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‘तुम्हारे फ़किं# गीता पर हस्तमैथुन करूँगा, तुम्हारी गाय को फ़# करूँगा’: रैपर MC कोड का वीडियो वायरल, 2016 में बनाया था

एक ‘रैप बैटल’ के दौरान रैपर एमसी कोड (MC Kode) ने हिन्दू धर्म का अपमान किया। उक्त रैपर ने हिन्दू धर्म की पवित्र पुस्तकों महाभारत और भगवद्गीता पर अश्लील टिप्पणी की थी। एमसी कोड ने एक रैप बैटल के दौरान कहा, “अगर तुम हिन्दू हो मैं तुम्हारी पवित्र गाय को फ़$ करूँगा। मैं तुम्हारे महाभारत पर मास्टरबेट (हस्तमैथुन) कर दूँगा।” महाभारत का नाम लेने से पहले वो ‘क्या था, क्या था’ बोलता है, जिस पर कुछ रैपर्स उसे ‘भगवद्गीता’ का नाम बताते हैं और फिर वो इस पुस्तक का नाम भी लेता है।

बताया जाता है कि नई दिल्ली में रहने वाले एमसी कोड का असली नाम आदित्य तिवारी है और उसने ये नाम रैपर के रूप में लोकप्रिय होने के लिए रखा है। मुंबई, गुजरात, गुवाहाटी, जयपुर, उत्तर प्रदेश और हरियाणा से लेकर कई जगहों पर वो ‘रैप बैटल्स’ आयोजित कर चुका है और ऐसे रैप बैटल्स की होस्टिंग और जजिंग भी करता रहा है। विवादित वीडियो जून 12, 2016 का है जो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

इस ‘रैप बैटल’ में वो सामने वाले रैपर की माँ को लेकर अश्लील बातें करता है और फिर हिन्दू धर्म की पुस्तकों पर आ जाता है। महाभारत, गीता और गाय के साथ वो बार-बार ‘फ़किं$-फ़$ग’ जैसे अश्लील शब्द का इस्तेमाल करता है। ‘Redbull’ कंपनी भी एमसी कोड को प्रमोट करती रही है। हालाँकि, ‘Redbull’ की वेबसाइट पर एमसी कोड से जुड़े कंटेंट्स पर ‘404 एरर’ दिखा रहा है। उसने मार्च 2021 में एमसी कोड का एक प्रोफ़ाइल तैयार किया था।

एमसी कोड ‘Spit Dope’ नामक एक प्लेटफॉर्म का सह-संस्थापक भी है। कॉलेज फेस्ट्स और प्राइवेट इवेंट्स में अक्सर रुपए लेकर हिस्सा लेता रहा है। विवाद होने के बाद रेडबुल ने अपनी वेबसाइट से उसकी प्रोफ़ाइल और वीडियो को हटा दिया है। एमसी कोड उत्तराखंड के लोगों पर भी आपत्तिजनक टिप्पणी कर चुका है। हाल ही में इंस्टाग्राम पर शेयर किए गए एक वीडियो में वो बैकग्राउंड में राष्ट्रगान बजा कर शराब पीता दिखा था।

पिछले कुछ दिनों में कॉमेडियनों के अलावा बॉलीवुड की फिल्मों व सीरीज के जरिए हिन्दू धर्म को बदनाम करने का सिलसिला सा चल पड़ा है। कॉमेडियन अग्रिमा जोशुआ ने छत्रपति शिवाजी महाराज को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की थी। इसी तरह ‘तांडव’ सीरीज में भगवान शिव का मजाक बनाया गया था। कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी ने ही हिन्दू देवी-देवताओं पर अभद्र टिप्पणी की थी, जिसके बाद उसकी गिरफ़्तारी भी हुई थी।

प्राइवेट पार्ट में शराब की बोतल, 4 लड़के+1 लड़की ने किया नॉर्थ-ईस्ट की लड़की से रेप: वीडियो वायरल, जोधपुर सुसाइड से अलग मामला

सोशल मीडिया पर उत्तर-पूर्वी भारत की एक महिला के यौन शोषण का वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें आरोपितों का चेहरा भी स्पष्ट देखा जा सकता है। सोशल मीडिया पर कुछ लोगों द्वारा इस आपत्तिजनक वीडियो को राजस्थान के जोधपुर का बताया जा रहा है, जहाँ हाल ही में नागालैंड की एक युवती ने आत्महत्या कर ली थी। केंद्रीय खेल एवं युवा मामलों के मंत्री किरण रिजिजू ने इसका खंडन किया है कि ये वीडियो जोधपुर वाली घटना से जुड़ा हुआ है।

दरअसल, रविवार (मई 23, 2021) को राजस्थान के जोधपुर में नागालैंड की एक 25 वर्षीय महिला ने आत्महत्या कर ली। वो राज्य के दीमापुर जिले के निउलैंड की रहने वाली थी। वो जोधपुर में ‘नवीन जूस रेस्टॉरेंट’ में कार्यरत थी। वो अपने रेंट के कमरे में ही फंदे से झूलती हुई मिली। ‘नेचुरल आत्महत्या’ को उसकी मौत का कारण बताया गया। सुबह-सुबह लोगों ने उसे मृत पाया था। नागा स्टूडेंट्स यूनियन के राजस्थान यूनिट ने बताया कि रेस्टॉरेंट के मालिक ने ही अंतिम संस्कार का खर्च उठाया। जैसे इस ट्वीट में वायरल वीडियो को जोधपुर केस से जोड़ा गया:

ईसाई समुदाय की महिला का अंतिम संस्कार जोधपुर के ही एक ईसाई सेमिटरी में एक पादरी की मौजूदगी में संपन्न कराया गया। उससे पहले अस्पताल में उसका पोस्टमॉर्टम भी हुआ था। वहीं सोशल मीडिया पर जो वीडियो वायरल हो रहा है, उसमें 5 आरोपितों को एक महिला का यौन शोषण करते हुए देखा जा सकता है। अभी तक ये पता नहीं चल सका है कि ये कहाँ का वीडियो है और पीड़िता या आरोपित कौन हैं।

अरुणाचल वेस्ट से सांसद किरण रिजिजू ने बताया, “नॉर्थ-ईस्ट की एक महिला का 4 पुरुषों और एक महिला द्वारा क्रूरता से बलात्कार किए जाने का एक वीडियो वायरल हो रहा है। ये जोधपुर आत्महत्या केस से जुड़ा मामला नहीं है। जोधपुर के पुलिस कमिश्नर से मेरी विस्तृत बातचीत हुई है। लेकिन, दोषियों की गिरफ़्तारी के लिए पुलिस द्वारा सारे प्रयास किए जाएँगे।” इस घटना का कारण क्या है, ये भी स्पष्ट नहीं है।

इस वीडियो में आरोपितों को अपनी करतूतों को वीडियो कॉल पर अन्य परिचितों को दिखाते हुए भी देखा जा सकता है। वीडियो रिकॉर्ड करते समय आरोपितों ने पीड़िता के प्राइवेट पार्ट में एक शराब की बोतल भी घुसा दी। सबसे ज्यादा पीड़ादायक है कि दरिंदों के इस कृत्य में एक महिला आरोपित भी उनका साथ दे रही थी, जिसने पीड़िता को नीचे भी गिराया। इसमें पीड़िता को ज्यादा से ज्यादा प्रताड़ित किया जा रहा है।

‘NE Now’ की खबर के अनुसार, स्पेशल कमिश्नर ऑफ पुलिस रोबिन हिबू ने कहा कि पुलिस अपराधियों को चिह्नित करने का प्रयास कर रही है। उन्होंने बताया कि पुलिस अपने काम पर लग गई है। उन्होंने भी इसकी पुष्टि की कि ये वीडियो जोधपुर में नागालैंड की युवती की आत्महत्या से नहीं जुड़ा हुआ है। मृतका की बहन और पुलिस ने पहचान कर के बताया कि ये वो महिला नहीं है। हिबू ने जोधपुर के DCP से भी फोन पर बात की।

वीडियो में पीड़िता चिल्लाती है, “कृपया मेरे साथ ऐसा मत करो, वीडियो रिकॉर्ड मत करो।” इसके बाद आरोपितों में से एक ने पीड़िता के मुँह मर कपड़ा ठूँस कर इसे बंद कर दिया। असम पुलिस पाँचों आरोपितों की तस्वीरें जारी करते हुए कहा है कि कि इन्होंने एक महिला को क्रूरतापूर्वक प्रताड़ित कर के उसका बलात्कार किया है। असम पुलिस ने कहा कि इस घटना का समय व स्थान अज्ञात है। साथ ही अपील की कि अगर किसी के पास इस घटना को लेकर कोई भी सूचना हो तो वो उससे संपर्क करे।

असम पुलिस ने ऐलान किया है कि इस घटना के सम्बन्ध में कोई भी सूचना देने देने वाले को अच्छा इनाम दिया जाएगा। पुलिस इस घटना के दोषियों का पता लगाने की कोशिश कर रही है। लेकिन, सोशल मीडिया पर जो लोग इस घटना को जोधपुर आत्महत्या केस से जोड़ रहे हैं, वो गलत हैं। जोधपुर वाले मामले में आत्महत्या का कारण स्पष्ट नहीं हो सका है। वहाँ के लोगों ने मृतका के अंतिम संस्कार में सहयोग भी किया।

भगोड़ा बिजनेसमैन मेहुल चोकसी डोमिनिका में गिरफ्तार, एंटीगुआ सरकार ने कहा, ‘सीधे भारत को किया जाएगा प्रत्यर्पित’

पीएनबी के 13,500 करोड़ रुपये के पीएनबी घोटाले में वाँछित भगोड़े व्यवसायी मेहुल चोकसी का पता डोमिनिका में चला है और उसे स्थानीय पुलिस द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया है। कुछ दिनों पहले चोकसी एंटीगुआ और बारबूडा से लापता हो गया था। डोमिनिका कैरेबियन सागर में एक छोटा सा द्वीप राष्ट्र है।

एंटीगुआ पुलिस ने उसकी हिरासत के लिए डोमिनिका में पुलिस से संपर्क किया है। इंटरपोल द्वारा ‘येलो कॉर्नर’ नोटिस जारी किए जाने के बाद डोमिनिका में मेहुल चोकसी का पता लगाया गया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सूत्रों का कहना है कि इंटरपोल ने सीबीआई को सूचित किया है कि डोमिनिका में मेहुल चोकसी का पता लगा लिया गया है और उसे गिरफ्तार कर लिया गया है। उन्होंने कहा कि चोकसी नाव के जरिए एंटीगुआ और बारबूडा से डोमिनिका पहुँचा।

उधर डोमिनिका मेहुल चोकसी को भारत प्रत्यर्पित करने के लिए सहमत हो गया है, जिससे इस भगोड़े बिजनेसमैन को भारत लाए जाने की सँभावनाएँ बढ़ गई हैं। एंटीगुआ के पीएम गैस्टन ब्राउन ने एएनआई को दिए एक इंटरव्यू में कहा, “… डोमिनिका (मेहुल चोकसी के प्रत्यावर्तन के लिए) सहमत हो गया है। हम उसे वापस स्वीकार नहीं करेंगे … डोमिनिकन सरकार और कानून प्रवर्तन सहयोग कर रहे हैं, और हमने भारत सरकार को उसे भारत वापस लाने के लिए सूचित किया है।”

लापता होने जितनी ही नाटकीय रही मेहुल चोकसी की गिरफ्तारी

मेहुल चोकसी का लापता होना जितना नाटकीय था उतनी ही नाटकीय उसकी गिरफ्तारी भी रही। डोमिनिका में हिरासत में लिए जाने के बाद स्थानीय पुलिस के अनुसार, पंजाब नेशनल बैंक में 13,500 करोड़ रुपये की लोन धोखाधड़ी मामले में वाँछित चोकसी को डोमिनिका की राजधानी रोसेउ में केनफील्ड समुद्र तट पर समुद्र में कुछ दस्तावेजों को फेंकते हुए देखा गया था। उसकी संदिग्ध हरकत ने ड्यूटी पर मौजूद कुछ पुलिस अधिकारियों का ध्यान खींचा जो उसके पास गए। जब उन्होंने देश आने का उसका उद्देश्य पूछा, तो उसने स्पष्ट रूप से जवाब देने से इनकार कर दिया।

अब, पेशेवर स्कूबा गोताखोरों को उन दस्तावेजों की तलाश में समुद्र को छानने के लिए तैनात किया गया है जिनसे उसने छुटकारा पाने की कोशिश की थी। शुरुआती पूछताछ के दौरान यह पता चला है कि चोकसी नाव से डोमिनिका में दाखिल हुआ था और कुछ देर रुकने के बाद उसने क्यूबा जाने की योजना बनाई थी।

कथित तौर पर 62 वर्षीय भगोड़े व्यवसायी को स्थानीय लोगों ने रविवार शाम करीब 5 बजे एंटीगुआ के जॉली हार्बर इलाके में गाड़ी चलाते हुए देखा था, जहां वह लापता होने से पहले डिनर के लिए गया था।

क्यों है मेहुल चोकसी की तलाश?

मेहुल चोकसी जनवरी 2018 से एंटीगुआ और बारबूडा में रह रहा था। वह और उसका भाँजा नीरव मोदी सरकारी पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) से कथित तौर पर 13,500 करोड़ रुपये के सार्वजनिक धन की हेराफेरी करने के लिए लेटर ऑफ अंडरटेकिंग का इस्तेमाल करने के मामले में वाँछित हैं।

नीरव मोदी कई बार जमानत खारिज होने के बाद लंदन की जेल में है और भारत में अपने प्रत्यर्पण के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रहा है। वहीं मेहुल चोकसी जनवरी 2018 के पहले सप्ताह में भारत से भागने से पहले निवेश कार्यक्रम के जरिए नागरिकता का उपयोग करके 2017 में एंटीगुआ और बारबूडा की नागरिकता ले ली थी। बाद में यह घोटाला सामने आया। अब दोनों सीबीआई जाँच का सामना कर रहे हैं।

मेहुल चोकसी के अचानक लापता होने के बाद, एंटीगुआ और बारबूडा के प्रधान मंत्री गैस्टन ब्राउन ने एक बयान में कहा कि अधिकारी भारत सरकार, पड़ोसी देशों और अंतरराष्ट्रीय पुलिस संगठन के साथ मिलकर उसका पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “उनके परिवार के किसी व्यक्ति ने संकेत दिया कि वह लापता है। तब से एंटीगुआ और बारबूडा की रॉयल पुलिस फोर्स ने इस आशय का एक बयान जारी किया। उस बयान को इंटरपोल के साथ साझा किया जाएगा।”

मेहुल चोकसी के खिलाफ एंटीगुआ में चल रहे दो केस

मेहुल चोकसी के खिलाफ एंटीगुआ और बारबूडा में दो मामले चल रहे हैं। एक भारत में उसके प्रत्यर्पण से संबंधित है और दूसरा उसकी नागरिकता के आधिकारिक रूप से रद्द किए जाने से संबंधित है। चोकसी ने इन मामलों में अपना प्रतिनिधित्व करने के लिए यूनाइटेड किंगडम से एक प्रसिद्ध वकील को लाया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, मेहुल चोकसी को आखिरी बार रविवार को उसकी कार में देखा गया था। पुलिस ने तलाशी के बाद वाहन तो बरामद कर लिया था लेकिन चोकसी नहीं मिला था।

इस बीच, मेहुल चोकसी के वकील विजय अग्रवाल ने एक बयान में कहा, “मैंने परिवार से बात की है। परिवार खुश और राहत महसूस कर रहा है कि आखिरकार मेहुल चोकसी का पता चल गया है। उससे बात करने का प्रयास किया जा रहा है ताकि कोई स्पष्ट रूप से जान सके। तस्वीर कैसे उसे डोमिनिका ले जाया गया।”

डोमिनिका में दिखा मोदी सरकार की वैक्सीन मैत्री का असर

भारत ने इसी साल फरवरी में 72 हजार की आबादी वाले कैरेबियाई देश डोमिनिका को 35000 कोविड वैक्सीन भेजी थीं। भारत द्वारा भेजी गई इन वैक्सीन को रिसीव करने एयरपोर्ट पर खुद डोमिनिकन गणराज्य के प्रधानमंत्री रूजवेल्ट स्केरिट एयरपोर्ट आए थे। कोविड वैक्सीन के लिए डोमिनिका के पीएम स्केरिट ने पीएम मोदी और भारत के लोगों को शुक्रिया कहा था।

मोदी सरकार की वैक्सीन मैत्री योजना के तहत कई देशों को मुफ्त वैक्सीन सप्लाई की इस योजना से लाभाँन्वित हुआ डोमिनिका अब मेहुल चोकसी को गिरफ्तारी करने के बाद उसके भारत को प्रत्यर्पित करने की कोशिशों में जुटा नजर आ रहा है। भारत की वैक्सीन मैत्री कार्यक्रम का असर दिखना शुरू हो गया और शायद इसकी शुरुआत मेहुली चोकसी के प्रत्यर्पण से हो सकती है।

बुद्धिजीवी, प्रोपगेंडाजीवी, आन्दोलनजीवी… इकोसिस्टम ने खोले सारे ‘घोड़े’, फिर भी PM मोदी अडिग

नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बने आज सात वर्ष हो रहे हैं। इन सात वर्षों में उनकी सरकार ने बहुत सारे काम किए जिनका असर व्यक्ति, समाज और राष्ट्र पर पड़ा। कुछ ऐसे काम भी रहे जिनके किए जाने की आशा लोगों को थी पर वे नहीं हो सके। ढेरों लोग उनसे संतुष्ट हैं तो कुछ असंतुष्ट भी। कुछ बिना शर्त समर्थन देते दिखते हैं, कुछ सशर्त समर्थन के पक्ष में रहते हैं तो कुछ धुर विरोध में रहते हैं। पर इसमें कुछ भी नया नहीं है। समर्थन और विरोध का यह प्रतिरूप लगभग हर नेता के बारे में देखा और सुना जाता है। वैसे भी मोदी अपने सौभाग्य या दुर्भाग्य से ऐसे युग के राजनेता हैं जिसमें बदलाव की रफ्तार बहुत तेज है। जिसमें राजनीतिक समर्थन से राजनीतिक विरोध तक की यात्रा कभी-कभी क्षणों में पूरी कर ली जाती है।

जब राजनीतिक या सामाजिक प्रतिक्रियाएँ इतनी अप्रत्याशित होती हैं कि उन्हें समझने के लिए मिला समय अक्सर कम पड़ जाता है। वे ऐसे युग में देश के प्रधानमंत्री हैं जब विपक्ष के विरोध का स्वरुप न तो राजनीतिक परंपराओं का मोहताज है और न ही लोकतान्त्रिक मूल्यों का। वे ऐसी सरकार के प्रधानमंत्री हैं जिसे विपक्ष के रूप में राजनीतिक दल और उनके नेता ही नहीं बल्कि लोकतंत्र मापने वाली देशी-विदेशी संस्थाएँ, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया, संपादक, पत्रकार, कलाकार, बुद्धिजीवी, प्रोपेगेंडाजीवी, आन्दोलनजीवी, नेतानुमा ऐक्टिविस्ट और ऐक्टिविस्टनुमा नेता मिले हैं।            

पिछले सात वर्षों में जैसे-जैसे विपक्ष की सूरत बदलती रही उसी तरह से मोदी विरोध के उसके तरीके भी बदलते रहे। यह बात और है कि मोदी को ऐसे विपक्ष और उसके विरोध की आदत तब से लगी हुई थी जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे। अंतर केवल इतना था कि मुख्यमंत्री रहने तक इस विपक्ष का स्वरुप इतना बड़ा नहीं था। तब उनके विरोध में विदेशी व्यक्तियों और संस्थाओं की भूमिका बहुत छोटे स्तर पर थी। उसे भी प्राप्त करने के लिए विपक्ष के नेताओं को बड़ी मशक्कत करनी पड़ती थी।

यह उन दिनों की बात है जब उनका अमेरिकी वीजा रोकने के लिए विपक्ष के लगभग साढ़े पाँच दर्जन सांसदों को एक ही पत्र पर अपने-अपने हस्ताक्षर करने पड़ते थे। पर प्रधानमंत्री बनने के बाद विदेशी व्यक्तियों और संस्थाओं द्वारा उनके विरोध ने एक नया रूप ले लिया। शायद विपक्षी राजनीतिक दलों, उनके नेताओं और उनके देशीय सहयोगियों ने राष्ट्रीय राजनीति में विदेशियों को लाने में कोई समस्या नहीं दिखी। उन्हें शायद इस बात से फर्क नहीं पड़ा कि राष्ट्रीय राजनीति में बाहर वालों को लाना एक स्वस्थ और अच्छी राजनीतिक परंपरा का द्योतक नहीं था।   

प्रश्न यह उठता है कि 2014 के बाद विपक्षी राजनीतिक दलों को अपनी सहायता के लिए राजनीति के बाहर के लोगों को क्यों लाना पड़ा? मीडिया, मीडियाकर्मी, संपादक, पत्रकार, कलाकार, देशी-विदेशी संस्थाओं, व्यक्तियों और बुद्धिजीवियों को विपक्ष की सहायता में क्यों उतरना पड़ा? इस प्रश्न का उत्तर शायद राजनीति के परंपरागत तरीकों में मोदी द्वारा लाए गए बदलाव में है। 2014 से पहले भारतवर्ष का राजनीतिक विमर्श परसेप्शन प्रधान था। राजनीतिक दलों का इस दर्शन में विश्वास था कि राजनीति के लिए काम करना आवश्यक नहीं है बल्कि काम करते दिखना आवश्यक है। इंदिरा गाँधी द्वारा दिया गया ‘गरीबी हटाओ’ नारा इसी राजनीतिक दर्शन के तहत दिया गया नारा था। 2014 से पहले चुनाव के पहले जारी किया जाने वाले घोषणा पत्र राजनीतिक औपचारिकता की मिसाल थे। 

मोदी ने प्रधानमंत्री बनकर इस राजनीतिक दर्शन को उलट कर रख दिया और विपक्ष शायद ऐसी किसी स्थिति के लिए तैयार नहीं था। विपक्ष के लिए मोदी अपने व्यक्तित्व में एक और सरप्राइज लेकर आए और वह था कुछ मुद्दों पर पहले लिए गए अपने स्टैंड को भूलकर उस पर पुनर्विचार करना। इसका सबसे बड़ा उदाहरण आधार कार्ड, मनरेगा और जीएसटी पर उनका पुनर्विचार रहा। उसके अलावा सफाई अभियान, जनधन अकाउंट, उज्ज्वला योजना, घर-घर बिजली पहुँचाने के उनके संकल्प जैसी महत्वाकांक्षी सरकारी योजनाओं को जिस रफ़्तार से लागू किया गया, उसने विपक्ष को लगातार अपनी रणनीति बदलने पर विवश कर दिया। उसका असर यह हुआ कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद भारतीय राजनीति ‘परसेप्शन बनाम परसेप्शन’ की राजनीति न रहकर ‘परसेप्शन बनाम रियलिटी’ की राजनीति हो गई।

हाँ, विपक्ष की समस्या जो शुरू में थी वही आज भी है और वह समस्या यही है कि विपक्ष आज भी राजनीतिक लड़ाई को केवल परसेप्शन की लड़ाई समझता है और इसीलिए अपने ही बनाए राजनीतिक विमर्श से निकल कर आगे देखना उसके लिए अब एक कठिन काम हो गया है। विपक्ष को 2014 में भी लगता था कि मोदी से लड़ाई का एकमात्र तरीका है मोदी की छवि को ध्वस्त करना और आज भी उसे यही लग रहा है। 

कहते हैं लोकतान्त्रिक राजनीति में विपक्ष का रहना इसलिए आवश्यक होता है क्योंकि विपक्ष का काम राजनीति, सरकार और शासन का एक वैकल्पिक मॉडल प्रस्तुत करना है। ऐसे में यदि कोई मोदी के विपक्षियों का वैकल्पिक मॉडल जानने बैठे तो उसे एक ही मॉडल मिलेगा और वह है कुछ भी करके मोदी की छवि ध्वस्त करने का मॉडल। यह ऐसा मॉडल है जिस पर उनके विरोधी लगभग दो दशक से काम कर रहे हैं। 

जब मोदी को उनके दल ने प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बताया उसी समय इस मॉडल का एक रूप बुद्धिजीवियों द्वारा उनके विरोध और बाद में जनता से की गई उनकी अपील के रूप में सामने आया। कुछ लोगों ने भविष्यवाणी की कि यदि मोदी प्रधानमंत्री बने तो देश में सांप्रदायिक विभाजन तय है।

शायद इसी भविष्यवाणी को सच साबित करने के लिए विपक्ष और उसके इकोसिस्टम ने देश में पहली बार ईसाई समुदाय पर मँडराने वाले तथाकथित खतरे को लेकर प्रोपगैंडा किया जिसमें दिल्ली में एक चर्च के दरवाजे पर मारे गए पत्थर और टूटे हुए काँच को आगे रखकर देश भर के ईसाइयों को खतरे में बताया गया। इसी प्रोपेगेंडा का एक और रूप पश्चिम बंगाल में दिखाई दिया जब बांग्लादेश के सीमावर्ती इलाके में ननों के बलात्कार में बिना किसी जाँच के हिंदुत्व के लोगों को जिम्मेदार बता दिया गया। यह और बात थी कि उस अपराध में जो लोग पकड़े गए वे बांग्लादेशी मुसलमान थे। प्रोपेगेंडा का यही स्वरूप मुसलमानों पर होने वाले तथाकथित अत्याचार के रूप में देखा गया। 

चूँकि 2014 के लोकसभा चुनावों में कॉन्ग्रेस का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा था इसलिए इकोसिस्टम के लिए राहुल गाँधी को मोदी के मुकाबले खड़ा करना असंभव सा काम था। इसी वजह से अगले चार वर्षों में पूरा इकोसिस्टम एक अदद नेता की तलाश करता रहा ताकी उसे नरेंद्र मोदी के खिलाफ खड़ा किया जा सके। हालत यह थी कि इस प्रक्रिया में 2019 तक अरविन्द केजरीवाल, अखिलेश यादव, ममता बनर्जी, कन्हैया कुमार, उमर खालिद और जिग्नेश मेवानी तक को नेता के रूप में प्रोजेक्ट करने की कोशिश की गई। प्रोपेगेंडा के तहत ही जेएनयू से लेकर आईआईटी मद्रास, हैदराबाद विश्वविद्यालय, जामिया मिलिया, बीएचयू, अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और जादवपुर विश्वविद्यालय तक में टुकड़े-टुकड़े के खेल किए गए।

अराजनीतिक खिलाड़ियों को एक मात्र उद्देश्य से पोषा गया और वह उद्देश्य था मोदी की छवि को ध्वस्त करना। इसी दिशा में ‘जाट रिजर्वेशन’ और ‘भीमा कोरेगाँव’ जैसे तथाकथित राजनीतिक आंदोलन चलाये गए। इसी उद्देश्य के साथ राहुल गाँधी ने मोदी सरकार को बार-बार सूट-बूट की सरकार बताया। इसी उद्देश्य के साथ राफेल के सौदे में आर्थिक अनियमितता के आरोप लगाए गए और इसी उद्देश्य के साथ ही सेना द्वारा पाकिस्तान में किए गए स्ट्राइक को झूठ बताया गया पर इनमें से किसी रणनीति का मोदी की छवि पर कोई असर नहीं हुआ। नतीजा यह हुआ कि नरेंद्र मोदी 2019 में और भारी जीत के साथ फिर से प्रधानमंत्री बन कर वापस आए।  

मोदी के दूसरे कार्यकाल में विपक्ष, उसके इकोसिस्टम और उसके प्रोपगैंडा का स्वरूप तेजी से बदला है। कारण फिर से वही था। मोदी का अपने फैसलों से विपक्ष को आश्चर्यचकित करना। यदि कुछ विपक्षी नेताओं के पुराने बयानों को देखा जाय तो कहा जा सकता है कि उन्होंने कम से कम जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 के हटाए जाने की कल्पना नहीं की थी और 5 अगस्त 2019 के इस फैसले से विपक्ष को सकते में डाल दिया। चूँकि कॉन्ग्रेस और उसके नेतृत्व ने ही अपने फैसले और संविधान में बदलाव से कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाया था लिहाजा उसे अपने प्रोपेगेंडा के लिए विदेशी व्यक्तियों और संस्थाओं के और अधिक सहयोग से कोई समस्या दिखाई नहीं दी।

किसी भी कीमत पर मोदी को हराने के लिबरलों के संकल्प को राम जन्मभूमि पर उच्चतम न्यायालय के फैसले से बड़ा धक्का लगा और उन्होंने नए सहयोगियों के साथ मिलकर अपने प्रयास में तेज़ी लाते हुए नागरिकता संशोधन कानून के बहाने शाहीन बाग़ कर डाला। वहाँ से विरोध की यह यात्रा दिल्ली दंगों से होते हुए अब किसान आंदोलन पर आ रुकी है। विरोध में अब विदेशी व्यक्तियों और संस्थाओं का उपयोग शायद इसलिए बढ़ गया है क्योंकि जिन देसी लोगों से इकोसिस्टम को उम्मीदें थीं वे बार-बार असफल होते गए। ऐसे में अब भारतीय लोकतंत्र की क्वालिटी पर विदेशी छुटभैय्ये एनजीओ की रिपोर्ट हो या किसी तथाकथित विदेशी इतिहासकार के वक्तव्य, इकोसिस्टम उसे अब खूब सेलिब्रेट करता है, इस आशा के साथ कि एक दिन नरेंद्र मोदी की छवि ध्वस्त हो जाएगी।
 
पर लोकतांत्रिक व्यवस्था की एक खूबी होती है। इस व्यवस्था में राजनीतिक दलों को अपनी लड़ाई खुद लड़नी पड़ती है। विपक्ष में रहकर भी देश के लिए एक वैकल्पिक राजनीतिक या आर्थिक व्यवस्था का मॉडल प्रस्तुत करना पड़ता है जिसे जनता परखती है। कोई राहुल गाँधी इस बात के सहारे नहीं बैठ सकता कि कोई रवीश कुमार रोज फेसबुक पोस्ट लिखकर उसे सत्ता दिला सकता है। कोई रवीश कुमार इस सोच के सहारे नहीं बैठ सकता कि कोई राहुल गाँधी सत्ता में आकर उसे उसकी खोई हुई विश्वसनीयता वापस दिला सकता है। इकोसिस्टम चाहे जितना बड़ा हो और अपना स्वरुप चाहे जिस तेजी से बदले, किसी नेता की छवि केवल प्रोपेगेंडा से न तो बना सकता है और न ही बिगाड़ सकता है।

गंगा किनारे समाधी दी गई लाशों की सच्चाई ‘गिद्ध’ मीडिया प्रोपेगेंडा से कहीं अलग: कई हिन्दू भी दफनाते हैं मृत शरीर

भारत परंपराओं और मान्यताओं का देश है। इन्हीं परंपराओं को अक्सर पश्चिमी जगत, लिबरल्स, वामपंथी और मीडिया के सदस्य समझ नहीं पाते हैं और इसे छलावा करार देते हैं। हालाँकि इन सबको समस्या मात्र हिन्दू धर्म से ही है। हिंदुओं की परम्पराएँ इन लिबरल्स और वामपंथियों को फूटी आँख नहीं सुहाती और शायद वो यह भी स्वीकार नहीं करना चाहते हैं कि हिंदुओं में मृत देह की अंतिम संस्कार के लिए भी कई विधियाँ हो सकती हैं।

हिन्दू धर्मं में भी मृत लोगों की लाश को पवित्र गंगा नदी के किनारे जमीन के अंदर समाधी देने या दफनाने की प्रथा उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में पाई जाती है। 1988 के पहले तो लाशों को गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद यह प्रथा बंद हो गई। परंपराओं के अनुसार कई बार जब व्यक्ति साँप के काटने से मरता है, त्वचा रोग से ग्रसित होता है, नवजात होता है या साधु होता है तो उसे जलाया नहीं जाता बल्कि जमीन में दफनाया जाता है। 

इसके अलावा कई प्राचीन परंपराओं से जुड़े परिवारों में भी मृत सदस्य को जलाने के स्थान पर गंगा के किनारे दफनाया जाता रहा है। प्रयागराज का फाफामऊ घाट और शृंगवेरपुर घाट में भी यह प्रथा अपनाई जाती है, जहाँ मृत शरीर को दफनाकर उसे बाँस और रामनामी गमछे से ढँक दिया जाता है। अभी तक हिंदुओं की इन प्रथाओं से अनजान रहने वाले मीडिया समूह अचानक Covid-19 के समय इन घाटों पर प्रकट हो गए हैं। इन मीडिया के अवसरवादियों ने ये लाश दिखाकर यह बताना शुरू कर दिया है कि उत्तर प्रदेश में Covid-19 संक्रमण के कारण होने वाली मौतें इतनी ज्यादा हैं कि लोग मृत सदस्यों का दाह संस्कार तक नहीं कर पा रहे हैं और उन्हें दफना रहे हैं।

सीएम योगी आदित्यनाथ ने भी बताया इस प्रथा के बारे में

इसमें कोई दो राय नहीं कि कोरोना वायरस संक्रमण की दूसरी लहर के दौरान मौतें पहले से ज्यादा हुई हैं लेकिन प्राचीन परंपरा को प्रोपेगेंडा में घसीटना भी सही नहीं है। 26 मई को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दैनिक जागरण की एक रिपोर्ट शेयर करते हुए कहा कि तीन साल पहले जब कोरोना नहीं था तब भी घाट पर ऐसी तस्वीरें देखने को मिलती थीं। जागरण की इस रिपोर्ट में विस्तार से इस प्रथा के बारे में बताया गया है, जहाँ मृत व्यक्ति को गंगा नदी के किनारे दफनाया जाता है।

लिबरल मीडिया का नैरेटिव

हालाँकि, कुछ लोग इस प्रथा के बारे में जानते होंगे लेकिन उनके लिए यह केंद्र सरकार को दोष देने का एक जरिया बन गया। 24 मई को ही मोजो स्टोरी यूट्यूब चैनल चलाने वाली ‘पत्रकार’ बरखा दत्त ने एक रिपोर्ट शेयर की। इस रिपोर्ट में घाट पर दफनाई गई लाशों को दिखाते हुए कहा गया कि कुछ लाशें गंगा में तैरती हुई आई हैं तो कुछ यहीं घाट पर दफनाई गई हैं। रिपोर्ट में दावा किया गया कि लगभग 1000 लाशें गंगा से बहकर तट पर आ गई हैं।  

रिपोर्ट में बताया गया कि संभव है कि इन लाशों को या तो पैसों की कमी के चलते या तो कोविड के कारण जलाने से मना किया गया है। अपने ही वीडियो चैनल की एक रिपोर्ट में बरखा खुद कहती हैं, “हम यह नहीं कहते हैं कि लाशों को दफनाने की प्रथा नहीं है लेकिन उत्तर प्रदेश के जिन घाट पर हम गए हैं वहाँ के स्थानीय लोगों ने बताया कि यहाँ लाशों में बढ़ोत्तरी देखी गई है।“

अलग कहानी कहती जागरण की रिपोर्ट :

जागरण की रिपोर्ट में बताया गया है कि सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरें 2018 की है, जब 2019 में होने वाले कुंभ की तैयारियों के लिए घाट की साफ सफाई हो रही थी। ये तस्वीरें जागरण के फोटो पत्रकार मुकेश कनौजिया ने ली थीं। रिपोर्ट में 85 वर्षीय पुजारी राममूरत मिश्रा का बयान भी है जिन्होंने बताया कि वो बचपन से लोगों को दफनाते हुए देखते आ रहे हैं। मिश्रा ने कहा कि जिनको त्वचा रोग होता है या जो साँप के काटने से मरते हैं उन्हें यहाँ दफनाया जाता है।   

पत्रकार मुकेश कनौजिया का एक वीडियो भी है जिसमें वो बताते हैं कि यहाँ और भी ऐसी लाशें हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अभी ही कुछ हुआ है। उन्होंने बताया कि जब उन्हें गंगा किनारे दफनाई जाने वाली लाशों पर रिपोर्ट बनाने के लिए कहा गया था तब भी उन्होंने कई लाशें देखी थीं लेकिन तब तो कोरोना भी नहीं था।

प्रयागराज रेंज के आईजी केपी मिश्र ने 17 मई को टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया था कि सभी कोविड से मरने वालों का दाह संस्कार किया गया है। उन्होंने बताया कि स्थानीय पुलिस, जल पुलिस और SDRF के सदस्य लगातार यमुना और गंगा के घाटों पर निगरानी कर रहे हैं। दाह संस्कार के लिए पैसों की कमी पर उन्होंने कहा कि हमारी टीम ऐसे लोगों की सहायता भी करती है।

गिद्ध पक्षी लवारिस पड़ी मृत लाश को खाकर पर्यावरण को स्वच्छ रखता है लेकिन मीडिया के गिद्ध इन लाशों पर अपना नैरेटिव चलाकर अपने पाठकों और दर्शकों के दिमाग को दूषित कर रहे हैं। मीडिया और लिबरल्स वामपंथियों के लिए जो शॉकिंग या अजीब हो सकता है वह कई हिन्दू परिवारों के लिए परंपरा की तरह है।   

IMA प्रमुख डॉ. जॉनरोज ऑस्टिन जयलाल: हिंदुओं को ईसाई बनाने की चाहत, PM मोदी से है सख्त नफरत, जानें उनका ‘काला चिट्ठा’

पत्र पर पत्र जारी करने के बाद डॉ. जॉनरोज ऑस्टिन जयलाल की अध्यक्षता में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) ने योग गुरु बाबा रामदेव पर एक और तीखा हमला किया, जिसमें एलोपैथी को खारिज करने वाले उनके बयानों पर 1000 करोड़ रुपए का मानहानि का मामला दर्ज किया गया है। बता दें कि इंडियन मेडिकल एसोसिएशन, स्वास्थ्य कर्मियों की देश की सबसे बड़ी प्रोफेशनल काउंसिल है।

बाबा रामदेव द्वारा आईएमए पर 25 सवाल दागे जाने के बाद यह कदम उठाया गया है। हालाँकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह पहली बार नहीं है जब बाबा रामदेव आईएमए, विशेष रूप से उनके प्रमुख डॉ. जयलाल के निशाने पर आए हैं। डॉ. जयलाल न केवल रामदेव की आलोचना कर रहे हैं, बल्कि आदतन आयुर्वेद और भाजपा से नफरत करने वाले भी हैं।

उनके सोशल मीडिया पर एक नजर

लोगों को लगता होगा कि चिकित्सा संगठन का नेतृत्व करने वाले डॉक्टर का सोशल मीडिया प्रोफाइल उपचार, इलाज और चिकित्सा प्रगति को लेकर भरा होगा, लेकिन डॉ. जयलाल की ट्विटर प्रोफाइल देखकर कोई भी आश्चर्यचकित हो जाएगा।

जयलाल लगातार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन और यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित भारतीय जनता पार्टी के नेताओं पर निशाना साधते हुए अपनी विचारधारा और मंशा को उजागर करने वाली खबरें (कुछ तो फेक भी), कार्टून और हैशटैग साझा करते रहते हैं।

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जैसा कि देखा जा सकता है कि डॉ. जयलाल पीएम पर कटाक्ष करने के लिए अक्सर मोदी विरोधी पोस्ट और कार्टून साझा करते हैं। IMA के प्रमुख के रूप में, उन्होंने अपने राजनीतिक झुकाव को साफ तौर पर स्पष्ट किया है। अब यहाँ सवाल उठता है कि क्या उनका बयान उनके विचारधारा को नहीं दर्शाता है?

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ईसाई डॉक्टर सक्रिय और आक्रामक रूप से बाबा रामदेव और उनकी कंपनी को महामारी की शुरुआत के बाद से परेशान कर रहे हैं। उनको ‘झोलाछाप डॉक्टर’ कहने से लेकर आयुर्वेद को पूरी तरह बदनाम करने तक डॉ. जयलाल काफी समय से इस काम पर लगे हुए हैं।

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उन्होंने आयुष मंत्रालय पर भी लगातार हमले किए हैं और उन्होंने आयुर्वेद चिकित्सकों को सर्जरी करने की अनुमति देने वाले केंद्र के खिलाफ विरोध अभियान शुरू किया था। इसे ‘SayNoToMixopathy’ अभियान कहते हुए, उन्होंने महामारी के बीच नए नियम की आड़ में आयुर्वेद की निंदा करने वाले साक्षात्कार, व्याख्यान और सेमिनार देने में महीनों बिताए।

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आईएमए के डॉक्टरों ने नई अधिसूचना के विरोध में भूख हड़ताल की और ‘मीम एवं पोस्टर’ प्रतियोगिता भी आयोजित की, जिसमें विरोध को हवा देने के लिए विजेताओं को ‘उपहार’ बाँटे गए। डॉ. जयलाल द्वारा साझा किए गए एक स्क्रीनशॉट से पता चलता है कि कैसे इसे कृषि विधेयक बनाने की योजना बनाई जा रही थी क्योंकि ‘इस भूख हड़ताल से कुछ नहीं हो सकता था।’ जयलाल ने सरकार की आलोचना के लिए किसानों के विरोध को भी समर्थन दिया।

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उनके अन्य रीट्वीट भी इसी तरह की मानसिकता दर्शाते हैं।

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पारिवारिक चिकित्सा को बढ़ावा देना चाहते हैं डॉ. जयलाल

इससे ज्यादा विडंबना कुछ भी नहीं हो सकती है कि वह एक ‘समग्र चिकित्सा’ पद्धति को बढ़ावा देकर एक ‘समग्र चिकित्सा उपचार’ का विरोध करना चाहते हैं। डॉ.जयलाल ने क्रिश्चियनिटी टुडे के साथ अपने साक्षात्कार में बिल्कुल चौंकाने वाले और विचित्र बयान दिए, जब उन्होंने इंडियन मेडिकल एसोसिएशन को और अधिक ईसाई डॉक्टरों को लगाने की अपनी योजना के बारे में बात की।

इस इंटरव्यू में डॉ. जयलाल द्वारा की गई कुछ चौंकाने वाली टिप्पणियों में शामिल हैं:

‘वास्तविक विज्ञान’ की वकालत करने के लिए एक अभियान चलाने वाले डॉक्टर ने कहा, “यह केवल सर्वशक्तिमान ईश्वर की कृपा है जो हमें संकट से उबरने और सुरक्षित रहने में मदद करती है और यह उनकी कृपा थी जिसने हमारी रक्षा की।”

उन्होंने क्रिश्चियनिटी टुडे को बताया, “मैं देख सकता हूँ, उत्पीड़न के बीच, कठिनाइयों के बीच, यहाँ तक कि सरकार के नियंत्रण के बीच, खुले तौर पर अपने संदेश की घोषणा करने में हमारे सामने आने वाले प्रतिबंधों के बीच भी ईसाई धर्म बढ़ रहा है।” क्रिश्चियनिटी टुडे ने बाद में इस हिस्से को एडिट किया।

आयुर्वेद के लिए तिरस्कार

जयलाल ने कहा कि सरकार आयुर्वेद में आस्था रखती है क्योंकि उसका सांस्कृतिक मूल्य और हिंदुत्व में पारंपरिक विश्वास है। डॉ. जयलाल ने कहा, “भारत सरकार, हिंदुत्व में अपने सांस्कृतिक मूल्य और पारंपरिक विश्वास के कारण, आयुर्वेद नामक एक प्रणाली में विश्वास करती है। पिछले तीन-चार सालों से उन्होंने आधुनिक चिकित्सा को इससे बदलने की कोशिश की है। अब 2030 से आपको आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध, होम्योपैथी, योग और प्राकृतिक चिकित्सा के साथ इसका अध्ययन करना होगा।”

जयलाल का तर्क है कि संस्कृत भाषा पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित करना एक ऐसा तरीका है जिसके माध्यम से सरकार हिंदुत्व की भाषा को लोगों के दिमाग में लाना चाहती है। डॉ. जयलाल ने क्रिश्चियनिटी टुडे को दिए एक साक्षात्कार में कहा था, “यह (आयुर्वेद, यूनानी, होम्योपैथी, योग आदि) भी संस्कृत भाषा पर आधारित है, जो हमेशा पारंपरिक रूप से हिंदू सिद्धांतों पर आधारित होती है। यह सरकार के लिए लोगों के मन में संस्कृत की भाषा और हिंदुत्व की भाषा को पेश करने का एक अप्रत्यक्ष तरीका है।”

भारत को ‘गॉड’ द्वारा महामारी से बचाने का दावा :

उन्होंने दावा किया, “मुझे व्यक्तिगत रूप से लगता है कि ‘गॉड’ अमेरिका से विचलित हो गए होंगे और अब वह भारत पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। वह भारत में हम पर कुछ कृपा कर रहे हैं (हँसते हुए)। इसलिए हम यह संदेश देना चाहते हैं कि यह गॉड की कृपा है और यह हमारी शक्ति से नहीं, बल्कि गॉड की कृपा से अच्छी स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली की वजह से हमें वह सकारात्मक प्रतिक्रिया मिल रही है।”

IMA प्रमुख का लक्ष्य अधिक से अधिक लोगों को ईसाई धर्म स्वीकार करने के लिए तैयार करना है :

डॉ. जयलाल ने खुलासा किया था, “इस लॉकडाउन के बाद, भगवान की कृपा, अधिक से अधिक लोगों को चर्च में उनके लिए आशीर्वाद के स्थान के रूप में देखने के लिए प्रेरित करे… भारतीय ईसाई सर्वशक्तिमान ईश्वर की भलाई के संदेश और अपने जीवन में मोक्ष की आशा में भरोसा कर सकते हैं।”

एक इंटरव्यू में, जब पूछा गया कि ईसाई समुदाय का हिंदू राष्ट्रवादियों के साथ क्या संबंध है, तो डॉ. जयलाल ने सुझाव दिया कि हिंदुओं को यीशु और मुहम्मद को अपने भगवान के रूप में स्वीकार करना चाहिए क्योंकि उनका धर्म बहुदेववाद पर आधारित है। चूँकि हिंदू कई भगवानों में विश्वास करते हैं, इसलिए डॉ. जयलाल का मानना ​​है कि उनके लिए सहिष्णुता प्रदर्शित करना और ईसाई एवं इस्लामी प्रथाओं को आत्मसात करना मुश्किल नहीं है।

डॉ. जयलाल ने कहा, “हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि हिंदू धर्म या हिंदुत्व, बहुदेववाद के कारण अन्य धर्मों से अलग है। वे विभिन्न देवताओं को स्वीकार करते हैं। उन्हें यह स्वीकार करने या घोषित करने में कोई कठिनाई नहीं है कि यीशु देवताओं में से एक हैं या मुहम्मद देवताओं में से एक हैं। इसलिए अन्य देशों की प्रणालियों के साथ तुलना करने पर धार्मिक प्रतिबंध कम होते हैं। मुझे व्यक्तिगत रूप से लगता है कि भारत में यह उतना मुश्किल नहीं है।”

‘पारिवारिक चिकित्सा’ को बढ़ावा देने पर जोर :

उन्होंने आगे कहा, “एक ईसाई के रूप में, एक अवसर जिसे मैं चिकित्सा संघ में शामिल करने में सक्षम था, वह है पारिवारिक चिकित्सा की अवधारणा। मुझे लगता है कि सर्विस के सिद्धांतों के तहत ईसाई धर्म के उदाहरण के साथ देश का नेतृत्व करने का यह एक अच्छा अवसर है। हालाँकि इस देश में ईसाइयों की आबादी 2.5 से 3 प्रतिशत से भी कम है। एक ईसाई डॉक्टर के रूप में, मुझे इस संगठन का नेतृत्व करने का सौभाग्य मिला है। मैं सर्वशक्तिमान ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि मुझे इस देश को चिकित्सा पेशे में नेतृत्व करने के लिए ज्ञान और साहस प्रदान करें।”

हिंदुओं को ईसाई बनाने के लिए अस्पतालों का इस्तेमाल करें :

जयलाल ने दावा किया था कि ईसाई डॉक्टरों को ‘समग्र उपचार’ प्रदान करने की एक विशेष क्षमता प्राप्त है जिसमें आध्यात्मिक, मानसिक और सामाजिक उपचार शामिल हैं। उन्होंने कहा था, “आम तौर पर चिकित्सा पेशे में हम शारीरिक इलाज के बारे में बात करते हैं। लेकिन एक ईसाई के रूप में, मेरा मानना ​​​​है कि हम यहाँ केवल शारीरिक रूप से ठीक होने के लिए नहीं हैं, बल्कि सर्वशक्तिमान ईश्वर ने हमें समग्र उपचार देने के लिए बुलाया है, जिसमें आध्यात्मिक उपचार, मानसिक उपचार और सामाजिक उपचार शामिल हैं।”

डॉ. जयलाल यहाँ जो कह रहे हैं, वह यह है कि ईसाई डॉक्टरों को उनके विश्वास के आधार पर न केवल शारीरिक इलाज बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक उपचार करने की असाधारण क्षमता का उपहार दिया जाता है। इसके बाद उन्होंने कहा कि धर्मनिरपेक्ष संस्थानों, मिशनरी संस्थानों और मेडिकल कॉलेजों में अधिक ईसाई डॉक्टरों को काम करने की आवश्यकता है, जो रोगियों को ‘ईसाई उपचार’ प्रदान कर सकते हैं।

यदि डॉ. जेए जयलाल के कथनों पर विश्वास किया जाए, तो वे ‘धर्मनिरपेक्ष संगठनों’ में कमजोर और लाचार लोगों को ईसाई धर्म में परिवर्तित करने के लिए मिशनरी उत्साह को बरकरार रखते हैं और हिंदू राष्ट्रवाद और भारत सरकार की अवमानना ​​करते हैं। इसके अलावा, उन्होंने कहा कि कोरोना वायरस महामारी ने ‘उन लोगों को ईसाई सिद्धांतों की घोषणा की तत्काल आवश्यकता प्रदान की है जो वायरस से पीड़ित हैं, हमें धर्मनिरपेक्ष संस्थानों में भी इन ईसाई सिद्धांतों को साझा करने की अनुमति दी है।’

कार्यप्रणाली :

इंटरव्यू में डॉ. जयलाल ने कहा, “हमें धर्मनिरपेक्ष संस्थानों, मिशनरी संस्थानों और मेडिकल कॉलेजों में अधिक काम करने के लिए और अधिक ईसाई डॉक्टरों की आवश्यकता है। मैं एक मेडिकल कॉलेज में सर्जरी के प्रोफेसर के रूप में काम कर रहा हूँ, इसलिए मेरे लिए यह एक अच्छा अवसर है कि मैं वहाँ समग्र चिकित्सा के सिद्धांतों को आगे बढ़ा सकूँ। मुझे ग्रेजुएट और इंटर्न को सलाह देने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ है।” डॉ. जयलाल अपनी वेबसाइट के अनुसार क्रिश्चियन मेडिकल एसोसिएशन ऑफ इंडिया, गुड सेमेरिटन क्लब और रेड क्रॉस सोसाइटी ऑफ इंडिया के भी सदस्य हैं।

Netflix सीरीज बॉम्बे बेगम पर FIR में देरी के लिए NCPCR ने महाराष्ट्र सरकार को लताड़ा, बच्चों के ड्रग्स और अश्लील दृश्य पर आपत्ति

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने बुधवार (मई 26, 2021) को महाराष्ट्र के गृह सचिव और मुंबई पुलिस आयुक्त को एक पत्र लिखा, जिसमें उन पर विवादास्पद नेटफ्लिक्स सीरीज ‘बॉम्बे बेगम’ के निर्माताओं के खिलाफ जानबूझकर कार्रवाई में देरी करने का आरोप लगाया और उनसे मामले में जल्द FIR दर्ज करने को कहा। 

महाराष्ट्र के गृह सचिव और मुंबई पुलिस को अलग-अलग पत्रों में, एनसीपीसीआर ने उल्लेख किया कि उन्हें इस साल मार्च में विवादास्पद नेटफ्लिक्स सीरीज ‘बॉम्बे बेगम’ के खिलाफ शिकायत मिली थी, जिसमें निर्माताओं पर आपत्तिजनक सामग्री दिखाने का आरोप लगाया गया था। एनसीपीसीआर ने कहा कि शिकायतकर्ताओं ने निर्माताओं पर बच्चों को ड्रग्स का सेवन करने और कक्षा में अश्लील तस्वीरें और सेल्फी लेते हुए दिखाने का आरोप लगाया है।

चूँकि बच्चों द्वारा इन कृत्यों को चित्रित करना और उनका महिमामंडन करना और उन्हें देश में प्रकाशित करना बच्चों की सुरक्षा और कल्याण के लिए बनाए गए कानूनों की भावना के खिलाफ था, इसलिए उपरोक्त प्रकृति के किसी भी कार्य को एनसीपीसीआर ने शो की सामग्री को आपत्तिजनक माना और स्ट्रीमिंग सेवा से इस तरह के कंटेंट को रोकने के लिए कहा।

इस साल मार्च में, आयोग ने नेटफ्लिक्स को 24 घंटे के भीतर एक कार्रवाई रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए भी कहा था, जिसमें विफल होने पर कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी थी। शीर्ष बाल अधिकार संस्था ने गुरुवार (11 मार्च 2021) को वेब सीरिज में बच्चों के अनुचित चित्रण का हवाला देते हुए नेटफ्लिक्स से इसकी स्ट्रीमिंग तुरंत बंद करने को कहा। साथ ही 24 घंटे के भीतर एक विस्तृत कार्रवाई रिपोर्ट भी पेश करने को कहा था। 

NCPCR ने कहा था कि यदि ओटीटी प्लेटफॉर्म ऐसा नहीं करती है तो वह कानूनी कार्रवाई को विवश होगी। हालाँकि, NCPCR के अनुसार, नेटफ्लिक्स ने आयोग की शिकायत पर कार्रवाई नहीं की, बल्कि आयोग द्वारा हाइलाइट की गई सीरीज के सभी आपत्तिजनक दृश्यों के लिए सिर्फ जस्टिफिकेशन दिया।

मुंबई पुलिस ‘बॉम्बे बेगम’ के निर्माताओं के खिलाफ कार्रवाई शुरू करने में विफल

एनसीपीसीआर ने नोटिस में कहा था कि नाबालिगों के कैजुअल सेक्स को सामान्य बताने के बाद अब वेब सीरिज बच्चों के बीच ड्रग्स के सेवन को सामान्य दिखा रही है। आयोग ने कहा कि वह बच्चों का इस तरह से चित्रण करने की अनुमति नहीं दे सकती। नोटिस में कहा गया था, “इस प्रकार की सामग्री के साथ सीरीज न केवल बच्चों के युवा दिमाग को दूषित करेगी, बल्कि इसका परिणाम अपराधियों के हाथों बच्चों के साथ दुर्व्यवहार और शोषण भी हो सकता है।”

महाराष्ट्र सरकार को लिखे अपने पत्र में आयोग ने कहा कि निर्माताओं ने किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की धारा 77 का उल्लंघन किया है। तब आयोग ने मुंबई के पुलिस आयुक्त को इस मामले की जाँच करने के लिए कहा था। आयोग ने कहा कि उन्होंने 12 अप्रैल को डीसीपी प्रवर्तन, मुंबई से अनुरोध किया था कि वह किशोर न्याय अधिनियम, 2015 और पॉक्सो के विभिन्न प्रावधानों का उल्लंघन करने के लिए नेटफ्लिक्स पर स्ट्रीमिंग श्रृंखला ‘बॉम्बे बेगम’ के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करें।

हालाँकि, आयोग के निर्देशों के बावजूद, मुंबई पुलिस ने विवादास्पद सीरीज के निर्माताओं के खिलाफ यह कहते हुए कोई शिकायत दर्ज नहीं की कि उन्हें ‘उच्च अधिकारियों से अनुमति’ की आवश्यकता है क्योंकि यह मामला ग्रे क्षेत्र में आता है और उच्च अधिकारियों के अनुमोदन के बिना, वे मामले में प्राथमिकी दर्ज नहीं कर सकते।

एनसीपीसीआर ने अपर मुख्य सचिव मनु कुमार श्रीवास्तव को लिखे पत्र में कहा, “आयोग यह समझने में विफल है कि कैसे एक संज्ञेय अपराध U/sec किशोर न्याय अधिनियम, 2015 की धारा 77 ग्रे क्षेत्र में आती है और संज्ञेय अपराध होने के बावजूद मुंबई पुलिस प्राथमिकी दर्ज करने को तैयार क्यों नहीं है।”

पत्र में, एनसीपीसीआर ने मुंबई पुलिस पर ‘बॉम्बे बेगम’ के निर्माताओं के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने में देरी करने और यहाँ तक कि आयोग के लिखित अनुरोध पर कोई ध्यान नहीं देने का आरोप लगाया।

एनसीपीसीआर प्रमुख ने महाराष्ट्र सरकार को लिखे पत्र में कहा, “चूँकि, यह एक गंभीर मुद्दा है जहाँ पुलिस निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं कर रही है। इसलिए आपसे अनुरोध है कि इस मामले को देखें और सुनिश्चित करें कि इस मामले में आगे कोई बाल अधिकार और कानून का उल्लंघन न हो।” एनसीपीसीआर ने यह भी अनुरोध किया है कि की गई कार्रवाई की रिपोर्ट अगले तीन दिनों के भीतर आयोग को प्रस्तुत की जाए।

बता दें कि ‘बॉम्बे बेगम्स’ की स्क्रिप्ट अलंकृता श्रीवास्तव ने लिखी है और पूजा भट्ट मुख्य भूमिका में है। यह सीरीज मुंबई में विभिन्न क्षेत्रों की 5 महिलाओं के जीवन पर आधारित है। यूजर्स ने सीरिज के हिंदूफोबिक कंटेट को लेकर भी नाराजगी जताई है। गौरतलब है कि यह पहला मौका नहीं है जब कोई वेब सीरीज अपने कंटेंट को लेकर विवादों में है। कुछ दिनों पहले अमेजन प्राइम वीडियो की वेब सीरीज ‘तांडव’ हिंदूफोबिक कंटेट को लेकर विवादों में थी। इससे जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने ओटीटी (OTT) प्लेटफॉर्म पर रिलीज से पहले कंटेंट की स्क्रीनिंग पर जोर दिया था।

PM मोदी के खिलाफ विदेशी मीडिया गिरोह और उसका प्रोपेगेंडा: कभी ‘डिवाइडर इन चीफ’ तो कभी Covid के ‘एकमात्र जिम्मेदार’

26 मई 2021 को केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार अपने कार्यकाल के 7 वर्ष पूरे करने जा रही है। भाजपा पहले भी सरकार में रही लेकिन इतने प्रचंड बहुमत के साथ नहीं। हालाँकि, यह नरेंद्र मोदी का करिश्माई नेतृत्व और ‘गुजरात मॉडल’ को बनाने वाली छवि का कमाल था कि लगातार विपक्षी पार्टियों और विश्व भर के लिबरल-वामपंथी षड्यंत्रों के बाद भी वह 2019 में सत्ता में लौट सके और 2014 के चुनावों से बेहतर प्रदर्शन कर सके।

उन्होंने न केवल भारत की सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक प्रगति के लिए कार्य किए बल्कि भारत की सुरक्षा और विदेशी संबंधों को सुदृढ़ करने में भी आगे रहे। स्वच्छ भारत अभियान हो या उज्ज्वला योजना, करोड़ों जन-धन खाते खोलने की बात हो या रोजगार प्रदान करने वाली मुद्रा योजना के विस्तार की, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने भारत में आर्थिक और सामाजिक विकास को हमेशा प्राथमिकता दी।

भारत की सुरक्षा के मुद्दे पर भी नरेंद्र मोदी ने शुरू से ही कड़े फैसले लिए। कभी मुंबई जैसा क्रूरतम आतंकी हमला झेलने वाला भारत आतंकियों को उनके घर में घुसकर मारने लगता है तो यह पीएम मोदी के दृढ़ निश्चय और सेना पर उनके अटल भरोसे को बताता है। कश्मीर और राम मंदिर जैसे जटिल मुद्दों का सुलझ जाना भी नरेंद्र मोदी सरकार की एक बड़ी उपलब्धि रही लेकिन मीडिया यह सब स्वीकार नहीं कर सकता।

न केवल भारतीय मीडिया बल्कि विदेशी मीडिया ने भी नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्रित्व कालखंड में जमकर नैरेटिव चलाया। कॉन्ग्रेस और मीडिया के इस गठजोड़ ने उसी दिन से नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के खिलाफ षड्यन्त्र शुरू कर दिया था जिस दिन भाजपा ने प्रचंड जीत हासिल की थी। यह हमेशा से ही स्पष्ट रहा कि पश्चिमी मीडिया ने जिन पत्रकारों और वामपंथियों के दम पर पीएम मोदी के खिलाफ नैरेटिव चलाया, वो सभी कॉन्ग्रेस पार्टी के समर्थक रहे जो कॉन्ग्रेस के शासनकाल में सत्ता के संरक्षण में अपना हिन्दू विरोधी और राष्ट्र विरोधी एजेंडा चलाते थे। 2014 के बाद यही सब बंद हुआ।

हालाँकि, ये मीडिया समूह और पत्रकार आज भी अपना एजेंडा चला रहे हैं लेकिन अंतर इतना आया है कि इन्हें सत्ता का संरक्षण प्राप्त नहीं हो पा रहा है। इसी खीझ में ये मीडिया समूह आज मोदी विरोध करते-करते विदेशी मीडिया की गोद में जा बैठे हैं।

आपको याद होगा कि मई 2019 में जब भारत में लोकसभा चुनाव अपने आखिरी चरण में चल रहा था तब ‘टाइम मैग्जीन’ ने अपने अंतरराष्ट्रीय संस्करण में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भारत का ‘डिवाइडर इन चीफ’ कहा था। यह मैग्जीन की कवर स्टोरी थी और बाकायदा टाइम मैग्जीन के कवर पर भगवा गमछा ओढ़े पीएम मोदी की फोटो के साथ डिवाइडर इन चीफ लिखा गया था।

टाइम मैग्जीन का कवर जिसमें पीएम मोदी को डिवाइडर इन चीफ कहा गया

टाइम मैग्जीन की इस कवर स्टोरी को भारतीय पत्रकार तवलीन सिंह और पाकिस्तान के पत्रकार एवं बिजनेसमैन सलमान तासीर के बेटे आतिश तासीर ने लिखा था। तासीर वही था जिसने गृह मंत्री अमित शाह के कोरोना संक्रमित होने पर उनके लिए आपत्तिजनक शब्दों का उपयोग किया था।

इस लेख में तासीर ने मोदी को एक ऐसा नेता कहा था जो 2014 में किए गए अपने वादे पूरे करने में असमर्थ रहे लेकिन 2019 के चुनावों में दोबारा चुने जाने की उम्मीद में है। तासीर ने लिखा था कि न केवल मोदी के आर्थिक चमत्कार असफल रहे बल्कि उन्होंने पूरे देश में एक विषैला धार्मिक राष्ट्रवाद का माहौल बना दिया है।

लेकिन यह सिर्फ टाइम मैग्जीन की बात नहीं है। विश्व मीडिया के एक बड़े वर्ग ने नरेंद्र मोदी की आलोचना ही की है। बीबीसी की खबरों को गौर से देखेंगे तो वहाँ भारत की नरेंद्र मोदी सरकार को कई मुद्दों पर घेरा गया है। कभी गौरक्षा के नाम पर तो कभी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री के लिए एक कट्टर छवि वाले एक हिन्दू संत को चुनने के नाम पर। बीबीसी ने जून 2017 में एक लेख प्रकाशित किया था जिसमें लिखा गया था कि नरेंद्र मोदी की हिन्दू राष्ट्रवादी भाजपा के शासन में गाय एक ध्रुवीकरण करने वाली जानवर हो गई है और धार्मिक विभाजन और भी बढ़ता जा रहा है।

बीबीसी के लेख का स्क्रीनशॉट

इसी लेख में कहा गया था कि नरेंद्र मोदी की नजरों के सामने भारत एक ‘भीडतंत्र (Mobocracy)’ में बदलता जा रहा है और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा में कानून व्यवस्था असमर्थ नजर आ रही है। लेख में यहाँ तक कह दिया गया कि मोदी सरकार हिन्दू भीड़ को रोकने में असमर्थ है या रोकना ही नहीं चाहती है।

बीबीसी का लेख जिसमें भारत को भीडतंत्र कहा गया

जैसा कि कॉन्ग्रेस के कथित टूलकिट में ‘सेंट्रल विस्टा’ प्रोजेक्ट को बदनाम करने और उसकी आलोचना करने के लिए कहा गया है, बीबीसी में हाल ही में एक लेख प्रकाशित किया गया जिसका शीर्षक था, “क्या भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वाकई एक नए घर की जरूरत है?” शीर्षक से ऐसा लगता है कि जैसे सेंट्रल विस्टा मात्र पीएम मोदी के नए घर को बनाने का एक प्रोजेक्ट है जबकि वास्तव में इस प्रोजेक्ट के अंतर्गत नई संसद, उपराष्ट्रपति के घर और कई बहुमंजिला कार्यालयों का निर्माण किया जाना है।

बीबीसी के लेख जिसमें सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट की आलोचना की गई है

लेख में पीएम मोदी की तुलना रोम के नीरो (रोम जल रहा था और नीरो बाँसुरी बजा रहा था) से की गई क्योंकि देश में Covid-19 संक्रमण की खतरनाक लहर के बाद भी यह प्रोजेक्ट चल रहा है।

भारत में कोरोना वायरस संक्रमण की दूसरी लहर के लिए भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ही दोषी ठहराया गया। बीबीसी के ही एक लेख में ऑस्ट्रेलियन अखबार के हवाले से कहा गया कि अफसरशाही की असफलता, अहंकार और छद्म राष्ट्रवाद के कारण भारत में कोरोना वायरस का संक्रमण खतरनाक हो गया। लेख में यह भी बताया गया कि मोदी ने गंगा नदी के किनारे न केवल एक हिन्दू त्यौहार (कुंभ) को होने दिया बल्कि पश्चिम बंगाल में चुनाव के दौरान खूब रैलियाँ भी की। हालाँकि इस लेख में दूसरी पार्टियों द्वारा किसी भी राज्य में की गईं एक भी रैली की चर्चा नहीं की गई।

वाशिंगटन पोस्ट का लेख

ऑपइंडिया ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी जिसमें बताया गया था कि वाशिंगटन पोस्ट और डीडब्ल्यू न्यूज ने भारत में कोरोना वायरस संक्रमण के हालातों का उपयोग करते हुए सोशल मीडिया में अपना प्रमोशन कर रहे थे। दोनों ही मीडिया समूहों ने ट्विटर ऐड का उपयोग करते हुए भारत में Covid-19 के हालातों पर आधारित अपनी रिपोर्ट को प्रमोट किया था।

वाशिंगटन पोस्ट में अप्रैल 2021 में प्रकाशित लेख में लिखा गया कि जब देश में कोरोना वायरस का संक्रमण तेजी से फैल रहा था तब नरेंद्र मोदी चुनावी रैलियाँ कर रहे थे और गंगा किनारे आयोजित हुए एक बड़े त्यौहार को रोकने में कोई रुचि नहीं दिखा रहे थे जबकि सही तो यह है कि पीएम मोदी ने स्वयं धर्मगुरुओं और मठाधीशों से बात करके कुंभ को सांकेतिक रूप से मनाए जाने का अनुरोध किया था जिसे मान भी लिया गया था।

वाशिंगटन पोस्ट के लेख का एक हिस्सा

इसी लेख में यह भी कहा गया था कि जब देश में स्वास्थ्य सुविधाओं को बढ़ाने की आवश्यकता थी तब मोदी सरकार टीकाकरण पर फोकस कर रही थी और खुद को ही शाबाशी दे रही थी। इस लेख में भी कहा गया कि मोदी ने 2019 की प्रचंड जीत के बाद भी भारतीयों को सेक्युलर गणतांत्रिक भारत की जगह एक ऐसे राष्ट्रवाद का स्वप्न दिया जो भारत को हिन्दू राष्ट्र के रूप में देखता है।

वाशिंगटन पोस्ट ने भारत की मोदी विरोधी राणा आयूब और बरखा दत्त की सहायता से शुरू से ही नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारत सरकार के खिलाफ अपना प्रोपेगेंडा चलाया। ये दोनों ही ऐसी पत्रकार हैं जो मोदी सरकार की आलोचना का कोई अवसर नहीं छोड़ती हैं। हालाँकि इसे आलोचना के बजाय प्रोपेगेंडा या नैरेटिव कहा जाना चाहिए क्योंकि इनके जैसे कई पत्रकार 2014 से ही मोदी सरकार के पीछे पड़ गए थे और इन्होंने मोदी सरकार के द्वारा किए गए कार्यों पर कोई ध्यान नहीं दिया बल्कि मोदी के नेतृत्व में देश में बढ़ रहे हिन्दू कट्टरवाद का झूठा प्रोपेगेंडा चलाया।   

2014 में भी जब भाजपा की जीत हुई और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तब विश्व के कई मीडिया समूहों ने इसे भारत का बदलाव तो बताया लेकिन साथ में राष्ट्रवाद और कट्टर हिन्दुत्व की छवि को भी समेटे रखा। इन मीडिया समूहों के तब प्रकाशित हुए लेखों में यह आशंका जताई गई कि अब भारत में मुस्लिमों का भविष्य क्या है?

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही विश्व मीडिया का उनसे बैर शुरू हो गया था। हर बार इन मीडिया समूहों के लेखों में मोदी के साथ भारत में बढ़ रहे राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व की भावना को भी निशाने पर लिया गया। जब भी नरेंद्र मोदी पर कोई लेख लिखा गया तो इसमें उनकी हिन्दू पहचान का वर्णन जरूर किया गया और इस प्रकार किया गया कि उसने पढ़ने वाला इस भ्रम में पड़ जाए कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत एक ऐसे हिन्दू राष्ट्र की ओर बढ़ रहा है जहाँ हिंदुओं के अलावा किसी के लिए कोई जगह नहीं है।

किसान आंदोलन से लेकर कोरोना वायरस संक्रमण तक जब भी सरकार ने अफवाहों को रोकने के लिए कड़े कदम उठाए, इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन बताकर मोदी सरकार पर निशाना साधा गया। 2014 में सत्ता में आने के बाद नरेंद्र मोदी सरकार ने भारत की आर्थिक उन्नति और सामाजिक सुरक्षा के लिए कई नीतियाँ बनाई लेकिन उन नीतियों को भी दरकिनार कर दिया गया और सरकार के प्रयत्नों को धूमिल कर दिया गया।

राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर भी जब नरेंद्र मोदी ने कड़े निर्णय लिए तो उन्हें भी हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद के प्रतिरूप में ढाल दिया गया और उन्हें भारत में दक्षिणपंथ के अधिनायकवाद के उदय के रूप में दिखाया गया।

हालाँकि, ऐसा नहीं है कि विश्व का मीडिया 2014 से ही नरेंद्र मोदी का बैरी बना हुआ है। गुजरात में हुए 2002 के दंगों के बाद भी इसी मीडिया ने नरेंद्र मोदी को लगातार दंगों का आरोपी बताया और आज भी इन दंगों की चर्चा होने पर मोदी को ही जिम्मेदार ठहराते हैं। उनके लिए यह मायने नहीं रखता कि गोधरा में ट्रेन में हिंदुओं को जिंदा जला दिया गया था।

हाल ही में भारत के कई पत्रकारों ने जलती चिताओं की तस्वीरों को पश्चिमी मीडिया को मुहैया कराया जो बड़े दामों पर ब्रिटिश अमेरिकन मीडिया कंपनी द्वारा बेची जा रही थीं। इन जलती चिताओं का ही उपयोग करके विश्व मीडिया ने भारत में कोरोना वायरस संक्रमण की लड़ाई को असफल करार दिया था और अंततः नरेंद्र मोदी को संक्रमण से निपटने में असफल बताया था। आपदा में फायदा उठाने का बिजनेस मॉडल हमेशा से पश्चिमी मीडिया के लिए अच्छा रहा है। इसलिए उन्होंने जलती चिताओं और लाशों भी उसी में शामिल कर दिया।   

मीडिया ही नहीं अपितु मेडिकल जर्नल लैंसेट ने नरेंद्र मोदी के खिलाफ एक नैरेटिव चलाया। लैंसेट ने 08 मई 2021 को एक लेख प्रकाशित किया जहाँ भारत में कोरोना वायरस संक्रमण के बढ़ते संक्रमण का पूरा ठीकरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर फोड़ दिया गया। हालाँकि, यह पहली बार नहीं है जब लैंसेट ने नरेंद्र मोदी का विरोध किया हो। इसके पहले लैंसेट कश्मीर से अनुच्छेद 370 के उन्मूलन का विरोध भी कर चुका है।

फिलहाल हम 2021 के मध्य में हैं और अभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल के तीन वर्ष शेष हैं। ऐसे में यह निश्चित है कि मीडिया (चाहे वह भारतीय हो या विदेशी) और भारत के राष्ट्रवादी लोगों का युद्ध बहुत आगे तक चलने वाला है। इस युद्ध में इतना तो निश्चित है कि मीडिया, हिंदुओं और भारत के हितों पर जोरदार प्रहार करने वाला है और मीडिया के सामने खड़े हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनका समर्थन करने वाले करोड़ों हिन्दू।  

WhatsApp को केंद्र सरकार का जवाब, कहा- निजता का सम्मान, लेकिन गंभीर मामलों की देनी ही होगी मूल जानकारी

व्हाट्सएप की तरफ से अदालत से लगाई गई गुहार के बाद भारत सरकार ने भी इस पर अपनी स्थिति स्पष्ट की है। भारत सरकार की मानें तो यह मानती है कि ‘निजता का अधिकार’ एक मौलिक अधिकार है और अपने नागरिकों के लिए इसे सुनिश्चित करने के लिए वह प्रतिबद्ध है। सरकार निजता के अधिकार का सम्मान करती है और इसका उल्लंघन करने का उसका कोई इरादा नहीं है।

बता दें कि व्हाट्सएप ने नए सोशल मीडिया मध्यवर्ती नियमों पर सरकार के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया है। व्हाट्सएप के एक प्रवक्ता ने पुष्टि की कि कंपनी ने हाल ही में लागू किए गए आईटी नियमों के खिलाफ 25 मई को हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इस मुद्दे पर केंद्र सरकार ने कहा कि सरकार लोगों को निजता का अधिकार देने के लिए प्रतिबद्ध है लेकिन यह ‘उचित प्रतिबंध’ और ‘कोई मौलिक अधिकार पूर्ण नहीं है’ के अधीन है।

सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा, “भारत सरकार अपने सभी नागरिकों का निजता का अधिकार सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन साथ ही यह सरकार की जिम्मेदारी भी है कि वह कानून व्यवस्था बनाए रखे और राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करे। सभी स्थापित न्यायिक सिद्धांतों के अनुसार, निजता के अधिकार सहित कोई भी मौलिक अधिकार आत्यंतिक नहीं हैं और यह उचित प्रतिबंधों के अधीन है।”

रविशंकर प्रसाद ने कहा कि जब व्हाट्सएप को किसी संदेश की उत्पत्ति का खुलासा करना आवश्यक था, तो यह केवल भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों से संबंधित बहुत गंभीर अपराधों की रोकथाम, जाँच या सजा के लिए था। सार्वजनिक आदेश, या उपरोक्त से संबंधित अपराध के लिए उकसाना या बलात्कार, यौन रूप से स्पष्ट सामग्री या बाल यौन शोषण सामग्री के संबंध में था।

प्रसाद ने कहा कि नए डिजिटल नियमों से व्हॉट्सएप का सामान्य कामकाज प्रभावित नहीं होगा। नए नियम के तहत व्हॉट्सएप को किन्हीं चिन्हित संदेशों के मूल स्रोत की जानकारी देने को कहना, निजता का उल्लंघन हरगिज नहीं है।

बताते चलें कि व्हाट्सएप ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करते हुए यूजर्स की प्राइवेसी पर असर का हवाला दिया है। सोशल मीडिया कंपनी का कहना है कि आईटी के नए नियम उसे यूजर्स की प्राइवेसी की सुरक्षा को तोड़ने पर बाध्य करेंगे।

फेसबुक की मालिकाना हक वाली कंपनी ने मंगलवार को यह केस फाइल किया था। इन नियमों के तहत व्हॉट्सएप पर यह नई अनिवार्यता लागू होगी कि उसे पूछे जाने पर यह बताना होगा कि एप पर आया कोई मैसेज, सबसे पहले कहाँ से आया था।

व्हॉट्सएप ने एक बयान जारी कर कहा, “चैट को ट्रेस करने के लिए बाध्य करने वाला यह कानून, व्हाट्सएप पर आ रहे हर मैसेज का फिंगरप्रिंट रखने के बराबर है। अगर हम ऐसा करते हैं तो इससे एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन का कोई मतलब नहीं रह जाएगा और यह लोगों के निजता के अधिकार का भी हनन होगा।”

व्हाट्सएप ने अपनी याचिका में हाईकोर्ट से आग्रह किया है कि इन नए नियमों से एक को भारतीय संविधान में दिए गए निजता के अधिकार का उल्लंघन करने वाला घोषित किया जाए, क्योंकि यह सोशल मीडिया कंपनियों के सामने शर्त रखता है कि वो संबंधित प्राधिकरण के कहे जाने पर ‘फर्स्ट ओरिजिनेटर ऑफ इन्फॉर्मेशन’ यानी किसी सूचना को सबसे पहले साझा करने वाले का पता लगाएँ।

कंपनी का कहना है कि व्हाट्सएप पर चैट्स का एंड-टू-एंड एन्क्रिप्शन होता है, ऐसे में इस नियम का पालन किए जाने का मतलब है कि वो अपने प्लेटफॉर्म पर मैसेज भेजेने और रिसीव करने वाले का एन्क्रिप्शन ब्रेक करें।

IMA ने PM मोदी को पत्र लिख रखी नई माँग, कहा- बाबा रामदेव पर देशद्रोह के तहत हो कार्रवाई

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) और योगगुरु बाबा रामदेव के मध्य विवाद खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है। बुधवार (26 मई) को IMA ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर बाबा रामदेव के खिलाफ देशद्रोह की कार्रवाई करने की माँग की है। पत्र में कहा गया है कि रामदेव भारत में बड़े स्तर पर चल रहे टीकाकरण कार्यक्रम के खिलाफ अफवाह फैला रहे हैं जिससे भारत को Covid-19 संक्रमण से मुक्त करने के अभियान को नुकसान पहुँचने की आशंका है।

IMA ने पीएम मोदी के नाम यह पत्र तब लिखा है जब एक वायरल वीडियो में बाबा रामदेव यह कहते हुए सुने गए कि लगभग 10,000 डॉक्टरों की कोरोना वायरस वैक्सीन की दोनों खुराक लेने के बाद भी मौत हो गई। इसके अलावा इस वायरल वीडियो में बाबा रामदेव ने यह भी कहा कि एलोपैथिक दवा लेने का बाद लाखों लोगों की भी मौत हुई है। हालाँकि, एक और वायरल वीडियो में संख्या 1000 बताई जा रही है।

पीएम मोदी को लिखे गए अपने पत्र में IMA ने कहा है कि पतंजलि प्रॉडक्ट्स के मालिक बाबा रामदेव के द्वारा टीकाकरण के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान को रोका जाए और उनपर देशद्रोह की धाराओं के तहत मामला दर्ज किया जाए।

IMA ने पत्र में कहा कि जब आपने (पीएम मोदी) 18 वर्ष से अधिक आयु के लोगों के टीकाकरण को लेकर अपनी प्रतिबद्धता दिखाई तब सबसे पहले IMA के प्रतिनिधियों ने ही टीका लेकर इसके प्रति लोगों में व्याप्त हिचकिचाहट को खत्म करने का प्रयास किया। सरकार और स्वास्थ्य पेशेवरों के कारण ही आज भारत में लगभग 20 करोड़ लोगों को टीका लग चुका है। पत्र में IMA ने कहा, “दूसरे देशों के टीकों को अनुमति देने और अपने देश में टीकों के उत्पादन को बढ़ाने के लिए हम आपके प्रयास का धन्यवाद करते हैं।“

कोरोना वायरस के टीकों पर अपनी बात रखते हुए IMA ने कहा कि यह राहत की बात है कि Covid-19 के टीकों की खुराक लेने के बाद 0.06% लोगों में ही हल्का संक्रमण देखने को मिला और बहुत ही कम लोगों को फेफड़ों का गंभीर संक्रमण हुआ।

IMA ने कहा कि यह बात साबित हो चुकी है कि टीके पूरी तरह से सुरक्षित हैं और भारत में कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने में प्रभावी भी हैं। IMA ने पीएम मोदी से कहा, “ऐसे कठिन समय में हम आपका संज्ञान इस बात पर दिलाना चाहते हैं कि एक वायरल वीडियो में बाबा रामदेव कह रहे हैं कि लगभग 10000 डॉक्टरों की कोरोना वायरस वैक्सीन की दोनों खुराक लेने के बाद भी मौत हो गई।“

IMA ने कहा कि बाबा रामदेव का यह बयान सरकार के टीकाकरण के प्रयासों को कमजोर कर रहा है। इसलिए बाबा रामदेव के खिलाफ त्वरित कार्रवाई करते हुए देशद्रोह का मुकदमा लगाया जाए और उन्हें गिरफ्तार किया जाए।

इसके अलावा आज (26 मई) ही यह खबर आई कि IMA उत्तराखंड ने बाबा रामदेव को 1000 करोड़ रुपए की मानहानि का नोटिस भेजा है। नोटिस में उनसे अपने बयान का खंडन कर लिखित और वीडियो के जरिए माफी की माँग की गई है। इसके लिए 15 दिनों का वक्त दिया गया है।

यह विवाद तब शुरू हुआ जब बाबा रामदेव ने एक वायरल वीडियो में कहा कि कोरोना वायरस के इलाज में एलोपैथी पूरी तरह असफल रही और कई लोगों की जान एलोपैथिक दवाओं के कारण ही गई।