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UP पुलिस ने किया कालाबाजारी का भंडाफोड़: 638 ऑक्सीजन सिलेंडर के साथ सलीम गिरफ्तार, लगेगा NSA

देश भर में कोरोना संक्रमण के कारण हाहाकार मचा है। जिन मरीजों को दवाई की जरूरत है उन्हें दवाई नहीं मिल रही और जिन्हें ऑक्सीजन चाहिए उनके पास ऑक्सीजन का इंतजाम नहीं हो पा रहा। ऐसी विकट स्थिति में गाजियाबाद पुलिस ने समीर उर्फ सलीम नाम के व्यक्ति को कालाबाजारी करते पकड़ा है। इस आदमी के पास से पुलिस को 638 ऑक्सीजन सिलेंडर बरामद हुए। 

यूपी पुलिस ने इस संबंध में अपने ट्विटर पर ट्वीट कर बताया। इसमें कहा गया, “गाजियाबाद पुलिस द्वारा 638 ऑक्सीजन सिलेंडर बरामद किए गए और आरोपित समीर उर्फ सलीम की गिरफ्तारी भी हुई जो इसे अत्यधिक कीमतों पर बेच रहा था। हम राज्यभर में जमाखोरों और जालसाजों के विरुद्ध कार्रवाई कर रहे हैं। इन्हें गैंगस्टर व एनएसए के तहत हिरासत में लिया जाएगा।”

वहीं एसपी सिटी प्रथम निपुण अग्रवाल ने मीडिया को जानकारी देते हुए बताया कि तेजी से बढ़ते कोरोना संक्रमण के कारण ऑक्सिजन की माँग बढ़ गई। इस दौरान कुछ लोगों ने ऑक्सिजन की कालाबाजारी शुरू कर दी है। इस पर अंकुश लगाए जाने के मकसद से एसएसपी अमित पाठक के निर्देश पर एक विशेष अभियान चलाया जा रहा है।

इसी कड़ी में पुलिस को सूचना मिली कि थाना लिंक रोड क्षेत्र अंतर्गत साइट 4, बी-30 औद्योगिक क्षेत्र में एक फैक्ट्री है। वहाँ पर भारी मात्रा में कालाबाजारी के लिए छोटे-बड़े ऑक्सीजन सिलेंडर जमा किए जा रहे हैं और यहीं से ऑक्सीजन की कालाबाजारी की जाती है।

सूचना के आधार पर पुलिस ने जब छापेमारी की, तो मौके पर समीर उर्फ सलीम मौजूद मिला। वहीं फैक्ट्री में 638 छोटे-बड़े खाली ऑक्सीजन सिलेंडर भी बरामद हुए। एसपी सिटी ने बताया कि गिरफ्तार किए गए समीर उर्फ सलीम ने पूछताछ में कहा कि वह जय गोपाल इंटरप्राइजेज का कर्मचारी है और अपने मालिक जय गोपाल मेहता के कहने पर छोटा सिलेंडर 10000 रुपए में और बड़ा सिलेंडर 30000 रुपए में बेचता था। 

पुलिस के मुताबिक सलीम का मालिक अभी फरार है। उसकी तलाश जारी है। जल्द ही उसे भी गिरफ्तार कर लिया जाएगा और दोनों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है।

बता दें कि इससे पूर्व प्रयागराज से कालाबाजारी करते 3 लोगों को गिरफ्तार किया था। पुलिस ने इनके पास से 5 सिलेंडर बरामद किए थे। इनमें 1 भरा हुआ जबकि 4 सिलेंडर खाली थे। प्रारंभिक पूछताछ में पता चला कि वह लोग 20 से 35 हजार रुपए एक सिलेंडर के लिए लोगों से वसूलते थे।

कल नोएडा में भी दो लोगों को इसी आरोप में पकड़ा गया। ये दोनों स्थिति का फायदा उठाकर मनमानी कीमतों पर सिलेंडर बेच रहे थे। नोएडा पुलिस ने बताया कि इनके कब्जे से चार ऑक्सीजन सिलेंडर के अलावा एक ट्रांसफर लाइन रिफिंग पाइप और चाबी समेत स्पेनर व 780 रुपए मिले हैं। 

लहर के साथ आए, वायरस के साए में जाएँगे PK? 2 मई का यह दिन ढलते-ढलते प्रशांत किशोर का भविष्य लिख जाएगा

10 साल के यूपीए कुशासन और मनमोह​न सिंह सरकार की ‘पॉलिसी पैरालिसिस’ से उपजी निराशा में डूबे भारतीय मतदाताओं ने नरेंद्र मोदी में तारणहार देखा। यही वजह है कि 2014 के आम चुनावों ने भारतीय राजनीति की दशा और दिशा बदल दी। मोदी ल​हर के साथ कई चीजें उफनाती हुईं राष्ट्रीय परिदृश्य पर उभर आईं। इनमें से एक प्रशांत किशोर (PK) का नाम भी था। ज्यादातर जींस-टीशर्ट में नजर आने वाला यह शख्स उनके चुनावी कैंपेन से जुड़ा था।

आम चुनावों के कुछ महीनों बाद ही यह स्पष्ट हो गया कि प्रशांत किशोर किसी वैचारिक या राजनीतिक प्रतिबद्धता की वजह से मोदी के कैंपेन से नहीं जुड़े थे। न ही वे उन ‘मल्टीनेशनल युवाओं’ जैसे थे जो अन्ना हजारे की आभा में कैद हो भारत बदलने के सपने लिए राजनीति से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर जुड़े और बाद में अरविंद केजरीवाल नाम का उत्पाद पाकर खुद को छला हुआ महसूस करते हुए गहरे अवसाद में चले गए।

असल में वह तकनीक और आने वाले वक्त को देखने की मोदी की दृष्टि थी, जिसने प्रशांत किशोर को उनके साथ जुड़कर काम करने का मौका दिया। इस मौके से पीके के बॉयोडाटा में मोदी के नाम और चेहरे से पैदा हुई सफलता बेचने के लिए जुड़ गई थी। इसे उन्होंने बेचा, जो कि किसी भी पेशेवर को करना चाहिए।

नरेंद्र मोदी के साथ प्रशांत किशोर (साभार: आउटलुक)

फिर आया 2015 का बिहार विधानसभा चुनाव। मूल रूप से बिहार के ही बक्सर के रहने वाले प्रशांत किशोर अब नीतीश कुमार की जदयू (JDU) के लिए चुनावी रणनीति तैयार कर रहे थे। उस समय नीतीश की राहें बीजेपी (BJP) से अलग हो चुकी थी और जंगलराज के सरपरस्त लालू यादव की राजद (RJD) उनकी हमसफर थी। ऐसे गठबंधन के चुनावी कैंपेन से पीके के जुड़ने से यह भी स्पष्ट हो गया कि उनके लिए न केवल ​विचारधारा महत्वहीन है, बल्कि आम आदमी की सुरक्षा भी मायने नहीं रखती। उनके लिए करियर, आर्थिक हित ज्यादा जरूरी हैं।

इस समय एक और बदलाव उनमें आया, जिसकी चर्चा न के बराबर हुई। उस समय प्रशांत किशोर पटना में अक्सर जींस-टीशर्ट की जगह सफेद कुर्ता-पायजामा में दिखने लगे। यह संकेत था कि चुनावी रणनीतियों को तैयार करने वाले इस आदमी की अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ भी हैं।

बाद के समय में प्रशांत किशोर ने उत्तर प्रदेश और पंजाब में कॉन्ग्रेस, दिल्ली में आम आदमी पार्टी (AAP) आंध प्रदेश में जगनमोहन रेड्डी वगैरह को भी अपनी सेवा दी। कुछ सफलताएँ मिली, कुछ असफलताएँ। इस दौरान उनका पहनावा कई बार बदला। वे कुछ समय के लिए बतौर जदयू उपाध्यक्ष सक्रिय तौर पर राजनीति की पिच पर भी उतरे।

उनकी इस यात्रा से लोगों को भी यह समझ आने लगा कि प्रशांत किशोर की कथित रणनीतियों का जलवा तभी चलता है, जब उन्हें किसी ऐसे शख्स का कैपेंन करना हो जिसके लिए जनता पहले से ही अपना मूड बना चुकी होती है। यदि उन्हें कोई बुरा ‘प्रोडक्ट’ सौंप दिया जाए तो उनकी रणनीति उसे जनता के बीच बेच नहीं पाती है।

बतौर जदयू उपाध्यक्ष प्रशांत किशोर का करियर संक्षिप्त और विवादित रहा (साभार: द स्टेट्समैन)

अपने हुनर पर उठते सवालों के बीच ही प्रशांत किशोर पश्चिम बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस के साथ जुड़े थे। आज (2 मई 2021) यदि इस रिपोर्ट को आप पढ़ रहे हैं तो इसका सीधा सा मतलब है कि आपकी नजरें पश्चिम बंगाल के जनादेश पर टिकी हैं। बंगाल का यह असाइनमेंट प्रशांत किशोर के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण है। इतना कि बीते साल जब कोरोना संक्रमण की वजह से जब पूरे देश में लॉकडाउन लगा था, प्रशांत किशोर कार्गो विमान से कोलकाता चले गए थे।

बाद के समय में वे तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) में मची भगदड़ को लेकर चर्चा में रहे। पार्टी को छोड़कर गए ज्यादातर नेताओं ने उनकी कार्यशैली पर सवाल उठाए। बावजूद वे कभी राष्ट्रीय सुर्खियों में नहीं रहे।

बंगाल चुनाव को लेकर पहली राष्ट्रीय सुर्खी उन्हें अपने एक ट्वीट से नसीब हुई। 21 दिसंबर 2020 को किए गए इस ट्वीट में उन्होंने दावा किया कि बंगाल में बीजेपी की सीट डबल ​डिजिट में होंगी। ट्रिपल डिजिट में सीटें आने पर उन्होंने इस काम से तौबा करने की बात कही। उनका दावा हवा-हवाई न लगे, इसके लिए उन्होंने इस ट्वीट को सहेजकर रखने की चुनौती भी दे डाली।

जब यह ट्वीट आया था तब बंगाल के चुनावी तारीखों का ऐलान नहीं हुआ था। लेकिन, इसने उन्हें टीएमसी के भीतर खुद पर उठते सवालों से छुटकारा पाने का मौका जरूर दे दिया। इससे उन्होंने यह भी निश्चित कर लिया कि किसी भी परिस्थिति में तृणमूल उनकी छुट्टी न करें, क्योंकि ऐसा होने पर यह संदेश जाता कि प्रशांत किशोर और उनके दावे पर खुद ममता बनर्जी को भी भरोसा नहीं है। जब चुनाव कुछ ही महीने दूर हो तो राजनेता इस तरह के नाकारात्मक संदेश देने वाले कदम उठाने से अमूमन बचने की ही जुगत भिड़ाते रहते हैं। राजनीतिक दुकानों में काम करते-करते यह बात प्रशांत किशोर भी भली-भाँति समझते होंगे। सो, पहली नजर में उनका यह ट्वीट सोच-समझकर उठाया गया कदम था।

फिर आया 10 अप्रैल 2021, एक बार फिर प्रशांत किशोर राष्ट्रीय सुर्खियों में थे। इस बार वजह बनी कुछ पत्रकारों के साथ ‘क्लबहाउस‘ पर हुई उनकी बातचीत के लीक अंश। इसमें प्रशांत किशोर बंगाल में मोदी की लोकप्रियता, मटुआ-दलित मतदाताओं के बीजेपी के प्रति झुकाव और मुस्लिम तुष्टिकरण से उपजे हिंदू ध्रुवीकरण का बीजेपी को मिल रहे फायदे को लेकर बात करते सुने गए। इन बातों का लब्बोलुआब यह था कि भाजपा बंगाल के चुनावी मैदान में भारी पड़ रही है। ध्यान देने की बात यह है कि प्रशांत किशोर की ये बातें जब सार्वजनिक पटल पर सामने आईं थी, तब तक बंगाल में केवल चार चरण के चुनाव हुए थे। चार चरण शेष थे।

हालाँकि इसको लेकर प्रशांत किशोर का कहना था कि उनकी बातों को गलत तरीके से पेश किया गया। लेकिन यह भी सच है कि इसके बाद के साक्षात्कारों में वे यह कोशिश करते भी दिखे कि बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस की संभावित हार की छाया उनके बॉयोडाटा पर न पड़े।

ऐसे ही एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि राजनीतिक दल अपनी आंतरिक मजबूती, नेतृत्व और अपने द्वारा किए और न किए गए कार्यों के कारण हारती तथा जीतती हैं। उनके जैसे लोग सिर्फ हार या जीत के अंतर पर फर्क डालने के लिए होते हैं। यह पूछे जाने पर कि क्या वो किसी हारती हुई लड़ाई को जीत में बदल सकते हैं, प्रशांत किशोर का जवाब था- एकदम नहीं।

यह सच है कि चुनावी रणनीतिकार कोई जादूगर नहीं होता। प्रशांत किशोर ने सच ही कहा है कि उनके जैसे लोग केवल अंतर में फर्क डाल सकते हैं। लेकिन 21 दिसंबर 2020 को खुद को इतना महत्वपूर्ण साबित करने पर जुटा शख्स, अप्रैल के साक्षात्कारों में इस तरह की बातें करने लगे तो संदेह तो उठते ही हैं। लेकिन, अब तक की हर बातचीत में उन्होंने यह कहा है कि वे 21 दिसंबर के अपने ट्वीट पर आज भी कायम हैं।

‘खाट पर चर्चा ‘ जैसे तमाशों से भी यूपी में 2016 में कॉन्ग्रेसी प्रोडक्ट नहीं बेच पाए थे पीके (साभार: इंडियन एक्सप्रेस)

यह भी दिलचस्प है कि हाल के साक्षात्कारों में प्रशांत किशोर उसी तरह जींस-टीशर्ट में नजर आए हैं, जैसे वे 2014 में राष्ट्रीय पटल पर मोदी के उदय के वक्त दिखते थे। आगे उनका पहनावा कैसा होगा? यह तय होने में कुछ ही घंटे बचे हैं। नया करियर या पुराना धंधा ही नए दरवाजे से?

जो भी हो उम्मीद की जानी चाहिए कि इतनी राजनीतिक दुकान घुमने के बावजूद प्रशांत किशोर ने नेताओं से अपने कहे से ही पलट जाने का हुनर नहीं सीखा होगा। वैसे भी यह हुनर नेताओं के लिए ही सही है, जिन्हें लोकतंत्र में हर पाँच साल पर परीक्षा देनी होती है। पेशेवरों को गलाकाट प्रतिस्पर्धा के इस दौर में हर सेकेंड एक इम्तिहान से गुजरना होता है। वायरस के साए में हुए चुनावों के नतीजे वाले दिन प्रशांत किशोर उसी इम्तिहान से गुजर रहे होंगे। टीवी स्क्रीन पर सीटों के बदलते नंबर के साथ ही उनका रक्तचाप भी उतराता रहेगा। दो मई का यह दिन जैसे-जैसे ढलेगा, प्रशांत किशोर का भविष्य लिखता जाएगा।

मतगणना 2 मई- 5 राज्य: कोरोना वायरस से लड़ाई के बीच आई जनादेश की घड़ी, बंगाल पर टिकी हैं सबकी नजरें

कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर के बीच साल 2021 में 1 माह के भीतर 5 राज्यों में विधानसभा चुनावों के लिए मतदान करवाए गए। इनमें से केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी में 1 चरण में मतदान पूरे हुए, जबकि असम के लिए 3 चरणों में वोट डाले गए और बंगाल में 8 चरणों में मतदान प्रक्रिया संपन्न हुई। अब कल यानी 2 मई को सभी राज्यों के नतीजे आने वाले हैं।

EXIT POLL क्या कहता है?

29 अप्रैल 2021 को बंगाल में आखिरी चरण की वोटिंग के बाद कई मीडिया चैनल्स पर अलग-अलग एग्जिट पोल दिखाए गए। अपने-अपने अनुमान के मुताबिक सबने 5 राज्यों में हुए चुनावों के नतीजों की तस्वीर बताई। बंगाल को लेकर अधिकांश एग्जिट पोल्स ने कहा कि बंगाल में टीएमसी और बीजेपी के बीच कड़ी टक्कर है। असम और पुडुचेरी में बीजेपी का बोलाबाला बताया गया। वहीं केरल में लेफ्ट की सरकार दोबारा बनती दिखाई गई है और तमिलनाडु में डीएमके को सत्ता में आता दिखाया गया।

पश्चिम बंगाल:

बंगाल की 294 विधानसभा सीट पर 8 चरणों में मतदान संपन्न कराए गए। ये चरण क्रमश: 27 मार्च, 1 अप्रैल, 6 अप्रैल, 10 अप्रैल, 17 अप्रैल, 22 अप्रैल, 26 अप्रैल, 29 अप्रैल कराए गए। 

वर्तमान में बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) सत्ता में है। ममता बनर्जी के नेतृत्व में पार्टी 2011 से राज्य की कुर्सी पर है। 2011 में टीएमसी ने कॉन्ग्रेस के साथ चुनाव लड़ा और अकेले 184 सीट पाईं। इसके बाद 2016 में 211 सीटें टीएमसी के खाते में आईं। 

हालाँकि, इस बार बंगाल की बयार अलग है। कुछ एग्जिट पोल्स में ममता सरकार को जीतते दिखा रहे हैं। लेकिन ज्यादातर का कहना यही है कि या तो भाजपा सभी रिकॉर्ड तोड़ सत्ता में आएगी वरना टीएमसी को कड़ी टक्कर देगी।

असम:

असम की 126 विधानसभा सीटों पर 3 चरणों में चुनाव हुए। पहले चरण के लिए मतदान 27 मार्च को हुआ। वहीं दूसरे तीसरे चरण के लिए मतदान 1 अप्रैल और 6 अप्रैल को हुआ।

राज्य में इस समय बीजेपी के गठबंधन वाली एनडीए सरकार है। भाजपा नेता सर्बानंद सोनोवाल के नेतृत्व में यहाँ एनडीए ने 2016 में सरकार बनाई थी। उससे पहले राज्य में लगातार 3 बार विधानसभा चुनाव में जीत के बाद कॉन्ग्रेस नेता तरुण गोगोई सीएम की कुर्सी पर थे।

एग्जिट पोल कहते हैं कि राज्य में लगातार दूसरी बार भाजपा लौटने वाली है। संभव है यहाँ भाजपा अधिकतम 85 सीट भी मिलें। वहीं कॉन्ग्रेस गठबंधन 65 के आसपास सीटें पा सकता है।

तमिलनाडु:

तमिलनाडु में इस बार 234 विधानसभा सीट के लिए 6 अप्रैल 2021 को एक चरण में मतदान हुआ।

यहाँ पिछले एक दशक से लगातार ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK) सत्ता में है। वर्तमान में पार्टी के मुख्यमंत्री के पलानिस्वामी हैं।

हालाँकि, एग्जिट पोल कहते हैं कि इस बार राज्य में डीएमके-कॉन्ग्रेस की सरकार आएगी। वहीं AIADMK को इस बार सत्ता से हाथ धोना पड़ेगा। DMK गठबंधन को इंडिया टुडे के एकिसस माय सर्वे में 175-195 सीटें मिलती दिखाई गई हैं। वहीं AIADMK को 38-54 सीट।

केरल:

वामपंथ का गढ़ माने जाने वाले केरल की 140 विधानसभा सीटों पर 6 अप्रैल को 1 चरण में मतदान हुआ था। पिनराई विजयन की अगुवाई में कन्युनिस्ट पार्टी ने यहाँ 2016 में सरकार बनाई थी। उससे पहले कॉन्ग्रेस ने भी यहाँ 2011-2016 का समय बिताया।

एक्जिट पोल बताते हैं कि इस बार केरल में CPI (M) के नेतृत्व वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) की सरकार बनेगी। पोल में एलडीएफ को पूर्ण बहुमत मिलता दर्शाया गया है। वहीं यूडीएफ के 50-60 सीटों पर सिमटने का अनुमान लगाया गया है।

पुडुचेरी:

30 विधानसभा सीटों वाले केंद्र शासित प्रदेश में केरल और तमिलनाडु की तरह 6 अप्रैल को 1 चरण में चुनाव पूरे हुए। 22 फरवरी से पहले वहाँ कॉन्ग्रेस सरकार थी। लेकिन सियासी उथल पुथल में सत्ता कॉन्ग्रेस के हाथ से चली गई। अभी इस समय वहाँ राष्ट्रपति शासन लगा हुआ है।

कल निर्धारित होगा कि कौन सी सरकार पुडुचेरी में सत्ता पर आएगी। एग्जिट पोल्स में तो यहाँ भाजपा की सरकार बनते दिखाया जा रहा है। रिपब्लिक सीएनएक्स का अनुमान है कि भाजपा यहाँ 19-23 सीटें भी पा सकती है जबकि कॉन्ग्रेस को 6-10 सीट हाथ लग सकती हैं। ये आँकड़े हर पोल पर अलग-अलग हैं।

जीत के बाद नहीं है जुलूस निकालने की अनुमति

गौरतलब है कि कोरोना महामारी के बढ़ते प्रकोप के बीच कल (2 मई) मतगणना के बाद नतीजे घोषित किए जाएँगे। ऐसे में चुनाव आयोग ने स्थिति को देखते हुए कुछ दिन पहले निर्णय लिया था कि कहीं भी किसी भी प्रकार का कोई जीत का जुलूस नहीं निकाला जाएगा। केवल दो लोग अपनी जीत का सर्टिफिकेट लेने जा पाएँगे।

आयोग के इस फैसले से पहले मद्रास हाईकोर्ट ने कहा था कि यदि आयोग 2 मई को होने वाले मतगणना के दौरान कोरोना के दिशा-निर्देशों का पालन कराने की योजना का खाका नहीं पेश कर पाया तो वह इस पर रोक लगा देंगे।

महाराष्ट्र में 24 घंटे में 63, 282 के बाद केरल में हुए लोग सबसे ज्यादा कोरोना संक्रमित, 35 हजार से ज्यादा मामले

देश भर में कोरोना संक्रमण की दूसरी लहर ने कोहराम मचाया हुआ है। वैक्सीन आने के बावजूद देश में 32 लाख से ज्यादा एक्टिव केस हैं। सरकारें अपनी-अपनी तरफ से हर प्रकार की सख्ती बरतने का प्रयास कर रही हैं। लेकिन कुछ राज्य ऐसे हैं जहाँ कोई सुधार आना तो दूर हालात और बिगड़ते जा रहे हैं।

महाराष्ट्र, केरल, कर्नाटक, दिल्ली, उत्तर प्रदेश इस समय संक्रमित केसों की सूची में टॉप 5 नाम हैं। एक ओर महाराष्ट्र की स्थिति में जहाँ पिछले साल से अब तक कोई सुधार दिखा ही नहीं, वहीं केरल का वह मॉडल भी विफल होता दिख रहा है, जिससे सीखने की सलाह हर राज्य को दी जा रही थी। दिल्ली के सीएम ने तो स्थिति देखते हुए प्रदेश में 1 हफ्ते का लॉकडाउन बढ़ाया है। वहीं यूपी में आज से वैक्सीन की प्रक्रिया चालू कर दी गई है ताकि बढ़ते केसों को रोका जा सके।

इन पाँचों राज्य के आँकड़े क्या कहते हैं आइए जानें:

कोरोना संक्रमितों की सबसे ज्यादा तादाद महाराष्ट्र में है। वहाँ आज भी बीते 24 घंटे में 63, 282 नए मामले सामने आए हैं, वहीं अकेले महाराष्ट्र में 802 मरीजों की कोरोना से मौत हुई है। 30 अप्रैल तक के डेटा के मुताबिक महाराष्ट्र में कुल संक्रमित की गिनती 46 लाख से ऊपर जा चुकी है। वहीं मौत का आँकड़ा 68813 हो गया है।

सबसे ज्यादा संक्रमित केसों की सूची में दूसरा नाम केरल का है। केरल में कुल संक्रमितों की गिनती कल तक 15,71184 थी। लेकिन 24 घंटे में यहाँ से 35, 493 नए मामले आए हैं। राज्य में कुल मृतकों की संख्या भी 5, 356 है।

कर्नाटक कुल संक्रमितों (15,64,132 ) की संख्या में फिलहाल केरल से नीचे हैं। लेकिन हाल में आए आँकड़ों ने सबको हैरान कर दिया है। वहाँ पिछले 24 घंटे में 40 हजार 990 मामले दर्ज किए गए हैं। इस दौरान मौतें भी 271 हुई। फिलहाल राज्य में 4 लाख से अधिक सक्रिय केस हैं।

30 अप्रैल तक के कोरोना आँकड़े (साभार: coronaclusters.in)

उत्तर प्रदेश में भी कोरोना ने अपना हाहाकार मचाया हुआ है। पिछले 1 दिन में वहाँ से 30317 हजार नए मामले आए हैं और 38826 लोग डिस्चार्ज होकर घर भी भेजे गए।

संक्रमण की रफ्तार दिल्ली में भी कुछ कम नहीं हुई है। यहाँ 24 घंटे में एक बार दोबारा 27 हजार मामले दर्ज किए गए हैं। इस दौरान 375 लोगों की मौत भी हुई। दिल्ली सीएम ने हालातों को देखते हुए आज एक हफ्ते का लॉकडाउन और बढ़ा दिया है। वहीं वैक्सीन के लिए कुछ समय इंतजार करने को कहा है।

कभी वैक्सीन को भाजपा का बताया तो कभी असुरक्षित: मिलिए 12 ‘कोविडियट्स’ से जिन्होंने किया लोगों को जमकर गुमराह

भारत में कोरोना वायरस का संक्रमण लगातार बढ़ता जा रहा है। कई राज्यों में यह संक्रमण गंभीर होता जा रहा है। स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ गया है और चिकित्सा सुविधाओं में भी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है। इस बीच भारत ने दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण कार्यक्रम शुरू किया है। कई चरणों में शुरू हुए इस टीकाकरण कार्यक्रम में विभिन्न स्तरों पर लोगों को टीका लगाया गया। अभी तक 45 वर्ष से अधिक आयु के लोगों को कोरोना वायरस संक्रमण का टीका लगाया जा रहा था लेकिन 1 मई 2021 से 18 वर्ष से अधिक आयु के सभी वयस्कों के लिए टीकाकरण कार्यक्रम को चालू कर दिया गया।

इन सब के बीच उन लोगों पर भी ध्यान दिए जाने की जरूरत है जिन्होंने संक्रमण की इस गंभीर समस्या में भी अपना प्रोपेगंडा चलाए रखा। इनमें नेता, पत्रकार और कई अन्य ऐसे प्रतिनिधि शामिल हैं जिन्हें बड़ी संख्या में लोग फॉलो करते हैं। इन्होंने वैक्सीन को लेकर लोगों में डर फैलाया, उन्हें गुमराह किया, वैक्सीन की दक्षता पर प्रश्न खड़े किए और जब टीकाकरण शुरू हुआ तो इन लोगों ने वैक्सीन का डोज लिया और फ्री में वैक्सीन उपलब्ध कराने की माँग करने लगे। ट्विटर यूजर @moronhumor के ट्विटर थ्रेड में इन प्रोपेगंडाबाजों की पूरी जानकारी दी गई है।

इन्होंने तो वैक्सीन की खुराक ली लेकिन पीछे छोड़ दिए कई प्रश्न जो आज भी वैक्सीन को लेकर लोगों के मन में शंका पैदा करते हैं।

समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव ने 3 जनवरी 2021 को कहा था, “यह भाजपा की वैक्सीन है, हम नहीं लेंगे। जब अपनी सरकार आएगी तब अपनी वैक्सीन भी ली जाएगी।“ अखिलेश यादव जो कि मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं, उन्होंने वैक्सीन पर सवाल उठाए और उसे भाजपा की वैक्सीन कहा। बाद में आलोचना होने पर उन्होंने अपने सुर बदले और कहा कि सरकार जल्दी तय करे टीकाकरण की तारीख।

पत्रकार संदीप चौधरी ने 6 जनवरी 2021 को कहा कि जब तक तीसरे चरण का ट्रायल पूरा नहीं होता और वैक्सीन की दक्षता साबित नहीं होती तब तक वह वैक्सीन की खुराक नहीं लेंगे। लेकिन उन्हीं संदीप चौधरी ने 28 अप्रैल 2021 को कहा कि टीका उनका अधिकार है और उन्हें यह मुफ्त में मिलना चाहिए।

कार्टूनिस्ट सतीश आचार्य ने वैक्सीन की सुरक्षा और अन्य मुद्दों पर तंज कसते, मजाक उड़ाते कई कार्टून बनाए। उन्होंने अपने कार्टूनों के माध्यम से वैक्सीन की सुरक्षा और दक्षता पर कटाक्ष किया लेकिन अंततः 18 अप्रैल 2021 को वैक्सीन की पहली खुराक ली।

वैक्सीन पर सतीश आचार्य द्वारा बनाए गए कार्टून
सतीश आचार्य की ट्विटर पोस्ट का स्क्रीनशॉट

बजाज ऑटोमोबाइल के मैनेजिंग डायरेक्टर राजीव बजाज ने कहा कि वह वैक्सीन के विरोधी नहीं हैं लेकिन एक नई वैक्सीन पर उनके विचार बीच के हैं अर्थात वो वैक्सीन से उत्पन्न होने वाले खतरे पर नजर रखेंगे। बजाज ने तो कोरोनावायरस के संक्रमण के लक्षणों को भी वैक्सीन पर प्राथमिकता दे दी और उसकी तुलना भारतीय सड़कों से की जहाँ दुर्घटना की दर भी बहुत ज्यादा है।

छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री टी एस सिंह देव ने 10 जनवरी 2021 को कहा था कि छत्तीसगढ़ में टीकाकरण के लिए कोवैक्सीन के उपयोग को वह समर्थन नहीं देते हैं। उन्होंने कहा कि वैक्सीन की दक्षता और सुरक्षा साबित होने तक वैक्सीन का उपयोग असुरक्षित है।

कॉन्ग्रेस के रणदीप सुरजेवाला ने वैक्सीन की दक्षता और सुरक्षा पर प्रश्न उठाए। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री, उनके स्वास्थ्य मंत्री, उनके कैबिनेट मंत्री और उनके मुख्यमंत्री पहले क्यों वैक्सीन की खुराक नहीं ले रहे हैं।

जबकि यह सबको पता था कि टीकाकरण का एक प्रोटोकॉल बनाया गया है जिसके तहत पहले फ्रंटलाइन स्वास्थ्य कर्मी, वृद्ध और बीमार लोगों को वैक्सीन लगाई जाएगी। उसके बाद बाकी लोगों के लिए वैक्सीन की खुराक उपलब्ध हो पाएगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं इस प्रोटोकॉल का पालन किया और अपना नंबर आने पर वैक्सीन की खुराक ली। लेकिन रणदीप सुरजेवाला जैसे लोगों ने अपना प्रोपेगंडा फैला दिया था।

कॉन्ग्रेस के ही मनीष तिवारी ने 5 जनवरी 2021 को भाजपा सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा था कि सरकार कुछ राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के चलते 130 करोड़ भारतीयों के साथ खिलवाड़ नहीं कर सकती। वैक्सीन पर उन्होंने कहा था कि जिस पर लगातार प्रश्न उठ रहे हैं उस वैक्सीन को स्वेच्छा से कौन लगवाएगा।

जहाँ एक ओर भारत के वैज्ञानिक और शोधकर्ता लगातार मेहनत करके एक वैक्सीन बनाते हैं वहाँ शशि थरूर जैसे नेता प्रोपेगंडा के तहत स्वदेशी वैक्सीन पर सवाल उठाते हैं। 3 जनवरी 2021 की अपने ट्वीट में शशि थरूर ने कहा था कि कोवैक्सीन को अप्रूवल देना खतरनाक है। उन्होंने केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन से इस विषय पर स्पष्टीकरण माँगा था।

पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी उन चुनिंदा लोगों में थीं जिन्होंने भारत बायोटेक की कोवैक्सीन पर सीधे-सीधे प्रश्न उठाए थे। चतुर्वेदी ने सीधे तौर पर कहा था कि उन्हें भारत बायोटेक पर कोई भरोसा नहीं है और वह कोवैक्सीन नहीं लेंगी। लेकिन 8 अप्रैल 2021 को इन्हीं पत्रकार महोदया ने मोदी सरकार से वैक्सीन की माँग की।

पत्रकार स्वाति चतुर्वेदी के ट्वीट का स्क्रीनशॉट
चतुर्वेदी ने ट्वीट में कहा कि वह कोवैक्सीन की खुराक नहीं लेंगी

वकील और एक्टिविस्ट प्रशांत भूषण ने तो यहाँ तक कह दिया था कि प्राकृतिक रूप से ही खत्म हो रहे कोरोना वायरस संक्रमण के बाद भी निजी वैक्सीन कंपनियों को 35,000 करोड़ रुपए दिए जा रहे हैं। भूषण ने यह कहा कि यह पैसे निजी कंपनियों को दिए जा सकते हैं लेकिन गरीब मजदूरों और किसानों को नहीं।

प्रशांत भूषण के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

एनसीपी नेता नवाब मालिक ने कहा था कि फ्रंटलाइन स्वास्थ्यकर्मियों और पुलिसकर्मियों के लिए टीकाकरण कार्यक्रम शुरू हो गया है लेकिन लोगों के मन में अभी भी शंका है। इसलिए प्रधानमंत्री को आगे आकार पहले वैक्सीन लेनी चाहिए। हालाँकि यह शंका उनकी खुद की थी जिसे उन्होंने लोगों का नाम देकर अपना प्रोपेगंडा चलाया।

नवाब मलिक का बयान

AIMIM के असदुद्दीन ओवैसी ने वैक्सीन पर राजनीति करने वालों और प्रोपेगंडा फैलाने वालों के क्लब में शामिल होने के लिए एक मध्यम मार्ग अपनाया। उन्होंने सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की कोविशील्ड पर प्रश्न उठाए और प्रधानमंत्री से यह प्रश्न किया कि उन्होंने कोवैक्सीन की खुराक क्यों ली? मतलब प्रधानमंत्री पहले टीका न लगवाएं तो समस्या और टीका लगवा लें तो यह समस्या कि दूसरा वाला टीका क्यों नहीं लिया।

असदुद्दीन ओवैसी की मध्यमार्गी राजनीति

कुल मिलाकर यही वो लोग थे जिनके कारण देश में वैक्सीन को लेकर दुष्प्रचार हुआ। कॉन्ग्रेस की मशीनरी ने इस दुष्प्रचार में बड़ा योगदान दिया। ये लोगों के बीच घुले-मिले रहे और चर्चाओं में ही वैक्सीन पर दुष्प्रचार करते रहे। यही कारण है कि आज भी वैक्सीन पर लोगों की राय स्पष्ट नहीं है लेकिन अब जब करोड़ों लोग वैक्सीन की खुराक ले रहे हैं तो लोगों में अपने आप वैक्सीन से जुड़ा हुआ भ्रम दूर हो रहा है और लोग बड़ी सँख्या में स्वयं आगे आकर वैक्सीन की खुराक ले रहे हैं।   

AltNews के प्रतीक सिन्हा ने किया रोहित सरदाना की मौत पर शरजील उस्मानी के घृणास्पद बयान का बचाव

ऑल्ट न्यूज़ के सह-संस्थापक प्रतीक सिन्हा ने शनिवार को अपने ट्विटर अकाउंट के माध्यम से साझा किए गए एक नोट में रोहित सरदाना की मौत का जश्न मनाने वाले शरजील उस्मानी का बचाव किया और उसे उचित ठहराया। प्रतीक सिन्हा ने कहा कि उस्मानी की आलोचना करने वाले लोग ‘विशेषाधिकार’ की स्थिति से ऐसा कर रहे थे।

शरजील उस्मानी आजतक के एंकर रोहित सरदाना की मौत की खबर के तुरंत बाद उन्हें ‘Sociopath’ ‘genocide enabler’ और ‘pathological liar’ कहा था।

प्रतीक सिन्हा ने कहा, “उस्मानी पर हमला करने वाले ट्वीट उन्हें तथ्यों पर काउंटर नहीं कर रहे थे बल्कि उसे एक बेहद घटिया मनुष्य बता रहे थे। कुछ यूजर्स ने यह भी दावा किया कि उस्मानी सरदाना की मौत का जश्न मना रहा था। अंग्रेजी की मेरी जितनी समझ है उसके आधार पर उस्मानी, सरदाना की मृत्यु का जश्न नहीं मना रहा था बल्कि वह रोहित सरदाना के कार्य की समीक्षा कर रहा था।“

प्रतीक सिन्हा की ट्विटर पोस्ट

ऑल्ट न्यूज के सह संस्थापक प्रतीक सिन्हा ने रोहित सरदाना पर अपनी रिपोर्टिंग के माध्यम से एक खतरनाक नैरेटिव चलाने का आरोप लगाया। सिन्हा ने सरदाना पर मीडिया ट्रायल का आरोप भी लगाया और सिर्फ इसलिए क्योंकि वो लिबरल एजेंडा के सामने कभी झुके नहीं।

शरजील उस्मानी के घृणा से सने हुए वक्तव्य का बचाव करते हुए प्रतीक सिन्हा ने कहा कि जिन लोगों ने उस्मानी की आलोचना की उन्होंने यह सब विशेषाधिकार की स्थिति से ऐसा किया है।  

शरजील उस्मानी शुक्रवार को रोहित सरदाना की मौत का जश्न मनाने वाला एकमात्र व्यक्ति नहीं था। The Print की स्तंभकार ज़ैनाब सिकंदर, टाइम्स ऑफ इंडिया और द इंडियन एक्सप्रेस के पत्रकार और कई इस्लामवादियों ने इस अवसर पर घृणा से भरे बयान दिए। अब हमारे पास उदारवादी बुद्धिजीवियों की एक जमात है जो इस घृणा को सही ठहराती है।

बत्रा अस्पताल में 12, कीर्ति में 6 की मौत: गौतम गंभीर दे रहे दिल्ली को 200 ऑक्सीजन कॉन्संट्रेटर तो AAP नेता ‘ट्विटरबाजी’ में व्यस्त

भाजपा सांसद और पूर्व क्रिकेटर गौतम गंभीर ने ऑक्सीजन की कमी से जूझ रहे मरीजों के लिए मुफ्त में ऑक्सीजन कॉन्संट्रेटर की व्यवस्था कराई। दिल्ली में बढ़ते कोरोना वायरस के संक्रमण के बीच ऑक्सीजन की कमी लगातार बनी हुई है। दिल्ली के ही बत्रा अस्पताल में शनिवार (01 मई) को ऑक्सीजन की कमी से 12 संक्रमितों की मृत्यु हो गई।

न्यूज एजेंसी ANI से बात करते हुए गौतम गंभीर ने कहा कि वर्तमान समय में दिल्ली में ऑक्सीजन की समस्या सबसे बड़ी है। उन्होंने कहा, “जिस प्रकार हमनें ऑक्सीजन सिलेंडर और फैबीफ्लू दवा मुफ्त में उपलब्ध कराई थी, ठीक उसी प्रकार हम 200 ऑक्सीजन कॉन्संट्रेटर भी मुफ्त में उपलब्ध करा रहे हैं। हमारी अपील है कि एक बार आवश्यकता पूरी होने पर ये ऑक्सीजन कॉन्संट्रेटर वापस लौटा दिए जाएँ जिससे बाकी जरूरतमंदों की मदद की जा सके।“

दिल्ली सरकार और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से प्रश्न करते हुए गंभीर ने कहा कि पिछले 6 सालों से जिस मोहल्ला क्लीनिक को दिल्ली सरकार बेहतरीन स्वास्थ्य मॉडल बता रही थी, आज वो मोहल्ला क्लीनिक कहाँ हैं और स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च करने के स्थान पर मुख्यमंत्री केजरीवाल विज्ञापनों में पैसा क्यों खर्च कर रहे थे?

वहीं दूसरी ओर ऑक्सीजन की कमी से दिल्ली के दो अस्पतालओं में कई मरीजों की मौत हो गई। दिल्ली के बत्रा अस्पताल में शनिवार को ऑक्सीजन की कमी से 12 कोरोना वायरस संक्रमित मरीजों की मौत हो गई। इनमें से गैस्ट्रोएंट्रोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. आर के हिमतानी भी शामिल हैं।

अस्पताल ने बताया कि जब सुबह 2500 लीटर ऑक्सीजन बची थी तब ही अधिकारियों को जानकारी दी थी। अस्पताल के चिकित्सा निदेशक एस सी अल गुप्ता ने कहा कि अधिकारियों ने साढ़े 12 बजे कहा कि ऑक्सीजन खत्म हो गई है और 1 बजकर 35 पर ऑक्सीजन का टैंकर आया।

इसके अलावा दिल्ली के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के गुरुग्राम में कीर्ति अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी के चलते Covid-19 संक्रमित 6 मरीजों की मौत हो गई। अस्पताल के अनुसार काफी प्रयास के बाद भी तय समय पर ऑक्सीजन नहीं मिल पाया।

जहाँ एक ओर दिल्ली में ऑक्सीजन की कमी लगातार बनी हुई है वहीं आम आदमी पार्टी (AAP) के नेता दूसरे राज्यों की ऑक्सीजन की व्यवस्थाओं को लेकर राजनीति कर रहे हैं। AAP के संस्थापक व नेता राजेश शर्मा ट्विटर पर असम के स्वास्थ्य मंत्री हेमंत बिस्वा सरमा से ऑक्सीजन के मुद्दे पर भिड़ गए जिस पर सरमा ने कह दिया कि दिल्ली सरकार टैंकर भिजवाए, असम से उन्हें 20 MT ऑक्सीजन रोज मिलेगी लेकिन इस पर AAP नेता राजेश शर्मा ने कह दिया कि दिल्ली औद्योगिक राज्य नहीं हैं और न ही उनके पास टैंकर की व्यवस्था है।

आपको बात दें कि Covid-19 के लगातार बढ़ते संक्रमण के चलते मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने लॉकडाउन को एक हफ्ते के लिए और बढ़ा दिया है। दिल्ली में पिछले 24 घंटों में 27,047 ने संक्रमित मरीज मिले हैं। इसके अलावा शुक्रवार को 375 मौतें हुई हैं। वर्तमान में दिल्ली में Covid-19 संक्रमण की दर बढ़कर 32.69% हो गई है।

TOI ने पब्लिश की पेड न्यूज, फैलाया मोदी विरोधी प्रोपगेंडा: पकड़े जाने पर चुपके से डिलीट की ‘खबर’

टाइम्स ऑफ इंडिया (Times of India) में 28 अप्रैल 2021 (बुधवार) को 10वें पेज पर न्यूज की तरह एक मोदी विरोधी प्रोपगेंडा विज्ञापन प्रकाशित हुआ। ये आर्टिकल रूपी विज्ञापन देवोलीना चक्रवर्ती ने लिखा। इसमें वह कोरोना के नाम पर मोदी विरोधी बातें करती दिखीं।

इसमें केंद्र सरकार की आलोचना व उनका क्रियान्वयन पर सवाल एक वाजिब बात थी, लेकिन जो गलत था वो इसे पाठकों को पेश करने का तरीका। टाइम्स ऑफ इंडिया ने इसे न्यूज आइटम की तरह पेश किया।

टाइम्स ऑफ इंडिया द्वारा प्रकाशित विज्ञापन

आमतौर पर अखबारों में AD के बारे में दूर से पता चल जाता है। उसमें अलग बॉर्डर होते हैं या कहीं कुछ ऐसा जरूर होता है जिससे पता चले कि विज्ञापन है न कि कोई ए़डिटोरियल पीस।

लेकिन, इस केस में पाठक के पास कोई अन्य रास्ता नहीं है कि वो पता लगा सके कि ये न्यूज स्टोरी है या विज्ञापन। कुछ लोगों को ये सामान्य लेख भी लग सकता है। लेकिन न्यूजब्रेड के आशीष शुक्ला जैसों को इसमें अंतर साफ दिखा।

उन्होंने आर्टिकल और विज्ञापन में फर्क दिखाते हुए समझाया कि सामान्य लेखों में इस्तेमाल किया गया फॉन्ट और इस लेख का फॉन्ट भिन्न है। आशीष ने इस बात पर ध्यान दिलाया कि ये आर्टिकल एक विज्ञापन है ताकि पीएम मोदी की छवि खराब की जा सके न कि ये कोई असली स्टोरी है।

आशीष ने इस संबंध में अपने पोर्टल पर भी लिखा। तस्वीर में देख सकते हैं कि ये दो कॉलम का है और आधे से ज्यादा पेज पर इसे खींचा गया है। आमतौर पर इतने बड़े ऐड की कीमत टाइम्स ऑफ इंडिया में 20-30 लाख रुपए होती है।

फॉन्ट के अलावा कई चीजें हैं जो बताती हैं कि ये न्यूज स्टोरी या ओपिनियन पीस सच में एक पेड विज्ञापन था। आर्टिकल में ‘यू और योर’ जैसे शब्द डबल इन्वर्टेड कॉमा में लिखे हैं। इसके अलावा इसमें लेखक की एक फोटो भी है जो ये दिखाने के लिए छापी जाती है कि लेख ओपिनियन पीस है।

अगर इतने प्रमाण भी काफी नहीं हैं तो बता दें कि यही आर्टिकल इसी लेखक के नाम से द वायर पर भी पब्लिश हुआ था। वहाँ भी आर्टिकल का एक-एक शब्द ऐसा था। इसलिए अगर कोई ये सोचे कि ये पहली बार टाइम्स पर ही पब्लिश हुआ है तो नहीं, टाइम्स ऑफ इंडिया से पहले 25 अप्रैल को ये द वायर पर भी पब्लिश हो चुका था। इससे जाहिर है ये न न्यूज स्टोरी है और न ओपिनियन पीस, क्योंकि अगर ऐसा होता तो नीचे बताया जाता कि ये आर्टिकल द वायर में पहले प्रकाशित हुआ या इसके लिए द वायर को साभार दिया जाता।

मालूम हो कि प्रिंट और डिजिटल मीडिया की कुछ मूल बातें होती हैं जो टाइम्स ऑफ इंडिया के लेख में नहीं थीं। अखबार में केवल एक न्यूज के तौर पर प्रोपगेंडा विज्ञापन चलाया जा रहा था। लेकिन जैसे ही इसका मालूम लोगों को चला अखबार के डिजिटल साइट से इसे हटा लिया गया।

भारत में पेड न्यूज

मीडिया जगत में पेड न्यूज का कॉन्सेप्ट 2009 के बाद आया। इसका मतलब होता है कि ऐसे विज्ञापन जो न्यूज की तरह हों। 2010 में प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने पाया कि इनसे न केवल पत्रकार बल्कि मीडिया संस्थानों को भी फायदा पहुँचता है। इसे राजनेताओं, संस्थानों, ब्रांड, मूवी और सेलिब्रिटियों द्वारा दिया जाता है। विकीपीडिया के अनुसार इस तरीके का दुरुपयोग बेनेट, कोलमैन एंड कंपनी लिमिटेड समूह द्वारा किया गया। दिलचस्प यह है कि यही संस्थान टाइम्स ऑफ इंडिया के प्रकाशन का मालिक है।

बता दें कि कई ऐसे मामले हैं जब मीडिया संस्थानों ने पेड न्यूज चलाई। ये काम प्रमुखता से यूपीए शासन में हुआ। 2009 से 2013 के बीच 17 राज्यों में चुनाव हुए और निर्वाचन आयोग ने 1400 से ज्यादा पेड न्यूज के मामले इस बीच रिपोर्ट किए।

‘AAP’ टैंकर भेजिए, मैं 20 MT ऑक्सीजन रोज दिल्ली भेजूँगा: हेमंत बिस्वा सरमा ने केजरीवाल को दिया विशेष ऑफर

असम के स्वास्थ्य, शिक्षा, वित्त और पीडब्ल्यूडी मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि वह दिल्ली को प्रतिदिन 20 मीट्रिक टन (MT) ऑक्सीजन दे सकते हैं अगर दिल्ली सरकार इसे लेने के लिए टैंकर भेजती है। असम के मंत्री ने आम आदमी पार्टी (AAP) के संस्थापक और पार्टी के राष्ट्रीय परिषद के सदस्य राजेश शर्मा को ट्विटर पर जवाब दिया। राजेश शर्मा असम में मंत्री हेमंत बिस्वा सरमा द्वारा किए गए ऑक्सीजन उपलब्धता के दावों को झूठा साबित करने की कोशिश कर रहे थे।

ट्विटर पर यह बहस तब शुरू हुई जब असम के एक AAP नेता ने डॉ. भाबेन चौधरी ने कहा कि गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में वैक्सीन उपलब्ध नहीं है। चौधरी ने आरोग्य सेतु ऐप का स्क्रीनशॉट पोस्ट किया और कहा कि यहाँ कोई वैक्सीन स्लॉट उपलब्ध नहीं है जबकि हेमंत बिस्वा सरमा ने दावा किया है कि वैक्सीन की 5 लाख खुराकें उपलब्ध हैं।

यह ट्वीट AAP संस्थापक तक पहुँच गया और उन्होंने कहा कि जबकि हेमंत बिस्वा सरमा ने असम में 5 ऑक्सीजन संयंत्रों की स्थापना के बारे में दावा किया है, असम के लोग एक ऑक्सीजन संयंत्र के बारे में नहीं जानते हैं। उन्होंने वैक्सीन पर असम AAP के नेता चौधरी के दावों को भी दोहराया और सरमा के ट्विटर हैंडल को टैग किया।

इस पर असम के स्वास्थ्य मंत्री हेमंत बिस्वा सरमा ने राज्य में स्थापित नए ऑक्सीजन संयंत्रों का विवरण दिया। उन्होंने कहा कि गुवाहाटी मेडिकल कॉलेज अस्पताल में 3 ऑक्सीजन संयंत्र, डिब्रूगढ़ में असम मेडिकल कॉलेज अस्पताल में 2, जोरहट मेडिकल कॉलेज अस्पताल में 2, और दिफु, तेजपुर और बरपेटा में मेडिकल कॉलेज अस्पतालों में एक-एक और महेंद्र मोहन चौधरी अस्पताल में 1 ऑक्सीजन संयंत्र स्थापित किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि समुगुरी, बोंगईगाँव और अमीनगाँव में 3 निजी क्षेत्र के ऑक्सीजन संयंत्र हैं।

सरमा ने शर्मा को चुनौती देते हुए कहा, “आप किस प्रकार का सबूत चाहते हैं? मुझे बताइए। कम से कम मैं अरविंद केजरीवाल नहीं हूँ।“

AAP नेता ने सोचा कि उन्हें असम के मंत्री के दावों को झूठा साबित करने का एक अवसर मिला है, क्योंकि सरमा केवल अस्पतालों में स्थापित PSA ऑक्सीजन जनरेटर के बारे में बात कर रहे थे। AAP नेता राजेश शर्मा ने कहा, “आप पिछले 20 वर्षों से असम के स्वास्थ्य मंत्री हैं। ये संयंत्र एंबुलेंस के ऑक्सीजन सिलेंडर को भी फिर से भरने में सक्षम नहीं हैं।“

हालाँकि,  राजेश शर्मा को गलत जानकारी दी गई थी क्योंकि भले ही भाजपा नेता ने असम में अस्पतालों में स्थापित नए PSA ऑक्सीजन संयंत्रों का उल्लेख किया था लेकिन तथ्य यह है कि असम में पहले से ही औद्योगिक ऑक्सीजन उत्पादक संयंत्र हैं जो लिक्विड ऑक्सीजन का उत्पादन करते हैं और कई अन्य संयंत्र अगले कुछ सप्ताह में स्थापित होने वाले हैं जिनसे सिलेंडरों में ऑक्सीजन को भरा जा सकता है। हेमंत बिस्वा सरमा ने कहा कि राज्य में वर्तमान माँग की तुलना में 42 मीट्रिक टन अधिक उत्पादन करने वाले 4 ऑक्सीजन संयंत्र हैं और वह 20 मीट्रिक टन ऑक्सीजन प्रतिदिन दिल्ली भेज सकते हैं। सरमा ने कहा, “आप अपने टैंकर भेजिए और मैं टैंकरों को फिर से ऑक्सीजन से भर दूँगा। यह मेरा वादा है।”

इस प्रस्ताव के बाद राजेश शर्मा ने बात बदल दी और जवाब दिया कि दिल्ली में क्रायोजेनिक टैंकर नहीं हैं क्योंकि यह एक औद्योगिक राज्य नहीं है। इसलिए उन्होंने सरमा से ही टैंकरों की व्यवस्था करने का अनुरोध किया और कहा कि यह दिल्ली के लोगों के लिए एक बड़ी मदद होगी।

हेमंत बिस्वा सरमा ने जब कहा कि वह अरविंद केजरीवाल नहीं हैं तो राजेश शर्मा ने कहा कि वह केजरीवाल हो भी नहीं सकते हैं, जिन्होंने केवल 7 वर्षों में दिल्ली में पूरी शिक्षा और स्वास्थ्य प्रणाली बदल दी। हेमंत बिस्वा सरमा ने मौजूदा Covid-19 स्थिति का हवाला देते हुए कहा कि दिल्ली के सीएम ने दिल्ली में किस तरह की क्रांति की है। सरमा ने कहा, ”हम असम में ऐसी क्रांति नहीं चाहते।“ उन्होंने राजेश शर्मा से कहा कि यदि उनमें साहस है वो असम की यात्रा करें और प्लांट्स को देखें।

AAP नेता ऑक्सीजन की स्थिति पर अन्य राज्यों पर राजनीति करने की कोशिश करते हैं लेकिन दिल्ली में ही अपने शासन में ऑक्सीजन की सबसे गंभीर कमी का सामना कर रहे हैं। असम सरकार ने यह सुनिश्चित करने के लिए कई कदम उठाए हैं कि Covid-19 मामलों के उपचार में पर्याप्त ऑक्सीजन उपलब्ध हो। असम में निजी क्षेत्र में चार मौजूदा ऑक्सीजन उत्पादन संयंत्र हैं और हाल के हफ्तों में राज्य सरकार ने कई अन्य संयंत्रों से ऑक्सीजन की आपूर्ति की व्यवस्था की है। अस्पतालों में PSA प्लांट लगाने के अलावा कुछ और ऑक्सीजन संयंत्रों को पुनर्जीवित किया जा रहा है जो सालों से उपयोग में नहीं थे।

असम सरकार ने दीमापुर में एक संयंत्र के साथ ऑक्सीजन की आपूर्ति के लिए एक समझौता किया है जो नागालैंड में कम माँग के कारण सप्ताह में केवल 2 दिन चल रहा था। अब संयंत्र सप्ताह में 7 दिन चलेगा और असम को 5 दिनों का ऑक्सीजन मिलेगा। इसके अलावा असम को भूटान के एक संयंत्र से 40 मीट्रिक टन ऑक्सीजन भी मिलेगी जो असम और भूटान की दो निजी कंपनियों द्वारा स्थापित की जा रही है। भूटान में लॉकडाउन के कारण संयंत्र पर काम ठप था लेकिन असम सरकार के अनुरोध पर विदेश मंत्रालय के भूटान सरकार से बात करने के बाद यह संयंत्र फिर से शुरू कर दिया गया।

लाशों के सहारे पोस्ट लिखते रहने की फेसबुकी रवीश कुमार की उम्मीद!  

रवीश कुमार उम्मीद से हैं। उन्होंने अपने एक फेसबुक पोस्ट में लिखा; उम्मीद है आपमें से कोई आईपीएल नहीं देख रहा होगा। इस वक़्त इससे अश्लील और क्या हो सकता है। इतना तो भरोसा कर ही सकता हूँ आप लोगों पर।

उम्मीद और रवीश कुमार का साथ चोली दामन का रहा है। यह बता पाना बहुत मुश्किल है कि उम्मीद रवीश कुमार से चिपकी पड़ी है या रवीश कुमार उम्मीद से। कहने का अर्थ कि; इस साथ में रवीश कुमार चोली हैं या दामन, यह शोध का विषय है। उनके इस फेसबुक पोस्ट से यह भी पता चला कि वे अपने फॉलोअर्स पर विश्वास भी करते हैं और इस विश्वास के तहत मानते हैं कि उनकी तरह ही उनके फॉलोअर्स भी एक क्रिकेट लीग को अश्लील समझते होंगे। मतलब एक ऐसा समानांतर ब्रह्मांड है, जिसमें एक सेलिब्रिटी एडिटर किसी खेल और उसके प्रसारण को न केवल खुद अश्लील समझता है बल्कि अपने फॉलोअर्स द्वारा भी उसे अश्लील समझने का विश्वास करता है। 
 
यह विश्वास की पराकाष्ठा है।   

हिसाब लगाया जाए तो रवीश कुमार लगभग ढाई दशकों से उम्मीद से हैं। कभी इस उम्मीद से तो कभी उस उम्मीद से। हाल यह है कि प्रसिद्ध मुहावरा; उम्मीद पर तो दुनिया कायम है को अब; उम्मीद पर तो रवीश कुमार कायम हैं, ने रिप्लेस कर दिया है। यह बात अलग है कि इतने वर्षों तक उम्मीद से रहने के बावजूद उन्होंने कभी खुद को उम्मीदवार घोषित नहीं किया। शायद इसीलिए उम्मीदवार बनने के महत्वपूर्ण काम के लिए उन्होंने अपने भाई से उम्मीद लगाई।   

ढाई दशकों तक उम्मीद से रहने का परिणाम यह हुआ है कि उनके उम्मीदों की लिस्ट लगातार बड़ी होती जा रही है। एक उम्मीद से बोर हो लेते हैं तो दूसरी उम्मीद चुन लेते हैं। दूसरी से बोर होते हैं तो तीसरी चुन लेते हैं। कभी किसी पुरानी उम्मीद से बोर नहीं होते तो नई उम्मीद खुद ब खुद आकर सामने खड़ी हो जाती है। मानो कह रही हो; मैं नई उम्मीद हूँ, अब इस पुरानी को छोड़कर मुझसे चिपक लो। रवीश उसे अपना लेते हैं और कुछ दिनों तक उसी से रहते हैं।

उनकी उम्मीदों की कैटेगरी भी तरह-तरह की हैं जैसे राजनीतिक उम्मीद, सामाजिक उम्मीद, धार्मिक उम्मीद, व्यक्तिवादी उम्मीद, कम्युनल उम्मीद, सेक्युलर उम्मीद, जातिवादी उम्मीद, घातवादी , फलित उम्मीद वगैरह वगैरह। समय और ग्रहों के प्रभाव में इनमें से कुछ को रवीश कुमार ने चुना और कुछ ने उन्हें चुन लिया। ऐसे ही चुनावी नतीजों के फलस्वरूप उम्मीद पर तो रवीश कुमार कायम हैं नामक मुहावरे का जन्म हुआ।
     
रवीश कुमार की यह उम्मीद यात्रा साल 2007 में शुरू हुई और अभी तक जारी है। उनकी पहली उम्मीद उस वर्ष गुजरात विधानसभा चुनावों के परिणाम स्वरूप कान्ग्रेस की जीत थी। यह बात अलग है कि उनकी केवल यह उम्मीद नहीं बल्कि उसके अगले तीन एडिशन भी बेकार गए। अपने अनुभव का फायदा उठाते हुए वे खुद को समय-समय पर नई उम्मीदों के साथ बाँधते गए और उम्मीद ने भी उनका साथ नहीं छोड़ा। हर दो-चार महीने में नई उम्मीदें आती गईं और रवीश उन्हें गले से लगाते रहे।  

राजनीतिक उम्मीद कैटेगरी के अलावा व्यक्तिवादी कैटेगरी वाली उनकी उम्मीदें भी उनसे खूब चिपकीं। परिणाम स्वरुप उन्होंने अरविन्द केजरीवाल से लेकर कन्हैया कुमार और उमर खालिद से लेकर अखिलेश यादव तक, हर किसी से उम्मीद लगाई। आगे जाकर राहुल गाँधी के प्रधानमंत्री बनने की उम्मीद से लेकर नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री न बनने की उम्मीद के बीच वे दीवार घड़ी के पेंडुलम की तरह झूलते रहे। उम्मीदें कम नहीं हुईं और रवीश कुमार उम्मीद से रहते गए। 

वे जिन सामाजिक उम्मीदों से रहे उनमें नोटबंदी के कारण जनता में विद्रोह की उम्मीद से लेकर दर्शकों द्वारा ढाई महीने टीवी न देखने की उम्मीद बहुत प्रसिद्ध हुई। कभी किसी की ‘जात’ जान लेने की उम्मीद ने तो उन्हें उम्मीदी ब्रह्मांड का चक्रवर्ती सम्राट बना दिया। इतने वर्षों की उम्मीद का असर है कि आज वे उम्मीद में सफलता और असफलता को नहीं देखते। सफलता मिली तो इसी उम्मीद से रहो और असफलता मिले तो कोई नई उम्मीद चुन लो जैसे दर्शन ने उन्हें उम्मीद के इस धंधे में टिकाए रखा।   

आज वे फिर उम्मीद से हैं। उन्हें उम्मीद है कि कोरोना की जिस दूसरी लहर ने उन्हें लखनऊ को लाशनऊ लिखने के लिए प्रेरित किया वह लहर कभी भारत से जाएगी ही नहीं। और ऐसा हुआ तो न केवल जलती लाशों को आगे रखकर फेसबुक पोस्ट में क्रिएटिविटी दिखाने की उम्मीद बनी रहेगी बल्कि वे फॉलोअर्स द्वारा आईपीएल को न देखने टाइप उम्मीद से भी रह सकते हैं।