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‘बैट पड़ोसी की बीवी की तरह होती है’: अपने सेक्सिस्ट बयान पर क्रिकेटर दिनेश कार्तिक ने माँगी माफी

क्रिकेटर से कमेंटेटर बने दिनेश कार्तिक ने 02 जुलाई को श्रीलंका और इंग्लैंड के बीच चल रहे एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैच के दौरान की गई एक टिप्पणी के लिए माफी माँगी है। उनके कमेंट को सेक्सिस्ट करार देते हुए लोगों ने उनकी काफी आलोचना की थी और सोशल मीडिया पर उनका खूब मजाक भी उड़ाया था।

कमेंट्री बॉक्स में उनको पसंद करने वाले लोगों ने उनके कमेंट को लेकर उन्हें ‘स्त्री जाति से नफरत करने वाला’ तक बता दिया। दरअसल उन्होंने मजाक करते हुए कहा था, “बल्लेबाज और बैट को ना पसंद करना ये दोनों चीजें साथ-साथ चलती हैं। ज्यादातर बल्लेबाजों को अपना बैट पसंद नहीं आता और वे दूसरों का बल्ला ज्यादा पसंद करते हैं। बल्ला पड़ोसी की बीवी की तरह होता है। वह हमेशा बेहतर महसूस कराता है।”

हालाँकि, कार्तिक का यह बयान उनके फॉलोवर्स व प्रशंसकों और यहाँ तक ​​कि उनके परिवार को भी पसंद नहीं आया। अपने बयान की आलोचना के बाद उन्होंने कहा, “पिछले मैच में जो हुआ उसके लिए मैं माफी माँगना चाहता हूँ। वास्तव में मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था। मुझे बस यह सब गलत लगा। मैं सभी से माफी माँगता हूँ।” बता दें कि दिनेश कार्तिक ने यह टिप्पणी रविवार को हुए वनडे मैच के दौरान की थी।

अपने बयान पर खेद जताते हुए क्रिकेटर ने कहा, “इस बयान के कारण मुझे मेरी माँ और पत्नी की डाँट खानी पड़ी। मुझे वास्तव में खेद है और ऐसा दोबारा नहीं होगा।”

कार्तिक की टिप्पणी पर नेटिज़न्स की प्रतिक्रिया

कार्तिक की टिप्पणी के लिए नेटिज़न्स ने सोशल मीडिया पर उनका जमकर मजाक उड़ाया।

एक यूजर ने ट्वीट किया, “दिनेश कार्तिक अपना भारी-भरकम कॉन्ट्रैक्ट रिन्यू करने के इच्छुक नहीं हैं।”

क्रिकेटर पर तंज कसते हुए एक अन्य यूजर ने लिखा, “कल्पना कीजिए कि दिनेश कार्तिक के पड़ोस में पति-पत्नी के बीच वर्तमान में क्या बातचीत चल रही है…”

कुछ ने भविष्यवाणी की कि कमेंटेटर के रूप में यह कार्तिक का पहला और आखिरी दौरा हो सकता है।

फैंस ने कार्तिक को किया चीयर

हालाँकि, इस नए रोल में कार्तिक को उनके फैन्स खूब पसंद भी कर रहे हैं। उन्हें बादशाह कहने से लेकर उनकी कमेंट्री के लिए तारीफ करने तक कार्तिक फैंस की जमकर तारीफें भी बटोर रहे हैं।

कुछ ने तो यहाँ तक कह दिया कि वे सिर्फ उनकी कमेंट्री के लिए मैच देख रहे थे।

कार्तिक की नई हवाई पोशाक भी हाल ही में शहर में चर्चा का विषय रही है, यहाँ तक ​​कि क्रिस ग्रीन भी उनके लुक की सराहना कर रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने कॉन्ग्रेस ‘टूलकिट’ मामले पर विचार करने से किया इनकार, कहा- नहीं पसंद तो करें नजरअंदाज

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (5 जुलाई 2021) को कॉन्ग्रेस टूलकिट मामले के खिलाफ जाँच कराने की माँग करने वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि अगर किसी को टूलकिट पसंद नहीं है तो उसे नजरअंदाज कर देना चाहिए। अदालत ने कहा, ”इसके लिए वैकल्पिक रास्ते अपनाने चाहिए। आप हाईकोर्ट जा सकते हैं।” इस टिप्पणी के बाद याचिकाकर्ता ने याचिका वापस ले ली है। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और एमआर शाह ने याचिकाकर्ता एडवोकेट शशांक शेखर झा से पूछा कि अनुच्छेद-32 के तहत इस याचिका पर कैसे विचार किया जा सकता है।

लाइवलॉ डॉट इन‘ के अनुसार जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, “अगर आपको टूलकिट पसंद नहीं है तो इसे नजरअंदाज कर दीजिए।” इस पर वकील झा ने कहा कि कोरोना वायरस म्यूटेंट के लिए ‘इंडियन वेरिएंट’ शब्द का इस्तेमाल करना एक प्रोपेगेंडा था। उन्होंने कहा कि सिंगापुर ने ‘सिंगापुर वेरिएंट’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने पर आपत्ति जताई है। इस पर जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, “भारत एक लोकतंत्र है, आप जानते हैं?”

वहीं, जस्टिस शाह ने कहा कि इस मामले में एक आपराधिक जाँच पहले ही लंबित है। उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता को अनुच्छेद-32 के अलावा अन्य उपाय अपनाने चाहिए। शीर्ष अदालत ने कहा कि हम संविधान के अनुच्छेद-32 के तहत दायर इस याचिका पर विचार नहीं कर सकते हैं, याचिकाकर्ता को वैकल्पिक रास्ते अपनाने चाहिए। इसके बाद याचिकाकर्ता ने अदालत से याचिका वापस लेने की अनुमति माँगी।

दरअसल, इस याचिका में टूलकिट की जाँच राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (एनआईए) से करवाने की माँग की गई थी और जाँच में आरोप सही पाए जाने पर कॉन्ग्रेस पार्टी का पंजीकरण रद्द करने को कहा गया था।

गौरतलब है कि सोशल मीडिया पर 18 मई 2021 को एक दस्तावेज खूब शेयर किया गया था, जिसके बारे में यह दावा किया गया था कि यह ‘कॉन्ग्रेस का टूलकिट’ है। इसमें कुम्भ मेले को बदनाम करने, ईद का महिमामंडन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि धूमिल करने और जलती चिताओं व लाशों की तस्वीरें शेयर कर भारत को बदनाम करने का खाका था।

उस दौरान कॉन्ग्रेस नेता राजीव गौड़ा ने भी स्वीकार किया था कि टूलकिट के लीक हुए दो डॉक्यूमेंट्स में से एक ऑल इंडिया कॉन्ग्रेस कमेटी (AICC) के शोध विभाग द्वारा तैयार किया गया था। कॉन्ग्रेस नेता राजीव गौड़ा ने ट्वीट करके यह जानकारी दी थी। उन्होंने कहा था कि AICC ने ही सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट पर एक शोध पत्र तैयार किया था।

‘भारत के खिलाफ बच्चों का इस्तेमाल कर आतंकी साजिश रचने वालों की मदद कर रहा ट्विटर’: KRF ने NCPCR में दर्ज कराई शिकायत

ट्विटर इंडिया के एमडी मनीष माहेश्वरी की मुश्किलें बढ़ती ही जा रही हैं। अब वह भारत में आतंकवाद को बढ़ावा देने और जिहादी संगठनों को अपना मंच इस्तेमाल करने की अनुमति देने के लिए कड़ी आलोचना का सामना कर रहे हैं। दिल्ली स्थित एक कार्यकर्ता समूह कलिंग राइट्स फोरम (केआरएफ) ने कथित तौर पर ट्विटर इंडिया के एमडी मनीष माहेश्वरी और पब्लिक पॉलिसी मैनेजर शगुफ्ता कामरान के खिलाफ राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) में शिकायत दर्ज कराई है।

केआरएफ (KRF) ने आरोप लगाया है कि इन्होंने भारत के खिलाफ बच्चों का इस्तेमाल कर आतंकवादी संगठनों को आतंकी साजिश रचने और आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए ट्विटर का इस्तेमाल करने की अनुमति दी है। केंद्र शासित प्रदेशों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में आतंकवादी गतिविधियों के लिए भर्ती को सुविधाजनक बनाने के लिए छोटे बच्चों को आतंकवादी संगठनों के चेहरे के रूप में दिखाया जा रहा है।

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) को अपनी शिकायत में कलिंग राइट्स फोरम लिखता है, ”ट्विटर इंडिया अंसार ग़ज़वत-उल-हिंद समर्थकों जैसे आतंकवादी संगठनों को भारत के खिलाफ काम करने और बच्चों को कट्टर बनाने एवं उनका ब्रेनवॉश करने जैसी गतिविधियों के माध्यम से आतंकी भर्ती गतिविधियों को आसान बनाने के लिए अपना प्लेटफॉर्म उपलब्ध करा रहा है।”

इस्लामिक आतंकवादी संगठनों को मंच मुहैया करा रहा ट्विटर इंडिया

ट्विटर इंडिया आतंकवादी समूहों को अपने संदेश फैलाने, सदस्यों की भर्ती करने, खुफिया जानकारी इकट्ठा करने और अपने नेटवर्क से जुड़ने के लिए मंच प्रदान कर आतंकवादियों की मदद कर रहा है। दिल्ली स्थित कार्यकर्ता समूह ने लिखा कि ट्विटर इंडिया आतंकवादी समर्थकों को वीडियो पोस्ट करने की अनुमति देता है, जिसमें छोटे बच्चों को एके-47 पकड़े हुए, हवा में शूटिंग करते हुए दिखाया गया है। वहीं, अन्य आतंकवादी बच्चे को करीब से देखते हैं और बंदूक से गोली चलाने का निर्देश देते हैं।

एक्टिविस्ट ग्रुप ने AGH HISTORY द्वारा पोस्ट किए गए ट्वीट के लिंक और आर्काइव लिंक को ट्विटर हैंडल @Rainbow35886147 द्वारा साझा किया है। इसमें एक छोटे बच्चे को आतंकवादियों द्वारा एके-47 का इस्तेमाल करना सिखाया जा रहा है। कार्यकर्ता समूह का दावा है कि AGH HISTORY इस्लामिक आतंकवादी संगठन अंसार गजवात-उल-हिंद का समर्थक है, जो अल-कायदा की एक कश्मीरी शाखा है। यह भारत के केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में सक्रिय है।

केआरएफ ने एनसीपीसीआर को अपनी शिकायत में आगे लिखा कि आतंकवादी संगठन के ट्विटर पोस्ट में केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के कुछ संवेदनशील क्षेत्रों का उल्लेख किया गया है। जैसे #pulwama #shopian #kulgam #tral #anantnag #kupwara #Baramulla #lolab #sopore #srinager #jammu #doda जहाँ पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद एक गंभीर चिंता का विषय है।

ट्विटर इंडिया भारत के खिलाफ साजिश कर रहा

माइक्रोब्लॉगिंग साइट पर इस तरह के पोस्ट की अनुमति देकर ट्विटर इंडिया भारत के खिलाफ साजिश कर रहा है। वह भारत विरोधी आतंकवादी संगठनों को भारत के खिलाफ आतंकवादी हमले करने के लिए उकसा रहा है उनका समर्थन कर रहा है।

शिकायत में कहा गया है कि आतंकवादी समर्थक AGH HISTOrY ने अपने ट्विटर पोस्ट में टेलीग्राम समूहों के लिंक का खुले तौर पर उल्लेख किया है। इसके अलावा साथी आतंकवादी समर्थकों को इन समूहों में शामिल होने के लिए कहा है।

एनसीपीसीआर ने शिकायत पर गौर किया कि कैसे सोशल मीडिया दिग्गज कंपनी ने पिछले कई मौकों पर इन आतंकवादी संगठनों को अपने नापाक भारत विरोधी एजेंडे को बढ़ावा देने के लिए एक मंच प्रदान करके उनका स्पष्ट रूप से समर्थन किया है। ट्विटर इंडिया को “serial offenders” कहते हुए कार्यकर्ता समूह ने ‘द हिंदू’ की एक रिपोर्ट का लिंक साझा किया है। इसमें बताया गया था कि कैसे भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने फरवरी 2021 में आतंकवादी संगठनों के प्रति सहानुभूति रखने के लिए ट्विटर इंडिया को नोटिस जारी किया था।

द हिंदू की 12 फरवरी की रिपोर्ट का स्क्रीनग्रैब

इसमें आगे उल्लेख किया गया है कि 1 फरवरी को गृह मंत्रालय ने ट्विटर को ‘फर्जी और उकसाने वाली सामग्री को बढ़ावा देने वाले’ 250 हैंडल को ब्लॉक करने का निर्देश दिया था।

सरकार ने उन 250 ट्वीट्स और अकाउंट्स को ब्लॉक किया

ध्यान दें कि 1 फरवरी 2021 को ऑपइंडिया ने बताया था कि इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MEITY) ने लगभग 250 ट्वीट्स/ट्विटर अकाउंट्स को ब्लॉक कर दिया था, जिन्होंने #ModiPlanningFarmerGenocide हैशटैग का इस्तेमाल फेक खबर फैलाने और लोगों को डराने के लिए किया था। इनमें कई 30 जनवरी 2021 को किए गए भड़काऊ ट्वीट्स भी शामिल थे। सूत्रों ने तब ऑपइंडिया को बताया था कि यह गृह मंत्रालय और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के अनुरोध पर किया गया है, ताकि चल रहे किसान आंदोलन को देखते हुए कानून व्यवस्था को बेहतर बनाया जा सके। इन फर्जी अकाउंट में अभिनेता सुशांत सिंह और कॉन्ग्रेस के मुखपत्र नेशनल हेराल्ड की कंसल्टिंग एडिटर संजुक्ता बासु का नाम भी शामिल था।

इस मामले पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए दिल्ली स्थित कार्यकर्ता समूह कलिंग राइट्स फोरम (केआरएफ) ने एनसीपीसीआर से आग्रह किया कि वह दिल्ली पुलिस को ट्विटर इंडिया के एमडी मनीष माहेश्वरी और ट्विटर इंडिया पॉलिसी मैनेजर शगुफ्ता कामरान के खिलाफ जुवेनाइन जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन एक्ट) के प्रासंगिक प्रावधानों के तहत एफआईआर दर्ज करने का आदेश दें। मालूम हो कि इसके तहत जुवेनाइन जस्टिस (केयर एंड प्रोटेक्शन एक्ट), 2015, गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम, 1967 की धारा 17,18,19 और अन्य आईपीसी धाराएँ उपयुक्त मानी गईं हैं।

उन्होंने वैधानिक निकाय से अनुरोध किया है कि वह ट्विटर इंडिया के एमडी, उसके पॉलिसी मैनेजर और अन्य अधिकारियों को अगले 24 घंटों के भीतर ऐसी भारत-विरोधी, आतंकवाद-विरोधी सामग्री को हटाने का आदेश दें। साथ ही एनसीपीसीआर, गृह मंत्रालय और भारत सरकार को आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए ट्विटर इंडिया के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का निर्देश देने के लिए भी कहा है।

ट्विटर इंडिया को नोटिस भेजने की प्रक्रिया में एनसीपीसीआर ने लिया संज्ञान

इसी बीच, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने शिकायत पर संज्ञान लिया है। दिल्ली स्थित एक्टिविस्ट ग्रुप द्वारा दायर शिकायत के जवाब में वैधानिक निकाय के अध्यक्ष प्रियांक कानूनगो ने लिखा, ‘नोटेड’। दिल्ली स्थित एक्टिविस्ट ग्रुप के एक सदस्य ने ऑपइंडिया को बताया कि एनसीपीसीआर फिलहाल नोटिस का मसौदा तैयार करने की प्रक्रिया में है, जिसे वैधानिक निकाय इस संबंध में ट्विटर इंडिया को भेजेगा। ट्विटर इंडिया को एनसीपीसीआर के नोटिस की कॉपी मिलने के बाद ऑपइंडिया विवरण अपडेट करेगा।

‘अंतरधार्मिक शादी में बच्चे हमेशा मुस्लिम ही क्यों? महिला हिन्दू क्यों नहीं रह सकती’: किरण-आमिर के तलाक पर चले कंगना के तीर

बॉलीवुड अभिनेता आमिर खान और उनकी पत्नी किरण राव के अलग होने के बाद बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत ने भी इस मुद्दे पर अपनी बात रखी है। कंगना ने यह सवाल किया है कि इंटरफेथ मैरिज (अंतरधार्मिक विवाह) में अक्सर बच्चा मुस्लिम ही क्यों होता है? क्यों किसी को मुस्लिम से शादी करने के लिए अपना धर्म बदलने की जरूरत पड़ती है?

कंगना रनौत हमेशा से ही अपने स्पष्ट विचारों और विभिन्न मुद्दों पर सीधी बात करने के लिए जानी जाती हैं। इसी क्रम में उन्होंने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी के जरिए आमिर खान और किरण राव के तलाक और अंतरधार्मिक शादियों के बारे में प्रश्न उठाया है। कंगना ने लिखा कि एक समय था जब पंजाब के परिवारों में एक बच्चा हिन्दू और एक बच्चा सिख के तौर पर पाला जाता था। लेकिन यह ट्रेंड हिन्दू-मुस्लिम, सिख-मुस्लिम या फिर किसी अन्य पंथ का मुस्लिमों के साथ नहीं देखा गया।

कंगना रनौत की इंस्टाग्राम स्टोरी का स्क्रीनशॉट

कंगना ने अपनी स्टोरी में आगे लिखा, “आमिर खान सर के दूसरे तलाक के साथ मैं आश्चर्य चकित हूँ कि अंतरधार्मिक विवाह के बाद बच्चा हमेशा मुस्लिम क्यों होता है? क्यों एक महिला हिन्दू नहीं रह सकती है? बदलते समय के इस प्रथा को भी बदलना चाहिए क्योंकि यह प्रथा प्राचीन है और गैर-विकासवादी है।”

कंगना ने आगे कहा कि जब एक परिवार में हिन्दू, बौद्ध, जैन, सिख, राधास्वामी और आस्तिक रह सकते हैं तो मुस्लिम क्यों नहीं? क्यों एक मुस्लिम से शादी करने के लिए किसी को अपना धर्म परिवर्तन करने की जरूरत पड़ती है।

ज्ञात हो कि शनिवार (03 जुलाई) को आमिर खान और किरण राव ने भी तलाक की घोषणा की थी, जिससे उनकी 15 वर्षों की शादी ख़त्म हो गई। किरण राव आमिर खान की दूसरी पत्नी थीं। इससे पहले रीना दत्त से आमिर खान ने शादी की थी। 1986 में हुई वो शादी 2002 में ख़त्म हो गई थी। इसके बाद 2005 में आमिर खान ने किरण राव से शादी की। आमिर खान और किरण राव ने संयुक्त बयान भी जारी किया था और कहा था कि अब उन्होंने निर्णय लिया है कि अब वो जीवन के नए अध्याय की शुरुआत करेंगे, लेकिन पति-पत्नी के रूप में नहीं।

2 माह में 12 अपराधी ढेर: योगी सरकार की राह पर असम की सरमा सरकार, पुलिस के ताबड़तोड़ एक्शन से विपक्ष नाराज

असम में 10 मई को हिमंत बिस्वा सरमा की सरकार बनने के बाद वहाँ अपराधियों के ख़िलाफ़ पुलिस कार्रवाई तेज हो गई है। मात्र दो माह के भीतर असम में 12 अपराधी मारे गए हैं। इन मुठभेड़ों पर पुलिस का कहना है कि उन्हें अपराधियों ने मजबूर किया तभी उन्होंने गोली चलाई जबकि विपक्ष पुलिस की इस कार्रवाई को ‘क्रूर’ बता रहा है।

दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार, रायजोर दल प्रमुख व विधायक अखिल गोगोई ने इन एनकाउंटर को ‘सरेआम हत्या’ करार दिया है। असम में नेता प्रतिपक्ष देबब्रत सैकिया ने पुलिस की कार्रवाई की आलोचना करते हुए कहा,

“अगर अपराधी हिरासत से भागने का प्रयास कर रहे हैं तो यह पुलिस की नाकामी है। पुलिस अपराधियों को अपराध दृश्य की पुनर्रचना के लिए ले जाती है और वे भागने का प्रयास करने लगते हैं। यह अब आम बात हो गई है और ऐसा लगता है कि असम पुलिस क्रूर हो चुकी है।”

उल्लेखनीय है कि इस मामले पर विशेष पुलिस महानिदेशक (कानून-व्यवस्था) ज्ञानेंद्र प्रताप सिंह ने अपना बयान दिया था। उन्होंने बताया था कि राज्य में विगत दो महीनों के दौरान मुठभेड़ में एक दर्जन अपराधी मारे गए हैं। इनमें कर्बी आंगलोंग जिले में मारे गए अपराधियों में छह उग्रवादी संगठन डीएनएलए (DNLA) से जुड़े थे। वहीं, दो का UPRF से संबंध था। 

उन्होंने बताया कि धेमाजी, नलबाड़ी, शिवसागर और कार्बी आंगलोंग जिलों में अलग-अलग मुठभेड़ों में 4 अन्य आरोपित मारे गए। कई अपराधियों ने कथित तौर पर पुलिस अधिकारियों की सर्विस पिस्तौल छीन ली थी, जिसके बाद उन पर गोलियाँ चलानी पड़ी।

उन्होंने ये भी बताया था कि कुछ मुठभेड़ तब हुई जब पुलिस ने आरोपितों को गिरफ्तार करने का प्रयास किया और कुछ ने भागने की कोशिश की। वह कहते हैं कि जब इन उग्रवादियों और अपराधियों ने हिरासत से भागने का प्रयास किया तो पुलिस को गोलियाँ चलानी पड़ी। ऐसे में केवल वे ही बता सकते हैं कि उन्होंने भागने की कोशिश क्यों की। 

बता दें कि असम पुलिस की ऐसी त्वरित कार्रवाई के बाद उनकी तुलना यूपी पुलिस और योगी सरकार से हो रही हैं। लेकिन विपक्ष नेता देवव्रत सैकिया का असम पुलिस के लिए कहना है कि पुलिस अपनी कमियाँ छिपाने के लिए और नई सरकार को खुश करने के लिए ये सब कर रही हैं। उनका कहना है कि यदि अपराधी पुलिस हिरासत से भागने की कोशिश करते हैं तो यह पुलिस की ढिलाई है।

‘निर्माता, निर्देशक अल्पसंख्यकों के आराध्य को कभी टारगेट नहीं करते’: ‘सत्यनारायण की कथा’ के खिलाफ मंत्री ने दिए जाँच के निर्देश

मध्यप्रदेश में ‘सत्यनारायण की कथा’ फिल्म का भारी विरोध होने के बाद अब इस मामले में गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा ने डीजीपी को कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। संभव है कि जाँच के बाद फिल्म के निर्माता, निर्देशक के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो। राज्य गृहमंत्री ने ये जानकारी मीडिया के सवालों के जवाब देते हुए दी। 

नरोत्तम मिश्रा ने सत्यनारायण कथा फिल्म के बारे में कहा, “निर्माता, निर्देशक हिन्दू देवी देवताओं को टारगेट करना बंद करें। अल्पसंख्यकों के आराध्य को कभी टारगेट नहीं करते। डीजीपी को निर्देश दे रहा हूँ वो इस मामले में जाँच कर आगे की कार्रवाई करें। जाँच के बाद इस सीरीज के डायरेक्टर, प्रोड्यूसर के खिलाफ FIR भी दर्ज कर सकते हैं।” 

राज्य गृह मंत्री के अलावा प्रदेश के चिकित्सा शिक्षा मंत्री विश्वास सारंग ने कहा कि यदि किसी फिल्म से हिंदू भावना आहत होती है तो उसको रोका जाना चाहिए। जो फिल्म हिंदू भावनाओं पर कुठाराघात करते हैं उनको सहन नहीं किया जाएगा। इधर सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने सत्यनारायण की कथा का नाम बदलने के लिए डायरेक्टर साजिद नाडियाडवाला को चेतावनी दी थी।

प्रज्ञा सिंह ठाकुर ने कहा था कि ये लोग हिंदुओं के देवी देवताओं के नाम या कथाओं को तोड़मरोड़ कर पेश करते हैं। हिंदू आवेदन और निवेदन करता है, दूसरे धर्मों के बारे में आप बोलेंगे तो वो आपको जिंदा ही नहीं छोड़ेंगे। सनातन धर्म की संस्कृति है कि हम किसी को कष्ट नहीं देंगे, लेकिन कष्ट देते ही रहोगे तो उसको छोड़ेंगे भी नहीं। अब हिन्दू देवी देवताओं या हमारे मापदंडों से खिलवाड़ करना सरल नहीं है।

उल्लेखनीय है कि ये विवादित फिल्म कार्तिक आर्यन की अगली फिल्म ‘सत्यनारायण की कथा’ है। कुछ दिनों से फिल्म के नाम को लेकर मध्य प्रदेश में काफी बवाल भी मचा हुआ था। जिसके बाद फिल्म के निर्देशक समीर विद्वांस ने फिल्म के नाम को लेकर ऑफिशियल स्टेटमेंट जारी किया। समीर ने अपने पोस्ट में लिखा,

“किसी भी समुदाय या संगठन के सेंटीमेंट आहत करने का कोई इरादा नहीं था, इसलिए हमने फिल्म का नाम बदलने का फैसला किया है। फिल्म का नाम पहले हमने ‘सत्यनारायण की कथा’ जाने-अनजाने में रखी थी। इससे किसी को आहत करने का कोई इरादा नहीं था।” समीर विद्वांस आगे लिखते हैं, “फिल्म के निर्माता और क्रिएटिव टीम भी इस फैसले का पूरा समर्थन कर रहे हैं। हम जल्द ही फिल्म के नए नाम की घोषणा करेंगे।”

विद्वांस ने ट्विटर पर बयान साझा किया था और कार्तिक ने भी इसे अपने ट्विटर हैंडल से ट्वीट किया। साथ ही इसे इंस्टाग्राम पर भी साझा किया। नए नाम को अभी गुप्त रखा गया है। कार्तिक ने पिछले महीने इंस्टाग्राम पर साझा की गई फिल्म के मोशन पोस्टर के साथ आधिकारिक तौर पर फिल्म के शीर्षक की घोषणा की थी। इंस्टाग्राम पर मोशन पोस्टर के साथ, कार्तिक ने लिखा था, “मेरे दिल के करीब एक कहानी सत्यनारायण की कथा। विशेष लोगों के साथ एक विशेष फिल्म।”

शादीशुदा कामिल ने कपिल बनकर हिन्दू लड़की को फँसाया, धोखे से धर्मांतरण कराकर किया निकाह: यूपी पुलिस ने गिरफ्तार कर भेजा जेल

उत्तर प्रदेश के बागपत में एक महिला ने खट्टा प्रहलादपुर गाँव के शादीशुदा युवक पर धोखा देकर धर्मांतरण कराने और निकाह करने का आरोप लगाते हुए रिपोर्ट दर्ज कराई है। आरोप है कि उस पर नमाज पढ़ने व गोमांस खाने का दबाव बनाया जाता था और विरोध करने पर मारपीट की जाती थी। महिला का कहना है कि असलियत सामने के बाद उसे 9 साल तक बंधक बना कर रखा गया, लेकिन मौका मिलते ही वह आरोपित के चंगुल से निकल भागी। महिला थाने में मुकदमा दर्ज नहीं हुआ तो उसने डीएम के यहाँ शिकायत की और डीएम के आदेश पर कोतवाली पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर आरोपित को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है।

29 वर्षीया महिला ने बताया कि कुछ साल पहले उसके व्हाट्सएप पर एक अनजान नंबर से मिस कॉल आई थी। वापस कॉल करने पर सामने वाले ने अपना नाम कपिल बताया। इसके बाद दोनों में बात होती रही और दोस्ती हो गई। इसके बाद दोनों ने शादी कर ली। कई दिन तक उसे मेरठ में बड़े लाड़-प्यार से रखा गया। उसका एक बेटा भी है। जबकि एक बच्चे की पैदा होने के कुछ दिन बाद ही मौत हो गई थी। शादी के बाद महिला को पता चला कि कपिल का असली नाम कामिल और उसके पिता का नाम रहीमुद्दीन है।

जब नाम झूठा बताने का कारण पूछा तो कामिल ने बताया कि उसका नाम भी बदलकर राबिया रख दिया है। इसी नाम से आधार कार्ड भी बनवा लिया है। विरोध करने पर उसके साथ मारपीट की गई। अप्राकृतिक यौन संबंध बनाए गए। नमाज पढ़ने और मीट खाने का दबाव बनाया जाने लगा। विरोध करने पर मारपीट कर उसे भूखा-प्यासा रखा जाने लगा। ईद के दिन उसे गाय का मीट खाने को मजबूर किया जाता था और विरोध करने पर उसे पीटा जाता था। उसे जान से मारने की धमकी भी दी जाती थी।

आरोप है कि कामिल ने उसे बताया कि वह एक संगठन से जुड़ा हुआ है, जिसका लक्ष्य हिंदू लड़कियों को बहला-फुसलाकर धोखे से शादी करने व अधिक से अधिक बच्चे पैदा करने का है। सात जून को कामिल और उसके परिवार वालों ने उसकी हत्या करने का प्रयास किया। किसी तरह वह बेटे को साथ लेकर बागपत पहुँची और महिला थाने में शिकायत की। पुलिस ने आरोपित के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। महिला का कहना है कि वह अब हिंदू धर्म वापस अपनाएगी। 

डीएम के आदेश पर मुकदमा दर्ज कर आरोपित को गिरफ्तार कर लिया। उसे जेल भेज दिया गया है। उसके परिवार वालों को तलाश किया जा रहा है। पुलिस मामले की जाँच कर रही है। जाँच में कोई और व्यक्ति या संगठन भी दोषी मिलेगा तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी। 

कश्मीर में राज्य का दर्जा बहाल होने के बाद हो विधानसभा चुनाव, सर्वदलीय बैठक के नतीजे से निराश गुपकार गठबंधन

जम्मू-कश्मीर को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सर्वदलीय बैठक के बाद फिर सियासत गरमा गई है। उस महत्वपूर्ण बैठक के बाद अब पहली बार गुपकार गुट की भी बैठक हुई। रविवार (4 जुलाई 2021) को नेशनल कॉन्ग्रेस प्रमुख फारूक अब्दुल्ला के आवास पर गुपकार की मीटिंग की संपन्न हुई। मीटिंग के बाद गुपकार गठबंधन ने सोमवार (5 जुलाई 2021) को कहा कि पिछले महीने पीएम नरेंद्र मोदी की सर्वदलीय बैठक के नतीजे से निराशा हुई है। इससे जम्मू-कश्मीर में राजनीतिक बंदियों की रिहाई जैसे विश्वास बहाली के उपायों की कमी दिखाई दी। इसके साथ, यह भी कहा गया कि जम्मू-कश्मीर का राज्य का दर्जा बहाल होने के बाद ही विधानसभा चुनाव हों।

इस बैठक में गठबंधन की उपाध्यक्ष महबूबा मुफ्ती, एमवाई तारिगामी, न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) हसनैन मसूदी, जावेद मुस्तफा मीर और मुजफ्फर अहमद शाह शामिल थे। सभी नेता 24 जून को दिल्ली में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में हाल ही में हुई बैठक पर चर्चा करने के लिए इकट्ठा हुए थे।

गठबंधन ने सभी संवैधानिक, कानूनी और राजनीतिक साधनों का उपयोग करते हुए 5 अगस्त 2019 को हुए फैसले को उलटने के लिए एक साथ लड़ने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई, जिसमें कहा गया इन परिवर्तनों को पूर्ववत करने के लिए इनका संघर्ष जारी रहेगा।

गठबंधन के सभी सदस्यों ने राजनीतिक व अन्य कैदियों को जेलों से रिहा करने के लिए ठोस कदम उठाने जैसे किसी भी महत्वपूर्ण विश्वास निर्माण उपायों के अभाव में दिल्ली की बैठक के परिणाम पर निराशा व्यक्त की।

बैठक में कहा गया कि जहाँ तक राज्य का दर्जा बहाल करने का सवाल है, यह संसद के पटल पर भाजपा की प्रतिबद्धता रही है और उसे अपने वचन का सम्मान करना चाहिए। इसलिए कोई भी विधानसभा चुनाव जम्मू-कश्मीर के लिए पूर्ण राज्य का दर्जा बहाल करने के बाद ही होना चाहिए। इस उद्देश्य के लिए गठबंधन ने इस मुद्दे पर एक सामान्य स्थिति लाने के लिए जम्मू-कश्मीर में अन्य राजनीतिक दलों तक पहुँचने का फैसला किया है।

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में 24 जून 2021 को जम्मू-कश्मीर पर एक बैठक हुई थी। इसमें आठ दलों के 14 नेताओं ने शिरकत की थी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, उप-राज्यपाल मनोज सिन्हा और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल भी बैठक में मौजूद थे। इस दौरान प्रधानमंत्री ने केंद्र शासित प्रदेश में लोकतंत्र की मजबूती और सर्वांगीण विकास पर जोर दिया। बैठक के दौरान राज्य का दर्जा देने और विधानसभा चुनाव को लेकर भी चर्चा हुई।

करीब तीन घंटे चली बैठक के दौरान प्रधानमंत्री ने कहा कि आपस में चर्चा करना ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता है। उन्होंने कहा कि वे ‘दिल्ली की दूरी’ और ‘दिल की दूरी’ को मिटाना चाहते हैं। जम्मू-कश्मीर में लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति अपनी प्रतिबद्धता जताते हुए कहा कि परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद विधानसभा चुनाव कराना उनकी प्राथमिकता में है।

‘RSS ट्रैक पर है या रास्ता भूल गया है?’: एक ऐसे संघी के विचार, जो कभी शाखा नहीं गया

(यहाँ प्रस्तुत उद्धरण ‘Sanghi Who Never Went To A Shakha’ किताब से लिया गया है और इसे हाल ही में आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत के हिन्दू-मुस्लिम एकता और दोनों समान पूर्वजों के बयान के संदर्भ में पुनः प्रकाशित किया जा रहा है।)

चूँकि मैंने खुद को एक ‘संघी’ के रूप में पहचाना है और अपनी किताब के शीर्षक में भी इसका जिक्र किया है, मैंने सोचा कि मैं विशेष रूप से यह स्पष्ट कर दूँ कि इस किताब में प्रस्तुत मेरे विचार एक आरएसएस विचारक अथवा स्वयंसेवक के विचारों से समानता प्रदर्शित कर भी सकते हैं और नहीं भी।

भले ही मैंने अपनी किताब की शुरुआत में ही यह डिसक्लेमर दिया है लेकिन मैं यहाँ इसे और अधिक विस्तारित रूप में प्रस्तुत करना चाहूँगा और साथ ही आरएसएस पर अपने विचारों को भी।

सबसे पहले तो यह कि अपनी विचारधारात्मक पहचान के प्रति सुदृढ़ रहने के बाद भी अभी तक (अगस्त 2020 में अपनी किताब का काम पूरा करने तक) मैं किसी भी शाखा में शामिल नहीं हुआ हूँ। मुझे अभी भी इसकी कोई जानकारी नहीं है कि एक आरएसएस सदस्य की शाखा के अंदर और बाहर (दैनिक या साप्ताहिक) क्या गतिविधियाँ होती हैं।

हाँ इतना जरूर है कि मैं आरएसएस और उसके विचारों को समझने के लिए आरएसएस सदस्यों के कुछ एकत्रीकरण में शामिल हुआ। ईमानदारी से कहूँ तो मैं यह नहीं कह सकता कि मैं हमेशा ही उनसे सहमत हूँ और निश्चित तौर पर आरएसएस भी कभी यह अपेक्षा नहीं करता कि सभी उससे सहमत हों।

मेरे सीमित आकलन के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि आरएसएस पर्याप्त रूप से ‘संघी’ नहीं है। यहाँ मैं उसी ‘संघी’ भाव की बात कर रहा हूँ जो अक्सर उसके समर्थक और विरोधियों के द्वारा एक नैरेटिव के तहत उपयोग में लाया जाता है।

मैं जितने भी वरिष्ठ आरएसएस सदस्यों से मिला उनमें वह आक्रामकता और जुझारूपन नहीं था जिसकी एक संघी में कल्पना की जाती है। उनमें से अधिकांश के अंदर समस्याओं के समाधान के लिए एक धैर्य और प्रेरक दृष्टिकोण देखा गया।

मैं अपने अनुमान में गलत हो सकता हूँ लेकिन मुझे नहीं लगता कि आरएसएस किसी भी तरीके से समाज अथवा राजनीति में आमूलचूल परिवर्तन करने में भरोसा करता है। उनका मानना है कि परिवर्तन धीरे-धीरे हो और बिना किसी को आहत किए।

यदि कोई आरएसएस को एक हिन्दू कट्टरपंथी संगठन के रूप में प्रचारित करता है तो यह हर सीमा तक गलत ही होगा। दुर्भाग्य से आरएसएस को इसी तरह प्रचारित किया जाता है। मैं कई ऐसे आरएसएस के सदस्यों को जानता हूँ जिन्होंने सिर्फ इसी कारण से आरएसएस को छोड़ दिया क्योंकि उन्हें लगता है कि आरएसएस बदलाव लाने के प्रति कुछ ज्यादा ही नरम है।

यह सही है कि कई अन्य संगठनों जैसे विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल के सदस्य आरएसएस के सदस्य भी हो सकते हैं लेकिन तकनीकी तौर पर वे ‘आरएसएस से सम्बद्ध’ संगठन नहीं हैं। जहाँ एक ओर ये संगठन आक्रामक माने जाते हैं, आरएसएस व्यक्ति निर्माण और सामाजिक समरसता की बात करता है। वास्तव में सच तो यह है कि आरएसएस एक्सक्लूसिव तौर पर सिर्फ हिन्दू समाज के बारे में बात नहीं करता।

बस यही वह एक बिन्दु है जहाँ अक्सर आरएसएस को शाखा न जाने वालों से आलोचनाओं का सामना करना पड़ता है। हालाँकि, मैं इन आलोचनाओं का पूर्ण रूप से समर्थन नहीं करता हूँ लेकिन आरएसएस और उसके शीर्ष नेतृत्व की एक सामान्य आलोचना हमेशा से होती रही है कि उनकी प्राथमिकताएँ सही नहीं हैं और वे हिन्दू समाज की ओर बढ़ रहे खतरे को नहीं देख पा रहे हैं। जब केरल या बंगाल में किसी आरएसएस सदस्य की हत्या होती है तो यह ‘संघी’ अक्सर नाराज होते हैं कि आरएसएस का नेतृत्व अपने ही लोगों की सुरक्षा के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाता है।

भारत में पैदा हुए सभी लोगों को उनके पंथ और मजहब के बावजूद हिन्दू मानने का विचार या बयान, जो कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत से भी सुना गया, इस बात का प्रमाण है कि आरएसएस के भीतर ही वैचारिक उलझन है जिसके कारण आरएसएस हिन्दू समाज की ओर बढ़ रहे खतरे को भाँपने में असमर्थ रह जाता है।

उदाहरण के लिए 2019 में दशहरा के अवसर पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था, “जो भारत के हैं, जो भारतीय पूर्वजों के वंशज हैं, जो राष्ट्र के गौरव के लिए कार्य कर रहे हैं, सभी तरह की अखंडता का सम्मान करते हैं, वो सभी भारतीय हिन्दू हैं।”

हालाँकि, 2012 से पहले मैं ऐसी बातों से प्रभावित होता लेकिन फिर भी संघी कहे जाने पर मैं इसे ‘चरित्र हनन’ के तौर पर ही मानता। मैं पूर्ण रूप से व्यावहारिक आदमी हूँ, आदर्शवादी नहीं। तो इसलिए मुझे नहीं पता कि ऐसे समावेशी बयानों का क्या मतलब निकलता है? और ऐसे समाधानकारी या मेल-मिलाप वाले बयान से किस उद्देश्य की पूर्ति होती है?

किसी भी सीमा तक भारत में रहने वाले या पैदा हुए सभी लोगों को हिन्दू के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता है। मैं निजी तौर पर भारतीयों को हिन्दुत्व के प्रति उनके रवैये के आधार पर 5 विभिन्न वर्गों में विभाजित करना चाहूँगा,

प्रतिरोधी : पहले वो हैं जो हिन्दुत्व के सख्त विरोधी हैं और इसे समाप्त करने की इच्छा रखते हैं। वो पेरियारवादियों, नियो-अम्बेडकरवादियों, इस्लामिस्ट और इंजीलवादियों की तरह हिन्दुत्व और हिन्दूइज्म में कोई भेद नहीं करते। वो सीधे तौर पर इस पहचान को समाप्त कर देना चाहते हैं। वो या तो हिन्दू धर्म को या तो संकीर्ण या आधारभूत तौर पर निम्न विचारधारा के रूप में देखते हैं और इसे समाप्त करने के योग्य समझते हैं।

कृपालु अथवा दयावान : इस वर्ग में ऐसे लोग आते हैं जो हिन्दुत्व या हिन्दूइज्म, दोनों के ही खिलाफ पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं लेकिन कई कारणों से इसे स्वीकार करते हैं। अधिकांश लिबरल इसी वर्ग में आते हैं। ये हिन्दू धर्म को तभी स्वीकार करेंगे जब वह उनके अनुसार होगा। उदाहरण के लिए जब सभी हिन्दू त्यौहार या तो विनियमित होंगे या धर्मनिरपेक्षित, जैसे कि ओणम जो कि ‘फसलों का त्यौहार है और इसका हिन्दू धर्म से कोई लेना-देना नहीं है।’

उदासीन : ये ऐसे लोग हैं जो हिन्दुत्व या हिन्दू धर्म (हिन्दूइज्म) के प्रति उदासीन हैं। इस वर्ग में वो लोग आते हैं जो या तो चुनौतियों से अनजान हैं या अपने जीवन में ही पूरी तरह से व्यस्त हैं। कॉन्ग्रेसी हिन्दू इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। इनके बारे में मैंने अपनी किताब में बताया था। हालाँकि, इनकी विचारशीलता ऊपर बताए गए दो समूहों से प्रेरित होती है, बजाए उनके जिनके बारे में आगे बताया जाएगा। कई गैर-हिन्दू भी इसी श्रेणी में आते हैं।

सहायक : ये ऐसे लोग हैं जो अपनी हिन्दू पहचान से वाकिफ हैं और हिन्दू कारणों का समर्थन करते हैं। ये मुखर हो भी सकते हैं और नहीं भी लेकिन ये उदासीन तो नहीं हैं। कई स्व-घोषित संघी (वास्तविक संघी नहीं) या तो इस वर्ग में आते हैं या अगले। आरएसएस प्रमुख के बयान के अनुसार कई गैर-हिन्दू भी इसी वर्ग में आते हैं। हालाँकि, मैं इसकी आशा करता हूँ किन्तु इसके विषय में निश्चित नहीं हूँ।

मुखर : इस समूह में ऐसे लोग हैं जो न केवल अपनी पहचान के प्रति जागरूक हैं बल्कि इसके लिए कड़े कदम उठाने के लिए तैयार रहते हैं। ये अपनी इस पहचान की सुरक्षा के लिए खतरा भी मोल ले सकते हैं। हालाँकि, यह एक संपूर्ण समूह नहीं है और इसके क्रियाकलाप कई उप-समूहों में अलग-अलग भी हो सकते हैं।

मेरे विचार में आरएसएस को अंतिम दो समूहों को नेतृत्व और स्पष्टता प्रदान करनी चाहिए और तीसरे समूह (उदासीन) को बदलने का प्रयास करना चाहिए। कृपालु अथवा दयावान समूह के लोगों से बात की जा सकती है लेकिन अपनी शर्तों पर। ऐसा करके पहले समूह को बिना किसी मेल-मिलाप के हराया जा सकता है।

मैं निजी तौर पर हिंदुओं के भविष्य को लेकर चिंतित हूँ। मुझे यह लगता है कि प्रतिरोधी और कृपालु समूह मिलकर भारत की जनसंख्या का लगभग 30% हैं और यह शीघ्र ही एक टिपिंग पॉइंट में बदल सकते हैं। इसके अलावा जैसा कि मैंने अपनी किताब में एक जगह उल्लेखित किया है कि मैं वर्तमान घटनाओं और भारत विभाजन के साथ उत्पन्न हुई परिस्थितियों में एक भयानक समानता देख पा रहा हूँ। मैं इतिहास को खुद को दोहराते हुए देखता हूँ जब तक कि हिन्दू जाग नहीं जाते।

अब हिन्दूफोबिया का भी एक चिंताजनक स्तर तक सामान्यीकरण और बुद्धिजीविकरण हो रहा है। यह एक ऐसा स्तर है जहाँ यदि कोई हिन्दू अपने साथ हुए अन्याय की बात करता है तो उसे धर्मांध कह दिया जाता है। जो कुछ भी हिन्दू धर्म के प्रचार से संबंधित है अथवा उसके उत्सव स्वरूप को प्रदर्शित करता है, उसे एक सुरक्षित वातावरण के लिए हानिकारक माना जाता है। यह भारत और यहाँ तक कि विदेशों में भी शुरू हो चुका है जिसका ताना-बाना ब्राह्मणवाद के विरोध में बुना जा रहा है।

मैं इस बात के लिए कितना चिंतित हूँ इसका पता इसी बात से चलता है कि मुझे लगता है हिंदुओं के औपचारिक संहार के लिए उन्हें खिलाया-पिलाया जा रहा है। यदि उन्हें वास्तविकता से परिचित करने का कोई भी प्रयास किया जाता है या उन्हें सभ्यतागत खतरों से सतर्क किया जाता है तो उसे ‘वास्तविकता मुद्दों से भटकाने के प्रयास’ के रूप में देखा जाता है।

मेरी यह चिंता उचित हो भी सकती है अथवा नहीं लेकिन इसके कारण मुझे यह लगता है कि हिंदुओं को एक सामुदायिक नेतृत्व की आवश्यकता है जो उन्हें आगामी खतरों के बारे में स्पष्ट और तार्किक रूप से समझा सके। यह जल्दी किया जाना चाहिए, इससे पहले कि मेरी तरह कई और लोग आतुर हो जाएँ। हालाँकि, मैं वास्तव में इस चिंता से खुश नहीं हूँ।

और मैं यह मानता हूँ कि आरएसएस इसके लिए सही संगठन है क्योंकि उसका आकार और उसकी विरासत उसे इस योग्य बनाती है। लेकिन आरएसएस एक हिन्दू संगठन बनने के स्थान पर एक राष्ट्रवादी संगठन बनने के प्रयास में लगा हुआ है जो चरित्र निर्माण पर केंद्रित है। यही वह बिन्दु है जहाँ मैं नाखुश हूँ।

दरअसल मैनें जो खा है वह किसी भी प्रकार से आरएसएस के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के वक्तव्य से अलग नहीं है। यहाँ प्रस्तुत वक्तव्य डॉ. हेडगेवार के द्वारा दिया गया था जो आरएसएस की दूरदृष्टा और लक्ष्य के बारे में है और आरएसएस की वेबसाइट पर बताया गया है,

“हिन्दू संस्कृति हिन्दुस्थान की प्राण-वायु है। अतः स्पष्ट है कि यदि हिन्दुस्थान की रक्षा करनी है तो पहले हमें हिन्दू संस्कृति का पोषण करना चाहिए। यदि हिन्दुस्थान में ही हिन्दू संस्कृति का नाश हो जाता है, और यदि हिन्दू समाज का अस्तित्व समाप्त हो जाता है, तो हिन्दुस्थान के रूप में बनी हुई केवल भौगोलिक इकाई का उल्लेख करना शायद ही उचित होगा। केवल भौगोलिक सीमाएँ ही राष्ट्र नहीं बनातीं। पूरे समाज को ऐसी सतर्क और संगठित स्थिति में होना चाहिए कि कोई भी हमारे सम्मान के किसी भी बिंदु पर बुरी नजर डालने की हिम्मत न करे। यह याद रखना चाहिए कि ताकत संगठन से ही आती है। इसलिए प्रत्येक हिंदू का कर्तव्य है कि वह हिंदू समाज को मजबूत करने के लिए हर संभव प्रयास करे।”

तो, क्या आरएसएस अपना रास्ता भटक गया है या मेरे जैसे स्वघोषित संघी यह नहीं देख पा रहे हैं कि संगठन अभी भी ट्रैक पर है और अपने संस्थापक के दृष्टिकोण का पालन कर रहा है। मुझे इसका जवाब चाहिए।

नोट:अंग्रेजी में मूल रूप से इस लेख को इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ा जा सकता है। इसका हिंदी अनुवाद ओम द्विवेदी ने किया है।

राहुल रौशन द्वारा लिखित पुस्तक ‘Sanghi Who Never Went To A Shakha’, रूपा प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की गई थी और 10 मार्च 2021 को जारी हुई थी। इस लिंक का उपयोग करके पुस्तक को खरीद सकते हैं।

‘SRK 25 साल छोटी एक्ट्रेस के साथ रोमांस कर सकते हैं, तो मैं रणबीर के साथ क्यों नहीं?’: नीना गुप्ता

बॉलीवुड एक्ट्रेस नीना गुप्ता इन दिनों अपनी ऑटोबायोग्राफी ‘सच कहूँ तो’ को लेकर खासा सुर्खियों में हैं। उन्होंने अपनी किताब में अपने निजी जीवन और ​करियर को लेकर कई बड़े खुलासे किए हैं। बेबाक राय और बोल्ड फैसले लेने के लिए मशहूर नीना गुप्ता ने बॉलीवुड अभिनेताओं के अपनी से छोटी उम्र की अभिनेत्रियों के साथ रोमांस को लेकर अपनी राय रखी है। एंटरटेनमेंट वेबसाइट पिंकविला से बातचीत में नीना गुप्ता ने कहा था कि आज भी एक्टर अपने से बड़ी उम्र की एक्ट्रेस के साथ रोमांस करने से कतराते हैं।

पिछले साल मार्च में लिया गया उनका यह इंटरव्यू आजकल तेजी से वायरल हो रहा है। उन्होंने बॉलीवुड के फेमस स्टार शाहरुख खान, ऋतिक रोशन का नाम लेते हुए कहा था कि जब ये अपने से उम्र में 25 साल छोटी एक्ट्रेस के साथ रोमांस कर सकते हैं, तो मैं रणबीर कपूर के संग फिल्म में रोमांस क्यों नहीं कर सकती हूँ।

‘बधाई हो’ फिल्म की अभिनेत्री ने ​आगे कहा था कि वह चाहती हैं कि बॉलीवुड में ऐसा वक्त भी आए, जब वह ऋतिक रोशन या शाहरुख खान के अपोजिट काम कर सकें। उन्होंने कहा कि वह शाहरुख या ऋतिक के अपोजिट काम क्यों नहीं कर सकती हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि भारत जैसे देश में इसमें बहुत समय लगेगा।

गौरतलब है कि 62 वर्षीय नीना गुप्ता आए दिन अपने किसी न किसी बयान को लेकर सुर्खियों में बनी रहती हैं। पिछले दिनों उनकी ऑटोबायोग्राफी रिलीज हुई है। इसमें उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ी कुछ घटनाओं के बारे में खुलकर लिखा है। इसमें उन्होंने एक फिल्ममेकर के साथ घटी घटना का भी जिक्र किया है, जिसमें उन्हें अश्लील चीजें कही गई थीं।

नीना गुप्ता की ऑटोबायोग्राफी ‘सच कहूँ तो’ में उस घटना का जिक्र भी किया है, जब एक डायरेक्टर/प्रोड्यूसर ने उन्हें होटल के कमरे में बुलाया था और रात बिताने के लिए पूछा था। इससे उनका ‘खून जम’ गया था।

नीना ने कहा था कि वह निर्माता-निर्देशक का नाम लेना और शर्मिंदा करना चाहती थीं, लेकिन उनके दोस्तों ने उन्हें ऐसा न करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि उन्होंने अपनी पुस्तक में उसका नाम नहीं लिया, क्योंकि प्रकाशकों ने उन्हें ऐसा करने पर कानूनी परिणाम भुगतने की चेतावनी दी थी।