Home Blog Page 3720

2500 ‘हिंदू’ गाँवों का नाम बदल इस्लामीकरण: ‘दुर्गा’ इंदिरा थीं तब PM, CM के लिए हिंदू थे ‘भारत सरकार के मुखबिर’

तीन दशकों से कश्मीर घाटी में कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार होता रहा है। हाल ही में तीन आंतकियों द्वारा दक्षिणी कश्मीर के त्राल में नगर पार्षद बीजेपी नेता राकेश पंडिता की हत्या कर दी गई। राकेश पंडिता की हत्या कर आतंकी संगठनों ने इशारा किया है कि उन्हें आज भी कश्मीरी पंडितों की घाटी में वापिसी खटकती है। यही कारण है कि वे फिर आतंकवाद की जड़ें मजबूत करने की नाकाम कोशिश में जुटे हुए हैं। दरअसल, घाटी में आतंकवाद के चलते राकेश पंडिता का परिवार 1990 में पलायन के बाद जम्मू आ गया था। 2020 में यानी 30 साल बाद राकेश पंडिता फिर से त्राल लौटे, जहाँ उन्होंने और उनकी पत्नी ने बीजेपी की टिकट पर स्थानीय निकाय का चुनाव लड़ा और दोनों जीत भी गए थे।

कश्मीरी पंडित समुदाय के कई लोग राजनीतिक दलों से जुड़कर घाटी में सक्रिय

इसी तरह कश्मीरी पंडित समुदाय के कई लोग विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़कर घाटी में सक्रिय हैं। यही कारण है कि आतंकवादियों के गढ़ में हिंदुओं की मौजूदगी उन्हें नागवार गुजरती आई है। इससे पूर्व भी ये आतंकी कई कश्मीरी पंडित नेताओं को मौत के घाट उतार चुके हैं। पिछले वर्ष जून में इसी तरह सरपंच अजय पंडिता की अनंतनाग में हत्या की गई थी। अजय पंडिता और राकेश पंडिता दोनों ही जाने-माने चेहरे थे, जो कश्मीरियों को ​वापस लाने के कार्य में लगे हुए थे। वहीं, सरकार की तरफ से भी पुरजोर प्रयास किए जा रहे हैं कि किसी भी तरह कश्मीरियों को वापस लाया जा सके। इसी बीच राकेश पंडिता की मौत के बाद एक बार फिर कश्मीरी पंडितों की सुरक्षा संदेह के घेरे में है। आखिर कब तक ‘कश्मीरी पंडित’ इसी तरह अपनी जान गँवाते रहेंगे? आखिर कब तक वह आतंकियों की गोलियों का निशाना बनते रहेंगे।

31 वर्ष पूर्व कश्मीरी पंडितों पर हुए नरसंहार की यादें ताजा

इस घटना ने कश्मीर घाटी में कश्मीरी पंडितों पर हुए नरसंहार की यादें ताजा कर दी हैं। कश्मीरी पंडित, जिन्हें कश्मीरी ब्राह्मण और कश्मीरी हिंदू भी कहा जाता है, उन्होंने घाटी में 31 वर्ष पूर्व हुए नरसंहार में अपने परिजनों को खोया है, उनके जख्म अभी भी नहीं भरे हैं। वह सालों से न्याय के लिए बाट जोह रहे हैं। मानवाधिकार संगठन जो जम्मू-कश्मीर में कुछ दिनों के लिए इंटरनेट बंद होने पर छाती पीटने लगता है, वह भी 31 सालों से विस्थापन का दर्द झेल रहे कश्मीरी पंडितों के मुद्दे पर चुप ही रहा है।

कश्मीरी पंडितों कश्मीर छोड़ो या फिर इस्लाम अपनाओ

19 जनवरी 1990 – कश्मीर के लिए यह तारीख बेहद महत्वपूर्ण है। इसी दिन कश्मीरी पंडितों पर नरसंहार कर उन्हें उनकी ही सरजमीं छोड़ने के लिए मजबूर किया गया था। 19 जनवरी शुक्रवार की सुबह डल झील पर शिकारा का संगीत नहीं, मुस्लिम कट्टरपंथियों का शोर सुनाई पड़ रहा था। हिंदुओं के घरों की दीवारों पर धमकी भरे पोस्टर लगा दिए गए थे। कश्मीर के कोने-कोने में मस्जिदों से फरमान जारी किए जा रहे थे। फरमान कश्मीर में रहने वाले गैर-मुस्लिमों के खिलाफ था। फरमान था कश्मीरी पंडितों कश्मीर छोड़ो या अंजाम भुगतो या फिर इस्लाम अपनाओ।

भारत के इतिहास में सबसे बड़ा नरसंहार और पलायन

वो रात कश्मीरी पं​ड़ितों के लिए किसी बुरे सपने से कम नहीं थी। रात को हजारों कश्मीरी पंडितों का कत्ल कर दिया गया था। राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता, कट्टरपंथी इस्लामवादी और उग्रवादी विद्रोह के बीच घाटी में अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय कश्मीरी पंडितों का यह भारत के इतिहास में सबसे बड़ा नरसंहार और पलायन था। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, हथियार लहराती हुई भीड़ अल्लाहु अकबर के नारे लगाते हुए अचानक कश्मीरी पंडितों के घरों में दाखिल हो जाती और उन्हें धमकाती थी। मुस्लिम कट्टरपंथियों ने गैर-मुस्लिमों के लिए ऐसी स्थिति पैदा कर दी थी, जिसमें उनके पास दो ही विकल्प थे – या तो कश्मीर छोड़ो या फिर दुनिया।

कश्मीरी पंडित नीरजा साधु का कहना है, ”19 जनवरी को मैंने या मेरे परिवार ने ये नहीं सोचा कि हमेशा के लिए हम यहाँ से चले जाएँगे, क्योंकि उससे पहले दिसंबर में मेरे पिताजी को धमकी भरे फोन आ रहे थे। उनसे ये बोला गया था कि आप जॉब छोड़कर चले जाएँ यहाँ से, नहीं तो आपका घर जलाएँगे। आपकी बेटी को घर से ले जाएँगे। आपके पूरे परिवार को जला देंगे।”

103 मंदिरों, धर्मशालाओं और आश्रमों को तोड़ दिया गया

एक रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ 19 जनवरी 1990 को ही लाखों कश्मीरी पंडितों ने मजबूरन घाटी छोड़ दी। घाटी में उस वक्त कश्मीरी पंडितों की आबादी लगभग 5 लाख के करीब थी, लेकिन कश्मीर को इस्लामिक स्टेट बनाने की मजहबी सोच की वजह से साल 1990 के अंत तक 95 प्रतिशत कश्मीरी पंडित अपना घर-बार छोड़ कर वहाँ से चले गए। इसी दौरान कश्मीरी पंडितों से जुड़े 150 शैक्षिक संस्थानों को आग लगा दी गई थी। 103 मंदिरों, धर्मशालाओं और आश्रमों को तोड़ दिया गया था। कश्मीरी पंडितों की हजारों दुकानों और फैक्ट्रियों को लूट लिया गया था। हजारों कश्मीरी पंडितों की खेती योग्य जमीन छीनकर उन्हें भगा दिया गया था। कश्मीरी पंडितों के घर जलाने की 20 हजार से ज्यादा घटनाएँ सामने आईं और 1100 से ज्यादा कश्मीरी पंडितों को बेहद निर्मम तरीके से मार डाला गया।

गौरतलब है कि कश्मीरी नेता शेख अब्दुल्ला और भारत की पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के बीच 1975 में एक समझौता हुआ था। कश्मीरियों की युवा पीढ़ी में कम ही लोगों यह बात जानते होंगे कि 1975 के समझौते के बाद शेख कॉन्ग्रेस के समर्थन से राज्य के मुख्यमंत्री बने थे। हालाँकि, उस समय राज्य विधानसभा में उनकी पार्टी का एक भी विधायक नहीं था। उस दौरान पाकिस्तान समर्थक जमात-ए-इस्लामी और जम्मू एवं कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) अब्दुल्ला के इस समझौते के विरोध में थे। बस यहीं से विद्रोह की चिंगारी उठी, जिसने भविष्य की आग में कई मासूमों का आशियाना तबाह कर डाला।

2500 गाँवों के नाम बदलकर इस्लामीकरण की नींव

1980 में अब्दुल्ला ने खुद कश्मीर का इस्लामीकरण करना शुरू कर दिया था। उनकी सरकार ने लगभग 2500 गाँवों के नाम (जो हिंदी या संस्कृत शब्दों से प्रेरित थे) बदलकर इस्लामी नामकरण की शुरुआत की थी। इसके अलावा अपनी आत्मकथा आतिश-ए-चिनार (Atish-e-Chinar) में उन्होंने कश्मीरी पंडितों को ‘मुखबिर’ के रूप में इंगित किया, जिसका अर्थ है ‘भारत सरकार के मुखबिर’।

1987 के राज्य विधानसभा चुनाव में कथित धांधली के बाद कश्मीर में भय का माहौल पैदा हो गया था, जिसने जमात-ए-इस्लामी के फ्रंटलाइन कार्यकर्ताओं के मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट (MUF) को जन्म दिया। उन्होंने अपने इस्लामिक आंदोलनों में इस्लाम धर्म का प्रचार किया, जिसमें पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) सक्रिय रूप से शामिल हो गई। बाद में हिजबुल-मुजाहिदीन नाम के एक आतंकवादी समूह को प्रायोजित किया जाने लगा।

तभी जेकेएलएफ ने आईएसआई के समर्थन से हथियारों के साथ विद्रोह करना शुरू कर दिया। उसी समय उन्होंने कलाश्निकोव राइफल (AK-47) का इस्तेमाल करना शुरू कर किया। इसके अलावा उन्होंने कश्मीरी पंडितों के खिलाफ बड़े स्तर पर दुष्प्रचार किया और देशद्रोह का अभियान चलाया।

यह सर्वविदित है कि 14 सितंबर 1989 को बीजेपी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष टिका लाल टप्पू की हत्या से कश्मीर में शुरू हुआ आतंक का दौर समय के साथ-साथ और वीभत्स होता गया। टप्पू की हत्या के तीन हफ्ते बाद जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के नेता मकबूल बट की मौत की सजा सुनाने वाले सेवानिवृत्त सत्र न्यायाधीश नीलकंठ गंजू की हत्या कर दी गई। फिर 13 फरवरी को श्रीनगर दूरदर्शन केन्द्र के निदेशक लासा कौल की निर्मम हत्या के साथ ही आतंक अपने चरम पर पहुँच गया था। उस समय आतंकवादियों के निशाने पर सिर्फ और सिर्फ कश्मीरी पंडित ही थे। इसके चलते 19 जनवरी, 1990 को लगभग तीन लाख कश्मीरी पंडितों को अपना सब कुछ छोड़कर घाटी से बाहर जाने को विवश होना पड़ा।

बहरहाल, आतंकवादियों की नई पौध को भी कश्मीरी पंडित खटकते हैं। कश्मीर में अन्य जगहों के मुकाबले त्राल में आतंकियों का कहीं बड़ा गढ़ है। 31 साल पहले कश्मीरी पंडितों पर जो अत्याचार हुआ, उस समय की सरकार कट्टरपंथियों के आगे तमाशबीन बनी रही। आखिर क्यों और ​कब त​क अपने ही घरों से कश्मीरी पंडितों को भागने के लिए मजबूर होना पड़ेगा?

कश्मीर में अब कोई और कश्मीरी पंडित न मारा जाए, इसके लिए घाटी को आतंकवाद की जंजीरों से मुक्त कराना बेहद जरूरी हो गया है। मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 और उसकी धारा 35 ए को समाप्त करके उससे विशेष राज्य का दर्जा छीनकर आतंकवादियों के साथ वहाँ के उग्रवादी संगठनों की कमर पहले ही तोड़ दी है। ऐसे में अब वक्त आ गया है, जब आतंकवाद को एक और ऐसी डोज दी जाए, जिससे उनकी आने वाली नई पीढ़ियाँ भी इस रास्ते पर जाने से पहले तौबा-तौबा करने लगें।

क्या केंद्र ने रोक दी केजरीवाल सरकार की गरीबों के लिए मुफ्त राशन वितरण योजना? तथ्यों के साथ जानें पूरा सच

अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार ने 5 जून को, केंद्र सरकार पर राशन की डोर-टू-डोर डिलिवरी के प्रस्ताव को खारिज करने का आरोप लगाया। आम आदमी पार्टी ने आधिकारिक अकाउंट्स से कई ट्वीट करते हुए केंद्र सरकार पर हमला बोला। ट्वीट में दिल्ली सरकार ने आरोप लगाया कि उपराज्यपाल ने केंद्र सरकार से मंजूरी न मिलने जैसे बहाने बनाकर प्रस्ताव को खारिज कर दिया।

आप ने दावा किया कि केंद्र सरकार मंजूरी न मिलने की आड़ में गरीबों को मुफ्त राशन देने से इनकार कर रही है।

आप ने दावा किया कि केजरीवाल दशकों से राशन माफिया के खिलाफ ‘लड़ाई’ लड़ रहे थे और मोदी सरकार उन्हें रोक नहीं सकती। बता दें कि आम आदमी पार्टी के पूर्व विधायक और समाज कल्याण मंत्री संदीप कुमार पर राशन कार्ड के लिए सेक्स रैकेट में शामिल होने का आरोप लगा था। एक सेक्स टेप में महिला ने आरोप लगाया था कि आप नेता ने राशन कार्ड देने के बहाने उसका यौन शोषण किया था।

आप ने पीएम मोदी पर आरोप लगाया और सवाल किया कि ‘राशन माफिया’ के साथ उनकी ‘सेटिंग’ क्या है जिसके कारण वह दिल्ली सरकार की राशन योजना को लागू नहीं होने दे रहे हैं।

‘दिल्ली सरकार को राशन बाँटने से किसी ने नहीं रोका’

भारत सरकार ने केजरीवाल सरकार के इन आरोपों का खंडन किया और कहा कि उन्होंने दिल्ली सरकार को अपनी इच्छानुसार राशन वितरित करने से नहीं रोका है। केंद्र सरकार के सूत्रों ने कहा कि राज्य को किसी भी योजना के तहत खाद्यान्न वितरित करने का अधिकार है। राज्य द्वारा माँगे जाने पर भारत सरकार वितरण के लिए अतिरिक्त राशन भी प्रदान करती है।

एलजी (लेफ्टिनेंट गवर्नर) ने योजना को केवल पुनर्विचार के लिए लौटाया है, न कि ‘अस्वीकार’ किया है, जैसा कि दिल्ली सरकार द्वारा बताया जा रहा है। इसके अलावा, एलजी कार्यालय ने कहा कि चूँकि अनुमोदन खाद्य वितरण की दिशा को बदलने का प्रयास करता है, ऐसे में इसे राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 के अनुसार केंद्र सरकार की मँजूरी के बाद ही लागू किया जा सकता है।

सूत्रों के अनुसार, दिल्ली सरकार ने एनएफएसए का अपना सारा कोटा यानी 37,400 मीट्रिक टन अनाज उठा लिया है और उसका 90% वितरित भी कर दिया है। इसके अलावा, सरकार ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना (पीएमजीकेएवाई) के तहत 63,200 मीट्रिक टन राशन उठाया, जो मई में आवंटित अनाज का 176% है। राज्य ने इसका 73% वितरण किया है।

भारत सरकार अनुरोध पर अतिरिक्त राशन प्रदान करती है

भारत सरकार अनुरोध करने पर राज्य को अतिरिक्त राशन प्रदान करती है। दिल्ली के मामले में, भारत सरकार वितरण के लिए दिल्ली को अतिरिक्त राशन देने के लिए तैयार है, और दिल्ली सरकार इसे अपनी इच्छानुसार वितरित करने के लिए स्वतंत्र है। सूत्रों ने कहा, ”भारत सरकार नागरिकों को सरकार की किसी भी कल्याणकारी योजना से वंचित क्यों करेगी? राशन वितरित करने की किसी भी योजना को कोई भी नाम दीजिए, और भारत सरकार अतिरिक्त राशन प्रदान करेगी।” हालाँकि, एनएफएसए के तहत मौजूदा अखिल भारतीय योजना को बाधित करने की कोई जरूरत नहीं है।

भारत सरकार किसी भी राज्य के साथ भेदभाव नहीं करती है। यह एक समान राष्ट्रीय अधिनियम के तहत देश के सभी राज्यों के साथ समान व्यवहार करती है। ध्यान देने वाली बात ये है कि, दिल्ली सरकार अनाज वितरण के लिए राष्ट्रीय स्तर पर प्रशासित कार्यक्रम को सँशोधित करना चाहती है और पिसाई इत्यादि का खर्च दिल्ली के उपभोक्ताओं पर डालना चाहती है। केंद्र सरकार ने दिल्ली सरकार को केवल नियम की स्थिति के बारे में सूचित किया।

दिल्ली सरकार ONORC के तहत लाभ प्रदान करने में विफल रही

सरकार के सूत्रों ने बताया कि दिल्ली सरकार भारत सरकार द्वारा कई बार याद दिलाने के बावजूद दिल्ली में वन नेशन वन राशन कार्ड (ONORC) योजना को लागू करने में विफल रही। यदि इसे ठीक से लागू किया जाता, तो इससे दिल्ली में एक लाख से अधिक प्रवासी श्रमिकों की मदद हो सकती थी, वह भी दिल्ली के बजट में बिना किसी अतिरिक्त लागत के, क्योंकि राशन राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (NFSA) के तहत आवंटित किया गया था।

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार (GNCTD) ने 2018 में, लगभग 2000 उचित मूल्य की दुकानों (FPS) में EPOS (इलेक्ट्रॉनिक पॉइंट ऑफ सेल) मशीनों के उपयोग को सस्पेंड कर दिया। केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई कई दौर की बातचीत के बाद, आप के नेतृत्व वाली दिल्ली सरकार ने अब इसे फिर से दुकानों पर स्थापित कर दिया है। हालाँकि, अब भी उनमें से ज्यादातर ऑनलाइन पीडीएस ट्रांजैक्शन के लिए पूरी तरह काम नहीं कर रहे हैं। सूत्रों ने कहा, ”यह सीधे तौर पर एनएफएसए और पीएमजीकेए के तहत पारदर्शिता और सही काम के लक्ष्यों को कमजोर करता है। जबकि पीडीएस लेनदेन के आधार प्रमाणीकरण का राष्ट्रीय औसत लगभग 80 प्रतिशत है, जबकि यह दिल्ली में शून्य है। यह सीधे तौर पर दिल्ली में लाखों प्रवासियों को पोर्टेबिलिटी के लाभों से वँचित करता है और साथ ही खाद्यान्न के इधर-उधर होने को बढ़ावा देता है।”

अब चूँकि दिल्ली में ईपीओएस का ठीक से उपयोग ही नहीं किया जाता है, तो भारत सरकार को दैनिक आधार पर खाद्यान्न वितरण डेटा नहीं मिल पाता है, जो राशन आवंटन में बाधा उत्पन्न करता है। दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्य न केवल ईपीओएस प्रणाली का उपयोग कर रहे हैं बल्कि टीपीडीएस और पीएमजीकेएवाई के तहत 95% से अधिक आधार प्रमाणित ट्रांजैक्शन कर रहे हैं। अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा जैसे राज्यों ने अपने एफपीएस पर 100% ईपीओएस मशीनें लगा दी हैं, जिससे केंद्र सरकार के लिए रियल टाइम में एनएफएसए खाद्यान्न वितरण की निगरानी करना आसान हो गया है। सूत्रों ने कहा कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार का खाद्य विभाग इन मुद्दों पर केंद्र सरकार की बातचीत के प्रति सक्रिय और सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दे रहा है।

‘वन नेशन वन राशन कार्ड’ असली समाधान है

भारत सरकार ने दिल्ली सरकार द्वारा लगाए गए आरोपों का स्पष्ट खंडन किया और उन्हें निराधार बताया। भारत सरकार ने डोरस्टेप डिलीवरी की प्रस्तावित राज्य योजना को अवरुद्ध नहीं किया है। सूत्रों ने कहा, ”एनएफएसए के तहत शामिल सभी सही लाभार्थियों और प्रवासियों के लाभ के लिए और दिल्ली राज्य में पीडीएस के कामकाज को परिष्कृत करने के लिए यहाँ वन नेशन वन राशन कार्ड (ओएनओआरसी) योजना को लागू करना ही असली समाधान है।”

हिंदू-मुस्लिम एंगल देकर सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट रोकने की साजिश: विधायक, कलाकर, मीडिया… सब इस खेल में शामिल

सर्वोच्च न्यायालय और दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को हरी झंडी दिए जाने के बाद अब इस मामले को सांप्रदायिक रंग देने की भोंडी शरारत हो रही है। पहले सुप्रीम कोर्ट और एक हफ्ते पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने इस प्रोजेक्ट को राष्ट्रीय महत्व का प्रोजेक्ट बताते हुए इस पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। दिल्ली उच्च न्यायालय ने तो इस प्रोजेक्ट को रोकने की याचिका करने वालों पर ₹100000 का जुर्माना भी लगाया था।

प्रोजेक्ट का विरोध करने वाले यहीं पर रुके नहीं हैं। अब इसे हिंदू-मुस्लिम का रंग देकर सांप्रदायिकता भड़काने की कोशिश हो रही है। एक तरफ आम आदमी के चर्चित विधायक अमानुल्लाह खान ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखकर सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के इलाके की 3 मस्जिदों को नुकसान पहुँचने पर चेतावनी भरा पत्र लिखा है। दूसरी ओर ब्रिटेन से छपने वाले ‘द गार्डियन अखबार’ में सेंट्रल विस्टा को ‘हिन्दू तालिबानी’ प्रोजेक्ट बताया गया है। अखबार के 5 जून के अंक में छपे इस लेख में सारी पत्रकारीय मर्यादाएँ तोड़ते हुए प्रधानमंत्री मोदी को आज का औरंगजेब, हिटलर और तालिबानी जैसा बताया है।

पहले बात अमानुल्लाह खान की चिट्ठी की। आम आदमी पार्टी के विधायक अमानुल्लाह खान अपनी गुंडागर्दी के लिए जाने जाते हैं। आपको बताना जरूरी है कि इन्हीं पर 2018 की फरवरी में दिल्ली के तत्कालीन मुख्यसचिव अंशु प्रकाश के साथ मारपीट के इल्जाम हैं। इस बहुचर्चित केस में दिल्ली के मुख्य सचिव के साथ मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के आवास में रात को 12:00 बजे बुलाकर मारपीट की गई थी। अंशु प्रकाश की लिखित शिकायत में इस मामले में अमानुल्लाह खान को नामजद किया गया था।

इन्हीं अमानुल्लाह खान ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी है। 03 जून की तारीख वाली इस चिट्ठी में उन्होंने चेतावनी दी है कि सेंट्रल विस्टा में आने वाली तीन मस्जिदों को कोई नुकसान नहीं पहुँचना चाहिए। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी से 10 दिन में इस पर जबाव माँगा है।

आम आदमी पार्टी से पूछना बनता है कि अगर सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट में पड़ने वाले धार्मिक स्थलों के बारे में चिंता है तो फिर पार्टी विधायक को वहाँ के मंदिरों, गुरुद्वारों और गिरजाघरों का भी जिक्र करना चाहिए था। क्या धार्मिक भावनाएँ सिर्फ मुसलमानों की होती हैं?

राष्ट्रीय महत्व के इस प्रोजेक्ट को हिन्दू और मुसलमान के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। सवाल है कि यह चिट्ठी अमानुल्लाह खान जैसे कुख्यात विधायक से क्यों लिखवाई गई? अगर आम आदमी पार्टी को इस प्रोजेक्ट से शिकायत है तो पार्टी दूसरे तरीके से भी इस मामले को उठा सकती थी।

आम आदमी पार्टी को खैर दिल्ली में हिंदू-मुसलमान वोटों की राजनीति करनी है। पर ‘द गार्डियन’ जैसे ब्रिटेन से छपने वाले अंग्रेजी अखबार को क्या हो गया कि उसके लेख में सारी पत्रकारीय लक्ष्मण रेखाएँ लाँघ दी गईं। इंग्लैंड की नागरिकता रखने वाले आर्किटेक्ट अनीश कपूर का ये लेख कई अनर्गल तर्क और झूठ परोसता है।

इस तर्क को आप क्या कहेंगे कि मोदी सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट इसलिए बनवा रहे हैं क्योंकि वे मुसलमानों से घृणा करते हैं। बहुत ही बचकाने तरीके से इस लेख में मौजूदा संसद भवन और राजपथ की अन्य सभी इमारतों को इस्लामी बताया गया है। इन्हें “दुनिया की इस्लाम प्रभावित सबसे महत्वपूर्ण निशानी” बताते हुए वे लिखते हैं कि “मोदी भारत की सभी इस्लामिक इमारतों और 20 करोड़ मुसलमानों को नेस्तनाबूद करने से कम कुछ भी नहीं चाहते।”

उनका झूठ यहीं नहीं रुकता। वे कहते हैं कि “हमें नहीं भूलना चाहिए कि उन्होंने (मोदी ने) ज़ोर ज़बरदस्ती से लाखों भारतीय मुसलमानों की नागरिकता छीनकर उन्हें राज्य-विहीन बना दिया है।” ये झूठ छापने से पहले गार्डियन को इसकी पुष्टि करनी चाहिए थी।

समझ में नहीं आता कि अपने को प्रतिष्ठित कहने वाले द गार्डियन जैसे 200 साल पुराने अखबार ने ये सफ़ेद झूठ अपने यहाँ क्यों छपने दिया। या फिर ये माना जाए कि ये अखबार और इसके संपादक भी सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को सांप्रदायिक रंग देने के इस राजनीतिक खेल में शामिल हैं?

ध्यान देने की बात है कि इसी व्यक्ति ने 12 मई को एक खुला पत्र लिखकर भारत सरकार से सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को रोकने की माँग की थी। उनके साथ कोई 76 कथित बुद्धिजीवियों ने इस पत्र पर हस्ताक्षर किए थे। इस पर हताक्षर करने वालों में अधिकतर रोमिला थापर जैसे वामपंथी विचार वाले लोग ही थे।

इस पत्र में कहा गया था कि कोरोना के कारण दिल्ली में कई खतरे हैं। कोरोना को देखते हुए सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को फिलहाल रोक देना चाहिए। इसी तर्क के आधार पर दायर अन्या मल्होत्रा और सोहेल हाशमी की याचिका पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने सुनवाई की थी। इन मुद्दों को सिलसिलेवार ढंग से निपटाते हुए हाई कोर्ट के निर्णय में स्पष्ट कर दिया गया कि राष्ट्रीय महत्व के इस प्रोजेक्ट को रोकना ठीक नहीं होगा। इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय इस प्रोजेक्ट को हरी झंडी दे ही चुका था।

लगता है प्रोजेक्ट का विरोध करने वालों के लिए भारत की न्यायपालिका का कोई मोल नहीं है। क्योंकि गार्डियन के लेख में अदालतों की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर अवमानना पूर्ण टिप्पणी की गई है। सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को ‘मूर्खतापूर्ण’ कहते हुए लिखा गया है कि “भारतीय अदालतों पर दबाव डालकर इस मूर्खतापूर्ण योजना (सेंट्रलविस्टा) पर हामी भरवाई गई है…”

उच्च न्यायालय के फैसले को एक हफ्ता भी नहीं बीता है कि जो लोग कोरोना के नाम पर सेंट्रल विस्टा का विरोध कर रहे थे, उन्हीं ने अब इसे हिंदू-मुस्लिम का रंग देना शुरू कर दिया है। शक पैदा होता है कि क्या प्रोजेक्ट का विरोध करने वाले भारत के लोकतंत्र में सचमुच में आस्था रखते हैं?

आप प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों से सहमत नहीं है, इसमें कोई बड़ी बात नहीं है। प्रजातंत्र में ऐसा होता ही है। परंतु आप एक प्रोजेक्ट के विरोध के बहाने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र और सबसे प्राचीन विरासत वाले राष्ट्र के चुने हुए प्रधानमंत्री को तकरीबन गाली-गलौज देने पर उतर आए हैं। यह बात अशोभनीय, अमर्यादित और अलोकतांत्रिक है। इसे हिंदू-मुस्लिम का रंग देने वाले भारत की स्वतंत्र और निष्पक्ष न्याय प्रणाली का अपमान तो कर ही रहे हैं, वे इस देश की लोकतांत्रिक मर्यादाओं, परंपराओं, आत्मसम्मान और गौरव का भी मज़ाक उड़ा रहे हैं। शायद इससे अधिक साम्प्रदायिक और निंदनीय कुछ और नहीं हो सकता।

राजस्थान में पाकिस्तान से जान बचा कर आए हिंदुओं को वैक्सीन नहीं, मुस्लिम आबादी के टीकाकरण के लिए स्पेशल प्रोग्राम

राजस्थान हाई कोर्ट ने पाक विस्थापित हिंदू प्रवासियों का कोरोना वैक्सीनेशन न कराए जाने के लिए राज्य की अशोक गहलोत सरकार को फटकार लगाई है। इस मामले में सुनवाई करते हुए राजस्थान हाई कोर्ट ने गुरुवार (3 जून) को राज्य सरकार की ‘निष्क्रियता’पर नाराजगी जताई।

राजस्थान उच्च न्यायालय ने राजस्थान राज्य सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा कि वह पाकिस्तानी अल्पसंख्यक प्रवासियों, जिनके पास निर्धारित पहचान पत्र नहीं हैं, उन्हें कोविड-19 टीकाकरण के लिए पात्र क्यों नहीं मान रही है।

जस्टिस विजय विश्नोई और जस्टिस रामेश्वर व्यास ने पाया कि उसके 28 मई के आदेश के बावजूद पाकिस्तानी अल्पसंख्यक प्रवासियों का टीकाकरण नहीं किया जा रहा है।

पाक विस्थापित हिंदू टीकाकरण योग्य क्यों नहीं: गहलोत सरकार से HC

कोर्ट ने राजस्थान सरकार से यह बताने को कहा कि वह केंद्र के नियमों द्वारा पाकिस्तान से आए हिंदू प्रवासियों को टीकाकरण के लिए पात्र बनाने के बावजूद उन्हें कोविड टीकाकरण के लिए पात्र क्यों नहीं मान रही हैं।

साथ ही हाई कोर्ट की जोधपुर पीठ ने इस बात पर भी कड़ी आपत्ति जताई कि गहलोत सरकार द्वारा पाकिस्तान से आए हिंदू प्रवासियों सहित निर्धारित पहचान पत्र नहीं रखने वाले लोगों के टीकाकरण के लिए क्या कदम उठाए गए हैं, इसकी जानकारी भी कोर्ट को नहीं दी गई है।

हाई कोर्ट ने कहा कि उसके द्वारा 28 मई को हुई पिछली सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट किया गया था कि किसी वैध पहचान दस्तावेज न होने पर टीकाकरण के लिए लोगों की पहचान के लिए केंद्र की एसओपी पाकिस्तानी प्रवासियों को टीकाकरण के लिए पात्र बनाती है।

पीठ ने कहा, ”यह समझ पाना मुश्किल है कि राजस्थान सरकार केंद्र से और स्पष्टीकरण क्यों माँग रही है और एसओपी में पाकिस्तानी प्रवासियों को शामिल करने का आग्रह क्यों कर रही है।”

हिंदू प्रवासी पात्र नहीं, मुस्लिमों के लिए विशेष टीकाकरण कार्यक्रम

एक ओर जहाँ गहलोत सरकार पाकिस्तानी अल्पसंख्यक प्रवासियों को केंद्र के नियमों और हाई कोर्ट के आदेश के बावजूद कोविड टीकाकरण के लिए पात्र नहीं मान रही है तो वहीं मुस्लिमों के टीकाकरण के लिए अलग से कैंप लगाकर विशेष टीकाकरण कार्यक्रम चला रही है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, राजस्थान में मुस्लिमों में कोरोना टीकाकरण को बढ़ाने और लोगों में फैली तरह-तरह की भ्रांतियों को दूर करने के लिए अब विशेष कैंप लगाए जा रहे हैं।

ऐसे ही कैंप चित्तौड़गढ़ में मंगलवार (1 जून) से छिपा मोहल्ले, यथासमय कच्ची बस्ती और रेलवे स्टेशन के पास स्थित कॉलोनी में आयोजित किए जा रहे हैं। चित्तौड़गढ़ जिला कलेक्टर ताराचंद मीणा ने पूर्व विधायक सुरेन्द्र सिंह जाड़ावत के साथ मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधियों की बैठक बुलाई और कोरोना टीकाकरण के कम कवरेज पर विचार-विमर्श किया।

बैठक के दौरान कलेक्टर ने वैक्सीन के महत्व पर प्रकाश डाला और मुस्लिम समुदाय के लोगों को वैक्सीनेशन के लिए आगे आने का आह्वान किया। इस बैठक में निर्णय लिया गया कि मुस्लिमों में कोरोना वैक्सीनेशन को बढ़ावा देने और इस समुदाय के लोगों में फैली तरह-तरह की भ्राँतियों को दूर करने के लिए अब विशेष कैंप लगाए जाएँगे।

महारानी की रानी भारती ‘काटती’ है, बिहार की राबड़ी देवी ‘कागजी’ थी… फिर हंगामा क्यों बरपा

फिल्म/सीरियल/वेब सीरिज में खासी रूचि नहीं है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कभी ये सब देखी नहीं। कुछ ने तो अजीब छाप भी छोड़ी जो समय के थपेड़ों के साथ मिट गईं। पटना के वीणा टॉकीज में धड़कन देखने के बाद ‘देव’ कुछ इस कदर चढ़ा कि बाहर निकलते ही काले रंग की जींस पैंट-शर्ट खरीद ली। बाटा का 99.99 रुपए वाला चमड़ा चप्पल खरीदा और उसमें मोची के पास जाकर कई कीलें ठुकवाई। उस मोची ने अजीब नजरों से देखा था। फिर कई महीनों तक उसी ड्रेस में घूमता रहा। इसके बाद कभी जींस पसंद नहीं आई। ऐसे ही जब नेटफ्लिक्स की वेब सीरिज हाउस आफ कार्ड्स (House of Cards) देखी तो कई दिनों तक ‘फ्रैंक अंडरवुड’ दिमाग से निकल ही नहीं पाया। बावजूद कभी इनका नियमित दर्शक नहीं रहा। ऐसे में पिछले दिनों पता चला कि एक वेब सीरिज महारानी नाम से बनी है। यह भी कि इसकी कहानी राबड़ी देवी से जोड़कर देखी जा रही है और इस पर विवाद शुरू हो गया है।

राजनीतिक विषयों को पढ़ने-समझने की रूचि है। लिहाजा साप्ताहिक अवकाश के दिन महारानी देखने का फैसला किया। पता चला कि यह सोनी लाइव (SonyLIV) पर आई है। सोनी लाइव पर गया तो पता चला कि देखने के लिए भगुतान करना होगा। सालाना वाला सबस्क्रिप्शन पैकेज लेकर महारानी के दसों एपिसोड एक ही बैठक में निपटा दिए।

यकीन मानिए यदि इसकी पृष्ठभूमि में बिहार और इससे जुड़ा ताजा विवाद नहीं होता तो मैं इस सीरिज का पहला एपिसोड भी पूरा नहीं कर पाता। बिहार की राजनीति, राजनीति में अपराध और जातिगत घालमेल जैसे विषय पर पहले भी फिल्में आईं हैं। इस लिहाज से महारानी बेहद छिछली कहानी है। दुखद यह है कि जॉली एलएलबी वाले सुभाष कपूर का नाम इस प्रोजेक्ट से जुड़े होने के बावजूद ऐसा है।

रचनाधर्मिता के नाम पर आजादी समझ में आती है। सीरिज में रानी भारती का किरदार निभाने वाली हुमा कुरैशी स​हित इससे जुड़े कई लोगों ने स्पष्ट भी किया है कि इसकी कहानी किसी के जीवन से प्रभावित नहीं है। लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं है कि रचनाधर्मिता और कल्पना की आजादी इतनी छिछली हो जाए कि ‘कठपुतली’ काटने लगे। ऐसा होने पर सब कुछ अपच हो जाता है।

कठपुतली का काटना पहले ही पहले ही एपिसोड से शुरू हो जाता है, जब वह मुख्यमंत्री भीमा शंकर के लिए घर के दरवाजे बच्चों की मनुहार के बाद खोलती है। उसे दूध दुहने और बाजार में बेचने को मजबूर करती है। वेटनरी कॉलेज सर्वेंट क्वार्टर में रहने वाली राबड़ी देवी भले रानी भारती की तरह अँगूठा छाप और भीमा के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी नीरज कुमार (जिसे असल जीवन का नीतीश कुमार बताया जा रहा) के शब्दों में कहें तो अनपढ़-गँवार रही हों पर वे इतनी भी अनभिज्ञ न रही होंगी कि पति का मुख्यमंत्री होना या 1 अणे मार्ग (बिहार का मुख्यमंत्री आवास) में रहना क्या होता है, इसका अहसास नहीं रहा हो।

कठपुतली केवल पहले ही एपिसोड में ही नहीं काटती। आखिरी एपिसोड तक काटती है। अपने ही पति पूर्व मुख्यमंत्री भीमा भारती को गिरफ्तार तक करवा देती है। उससे पहले पति का नाम लेने की बजाए उन्हें ‘साहेब’ कहने के लिए पार्टी अध्यक्ष (जिसे सब पीठ पीछे काला नाग कहते हैं) से अस्पताल में भिड़ जाती है, गवर्नर के घर में एक तरह से देर रात रेड मारती है, घोटाले को उजागर करती है, वगैरह वगैरह।

यह सच है कि मुख्यमंत्री बनते समय राबड़ी देवी कुछ-कुछ रीना भारती जैसे ही अटकती थीं। राजकाज का आइडिया नहीं था। साहेब और साहेब के द्वारा तैनात अधिकारियों और मंत्रियों पर आश्रित थीं। तवलीन सिंह को दिए एक वीडियो इंटरव्यू में भी उनकी यह अक्षमता, असमर्थता और अटकना दिखता है। लेकिन, दूसरा सत्य यह भी है कि राबड़ी देवी में रानी भारती की तरह काटने का साहस होता तो बिहार की वो दुर्गति नहीं हुई होती जिसे हम अपनी विस्मृतियों से मिटा देना चाहते हैं। जंगलराज का वो टैग नहीं लगता जिससे बिहार आज भी सिहरता है।

नेशनल अवॉर्ड विजेता फिल्म समीक्षक विनोद अनुपम ने दैनिक भास्कर को दिए एक इंटरव्यू में कहा है कि इस सीरिज में राबड़ी राज की इमेज बनाने के लिए सवर्णों को नीचा दिखाने की कोशिश की गई है। उनकी बातों में दम है। लेकिन हमारे मनोरंजन इंडस्ट्री की यह बीमारी पुरानी है। आर्टिकल 15 यूपी की एक सत्य घटना से प्रेरित बताई जाती है। लेकिन, असल घटना के आरोपित किसी और जाति के थे, जिन्हें फिल्म में सवर्ण दिखाया गया है। मनोरंजन इंडस्ट्री में रचनाधर्मिता के नाम पर सर्वर्णों को अत्याचारी, क्रूर, चोर, बेईमान, भ्रष्ट और न जाने क्या-क्या दिखाने का चलन पुराना है। महारानी ने ईमानदारी से उस परंपरा का निर्वाह किया है। वित्त सचिव परवेज आलम के तौर पर ‘ईमानदार मुस्लिम’ को पेश करने की परंपरा का भी ख्याल रखा गया है। यह भी अजीब संयोग है कि महारानी के रिलीज होने से चंद दिन पहले ही सेनारी में सवर्णों के हुए नरसंहार, जिसमें 18 मार्च 1999 की रात 34 लोगों का गला काटा और पेट चीरा गया था, हाई कोर्ट ने किसी को दोषी नहीं माना था।

इस वेब सीरीज की स्क्रिप्ट लिखने वाले उमाशंकर सिंह ने दैनिक भास्कर को दिए एक इंटरव्यू में कहा है कि इसकी कहानी कट्टर जातिवादियों को ही नागवार गुजरी है। पर विवाद जातीय से ज्यादा इसकी कहानी को लेकर राजनीतिक है।

रानी भारती के किरदार को राबड़ी देवी से जोड़े जाने को लेकर उनकी बेटी रोहिणी आचार्य ने खासी नाराजगी दिखाई है। माँ का बचाव करते हुए उन्होंने कुछ ट्वीट किए हैं। इनमें से एक में उन्होंने राबड़ी देवी के शासनकाल में महिलाओं को पीरियड के समय दो दिन की छुट्टी देने को ऐतिहासिक बताते हुए कहा है कि वे बिहार की पहली और इकलौती मुख्यमंत्री हैं जिन्होंने कामकाजी महिलाओं की पीड़ा समझी। लेकिन ऐसा कर उन्होंने अपनी पूर्व मुख्यमंत्री माँ के लिए कई कठिन सवाल खड़े कर दिए हैं।

आखिर पीरियड का दर्द समझने वाली पहली और इकलौती मुख्यमंत्री जातीय नरसंहारों की विधवाओं का दर्द कैसे नहीं समझ पाईं? शहाबुद्दीन द्वारा तेजाब से नहलाकर मार दिए गए बेटों की माँ का दर्द कैसे नहीं समझ पाईं? फिरौती के लिए अगवा/मारे गए बच्चों के माँ के दर्द को समझकर कानून-व्यवस्था क्यों नहीं दुरुस्त कर पाईं? उन महिलाओं का दर्द कैसे नहीं समझ पाईं जिन्हें कुकृत्य झेलना पड़ा? जदयू के नेता और पूर्व मंत्री नीरज कुमार ने बालिका गृह कांड को लेकर किए गए रोहिणी के ट्वीट के जवाब में ऐसे महिलाओं की संख्या 5263 बताई है।

दरअसल बतौर मुख्यमंत्री राबड़ी देवी की सबसे बड़ी उपलब्धि अपने कुनबा का विस्तार करना था। इसी विस्तार की वजह से बिहार ने साधु और सुभाष देखे। यह सब उस ​दौर में हुआ जब बिहार का हर परिवार उजड़ने को मजबूर था। राबड़ी के मुख्यमंत्री नहीं रहने के बाद ये कुनबा बिखर गया। बतौर पूर्व मुख्यमंत्री वह अपने बड़े बेटे का घर भी नहीं बचा पाईं। कुर्सी ने कठपुतली को परिवार को बाँधकर रखने की जो ताकत दी थी वह कुर्सी के साथ ही चली गई।

महारानी की खासियत यह है कि इसने तोड़-मरोड़कर ही सही चारा घोटाला जिसे इस सीरिज में अन्न घोटाला कहा गया है, में लालू प्रसाद, सॉरी भीमा भारती की संलिप्तता स्वीकार की है। माना है कि जातीय नरसंहार राज बचाने की सरकारी साजिश थी और इसके एक पक्ष को सरकार का संरक्षण हासिल था।

महारानी के आखिरी एपिसोड में भीमा भारती कहता है, स्वर्ग नहीं दे पाए तो क्या स्वर तो दिया। लालू यादव ने राबड़ी को मुख्यमंत्री बनाकर जो स्वर दिया वह बाद के वर्षों में एक सभा में नीतीश कुमार और ललन सिंह का रिश्ता बताने में प्रस्फुटित होते बिहार ने देखा था। शायद यह पहली चीज थी जो उन्होंने बिना लालू के इशारे पर की और इसकी सजा लालू को सार्वजनिक तौर पर माफी माँगकर भुगतनी पड़ी थी।

तमाम खूबियों के साथ लोकतंत्र की कुछ विसंगतियाँ भी हैं। राबड़ी देवी का मुख्यमंत्री बनना इन्हीं विसंगतियों की उपज थी। जो लोकतंत्र के लिए हमेशा एक स्याह धब्बा ही रहेगा और जिसे भोगा पूरे बिहार ने। काश राबड़ी देवी, महारानी की रानी भारती जैसे काटतीं।

TMC सांसद नुसरत जहां हैं प्रेग्नेंट, पति ने कहा – ‘6 महीने से साथ नहीं, मेरा बच्चा नहीं’: ममता बनर्जी ने OK किया था एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर

टीएमसी सांसद और बंगाली एक्ट्रेस नुसरत जहाँ कथित तौर पर प्रेग्नेंट हैं और अपने पहले बच्चे के जन्म का इंतजार कर रही हैं। हालाँकि न तो नुसरत और न ही उनकी टीम ने इस खबर की पुष्टि की है लेकिन उनकी प्रेग्नेंसी से जुड़ी खबर पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया में छाई है।

कई बंगाली मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, नुसरत जहाँ छह महीने की प्रेग्नेंट हैं। हालाँकि उन्होंने इस बारे में अब तक कुछ नहीं कहा है।

पति को नहीं है नुसरत जहाँ की प्रेग्नेंसी के बारे में कुछ भी पता

लेकिन नुसरत के पति निखिल ने मीडिया से कहा है कि उन्हें नुसरत की प्रेग्नेंसी के बारे में कुछ नहीं पता है। उन्होंने नुसरत के बच्चे का पिता होने से भी इनकार किया। निखिल ने दावा किया कि नुसरत की प्रेग्नेंसी की खबर से वह खुद भी हैरान हैं।

नुसरत जहाँ और निखिल ने 19 जून 2019 को टर्की में एक शाही विवाह समारोह में शादी की थी। उन्होंने इस्लाम, हिंदू और ईसाई धर्मों की परंपराओं के अनुसार शादी की थी। हालाँकि उनकी ये शादी ज्यादा दिन नहीं चली और एक साल बाद ही उनके बीच अनबन की खबरें आने लगीं।

नुसरत के पति निखिल ने एबीपी आनंदा से कहा कि उनकी और नुसरत की शादी टूट गई है और वे छह महीने से ज्यादा समय से साथ नहीं रह रहे हैं। ऐसे में किसी भी तरह से ये बच्चा उनका नहीं है। निखिल ने ये भी कहा कि उनके और नुसरत के बीच कोई संपर्क नहीं है।

नुसरत की निजी जिंदगी पिछले कुछ महीनों से ट्रैक पर नहीं रही है। हालाँकि वह अपने पति निखिल से कानूनी तौर पर अलग नहीं हुई हैं लेकिन वे कई महीनों से साथ नहीं रह रहे हैं। निखिल ने कहा, “मैं इस बारे में कुछ नहीं जानता। मेरा उससे लंबे समय से कोई संबंध नहीं है। यह स्पष्ट है कि यह बच्चा मेरा नहीं है।”

निखिल और नुसरत ने मीडिया में अपने रिश्तों में आई खटास को लेकर कभी कुछ नहीं। ऐसे में ये स्पष्ट नहीं है कि लव मैरिज करने वाले इस कपल के रिश्तों में खटपट किस वजह से हुई। अनबन के बाद करीब छह महीने पहले नुसरत निखिल के अलीपुर स्थित घर को छोड़कर अपने घर आ गई थीं।

यश दासगुप्ता के साथ रिलेशनशिप में है नुसरत जहाँ?

नुसरत कथित तौर पर बीजेपी उम्मीदवार रहे और एक्टर यश दासगुप्ता के साथ रिलेशनशिप में हैं। ये दोनों ‘एसओएस कोलकाता’ की शूटिंग के दौरान करीब आए थे। रिपोर्ट्स के मुताबिक, नुसरत और यश दिसंबर में अजमेर शरीफ गए थे और उन्होंने नया साल साथ में राजस्थान में मनाया था, साथ ही ये दोनों दक्षिणेश्वर मंदिर भी गए थे। इसके बाद दोनों कई बार साथ वक्त गुजारते देखे गए।

नुसरत यश के साथ अपने रिश्ते को धीरे-धीरे सोशल मीडिया में स्वीकार भी कर रही हैं। नुसरत और यश सोशल मीडिया पर एकदूसरे के साथ काफी तस्वीरें पोस्ट करते रहते हैं, जो उनके कथित रिश्ते की अटकलों को और हवा देने का काम कर रहे हैं।

नुसरत जहाँ टीएमसी की सांसद हैं तो वहीं यश दासगुप्ता बीजेपी के टिकट पर 2021 विधानसभा चुनावों में चंडीतल्ला से चुनाव लड़े और हार गए। ऐसे में नुसरत-यश की करीबी और प्रेग्नेंसी की खबर आने वाले समय में बंगाल में एक बड़ा राजनीति और सामाजिक मुद्दा बनने वाला है।

ममता बनर्जी ने दी थी एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर की इजाजत

नुसरत जहाँ की पार्टी टीएमसी की सुप्रीमो और बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अतीत में महिलाओं के एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर की वकालत कर चुकी हैं। इस साल की शुरुआत में ममता बनर्जी का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें उन्होंने कहा था कि उनके विचार इतने खुले है कि उन्होंने शादी-शुदा महिलाओं को अपनी पसंद के पुरुषों के साथ एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर रखने की अनुमति दे दी है।

पश्चिम बंगाल की CM ने बांग्ला भाषा में कहा, ”मैं सभी गृहिणियों को यह बताना चाहती हूँ कि, यदि आप कभी भी एक्स्ट्रा-मैरिटल संबंध में रहना चाहती हैं, तो आप यह कर सकती हैं। इसके लिए मैं आपको अनुमति दूँगी।”

शिंगणवाडी का संत, जिनके बताए मार्ग पर चलते थे छत्रपति शिवाजी, चरणों में अर्पित कर दिया था पूरा राज्य: नकारते हैं वामपंथी

भारत में एक के बाद एक महान हिन्दू शासक हुए हैं, जिन्होंने न सिर्फ युद्धभूमि में अपनी वीरता दिखाई, बल्कि धर्म के अनुसार शासन के लिए साधु-संतों की सलाह को प्राथमिकता दी। लेकिन, आज के वामपंथी न तो चन्द्रगुप्त मौर्य और चाणक्य के संबंधों को स्वीकार कर पाते हैं और न ही छत्रपति शिवाजी महाराज और समर्थ रामदास के। वो कहते हैं कि चाणक्य का कोई अस्तित्व ही नहीं था। वो कहते हैं कि छत्रपति शिवाजी और समर्थ रामदास अलग-अलग काल में थे।

जून 6, 1674 ही वो दिन था (ज्येष्ठ त्रयोदशी, 1596), जब लाखों लोगों की उपस्थिति में जयकारे के साथ शिवाजी का ‘छत्रपति’ के रूप में राज्याभिषेक हुआ था। जहाँ समर्थ रामदास का जन्म 1608 में हुआ है, छत्रपति शिवाजी उनके 22 वर्ष बाद जन्मे थे। 1680 में छत्रपति का निधन हुआ और इसके 1 साल बाद संत समर्थ रामदास का। फिर वामपंथी किस मुँह से दावा करते हैं कि दोनों का काल अलग-अलग था। असल में छत्रपति शिवाजी के राजनीतिक जीवन के दिशा-निर्देशक समर्थ रामदास ही थे।

महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री शरद पवार ने एक बार भाषण देते हुए इन दोनों के सम्बन्ध को नकार दिया था। उन्होंने कहा था कि ये झूठ है कि समर्थ रामदास, शिवाजी के गुरु थे और उन्होंने ही शिवाजी के व्यक्तित्व को तराशा। उन्होंने कहा था कि निष्पक्ष इतिहास में दोनों का समयकाल अलग-अलग मिलता है और चंद लोगों का उस समय कलम पर कब्ज़ा था, जिन्होंने ये थ्योरी गढ़ी। ब्राह्मणों और हिन्दू साधु-संतों के विरुद्ध इनके मन में ऐसी घृणा है कि ये उनके योगदान को स्वीकार कर ही नहीं पाते।

शिवाजी का राज्याभिषेक रायगढ़ में हुआ था, जो कोंकण में स्थित है। माँ जीजाबाई के लिए ये बहुत बड़ा क्षण था क्योंकि उनका बेटा औरंगज़ेब की कैद में मौत के मुँह से निकल कर आया था और वो अब राजमाता बन गई थीं, लेकिन इस कार्य में अपना रक्त बहाने वाले वीरों को वो याद करना नहीं भूलीं। हालाँकि, इस राज्याभिषेक के 12वें दिन उनका निधन हो गया था। लेकिन, छत्रपति शिवाजी माता के बताए आदर्शों पर चलते रहे।

समर्थ रामदास और शिवाजी के मुलाकात की कहानी भी दिलचस्प है। जब रामभक्त रामदास ने हनुमान जी की मूर्ति की स्थापना कर धार्मिक स्वतंत्रता की ओर कदम बढ़ाया था, उसी काल में तोरण दुर्ग जीत कर शिवाजी ने औरंगजेब के खिलाफ स्वतंत्रता का बिगुल बजाया था। शिवाजी को जब समर्थ रामदास के बारे में पता चला तो उन्होंने उन्हें मिलने के लिए पत्र भेजा। संदेश मिलते ही संत रामदास ने अपना प्रत्युत्तर भेजा।

इस पत्र में भारतवर्ष के महान संत ने लिखा कि उन्होंने देशाटन के समय कई राजा देखे हैं, लेकिन दिल्ली के मुग़ल दरबार के सामने सब भीगी बिल्ली बने रहते हैं। समर्थ रामदास ने स्पष्ट कर दिया कि उन्हें शिवाजी में शक्ति और युक्ति से सज्जित एक धर्म रक्षक की छवि दिखती है, जबकि उत्तर के कई राजाओं को धर्म की चिंता नहीं। उन्होंने धर्म स्थापना के पुनीत कार्य में शिवाजी का सहयोग माँगा। ये पढ़ कर शिवाजी आह्वादित हो गए।

कहते हैं कि उन्होंने फिर से इसके प्रत्युत्तर में पत्र तो लिखा लेकिन समर्थ रामदास से मिलने के लिए इतने अधीर हो उठे कि खुद ही पत्र लेकर चाफल के श्रीराम मंदिर के नीचे की पहाड़ी पर शिंगणवाडी के जंगलों में पहुँच गए। इसके बाद समर्थ रामदास जैसे शिवाजी के आध्यात्मिक ही नहीं बल्कि राजनीतिक दिशा-निर्देशक बन गए। उन्होंने भगवान श्रीराम का नाम लेकर छत्रपति को उनकी मनोकामनाओं की पूर्ति का आशीर्वाद दिया था।

तभी तो औरंगज़ेब की कैद से छूटने के बाद जिन लोगों ने शिवाजी को स्वदेश लाने में मदद की, उनमें समर्थ रामदास का बड़ा रोल था। शिवाजी ने राज्याभिषेक भी उनकी ही सलाह पर किया और सबसे पहले राजचिह्न उन्हें ही भेंट में दिया। इतना ही नहीं, वो राज्याभिषेक के बाद परिवार समेत समर्थ रामदास से मिलने पहुँचे। कर्नाटक के युद्ध में वेलूर में वैराग्य के प्रति आकर्षण हो या अफजल खान के छल को परास्त करना, समर्थ रामदास की सलाह हमेशा उनके काम आई। शिवथरगल में आज भी वो जगह मौजूद है, जहाँ समर्थ रामदास ने ‘दशबोध’ का लेखन कार्य किया था।

शिवाजी का समर्थ रामदास से लगाव तो था ही, उसी समय वो संत तुकाराम से भी संपर्क में थे। ये वो समय था, जब दक्षिण में भी मराठा शक्तिशाली हो रहे थे और मराठी भाषा का प्रभाव बढ़ रहा था। इस्लामी आक्रांताओं का प्रभाव कम हो रहा था। औरंगज़ेब दक्षिण जीतना का ख्वाब पाले बैठा था, लेकिन बुढ़ापे तक उसकी ये इच्छा अधूरी ही रही। डेक्कन-डेक्कन करते हुए बूढ़े औरंगेजेब की मौत हुई और मराठा पूरे भारत में छा गए।

साहूजी और फिर बाजीराव ने जब दिल्ली तक मराठा साम्राज्य का विस्तार किया, तब शिवाजी भले इस धरती पर मौजूद नहीं थे लेकिन दिव्यलोक में अपने प्रयासों को फलीभूत होते देख उन्हें प्रसन्नता तो ज़रूर हुई होगी। वसंतराव वैद्य ने श्री शिव-समर्थ भेंट नामक पुस्तक लिखी है, जिसे ‘श्रीराम देवस्थान ट्रस्ट ऑफ चफल’ द्वारा प्रकाशित किया गया था। इस पुस्तक में वैद्य लिखते हैं कि शिवाजी महाराज ने समर्थ के 11 मारुति मंदिरों में से प्रत्येक को 11 बीघा जमीन दी थी।

तब शिवाजी द्वारा लिखे गए कुछ अंशों से ये भी पता चलता है कि उन्होंने अपना राज्य समर्थ गुरु रामदास के चरणों में अर्पित कर दिया था। इसे ‘चाफल का चार्टर’ भी कहते हैं। हालाँकि, कुछ इतिहासकार इसे लेकर संदेह भी जताते हैं। शिवाजी महाराज पटगाँव के मौनी महाराज, केल्शी के रामदास स्वामी, याकुतबाबा जैसे कई संतों और महंतों से सलाह लेते थे। आज के इतिहासकार जबरदस्ती शिवाजी को एक अलग प्रकार का ‘सेक्युलर’ साबित करने के प्रयास में लगे रहते हैं।

समर्थ गुरु रामदास के प्रति छत्रपति शिवाजी की भक्ति को दर्शाती राजा रवि वर्मा की पेंटिंग (साभार: https://rajaravivarma.net/)

लेकिन, इन्हीं इतिहासकारों की नजर में हिन्दू महंतों और साधु-संतों से परामर्श लेना ‘सेक्युलरिज्म’ के खिलाफ है। शिवाजी सभी धर्मों का आदर जरूर करते थे, लेकिन हिन्दू धर्म के राज्य की स्थापना ही उनका उद्देश्य था और साधु-संतों की शिक्षा ही उनके लिए जीवन जीने का मार्ग। लेकिन, वामपंथी इतिहासकार ये सब तभी मानेंगे जब डच, अंग्रेजों, इस्लामी आक्रांताओं और पुर्तगालियों ने कुछ ऐसा लिखा हो।

अब इन चारों ने समर्थ रामदास और शिवाजी संबंधों के बारे में नहीं लिखा तो वामपंथी इतिहासकार स्थानीय स्रोतों और इतिहास के साक्ष्यों को भी नकारने से गुरेज नहीं करते। इन्हें भारत के इतिहास के लिए भी विदेशी स्रोत चाहिए। अगर वीर सावरकर ने 1857 पर रिसर्च कर के दोबारा न लिखा होता तो आज ये उसको प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की जगह सिपाही विद्रोह वाले नैरेटिव में ही बहा रहे होते। इस तरह शिवाजी को ‘जाणता राजा’ कहने वाले समर्थ रामदास से उनके संबंधों पर इनकी भौहें तन जाती हैं।

भगवान शिव का ऐसा मंदिर जहाँ हर 12 साल में गिरती है आकाशीय बिजली, हिमाचल प्रदेश का बिजली महादेव

ऑपइंडिया की मंदिरों की श्रृंखला में हम आपका परिचय कई ऐसे मंदिरों से कराते हैं जो दिव्य हैं, चमत्कारिक हैं लेकिन अनसुने हैं। हाल ही में हमने आपको मध्य प्रदेश के एक ऐसे शिव मंदिर के बारे में बताया था, जहाँ शिवलिंग पर मुस्लिम आक्रांता औरंगजेब ने तलवार से प्रहार किया था, लेकिन वहाँ से उसे अपनी सेना के साथ जान बचाकर भागना पड़ा था। आज हम आपको एक ऐसे मंदिर के बारे में बताएँगे, जहाँ हर 12 साल में आकाशीय बिजली शिवलिंग पर ही गिरती है और शिवलिंग कई हिस्सों में टूट जाता है लेकिन यह टूटा हुआ शिवलिंग कुछ दिनों बाद पुनः अपनी मूल अवस्था में लौट आता है।

हिमालय की गोद में बसा हुआ यह बिजली महादेव का मंदिर हिमाचल प्रदेश की कुल्लू घाटी पर स्थित है। शिवलिंग पर बिजली गिरने के कारण ही इस मंदिर का नाम पड़ा बिजली महादेव पड़ा। यह मंदिर व्यास और पार्वती नदी के संगम पर स्थित एक पहाड़ पर बना हुआ है तथा समुद्र तल से 2450 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है।

कुल्लू का पौराणिक इतिहास

इस क्षेत्र के निवासी यहाँ का इतिहास बताते हैं। उनके अनुसार इस क्षेत्र पर कभी कुलांतक नामक एक दैत्य ने कब्जा कर लिया था। विशाल अजगर के शरीर वाला यह दैत्य इस पूरे क्षेत्र को पानी में डुबा देना चाहता था। इस उद्देश्य से उसने व्यास नदी के पानी को रोक दिया था। इस पूरे क्षेत्र की रक्षा करने के लिए अंततः भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से कुलांतक का वध कर दिया। वध के पश्चात कुलांतक का विशाल शरीर एक पहाड़ में बदल गया और इस स्थान का नाम भी उसी दैत्य के नाम से अपभ्रंश के चलते कुल्लू हो गया।

भगवान शिव ने ही इन्द्र देव को आदेश दिया था कि वह इस दैत्य की देह पर हर बारह वर्ष में आकाशीय बिजली गिराएँ। तब से ही प्रत्येक 12 वर्षों में यहाँ आकाशीय बिजली गिरती है। लेकिन इस बिजली से किसी प्रकार का नुकसान न हो, इसलिए भोलेनाथ शिवलिंग के रूप में यहाँ स्थापित हो गए और इन्द्र को अपने ऊपर ही बिजली गिराने के लिए आदेशित किया।

मक्खन से जुड़ जाता है शिवलिंग

बिजली गिरने के बाद मंदिर का शिवलिंग कई टुकड़ों में विभाजित हो जाता है। मंदिर के पुजारी शिवलिंग के टुकड़ों को एकत्र करके मक्खन से उन्हें चिपकाते हैं। यह चमत्कार ही है कि कुछ दिनों के बाद शिवलिंग अपने मूल ठोस स्वरूप में लौट आता है।

कैसे पहुँचें?

हिमाचल प्रदेश की ग्रीष्मकालीन राजधानी शिमला से कुल्लू की दूरी लगभग 200 किमी है। शिमला में ही एक हवाई अड्डा भी है। शिमला से कुल्लू सड़क मार्ग से पहुँचा जा सकता है। हिमाचल प्रदेश की शीतकालीन राजधानी धर्मशाला से कुल्लू की दूरी लगभग 175 किमी है। बिजली महादेव जिस पहाड़ी पर स्थित हैं, उसकी कुल्लू से दूरी लगभग 25 किमी है। कुल्लू से बिजली महादेव तक पहुँचने के लिए बस या टैक्सी उपलब्ध रहती हैं। ये बस या टैक्सी चांसरी तक जाती हैं, जहाँ से 3 किमी की ऊँचाई तक सीढ़ी चढ़ने के बाद बिजली महादेव पहुँच सकते हैं।  

IMA ने जताई Covid-19 किट में बाबा रामदेव के कोरोनिल शामिल करने के सुझाव पर कड़ी आपत्ति, बताया- ‘मिक्सोपैथी’

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) की उत्तराखंड इकाई ने राज्य में Covid-19 किट में पतंजलि की कोरोनिल टैबलेट को शामिल किए जाने के सुझाव पर आपत्ति दर्ज कराई है। इस मामले में IMA उत्तराखंड ने राज्य के मुख्य सचिव को पत्र भी लिखा है।

ज्ञात हो कि बाबा रामदेव की पतंजलि ने उत्तराखंड में वितरित की जाने वाली Covid-19 किट में कोरोनिल टैबलेट को भी शामिल किए जाने का सुझाव दिया था। हालाँकि यह एक सुझाव मात्र था लेकिन IMA ने इस पर कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। IMA का कहना है कि पतंजलि की कोरोनिल टैबलेट न तो डबल्यूएचओ के द्वारा अप्रूव की गई है और न ही DCGI के द्वारा। इसके अलावा IMA ने कहा कि कोरोनिल को फूड सप्लीमेंट के तौर पर ही केंद्र सरकार के आयुष विभाग ने मंजूरी दी है न कि कोरोना वायरस संक्रमण की दवा के तौर पर।

IMA ने यह भी कहा कि आयुर्वेदिक कोरोनिल को एलोपैथिक दवाओं के साथ मिक्स करना मिक्सोपैथी कहलाएगा जो कि सुप्रीम कोर्ट के द्वारा प्रतिबंधित है। ऐसे में Covid-19 किट में कोरोनिल को शामिल किया जाना सुप्रीम कोर्ट की अवमानना की श्रेणी में गिना जाएगा।

इसके अलावा IMA ने नेशनल मेडिकल कमीशन की धारा 34 का हवाला देते हुए कहा कि ऐसी किसी भी प्रकार की प्रक्रिया प्रतिबंधित है। उत्तराखंड के मुख्य सचिव को लिखे गए पत्र में IMA के उत्तराखंड के राज्य सचिव डॉ. अजय खन्ना ने राज्य सरकार से इस मामले में हस्तक्षेप करने और उचित कार्रवाई करने की माँग की है।

हालाँकि, IMA और बाबा रामदेव का यह विवाद सिर्फ कोरोनिल से जुड़ा हुआ नहीं है बल्कि यह तब शुरू हुआ जब बाबा रामदेव एक वायरल वीडियो में एलोपैथी की आलोचना करते हुए देखे गए। बाबा रामदेव ने उस वीडियो में कहा था कि एलोपैथी दवाओं के कारण ही कोरोना वायरस संक्रमण में कई मरीजों की जान गई। इसके बाद लगातार IMA, योगगुरु रामदेव के खिलाफ मोर्चा खोले हुए है।

बाबा रामदेव के खिलाफ 1000 करोड़ रुपए के मानहानि के नोटिस के अलावा IMA, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बाबा रामदेव के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा लगाने की माँग भी कर चुका है।

‘कोरोना सीजनल बीमारी, सिर्फ खाँसी-जुकाम है’: महिला प्रोफेसर के दावों से उठे WHO पर सवाल, जानें क्या है सच्चाई

कोरोना संक्रमण के खतरनाक प्रकोप को झेलने के बावजूद सोशल मीडिया पर दावे किए जा रहे हैं कि ये एक मौसमी बीमारी है और इससे घबराने की कोई जरूरत नहीं है। इन दावों को सही साबित करने के लिए डोलोरेस काहिल नाम की महिला प्रोफेसर का वीडियो शेयर हो रहा है।

बिना दावों की सच्चाई जानें फेक न्यूज फैलाने वालों का कहना है कि कोरोना संक्रमण पर दी जानकारी पर WHO ने अपनी गलती मान कर इसे एक सीजनल वायरस बताया है जिसमें मौसमी बदलाव के कारण खाँसी-जुकाम और गला दर्द रहता है।

वायरल होते संदेशों के मुताबिक WHO के हवाले से ये भी कहा जा रहा है कि कोरोना रोगी को न तो अलग रहने की है और न ही जनता को सोशल डिस्टेंसिंग की जरूरत है। यह एक मरीज से दूसरे व्यक्ति में भी नहीं फैलता। इस संदेश के साथ WHO पर गुस्सा दिखाते हुए इस वीडियो को देखने को कहा जा रहा है। संदेश में लिखा है, “सबके 2 साल खराब करने के बाद इन्होंने तो पल्ला झाड़ लिया अब कर लो क्या करना है, इनका देखिए WHO की प्रेस कॉन्फ्रेंस।”

अब वीडियो और संदेश की सच्चाई क्या है। इसे पीआईबी फैक्ट चेक के जरिए पहले ही बताया जा चुका है कि संदेश में किए गए दावे फर्जी हैं। कोरोना कोई सीजनल बीमारी नहीं है। इसमें शारीरिक दूरी और आइसोलेशन जरूरी है। यह एक संक्रामक रोग है जिसमें कोविड के अनुकूल व्यवहार अपनाना जरूरी है।

इसके अलावा बात करें वीडियो में नजर आने वाली महिला प्रोफेसर डोलोरेस काहिल की तो गूगल सर्च से पता चलता है कि महिला डबलिन में स्कूल ऑफ मेडिसिन की एक प्रोफेसर हैं। उनका यह वीडियो 19 अक्टूबर 2020 को बर्लिन में हुए वर्ल्ड डॉक्टर अलायंस का है। जहाँ कोरोना संक्रमण पर भ्रामक दावा करने के कारण इस पर फॉल्स इन्फॉर्मेशन का टैग लगा दिया गया है।

इसके अलावा ये बात भी गौर करने वाली है कि डोलोरेस WHO की कोई अधिकारी नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस महामारी को 11 मार्च 2020 को महामारी घोषित किया था। इसके कारण अब तक 37 लाख से ज्यादा मौतें हुई हैं। इसलिए सिर्फ एक वीडियो पर ये मानना कि कोरोना कोई संक्रामक बीमारी नहीं है, समझदारी का काम नहीं है।