Home Blog Page 3734

डॉक्टर के कपड़े उतारे, घसीट-घसीट कर मारा: कमरुद्दीन समेत 24 गिरफ्तार, CM हिमंत बिस्वा सरमा बोले- बर्दाश्त नहीं करेंगे

असम के होजाइ जिले में स्थित एक कोविड केयर सेंटर में एक मरीज की मौत के बाद उसके परिजनों ने डॉक्टर के साथ मारपीट की। मंगलवार (जून 1, 2021) को हुई इस घटना के मामले में अब तक 24 आरोपितों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें मोहम्मद कमरुद्दीन, मोहम्मद जैनलुद्दीन, रेहनुद्दीन, सईदुल आलम, रहीमुद्दीन, राजुल इस्लाम, तैयबर रहमान और साहिल इस्लाम शामिल हैं। पीड़ित डॉक्टर सेजु कुमार सेनापति उडाली कोविड केयर सेंटर में तैनात थे।

असम के स्पेशल DGP जीपी सिंह ने बताया कि होजाइ के एसपी को उन्होंने सभी आरोपितों की तुरंत धर-पकड़ करने का निर्देश दे दिया था। इसके बाद मंगलवार को ही अर्धरात्रि तक 8 आरोपितों को दबोच लिया गया। जीपी सिंह ने आश्वासन दिया कि एक-एक दोषी को कानूनन सज़ा दिलाई जाएगी। अगले दिन 4 बजे तक 24 आरोपित गिरफ्तार कर लिए गए। आरोपितों में एक महिला भी है, जिसे वीडियो में डॉक्टर के साथ मारपीट करते हुए देखा जा सकता है।

स्पेशल DGP ने आश्वासन दिया है कि इस मामले में कम से कम समय में एक मजबूत चार्जशीट बनाई जाएगी, ताकि अदालत में आरोपितों के खिलाफ साक्ष्य और गवाह पेश किए जा सकें। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसमें बदमाशों का समूह अस्पताल के भीतर घुस कर डॉक्टर के कपड़े उतार कर उन्हें घसीट-घसीट कर पीट रहा था। लात-घूसों से डॉक्टर की पिटाई की गई थी। उनमें से एक अपने हाथ में बर्तन लेकर ताबड़तोड़ वार कर रहा था।

इसके बाद सभी आरोपित डॉक्टर को पकड़ कर अस्पताल के बाहर ले गए, जहाँ एक पुलिसकर्मी भी मौजूद था। हालाँकि, उत्पाती भीड़ के सामने सब बेबस थे। डॉक्टर कमल देबनाथ ने मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को टैग कर के इस तरह उनका ध्यान आकृष्ट कराया। डॉक्टर देबनाथ ने कहा कि सीएम खुद देखें कि राज्य में फ्रंटलाइन वर्कर्स की क्या हालत है। उन्होंने कहा कि इस निष्क्रियता की सज़ा डॉक्टर भुगत रहे हैं।

इसके बाद मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि इस तरह की असभ्य हरकत को उनके प्रशासन द्वारा बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। फिर उन्होंने असम पुलिस को आवश्यक कार्रवाई के लिए निर्देश दिए। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिख कर मेडिकल कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का आग्रह करते हुए कहा कि पूरे देश में इस तरह की घटनाएँ सामने आ रही हैं, इसीलिए दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।

पुलिस ने बताया है कि गिरफ्तार किए जाने वालों में मुख्य आरोपित के अलावा इस घटना की साज़िश रचने वाले भी शामिल हैं। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि वो व्यक्तिगत रूप से इस घटना के सम्बन्ध में हो रही कार्रवाई की निगरानी कर रहे हैं और वादा करते हैं कि न्याय होगा। पीड़ित डॉक्टर ने बताया कि बदमाशों की भीड़ के कारण मेडिकल कर्मचारियों को अस्पताल में ताला लगा कर भागना पड़ा। अस्पताल की खिड़कियों सहित सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाया गया।

श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर: संपदा, आस्था, और रहस्य का वह केंद्र जहाँ आज तक नहीं पहुँच सका कोई इस्लामी लुटेरा

केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम स्थित पद्मनाभस्वामी मंदिर विश्व का सबसे धनी मंदिर माना जाता है। यहाँ भगवान विष्णु, श्री पद्मनाभस्वामी के रूप में पूजे जाते हैं। यह मंदिर भगवान विष्णु की दिव्यता और भव्यता का बोध कराता है। हिंदुओं के इस प्रसिद्ध तीर्थ स्थल के बारे में मान्यता है कि यहाँ भगवान विष्णु की मूर्ति प्राप्त हुई थी, जिसके बाद इस मंदिर का निर्माण कराया गया।

इतिहास

श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर के प्रमुख देवता की प्रतिमा अपने निर्माण के लिए जानी जाती है, जिसमें 12008 शालिग्राम हैं जिन्हें नेपाल की नदी गंधकी (गंडकी) के किनारों से लाया गया था। श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर का गर्भगृह एक चट्टान पर स्थित है और जहाँ स्थापित मुख्य प्रतिमा लगभग 18 फीट लंबी है। इस प्रतिमा को अलग-अलग दरवाजों से देखा जा सकता है। पहले दरवाजे से सिर और सीना देखा जा सकता है, दूसरे दरवाजे से हाथ और तीसरे दरवाजे से पैर देखे जा सकते हैं। वर्तमान मूर्ति 1730 में मंदिर के पुनर्निर्माण के दौरान त्रावणकोर के राजा मार्तंड वर्मा के द्वारा बनवाई गई थी।

इसके पहले मंदिर में स्थापित लकड़ी की मूल मूर्ति का कोई इतिहास नहीं है। हिन्दू धर्म ग्रंथों में इस मंदिर का उल्लेख मिलता है कि श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम ने मंदिर की यात्रा की थी और मंदिर में स्थित पद्मतीर्थम में स्नान करके पूजा-अर्चना की थी। हिंदुओं के प्रसिद्ध संतों में से एक नौवीं शताब्दी के नम्मा अलवर ने भी श्री पद्मनाभस्वामी की अर्चना की। त्रावणकोर के जाने-माने इतिहासकार स्व. डॉ. एलए रवि वर्मा का यह मानना था कि यह मंदिर कलियुग शुरू होने के पहले ही दिन स्थापित हुआ था। मंदिर में प्राप्त हुए ताम्रपत्र में ऐसा लिखा हुआ है कि कलियुग प्रारंभ होने के 950वें साल में एक तुलु ब्राह्मण दिवाकर मुनि ने मूर्ति की पुनर्स्थापना की थी और 960वें साल में राजा कोथा मार्तंडन ने मंदिर का कुछ हिस्सा निर्मित कराया।  

कई बार इस मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ। आज हम जो मंदिर और भगवान श्री पद्मनाभस्वामी का जो स्वरूप देखते हैं वह त्रावणकोर के राजा मार्तंड वर्मा की देन है। माना जाता है कि श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर ऐसे स्थान पर स्थित है जो सात परशुराम क्षेत्रों में से एक है। स्कंद पुराण और पद्म पुराण में भी इस मंदिर का संदर्भ मिलता है।

रात्रि के समय श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर का दृश्य (फोटो : केरल पर्यटन)

केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम का नाम श्री पद्मनाभस्वामी के नाम पर है जिन्हें अनंत (जो अनंत सर्प पर लेटे हैं) भी कहा जाता है। शब्द ‘तिरुवनंतपुरम’ का शाब्दिक अर्थ है – श्री अनंत पद्मनाभस्वामी की भूमि।

वास्तुकला

विश्व का सबसे धनाढ्य श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर केरल और द्रविड़ वास्तु शैली के मिश्रण का एक अनूठा उदाहरण है। मंदिर के अधिकांश हिस्से में पत्थरों और कांसे पर हिन्दू धर्म के देवी-देवताओं की मूर्तियाँ उकेरी गई हैं। इनमें प्रमुख हैं, भगवान विष्णु की लेटी हुई प्रतिमा, नरसिंह स्वामी, भगवान गणेश और गजलक्ष्मी। इसके अलावा मंदिर में एक 80 फुट ऊँचा ध्वज स्तम्भ है जिसे सोने से लेपित किए गए तांबे की चादरों से ढ़का गया है।

श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर की सबसे सुंदर विशेषता है उसके मंडप, बालिप्पुरा मंडपम, मुख मंडपम और नवग्रह मंडपम। पूर्वी हिस्से से लेकर गर्भगृह तक एक गलियारा है जिसमें ग्रेनाइट के पत्थरों से बने खंभों पर शिल्पकारी की गई है। मुख्य प्रवेश द्वार के नीचे भूतल है जिसके नाटकशाला कहा जाता है। यहाँ मलयालम महीने मीनम और तुलम के दौरान आयोजित वार्षिक दस दिवसीय त्यौहार में केरल के शास्त्रीय कला कथकली का प्रदर्शन किया जाता है।

मंदिर का गोपुरम (फोटो : जागरण)

इन सब के अलावा श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर जाना जाता है अपने खजानों के लिए। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर मंदिर के कई गुप्त तहखाने खोले गए जहाँ लगभग डेढ़ से दो लाख करोड़ रुपए की संपत्ति होने का अनुमान लगाया गया। हालाँकि मंदिर का एक तहखाना जिसे ‘वॉल्ट बी’ कहा जाता है, आज तक नहीं खोला गया। इस तहखाने की विशेषता है कि इसमें कोई ताला नहीं है और न ही इसे खोलने का कोई विशेष स्थान दिखाई देता है। त्रावणकोर शाही परिवार और मंदिर से जुड़े कई लोगों का मानना है कि यह तहखाना सिद्ध तरीके से किए जाने वाले मंत्रोच्चारण से ही खुल सकता है। हालाँकि मंदिर से जुड़े और पुरातन परंपरा में विश्वास करने वाले विद्वान यही कहते हैं कि तहखानों को ऐसे ही छोड़ देना चाहिए, क्योंकि यह पूरी संपत्ति भगवान की है।   

कैसे पहुँचे?

श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर से नजदीकी हवाईअड्डा तिरुवनंतपुरम अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डा है जो मंदिर से लगभग 6 किमी की दूरी पर है। नजदीकी रेलवे स्टेशन तिरुवनंतपुरम सेंट्रल रेलवे स्टेशन है जिसकी मंदिर से दूरी मात्र 1 किमी है। तिरुवनंतपुरम देश के लगभग सभी बड़े शहरों से रेलमार्ग से जुड़ा हुआ है।  

तमिलनाडु स्थित कन्याकुमारी से तिरुवनंतपुरम स्थित इस मंदिर की दूरी 85 किमी है। चेन्नई और बेंगलुरु जैसे महानगरों से श्री पद्मनाभस्वामी मंदिर की दूरी 700-750 किमी है, लेकिन सड़कों के बेहतर नेटवर्क के कारण यहाँ सड़क मार्ग से पहुँचना आसान है।

वजन: 340 ग्राम, कीमत: ₹61200000000, गिरफ्तार: 08; लखनऊ में पकड़ी गई ‘कैलिफोर्नियम’ क्या बला है

इन दिनों दुनिया की दूसरी सबसे महँगी धातु कैलिफोर्नियम चर्चा में है। यह आम लोगों के लिए जाना-पहचाना नाम नहीं है। कैलिफोर्नियम से केवल विज्ञान क्षेत्र से जुड़े लोग ही परिचित होंगे क्योंकि यह प्राकृतिक नहीं, बल्कि प्रयोगशाला में तैयार होने वाला एक ऐसा रासायनिक तत्व है, जिसे क्यूरियम और अल्फा पार्टिकल्स को मिलाकर बनाया जाता है।

हाल ही में (गुरुवार 27 मई 2021) उत्तर प्रदेश के लखनऊ में गाजीपुर पुलिस ने बिहार के पटना और नवादा जिलों के दो युवकों सहित आठ लोगों को 340 ग्राम कैलिफोर्नियम के साथ गिरफ्तार किया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुलिस ने इन सभी को गाजीपुर थाना क्षेत्र में पॉलीटेक्निक चौराहे के पास से पकड़ा था। इनके कब्जे से कैलिफोर्नियम के अलावा दस हजार रुपए नकद, एक मारुति कार, स्कूटी व बाइक भी बरामद की गई थी।

कैलिफोर्नियम की जानकारी के लिए कई लोगों को भेजे यूट्यूब लिंक

बताया गया कि झारखंड से कुछ लोग इसको लेकर लखनऊ आए थे और कई दिनों से इसे बेचने की फिराक में थे। कई लोगों को उन्होंने यूट्यूब लिंक भी भेजा था, ताकि वो लोग जान सकें कि कैलिफोर्नियम क्या होता है और बाजार में इसका क्या दाम है। सोशल मीडिया पर कई लोगों के चैट सामने आए हैं। आरोपित सोशल मीडिया के माध्यम से धातु को बेचने की फिराक में थे। इसी बीच पुलिस के पास इनकी सूचना पहुँची। पुलिस ने जब छानबीन की तो उन्होंने इन युवकों को कैलिफोर्नियम समेत गिरफ्त में ले लिया। जाँच में अगर यह सही में कैलिफोर्नियम धातु ही निकला तो इसकी कीमत अरबों में हो सकती है। यानी 340 ग्राम कैलिफोर्नियम की कुल कीमत 61200000000 रुपए होगी, इतनी बड़ी रकम शायद ही किसी ने एक साथ देखी होगी।

क्या होता है कैलिफोर्नियम

कैलिफोर्नियम एक रेडियो एक्टिव पदार्थ है। न्यूक्लियर प्लॉन्ट में इसका इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा सोने की खदानों, बारुदी सुरंगों का पता लगाने में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। पूरी दुनिया में साल भर में केवल एक से आधे ग्राम ही कैलिफोर्नियम का उत्पादन होता है। 1 ग्राम कैलिफोर्नियम की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाजार में 26-27 लाख डॉलर डॉलर यानी करीब 18-19 करोड़ रुपए है।

कैलिफोर्नियम नाम कैसे पड़ा

पहली बार इसे 1950 में लॉरेंस बर्कल नेशनल लेबोरेटरी में बनाया गया था। ये यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफोर्निया (अमेरिका) में है। कैलिफोर्निया के नाम पर ही इसे कैलिफोर्नियम नाम दिया गया था, जिसके बाद से यह पूरी दुनिया में मशहूर हुआ। इसकी खोज स्टेलने जी. थॉमसन, कीनिथ स्ट्रीट, अल्बर्ट ग्हेयरसो और ग्लेन टी. सीबॉर्ग ने की है। पीरियोडिक टेबल में इसे सीएफ (CF) के नाम से जाना जाता है और इसकी परमाणु संख्या (एटॉमिक नंबर) 98 है। अभी तक इसके दस आइसोटॉक्स मिले हैं।

कैलिफोर्नियम का इस्तेमाल परमाणु ऊर्जा, विस्फोटक के लिए होता है

एनडीआरएफ (राष्ट्रीय आपदा मोचन बल) के इंस्पेक्टर विनय कुमार के मुताबिक, रेडियो एक्टिव पदार्थ कैलिफोर्नियम 20 प्रकार का होता है। इसके 237 से लेकर 256 आइसोटॉक्स होते हैं। कैलिफोर्नियम जिस आइसोटॉक्स अथवा जिस प्रकार का होता है, उसके अनुसार ही प्रयोग होता है। यह दुनिया का दूसरा सबसे महँगा रेडियो एक्टिव पदार्थ है। उन्होंने बताया कि कैलिफोर्नियम का इस्तेमाल परमाणु ऊर्जा, विस्फोटक, खदानों में सोने, आयल रिफाइनरी, चाँदी और अन्य धातुओं की खोज (माइनिंग) के लिए होता है। इसके अलावा दवाओं के निर्माण में भी इसका उपयोग किया जाता है।

मानव और पशु-पक्षियों के लिए जानलेवा है कैलिफोर्नियम

कैलिफोर्नियम एक खतरनाक रेडियो एक्टिव मेटल है, जो इंसानों के साथ ही पशु-पक्षियों के लिए जानलेवा साबित हो सकता है। इसके संपर्क में आने से कैंसर हो सकता है। शरीर की प्रतिरोधक क्षमता नष्ट हो सकती है। कैलिफोर्नियम प्रजनन क्षमता पर भी असर डालता है, इसकी वजह से ल्यूकोमिया और मिसकैरिज जैसी समस्याएँ भी सामने आ सकती हैं।

मुंबई के भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर से ही कैलिफोर्नियम मिलता है

चाँदी जैसे रंग का कैलिफोर्नियम साबुन की तरह होता है, जिसे ब्लेड से काटकर टुकड़ों में कर सकते हैं। देश में आम आदमी रेडियो एक्टिव पदार्थ कैलिफोर्नियम की खरीद-फरोख्त नहीं कर सकता है। यह बहुत महँगा होता है, इसे सिर्फ लाइसेंसधारी ही बेच सकते हैं। देश में मुंबई स्थित भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर से ही कैलिफोर्नियम मिलता है।

डीसीपी नॉर्थ रईस अख्तर के मुताबिक, गिरोह का सरगना कृष्णानगर की एलडीए कॉलोनी निवासी अभिषेक चक्रवर्ती और पटना निवासी रामशंकर हैं। अभिषेक मूलत: पश्चिम बंगाल का रहने वाला है। पुलिस ने उसके साथ कृष्णानगर के मानस नगर निवासी अमित सिंह, बिहार के नेवादा निवासी महेश कुमार, बाजारखाला के गुलजार नगर निवासी शीतल गुप्ता, बस्ती निवासी हरीश चौधरी, रमेश तिवारी और श्याम सुंदर को भी पकड़ा है। फिलहाल पुलिस ने आरोपितों के खिलाफ जालसाजी और ठगी का केस दर्ज किया है।

आरोपितों को पकड़ने के लिए ऐसे बिछाया जाल

वहीं, इंस्पेक्टर गाजीपुर प्रशांत मिश्रा ने बताया कि अभिषेक ने दो महीने पहले कैलिफोर्नियम की बिक्री का झाँसा देकर गोमतीनगर निवासी प्रॉपर्टी डीलर शशिलेश राय को भी अपने जाल में फँसाया था। अभिषेक ने वॉट्सऐप पर फोटो भेजे, जिसके बाद 10 लाख रुपए में सौदा तय हुआ। इस बीच अभिषेक ने शशिलेश से 1.20 लाख ऐंठ लिए थे। काफी दिन बाद भी शशिलेश को सामान नहीं मिला तो उनको ठगी का शक हुआ। ऐसे में उसने गुरुवार (27 मई 2021) की सुबह गाजीपुर पुलिस से संपर्क किया।

इंस्पेक्टर ने बताया कि पुलिस के कहने पर शशिलेश ने अभिषेक को फोन कर बकाया रकम देने का झाँसा दिया और धातु लेकर आने को कहा। पूछताछ में अभिषेक ने बताया कि महेश, रविशंकर, हरीश, रमेश और श्याम सुंदर धातु लेकर बिहार से लखनऊ के लिए निकले हैं, जबकि वह अमित और शीतल गुप्ता के साथ कृष्णानगर से पॉलिटेक्निक चौराहे के पास पहुँचा है। इस बीच सूचना मिलते ही मौके पर इंस्पेक्टर ने इन आठों को धर दबोचा।

देश की सुरक्षा को भी खतरा संभव

इस हालिया प्रकरण ने सबके समक्ष कई प्रश्न खड़े कर दिए हैं। पहला पकड़े गए इन लोगों के पास इतने बड़े पैमाने पर महँगा कैलिफोर्नियम कैसे पहुँचा? दूसरा क्या यह गिरोह पहले से ही ऐसे धातुओं की तस्करी में लिप्त है और ये लखनऊ में किन लोगों को कैलिफोर्नियम बेचेने की फिराक में थे? तीसरा यह मामला राष्ट्रीय न होकर अंतरराष्ट्रीय हो सकता है। अगर ऐसा कुछ है तो इससे देश की सुरक्षा को भी खतरा संभव है।

राजस्थान के 8 जिलों में डस्टबिन में वैक्सीन, खुलासा करने वाले मीडिया पर कार्रवाई की धमकी: जानें यहाँ हर बात

राजस्थान में कोरोना वैक्सीन के 500 वॉयल कचरे में मिले होने की खबर सामने आने के बाद वहाँ की कॉन्ग्रेसी सरकार के स्वास्थ्य मंत्री डॉ रघु शर्मा ने इसे इसे पूरी तरह से भ्रामक और झूठा बताया है। इसके साथ ही उन्होंने इसका खुलासा करने वाले ‘दैनिक भास्कर अखबार’ के खिलाफ कार्रवाई करने की बात कही है।

उन्होंने सोशल मीडिया पर कहा कि कोरोना वैक्सीन का उपयोग करने के बाद उसे नियमों के तहत मेडिकल संस्थानों में जमा कराया जाता है। हालाँकि, दैनिक भास्कर ने दावा किया है कि उसकी टीम ने 8 जिलों की 35 वैक्सीनेशन सेंटरों से कचरे से 500 वॉयल बरामद किया था, जिनमें करीब 2500 डोज थे।

समाचार पत्र ने दावा किया है कि जिन वायलों को कचरे की पेटी से बरामद किया गया था उनमें बैच नंबर के साथ ही उसे लगाने की तारीख भी दर्ज है। मीडिया संस्थान ने अपनी पड़ताल में इस बात का खुलासा किया था कि जो वायल्स कचरे के ढेर से मिले थे वो 20-75 फीसदी भरे थे।

आँकड़ों के मुताबिक, इसी साल 2021 में 16 जनवरी से लेकर 17 मई तक राज्य में 11.50 लाख से भी अधिक डोज खराब हो गए हैं। वहीं राज्य सरकार केवल 2 फीसदी वैक्सीन के बर्बाद होने का ही दावा करती है।

अब वैक्सीन के ऑडिट का आदेश

वैक्सीन की बर्बादी का मामला उजागर होने के बाद राजस्थान के प्रमुख शासन सचिव और स्वास्थ्य अखिल अरोड़ा ने कहा कि शुरुआती जाँच में वैक्सीन बर्बादी नहीं पाई गई है। बावजूद इसके जिन स्थानों पर इसकी बर्बादी की घटनाएँ हुई हैं वहाँ वैक्सीन ऑडिट के निर्देश दिए गए हैं।

गौरतलब है कि राजस्थान के चुरू में सबसे ज्यादा 39.7 फीसदी , भरतपुर कमें 17.13 प्रतिशत, कोटा में 16.71 फीसदी, चित्तौड़गढ़ में 11.81 फीसदी , हनुमानगढ़ में 24.60 प्रतिशत, जालौर में 9.63%, सीकर में 8.83%, अलवर में 8.32% और चौलपुर में 7.89 वैक्सीन बर्बाद हो गई थी। इसके अलावा जयपुर प्रथम में 4.67% और द्वितीय में 1.31% वैक्सीन की डोज बर्बाद हो गई।

डेढ़ करोड़ से अधिक वैक्सीनेशन का दावा

राजस्थान के स्वास्थ्य मंत्री डॉ रघु शर्मा ने प्रदेश में 1.66 करोड़ लोगों के टीकाकरण का दावा किया है। उन्होंने सोशल मीडिया पर बताया कि राज्य में 18-44 आयुवर्ग में जीरो वेस्टेज एवं 45 से अधिक आयुवर्ग में वैक्सीन का वेस्टेज 2% से कम है जो केंद्र द्वारा निर्धारित सीमा 10% व वैक्सीन वेस्टेज की राष्ट्रीय औसत 6% से बेहद कम है।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने लिखा राजस्थान के स्वास्थ्य मंत्री को पत्र

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ हर्षवर्धन ने सोमवार (31 मई 2021) को राजस्थान के स्वास्थ्य मंत्री रघु शर्मा को वैक्सीन बर्बादी को लेकर एक पत्र लिखा।

केंद्रीय मंत्री ने रघु शर्मा से इस मामले पर ध्यान देने का आग्रह करते हुए पत्र में लिखा, “राजस्थान के लगभग सभी जिलों में, वैक्सीन की बर्बादी राष्ट्रीय औसत 1 फीसदी से काफी ज्यादा है। दैनिक भास्कर के लेख में यह भी बताया गया है कि राज्य में 35 कोविड -19 टीकाकरण केंद्रों के कचरे के डस्टबिन में कोरोना टीकों की 500 से अधिक शीशियाँ पाई गईं।”

उन्होंने कहा, “ये बहुत बड़ी बर्बादी है, आप इससे सहमत होंगे, स्वीकार्य नहीं है।”

इसके साथ ही केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने शर्मा को लिखे पत्र को ट्विटर पर भी शेयर किया और कहा कि उन्होंने राज्य के स्वास्थ्य मंत्री से इस मुद्दे पर स्थानीय स्तर पर बेहतर तैयारी करने को कहा है।

एक अन्य ट्वीट में उन्होंने प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का कोट लिखा कि एक खुराक की भी बर्बादी का मतलब किसी व्यक्ति को कोविड -19 से बचाने में विफल हो जाना है।

600 शिक्षाविदों ने लिखा पत्र, कहा- पश्चिम बंगाल में चुनाव बाद हिंसा की SC के निगरानी में हो SIT जाँच

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनावों में राज्य की सीएम ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कॉन्ग्रेस की जीत के बाद शुरू हुई हिंसा पर देश के 600 शिक्षाविदों ने पत्र लिखा है। शिक्षाविदों ने ममता बनर्जी सरकार को आगाह किया है कि सरकार राजनैतिक विद्रोहियों के खिलाफ हिंसा का माहौल बनाकर संवैधानिक मूल्यों के साथ खिलवाड़ न करे। पत्र लिखने वालों में प्रोफेसर, वाइस चांसलर, डायरेक्टर, डीन और पूर्व वाइस चांसलर शामिल हैं।

शिक्षाविदों ने टीएमसी सरकार से राज्य में बदले की राजनीति बंद करने की माँग की है। पत्र में कहा गया है कि टीएमसी से जुड़े आपराधिक किस्म के लोग उसकी विपरीत विचारधारा वाले लोगों पर हमले कर रहे हैं। पत्र में यह भी कहा गया है कि हजारों लोगों की संपत्ति को नुकसान पहुँचाने के साथ ही उनके साथ लूट-पाट भी की गई है।

600 विद्वानों द्वारा साइन किया गया लेटर

इसमें ये दावा किया गया है कि बंगाल में टीएमसी को वोट नहीं करने वाला समाज का एक बड़ा वर्ग डर के साए में जी रहा है। ये टीएमसी समर्थकों द्वारा पीड़ित हैं। हत्या, बलात्कार और लूट के भय से हजारों लोग असम, झारखंड और ओडिशा में शरण ले रहे हैं। अधिकांश मीडिया, पुलिस और प्रशासन या तो अपराधियों के साथ हैं या राज्य सरकार के भय से चुप्पी साधे हुए हैं।

हस्ताक्षरकर्ताओं ने बंगाल के उन लोगों के लिए चिंता व्यक्त की है, जिन्हें स्वतंत्र और निष्पक्ष मतदान के अपने लोकतांत्रिक अधिकार का प्रयोग करने पर सत्तासीन पार्टी (टीएमसी) का गुस्सा झेलना पड़ा। शिक्षाविदों ने पत्र में कहा, “हम समाज के कमजोर वर्गों के बारे में चिंतित हैं, जिन्हें भारत के नागरिक के रूप में अपने अधिकार का प्रयोग करने के कारण सरकार द्वारा परेशान किया जा रहा है।”

बयान जारी करने वालों में प्रो प्रकाश सिंह, दिल्ली विश्वविद्यालय, प्रो गोवर्धन दास, जेएनयू, डॉ जेएसपी पांडे, लखनऊ विश्वविद्यालय, प्रो जय कुमार, केरल केंद्रीय विश्वविद्यालय, प्रो गोपाल रेड्डी–उस्मानिया विश्वविद्यालय, हैदराबाद समेत करीब 600 से अधिक प्रोफेसर और स्कॉलर्स शामिल हैं।

देश के दूसरे हिस्सों में हिंसा फैलने की आशंका

पश्चिम बंगाल में चुनाव बाद हिंसा को लेकर शिक्षाविदों ने बंगाल हिंसा के चलते देश के दूसरे हिस्सों में भी हिंसा फैलने की आशंका है। शिक्षाविदों ने बिहार के पूर्णिया जिले में महादलित समुदाय के सदस्य मेवालाल की लिंचिंग, 12 घरों को जलाने और असामाजिक तत्वों द्वारा कई अन्य हिंसा की घटनाओं को भी इसी से जोड़ कर देखना चाहिए, क्योंकि ये बंगाल के आसपास के क्षेत्र हैं।

इसके अलावा शिक्षाविदों ने अपने पत्र में सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त एसआईटी जाँच की माँग की है। साथ ही उन्होंने स्वतंत्र एजेंसियों से पश्चिम बंगाल में चुनाव के बाद हुई हिंसा की जाँच करने को कहा है।

चुनाव बाद हिंसा

पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के नतीजे घोषित होने के बाद यहाँ राजनीतिक हिंसा आम बात हो गई है। टीएमसी के गुंडों के हौसले बढ़ते ही जा रहे हैं। उन्हें लेशमात्र भी कानून का खौफ नहीं है। बंगाल से राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ बड़ी संख्या में हिंसा की सूचना मिली है। इनमें सबसे अधिक पीड़ित भाजपा समर्थक और कार्यकर्ता रहे हैं, जबकि आरोपित ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी के समर्थक बताए गए थे। विधानसभा चुनावों में टीएमसी की जीत के बाद हुई हिंसा में लगभग एक दर्जन से अधिक भाजपा कार्यकर्ता अपनी जान गँवा चुके हैं।

भाजपा के सैकड़ों कार्यकर्ताओं और समर्थकों को परिवारों समेत अपने गाँवों से पलायन करने के लिए मजबूर कर दिया गया था। वे असम चले गए, जहाँ मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने उनकी मदद की। उन्होंने सभी भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए रहने और भोजन की व्यवस्था की। गौरतलब है कि सिर्फ भाजपा ही नहीं, बल्कि माकपा ने भी टीएमसी पर अपने कार्यकर्ताओं की हत्या का आरोप लगाया है। मीडिया में बीएसएफ जवानों पर हमले की खबरें भी सामने आई हैं।

मोदी सरकार ने वैक्सीन विदेश क्यों भेजी और अब क्यों नहीं दे रहे की माँग? कॉन्ग्रेस का रुख राहुल गाँधी से ज्यादा कन्फ्यूज

कॉन्ग्रेस और राहुल गाँधी द्वारा ‘वैक्सीन मैत्री’ कार्यक्रम को लेकर भारत सरकार पर निशाना साधने के बाद, अब पार्टी के वरिष्ठ नेता शशि थरूर कोरोना वैक्सीन के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने के लिए मोदी सरकार पर हमला कर रहे हैं।

शशि थरूर ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. सौम्या स्वामीनाथन की एक टिप्पणी का हवाला देते हुए कहा कि सरकार को कोविड-19 वैक्सीन के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने के लिए शर्म से सिर झुका लेना चाहिए। उन्होंने कहा, “जब डब्ल्यूएचओ की एक वरिष्ठ अधिकारी, एक प्रतिष्ठित भारतीय कहती हैं कि भारत द्वारा वैक्सीन के निर्यात पर प्रतिबंध लगाने के फैसले से 91 देशों पर गंभीर प्रभाव पड़ा है, तो विश्वगुरु को (सरकार) अपना सिर शर्म से झुका लेना चाहिए।”

डॉ. सौम्या स्वामीनाथन ने कहा है कि वैक्सीन की सप्लाई में कमी के कारण 91 देशों में आपूर्ति बाधित हुई है। उन्होंने NDTV से कहा कि 91 देश आपूर्ति की कमी से प्रभावित हैं, खासकर तब से जब एस्ट्राजेनेका अपनी सहयोगी कंपनी सीरम से आई खुराक की कमी की भरपाई करने में सक्षम नहीं है।

विडंबना यह है कि प्रियंका गाँधी टीकों के निर्यात को लेकर हमेशा प्रधानमंत्री मोदी पर हमलावर रही हैं। उनका कहना है कि पीएम मोदी भारतीय बच्चों की वैक्सीन विदेश भेज रहे हैं।

इसी मुद्दे को लेकर राहुल गाँधी भी सरकार पर निशाना साधते रहे हैं।

इन परिस्थितियों को देखने के बाद हम कह सकते हैं कि शशि थरूर और उनकी कॉन्ग्रेस पार्टी मोदी सरकार को जबरन घेर रही है। जहाँ एक ओर राहुल और प्रियंका वैक्सीन के निर्यात को लेकर केंद्र सरकार पर निशाना साध रहे हैं। वहीं, दूसरी ओर शशि थरूर उनसे भी चार कदम आगे जाकर वैक्सीन के प्रतिबंध को लेकर भारत सरकार पर हमलावर हो रहे हैं।

भारत के “विदेशों में वैक्सीन की खुराक भेजने” का पूरा नैरेटिव गलत है, क्योंकि ‘वैक्सीन मैत्री’ के तहत मित्र राष्ट्रों को भेजी जाने वाली वैक्सीन की खुराक भारत द्वारा अपने नागरिकों को पहले से ही उपलब्ध कराई गई डोज का एक बहुत छोटा सा हिस्सा है। साथ ही ‘वैक्सीन मैत्री’ पहल ने भारत के लिए बड़े स्तर पर अंतरराष्ट्रीय सद्भावना का निर्माण किया है, जो देश की उदारता को प्रकट करता है कि किस प्रकार वह कोरोना संकटकाल में अन्य देशों की मदद के लिए आगे आ रहा है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत ने अनुदान के तौर पर अब तक एक करोड़ 7 लाख 15 हजार टीके अनुदान में दिए हैं। जिन देशों को 1 लाख टीकों से ज्यादा की खेप अनुदान में यानी तोहफे के तौर पर दी उनकी संख्या 19 है। इन देशों में भी सबसे बड़ा हिस्सा पाने वाले अधिकतर भारत के पड़ोसी हैं। यदि अनुदान की हिस्सेदारी देखें तो 75 लाख टीके सार्क के पड़ोसी मुल्कों को दिए गए हैं। मालूम हो कि भारत 20 करोड़ से ज्यादा लोगों को कोविड टीका लगाने वाला अमेरिका के बाद दुनिया का दूसरा देश बन गया है।

लेकिन फिर भी कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा इस पहल की कड़ी आलोचना की गई, जबकि अब वह कहती है कि भारत सरकार को शर्म से सिर झुका लेना चाहिए। एनडीटीवी की रिपोर्ट में भी बेहद अजीबोगरीब अंदाज में वैक्सीन मैत्री पर हमला करते हुए सरकार पर निर्यात रोकने का आरोप लगाया गया है।

एनडीटीवी की रिपोर्ट के मुताबिक, “पिछले साल न केवल भारत अपने नागरिकों के लिए बड़ी संख्या में ऑर्डर देने में विफल रहा, बल्कि इस साल 16 अप्रैल 2021 तक लगभग 66.3 मिलियन खुराक का निर्यात किया गया, जिसे वैक्सीन मैत्री के रूप में जाना जाता है। ये भारत को दुनिया के वैक्सीन-निर्माण केंद्र के रूप में दिखाते हुए मित्र राष्ट्रों की मदद करने का प्रयास है।”

कोरोना की दूसरी लहर में सबसे अधिक प्रभावित होने पर नई दिल्ली ने वैक्सीन के निर्यात पर तुरंत प्रतिबंध लगा दिया। देश के भीतर राज्यों को फिर से निर्देश दिया कि टीकाकरण कार्यक्रम को प्राथमिकता वाले आयु वर्ग (18 से 44 वर्ष) के लिए खोल दिया है। इस प्रक्रिया में गावी के माध्यम से दर्जनों देशों को आपूर्ति के आधार पर हाई और ड्राई छोड़ दिया गया था।

यहाँ आईने की तरह पूरी तरह से साफ है कि ‘अगर हेड आया तो मैं जीता हूँ और टेल आया तो आप हारे हैं’ यानी यही स्थिति भारत सरकार के खिलाफ एजेंडे के तहत आलोचना करने वाली कॉन्ग्रेस पार्टी पर लागू होती है। इसके अलावा, कॉन्गेस पार्टी फ्लिप-फ्लॉप में उलझी हुई है, जो किसी को भी शर्मसार कर देगी। अन्य ‘पत्रकार’ भी आलोचना करने के लिए इस मौके का फायदा उठा रहे हैं, जिसका शायद ही कोई मतलब है।

हालाँकि, यह सच है कि अफ्रीकी देशों को पर्याप्त मात्रा में टीके नहीं मिले हैं, लेकिन इसके लिए विकसित पश्चिमी देशों की बजाए भारत को दोष देना मूर्खतापूर्ण लगता है, जिनमें से कुछ वैक्सीन की जमाखोरी में लिप्त हैं।

यह स्पष्ट रूप से भारत की प्रतिष्ठा को धूमिल करने का प्रयास है। कॉन्ग्रेस पार्टी भारत की प्रतिष्ठा की परवाह किए बिना इसमें सक्रिय भूमिका निभा रही है। कोरोना की दूसरी लहर बेहद घातक साबित हो रही है। इस दौरान टीकों के उपलब्ध न होने और वैक्सीन मैत्री लेकर सरकार की कड़ी आलोचना की गई थी। अब, वही लोग उसी के निर्यात को रोकने के लिए सरकार पर आरोप लगा रहे हैं।

मुस्लिम लीग ने गैर मुस्लिमों को नागरिकता देने के केंद्र के फैसले को SC में दी चुनौती, धार्मिक आधार पर बताया भेदभाव

इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने केंद्र सरकार के अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान में रह रहे गैर मुस्लमों को देश की नागरिकता देने के फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है।

गृह मंत्रालय ने नागरिकता अधिनियम 1955 और 2009 में कानून के तहत बनाए गए नियमों के तहत इस आदेश के तत्काल कार्यान्वयन के लिए अधिसूचना जारी की है। जबकि, यह नियम 2019 में सीएए (CAA) के तहत बनाए गए थे।

इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग की ओर से एडवोकेट हारिस बीरन और एडवोकेट पल्लवी प्रताप ने केंद्र सरकार के फैसले का विरोध करते हुए सुप्रीम कोर्ट को बताया कि केंद्र ने पहले कहा था कि नागरिकता संशोधन अधिनियम पर रोक लगाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि नागरिकता संशोधन अधिनियम के नियम नहीं बनाए गए हैं।

आईयूएमएल ने केंद्र सरकार पर धार्मिक आधार पर भेदभाव करने का आरोप लगाते हुए विदेशी आदेश, 1948 के आदेश 3A और पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) नियम, 1950 के नियम 4(ha) के बीच संविधान के अनुच्छेद 14, 15,21 और संविधान के बेसिक स्ट्रक्चर का उल्लंघन करने को लेकर केंद्र के खिलाफ कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

आईयूएमल का कहना है कि उसकी याचिका लंबित होने के बावजूद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने यह अधिसूचना जारी कर दिया, जो गैरकानूनी है।

पाँच राज्यों के 13 जिलों में रह रहे गैर मुस्लिम कर सकेंगे आवेदन

गृह मंत्रालय द्वारा शुक्रवार (28 मई 2021) को जारी इस अधिसूचना में गुजरात, राजस्थान, छत्तीसगढ़, पंजाब और हरियाणा के 13 जिलों में रह रहे अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश के गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों को भारतीय नागरिकता का आवेदन करने का अधिकार दिया गया है। इससे पहले वर्ष 2016 में देश के 16 जिलाधिकारियों को नागरिकता अधिनियम,1955 के तहत नागरिकता के लिए आवेदन स्वीकार करने के लिए कहा गया था।

2019 में केंद्र सरकार लाई थी यह कानून

पड़ोसी देशों में शोषित अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता देने के लिए केंद्र सरकार यह कानून 2019 में लाई थी। इसे 10 जनवरी, 2020 से केंद्र सरकार ने देश में प्रभावी करने का ऐलान किया था।

मुख्य सचिव अलपन से लेकर बैठक के मुद्दों तक, ममता बनर्जी के एक-एक आरोपों का केंद्र ने दिया जवाब: जानें पूरी डिटेल

केंद्र सरकार और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच चक्रवात ‘यास’ की समीक्षा बैठक के दौरान शुरू हुए विवाद के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार पर कई आरोप लगाए जिनका केंद्र सरकार के सूत्रों ने तथ्यों के साथ जवाब दिया है। 

ममता बनर्जी का आरोप : पीएम मोदी के कार्यक्रम और मीटिंग की जानकारी देर से मिली।

केंद्र का जवाब : सीएम ममता बनर्जी के बयान पर केंद्र सरकार के सूत्रों ने जवाब दिया है कि बैठक चक्रवात के बाद हुई तबाही की समीक्षा के लिए आयोजित की गई थी इसलिए तूफान आने के पहले ही इस मीटिंग का आयोजन संभव नहीं था। हालाँकि, ओडिशा को भी इसी तरह मीटिंग की सूचना दी गई थी लेकिन ओडिशा ने बेहतर तरीके से सामंजस्य स्थापित किया।

ममता का बयान : पहले से तय थे उनके कार्यक्रम

केंद्र का जवाब : केंद्र सरकार के सूत्रों ने बताया कि ममता बनर्जी को जब इस मीटिंग की जानकारी दी गई तब वह मीटिंग में शामिल होने के लिए राजी थीं लेकिन जब उन्हें यह पता चला कि मीटिंग में उन्हें नंदीग्राम से हराने वाले शुभेन्दु अधिकारी शामिल होंगे तब ही उन्होंने मीटिंग में शामिल न होने का फैसला किया। 

ममता का बयान : पीएम मोदी का इंतजार उन्होंने किया।

केंद्र का जवाब : पीएम मोदी ने कलईकुंडा में 1:59 बजे दोपहर लैंड किया जबकि ममता बनर्जी 2:10 बजे दोपहर पर वहाँ पहुँची। इससे पता चलता है कि ममता बनर्जी ने नहीं बल्कि पीएम मोदी ने उनका इंतजार किया। हालाँकि महुआ मोइत्रा के ट्वीट ने ममता बनर्जी की ही पोल खोल दी। अपने ट्वीट में टीएमसी की सांसद महुआ मोइत्रा ने लिखा है, “थोड़ा आप भी वेट कर लीजिए कभी-कभी।“

ममता का बयान : पीएम मोदी के हेलिकॉप्टर की लैंडिंग के पहले उन्हें 20 मिनट तक इंतजार करना पड़ा।

केंद्र का जवाब : केंद्र सरकार के सूत्रों के बताया कि एक मुख्यमंत्री होने के नाते उन्हें पीएम से पहले पहुँचना चाहिए और ऐसा हमेशा से होता आया है। इसके अलावा एक मुख्यमंत्री से यह उम्मीद की जाती है कि वह पीएम के सुरक्षा प्रोटोकॉल्स को बेहतर तरीके से जानते हैं।

ममता का बयान : मुख्य सचिव को लेकर केंद्र सरकार का आदेश असंवैधानिक और गैर-कानूनी है।

केंद्र का बयान : इस पूरे मामले में इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर जवाब देते हुए केंद्र सरकार के सूत्रों ने बताया कि मुख्य सचिव ऑल इंडिया सर्विसेस के अंतर्गत आते हैं लेकिन पीएम की समीक्षा मीटिंग के दौरान उन्होंने अपने संवैधानिक दायित्व का निर्वहन नहीं किया। पीएम मोदी को कोई प्रेजेंटेशन भी नहीं दी गई। एक ऑल इंडिया सर्विस के अधिकारी से यह उम्मीद की जाती है कि वह राजनीति का हिस्सा न बनकर अपने कर्त्तव्य का निर्वहन करेगा।

ममता का बयान : भारत सरकार ने ही मुख्य सचिव का कार्यकाल तीन महीने बढ़ाया।

केंद्र का बयान : सूत्रों ने बताया कि केंद्र सरकार ने ही राज्य के साथ सामंजस्य बैठाते हुए मुख्य सचिव अलपन बंद्योपाध्याय का कार्यकाल तीन महीने के लिए बढ़ाया था। यह बताता है कि केंद्र सरकार ने पश्चिम बंगाल सरकार के साथ मिलकर ही काम किया।

ममता का बयान : बैठक में एक विधायक को शामिल किया गया।

केंद्र का बयान : केंद्र सरकार के सूत्रों ने जवाब देते हुए कहा कि शुभेन्दु अधिकारी मुख्य विपक्षी नेता हैं और उनके क्षेत्र में भी चक्रवात का असर हुआ है। इसके अलावा सूत्रों ने बताया कि कई गैर-भाजपा शासित राज्यों में भी ऐसी बैठकों में दूसरे दलों के नेता भी उपस्थित रहे हैं।

ममता का बयान : मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि मुख्य सचिव द्वारा इस मामले में पीएम मोदी के सहयोगी अधिकारी को सूचना दे दी गई थी लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।

केंद्र का जवाब : केंद्र सरकार के सूत्रों का कहना है कि केंद्र सरकार की ओर से कोई भी आपत्ति नहीं जताई गई। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने शुभेन्दु अधिकारी के मीटिंग में शामिल होने के कारण मीटिंग छोड़ने का फैसला किया।

ममता का बयान : पीएम मोदी की अनुमति के बाद ही बैठक से चली गई थीं ममता बनर्जी।

केंद्र का जवाब : सूत्रों की ओर से यह स्पष्ट कहा गया कि ऐसी कोई भी अनुमति नहीं दी गई।    

पश्चिम बंगाल में आए ‘यास’ चक्रवात के समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 28 मई को चक्रवात की समीक्षा के लिए जो मीटिंग की थी वहाँ मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तत्कालीन मुख्य सचिव अलपन बंद्योपाध्याय देर से पहुँचे थे और वापस चले भी गए थे। इसके बाद से ही पश्चिम बंगाल सरकार और केंद्र सरकार के बीच टकराव की स्थिति बनी हुई है। यह पूरा मुद्दा मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव अलपन बंद्योपाध्याय पर सीमित हो गया था जिन्हें केंद्र सरकार ने कार्मिक एवं प्रशिक्षण मंत्रालय बुला लिया था। हालाँकि अलपन बंद्योपाध्याय ने रिटायरमेंट ले लिया और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के मुख्य सलाहकार बन गए।  

गाँधी जब उठाए थे लाठी: PETA ने उनकी बकरी और दूध पर कर दी थी हिंसक बात

आज विश्व दूध दिवस है। दूध दिवस! मतलब एक जून की रोटी के साथ दूध मिलने की गारंटी? विश्व दूध दिवस सुनकर लगा जैसे किसी राजा ने नियम निकाला हो कि साल में बस आज के दिन सबको दूध मिलेगा। या फिर दूध ने विश्व भर के लोगों के साथ यह समझौता किया हो कि उसे साल में बस एक दिन खाया या पीया जा सकता है? भाई, विश्व दूध दिवस सुनकर सदियों से दूध खाने और पीने वाले हम भारतीयों के मन में और आएगा?
 
हम बचपन से सुनते आए हैं कि हमारे देवी देवता तो क्षीर सागर में आज भी रहते ही हैं, पर पहले हमारे देश की धरती पर भी दूध की नदियाँ बहती थीं। सोचिए कि हमारे पूर्वज जाने-अनजाने में डूबते भी होंगे तो पानी की नदी में नहीं बल्कि दूध की नदी में। मने नदी पार करते हुए नाव में छेद होता होगा तो उसके भीतर पानी नहीं बल्कि दूध घुसता होगा और उसमें बैठे हमारे पूर्वज नाव को डूबने से बचाने के लिए उस दूध को बाहर न फेंक कर पी जाते होंगे। पीने की इच्छा न होती होगी तो नींबू गार करके उस दूध का छेना बना लेते होंगे। उसी छेना में से कुछ नाव में हुए छेद में घुसा देते होंगे। नाव डूबने से बच जाती होगी और वे बाकी का बचा छेना लेकर पार भी उतर जाते होंगे। आपदा में अवसर वाला मुहावरा पहली बार यहीं से निकला होगा। 

इतिहासकार ऐसा बताते हैं कि हमारे पूर्वज जब यात्रा पर जाते थे तब साथ नींबू लेकर जाते थे ताकि जब किसी झरने से पानी लें तो उसमें नींबू गार के पीते थे जिससे उन्हें पेट की बीमारियाँ नहीं होती थी। दरअसल इन इतिहासकारों ने सच नहीं लिखा है। सच यह है कि वे लोग नींबू इसलिए साथ रखते थे ताकि जहाँ मन करे नदी से दूध लेकर उसमें नींबू का रस डाल कर छेना बना लें और उसके साथ घर से लाई रोटी खा लें। ऐसा लिखने के पीछे इतिहासकारों का उद्देश्य यह था कि हमने बचपन से दूध की नदियाँ बहने की जो कहानी सुनी है, उसे भूल जाएँ।

इन इतिहासकारों का मानना था कि हमसे यह बात छिपा ली जाए ताकि हम अपनी संस्कृति और इतिहास पर गर्व न कर सकें। वैसे तो इस बात का लिखित प्रमाण नहीं मिलता कि नगर पालिका के नियमों में पहले भी खतरे के निशान वाला कांसेप्ट था या नहीं पर यदि होता होगा तो बाढ़ के समय पानी नहीं बल्कि दूध खतरे के निशान से ऊपर जाता होगा।

ऐसे भारतवासियों से आज PETA कह रहा है कि वेगन मिल्क पीयो। बता रहा है कि गाय और भैंस का दूध पीना पाप है। दूध निकालना गायों और भैंसों के साथ क्रूरता है, निष्ठुरता है, निर्दयता है। (मैंने प्रवाह में तीन शब्द लिख दिए हैं, आपको जो पसंद आए उसे चुन लें।) यह बात उन्हें कही जा रही है जिनके भगवान कान्हा गाय के दूध से बनी दही और माखन से कितना प्यार करते थे यह हम सब जानते हैं। मने वे तो इतना प्यार करते थे कि दूसरों के घर में घुसकर इन चीजों की चोरी कर लेते थे। सोचिए कि आज यदि कान्हा सुनते तो क्या कहते? वे तो भगवान थे तो शायद कुछ न कहते पर सोचिए कि जो गोपियाँ मन ही मन प्रार्थना की थीं कि उनका कान्हा उनके घर से माखन चुरा लेता तो उनके सात जनम तर जाते, वे क्या कहतीं? 

क्या होता जब वे पूछती कि ; क्यूँ री, तुझे हमारी गायों से प्यार नहीं है जो तू हमारे दूध निकालने को गायों के प्रति निर्दयता बता रही है? 

इधर से PETA वाली कहती; आप हमें गलत समझ रही हैं। हम दूध के खिलाफ इसलिए हैं क्योंकि उसे निकालते समय गायों को कष्ट होता है, यू नो! इसलिए हम इस कष्ट से उन्हें बचाने के लिए अभियान चलाते हैं। 

यदि अगला प्रश्न आ जाता; कष्ट तो उन्हें तब भी होता है जब उन्हें काटा जाता है?

तो उत्तर आता; नहीं, काटने के लिए मशीन इस्तेमाल करने से इतना कष्ट नहीं होता जितना दूध निकालने से होता है। ये आर्टिकल पढ़िए, इसमें एक अमरीकी वैज्ञानिक ने यह साबित कर दिया है कि दूध निकालते समय गाय के अंदर PETAtene हार्मोन बनता है जिससे उन्हें कष्ट होता है पर उन्हें काटते समय यह हॉर्मोन नहीं बनता इसलिए उन्हें कष्ट नहीं होता। 

कान्हा ये कन्वर्सेशन सुन लेते तो सुदर्शन चक्र नचाने लगते।  

PETA वालों की बात सुनकर आशुतोष की तरह मेरे मन में भी प्रश्न उठा कि; आज यदि महात्मा गाँधी होते तो क्या कहते? 

महात्मा ने बकरी पाल रखी थी। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि उन्होंने बकरी इसलिए पाल रखी थी ताकि उसका दूध पी सकें। कुछ घुटे हुए टाइप इतिहासकार मानते हैं कि; उन्होंने बकरी इसलिए पाल रखी थी ताकि कोई अवांछित व्यक्ति मिलने आ जाए तो वे बकरी को चारा खिलाने के बहाने व्यस्त हो जाएँ। इन घुटे हुए इतिहासकार इस निष्कर्ष पर वे तमाम तस्वीरें देखकर पहुँचे हैं जिनमें गाँधी जी के आस-पास दो-चार लोग बैठे हुए हैं और गाँधी जी अपनी पालतू बकरी को घास खिला रहे होते थे। 

जरा कल्पना कीजिये कि गाँधी जी अपनी बकरी को घास खिला रहे हैं और पास ही बर्तन रखा हुआ है क्योंकि घास खाने के बाद बकरी को दुहा जाएगा। उसी समय PETA से एक कन्या पहुँच जाती और कहती; महात्मा, आप बकरी का दूध न पीया करें? आप वेगन दूध पीया करें। 

बा वहीं होती और पूछती; बेटी, तुम्हारे कहने का अर्थ है बैंगन के तने से निकलने वाले दूध को हम पीयें! पर उससे उतना दूध निकलेगा कि बापू पी सकें?

कन्या बोलती; बैंगन नहीं,  बैंगन नहीं, वेगन बा, वेगन। 

बा पूछतीं; ये वेगन क्या होता है बेटी? मुझे समझाओ जरा। 

कन्या बोलती; बा, वेगन का मतलब और चीजों का दूध पीजिये जैसे सोयाबीन, काजू, बादाम… वगैरह वगैरह। जब बकरी का दूध निकाला जाता है न बा, तब बकरी को बहुत कष्ट होता है। इसलिए हम चाहते हैं कि बापू वेगन दूध पीएँ। 

ये सुनकर बापू के मन में आता; आज तक तो बकरी को कोई कष्ट होते नहीं देखा। ये किस कष्ट की बात कर रही है! यह सोचते सोचते अहिंसा के पुजारी महात्मा भी अपनी लाठी उठाकर दौड़ा लेते। यह घटना इतिहास में दर्ज हो जाती। इसे भी अलग-अलग इतिहासकार अपनी तरह से लिखते। 

असली इतिहासकार लिखते कि; एक क्षण ऐसा भी आया था जब महात्मा गाँधी ने अहिंसा त्याग दी थी। पर गाँधी जी की महानता यह थी कि उन्होंने बकरीद पर कटने वाले बकरों और बकरियों को लेकर PETA के स्टैंड पर सवाल नहीं उठाए। इससे साबित होता है कि वे बकरियों से शायद यह कहना अधिक उचित समझते कि; मुसलमान यदि चाहते हैं कि वे तुम्हें काटें तो तुम्हारा खुद को उनके सामने समर्पण कर देना ही मानवता की सेवा है। 

वहीं घुटे हुए नकली इतिहासकार लिखते; महात्मा उस लड़की की बात सुन यह सोचकर नाराज हो गए कि; इतने वर्षों की मेहनत के बाद मैंने एक गरीब की अपनी इमेज बनाई। ये लड़की तो बादाम का दूध पिलाकर मुझे अमीर साबित करवा देगी। ऊपर से मैंने जानबूझकर गाय नहीं पाली ताकि हिन्दुओं की ओर खड़ा न दिखाई दूँ और ये मेरी छवि बर्बाद करने पर तुली है। 

PETA वाले यह भी बताते हैं कि गाय भैंस का दूध छोड़ लोगों को हर वह चीज पीना चाहिए जो दूध का फील देता हो। लोग तो यह सोचकर भी परेशान हैं कि; ये लोग इस चक्कर में वो डिटर्जेंट और यूरिया वाला दूध भी न प्रमोट करने लग जाएँ। सोचिए कि ऐसा जो हो जाए तो क्या-क्या हो सकता है! 

हम देखेंगे कि देश में यूरिया की कमी हो गई। किसानों को यूरिया नहीं मिल पा रहा। उधर देश में बनने वाला सारा डिटर्जेंट दूध में खप जा रहा है। लोगों के पास कपड़े धोने के लिए डिटर्जेंट नहीं है। सब मैले कुचैले कपड़े पहने घूम रहे हैं। PETA वाले खुश हैं। गायों को कष्ट नहीं हो रहा है। वे जहाँ-तहाँ खुश होकर घूम रही हैं। यूरिया न मिलने की वजह से फसलों की पैदावार में भीषण कमी आ गई है। सब केवल वेगन दूध पी रहे हैं। 

सीन कुछ डरावना हो गया न! अरे परेशान न हो, युधिष्ठिर ने कहा था कि मन बहुत तेज चलता है। ये सब बस उसी मन की वजह से है।          

CM योगी का ‘मिशन जून’: UP के 75 जिलों में इस महीने 1 करोड़ लोगों के वैक्सीनेशन का लक्ष्य

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने जून महीने में राज्य के 75 जिलों में 90 लाख से 1 करोड़ लोगों का टीकाकरण करने का लक्ष्य रखा है। इस वृहद टीकाकरण कार्यक्रम को नाम दिया गया है, ‘मिशन जून’।

उत्तर प्रदेश सरकार के द्वारा दी गई सूचना के अनुसार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आदेशित किया है कि मिशन जून के अंतर्गत समाज के सभी तबकों का टीकाकरण किया जाना चाहिए। ट्विटर के माध्यम से सीएम आदित्यनाथ ने राज्य में 18 वर्ष से अधिक आयु के लोगों के लिए शुरू किए जा रहे टीकाकरण महाअभियान की जानकारी दी और लोगों से अपील की कि वो अधिक संख्या में अपनी ‘जीत का टीका’ लें।

सीएम आदित्यनाथ ने लखनऊ के केडी सिंह बाबू स्टेडियम की अपनी यात्रा का एक वीडियो भी शेयर किया जहाँ से आज (01 जून) मिशन जून की शुरुआत की गई। सोमवार (31 मई) को एक उच्च स्तरीय बैठक को संबोधित करते हुए सीएम आदित्यनाथ ने कहा, “75 जिलों में जून महीने में 90 लाख से 1 करोड़ लोगों के टीकाकरण का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए 2100 बूथ बनाए गए हैं जहाँ 18 वर्ष से अधिक आयु के लोगों को टीके लगाए जाएँगे जबकि 45 वर्ष से अधिक आयु के लोगों के लिए 3000 से अधिक टीकाकरण केंद्र स्थापित किए गए हैं।“ सीएम आदित्यनाथ ने कहा कि मिशन जून के अंतर्गत तय लक्ष्यों को पूरा करने के लिए प्रदेश में पर्याप्त टीके हैं।   

सीएम आदित्यनाथ ने यह भी सूचना दी कि पत्रकारों, सरकारी कर्मचारियों और न्यायपालिका के सदस्यों को टीके लगाने के लिए कैंप बनाए गए हैं। इसके अलावा उन्होंने यह भी बताया कि 12 साल से कम उम्र के बच्चों के माता-पिता के टीकाकरण के लिए सभी जिलों में 200 ‘गार्जियन बूथ’ बनाए गए हैं।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घोषणा की है कि 15 जून से सामाजिक और आर्थिक तौर पर पिछड़े लोगों (ड्राइवर, दिहाड़ी मजदूर और रिक्शा चालक इत्यादि) के लिए विशेष टीकाकरण कार्यक्रम चलाया जाएगा।