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वैक्सीन पर बछड़े वाला प्रोपेगेंडा: कॉन्ग्रेस और ट्विटर में गिरने की होड़ या दोनों का ‘सीरम’ सेम

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब घोषणा की कि अब केंद्र सरकार वैक्सीन खरीद कर राज्यों को मुफ्त देगी तब लगा कि टीकाकरण को लेकर लगातार उठ रहे प्रश्न अब और नहीं उठाए जाएँगे। पर मुझे लोगों के इस निष्कर्ष पर संदेह था कि अब किसी तरह का विवाद नहीं होगा। इस वजह से मैंने यह कहा था कि अब देखना यह होगा कि लेफ्ट-कॉन्ग्रेस इकोसिस्टम के प्रोपेगेंडा का स्वरूप अब क्या होगा?

इस प्रश्न का उत्तर भी दूसरे दिन ही मिला जब राहुल गाँधी के साथ-साथ रॉबर्ट वाड्रा ने पूछा कि जब सरकार मुफ्त में वैक्सीन दे रही है तब निजी क्षेत्र के अस्पताल उसके लिए पैसे क्यों ले रहे हैं? उधर विपक्ष के कुछ नेताओं ने यह कहा कि सरकार मुफ्त में कुछ नहीं दे रही है, वैक्सीन खरीदने के लिए जनता की जेब से पैसा जाता है।

अर्थात विपक्ष को विरोध की ऐसी आदत लग चुकी है कि वह बिना विरोध व्यक्त किए रह नहीं सकता। 

यह इकोसिस्टम वैक्सीन के बारे में अफवाहें और भ्रम फैलाने का काम लम्बे समय से करता रहा है। इस काम में पत्रकार, कलाकार, नेता, अभिनेता, कार्टूनिस्ट शामिल रहे हैं। राज्यों के मुख्यमंत्री, पूर्व मुख्यमंत्री, स्वास्थ्य मंत्री के साथ-साथ और न जाने कौन-कौन शामिल रहा है। कोरोना की दूसरी भीषण लहर के बाद वैक्सीन के प्रति भ्रम फैलाने में इन लोगों की भूमिका की चर्चा सोशल मीडिया में होती रही। पर ये इतने ढीठ लोग हैं कि फेक न्यूज़ और वैक्सीन हेसिटेन्सी फैलाने से बाज़ नहीं आए। 

वैक्सीन के बारे में भ्रम फैलाने की नई घटना कॉन्ग्रेस सोशल मीडिया सेल के गौरव पांधी की ओर से हुई है। पांधी ने ट्वीट करते हुए लिखा; एक आरटीआई के उत्तर में मोदी सरकार ने स्वीकार किया है कि कोवैक्सीन के बनाने में बीस दिन से छोटे बछड़े का वध करके उसके खून का इस्तेमाल किया जाता है। यह घृणित काम है। सरकार को इसकी जानकारी पहले देनी चाहिए थी।  

यह जान-बूझकर फैलाया गया फेक न्यूज़ है। इस झूठ को फैलाने का उद्देश्य ही यह था कि केंद्र की भाजपा सरकार को बदनाम किया जाए और हिन्दुओं के मन में सरकार प्रति एक भ्रम पैदा किया जाए। सब कुछ के बाद भी मुझे इस बात पर आश्चर्य नहीं होता कि जिम्मेदार पद पर बैठा एक कॉन्ग्रेसी ऐसा कर रहा है, ऐसे दल का नेता जिसके सदस्य केरल में गाय काटकर खुश होते हैं। पर मन में एक बात यह भी आती है कि प्रोपेगेंडा चलाने वाले और फेक न्यूज़ फैलाने वाले ये लोग कितने बासी हो गए हैं कि ये आगे क्या करने वाले हैं, न केवल उसका पूर्वानुमान लगाना सरल हो गया है बल्कि अब इनकी कोई भी बात अधिकतर लोगों को आश्चर्यचकित नहीं करती। 

सरकार ने पांधी की इस ट्वीट को गंभीरता से लेते हुए एक वक्तव्य जारी किया और बताया कि यह बात गलत है कि कोवैक्सीन बनाने में बछड़े के खून का इस्तेमाल होता है। स्वास्थ्य मंत्रालय के वक्तव्य में यह बताया गया कि बछड़े के खून का इस्तेमाल केवल वीरो सेल के विकास के लिए किया जाता है। यह सबको पता है कि न तो भारत बायोटेक और न ही सरकार ने वैक्सीन से सम्बंधित सूचनाएँ कभी भी छिपाई है। 

यह बात और है कि सरकार के इस वक्तव्य के बाद भी कॉन्ग्रेसी नेता झूठ फैलाने से बाज नहीं आएँगे पर इस विषय पर ट्विटर का अपना आचरण चिंताजनक है। ट्विटर के लिखित नियमों के अनुसार ट्विटर वैक्सीन हेसिटेन्सी को बढ़ावा देनेवाले ट्वीट डिलीट करवा देता है पर आश्चर्य की बात यह है कि इस नियम के बावजूद ट्विटर ने पांधी का ट्वीट नहीं हटाया। यह समझना मुश्किल नहीं है कि विदेशों में वैक्सीन सम्बंधित प्रोपेगेंडा के विरुद्ध सख्त कार्रवाई करने वाला ट्विटर भारत में कॉन्ग्रेस नेताओं के ट्वीट पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं करता। 

ट्विटर का यही आचरण आम भारतीय के साथ-साथ सरकार के मन में भी उसके उद्देश्य को लेकर शंका पैदा करता है। आखिर रोज-रोज लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दावा करने वाला ट्विटर ऐसे मौकों पर एक पारदर्शिता का प्रदर्शन क्यों नहीं कर सकता? दुनिया भर में नैतिकता की बात करने वाला एक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म यदि इस तरह का आचरण करेगा तो किसके मन में संदेह पैदा न होगा? ऐसे में ट्विटर के लिए सरकार द्वारा बनाए गए नए कानून और नियमों के अनुसार कार्रवाई करने के अलावा अब और कोई रास्ता नहीं बचा है। ट्विटर कितनी जल्दी यह मान लेगा, वह देखना दिलचस्प रहेगा। 

राजनीतिक आलोचना बर्दाश्त नहीं, ममता सरकार ने की बड़ी संख्या में सोशल मीडिया पोस्ट्स ब्लॉक करने की सिफारिश: सूत्र

ऑपइंडिया को पश्चिम बंगाल सरकार के सूत्रों से बड़ी जानकारी मिली है। राज्य प्रशासन के सूत्रों से पता चला है कि हाल ही में पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सरकार ने बड़ी संख्या में सोशल मीडिया पोस्ट्स को ब्लॉक करने की सिफारिश की। इसके लिए ‘इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी एक्ट, 2000’ की धारा-69A का सहारा लिया गया है। फेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब पर ऐसे 200 पोस्ट्स के खिलाफ कार्रवाई को कहा गया है।

बता दें कि आईटी अधिनियम की धारा 69 (ए) सरकार को उन पोस्ट और अकाउंट्स के खिलाफ कार्रवाई करने की अनुमति देती है, जो सार्वजनिक व्यवस्था या भारत की संप्रभुता और अखंडता, भारत की रक्षा, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध के हित के लिए खतरा बन सकते हैं। सूत्रों की मानें तो तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) की सरकार ने इन पोस्ट्स को राज्य में कानून-व्यवस्था के खिलाफ बताया है।

सूत्रों से ये भी पता चला है कि ये पोस्ट्स मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की आलोचना में लिखे गए थे। साथ ही इनमें राज्य में लगातार हो रही भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्याओं पर सरकार को घेरा गया था। सरकार ने दावा किया है कि इनमें से कई पोस्ट्स ऐसे भी हैं, जो सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील थे क्योंकि इनमें हिन्दू देवी-देवताओं या इस्लाम मजहब को लेकर आपत्तिजनक कंटेंट्स थे। सरकार का कहना है कि इनसे दंगे भड़कने की आशंका थी।

बताया गया है कि राज्य सरकार ने केंद्र के पास ये सिफारिश भेजी थी। हालाँकि, केंद्र सरकार ने इनमें से दो तिहाई सोशल मीडिया पोस्ट्स को ही ब्लॉक किए जाने के लिए आगे बढ़ाया है। ऐसा इसलिए, क्योंकि इनमें से एक तिहाई पोस्ट्स ऐसे हैं, जो विशुद्ध रूप से राजनीतिक आलोचना की श्रेणी में आते हैं। राजनीतिक आलोचनाओं को राज्य की कानून-व्यवस्था में अड़ंगा बता कर उन्हें ब्लॉक करने की सिफारिश नहीं की जा सकती है।

जहाँ एक तरफ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी केंद्र सरकार पर ट्विटर को दबाने का आरोप लगा रही हैं और ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ की बातें कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ सूत्रों की मानें तो वो खुद ऐसे सोशल मीडिया पोस्ट्स को ब्लॉक करने के लिए भेज रही हैं, जिनमें राजनीतिक आलोचना की गई है। बता दें कि ट्विटर बार-बार कहने के बावजूद नए आईटी नियमों को लेकर ढील बरत रहा है, जिसके बाद सरकार ने उसे चेताने के बाद कार्रवाई भी की है।

हाल ही में गाजियाबाद में जब एक मुस्लिम बुजुर्ग की पिटाई और दाढ़ी काटने की घटना सामने आई तो इसमें ‘जबरन जय श्री राम बुलवाने’ वाला एंगल ठूँस कर इसे सांप्रदायिक बनाने के लिए भी ट्विटर और फेसबुक का ही सहारा लिया गया। इसके लिए लोनी थाणे में ट्विटर के खिलाफ FIR भी दर्ज की गई है। इन सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने इस कंटेंट का फैक्ट-चेक करने की कोशिश नहीं की और झूठा नैरेटिव फैलने दिया।

कैप्टन के सलाहकार प्रशांत किशोर सिद्धू के बनेंगे तारणहार? पंजाब में नेताओं को मिल रहे हैं खुले ऑफर

भाजपा छोड़कर कॉन्ग्रेस में शामिल होने के बाद क्रिकेटर से नेता बने नवजोत सिंह सिद्धू के लिए ना रास्ता आसान रहा और ना ही पंजाब कॉन्ग्रेस के कद्दावार माने जाने वाले कैप्टन अमरिंदर सिंह के लिए। कैप्टन और सिद्धू के बीच छत्तीस का आँकड़ा जग जाहिर है। लेकिन जब 2022 में पंजाब में विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में दोनों गुट अपनी-अपनी गोटियाँ फिट करने में व्यस्त हो गया है। ऐसे में कॉन्ग्रेस हाईकमान संभावित नुकसान को देखते हुए दोनों के बीच सुलह कराने की हर संभव प्रयास कर रही है, लेकिन ये कोशिशें विफल होती नजर आ रही हैं।

कहा जा रहा है कि हाईकमान द्वारा ऑफर किए जा रहे प्रदेश में डिप्टी सीएम के पद को नवजोत सिंह सिद्धू ने ठुकरा दिया है। सिद्धू चाहते हैं कि उन्हें प्रदेश अध्यक्ष का पद मिले। कॉन्ग्रेस के सूत्रों का कहना है कि नवजोत सिद्धू ने कैप्टन के लीडरशिप में डिप्टी सीएम बनने से इनकार कर दिया है। उनका कहना है कि यदि वह इस पद को स्वीकार भी कर लेते हैं तो सहज नहीं रह पाएँगे। वहीं, कैप्टन चाहते हैं कि प्रदेश अध्यक्ष जैसा शक्तिशाली पद उनके विरोधी सिद्धू के पास ना जाए।

यहाँ कैप्टन का तर्क है कि प्रदेश अध्यक्ष का पद किसी हिंदू नेता को मिलना चाहिए, ताकि अगले साल होने वाले चुनावों में संतुलन साधा जा सके। इससे वोटरों पर भी असर होगा। कहा जा रहा है कि बीते शनिवार को ही राहुल गाँधी ने पंजाब के मसले को हल करने के लिए बने पैनल से बातचीत की थी, लेकिन कोई हल नहीं निकल सका। हालाँकि, प्रदेश प्रभारी हरीश रावत ने कहा कि इस मसले का हल जुलाई तक निकल सकता है।

कॉन्ग्रेस सूत्रों का कहना है कि सिद्धू ने पैनल से साफ तौर पर कह दिया है कि वह डिप्टी सीएम के पद के लिए तैयार नहीं हैं और प्रदेश अध्यक्ष बनना चाहते हैं। वहीं सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह किसी हिंदू नेता को यह जिम्मेदारी देने के पक्ष में हैं। कॉन्ग्रेस सूत्रों ने कहा कि फिलहाल पंजाब में दोनों नेताओं के बीच बर्फ पिघलती नहीं दिख रही है क्योंकि दोनों ही अपने स्टैंड से पीछे हटने के लिए तैयार नहीं हैं।

हालाँकि, अपनी पोजिशन को मजबूत बनाए रखने के लिए अमरिंदर सिंह तमाम प्रयास कर रहे हैं। उनके इशारे पर एनएसयूआई ने ‘कैप्टन फॉर 2022’ मुहिम शुरू कर दी है। इस मुहिम के तहत एनएसयूआई टी-शर्ट बाँट रही है, जिस पर लिखा है कि कैप्टन इज वन। मोहाली से इस मुहिम की शुरुआत मंगलवार (15 जून) को की गई।

इसी बीच, मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के लिए एक और मुश्किल खड़ी हो गई है। चुनाव रणनीतिज्ञ ‘प्रशांत किशोर’ कॉन्ग्रेसी नेताओं को फोन कर कैप्टन के खिलाफ गलत बयानबाजी करने को कह रहे हैं।

पंजाब पुलिस के प्रवक्ता के अनुसार, पुलिस को सूचना मिली थी कि कोई अज्ञात व्यक्ति प्रशांत किशोर बनकर पिछले 5-7 दिनों से नेताओं और जनप्रतिनिधियों को फोन कर रहा है। फोन कॉल करने वाले ये अज्ञात लोग खुद को प्रशांत किशोर बताकर कथित तौर पर मुख्यमंत्री के खिलाफ सार्वजनिक बयानबाजी करने और उनकी लीडरशिप की आलोचना के लिए उकसा रहे हैं। हालाँकि, पुलिस कह रही है कि मामला दर्ज करके जाँच की जा रही है, लेकिन कुछ लोग इसमें दूसरा पक्ष भी तलाश रहे हैं।

ध्यान देने की बात है कि प्रशांत किशोर मार्च से मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के प्रधान सलाहकार हैं। पंजाब में प्रशांत किशोर के आते ही राजनीतिक सरगर्मी और भी बढ़ गई है। कहा जाता है कि प्रशांत किशोर प्रियंका गाँधी के बेहद नजदीकी हैं। वहीं, कॉन्ग्रेस में नवजोत सिंह सिद्धू भी प्रियंका के कहने पर ही शामिल हुए हैं। ऐसे राजनीतिक विश्लेषकों को यह सवाल परेशान कर रहा है कि प्रियंका के दोनों नजदीकी पात्रों के तार आपस में जुड़ते हुए अमरिंदर सिंह के खिलाफ कैसे हो जा रहे हैं।

ध्यान देने वाली बात यह है कि पंजाब में कैप्टन को मुख्यमंत्री बनवाने का श्रेय सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी को जाता है। कहा जाता है कि प्रियंका गाँधी नहीं चाहती थीं कि अमरिंदर सीएम की कुर्सी पर बैठें। समय-समय पर अमरिंदर सिंह द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ कर देना भी उन्हें असहज कर देता है।

ऐसे में कई लोगों का मानना है कि सिद्धू डिप्टी सीएम का पद अपने मन से नहीं, बल्कि किसी के वरदहस्त के कारण ठुकरा रहे हैं, ताकी प्रदेश अध्यक्ष पर काबिज हो सकें। अगर कैप्टन के विरोध के कारण अध्यक्ष पद उन्हें नहीं मिलता है तो 2022 के विधानसभा चुनावों में उन्हें मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में प्रोजेक्ट किया जा सके। दोनों ही स्थिति में कैप्टन के पर कतरे जा सकते हैं।

कैप्टन अमरिंदर का पर कतरना कॉन्ग्रेस हाईकमान को जरूरी भी लगता है और इस काम में सिद्धू से बड़ा सहायक उन्हें कोई और नहीं मिल सकता है। हो सकता है कि प्रशांत किशोर के रूप में कॉन्ग्रेस के नेताओं को फोन करने वाला व्यक्ति या गैंग किसी खास उद्देश्य से प्लांट किया गया हो या हो सकता है कि वह प्लांट किया ही नहीं गया हो। क्योंकि, फोन करने वाला व्यक्ति कहता है कि अगर वे उनकी सलाह पर काम करते हैं तो वह दिल्ली में कॉन्ग्रेस आलाकमान के साथ मामला उठाएँगे।

गौरतलब है कि प्रशांत किशोर ने 2017 के पंजाब विधानसभा चुनावों में कॉन्ग्रेस के चुनाव अभियान की कमान संभाली थी। उस चुनाव में पार्टी ने 117 सदस्यीय विधानसभा की 77 सीटों पर जीत हासिल कर सत्ता में वापसी की थी और कैप्टन अमरिंदर सिंह मुख्यमंत्री बने थे। अब यही ‘प्रशांत किशोर’ अमरिंदर का खेल बिगाड़ कर सिद्धू को मौका दे रहे हों, ऐसा दबी जुबान में कुछ कॉन्ग्रेसी नेताओं का मानना है।

‘हराम’ है हिंदू लड़के के साथ मुस्लिम लड़की का प्रेम: ‘धूप की दीवार’ से भड़के पाकिस्तानी और कट्टरपंथी

ओटीटी प्लेटफॉर्म Zee5 ने अपनी आने वाली वेब सीरीज ‘धूप की दीवार’ के ट्रेलर और पोस्टर सोशल मीडिया पर जारी की है। इसमें ‘शांति, सद्भाव और जीवन की खुशी का एक संदेश’ देने की कोशिश की गई है। इसको लेकर सोशल मीडिया पर पाकिस्तानियों ने अपना गुस्सा जाहिर किया है।

हसीब हासन के निर्देशन में बनी यह वेब सीरीज 25 जून को रिलीज होगी। इसमें भारत के ‘विशाल’ नाम के लड़के और पाकिस्तान की ‘सारा’ के बीच क्रॉस बॉर्डर प्रेम कहानी को दिखाया गया है। सीरीज में दोनों अपने पिता को युद्ध में खोने के बाद एक-दूसरे से प्यार करने लगते हैं।

हालाँकि, पाकिस्तानी दर्शकों को Zee5 की यह सीरीज बिल्कुल भी पसंद नहीं आई है। पाकिस्तानियों ने मुस्लिम लड़की और हिंदू लड़के के बीच प्रेम संबंधों को हराम बताते हुए सोशल मीडिया पर #BoycottDhoopKiDeewar ट्रेंड शुरू किया है।

वेब सीरीज पर क्या बोले यूजर्स

‘कश्मीर के राजदूत’ नाम के एक ट्विटर यूजर ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान पर इस वेब सीरीज को कथित तौर पर बढ़ावा देने का आरोप लगाया है।

एक अन्य ट्विटर यूजर सलमान जावेद ने इस तरह की वेब सीरीज बनाने के पीछ के फैक्ट्स और संभावित मंशा का पता लगाने के लिए ट्विटर का सहारा लिया। सलमान ने ट्वीट किया, “इस पेंडोरा बॉक्स में मजेदार तथ्य हैं। Zee, zindgi के कंटेंट को बिना सब्सक्रिप्शन शुल्क के नहीं देखा जा सकता है, लेकिन यह फिल्म पाकिस्तानी दर्शकों के लिए मुफ्त उपलब्ध होगी। वे पाकिस्तानी अभिनेताओं और दर्शकों में निवेश करने के लिए इतने उत्सुक क्यों हैं? कोई खास वजह?”

सीरीज का बहिष्कार करते हुए एक अन्य ट्विटर यूजर ने इस बात का खुलासा किया कि इसे पाकिस्तान में एक पाकिस्तानी कलाकार के साथ शूट किया गया है, जिससे वह काफी शर्मिंदा महसूस कर रहा है।

एक ब्लू टिक वाले यूजर ने ‘अमन की आशा’ पहल का मजाक उड़ाते हुए ट्वीट किया, “अमन का तमाशा पहली बार विफल हुआ और यह दूसरी बार भी विफल हो जाएगा। लेकिन यह कई लोगों के लिए जल्दी से जल्दी पैसा बनाने के लिए पर्याप्त समय तक चलेगा। आप खून, पेशा और जातीय सफाई पर शांति नहीं बना सकते।”

वहीं ताहा जौनपुरी नाम के ट्विटर यूजर ने खुद के ‘मदरसा छाप’ होने पर गर्व करते हुए इस सीरीज को ‘भगवा लव ट्रैप’ करार दिया।

एक अन्य हैंडल ने इसमें दिखाए गए रिश्ते को ‘हराम’ करार दिया।

पाकिस्तानी ने लिखा है ‘धूप की दीवार’

इस सीरीज को पाकिस्तानी नाटककार उमेरा अहमद ने लिखा है। इसमें दिखाया गया है कि यह सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं है, बल्कि यह भारत और पाकिस्तान द्वारा शेयर किए गए लव-हेट का रिश्ता है।

कश्मीर और पुलवामा हमलों की पृष्ठभूमि में लिखी गई यह कहानी कथित तौर पर सच्ची घटनाओं पर आधारित है, जिसमें बॉर्डर के दोनों ओर बलिदान हुए सैन्य अधिकारियों के परिवारों और बच्चों के बारे में बात करती है।

गौरतलब है कि zindgi, Zee के स्वामित्व वाला प्लेटफ़ॉर्म है, जिसमें पाकिस्तानी, यूक्रेनी, ब्राज़ीलियाई कंटेंट समेत शॉर्ट सीरीज होती हैं। Zee5, Zee का ओटीटी प्लेटफॉर्म है जो Zee के सभी मनोरंजन चैनलों की सामग्री को स्ट्रीम करता है।

सरेंडर करो, काम पाओ: ISF कार्यकर्ताओं को धमका रहे TMC नेता मुदस्सिर हुसैन को सुनिए

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार आए डेढ़ महीने से ज्यादा हो गया है मगर, भाजपा कार्यकर्ताओं समेत अन्य राजनीतिक दलों के समर्थकों पर होते हमले अब तक नही थमे हैं। इसी क्रम में सत्ताधारी तृणूमल कॉन्ग्रेस (TMC) नेता का एक वीडियो वायरल हुआ है। वीडियो में वह इंडियन सेकुलर फ्रंट (ISF) के समर्थकों और कार्यकर्ताओं को धमका रहे हैं कि अगर उन्होंने टीएमसी नहीं ज्वाइन की तो उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलेगा।

टीएमसी नेता का नाम मुदस्सिर हुसैन है। वह दक्षिण 24 परगना के भांगर में भोगली-द्वितीय पंचायत के पंचायत प्रमुख हैं। उनका यह विवादित वीडियो मंगलवार (जून 15, 2021) का है। कटालिया क्षेत्र में एक पार्टी कार्यालय के उद्घाटन के दौरान, मुदस्सिर हुसैन ने कहा कि अन्य दलों के लिए काम करने वाले यदि 100 दिन की नौकरी योजना के तहत काम चाहते हैं तो उनको सत्ताधारी पार्टी के सामने आत्मसमर्पण करना होगा।

आगे वीडियो में हुसैन ने कहा कि जिन लोगों ने पीरजादा अब्बास सिद्दीकी की ISF को ज्वाइन किया था उन्हें तृणमूल कॉन्ग्रेस से जुड़ना होगा, अगर वह सरकारी योजनाओं के तहत नौकरी चाहते हैं। उन्होंने कहा, “जिन कार्यकर्ताओं ने हमसे सभी सुविधाएँ लेने के बाद चुनाव के दौरान अन्य दलों के लिए काम किया था, उन पर तब तक विचार नहीं किया जाएगा जब तक वे हमारे सामने आत्मसमर्पण नहीं कर देते। चुनाव के दौरान ISF के लिए काम करने वालों को सत्ताधारी पार्टी के प्रति अपनी निष्ठा दिखानी होगी।”

हुसैन बोले, “ISF को जितने लोगों ने वोट दिया था उन्हें हमारे सामने सरेंडर करना होगा, नहीं तो उन्हें 100 दिन की नौकरी पाने के लिए फुरफुरा जाना होगा।” बता दें कि टीएमसी नेता ने फुरफुरा को लेकर ISF कार्यकर्ताओं को इसलिए ताना दिया क्योंकि ISF के संस्थापक फुरफुरा शरीफ से संबंध रखते हैं। ये जगह बंगाली मुसलमानों के बीच काफी प्रसिद्ध है।

टीएमसी नेता ने आगे धमकी देते हुए कहा कि अगर टीएमसी ज्वाइन नहीं की तो योजना के तहत नौकरी पाने के लिए बीडीओ दफ्तर जाकर भी कुछ नहीं होगा। उनके अनुसार, “कुछ लोग कह रहे हैं कि वे बीडीओ कार्यालय जाएँगे, लेकिन मैं कह रहा हूँ कि आपको बीडीओ कार्यालय नहीं जाना है, क्योंकि हम सब कुछ नियंत्रित करते हैं।”

गौरतलब है कि टीएमसी नेता मुदस्सिर हुसैन ऐसे भड़काऊ बयान देने के लिए अक्सर चर्चा में रहते है। बंगाल में विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने कहा था कि केवल टीएमसी वोटर्स को ही बूथ पर मतदान करने दिया जाएगा। उनका कहना था कि टीएमसी कार्यकर्ताओं और समर्थकों के अलावा कोई भी इलाके में वोट नहीं डालेगा और न ही दूसरी पार्टियों को सपोर्ट करने वालों को वोट देने की जरूरत है। हुसैन ने ये भी कहा था कि सेंट्रल फोर्स बूथ पर तैनात होगी, लेकिन टीएमसी वर्कर सड़कों पर पेट्रोलिंग करेंगे और गैर टीएमसी वोटरों को नहीं जाने देंगे।

बोफोर्स FIR, ‘Mr क्लीन’ की सरकार का गिरना और ‘युवा तुर्क’ पर कॉन्ग्रेस की कृपा: कैसे निधन के 26 दिन बाद ही राजीव बने ‘भारत रत्न’

देश की आज़ादी के बाद से अधिकतर नेहरू-गाँधी का ही शासन नई दिल्ली में रहा, कभी प्रत्यक्ष तो कभी अप्रत्यक्ष रूप से भी। ये भी गौर करने वाली बात है कि नेहरू-गाँधी परिवार के तीनों प्रधानमंत्रियों को भारत रत्न से नवाज़ा गया – जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी। नेहरू और इंदिरा को तो उनके ही कार्यकाल में ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया, वहीं राजीव गाँधी को उनके निधन के बाद देश के इस सर्वोच्च सम्मान से नवाजा गया।

सिख नरसंहार की वजह से राजीव गाँधी को ‘भारत रत्न’ दिए जाने का मुद्दा भी जिंदा रहता है और गाहे-बगाहे उठता रहता है। दिसंबर 2018 में ये मुद्दा फिर से उठा था, जब दिल्ली विधानसभा ने एक प्रस्ताव पारित कर के भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी का ‘भारत रत्न’ वापस लेने की माँग की। सिख नरसंहार को इसका कारण बताया गया। AAP विधायक जरनैल सिंह के प्रस्ताव को विधानसभा ने विश्वासमत से पारित किया।

इस प्रस्ताव में कहा गया था कि भारत की राष्ट्रीय राजधानी के सबसे बड़े नरसंहार के पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए दिल्ली सरकार केंद्रीय गृह मंत्रालय को पत्र लिखे। उसी साल कॉन्ग्रेस नेता सज्जन कुमार के खिलाफ भी दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला आया था। सिख नरसंहार के बारे में ज्यादा बताने की ज़रूरत नहीं है। स्वर्ण मंदिर में ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ के बाद तत्कालीन पीएम इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद उनके बेटे राजीव ने सत्ता संभाली।

फिर पूरी दिल्ली में सिखों के खिलाफ नरसंहार शुरू हुआ, जिसमें कई कॉन्ग्रेस नेताओं पर क्रूरता के आरोप लगे। राजीव गाँधी ने ‘जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती थोड़ी सी हिलती ही है’ वाला बयान दिया, जिसकी आज भी आलोचना होती है। इंदिरा गाँधी की सहानुभूति लहर में राजीव गाँधी के नेतृत्व में 1984 में कॉन्ग्रेस को 414 सीटें मिलीं। अब तक देश में लोकसभा के 17 चुनाव हुए हैं, लेकिन किसी पार्टी ने इस मौके के अलावा कभी 375 का आँकड़ा भी पार नहीं किया।

राजीव गाँधी को ‘भारत रत्न’ दिए जाने की बात करने से पहले हमें 80 के दशक के अंत और 90 के दशक के शुरुआत की राजनीति को समझना पड़ेगा। 1984 में जिस कॉन्ग्रेस पार्टी को 414 सीटें मिली थीं, वही पार्टी 5 साल बाद हुए चुनावों में इसका आधा पाने को भी तरस गई। 195 सीटों पर सिमटी कॉन्ग्रेस सरकार बनाने की स्थिति में ही नहीं थी। यही वो दौर था, जब भारत में गठबंधन की राजनीति का दौर शुरू हुआ।

कॉन्ग्रेस विरोधी गठबंधनों का दौर तो 70 के दशक में ही शुरू हो गया था, जब इंदिरा गाँधी ने आपातकाल लगाया। राजीव गाँधी की प्रचंड बहुमत वाली सरकार ने शाहबानो मामले में इस्लामी कट्टरपंथियों को खुश करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया। फिर डैमेज कंट्रोल के लिए राम मंदिर का ताला खुलवाया गया। बोफोर्स घोटाला हुआ, जिसे तब तक भारत का सबसे बड़ा घोटाला बताया गया।

श्रीलंका में भारत ने सैन्य दखल दिया। सिंख दंगों के घाव तो पंजाब और दिल्ली के कई इलाकों में थे ही। प्रचंड बहुमत का इस्तेमाल प्रचंड गलतियों के लिए किया गया। बोफोर्स तोप घोटाला के समय विश्वनाथ प्रताप सिंह भारत के रक्षा मंत्री हुआ करते थे, लेकिन घोटाला के सामने आने के बाद उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया और जनता पार्टी के कई गुटों को मिला कर जनता दल का गठन किया। ‘राजाजी’ के नाम से जाने जाने वाले वीपी सिंह का प्रभाव पूरे भारत में था।

वीपी सिंह का प्रभाव और राजीव गाँधी के विरोध ने कुछ ऐसा काम किया कि ‘मिस्टर क्लीन’ सेंट्रिस्ट, लेफ्टिस्ट और दक्षिणपंथी पार्टियों को एक साथ लाने में कामयाब हो गए और सरकार बना ली। उनकी सरकार पर भी दाम कम नहीं लगे। कभी ‘मिस्टर क्लीन’ के रूप में जाने जाने वाले वीपी सिंह के कार्यकाल में कश्मीरी पंडितों का नरसंहार और पलायन हुआ, रिलायंस का सरकार से पंगा हुआ, राम मंदिर मुद्दा सामने आया, मंडल कमीशन की रिपोर्ट लागू हुई और SC-ST एक्ट प्रभाव में आया।

लेकिन, राम मंदिर के लिए आंदोलन तेज़ होता जा रहा था और इसी बीच अक्टूबर 1990 में उत्तर प्रदेश में कारसेवकों पर अयोध्या में गोली चलवा कर मुलायम सिंह यादव ने ‘मुल्ला मुलायम’ का ख़िताब हासिल किया। इस प्रकरण के आक्रोश में भाजपा ने वीपी सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया। वीपी सिंह संसद में विश्वासमत हासिल करने में नाकाम रहे। उन्होंने नैतिकता, बाबरी मस्जिद बचाने और सेक्युलरिज्म का गान करते हुए पद छोड़ा।

लेकिन, उससे पहले वो बोफोर्स को लेकर कार्रवाई शुरू कर चुके थे। जनवरी 1990 में ही भारत सरकार ने इस मामले में आपराधिक प्रोसिडिंग शुरू कर दी थी। स्वीडन और स्विट्जरलैंड तक की सरकारों से इस मामले में जवाब माँगा जाना था। तब वीपी सिंह ने ही कहा था कि जिन्होंने बोफोर्स घोटाले में रुपया बनाया है, उनके नाम जानने का हक़ देश को है। FIR दर्ज कर ली गई थी। कॉन्ग्रेस के कई पूर्व नेता नेशनल फ्रंट सरकार के इर्दगिर्द भी थे, ऐसे में ये एक मुश्किल कार्य था।

वीपी सिंह के पद छोड़ने के बाद एक बार फिर से कॉन्ग्रेस ने अपना दाँव खेला और चंद्रशेखर को पीएम बनाया, जिन्होंने मौके का फायदा उठाते हुए अपनी पार्टी तोड़ दी और पीएम बन गए। कॉन्ग्रेस ने उन्हें समर्थन दिया। कहते हैं, राजीव गाँधी ने प्रणब मुखर्जी की जगह चंद्रशेखर को प्राथमिकता दी थी। अयोध्या मुद्दे, मंडल कमिशन और देश के कई हिस्सों में फैलते अलगाववाद के बीच वो प्रधानमंत्री बने। ऊपर से राजीव गाँधी के साथ उनके मतभेद बढ़ते जा रहे थे।

इसी बीच लोकसभा चुनाव की घोषणा हुई और चुनाव प्रचार के दौरान ही तमिलनाडु के श्रीपेरुमबुदूर में एक चुनावी रैली के दौरान आत्मघाती हमले में राजीव गाँधी का निधन हो गया। LTTE की आतंकी उनका पाँव छूने के लिए झुकी और ब्लास्ट हो गया। देश में मध्यावधि चुनाव चल रहे थे, इसीलिए उस समय कार्यवाहक सरकार थी, जिसके मुखिया चंद्रशेखर थे। इसी सरकार ने राजीव गाँधी को ‘भारत रत्न’ देने का निर्णय लिया।

वो जून 17, 1991 की तारीख थी जब राजीव गाँधी को भारत रत्न का अवॉर्ड दिए जाने की घोषणा की गई। मई 21, 1991 को उनका निधन हुआ था। ऐसे में निधन के मात्र 26 दिनों बाद ही उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान से सम्मानित कर दिया गया। बताया गया कि पक्ष-विपक्ष ने एकमत से ये फैसला लिया है। उस समय देश के प्रधानमंत्री थे चंद्रशेखर, जिनकी सरकार अगले महीने ही चली गई। चंद्रशेखर, राजीव गाँधी की कृपा से ही पीएम बने थे।

जब सोनिया गाँधी ने रिसीव किया राजीव गाँधी को मरणोपरांत मिला ‘भारत रत्न’

इसीलिए, जब औपचारिक रूप से राजीव गाँधी को मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया गया, तब पीवी नरसिंह राव की सरकार आ चुकी थी। सोनिया गाँधी ने ये अवॉर्ड रिसीव किया था। राव ने 5 सालों तक पार्टी और सरकार, दोनों को बड़ी चालाकी से चलाया था। तेलुगु पार्टियाँ उनके लिए भी कई वर्षों से ‘भारत रत्न’ की माँग करती रही हैं। लेकिन, राजीव गाँधी को ‘भारत रत्न’ दिए जाने का विरोध हो भी नहीं सकता था, क्योंकि वो देश के पूर्व पीएम थे और तुरंत निधन के बाद किसी भी वजह से इसका विरोध करना बैकफ़ायर कर सकता था।

एक और बात ध्यान देने लायक है कि राजीव गाँधी के साथ ही देश के प्रथम उप-प्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल को भी ‘भारत रत्न’ मिला, जिन्हें 40 वर्षों तक उनकी ही पार्टी ने नज़रअंदाज़ किया था। कॉन्ग्रेस ने जब राजीव गाँधी को ‘भारत रत्न’ देने की माँग की तो पीएम चंद्रशेखर ने सरदार पटेल का नाम भी आगे बढ़ाया। तत्कालीन राष्ट्रपति रामास्वामी वेंकटरमन को उन्होंने दोनों नामों का प्रस्ताव भेजा, लेकिन सरदार पटेल के लिए न कॉन्ग्रेस इच्छुक थी और न ही राष्ट्रपति।

जिस समारोह में सरदार पटेल को ‘भारत रत्न’ दिया गया, उसमें तत्कालीन राष्ट्रपति मौजूद ही नहीं थे। वेंकटरमन राजीव गाँधी के प्रधानमंत्रित्व काल में 1987 में ही राष्ट्रपति चुने गए थे और कॉन्ग्रेस ने उनका समर्थन किया था। इन सबसे ये बात साफ़ है कि कॉन्ग्रेस ने जितनी तत्परता गाँधी-नेहरू परिवार की सेवा में दिखाई, उतनी महात्मा गाँधी तक के लिए भी नहीं दिखाई, सरदार पटेल और बीआर आंबेडकर तो दूर की बात थे।

मिलिए ‘वैग्रेंट हंटर्स’ से, जानिए ‘बैलूनिंग’: बाढ़ का पानी उतरते ही 8 किमी जमीन पर मकड़ियों ने क्यों और कैसे बनाए जाले

ऑस्ट्रेलिया के दक्षिण-पूर्वी प्रांत विक्टोरिया में लाखों की संख्या में मकड़ियों ने भारी बरसात के कारण अपना जाला जमीन से कुछ ऊँचाई पर बना लिया है। इससे 8 किमी तक की जमीन एक महीन जाले से ढँक गई है। गिप्सलैंड में मकड़ी के इस जाले से ढकी जमीन में से करीब 1 किमी हिस्सा सड़क का है। सोशल मीडिया पर इस प्राकृतिक घटना की अच्छी-खासी चर्चा हो रही है और इससे जुड़ी कई सारी तस्वीरें भी शेयर की जा रही हैं।

ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया प्रांत में पिछले हफ्ते ही जबर्दस्त बारिश देखने को मिली थी। इस वजह से क्षेत्र में बाढ़ आ गई। प्रांत के गिप्सलैंड क्षेत्र में इस बाढ़ से बचने के लिए मकड़ियाँ लाखों की संख्या में जमीन से ऊपर आ गईं। मकड़ियों की यह प्रवृत्ति ‘बैलूनिंग’ कही जाती है।

दरअसल बाढ़ आने के कारण लाखों की संख्या में मकड़ियों ने एक साथ यह प्रक्रिया अपनाई। इन मकड़ियों ने जमीन से ऊपर आने के लिए आसपास की वनस्पतियों और पेड़-पौधों पर अपने जाले का निर्माण किया। यही कारण है कि गिप्सलैंड के लैंगफोर्ड और सेल कस्बे के बीच मकड़ियों के इन जालों के कारण लगभग 8 किमी की एक महीन परत हवा में तैर रही है।

बैलूनिंग की इस प्रक्रिया के कारण मकड़ियाँ जो जाला बनती हैं वह हवा से भी हल्का होता है जिस कारण यह वनस्पतियों और पौधों के ऊपर तैरता रहता है। यह बड़े आश्चर्य की बात है कि मकड़ियों द्वारा बनाया गया यह जाल इतना हल्का होता है कि इसकी सहायता से मकड़ियाँ हवा में लगभग 100 किमी दूर तक जा सकती हैं।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इस प्रकार के जाले की परत का निर्माण करने वाली मकड़ियाँ अक्सर जमीन पर रहती हैं और जाला नहीं बनाती हैं। इन्हें ‘वैग्रेंट हंटर्स’ कहा जाता है। लेकिन ये मकड़ियाँ बाढ़ के समय अपने बचाव के लिए जमीन छोड़ देती हैं। हालाँकि इस प्रक्रिया के दौरान भी ये मकड़ियाँ सिर्फ एक ही बार तरल पदार्थ छोड़ती हैं, जिससे एक ही महीन धागे का निर्माण होता है। इसका मतलब यह हुआ कि कई किमी तक फैले इस जाल का एक-एक धागा अलग-अलग मकड़ियों द्वारा बनाया गया है, जो करोड़ों की संख्या में हैं।

अक्सर ही विक्टोरिया में ठंड के महीनों में यह दृश्य देखने को मिलता है, जब प्रांत में काफी बारिश होती है। इस साल भी गिप्सलैंड का इलाका बाढ़ से प्रभावित हुआ। हालाँकि बाढ़ का पानी तो उतर गया, लेकिन जमीन मकड़ी के जाले से ढँक गई। स्थानीय निवासियों के अनुसार हवा चलने पर यह जाले पानी की किसी लहर की तरह दिखाई देते हैं।

‘ये जिहादी मानसिकता के लोग…’: करीना कपूर बनी ‘सीता’ तो होगा कड़ा विरोध, बजरंग दल ने चेताया

फिल्म ‘सीता’ में करीना कपूर के माता सीता का किरदार निभाने की अभी तक आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन, जब से उन्हें यह भूमिका ऑफर किए जाने की खबरें आई हैं इसका लगातार विरोध हो रहा है। इसी कड़ी बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने नागपुर में अभिनेत्री के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए जिला अधिकारी को ज्ञापन सौंपकर चेतावनी दी है कि फिल्म बनने पर इसका कड़ा विरोध किया जाएगा।

दैनिक भास्कर ने एक कार्यकर्ता के हवाले से कहा है कि बॉलीवुड में हिंदू समाज को टारगेट करने की फैशन चल रहा है। इससे पहले तांडव बनी थी, जिसमें करीना के शौहर सैफ अली खान ने मुख्य रोल अदा किया था। अब सीता आ रही है, जिसमें कोई करीना कपूर खान हैं।

कार्यकर्ता ने कहा, “बार-बार मुस्लिम समाज के लोग ही हिंदू चरित्रों को क्यों निभाते हैं। इससे हमारे समाज में क्षति आती है। ये जिहादी मानसिकता के लोग हैं, जो हिन्दुओं से कमाई कर हिंदू समाज को ही गली देते हैं। अगर यह फिल्म बनी तो इसका कड़ा विरोध होगा।”

रिपोर्ट्स के मुताबिक, डायरेक्टर अलौकिक देसाई द्वारा करीना कपूर खान को फिल्म सीता के लिए चुना गया था। दावा तो यह भी किया जा रहा है कि इसके लिए करीना ने 12 करोड़ रुपए की फीस माँगी है। करीना कपूर खान द्वारा माता सीता का रोल किए जाने का सोशल मीडिया पर भी कड़ा विरोध हो रहा है। लोगों का मानना है कि करीना को रोल ऑफर करना हिंदू धर्म और माता सीता का अपमान है। सोशल ट्विटर पर बायकॉट करीना का ट्रेंड चलाया गया है।

बाहुबली के लेखक ने लिखी है सीता की स्क्रिप्ट

‘बाहुबली’ फिल्म के मशहूर लेखक केवी विजेंद्र प्रसाद ने ‘सीता- द इनकार्नेशन’ फिल्म की कहानी लिखी है। इसका निर्देशन अलौकिक देसाई करेंगे। बॉलीवुड हंगामा के अनुसार, “बेबो पहले ‘वीरे दी वेडिंग 2’ और हंसल मेहता की एक फिल्म की शूटिंग करेंगी, क्योंकि इन फिल्मों की शूटिंग एक-एक महीने में पूरी जाएगी। वहीं, सीता की शूटिंग और प्रोडक्शन के लिए कम से कम 8 से 10 महीने का समय चाहिए होगा। ताकि उस समय उनका पूरा फोकस इस फिल्म पर हो। दरअसल, करीना यह अच्छी तरह जानती हैं कि यह फिल्म उनके लिए मील का पत्थर साबित होगी, क्योंकि यह सीता के दृष्टिकोण से रामायण की एक रीटेलिंग है।”

रिपोर्ट्स के मुताबिक, फिल्म में रावण के रोल के लिए रणवीर सिंह को कास्ट किया जा सकता है, लेकिन अभी तक उनकी ओर से इसको लेकर कोई रिएक्शन नहीं आया है।

हमला कर भाग रहा था रहमान, पुलिस ने गोली मारी: रेप के बाद आदिवासी बहनों को पेड़ से लटकाने का मामला

असम के कोकराझार में आदिवासी नाबालिग बहनों से रेप और हत्या के मामले के मुख्य आरोपितों में से एक फारूक रहमान ने भागने की कोशिश की। इस दौरान पुलिस कार्रवाई में गोली लगने से वह घायल हो गया। उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

कोकराझार के एसपी थुबे प्रतीक विजय कुमार ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि रहमान ने पुलिस को कहा कि वह एक मोबाइल फोन की बरामदगी में मदद करेगा। जब गुरुवार (17 जून 2021) को उसे मौके पर ले जाया गया तो उसने पुलिस पर हमला कर दिया। उन्होंने बताया कि रहमान ने जहाँ मोबाइल फोन होने की बात कही थी, असल में वहाँ एक धारदार हथियार छिपाया गया था। इसकी सहायता से उसने पुलिस पर हमला किया और भागने की कोशिश की। मजबूरी में पुलिस को रहमान पर गोली चलनी पड़ी।

ज्ञात हो कि असम के कोकराझार जिले में दो आदिवासी नाबालिग बहनों की पेड़ से टँगी लाश हुई लाश मिली थी। बलात्कार के बाद इनकी हत्या की गई थी और फिर उनकी लाश को पेड़ से लटका दिया गया था। मामले के मुख्य आरोपितों मुजम्मिल शेख, नजीबुल शेख और फारूक रहमान सहित सभी 7 को पुलिस ने गिरफ्तार कर चुकी है।

पिछले सप्ताह अभ्याकुती गाँव के पास जंगल में नाबालिग बहनों की लाश मिलने के बाद उनके परिवार ने रेप के बाद हत्या किए जाने की आशंका जताई थी। हालाँकि पुलिस शुरुआत में इसे सुसाइड का मामला मान रही थी। आरोपितों की गिरफ्तारी के बाद एसपी थुबे प्रतीक विजय कुमार ने बताया था कि दोनों लड़कियों की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट आनी अभी बाकी है। लेकिन मामले में गिरफ्तार किए गए सात लोगों ने लड़कियों के साथ दुष्कर्म और उन्हें जान से मारने की बात कबूल कर ली थी।

असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा नए खुद ट्वीट करके इस घटना की जानकारी दी थी और इस बलात्कार और हत्या की गुत्थी सुलझाने के लिए असम पुलिस की सराहना भी की थी।

इस वीभत्स अपराध में गिरफ्तार सभी आरोपित 19 से 27 साल के हैं। इनकी पहचान मुजम्मिल शेख, नजीबुल शेख, फारुक रहमान, हनीफ़ शेख, जहानुर इस्लाम, मो. अतब अली और संकार्डे बर्मन के रूप में हुई है। एसपी ने बताया था कि आरोपितों ने अपने कबूलनामे में कहा है कि वे दोनों लड़कियों को जानते थे। जहाँ लड़कियों का परिवार रहता है, उससे सटे इलाकों के ही आरोपित भी रहने वाले हैं।

अखिलेश यादव की तुलना भगवान श्रीकृष्ण से, सपा का नया वीडियो: फिर से लैपटॉप का वादा

उत्तर प्रदेश में अगले साल (2022) में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर समाजवादी पार्टी ने सोशल मीडिया पर पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव का एक वीडियो रिलीज किया है। इसमें अखिलेश यादव को भगवान श्रीकृष्ण के रूप में प्रोजेक्ट किया गया है। इसमें कहा गया है कि ‘मुरलीधारी कृष्ण बदलकर वेश आ रहे हैं, अखिलेश आ रहे हैं, अखिलेश आ रहे हैं।’

सपा नेता राजकुमार भाटी द्वारा लिखे गए इस गाने में अखिलेश यादव का गुणगान करते हुए उनके द्वारा जारी की गई योजनाओं को दिखाया गया है। इस वीडियो को पार्टी के आधिकारिक फेसबुक पेज पर शेयर किया गया है। इसमें जनता को वादों का लॉलीपॉप दिखाते हुए दावा किया गया है कि सपा सरकार के प्रदेश की सत्ता में वापसी से यहाँ के किसान, शिक्षा समेत दूसरी सुविधाओं की हालत पहले से बेहतर होगी।

इसके अलावा वीडियो में सपा ने दोबारा से सत्ता में आने पर छात्रों को फिर से लैपटॉप देने का वादा किया गया है। गाने में कहा गया है, आ जाओ अखिलेश तुम्हें उत्तर प्रदेश बुलाता है। इसमें कहा गया है कि गाँव, गरीब और दलित सभी अखिलेश यादव को ही सीएम की कुर्सी पर देखना चाहते हैं।

गौरतलब है कि 2022 विधानसभा चुनाव के मद्देनजर राजनीतिक पार्टियों ने अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। इस कड़ी में बुधवार (16 जून 2021) को भाजपा पर निशाना साधते हुए ट्वीट किया था, “भाजपा का छलावा बहुत हो गया है, बीजेपी को जनता सबक सिखाएगी। आज सत्ताधारी सोच रहे हैं कि काश वो भ्रस्टाचार का नाम और झूठ के रंग बदल पाते। आज दुनिया भर की आस्थावान जनता खुद को ठगा महसूस कर रही है। ये भाजपा का भ्रस्टाचार है।”

इससे पहले उन्होंने 11 जून 2021 को भी अखिलेश ने प्रदेश सरकार पर निशाना साधते हुए ट्वीट किया था, “इधर बेकारी-बेरोज़गारी रिकॉर्ड तोड़ रही है, उधर महंगाई कमर तोड़ रही है। न मनरेगा में काम है, न स्किल मैपिंग का कहीं अता-पता है और न ही इंवेस्टमेंट मीट के निवेश का। व्यापार, कारोबार, दुकानदारी, कारीगरी सब ठप्प है।” सपा प्रमुख ने भाजपा सरकार के बंदरबाँट में उलझे होने और जनता के उम्मीद खोने का दावा किया था।