साउथ फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ी एक हैरान करने वाली खबर सामने आई है। कन्नड़ अभिनेत्री शनाया काटवे को अपने भाई की हत्या के आरोप में गुरुवार (22 अप्रैल 2021) को हुबली पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।
पुलिस के मुताबिक, शनाया काटवे (Kannada actress Shanaya Katwe) ने अपने भाई राकेश काटवे (32 साल) की बॉयफ्रेंड नियाज के साथ मिलकर हत्या करने के बाद उसकी लाश के टुकड़े अलग-अलग जगहों पर फेंक दिए थे। इस मामले में पुलिस ने चार अन्य लोगों को भी आरोपी बनाया गया है। इनके नाम हैं नियाज अहमद काटीगार (21 साल), तौसीफ छन्नापुर (21 साल), अल्ताफ मुल्ला (24 साल) और अमन गिरानीवाले (19 साल)।
रिपोर्ट्स के मुताबिक पुलिस ने प्रारंभिक जाँच में पाया है कि राकेश का बेरहमी से कत्ल किया गया है। उन्हें राकेश काटवे का कटा हुआ सिर देवरागुडीहल के जंगल (Devaragudihal forest) से मिला, जबकि शरीर के बाकी टुकड़े हुबली में अलग-अलग जगहों और गदग रोड से बरामद किए गए हैं। शनाया ने हत्या करने के पीछे की वजह उनका लव अफेयर बताया है।
बताया जा रहा है कि शनाया और नियाज एक-दूसरे से प्यार करते हैं, लेकिन उनका भाई इस रिश्ते के खिलाफ था, जिसके चलते नियाज ने राकेश के कत्ल की साजिश रची। 9 अप्रैल को जिस दिन शनाया अपनी फिल्म के प्रमोशन के लिए हुबली गई हुई थीं, उसी दिन इस वारदात को अंजाम दिया गया। नियाज अहमद कटीगार और उसके दोस्तों ने मिलकर राकेश काटवे की बेरहमी से हत्या की और शव के टुकड़े करके उन्हें शहर के अलग-अलग जगहों पर फेंक दिया। फिलहाल, एक्ट्रेस को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है।
बता दें कि शनाया का कन्नड़ इंडस्ट्री में ज्यादा लंबा सफर नहीं है। एक्ट्रेस ने साल 2018 में ही फिल्म Premam Jeevanam से ही इंडस्ट्री में कदम रखा है, जिसके निर्देशक राघवंका प्रभु थे।
कोविड की दूसरी लहर भारत में मौत का कहर लाई है, निःसंदेह। जिस तरह लगातार हमारे देश की प्राथमिकताएँ लंबे समय तक गड्डमड्ड रहीं, उसी के फलस्वरूप स्वास्थ्य-सेवा का लचर होना और उससे होने वाली मौतों का मंजर भी देखने को मिल रहा है। हालाँकि, ‘आपदा में अवसर’ की तरह इस ‘दुष्काल’ का लाभ उठाते हुए अमेरिकी अखबारों से लेकर ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन तक के पत्रकारों ने भारत पर अपनी कलम और की-बोर्ड से हमला बोल दिया।
‘वाशिंगटन पोस्ट’ की खबर हो या ‘गार्डियन’ का संपादकीय, ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ का कवरेज हो या ‘सीएनएन’ की कवरेज, ये सभी और कुछ नहीं, बस ‘व्हाइट मेन्स बर्डन सिंड्रोम’ का ज्वलंत उदाहरण है। उच्चता-बोध से भयंकर रूप से पीड़ित अंग्रेजों की शाब्दिक उलटी है। इन्हें देख-पढ़कर लगता है, जैसे JNU में बैठे किसी SFI के कारकुन ने अपने ‘सोशलिस्ट-कम्युनिस्ट सीजोफ्रेनिया’ में आकर कोई पर्चा लिख मारा है।
यह कोई पहली बार भी नहीं है और न ही आखिरी बार। पोखरण (इंदिरा और अटल दोनों ही के समय) हो या हालिया मंगलयान भेजने तक। सुपर कंप्यूटर की बात हो या क्रायोजेनिक इंजन की, भारत को लूटकर समृद्ध हुए यूरोपीय बर्बर हों या अमेरिकी श्वेत, ये सभी नस्लीय द्वेष, अहंकार और कुत्सा से भरे हुए हैं। जब भारत ने कम बजट में मंगलयान भेजा तो न्यूयॉर्क टाइम्स ने एक बेहद आपत्तिजनक कार्टून उस वक्त प्रकाशित किया था, जिसमें दो लोग एक कमरे में बैठे हैं, उसके ऊपर एलिट स्पेस क्लब की पट्टी लगी है और बाहर एक व्यक्ति धोती-कुर्ता और पगड़ी में गाय के साथ दरवाजा खटखटा रहा है। सिर्फ इस एक कार्टून से इन श्वेत अहंवादियों की बुद्धि का पता चल जाता है।
जरा यह उलटबांसी देखिए, जो गार्डियन ने की है- “पिछले साल मोदी ने भारत की एक अरब आबादी पर अचानक एक विनाशकारी लॉकडाउन थोप दिया था। देश के शीर्ष महामारी विशेषज्ञों की राय के उलट जाकर बिना किसी चेतावनी के लगाया गया यह लॉकडाउन मोदी की नाटकीय भंगिमाओं के सर्वथा अनुकूल था। युवाओं की आबादी ज्यादा होने के चलते कोविड-19 के कारण मरने वाले भारतीयों की संख्या दूसरे देशों के मुकाबले कम ही रहनी थी।”
अब ज़रा, इसको डी-कंस्ट्रक्ट करते हैं। ब्रिटेन उन देशों में एक है, जिसने सबसे लंबा लॉकडाउन लगाया। ब्रिटेन उन देशों में एक है, जहाँ सबसे अधिक लाशें गिरीं, फिर भी गार्डियन का यह आलेख मोदी के लॉकडाउन की निंदा तो करता ही है, भारत में लाशें कम गिरीं, इसका श्रेय वह युवाओं की अधिक जनसंख्या को देता है। हालाँकि इसमें फिर से वह फँस जाता है, जो हम आगे देखेंगे। गार्डियन दरअसल, चित भी मेरी, पट भी मेरी और सिक्का खड़ा रहा, तो मेरे बाप का तो है ही, वाली मसल मान रहा है।
अब आगे, एक और उलटबांसी देखिए, “महज छह हफ्ते पहले जब कुल आबादी के 1 प्रतिशत को भी टीका नहीं लग सका था, मिस्टर मोदी ने देश को दुनिया का दवाखाना घोषित कर दिया था और संकेत दिया था कि महामारी से पहले का सामान्य जीवन बहाल हो सकता है। इसके ठीक बाद लाखों हिंदुओं ने कुम्भ मेले के दौरान गंगा में डुबकी मार दी। वायरस का भयंकर फैलाव तभी शुरू हुआ।”
ऊपर का वाक्यांश उसी आर्टिकल का हिस्सा है। ज़रा इन अंग्रेजों से ये पूछा जाए कि ये आँकड़े किस वैज्ञानिक ने दिए, ये कैसे सिद्ध होगा कि सुपरस्प्रेड कब हुआ, कुंभ जब जनवरी 14 से ही शुरू था, तो मार्च के अंत में किस महान वैज्ञानिक ने बताया कि कुंभ से ही यह फैला है, क्योंकि कुंभ तो हरिद्वार में था। (यह सब तब है, जबकि संक्रमण का फैलाव होते ही कुंभ को समाप्त कर लिया गया)। जहाँ तक टीका की बात है, तो 135 अरब की आबादी वाले देश में 1 फीसदी भी 1 करोड़ से अधिक होता है और इतने लोगों को टीका लग चुका था, छह हफ्ते पहले।
गार्डियन के अहंकारी लेखक का आँकड़ाबोध भी ठीक नहीं है। फिलहाल, लगभग 14.52 करोड़ लोगों को टीका लग चुका है, वह भी जबकि इस देश में एक बड़ा तबका है जो मोदी/भाजपा का टीका लगाने को तैयार नहीं और जब 45 वर्षों से ऊपर की आबादी को ही टीके लगाए जा रहे थे, तो आबादी का लगभग 40 फीसदी हिस्सा टीका के योग्य ही नहीं रह जाता था। हालाँकि, अब भारत में 1 मई से यूनिवर्सल टीकाकरण शुरू हो रहा है।
ज़रा इन अंग्रेजों से यह पूछा जाए कि यही भारत है जिसने आधी दुनिया को वैक्सीन बाँटी, तब ये कहाँ थे। यह और कुछ नहीं, विशिष्टताबोध से ग्रस्त श्वेत नस्लीय अंग्रेजों की बौखलाहट का नतीजा है। नस्लीय दंभ और श्रेष्ठताबोध से विकृत दिमाग वाले इन श्वेतों ने सुपर कंप्यूटर से लेकर क्रायोजेनिक इंजन और दवाइयों तक, भारत को कहाँ नहीं रोकने की कोशिश की है? भारत से इनकी अपेक्षा है कि वह भी पाकिस्तान की तरह भीख का कटोरा लेकर इनके सामने हमेशा हाथ पसारे रहे।
यह नहीं हो रहा है, भारत की विदेश नीति का रुख बदल रहा है औऱ चाचा नेहरू के ‘उस बियाबान में तो घास का एक तिनका नहीं उगता’ वाली नीति को त्यागकर अब लद्दाख में चीनी चूजों को बल भर तोड़ा जा रहा है, तो ‘दर्द तो होना लाजिमी है। भारत में कोरोना की दूसरी लहर कहर बनकर टूटी है, स्वास्थ्य सेवाएँ बेहद दबाव में हैं, मौतें भी हो रही हैं, लेकिन हमें पिछले साल का मंजर भी याद है जब स्पेन और इटली में लाशों के ढेर लगे थे।
तथाकथित फर्स्ट वर्ल्ड की औकात भी हमने देखी थी, जब अमेरिका अपने घुटनों पर आया था, हमसे पाँचवाँ हिस्सा जनसंख्या और बेहद आधुनिक स्वास्थ्य-सेवाओं के बाद यूरोप और अमेरिका का क्या हाल हुआ था, यह हम सबने देखा है, देख रहे हैं। सब याद भी रखा जाएगा।
राजस्थान के जैसलमेर में सामानांतर सत्ता चलाने के लिए जाना जाने वाले गाजी फकीर की मौत हो गई, जिसके बाद उसके जनाजे में भारी भीड़ देखने को मिली। राजस्थान की सरकार ने स्वीकार किया है कि राज्य के अस्पताल ऑक्सीजन की कमी से जूझ रहे हैं, फिर भी कोरोना के दिशानिर्देशों का पालन नहीं कराया जा रहा। गाजी फ़कीर मौलवी भी थे, ऐसे में उसके अनुयायी भी हजारों की संख्या में हैं, जिन्होंने भीड़ जुटाई।
गाज़ी फ़क़ीर के बेटे सालेह मोहम्मद राज्य में अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री हैं, ऐसे में जनाजे में जुटी भीड़ की निंदा करना या इसके खिलाफ कार्रवाई करना तो दूर की बात, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने निधन पर शोक जता कर इतिश्री कर ली। वायरल वीडियो में देखा जा सकता है कि कॉन्ग्रेस नेता रहे गाजी फ़कीर के घर के सामने मुस्लिमों की भारी भीड़ जुटी हुई है और उसके अंतिम क्रिया-कर्म की तैयारी हो रही है।
केबिनेट मंत्री सालेह मोहमद के पिता मुस्लिम धर्मगुरु गाजी फकीर का देर रात हुआ देहांत, अंतिम दर्शन को पैतृक गाँव जैसलमेर में उमड़ी भीड़। pic.twitter.com/94e2kbkz3Z
ये सब तब हो रहा है, जब गाजी फ़कीर के बेटे सालेह मोहम्मद के कोरोना पॉजिटिव आए एक हफ्ता भी नहीं हुआ है। शुक्रवार (अप्रैल 23, 2021) को ही ट्वीट करके पोखरण के MLA ने जानकारी दी थी कि चिकित्सकों की सलाह पर उन्होंने खुद को जयपुर आवास पर आइसोलेट किया हुआ है। उन्होंने अपने संपर्क में आए लोगों से भी जाँच कराने की अपील की थी। सालेह मोहम्मद के पास अल्पसंख्यक विभाग, वक्फ मामलों और जान अभाव अभियोग निराकरण जैसे मंत्रालय हैं।
कोरोना के लक्षण दिखने पर मैंने व मेरे PSO की जाँच कराई, जिसकी रिपोर्ट पॉज़िटिव आयी है। चिकित्सकों की सलाह पर हम स्वयं को जयपुर आवास पर ही आइसोलेट कर लिया है। विगत 2 3 दिनों से आइसोलेट ही थे फिर भी हमारे सम्पर्क में आये हुवे लोगो से अनुरोध है कि आप सभी भी अपनी जांच जरूर करवा लें
‘सरहद का सुल्तान’ कहने जाने वाले गाजी फकीर सिंधी मुस्लिमों के धर्मगुरु थे, ऐसे में उनके जनाजे में कोरोना के नियमों का जम कर उल्लंघन हुआ और जनाजे में जुटी भीड़ के सामने पुलिसकर्मी भी मौन रहे। 85 वर्षीय गाजी फकीर के परिवार में उनकी बीवी, 6 बेटे और 3 बेटियाँ हैं। जैसलमेर विधायक रूपाराम धणदे, जैसलमेर नगरपरिषद के सभापति हरिवल्लभ कल्ला, पूर्व जिला प्रमुख अंजना मेघवाल, पूर्व जिला कॉन्ग्रेस अध्यक्ष गोविंद भार्गव, पूर्व प्रधान मूलाराम चौधरी और युवा नेता विकास व्यास सहित कई कॉन्ग्रेस नेताओं ने पहुँच कर उन्हें श्रद्धांजलि दी।
पाकिस्तान स्थित सिंधी मुस्लिमों के सबसे बड़े आस्था स्थल पीर पगारो के खलीफा के रूप में गाजी फकीर के अनुयायी सीमा के उस पार पाकिस्तान में भी हैं। सरपंच और फिर जिला परिषद रहने वाले गाजी फ़कीर ने अपने परिवार के कई लोगों को राजनीति में आगे बढ़ाया। भाई फतेह मोहम्मद प्रधान और जिला प्रमुख के साथ कॉन्ग्रेस जिलाध्यक्ष रहे। एक बेटे अमरदीन फकीर जैसलमेर समिति के प्रधान रह चुके हैं तथा युवा कॉन्ग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष हैं।
देशद्रोह सहित कई मामलों में आरोपित गाज़ी कई वर्षों से भारतीय एजेंसियों के पकड़ में नहीं आ पाए क्योंकि उनके ख़िलाफ़ सबूत ही नहीं मिले। पुलिस हिस्ट्रीशीट में उनका नाम 1965 से ही आता रहा है लेकिन कॉन्ग्रेस में उनके वर्चस्व के कारण कोई उनका बाल भी बाँका नहीं कर सका। पुलिस अधिकारी पंकज चौधरी ने छानबीन शुरू की तो उन्हें बरख़ास्त कर दिया गया। 90 के दशक में एक एसपी को इसीलिए ट्रांसफर कर दिया गया था।
अरविंद केजरीवाल की अगुवाई वाली दिल्ली की आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार विज्ञापनों में कामकाज का जितना ढोल पीटती है, हकीकत उसके उलट ही है। अदालतों की सुनवाई हो या आरटीआई के जवाब या फिर जमीन के हालात, हर जगह उसके तमाम दावे सवालों के घेरे में आए हैं। पिछले साल भी कोरोना संक्रमण के दौरान आप सरकार बेबस दिखी थी और अब दूसरी लहर के दौरान भी ऐसा ही हो रहा। हम पहले ही बता चुके हैं कि ऑक्सीजन को लेकर इस सरकार ने केवल दावे किए, उस दिशा में काम नहीं हुआ।
अब केजरीवाल सरकार ने एक नया दावा किया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री ने कहा है कि एक माह के भीतर दिल्ली में 44 ऑक्सीजन प्लांट लगेंगे। इनमें 8 केंद्र सरकार के होंगे और बाकी 36 का प्रबंध केजरीवाल सरकार करेगी। इसके लिए 21 प्लांट फ्रांस से आएँगे।
पिछले दिनों यह बात सामने आई थी कि केंद्र सरकार से दिसंबर 2020 में 8 ऑक्सीजन प्लांट लगाने का फण्ड मिलने के बावजूद दिल्ली अब तक केवल 1 ऑक्सीजन प्लांट इनस्टॉल किया जा सका है। अब केजरीवाल के नए ऐलान के बाद हमारा काम क्या है? खुश होना और चुप हो जाना। हमें ये नहीं पूछना है कि जब एक माह में 44 प्लांट लग सकते हैं तो केंद्र सरकार से फंड मिलने के बाद भी दिल्ली में 4 माह में एक ही ऑक्सीजन प्लांट क्यों लग पाया।
हमें केजरीवाल सरकार से ये भी सवाल नहीं करना कि आखिर 150 करोड़ रुपए का विज्ञापन उन्होंने जब ये दिखाने में दर्शा दिया कि दिल्ली कैसे कोरोना से निपटने को तैयार है तो ये अब हालात इतने बदतर क्यों है। ये तो हम बिलकुल नहीं पूछ सकते हैं कि दिल्ली जब महामारी से लड़ने के लिए इतनी तैयार थी तो फिर अस्पतालों के बाहर दम क्यों तोड़ रहे हैं?
दिल्ली के हालात और सीएम केजरीवाल का रवैया
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में कोरोना संक्रमण के कारण कोहराम मचा है। पिछले एक हफ्ते में एक भी दिन ऐसा नहीं बीता, जब 20 हजार से कम संक्रमितों के मामले सामने आए हों। पिछले 24 घंटों में ये आँकड़ा अन्य दिनों के मुकाबला कम जरूर हुआ, लेकिन सुधरा बिलकुल नहीं है। 24 घंटे में यहाँ से 20, 201 नए मामले आए जबकि रविवार को ये आँकड़ा 22, 913 था। उससे पहले संक्रमितों की संख्या 26 हजार भी आ चुकी है।
उक्त आँकड़े स्पष्ट दर्शा रहे हैं कि दिल्ली में संक्रमण की रफ्तार कितनी तेज है, जबकि सोशल मीडिया पर नजर आने वाले पोस्ट बताते हैं कि रफ्तार तेज होने के बाद यहाँ की स्वास्थ्य व्यवस्था कितनी चरमराई हुई है। ऐसे में हमारे मुख्यमंत्री इतने ज्यादा आम हैं कि वह दिल्ली में बेकाबू हालत देख सिर्फ केंद्र या दूसरे राज्यों से मदद की अपील नहीं कर रहे, बल्कि दिल्ली की जनता से भी उम्मीद कर रहे हैं कि कोई हालात सुधरवाने में उनका हाथ पकड़ ले।
सोशल मीडिया पर मदद माँगते अरविंद केजरीवाल
मुख्यमंत्री केजरीवाल का यह साधारण व्यक्ति जैसा रवैया शायद आम दिनों में या चुनावों के बीच आपको प्रभावित करे। लेकिन, इस संकट की घड़ी में उनका यह बचकाना बर्ताव सिर्फ उनकी थू-थू करवाने में लगा है। लोग खुलेआम दिल्लीवासियों का मजाक उड़ा रहे हैं कि जब वोट फ्री-बिजली पानी के लिए दिया तो ऑक्सीजन क्यों माँग रहे हो?
हमारे लिए ये सवाल सही भी है। आखिर हमारी प्राथमिकताओं में कब अच्छी स्वास्थ्य सुविधा थी! हमें कहा गया मोहल्ला क्लिनिक खुलेंगे। हमने मान लिया। हमने ये नहीं सोचा कि पहले से मौजूद डिस्पेंसरी आदि को संसाधन लैस क्यों नहीं किया जा रहा। केंद्र सरकार आयुष्मान भारत योजना लाई। केजरीवाल सरकार ने उसे भी दिल्ली में लाने से मना कर दिया। हमने कभी नहीं पूछा कि ऐसा क्यों हुआ?
हमारी वरीयता जो रही केजरीवाल सरकार ने वही तो दिया! आज भी वही हो रहा है। हमें अपने सीएम से आश्वासन चाहिए, जवाब नहीं। वो वहीं दे रहे हैं। इंतजार करिए, 44 प्लांट कब लगेंगे। कब दिल्ली को साँस आएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने आज (अप्रैल 27, 2021) वेदांता को तमिलनाडु के तूतीकोरिन में लगे ऑक्सीजन प्लांट को शुरू करने की मंजूरी दे दी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऑक्सीजन की ‘राष्ट्रीय आवश्यकता’ के मद्देनजर यह आदेश पारित किया गया है। जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति एल नागेश्वर तथा न्यायमूर्ति एस रविन्द्र भट की पीठ ने कहा कि इस आदेश की आड़ में वेदांता को तांबा गलाने वाले प्लांट में जाने और उसे चलाने की अनुमति नहीं दी गई है।
Vedanta submits before the Supreme Court that it will supply oxygen free of cost to people in need.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वेदांता के ऑक्सीजन प्रोडक्शन को लेकर राजनीति नहीं होनी चाहिए क्योंकि इस समय देश संकट का सामना कर रहा है। कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को ऑक्सीजन प्लांट में गतिविधियों पर नजर रखने के लिए जिला कलेक्टर और तूतीकोरिन के पुलिस अधीक्षक को शामिल कर एक समिति गठित करने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने 23 अप्रैल को कहा था कि ऑक्सीजन की कमी की वजह से लोग मर रहे हैं। उसने तमिलनाडु सरकार से पूछा था कि वह ऑक्सीजन उत्पादन के लिए तूतीकोरिन में वेदांता के स्टरलाइट कॉपर यूनिट को अपने कंट्रोल में क्यों नहीं ले लेती, जो प्रदूषण चिंताओं को लेकर मई 2018 से बंद है।
वेदांता ने कहा है कि वह राष्ट्र के लिए इस प्लांट में उत्पादित ऑक्सीजन मुफ्त में सप्लाई करेगी। वेदांता के लिए कोर्ट में दलील दे रहे वरिष्ठ वकील हरीष साल्वे ने कहा, “हम यहाँ सिर्फ ऑक्सीजन प्लांट संचालित करेंगे न कि पावर प्लांट। बिजली राज्य सरकार देगी।”
Appearing for Vedanta, senior lawyer Harish Salve tells SC, “We’ll run only oxygen plant & not power plant. Electricity will be provided by the state.”
Justice DY Chandrachud asks, “When can you start the plant?”
“We can start producing oxygen in maybe 10 days,” Salve replies.
इस पर जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने साल्वे से पूछा, “आप प्लांट कब शुरू कर सकते हैं?” साल्वे ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि संभवतः 10 दिन के अंदर ऑक्सीजन उत्पादन शुरू हो जाएगा। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस डीवाई चंद्रचूड, एलएन राव और एसआर भट्ट की बेंच ने तमिलनाडु सरकार को फटकार लगाते हुए कहा- वेंदाता द्वारा ऑक्सिजन के उत्पादन पर राजनीति नहीं की जानी चाहिए। यह राष्ट्रीय आपदा का वक्त है। देश की सबसे बड़ी अदालत होने की नाते हम जिंदगियों को बचाने की हर कोशिश करेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने वेंदाता की ऑक्सिजन उत्पादन ईकाई को 15 जुलाई तक ऑपरेशन की इजाजत दे दी है। कोर्ट ने कहा कि अगर जरूरत पड़ी तो वह इस पर दोबारा आदेश देंगे।
Supreme Court starts hearing suo motu case of oxygen shortage & other issues related to management of #COVID19 pandemic.
“We have to step in when we feel so & we need to protect the lives of people,” Justice DY Chandrachud says. pic.twitter.com/9l7mt9lQx4
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (अप्रैल 27, 2021) को स्पष्ट किया कि COVID मुद्दों पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की गई स्वत: संज्ञान कार्यवाही का उद्देश्य उच्च न्यायालयों को हटाना या उच्च न्यायालयों से सुनवाई को अपने पास लेना नहीं है। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ के नेतृत्व वाली पीठ ने स्पष्ट किया, “इस कार्यवाही का उद्देश्य उच्च न्यायालयों को हटाना या उच्च न्यायालयों से उन मामलों को लेना नहीं है, जो वो कर रहे हैं। उच्च न्यायालय एक बेहतर स्थिति में हैं कि वे यह देख सकें कि उनकी क्षेत्रीय सीमाओं के भीतर क्या चल रहा है।”
राजस्थान ने दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा टैंकर रोकने की टिप्पणी का जिक्र किया तो सर्वोच्च अदालत ने इस मसले में दखल देने से इनकार किया। सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि हाईकोर्ट के पास ही जाएँ, हम इस मामले में दखल नहीं देंगे।
बता दें कि देश में कोरोना के तेजी से बढ़ते मामलों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने ऑक्सीजन संकट पर स्वत: संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार से प्लान माँगा था। इसके साथ ही कल दिल्ली हाई कोर्ट ने केजरीवाल सरकार को कड़ी फटकार लगाई थी।
दिल्ली सरकार से दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा, हमें कहीं डिस-कनेक्शन नजर आता है। आप आदेश जारी करते हैं। लेकिन जमीन पर उन पर काम होता हुआ नजर नहीं आ रहा है। सीनियर एडवोकेट तुषार राव ने अदालत के सामने सुझाव रखा कि यहाँ तमाम छोटे छोटे अस्पताल हैं और ऑक्सीजन की सप्लाई को बरकरार रखा जाए। इन अस्पतालों में भी तो समस्या को कुछ कम किया जा सकता है। दिल्ली हाई कोर्ट ने अस्पतालों में ऑक्सीजन सिलेंडर की कमी से टूटे कहर पर रोष जताया और कहा कि हम सभी जानते हैं कि देश भगवान भरोसे चल रहा है।
देश में कोरोना के बढ़ते मामलों को लेकर शासन से लेकर प्रशासन तक सभी चिंतित हैं। इसी बीच कोविड नियमों की धज्जियाँ उड़ाने वालों को जब एक साथ नमाज पढ़ने से रोका गया तो उन्होंने मारपीट की घटना को अंजाम दिया। अमर उजाला में प्रकाशित खबर के मुताबिक, यह घटना शनिवार (24 अप्रैल 2021) हिमाचल प्रदेश के पांवटा साहिब के अंतर्गत देवीनगर की एक मस्जिद की है।
अब्दुल अलीम निवासी वॉर्ड नंबर 9 ने पुलिस थाने में इसकी शिकायत दर्ज कराई है। शिकायतकर्ता अब्दुल ने कहा कि वह पिछले करीब पाँच साल से मदीना मस्जिद की देखरेख कर रहे हैं। आजकल रमजान का महीना चल रहा है। ऐसे में वह हर रोज मस्जिद की देखरेख के लिए जाते हैं।
शनिवार रात करीब 8 बजे वह मस्जिद में नमाज अदा करने गए थे। लेकिन वहाँ पहले से ही मोहल्ले के 20 से 30 लोग नमाज पढ़ने के लिए आए हुए थे। अब्दुल ने कोरोना को लेकर जारी दिशा-निर्देशों के तहत पाँच से अधिक लोगों को एक साथ नमाज पढ़ाने से इनकार कर दिया।
इसको लेकर अब्दुल और मस्जिद में आए लोगों में बहस शुरू हो गई। वहाँ मौजूद कुछ लोगों ने उन्हें डंडों से पीटकर जमीन पर गिरा दिया। इस दौरान जब उनका बेटा अब्दुल हबीज उन्हें बचाने आया, तो उन लोगों ने उसे भी डंडों से मारकर घायल कर दिया। अब्दुल और उनके बेटे का अस्पताल में इलाज चल रहा है। वहीं डीएसपी बीर बहादुर ने बताया कि पुलिस मामला दर्ज जाँच में जुट गई है।
बता दें कि कोरोना की बेकाबू रफ्तार पर काबू पाने के लिए केंद्र सरकार ने तमाम धार्मिक जगहों पर लोगों को भीड़ जुटाने के लिए मना किया हुआ है। लेकिन कोविड-19 महामारी को लेकर जारी दिशा-निर्देशों का सही ढंग से पालन नहीं होने के कारण देश भर में कोरोना के मामले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। हिमाचल प्रदेश में 26 अप्रैल को बीते 24 घंटों में कोरोना के 1,692 नए मामले सामने आए। 916 लोग डिस्चार्ज हुए और 27 लोगों की मृत्यु दर्ज की गई थी।
कॉन्ग्रेस पार्टी इस देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी है और इसकी वर्तमान अध्यक्ष सोनिया गाँधी हैं। वे खुद 5 बार सांसद रही हैं और 10 साल पर्दे के पीछे से भारत सरकार चलाने का अनुभव भी है। उनकी सास और पति प्रधानमंत्री रहे हैं। ससुर भी नेता थे, जिनका आज परिवार में कोई नाम लेने वाला भी नहीं है। सास के पिता भी कॉन्ग्रेस अध्यक्ष और प्रधानमंत्री थे।
उनके बेटे राहुल गाँधी भी कॉन्ग्रेस अध्यक्ष रहे हैं। लगातार 4 बार से सांसद हैं। अब सोनिया की बेटी प्रियंका गाँधी भी राजनीति में आ चुकी हैं। पार्टी में उन्हें महासचिव का पद मिला है, लेकिन उनका जनप्रतिनिधि बनना अभी बाकी है। आज मैं राजनीति की समझ रखने वाली इस देश की एक जिम्मेदार नागरिक होने के नाते ये जानना चाहती हूँ कि गाँधी परिवार ने कोरोना के खिलाफ लड़ाई में आर्थिक रूप से क्या योगदान दिया है, खासकर अपनी व्यक्तिगत संपत्ति में से?
चूँकि देश-विदेश में गाँधी परिवार की संपत्ति होने की बात सामने आती रहती है, इसलिए माना जा सकता है कि उनके पास कम से कम इतना धन तो है ही कि उसमें से कुछ रुपए अस्पताल बनाने या ऑक्सीजन प्लांट स्थापित करने के लिए दान में दिए जा सकें। गाँधी परिवार समाजवाद में विश्वास रखता है और लाभ कमाने को बुरा मानता है, ये स्वाभाविक है कि वे अपने शब्दों को धरातल पर उतारेंगे। इसलिए, मैंने इसी सवाल को ट्विटर पर डाला।
सवाल बस इतना था कि क्या गाँधी परिवार ने अस्थायी क्वारंटाइन सेंटर्स, अस्पताल, ऑक्सीजन प्लांट्स बनवाने या प्रवासी मजदूरों के लिए भोजन की व्यवस्था करने में कोई योगदान दिया है? मेरा सवाल सपाट तो था, लेकिन विनम्र भी। बदले में मुझ जवाब क्या मिला, वह देखिए। इस ट्वीट की प्रतिक्रिया में गाय को लेकर मजाक किए गए और ‘गोबर’ जैसे शब्द का इस्तेमाल किया गया। भारत में गाय को पवित्र माना जाता है, इसलिए इस्लामी आतंकी और कट्टरवादी अक्सर गाय को निशाना बनाते हैं।
Thanks, Congress workers for giving me details about their contribution. Most obliged. pic.twitter.com/zrqsf5k7ZM
भारतीयों और खासकर हिन्दुओं को लेकर ‘गोमूत्र’ वाले चुटकुले शेयर किए जाते हैं। यही तंज कॉन्ग्रेस समर्थकों ने मुझ पर भी कसा, क्योंकि मैंने गाँधी परिवार से सवाल पूछने की हिमाकत की थी। गाली तक दी गई। इसमें 11,000 फॉलोवर्स वाली एक अंजलि शर्मा भी शामिल थीं, जिन्हें अलका लांबा और पवन खेरा जैसे कॉन्ग्रेस नेता फॉलो करते हैं। अब कॉन्ग्रेस नेता से सिर्फ समर्थक बन चुके संजय झा भी। अंजलि ने मुझे गाली दी, रिप्लाई में कॉन्ग्रेस समर्थकों ने हँसने वाली इमोजी डाली।
अलका लांबा द्वारा ट्विटर पर फॉलो किए जा रहे एक ध्रुवदेब चौधरी ने मुझे याद दिलाया कि ये 2014 नहीं, बाकि 2021 है जिसमें नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं। तो क्या सिर्फ इसी वजह से भारत के सबसे अमीर परिवारों में से एक पर निशाना नहीं साधा जाना चाहिए? वही परिवार, जो सेना के वॉरशिप का उपयोग अपनी पारिवारिक छुट्टियों और मौज-मस्ती के लिए करता था। उनसे सवाल पूछना ही समर्थकों के लिए गाली है।
गाय को लेकर जोक मारने में कुशल हैं कॉन्ग्रेस के लोग
जहाँ तक मौत की दुआ है, वो तो आजकल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के लिए भी मनाई जाती है। खासकर इस्लामी कट्टरवादियों द्वारा और कॉन्ग्रेस के वफादार पत्रकारों द्वारा भी। फिर मैं तो बस एक आम नागरिक हूँ। फिर राणा देब राजवंशी ने मेरे कोविड-19 पॉजिटिव होने, ऑक्सीजन व दवाओं के लिए तड़पने की दुआ की, तो मुझे कुछ नया नहीं लगा। उनका कहना था कि ऐसा होगा तभी मुझे ‘एहसास होगा’ कि ज़मीन पर कौन लोग काम कर रहे हैं।
मृगांका सिंह ने भी यही कामना की, लेकिन मेरे साथ-साथ मेरे परिवार के लिए भी। चलिए, फिर मैंने इसे ही कोरोना के इस काल में सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी का योगदान मान लिया। मेरे ट्वीट की प्रतिक्रिया में पीएम मोदी पर आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए जोक मारे गए। राहुल गाँधी महिला सम्मान की बातें भले करते हैं, लेकिन उनसे सवाल पूछते ही आपका महिला होना का सर्टिफिकेट रद्द कर दिया जाता है और आप अब सिर्फ ‘भक्त’ रह जाते हो।
कॉन्ग्रेस समर्थकों का ‘महिला सम्मान’
और आपको तो पता ही है, लिबरल का मानना ही है कि ‘भक्त’ तो भला होते ही हैं मरने के लिए। गाँधी परिवार MPLAD से भी योगदान दे सकता है। लेकिन देश के पुराने अमीर और रईस खानदान के लोगों से उनके व्यक्तिगत संपत्ति में से त्रासदी के इस समय में देश के लिए योगदान को लेकर सवाल करना क्या गुनाह है? इसी गाँधी परिवार ने ही न पिछले कुछ दिनों में ये नैरेटिव बनाया है कि भारत में अमीर होना ही एक गुनाह है।
राहुल गाँधी और उनके समर्थक हमेशा भारत के उद्योगपतियों को गाली देते रहते हैं। वही उद्योगपति, जो लाखों रोजगार पैदा करते हैं। पहले अम्बानी-अडानी, अब वैक्सीन निर्माताओं को गाली दी जा रही है। इसी से कॉन्ग्रेस समर्थकों के मन में ये बात बैठ गई है कि अमीर होने या लाभ कमाने का एक ही मतलब है – भ्रष्टाचार। लेकिन, जब बात गाँधी परिवार की आती है तो ये समाजवाद कहाँ हवा हो जाता है? या ये सब सिर्फ कहने-सुनने की कोरी बातें हैं, थ्योरी है, प्रैक्टिकल नहीं?
देशभर में कोरोना वायरस के कहर के बीच रविवार (25 अप्रैल 2021) को NDTV ने कोरोना वायरस की दूसरी लहर के बारे में चर्चा करने के लिए महामारी विशेषज्ञ एरिक फीगल-डिंग को टीवी पर आमंत्रित किया।
पत्रकार विष्णु सोम को दिए इंटरव्यू में एरिक फीगल-डिंग ने दावा किया, “भारत में डेटा बहुत खराब है। मौतों की संख्या ठीक से नहीं बताई जा रही है। भारत में आगामी 1 अगस्त तक लाखों लोगों की मौत हो सकती है।” उन्होंने यह पूर्वानुमान व्यक्त किया कि देश में मरने वालों की संख्या 1 मिलियन नहीं भी हो सकती है, लेकिन अगस्त तक 5 मिलियन भी पार कर सकती है। उन्होंने भारत सरकार से लोगों को मुफ्त सहायता देने और देश में कर्फ्यू लागू करने को कहा। पेशे से एक “महामारी विज्ञानी” एरिक फीगल-डिंग ने भी राजनीतिक रैलियों पर प्रतिबंध लगाने का आह्वान किया है।
NDTV के ट्वीट का स्क्रीनशॉट
विशेषज्ञ ने यह भी दावा किया कि मौतों के जो आँकड़े सरकार के द्वारा जारी किए जा रहे हैं, हकीकत में श्मशान में 20 से 50 गुना ज़्यादा मौतें होती हैं। हालाँकि, उन्हें इस बात की जानकारी नहीं है कि कोविड -19 दुनिया में मौत का एकमात्र कारण नहीं है और लोग अन्य बीमारियों से भी मर सकते हैं।
आगे के संदर्भ के लिए बता दें कि भारत में हर दिन लगभग 27,000 लोग सभी कारणों से मरते हैं। वर्तमान और अगस्त के बीच तीन महीने हैं, जो लगभग 90 दिनों का है। यानी भारत में सभी कारणों से अब और अगस्त के बीच औसतन 2,430,000 लोगों की मृत्यु होगी। जबकि, विशेषज्ञ के अनुसार, अगस्त तक अकेले कोविड -19 की मौत 5 मिलियन को पार कर सकती है।
इससे पहले 16 अप्रैल को इंडिया टुडे को दिए इंटरव्यू में महामारी विशेषज्ञ ने दावा किया कि भारत में कुल मामलों की संख्या वास्तव में दर्ज किए जा रहे आँकड़ों की 5-10 गुना अधिक हो सकती है।
एरिक फीगल-डिंग कौन हैं?
हार्वर्ड टीसी चैन स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के अनुसार, एरिक फीगल-डिंग एक जन स्वास्थ्य महामारी विज्ञानी, आहार विशेषज्ञ और हेल्थ इकोनॉमिस्ट हैं। हालाँकि, सामान्य तौर पर ये जैसे दिखते हैं उससे कहीं अधिक हैं। वह कोरोना वायरस के स्टार एक्सपर्ट के रूप में उभरे हैं। जितनी प्रसिद्धि इनकी हुई है उतनी न तो किसी स्वास्थ्य शोधकर्ता / महामारी विज्ञानी या वैज्ञानिक की भी नहीं हुई। उन्हें कोरोना वायरस पर एक रिसर्च पेपर पढ़ने का मौका मिला था, जिसमें उन्होंने पिछले साल 2020 में जनवरी में एक महामारी के प्रकोप होने की भविष्यवाणी की थी। विशेषज्ञ डिंग एक संक्रामक रोग विशेषज्ञ भी नहीं हैं, वह एक पुरानी बीमारी महामारी विशेषज्ञ हैं।
एक ट्वीट में (जो अब डिलीट हो गया है) उन्होंने लिखा, “HOLY MOTHER OF GOD- नया कोरोनोवायरस 3.8 है !!! कितना बुरा है कि इसका प्रजनन RO मूल्य? यह थर्मोन्यूक्लियर महामारी का खराब स्तर है – मेरे पूरे करियर में ट्विटर के बाहर कभी भी ऐसा नहीं देखा। मैं अति नहीं कर रहा हूँ। इसके बाद डिंग का ट्वीट वायरल हो गया और फॉलोवर्स की संख्या 2000 से 1,60,000 तक पहुँच गई। इसके बाद एरिक फीगल-डिंग को सीएनएन समेत दूसरे लिबरल टीवी चैनल्स कोरोना महामारी के बारे में बात करने के लिए बुलाने लगे।
उनकी प्रसिद्धि बढ़ने के बाद कई महामारीविदों ने उनकी साख पर सवाल उठाए हैं। नाम न छापने की शर्त पर, एक महामारीविज्ञानी ने उच्च शिक्षा के क्रॉनिकल को बताया कि एरिक फीगल-डिंग की संक्रामक बीमारियों पर रिसर्च की पृष्ठभूमि शून्य है। उन्होंने डिंग को ‘अर्ध-सत्य अर्थात झूठ का पुलिंदा’ करार दिया। एक अन्य महामारी विज्ञानी ने खेद व्यक्त किया, “हर कोई उनसे बहुत निराश और दुखी है। हमने उसे बदनाम करने के लिए ऐसा नहीं किया है।” हार्वर्ड के महामारी विज्ञान के प्रोफेसर मार्क लिप्स्टिक (Marc Lipstisch) ने भी डिंग को अयोग्य होने के बाद भी चीप पब्लिसिटी का भूखा बताया है।
पिछले साल 19 मार्च को मार्क लिप्स्टिक ने ट्वीट किया था कि उनके जैसे महामारी विज्ञानी खुद की प्रसिद्धि के लिए मजबूत संबंधों का दोहन करने वाले चार्लटन को पसंद नहीं करते हैं। अब हटाए गए ट्वीट में उन्होंने कहा था कि डिंग का कोरोना वायरस का विश्लेषण 80% पारंपरिक ज्ञान पर आधारित था, 20 फीसदी दिखावे का विज्ञान है, जिससे 100 प्रतिशत का जन्म होता है। मार्क लिप्स्टिक ने आगे कहा, “ऊपर दिए गए प्रतिशत में जो वो कहते हैं वो गलत नहीं है। लेकिन अक्सर कुछ गलत हो जाता है कि आपको जानकारी के दूसरे हिस्सों को ढूँढना चाहिए।”
ट्वीट का स्क्रीनशॉट
एरिक फेगल-डिंग न्यूट्रिशनिस्ट से बने कोरोनो वायरस विशेषज्ञ
मार्क लिप्स्टिक ने आगे जोर दिया, “दर्जनों ऐसे अच्छे कोरोना एक्सपर्ट हैं, जिन्हें सुना जा सकता है। एरिक एक आहार विशेषज्ञ हैं। एरिक के पास महामारी विज्ञान में प्रशिक्षण है, लेकिन यह एक बड़ा क्षेत्र है। ” दिलचस्प बात यह है कि उच्च शिक्षा के क्रॉनिकल ने यह भी पाया कि एरिक फीगल-डिंग के अकादमिक लेखों में से सभी व्यायाम और आहार के स्वास्थ्य के प्रभावों पर केंद्रित है। उनका एक लिस्टेड रिसर्च पेपर पहनने योग्य उपकरणों के बारे में था, जो शारीरिक गतिविधि को ट्रैक करने में मदद कर सकता था। उनके विद्वतापूर्ण लेख बचपन का मोटापा, रेड मीट के सेवन और कैंसर के खतरे आदि के प्रभावों पर भी आधारित थे।
उनकी शैक्षणिक रुचि आहार पर फोकस थी, जिसके लिए उन्हें हार्वर्ड विश्वविद्यालय के पोषण विभाग में “अवैतनिक विजिटिंग साइंटिस्ट” के रूप में नियुक्त किया गया था। दिलचस्प बात यह है कि ऐसी नियुक्तियाँ लगभग एक साल तक चलती हैं। ऐसे में उन्हें कई बार विशेष ज्ञान से लैस व्यक्ति के रूप में खुद को बढ़ावा देने के लिए चेतावनी दी गई थी। हालाँकि, महामारी एरिक फीगल डिंग के लिए आपदा में प्रसिद्धि के अवसर के रूप में साबित हुई।
चेतावनी के बाद भी खुद को प्रमोट करना रखा जारी
चीजों को बदतर बनाने के लिए केवल एरिक फीगल-डिंग इकलौते नहीं हैं, जिन्होंने इंटरनेट पर सक्रिय लोगों को चेतावनी दी थी। पिछले दिनों एनपीआर से बात करते हुए, एपिडेमियोलॉजिस्ट डब्ल्यू इयान लिपकिन ने चेतावनी देते हुए कहा था, “इसका प्रकोप बहुत बड़ा होता जा रहा है। अगर हम इस वायरस से निपटना चाहते हैं तो हमें बहुत तेज़ी से आगे बढ़ना होगा।”
लेकिन, डिंग को केवल इसीलिए मान्यता मिली है, क्योंकि उन्होंने हाल ही में रिसर्च पेपर के कुछ अंश को लिखा था। अपने ट्वीट में डिंग ने झूठा दावा किया था कि SARS-Covid-1 का R0 (जो 2003 में महामारी का कारण बना) 0.49 के आसपास के वास्तविक आँकड़े की तुलना में 0.49 फीसदी था। इस झूठे दावे के लिए उन्हें अपने फॉलोवर्स को ये स्पष्टीकरण देना पड़ा था कि वो संक्रामक रोग विशेषज्ञ या महामारी विशेषज्ञ नहीं थे।
जिस ट्वीट के बाद एरिक फीगल-डिंग लाइम लाइट में आए थे उन्हें सोशल मीडिया पर आलोचना के बाद मजबूरन डिलीट करना पड़ा। लोगों ने उन की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा किया था। एचआईवी और कोरोनावायरस के बीच आनुवंशिक समानता का सुझाव देने के मामले में भी उन्हें अपने ट्वीट्स को डिलीट करना पड़ा था। उन्होंने एक बार वायरस के पुनः सक्रिय होने और पुन: संक्रमण की समानता को भी समाप्त कर दिया था। डिंग ने सुझाव दिया था कि एन -95 मास्क स्वास्थ्य कर्मियों को फ्लू से रोक नहीं सकते हैं और वुहान कोरोन वायरस के खिलाफ भी यह असरदार नहीं है। हालाँकि, कुछ हफ्ते बाद वह ट्विटर अभियान #मास्क4all में सबसे आगे थे।
एरिक फीगल-डिंग और ‘डैमेज कंट्रोल’ तंत्र
हार्वर्ड के महामारी विज्ञानी ने अपने दोहरे भाषणों पर कई बार फँसने के बाद उसे वाइटवॉश करने की कोशिश की है। डिंग ने कहा था, “हम सभी ने एक डिटेल या वाई एक्सिस या एक्स एक्सिस को गलत पढ़ा है। मुझे लगता है कि मैं जो कुछ भी पढ़ रहा हूँ उसके वाक्यों को जोड़कर जनता के लिए उसका अच्छा अनुवाद करने में मैं सक्षम हूँ।” एरिक फ़ीगल-डिंग ने मार्क लिप्स्टिक द्वारा की गई टिप्पणियों पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने अपना बचाव करते हुए कहा था, “यह दावा बहुत ही आश्चर्यजनक है कि 20 प्रतिशत दिखावे का विज्ञान है। मैं एक महामारी के बीच में इस तरह की नीचता को बढ़ावा नहीं देना चाहता।”
संक्रामक रोगों के विशेषज्ञ नहीं हैं डिंग
स्क्रीन शॉट
एरिक फीगल-डिंग ने भी कहा है कि वह संक्रामक रोगों के विशेषज्ञ नहीं थे और उन्होंने कभी भी खुद को गलत नहीं बताया। उन्होंने कहा कि उनका ज्ञान ‘सामान्य महामारी विज्ञानी’ के रूप में उनकी डिग्री पर आधारित है। उन्होंने अपने ट्विटर थिएट्रिक्स के बारे में बात करते हुए कहा, “मेरे बहुत से फॉलोवर्स ऐसे हैं कि जब तक आप उन्हें स्पून फीडिंग नहीं कराओ नहीं पढ़ पाते।” संक्रामक रोगों में कोई पृष्ठभूमि नहीं होने के बावजूद, एरिक फीगल-डिंग को शीर्ष 100 हेल्थकेयर पेशेवरों की कोविड सूची में दूसरे स्थान पर रखा गया है।
उन्हें फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स के अध्यक्ष अली नूरी का भी काफी समर्थन मिला। नूरी ने जोर देकर कहा, “मुझे लगता है कि उनकी कुछ आलोचना उनके अपने स्टाइल की वजह से हो रही है न कि जो वो कह रहे हैं उसके कारण। यह आमतौर पर वैज्ञानिक नहीं करते हैं, लेकिन एरिक यह काम कर रहा है।” यहाँ तक कि न्यूजर्सी के डेमोक्रेटिक गवर्नर फिल मर्फी ने न्यू जर्सी में हालात से निपटने के लिए डिंग की मदद लेने की कसम खाई थी।
NDTV, हार्वर्ड, और कोरोनावायरस में एक गैर-विशेषज्ञ
डिंग का अधिक मुँहफट होना, विशेषज्ञता की कमी, हार्वर्ड विश्वविद्यालय के साथ उनका जुड़ाव और भारत में अगस्त तक 5 मिलियन कोविड-19 की मौत जैसे बड़े-बड़े दावों को करने की क्षमता ने उन्हें NDTV का आदर्श अतिथि बनाया। ऐसे भारतीय जिन्हें अपनी समस्याओं को समझने और उसके हल और देश को बदनाम करने के लिए विदेशियों के दिमाग की जरूरत होती है, एरिक उनके लिए सबसे बेहतर है।
भारत में जब कोरोना वायरस के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। ऐसे में एनडीटीवी को कोरोना में गैर विशेषज्ञता वाले व्यक्ति की जरूरत थी। अपनी राजनीतिक टिप्पणियों से एरिक ने देश में मोदी विरोधी लॉबी को चीनी कोरोना वायरस को लेकर भय और डर फैलाने की खुराक दे दी है।
इमरान खान के ‘नया पाकिस्तान’ में हिंदू लड़कियों की स्थिति बदतर होती जा रही है। धर्म परिवर्तन के लिए बदनाम सिंध प्रांत हिंदू लड़कियों की कब्रगाह बन चुका है। यहाँ लड़कियों को अगवा कर उनका धर्म परिवर्तन कर निकाह करवाया जाता है। हाल ही में रीना मेघवार नाम की लड़की को अगवा कर जबरन धर्म परिवर्तन और निकाह का मुद्दा पाक संसद में गूँजा था। अब इस लड़की का एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी के साथ वायरल हो रहा है। वायरल वीडियो में लड़की मदद की गुहार लगाती हुई दिख रही है।
वीडियो पाकिस्तान के सिंध प्रांत का बताया जा रहा है। वीडियो में रीना मेघवार दीवार से झाँकती हुई नजर आ रही है। वो रो-रोकर लोगों से मदद गुहार की लगा रही है। लड़की का कहना है कि उसे अच्छा नहीं लग रहा है और वह वापस अपने घर लौटना चाहती है। वीडियो में अन्य कई औरतों की आवाज भी सुनाई दे रही है। मगर 36 सेकेंड के इस वीडियो में लड़की की मदद करने के लिए कोई आगे नहीं आता है।
रीना मेघवार का अपहरण 13 फरवरी को किया गया था और फिर दादू में एक अधेड़ से उसकी शादी करा दी गई थी। रीना मेघवार के चाचा के अनुसार उन्होंने कई अधिकारियों से इस मामले में शिकायत की है, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ है। 13 फरवरी को रीना मेघवार को केरियोगर, बादिन से अपहरण कर इस्लाम कबूल करवाया गया था। फिर अधेड़ उम्र के शख्स से निकाह करा दी गई थी। परिजनों ने एफआईआर भी दर्ज कराई थी, लेकिन पुलिस लड़की को खोजने में नाकाम रही।
On 13 February, Hindu girl Reena Meghwar was abducted from Keriogjar, Badin, converted to Islam, and then married to man. The family had lodged FIR — the police failed to recover girl, yet. pic.twitter.com/JY9r4pMDOc
अल्पसंख्यकों पर अत्याचार के लिए बदनाम सिंध में यह पहली घटना नहीं है। सिंध प्रांत में बड़े स्तर पर हिंदुओं का धर्म परिवर्तन कराकर उन्हें मुस्लिम बनाए जाने का मामला सामने आया है। पिछले दिनों सिंध के घोटकी से दो हिंदू लड़कियों रीना और रवीना का अपहरण कर उन्हें जबरन इस्लाम कबूल करवाया गया। इनका भी जबरन निकाह उम्र से बड़े मुस्लिमों से करा दी गई। इस मामले में इस्लामाबाद हाई कोर्ट में दोनों बहनों को अपने मुस्लिम पतियों सफ़दर अली और बरक़त अली के साथ रहने का आदेश दिया था।
इस साल जनवरी में भी एक वीभत्स घटना सामने आई थी, जब पाकिस्तान के पंजाब के बहु भाटी गाँव में एक मुस्लिम व्यक्ति ने जबरन रतन लाल की बेटी मिजा कुमारी का अपहरण कर उसके साथ बलात्कार किया और निक़ाह करने के लिए बलपूर्वक उसका इस्लाम में धर्मांतरण कर दिया गया। माता-पिता ने बताया था, “यदि हमारी बेटी हमें वापस नहीं मिलती है तो हम आत्महत्या कर लेंगे। हम गरीब हैं, हम दोषियों से नहीं लड़ सकते, पाकिस्तान में कोई भी हमारी मदद नहीं कर रहा है।”
कोरोना महामारी के कारण देश के हालात बिलकुल ठीक नहीं है। ऐसे में बॉलीवुड अभिनेत्री काजोल की एक वीडियो पर बवाल हुआ है। वीडियो में काजोल सेब को हवा में उछालकर उसे दो हिस्सों में काटती नजर आ रही हैं। वीडियो का कैप्शन है- मूड।
इस छोटी सी क्लिप में हालाँकि काजल ने कुछ कहा नहीं, लेकिन उनके फैन्स फिर भी इस तरह की वीडियो पोस्ट करने पर उनसे नाराज हो गए।
कुछ लोगों ने तो उन्हें फ्रूट निन्जा कहकर चुटकी ली। लेकिन कुछ ने गंभीरता से प्रश्न पूछा कि इस समय में ऐसी वीडियो का क्या मतलब है। एक यूजर ने उन्हें खाने की महत्ता समझाते हुए कहा, “खाने की चीजों को बर्बाद मत करो… कई लोग इसके लिए भूख से मर रहे हैं। इस तरह के पोस्ट को प्रोत्साहित न करें।” दूसरे यूजर ने लिखा, “लोग भूखे मर रहे हैं। उनका मजाक मत बनाइए, खान वेस्ट मत करिए।”
बता दें कि ये पहली दफा नहीं हुआ कि काजोल इस तरह किसी वीडियो या खाद्य पदार्थ के कारण चर्चा में आई हों। साल 2017 में काजोल बीफ पार्टी के कारण विवादों में घिरी थीं। कथित तौर पर काजल ने महाराष्ट्र में बीफ बैन होने के बावजूद अपने दोस्त के घर बीफ पार्टी की थी। साथ ही वीडियो को सोशल मीडिया पर शेयर भी किया था।
विवादित वीडियो
हालाँकि, जब विवाद बढ़ा तो काजोल को अपनी वीडियो डिलीट करनी पड़ी और उन्होंने सफाई देते हुए कहा कि वो बीफ नहीं बल्कि बफैलो मीट था। काजोल ने ट्विटर पर लिखा, “मेरा एक वीडियो काफी वायरल हो रहा है जिसमें ये दिखाया जा रहा है कि मैं अपने दोस्त के घर बीफ खा रही हूँ। इसमें कुछ गलतफहमी हुई है। वो बफैलो (भैंस) मीट था जो कानूनी तौर पर उपलब्ध है।” काजोल ने पोस्ट कर बताया था कि उन्होंने अपनी सफाई इसलिए दी क्योंकि ये एक संवेदनशील मुद्दा है। इससे कई लोगों की भावनाएँ आहत हो सकती हैं।
गौरतलब है कि कोरोना संक्रमण के बेकाबू होने के बाद हर किसी की बस यही कोशिश है कि किसी न किसी तरह इस महामारी से लड़ाई जीती जा सके। लोग अपने सामर्थ्य के मुताबिक संक्रमितों की मदद भी कर रहे हैं। हालाँकि, इस बीच कई बॉलीवुड कलाकार ऐसे हैं जिन्हें कोई मतलब नहीं कि देश में क्या हो रहा है। रणबीर-आलिया जैसे लोग मालदीव जा रहे हैं और काजल जैसे लोग फ्रूट निंजा बनकर हवा में सेब कट रहे हैं। यही वजह है कि आम जन जो कभी इनकी एक्टिंग की सराहना करते नहीं थकते थे वो अब खुलेआम इनकी आलोचना कर रहे हैं।