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मनोचिकित्सकों ने मीडिया को दी सकारात्मक रहने की सलाह: भय के माहौल और लाशों के बीच रिपोर्टिंग पर जताई चिंता

भारत में तेज गति से बढ़ रहे संक्रमण के बीच मीडिया समूहों द्वारा की जा रही ‘गिद्ध रिपोर्टिंग’ पर संज्ञान लेते हुए मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित चिकित्सकों के एक समूह ने न्यूज मीडिया आउटलेट्स को ओपन लेटर लिखा है। इसमें चिकित्सकों ने मीडिया समूहों से अपील की है कि वह नकारात्मक रिपोर्टिंग छोड़कर लोगों पर बेहतर प्रभाव डालने वाली रिपोर्टिंग करें। उन्होंने मीडिया आउटलेट्स से अपील की है कि वे सकरात्मकता की कहानियाँ लोगों के सामने लेकर आएँ।

ओपन लेटर लिखने वाले इस समूह में नई दिल्ली के नेशनल मेडिकल कमीशन के एथिक्स एण्ड मेडिकल रजिस्ट्रेशन बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. बीएन गंगाधर, बैंगलोर की NIMHANS में मनश्चिकित्सा (Psychiatry) की HOD एवं प्रोफेसर प्रतिमा मूर्ति, भारतीय मनश्चिकित्सा सोसायटी के अध्यक्ष गौतम साहा और दिल्ली एम्स में मनश्चिकित्सा के प्रोफेसर राजेश सागर शामिल हैं।

मीडिया की संवेदनशीलता मुद्दों पर रिपोर्टिंग :

इस ओपन लेटर में कहा गया है कि मीडिया एक समय में कई करोड़ों लोगों के साथ संपर्क स्थापित करने की क्षमता रखता है। मीडिया के द्वारा पेश की गई रिपोर्ट टेलीविजन, मोबाईल और समाचारपत्रों के माध्यम से लगातार लोगों तक पहुँचती रहती है। ऐसे में श्मशानों में जलती हुई लाशों को दिखाकर, रोते-बिलखते लोगों की तस्वीरों और वीडियो दिखाकर, संवेदनशील क्षणों को कैमरा में कैद करके कुछ समय के लिए सनसनी पैदा की जा सकती है और इससे लोगों का ध्यान भी खींचा जा सकता है लेकिन ऐसी रिपोर्टिंग की कीमत भारी हो सकती है।

लेटर में यह भी कहा गया है कि जबकि देश के अधिकांश लोग विभिन्न प्रकार के प्रतिबंधों के कारण अपने घरों में है ऐसे में वो टेलीविजन और अपने मोबाईल के माध्यम से बाहरी दुनिया की खबरों से जुड़े हैं। लोग इस समय पहले से ही अवसाद और महामारी की कठिनाईयों से जूझ रहे हैं लेकिन संवेदनशील मुद्दों पर सनसनीखेज रिपोर्टिंग और निराशा एवं भय के विजुअल देखने से लोग और भी अवसाद में जा सकते हैं।

लेटर में उदाहरण दिया गया है कि यदि कोई Covid-19 संक्रमित मरीज ऐसी रिपोर्टिंग के माध्यम से निराशा भरी खबरों को देखेगा तो उसके भीतर से सकरात्मकता जाती रहेगी और जलती चिताओं को देखकर उसके मन में चिंता का भाव ही उत्पन्न होगा।

तर्क, तथ्य और उचित परिस्थितियों पर आधारित रिपोर्टिंग की सलाह :

इस ओपन लेटर में डॉक्टरों के समूह द्वारा यह बताया गया है कि किसी भी वस्तु की कमी को उजागर करना सही है ताकि उस पर कार्रवाई हो सके किन्तु यह बताना कि उस वस्तु की कमी हर जगह है, गलत है। जिस स्थान पर वस्तु की कमी है उसे दिखाना चाहिए लेकिन जहाँ कमी नहीं है उसे भी बराबर महत्व देते हुए दिखाना चाहिए।

लेटर में माँग तथा आपूर्ति के चक्र का उदाहरण दिया गया है और उसे मानवीय व्यवहार से जोड़ा गया है। मनोचिकित्सकों ने बताया कि मानव की प्रवृत्ति ही यही है कि वो जिस वस्तु की कमी के बारे में जितना सुनता है उतना ही उस वस्तु को संग्रहित करना शुरू कर देता है भले ही वह वस्तु उसके काम की हो या न हो। इसी प्रवृत्ति के कारण एक चक्र बन जाता है और अधिक संग्रह करने के कारण वस्तु की कमी बढ़ती जाती है।

क्या दिखाना है क्या नहीं :

डॉक्टरों के समूह द्वारा लिखे गए इस ओपन लेटर में कहा गया है कि मीडिया को यह दिखाना चाहिए कि मरीज को किस प्रकार से दवाई लेनी है, अस्पताल की जरूरत कब है, ऑक्सीजन की जरूरत कब है, कितने लोग Covid-19 से संक्रमण के बाद भी घर में ही ठीक हुए, संस्थाएँ किस प्रकार से महामारी के इस दौर में लोगों की मदद कर रही हैं। ऐसा करने से लोग सकारात्मक व्यवहार करेंगे और महामारी का यह पहलू भी सबके सामने आएगा।

मीडिया आउटलेट्स से निवेदन करते हुए इस लेटर में मनोचिकित्सकों द्वारा कहा गया है कि पत्रकारों को यह महसूस करना चाहिए कि जब रिपोर्टिंग करते समय उन पर ही नकारात्मकता हावी हो सकती है तो आम आदमी जो दिन भर यही खबरें देखता है उसके जीवन पर इन खबरों का कैसा प्रभाव होगा।

लेटर में अंत में मीडिया कर्मियों और न्यूज समूहों से प्रार्थना की गई है कि मीडिया इस महामारी में एक महत्वपूर्ण किरदार निभा सकता है लेकिन डर और लाशों की रिपोर्टिंग करके नहीं बल्कि सकरात्मक और विश्वसनीय खबरों को दिखाकर।

हाल ही में कई ऐसी खबरें आई थीं जहाँ मीडिया समूहों ने जलती लाशों और श्मशान की रिपोर्टिंग की, फेक खबरें चलाईं। इस पर ही संज्ञान लेते हुए डॉ. बीएन गंगाधर एवं अन्य ने मीडिया समूहों को अपनी रिपोर्टिंग पर ध्यान देने और सकारात्मक व्यवहार करने की सलाह दी है।

Scroll ने योगी सरकार को बदनाम करने के लिए दिया भ्रामक शीर्षक, अमेठी में ऑक्सीजन की झूठी कमी का मामला

जहाँ देश में एक ओर Covid-19 महामारी लगातार बढ़ती जा रही है वहीं दूसरी ओर वामपंथी और लिबरल न्यूज समूह फेक न्यूज और प्रोपेगंडा फैलाने से बाज नहीं आ रहे हैं। हाल ही में वामपंथी न्यूज वेबसाइट स्क्रॉल ने उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार को बदनाम करने के लिए एक भ्रामक शीर्षक प्रकाशित किया। स्क्रॉल का शीर्षक कुछ ऐसा था कि उससे यही प्रतीत होता कि उत्तर प्रदेश में सहायता माँगने पर एक आदमी के ऊपर एफआईआर दर्ज हो गई।

स्क्रॉल के द्वारा प्रकाशित लेख का शीर्षक था, ‘FIR filed against man who sought Twitter help for oxygen for grandfather in Uttar Pradesh’. स्क्रॉल के शीर्षक से यही लग रहा था कि ट्विटर के माध्यम से ऑक्सीजन की सहायता माँगने वाले व्यक्ति पर उत्तर प्रदेश में एफआईआर दर्ज कर दी गई है।

स्क्रॉल के लेख का स्क्रीनशॉट जहाँ भ्रामक शीर्षक दिखाई दे रहा है

स्क्रॉल के लेख में बताया गया है कि ट्विटर पर ऑक्सीजन के लिए सहायता माँगने वाले शशांक यादव पर पुलिस ने एफआईआर दर्ज की है। हालाँकि उस पर ऑक्सीजन की कमी की अफवाह फैलाने और झूठा ट्वीट करने का आरोप है।

The Indian Express के हवाले से स्क्रॉल ने कहा कि पुलिस ने बताया है कि यादव अपने ट्वीट के माध्यम से भ्रामक जानकारी दी थी। स्क्रॉल के लेख में एक पुलिस अधिकारी का भी जिक्र था जिसने बताया कि यादव ने ऑक्सीजन की आपूर्ति और कोरोनावायरस पर भ्रामक जानकारी दी। हालाँकि इतनी जानकारी होने के बाद भी स्क्रॉल ने अपने शीर्षक को भ्रामक ही बनाए रखा।

स्क्रॉल के लेख का एक हिस्सा जहाँ इंडियन एक्स्प्रेस के हवाले से खबर दी गई है

शशांक ने पुलिस को किया गुमराह, न तो उसका कोई संबंधी कोविड-19 था न ही उसे ऑक्सीजन की जरूरत थी:

पुलिस ने बताया कि शशांक ने अपने ट्वीट में जिस मरीज का जिक्र किया था वह शशांक के नाना थे ही नहीं बल्कि उसके किसी चचेरे भाई के नाना थे। उनकी उम्र 88 वर्ष थी और वह न तो कोविड-19 से संक्रमित थे और न ही उन्हें ऑक्सीजन की जरूरत थी। उनकी मृत्यु हार्ट अटैक से हुई।

पुलिस ने यह भी बताया कि सनसनी और ऑक्सीजन की कमी का डर फैलाने के उद्देश्य से किए गए इस ट्वीट के बाद शशांक यादव सो गया और पुलिस के फोन लगाने पर कोई भी जवाब नहीं दिया। पुलिस ने इस चिंता से कि हो सकता है कोई आपात स्थिति हो, यादव का फोन ट्रेस किया और उस तक पहुँची।

शशांक यादव के ऊपर एपिडेमिक अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया और सीआरपीसी की धारा 41 के अंतर्गत उसे नोटिस दिया गया। हालाँकि, अमेठी पुलिस ने बताया कि शशांक को नोटिस और भविष्य के लिए चेतावनी देकर छोड़ दिया गया है।

इस पूरे मामले पर द वायर की पत्रकार आरफा खानम शेरवानी ने केन्द्रीय मंत्री और अमेठी सांसद स्मृति ईरानी से मदद करने की अपील की। जिस पर संज्ञान लेते हुए स्मृति ईरानी ने अमेठी पुलिस और जिलाधिकारी को शशांक की मदद का निर्देश दिया।

इस पूरे मामले को देखने के बाद यही प्रतीत होता है कि स्क्रॉल ने जानबूझकर भ्रामक शीर्षक दिया जिससे शीर्षक देखने पर ही यह प्रतीत हो कि उत्तर प्रदेश में मदद माँगने पर भी एफआईआर हो रही है।

कोरोना वैक्सीन कीमतों पर मची रार के बीच SII ने घटाया कोविशील्ड टीके का दाम, जानें कितनी हुई कीमत

सीरम इंस्टीट्यूट ने राज्यों को दी जाने वाली कोविशील्ड वैक्सीन की कीमत 100 रुपए घटा दी है। पुणे स्थित सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (SII) ने अपने कोविड-19 टीके ‘कोविशील्ड’ की राज्य सरकारों के लिए कीमत 400 रुपए प्रति खुराक तय की थी। अब इसे 300 रुपए प्रति खुराक कर दिया गया है। खुद एसआईआई के सीईओ अदार पूनावाला ने ट्वीट कर इसकी जानकारी दी है।

उन्होंने कहा, ”सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की तरफ से राज्य को दी जाने वाली वैक्सीन की कीमत 400 रुपए से घटाकर 300 रुपए प्रति डोज करता हूँ और यह तत्काल प्रभाव से लागू होगा। इससे राज्य के हजारों करोड़ रुपए की बचत होगी। इससे और ज्यादा वैक्सीनेशन हो पाएगा और अनगिनत जिंदगियाँ बचाई जा सकेंगी।”

दरअसल, 1 मई से देश में कोरोना वैक्सीनेशन का अगला चरण शुरू हो रहा है। इसके तहत 18 साल से ऊपर के लोग भी कोरोना से बचाव की वैक्सीन लगवा सकेंगे जिसके लिए आज से ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन भी शुरू हो चुका है। इस चरण के लिए केंद्र ने राज्यों और प्राइवेट अस्पतालों को सीधे वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों से वैक्सीन खरीदने की छूट दी है। सीरम इंस्टिट्यूट ने ऐलान किया था कि वह राज्यों को 400 रुपए प्रति डोज के हिसाब से कोविशील्ड की सप्लाई करेगी। प्राइवेट अस्पतालों के लिए यह कीमत 600 रुपए प्रति डोज है। अब राज्यों के लिए यह कीमत 400 रुपए से घटकर 300 रुपए प्रति डोज हो गई है।

कोविशील्ड की कीमत पर सवाल भी उठे थे। सोशल मीडिया पर तमाम यूजर इस बात को उठा रहे थे कि एस्ट्राजेनेका की जिस वैक्सीन को सीरम ने बनाया है, वह भारत में सबसे महँगी क्यों है जबकि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में इसकी कीमत भारत के मुकाबले आधे या उससे भी कम रखी गई है। इसके अलावा, केंद्र सरकार ने भी सीरम और भारत बायोटेक से वैक्सीनों की कीमत घटाने की अपील की थी। अब सीरम ने राज्यों के लिए कोविशील्ड की कीमत घटा दी है। हालाँकि, प्राइवेट अस्पतालों को यह 600 रुपए प्रति डोज के हिसाब से ही मिलेगी।

दिल्ली के 4 आलीशान होटल रिजर्व: जजों के बाद CM केजरीवाल ने अब सरकारी अफसरों के लिए भी किया VIP कोविड इंतजाम

कोरोना के बढ़ते संक्रमण के बीच अरविंद केजरीवाल सरकार ने जजों के बाद अब सरकारी अधिकारियों के लिए वीआईपी इंतजाम किया है। दिल्ली सरकार ने मंगलवार (अप्रैल 27, 2021) को दिल्ली के चार बड़े होटलों को अस्पतालों से लिंक करने का आदेश दिया है ताकि सरकारी अधिकारियों और उनके परिवार के लोगों का इलाज किया जा सके। बता दें कि दिल्ली उच्च न्यायालय पहले ही जजों के लिए वीआईपी इंतजाम करने को लेकर दिल्ली सरकार को जमकर फटकार लगा चुकी है।

दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने विवेक विहार में होटल जिंजर, शाहदरा में होटल पार्क प्लाजा, कड़कड़डूमा के पास होटल लीला एंबियंस, हरि नगर में होटल गोल्डन ट्यूलिप एसेंशियल को सरकारी अधिकारियों और उनके परिवार वालों के लिए रिजर्व किया है। मंगलवार को जारी किए गए आदेश के अनुसार इन होटलों को राजीव गाँधी सुपरस्पेशलिटी अस्पताल और दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल से जोड़ा जाएगा ताकि दिल्ली सरकार, स्वायत्त संस्थाओं और निगम के अधिकारियों और उनके परिवार वालों का इलाज किया जा सके।

दिल्ली सरकार के द्वारा जारी किए गए आदेश में लिखा गया है कि राजीव गाँधी अस्पताल और दीन दयाल उपाध्याय अस्पताल के निदेशकों को निर्देशित किया जाता है कि वे रिजर्व किए गए होटलों में कोविड पॉजिटिव अधिकारियों और उनके परिवार वालों के लिए स्वास्थ्य व्यवस्था मुहैया करवाएँ। साथ ही इस आदेश में यह भी कहा गया है कि रिजर्व किए गए होटलों में दिल्ली सरकार के कोविड पॉजिटिव अधिकारी और उनके परिवार के सदस्य क्वारंटाइन भी कर सकेंगे।

बीजेपी नेता कपिल मिश्रा ने आदेश की कॉपी शेयर करते हुए ट्वीट किया, “SHAME: अब केजरीवाल सरकार के अफसरों के लिए चार बड़े होटलों के 250 कमरें बुक करने का आर्डर। सरकारी अस्पताल को मरीज छोड़ कर इन होटलों में डॉक्टर ,ऑक्सीजन, दवाएँ भेजने का आर्डर। जनता एक एक बेड, एक ऑक्सीजन सिलेंडर के लिए तड़प तड़प कर मर रही है। ये कैसे बर्दाश्त किया जाएगा?”

बता दें कि पिछले दिनों दिल्ली सरकार ने एक आदेश जारी कर अशोका होटल के कमरों को कोविड केयर सेंटर्स में बदलने के लिए कहा था। अशोका होटल में इस सुविधा के लिए प्राइमस अस्पताल को भी लगाया गया था। हालाँकि मंगलवार को दिल्ली सरकार के इस आदेश पर ऑक्सीजन संकट की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने जमकर फटकार लगाई थी।

हाई कोर्ट ने फटकार लगाते हुए कहा था कि हमने कभी ऐसा कोई आग्रह नहीं किया था। साथ ही कोर्ट ने दिल्ली सरकार को कहा था कि आप सोचिए कि इस महामारी के दौरान ऐसा हम कैसे कह सकते हैं। यहाँ लोगों को अस्पताल में बेड और ऑक्सीजन नहीं मिल रहे हैं और हम आपसे लग्जरी होटल में बेड माँगेंगे? ऐसा आदेश कैसे जारी किया जा सकता है। सुनवाई के दौरान ही हाईकोर्ट ने दिल्ली सरकार को इस आदेश को तुरंत वापस लेने को कहा था। जिसके बाद सरकार ने साफ़ कर दिया कि इस आदेश को तुरंत वापस ले लिया जाएगा।

‘प्रियंका चोपड़ा की वजह से मुझे कोई काम नहीं मिला’: एक्ट्रेस की बहन मीरा चोपड़ा ने सुनाई स्ट्रगल की कहानी

बॉलीवुड सुपरस्टार प्रियंका चोपड़ा की कजिन मीरा चोपड़ा इन दिनों काफी चर्चा में आ गईं हैं। साल 2014 में फिल्‍म ‘गैंग ऑफ घोस्‍ट्स’ से बॉलीवुड डेब्‍यू करने वाली मीरा हिंदी सिनेमा के अलावा तमिल और तेलुगु फिल्मों में भी काम कर चुकी हैं। मीरा चोपड़ा ने 2014 में फिल्‍म ‘गैंग ऑफ घोस्‍ट्स’ से बॉलीवुड डेब्‍यू किया था। 

साउथ इंडियन फिल्‍मों में वह 2005 से ही काम कर रही थीं, बावजूद इसके उनका हिंदी फिल्‍मी करियर बहुत अच्‍छा नहीं रहा। मीरा चोपड़ा का कहना है कि उन्‍हें आज तक कोई भी फिल्‍म या काम प्रियंका चोपड़ा के कारण नहीं मिली है। उन्होंने जितना भी काम किया है, अपने बूते किया है।

‘प्रियंका ने नहीं की कभी कोई मदद’

मीरा चोपड़ा ने अपने एक्‍ट‍िंग करियर की शुरुआत तमिल और तेलुगु फिल्‍मों से की थी। ‘1920 लंदन’ जैसी बॉलीवुड फिल्‍मों में नजर आने वाली मीरा कहती हैं, “जैसे ही मैंने बॉलीवुड में एंट्री की, हर तरफ यही चर्चा रही कि प्रियंका चोपड़ा की बहन आ रही है। जबकि ईमानदारी से कहूँ तो मुझे प्रियंका की वजह से कभी कोई काम नहीं मिला। उन्‍होंने कभी रोल दिलवाने में मेरी कोई मदद नहीं की।”

‘प्रियंका की बहन होने का सिर्फ एक फायदा मिला’

Zoom TV Digital से स्‍ट्रगल को लेकर बात करते हुए मीरा कहती हैं, “यदि मुझे कभी किसी प्रोड्यूसर की जरूरत भी हुई, तो उन लोगों ने मुझे कास्‍ट नहीं किया क्‍योंकि मैं प्रियंका चोपड़ा की बहन हूँ। सच यही है कि प्रियंका से रिश्‍ता होना, मेरे करियर में किसी भी रूप में मददगार साबित नहीं हुआ। हाँ, इतना जरूर हुआ कि लोगों ने मुझे गंभीरता से लिया।”

मीरा आगे कहती हैं, “बॉलीवुड ने मुझे कभी ग्रांटेड नहीं लिया। ऐसा इसलिए था कि उन्हें पता था कि मैं तमिल फिल्मों में काम करके आई हूँ। लोगों को यह भी पता था कि मैं फिल्मी परिवार से हूँ। मुझे प्रियंका की बहन होने का बस यही फायदा हुआ। बाकी मुझे भी करियर में खूब स्ट्रगल करना पड़ा है।”

दोनों बहनों से कभी नहीं हुई तुलना

प्रियंका चोपड़ा के अलावा परिणीति चोपड़ा भी मीरा की बहन हैं। मीरा कहती हैं, “मैं इस मामले में भाग्‍यशाली रही हूँ कि मेरे काम की कभी मेरी दोनों से तुलना नहीं की गई है।” प्रियंका चोपड़ा अब जहाँ बॉलीवुड के साथ ही हॉलीवुड में भी नाम कमा रही हैं, वहीं परिणीति चोपड़ा हाल ही ‘साइना’ और ‘द गर्ल ऑन द ट्रेन’ और ‘संदीप और पिंकी फरार’ जैसी फिल्‍मों में नजर आई हैं।

पुलिसवाली के रोल में OTT पर डेब्‍यू

मीरा चोपड़ा आखिरी बार बॉलीवुड फिल्म ‘सेक्शन 375’ में नजर आई थीं। इस फिल्म में उनके साथ अक्षय खन्ना और रिचा चड्ढा भी थे। मीरा चोपड़ा ने अब ओटीटी प्लेटफॉर्म पर भी डेब्यू किया है। वह ‘कमाठीपुरा (द टैटू मर्डर्स)’ में लीड रोल प्ले कर रही हैं। जबकि आगे अर्जुन रामपाल के साथ उनकी फिल्‍म ‘नास्तिक’ भी आने वाली है।

राज्यों के उपयोग के लिए रेल मंत्रालय ने लगभग 64000 बेड और 4000 कोविड केयर कोच उपलब्ध कराए

देश कोरोना वायरस की दूसरी लहर से जूझ रहा है। इस संकट से निपटने के लिए कई मंत्रालय, निगम और संगठन एक साथ आए हैं। इस बीच रेल मंत्रालय की तरफ से लगभग 64,000 बेड और 4000 कोविड केयर कोच विभिन्न राज्यों के उपयोग के लिए उपलब्ध कराए गए हैं।

रेल मंत्रालय की एक विज्ञप्ति के अनुसार, लगभग 169 कोच पहले ही कोविड केयर के लिए विभिन्न राज्यों को सौंप दिए गए हैं। रेलवे को अब नागपुर से कोविड केयर की डिमांड हुई है, जहाँ लगभग 6000 नए कोरोना वायरस के मामले रोजाना सामने आ रहे हैं।

समझौते को जल्द से जल्द पूरा करने के लिए मंडल रेल प्रबंधक, नागपुर और नागपुर नगर निगम के आयुक्त के बीच एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए हैं। रेलवे 11 कोचों के साथ एक कोविड केयर रेक तैनात करने के लिए तैयार है, जिसमें प्रत्येक कोच में कम से कम 16 मरीजों को समायोजित करने की क्षमता वाले संशोधित स्लीपर्स शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, कोच में राज्य स्वास्थ्य अधिकारियों द्वारा प्रदान की जाने वाली सभी आवश्यक चिकित्सा बुनियादी सुविधाएँ उपलब्ध होंगी। महाराष्ट्र राज्य ने भी अजनी ICD क्षेत्र में अलगाव के कोच जुटाने की माँग रखी है।

नंदुरबार में अप्रैल के मध्य में लगभग 94 कोचों के साथ रेलवे कोविड केयर फैसिलिटी उपलब्ध कराई गई थी, जहाँ वर्तमान में 57 मरीजों के लिए सुविधा उपलब्ध है।

राज्यों की माँग के अनुसार, नागपुर, भोपाल, अजनी ICD, तिवारी (निकट इंदौर) में कोविड केयर कोच की भी व्यवस्था की गई है।

रेलवे कोविड केयर कोच डेटा (साभार: My Gov Twitter handle)

इंदौर के पास टिही में 20 कोविड केयर कोच में ऑक्सीजन सिलेंडरों से सुसज्जित लगभग 320 बिस्तरों की व्यवस्था भारतीय रेलवे द्वारा की गई है।

कोविड -19 उपचार की आवश्यकता वाले रोगियों के प्रबंधन के लिए दिल्ली की क्षमता को बढ़ाते हुए, रेलवे ने दिल्ली के सरकार की 75 कोविड केयर कोचों की माँग को पूरा किया है, जिसमें शकूरबस्ती में 50 कोच और आनंद विहार स्टेशनों पर 25 कोच लगाकर 1200 बेड की क्षमता है।

SC ने UAPA आरोपित सिद्दीकी कप्पन को मथुरा जेल से दिल्ली लाने का दिया आदेश, यूपी के वहीं ईलाज की अपील को ठुकराया

यूपी के हाथरस में दलित लड़की के साथ हुई रेप और हत्या के मामले में दंगों की साजिश रचने के आरोप में उत्तर प्रदेश पुलिस ने केरल के पत्रकार सिद्दीकी कप्पन पर UAPA के तहत चार्जशीट दायर की थी। अब सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को आदेशित किया है कि सिद्दीकी कप्पन को मथुरा जेल से दिल्ली के किसी सरकारी अस्पताल में ईलाज के लिए शिफ्ट किया जाए।

भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एनवी रमन, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस एएस बोपन्ना की पीठ ने केरल यूनियन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट (KUWJ) की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश जारी किया है। न्यायालय ने कहा कि केरल के पत्रकार सिद्दीकी कप्पन को मथुरा जेल से दिल्ली के एम्स, राम मनोहर लोहिया अथवा किसी अन्य सरकारी अस्पताल में शिफ्ट किया जाए।

लाइव लॉ के अनुसार उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से पक्ष रखते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि एक कोविड-19 निगेटिव व्यक्ति को विशेष सुविधा देते हुए दिल्ली के सरकारी अस्पताल में शिफ्ट करना न्यायसंगत नहीं है जबकि हजारों कोविड-19 संक्रमित मरीज पहले से ही अस्पतालों में बिस्तरों की कमी से जूझ रहे हैं।

सिद्दीकी कप्पन जिस मथुरा जेल में बंद है, वहाँ का उदाहरण देते हुए सॉलिसिटर जनरल मेहता ने कहा कि मथुरा जेल में ही लगभग 50 कोविड-19 संक्रमित मरीज हैं जिनका ईलाज मथुरा अस्पताल में ही चल रहा है। सिद्दीकी कप्पन के ईलाज के विषय में राज्य का पक्ष रखते हुए मेहता ने कहा कि राज्य सरकार यह सुनिश्चित करती है कि किसी भी चिकित्सकीय आपात स्थिति में मथुरा अस्पताल त्वरित कार्रवाई करते हुए कप्पन की जाँच करेगी।  

हालाँकि सिद्दीकी कप्पन को मथुरा जेल से दिल्ली के अस्पतालों में शिफ्ट किए जाने के विरोध में सॉलिसिटर जनरल मेहता के द्वारा दी गई दलीलों को नजर अंदाज करते हुए मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने कहा कि न्यायालय ने कप्पन की वर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यह आदेश दिया है। न्यायालय ने कहा कि जेल में दुर्घटनावश कप्पन चोटिल हुआ है और उसके स्वास्थ्य की रक्षा करना उस राज्य की जिम्मेदारी है जहाँ उसे गिरफ्तार किया गया है।

आपको बात दें कि यूपी के हाथरस में दलित लड़की के साथ हुई रेप और हत्या के मामले में दंगों की साजिश रचने के आरोप में उत्तर प्रदेश पुलिस ने केरल के पत्रकार सिद्दीकी कप्पन पर UAPA के तहत चार्जशीट दायर की थी। यूपी के हाथरस में हुए रेप और हत्या के मामले में यूपी एसटीएफ की एक टीम दंगों की साजिश की जाँच कर रही थी जिसको लेकर टीम ने मथुरा कोर्ट में UAPA के तहत एक चार्टशीट फाइल की थी। 

PFI और उस से जुड़े संगठन के 8 आरोपितों के खिलाफ दाखिल की गई 5000 पन्नों की चार्जशीट में यूपी एसटीएफ ने हाथरस में दंगों की साजिश का खुलासा किया था और इसमें सिद्दीकी कप्पन, अतीकुर्रहमान, मसूद अहमद, रउफ शरीफ, अंसद बदरूद्दीन, फिरोज, दानिश का नाम शामिल था। उत्तर प्रदेश पुलिस की ओर से दायर की गई चार्जशीट में कहा गया था कि गिरफ्तार किए गए सभी आरोपित हाथरस में दंगा भड़काना चाहते थे और उसकी साजिश रच रहे थे। चार्जशीट के अनुसार केरल के पत्रकार सिद्दीकी कप्पन ने ही दंगों की साजिश रची थी और PFI मेंबर रउफ शरीफ इन दंगों की फंडिंग के लिए काम कर रहा था।

‘मेरे साथ जाहिल गाँव वाले की तरह बात मत करो’: गाँधी होते तो त्रिपुरा के DM साहब से क्या कहते?

त्रिपुरा (वेस्ट) के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट शैलेश कुमार यादव ने उसी विवाह समारोह को बंद करवाने के लिए रेड मारा जिसकी अनुमति उन्होंने खुद दी थी। पुलिसकर्मियों के साथ वैवाहिक स्थल पर जाकर धूम मचाने का उनका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। वीडियो में जो सबसे आपत्तिजनक बात नजर आई, वह है उनका व्यवहार। विवाह समारोह के लिए जिम्मेदार घरवालों के साथ जो करते हुए उन्हें देखा गया वह एक सरकारी अधिकारी के लिए उचित नहीं जान पड़ता।

कानून लागू करवाना सरकारी अधिकारी की जिम्मेदारी है। पर उसे कैसे लागू करवाना है, इस बात पर उन्हीं अधिकारियों के विवेक और धैर्य की परीक्षा होती है। वैवाहिक समारोहों में केवल दो घरों के लोग ही नहीं, उनके मेहमान भी होते हैं। ऐसे में इतने लोगों के बीच सबके साथ इस तरह का व्यवहार इन लोगों के मन में सरकारी अधिकारियों के प्रति एक धारणा छोड़ जाता है जो शायद जीवन भर के लिए उनके मन मस्तिष्क में रहे और खुद के साथ अपराधी की तरह किए गए व्यवहार को शायद ही कोई नागरिक भुला सके।

उसके अलावा एक और महत्वपूर्ण बात आए दिन सामने आती है जिसमें एक आम नागरिक यह प्रश्न उठाता है कि ये अधिकारी ऐसा ही व्यवहार ‘समुदाय विशेष’ के लोगों के साथ कर सकता था? यह प्रश्न गलत है या सही, उससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि यह प्रश्न पूछा जा रहा है। हम चाहे ऐसे प्रश्न के आगे अपनी आँखें बंद कर लें पर प्रश्न तो हमारी बंद आँखों के सामने खड़ा रहेगा। इसका उत्तर देने की क्षमता केवल उन सरकारी अफसरों के पास है जो सार्वजनिक स्थलों पर नागरिकों के साथ अलग-अलग व्यवहार करते हैं। सोचने की आवश्यकता है कि यह प्रश्न क्या बिलकुल ही बेमानी है जिसके लिए हमेशा के लिए आँख और कान बंद कर लिए जाएँ ताकि ये प्रश्न न तो सुनने को मिलें और न ही पढ़ने को दिखें।

डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट के व्यवहार की चर्चा और आलोचना, दोनों हो रही है। किसी को इस बात से ऐतराज नहीं कि क़ानून का पालन होना चाहिए पर यदि ऐसे समारोह में ऐसा कुछ हो गया जिससे क़ानून को ठेस पहुँची तो क्या सरकारी अधिकारी क़ानून को ठेस पहुँचाने वालों के साथ वही सब कुछ करेंगे जैसा वे जुआघर या अवैध शराबखाने पर छापे के दौरान करते हैं? जिनके घर वैवाहिक समारोह है वे जुआघर चलाने वाले तो नहीं हैं कि उन्हें थप्पड़ मारे जाएँ या गाली दी जाए। वे ऐसे अपराधी तो नहीं हैं कि उन्हें सबके सामने धमकी दी जाए।

यह बहस अनवरत चल सकती है कि गलती किसकी है। दोनों पक्ष के लोग अपनी-अपनी बातें तर्क, वितर्क या फिर कुतर्क के रूप में रख सकते हैं पर सच यही है कि जिस समारोह के लिए अनुमति पर खुद डीएम साहब ने दस्तख़त किए हों, उसी समारोह में जाकर इस तरह के व्यवहार को उचित ठहराना उनके लिए आसान न होगा। त्रिपुरा उत्तर-पूर्व के राज्यों में से एक है और अफ़सरों के लिए वहाँ रहकर सुचारु रूप से शासन-व्यवस्था चलाना एक चुनौती होती है। अधिकारियों के लिए अपने मन से व्यवस्था चलाने के लिए जगह रहती है। ऐसी सुविधा नहीं होती कि वे स्थानीय लोगों के साथ ऐसा व्यवहार करते हुए दिखें जैसा डीएम साहब ने किया, क्योंकि ऐसा व्यवहार उनके बारे में ही नहीं बल्कि सरकारी तंत्र के बारे में गलत धारणाएँ बनाने में मदद करता है।

हो सकता है सरकारी अधिकारियों के लिए कोई मॉडल कोड ऑफ कांडक्ट हो या न भी हो पर उनके पास विवेक तो होना ही चाहिए। माना कि बहुत सारे अधिकारियों को शौक होता है कि वे अमिताभ बच्चन के जवानी के दिनों वाले पुलिसिया किरदार को रीयल लाइफ में सार्वजनिक तौर पर करते हुए नजर आएँ, पर सार्वजनिक व्यवहार का अलिखित कोड भी बताता है कि ऐसे शौक अपराधियों के लिए रिज़र्व रखें जाएँ और उचित समय पर ही पूरे किए जाएँ। ऐसे शौक पढ़े-लिखे निरीह शहरी पर आजमाने से आम लोगों के लिए अधिकारी वर्ग के प्रति गलत धारणा बनाने में सुभीता रहेगा और वे अधिकारियों के साथ अपनी बनाई उसी धारणा के अनुरूप व्यवहार करेंगे।

डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट माननीय शैलेश कुमार यादव ने मेजबानों में से किसी से कहा कि मेरे साथ जाहिल गाँव वाले की तरह बात मत करो, मैं तुम्हारा डीएम हूँ। गाँव वालों के लिए ऐसी सोच क्यों रखनी? भारतवर्ष का सरकारी तंत्र बात-बात पर जिन महात्मा गाँधी की कसम खाता है, उन्होंने ही कहा था कि भारत की आत्मा गाँवों में बसती है। यदि महात्मा की बात सच है और देश की आत्मा गाँवों में ही बसती है तो गँवई व्यक्ति को जाहिल बुलाकर ऐसी दृष्टि से देखने की सलाह क्या महात्मा देते? डीएम साहब को एक बार खुद से अवश्य पूछना चाहिए कि उनकी इस बात पर महात्मा गाँधी जी होते तो क्या कहते?

महाराष्ट्र सरकार ने कोविड खत्म मानकर 25% संविदा स्वास्थ्य कर्मियों को कर दिया था बर्खास्त, अब कर्मचारियों की भारी किल्लत

महाराष्ट्र सरकार ने इस साल जनवरी में यह सोचते हुए कि कोविड-19 संकट खत्म हो गया है एक दिन की बर्खास्तगी की सूचना के साथ 25 फीसदी संविदा स्वास्थ्य कर्मचारियों को हटा दिया। जैसे ही राज्य में कोविड मामलों में कमी आने लगी, महा विकास अघाड़ी सरकार ने अचानक ही उन स्वास्थ्य कर्मचारियों को जाने को कह दिया जिन्हें पिछले साल अप्रैल महीने के दौरान राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत काम पर रखा गया था।

इस कदम ने उन्हें टीकाकरण अभियान के लिए अयोग्य बना दिया जो फ्रंटलाइन श्रमिकों के लिए शुरू होना था। कोरोना योद्धा कर्मचारी परिषद के अध्यक्ष प्रमोद केट ने कहा, “हम काम करने आए थे क्योंकि मुख्यमंत्री ने लोगों से आगे आने और मदद करने की अपील की थी। उस समय, अस्पतालों में स्थायी कर्मचारी काम पर नहीं आ रहे थे, लेकिन हमने अपने परिवारों की परवाह नहीं की और कोविड रोगियों के साथ काम किया। हमें बदले में क्या मिल रहा हैं बर्खास्तगी से पहले एक दिन का नोटिस। हम सरकार से माँग करते हैं कि वह हमें बहाल करे और स्थाई नौकरी दे।”

इन 10,000 संविदात्मक कर्मचारियों में से, 1,000 मुंबई के विभिन्न अस्पतालों में कार्यरत थे, जबकि 5000 से अधिक पूर्वी विदर्भ में काम पर रखे गए थे।

पूजा डोइफोड़े, जिन्होंने बीएमसी के ई वार्ड में एक बहुउद्देश्यीय कार्यकर्ता के रूप में काम किया, ने कहा, “जब हमने जॉइन किया था, तो हमने अपने परिवारों को जोखिम में डाल दिया था। हम में से कई कोविड -19 संक्रमित हो गए थे। हमने ऐसे समय में काम किया जब कोई भी अपने घरों से बाहर निकलने के लिए तैयार नहीं था। हमने पीपीई किट में घंटों बिताए और कोविड पॉजिटिव शवों को स्थानांतरित किया। जब आवश्यकता पूरी हो गई तो हमें छोड़ने के लिए कहने के बजाय हम एक गरिमापूर्ण व्यवहार के हकदार हैं।”

स्वास्थ्य कर्मचारियों को डॉक्टरों, एनेस्थेसियोलॉजिस्ट, मेडिकल ऑफिसर, हॉस्पिटल मैनेजर, नर्स, एक्स-रे तकनीशियन, ईसीजी तकनीशियन, प्रयोगशाला तकनीशियन, दवा निर्माता, स्टोर कीपर, डेटा एंट्री ऑपरेटर, वार्ड बॉय श्रेणियों में कोविड-19 अस्पतालों और कोविड देखभाल सुविधा केंद्रों पर मरीजों की आमद का प्रबंधन करने के लिए नियुक्त किया गया था।

इन स्वास्थ्य कर्मियों ने अपनी निर्बाध और नि: स्वार्थ सेवा के लिए स्थायी रोजगार की माँग करते हुए राज्य भर में कई विरोध प्रदर्शन किए।

महाराष्ट्र में स्वास्थ्य कर्मचारियों की भारी कमी

हालाँकि, कर्मचारियों की छंटनी का कदम राज्य सरकार के लिए उल्टा पड़ गया क्योंकि कोरोनोवायरस की दूसरी लहर के आने के साथ ही राज्य स्वास्थ्य सेवा कर्मचारियों की कमी से जूझने लगा।

महाराष्ट्र जो नए कोरोनोवायरस मामलों में अचानक तेजी से प्रभावित होने वाले सबसे पहले राज्यों में से एक था, वर्तमान में स्वास्थ्य सेवा कर्मियों की बड़ी कमी का सामना कर रहा है।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री राजेश भूषण ने इस महीने की शुरुआत में अपने असंतोषजनक प्रदर्शन को लेकर महाराष्ट्र सरकार को सावधान किया था। मंत्री ने संविदा कर्मियों की भर्ती में तेजी लाने के लिए महाराष्ट्र राज्य को खत लिखा। उन्होंने पत्र में जानकारी देते हुए कहा, औरंगाबाद, नंदुरबार, यवतमाल, सतारा, पालघर, जलगाँव, जालना जिलों की टीमों द्वारा स्वास्थ्यकर्मी कार्यबल की बड़ी संख्या में कमी की सूचना दी गई है।”

भूषण ने महामारी की दूसरी लहर के प्रति महाराष्ट्र के सुस्त रवैए की भी आलोचना की। केंद्रीय टीम से प्राप्त मूल फीडबैक के बाद, भूषण ने लिखा कि सतारा, सांगली और औरंगाबाद में कंटेनमेंट ऑपरेशन को औसत पाया गया जोकि संतोषजनक नहीं था, सतारा, औरंगाबाद और नांदेड़ में निगरानी और कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग को औसत पाया गया, इसकी मुख्य वजह इस कार्य में लगी सीमित जनशक्ति को पाया गया।

महाराष्ट्र में मंगलवार को कोरोना वायरस के 66,358 नए मामले सामने आए और 895 मौतें हुईं, इससे राज्या में कुल मृतकों की संख्या 66,179 हो गई है।

महाराष्ट्र में हुई RSS कार्यकर्ता की मौत, पत्रकार साक्षी जोशी ने दोष दिया मध्य प्रदेश के CM शिवराज को: पोल खुलने पर डिलीट किया ट्वीट

महाराष्ट्र के नागपुर में हुई एक घटना के लिए पत्रकार साक्षी जोशी सहित कुछ लोगों ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जिम्मेदार ठहराया। पोल खुलने के बाद उन्होंने ट्वीट को चुपके से डिलीट भी कर लिया। ये मामला RSS स्वयंसेवक नारायण भाऊराव दाभाडकर से जुड़ा है, जिन्होंने कोरोना वायरस से संक्रमित होने के बावजूद अस्पताल में अपना बेड एक अन्य मरीज को दे दिया। इसके 3 दिन बाद 85 वर्षीय नारायण का निधन हो गया।

इस घटना को लेकर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने उनकी सराहना की। चौहान ने उस बात को शेयर किया, जो नारायण भाऊराव दाभाडकर ने अपने बेड दूसरे मरीज को देते समय कही थी। उन्होंने कहा था, “मैंने अपनी ज़िंदगी जी ली है। मेरी उम्र अब 85 साल है। इस महिला का पति युवा है। उस पर परिवार की जिम्मेदारी है, इसलिए मेरा बेड उसे दे दिया जाए।”

ऐसा आग्रह कर के वयोवृद्ध RSS कार्यकर्ता अपने घर लौट गए थे। इसके 3 दिन बाद उनका निधन हो गया। उनका ऑक्सीजन लेवल 60 पर पहुँच गया था। इससे पहले बेटी-दामाद उन्हें इंदिरा गाँधी शासकीय अस्पताल ले गए थे, जहाँ बड़ी मुश्किल से बेड मिला था। वहीं इलाज की प्रक्रिया के दौरान एक 40 वर्षीय महिला अपने पति को लेकर आई थी। अस्पताल में बेड खाली न होने पर उसे भर्ती से मना कर दिया गया।

वो महिला फफक-फफक कर रोने लगी, जिसके बाद नागपुर के नारायण भाऊराव दाभाडकर ने आग्रह किया कि उनका बेड इस महिला के पति को दे दिया जाए, वरना उसके बच्चे अनाथ हो जाएँगे। अस्पताल प्रशासन ने उनसे कागज़ पर लिखवाया भी कि वे स्वेच्छा से दूसरे मरीज के लिए अपना बेड दे रहे हैं। स्वीकृति पत्र भर कर वो घर लौट गए थे। सीएम शिवराज ने उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए लिखा, “समाज और राष्ट्र के सच्चे सेवक ही ऐसा त्याग कर सकते हैं, आपके पवित्र सेवा भाव को प्रणाम! आप समाज के लिए प्रेरणास्रोत हैं।”

सोशल मीडिया में जम कर शेयर हो रही है ये खबर (फोटो साभार: दैनिक भास्कर)

पत्रकार साक्षी जोशी ने इसी ट्वीट पर प्रतिक्रिया दी। हाल ही में TMC के चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के शौचालय जाने को लेकर सवाल करने वाली साक्षी ने लिखा, “दिल से सलाम और सम्मान RSS के स्वयंसेवक नारायण जी के लिए, लेकिन आपके लिए नहीं शिवराज जी। वजह तो आप समझ गए होंगे। आप CM हैं। आपके ‘सिस्टम’ के कारण नारायण जी को ऐसा फैसला करना पड़ा।”

साक्षी जोशी ने आगे लिखा, “स्वयंसेवक तो आप भी रहे होंगे लेकिन पद मिल गया तो कर्तव्य भूल गए। नारायण जी को मेरा नमन।” जबकि सच्चाई ये है कि नागपुर, मध्य प्रदेश में नहीं बल्कि महाराष्ट्र में है और वहाँ के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे हैं, जिनसे साक्षी जोशी जैसे पत्रकार सवाल नहीं पूछते। वहाँ भाजपा विरोधी 3 दलों शिवसेना-NCP-कॉन्ग्रेस की ‘महाविकास अघाड़ी’ सरकार चल रही है। लेकिन, दोष पड़ोसी राज्य के CM को ही दिया जाएगा, क्योंकि पत्रकार लिबरल गिरोह की है।