द वायर की प्रोपेगेंडाबाज पत्रकार आरफा खानम शेरवानी ने शनिवार (05 जून) को ट्वीट करके कहा कि तालिबान ने ‘हिन्दुत्व के गुंडों’ से प्रेरित होकर बामियान बुद्ध की विशाल मूर्ति को विस्फोटक से उड़ा दिया था। शेरवानी ने ट्वीट में लिखा कि बाबरी मस्जिद के विध्वंस ने ही अफगानिस्तान में बौद्ध स्मारक के तालिबान द्वारा विनाश को प्रेरित किया था।
आरफा खानम शेरवानी का ट्वीट
इस पूरी चर्चा के कई पहलू हैं। सबसे पहले तो यह ध्यान देना चाहिए कि बामियान में बौद्ध स्मारकों के साथ जो हुआ वह कट्टरपंथी इस्लामिक विचारधारा का नतीजा था जो हिन्दू, बौद्धों और जैनों के धर्म स्थानों के विनाश का कारण बनी। औरंगजेब तो आज भी हिन्दू मंदिरों को नष्ट करने के लिए जाना जाता है। जिस बाबरी मस्जिद की बात शेरवानी ने की वह उसी जगह बनी हुई थी जहाँ पहले राम मंदिर था।
हालाँकि, तालिबान की जिहादी गतिविधियाँ नई नहीं हैं। तालिबानी तो सिर्फ अपने वैचारिक आकाओं के बनाए रास्ते पर ही चल रहे हैं। शेरवानी यह सोचती हैं कि मुस्लिम आक्रान्ताओं के जुल्म सदियों पहले हुए थे तो उन्हें इतिहास के पन्नों में दफन कर देना चाहिए। लेकिन हिन्दू धर्म एक सजीव धर्म है और हिंदुओं को उनके पूर्वजों के बलिदान याद हैं जिनके कारण आज हम अपने देवी-देवताओं की पूजा कर पा रहे हैं।
जहाँ एक ओर तालिबान का किया इस्लामिक जिहाद का एक अंग है वहीं बाबरी मस्जिद का विध्वंस बैस्टिल की उस घटना की तरह है जिसने फ्रांसीसी क्रांति को जन्म दिया था। बाबरी विध्वंस उस पुनर्जागरण का कारण बना जो आज भी हिन्दू समाज में व्याप्त है।
बामियान के बौद्ध स्मारकों को नष्ट किया जाना कोई अलग घटना नहीं है बल्कि पहले ही बताया गया है कि हिन्दू और बौद्ध स्मारक हमेशा से ही इस्लामिक कट्टरपंथ की भेंट चढ़ते रहे हैं। आज भी पाकिस्तान में हिन्दू मंदिरों की स्थिति को देखा जा सकता है जो सात दशक पहले भारत ही था। वहाँ हिन्दू अपने पैसे से भी मंदिर नहीं बना सकते हैं और इस्लाम के नाम पर इस दमन को जायज ठहराया जाता है।
इस पूरी चर्चा का एक पहलू यह भी है कि बामियान में तालिबान ने निसहाय अल्पसंख्यकों पर खूब जुल्म किया जबकि बाबरी विध्वंस किसी समुदाय के प्रति कोई प्रतिक्रिया नहीं थी। यह मात्र हिंदुओं द्वारा अपनी राम जन्मभूमि प्राप्त करने की एक प्रक्रिया थी और बाद में सुप्रीम कोर्ट में संविधान के दायरे में यह सिद्ध भी हुआ कि उस विवादित ढाँचे पर हिंदुओं का ही अधिकार है। जबकि ऐसा बामियान बौद्ध स्मारकों के साथ संभव नहीं है।
यह केवल आरफा खानम शेरवानी की बात नहीं है। पूरा लिबरल समुदाय ही ऐसी चर्चाओं में अक्सर ही इस्लामिक जिहादियों और कट्टरपंथियों को क्लीनचिट देता फिरता है और अंत में इन इस्लामिक आतंकियों को नैतिक तौर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से श्रेष्ठ घोषित कर देता है।
उत्तर प्रदेश में वैक्सीनेशन क्षमता को तीन गुना ज्यादा बढ़ाने के संबंध में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शुक्रवार को (जून 4, 2021) अपना बयान दिया। सरकार की ओर से जारी सूचना में बताया गया कि योगी आदित्यनाथ ने वैक्सीनेशन कैम्पेन को तेज करने के लिए उपयुक्त कदम उठाने को कहे हैं।
हाई लेवल कोविड रिव्यू मीटिंग में योगी आदित्यनाथ ने कहा, “दैनिक टीकाकरण क्षमता को बढ़ाने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए। मौजूदा क्षमता को एक महीने के भीतर तीन गुना बढ़ाने की जरूरत है।”
मंगलवार को मिशन जून के शुभारंभ के बाद से अब तक 6,000 केंद्रों पर टीकाकरण किया जा रहा है। इस बीच 14.68 लाख से अधिक लोगों को टीका लगाया गया है। केवल शुक्रवार को 3.94 लाख कोरोना वैक्सीन के शॉट दिए गए हैं। वहीं प्रदेश में शुक्रवार को 18-44 वर्ग के 2 लाख लोगों को वैक्सीन दी गई। अधिकारियों ने बताया कि आने वाले 5 दिनों के लगभग हर जिले में स्लॉट बुक हैं। सीएम लगातार प्रदेश की जनता से वैक्सीन लगवाने की अपील कर रहे हैं।
MBA वालोंं को अस्पतालों में नौकरी देगी योगी सरकार
गौरतलब है कि एक ओर जहाँ सरकार कोविड से लड़ाई में वैक्सीनेशन प्रक्रिया को तेज कर रही है। वहीं अस्पताल के मैनेजमेंट और रोजगार के अवसरों को बेहतर करने के लिए एक और सराहनीय फैसला योगी सरकार द्वारा लिया गया है। इस फैसले के साथ ही उन डॉक्टर्स को जिन्हें प्रशासनिक कार्य करने पड़ते थे उन्हें उससे मुक्ति मिलेगी और एमबीए करने वाले छात्रों को अस्पताल प्रबंधन संभालने के लिए वहाँ नौकरी दी जाएगी।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शनिवार काे लखनऊ में टीम-9 के साथ बैठक में कहा कि अस्पताल में डॉक्टरों से केवल इलाज करवाने का ही काम लिया जाए। स्वास्थ्य विभाग और चिकित्सा शिक्षा विभाग के अलग-अलग अस्पतालों या कार्यालयों जहाँ भी डॉक्टरों की तैनाती प्रशासनिक या प्रबंधकीय कार्यों में की गई है, उन्हें तत्काल कार्यमुक्त कर दिया जाए।
रोजगार देने में आगे योगी सरकार
बता दें कि योगी आदित्यनाथ ने अपने चार साल के कार्यकाल में प्रदेश में फैली बेरोजगारी को खत्म करने के लिए जमकर मेहनत की है। ये प्रतिबद्धता कोरोना समय में भी कम होती नहीं देखने को मिली। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के ताजा सर्वे के आँकड़े इस बात के गवाह हैं। इन आँकडों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में बेरोजगारी दर 6.9 फीसदी दर्ज की गई है, जो मार्च 2017 के 17.5 प्रतिशत के आँकड़े के मुकाबले काफी कम है।
सीएमआईई की रिपोर्ट के मुताबिक रोजगार उपलब्ध कराने के मामले में दिल्ली, पंजाब, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु, जैसे देश के तमाम राज्यों के मुकाबले उत्तर प्रदेश काफी आगे रहा है। हिंदुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार अपर मुख्य सचिव नवनीत सहगल ने एक बयान में कहा कि योगी सरकार ने पिछले 4 सालों में युवाओं को 4 लाख से अधिक सरकारी नौकरियाँ देने का रिकॉर्ड बनाया है।
अन्य राज्यों के मुकाबले यूपी कैसे है रोजगार देने में आगे
नवनीत सहगल ने सीएमआईई की मई महीने की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि राजस्थान में बेरोजगारी दर का आँकड़ा 27.6% है, जबकि देश की राजधानी दिल्ली की स्थिति रोजगार के लिहाज से बेहद खराब है। दिल्ली की बेरोजगारी दर 45.6% दर्ज की गई है, पश्चिम बंगाल में ये दर 19.3 %, तमिलनाडु में 28%, पंजाब में 8.8%, झारखण्ड में बेरोजगारी दर 16.0%, छत्तीसगढ़ में 8.3%, केरल में 23.5%, और आंध्र प्रदेश में 13.5% रही है।
अपर मुख्य सचिव का कहना है कि यूपी की इस कामयाबी में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की दूरदर्शी नीति और रोजगारपरक योजनाओं की बड़ी भूमिका रही है। मार्च 2017 में जब योगी आदित्यनाथ ने राज्य की सत्ता संभाली, तब प्रदेश में बेरोजगारी दर का आँकड़ा 17.5% था। यानी साफ है कि पहले के मुकाबले बेरोजगारी दर काफी कम है। सहगल कहते हैं कि मिशन रोजगार के तहत विभिन्न विभागों, संस्थाओं एवं निगमों आदि के माध्यम से प्रदेश के लोगों को रोजगार के अवसर उपलब्ध कराए जा रहे हैं। 4 लाख से अधिक लोगों को सरकारी नौकरी से जोड़ने के साथ ही 15 लाख से अधिक लोगों को निजी क्षेत्र में तथा लगभग 1.5 करोड़ लोगों को स्वरोजगार से जोड़ा है।
चीन के वुहान शहर में पहली बार कोविड-19 का पता चलने के डेढ़ साल बाद भी यह सवाल रहस्य बना हुआ है कि दुनियाभर में कोरोना वायरस कहाँ से फैला। दरअसल, चीन की वुहान लैब से डेढ़ साल पहले SARS-CoV-2 वायरस के लीक होने की खबरों ने जोर पकड़ा था, जिसे सिरे से खारिज कर दिया गया था। इसके बाद अमेरिकी लेफ्ट लिबरल ने इन संभावनाओं पर नए सिरे से सोचना प्रारंभ कर दिया था।
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जब यह कहा था कि कोरोना वायरस की उत्पत्ति चीन में हुई है। यह चाइनीज वायरस है। तब इस बात को हर किसी ने यह कहते हुए नजरअदांज कर दिया था कि यह ट्रंप की कोरी कल्पना है। हालाँकि, अब खुद वर्तमान राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कोरोना वायरस कहाँ से फैला इसकी जाँच के आदेश दिए हैं। इस बात को लेकर अमेरिका और चीन एक बार फिर से आमने-सामने आ गए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने इंटेलिजेंस एजेंसियों को 90 दिनों के अंदर यह पता लगाने का आदेश दिया है कि कोरोना वायरस कहाँ से फैला है। यह मीडिया को जगाने और वायरस के नेशनल ओरिजिन थ्योरी (national origin theory) पर सवाल उठाने के लिए मजबूर करता है।
सूचना की स्वतंत्रता अधिनियम के तहत डॉ. एंथनी फौसी के हजारों ईमेल प्राप्त होने के बाद लैब-लीक थ्योरी को लेकर कई और खुलासे हुए हैं। ईमेल से पता चला कि इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (Wuhan Institute of Virology) में कोविड-19 वायरस कैसे विकसित हुआ। वे चमगादड़ से विकसित हुए कोरोना वायरस को और अधिक प्रभावशाली बनाने के लिए इस पर रिसर्च कर रहे थे।
वहीं, ईमेल और अन्य स्टडी को लेकर हाल ही में जो रिपोर्ट्स सामने आई हैं, उसके मुताबिक शोधकर्ताओं, अमेरिकी प्रशासन सहित खुफिया एजेंसी से जुड़े कई लोग चीनी लैब की भूमिका की जाँच कराना चाहते थे, लेकिन डॉ. फौसी और अन्य कुछ लोगों ने इसकी मंजूरी नहीं दी। ऐसा इसलिए क्योंकि इसमें उनका स्वार्थ छिपा था। दरअसल, अमेरिकी सरकार उन्हें वुहान लैब में वायरस पर रिसर्च करने के लिए मोटी रकम देती थी। इस जाँच प्रक्रिया में वह महत्वपूर्ण भूमिका में थे।
फौसी द्वारा ध्यान में लाए गए कुछ स्टडी (रिसर्च) में एक रिसर्च पेपर ऐसा भी था, जिसे भारत के कुछ वैज्ञानिकों द्वारा तैयार किया गया था। पिछले साल जनवरी में आईआईटी दिल्ली (IIT DELHI) में कुसुमा स्कूल ऑफ बायोलॉजिकल साइंसेज और दिल्ली यूनिवर्सिटी के आचार्य नरेंद्र देव कॉलेज के शोधकर्ताओं ने एक पेपर प्रकाशित किया था, जिसमें उन्होंने पाया था कि SARS-CoV-2 के स्पाइक ग्लाइकोप्रोटीन (S) (spike glycoprotein (S)) में चार इंसर्शन थे, जो कि एचआईवी (HIV) वायरस के समान हैं और अन्य किसी कोरोना वायरस के रूप में नहीं पाए जाते हैं। इस स्टडी ने इन संभावनाओं को मूर्त देने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यानी हो सकता है कि SARS-CoV-2 को मौजूदा कोरोना वायरस और एचआईवी वायरस के इस्तेमाल से bio-engineered किया गया हो।
रिसर्च पेपर को इन भारतीय वैज्ञानिकों ने तैयार किया था
यह रिसर्च पेपर प्रशांत प्रधान, आशुतोष कुमार पांडे, अखिलेश मिश्रा, पारुल गुप्ता, प्रवीण कुमार त्रिपाठी, मनोज बालकृष्णन मेनन, जेम्स गोम्स, पेरुमल विवेकानंदन और बिश्वजीत कुंडू द्वारा सभी उपलब्ध कोरोना वायरस अनुक्रमों का अध्ययन करने के बाद तैयार किया था, जो एनसीबीआई वायरल जीनोम डेटाबेस (NCBI viral genome database) में उपलब्ध हैं।
स्पाइक (एस) ग्लाइकोप्रोटीन कोरोना वायरस को मानव के शरीर में मौजूद कोशिकाओं में प्रवेश करने के लिए सक्षम बनाता है। स्टडी के मुताबिक, ग्लाइकोप्रोटीन एक विशेष आकार का होता है, जो कोशिकाओं से जुड़ने में मदद करता है और यह क्षमता SARS-CoV-2 के लिए बेहद यूनिक मानी जाती है। जैसे SARS-CoV अन्य किसी भी प्रकार के कोरोना वायरस में नहीं पाया जाता है। खासतौर पर कोरोना वायरस के स्पाइक ग्लाइकोप्रोटीन (एस) को दो सबयूनिट्स एस 1 और एस 2 में बाँटा गया है। S1 टागेट सेल कोशिकाओं पर रिसेप्टर के साथ जुड़ने में मदद करता है। वहीं, S2 सबयूनिट कोशिका झिल्ली के साथ मिलाने में मदद करता है।
दरअसल, SARS-CoV-2 में ग्लाइकोप्रोटीन का यह विभाजन इसके लिए यूनिक है। यही कारण है कि भारतीय शोधकर्ता इस पर स्टडी करना चाहते थे कि यह विकास कैसे हुआ। इस स्टडी को करने के लिए उन्होंने SARS-CoV-2 के स्पाइक ग्लाइकोप्रोटीन अनुक्रमों की तुलना SARS-CoV से की और उनमें क्या अंतर हैं, इसका विश्लेषण किया। इसकी सावधानीपूर्वक जाँच करने पर उन्होंने पाया कि SARS-CoV-2 स्पाइक ग्लाइकोप्रोटीन में 4 इंसर्शन (insertions) या 4 सेग्मेंट होते हैं, जो कि कोरोना वायरस के पहले के कम संक्रामक रूपों में नहीं पाए जाते हैं।
स्टडी में पाए गए चार इंसर्शन इस प्रकार हैं, जीटीएनजीटीकेआर (GTNGTKR), एचकेएनएनकेएस (HKNNKS), जीडीएसएसएसजी (GDSSSG) और क्यूटीएनएसपीआरआरए (QTNSPRRA)।
इसे खोजने के बाद उन्होंने मानव शरीर में पाए जाने वाले वायरस के सभी उपलब्ध फुल-लेंथ अनुक्रमों (sequences) का अध्ययन किया। इस दौरान उन्होंने पाया कि उन सभी में इंसर्शन मौजूद थे, लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये सेग्मेंट चमगादड़ में पाए जाने वाले एक ही वायरस के स्पाइक ग्लाइकोप्रोटीन सिक्वेंस में नहीं थे।
जब उन्होंने इसके संभावित मूल (possible origin) को जानने के लिए इन 4 सेग्मेंट का और अधिक विश्लेषण किया, तो उन्होंने पाया कि ये चारों ह्यूमन इम्युनोडेफिशिएंसी वायरस-1 (एचआईवी -1) प्रोटीन के खंडों से मेल खाते हैं। पहले 3 खंड HIV-1 gp120 में अमीनो एसिड अवशेषों के सेग्मेंट से मेल खाते हैं, जबकि चौथा खंड HIV-1 Gag से मेल खाता है। चार में से पहले दो 100% मैच हैं, जबकि बाकी दो में कुछ अंतर हैं। ये प्रोटीन वायरस की पहचान करने में बेहद कमजोर साबित होते हैं।
शोधकर्ताओं के अनुसार, SARS-CoV-2 और HIV-1 वायरस दोनों में प्रोटीन का ऐसा मेल अपने आप संभव नहीं हो सकता है। वे यह भी कहते हैं कि चमगादड़ या कोरोना वायरस के अन्य सभी रूपों में पाए जाने वाले एक ही वायरस में सेग्मेंट नहीं थे। इसलिए यह बहुत ही चौंकाने वाला है, क्योंकि बहुत कम समय में स्वाभाविक रूप से इस तरह का बदलाव होना संभव नहीं हैं। ध्यान दें कि ऐसा दावा किया जाता रहा है कि वायरस सीधे या चमगादड़ जैसे किसी जानवर के माध्यम से इंसान के अंदर प्रवेश कर सकता है।
भारतीय वैज्ञानिकों ने वायरस की उत्पत्ति पर आगे की जाँच का दिया था सुझाव
हालाँकि, भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा की गई रिसर्च में यह दावा नहीं किया गया था कि वायरस को एक लैब में बनाया गया था, लेकिन इन्होंने निष्कर्ष निकाला था कि यह एक लीक से हटकर (unconventional evolution) था। इसके चलते रिसर्च पेपर में वायरस की उत्पत्ति कहाँ से हुई इस पर आगे की जाँच का सुझाव दिया गया था।
रिसर्च पेपर का प्रीप्रिंट 31 जनवरी, 2020 को बायोरेक्सिव (bioRxiv) पर प्रकाशित किया गया था, जो एक ओपन-सोर्स पोर्टल है। यह बॉयोलॉजिकल रिसर्च के लिए फेमस है। इसे शोधकर्ताओं द्वारा 2 फरवरी, 2020 को वापस ले लिया गया था। वापसी के नोट में कहा गया था कि उन्होंने तकनीकी दृष्टिकोण और परिणामों की उनकी व्याख्या पर रिसर्च कम्यूनिटी से प्राप्त टिप्पणियों के जवाब में इसे संशोधित करने का फैसला किया है।
वैज्ञानिकों और अमेरिकी प्रशासन ने इसे लेकर गंभीरता नहीं दिखाई
मालूम हो कि कोरोना महामारी के शुरुआती दिनों में लैब लीक थ्योरी काफी मजबूत था, लेकिन इसे वैज्ञानिकों और अमेरिकी प्रशासन के एक बड़े वर्ग द्वारा गंभीरता से नहीं लिया गया था। राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा समय-समय पर इस मुद्दे को उठाया गया, इसके बावजूद किसी ने भी इस पर ध्यान नहीं दिया। लैब लीक थ्योरी पहले से ही 19 फरवरी, 2020 तक थी, जब द लैंसेट ने एक बयान में प्रकाशित किया था, जिसमें इस तरह की संभावनाओं को सिरे से खारिज कर दिया गया था कि वायरस वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी से लीक हो सकता है। इस तरह एक प्रभावशाली हेल्थ पत्रिका (medical journal) द्वारा प्रकाशित 27 वैज्ञानिकों द्वारा हस्ताक्षरित बयान ने वायरस की उत्पत्ति को लेकर जारी रिसर्च को प्रभावी ढंग से समाप्त कर दिया था, क्योंकि उन्होंने इसको लेकर एक एंगल को पूरी तरह से बंद कर दिया था।
अब फौसी के ईमेल से पता चलता है कि जब उनसे भारतीय वैज्ञानिकों द्वारा इस रिसर्च पेपर के बारे में पूछा गया था, तो उन्होंने इसे ‘वास्तव में अजीब’ कहकर खारिज कर दिया था। कई अन्य ईमेल से यह भी पता चला है कि डॉ. फौसी को चेताया गया था कि हो सकता है COVID-19 को ‘engineered’ किया गया हो, लेकिन उन्होंने उन सभी बातों को खारिज कर दिया था।
भारतीय शोधकर्ता आज भी अपनी बात पर कायम हैं
ऑपइंडिया ने रिसर्च करने वाले भारतीय शोधकर्ताओं में से एक आशुतोष कुमार पांडे से बात की। इससे पहले उन्होंने ट्विटर पर कमेंट किया था कि वे अपने निष्कर्ष पर कायम हैं कि SARS-CoV-2 स्वाभाविक नहीं है। उन्होंने ट्वीट किया था, ”हमने जनवरी 2020 में यह कहा था, हम आज यही फिर से कह रहे हैं।”
If published this will be tight slap on the cartel of Virologists who are hell bent to make this virus natural. SARS-CoV-2 is not natural. We said this in Jan 2020, we are saying it again.
— Ashutosh Kumar Pandey (@asrayagiriraj) May 29, 2021
उन्होंने ऑपइंडिया से बात करते हुए फिर दोहराया और कहा कि यह रिसर्च पेपर उन लोगों के लिए बेहद अजीब था, जो यह साबित करने में जुटे थे कि वायरस की उत्पत्ति प्राकृतिक रूप (natural origin) से हुई है। उन्होंने कहा कि उनकी रिसर्च में जीनोम (genome) के उन वर्गों की सही पहचान की गई थी, जो इस वायरस की खासियत थी। यह पूछे जाने पर कि उन्होंने कागज वापस क्यों ले लिया। इस पर पांडे ने कहा कि स्वार्थी लोगों के दबाव के कारण इसे वापस ले लिया गया था।
यह वायरस छूने से क्यों फैलता है
पांडे ने यह भी कहा कि यह पेपर उनके द्वारा की गई विभिन्न रिसर्च का सिर्फ एक भाग था। वे रिसर्च के पूरे निष्कर्षों को अपडेटेड वर्जन में शामिल करना चाहते थे, लेकिन संशोधित कॉपियों (revised manuscripts) पर प्रकाशकों द्वारा कड़ी रोक लगा दी गई थी। उन्होंने कहा कि संशोधित कॉपियों में उन्होंने इस बात की जानकारी दी है कि यह वायरस छूने से क्यों फैलता है और यह इंसान को इतनी आसानी से क्यों संक्रमित करता है, लेकिन इस रिसर्च को कभी बाहर ही नहीं लाने दिया गया।
एक विशेष एजेंडे के तहत वैज्ञानिकों द्वारा कैसे एक रिसर्च पेपर को ब्लॉक किया जा रहा है। इस पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा, “विज्ञान नया मध्ययुगीन चर्च है, जो इसके पोप हैं अपनी इच्छानुसार सेंसर करते हैं।”
वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी पहले भी ऐसे कई प्रयोग कर चुका है
हालाँकि, भारतीय शोधकर्ताओं ने यह दावा नहीं किया है कि SARS-CoV-2 वायरस एचआईवी (HIV) वायरस के सेग्मेंट्स (segments) का उपयोग करके बनाया गया था। वे केवल इस पर और रिसर्च करना चाहते थे। तथ्य यह है कि इस तरह के अध्ययन नियमित रूप से किए जाते रहे हैं। दरअसल, वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी पहले भी ऐसे कई प्रयोग कोरोना वायरस पर ही कर चुका है।
2007 से 2017 के बीच लैब ने स्पाइक प्रोटीन में विभिन्न रिसेप्टर बाइंडिंग मोटिफ्स के साथ 8 नए काइमेरिक कोरोना वायरस (chimeric coronaviruses) बनाए थे। 2019 से अभी तक इस तरह का शोध चल रहा था, जिसके लिए अमेरिकी सरकार ने फंडिंग भी की थी। उदाहरण के लिए 2008 का यह पेपर targeted RNA recombination का उपयोग करके कोरोना वायरस जीनोम के हेरफेर के बारे में खुलासा करता है।
संयुक्त राज्य अमेरिका में वुहान इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी और मिनेसोटा यूनिवर्सिटी (University of Minnesota) के वैज्ञानिकों द्वारा 2019 के एक रिसर्च पेपर ने कोरोना वायरस पर अपनी रिसर्च के उद्देश्यों को वर्णन करते हुए यह कहा था, ”इन विट्रो और इन विवो लक्षणों का वर्णन SARSr-CoV स्पिलओवर रिस्क के साथ, स्थानिक और phylogenetic विश्लेषण, पब्लिक हेल्थ कंसर्न और वायरस की पहचान करने के लिए हम सब मिलकर इन विट्रो और इन विवो संक्रमण प्रयोगों और रिसेप्टर बाइंडिंग के विश्लेषण में एस प्रोटीन अनुक्रम डेटा, संक्रामक क्लोन तकनीक का उपयोग करेंगे।”
ध्यान दें कि यहाँ संक्रामक क्लोन तकनीक का अर्थ है लाइव सिंथेटिक वायरल क्लोन बनाना। इन विट्रो का अर्थ है टेस्ट ट्यूब में किए गए सूक्ष्म जीवों पर अध्ययन और विवो में इसका मतलब लैब में जानवरों पर की गई रिसर्च से है।
हाल में पाकिस्तानी एक्टिविस्ट और नोबेल पुरस्कार विजेता मलाला यूसुफजई ब्रिटिश फैशन मैग्जीन वोग के कवर पेज पर नजर आने के बाद चर्चा का कारण बनीं। मैग्जीन को दिए इंटरव्यू में मलाला ने कई विषयों पर अपनी बात रखी। राजनीति, शिक्षा, संस्कृति सब पर बात रखते हुए मलाला ने निकाह को लेकर भी अपनी राय दी। लेकिन पाकिस्तानी कट्टरपंथियों को उनकी ये राय हजम नहीं हुई।
दरअसल मलाला का शादी जैसे विषय पर कहना था, ”मैं अभी भी नहीं समझ पाई हूँ कि लोग क्यों शादी करते हैं। यदि आप किसी को अपनी जिंदगी में चाहते हैं, तो आपको निकाह के पेपरों पर साइन करने की क्या जरूरत है, यह सिर्फ एक पार्टनरशिप क्यों नहीं हो सकती है?”
मलाला के इस बयान पर पाकिस्तानियों ने ट्विटर पर हंगामा मचा दिया। लोग खुलकर उनकी आलोचना करने लगे। साथ ही उन पर युवाओं का दिमाग खराब करने के आरोप भी लगे। इसके साथ हुए पश्चिमी सभ्यता को बढ़ावा देने वाला भी बताया गया। यूजर्स कोट शेयर कर करके बताने लगे कि कैसे अल्लाह के संदेशवाहक पैगम्बर ने बताया है कि दो प्यार करने वालों के लिए निकाह जितना कुछ पाक नहीं है।
जोहेब अहमद ने लिखा कि एक पश्चिमी महिला ने पश्चिमी बयान दिया है। इसमें कोई बड़ी बात नहीं है।
पाकिस्तानी सोशल मीडिया स्टार और मॉडल मथरिरा ने भी मलाला की आलोचना की। अपने इंस्टा पर मॉडल ने लिखा, “मलाला, कृपया हमें इस पीढ़ी को सिखाना चाहिए कि निकाह सुन्नत है, यह सिर्फ एक कागज पर हस्ताक्षर करने के बारे में नहीं है – आप कोई जमीन नहीं खरीद रहे हैं।”
बिस्मा सज्जाद लिखती हैं, “निकाह एक पाक रिश्ता है जिसे हमारे पैगंबर ने हलाल बताया है। मलाला हमें लगता है तुम भूल गई हो कि तुम मुसलमान हो। ये तुम्हारी सोच है ये नजरिया है पाकिस्तानी लड़कियों के लिए?”
Marriage is a pure bond which our Prophet Muhammadﷺ declared sacred for us and Allah commanded.@Malala We think you forget that you are Muslim Is this your vision & mission for Muslim girls of Pakistan?@Team4PKpic.twitter.com/1IOsPT6ub0
इसके बाद कई लिबरल ऐसे भी सामने आए जिन्होंने मलाला का समर्थन किया। सोहनी नाम की यूजर ने कहा कि ये कहना कि मलाला पाकिस्तान को बुरा दिखा रही हैं। क्या एक 15 साल की लड़की के मुँह पर गोली मारना सिर्फ इसलिए क्योंकि वह शिक्षा चाहती हैं पाकिस्तान को अच्छा दिखाता है।
“Malala is making Pakistan look bad” Yeah because it looked so great that a 15 year old kid was shot in the face for wanting an education
एक अन्य यूजर कहती हैं, “ मलाला अगर पाकिस्तान को गंदा दिखा रही हैं तो बाल विवाह, ऑनर किलिंग और अल्पसंख्यकों से बर्ताव उसे अच्छा दिखाता है क्या। कल्पना करो एक बार गोली खाने के बाद अपनी पूरी जिंदगी उस मंच का उपयोग करने के लिए समर्पित कर दो ताकि केवल अपने लोगों को शिक्षा दी जा सके।”
Malala is making Pakistan ‘look bad’ but child marriages, honor killings and the absolutely horrific way we treat our minorities is all good? Imagine getting shot then dedicating your entire life to using your platform to advocate for access to education just for your own people
गौरतलब है कि वोग के ऑफिशियल इंस्टा अकॉउंट ने मलाला के कवर वाली तस्वीर को शेयर किया गया था। इसके अलावा मलाला ने भी इसे अपने ट्विटर पर शेयर किया था। इन तस्वीरों के सामने आने के बाद ही सारा बवाल शुरू हुआ। लोगों ने मलाला पर आरोप मढ़े कि वह अपने वतन के ही लोगों के दिमाग में गंद भर रही हैं ।
बता दें कि साल 2012 में इन्हीं मलाला को तालिबान के एक आतंकी ने सिर में गोली मारी थी। उस समय मलाला महिला शिक्षा के ख़िलाफ़ तालिबानी नीति का विरोध कर रही थीं। बाद में मलाला यूके चली गईं और 2020 में ऑक्सफॉर्ड यूनिवर्सिटी से अपनी ग्रैजुएशन की डिग्री हासिल की।
भारतीय रिज़र्व बैंक ने अपनी मुद्रा-नीति की घोषणा की। बैंक की मॉनेटरी पालिसी कमिटी ने अर्थव्यवस्था के सभी पहलुओं को देखते हुए दो मुख्य निर्णय लिए:
# बैंक ने रेपो रेट (वह दर जिस पर रिज़र्व बैंक अन्य व्यावसायिक बैंकों को पैसे देता है) में कोई बदलाव न करते हुए उसे 4 प्रतिशत पर रखा # रिवर्स रेपो रेट (वह दर जिस पर रिज़र्व बैंक व्यावसायिक बैंकों से डिपॉजिट/पैसे लेता है) भी बिना किसी बदलाव के 3.35 प्रतिशत पर रखा गया है।
रिज़र्व बैंक के इन निर्णयों से ब्याज दरों पर कोई असर नहीं होगा। ऐसे में होम लोन या और लोन की ईएमआई में किसी तरह का बदलाव नहीं होगा। गवर्नर शक्तिकांत दास के अनुसार बैंक ने घरेलू अर्थव्यवस्था को सहारा देने और मुद्रास्फीति की दर पर नियंत्रण के उद्देश्य से एक सरल मॉनेटरी पॉलिसी अपनाने का निर्णय लिया है।
वित्त वर्ष 2021-22 के अपने पहले द्विमासिक मुद्रा-नीति में कमिटी ने वैश्विक और घरेलू अर्थव्यवस्था की वर्तमान स्थिति और अर्थव्यवस्था के अपने आकलन प्रस्तुत किए। बैंक के अनुसार कोरोना की दूसरी लहर की वजह से आर्थिक प्रगति की दर पर प्रतिकूल असर पड़ा है। इसे देखते हुए बैंक ने वित्त वर्ष 2022 के लिए जीडीपी के विकास की दर के अपने पूर्वानुमान को 10.5% से घटाकर 9.5% कर दिया है।
अप्रैल में मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी की मीटिंग के पश्चात वैश्विक अर्थव्यवस्था में सुधार देखा गया। बैंक के अनुसार इस सुधार में विकसित अर्थ्यव्यवस्थाओं का योगदान रहा है। विकसित देशों में चलने वाले टीकाकरण अभियान से भी अर्थव्यवस्था को वापस पटरी पर लाने में बहुत मदद मिली है। हालाँकि विकासशील देशों और अल्प विकसित देशों की अर्थव्यवस्था में सुधार की प्रक्रिया पर कोरोना की दूसरी लहर का प्रतिकूल असर पड़ा है। विकासशील देशों में मुद्रास्फीति की दर में कुछ हद तक बढ़ोतरी हुई है।
बैंक के अनुसार घरेलू जीडीपी की दर में पिछले वित्त वर्ष में 7.3% की कमी देखी गई। वित्त वर्ष के अंतिम तिमाही में जीडीपी विकास की दर 1.6% रही। बैंक का मानना है कि भारत सरकार के मौसम विभाग के अनुसार इस वर्ष मॉनसून सामान्य रहेगा। इसका कृषि पर सकारात्मक असर पड़ेगा। वैसे बैंक के अनुसार अप्रैल महीने में कोरोना की लहर का ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ा है, जिसकी वजह से दुपहिया वाहनों और ट्रैक्टर की बिक्री में गिरावट देखी गई।
रिज़र्व बैंक के अनुसार एक सरल मुद्रा नीति के चलते अर्थव्यवस्था के सुचारु रूप से चलने की उम्मीद है। मुद्रास्फीति की दर भी घोषित लक्ष्य के आस-पास ही रहने की उम्मीद है। रेपो रेट में किसी तरह कमी न करने का फैसला भी मुद्रास्फीति की दर को नियंत्रण में रखने में सहायक होगा। हालाँकि तेल की बढ़ती कीमतों का परिवहन और सम्बंधित क्षेत्रों पर प्रतिकूल असर पड़ा है।
बैंक के अनुसार कमॉडिटी, खासकर तेल के अंतरराष्ट्रीय मूल्यों में बढ़त की वजह से मुद्रास्फीति की दर ऊपर रहने का एक खतरा बना रहेगा। बैंक ने केंद्र और राज्य सरकारों को एक्साइज, कस्टम और सम्बंधित टैक्स को लेकर एक समन्वय बनाने की सलाह भी दी है। ऐसा करने से तेल की बढ़ती कीमतों से उद्योगों के लिए लगने वाले माल की कीमतों पर नियंत्रण करने में सुविधा होगी।
कुल मिलाकर रिज़र्व बैंक ने अपनी द्विमासिक मुद्रा नीति में अर्थव्यवस्था को लेकर एक आशावादी अनुमान दिया है। हाल ही में आए निर्यात के आँकड़े मजबूत रहे हैं। मौसम विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार मॉनसून यदि सामान्य रहा और कोरोना की चल रही लहर को जल्द ही नियंत्रित किया जा सका तो भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर घरेलू और वैश्विक उत्साह बना रहेगा।
हाल ही में ट्विटर के द्वारा भारत के उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत और संघ के ही अन्य पदाधिकारियों के ट्विटर एकाउंट से ब्लू टिक हटा दिया गया था। हालाँकि विवाद होने के बाद उपराष्ट्रपति का ब्लू टिक रिस्टोर कर दिया गया था। अब खबर आ रही है कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के ट्विटर एकाउंट का ब्लू टिक भी रिस्टोर कर दिया गया है।
Twitter restores the blue verification badge of RSS Chief Mohan Bhagwat and other RSS key functionaries including Krishna Gopal pic.twitter.com/knCcr70G5z
शनिवार (05 जून) को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत समेत 5 अन्य संघ पदाधिकारियों के ट्विटर एकाउंट का ब्लू टिक हटा दिया था और इन सभी को ‘Unverified’ की श्रेणी में डाल दिया था। ये ट्विटर एकाउंट 2019 में वैरिफाई किए गए थे जिसके बाद इन्हें ब्लू टिक मिला था। जिन 5 RSS नेताओं के ट्विटर हैंडल से ब्लू टिक हटाया गया, वो हैं – सुरेश जोशी, सुरेश सोनी, अरुण कुमार, अनिरुद्ध देशपांडे और कृष्णा गोपाल।
इस मामले पर देश भर में ट्विटर की तीखी आलोचना शुरू हो गई। आलोचना के चलते अब ट्विटर ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और कृष्णा गोपाल समेत अन्य संघ पदाधिकारियों के ट्विटर एकाउंट का ब्लू टिक रिस्टोर कर दिया है।
ज्ञात हो कि पिछले कुछ समय से ट्विटर और भारत सरकार के बीच खींचतान बनी हुई है। ट्विटर इस समय भारत के नियम कायदों का मजाक उड़ाने और भाजपा नेताओं को परेशान करने में तुला हुआ है।
काफी समय से भारत में केंद्र सरकार नए आईटी कानूनों के मुताबिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को अपनी नीतियों में बदलाव करने के लिए कह रही है लेकिन ट्विटर अपनी मनमानी पर अड़ा हुआ है। इस पर कार्रवाई करते हुए शनिवार (05 जून) को ही भारत सरकार ने ट्विटर को नए आईटी कानूनों के अनुपालन के लिए आखिरी नोटिस भेजा है और कहा है कि असफल रहने पर ट्विटर ही कार्रवाई के लिए जिम्मेदार होगा।
द गार्जियन में लिखे गए अपने लेख में भारतीय मूल के शिल्पकार अनीश कपूर ने जमकर प्रोपेगेंडा फैलाया और हिन्दू घृणा का प्रदर्शन किया। लेख में कपूर ने केंद्र की सत्तारूढ़ एनडीए सरकार को हिन्दू तालिबान कहा और दावा किया कि सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट भारत को इस्लाम रहित करने का एक प्रोजेक्ट है।
द गार्जियन में शुक्रवार (04 जून) को लिखे गए लेख में अनीश कपूर ने लिखा कि इमारतों का इस्लामिक इतिहास दिल्ली में सत्ता में बैठे नेताओं को पसंद नहीं है इसलिए तानाशाह मोदी और उनके अनुयायी इन्हें समाप्त कर रहे हैं। जबकि वास्तविकता में इस प्रोजेक्ट के दौरान कोई भी इमारत नष्ट नहीं की जा रही है।
द गार्जियन में अनीश कपूर के द्वारा लिखा गया लेख
कपूर ने दावा किया कि मोदी के इस्लाम विरोध के चलते इस प्रोजेक्ट के दौरान इस्लामिक पहचान वाली इमारतों को नष्ट किया जा रहा है। जबकि सच यह है कि जो इमारते प्रभावित होने वाली हैं उनमें से अधिकांश कॉन्ग्रेस के शासनकाल में बनी हैं। कपूर ने कहा कि यूएन हेरिटेज फोरम और अन्य संस्थाएं भी इस प्रोजेक्ट में इमारतों को नष्ट किए जाने पर चुप हैं। हालाँकि यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि न तो सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट में किसी हेरिटेज इमारत को नुकसान पहुँचाया जा रहा है और न ही यूएन भारत के किसी आंतरिक मामले में हस्तक्षेप करेगा। एक बात यह भी है कि कृषि भवन, शास्त्री भवन और निर्माण भवन जैसी इमारतें सामान्य हैं न कि कोई महान संरचना।
लेख में अनीश कपूर ने जिस तरह की भाषा का उपयोग किया है वह भी आपत्तिजनक है। कपूर ने लेख में प्रोजेक्ट के वास्तुकार बिमल पटेल को नाजी और पीएम मोदी को आज के जमाने का औरंगजेब कहा, जो कि एक इस्लामिक जिहादी था। यही नहीं, कपूर ने सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट की तुलना बाबरी विध्वंस से की। बिना किसी सबूत के कपूर ने अपने लेख में बता दिया कि न्यायपालिका के ऊपर दबाव बनाया गया जिससे इस मूर्खतापूर्ण प्रोजेक्ट को मंजूरी मिल सके।
कपूर ने अपने प्रोपेगेंडा लेख में लिखा कि मोदी का हिन्दू तालिबान देश में सांस्कृतिक प्रभुसत्ता स्थापित करने के लिए स्मारक बनाना चाहता है जैसा कि लगभग सभी फासीवादी नेता करते हैं। लेख के अंत में कपूर ने लिखा है कि इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य है सभी भारतीयों पर हिन्दू अधिनायकवाद की स्थापना और मोदी इसके वास्तुकार के रूप में भारत पर उसी मुद्रा में शासन करना चाहते हैं जैसे भगवान विष्णु।
यह पहली बार नहीं है जब अनीश कपूर ने सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट या मोदी सरकार पर निशाना साधा हो। इससे पहले भी कपूर मई में भी सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट का विरोध कर चुका है। इसके अलावा कपूर 2015 से भाजपा को हिन्दू तालिबान कहता आया है। कपूर ने गार्जियन में ही लेख लिखा था और भाजपा को कट्टरपंथी इस्लामिक संगठन तालिबान का हिन्दू वर्जन कहा था। कपूर ने इस लेख में लिखा था कि भारत में हिन्दू-मुस्लिम साथ रहते आए हैं लेकिन अब सरकार (मोदी) का उग्र हिन्दुत्व अल्पसंख्यकों को दरकिनार करने का काम कर रहा है।
अनीश कपूर, तीस्ता सीतलवाड़ का समर्थन भी कर चुका है। कपूर ने कहा था कि सीतलवाड़ को डराया-धमकाया गया और शोषण किया गया। जबकि शायद कपूर इस बात से अनजान है कि सीतलवाड़ गुजरात दंगों के पीड़ितों के फंड से संबंधित अनियमितताओं के मामले में आरोपित है और सीबीआई ने 2015 में इस मामले में सीतलवाड़ के घर और ऑफिस में छापामारी की थी।
9000 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी और मनीलॉन्ड्रिंग के आरोप में देश से फरार चल रहे भगौड़े विजय माल्या की संपत्ति को बेचने की अनुमति प्रीवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट कोर्ट ने दे दी है। कोर्ट ने प्रवर्तन निदेशालय (ED) को संपत्तियाँ बैंक को सौंपने का आदेश दे दिया है।
समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार, पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) के मैनेजिंग डायरेक्टर मल्लिकार्जुन राव ने बताया, “₹5,600 करोड़ के बकाया कर्ज को वसूलने के लिए बैंक ने विजय माल्या की कुछ रियल एस्टेट की संपत्ति और सिक्योरिटी को बेचेन की अनुमति दे दी है। देश के प्रमुख बैंक ये संपत्ति बेचेंगे।”
PMLA court has given permission to banks to sell certain real estate properties & securities belonged to disgraced tycoon Vijay Mallya to recover dues loan amount of over Rs 5,600 crore. It was earlier under ED: Mallikarjuna Rao, Managing Director, Punjab National Bank
उन्होंने कहा, “किंगफिशर में पीएनबी का बहुत कर्ज नहीं है। लेकिन जब प्रमुख बैंक इस संपत्ति को बेचेंगे तब पीएनबी को भी अपना शेयर मिल जाएगा।” इससे पहले कोर्ट ने 24 मई को 4233 करोड़ और एक जून को 1411 करोड़ की प्रॉपर्टी बैंकों को देने का आदेश दिया था।
Now the lead bank will sell those properties. PNB doesn’t have much loan exposure in Kingfisher, but we will get our due share whatever once lead bank realize: Mallikarjuna Rao, Managing Director, Punjab National Bank
बता दें कि SBI की अगुवाई वाले 11 बैंकों ने विजय माल्या को लोन दिया था, जिसे उसने चुकाया भी नहीं और 9000 करोड़ की धोखाधड़ी व मनीलॉन्ड्रिंग करके देश से फरार हो गया। फिलहाल भारत सरकार ने उसे भगौड़ा घोषित किया हुआ है और उसे लगातार भारत वापस लाने की कोशिश कर रही है। यहाँ माल्या के ख़िलाफ देश की कई अदालतों में मुकदमा चल रहा है।
जानकारी के अनुसार माल्या की किंगफिशर एयरलाइन को दिए गए 6,900 करोड़ रुपए के मूल कर्ज में सर्वाधिक 1,600 करोड़ रुपए स्टेट बैंक ने दिए हैं। इसके अलावा, जिन अन्य बैंकों ने एयरलाइन को कर्ज दे रखा है, उनमें पंजाब नेशनल बैंक (800 करोड़ रुपए), आईडीबीआई बैंक (800 करोड़ रुपए), बैंक ऑफ इंडिया (650 करोड़ रुपए), बैंक ऑफ बड़ौदा (550 करोड़ रुपए), सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया (410 करोड़ रुपए) शामिल हैं।
कोरोना संकट में जिस तरह एक रक्षक के तौर पर सोनू सूद की छवि उभरी उसे देखते हुए कई लोग चाहते हैं कि वो राजनीति में आ जाएँ। बॉलीवुड एक्ट्रेस हुमा कुरैशी भी उसी सूची का एक नाम हैं लेकिन वह चाहती हैं कि सोनू सूद सीधा प्राइम मिनिस्टर बनें। अब हुमा के इस इच्छा पर सूद ने प्रतिक्रिया दी है।
स्पॉटबॉय को दिए अपने इंटरव्यू में सोनू ने हुमा की बात पर असहमति जताते हुए कहा, “यह थोड़ा ज्यादा हो गया। यह उनकी बहुत मेहरबानी है। अगर उन्हें लगता है कि मैं इस सम्मान के लायक हूँ तो जरूर कुछ अच्छा किया होगा। हालाँकि मैं उनसे सहमत नहीं हूँ। हमारे पास एक काबिल प्रधानमंत्री हैं। मैं ऐसी कोई जिम्मेदारी उठाने के लिए बहुत छोटा हूँ। हाँ मुझे पता है कि राजीव गाँधी 40 साल की उम्र में प्रधानमंत्री बन गए थे लेकिन वह एक खास हालात में बने थे। इसके अलावा वह एक राजनीतिक परिवार से आते थे। मेरा ऐसा कोई अनुभव नहीं है।”
अपने इंटरव्यू में सोनू सूद कहते हैं कि वो खुद को राजनीति से दूर रखना चाहते हैं। उनके अनुसार, “बाहर ऐसे लोग हैं जो मेरे राजनीति में जाने को नापसंद करेंगे। मैं नहीं चाहता कि वह परेशान हों। मेरे लिए यह जरूरी है कि मैं सिर्फ अपना काम करूँ। मैं एक अभिनेता के तौर पर अपने स्पेस का सुख ले रहा हूँ और अब आम आदमी के कष्टों में उनका हिस्सा हूँ। मुझे लगता है कि हम सत्ता में घुसे बिना अपना अपना काम कर सकते हैं।”
बता दें कि हाल में महारानी फिल्म में नजर आईं हुमा कुरैशी ने बॉलीवुड हंगामा से बात करते हुए अपनी इच्छा जाहिर की थी कि सोनू सूद को चुनाव लड़कर देश का प्रधानमंत्री बनना चाहिए। इस दौरान वह रैपिड फायर खेल रही थीं तभी उनसे पूछा गया कि उन्हें कौन से एक्टर में एक अच्छा राजनेता दिखता है। सवाल सुनकर हुमा ने बिन सोचे सोनू का नाम लिया और कहा कि अगर वह चुनाव लड़ेंगे तो हुमा उन्हें ही वोट देंगी।
पश्चिम बंगाल से एक नई बात सामने आ रही है। भाजपा ने आरोप लगाया गया है कि बंगाल में स्थानीय तृणमूल कॉन्ग्रेस (टीएमसी) ने कुछ भाजपा कार्यकर्ताओं की सूची जारी की है और बंगाल के दुकानदारों को यह आदेश दिया है कि इन भाजपा कार्यकर्ताओं को कोई भी सामान न बेचा जाए, यहाँ तक कि चाय भी नहीं। पश्चिम बंगाल में भाजपा की महिला मोर्चा अध्यक्ष केया घोष ने शनिवार (05 जून) को ट्वीट करके यह जानकारी दी।
केया घोष ने ट्वीट करके यह जानकारी दी कि स्थानीय टीएमसी ने कुछ लोगों की लिस्ट जारी की है और दुकानदारों से कहा है कि इन 18 सूचीबद्ध लोगों को कोई भी सामान न बेचा जाए, यहाँ तक कि चाय भी नहीं। यदि सामान बेचना भी है तो टीएमसी से पूछकर। घोष ने कहा कि इन सभी लोगों के बीच यही समानता है कि ये सभी भाजपा कार्यकर्ता हैं। केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने केया घोष के ट्वीट पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी यह सुनिश्चित करें कि पश्चिम बंगाल में सभी लोगों के साथ समान व्यवहार हो अन्यथा यह शर्म की बात है।
This is shocking. Would urge CM @MamataOfficial to see that ALL citizens in West Bengal are protected and not ostracised or denied the basics. Otherwise, a true shame. https://t.co/RnHYo6J6xN
भाजपा नेता स्वपन दासगुप्ता ने भी टीएमसी के इस कथित निर्णय पर कहा कि पश्चिम बंगाल में भाजपा कार्यकर्ताओं को ब्लैकलिस्ट किया जाना नया नहीं है। ऐसा करके कार्यकर्ताओं के मनोबल और उनके आर्थिक हितों को निशाना बनाया जा रहा है। स्वपन दासगुप्ता ने मीडिया की चुप्पी और पुलिस की मिलीभगत का भी आरोप लगाया। उन्होंने यह भी कहा कि राशन आदि की दुकानों के अलावा भाजपा कार्यकर्ताओं को कोरोना वायरस का टीका लेने से भी रोका जा रहा है।
The instruction of the local Trinamool Congress is aimed at shopkeepers. They are warned to not sell anything to the people who have been listed. Similar (albeit verbal)instructions have gone out to ration shops & there are reports that BJP workers have been denied vaccinations
हालाँकि पश्चिम बंगाल में भाजपा कार्यकर्ताओं को पहली बार निशाना नहीं बनाया जा रहा है। 02 मई 2021 को राज्य में विधानसभा चुनावों के परिणाम आने और तृणमूल कॉन्ग्रेस की सरकार बनने के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों के खिलाफ हिंसा शुरू हुई थी। इस हिंसा में कई कार्यकर्ताओं की हत्या तक कर दी गई थी। इसके अलावा राज्य में लूटपाट, तोड़फोड़ और महिलाओं के उत्पीड़न की खबर भी आई थी। तृणमूल कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं पर इन घटनाओं में शामिल होने का आरोप लगाया गया। चुनाव बाद शुरू हुई हिंसा के बाद भारी संख्या में भाजपा कार्यकर्ताओं और समर्थकों ने असम की ओर पलायन शुरू कर दिया था।