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बालाघाट में यति नरसिंहानंद के पोस्टर लगाए, अपशब्दों का इस्तेमाल: 4 की गिरफ्तारी पर भड़की ओवैसी की AIMIM

मध्य प्रदेश की बालाघाट पुलिस ने 9 अप्रैल को गाजियाबाद के डासना देवी मंदिर के महंत यति नरसिंहानंद सरस्वती के खिलाफ पोस्टर लगाने के आरोपित मतीन अजहरी, कासिम खान, सोहेब खान और रजा खान को गिरफ्तार किया। इन चारों ने पैगंबर मुहम्मद पर कथित टिप्पणी करने के मामले में डासना देवी मंदिर के महंत के विरोध में बालाघाट के जामा मस्जिद रोड पर पोस्टर चिपकाए थे।

महंत का पोस्टर लगाने के मामले में विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) और बजरंग दल ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी। इसी के आधार पर चारों के खिलाफ आईपीसी की धारा 153-ए, 295-ए और 34 के आधार पर केस दर्ज किया गया है। बता दें कि इससे पहले यूपी के बरेली स्थित इस्लामिया ग्राउंड में जुमे की नमाज के बाद बड़ी संख्या में कट्टरपंथी इकट्ठा हुए थे और सभी ने यति नरसिंहानंद के खिलाफ कार्रवाई और उनका सिर कलम करने की माँग की थी।

मामले को लेकर बालाघाट बजरंग दल के जिला प्रभारी रामेश्वर राणा ने कहा कि वे अपने दोस्तों के साथ सब्जियाँ खरीदने के लिए बाजार जा रहे थे। उन्होंने जामा मस्जिद के पास सड़क पर चार लोगों को देखा, जो डासना मंदिर के महंत के पोस्टर दीवार पर चिपकाकर उस पर जूते मार रहे थे। इसके अलावा वह गंदी गालियाँ भी दे रहे थे।

वीएचपी के दुर्गेश शर्मा ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि बालाघाट एक शांतिपूर्ण जिला रहा है। हालाँकि, कुछ लोग शांति को बाधित करने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा, “कुछ असामाजिक तत्वों ने सड़क पर यति नरसिंहानंद सरस्वती के पोस्टर चिपकाए थे। उन्होंने पुजारी के खिलाफ अपशब्दों का इस्तेमाल किया। इससे हमारी धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँची है।” दुर्गेश ने आगे कहा कि अगर वे किसी चीज के लिए अपना विरोध दर्ज कराना चाहते हैं, तो वे ज्ञापन के माध्यम से कर सकते थे। इस तरह के कृत्य स्वीकार्य नहीं हैं। यही कारण है कि हमने उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई है।

कोतवाली पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर मंशाराम रोमडे ने आरोपितों के खिलाफ एफआईआर की पुष्टि करते हुए बताया कि चारों को गिरफ्तार कर लिया गया है। उन्होंने इसके बारे अधिक जानकारी देने से इनकार करते हुए इसे सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील मुद्दा करार दिया। एआईएमआईएम के 5 सदस्यों के एक प्रतिनिधिमंडल ने पुलिस को पत्र लिखकर 1 अप्रैल को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में अपनी टिप्पणी के लिए डासना पुजारी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने का आग्रह किया। AIMIM के जिला प्रभारी नाजिम खान ने कहा, “पूरे मुस्लिम समुदाय की भावनाओं को आहत करने वाले के खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय, हमारे समुदाय के चार सदस्यों को उनका पोस्टर लगाने के लिए गिरफ्तार किया गया है।”

बीते 1 अप्रैल को गाजियाबाद के डासना देवी मंदिर के मुख्य पुजारी यति नरसिंहानंद सरस्वती ने प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित एक कार्यक्रम में बात की थी। उन्होंने पैगंबर मुहम्मद की विशेषताओं को उजागर करने में हिंदुओं से निडर होने का आग्रह किया था। उन्होंने कहा था, “अगर इस्लाम की वास्तविकता, जिसके लिए मौलाना कहते हैं कि यदि आप मुहम्मद के बारे में बोलते हैं, तो हम आपका सिर कलम कर देंगे, हिंदुओं को इस डर से छुटकारा मिलना चाहिए। हम हिंदू हैं। अगर हम भगवान राम, और अन्य हिंदू देवताओं की विशेषताओं के बारे में कह सकते हैं, तो मुहम्मद हमारे लिए कुछ भी नहीं है। हम मुहम्मद के बारे में और सच क्यों नहीं बोल सकते थे?”

AAP विधायक अमानतुल्ला खान ने पैगंबर मुहम्मद की आलोचना के लिए यति नरसिंहानंद सरस्वती का सिर कलम करने का आह्वान किया था। उसकी शिकायत के बाद दिल्ली पुलिस ने एफआईआर भी दर्ज की थी। बाद में महंत का सिर काटने की धमकी के मामले में AAP विधायक के खिलाफ भी केस दर्ज किया गया था।

SHO अश्विनी की हत्या के लिए मस्जिद से जुटाई गई थी भीड़: बेटी की CBI जाँच की माँग, पत्नी ने कहा- सर्किल इंस्पेक्टर पर दर्ज हो केस

बिहार के किशनगंज जिला के नगर थाना प्रभारी अश्विनी कुमार की शनिवार (अप्रैल 10, 2021) को पश्चिम बंगाल में हत्या के मामले में उनकी बेटी ने इसे षड़यंत्र करार देते हुए सीबीआई जाँच की माँग की है। वहीं उनकी पत्नी ने सर्किल इंस्पेक्टर पर केस दर्ज करने की माँग की है। 

मामले में किशनगंज के एसडीपीओ जावेद अंसारी ने बड़ा खुलासा करते हुए बताया कि SHO की हत्या करने वाले भीड़ को वहाँ की एक मस्जिद से बकायदा अनाउंस करके जुटाया गया था। एसडीपीओ के मुताबिक दो लोगों ने हल्ला कर पहले लोगों को बुलाया और फिर देखते ही देखते भीड़ जमा हो गई। एसडीपीओ ने कहा कि थानाध्यक्ष की हत्या करने के मामले में मस्जिद से ऐलान कर लोगों को इकट्ठा किया गया था कि चोर आ गए हैं, डाकू आ गए हैं जिसके बाद भीड़ ने थानेदार की पीट-पीटकर हत्या कर दी।

रविवार (अप्रैल 11, 2021) को किशनगंज थाना प्रभारी अश्विनी कुमार और उनकी माँ उर्मिला देवी का पूर्णिया जिले में उनके पैतृक गाँव में अंतिम संस्कार किया गया। रविवार को सुबह ही अश्विनी कुमार की 75 वर्षीया माँ उर्मिला देवी ने बेटे का शव देखते ही दम तोड़ दिया था। इसके बाद दोनों का अंतिम संस्कार कर दिया गया। इस दौरान शहीद अश्विनी अमर रहे के नारे से पूरा इलाका गूँज उठा।

मीडिया से बात करते हुए, अश्विनी कुमार की बेटी नैंसी ने अपने पिता की निर्मम हत्या के पीछे साजिश का आरोप लगाया। उन्होंने ऑपरेशन के दौरान अपने पिता के साथ अन्य अधिकारियों की भूमिका पर आशंका जताई। उसने सवाल किया कि जब उनके पिता को मार डाला गया, तो बाकी लोग सुरक्षित वापस कैसे आ गए। उन्हें एक खरोंच भी नहीं आई। नैंसी ने सीबीआई जाँच की माँग की है।

नैंसी ने रोते हुए कहा, “यह एक साजिश है और मैं सीबीआई जाँच की माँग करती हूँ। उन्होंने बंदूकें होने के बावजूद मेरे पिता को अकेला छोड़ दिया। न केवल सर्किल इंस्पेक्टर मनीष कुमार, बल्कि भागने वाले सभी लोगों को दंडित किया जाना चाहिए। मेरे पिता की मृत्यु के बाद मेरी दादी भी सदमे से मर गईं।”

साभार: दैनिक जागरण

अश्विनी कुमार की पत्नी मीनू स्नेहलता ने किशनगंज के सर्किल इंस्पेक्टर मनीष कुमार समेत अन्य के खिलाफ केस दर्ज करने की माँग की है। पुलिस को दिए आवेदन में उन्होंने कहा कि उन्हें पूरा विश्वास है कि उनके पति की निर्मम हत्या में मनीष कुमार का हाथ है। छापेमारी के दौरान मनीष कुमार ने जो लापरवाही और कर्तव्यहीनता दिखाई, उसे पुलिस प्रशासन ने भी माना और उन्हें तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया। इसने साबित कर दिया कि इस हत्याकांड में मनीष कुमार निश्चित रूप से संदेह के घेरे में है। मीनू ने मनीष को अपनी सास की हत्या के लिए भी अप्रत्यक्ष रूप से मनीष कुमार को जिम्मेदार ठहराया है।

साभार: दैनिक जागरण

अश्विनी कुमार के स्वजनों को पूर्णिया प्रक्षेत्र के सभी पुलिसकर्मियों ने एक दिन का वेतन (करीब 50 लाख रुपए) और आईजी ने 10 लाख देने की घोषणा की। वहीं मुख्यमंत्री ने पीड़ित परिवार को हरसंभव मदद देने की बात कही। इसके साथ ही अनुकंपा पर घर के एक व्यक्ति को नौकरी देने की भी घोषणा की गई है। अश्विनी की बड़ी बेटी जहाँ बदहवास स्वजनों को सँभालने की कोशिश कर रही थी वहीं उनकी सबसे छोटी बेटी और बेटा सबसे बार- बार यही पूछ रहे थे कि पापा उठ क्यों नहीं रहे। बता दें कि इस मातम की वजह से गाँव में किसी के भी घर में दो दिनों तक चूल्हा नहीं जला।

साभार: दैनिक जागरण

प्रखंड क्षेत्र में रविवार को जगह-जगह श्रद्धांजलि दी गई और हत्यारे की जल्द से जल्द गिरफ्तारी की माँग की गई। इस मामले में अब तक पश्चिम बंगाल से पाँच जबकि बिहार से तीन लोगों की गिरफ्तारी की गई है। मस्जिद से अनाउंस कर भीड़ इकट्ठा करने के मामले में पुलिस ने मास्टरमाइंड फिरोज और इजराइल थे जिनको भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। इससे पहले शनिवार को पुलिस ने मुख्य अभियुक्त फिरोज आलम ,अबुजार आलम और सहीनुर खातून की गिरफ्तारी की थी।

क्या है पूरा मामला 

ये घटना पश्चिम बंगाल के उत्तर दिनाजपुर के गोलपोखर पुलिस स्टेशन इलाके के गाँव पांतापारा में हुई। किशनगंज थाने के एसएचओ अश्विनी कुमार दलबल के साथ बाइक चोरी को पकड़ने बंगाल के पांतापाड़ा गाँव छापेमारी करने गए थे। भीड़ ने पुलिसकर्मियों पर जानलेवा हमला कर खदेड़ा। थानाध्यक्ष को घेर लिया और पीट-पीटकर हत्या कर दी थी। आरोप है कि पश्चिम बंगाल की पुलिस ने सूचना के बावजूद बिहार पुलिस की टीम का कोई सहयोग नहीं किया।

‘मुनाफ़िक़ीन है आरिफ मोहम्मद, मुस्लिम नाम वाला संघी है जिस पर हम थूकते हैं’: सबरीमाला में केरल के गवर्नर को देख भड़के कट्टरपंथी

केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने सबरीमाला मंदिर में जाकर पूजा-अर्चना की। हिन्दुओं ने जहाँ इसका स्वागत किया है, वहीं कई कट्टरपंथी मुस्लिमों ने सोशल मीडिया के माध्यम से उन पर निशाना साधा। ‘वोक मुस्लिम’ नामक ट्विटर हैंडल ने लिखा कि आरिफ मोहम्मद खान एक ‘गंगा-जमुनी’ मुस्लिम नहीं, बल्कि एक मौकापरस्त है, जिसने फायदों और सत्ता के लिए अपने ईमान व रूह को बेच डाला।

ज़िआउद्दीन अहमद ने लिखा, “ये सेक्युलरिज्म नहीं है, ये उच्च-स्तर का दोहरा रवैया है। आप अपना काम करो और मैं अपना काम करूँगा, कानून के तहत – ये है सेक्युलरिज्म।” वहीं शम्स उर्रहमान अल्हावै ने लिखा कि ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ का ये मतलब नहीं है कि कोई मुस्लिम मंदिर में जाए या हिन्दू मस्जिद में जाए। वहीं आसिफ डॉक्टर नामक हैंडल ने पूछा कि क्या किसी हिन्दू नेता ने आज तक नमाज पढ़ी है?

वहीं एक ‘शो मर्सी’ नामक ट्विटर हैंडल ने इसे क़यामत की निशानी बताया। नसरुल्लाह नामक यूजर ने कहा कि ये आदमी (आरिफ मोहम्मद खान) हमेशा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गुण गाते रहते हैं। वहीं शरीक नामक व्यक्ति ने स्पष्ट किया कि आरिफ उत्तर प्रदेश के मुस्लिमों का प्रतिनिधित्व नहीं करते। एक ऐसे ही ट्विटर हैंडल ने आशंका जताई कि कई ऐसे RSS के लोग हैं जो मुस्लिम नाम रख कर मुस्लिमों को बदनाम कर रहे हैं।

आरिफ मोहम्मद खान के खिलाफ सोशल मीडिया पर कट्टरपंथियों ने उगला ज़हर

वहीं हिन्दुओं में से अधिकतर ने उनका स्वागत करते हुए कहा कि अगर वो विधि-विधान के साथ चीजें नियमानुसार कर रहे हैं तो कोई दिक्कत नहीं है। कुछ लोगों ने पूछा कि सबरीमाला मंदिर में जाने से पहले उपवास करना होता है और माँसाहार नहीं करना होता है, तो क्या उन्होंने इसका पालन किया? कई हिन्दुओं ने आशंका जताई कि जल्द ही आरिफ मोहम्मद खान के खिलाफ फतवा जारी हो सकता है, क्योंकि उन्होंने कट्टरपंथियों के हिसाब से ‘कुफ्र’ किया है।

वहीं ‘ऐसी-तैसी डेमोक्रेसी’ पेज पर शाइस्ता कुरैशी ने लिखा, “हम तो बचपन से आरिफ मोहम्मद खान को सिर्फ़ मुसलमान नाम वाला हिंदू मानते हैं। ऐसे लोग ना कभी मुसलमान थे और ना रहेंगे। कुरान में ऐसे लोगों को ही ‘मुनाफ़िक़ीन’ (दोगला) कहा गया है। ये तब भी गुमराह करते थे कौम को, ये आज भी गुमराह कर रहे हैं। हम तो इन पर शुरू से थूकते हैं, थूकते रहेंगे।” इसी तरह कई अन्य ने भी उनके लिए आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया।

बता दें कि 70 वर्षीय आरिफ मोहम्मद खान 80 के दशक में केंद्रीय मंत्री हुआ करते थे। लेकिन शाहबानो मामले में जब राजीव गाँधी ने सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट कर मुस्लिम तुष्टिकरण को एजेंडा बनाया, तब उन्होंने कॉन्ग्रेस छोड़ दी। मात्र 26 की उम्र में बुलंदशहर के सियाना से विधायक बने थे। वो 1980 में कानपुर से पहली बार सांसद बने। 1884, 89 और 98 में उन्होंने बहराइच लोकसभा का प्रतिनिधित्व किया। सितम्बर 2019 से वो केरल के राज्यपाल हैं।

कुरान की 26 आयतों को हटाने वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट में खारिज, वसीम रिजवी पर 50000 रुपए का जुर्माना

शिया वक़्फ़ बोर्ड के पूर्व चेयरमैन सैयद वसीम रिजवी ने सुप्रीम कोर्ट में कुरान की 26 आयतों को हटाने के संबंध में याचिका दाखिल की थी। इस याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया है। साथ ही 50000 रुपए का जुर्माना वसीम रिज़वी पर किया है।

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (12 अप्रैल, 2021) को कुरान से 26 आयतों को हटाने वाली याचिका खारिज की। इस याचिका में आरोप लगाया गया था कि ये सभी 26 आयतें भारत के कानून का उल्लंघन करते हैं और उग्रवाद को बढ़ावा देते हैं।

सैयद वसीम रिजवी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट के जज रोहिंटन फली नरीमन, बीआर गवई और हृषिकेश रॉय की खंडपीठ ने सुनवाई की।

कुरान में कत्ल, नफरत और कट्टरपन बढ़ाने वाली बातें

वसीम रिज़वी ने सुप्रीम कोर्ट में जो याचिका दाखिल की थी, उसके पीछे तर्क था कि कुरान की इन 26 आयतों में से कुछ आयतें आतंकवाद को बढ़ावा देने वाली हैं, जिन्हें बाद में शामिल किया गया। वह कहते हैं कि जब पूरे कुरान पाक में अल्लाहताला ने भाईचारे, प्रेम, खुलूस, न्याय, समानता, क्षमा, सहिष्णुता की बातें कही हैं तो इन 26 आयतों में कत्ल व गारत, नफरत और कट्टरपन बढ़ाने वाली बातें कैसे कह सकते हैं।

रिज़वी का सिर काट लाओ

कुरान के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका को लेकर रिजवी को चरमपंथी और मुस्लिम विरोधी संगठनों का एजेंट करार दिया गया। शियाने हैदर-ए-कर्रार वेलफेयर एसोसिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हसनैन जाफरी डंपी ने वसीम रिजवी का सिर काटकर लाने वाले को 20 हजार रुपये इनाम देने की घोषणा की है।

परिवार ने भी तोड़ा नाता

कुरान की 26 आयतों को ‘हिंसक’ बता कर उन्हें हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाले शिया वक़्फ़ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष वसीम रिजवी को महंगा पड़ा। तालकटोरा में स्थित कर्बला में बनी वसीम रिजवी की हयाती कब्र को तोड़ डाला गया। उनके छोटे भाई ने कहा है कि परिवार का वसीम से कोई लेनादेना नहीं।

‘बीजेपी की सेंचुरी पूरी, आधे चुनाव में ही TMC पूरी साफ’: बर्धमान में PM मोदी ने उठाया बिहार के SHO की मॉब लिंचिंग का मुद्दा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार (अप्रैल 12, 2021) को पश्चिम बंगाल के बर्धमान में एक चुनावी जनसभा को सम्बोधित किया। बंगाल में 17 अप्रैल को पाँचवें चरण का चुनाव होना है। इस दौरान प्रधानमंत्री ने बर्धमान की दो मशहूर चीजों चावल और मिहिदाना को याद करते हुए कहा कि यहाँ के लोगों की बोली, व्यवहार, यहाँ का खान-पान, हर चीज में भरपूर मिठास है। उन्होंने इस मौके पर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को भी आड़े हाथों लिया।

पीएम मोदी ने कहा, “दीदी की कड़वाहट, उनका क्रोध, उनकी बौखलाहट बढ़ती ही जा रही है। जानते हैं क्यों? मैं बताता हूँ। क्योंकि बंगाल में हुए आधे चुनावों में आपने TMC को पूरा साफ कर दिया है। यानी, आधे चुनाव में ही TMC पूरी साफ। चार चरणों के चुनाव में बंगाल की जागरूक जनता ने इतने चौके-छक्के मारे कि भाजपा की सीटों की सेंचुरी हो गई है। जो आपके साथ खेला करने की सोच रहे थे, उन्हीं के साथ खेला हो गया है।”

प्रधानमंत्री ने कहा कि एक तो नंदीग्राम में बंगाल के लोगों ने दीदी को ‘क्लीन बोल्ड’ कर दिया, यानी बंगाल में दीदी की पारी समाप्त हो चुकी है। दूसरा, बंगाल के लोगों ने दीदी का बहुत बड़ा प्लान फेल कर दिया। बकौल पीएम मोदी, दीदी तैयारी करके बैठी थीं कि पार्टी की कप्तानी भाइपो को सौंपेंगी, लेकिन दीदी का ये खेला भी जनता ने समय रहते समझ लिया और इसलिए दीदी का सारा खेला धरा का धरा रह गया।

पीएम मोदी ने तीसरी बात ये बताई कि दीदी की पूरी टीम को ही बंगाल के लोगों ने मैदान से बाहर जाने को कह दिया है, तो अब दीदी बंगाल के लोगों से गुस्सा तो होंगी ही। उन्होंने लोगों को बताया कि दीदी को ये भी मालूम है कि एक बार बंगाल से कॉन्ग्रेस गई तो कभी वापस नहीं आई। वामपंथी वाले, लेफ्ट वाले गए वापस नहीं आए। उन्होंने TMC सुप्रीमो से कहा, “दीदी, आप भी एक बार गईं तो कभी वापस नहीं आएँगी।”

पीएम मोदी ने बर्धमान में गरजते हुए कहा कि दीदी के लोग बंगाल के अनुसूचित जाति के भाई-बहनों को गाली देने लगे हैं और उन्हें भिखारी कहने लगे हैं। पीएम मोदी ने दुःख जताते हुए कहा कि बाबा साहेब की आत्मा को दीदी के कड़वे शब्द सुनकर कितना कष्ट हुआ होगा। उन्होंने कहा कि वो राजा राम मोहन राय जिन्होंने जाति प्रथा के खिलाफ देश को झकझोरा, इस कुरीति को मिटाने के लिए देश को दिशा दिखाई, उनके बंगाल में दीदी ने दलितों को इतना बड़ा अपमान किया है।

प्रधानमंत्री ने कहा, “दीदी, ओ दीदी, अरे दीदी, हार होती देख ये क्या हो गया आपको? आपके करीबियों को? हालत तो ये हो गई है कि दीदी अब केंद्रीय वाहिनी के खिलाफ अपने कार्यकर्ताओं को भड़का रही हैं। दीदी, ओ दीदी, आपको गुस्सा करना है तो मैं हूँ न, मुझ पर कीजिए। जितनी मर्जी गाली दीजिए। लेकिन बंगाल की गरिमा, बंगाल की गौरवमयी परंपरा का अपमान मत कीजिए।”

प्रधानमंत्री मोदी ने तंज कसते हुए कहा कि दीदी ने 10 साल तक माँ, माटी, मानुष के नाम पर बंगाल पर राज किया है, लेकिन इन दिनों सभा में माँ, माटी, मानुष नहीं बल्कि ‘मोदी, मोदी, मोदी..’ करती रहती हैं। उन्होंने भीड़ द्वारा माए डाले गए बिहार के SHO अश्विनी कुमार की हत्या का मुद्दा उठाते हुए कहा कि वो वीर जवान, दो दिन पहले अपने कर्तव्य का पालन करने बंगाल की धरती पर आया था, लेकिन यहाँ पीट-पीट कर उस पुलिस अफसर की हत्या कर दी गई।

प्रधानमंत्री ने याद किया कि कैसे जब अश्विनी कुमार की माँ ने अपने वीर जवान बेटे का शव देखा, तो उन्होंने भी दम तोड़ दिया। प्रधानमंत्री ने ममता बनर्जी से सवाल दागा कि क्या उस पुलिस अफसर की माँ, आपके लिए माँ नहीं थीं? उन्होंने कहा, “आप इतनी कठोर हैं, इतनी निर्मम हैं, इसका अंदाजा बंगाल की किसी माँ को नहीं था।” उन्होंने 80 वर्षीय वृद्ध महिला शोभा मजूमदार की मौत का मुद्दा भी उठाया।

सुप्रीम कोर्ट के 50% से ज्यादा स्टाफ संक्रमित, घर से चलेगी अदालत: 24 घंटे में कोरोना के 1.68 लाख नए केस

देश में कोरोना संक्रमण के मामलों में बीते कुछ दिनों में रिकॉर्ड वृद्धि देखने को मिली है। देश का सर्वोच्च न्यायालय भी संक्रमण से अछूता नहीं रहा है। खबरों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के 50 प्रतिशत से अधिक कर्मचारी कोरोना संक्रमित हैं। शनिवार (अप्रैल 10, 2021) तक यहाँ 44 पॉजिटिव केस सामने आए। इसके चलते सुप्रीम कोर्ट के जजों ने अपने-अपने घरों से मामलों की सुनवाई करने का फैसला किया है।

इस बाबत सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी किए गए नोटिस के मुताबिक इस दौरान सुप्रीम कोर्ट परिसर को सैनिटाइज किया जाएगा और, सभी बेंच अपने निर्धारित समय से 1 घंटे की देरी से बैठेगी। नोटिस के मुताबिक जो बेंच 10:30 पर बैठती है वह 11:30 पर और जो बेंच 11 बजे बैठती है, वह दोपहर 12 बजे बैठेगी।

सुप्रीम कोर्ट के सेक्रेटरी जनरल ने कहा है कि वे कोरोना संक्रमित होने वालों का डाटा कलेक्ट कर रहे हैं। उनके संपर्क आए लोगों की ट्रेसिंग की जा रही है। कोर्ट परिसर को सेनेटाइज करने का काम चल रहा है। इससे पहले दिल्ली में कोरोना संकट के चलते दिल्ली हाई कोर्ट ने राजधानी की सभी जिला अदालतों में फिजिकल सुनवाई बंद करने के आदेश जारी किए थे। नए आदेश के बाद 23 अप्रैल तक दिल्ली हाई कोर्ट और दिल्ली की सभी जिला अदालतों में सुनवाई अब वर्चुअल मोड में ही होगी।

24 घंटे में टूट गए संक्रमण के सारे रिकॉर्ड

बीते 24 घंटे में भारत में कोरोना के 168912 नए मामले सामने आए हैं, जबकि इस दौरान 904 लोगों की मौत हो गई। इससे पहले रविवार (अप्रैल 11, 2021) को देश में कोरोना के 170195 मामले सामने आए थे जो कि शनिवार (अप्रैल 10, 2021) को मिले 1.52 लाख केसों से 11.6% ज्यादा थे। कोविड के सबसे अधिक मामले महाराष्ट्र में देखने को मिले हैं।

कोरोना को काबू में करने के लिए देश भर में कोरोना टीकाकरण अभियान तेजी से चलाया जा रहा है, लोगों को इसके प्रति जागरूक करने के लिए रविवार को देश में टीका उत्सव की भी शुरुआत हुई।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने सोमवार (अप्रैल 12, 2021) को बताया कि देश में अब तक 10.45 करोड़ से अधिक वैक्सीन की खुराक दी जा चुकी है, जिसमें ‘टीका उत्सव’ के पहले दिन लगभग 30 लाख खुराकें शामिल हैं। भारत की औसत खुराक प्रति दिन 40-लाख का आँकड़ा पार कर गई है, जो विश्व स्तर पर सबसे अधिक है।

दिल्ली में कोरोना के रिकॉर्ड मामले आए सामने

दिल्ली स्वास्थ्य विभाग की ओर से जारी आँकड़ों के अनुसार, राष्ट्रीय राजधानी में 24 घंटे में कोविड-19 के 10,732 नए मामले दर्ज किए गए, जो एक दिन में आए अब तक के सबसे ज्यादा मामले हैं। दिल्ली में इससे पहले एक दिन में सबसे अधिक 8,593 मामले सामने आए थे। इसके साथ ही पिछले 24 घंटे में राजधानी में 48 मरीजों की मौत भी हो गई, जो कि 14 दिसंबर के बाद एक दिन में सबसे ज्यादा मौत का आँकड़ा हैं। 19 नवंबर को शहर में कोविड-19 से 131 लोगों की मौत हुई थी, जो अभी तक एक दिन में मरने वाले लोगों की सर्वाधिक संख्या है।

उत्तराखंड के जंगलों में आग: अंग्रेजों की नीति Vs ग्राम समुदाय के पास जंगल का नियंत्रण – क्या है समाधान?

एमआई 17 हेलीकॉप्टरों की मदद से उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग बुझाई जा रही है। जंगलों में आग मुख्यतः जमीन पर गिरी सूखी घास-पत्तियों से फैलती है। उत्तराखंड के पहाड़ों में चीड़ के पेड़ों की अधिकता यहाँ आग फैलने का मुख्य कारण है। चीड़ की पत्तियाँ जिन्हें पिरूल भी कहा जाता है, अपनी अधिक ज्वलनशीलता की वजह से हिमालय की बहुमूल्य वन संपदा खत्म कर रही हैं।

यूकेफॉरेस्ट वेबसाइट के अनुसार वर्ष 2021 में अब तक जंगल में आग लगने की 1635 घटनाएँ सामने आ चुकी हैं। जिस वजह से 4 लोगों की मौत के साथ ही 17 जानवरों की मौत भी हुई है। जंगल में आग लगने की वजह से 6158047.5 रुपए की वन संपदा जल कर ख़ाक हो गई।

इसी वेबसाइट पर आप जंगल में आग से प्रभावित स्थानों की लाइव जानकारी भी ले सकते हैं।

3 मई 2016 में टाइम्स ऑफ इंडिया में विनीत उपाध्याय की छपी एक रिपोर्ट के अनुसार जंगल की आग से निकला स्मॉग और राख ‘ब्लैक कार्बन’ बना रहा है, जो ग्लेशियरों को कवर कर रहा है, जिससे उन्हें पिघलने का खतरा है। गंगोत्री, मिलम, सुंदरडुंगा, नयाला और चेपा जैसे अपेक्षाकृत कम ऊँचाई पर स्थित ग्लेशियर सबसे अधिक खतरे में हैं और यही ग्लेशियर बहुत सी नदियों के स्रोत भी हैं।

इस आग की वज़ह से पहले ही उत्तर भारत के तापमान में 0.2 डिग्री सेल्सियस की छलांग से मानसून पर हानिकारक प्रभाव पड़ सकता है। चीड़ के पेड़ हिमालय में आग फैलाने के लिए मुख्य रूप से उत्तरदायी तो हैं पर उन्हें काट देना ही आग रोकने का समाधान नहीं है। चीड़ के बहुत से फायदे भी हैं। उसे कई रोगों के इलाज में उपयोगी पाया गया है, जैसे इसकी लकड़ियाँ, छाल आदि मुँह और कान के रोगों को ठीक करने के अलावा अन्य कई समस्याओं में भी उपयोगी हैं।

चीड़ की पत्तियों से कोयला बना और बिजली उत्पादन कर आजीविका भी चलाई जा सकती है।

ऊर्जा एवं संसाधन संस्थान (टेरी ) के जैवविविधता विशेषज्ञ डॉ योगेश गोखले चीड़ के जंगलों में हर वर्ष लगने वाली आग की समस्या पर कहते हैं कि पिरूल के बढ़ने से आग लगने का खतरा भी बढ़ जाता है। नमी की वज़ह से आग को फैलने से रोका जा सकता है। जलती बीड़ी जंगलों में फेंक देना भी जंगल की आग के लिए उत्तरदायी है।

चीड़ के जंगल से पर्यावरण को पहुँच रहे नुकसान पर डॉ गोखले कहते हैं कि अक्सर यह माना जाता है कि जहाँ चीड़ होगा, वहाँ पानी सूख जाता है और देवदार के पेड़ों वाली जगह पर पानी के स्रोत मिलते हैं। चीड़ की वजह से जंगल में आग लगने से कार्बन डाइऑक्साइड बढ़ जाती है।

आग लगने की वजह से पर्यावरण को जो नुकसान पहुँच रहा है, उसे बचाने के लिए डॉ गोखले पिरूल के अधिक से अधिक इस्तेमाल को बढ़ावा देना चाहते हैं क्योंकि पिरूल हटने से बाकि वनस्पतियों का विकास होगा और मिश्रित जंगल बनने की वज़ह से भविष्य में आग लगने की घटनाओं में भी कमी आएगी। पालतू जानवरों के लिए चारा उपलब्ध होगा तो ग्रामीण इसके लिए पिरूल के जंगलों में आग भी नही लगाएँगे।

आईएफएस एडिशनल प्रिंसिपल, चीफ कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट उत्तराखंड डॉ एसडी सिंह से जब यह पूछा गया कि चीड़ के जंगलों में आग न लगे, सरकार इसके लिए क्या कदम उठा रही है तो उन्होंने बताया कि इसके लिए हर वर्ष कार्य योजना बनाई जाती है। फरवरी और मार्च में ही तय कर लिया जाता है कि कहाँ पर फायर क्रू स्टेशन बनाए जाने हैं और साथ में ही संचार साधन भी दुरस्त कर लिए जाते हैं। इसके अलावा जंगल में फायर लाइन बनाते रहते हैं और झाड़ी नहीं होने देते हैं। किसानों को भी साथ लेकर पत्तियाँ इकट्ठा की जाती हैं और खेतों के किनारे सफाई की जाती है ताकि आग खेतों तक न फैले।

पत्रिका की एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग की घटनाओं को नैनीताल हाईकोर्ट ने गंभीरता से लिया है। कोर्ट ने इसके स्थाई समाधान के लिए जंगलों में पहले से चाल व खाल बनाने के निर्देश दिए हैं।

उत्तराखंड में पारंपरिक रूप से पानी रोकने के लिए बनाए जाने वाले तालाबों को चाल व खाल कहते हैं, इनकी वजह से जमीन में नमी बनी रहती है और आग कम फैलती है।

भारत में औपनिवेशिक काल से पहले लोग वनों का उपभोग भी करते थे और रक्षा भी। अंग्रेजों ने आते ही वनों की कीमत को समझा, जनता के वन पर अधिकारों में कटौती की और वनों का दोहन शुरू किया।

जनता के अधिकारों में कटौती की व्यापक प्रतिक्रिया हुई और समस्त कुमाऊँ में व्यापक स्तर पर आन्दोलन शुरू हो गए। शासन ने दमन नीति अपनाते हुए प्रारम्भ में कड़े कानून लागू किए, परन्तु लोगों ने इन कानूनों की अवहेलना करते हुए यहाँ के जंगलों को आग के हवाले करना आरम्भ किया। फलस्वरूप शासन ने समझौता करते हुए एक समिति का गठन किया।

1921 में गठित कुमाऊँ फॉरेस्ट ग्रीवेंस कमिटी का अध्यक्ष तत्कालीन आयुक्त पी विंढम को चुना गया तथा इसमें तीन अन्य सदस्यों को शामिल किया गया। समिति ने एक वर्ष तक पर्वतीय क्षेत्र का व्यापक भ्रमण किया। समिति द्वारा यह सुझाया गया कि ग्रामीणों की निजी नाप भूमि से लगी हुई समस्त सरकारी भूमि को वन विभाग के नियंत्रण से हटा लिया जाए।

स्वतन्त्र भारत में वनों को लेकर बहुत से नए-नए नियम कानून बनाए गए। वर्तमान समय में उत्तराखंड की वन पंचायत जो पंचायती वनों का संरक्षण और संवर्धन खुद करती है, उन्हें अधिक शक्ति दिए जाने की आवश्यकता है।

डाउन टू अर्थ में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व में आदिवासी बहुल क्षेत्र सबसे कम कार्बन उत्सर्जित करते हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि समुदाय के पास जंगल का नियंत्रण रहने से वहाँ आग भी कम लगती है क्योंकि वह ही जंगल की रक्षा भी करते हैं।

जंगल में लग रही इस आग के समाधान पर वरिष्ठ पत्रकार और पर्यावरणविद राजीव नयन बहुगुणा कहते हैं कि उत्तराखंड के गाँवों की चार किलोमीटर परिधि में जंगलों से सरकारी कब्ज़ा हटा कर उन्हें ग्राम समुदाय के सुपुर्द किया जाना चाहिए।

मई-जून की गर्मियों में उत्तराखंड के जंगलों में आग सबसे ज्यादा फैलेगी और हेलीकॉप्टर से पानी गिरा आग बुझाना, इस समस्या का स्थाई समाधान नहीं है। न ही चीड़ के पेड़ों को काट-काट कर हम अपने कृत्यों से लगी इस आग को रोक सकते हैं। समुदाय ने मिल कर ही मानव जाति का निर्माण किया है और वह ही इसे और अपने पर्यावरण को बचा भी सकता है।

लेखक: हिमांशु जोशी, नुपुर कुलश्रेष्ठ

बंगाल में हार का ठीकरा ममता बनर्जी पर फोड़ने को प्रशांत किशोर तैयार, कहा- नतीजों के लिए राजनीतिक दल खुद होते हैं जिम्मेदार

चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर पश्चिम बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) सुप्रीमो ममता बनर्जी और उनकी पार्टी के चुनावी प्रबंधन को देख रहे हैं। इसी बीच शनिवार (अप्रैल 10, 2021) को उनका ‘खान मार्किट’ के पत्रकारों से ‘क्लबहाउस’ एप पर बात करते हुए ऑडियो वायरल हुए, जिसमें उन्होंने मोदी लहर को स्वीकार किया था। एक तरह से ‘लुटियंस पत्रकारों’ के साथ संवाद में प्रशांत किशोर ने बंगाल में ममता बनर्जी की संभावित हार को कबूल किया।

‘क्लबहाउस’ प्रकरण से पिटी भद को बचाने के लिए प्रशांत किशोर ने डैमेज कंट्रोल की कोशिश की है। इसमें उनका साथ दिया ‘लिबरल गिरोह’ के जाने-माने पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने, जो फेक न्यूज़ फैलाने में माहिर हैं। राजदीप के साथ बातचीत में प्रशांत किशोर ने उलटा ममता बनर्जी और TMC को ही जिम्मेदार ठहरा दिया, अगर 2 मई को होने वाली मतगणना में उनकी हार होती है।

प्रशांत किशोर ने अब कहा है कि राजनीतिक दल अपनी आंतरिक मजबूती, नेतृत्व और अपने द्वारा किए और न किए गए कार्यों के कारण हारती तथा जीतती हैं। उन्होंने खुद के बारे में बात करते हुए कहा कि उनके जैसे लोग सिर्फ हार या जीत के अंतर पर फर्क डालने के लिए होते हैं। इस पर राजदीप सरदेसाई ने उनसे सवाल पूछा कि क्या वो किसी हारती हुई लड़ाई को जीत में बदल सकते हैं या नहीं? इस पर PK ने जवाब दिया कि एकदम नहीं।

चुनावी रणनीतिकारों से कोई जादूगर की तरह कार्य करने की अपेक्षा नहीं करता है, लेकिन प्रशांत किशोर स्पष्ट रूप से कह रहे हैं कि पार्टियाँ खुद के कामों से हारती-जीतती हैं, न कि किसी रणनीतिकार की वजह से। हार या जीत के लिए पार्टियाँ खुद जिम्मेदार हैं। कुछ दिनों पहले वो ‘क्लबहाउस’ में भी स्वीकार कर चुके हैं कि TMC के आंतरिक सर्वे में भी भाजपा जीत रही है।

कुछ महीनों पहले प्रशांत किशोर द्वारा दिए गए बयान को याद कीजिए। उन्होंने कहा था कि अगर पश्चिम बंगाल में भाजपा दोहरे अंकों के आँकड़े को पार कर जाती है तो वो बतौर चुनावी रणनीतिकार अपने काम को छोड़ देंगे। प्रशांत किशोर को अब पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह की चुनावी प्रचार अभियान के रणनीति की जिम्मेदारी भी सँभालनी है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कॉन्ग्रेस बुरी तरह फेल हुई। तब प्रशांत पार्टी के ही साथ थे।

प्रशांत किशोर के साथ राजदीप सरदेसाई की बातचीत

प्रशांत किशोर को लेकर मीडिया में हाइप भी इसीलिए बनी थी, क्योंकि उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए 2014 लोकसभा चुनाव में काम किया था। उन्होंने मीडिया के कुछ हिस्से को अपने साथ लेकर अपनी कंपनी की ब्रांडिंग शुरू की। लोगों का मानना है कि 2014 लोकसभा चुनाव में सारी रणनीति पीएम मोदी की थी और कमाल उनके चेहरे की लोकप्रियता का था। प्रशांत किशोर जैसों को तो बस कुछ टास्क दिए गए थे।

बता दें कि वायरल ऑडियो में ऑडियो में प्रशांत किशोर ने माना कि लोग मोदी को वोट कर रहे हैं। बंगाल की आबादी के 27% SC और मतुआ सभी भाजपा के लिए वोट कर रहे हैं। उन्होंने कहा था, “भाजपा को मोदी और हिंदू फैक्टर के कारण वोट मिल रहे हैं। शुभेंदु अधिकारी के बाहर निकलने या मेरे प्रवेश का चुनाव परिणामों पर कोई असर नहीं है। यहाँ 1 करोड़ से अधिक हिंदी भाषी लोग हैं और 27% अनुसूचित जाति हैं। ये सभी भाजपा के साथ खड़े हैं।”

‘इस देश को काफिरों से मुक्त कराना होगा…’: दिल्ली पर जिस मौलाना को चाहिए कब्जा, उसके मोबाइल में मिले एडल्ट कंटेंट

बांग्लादेश के कट्टरपंथी इस्लामी उपदेशक रफीकुल इस्लाम मदनी को रैपिड एक्शन बटालियन (RAB) ने हाल ही में गिरफ्तार किया है। इस्लाम के नाम पर दूसरों को उकसाने वाले मदनी के मोबाइल से एडल्ट कंटेंट मिले हैं। RAB ने इसकी जानकारी देते हुए उसे ‘फ्रॉड’ उपदेशक बताया है।

उसकी गिरफ्तारी 12 मार्च को जन्नत टीवी 24 पर अपलोड किए गए एक वीडियो को लेकर हुई है। इसमें वह अपने अनुयायियों को अल्लाह के नियमों का पालन करने के नाम पर संविधान तथा कानून की अवहेलना करने के लिए उकसाता दिखा था।

वीडियो में उसने कहा था, “अल्लाह के मुल्क में प्रशासनिक आदेश नहीं हो सकते। यही कारण है कि मैं किसी भी आदेश का पालन नहीं करता हूँ। मेरी डिक्शनरी या संविधान किसी भी प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति या सांसद को मान्यता नहीं देती अगर वे इस्लाम के खिलाफ जाते हैं तो… आप क्या करेंगे?”

(Video Courtesy: Youtube/ Jannat Tv 24)

वह आगे कहता है, “आप इसके लिए मुझे मार सकते हैं, कैद कर सकते हैं या मुझे फाँसी भी दे सकते हैं। आप (प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति का जिक्र करते हुए) वही करें जो आपका कानून या संविधान कहता है और मैं वही करूँगा जो मेरे अल्लाह कहते हैं। मैं राष्ट्रपति का सम्मान तभी करूँगा जब वह अल्लाह और इस्लाम का सम्मान करेंगे।”

कथित इस्लामी उपदेशक ने शेख हसीना की अवामी लीग पार्टी को धमकी देते हुए कहा, “यह जान लें कि अगर आप (हम पर) पत्थर फेंकते हैं, तो आप पर ईंटें फेंकी जाएँगी। यदि आप इससे नहीं सीखते हैं, तो आप खुद को एक खतरनाक स्थिति में पाएँगे। हम आपके खिलाफ नहीं हैं। हमारी फोल्ड में लौट आओ।”

7 अप्रैल को जन्नत टीवी 24 पर अपलोड एक अन्य वीडियो में रफीकुल इस्लाम मदनी को मुसलमानों को इस्लाम के लिए मरने के लिए उकसाते हुए देखा गया था। उसने कहा था, “हमें इस देश और इस्लाम को, माफिया सरकार और काफिरों के हाथों से मुक्त कराना होगा… सभी इस्लामी संस्थानों के लिए एक मजहबी प्रमुख होना चाहिए। उनके निर्देशों के तहत, हम सरकारी तंत्र को पंगु बना देंगे और इस देश को माफियाओं के हाथों से मुक्त करेंगे। यदि आवश्यक हो, तो हम सेना को शक्ति प्रदान करेंगे।”

इसके अलावा, उसने अपने अनुयायियों को यह आरोप लगाकर भड़काया कि अवामी लीग का छात्रसंघ उन्हें और ऐसे अन्य प्रचारकों को मार देगा। रफीकुल इस्लाम मदनी ने कहा कि सभी विद्रोही मौलवी बांग्लादेश की खुफिया एजेंसियों की निगरानी में हैं। उसने कहा, “आज, मैं जिहाद नहीं कर सकता। वे मुझे प्रताड़ित कर सकते हैं, सड़क पर हमला कर सकते हैं या मुझे मार सकते हैं। मैं व्यर्थ में मरना नहीं चाहता।”

(Video Courtesy: Youtube/ Jannat Tv 24)

उसने सवालिया लहजे में अपनी बात बताते हुए पूछा, “मैं अल्लाह के आह्वान पर सही कारण के लिए शहीद होना चाहता हूँ। मैं बेवजह मरना नहीं चाहता। इसलिए मैं सुरक्षित रहने की कोशिश करता हूँ। हालाँकि हम मरना चाहते हैं, लेकिन ऐसा करने के लिए कोई प्लेटफॉर्म नहीं है। हम मरना चाहते हैं। हम अपन जीवन शहीद करना चाहते हैं। इस देश में (इस्लाम के लिए) लाखों लोग मरने को तैयार हैं। तुम किससे डरते हो?”

बांग्लादेशी मुसलमान दिल्ली पर कब्जा करें

पीएम मोदी की हालिया बांग्लादेश यात्रा का विरोध करते हुए रफीकुल इस्लाम मदनी ने एक वीडियो संदेश जारी किया था। उसने चेतावनी देते हुए कहा था, “हम बांग्लादेश की धरती पर मोदी को कदम नहीं रखने देंगे। हमारे सभी उलेमा कल इसे साबित कर देंगे।” शेख मुजीबुर रहमान का हवाला देते हुए, उसने धमकी दी कि 18 करोड़ बांग्लादेशी मुसलमान शक्तिशाली हैं या मोदी… यह उनकी यात्रा के दौरान साबित हो जाएगा।

उसने मुसलमानों को उकसाते हुए कहा, “अगर भारत में अल्लामा मदनी की संतान हमें दिल्ली पर कब्जा करने के लिए बुलाती है, तो, हम जाएँगे और करेंगे। दुनिया की कोई भी ताकत हमें रोक नहीं सकती। कोई भी शक्ति या बाड़ हमें रोक नहीं सकती। मुसलमानों के लिए हमारा प्यार इतना मजबूत है कि हम दिल्ली तक एक लंबा मार्च करेंगे। मुसलमानों को अल्लाह और साथी मुसलमानों से प्यार है। अपने इमान को मजबूत रखें। युद्ध के मैदान में जाओ। यदि आप मर जाते हैं, तो शहीद हो जाएँगे।”

उसने कहा था, “आप विश्वास नहीं कर सकते कि बांग्लादेश सरकार अब अपनी शर्तों पर काम नहीं कर रही है। यह हिंदुत्व और मोदी के इशारे पर चल रहा है। मोदी जो भी चाहते हैं, इस देश में होता है। अवामी लीग, चतरा लीग और शेख हसीना के मामले में ऐसा ही है। आज, सभी मंदिरों को उन्नत किया जा रहा है और यहाँ की मस्जिदें मर रही हैं। इसका मतलब है कि जो भी मोदी के खिलाफ बोलेगा उसे यातनाएँ दी जाएँगी और जेल में बंद किया जाएगा। लॉकडाउन के नाम पर वे मस्जिदों और मदरसों को बंद करवाएँगे। हम कुछ भी नहीं मानेंगे… हम चाहते हैं कि यह देश एक सच्चा इस्लामी गणराज्य हो।”

कौन है रफीकुल इस्लाम मदनी

बता दें कि मदनी की उम्र 26 साल है। पर वह ‘शिशु वक्ता (shishu bokta)’ के नाम से जाना जाता है। वजह उसकी हाइट है। भले ही वह 3 फीट 4 इंच का ही हो, लेकिन जहर जमकर उगलता है। सरकार, प्रधानमंत्री, मंत्रियों और नामचीन लोगों के खिलाफ देशभर में घूम-घूमकर जहर उगल उसने पहचान बनाई है। बांग्लादेश में इस्लामी शासन की वह पैरोकारी करता है। वह कट्टरपंथी संगठन हिफाजत-ए-इस्लाम (Hefazat-e-Islam) से जुड़ा है। मोदी की यात्रा के विरोध में बांग्लादेश में हुई हिंसा के लिए यही संगठन जिम्मेदार था।

रूस का S-400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम और US नेवी का भारत में घुसना: ड्रैगन पर लगाम के लिए भारत को साधनी होगी दोधारी नीति

इस महीने की चार घटनाएँ भारत की विदेश नीति के लिहाज से दूरगामी महत्व की हैं।

• पहली, रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव की भारत यात्रा।
• दूसरी, भारत और चीन के सेना कमांडरों के बीच पूर्वी लद्दाख से सेना वापसी को लेकर 11वें दौर की बातचीत।
• तीसरी, अमेरिकी कॉन्ग्रेस की रिसर्च सर्विस रिपोर्ट का अचानक भारतीय मीडिया में आना
• चौथी, अमेरिकी नौसेना के सातवें बेड़े द्वारा लक्षद्वीप के पास भारत के विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र जोन का खुल्लमखुल्ला अतिक्रमण।

ये चारों घटनाएँ सतही तौर पर विदेश नीति के मौजूदा दौर की सामान्य घटनाएँ सी लगती हैं। पर थोड़ा बारीकी से देखें तो ये घटनाएँ अलग-अलग होते हुए खूब घुली-मिली हैं। ये भारत के दूरगामी हितों पर गहरा असर करेंगीं।

9 अप्रैल को भारत में लक्षद्वीप के पास भारत के विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र यानी ‘एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन’ में अमेरिका का सातवाँ बेड़ा घुस आया। घुसने से पहले ना तो इसने भारत को सूचना देना उचित समझा, ना ही दोनों देश के बीच इसको लेकर कोई अन्य संपर्क हुआ। अति तो तब हो गई, जब सातवें बेड़े की ओर से एक प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई। इसमें कहा गया कि अमेरिका को यह हक है कि वह इन इलाकों में जब चाहे अपनी नौसेना को भेज सकता है।

प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया कि अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार भारत को पहले सूचना देना जरूरी नहीं था। विज्ञप्ति में अमेरिकी बेड़े की इस गतिविधि को अमेरिका की “नौ परिवहन की आज़ादी” से जोड़ दिया गया। ध्यान देने की बात है कि अमेरिका के बेड़े पहले भी भारत की सीमा में आते-जाते रहे हैं। लेकिन एक दूसरे की संवेदनशीलता का ध्यान रखते हुए हमेशा इनकी सूचना पहले दी जाती थी। भारत-अमेरिका दोस्ती की ये कैसी अजीब मिसाल है?

भारत और अमेरिका के संबंध पिछले दो दशक में काफी गहरे हुए हैं। दोनों सेनाओं के बीच कई साझा युद्ध अभ्यास हुए हैं। पिछले नवंबर में ही मालाबार संयुक्त युद्धाभ्यास में अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत की नौसेनाओं ने हिस्सा लिया था। इन चारों देशों का शिखर सम्मेलन ‘क्वाड’ यानी चौगुटे के नाम से पिछले महीने ही हुआ था।

दोनों देशों की तरफ से ये बात लगातार दोहराई जाती रही है कि लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं के कारण अमेरिका और भारत का रिश्ता प्राकृतिक और सहज है। अगर सचमुच में ऐसा है तो फिर अमेरिकी नौसेना की विज्ञप्ति में ऐंठन भरी भाषा का इस्तेमाल क्यों किया गया? यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है। इसकी विवेचना भी बेहद ज़रूरी है।

यहीं पर रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव के भारत दौरे का जिक्र ज़रूरी है। वे पाँच और छह अप्रैल को भारत आए और फिर दो दिन के लिए पाकिस्तान गए। रूस और भारत के संबंध भी बहुत पुराने हैं। भारत रूस से बहुत हथियार मँगाता है। फिलहाल भारत एस-400 मिसाइल वायु सुरक्षा प्रणाली रूस से खरीदने का फैसला कर चुका है। इसे लेकर अमेरिका और भारत के बीच में थोड़ी तनातनी है। अमेरिका कहता रहा है कि भारत ने अगर इसे खरीदा तो उसके खिलाफ प्रतिबंध लग सकते हैं। विदेश मंत्री लावरोव से भारत की कई मुद्दों पर बातचीत हुई। भारत ने स्पष्ट किया कि वह रूस से हथियार मँगाता रहेगा।

ये संयोग नहीं है कि रूस के विदेश मंत्री के भारत दौरे के चार दिन के भीतर ही अमेरिकी नौसेना ने ये हरकत की। इसके कई मतलब निकाले जा सकते हैं। क्या अमेरिका ने भारत को इस जरिए एक परोक्ष धमकी दी है? अगर हाँ, तो क्यों? ये सोचने की बात है।

अंतरराष्ट्रीय राजनीति की भाषा में कई बार बातें सीधे-सीधे नहीं कही जातीं। क्या अमेरिका ने सातवें बेड़े के जरिए इस बार पीछे से भारत का कान उमेठने की कोशिश की है? अमेरिकी नौसेना का सातवाँ बेड़ा यों भी भारत को 1971 के बाँग्लादेश युद्ध के दौरान दी गई धमकी को लेकर कुख्यात है। लेकिन अमेरिका ने इस समय भारत के साथ ऐसा क्यों किया? इस गुत्थी को सुलझाना भारत के विदेश मंत्रालय के लिए नितांत आवश्यक है।

इसमें यह भी देखना होगा कि भारत-अमेरिका-जापान-ऑस्ट्रेलिया के चौगुटे को लेकर भारत और रूस के बीच में मतैक्य नहीं है। जहाँ अमेरिका और भारत, दक्षिणी चीन सागर के इलाकों को भारत-प्रशांत यानी ‘इंडो पेसिफिक’ कह कर बुलाते हैं, वहीं रूस अभी भी इसे एशिया-प्रशांत या ‘एशिया पेसिफिक’ कहता है।

रूस के विदेश मंत्री ने सीधे नहीं, लेकिन घुमाफिरा कर चौगुटे को चीन के खिलाफ एशियाई नाटो जैसी लामबंदी करार दिया। उन्होंने कहा कि इस इलाके के लिए और दुनिया के लिए ये लामबंदी ठीक नहीं है। लेकिन भारत ने स्पष्ट किया है कि ये चौगुटा चीन के खिलाफ नहीं है। और इसे एशियाई नाटो कहना सही नहीं होगा। चीन और रूस इस समय दोस्ती की पींगे बढ़ा रहे हैं। क्या लावरोव भारत को चीन का कोई सन्देश देने आए थे?

यहाँ अमेरिकी कॉन्ग्रेस की नवंबर 2020 की एक रिसर्च सर्विस रिपोर्ट का उल्लेख करना ठीक रहेगा। हालाँकि ये रिपोर्ट कोई 5 महीने पहले आई थी लेकिन भारत के कई अखबारों में इसे लेकर चर्चा अब हुई है। सवाल है इसे चर्चा में अभी ही क्यों लाया गया?

भारत पारंपरिक तौर से गुट निरपेक्ष विदेश नीति अपनाता रहा है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका और रूस के बीच चले घनघोर शीत युद्ध के समय भारत जाहिर तौर पर किसी गुट का हिस्सा नहीं बना था। लेकिन जब अमेरिका और चीन शीतयुद्ध 2.0 में प्रवेश कर चुके हैं तो ऐसे में भारत के मौजूदा रुख की चर्चा जो इस रिपोर्ट में है, वो लाजिमी हो गई है। चौगुटे को लेकर, खासकर उसकी सैन्य धड़ेबंदी को लेकर भारत के संशय का जिक्र इस रिपोर्ट में है। अमेरिकी प्रतिष्ठान अब मानता है कि भारत को असमंजस छोड़ कर खुलकर अमेरिका के साथ आना चाहिए।

आपको याद दिलाना जरूरी है कि भारत चौगुटे को लेकर शुरू में बहुत उत्साहित नहीं था। चीन की हरकतों के कारण जो गलवान घाटी में हुआ, इसके परिणामस्वरूप जो सामरिक स्थितियाँ उभरीं, उसको देखते हुए भारत का अमेरिका से नज़दीकी एकदम स्वभाविक था। कई विशेषज्ञों का मानना है कि चीन के कम्युनिस्ट नेतृत्व ने जिस तरह से लद्दाख में सभी पुराने समझौतों का उल्लंघन किया, उसके बाद और आने वाले समय को देखते हुए चौगुटे को लेकर भारत ने अपनी राय बदली।

गलवान घाटी में चीन की सेना की धींगामुश्ती असल में चीन की बहुत बड़ी रणनीतिक भूल थी। क्योंकि इससे पहले भारत एक ओर चीन तो दूसरी ओर अमेरिका के बीच सामंजस्य और संतुलन बिठा कर चल रहा था। लेकिन राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भारत को बाध्य कर दिया कि वह सामरिक दृष्टि और वैश्विक रणनीति को देखते हुए अमेरिका के साथ अपना सहयोग और ज्यादा मजबूत करे।

वहीं इसी हफ्ते भारत और चीन के कमांडरों के बीच पूर्वी लद्दाख में देपसांग, हॉट स्प्रिंग और घोगरा तथा अन्य इलाकों से सेना की वापसी को लेकर बातचीत का होना भी महत्वपूर्ण है। बातचीत का अभी तक कोई नतीजा नहीं आया है। असल मुद्दा है कि क्या चीन को अपनी गलती नज़र आएगी और भारत का खोया विश्वास पाने के लिए वह कोई कदम उठाएगा? या फिर उसकी भारत नीति पीपुल्स लिब्रेशन आर्मी के कठोरपंथियों के हाथ बंधक बनी रहेगी? एक बात तो चीन के नेतृत्व को समझ ही लेनी चाहिए कि वह दादागिरी के डंडे से भारत को नहीं हाँक सकता।

ख्याल रहे कि चौगुटे के देशों में से भारत ही इकलौता ऐसा देश है, जिसकी सीमाएँ चीन से मिलती हैं। उसी का चीन के साथ लंबा सीमा विवाद है। इसलिए सिर्फ वह चौगुटे के अन्य सदस्यों यानी जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका के हितों के लिए ही नहीं खेलेगा।

यह भी निर्विवाद है कि चीन और भारत पड़ोसी हैं। दोनों ही प्राचीन विरासत रखने वाली महान सभ्यताएँ हैं। ये महान सभ्यताएँ हमेशा के लिए चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व के झगड़ालू धड़े के ढीठपने की बंधक बनी नहीं रह सकतीं। ये तत्व अपनी जोर जबरदस्ती की मानसिकता के कारण इतिहास के साथ-साथ भारत और चीन की जनता के साथ भी ज्यादती कर रहे हैं। लेकिन चीन ने अगर मौजूदा रुख नहीं बदला तो भारत और अमेरिकी संबंध को लेकर वो सवाल भी नहीं उठा सकता है। यानी गेंद अब चीन के पाले में है। उसे सीमा को लेकर अपनी विस्तारवादी सोच को छोड़ कर भारत जैसे पड़ोसी का भरोसा जीतने के लिए सार्थक कदम उठाने ही होंगे।

भारत आज अंतरराष्ट्रीय जगत में ऐतिहासिक चुनौतियों के मोड़ पर खड़ा है। एक तरफ अमेरिका उसको पूरी तरह अपने पाले में लेने के लिए आतुर है; दूसरी तरफ सीमा पर चीन की जोर जबरदस्ती है; वहीं तीसरी ओर भारत और चीन के बीच का गहरा व्यापार भी है; और चौथी ओर रूस से उसकी पुरानी दोस्ती है। भारत को इन सबकी आवश्यकता है, सिर्फ ऐसा नहीं है। इन सबको भी भारत की जरूरत है।

भारत के लिए अगले कम से कम 2 दशक आम हिंदुस्तानी की बेहतर ज़िन्दगी के लिए विकास की अप्रतिम संभावनाओं के हैं। ये सही है कि इस समय देश चीन के साथ किसी पचड़े में नहीं पड़ना चाहेगा। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वह अपने आत्मसम्मान या अपने सामरिक हितों से कोई समझौता करेगा।

वैश्विक कूटनीति, सामरिक महत्व, देश का विकास और विश्व पटल पर विकसित अर्थव्यवस्था… सबको देखते हुए भारत को बहुत फूँक-फूँक कर कदम रखने हैं। न तो वह अमेरिका की परोक्ष धमकी को सहन कर सकता है और ना ही वह चीन की जोर जबरदस्ती के आगे झुक सकता है। उसे रूस के साथ भी अपने पुराने संबंधों को कायम रखना है। कुल मिलाकर भारत के लिए अगर यह मुश्किलों का दौर है तो तेजी से बदलता अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य उसके लिए अनंत मौके भी लेकर आया है। देश का नेतृत्व इसे एक चुनौती के तौर पर स्वीकार करके स्वर्णिम अवसर में बदल सकता है।

इसके लिए ज़रूरी है कि भारतीय नेतृत्व भगवान गौतम बुद्ध के रास्ते पर चलते हुए अपना संतुलन नहीं खोए। सम्यक सिद्धांत के भाव के साथ देश एक ऐसा माहौल बना सकता है, जिसमें उसके सामरिक, आर्थिक, भू-राजनीतिक और विरासत संबंधी उद्देश्य पूरे हो सकें। उम्मीद है कि विदेश मंत्री डॉक्टर जयशंकर और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ऐसा संतुलन कायम कर पाएँगे। किसी का पिछलग्गू नहीं बल्कि एक संपन्न भारत ही विश्व को शीतयुद्ध 2.0 की त्रासदी से बचा सकता है। तेजी से बदलती इस दुनिया को एक ऐसी महाशक्ति की जरूरत है, जो ताकत के नशे में चूर होकर दुनिया को बाँटे नहीं बल्कि संतुलित और संयमित हो। इस भूमिका के लिए भारत को अपने को तैयार करना है।