ति भारतीय नागरिक होने का दावा करता है, तो उस राज्य की सरकार का दायित्व होगा कि वो उसकी पहचान और पृष्ठभूमि की जानकारी एकत्र करनी होगी।

गौरतलब रहै कि पिछले कुछ समय से भारत में घुसैठियों को पकड़कर वापस भेजने की दिशा में जाँच एजेंसिया लगातार काम कर रही है। इसी क्रम में राजस्थान में 30 अप्रैल 2025 से शुरू हुए विशेष अभियान में अब तक 1,000 से ज्यादा घुसपैठिए पकड़े गए हैं। यही संख्या गुजरात से भी सामने आई थी। इसी तरह हरियाणा के तीन जिलों- नूहँ, झज्जर और हाँसी में 237 से अधिक बांग्लादेशी नागरिक हिरासत में लिए गए हैं। पश्चिम बंगाल के नदिया जिले में पिछले कुछ दिनों में 300 से अधिक घुसपैठियों को गिरफ्तार किया गया है। मुंबई में 1 जनवरी 2025 से अब तक 650 से ज्यादा बांग्लादेशी घुसपैठिए गिरफ्तार किए जा चुके हैं।

पाकिस्तान घूमने नहीं, ISI से ट्रेनिंग लेने गए थे गौरव गोगोई: असम CM का दावा, कॉन्ग्रेस सांसद की पत्नी के भी आतंकी मुल्क से कनेक्शन को लेकर उठा चुके हैं सवाल

असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने रविवार (18 मई 2025) को कॉन्ग्रेस सांसद गौरव गोगोई पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि गोगोई पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के निमंत्रण पर वहाँ गए थे। गुवाहाटी में एक कार्यक्रम के दौरान पत्रकारों से बातचीत में सरमा ने कहा कि गोगोई का पाकिस्तान दौरा पर्यटन के लिए नहीं, बल्कि ट्रेनिंग के उद्देश्य से था। उन्होंने कहा कि गोगोई को पाकिस्तान के गृह मंत्रालय से निमंत्रण मिला था, जो देश की सुरक्षा के लिए खतरनाक है।

मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा, “कॉन्ग्रेस के सांसद गौरव गोगोई पाकिस्तान में ISI के निमंत्रण पर गए थे। हमारे पास निमंत्रण पत्र से संबंधित दस्तावेज़ उपलब्ध हैं।” उन्होंने कहा, “अभी तक मैंने इतना खुलकर कभी नहीं कहा, लेकिन आज पहली बार मैं साफ कह रहा हूँ कि गौरव गोगोई पाकिस्तान आईएसआई के निमंत्रण पर गए थे। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि उन्हें वहाँ पर ट्रेनिंग मिली। गौरव गोगोई को पाकिस्तान के गृह मंत्रालय से पत्र मिला, इसके बाद ही वो पाकिस्तान गए।”

हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा, “एक विदेशी यूनिवर्सिटी से निमंत्रण मिलना अलग है, लेकिन इसमें विदेशी सरकार के विभाग से उन्हें बुलावा आया था। वो भी विदेश मंत्रालय या कल्चरल मामलों के मंत्रालय से नहीं, बल्कि पाकिस्तानी सरकार के सबसे महत्वपूर्ण होम मिनिस्ट्री से उन्हें बुलावा आया, जो ये बताता है कि गौरव गोगोई का ये कदम देश की सुरक्षा के लिए कितना खतरनाक है। ये बेहद गंभीर मामला है और इस पर एक्शन होगा। ये कोई मजाक का मामला नहीं है।” उन्होंने कहा कि वो इस बारे में सबकुछ 10 सितंबर को कहेंगे। इस बयान को उन्होंने एक्स पर पोस्ट किया है।

सरमा ने दावा किया कि उनके पास इस बात के दस्तावेजी सबूत हैं, जिन्हें 10 सितंबर तक जनता के सामने पेश किया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह मामला गंभीर है और इस पर कार्रवाई होगी। सरमा ने यह भी आरोप लगाया कि गोगोई ने पाकिस्तान की सत्ता के साथ मिलकर काम किया और वापस लौटकर राफेल सौदे का विरोध किया। उन्होंने चुनौती दी कि अगर उनका एक भी शब्द गलत साबित हुआ, तो वे मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे देंगे।

इससे पहले, सरमा ने कॉन्ग्रेस नेतृत्व से गौरव गोगोई को सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल से हटाने की माँग की थी। यह प्रतिनिधिमंडल पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को वैश्विक मंच पर बेनकाब करने के लिए बनाया गया है। कॉन्ग्रेस ने गौरव समेत 4 नाम भेजे थे। सरमा ने कॉन्ग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि गोगोई का नाम इस लिस्ट में शामिल करना ठीक नहीं है।

गौरव पर हिमंता के आरोप गंभीर, पत्नी का पाकिस्तान से जुड़ाव

बता दें कि हिमंता बिस्वा सरमा खुलकर गौरव गोगोई और उनकी ब्रिटिश पत्नी एलिजाबेथ कोलबर्न गोगोई के आईएसआई से लिंक्स को लेकर आरोप लगा चुके हैं। उन्होंने कहा था कि मामले की जाँच चल रही है और मामले की जाँच पूरी होने के बाद दोनों की असलियत पूरे देश के सामने लाई जाएगी।

असम सीएम हिमंता बिस्वा सरमा ने 15 फरवरी 2025 को कहा, “हमारे पास पक्की जानकारी है कि एलिजाबेथ गोगोई अपनी शादी के बाद भी पाकिस्तान गई हैं। वह सांसद के साथ गई थीं या अकेली, इन बातों की पुष्टि हो जाएगी। कई नई जानकारियाँ भी सामने आ रही हैं।”

CM सरमा ने स्पष्ट किया है कि यह जाँच मात्र एलिजाबेथ कोलबर्न तक ही नहीं बल्कि उसने जुड़े लोगों और बाकी इकोसिस्टम को भी दायरे में लेकर की जाएगी। उन्होंने कहा है कि जाँच के लिए एक केस दर्ज किया जाएगा, इसके बाद उनके पासपोर्ट और वीजा की जानकारी जुटाई जाएगी। उन्होंने इस बात पर भी चिंता जताई है कि क्या गौरव गोगोई के पिता तरुण गोगोई के मुख्यमंत्री रहते हुए ISI का मुख्यमंत्री दफ्तर तक दखल था। उन्होंने इसकी जाँच भी करवाने की बात कही है।

सीएम हिमंता बिस्वा ने गौरव गोगोई की पाकिस्तानी हाई कमिश्नर अब्दुल बासित से मुलाक़ात को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने उनकी पत्नी एलिजाबेथ कोलबर्न का एक पुराना ट्वीट दिखाया है, जिसमें वह इस्लामाबाद में होने सम्बन्धित बात लिखी थी।

एलिजाबेथ कोलबर्न की नागरिकता को लेकर भी CM बिस्वा सरमा ने सवाल उठाए थे। उन्होंने पूछा था कि विवाह के 12 साल के बाद भी कोलबर्न के पास भारतीय नागरिकता क्यों नहीं और वह अपनी ब्रिटिश नागरिकता क्यों बनाए हुए हैं। विवाह के पहले और बाद भी जिन संगठनों के साथ कोलबर्न ने काम किया, उनको लेकर सवाल उठे हैं।

कोलबर्न 2011-15 के बीच क्लाइमेट एंड डेवलपमेंट नॉलेज नेटवर्क (CDKN) के लिए काम किया था। दावा है कि वह इस दौरान अधिकतर समय पाकिस्तान में रहीं। CDKN से ही जुड़े एक संगठन LEAD के लिए वह पाकिस्तान में काम करती थीं। उनके पाकिस्तान सरकार की एक टास्क फ़ोर्स में भी शामिल रहने का दावा किया गया है।

यह टास्क फ़ोर्स कथित तौर पर पाकिस्तान के लिए पैसा जुटाती थी। इसके ISI का एक मुखौटा होने का दावा है। इसी को लेकर उन पर ISI लिंक के आरोप लगाए गए हैं। पाकिस्तान और भारत में काम करने के दौरान कोलबर्न का सुपरवाइजर एक पाकिस्तानी अली तौकीर शेख था। उसका भारत विरोधी प्रोपेगेंडा भी अब सामने आया है।

दादा पाकिस्तान का पैरोकार, अब्बा रहे कॉन्ग्रेस MLA, खुद सपा का प्रवक्ता… जानिए कौन है ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर जहर उगलने वाला प्रोफेसर अली खान

हरियाणा के सोनीपत में स्थित अशोका यूनिवर्सिटी एक बार फिर विवादों के घेरे में है। इस बार मामला प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद की गिरफ्तारी से जुड़ा है, जिन्हें 18 मई 2025 को दिल्ली से हिरासत में लिया गया। प्रोफेसर अली खान पर ऑपरेशन सिंदूर और इसमें शामिल महिला सैन्य अधिकारियों कर्नल सोफिया कुरैशी और विंग कमांडर व्योमिका सिंह के खिलाफ सोशल मीडिया पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने का आरोप है।

यह घटना अशोका यूनिवर्सिटी के कथित वामपंथी और वोक विचारधारा वाले माहौल को लेकर चल रही बहस को और आगे बढ़ा दिया। यही नहीं, अब अली खान के परिवार के मोहम्मद अली जिन्ना से कथित करीबी रिश्ते और पाकिस्तान के निर्माण में उनके परिवार की भूमिका भी एक बार फिर से चर्चा में आ गई है।

ऑपरेशन सिंदूर और महिला अधिकारियों पर टिप्पणी के मामले में गिरफ्तारी

हरियाणा पुलिस ने प्रोफेसर अली खान को रविवार (18 मई 2025) को दिल्ली के ग्रेटर कैलाश इलाके से गिरफ्तार किया। यह कार्रवाई बीजेपी युवा मोर्चा के एक नेता की शिकायत पर हुई, जिसमें अली खान की ऑपरेशन सिंदूर पर टिप्पणियों को आपत्तिजनक और सांप्रदायिक बताया गया। ऑपरेशन सिंदूर 7 मई 2025 को पाकिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) में आतंकी ठिकानों पर भारतीय सेना की कार्रवाई थी। इस ऑपरेशन की जानकारी देने के लिए कर्नल सोफिया कुरैशी और विंग कमांडर व्योमिका सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी।

अली खान ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में इस प्रेस कॉन्फ्रेंस को ‘दिखावा और पाखंड’ करार दिया। उन्होंने लिखा कि सरकार कर्नल सोफिया को सिर्फ मीडिया में दिखाने के लिए आगे लाई है, जबकि वह मुस्लिम समुदाय के खिलाफ काम करती है। उन्होंने यह भी कहा कि दोनों देशों के कुछ ‘पागल फौजी’ लोग सीमा पर तनाव पैदा करते हैं, जिससे बेकसूर लोग मरते हैं।

हरियाणा राज्य महिला आयोग ने 12 मई को उसकी टिप्पणियों को सेना की महिला अधिकारियों का अपमान और सांप्रदायिक विद्वेष फैलाने वाला माना। आयोग ने उन्हें नोटिस भेजा, लेकिन अली खान जवाब देने नहीं गए। इसके बाद पुलिस ने उनके खिलाफ राजद्रोह सहित कई गंभीर धाराओं में केस दर्ज किया और उन्हें हिरासत में ले लिया।

अली खान ने अपने बचाव में कहा कि उनकी बातों को गलत समझा गया। वह महिला अधिकारियों की तारीफ कर रहे थे और सिर्फ यह कहना चाहते थे कि मुस्लिम समुदाय को भी बराबर सम्मान मिलना चाहिए।

कौन हैं प्रो. अली खान महमूदाबाद?

अली खान महमूदाबाद अशोका यूनिवर्सिटी के राजनीति विज्ञान विभाग में एसोसिएट प्रोफेसर है। उसका जन्म दिसंबर 1982 में हुआ था। खान ने लखनऊ के ला मार्टिनियर कॉलेज से शुरुआती पढ़ाई की, फिर यूके के किंग्स कॉलेज और विनचेस्टर कॉलेज में पढ़े। कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से खान ने इतिहास और राजनीति विज्ञान में एमफिल और पीएचडी की डिग्री हासिल की। इसके अलावा, अली खान ने सीरिया की दमिश्क यूनिवर्सिटी में अरबी की पढ़ाई भी की। अली खान उत्तर प्रदेश के महमूदाबाद राजघराने से ताल्लुक रखते हैं, जिसका इतिहास ब्रिटिश भारत और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा है।

प्रोफेसर अली खान समाजवादी पार्टी का राष्ट्रीय प्रवक्ता भी है, जिसके चलते उसकी राजनीतिक सक्रियता अक्सर सुर्खियों में रहती है। उनके परिवार की संपत्ति की बात करें तो यह 30-50 हजार करोड़ रुपये की बताई जाती है। इसमें लखनऊ का आधा हजरतगंज, उत्तराखंड में 396 संपत्तियाँ, और इराक, पाकिस्तान जैसे देशों में प्रॉपर्टी शामिल हैं।

अली खान के परिवार का जिन्ना और भारत के बँटवारे से खास नाता

अली खान के परिवार का इतिहास ऑल इंडिया मुस्लिम लीग और मोहम्मद अली जिन्ना से गहराई से जुड़ा है। उनके दादा, मुहम्मद अमीर अहमद खान, जिन्हें राजा महमूदाबाद के नाम से जाना जाता था, उत्तर प्रदेश के महमूदाबाद के नवाब थे। वह जिन्ना के इतने करीबी थे कि जिन्ना उन्हें अपने बेटे की तरह मानते थे। राजा महमूदाबाद ने मुस्लिम लीग में कई अहम भूमिकाएँ निभाईं।

जिन्ना ने उन्हें मुस्लिम लीग की छात्र ईकाई का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया। बाद में वह मुस्लिम लीग के कोषाध्यक्ष बने। उन्होंने मुस्लिम लीग को भारी मात्रा में चंदा दिया और लीग के प्रचार अखबार डॉन को आर्थिक मदद दी। पाकिस्तान के निर्माण में उन्होंने तन, मन, धन से पूरा योगदान दिया। कहा जाता है कि उन्होंने पाकिस्तान के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।

परिवार ने दे दिया पाकिस्तान को सबकुछ दान, फिर भी भारत में रह गए कब्जेदार

साल 1947 में भारत के बंटवारे के समय राजा महमूदाबाद इराक में रह रहे थे। 1957 में उन्होंने पाकिस्तान की नागरिकता ले ली और अपनी सारी संपत्ति पाकिस्तान को दान दे दी। इस वजह से भारत में उनकी संपत्तियों को शत्रु संपत्ति के तौर पर सरकार ने अपने कब्जे में ले लिया। 1966 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर महमूदाबाद का किला उनके परिवार को वापस मिला। 1973 में राजा महमूदाबाद की लंदन में मृत्यु हो गई।

राजा महमूदाबाद के बेटे मुहम्मद अमीर मुहम्मद खान (उर्फ सुलेमान) (अली खान के अब्बू) बँटवारे के बाद पाकिस्तान नहीं गए। वह भारत में रहे और उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड में अपनी संपत्तियों की देखभाल करते रहे। 1981 में इंदिरा गाँधी सरकार ने उनकी 25% संपत्ति लौटाने की पेशकश की, लेकिन वह सहमत नहीं हुए। उन्होंने लखनऊ सिविल कोर्ट में केस लड़ा और 2001 में जीत गए। हालाँकि 2002 में सरकार ने अपील की और यह मामला अभी भी कोर्ट में चल रहा है। सुलेमान 1985 और 1989 में कॉन्ग्रेस के टिकट पर महमूदाबाद से विधायक बने।

राजा महमूदाबाद के पोते और सुलेमान के बेटे प्रोफेसर अली खान ने समाजवादी पार्टी जॉइन की और राष्ट्रीय प्रवक्ता बने। वह अक्सर पार्टी के विचारों को सार्वजनिक मंचों पर रखते हैं। लेकिन उनकी ऑपरेशन सिंदूर पर टिप्पणियाँ पार्टी के लिए भी मुश्किल खड़ी कर सकती हैं, क्योंकि यह राष्ट्रीय सुरक्षा और सेना जैसे संवेदनशील मुद्दों से जुड़ा है।

अशोका यूनिवर्सिटी बन चुका है वामपंथी-वोक का गढ़?

अशोका यूनिवर्सिटी की स्थापना 2014 में हुई थी। यह एक निजी विश्वविद्यालय है, जो अपनी लिबरल आर्ट्स एजुकेशन के लिए जाना जाता है। हालाँकि बीते कुछ सालों में अशोका यूनिवर्सिटी बार-बार विवादों में घिरा है। कई लोग इसे वामपंथी और वोक विचारधारा का अड्डा कहते हैं, क्योंकि इसके छात्र और प्रोफेसर अक्सर ऐसे बयान या प्रदर्शन करते हैं, जो देश की मुख्यधारा की सोच से टकराते हैं।

अशोका यूनिवर्सिटी में हुई हिंदू विरोधी नारेबाजी

बीते साल 26 मार्च 2024 को यूनिवर्सिटी के छात्रों ने एक प्रदर्शन में ‘ब्राह्मण-बनियावाद मुर्दाबाद‘, ‘जय भीम-जय मीम’, और ‘जय सावित्री-जय फातिमा’ जैसे नारे लगाए। ये लोग राहुल गाँधी से प्रभावित होकर छात्र जाति जनगणना और यूनिवर्सिटी में आरक्षण की माँग कर रहे थे। सोशल मीडिया पर इन नारों को हिंदू विरोधी बताया गया। कई लोगों ने यूनिवर्सिटी प्रशासन पर कार्रवाई न करने का आरोप लगाया। इस घटना ने अशोका की छवि को और धक्का पहुँचाया।

यूनिवर्सिटी में प्रो-फिलिस्तीन प्रदर्शन

मई 2024 में यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में छात्रों ने ‘फ्री फिलिस्तीन‘ और ‘स्टॉप जेनोसाइड’ लिखे प्लेकार्ड दिखाए। छात्रसंघ ने इजराइल की तेल अवीव यूनिवर्सिटी से रिश्ते तोड़ने की माँग की। इस प्रदर्शन को कुछ लोग वोक विचारधारा का हिस्सा मानते हैं, जो वैश्विक मुद्दों पर एकतरफा रुख अपनाता है।

इजराइल विरोधी बयानबाजी

अशोका के छात्रसंघ ने इजराइल के गाजा में सैन्य कार्रवाई को ‘नरसंहार’ बताया। 7 अक्टूबर 2023 को हमास के आतंकी हमले को उन्होंने सिर्फ ‘इवेंट्स’ कहा, जिसकी खूब आलोचना हुई। कई लोगों ने इसे वामपंथी प्रोपेगैंडा करार दिया।

ईवीएम में हेराफेरी का भी किया था फर्जी दावा

इस यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर सब्यसाची दास ने अपने शोधपत्र में दावा किया कि 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने ईवीएम में हेराफेरी की। उनके शोध में खामियां पाई गईं, जिसके बाद उनकी आलोचना हुई। दबाव बढ़ने पर उन्होंने इस्तीफा दे दिया था।

नेताजी की तस्वीर पर विवाद

इसी यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर नीलांजन सरकार ने दावा किया था कि राष्ट्रपति भवन में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की तस्वीर असल में बंगाली अभिनेता प्रोसेनजीत चटर्जी की है। उन्होंने बीजेपी और भगवान राम का भी मजाक उड़ाया था।

यूनिवर्सिटी के संस्थापक धोखाधड़ी में जा चुके हैं जेल

यूनिवर्सिटी के संस्थापक विनीत गुप्ता और प्रणव गुप्ता पर 1,626 करोड़ रुपये की बैंक धोखाधड़ी का आरोप है। सीबीआई ने 2021 में उनकी कंपनी पैराबोलिक ड्रग्स के खिलाफ केस दर्ज किया। ईडी ने 28 अक्टूबर 2023 को दोनों को गिरफ्तार किया। उन पर जाली दस्तावेजों से बैंकों से कर्ज लेने और पैसे का गलत इस्तेमाल करने का आरोप है। यूनिवर्सिटी ने कहा कि उसका इस कंपनी से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन इन आरोपों ने उसकी साख को नुकसान पहुँचाया।

यूनिवर्सिटी ने अली खान के बयानों से किया खुद को अलग

अली खान की टिप्पणियों से यूनिवर्सिटी ने खुद को अलग कर लिया। उसने कहा कि यह प्रोफेसर का निजी बयान था और यूनिवर्सिटी भारतीय सेना का समर्थन करती है। लेकिन बार-बार होने वाले विवादों के बावजूद प्रशासन की ओर से कोई सख्त कदम न उठाने की आलोचना हो रही है।

अशोका यूनिवर्सिटी के छात्र और प्रोफेसर अक्सर जाति, धर्म, लिंग, और वैश्विक मुद्दों पर मुखर रहते हैं। उनके प्रदर्शन और बयान लिबरल और वामपंथी विचारधारा से प्रेरित दिखते हैं। हालाँकि यह वोक संस्कृति एकतरफा है और देश की भावनाओं को ठेस पहुँचाती है। खासकर हिंदू विरोधी नारे और इजराइल विरोधी बयान को कई लोग भारत विरोधी मानते हैं।

ऐसे में क्या यह यूनिवर्सिटी वाकई वामपंथी और वोक विचारधारा का गढ़ बन चुकी है? या यह सिर्फ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बढ़ावा दे रही है? इन सवालों का जवाब यूनिवर्सिटी प्रशासन को देना होगा, ताकि इसका शैक्षणिक सम्मान बरकरार रहे।

एक ज्योति, नकाब कई… क्या दानिश पर मर मिटी थी पाकिस्तान के लिए जासूसी करने वाली भारत की यूट्यूबर?

यदि आपका सोशल मीडिया से वास्ता है तो शायद यूट्यूबर ज्योति मल्होत्रा (Youtuber Jyoti Malhotra) को जानते होंगे। शायद उसके चैनल ‘ट्रैवल विद जो (Travel with JO)’ का वीडियो भी देखा हो। अब खुलासा हुआ है कि यह ज्योति मल्होत्रा पाकिस्तान की जासूस है।

सोशल मीडिया से ही ज्योति ने नाम बनाया। सोशल मीडिया की गतिविधियों से ही वह एजेंसियों की रडार पर आई। उसका सोशल मीडिया प्रोफाइल खँगालते ही आपको एहसास हो जाएगा कि उसके लिए पाकिस्तान जाना और वहाँ के बड़े लोगों से मिल लेना कोई बड़ी बात नहीं थी।

ऐसे में यह सवाल उठता है कि उसके पीछे किसका हाथ है? अब उसके ही एक वीडियो से पता चला है कि वह दिल्ली के पाकिस्तानी उच्चायोग में राजनयिक बनकर तैनात उस ISI जासूस एहसान उर रहीम उर्फ दानिश के सीधे संपर्क में थी, जिसे हाल ही में भारत ने देश छोड़ने का आदेश दिया था। दावा यह भी है कि दानिश पर ज्योति मर मिटी थी। यह भी कहा जा रहा है कि दानिश ही ज्योति के पाकिस्तान आने-जाने का खर्च उठाया करता था।

आश्चर्यजनक तौर पर ज्योति को पाकिस्तान का वीजा आसानी से मिल जाता था। वह पाकिस्तान के प्रधानमंत्री रहे नवाज शरीफ की बेटी और पंजाब की मुख्यमंत्री मरियम नवाज से उनके बगल में ऐसे खड़ी होकर बतियाती थी, जैसे गहरी यारी हो।

आश्चर्यजनक यह भी है कि जिस पहलगाम में हिंदुओं की इस्लामी आतंकियों ने धर्म पूछ-पूछकर हत्या की थी, वहाँ की उसने अटैक से कुछ महीने पहले ही यात्रा की थी और वीडियो बनाए थे। पहलगाम अटैक के बाद एक वीडियो में उसने पीड़ितों और भारत सरकार को ही इसका जिम्मेदार ठहराने की कोशिश भी की थी।

सोशल मीडिया पर ट्रैवल व्लॉगर ज्योति के कई चेहरे हैं। कभी वह लग्जरी लाइफ जीती नजर आती है। कभी वह मस्त​क पर चंदन किए धार्मिक स्थल की यात्रा करती दिखती है। लेकिन यह तथ्य बार-बार खटकता है कि हरियाणा के हिसार में 55 गज के एक घर में पली-बढ़ी लड़की अचानक से इतनी शान-शौकत वाली जिंदगी कैसे जीने लगी? भारत के दुश्मन मुल्क की हर जगह उसके पहुँच में कैसे आ गई?

दिल्ली में 20 हजार की नौकरी की, पिता कारपेंटर

ज्योति के यूट्यूब चैनल ‘ट्रैवल विद जो‘ के 3.77 लाख सब्सक्राइबर हैं, जबकि इंस्टाग्राम पर उसे 1.31 लाख फॉलो करते हैं। उसके वीडियो को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है इन्हें बनाने में मोटा खर्च हुआ होगा।

दुबई घूमने गई ज्योति। यह तस्वीर 25 अक्टूबर 2024 की है। (फोटो साभार: Instagram-travelwithjo)

ज्योति हरियाणा की रहने वाली एक सामान्य घर की लड़की है। उसके पिता हरीश कुमार अभी भी सामान्य नौकरी करते हैं। यूट्यूबर ज्योति का हिसार की न्यू अग्रसेन कॉलोनी में सिर्फ 55 गज का घर है। इसमें तीन छोटे-छोटे कमरे बने हैं। पिता कारपेंटर की नौकरी करते हैं, मगर इस कमाई से घर नहीं चल पाता है। घर का खर्च चाचा की पेंशन से चलता था। ज्योति के माता-पिता का तलाक 20 साल पहले हो चुका है।

हरियाणा के हिसार स्थित अग्रेसन कॉलोनी में ज्योति का घर (साभार: DainikBhaskar)

कभी दिल्ली में ज्योति 20 हजार की नौकरी करती थी। कोरोना में नौकरी छूटी और वह हिसार लौट आई। इसके बाद उसने सोशल मीडिया पर वीडियो बनाना शुरू किया और अचानक से उसकी जिंदगी बदल गई।

सोशल मीडिया पर ‘धार्मिक-देशभक्त’ का नकाब

सोशल मीडिया पर ज्योति खुद को धार्मिक और देशभक्त दिखाने की पूरी कोशिश करती रही है। भारत के लगभग सभी प्रमुख धार्मिक स्थलों के वीडियो बनाए हैं। देशभक्ति गीतों पर तिरंगे के साथ रील्स भी पोस्ट की है। लेकिन विदेश जाते ही उसका नकाब उतर जाता था।

पाकिस्तान के करतारपुर कॉरिडोर से लेकर भूटान के फर्टिलिटी टैंपल और ‘कंडोम कैफे‘ तक के उसने आपत्तिजनक वीडियो भी बनाए हैं। इन वीडियो के थंबनेल भी अश्लील हैं।

इस फोटो में ज्योति केरल एक होटल में हैं। तस्वीर इसी साल 19 फरवरी की है (साभार: Instagram-travelwithjo)

यूट्यूब चैनल पर पाकिस्तान के वीडियो की भरमार

ज्योति के यूट्यूब चैनल ‘ट्रैवल विद जो’ पर पाकिस्तान के कई वीडियो हैं। इनमें वहाँ की बस, ट्रेन, बाजार और संस्कृति को दिखाया गया है। इनमें ‘Indian Girl in Pakistan‘, ‘Indian Girl Exploring Lahore‘,’Indian Girl Ek Qatal Raaz Temple‘, ‘Indian Girl Rides Luxury Bus in Pakistan‘नाम से कई वीडियो हैं।

पाकिस्तान में कैसे बनाया नेटवर्क?

ज्योति ने पुलिस पूछताछ में कबूला है कि वह साल 2023 में पाकिस्तान का वीजा लगवाने दिल्ली स्थित पाकिस्तान हाई कमीशन गई थी। वहाँ उसकी मुलाकात पाकिस्तानी अधिकारी अहसान-उर-रहीम उर्फ दानिश से हुई। दोनों के बीच संपर्क बढ़ा और बातचीत शुरू हो गई। इसके बाद ज्योति ने दो बार पाकिस्तान की यात्रा की। वहाँ दानिश के जानकार अली अहयान से मिली, जिसने उसके ठहरने और घूमने-फिरने का इंतजाम किया।

पाकिस्तान में अली अहयान ने उसे पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों और खुफिया अधिकारियों से मिलवाया। यहीं पर ज्योति की मुलाकात शाकिर और राणा शहबाज से भी हुई। शाकिर का नंबर उसने भारत लौटकर ‘जट रंधावा’ नाम से सेव कर लिया ताकि किसी को शक न हो। भारत लौटने के बाद वह व्हाट्सएप, स्नैपचैट और टेलीग्राम जैसे ऐप्स से लगातार पाकिस्तान से संपर्क में रही और देशविरोधी सूचनाएँ साझा करती रही।

दानिश की इफ्तार पार्टी की ‘खास मेहमान’

साल 2024 में ज्योति को पाकिस्तान हाई कमीशन से इफ्तार पार्टी का खास निमंत्रण मिला। वहाँ वह चीनी अधिकारियों से भी मिली। ज्योति ने इस कार्यक्रम का वीडियो खुद शेयर किया था, जिसमें वह दानिश के काफी नजदीक नजर आई। दानिश ने उसे पार्टी में रिसीव किया। वहाँ मौजूद अन्य मेहमानों से परिचय कराया और अपनी बीवी से भी मिलवाया।

इस 15 मिनट के वीडियो में ज्योति पाकिस्तान की व्यवस्था की तारीफ करती दिख रही है। वहाँ मौजूद भारतीयों से बातचीत कर रही है और पूछ रही है कि पाकिस्तान जाकर कैसा अनुभव रहा। आखिर में वीडियो का समापन दानिश और ज्योति मिलकर करते हैं। इसमें दानिश ने पार्टी में आने के लिए ज्योति का आभार भी जताया।

इफ्तार पार्टी में दानिश के साथ यूट्यूबर ज्योति मल्होत्रा (साभार: Youtube/Travel with JO)

ज्योति की पाकिस्तान हाई कमीशन में तैनात दानिश से बार-बार मुलाकात होती रही। पूछताछ में यह सामने आया कि दानिश, पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी का एजेंट था। भारत सरकार ने 13 मई 2025 को उसे अवांछित व्यक्ति घोषित कर देश छोड़ने का आदेश दिया था।

दानिश के हाथों में खेल रही थी ज्योति?

दानिश का मकसद सोशल मीडिया के जरिए पाकिस्तान की अच्छी छवि दिखाना और भारत विरोधी नैरेटिव को बढ़ावा देना था। इसी काम में उसने ज्योति का इस्तेमाल किया। ज्योति ने अपने सोशल मीडिया चैनलों पर ऐसे वीडियो और पोस्ट डाले हैं जिनका मकसद पाकिस्तान के पक्ष में माहौल बनाना है।

खुलासा हुआ कि दानिश भारत के कई अन्य सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के संपर्क में भी था, जिन्हें उसने पैसे और सुविधाएँ देकर अपने पक्ष में किया। खासकर पहलगाम हमले के बाद जब भारत में पाकिस्तान के खिलाफ गुस्सा था, तब दानिश की रणनीति थी कि सोशल मीडिया पर पाकिस्तान को शांतिप्रिय देश बताया जाए। ज्योति ने इस प्रोपेगेंडा को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई।

जब मरियम नवाज की बगलगीर बनी ज्योति

पाकिस्तान पंजाब की पहली महिला मुख्यमंत्री मरियम नवाज का इंटरव्यू भी ज्योति ले चुकी है। गुरुद्वारा करतारपुर साहिब कॉरिडोर में मरियम नवाज के बगल में वह दिखाई पड़ती है।

गुरुद्वारा करतारपुर साहिब कॉरिडोर में सीएम मरियम नवाज का इंटरव्यू लेती ज्योति (साभार: Youtube/Travel with JO)

दोनों काफी सहज अंदाज में बातचीत करते नजर आते हैं। 42 मिनट का यह वीडियो अप्रैल 2024 का है, जिसे 7.53 लाख दर्शक देख चुके हैं और करीब दो हजार कमेंट आए हैं। वीडियो में ज्योति कहती नजर आ रही कि वह यहाँ दूसरी बार आई हैं और यहाँ आकर उन्हें बहुत अच्छा महसूस होता है।

पाकिस्तान-चीन यात्रा के बाद हुआ शक

साल 2024 में ज्योति ने दो महीने के भीतर पाकिस्तान और चीन का दौरा किया। इसके बाद वह सुरक्षा एजेंसियों के रडार पर आई। वह 17 अप्रैल को पाकिस्तान गई। 15 मई को भारत वापस लौटी। पाकिस्तान से लौटने के 25 दिन बाद ही 10 जून 2024 को वह चीन चली गई। 09 जुलाई 2024 तक चीन में रही। फिर वहीं से 10 जुलाई को नेपाल में काठमांडू पहुँच गई।

चीन की यात्रा के दौरान फ्लाइट में एयर होस्टेस के साथ ज्योति ने ली तस्वीर (साभार:  Instagram-travelwithjo)

इन यात्राओं के देखते हुए जाँच एजेंसी के अधिकारी अलर्ट हो गए। वह ज्योति को ट्रैक करने लगे। पुख्ता सबूत मिलते ही 15 मई 2025 को सुबह 9 बजे पुलिस ने उसके घर पर छापा मारा। पिता और चाचा के मोबाइल जब्त कर लिए। ज्योति को थाने लेकर आई और पूछताछ की। रात 9 बजे उसे घर वापस भेज दिया। 17 मई को उसे गिरफ्तार कर लिया गया।

ISI के संपर्क में थी ज्योति?

फिलहाल ज्योति को पाँच दिन की रिमांड में लेकर पूछताछ की जा रही है। हिसार DSP कमलजीत ने बताया कि ज्योति पर अधिकारिक गोपनीयता अधिनियम और BNS 152 के तहत केस दर्ज कर गिरफ्तार किया गया है। इसके अलावा उसके मोबाइल और लैपटॉप से कई संदिग्ध सामग्री मिली है।

SP शशांक कुमार सावन ने पुष्टि की कि ज्योति ISI के संपर्क में थी। उसकी आय और खर्च में भारी अंतर है। बैंक खाते और सोशल मीडिया गतिविधियाँ खंगाली जा रही हैं। कुछ और सोशल मीडिया यूज़र्स भी जाँच के घेरे में है।

धार्मिक यात्रा पर पाकिस्तान गया देवेंद्र, युवती ने हुस्न के जाल में फँसाकर बना दिया ISI जासूस: पैसे-लड़कियों का दिया लालच, हथियारों संग फोटो से खुला भेद

हरियाणा पुलिस की विशेष जासूस इकाई (एसडीयू) ने कैथल जिले में छापेमारी की और मस्तगढ़ गाँव के देवेंद्र सिंह ढिल्लों को जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किया। उसे आईएसआई ने हनी ट्रैप में फँसाकर जासूसी के लिए तैयार किया था। वो आईएसआई के 5 एजेंट्स के संपर्क में था। उसे आईएसआई ने लड़की का लालच भी दिया था, जिसके बदले में उसने सैन्य प्रतिष्ठान से जुड़ी तस्वीरें भी भेजी थी। इस मामले में स्पेशल डिटेक्टिव यूनिट ने कैथल के मस्तगढ़ गाँव से उसे पकड़ा।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पंजाब के पटियाला में रहकर देवेंद्र पंजाब यूनिवर्सिटी में पढ़ाई करता था और वो खालसा कॉलेज में पढ़ रहा था। राजनीति शास्त्र के छात्र देवेंद्र पर पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के लिए जासूसी करने का आरोप है। जाँच में पता चला कि नवंबर 2024 में वह करतारपुर कॉरिडोर के जरिए सिख श्रद्धालुओं के साथ पाकिस्तान गया था। वहाँ उसने करतारपुर साहिब, ननकाना साहिब और लाहौर जैसे धार्मिक स्थलों का दौरा किया, जहाँ उसकी मुलाकात आईएसआई एजेंटों से हुई।

पुलिस के मुताबिक, देवेंद्र पाँच से ज्यादा पाकिस्तानी एजेंटों के संपर्क में था। उसकी दोस्ती फेसबुक पर एक पाकिस्तानी युवती से हुई, जो बाद में आईएसआई एजेंट निकली। हनी ट्रैप में फँसकर उसने पटियाला के सैन्य क्षेत्र की तस्वीरें खींचकर एजेंटों को भेजीं। जब पुलिस जाँच की आहट मिली, तो उसने अपने मोबाइल का सारा डाटा डिलीट कर दिया। साइबर यूनिट अब डाटा रिकवरी में जुटी है।

देवेंद्र मध्यमवर्गीय परिवार से है, जिसमें माता-पिता और एक बहन हैं। उसका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था, लेकिन हथियारों के साथ सोशल मीडिया पर तस्वीरें डालने से पुलिस का ध्यान उसकी ओर गया। ये हथियार गाँव के मालक सिंह के थे, जिसके आधार पर पुलिस ने डर फैलाने का आरोप भी जोड़ा।

डीएसपी वीरभान सिंह के अनुसार, देवेंद्र करतारपुर साहिब दर्शन के बहाने पाकिस्तान गया था, जहाँ वह ISI एजेंटों के संपर्क में आया और भारत की सैन्य जानकारी पाकिस्तान को भेजने लगा।

एसपी आस्था मोदी ने कहा कि देवेंद्र के अन्य संपर्कों की जाँच जारी है। यह मामला आईएसआई के सोशल मीडिया हनी ट्रैप नेटवर्क को फिर उजागर करता है, जिसने पहले भी कई भारतीय कर्मचारियों को निशाना बनाया है।

यह मामला एक बार फिर आईएसआई द्वारा सोशल मीडिया पर फैलाए गए हनी ट्रैप नेटवर्क को सामने ला रहा है, जिससे पहले भी DRDO और विदेश मंत्रालय के कर्मचारियों को निशाना बनाया गया है।