Home Blog Page 3866

मधुबनी: धरोहर नाथ मंदिर में सोए दो साधुओं का गला कुदाल से काटा, ‘लव जिहाद’ का विरोध करने वाले महंत के आश्रम पर हमला

बिहार के मधुबनी जिला स्थित खिरहर गाँव में 2 साधुओं की गले पर वार कर हत्या कर दी गई है। दोनों गाँव के ही ‘धरोहर नाथ मंदिर’ में कई साल से रह रहे थे। मंगलवार (अप्रैल 20, 2021) की रात जब दोनों गहरी नींद में थे, तभी कुदाल से काट कर उनका सिर धड़ से अलग कर दिया गया। ग्रामीणों का कहना है कि दोनों ही महात्मा वैरागी किस्म के थे और उन्हें छल-प्रपंच से कोई मतलब नहीं था। उनका स्वभाव भी मृदु था।

बता दें कि धरोहर नाथ मंदिर स्थानीय स्तर पर काफी प्रसिद्ध है और वहाँ विभिन्न मौकों पर पूजा-पाठ के भारी भीड़ उमड़ती है। दोनों साधु का शव पोस्टमॉर्टम के लिए मधुबनी सदर अस्पताल भेजा गया है। पुलिस ने अभी तक हत्या के कारणों के बारे में कुछ नहीं बताया है। जाँच चल रही है। दोनों साधुओं के साथ उनका एक सहायक भी रहता था, जिसकी जान बच गई। घटना की सूचना मिलते ही मौके पर ग्रामीणों की भीड़ इकट्ठी हो गई।

मृतक साधुओं में से एक का सिर कमरे में तो दूसरे का दीवार के बगल में पाया गया। साधुओं के धड़ों को भूँसे में छिपा दिया गया था। बिछावन और मच्छरदानी खून से लथपथ थे। एक पुजारी नारायण दास ने इस घटना की सूचना पुलिस को दी, जिन्हें पूछताछ के लिए थाने ले जाया गया। एक स्थानीय व्यक्ति का दावा है कि 4-5 की संख्या में हमलावर थे। ग्रामीणों ने कहा कि दहशत फैलाने और डर पैदा करने के लिए ऐसा किया गया।

एक ग्रामीण ने कहा कि साधु-महात्मा यहाँ नहीं रहें, इसीलिए उनकी हत्या कर दी गई। इनमें से एक पुजारी के बड़े भाई पास के ही बिसौली कुटी पर रहते हैं। घटनास्थल पर पुलिस मौजूद है और वो जाँच कर रही है। हमने इस मामले में पुलिस का पक्ष लेने के लिए खिरहर SHO से संपर्क किया, लेकिन उनका नंबर लगातार व्यस्त आ रहा था। एक स्थानीय पत्रकार ने बताया कि पुलिस पोस्टमॉर्टम के बाद ही कुछ कह सकेगी।

इलाके में पहले से ही तनाव का माहौल है, क्योंकि इससे पहले की रात बिसौली कुटी के महंत ब्रजमोहन दास के आश्रम पर भी हमला हुआ था। ऑपइंडिया से बात करते हुए महंत ने बताया कि उनकी थाना प्रभारी से ठीक से बात नहीं हो सकी है और वो आज रामनवमी की पूजा में व्यस्त हैं, इसीलिए अब तक लिखित शिकायत दर्ज नहीं कराई गई है। हालाँकि, उन्होंने थाने में जाकर पुलिस को इस घटना से अवगत करा दिया है।

महंत ने बताया कि सोमवार की रात उनका सहायक अपने कमरे में IPL का मैच देख रहा था, तभी खिड़की के पास से कुछ फुसफुसाहट की आवाज़ आई। जब उसने करीब जाकर सुना तो बिजली काटने की बातें की जा रही थी। इसके कुछ देर बाद ही अचानक से मठ परिसर की बिजली गुल हो गई। फिर उसके मन में कुछ खटका और उसने बाहर निकल कर देखा तो गाँव में अन्य जगह बिजली थी।

खिरहर में पुजारियों की हत्या, तस्वीरें विचलित कर सकती हैं (वीडियो साभार: हरलाखी न्यूज़)

उसने महंत को आकर सारी बातें बताईं, जिन्होंने तुरंत थाने में फोन कॉल कर के खुद पर खतरा होने की जानकारी दी। साथ ही कुछ ग्रामीणों को भी सूचित किया। वो बताते हैं कि जब उन्होंने बाहर निकल कर देखा तो कुछ लोग कपड़ा मुँह पर बाँधे हुए खड़े थे। मठ के अंदर से आत्मरक्षा के लिए इन लोगों ने कुछ चीजें बाहर फेंकी, जिसके बाद वे लोग पीछे हट गए। तब तक कुछ ग्रामीण जुटे और शोर मचाने लगे।

बिसौली कुटी के महंत इलाके में ‘लव जिहाद’ और इस्लामी कट्टरपंथ के मामलों के खिलाफ आवाज उठाने के लिए जाने जाते हैं। इसी साल मार्च में खिरहर थाना क्षेत्र के ही बालाराही शोएब नाम के एक युवक पर नाबालिग हिन्दू लड़की के अपहरण का आरोप लगा था। सितम्बर 2020 में ऐसे ही एक मामले में राष्ट्रीय बाल आयोग को संज्ञान लेना पड़ा था। इन सब मामलों को लेकर वे काफी मुखर रहे थे।

पाकिस्तानी फ्री होकर रहें, इसलिए रेप की गईं बच्चियाँ चुप रहें: महिला सांसद नाज शाह के कारण 60 साल के बुजुर्ग जेल में

इंग्लैंड में एक सांसद हैं, नाम है नाज शाह। पाकिस्तानी मूल की हैं। इन्हें रिटायर हो चुके एक नर्स ने नस्लवादी चिट्ठी लिखी थी। इस चिट्ठी के आधार पर अब 60 साल के इयान ब्राउन (नर्स) को वहाँ की अदालत ने सजा सुनाई है।

इयान ब्राउन ने सांसद नाज शाह को 11 अप्रैल 2020 को चिट्ठी भेजी थी। इसमें मुख्य तौर पर जबरन शादी, ऑनर किलिंग, ग्रूमिंग गैंग और महिला जननांग विकृति (FGM: female genital mutilation) के बारे में लिखा गया था। साथ ही सांसद नाज शाह पर तंज कसते हुए यह भी लिखा था कि ग्रूमिंग गैंग के शिकार लोग आपकी (सासंद की) नियुक्ति पर खुश होंगे।

पाकिस्तानी मूल की सांसद नाज शाह ने इस चिट्ठी के कंटेंट को नस्लीय मानते हुए पुलिस में शिकायत दी थीं। कोर्ट में सुनवाई हुई। इस दौरान हालाँकि नर्स इयान ब्राउन ने चिट्ठी की बातों को नस्लीय मानने से इनकार किया। उन्होंने इतना ही स्वीकार किया कि ग्रूमिंग गैंग (पाकिस्तानी मूल के) ने जिन सैकड़ों-हजारों बच्चे-बच्चियों के यौन शोषण, हत्या, अपहरण आदि किए, उसके गुस्से के कारण सांसद को पत्र लिखा गया।

वेस्टमिन्सटर मैजिस्ट्रेट कोर्ट ने नर्स इयान ब्राउन की बातों को नकारते हुए भेजी गई चिट्ठी को नस्लीय ही माना और सजा सुनाई। ब्राउन को 6 सप्ताह की सजा, 24 महीने का सस्पेंशन और अगले 6 महीने तक सांसद नाज शाह से संपर्क नहीं करने का आदेश सुनाया गया।

नाज शाह, ग्रूमिंग गैंग और 2017

बात 2017 के अगस्त की है। ओवेन जोन्स नाम का एक पैरोडी अकाउंट था ट्विटर पर। उसने लिखा था – विविधता (विभिन्न नस्लों, देशों के लोगों के एकसाथ रहने) की भलाई के लिए… रोटरहैम और अन्य जगहों पर जिन लड़कियों का यौन शोषण हुआ, उन्हें अपना मुँह बंद रखने की जरूरत है। नाज शाह तब भी सांसद थीं। उन्होंने न सिर्फ इस ट्वीट को लाइक किया था बल्कि इसे रिट्वीट भी किया था। बवाल के बाद ट्वीट डिलीट करना पड़ा था नाज शाह को।

महिला सांसद के विचार

इन सबके पीछे एक कहानी थी। कहानी पाकिस्तानी कनेक्शन की। ग्रूमिंग गैंग (ऐसा गिरोह, जो 13-16 साल की लड़कियों को प्याप में फँसाता, रेप करता, देह-व्यापार में धकेलता या मर्डर कर देता) इंग्लैंड में पाकिस्तानियों का एक “अनजान लेकिन खौफनाक” समूह है। नाज शाह भी पाकिस्तानी मूल की है। रोटरहैम सेक्स स्कैंडल को लेकर एक सांसद साराह चैंपियन ने अपनी बात रखी थी। पीड़ितों को न्याय दिलाने और आरोपितों को सजा देने की बात कही गई थी।

पाकिस्तानी मूल की सांसद नाज शाह को यह बुरा लगा था। इतना बुरा कि खुद एक महिला होते हुए भी यौन शोषण पीड़ितों की न सोच कर उन्होंने आरोपितों के लिए लंबा-चौड़ा लेख लिख डाला था। नाज शाह के अनुसार ग्रूमिंग गैंग पर चर्चा करके बिना वजह पूरे पाकिस्तानी कम्युनिटी को बदनाम किया जाना है।

ग्रूमिंग गैंग: मौत नहीं रेप का आतंक

यह पूरे इंग्लैंड में फैला हुआ है। बहुत कम ऐसे शहर हैं, जहाँ पर यह गैंग सक्रिय नहीं। पिछले 40 साल में इंग्लैंड में कम से कम 5 लाख गैर-मुस्लिम (काफिर) लड़कियों के साथ मुस्लिम कट्टरपंथियों ने रेप किया है। रेप पीड़िता डॉ. एला हिल ने एक इंटरव्यू में इसका खुलासा किया था।

हिल ने कहा था, “इसका बहुत कुछ नस्ल और धर्म से लेना-देना है। लड़कियों की गोरी त्वचा हमेशा ग्रूमिंग गैंग से जुड़े मुस्लिम अपराधी के दिमाग में होती है। खुद डॉ. एला हिल की यातना अच्छे मुस्लिम और गैर मुस्लिम के विचारों से प्रेरित था। उनके मुस्लिम अपराधी (पाकिस्तानी मुस्लिम ब्वॉयफ्रेंड) का मानना था कि उनके साथ बलात्कार जायज है, क्योंकि वह सिर से पैर तक पूरी तरह से ढँकी नहीं थीं।

19000 बच्चे-बच्चियों का यौन शोषण सिर्फ 2018-19 में

2019 में इंग्लैंड में लगभग 19,000 नाबालिगों के साथ यौन ग्रूमिंग (sexual grooming) की वारदात को अंजाम दिया गया था। इंग्लैंड में स्थानीय प्रशासन ने 2018-19 में कुल 18,700 पीड़ितों की पहचान की थी, जिनकी संख्या पाँच साल पहले 3300 थी। नवीनतम आँकड़ों में पिछले 5 वर्षों में चाइल्ड ग्रूमिंग पीड़ितों की संख्या में तेज वृद्धि देखी गई।

इन सब आँकड़ों के बावजूद इंग्लैंड की न्यायिक व्यवस्था अब तक सख्ती (अज्ञात कारणों से) नहीं दिखा पा रहा। इसे आप इस खबर से समझिए। इंग्लैंड में रोशडेल चाइल्ड ग्रूमिंग गिरोह का सरगना कारी अब्दुल रऊफ अब आराम से सड़कों पर बेखौफ घूम रहा है। सजा के बाद अब वो फ्री है! वो भी तब जबकि उसकी सजा के अनुसार उसे 6 साल बाद निर्वासित किया जाना था… लेकिन अभी तक नहीं किया गया।

अब्दुल या डॉ. एला हिल के पाकिस्तानी मुस्लिम ब्वॉयफ्रेंड जैसों के साथ क्यों न्यायिक सख्ती की जानी चाहिए, इसे समझिए। अब्दुल ने एक बच्चे के साथ तब जबरन सेक्स किया, जब वो खुद 3 बच्चों का बाप था। फिर मानव तस्करी भी की। डॉ. हिल का पाकिस्तानी ब्वॉयफ्रेंड प्यार का नाटक करके बार-बार रेप करता है, सिर्फ इसलिए क्योंकि वो ‘मुसलमान जैसी नहीं’ है।

पाकिस्तान की बदनामी, विविधता बचाना, सांसद को तकलीफ या बच्चियों को न्याय?

नाज शाह सांसद हों या पाकिस्तानी मूल की या एकदम अंग्रेज… इस पर बहस हो सकती है लेकिन वह एक औरत हैं, यह अकाट्य सत्य है। आश्चर्य इस बात का है कि एक औरत यह कैसे कह सकती है कि जिन बच्चे-बच्चियों का यौन शोषण हुआ है, वो चुप हो जाएँ क्योंकि देश में विविधता को बचाना है। सभ्य समाज की पूरी नींव ही न्याय पर आधारित है। जो ताकतवर है, उसी को ध्यान में रख कर फैसले सुनाने वाला समाज जंगलों में रहता था। सांसद नाज शाह तो इंग्लैंड के शहर में रहती हैं, फिर जंगली मानसिकता क्यों? उनकी सोच का कनेक्शन इस्लामी कट्टरपंथ से तो नहीं!

इस्लामी कट्टरपंथी सोच से प्रभावित नहीं हैं नाज शाह तो एक चिट्ठी (गुस्से से भरी, नस्लीय ही सही) से इतनी नाराजगी क्यों? क्यों किसी 60 साल के बुजुर्ग के लिए इतनी नफरत कि वो सलाखों के पीछे पहुँचा दिए जाएँ? क्षमा शोभती उस भुजंग को… ओह, दिनकर की यह कविता पाकिस्तानी आसमानी किताब वाली सांसद कहाँ पढ़ी होंगी!

विकास दुबे की गाड़ी पलटी ही थीः न्यायिक जाँच में UP पुलिस को क्लीनचिट, मीडिया के रवैए पर उठाए सवाल

विकास दुबे के एनकाउंटर में न्यायिक जाँच आयोग ने उत्तर प्रदेश पुलिस को क्लीनचिट देते हुए मीडिया के रवैए पर सवाल उठाए हैं। रिटायर्ड जस्टिस बीएस चौहान की अगुवाई वाली कमेटी ने अपनी रिपोर्ट यूपी सरकार को सौंप दी है। एनकाउंटर की जाँच के लिए कमेटी बनाने के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने भी मुहर लगाई थी।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार जस्टिस बीएस चौहान जाँच आयोग को गैंगस्टर विकास दुबे और उसके पाँच साथियों के एनकाउंटर में उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा कोई गलत काम करने सबूत नहीं मिला है। न्यायिक जाँच में मुठभेड़ को सही माना गया है।

बता दें कि पिछले साल बिकरू गाँव में विकास दुबे और उसके साथियों द्वारा यूपी पुलिस के एक DSP और कई जवानों को गोलियों से भून दिया गया था, जिसके बाद मध्य प्रदेश से यूपी लाए जाते वक्त विकास दुबे का एनकाउंटर हुआ था। यूपी सरकार ने पिछले साल ही इस मामले की जाँच के लिए सुप्रीम कोर्ट के जज बीएस चौहान के नेतृत्व में कमीशन का गठन किया, जिसमें इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज शशिकांत अग्रवाल और पूर्व डीजीपी केएल गुप्ता शामिल थे।

आयोग ने स्वतंत्र गवाहों की आठ महीने की गहन खोज के बाद सोमवार (अप्रैल 19, 2021) को यूपी सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी। रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट को फाइल किए जाने की प्रक्रिया चल रही है। एक सूत्र ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया, “जाँच के दौरान कोई भी ऐसा गवाह सामने नहीं आया, जो मुठभेड़ के पुलिस से अलग कुछ जानकारी दे सके। इस केस में पुलिस के खिलाफ कोई सबूत नहीं है।”

बता दें कि आयोग द्वारा समाचार पत्रों में बार-बार विज्ञापन देने के बावजूद मीडिया कर्मियों सहित ऐसा कोई भी व्यक्ति पैनल के सामने पेश नहीं हुआ, जिसने मुठभेड़ को फर्जी बताया था। आयोग ने मुठभेड़ स्थलों के पास के गाँवों में पर्चे भी बाँटे थे, जिसमें लोगों से घटनाओं का वर्णन करने का अनुरोध किया गया था। सूत्रों ने बताया कि कई ऐसे स्वतंत्र गवाह सामने आए जिन्होंने पुलिस के वर्जन को सपोर्ट किया

न्यायमूर्ति चौहान आयोग ने अपनी 130 पृष्ठों की रिपोर्ट में कहा है कि जाँच के दौरान दल ने मुठभेड़ स्थल का निरीक्षण करने के साथ ही बिकरू गाँव का भी दौरा दिया। मुठभेड़ करने वाली पुलिस टीम के सदस्यों के बयान लेने का प्रयास करने के साथ मौके पर मौजूद लोगों तथा मीडिया से बात की। जाँच कमेटी ने विकास दुबे की पत्नी, रिश्तेदारों और गाँव के लोगों को भी बयान के लिए बुलाया, लेकिन कोई भी आगे नहीं आया। न्यायमूर्ति चौहान ने कथित तौर पर घटनाओं के सबूत या फुटेज देने के लिए आगे नहीं आने के लिए मीडिया के व्यवहार को भी ‘काफी निराशाजनक’ बताया, जिन्होंने कथित फर्जी मुठभेड़ की कवरेज की थी।

गौरतलब है कि 2 जुलाई 2020 की रात कानपुर के बिकरु गाँव में आठ पुलिसकर्मियों की हत्या करने का आरोपित गैंगस्टर विकास दुबे (Vikas Dubey) 10 जुलाई 2020 की सुबह भागने की कोशिश करते हुए पुलिस एनकाउंटर में मारा गया था। उसे कानपुर लाते वक्त रास्ते में उत्तर प्रदेश एसटीएफ के काफिले की गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी। गाड़ी पलटने के बाद विकास दुबे ने घायल यूपी एसटीएफ के पुलिसकर्मियों की पिस्टल छीनकर भागने की कोशिश की। जवाबी फायरिंग में गोली लगने से बुरी तरह घायल विकास दुबे की मौत हो गई थी।

रवीश और बरखा की लाश पत्रकारिताः निशाने पर धर्म और श्मशान, ‘सर तन से जुदा’ रैलियाँ और कब्रिस्तान नदारद

रवीश कुमार ने पिछले दिनों एक फ़ेसबुक पोस्ट लिखा। शीर्षक है: लखनऊ बन गया है लाशनऊ, धर्म का नशा बेचने वाले लोगों को मरता छोड़ गए।

ये कैसी घटिया क्रिएटिविटी है जो भारत के सैकड़ों शहर में से एक को चुनकर उसके साथ लाश को जोड़ने की कोशिश कर रही है! अचानक लग रहा है जैसे पत्रकारों को लाश से प्यार हो गया है। बरखा दत्त श्मशान में बैठकर रिपोर्टिंग कर रही हैं। रवीश कुमार लखनऊ को लाशनऊ बता रहे हैं। एक अख़बार के संवाददाता भोपाल के एक श्मशान में जलती लाशों के बीच खड़े होकर फ़ोटो खिंचवा कर अपनी रिपोर्ट के साथ लगा दिया।

इन तीनों पत्रकारों के बीच कॉमन क्या है? पत्रकारिता? नहीं। कॉमन यह है कि ये तीनों भाजपा शासित राज्यों में जलने वाली लाशों को दिखा रहे हैं। जीवन भर दिल्ली में रहकर पत्रकारिता करने वाली बरखा दत्त को जलती लाशों के बीच बैठ कर रिपोर्टिंग करने के लिए गुजरात जाना पड़ा। दिल्ली से ही दशकों तक पत्रकारिता में लिप्त रहने वाले रवीश कुमार भी लाशों की बात करने के लिए लखनऊ को चुनते हैं!

इस बात को लेकर मतभेद हो ही नहीं सकता कि कोरोना की दूसरी लहर बहुत तेज है और उसकी वजह से अधिकतर प्रदेशों की स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गई है। पर क्या ऐसी महामारी में रिपोर्टिंग की शुरुआत और उसका अंत केवल श्मशान में जल रही लाशों के बीच ही हो सकता है? स्वास्थ्य व्यवस्था की कमियाँ, सरकार की योजनाओं में ख़ामी और नेतृत्व की अक्षमता जैसे विषय पर चर्चा पत्रकारिता के मानदंडों पर खरे नहीं उतरते?

इतनी बड़ी महामारी के इतने व्यापक स्तर पर दुष्प्रभाव को दुनिया ने पिछले सौ वर्षों में नहीं देखा है। यह जगज़ाहिर है कि इस समय रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकारों ने पिछली सबसे बड़ी महामारी नहीं देखी है कि उसको आधार बनाकर रिपोर्टिंग करें और तय कर सकें कि किन बिंदुओं पर नहीं बोलना है, पर पत्रकारिता के मानदंड तो पढ़े होंगे? स्थापित मान्यताओं की भनक कभी न कभी तो लगी होगी? पत्रकार अपनी-अपनी शैली ख़ुद बनाते हैं और उस पर गर्व भी करते हैं पर ऐसा क्या है कि अपनी अलग-अलग शैली पर गर्व करने वाले पत्रकार केवल लाशों पर या लाशों के बीच रहकर रिपोर्टिंग कर रहे हैं?

सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था, नेतृत्व की कमियाँ और ढीले तंत्र के कारण होने वाले नुक़सान पर बहस या रिपोर्टिंग क्या इसलिए नहीं हो सकती क्योंकि वह मेहनत का काम है? क्योंकि इन विषयों पर ठोस बात करने के लिए पहले मुद्दों को समझने की आवश्यकता होगी और पत्रकारिता के अपने जीवन में शॉर्टकट लेकर पगडंडियों पर चलने वाले इन पत्रकारों को सीधे रास्ते जाने में पसीने छूट जाते हैं?

रवीश कुमार अपने फेसबुक पोस्ट में उत्तर प्रदेश के नेताओं पर केवल धर्म की राजनीति करने का आरोप बार-बार लगाते हैं। रवीश कुमार मार्का पत्रकारिता के लिए इन आरोपों का बार-बार इस्तेमाल कोई नई बात नहीं है पर जब वे ऐसी बात करते हैं तब यह बताना ज़रूरी नहीं समझते कि मुख्यमंत्री के अपने कार्यकाल में योगी आदित्यनाथ ने धर्म की राजनीति कब और कहाँ की? शायद वे योगी जी द्वारा पूजा-पाठ करने को धर्म की राजनीति कहते हैं। योगी जी ने कई बार कहा है कि चूँकि वे एक हिंदू हैं, ऐसे में धार्मिक आचरण करते हुए दिखने में उन्हें कोई संकोच नहीं है। एक हिंदू द्वारा पूजा-अर्चना करना धर्म की राजनीति कैसे हो गई?

रवीश कुमार जैसे पत्रकार इस बात पर कभी नहीं लिखेंगे और न ही चर्चा करेंगे कि अभी पिछले वर्ष जब दिल्ली के ‘मालिक’ अपने राजनीतिक हथकंडों का इस्तेमाल कर जब प्रवासी मज़दूरों को उत्तर प्रदेश की सीमा पर छोड़ आए थे, तब इन्हीं योगी आदित्यनाथ ने उन मज़दूरों के लिए सारी सुविधाएँ मुहैया करवाईं थी और लाखों मज़दूरों को उनके घर तक पहुँचाया था। उत्तर प्रदेश के इन्हीं मुख्यमंत्री ने सीमित संसाधनों के बावजूद दिन-रात काम करके प्रदेश में कोरोना की पहली लहर को क़ाबू में किया था। इसके ठीक उलट कॉन्ग्रेस शासित राज्यों में पूरे साल भर में कोरोना को कभी क़ाबू में किया ही नहीं जा सका पर शायद उस पर बात करना रवीश कुमार के एजेंडा में फिट नहीं बैठता।

रवीश कुमार का फेसबुक पोस्ट

योगी आदित्यनाथ पर धर्म की राजनीति करने का आरोप लगाने वाले यह नहीं बताते कि उन्होंने किस तरह पूर्वी उत्तर प्रदेश में जापानी बुख़ार को न केवल क़ाबू में किया पर उनके प्रयासों की सराहना दुनिया भर में हुई। रवीश कुमार योगी आदित्यनाथ के लिए कहते हैं कि उनका दूर-दूर तक विज्ञान से कोई नाता नहीं हैं। हम उस काल के नागरिक हैं जिसमें एजेंडावाहक पत्रकार फ़ैसला सुनाते हैं कि यदि कोई मुख्यमंत्री भगवा धारण करता है तो उसका विज्ञान से कभी कोई नाता नहीं हो सकता। यह कहते हुए रवीश कुमार को याद नहीं रहता कि योगी आदित्यनाथ विज्ञान के ही स्नातक हैं। ऐसे में यह कैसे हो सकता है कि वे विज्ञान से दूर रहेंगे? ये पत्रकार भूल जाते हैं कि इन्हीं योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश जीडीपी की रैंकिंग में देश का दूसरा राज्य बना। केवल धर्म के लिए काम करने वाला कौन मुख्यमंत्री अपने प्रदेश के लिए ये काम कर सकता है?

एक बात यह ध्यान देने लायक़ यह है कि जबसे कोरोना की दूसरी लहर आई है तब से एजेंडावाहक इन पत्रकारों ने धर्म को निशाने पर ले रखा है। कभी तेजी से फैल रहे संक्रमण के लिए हरिद्वार कुंभ को ज़िम्मेदार बताया जाता है तो कभी भाजपा द्वारा धर्म की राजनीति करने को। यह किसी से छिपी बात नहीं है कि पिछले दो दशकों में इन पत्रकारों की सोच कहाँ से शुरू होकर कहाँ खत्म होती है पर ऐसी भी क्या मजबूरी की इन्हें और कुछ दिखाई नहीं देता? क्यों इन्हें ‘सर तन से जुदा’ वाली रैलियाँ दिखाई नहीं देतीं? क्यों रिपोर्टिंग के लिए इन्हें हिंदुओं का श्मशान ही मिलता है? क्यों ये क़ब्रिस्तान के बीच इसी तरह से बैठकर रिपोर्टिंग नहीं कर सकते?

ऐसे में इसे क्या कहें? लाश की पत्रकारिता या पत्रकारिता की लाश?

‘दिल्ली में बेड और ऑक्सीजन पर्याप्त, लॉकडाउन के आसार नहीं’: NDTV पर दावा करने के बाद CM केजरीवाल ने टेके घुटने

हाल ही में एक आरटीआई से यह बात सामने आई थी कि 2015-19 के बीच दिल्ली में आम आदमी पार्टी (AAP) की सरकार ने कोई नया अस्पताल नहीं बनाया। जैसा कि हम जानते हैं 2020 में पूरी दुनिया कोरोना संक्रमण की चपेट में आ गई। 20 अप्रैल 2021 को ही दिल्ली हाई कोर्ट ने माना कि बीते साल लॉकडाउन के दौरान आप सरकार प्रवासी और दिहाड़ी मजदूरों को मदद पहुँचाने में नाकाम रही। हमने यह भी देखा है कि पिछले साल संक्रमण की शुरुआत में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल रोजाना प्रेस कॉन्फ्रेंस कर बड़े-बड़े दावे करते रहे और दिल्ली में हालात बदतर होते रहे। आखिर में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को मोर्चा सँभालना पड़ा था और उसके बाद हालात काबू में आए थे।

अब एक बार फिर से दिल्ली में वही सब दोहराया जा रहा है। मात्र एक सप्ताह में काफी कुछ बदल गया है। AAP सरकार की भाषा बदल गई है। राज्य में कोरोना के कारण हाहाकार की स्थिति है। नेताओं के सुर बदल गए हैं। 20 अप्रैल को दिल्ली के अस्पतालों में ऑक्सीजन की किल्लत को लेकर केजरीवाल ने ट्वीट किया, जबकि ज्यादा दिन नहीं बीते जब वे दिल्ली के अस्पतालों में बेड खाली होने और पर्याप्त ऑक्सीजन होने के दावे कर रहे थे। इसके बाद संक्रमण चेन तोड़ने के नाम पर वे पहले नाइट कर्फ्यू लेकर आए। उसके बाद वीकेंड कर्फ्यू और अब 26 अप्रैल की सुबह 5 बजे तक का लॉकडाउन। लॉकडाउन के ऐलान के बाद घर वापसी के लिए प्रवासी मजदूरों की पिछले साल जैसी होड़ ही देखने को मिली। और अब अस्पताल भी उसी पुराने संकट से जूझ रहे हैं, लेकिन केजरीवाल सरकार क्रेडिट लेने का कोई मौका चूक नहीं रही।

ऐसे में एक सप्ताह पहले मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जो बातें कही थीं, वो सुनने लायक है। तब दिल्ली में सब ठीक होने का दावा करने वाले AAP सुप्रीमो ने अब हॉस्पिटल बेड्स और ऑक्सीजन सप्लाई की जिम्मेदारी केंद्र सरकार पर डाल कर खुद को ट्वीट करने तक ही सीमित रखा है।

अप्रैल 15, 2021 को उन्होंने NDTV को दिए गए इंटरव्यू में दावा किया था कि दिल्ली में 500 के करीब ICU उपलब्ध हैं और दिल्ली सरकार के एप पर जाकर देखा जा सकता है कि किस अस्पताल में कितने बेड्स उपलब्ध हैं। उन्होंने तब 5000 बेड्स उपलब्ध होने की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि कुछ ही अस्पतालों में बेड ख़त्म हुए हैं, दिल्ली में नहीं। उन्होंने स्थिति के दैनिक मॉनिटरिंग की बात करते हुए कहा था कि वे लॉकडाउन के खिलाफ हैं।

दिल्ली सरकार के एप की अब क्या हालत है, ये छिपी नहीं है। केजरीवाल के दावों के बाद जब एप पर चेक कर अस्पतालों को फोन कॉल किया गया तो स्थिति कुछ और ही निकली। जिन अस्पतालों में एप पर दर्जनों बेड्स खाली दिख रहे थे, वहाँ से कहा गया कि यहाँ एक भी मरीज को भर्ती करने लायक जगह नहीं है। कहीं-कहीं कहा गया कि स्थिति पल-पल बदलती रहती है। फिर उस एप का फायदा ही क्या?

केजरीवाल ने एक सप्ताह पहले कहा था कि ऑक्सीजन या बेड्स की कमी से लोगों की मौत की स्थिति दिल्ली में वो नहीं आने देंगे। लॉकडाउन लगाने की स्थिति उन्हें नजर नहीं आ रही। ध्यान देने वाली बात ये है कि इस इंटरव्यू के अगले ही हफ्ते दिल्ली में पूर्ण लॉकडाउन लगा दिया गया।

दिल्ली में पिछले 1 दिन में कोरोना के 28,395 नए मामले सामने आए हैं, जबकि केजरीवाल ने जिस दिन ये बयान दिए थे तब ये आँकड़ा 17,000 के करीब था। उस दिन जहाँ कोरोना ने 115 लोगों की जान ली है, पिछले 1 दिन में ये आँकड़ा लगभग ढाई गुना बढ़ कर 277 हो गया है। हाँ, उलटा टीकाकरण की संख्या में कमी आई है। पिछले 1 दिन में जिनका भी टेस्ट किया गया, उनमें से एक तिहाई कोरोना संक्रमित निकले हैं।

अब उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया कह रहे हैं कि ऑक्सीजन को लेकर सब अस्पतालों से SOS फ़ोन आ रहे हैं और सप्लाई करने वाले लोगों को अलग-अलग राज्यों में रोक दिया जा रहा है। उन्होंने कहा कि ऑक्सीजन की सप्लाई को लेकर राज्यों के बीच जंगलराज न हो, इसके लिए केंद्र सरकार को बेहद संवेदनशील और सक्रिय रहना होगा। केजरीवाल कह रहे हैं कि दिल्ली में कुछ ही घंटों का ऑक्सीजन बचा है।

जहाँ पहले ऑक्सीजन और बेड्स की कमी वाली स्थिति न आने की बातें इन्हीं लोगों द्वारा की जा रही थी, अब दूसरे राज्यों पर दोष मढ़ने से पहले AAP को उन किसान प्रदर्शनकारियों की निंदा करनी चाहिए, जिनकी वजह से ऑक्सीजन की सप्लाई रुक रही है। सप्लायर कंपनी ने स्पष्ट कहा है कि सीमा पर बैठे किसान आंदोलनकारियों की वजह से घंटों की देरी हो रही, क्योंकि 100 किलोमीटर ज्यादा चक्कर काटने पड़ रहे।

एक सप्ताह पहले दिल्ली के मुख्यमंत्री ने कहा था, “दिल्ली के अस्पतालों में इस वक्त पर्याप्त बेड्स मौजूद हैं। जनता से मेरी अपील है कि घबराएँ नहीं, हो सकता है कि किसी को उसकी पसंद का अस्पताल शायद ना मिले लेकिन किसी और अस्पताल में बेड और इलाज ज़रूर मिलेगा।” अब दिल्ली में न बेड है और न ऑक्सीजन। केंद्र से ऑक्सीजन माँगी जा रही है। क्या सरकार एक सप्ताह आगे का भी अनुमान नहीं लगा सकी?

रेप में नाकाम रहने पर शकील ने बेटी को कर दिया गंजा, जैसे ही बीवी पढ़ने लगती नमाज शुरू कर देता था गंदी हरकतें

उत्तर प्रदेश के मेरठ से रिश्तों को शर्मसार करने वाला मामला सामने आया है। यहाँ एक अब्बू ने ही अपनी बेटी के साथ दुष्कर्म का प्रयास किया और विफल होने पर उसने अपनी बेटी की चोटी कैंची से काटने के बाद उसे उस्तरे से गंजा कर डाला। अब्बू की हदें पार होने के बाद बेटी ने 112 नंबर पर कॉल कर पुलिस को सूचना दी। पुलिस ने आरोपित अब्बू शकील को हिरासत में ले लिया है।

मामला थामा लिसाड़ी गेट क्षेत्र के लक्खीपुरा गली नंबर 26 का है। 20 वर्षीय पीड़िता ने बताया कि उसका अब्बू उस पर गंदी निगाह रखता था। कई बार उसके साथ दुष्कर्म करने का प्रयास किया। पीड़िता के अनुसार जब भी उसकी अम्मी नमाज पढ़ने लगती, अब्बू नशे में धुत्त होकर उसके साथ गंदी हरकतें करता था। कथित तौर पर शकील पिछले 3 साल से बेटी के साथ गंदी हरकतें करता आ रहा था।

पीड़िता ने बताया कि घर की इज्जत को छुपाने के लिए उसने पहले किसी को कुछ नहीं बताया। लेकिन इस बार जैसे ही उसकी अम्मी नमाज पढ़ने गई तो अब्बू शकील नशे में धुत्त होकर उसके कमरे में घुस गया और दुष्कर्म का प्रयास करने लगा। इसके बाद बेटी ने शोर मचा दी और उसके चंगुल से छूटने की कोशिश की। लेकिन शकील ने उसको पकड़ लिया और गंजा कर दिया।

पीड़िता ने थाना लिसाड़ी गेट में अब्बू के खिलाफ दुष्कर्म का प्रयास करने की तहरीर दी। पुलिस ने आरोपित शकील को हिरासत में ले पीड़िता, उसकी अम्मी और मोहल्ले के लोगों के बयान दर्ज किए हैं और मेडिकल भी कराया है।

गौरतलब है कि पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के फतेहपुर थाना के एक गाँव में अपनी ही नाबालिग बेटी से अब्बू द्वारा दुष्कर्म करने का मामला सामने आया था। आरोपित अब्बू, गुलाम रसूल पिछले 1 साल से अपनी ही 16 साल की बेटी को हवस शिकार बनाया। लगातार दुष्कर्म के बाद जब उसकी बेटी गर्भवती हो गई तब मामले का खुलासा हुआ।

‘हाइवे पर किसान, ऑक्सीजन सप्लाई में परेशानी’: कोरोना के खिलाफ लड़ाई में AAP समर्थित आंदोलन ही दिल्ली का काल

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पिछले दो दिनों से कह रहे हैं कि ऑक्सीजन की भारी किल्लत है, जिससे हाहाकार मच सकता है। अब पता चल रहा है कि दिल्ली और उसके आसपास के इलाकों में चल रहे ‘किसान आंदोलन’ के कारण ऑक्सीजन की सप्लाई में देरी आ रही है। ये वही ‘किसान आंदोलन’ है, जिसे AAP ने समर्थन दिया हुआ है। अब वे सारी जिम्मेदारी केंद्र सरकार पर डालते दिख रहे हैं।

दिल्ली पुलिस ने एक ग्रीन कॉरिडोर बनाया था, जिसके तहत ‘श्री बालाजी एक्शन मेडिकल इंस्टिट्यूट’ तक ऑक्सीजन की सप्लाई तेज़ी से और निर्बाध रूप से हो सके। इस अस्पताल में ऑक्सीजन की किल्लत नाजुक स्तर पर पहुँच गई थी। 19,500 लीटर के दो लिक्विड ऑक्सीजन सिलिंडरों को उत्तर प्रदेश और हरियाणा की सीमाओं से लाने के लिए सोमवार (अप्रैल 19, 2021) की रात डेडिकेटेड कॉरिडोर बनाया गया था।

पुलिस ने बताया था कि दोनों की राज्यों से लगी सीमाओं पर ट्रैफिक जाम के कारण ऑक्सीजन के सिलिंडर अटके रहे, वहीं अब सप्लायर्स ने एक पत्र में कुछ अलग ही कारण बताया है। उसने कहा है कि आंदोलनरत किसानों के कारण ऑक्सीजन की सप्लाई में बाधा आई। ये पत्र ‘आइनॉक्स एयर प्रोडक्ट्स’ ने लिखा है, जो केंद्र सरकार को ऑक्सीजन की सप्लाई करती है। उनके प्लांट्स राजस्थान और उत्तर प्रदेश में स्थित हैं।

कंपनी ने कहा है कि आंदोलनकारियों ने हाइवे को ब्लॉक कर रखा हुआ है, जिससे सप्लाई में परेशानी आ रही है। पश्चिम विहार स्थित बालाजी अस्पताल में लगभग ऑक्सीजन ख़त्म ही होने वाला था, लेकिन दिल्ली-यूपी सीमा पर गाजीपुर स्थित NH24 पर किसानों का कब्ज़ा था, जिससे सप्लाई में 2 घंटे की देरी हुई। उत्तर प्रदेश के मोदीनगर से ऑक्सीजन की सप्लाई लेकर चल रही गाड़ियों को 100 किलोमीटर की अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ रही है।

कंपनी के पत्र में ये भी लिखा है कि इसके इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (IOC) फैसिलिटीज से ऑक्सीजन की सप्लाई भी ‘किसान आंदोलन’ की वजह से रुक रही है। भारत सरकार ने उससे कहा है कि वो पानीपत स्थित IOC की यूनिट से ऑक्सीजन लेकर दिल्ली पहुँचाए। लेकिन, बीच में सिंघु बॉर्डर पड़ता है, जहाँ किसान अब भी बैठे हुए हैं। इसलिए, कंपनी ने ऑक्सीजन ले जा रहे ट्रकों और ट्रांसपोर्ट्स के लिए ग्रीन कॉरिडोर्स बनाने की माँग की है।

सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने भी किसानों द्वारा सड़क जाम करने के मुद्दे पर सुनवाई करते हुए कहा कि वो किसी और के अधिकारों को नहीं छीन सकते और उनके आवागमन को बाधित नहीं कर सकते। जस्टिस संजय किशन कौल ने किसानों से कहा कि आप किसी नीति से सहमत नहीं हैं तो इसका मतलब ये नहीं कि दूसरों का रास्ता बंद कर दें। एक सिंगल माँ ने याचिका दायर कर के कहा था कि आंदोलन के कारण उसे दिल्ली से नोएडा के सफर में 20 मिनट की जगह 2 घंटे लगते थे।

‘जिस देश में गंगा रहता है’ फेम किशोर नांदलस्कर का कोरोना से निधन: ‘सन्नाटा’ को दर्शकों ने दिया था भरपूर प्यार

बॉलीवुड अभिनेता किशोर नंदलास्कर का कोरोना से मुबंई में निधन हो गया है। बताया जा रहा है कि कोरोनो संक्रमण के बाद उन्हें ठाणे के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहाँ उन्होंने मंगलवार (20 अप्रैल, 2021) को दोपहर करीब 12.30 बजे अंतिम साँस ली।

एबीपी न्यूज के मुताबिक, किशोर नांदलस्कर के‌ पोते अनीष ने उनकी मौत की जानकारी दी है। अनीष ने बताया कि उनके दादा को कोरोना पॉजिटिव आते ही ठाणे के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था। उन्हें कोविड सेंटर में भर्ती कराने से पहले साँस लेने में काफी दिक्कत हो रही थी। उनका ऑक्सीजन लेवल भी काफी गिर गया था। उन्होंने दोपहर 12:30 बजे आखिरी साँस ली थी। 

मालूम हो कि किशोर नंदलास्कर ने बॉलीवुड में वास्तव, सिम्बा, जिस देस में गंगा रहता है, खाकी और सिंघम जैसी तमाम फिल्मों में काम किया है। इसके अलावा मराठी फिल्म इंडस्ट्री में भी वह काफी मशहूर कलाकार थे।

उन्होंने 1989 में मराठी फिल्म ‘इना मीना डीका’ से फिल्म जगत में डेब्यू किया था। उन्होंने मराठी फिल्मों मिस यू मिस, भविष्याची ऐशी तैशी, गाव थोर पुढारी चोर, जरा जपुन करा, हैलो गंधे सर, मध्यममार्ग -द मिडिल क्लास जैसी कई फिल्मों में काम किया था। उनके निधन की खबर से बॉलीवुड और मराठी फिल्म जगत में शोक की लहर छा गई है।

बता दें कि किशोर को सबसे ज्यादा फेम अभिनेता गोविंदा की फ‍िल्‍म ‘जिस देश में गंगा रहता है’ से मिला। इस फिल्म में उन्होंने सन्‍नाटा का किरदार निभाया था, जिसे दर्शकों को खूब पसंद किया था।

रेमडेसिविर खेप को लेकर महाराष्ट्र के FDA मंत्री ने किया उद्धव सरकार को शर्मिंदा, कहा- ‘हमने दी थी बीजेपी को परमीशन’

महाराष्ट्र में रेमडेसिविर खेप को लेकर उद्धव ठाकरे सरकार के मंत्री ने बड़ा खुलासा किया है। राज्य के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (एफडीए) मंत्री राजेंद्र शिंगणे ने कहा कि उन्हें इसकी जानकारी थी कि रेमडेसिविर (Remdesivir) की 60,000 शीशियों को बीजेपी ने महाराष्ट्र सरकार के लिए मँगाया था।

मंगलवार (अप्रैल 20, 2021) को News18 लोकमत को दिए इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि बीजेपी के नेताओं ने दवा निर्माताओं के एक प्रनितिधिमंडल के साथ उनसे उनके घर में मुलाकात की थी। बीजेपी ने उनसे राज्य सरकार के लिए रेमडेसिविर स्टॉक खरीदने में मदद की पेशकश की और वो इसके लिए तैयार हो गए थे। पूरी प्रक्रिया सभी नियमों का पालन करते हुए लोगों की मदद करने के इरादे से की गई थी। इसके साथ ही उन्होंने महाविकास अघाड़ी को लेकर भी काफी कुछ बताया।

महाविकास अघाड़ी को और शर्मिंदा करते हुए राजेंद्र शिंगणे ने पुष्टि की कि ये इंजेक्शन किसी अन्य उद्देश्य के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। उन्हें भाजपा नेताओं ने भी इसके बारे में आश्वासन दिया था। उन्होंने राजनीतिक दलों से आरोप प्रत्यारोप लगाने की बजाय इस मुश्किल घड़ी में साथ आने का आग्रह किया।

दरअसल, एफडीए मंत्री के इस कबूलनामे से महाराष्ट्र की महाविकास अघाड़ी सहयोगियों शिवसेना-एनसीपी और कॉन्ग्रेस की काफी किरकिरी हुई है। दरअसल, शनिवार-रविवार की रात दमन से लाए जा रहे साठ हजार रेमडेसिविर इंजेक्शन की इस खेप को मुंबई पुलिस ने कालाबाजारी का स्टॉक समझकर जब्त कर लिया था। इतना ही नहीं कंपनी के एक अधिकारी को हिरासत में भी ले लिया गया था। रात भर चले ड्रामे के बाद अधिकारी को जाने दिया गया, लेकिन इस मामले को लेकर काफी हंगामा हुआ था।

राजेंद्र शिंगणे के स्पष्टीकरण के बाद महाराष्ट्र विधान परिषद में विपक्ष के नेता प्रवीण दरेकर ने कहा कि उन्होंने दवा निर्माताओं के एक प्रतिनिधिमंडल के साथ शिंगणे से मुलाकात की थी। उन्होंने कहा कि शिंगणे ने हमारे प्रयासों के लिए हमें धन्यवाद भी किया और हमने भी यह आश्वासन दिया कि इंजेक्शन की खुराक राज्य सरकार को दी जाएगी। दरेकर ने कहा कि अब एनसीपी के गृह मंत्री दिलीप पाटिल, अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री नवाब मलिक, शिवसेना सांसद संजय राउत, प्रदेश कॉन्ग्रेस प्रमुख नाना पटोले और प्रियंका गाँधी वाड्रा जैसे नेताओं को इस मामले में जवाब देना चाहिए।

गौरतलब है कि बीजेपी विधायक प्रसाद लाड ने सोमवार को कहा कि 60 हजार रेमडेसिविर इंजेक्शन की जिस खेप को कालाबाजारी का स्टॉक समझा जा रहा था, उस स्टॉक को बीजेपी महाराष्ट्र सरकार को देने के लिए खरीदने जा रही थी। लाड ने आगे यह भी कहा कि हमने एफडीए मंत्री राजेंद्र शिंगणे को एक पत्र लिखा था और दमन से फोन कर मुख्य सचिव सीताराम कुंटे को सूचित किया था कि बीजेपी राज्य में रेमडेसिविर इंजेक्शन लाने की कोशिश कर रही है। हमने राज्य सरकार को कंपनियों से सीधे संपर्क करके और रेमडेसिविर इंजेक्शन लेने का निवेदन भी किया था।

उन्होंने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जो कंपनी इंजेक्शन की आपूर्ति करके महाराष्ट्र सरकार की मदद कर रही थी, उसे पुलिस स्टेशन बुलाया गया और पूछताछ की गई। इस डर से कि बीजेपी को इसका श्रेय मिलेगा, महाविकास अघाड़ी के नेताओं ने इसे राजनीतिक रंग देने की भी कोशिश की। बीजेपी नेता जनता की भलाई के लिए किसी भी कार्रवाई का सामना करने के लिए तैयार है।

बता दें कि कॉन्‍ग्रेस समर्थक और बेबाकी से फेक न्यूज फैलाने में माहिर साकेत गोखले ने सोमवार (अप्रैल 19, 2021) को राज्य के गृह मंत्री दिलीप वालसे पाटिल के साथ मिलकर देवेंद्र फडणवीस के खिलाफ रेमडेसिविर स्टॉक की जमाखोरी को लेकर शिकायत दर्ज कराई है। इससे पहले गोखले ने बेबुनियाद ट्वीट्स की सीरीज में आरोप लगाया था कि भाजपा ने महाराष्ट्र में अपने पार्टी कार्यालय में 4.75 करोड़ रुपए की रेमडेसिविर (Remdesivir) की जमाखोरी की है।

गोखले ने यह आरोप मुंबई पुलिस द्वारा शनिवार को दमन स्थित ब्रुक फार्मा कंपनी के रेमडेसिविर सप्लायर को हिरासत में लेने और सवाल पूछे जाने के बाद लगाया था। बीजेपी की महाराष्ट्र इकाई ने कंपनी से रेमडेसिविर को महाराष्ट्र में लोगों को आपूर्ति करने का आदेश दिया था, लेकिन पुलिस ने कंपनी के डायरेक्टर को हिरासत में ले लिया था। हालाँकि, देवेंद्र फडणवीस द्वारा सवाल उठाए जाने के बाद उसे रिहा कर दिया गया। 

वैक्सीन लगवा चुके राकेश टिकैत ने कहा- अगर किसानों को कोरोना होता है, तो इसकी जिम्मेदार केंद्र सरकार होगी

दिल्ली में कोरोना वायरस के बढ़ते मामलों के बीच भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत ने कहा कि अगर दिल्ली की सीमाओं पर विरोध कर रहे किसान कोरोना वायरस से संक्रमित होते हैं, तो इसकी जिम्मेदार केंद्र सरकार की होगी। उन्होंने कहा कि किसान अपनी माँग पूरी हुए बिना किसी कीमत पर दिल्ली की सीमाओं से नहीं हटेंगे। राजधानी में 6 दिन का लॉकडाउन है, यह किसानों के विरोध प्रदर्शन को रोक नहीं सकता है। कोरोना वैक्सीन लगवा चुके टिकैत ने कहा कि यह केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है कि प्रदर्शन कर रहे किसानों को कोरोना वायरस से संक्रमित होने से कैसे बचाया जाए।

रिपब्लिक टीवी से बात करते हुए टिकैत ने कहा, “आंदोलन अगर खत्म हो जाए तो क्या देश से कोरोना खत्म हो जाएगा। वे हमारे गाँव हैं जहाँ हम 5 महीने से रह रहे हैं। अगर किसान कोरोना वायरस से संक्रमित होते हैं, तो इसकी पूरी जिम्मेदारी केंद्र सरकार की होगी। जब देश भर में COVID-19 के मामले बढ़ रहे हैं, तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? क्या इसके लिए भी किसान ही जिम्मेदार हैं?”

उन्होंने आगे कहा कि अगर कोई बीमारी है, तो सरकार को इसका इलाज सुनिश्चित करना चाहिए और इसके लिए अस्पतालों का निर्माण करना चाहिए। राजनेता अन्य उद्देश्यों के लिए धन एकत्र कर रहे हैं। वे रैलियाँ कर रहे हैं और चुनाव लड़ रहे हैं।

बीते दिनों किसान नेता राकेश टिकैत ने जम्मू जाने के दौरान कहा था कि कोरोना नियमों का पालन करते हुए आंदोलन को जारी रखा जाएगा। ये कोई शाहीन बाग नहीं है, जिसे कोरोना वायरस के नाम पर खत्म किया जा सकता है।

किसानों के विरोध प्रदर्शन की अगुवाई कर रहे हैं राकेश टिकैत ने आगे जोर देकर कहा कि कोरोनो वायरस के प्रकोप के कारण आंदोलन नहीं रुकना चाहिए। उन्होंने मंगलवार को दिल्ली-यूपी की सीमा के पास एक अस्पताल में वैक्सीन लगवाई है। इससे पहले टिकैत ने 13 अप्रैल को गाजीपुर बॉर्डर पर प्रदर्शन स्थल के पास स्थित एक अस्पताल में कोरोना वैक्सीन की पहली खुराक ली थी।

बता दें कि दिल्ली में लॉकडाउन लगने से पहले ही भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने ऐलान कर दिया था कि लॉकडाउन लगने के बावजूद बॉर्डर पर किसानों का प्रदर्शन नहीं थमेगा। रिपोर्ट्स के मुताबिक राकेश टिकैत का किसानों पर खासा प्रभाव है। यही वजह है कि किसान न तो तीनों कृषि कानूनों की अच्छाई समझ पा रहे हैं और न ही इस पर हो रही राजनीति की गहराई तक पहुँच सके हैं।